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अधूरी ख्वाहिशें

निशी ने अपनी सारी अलमारी छान ली पर उसे कुछ भी सफेद रंग में नही मिला पहनने को।उसे कभी सफेद रंग पसन्द ही नही था।

भगवान जी के पास रखे सफेद लिफाफे में से कुछ रुपये लेकर निशी ने अपनी स्कूटी उठाई और पहुच गई गोरखपुर के मार्किट में।संपत की दुकान पर बहुत से सूट देखे पर सफेद देखते ही उसे पसन्द न पसन्द का पैमाना ही खत्म हो जाता था।निशी को जब कुछ समझ नही आया तो दुकान वाले ने एक साड़ी दिखाई।ऑफ वाइट साड़ी पर गुलाबी नीले सितारे जँच रहे थे।इतनी सुंदर साड़ी पहली बार ही देखी थी निशी ने 2600 की शिफॉन साड़ी को बहुत कम कराने पर दुकान वाले ने 2500 में दे ही दी।निशी खुश थी पर अब एक और बड़ी समस्या थी,अभ्युदय जी के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा।

"क्या आज उन्हें सच बोल दू कि वो मुझे पसंद हैं?"

"नहीं। ये उपहार थोड़ी ना हुआ फिर क्या दू?"

"पोहा पसन्द है उन्हें।हम्म.."

पोहा,मूंगफली,सौंफ,हरा धनिया,प्याज,आलू,नींबू और सेव लेकर घर पहुंची।मुझे अपनी माँ के हाथ का पोहा पसन्द है बस वैसे ही बनाने की कोशिश की।चख कर भी देख लिया।ठीक बना है।अपने रूम को कुछ गुब्बारों से सजाया था एक छोटी पेस्ट्री भी लाकर रखी थी।दिमाग में कुछ और चल रहा था लेकिन वैसा होगा या नहीं ये डाउट था।

शाम को एक बार फिर फोन मिलाया अभ्युदय जी के नम्बर पर

"जिंदगी हेलो।"

"हैप्पी जन्मदिन।"

"थैंक्यू तुम्हारा।"

"आप नाराज़ हैं?जन्मदिन पर भी नाराज़ रहेंगे?"

"किसने कहा? नहीं मैं नाराज नही।कितनी देर में आओगी?"

"मैं आज नहीं आ पाऊंगी।"

"क्यों?यंहा से भी पोस्टिंग खत्म कर ली क्या?"

"नहीं।वो आज मार्किट से आते वक्त स्कूटी खराब हो गई और हाथ मे थोड़ी चोट.."

"चोट? कैसी चोट? तुम्हें लगी? कब? कैसे? ध्यान नही रख सकती हो अपना?" इतनी बैचैनी?इतने परेशान?ये तो देखा था मैंने जब दादा जी बीमार थे।आज मेरे लिए इनकी ये परेशानी साफ जाहिर कर रही है इनका प्यार।

"अभ्यु जी।"

"निशी।तुम्हें कुछ हो गया तो मैं.."

"क्या मैं?कहिये? पूरा कीजिये?क्या आप?"

"मैं आता हूँ।" फोन रख दिया उन्होंने।चाल कामयाब हुई।स्कूटी तो खराब हुई थी पर ये चोट वाली बात झूठ थी।

सफेद साड़ी पर कंट्रास्ट पिंक ब्लाउज और हल्की पिंक लिपस्टिक।साड़ी में दिखता मेरा हल्का बदन सच में मेरी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।आज तक लड़की ही आई थी मेरे रूम में कभी कोई लड़का नही तो अपनी मकान मालिक को बताना जरूरी था।

"आंटी।"

"निशी।बहुत सुंदर लग रही हो।तुम्हारी साड़ी तो बस ऐसा लग रहा कि तुम्हारे लिए ही बनाइ गई है।"

"थैंक्यू आंटी।मुझे एक पार्टी में जाना है।मेरे एक पेशेंट आने वाले हैं घर।वो अभी आएंगे थोड़ी ही देर में,आपको कोई ऑब्जेक्शन तो नहीं?वरना मैं उन्हें फोन करके मना कर दूँ?"

"नही बेटा।हमे कोई दिक्कत नही।"

दिल खुशी से झूम उठा।नाच उठा।अरे जन्मदिन के लिये एक सीडी लाई थी।नुसरत फतेह अली खां साहब का एक गाना है 'जिस्म दमकता जुल्फ घनेरी, रँगी लब आंखे जादू,संगमरमर उधा बदल सुर्ख शफक हैरान हूँ।' इसी गाने की ।

मेरे कमरे पर हमेशा रेडियो चलता ही पाया जाता है।मेरे फोन की घंटी बजी।

"निशी.. भीगी सी भागी सी..अच्छा गाना लगाया है।हम खुश हुए।घर कौन सा है तुम्हारा?बाहर तो आओ।"

"जी बर्थडे बॉय।" मैं बाहर आई वो अपनी स्टिक लिए गाड़ी के पास ही खड़े थे।मैं ने अपने हाथों में उनका हाथ लिया और गेट से अंदर ले आई।

कमरे में आते ही अभ्युदय जी बोले

"झूठ कहा था?"

"जी।"

"क्यों?"

"आपको अपने गरीब खाने पर बुलाने के लिए।"

"निशी।"

"जी।"

"बहुत सुंदर हो तुम।"

मैंने कोई जवाब नही दिया बस अंदर वाले कमरे में गई और लाई हुई पेस्ट्री ले आई।

"तो काटूँ?"

"अरे रुकिए।" भगवान जी के पास से कुमकुम चावल की प्लेट उठाई और पहले तिलक लगाया।चावल हल्दी लगाया और फिर कहा काटिए।

काटते हि हैप्पी बर्थडे गाकर मैंने उन्हें पेस्ट्री खिलाई।पोहा लेकर दिया तभी छोटू ऑन्टी का बेटा भी आगया।ये जरूर आंटी के दिमाग की उपज होगी पर अच्छा ही है, उनके मन का वहम या कोई भी विचार निकल जाएंगे।मैंने छोटू को भी पोहा लाकर दिया।अब अभ्यु जी और छोटू बैठकर पोहा खा रहे थे।

"आप चाय पियेंगे?"

"नही। पोहे बहुत अच्छे बने है निशी।पर तुमने ऐसा क्यों किया?"

"मैंने क्या किया?"

"पोहे के साथ अखरोट कौन खाता है?

मैं और अभ्युदय जी देर तक हंसते रहे।
 
बहुत देर तक छोटू के न लौटने पर आंटी खुद ही आ गईं।अभ्युदय जी को देखकर उन्हें अपने किए पर पछतावा हुआ शायद।उन्होंने बातों ही बातों में कई बार बहुत अफसोस जताया अभ्युदय जी की हालत पर।मुझे गुस्सा आने को ही था पर अभ्युदय जी ने कहा

"आंटी जी आपका एक ही बेटा है?"

आंटी जी सुन कर आंटी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।तमतमाती आंटी छोटू को लेकर चली गईं।मैंने अभ्युदय जी के लिए एक कार्ड जो अपने हाथों से बनाया था दिया।एक छोटे से गणपति जो कि पूरे सफेद थे, बस उनकी पगड़ी लाल रंग की चमक रही थी दिए।

"ये आपका बर्थडे गिफ्ट।"

"क्या है निशी?"

"खोलकर देखिए।"

उन्होंने बड़ी बेरहमी से गिफ्टिंग पेपर फाड़ा।जो की मुझे पसंद नही आया।शायद कभी-कभी हम जिसे तोहफा देते हैं, उसकी हर चीज़ से इतना जुड़ाव महसूस करते हैं कि उसकी हर चीज़ को प्यार नवाज़ते हैं पर ये तो बड़े अनरोमांटिक हैं।सोचते हुए मुँह से न चाहते हुए भी निकल ही गया।

"हुह"

"क्या हुआ निशी?"

"थोड़ा प्यार से,नजाकत से।किसी ने कितने प्यार से इस गिफ्ट को पैक किया होगा।कितना वक्त दिया होगा और आपकी ये बेरहमी?पसन्द नही आई हमें।"

"ओह।" अभ्युदय जी ने गिफ्ट खोलना रोककर पूछा।

"अच्छा अखरोट के छिलके भी संभाल कर रखती हो मतलब?"

"जी, मतलब?"

"क्या मतलब? बताओ अखरोट के छिलके भी संभालकर रखती हो क्या?किसी ने गिफ्ट दिया,प्यार से दिया और भी जो तुमने कहा सब।"

मैं उठी और अंदर वाले रूम से एक प्लास्टिक का डिब्बा ले आई।उन्होंने खोल कर देखा तो अपने सिर पर थपकी दी और कहा

"मैं कैसे भूल गया? तुम निशी हो।"

डिब्बे में अखरोट के छिलकों को देख मुस्कुरा दिए अभ्युदय जी।

"आप गिफ्ट खोलिए।"

इस बार उन्होंने मुझे भी अपने पास ही बिठा लिया।आपको बता दूँ की पी जी मे रहती हूँ पर घर अच्छा है। दो कमरे हैं। पहले कमरे में एक सिंगल बेड है और एक लंबी टेबल सी है जिसे गद्दा डालकर सोफे की तरह ही यूज़ किया जाता है।कमरे की खिड़कियों पर पर्दा नही है कांच ऐसे हैं जिससे रोशनी पर अंदर का कुछ नही दिखाई देता।खिड़कियां खुलती भी छत पर जाने वाली सीढ़ियों के पीछे हैं तो रात को बाहर दिखने का भी कोई सवाल नही।कमरे में 3 आले बने हैं जिनमे एक मे मेरे भगवान विराजे हैं और बाकी दो में बुक्स।भगवान वाले सेल्फ पर ही एक आईना और वही लिपस्टिक काजल बिंदिया कुमकुम वगैरह फैला है।अंदर के कमरे में एक बर्नर की गैस,छोटा सिलेंडर,कुछ बर्तन और एक अलमारी।

मैं सामने ही बैठी थी देखने को कि उन्हें उनका तोहफा कैसा लगेगा? भगवान की मूर्ति देख उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी।बस एक बार अपने माथे पर लगाया,उन्हें एक किस किया और उठकर मेरे भगवानों के पास ही रख दिया।

"माफ करना निशी, मेरी भगवानों से बनती नहीं।"

"मतलब?आपको नही पसन्द आया गिफ्ट?"

"ऐसा नही है।लेकिन,मैं इन्हें नहीं रखूंगा।वैसे भी गिफ्ट मैं मांग कर ले लूंगा।"

"ठीक है तो क्या चाहिए आपको?"

"दोगी?"

"ये ऐसे कौन पूछता है?डरा तो ऐसे रहे हैं जैसे मेरे पास खजाना है कोई?"

"बातें मत घुमाओ।"

"कौन घुमा रहा बातें?"

"बताइये क्या चाहिए आपको?"

"मुझे एक बार गले लगा सकती हो अपने?"

ऐसा गिफ्ट कौन मांगता है?न आई लव यू।न मैं तुम्हें पसन्द करता हूँ।बस गले लगना है।मैं क्या बोलूँ?आंटी आ गईं तो?मेरा दिल जोरो से कांप गया।अभ्युदय जी की सारी अच्छी इमेज पर किसी ने जैसे सारी स्याही की बोतल ही लुढ़का दी हो।मुझे और मेरे चेहरे पर आए भावों को देख अभ्युदय जी समझ चुके थे मेरा जवाब तभी उन्होंने अपनी बात घुमा दी।

"क्या हुआ?डर गईं डॉ साहिबा? हा हा.."

