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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

उस आदमी की कहानी जिसके चारों अँगूठे कटे थे

उस ने कहा कि दोस्तो, मेरा पिता बगदाद का रहनेवाला था और खलीफा हारूँ रशीद के जमाने में था। मैं भी उसी समय पैदा हुआ। मेरा पिता यद्यपि धनवान तथा बड़े व्यापारियों में गिना जाता था तथापि वह बहुत ही विलासी और व्यसनी था। इसीलिए व्यापार की ठीक तरह देख-भाल नहीं कर पाता था और उसमें काफी गड़बड़ होती थी। जब वह मरा तो मुझे मालूम हुआ कि न जाने कितने लोगों से उस ने ॠण ले रखा था। मुझे कठिनाई तो बहुत हुई किंतु मैं ने परिश्रम से व्यापार बढ़ाया और धीरे-धीरे सारे ॠणदाताओं का रुपया वापस कर दिया।

अब मैं इत्मीनान से अपनी कपड़े की दुकान पर बैठ कर व्यापार किया करता था। एक दिन मैं दुकान पर बैठा था कि एक सुंदरी, जो खच्चर पर सवार थी और जिसके आगे एक नौकर और पीछे दो नौकरानियाँ चल रही थीं, मेरी दुकान के पास आई। उस के नौकर ने उसे हाथ पकड़ कर खच्चर से उतारा और कहा, 'मालकिन, आप बेकार ही इतने सवेरे बाजार में आ गईं। अभी तो कोई दुकान ही नहीं खुली है, आप कहाँ तक प्रतीक्षा करेंगी।' उस ने कहा, 'तुम ठीक कहते हो, केवल एक ही दुकान खुली है। चलो उसी में चलें।'

अतएव वह मेरी दुकान पर आ कर बैठ गई। उस ने देखा कि मेरे और नौकर के अलावा कोई नहीं है तो साफ हवा लेने के लिए नकाब थोड़ा-सा उठाया। मैं ने ऐसा रूप कभी नहीं देखा था। मैं ठगा-सा टकटकी लगा कर उसे बराबर देखता रहा। उस ने मेरी उत्कंठा देख कर पूरा नकाब उलट दिया और मैं जी भर कर उस के सौंदर्य का रसास्वादन करने लगा। कुछ ही देर में अन्य व्यापारी और ग्राहक आ गए और बाजार में भीड़ बढ़ गई तो उस ने नकाब फिर चेहरे पर डाल दिया।

उस ने मुझ से कहा, 'मैं जरी के कपड़े खरीदना चाहती हूँ। आपके पास ऐसे थान हों तो दिखाइए।' मैं ने कहा, 'मैं तो सादा थान बेचता हूँ लेकिन आप कहें तो अन्य दुकानदारों के यहाँ से खुद आपके लिए अच्छे-अच्छे थान ला दूँ, इस से आपका दुकान- दुकान जा कर कपड़े देखने और खरीदने का कष्ट बच जाएगा।' वह इस बात से बहुत प्रसन्न हुई और देर तक मुझ से इधर-उधर की बातें करती रही।

कुछ देर बाद मैं कई दुकानों में गया और बहुत-से जरी के थान मैं ने उस स्त्री के आगे ला कर रख दिए। उस ने उसमें कुछ थान पसंद किए। उनका मूल्य 24,750 मुद्राएँ था। उस ने यह दाम मंजूर कर लिया और मैं ने थान उस के सेवक को दे दिए। उस स्त्री ने विदा ली। मैं उस के सौंदर्य के मोह में इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था कि उस से थानों का मूल्य माँगा ही नहीं और उस ने भी नहीं दिया। मैं ने उस से यह भी नहीं पूछा कि तुम रहती कहाँ हो।

मुझे फिक्र हुई कि उस से रुपया न मिला तो मैं यह पौने पच्चीस हजार कहाँ से भरूँगा। दुकानदारों को दिलासा दे दिया कि मैं उस स्त्री को जानता हूँ और दाम मिल जाएँगे। लेकिन रात भर चिंता में मुझे नींद न आई। दूसरे दिन मैं ने व्यापारियों से एक हफ्ते में अदायगी करने का वादा किया और उन्होंने इसे मंजूर कर लिया। एक हफ्ते तक भी उस स्त्री का पता नहीं लगा।

