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निशी ने अपनी सारी अलमारी छान ली पर उसे कुछ भी सफेद रंग में नही मिला पहनने को।उसे कभी सफेद रंग पसन्द ही नही था।
भगवान जी के पास रखे सफेद लिफाफे में से कुछ रुपये लेकर निशी ने अपनी स्कूटी उठाई और पहुच गई गोरखपुर के मार्किट में।संपत की दुकान पर बहुत से सूट देखे पर सफेद देखते ही उसे पसन्द न पसन्द का पैमाना ही खत्म हो जाता था।निशी को जब कुछ समझ नही आया तो दुकान वाले ने एक साड़ी दिखाई।ऑफ वाइट साड़ी पर गुलाबी नीले सितारे जँच रहे थे।इतनी सुंदर साड़ी पहली बार ही देखी थी निशी ने 2600 की शिफॉन साड़ी को बहुत कम कराने पर दुकान वाले ने 2500 में दे ही दी।निशी खुश थी पर अब एक और बड़ी समस्या थी,अभ्युदय जी के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा।
"क्या आज उन्हें सच बोल दू कि वो मुझे पसंद हैं?"
"नहीं। ये उपहार थोड़ी ना हुआ फिर क्या दू?"
"पोहा पसन्द है उन्हें।हम्म.."
पोहा,मूंगफली,सौंफ,हरा धनिया,प्याज,आलू,नींबू और सेव लेकर घर पहुंची।मुझे अपनी माँ के हाथ का पोहा पसन्द है बस वैसे ही बनाने की कोशिश की।चख कर भी देख लिया।ठीक बना है।अपने रूम को कुछ गुब्बारों से सजाया था एक छोटी पेस्ट्री भी लाकर रखी थी।दिमाग में कुछ और चल रहा था लेकिन वैसा होगा या नहीं ये डाउट था।
शाम को एक बार फिर फोन मिलाया अभ्युदय जी के नम्बर पर
"जिंदगी हेलो।"
"हैप्पी जन्मदिन।"
"थैंक्यू तुम्हारा।"
"आप नाराज़ हैं?जन्मदिन पर भी नाराज़ रहेंगे?"
"किसने कहा? नहीं मैं नाराज नही।कितनी देर में आओगी?"
"मैं आज नहीं आ पाऊंगी।"
"क्यों?यंहा से भी पोस्टिंग खत्म कर ली क्या?"
"नहीं।वो आज मार्किट से आते वक्त स्कूटी खराब हो गई और हाथ मे थोड़ी चोट.."
"चोट? कैसी चोट? तुम्हें लगी? कब? कैसे? ध्यान नही रख सकती हो अपना?" इतनी बैचैनी?इतने परेशान?ये तो देखा था मैंने जब दादा जी बीमार थे।आज मेरे लिए इनकी ये परेशानी साफ जाहिर कर रही है इनका प्यार।
"अभ्यु जी।"
"निशी।तुम्हें कुछ हो गया तो मैं.."
"क्या मैं?कहिये? पूरा कीजिये?क्या आप?"
"मैं आता हूँ।" फोन रख दिया उन्होंने।चाल कामयाब हुई।स्कूटी तो खराब हुई थी पर ये चोट वाली बात झूठ थी।
सफेद साड़ी पर कंट्रास्ट पिंक ब्लाउज और हल्की पिंक लिपस्टिक।साड़ी में दिखता मेरा हल्का बदन सच में मेरी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।आज तक लड़की ही आई थी मेरे रूम में कभी कोई लड़का नही तो अपनी मकान मालिक को बताना जरूरी था।
"आंटी।"
"निशी।बहुत सुंदर लग रही हो।तुम्हारी साड़ी तो बस ऐसा लग रहा कि तुम्हारे लिए ही बनाइ गई है।"
"थैंक्यू आंटी।मुझे एक पार्टी में जाना है।मेरे एक पेशेंट आने वाले हैं घर।वो अभी आएंगे थोड़ी ही देर में,आपको कोई ऑब्जेक्शन तो नहीं?वरना मैं उन्हें फोन करके मना कर दूँ?"