"ये आप कभी मुझे निशी,कभी डॉ साहिबा क्यों कहते हैं?"

"अभी डॉ साहिबा बन कर सोच रही हो, तो डॉ साहिबा ही तो कहूंगा न?निशी होती तो डरती नही।"

मैंने कुछ भी नही सोचा बस जाकर उन्हें गले लगा लिया।वो अब भी भगवान के सामने ही खड़े थे।उन्होंने कोशिश की थी अपने बाएं हाथ को उठा कर मेरे कंधे पर रखने की।उनकी इस कोशिश से खुश थी मैं।शायद इसी बहाने उनके हाथ मे वापिस पावर आ जाये।

"कुछ और भी मांगूँगा तो दोगी?"

मैंने कुछ भी नही कहा बस आंखों में आंसू लिए जो पल बीता उसे समेटने को,खुद को संभालने को अंदर चली आई।

अभ्युदय जी मेरी रखी एक ड्राइंग बुक को उठा कर पलटने लगे।मेरी बनाई बहुत सी अलग-अलग ज्वैलरी डिज़ाइन, कुछ मेंहदी की डिज़ाइन, कुछ कपड़ों के।

"आप चलिए घर मैं कपड़े बदल कर आती हूँ थोड़ी देर में।"

"मेरा गिफ्ट?"

"अभ्युदय जी।"गुस्सा दिखाते हुए मैंने कहा।

"यही साड़ी पहन कर घर चलोगी?"

"क्या मतलब?"

"मेरा गिफ्ट?"

"ये साड़ी पहन कर घर चलूँ?ये आपका गिफ्ट?"

"हाँ।तुम्हें क्या लगा?किस्सी मांगूँगा?"

"अभ्युदय जी "

"अच्छा अब गुस्सा नहीं।तुम ऐसे ही चलोगी और मेरे साथ ही चलोगी।" मैं और अभ्युदय जी घर के लिए चल दिए।रास्ते में एक फोन आया।

"हेलो। तुम। तुमने कैसे याद किया? कुछ पैसे चाहिए? कितने?अकाउंट में कितना है बैलेंस?क्या हुआ?अम्मी और अप्पी ओह। ठीक है भेजता हूँ। ठीक है। सुनो आज जन्मदिन हाँ.. शुक्रिया।कल तक हो जाएगा। खुदा हाफ़िज।"

फोन रखकर अभ्युदय जी ने एक काल किया।

"और डार्लिंग? थैंक्यू.. थैंक्यू.. अच्छा सुन उसे 1 लाख चाहिए कल तक। हो पायेगा? करवा दे यार।परेशान है बहुत, उसकी अप्पी को ले गए है कुछ.. समझोगे या बस यही बातें? ठीक है मत कर।सुन घर पर फोन किया तो खून पी जाऊंगा।"

ये चल क्या रहा है?इतना सस्पेंस?फिर लगा छोड़ो मुझे क्या करना।होगा कुछ पर्सनल, बस यही सोच ध्यान बाहर की तरफ भटका लिया।

आज घर पर चहल-पहल थी।अभ्युदय जी की मासी, उनके बच्चे चिया और जिया भी आये थे।

"अभ्यु दा ये वो डॉ निशी हैं?"

"पूछ लो तुम खुद ही चिया।"

"हाँ चिया मैं ही हूँ,डॉ निशी।"

तभी पीछे से जिया भी आ गई।

"तो ये हैं।हम्म.."

"जी हम ही हैं।"

"आपको ही चॉकलेट केक पसन्द है?"

"हम्म.."

"थैंक्यू निशी भ डॉ जी।"

"थैंक्यू? वो क्यों?"

"क्योंकि हम वनीला और ब्लैक फारेस्ट खा-खा कर बोर हो गए हैं।कोई तो आया जिसने दादा पर हुक्म चलाया।"

"अच्छा जी।"

"जी।अब आप देखिएगा दा की खिंचाई।"

आंटी और मासी साथ ही रूम में आईं।दोनो ने ही मेरी साड़ी और मेरी तारीफ की।बोलकर गई दादा जी के कमरे में आने का बोलकर।मैं खुश इसलिए भी थी क्योंकि 3 दिन बाद मेरा भी जन्मदिन है।

हम सभी दादा जी के कमरे में आ गए।सारे कमरे को सफेद गुलाबो से सजाया गया था। अभ्युदय जी बहुत ही पुरानी फ़ोटो जिसमे वो दादा जी के साथ खड़े होकर केक काट रहे थे का बड़ा पोस्टर दीवार पे था।

उस तस्वीर को देख कर अभ्युदय जी की आंखों में चमक थी और कुछ आंसू भी।
 
"ये आँसू क्यों?"मैंने धीरे से पास आकर पूछा।

"कुछ नहीं निशी।ये जन्मदिन बहुत यादगार था और बस इसी जन्मदिन के बाद मैंने जन्मदिन बनाना ही बंद कर दिया था।"

"ऐसा क्या हुआ था?"

"कुछ कड़वी याद जुड़ी है।आज रहने दो।"

मैंने सबकी तरफ नज़र घुमाई पर सभी अपनी-अपनी बातों में व्यस्त कुछ करते से लगे।

"आप बताएंगे या नहीं?"

"निशी इसी जन्मदिन पर केक काटने के बाद दादू को हार्ट अटैक आ गया था,अफरा-तफरी मच गई थी और बहुत सहम गया था मैं।पर दादू ठीक हो गए और तब से मैंने केक नही काटा।"

"लेकिन आज?"

"आज भी तुमने निशी मुझसे केक नही पेस्ट्री कटवाई।मैं खुद डर रहा था कि तुम्हें कैसे मना करूँगा।लेकिन तुम तो मेरी निशी हो,मेरे लिए कोई परेशानी खड़ी कर ही नही सकती हो।"

"अभी केक?मेरा मतलब वो चॉकलेट केक?"

"माँ जानती हैं मैं जो मान लेता हूँ वो मान लेता हूँ।देखते हैं आज माँ क्या करेंगी?"

थोड़ी ही देर में कप केक्स से बना एक केक आया।दादाजी की तबियत खराब जबसे हुई थी उनका उठना बन्द था पर अभ्युदय जी का मन वंहा ही था।मैंने आंटी जी के पास जाकर बस एक बार कहा ही था और वो मान भी गईं।मैं कप केक्स उठा कर दादा जी के कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे सब।

केक रख मैं वापिस आकर अभ्युदय जी का बांया हाथ पकड़ कर चलने लगी।सब हम दोनों को ही देख रहे थे।चिया जिया अपनी मम्मी के कान में कुछ खुसपुस करने में व्यस्त थीं।आंटी और दादा जी की आंखों में अलग ही प्यार था।

"मैं जानता था,तुम ही कर सकती हो नामुमकिन को मुमकिन।"दादा जी ने मुस्कुरा कर मुझसे कहा।

"मैंने तो कुछ किया ही नही दादा जी।"

"किया तो।मेरे अभ्यु को 3 महीने के पहले ही चला दिया अब इसे पहले जैसा ही कर दो।"

"कोशिश करूँगी दादा जी।"

"मैं भी हूँ दादू।या अब आपको बस यहीं दिखतीं हैं?" अभ्युदय जी ने चिढ़ कर मजाक में कहा।

"आजा मेरे शेर बच्चे।"दादा जी ने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास ही बैठा लिया।कप केक लेकर सबने एक साथ हैप्पी बर्थडे गाना गाया।बहुत खुशनुमा माहौल था।बस कमी थी अभ्युदय जी के पापा जी की।वो इस पार्टी में नही थे।किसी कॉन्फ्रेंस की वजह से बाहर थे।

आज वाइट सॉस का पास्ता और चॉकलेट कप केक्स खाकर चिया,जिया मेरे गुन गा रही थीं।वंही इन सब में,इतने लोगों के बीच अभ्युदय जी की नज़र सिर्फ मुझ पर थीं।

ये नजर मुझपर हैं इस बात का पता तो था ही पर एक दो बार जब नजरें मिली तो बात साफ थी।

मैं भी कंहा कम हूँ, अभ्युदय जी को जानकर नजरअंदाज करती रही।पर जब दिल खुद ही बेकाबू हो तो कोई कैसे काबू में रहे?बस यही सोच की वजह से जैसे ही उन पर नजर जाती दिल मे कुछ हो जाता।

ये मुझे क्या होता जा रहा है?क्या ये प्यार है?लेकिन मैं तो बहुत ही प्रैक्टिकल लड़की हूँ, एक ऐसे व्यक्ति से प्रेम जो उम्र में मुझसे बड़ा है साथ ही पूरी तरह सक्षम भी नही अपनी बीमारी की वजह से।फिर ये क्या है? कोई लगाव है या शायद इसे ही पहली नजर का पहला प्यार कहते होंगे।स्कूल में कभी किसी लड़के की तरफ नही देखा आज तक कभी कोई हीरो भी नही पसन्द आया।लेकिन अब दिल ऐसे धड़कता है जैसे अभी-अभी 440 वाल्ट का झटका लगा हो।

सोच में डूबी मैं सिर्फ अभ्युदय जी की तरफ ही देखे जा रही थी तभी मासी जी पीछे से आईं और बोलीं "बस भी करो डॉक्टर साहिबा,नज़र लगाओगी क्या अभ्यु को?"

मैं हड़बड़ा गई।बहुत ही ज़्यादा हाथ से प्लेट गिरने को ही थी पर संभाल लिया किसी तरह और बोली

"मासी जी वो किसी सोच में थी।अभ्युदय जी की तरफ तो ध्यान भी नही था।"

"हाँ पर नज़र जिस पर थी हम सबने देखा।"

"सॉरी।"

"अरे नहीं बेटा, सॉरी क्यों?ये कोई गलती थोड़े न है।ये इश्क है ही ऐसा मर्ज।"

"जी,इश्क?नही मासी आप गलत समझ रही हैं।"

"रहने दो।चेहरे की रंगत और इस सफेद साड़ी के रहते कहना मुश्किल है कि इश्क नही है।"

"मासी जी,लगाव है। इतने दिनों से उनके साथ हूँ।बहुत गहरा रिश्ता होता है एक मरीज से हमारा।बस वही रिश्ता है और कुछ भी नहीं।"

"निशी अगर ऐसा है तो अभ्यु को बता दो।उसका दिल बहुत बार टूटा है।वो अब नही सह पाएगा।"

"जी मतलब?"

"सच कहा अभ्यु ने,बहुत मतलब पूछती हो।"

मौसी जी चली गईं आंटी के पास और मेरी नजर एक बार फिर अभ्युदय जी पर।

सफेद शर्ट और ब्लैक जीन्स।स्पोर्ट शूज और हाथ मे स्टिक।बालों में हल्का तेल या जेल पता नही पर सलीके से कंघी किये बाल।क्लीन शेव और रौबदार मूछें बिल्कुल ठाकुरों वाली। तभी बाहर से आवाज़ आई

"बारिश होने लगी।"

आवाज़ चिया या रिया में से ही किसी की थी।ये आज इस मौसम की पहली बारिश थी।जुलाई की पहली बारिश।

बारिश के पड़ते ही मिट्टी की आती सौंधी खुशबू फैल गई।मुझसे रहा नही गया और मैं कमरे से निकल कर गेट पर आ गई।

गहरी सांस लेकर इस खुशबू को अपने अंदर तक समेट लेने की चाह, जो बचपन से रही है उसकी नाकामयाब कोशिश करने लगी।

मैं नही जानती थी ऐसा करते मुझे कोई देख रहा है या नही बस मैं तो व्यस्त थी वो खुशबू समेटने में।

पीछे से एक हाथ कंधे पर आया और मैं अपनी इस बचकानी हरकत से बाहर निकली।

"जी आंटी जी।वो मैं.."