आठवें दिन वह सुंदरी उसी खच्चर पर उन्हीं सेवकों के साथ मेरी दुकान पर आई और बोली, 'तुम रुपए लेने क्यों नहीं आए। अब मुझे खुद इन्हें ले कर आना पड़ा। अब मैं सारा पैसा ले आई हूँ। सर्राफ से परखवा लो कि सिक्के ठीक हैं या नहीं।' मैं ने सर्राफ को दिखाया तो सब सिक्के खरे निकले। वह सुंदरी देर तक मुझ से बातें करती रही और बातचीत से मालूम हुआ कि वह बहुत बुद्धिमती है। मैं ने वस्त्र व्यापारियों को बुला कर उनका रुपया दे दिया। वे सब बड़े प्रसन्न हुए और मेरे व्यवहार से बाजार में मेरी साख बढ़ गई।

उस सुंदरी ने कई और थान माँगे और मैं ने व्यापारियों से ला कर उसे दे दिए लेकिन फिर भी न उस का नाम पूछा न निवास स्थान। उस के जाने के बाद फिर सोचने लगा कि एक बार तो वह रुपए दे गई, अब अगर न दिए तो मैं बरबाद हो जाऊँगा। फिर सोचता कि यह असंभव है कि वह धोखा करे, वह तो मेरे शील की परीक्षा ले रही है। उसे मेरे हानि-लाभ और प्रतिष्ठा का खयाल जरूर होगा। वह तो जानती ही है कि मेरी साख पर ही व्यापारियों ने कपड़े के थान दिए हैं। कभी मुझे अपनी संभावित हानि का ध्यान आता और कभी उस के सौंदर्य का ध्यान करके सारा दुख भूल जाता।

इस बार उस ने बहुत दिनों तक रुपए न पहुँचाए और बजाज लोग बेसब्र हो कर मुझ से रुपयों का तकाजा करने लगे। मैं अपनी आमदनी में से थोड़ा-थोड़ा उन्हें भिजवा कर उनकी तसल्ली कर देता था। एक महीने बाद वह फिर अपने सेवकों के साथ आई और उस ने पिछली बार के खरीदे कपड़ों का मूल्य दे दिया। फिर उस ने मुझ से पूछा कि तुम्हारा विवाह हो चुका है या नहीं। मैं ने कहा, अभी तक नहीं हुआ। उस ने अपने नौकर को इशारा किया और वह मुस्कुराता हुआ उठा और मुझे एक तरफ ले जा कर बोला, 'तुम क्या समझते हो कि मालकिन तुम से कपड़े खरीदने के लिए आती हैं। मैं जानता हूँ कि तुम उन पर आसक्त हो लेकिन तुम ने सभी से यह बात छुपाई है। अब यह जान लो कि वह भी तुम से प्रेम करती है इसीलिए तुम्हारे विवाह के बारे में पूछा। तुम इतने बुद्धू निकले कि उस का इशारा भी नहीं समझे।' मैं ने कहा, 'भाई, मैं ने तो जब पहली ही बार तुम्हारी मालकिन को देखा तो उस पर मर मिटा। किंतु मुझे यह आशा नहीं थी कि वह भी मुझ से प्रेम करेंगी। अब तुम इस मामले में अगर मेरी सहायता करोगे तो मैं आजीवन तुम्हारा अहसान नहीं भूलूँगा।'

वह मेरे पास से उठ कर अपनी मालकिन के पास पहुँचा और उसे मेरी बात बताई। वह सुंदरी अपनी सेविकाओं को कुछ इशारा कर के उठ खड़ी हुई और फिर मुझ से बोली, 'मैं अपने नौकर को तुम्हारे पास भेजूँगी, वह जैसा कहे वैसा करना।' यह कह कर वह चली गई। मैं कई दिन तक नौकर की बाट देखता रहा। जब वह आया तो मैं ने उस से उस सुंदरी की कुशलक्षेम पूछी। उस ने कहा कि तुम बड़े भाग्यवान आदमी हो, वह तुम पर अत्यधिक मोहित हैं, उनका बस चलता तो अभी तुम्हारे पास पहुँच जातीं।