"नही बेटा।हमे कोई दिक्कत नही।"
दिल खुशी से झूम उठा।नाच उठा।अरे जन्मदिन के लिये एक सीडी लाई थी।नुसरत फतेह अली खां साहब का एक गाना है 'जिस्म दमकता जुल्फ घनेरी, रँगी लब आंखे जादू,संगमरमर उधा बदल सुर्ख शफक हैरान हूँ।' इसी गाने की ।
मेरे कमरे पर हमेशा रेडियो चलता ही पाया जाता है।मेरे फोन की घंटी बजी।
"निशी.. भीगी सी भागी सी..अच्छा गाना लगाया है।हम खुश हुए।घर कौन सा है तुम्हारा?बाहर तो आओ।"
"जी बर्थडे बॉय।" मैं बाहर आई वो अपनी स्टिक लिए गाड़ी के पास ही खड़े थे।मैं ने अपने हाथों में उनका हाथ लिया और गेट से अंदर ले आई।
कमरे में आते ही अभ्युदय जी बोले
"झूठ कहा था?"
"जी।"
"क्यों?"
"आपको अपने गरीब खाने पर बुलाने के लिए।"
"निशी।"
"जी।"
"बहुत सुंदर हो तुम।"
मैंने कोई जवाब नही दिया बस अंदर वाले कमरे में गई और लाई हुई पेस्ट्री ले आई।
"तो काटूँ?"
"अरे रुकिए।" भगवान जी के पास से कुमकुम चावल की प्लेट उठाई और पहले तिलक लगाया।चावल हल्दी लगाया और फिर कहा काटिए।
काटते हि हैप्पी बर्थडे गाकर मैंने उन्हें पेस्ट्री खिलाई।पोहा लेकर दिया तभी छोटू ऑन्टी का बेटा भी आगया।ये जरूर आंटी के दिमाग की उपज होगी पर अच्छा ही है, उनके मन का वहम या कोई भी विचार निकल जाएंगे।मैंने छोटू को भी पोहा लाकर दिया।अब अभ्यु जी और छोटू बैठकर पोहा खा रहे थे।
"आप चाय पियेंगे?"
"नही। पोहे बहुत अच्छे बने है निशी।पर तुमने ऐसा क्यों किया?"
"मैंने क्या किया?"
"पोहे के साथ अखरोट कौन खाता है?
मैं और अभ्युदय जी देर तक हंसते रहे।
भगवान जी के पास रखे सफेद लिफाफे में से कुछ रुपये लेकर निशी ने अपनी स्कूटी उठाई और पहुच गई गोरखपुर के मार्किट में।संपत की दुकान पर बहुत से सूट देखे पर सफेद देखते ही उसे पसन्द न पसन्द का पैमाना ही खत्म हो जाता था।निशी को जब कुछ समझ नही आया तो दुकान वाले ने एक साड़ी दिखाई।ऑफ वाइट साड़ी पर गुलाबी नीले सितारे जँच रहे थे।इतनी सुंदर साड़ी पहली बार ही देखी थी निशी ने 2600 की शिफॉन साड़ी को बहुत कम कराने पर दुकान वाले ने 2500 में दे ही दी।निशी खुश थी पर अब एक और बड़ी समस्या थी,अभ्युदय जी के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा।
"क्या आज उन्हें सच बोल दू कि वो मुझे पसंद हैं?"
"नहीं। ये उपहार थोड़ी ना हुआ फिर क्या दू?"
"पोहा पसन्द है उन्हें।हम्म.."
पोहा,मूंगफली,सौंफ,हरा धनिया,प्याज,आलू,नींबू और सेव लेकर घर पहुंची।मुझे अपनी माँ के हाथ का पोहा पसन्द है बस वैसे ही बनाने की कोशिश की।चख कर भी देख लिया।ठीक बना है।अपने रूम को कुछ गुब्बारों से सजाया था एक छोटी पेस्ट्री भी लाकर रखी थी।दिमाग में कुछ और चल रहा था लेकिन वैसा होगा या नहीं ये डाउट था।
शाम को एक बार फिर फोन मिलाया अभ्युदय जी के नम्बर पर
"जिंदगी हेलो।"
"हैप्पी जन्मदिन।"
"थैंक्यू तुम्हारा।"
"आप नाराज़ हैं?जन्मदिन पर भी नाराज़ रहेंगे?"
"किसने कहा? नहीं मैं नाराज नही।कितनी देर में आओगी?"