"तुम्हें पसन्द है ये खुशबू?"

"जी।"

"निशी चलो खाना खा लो।"

"नहीं आंटी जी।बस अब घर निकलूंगी।पास्ता बहुत खा लिया है।पेट मे बिल्कुल भी जगह नही अब।"

"बिना कुछ खाए मैं जाने नही दूंगी।चलो आओ।"

मैं पीछे-पीछे आ गई।न जाने कब साड़ी पैर में फसी और मैं लड़खड़ा गई पर अभ्युदय जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले "मेरे रहते कभी नही गिरने दूंगा तुम्हें,न कुछ होने दूंगा।"

"थैंक्यू अभ्युदय जी।"

"ये जी बोलना कब बन्द करोगी?"

"जब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे।"

"मतलब कभी नही?"

"आप भी मतलब,मतलब शुरू हो गए?"

"तुम्हारा मतलब अलग होता है।अब पकाओ मत।चलो खाना खाने।"

"जी।"

डाइनिंग टेबल पर सभी थे मासी-मौसा जी,चिया-रिया,आंटी,अभ्युदय जी और मैं।

पालक की पुरिया और आलू की सब्जी।दही बड़े और इमली की चटनी।गुलाब जामुन और फ्रूट कस्टर्ड, साथ ही एक और चीज़ ये कैसे न रहती इधर ये तो हर समय होती ही है खाने में जी वही जो आप बिल्कुल सहि समझें हैं अखरोट।

इतनी लज़ीज चीज़ों को सामने देख भी मन खाने का नही था।थोड़ी ही भूख थी जो इन सब चीज़ों से नहीं भरती तभी देखा कि शर्मिला कटोरी में लेकर कुछ जा रही है।

"दूध रोटी?"

"जी।वो दादा जी के लिए मैडम।"

"मुझे भी मिल सकती है क्या?"

"दूध रोटी खाने का मन है निशी?" आंटी ने पूछा तो तुरंत ही मुंडी हाँ में हिला दी मैंने।

आज मजा आ गया था दूध रोटी खा कर।बिल्कुल घर जैसा स्वाद।अब घर निकलने की बारी थी।पर ये बारिश थमने का नाम नही ले रही थी।शायद ये साजिश है उस ऊपर वाले कि,क्या चाहता है वो? मैं अभ्युदय जी को देखकर बहुत कुछ सोच रही थी।

"चलो मैं चलता हूं, तुम्हें रास्ते मे घर छोड़ दूंगा।"अभ्युदय जी ने मुझे देखकर कहा।

"नहीं मैं निकल जाऊंगी।कोई दिक्कत नही है।आप घर पर ही आराम कीजिये आज बहुत एक्सरशन हो गया है।"

"अरे पर मुझे तो जाना ही है न?"

"मतलब?"

"मतलब ये डॉ साहिबा कि अभी दोस्तों की पार्टी बाकी है,जो देर रात तक चलेगी।मुझे जाना ही है तुम्हें छोड़ते हुए निकल जाऊंगा।"

"जी।ठीक है।"

"अभ्यु ये दवाई लो।देखो ज्यादा देर नही करना और तुम्हारे किसी दोस्त ने कोई भी जबरदस्ती की तो मुझसे बुरा..।"आंटी ने पानी और दवाई अभ्युदय जी को दी।

"माँ चिल।मैं जल्दी आ जाऊंगा।"

हम दोनों गाड़ी में बैठ गए।
 
गाना चलता रहा, अचानक फोन बजा और, अभ्युदय जी बात करने लगे।

"मैं करवा दूंगा इंतजाम।एक-दो दिन तो रुकना पड़ेगा। हाँ, मैं ठीक हूँ।"

फोन रखकर अभ्युदय जी पीछे पलटे मैं उनकी तरफ न देखते हुए गाने और बारिश पर ही ध्यान लगाएं हुई थी।

"निशी।"

"जी।"

"क्या सोच रही हो?"

"इस बारिश को देख रही हूँ।"

"तुम्हें पसन्द है बारिश?"

"जी।बहुत।आपका ये कौन बनेगा करोड़पति खत्म हुआ हो तो मैं कुछ पूछ सकती हूँ?"

"पूछो।"

"आप किस से बात कर रहे थे अभी?"

"एक दोस्त है।"

"कोई लड़की है?"

"हाँ।"

"क्या हुआ उन्हें?एक लाख रुपये की जरूरत उन्हें ही है?"

"उसकी बहन की कुछ लोग ले गए हैं,ऐसा कहा है उसने।"

"और आपने मान लिया?क्या उन्हें पुलिस के पास नही जाना चाहिए?"

"निशी, तुम जानती नही हो उसे।इसलिए ऐसा कह रही हो।उसे लाख रुपये सिर्फ अपने लिए चाहिए जानता हूँ और दे भी दूंगा क्योंकि कभी कहा था उसे,कि उसकी हर जरूरत को पूरा करूँगा।"

"जायज़ हो या नाजायज़?तब भी?"

"हाँ सारी जरूरतें।"

"प्यार करते हैं उसे?"

"नहीं, वो करती थी।लेकिन "

"लेकिन क्या अभ्युदय जी?" डर लग रहा था मुझे।क्या कहेंगे अब अभ्युदय जी।ये कौन हैं जो आज ऐसे मेरे दिल को ऐसे कमजोर कर रही है।

"बताइए न?लेकिन क्या?"

"लेकिन कुछ रातें हैं जो मैंने साथ बिताईं है उसके।"

बस दिल टूट चुका था,दिल के जुड़ने की अभी खुशी भी ठीक से नही मनाई थी और ये गम,ये दर्द उफ्फ।दर्दनाक सी इस रात में मैं कुछ बोल नही पाई।आंखों से आंसू बह निकले और बिना कुछ आगे जानने के बजाय मैंने बिल्कुल चुप रहना सही समझा।

घर आ चुका था।मैं बिना कुछ कहे बारिश रुकने का इन्तेजार किये बगैर।साड़ी के खराब हो जाने की चिंता किये बगैर गाड़ी से उतरी अपना बैग लिया और बिना कुछ बोले चली गई।मुड़कर भी नही देखा एक भी बार।दिल टूटना क्या होता है ये अभी कंहा जाना था ये तो बस एक दर्द था जो अभी-अभी उठा था।

घर जाकर कपड़े बदल कर रेडियो ऑन किया और लेट कर रिया को फोन किया।

"हाँ बोल।"हमारी बातें हेलो से शुरू नही होती कभी भी।

"सुन घर आ जाना।"

"क्या हुआ?टाइम देख नालायक।"

"देख लिया टाइम।आजा न यार।"

"निशी क्या हुआ तुझे?"

मैं चुप थी पर आंसू गिर रहे थे।लगातार,बार-बार रिया पूछ रही थी "क्या हुआ बताएगी?"

"आ जा अभी के अभी बस।"

"जा चाबी लेकर रख आंटी से।आती हूँ।"

मैं पी जी में रहती हूँ, कुछ टाइम लिमिट्स हैं।लेकिन अगर कुछ जरूरी हो तो मेरी आंटी इतनी भी बुरी नही थीं।आज चाबी लेकर रखनी थी गेट की।जाकर आंटी की बेल बजाई।

"आंटी मेरी एक फ्रेंड आ रही है।थोड़ी देर में आ जायेगी अभी कितनी देर गेट खुला है?"

"निशी आज अंकल लेट आने वाले हैं।तो अभी 12 बजे तक खुला है गेट।"

"ओके आंटी।"

"लड़की ही है न निशी?"

ये आंटी भी क्या पलटी खाई इन्होंने।आजतक कभी कोई लड़का आया क्या अंदर?

"आंटी रिया आ रही है।"

"अच्छा।रिया आ रही है।आ जाना साथ मे चाय पियेंगे।"

आंटी की जरा सी तारीफ और रिया और मुझे चाय नाश्ता आंटी की तरफ से।पता नही कैसे पर रिया के लिए बड़ा आसान हुआ करता था ये सब।

"जी आंटी।"

बोलकर पलटी ही थी कि रिया मैडम गेट पर थीं।

"नमस्ते आंटी।गाड़ी अंदर लगाऊं न?"

"हाँ रिया इस तरफ।"

गाड़ी लगा कर मेरी तरफ देखा भी नही नालायक ने और आंटी को बोली

"क्या लगते हो आप गाउन में।आज पहली बार देखा मैंने।आपको आंटी भी नहीं कहा जा सकता सच।"

रिया के इस झुठ को इतनी शातिर आंटी भी समझ नही पाती, या यूं कहें कि समझना नहीं चाहतीं।

"आजाओ रिया,निशी चाय पीते हैं।अंकल को आने में बहुत टाइम है।छोटू भी सो चुका है,गप्पे मारेंगे।"

रिया ने मुझे फिर नजरअंदाज कर दिया और आंटी के ही पीछे चल दी।

"हाँ-हाँ भाभी बिल्कुल।" अब ये भाभी क्या बला है और आज अचानक आंटी को भाभी बोलने का तुक? ये सिर्फ रिया मैडम ही जान सकती है और दूजा कोई नही।मैं घर का दरवाजा लगा कर दोनों के पास आ गई जंहा पहली बार रिया ने मेरी तरफ देखा।

"भाभी पहले चाय।फिर आपकी पुरानी फोटोज देखेंगे।"

"हाँ तुम दोनों बैठो।मैं जल्दी आई।" भाभी मेरा मतलब आंटी जो कुछ ही देर पहले भाभी में तब्दील हो चुकी हैं चाय रखने चली गईं।रिया ने अपनी आई ब्रो ऊपर नीचे करके पूछा

"हाल कैसे हैं?"

मैं कुछ कह नहीं पाई।

"बोलोगी कुछ?क्या हुआ?"

तभी हमारी आज ही बनी भाभी कूद पड़ीं।

"जानती हो रिया ये निशी के दोस्त , अरे नही वो मरीज बहुत बद्तमीज हैं। खुद कितनी उम्र के होंगे मुझे कहते हैं एक ही बच्चा है आपका आंटी।"

रिया ने अपनी आंखें तरेर कर मेरी तरफ नजर की और गुस्से में पूछा।

"कौन से मरीज आये थे यंहा? और क्यों आये थे?"

मैं तो चुप थी।

"कोई बताएगा मुझे?"

"तुम नही जानती क्या उनको?हाथ पैर में लकवा लगा है जिनको? आज जन्मदिन था उनका निशी को पार्टी में लेकर जाने के लिए आये थे।" ये तय था कि आज मेरा खून होना है।पहले से ही दर्द कम था क्या? जो ये आंटी कम अभी बनी भाभी चक्कू पर धार तेज कर रही हैं?

"अच्छा, घर आए, थे।पार्टी थी और क्या जानना है अब?"

मेरी तरफ गुस्से से भड़की आंखे रिया की और ऐसे डायलॉग।मैं समझ गई थी अब मेरा कुछ नही हो सकता।ये वो गब्बर है जो कितने आदमी थे भी नही पूछेगी।ऊपर से ये आंटी,इन्हें भी आज ही ये प्रेम दिखाना है।फिर टपक कर बोलीं।

"आज तो निशी को तुमने देखा ही नही।साड़ी में कितनी सुंदर लग रही थी।"

बस यही बाकी था।

रिया ने और ग़ुस्से मे देखते हुए ही कहा "अच्छा साड़ी में।बहुत सही।तब तो मुझे केक खाने बुलाया होगा।क्यों है ना?"