मैं ने कहा, वह बहुत शीलवती जान पड़ती हैं कि इतने संयम से काम लेती हैं। उस ने कहा, 'तुम्हें इसलिए उनके शील पर आश्चर्य हो रहा है कि उन्हें जानते नहीं हो। वह खलीफा हारूँ रशीद की पत्नी जुबैदा की सहेली हैं। बीबी उन्हें बहुत प्यार करती हैं, उन्होंने उनके बचपन ही से उन्हें पाला-पोसा है। वह जनानखाने की सारी व्यवस्था करती हैं। जुबैदा कई बार उन से विवाह करने को कह चुकी हैं। अब उस ने कहा कि एक व्यापारी है, आप अनुमति दें तो उस से विवाह कर लूँ। बीबी ने कहा, अच्छी बात है लेकिन उस व्यापारी को एक बार देखने के बाद ही मैं शादी के लिए अनुमति दूँगी। इसीलिए मैं तुम्हें लेने आया हूँ।'

मैं ने कहा, मैं तैयार हूँ, जब भी चाहो मुझे ले चलो। उस ने कहा, 'ठीक है। लेकिन तुम जानते हो कि खलीफा के महल में कोई बाहरी आदमी नहीं जा सकता। मैं तुम्हें और किसी तरकीब से ही ले जाऊँगा। तुम आज शाम को नदी के किनारे बनी फलाँ मस्जिद में मेरी राह देखना।' मैं ने बड़ी प्रसन्नता से उस की बात स्वीकार की।

शाम को मैं उस मस्जिद में जा कर बैठ गया। थोड़ी ही देर में एक डोंगी आ कर किनारे से लगी। उसमें कई संदूक रखे थे। मल्लाहों ने डोंगी किनारे से बाँधी और एक काफी लंबा संदूक ला कर मस्जिद में रख दिया और नाव पर चले गए। नाव पर आया हुआ एक नौकर वहीं रह गया। कुछ देर में वह सुंदरी वहाँ आई। मैं ने कहा, 'मेरे लिए क्या हुक्म है।' वह बोली, ' बाद में बातें होंगी, इस समय बात करने की फुरसत नहीं है। तुम सिर्फ इस लंबे संदूक में जा कर लेटे रहो।' मैं संदूक में लेट रहा तो उस ने संदूक में ताला लगा दिया और सेवक से कहा कि इसे नाव पर पहुँचा दो। नौकर ने मल्लाहों को पुकारा और वह संदूक, जिसमें मैं था, नाव पर पहुँचा दिया। वह सुंदरी भी नाव पर बैठ गई।

मैं संदूक के अंदर पड़ा-पड़ा अपने भाग्य को कोसने लगा कि अच्छी-खासी जिंदगी छोड़ कर किस मुसीबत में फँस गया। नाव खलीफा के महल के मुख्य द्वार के समीप जा लगी। सारे संदूक द्वार पर पहुँचा दिए गए। द्वारपालों के पास सारी चाबियाँ थीं और देखे-भाले बगैर कोई चीज अंदर नहीं जा सकती थी। प्रधान द्वारपाल उस समय सो रहा था। उसे जगाया गया तो वह बहुत झुँझलाया और कहने लगा कि मैं संदूकों की एक-एक चीज देखूँगा। सुंदरी ने चुपचाप अपने नौकरों से कहा कि सारे संदूक द्वारपाल को दिखाए बगैर अंदर ले जाओ, ऐसा न हो कि वह संदूकों को खोल कर देखे और भेद खुल जाए। किंतु द्वारपालों ने ऐसा नहीं होने दिया। वे सारे संदूक प्रधान द्वारपाल के पास ले गए। सबसे पहले वही संदूक रखा जिसमें मैं था। सुंदरी की प्रधान द्वारपाल से बहस होने लगी। मैं इस बहस को सुन कर अंदर ही अंदर सूखा जाता था। यह तो स्पष्ट ही था कि अगर मुझे संदूक में पाया गया तो खलीफा मुझे अवश्य मृत्युदंड देंगे।