"मैं आज नहीं आ पाऊंगी।"
"क्यों?यंहा से भी पोस्टिंग खत्म कर ली क्या?"
"नहीं।वो आज मार्किट से आते वक्त स्कूटी खराब हो गई और हाथ मे थोड़ी चोट.."
"चोट? कैसी चोट? तुम्हें लगी? कब? कैसे? ध्यान नही रख सकती हो अपना?" इतनी बैचैनी?इतने परेशान?ये तो देखा था मैंने जब दादा जी बीमार थे।आज मेरे लिए इनकी ये परेशानी साफ जाहिर कर रही है इनका प्यार।
"अभ्यु जी।"
"निशी।तुम्हें कुछ हो गया तो मैं.."
"क्या मैं?कहिये? पूरा कीजिये?क्या आप?"
"मैं आता हूँ।" फोन रख दिया उन्होंने।चाल कामयाब हुई।स्कूटी तो खराब हुई थी पर ये चोट वाली बात झूठ थी।
सफेद साड़ी पर कंट्रास्ट पिंक ब्लाउज और हल्की पिंक लिपस्टिक।साड़ी में दिखता मेरा हल्का बदन सच में मेरी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।आज तक लड़की ही आई थी मेरे रूम में कभी कोई लड़का नही तो अपनी मकान मालिक को बताना जरूरी था।
"आंटी।"
"निशी।बहुत सुंदर लग रही हो।तुम्हारी साड़ी तो बस ऐसा लग रहा कि तुम्हारे लिए ही बनाइ गई है।"
"थैंक्यू आंटी।मुझे एक पार्टी में जाना है।मेरे एक पेशेंट आने वाले हैं घर।वो अभी आएंगे थोड़ी ही देर में,आपको कोई ऑब्जेक्शन तो नहीं?वरना मैं उन्हें फोन करके मना कर दूँ?"
"नही बेटा।हमे कोई दिक्कत नही।"
दिल खुशी से झूम उठा।नाच उठा।अरे जन्मदिन के लिये एक सीडी लाई थी।नुसरत फतेह अली खां साहब का एक गाना है 'जिस्म दमकता जुल्फ घनेरी, रँगी लब आंखे जादू,संगमरमर उधा बदल सुर्ख शफक हैरान हूँ।' इसी गाने की ।
मेरे कमरे पर हमेशा रेडियो चलता ही पाया जाता है।मेरे फोन की घंटी बजी।
"निशी.. भीगी सी भागी सी..अच्छा गाना लगाया है।हम खुश हुए।घर कौन सा है तुम्हारा?बाहर तो आओ।"
"जी बर्थडे बॉय।" मैं बाहर आई वो अपनी स्टिक लिए गाड़ी के पास ही खड़े थे।मैं ने अपने हाथों में उनका हाथ लिया और गेट से अंदर ले आई।
कमरे में आते ही अभ्युदय जी बोले
"झूठ कहा था?"
"जी।"
"क्यों?"
"आपको अपने गरीब खाने पर बुलाने के लिए।"
"निशी।"
"जी।"
"बहुत सुंदर हो तुम।"
मैंने कोई जवाब नही दिया बस अंदर वाले कमरे में गई और लाई हुई पेस्ट्री ले आई।
"तो काटूँ?"
"अरे रुकिए।" भगवान जी के पास से कुमकुम चावल की प्लेट उठाई और पहले तिलक लगाया।चावल हल्दी लगाया और फिर कहा काटिए।
काटते हि हैप्पी बर्थडे गाकर मैंने उन्हें पेस्ट्री खिलाई।पोहा लेकर दिया तभी छोटू ऑन्टी का बेटा भी आगया।ये जरूर आंटी के दिमाग की उपज होगी पर अच्छा ही है, उनके मन का वहम या कोई भी विचार निकल जाएंगे।मैंने छोटू को भी पोहा लाकर दिया।अब अभ्यु जी और छोटू बैठकर पोहा खा रहे थे।
"आप चाय पियेंगे?"
"नही। पोहे बहुत अच्छे बने है निशी।पर तुमने ऐसा क्यों किया?"
"मैंने क्या किया?"
"पोहे के साथ अखरोट कौन खाता है?
मैं और अभ्युदय जी देर तक हंसते रहे।