"नहीं रिया अभी "

"क्या अभी?मैं पागल हूँ न?"

मैं अपनी बात रखती और रिया को कुछ बता समझा पाती वो आंटी फिर कूदी बीच में।लेकिन इस बार मेरे भले के लिए।

"मैं चाय लाती हूँ।कुछ खाओगी तुम दोनों?"

"न नहीं।" दोनो ने एक साथ ही कहा। आंटी चली गईं अंदर।

"मैं अभी सब बताती हूँ।सब बताने ही तो बुलाया है।फोन पर क्या बताती?"

"रहने दो।अब क्या बताओगी?"

"रिया भाव मत खा, मोटी हो जाएगी।"

"तू टेंशन न ले,मैं मोटी नहीं होऊँगी।"

"घर चलकर सब बताती हूँ।"

आंटी आ गईं।हम सबने चाय पी बिस्किट नमकीन भी ली और फिर रूम पर आ गए।

पहुचते ही मैंने रिया को जोर से पकड़ लिया और आंसू बहने लगे।

"क्या हुआ निशी?वो अभ्युदय जी ने कुछ गलत? या किसी ने कुछ कहा?"

मैं कुछ बोल नही पा रही थी।अब तक शांत कैसे थी नही जानती।रिया बहुत असमंजस में थी क्या करे,क्या नही?

"चुप होगी? या जाऊँ मैं?"

"हम्म.. हो गई चुप।" मेरा सिसकना बन्द हो गया था। लेकिन आंसू अबभी लगातार गिर रहे थे।

"निशी क्या हुआ? बता न पागल? मैं हूँ न?"

रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी क्या हुआ आखिर जो निशी का ये हाल हो गया है।
 
रिया अब बेकाबू हो गई।

"बोलेगी कुछ?"

"वो..वो अभ्युदय जी ने बताया कि.."

"की क्या निशी?शादीशुदा हैं वो?या प्यार करते हैं किसी और को?क्या हो गया है तुझे?तुझसे जब पूछा तब तो बड़ी प्रैक्टिकल बातें चेप रही थी,अब क्या हुआ?"

"तुझे यंहा मजाक उड़ाने नही बुलाया।ना ही मुझसे लड़ने,सुनेगी या बिना सुने ही बस चिल्लाती रहेगी?"

इन्हीं बातों के चलते बीच मे न जाने कितनी बार अभ्युदय जी का फोन आ चुका था।पर मैं बात नहीं करना चाहती थी।हो न हो 20 से 25 मिस्ड कॉल हो चुके थे कि अचानक आंटी जी का काल आया(अभ्युदय जी की माँ का)

मैंने अब फोन उठाया।

"हेलो..जी आंटी।"

"बेटा अभ्युदय कितनी देर पहले तुम्हें छोड़कर निकला है?"

"अभी घर नहीं आये क्या?अभी फोन आ रहा था उनका,उठा नही पाई।बात करके बताती हूँ आपको।"

मैंने तुरंत कॉल कट करके अभ्युदय जी को कॉल लगाया। रिया चुपचाप बैठे देख रही थी ये सब।

"हेलो,कंहा हैं आप?घर क्यों नही पहुँचे अभी तक?आंटी परेशान हैं जल्दी पहुँचिए आप।"

फोन के उठते ही बिना हेलो सुने ही मैंने बोलना शुरू कर दिया।

सामने से अभ्युदय जी बोले

"माँ थैंक्यू,डॉक्टर साहिबा का फोन आ गया। लव यू माँ।"

मुझे कुछ समझ ही नही आया कि क्या हुआ।

"मतलब?"

आंटी ने अभ्युदय जी का फोन लिया और बोलीं

"मतलब ये निशी कि नाराज़ मत हो अभ्यु से।कल कॉलेज के बाद घर आओ।मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।"

"जी आंटी।आती हूँ, पर अभ्युदय जी कितनी देर से घर पर थे?"

"तुम्हें छोड़ कर ही घर आ गया था तब से परेशान है।फोन उठाया नही तुमने।माँ हूँ न उसकी, तो देख नही पाई।माफ़ करना बेटा झूठ बोला मैंने।"

"जी कोई बात नही आंटी जी।"

इतनी बात होकर फोन अभ्युदय जी ने ले लिया।

"नाराज़ हो मुझसे?"

"मैं आपसे किस बात पर?"

"जब सच जानोगी निशी तो खुद पर नाराज़ हो जाओगी।इसलिए मेरी बात मानों और मुस्कुरा दो।"

"मैं सोने जा रही हूँ बाद में बात करूँगी।"

"अच्छा ठीक है लेकिन रिया से बात तो करवा दो।"

"रिया से?मतलब? रिया और मैं साथ मे नही रहते।"

"हाँ जानता हूं, पर रुका था मैं तब तक जब तक उसे तुम्हारे घर पहुचते नही देख लिया था।करवा दो अब बात।"

समझ नही आता मुझे।कैसे इंसान हैं, क्या इंसान हैं?दर्द दे जाते हैं और परवाह भी इतनी करते हैं।

"लो मैडम।आपसे बात करनी है।" मैंने फोन रिया को पकड़ा दिया और चुप होकर बैठ गई।

रिया बोली "क्यों जनाब, क्यों रुलाया आपने मेरी जान को?"

"हमारी जान रो रही थीं?"

"जी हाँ, लेकिन हमें बताया नही गया कि हुआ क्या?"

"आपको भी बताया जाएगा हुजूर।अभी आप ये बताइये की जान का मूड तो ठीक है न?"

"जी आप उसकी चिंता न करें।अब हम हैं हमारी जान के पास।"

"चिंता तो नही है पर दुःख है कि आप अकेली हैं,काश हम भी होते हमारी जान के पास।"

"अच्छा अब रखिये फोन।बाय।"

"जी बाय।एक बार बात नही कराएंगी?"

"उन्हें नही करना।"

"अच्छा फिर शुभ रात्रि।"

फोन कट गया रिया मुझे देख रही थी मैं रिया को।नही जनती क्या कहूँ अब।कल आंटी क्या कहेंगी,क्या कहा होगा अभी जाकर अभ्युदय जी ने उन्हें।बहुत से सवाल जवाब थे मन में।रिया ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी।

"चाय पीयेगी?"

"हाँ, पर दूध नही है घर में।"

"टाइम बता?"

"11 बज चुका है।"

हम, दोनों की आंखे चमकी और एक शरारत सूझी।

"चलें?"

दोनो एक ही साथ बोले।जोरदार बारिश के बाद का मौसम खुशनुमा था। हम दोनों अपनी सो कॉल्ड भाभी को उल्लू बना कर मेडिकल के सामने चाय के ठेले पर थे।हम दोनों के बीच कुछ न कभी छिपा है न आगे कभी छिपेगा ऐसी बातों के साथ हम दोनों चाय पीकर थोड़ा इधर-उधर घूम कर वापिस रूम पर आ गए।

भाभी सामने ही दिख गईं।

"पी आईं तुम दोनों चाय?"

"अरे भाभी नहीं वो पास रहने वाली एक जूनियर को दिक्कत हो रही थी तो बस वंही " रिया ने झूठ तपाक से बोला।

"अंकल ने देखा क्या किसकी मदद कर रही थीं।" हम तीनों ही हंस पड़े।आज आंटी बनी भाभी ने हमपर भरपूर प्यार बरसा दिया था बिना गुस्सा हुए।

हम दोनों रात भर बातें करते कब सोए हम भी नही जानते।

अब कल का दिन क्या नया रंग लाएगा ये प्रभु ही जानें।
 
मन अब संतुष्ट था और जो बाटी अब तक बस प्लेट में ही थी धीरे-धीरे मुँह से होकर पेट मे जाने लगी।आंटी बिना कुछ बोलें उठी और माइक्रोवेव कर के ले आई बाटी और दाल भी।

गरमा गरम दाल बाटी खाकर दिल खुश हो गया।

"आंटी मैं हूँ न।मैं बात करूँगी मिनी से भी और अभ्युदय जी से भी।आप। बिलकुल भी परेशान मत होइए।"

"जानती थी कि तुम अलग हो।"

"मतलब?"

"कुछ नहीं बेटा।कुछ और लोगी?"

"चाय।"

"ठीक है।अभी बनाती हूँ।"

मैं उठकर बाहर आ गई।अभ्युदय जी अब भी रूम में फोटोज देख रहे थे।मैं रूम में जाकर बैठ गई।अभ्युदय जी चुप थे मैं भी चुप।

"आओ फोटोज देख लो।ऐसा लग रहा है तुम्हारा ही बर्थडे है।"

"हम्म।मैं सुंदर हूँ जानती हूं।फ़ोटो देखने की जरूरत नही मुझे।"

"ओहो।घमंड?"

"नही बाबा।घमंड नही सच।"

"चलो मान लेता हूँ।अब तो नाराज नही हो न निशी?"

"सच बताऊ?"

"नही।झूठ।"

"झूठ ही बोलना है तो बिल्कुल नाराज नही आपसे।"

"कहना क्या चाहती हो?अब भी नाराज हो सच में?"

"हाँ अभ्युदय जी। मैं नाराज हूँ आपसे।आप कल ही ये बता सकते थे पर आपने किस तरह से बातें घुमाई? कई रातें बिताई हैं हमने साथ।आप कल ही सच कहते तो शायद आपका जन्मदिन और भी खास हो जाता।खैर अब रात गई बात गई।"

"चलो बात गई तो।"

"नही अभ्युदय जी।मिनी को अब आप कुछ नही भेजेंगे।कोई पैसे नही और अब कोई बात भी नही।"

"पर निशी अभिदा?"

"अभिदा अब नही हैं।मिनी आपको बेवकूफ समझ रही है।जो आप बिलकुल भी नही हैं।"

"लेकिन निशी।"

"लेकिन वेकिन कुछ भी नहीं।मुझे कुछ मानते हैं?अगर मानते हैं तो कल सुबह तैयार रहिएगा 7 बजे मेरे घर के पास।"

"क्या करना है?"

"बस 100 चादर और 100 कंबल लेकर रखने है आपको गाड़ी में।"

"ठीक है। निशी की महिमा वो ही जाने।"

"जी बिल्कुल।शाम को मिलते हैं अभी रिया घर पर इंतजार कर रही है।" चाय पीकर आंटी को कल सुबह के लिए पूरी सब्जी बनवाने का कहकर मैं रूम पर आ गई।रिया घर नही पहुँची थी अभी।ताला लगा ही हुआ था,मैंने फोन लगाया तो पता चला मैडम भाभी के घर आराम फरमा रही हैं।

रिया को कुछ बातें बताना जरूरी था।उसे मैंने हर पहलू बताया जिस से वो भी संतुष्ट होने का नाटक करने लगी पर उसके मन मे अब भी उलझन थी।वो उलझन जानने की बहुत कोशिश की मैंने पर उसने कुछ नही कहा।

"कुछ बताएगी नहीं तो कैसे जानूँगी क्या हुआ?"

"कुछ नहीं पर अब भी बातें अधूरी हैं।"

"कैसी अधूरी रिया?"

"क्या सिंह सर अब भी मुम्बई वंही जाते हैं?क्या अभ्युदय जी उनकी सौतेली माँ से मिले हैं?आगे क्या और कैसे चलेगा इनकी फैमिली में सब?क्या मिनी के बारे में अभिमन्यु जी की माँ को पता था?वो क्यों और ऐसे कैसे,किस हक से पैसे मांग रही है?"