लेकिन मेरी प्रेमिका ने प्रधान द्वारपाल को संदूक नहीं खोलने दिया। वह बोली, 'तुम अच्छी तरह जानते हो कि जुबैदा की आज्ञा के बगैर कोई चीज अंदर नहीं ले जाती। इस संदूक में बड़े व्यापारियों से खरीदा हुआ बहुत-सा कीमती और नाजुक सामान रखा है तुम उसे निकालोगे तो वे चीजें टूट-फूट जाएँगी। इस के अतिरिक्त एक पतले काँच के घड़े में मक्के से लाया हुआ जमजम का पवित्र जल है। वह काँच का घड़ा अगर टूट गया या अन्य वस्तुएँ नष्ट हो गईं तो तुम्हें इसकी जवाबदेही करनी पड़ेगी और जुबैदा के हाथों तुम्हें कठोर दंड मिलेगा।'

प्रधान द्वारपाल इस बात से डर गया। वह चुप हो गया। सुंदरी ने गुलामों से सारे संदूक अंदर पहुँचाने के लिए कहा और उन्होंने ऐसा ही किया। किंतु अंदर जा कर भी मेरी मुसीबत खत्म नहीं हुई। संदूकों के खुलने के पहले ही अचानक वहाँ खलीफा आ गया। उस ने बहुत-से संदूक देख कर पूछा कि इन में क्या है, और न जाने उसे क्या सूझी कि हुक्म दिया कि सारे संदूकों का सामान मुझे दिखाया जाए। सुंदरी ने बड़े बहाने बनाए लेकिन खलीफा टस से मस न हुआ। विवशतः उस ने एक एक संदूक खोल कर दिखाना शुरू किया मेरा संदूक इस आशा में आखिर तक डटा रहा और उस ने अंतिम संदूक, जिसमें मैं बंद था, खोल कर दिखाने का आदेश दिया।

मित्रो, आप लोग सोच सकते हैं कि उस समय भय से मेरी क्या दशा हुई होगी। अगर कोई मुझे काटता तो बदन से खून न निकलता। किंतु उस सुंदरी ने बड़ी समझदारी से काम लिया। उस ने हाथ जोड़ कर कहा, 'सरकार, इस संदूक के खुलवाने का आग्रह न करें। इसमें जुबैदा के काम की खास चीजें हैं। जुबैदा की अनुमति के बगैर मैं इसे नहीं खोल सकती।' खलीफा ने हँस कर कहा, अच्छा फिर न खोल इसे।' और यह कह कर वह चला गया। मेरी जान में जान आई।

सुंदरी ने सेवकों से सारे संदूक अपने निवास कक्ष में पहुँचवाए। जब सारे नौकर चले गए तो उस ने मेरा संदूक खोला और मुझे एक जीना दिखा कर कहा कि ऊपर के कमरे में बैठो, मैं थोड़ी ही देर में आऊँगी। मैं ऊपर गया तो उस ने जीने का ताला लगा दिया। ताला लगाए दो क्षण भी नहीं हुए थे कि खलीफा फिर वहाँ आ गया और उसी संदूक पर बैठ कर उस स्त्री से बहुत देर तक नगर के बारे में पूछताछ करने लगा। वह सुंदरी काफी देर तक खलीफा से वार्तालाप करती रही। जब खलीफा अपने शयन कक्ष में चला गया तो वह ऊपर आई और बोली, 'तुम पर मेरे कारण बड़े कष्ट पड़े, किंतु अब तुम आराम से रहो। सुबह तुम्हें जुबैदा के पास ले चलूँगी।' फिर हम दोनों ने भोजन किया और वह चली गई।

मैं बड़े आनंद से उस भव्य प्रासाद में सोया। मुझे बड़ी प्रसन्नता थी कि यद्यपि यहाँ तक पहुँचने में बड़ी कठिनाइयाँ और खतरे उठाए किंतु अब तो किसी बात का खटका ही नहीं है। मुझे यह भी खुशी थी कि इतनी सुंदर और बुद्धिमती स्त्री स्वयं मेरे प्रेम में ग्रस्त है। सुबह वह मेरे पास आई और मुझ से बोली कि चलो मैं तुम्हें जुबैदा के पास ले चलती हूँ। इस के साथ उस ने मुझे खलीफा की पत्नी से बातचीत और व्यवहार करने के तौर-तरीके भी बताए। उस ने वे सभी संभव प्रश्न जो जुबैदा मुझ से पूछ सकती थी बताए और यह भी बताया कि उनका क्या उत्तर दूँ। उस ने मुझे एक स्थान पर ले जा कर खड़ा कर दिया और कहा कि जुबैदा अपने शयनागार से निकल कर यहीं बैठती है। यह कह कर वह चली गई। वह कमरा इतना शानदार था कि मैं चकराया-सा खड़ा रह गया और आँखें फाड़-फाड़ कर चारों ओर देखने लगा।