"रिया दिमाग ज्यादा मत लगा।मुझे क्या करना उनकी फैमिली में कैसे क्या होगा?हाँ सिंह सर सब जानते हैं।"

"निशी पर तू समझ नही रही..।"

"छोड़ ना यार।मुझे अब नही समझना।सुन कल सुबह ओल्ड एज होम जाना है।चलेगी?"

"टाइम बता?"

"6.30 मेरे घर।"

"मैं जा ही क्यों रही हूँ?यहीं रुक जाती हूँ।"

"तेरी मर्जी है।मैंने कभी मना किया क्या?"

"चल भग।अभी खुद तो चली जायेगी फिर अपने अभ्युदय जी के पास।मैं रह जाऊंगा तेरी वो खड़ूस आंटी के पास उनकी झूठी तारीफों के साथ।"

"तो तू भी चल अभ्युदय जी के घर।"

"नहीं। इट डसन्ट लुक प्रोफेशनल समझी।"

"हम्म.. फिर?"

"तू जा मैं भी निकलूंगी और कल सुबह मिलती हूँ।प्रोमिस नही कर रही समझी।नींद खुल गई तो आ जाऊंगी।"

"ओके बाए।"

रिया चली गई।मैं आंटी की बातों में खो कर कब सो गई पता ही नही चला।नींद खुली तो देखा अभ्युदय जी के ढेर सारे मिस्ड कॉल और घड़ी में समय 7.30।

फोन लेकर तुरंत ही काल लगाया

"कंहा रहती हो तुम?फोन क्यों रखती हो?"

"सॉरी अभ्युदय जी।नींद लग गई थी।"

"ओह्ह तो हमारी निशी सो रही थी।"

"मैं बस 10 मिनट में पहुँच जाऊंगी।"

"नहीं अब रहने दो।दिन में भी बहुत समय ले लिया तुम्हारा।आज के पैसे काटे नही जाएंगे।"

"नहीं, ऐसी कोई बात नही।मैं आती हूँ तब तक आप एक्सरसाइज शुरू कीजिए।"

"मैंने सारी एक्सरसाइज कर ली हैं।बस मशीन ही बाकी है।एक दिन नही भी लगी तो कोई दिक्कत नही है।"

"30 मिनट की तो बात होगी।मैं आती हूँ।"

मैंने फोन रख दिया और 2 मिनट में ही ऑटो लेकर धन्वन्तरी के लिए निकल गई।

अंधेरा हो ही चुका था।आज चेहरे पर दुप्पटा भी नही बांधा था।बगल में बैठे अंकल ने बहुत शराब पी रखी थी शायद।पूरे ऑटो में से अजीब सी बदबू आ रही थी।मैं उठ कर ऑटो की सीट से हट गई और सामने लगे पटिये पर बैठ गई।अब उन अंकल का चेहरा उजाले में नजर आने लगा था।लाल बड़ी आंखे और आधी काली और आधी सफेद दाढ़ी-मूंछ।

उनकी आंखे मुझे ही घूर रही थीं।मैं उन्हें इग्नोर करने की कोशिश कर रही थी पर जब आपको पता हो कि दो निगाहें सिर्फ आपको देखे जा रही हैं वो भी गंदी निगाहों से तो कितनी बेचैनी होती है।

आज ही दुप्पटा नही बांधना था मुझे भी,खुद पर गुस्सा आ रहा था बहुत।हल्का सा गढ्डा और ऑटो उचका, उन अंकल की हिम्मत के मेरे हाथ पर हाथ रख दिया।मैंने ज़ोर से हाथ झटका जिसका उन्हें अंदाजा नही था।पीछे की तरफ एक दूसरे अंकल पर हाथ गिरा उनका और वो लड़ पड़े।हाथ जोड़ से लगा था उनको।

धन्वन्तरी आते ही मैं उतर गई।लेकिन दुर्गा मंदिर पहुचते तक सांस फूल गई।डर के कारण एक बार भी पलट कर नही देखा था।पीछे से कोई बहुत देर से दीदी- दीदी भी चिल्लाता रहा पर मैंने तो दौड़ सी ही लगा दी थी।अभ्युदय जी के घर के बाहर ही गाड़ी खड़ी थी और ड्राइवर भैया भी तो जान में जान आई। पलट कर देखा तो एक लड़का मेरे पास आकर बोला "दीदी ऑटो के पैसे?"

खुद पर बहुत गुस्सा आया।कैसे भूल गई?बैग से पैसे निकाल कर दिए और अंदर चली गई।सोफे पर बैठी और अपने चेहरे को अपने हाथों से ढाँक लिया।

"निशी.. क्या हुआ?"

अभ्युदय जी अपनी एक्सरसाइज रोक कर पास आ गए।

मैंने सिर्फ मुंडी हिला दी न में।अभ्युदय जी ने एक हाथ सर पर रखा और फिर पूछा।

"क्या हुआ?"

"कुछ नहीं।"

मैं रो रही थी।सारे हाथ को आंसू से भर लिया।अभ्युदय जी डर गए।

"निशी क्या हुआ?कुछ बोलोगी? माँ..माँ जल्दी आओ।"

मैं रोती रही कुछ देर बिना अपना हाथ हटाये और बिना अभ्युदय जी की तरफ देखते हुए।अभ्युदय जी ने भी अपना हाथ नही हटाया और साथ ही खड़े रहे मेरे सर पर हाथ रखे हुए।
 
"निशी कुछ बोलो प्लीज़।"

अभ्युदय जी परेशान लग रहे थे।आंटी आईं और उन्होंने आकर पूछा।

"निशी क्या हुआ बेटा?जल्दी बताओ?"

मैंने जैसे ही ऊपर सिर उठाया दोनों ही मुझे देखकर डर गए।

लाल आँखे और सूजी हुई भी,आँसुओ से सारा चेहरा भीगा हुआ।इस तरह मुझे कभी भी किसी ने नहीं देखा।

"निशी, क्या हुआ?कुछ बोलोगी?"

अभ्युदय जी ने मुझे अपनी तरफ खिंच कर अपने गले लगाया।

"मैं म मैं वो आ रही थी और ऑटो.. म..में.."

"क्या हुआ बेटा?डरो नहीं बिल्कुल भी।हम सभी हैं न?बोलो बताओ क्या हुआ?"

मैं अब भी कुछ बोल नहीं पा रही थी।बस सिसक-सिसक कर रोना ही शुरू था मेरा।

"मैं ऑटो में और वो गंदा आदमी।"

"क्या किया उसने निशी?"अभ्युदय जी ने मुझे झकझोरते हुए कहा।

"अभ्यु वो गंदा आदमी था,बहुत गंदा उसने शराब भी पी थी।वो मुझे छूने की कोशिश कर रहा "

मैं फिर रोने, सिसकने लगी।मैं नही जानती थी कि मैं अभ्युदय जी को अभ्यु बोल रही थी या उनसे किस तरह से बात कर रही थी।बस जानती थी तो इतना कि वो ऐसे इंसान हैं जिन्हें हर चीज़ कह या बता सकती हूँ।

"मैं भाग कर आ रही थी,वो पीछे कोई था।मैं बहुत डर गई थी अभ्यु।बहुत ज्यादा डर गई।"

मैंने अभ्युदय जी को जोर से पकड़ लिया।

"कुछ नहीं हुआ।सब सही है।तुम मेरे पास हो।चुप हो जाओ, बिल्कुल भी नहीं रोना।मैं हूं न,हमेशा हूं न साथ।"

"आप हमेशा हैं न?सच में?मैंने तो ऐसे कोई गलत कपड़े भी नहीं पहने फिर?"

"निशी.. क्या बकवास कर रही हो?सब ठीक है।जाओ जाकर मुँह धोकर आओ।"

मैं उठी और जाकर मुँह धोने चली गई।मुँह धोकर आई और चुपचाप चाय लेकर बैठ गई जो आंटी ने लाकर रखी थी। चाय पीने के बाद कप रखा और अपनी मशीन उठाने लगी।अभ्युदय जी ने मुझे रोक दिया।

"तुम बैठ जाओ चुपचाप।"

मैं बैठ गई और फिर खो गई।

"बाहर निकलो सोच से।सब ठीक है,मैं हूँ तुम्हारे साथ।उठो मेरी तरफ देखो।"

अभ्युदय जी की तरफ देखा तो फिर आँखे भरने को आ गईं।

"न..न बिल्कुल भी नहीं।अब एक आँसू नहीं,वरना अब मैं रुलाता हूँ।"

मैंने अपने आते आंसूओ को रोक लिया।बहुत देर अभ्युदय जी के हाथ को पकड़ कर बैठी रही।

"अब जाना चाहिए।बहुत देर हो गई।क्या आप मुझे छुड़वा देंगे?"

"नही।"

"पर,मैं..अकेले?"

"पूरी बात तो सुनती नही हो।नही मैं चलूंगा साथ छोड़ने।"

आंटी ने आकर खाना खाने को कहा पर मुझसे कुछ खाया तो जाना नही था।मैंने मना किया तो आंटी ने एक टिफिन में दूध रोटी पैक कर दिया।

रास्ते में भी मैं एकदम चुप थी।गाड़ी सीधे जाने की जगह तिलवारा की तरफ मुड़ गई।

"हम कंहा जा रहे हैं?"

"दीप दान किये हैं कभी तुमने?"

"तिलवारा पर?नहीं।"

"तो कंहा किये हैं?"

"ग्वारीघाट पर किये हैं दो बार।"

"चलो आज, तिलवारा पर भी कर लेते हैं।"

हम तिलवारा घाट पर पहुच गए थे।अभ्युदय जी उतार पर नही जाना चाहते थे शायद।उन्होंने पैसे देकर ड्राइवर भैया को कहा दीदी को दिए दिलाओ और वंही रहना।

मैं चल दी पीछे।

"21 दीप?क्यों?"

"भैया हमेशा 11 ही दान करवाते हैं पर आज भैया ने 21 दीप के पैसे दिए हैं।"

"ठीक है।" मैंने दीप जलाए और घाट पर सारे दीप बहा दिए।दीपकों की जलती लड़ी बेहद खूबसूरत लग रही थी। मैं कुछ देर वंही रहना चाहती थी पर ड्राइवर भाई बोले "जल्दी चलिए दीदी।"

मैं चल दी।गाड़ी पर बैठते ही गाड़ी चल दी।

"आपने दीप तो देखे ही नही अभ्युदय जी?"

गाड़ी अब भी मेडिकल की तरफ नही मुड़ी।अब हम तिलवारा के बड़े पुल पर थे और अभ्युदय जी और मैं साथ खड़े होकर 21 दीपो को जलते,टिमटिमाते देख रहे थे।पानी मे बनता उन दीपों का अक्स बहुत ही सुंदर था।वही टिमटिमाहट मेरी आँखों और अभ्युदय जी की आंखों में भी थी।

"निशी।"

"जी।"

"तुम्हारी आँखों मे जो डर आज देखा वो कभी दुबारा नही देखना चाहता हूँ।"

"कोशिश करूँगी।"

"एक और बात।"

"कहिये।"

"अभ्यु ही बोला करो,मुझे अच्छा लगेगा।"

"नहीं वो पॉसिबल नही।"

एक दूसरे की आंखों को देख मुस्कुरा दिए हम दोनों। ये आकाश और छाए हुए बादल,हल्का-फुल्का दिखता चाँद, नीचे बहती नर्मदा नदी का पानी, पानी पर वो दीप और उन दीपों का प्रकाश, सब कितना सुंदर था।सबसे ज्यादा सुंदर जो था वो था उन दोनों का साथ।पवित्र बिल्कुल नर्मदा जल की ही तरह।

"ये साथ यूँही बना रहे।" निशी ने धीरे से कहा।

अभ्युदय जी तुरन्त ही बोल पड़े

"आमीन। अब तुम बोलो सुमा आमीन।"

"सुमा आमीन।लेकिन ये है क्या?"

"कुछ नही।बस बोल दो।"

"बोल तो दिया।"

हम कुछ देर और रुककर वापिस आने लगे।टोल पर रुककर अभ्युदय जी ने वंहा टोल काटने वाले लड़के से बात की।एक बैग लिया और बिना टोल के पैसे दिए ही हम निकल गए।

"आपसे पैसे नही लिए?"

"मेरे टोल पर मैं ही पैसे दूंगा क्या निशी?"

"आपका टोल?"

"हाँ, मेरा ही है।"

घर पर आकर टिफिन निकालकर दूध रोटी खाते-खाते रिया को सारी कहानी सुनाई।पीछे अभ्युदय जी के तीन कॉल वेटिंग पर जा चुके थे।रिया से बात करके अभ्युदय जी को फोन लगाया।

"हैलो।"

"हो गई रिया से बात?"

"आपको कैसे पता?"

, "तुम और किससे बात करोगी इतनी रात को?"

"क्यों मेरा कोई बॉयफ्रेंड नही हो सकता क्या?"

अभ्युदय जी एक दम ही चुप हो गए।कुछ भी नही बोले अब वो।

"क्या हुआ आपको?"

"उहनहु।तुम्हारा बॉयफ्रेंड होना मुश्किल है।"

"मतलब क्या है आपका?मैं इतनी बुरी हूँ क्या?"

"न,बुरी नही हो।"

"फिर?"

"जरूरत से ज्यादा अच्छी हो।"

"तो?जरूरत से ज्यादा अच्छी गर्लफ्रैंड ही चाहते हैं लड़के।समझे आप?"

"मैं खुद भी लड़का ही हूँ, जानता हूँ कौन क्या चाहता है।"

"अच्छा।तो बताइए तो ज़रा कौन क्या चाहता है?"

"कितने भाई बन चुके हैं तुम्हारे?"

"एक भी नहीं।"

"कितने हैं जिन्होंने प्रपोस किया?"

"हम्म.. वो भी एक भी नहीं।"

"कितने बेस्ट फ्रेंड हैं?"

"सभी मुझे उनका बेस्ट फ्रेंड ही कहते हैं।"

"देखा।कहा न सब जानता हूँ।"

"मतलब?"

"कुछ नहीं बुद्धू लड़की।"

"एक ने किया प्रपोज़।मेरा मतलब सामने से नही कहा पर बहुत कुछ किया मेरे लिए।"

"कौन है वो साहसी लड़का?"

"वो माही,मेरा मतलब महिंदर।साथ ही था।"

"मिलूंगा इस माही से।"

"ठीक है,मिल लीजियेगा।"

"सो जाओ निशी।"

, "ओके बॉय।"

फोन कट गया और मैं सो गई सोचते हुए की गर वो आदमी ही मेरा पीछा कर रहा होता तो मुझे कैसे क्या करना चाहिए था।
 
कितनी अजीब बात है जरूरत से ज्यादा अच्छी लड़की का कोई नही होता।सुबह 6 बजे नींद खुल गई।मैं नहा कर तैयार थी आज पीले रंग का सूट पहना था मैंने।बालों पर एक कल्चर लगा रखा था और वही थोड़ा सृंगार।

आज बिंदी के नीचे कुमकुम नही था।पूजा करने का मन नही किया सोच थी कि आज पहले माँ त्रिपुर सुंदरी के दर्शन करूँगी।

7 बजते ही अभ्युदय जी का फोन मेरे फोन पर आ गया था।

"मैं आ रही हूँ।" बोलकर फोन कट कर दिया मैंने।बैग उठाकर ताला लगाया और घर से बाहर आ गई।बैग से फोन निकाल कर रिया को फोन लगाया पर मैडम ने फोन नहीं उठाया।सो ही रही होगी।

बाहर न गाड़ी थी न अभ्युदय जी।मैंने फोन पर उनका नम्बर लगाने के लिए डायल ही किया कि उनका फोन आ गया।

"आप आए नहीं हैं?"

"मैंने कहा था,मेरा जन्मदिन शुभ नही है,कभी नहीं होता तो इस बार कैसे हो जाता?"

"क्या हुआ अभ्युदय जी?" मन शंकाओं से भर गया।कंही दादा जी को कुछ हो तो नही गया?घर मे सब ठीक तो होगा न?कितनी बातें थीं जो जेहन में एक पल में दौड़ गईं।

"बोलिए न अभ्युदय जी।क्या हुआ?"

"माँ.."

"आंटी को?क्या हुआ आंटी को?"

"माँ के पैर में फ्रैक्चर हो गया।"

, "कैसे?कब?अभी कंहा हैं?"

"मेडिकल में ही हैं।प्लास्टर लग रहा है।"

"कौन सी बोन में है फ्रैक्चर?"

"फिबुला में सिर टूट गया।"

"सिर?मतलब?"

"हाँ, फिबुला का हेड शायद।"

"हे प्रभु।आप भी।मैं पहुँचती हूँ, परेशान मत, होइए जल्द ही ठीक हो जाएंगी आंटी।"

मैं ऑटो पकड़ कर जल्दी मेडिकल पहुच गई।ऑर्थो डिपार्टमेंट से तो पक्की यारी है क्योंकि फिजियो डिपार्टमेंट उसके अंडर ही आता है।जाकर देखा कि एच ओ डी सर आंटी का प्लास्टर बांध रहे हैं।अब तो डरने की भी कोई बात नही।सर का हाथ लग गया मतलब सब ठीक।मैं अंदर पहुच तो गई पर अब तक सर की नज़र मुझ पर पड़ी नही थी।आंटी ने मुझे देखकर कहा

"अरे निशी, तुम्हें भी परेशान कर दिया अभ्यु ने?"

"नहीं आंटी मैं तो आ ही रही थी।वो कम्बल और खाने के लिए।"

"बेटा खाना तैयार हो गया होगा।शर्मिला से कह कर आई थी।"

अब तक सर मुझे सिर्फ देखते रहे और जैसे ही उन्हें याद आया कि मैं फिजियोथेरेपी की स्टूडेंट हूँ वो बोले।

"निशी?"

"यस सर।"

"निशी सिंह,फर्स्ट बैच फिजियोथेरेपी?"

"यस सर।"

"इंटर्नशिप, राइट?"

"यस सर।"

"हाऊ कम यू नो दिस फैमिली?"

"सर आई एम फिजियो ऑफ अभ्युदय जी।"

"यू मीन, यू आर डूइंग होम विजिट?"

"यस सर।"

अब तो गई।डिग्री तो कम्पलीट है नहीं, निशी मैडम पेशेंट देख रही हैं।पैसे कमा रही हैं।बस आज खैर नहीं।पता नही सुबह-सुबह किसका मुँह देखा है आज।

"यू नो योर डिग्री हैस बीन नॉट कंप्लीटेड येट।"

"यस सर।"

"इफ यू नो दिस देन, कैन आई आस्क व्हाई यू आर डूइंग होम विजिट्स?"

"अंकल शी इस कमिंग बिकॉज़ ऑफ मी।"

बचा लिया।बचा लिया अभ्युदय जी थैंक्यू आई लव यू।इस बात पर तो सच्ची मैं आई लव यू बोल सकती हूँ अभ्युदय जी को।लाइफ बचा ली आज।खड़ूस ने फूल प्लान बना लिया था आज मेरा कत्ल करने का।पर मैं बच गई,बच गई हूँ न?अभी भी दिल मे शंकाये तो बहुत हैं।

"एक्सप्लेन अभ्युदय।"

"शी इस वेरी गुड इन हर वर्क।आई एम वाकिंग बिकॉज़ ऑफ हर।"

सर ने अभ्युदय जी को देखा और आंटी की तरफ देखकर फिर बोले।

"आजकल के बच्चे।आपको क्या लगता है मिसेज सिंह?

"निशी ने बहुत मेहनत की है।हम सभी ने देखा और अभ्यु को आगे बढ़ते देख रहे हैं।"

अब तो बस मैं गई।किसी और कि तारीफ सर से हजम होती नही है।यंहा तो एक फिजियो की तारीफ हो रही है।बस निशी तेरा आज ही आखिरी दिन है।आज तेरा जनाज़ा निकलेगा,आज खिल्ली उड़ेगी और तो और बेइज्जती,उफ्फ सोच कर डर लग रहा है।

"कीप इट अप निशी।स्टार्ट हिज वेट बेयरिंग।"

"सर स्टारटेड।"

"गुड।" बोलकर सर निकल गए सिंह सर से बात करते हुए।आंटी को व्हीलचेयर पर बैठा कर हम सभी घर आ गए।8 बज चुके थे और रिया का फोन पर फोन आ रहा था।

"हेलो।"

"कंहा है तू?मैं पिछले आधे घंटे से इस आश्रम में लोगों को अपनी बत्तीसी दिखा-दिखा के थक गई हूँ।"

मुझे रिया की इस बात पर हंसी आ गई लेकिन मौके की नजाकत को समझते ही मैं शांत हो गई।

"रिया वो आंटी जी को फ्रैक्चर हो गया है तो बस हम अगले 10 मिंट में पहुच जाएंगे।"

"बेड़ा गरक।मतलब अभी 10 मिनट और लोगों के सामने मुस्कुराना होगा।आजा यार जल्दी मुझसे नही होता ये सब, जानती है न?वैसे भी सब बुड्ढे भरे पड़े हैं यंहा।कोई मेरे टाइप का भी होता तो दिखाती रहती अपनी बत्तीसी।"

"बकवास बन्द कर।बस आए हम लोग।रख फोन।"

घर से कम्बल और खाना रखवा कर मैं और अभ्युदय जी निकल आए।आश्रम पहुँच कर देखा तो रिया मैडम को एक साथी मिल चुका था।

हमें देखकर रिया हमारे पास आई और उसका नया बना साथी भी जो मेडिकल का ही था।

"ये मेरी फ्रेंड निशी और ये मेरी फ्रेंड के फ्रेंड अभ्युदय जी।" रिया ने हम दोनों का परिचय दिया।

मैंने सिर को हल्का हिलाया और हेलो कहा।अभ्युदय जी ने भी यही किया जबकि उस लड़के ने अपना हाथ आगे बढ़ाया था।पर एक हाथ मे स्टिक और दूसरे हाथ के न उठने पर उन्हें यही करना था।

"और ये हैं एक होनहार,मेधावी जल्द ही एक सफल इंजीनियर बनने वाले पंकज।"

"नाइस टू मीट यू पंकज।" मैंने कहा।

पंकज दिखने में हिंदुस्तानी कम,विदेशी ज्यादा लग रहा था।गोरा-चीट्टा, हट्टा-कट्टा,स्मार्ट और हाइटेड।

"चले निशी?" अभ्युदय जी ने शायद मुझे पंकज को घूरते देख लिया।मेरी आदत ही है जब किसी से पहली बार मिलती हूँ तो दिमाग में फिट घूरने का सिग्नल ऑन होता है और सूरत छप सी जाती है दिमाग की मेमोरी में।

शायद इसलिए ही मुझे शक्लें बहुत अच्छे से याद रह जाती हैं।

हम चारों अब साथ थे।बातों-बातों में ही पता चला कि पंकज यंहा आता रहता है।आज वो यंहा किसी अंकल के लिए कुछ दवाइयां लेकर आया था।

हम सभी ने कम्बल एक-एक करके बाट दिए।खाना स्टाफ को देकर निकल ही रहे थे कि मेरी नज़र सामने से आते एक अंकल पर पड़ी।

"ये तो वही हैं।"

"कौन? निशी, तुम जानती हो इनको?"