सबसे पहले बीस दासियाँ आईं। वे उस तख्त के सामने जो जुबैदा के बैठने के लिए बिछा था दो पंक्तियों में खड़ी हो गईं। फिर बीस अन्य दासियों के मध्य हंस जैसी चाल से चलती हुई जुबैदा आई और तख्त पर बैठ गई। वह गहने और भारी पोशाक से इतनी लदी हुई थी कि मंद गति ही से चल सकती थी। वह उसी रत्नजटित सिंहासन पर बैठ गई। सब दासियाँ अपने-अपने उचित स्थान पर खड़ी हो गईं और मेरी प्रेमिका, जो जुबैदा की खास मुसाहिब थी, बड़ी आन-बान से जुबैदा के दाहिनी ओर खड़ी हो गई।

अब एक दासी ने मुझे इशारा किया कि झुक कर सलाम करो। मैं ने तख्त के आगे जा कर अपने सिर को इतना झुकाया कि वह जुबैदा के पाँव से लग गया। मैं बराबर इसी दशा में रहा और सिर तभी उठाया जब जुबैदा ने मुझ से उठाने के लिए कहा। उस ने मेरा नाम, पेशा, कुटुंब आदि-आदि के बारे में प्रश्न किए जिनका मैं ने यथोचित उत्तर दिया। जुबैदा मेरी शक्ल-सूरत देख कर और मेरी बातें सुन कर प्रसन्न हुई। उस ने कहा, 'मैं चाहती हूँ कि तुम्हारा विवाह अपनी मुँहबोली बेटी से करूँ। मैं विवाह की तैयारियों के लिए आदेश देती हूँ। दस दिन बाद तुम्हारा विवाह हो जाएगा। दस दिन तक तुम इसी तरह होशियारी से रहो। इसी अवधि में मैं खलीफा से तुम्हारे विवाह के लिए अनुमति भी ले लूँगी।' '

मैं जुबैदा से विदा ले कर अपने कमरे में चला गया। मेरी प्रेमिका कई बार मौका निकाल कर मेरे पास आती और बातचीत करके चली जाती। मैं बड़ी सुख-सुविधा से वहाँ रहने लगा। जुबैदा ने इस अवधि में खलीफा से विवाह की अनुमति भी ले ली और शादी के समारोह के लिए बहुत-सा धन दिया। रोज ही वहाँ गाना-बजाना और तरह-तरह के खेल-तमाशे होने लगे। दसवें दिन हम दूल्हा-दुल्हन ने नहा-धो कर मूल्यवान वस्त्र पहने। शाम को दासियों ने हम लोगों के सामने नाना प्रकार के व्यंजन खाने के लिए परोसे। एक रकाबी में वही लहसुन का व्यंजन था जो आप लोगों ने मुझे खिलाया है। मुझे वह बहुत अच्छा लगा और मैं ने अन्य चीजों के बजाय उसे अधिक खाया। दुर्भाग्य से खाने के बाद मैं ने अच्छी तरह से हाथ नहीं धोए, यूँ ही रूमाल से हाथ पोंछ लिए।