मैंने कम्बल लेकर उन अंकल की तरफ बढ़ी।

"ये आपके लिए।"

"तुम?"

"आपने भी पहचान लिया मुझे?मुझे तो लगा आप नशे में थे अब याद नही होगा आपको?"

"बेटा मैं शराब या कोई नशा नहीं करता।"

"जी वो कल देखा मैंने।"

"तुम गलत समझ रही हो।"

हमारी बात सुनकर अभ्युदय जी और रिया पास आ गए।

"तो आप थे वो? देखता हूँ अब आप यंहा भी कैसे रहते हैं।कभी जेल गए हैं आप?"

अभ्युदय जी ने आकर, अपनी बात कही जिसे सुनकर मैं खुश नही थी।

बूढ़े हैं और कुछ बताना भी चाहते हैं।एक मौका तो मिलना ही चाहिए उन्हें।
 
वो अंकल परेशान से हो गए।पर पंकज शायद जिनके लिए दवाई लाया था वो यही थे।पंकज मेडिकल में ही रहता है पर ज्ञान गंगा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ता है।

"कंहा चले गए थे दस्सी लाल?"

"बेटा, मन बड़ा बेचैन था।तो यंही चक्कर लगा रहा था।तुम दवाई ले आए?"

"हाँ दस्सी लाल, लो ये दवाई रखो।पूरे एक महीने की है।"

अब ये क्या नया ड्रामा है?दस्सी लाल और ये दवाई?

"पंकज, तुम जानते हो इन्हें?"

"निशी ये मेरे ही घर के पास रहते थे।पर बेटे-बहू ने घर से निकाल दिया तब से यंही हैं।इनका बेटा बहुत नशा करता है।ये हर रोज शाम को अपने बेटे से मिलने जाते हैं और फिर उसे ये नशा खत्म करने की दवाई खिलाते हैं।"

"लेकिन पंकज?कल तो.."

अंकल बीच में ही बोले।

"कल जो मेरे बगल में बैठा था वो मेरा ही बेटा था।उसने ही नशा किया हुआ था। तुम्हें देखकर लगा था कि तुम शायद डॉक्टर हो, तो इसकी दवाई वगैरह के लिए ही तुमसे बात करनी चाही थी।पर तुम गलत समझ बैठी बेटा।"

"लेकिन..आपकी आँखे?वो इतनी लाल क्यों थीं?"

"जो बाप रोज अपने ही घर से अपनी ही बहू और बेटे से गालियां खा कर निकलता हो उसकी आँखों से समुंदर का बहना लाजमी है और जब रो चुका होता हूँ तब आँखों का रंग कभी देखने का समय नही मिला।"

"माफ़ कीजियेगा अंकल।"

"नहीं बेटा।मुझे माफ़ करना क्योंकि मैं बड़ा हूँ और मुझे थोड़ा ऐतिहात बरतना चाहिए था।"

"अंकल आपकी उर्दू बहुत अच्छी है।"

"कभी-कभी कुछ लिखता हूँ।पढ़ना भी पसन्द है।बस शायद इसलिए।"

"आपके लिए कम्बल आपके बिस्तर पर रखा है। जल्द ही आपके लिए कुछ अच्छी किताबें लेकर आऊंगी।"

"खुश रहो हमेशा।"

"आशीर्वाद इन्हें दीजिये दस्सी लाल जी।जन्मदिन इनका था,जिसकी वजह से हम सब यंहा आए और आपकी कहानी जान पाए।" अब रिया से चुप नही रहा गया।वैसे भी वो इतनी देर से चुप कैसे थी वही जान सकती है।

आश्रम से निकल कर रिया पंकज के नम्बर एक्सचेंज हो चुके थे।पकंज अपनी गाड़ी पर निकल गया।

मैंने रिया को गाड़ी वहीं पार्क करके अभ्युदय जी की गाड़ी में बैठने को कहा।

"हम कंहा जा रहे हैं?"

"त्रिपुर सुंदरी।"

"क्या?मैं नहीं।मैं कॉलेज जा रही हूं, तू जा और कॉलेज में मिलते हैं।"

"पर रिया।चल न साथ?"

"समझा कर न उल्लू।लेडीज प्रॉब्लम।" रिया ने आंख मारकर समझा दिया कि वो नही जा सकती।

मैं चुपचाप कार में बैठी रही।गाड़ी चल दी।माँ के दर्शन हुए बहुत दिन हो गए थे,लेकिन आज जाने के प्लान से मैं खुश थी।एक दुकान पर रुकने कहा ड्राइवर भैया को।

दुकान से जाकर लौंग ले आई और बैठ गई।गाड़ी फिर चल दी।आगे फल की दुकान पर फिर गाड़ी रुकवा कर एक किलो अनार ले लिए।

अभ्युदय जी से अब रहा नही गया और पूछ ही बैठे।

"क्या कर रही हो निशी?"

"माँ की पसन्द की चीज़ें ले रही हूँ।"

"माँ को अनार नही पसन्द हैं।"

"मतलब?"

"मतलब ये की माँ को अनार से एलर्जी है।"

"अरे बाबा।मैं त्रिपुर सुंदरी माँ के लिए ले रही हूं सब।"

"तुम्हें किसने कहा कि माँ को अनार पसंद हैं?मेरे मतलब त्रिपुर सुंदरी माँ को?"

"पंडित जी मे बताया।उन्होंने ही बताया कि माँ को लौंग भी बहुत पसंद हैं इसलिए तो मैंने लौंग भी ले ली हैं।"

"माँ को काजू,बादाम या अखरोट नही पसंद?"

"नहीं।पंडित जी ने तो नही बताया।"

"हाँ, क्योंकि पंडित जी के दांत तो हैं नही और वो खा भी नही पाएंगे काजू,बादाम या अखरोट।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि पढ़ी-लिखी होकर भी मूर्खों वाली हरकतें शोभा नही देती तुम्हें।"

मैं तो रो ही देती गर अभ्युदय जी ने थोड़े प्यार से कहा न होता कि

"तुमको माँ पर विश्वास है,प्रेम है और उस प्यार विश्वास का फायदा वो पंडित उठा रहा है।सच बताओ कभी माँ को अनार खाते देखा है तुमने?"

मैंने बस न में सिर हिला दिया।

"फिर?और लौंग?"

"नहीं।नहीं खाते देखा।" बोलकर मैं चुप हो गई।

"पंडित जी की उमर के हिसाब से वो अनार और लौंग ही खा सकते हैं, उन्होंने तुम्हारी ही तरह न जाने कितने अंधविश्वासी लोगों से ऐसे ही अपने पसंद की चीज़ें मंगाई होंगी।अनार बांटना है तो चलो मैं बताता हूँ किसे बाटो।"

मैं चुप ही थी।तेवर आ गया था।तेवर जबलपुर से भेड़ाघाट के बीच एक छोटा कस्बानुमा गांव है,जंहा माँ त्रिपुर सुंदरी का मंदिर है।तीन मुखी माँ की अद्भुत मूर्ति देखते ही बनती है।दिल मे कभी भी कोई उथल-पुथल हो बस माँ की तस्वीर सामने रख लो।सब ठीक सा लगने लगता है।

मन्दिर के लिए मुड़ने के पहले ही गाड़ी रुकी।मैंने देखा कि अभ्युदय जी गाड़ी से उतर रहे हैं।मैं भी पीछे की सीट से उतर कर उनके पास सामने पहुची।

"क्या हुआ?यंहा क्यों रुके हैं हम?"

"अनार बांटने।"

एक पास से ही जाते बच्चे को अभ्युदय जी ने पास बुलाकर पूछा

"छोटू, अ से?"

"अनार।" छोटू ने जो कि 5-6 साल का था तपाक से बोला।

"नाम क्या है?"

"रितिक,बाबू जी।"

"रितिक।बड़ा अच्छा नाम, है।अनार खाये हो कभी?"

"हाँ, पर बड़ा कड़वा होता है।सिर्फ किताबों दिखता अच्छा।"

"कब खाये थे?"

"हमारे घर के बगल ही पेड़ लगा था,तब खाये हैं।"

"ये दीदी का कल जन्मदिन है तो बोली कि सबको अनार खिलाएंगी।"

"दीदी केक खिलाते हैं अब सब।अनार नहीं।हैप्पी बर्ड डे।"

"बर्थडे।बर्ड डे नहीं और हाँ थैंक्यू।" मैंने रितिक को कहा।

"अब केक तो नहीं है।अनार ही खाना पड़ेगा।बुला लो सारी पार्टी को।"

"अभी बुला के लाया।"रितिक अभ्युदय जी की बातें सुनकर भागा और कुछ ही देर में 5 10 बच्चों की लाइन लग गई।मैंने अनार रितिक को पकड़ा कर कहा।

"ये अच्छे अनार हैं और मीठे भी।अनार कड़वा नही होता।तुमने कच्चा ही तोड़ लिया होगा।सभी मिलकर खाना।ठीक है?"

"हाँ दीदी।हैप्पी बर्ड डे।"सभी बच्चों ने साथ मे कहा।

हम गाड़ी में बैठकर मन्दिर आ गए।मैं और मेरा मन अब लौंग चढ़ाने की भी गवाहि नही दे रहा था।अभ्युदय जी मन्दिर के अंदर नही आये।वही भगवानो से बनती नही है कहकर।मैं अंदर आई और माँ के दर्शन से दिल खुश हो गया।

आज ज्यादा भीड़ भी नही थी।दर्शन के बाद जब प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाया तो देखा आज पंडित जी नही हैं।

"नमस्ते।"

"नमस्ते।"नए पंडित जी ने कहा

"वो पुराने पंडित जी?"

"उनकी तबियत ठीक नही।अपने उस कमरे में हैं।"

"क्या हुआ?"

"बुढ़ापे से बड़ी कोई बीमारी नही बेटा।उस पर बेटे को भी समय नही मिलने आने का।माँ ही है जो हैं।"

"मैं मिल सकती हूँ उनसे?"

"हाँ।सो रहे हों तो न जगाना।"

मंदिर परिसर में ही पंडित जी के कमरे बने थे दो।मैंने अंदर जाकर झांका और एक आवाज़ दी पंडित जी कहकर।वो खाँसे थे मतलब जाग ही रहे थे।

छोटी सी कुटियानुमा कमरे में नीचे गद्दे पर पंडित जी लेटे हुए थे।

"नमस्ते पंडित जी।क्या हुआ आपको?"

"अरे कुछ नही बिटिया।जरा सी सर्दी खाँसी जुकाम बुखार है।"

"सब एक साथ?"

"अरे डॉक्टर।माँ ने भेज दिया तुम्हें?"

"ये आपके लिए लौंग लाई हूँ।चाय में डाल कर पी लीजियेगा।सही हो जाएंगे।"

"अब तो बस माँ जब बुला ले बिटिया।"

एक पंडित जी ही थे जो बेटा नही बिटिया कहते हैं वरना सभी बेटा ही कहते हैं।

"एक अनार भी है पंडित जी।पर आप खाना नही सर्दी और बढ़ जाएगी।"

"तुमको याद है बहुत है बिटिया।वो आएगी अभी थोड़ी देर में सब खा जाएगी।"

"कौन पंडित जी?"