रात और बीती तो दासियों ने वहाँ बहुत-से दीए और मोमबत्तियाँ जलाईं और देर तक नाच और गाना बजाना होता रहा। जब रात काफी ढल गई तो दासियों ने हम दोनों को शयनागार में पहुँचा दिया। मैं ने अपनी पत्नी को जब अपनी गोद में खींचना चाहा तो वह बड़े क्रुद्ध स्वर में चीखने-चिल्लाने लगी। सारी दासियाँ यह देखने के लिए दौड़ी आईं कि क्या हो गया। मैं तो इतना घबरा गया था कि उस से पूछ ही न सका कि क्या बात हो गई। दासियों ने पूछा कि मालकिन, ऐसी क्या बात हो गई कि आप इतनी नाराज हैं, हम से कुछ भूल हो गई हो तो बताइए। मेरी पत्नी चीख कर बोली, 'इस अभागे को मेरे पास से तुरंत हटाओ।' मैं ने डरते-डरते पूछा, 'सुंदरी, ऐसा क्या अपराध मुझ से हुआ कि आप मुझे अपने पास ही से हटा रही हैं?' उस ने कहा, 'तुम दुष्ट भी हो और असभ्य भी। तुम ने लहसुन का पुलाव खाया और हाथ भी अच्छी तरह नहीं धोए। ऐसे गंदे आदमी से मुझे हार्दिक घृणा है। तुम्हारे हाथों की बदबू से अभी तक मेरा दिमाग फटा जा रहा है।'

यह कह कर उस ने दासियों को आज्ञा दी कि मुझे जमीन पर गिरा कर दबाए रहें। दासियों ने ऐसा ही किया। उस सुंदरी ने हाथ में चमड़े का चाबुक ले कर मुझे मारना शुरू किया और तब तक मारती रही जब तक खुद पसीने-पसीने न हो गई। फिर उस ने दासियों से कहा कि इसे दारोगा के पास ले जाओ ताकि वह इसका दाहना हाथ जिससे इसने पुलाव खाया था काट डाले। मैं अपने मन में पश्चात्ताप करने लगा कि इतने छोटे- से अपराध पर मेरा हाथ काट डाला जाएगा, इतनी मार मेरे लिए यथेष्ट नहीं समझी गई, वह बावर्ची जिसने उसे पकाया था और वह दासी जिसने मेरे सामने वह रकाबी रखी थी ऐसा करने के पहले ही क्यों न मर गए।

मेरी पत्नी की निष्ठुरता तो जैसी की तैसी रही किंतु हर एक बाँदी मेरी दशा से दुखी होने लगी। उन सभी ने मेरी पत्नी से कहा, 'मालकिन, अब गुस्सा थूक दो। इस के अपराध और मूर्खता में संदेह नहीं किंतु यह बेचारा तुम्हारी प्रतिष्ठा और तुम्हारी सुरुचि को क्या जाने। इसे काफी सजा मिल चुकी है। अब इस के अपराध क्षमा हों।' वह बोली, 'हरगिज नहीं। इसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि यह हमेशा याद रखे कि लहसुन खाने के बाद हाथ-धोना जरूरी होता है। इस के पास कुछ ऐसी निशानी होनी चाहिए जिससे यह अपने अपराध को हमेशा याद रखे और फिर यह अपराध न करे।' दासियों ने फिर एक स्वर से अनुनय की विनय की तो वह चुप हो रही और उस कमरे से उठ कर चली गई।

सारी दासियाँ भी उस के पीछे चली गईं। मुझे उसी कमरे में बंद कर दिया। दस दिन तक मैं वहीं बंद रहा। कोई दासी या नौकर-चाकर मेरी पत्नी के क्रोध से डर से मेरे पास फटकता भी नहीं था, सिर्फ एक बुढ़िया दिन में दो बार आ कर खाने-पीने के लिए मुझे कुछ दे जाती थी। एक दिन उस से मैं ने अपनी पत्नी का हाल पूछा। उस ने कहा, 'वह तो बीमार पड़ी है। तुम्हारे हाथ की लहसुन की बदबू उस से बर्दाश्त नहीं हुई। तुम ने लहसुन का पुलाव खा कर हाथ क्यों नहीं धोए?' मैं ने कहा, 'अब तो जो हो गया वह हो ही गया।' मैं सोचने लगा कि इन स्त्रियों की नजाकत की भी हद नहीं है और क्रोध की भी। फिर भी आश्चर्य यह था कि मेरे मन से उस का प्रेम न गया और मैं उस कीएक झलक पाने के लिए तड़पने लगा।