"माँ और कौन?देखो बैठो थोड़ी देर।"

"नहीं पंडित जी।देर हो जाएगी।अब चलती हूँ।"मैं निकली ही थी कि एक छोटी बच्ची सच में पंडित के कमरे में गई और हाथ मे अनार लिए बाहर आ गई।कुछ ही देर में ओझल भी हो गई।

आंखों के सामने से ऐसे कैसे गायब हो सकता है कोई।मैं ही शायद खो गई थी अभी यंही कंही होगी। ढूंढने के लिए उठी,इधर-उधर हर जगह देखा पर वो नही मिली।माँ की मूर्ति को,उनकी आंखों में एक बार फिर देखा और आंखे बंद करके कहा।

"जानती हूँ माँ, तुम ही थीं न?लव यू।"

मैं आज से पहले शायद ही कभी इतनी खुश हुई थी।मन्दिर में साक्षात माँ के दर्शन थे।अभ्युदय जी को आकर बताया तो वो हंसते रहे मुझे देखकर।पर मुझपर असर नही हुआ किसी भी बात या मजाक का।मैंने जो देखा जो महसूस किया वो मैं ही जानती हूँ।

अनार बांट देने पर भी एक अनार मैंने क्यों बचा कर रख लिया था?क्योंकि माँ को खाना था अनार।
 
आज मेरा हैप्पी बर्थडे

रात 12 बजे दरवाजे पर दस्तक के साथ-साथ फोन भी बज उठा।जरूर रिया ही होगी सोचकर फोन देखा तो माँ का फोन था।

"हाँ माँ।थैंक्यू।आप जाग क्यों रही हैं?ठीक है सुबह बात करेंगे।"

बात करके मैंने दरवाजा खोला तो सामने आज रिया नहीं थी।

समझ सकती हूँ मेरी तरह आप सब ने भी यही सोचा होगा कि अभ्युदय जी ही होंगे पर वो भी नही थे।

जी रात के 12 बजे मेरी मकान मालकिन,नई-नई आंटी से परिवर्तित भाभी सामने थीं।

"निशी, हैपी बर्थडे।"

"थैंक्यू भाभी।आपको याद था?"

"नहीं।मुझे याद तो नही था पर शाम को वो तुम्हारे पेशेंट का ड्राइवर आया था,वो ये केक और ये लिफाफा देकर गया।"

"अभ्युदय जी?"

"बोलकर गया कि दीदी को 12 बजे दे दीजियेगा।मैंने देख लिया है बहुत सुंदर केक है।चलो अब काट लो।मैं तुम्हारी फ़ोटो खिंच लेती हूँ।"

"क्या भाभी,आप भी।रहने दीजिए, अभी वापिस रख लीजिए।सुबह नहा कर पूजा कर के काट लेंगे।"

"पक्का?"

"हाँ, छोटू और रिया भी होंगे तब।"

"ठीक है तुम उनको भी बुला लेना।"

"किसे भाभी?"

"अभ्युदय जी को।"

"वो शायद ही आएंगे।बोल दूंगी लेकिन।"

"ठीक है सो जाओ निशी।हैप्पी बर्थडे।"

"जी भाभी।"

मैंने दरवाजा बंद कर फोन देखा तो रिया और अभ्युदय जी के मिस्ड कॉल थे।एक नम्बर नया भी था।पहले रिया को फोन करने का सोचा पर उस नए नम्बर से फिर फोन आने लगा।

"हेलो।"

"हैप्पी बर्थडे ब्यूटीफुल।"

"थैंक्यू।आप कौन?"

"पहचाना नहीं निशी?"

नाम जानता है और बात भी ऐसे कर रहा जैसे बहुत अच्छे से जानता हो मुझे।पर आवाज़ भी तो जानी सी नही है।कौन होगा?

"जी नहीं। मतलब पहचान नही पा रही।"

"चलिए मैं ही बता देता हूँ।पंकज बोल रहा हूं।"

"पंकज आप? आपको नम्बर? रिया ने बताया होगा कि आज मेरा जन्मदिन है।"

"हाँ उस दिन बात हो रही थी तब ही पता चला था।वैसे निशी आज मेरा भी जन्मदिन है।"

"ओह।आपको भी हैप्पी बर्थडे पंकज।"

"सेम टू यू।गॉड ब्लेस यू।बाए निशी।"

"बाय पंकज।"

फोन रखा ही था कि रिया मैडम का फोन आ गया।

"और जानेमन आधे घंटे से कोशिश कर रहे हैं तुमसे गुफ़्तियाने की और आज जनाबे आला फोन ही नही उठा रही हैं।"

"बस कर।सीधे-सीधे कभी हैप्पी बर्थडे नही बोल सकती न?"

"न हम ऐसा पाप नही करते।सुन कल पार्टी समझी?"

"हाँ-हाँ वो तेरा पंकज देगा न पार्टी।"

"ओ तेरी उसे तो फोन ही नही किया बे।उसका भी तो अवतार दिन , है आज।"

"क्या?क्या दिन?"

"तू रहने दे।तुझसे न हो पाएगा।कल पार्टी पक्की समझ।"

"तू पागल है रिया।"

"हाँ पता है।तू थोड़ी कम पागल।लेकिन रुक ज़रा।तुझे कैसे पता कि पंकज का आज??"

"फोन आया था उसका।नम्बर आपके कर कमलों द्वारा ही दिया गया होगा?"

"यार नही दिया बे।सच्ची।HOD की कसम।"

"रिया बकवास न किया कर और ये तेरी HOD कसम तू अपने पास रख।"

"सुन न।मैंने ही दिया था।कल बात हुई थी उससे तब।"

"HOD मरेगा एक दिन, तेरी इन झूठी कसमों से।"

"एक दिन तो हम सभी को मरना है निशी, जल्दी में तो बस वही रहता है न?तू रख यार फोन वंहा एक लड़का मेरी विश के लिए इंतजार में तड़प रहा होगा।"

"हे प्रभु।बाय।नालायक।"

"हाँ-हाँ मेरी लायक।हैप्पी बर्थडे बाय।"

घड़ी में 1 बजने में 5 मिनट कम थे।अभ्युदय जी सो गए होंगे सोचकर मैंने फोन नही किया।लेकिन आंटी जी का फोन आ ही गया।

"हैप्पी बर्थडे निशी बेटा।"

"थैंक्यू आंटी जी।आप इतनी रात तक जागे हुए हैं?"

"ये सोने कंहा देता अभ्यु तुमसे बात करने के लिए बैठा है तबसे।तुमने फोन नहीं उठाया तो इसने मुझे ही उठा दिया।"

"सॉरी आंटी जी।"

"न बेटा, कोई बात नहीं।लो बात करो।"

"आपने आंटी जी को ही जगा दिया?हद करते हैं अभ्युदय जी आप?"

"जन्मदिन मुबारक डॉक्टर साहिबा।"

"दादा जी।बहुत-बहुत थैंक्यू दादा जी।"

"बहुत खुश रहो।सदा तरक्की करो और जो मांगों वो मिले तुम्हें।लो अभ्यु से बात करो।"

"अभ्युदय जी।क्या है ये आपने दादा जी को भी ईतनी रात तक जगा के रखा?गलत है ये।"

"MANY HAPPY RETURNS OF THE DAY DR. NISHI."

"THANKU SO MUCH SIR."

"Hope you get everything you deserve,with all my best wishes.happy birthday"

"Thanku so much sir,means alot."

अभ्युदय जी ने अपने पापा को भी जगाया हुआ है।उनसे बात करते वक़्त तो हाथ पैर कांप जाते हैं।पता नही क्यों डर लगता है मुझे सर से इतना?

"बेटा निशी।ज़रा छत पर जाओ।"

"आंटी इस समय?"

"जाकर देखो एक बार,फोन रखती हूं।कुछ स्पेशल है।"

"लेकिन आंटी वो अभ्युदय जी से बात?" फोन काट दिया था आंटी ने।मुझे बुरा लगा कि अभ्युदय जी ने बात भी नही की।छत पर जाने को उठी और दरवाजा खोल कर निकली।फोन हाथ मे ही था और वो फिर बज उठा।रात के 1 बीज कर 16 मिनट हो रहे थे।

मैंने फोन उठाया।

"हैप्पी बर्थडे टू यू

हैप्पी बर्थडे टू यू

हैप्पी बर्थडे टू यू निशी..

हैप्पी बर्थडे टू यू..

छत से नीचे देखा तो अभ्युदय जी गाड़ी से टिककर खड़े थे।हाथ में फोन और बर्थडे सांग।मन किया छत, से कूद कर जाकर उन्हें गले लगा लूं पर बर्थडे पर ही अपनी हड्डियां तुड़वाने का कोई शौक है नहीं मुझे।

"अब थैंक्यू भी कहोगी?या बस यूँही देखती रहोगी?"

"थैंक्यू सो मच।आप अभी आए हैं?"

"जी नही मोहतरमा 12 बजे से यंही हैं।"

"सॉरी अभ्युदय जी।"

"बर्थ डे पर सॉरी?न न..पार्टी लेंगे।सॉरी नहीं।"

"जी कल करते हैं पार्टी।"

"सिर्फ तुम और मैं।"

"मतलब?"

"मतलब क्या मतलब?अब सिर्फ तुम और मैं का भी कुछ मतलब होता है क्या?"

"नहीं मेरा मतलब है कि वो अकेले क्यों?रिया और पंकज भी होंगे न?"

"निशी, अकेले का मतलब कुछ और ही समझ लिया शायद तुमने।गलत मत सोचना कभी भी। मेरी बातों का जो मतलब होगा वही होगा।डबल मीनिंग नही होगा।जब वैसा वाला अकेले कहूंगा तब भी बता दूंगा कि इरादे गलत हैं मेरे तुम्हारे लिए।समझीं?"

"जी।समझ गई।"

फोन पर बात लेकिन आंखों में आंखे डालकर ये बातें करना एक सुकून सा दे रहा था।मेरी आँखें और अभ्युदय जी की आंखे बस एक दूसरे को ही देख रही थीं बिना पलक झपके हुए।

"अब नीचे जाओ और सुनो दरवाज़ा बन्द मत करना देखो तुम्हारा गिफ्ट नीचे पहुचते ही मिलेगा तुम्हें।"

"जी।ठीक है।थैंक्यू अभ्युदय जी।"

"एक बात और कहूँ आज?"

शायद आज आई लव यू ही कहेंगे।मन में उम्मीद न जाने क्यों आ गई।

"जी कहिये।"

"डरना नही।बादल जोरो से गरज कर हैप्पी बर्थडे गाने वाले हैं।"

"मतलब?"

बूंदाबांदी शुरू हो गई।मैं नीचे आ गई।गाड़ी के जाने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।घर के दरवाजे पर आते ही झमाझम बारिश होने लगी।फोन पर अभ्युदय जी फिर बोले

"जन्मदिन का पहला तोहफा ये है तुम्हारे लिए।सीधे तुम्हारे भगवान से कहा था इसके लिए।तुम्हारी पसंदीदा बारिश।खुश रहो हमेशा।हैप्पी जन्मदिन पागल लड़की।"

"मैं? मैं पागल नही हूँ।"

"हो..हाँ पूरी नही पर पागल हो।"

अभ्युदय जी हँस पड़े और मैं भी।

"सो जाना निशी, कल के दिन बहुत से तोहफे ला रहा है तुम्हारे लिए।हैप्पी वाला जन्मदिन।"

"थैंक्यू सो मच अभ्युदय जी।"

फोन तो कट गया पर बहुत देर मैं दरवाजे पर ही खड़ी बाहर होती बारिश देखती रही।क्या भगवान भी मिला हुआ है अभ्युदय जी के साथ?

हैप्पी बर्थडे निशी।सो जा अब कल देखते हैं क्या नया होता है इस हैप्पी जन्मदिन में
 
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