दस दिन बाद बुढ़िया ने बताया, तुम्हारी पत्नी स्वस्थ हो गई और नहाने के लिए हम्माम को गई है। उस ने कहा कि स्नान के बाद वह यहाँ आएगी। शायद आज न आ सके लेकिन कल जरूर आएगी।

दूसरे दिन वह मेरे पास आई किंतु उस का क्रोध शांत न हुआ था। वह बोली कि मैं तुझे प्यार करने को नहीं, दंड देने को आई हूँ। यह कह कर उस ने फिर दासियों को आज्ञा दी कि मुझे जमीन पर गिरा दें। उन्होंने मुझे जमीन पर गिरा कर मुझे अच्छी तरह दबा रखा और मेरी निर्दयी पत्नी ने छुरी ले कर मेरे दोनों हाथों और दोनों पावों के अँगूठे काट डाले। एक दासी ने तुरंत ही किसी विशेष वृक्ष की पिसी हुई जड़ मेरे घावों पर लगा दी जिससे खून बहना बंद होगा किंतु पीड़ा के कारण मैं अचेत हो गया। जब मुझे होश आया तो उन्होंने मुझे थोड़ी मदिरा पिलाई जिससे मेरे शरीर में शक्ति आ गई।

मुझे फिर भी अपनी पत्नी की खुशामद करनी ही थी क्योंकि उस की कृपा के बगैर मेरी जान न बचती। मैं ने उस से कहा कि अब मैं कभी ऐसा दुर्गंधयुक्त भोजन नहीं करूँगा और करूँगा भी तो एक सौ चालीस बार हाथ धोऊँगा। उस ने कहा, 'फिर मैं भी उस कष्ट को जो तुम्हारे कारण मुझे हुआ है, भूल जाऊँगी। अतः हम लोग आनंदपूर्वक पति-पत्नी की तरह रहने लगे। किंतु मुझे यह बड़ा कष्ट था कि शाही महल में मुझे छुप कर रहना पड़ता था। मेरी पत्नी मेरे कहे बगैर ही मेरे दुख को समझ गई और उस ने एक दिन जुबैदा से यह बात कही तो उस ने मेरे अलग घर में रहने के लिए पचास हजार अशर्फियाँ दीं। मेरी पत्नी ने मुझे दस हजार अशर्फी दे कर कहा कि नगर में कोई अच्छा मकान खरीद लो ताकि हम वहाँ रहें।

मैं ने शहर में एक अच्छा मकान खरीद कर उसे बहुमूल्य वस्तुओं से सजाया और कुछ दास-दासियाँ भी मोल लीं। हम दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। किंतु कुछ समय के बाद ही मेरी पत्नी बीमार हो कर मर गई। मैं ने दूसरा विवाह किया, कुछ दिनों के बाद वह स्त्री भी मर गई। फिर मैं ने तीसरा विवाह किया किंतु मेरी तीसरी पत्नी भी काल कवलित हो गई। मैं ने विचार किया कि यह घर ही मनहूस है, इसमें रहना नहीं चाहिए। इस के अलावा लगातार तीन पत्नियों की मृत्यु से मैं खिन्न भी था। इसलिए मैं मकान को बेच-बाच कर देश-विदेश के व्यापार को निकला। पहले फारस गया, वहाँ से समरकंद पहुँचा और वहाँ से यहाँ आया हूँ।

अनाज के व्यापारी ने यह कह कर बादशाह से पूछा कि कहानी कैसी है। उस ने कहा, ईसाई की कहानी से तो अच्छी है किंतु कुबड़े की कहानी को नहीं पहुँचती। अब यहूदी हकीम ने कहानी शुरू की।
 
यहूदी हकीम

यहूदी हकीम ने बादशाह के सामने झुक कर जमीन चूमी और कहा कि पहले मैं दमिश्क नगर में हकीमी किया करता था। अपनी चिकित्सा विधि के कारण वहाँ मेरी बड़ी प्रतिष्ठा हो गई थी। एक दिन वहाँ के हाकिम ने मुझ से कहा कि फलाँ मकान में एक रोगी है, वह यहाँ आ नहीं सकता, उसे वहीं जा कर देखो। मैं वहाँ गया तो देखा एक अत्यंत सुंदर नवयुवक चारपाई पर लेटा है। उस ने मेरे अभिवादन के उत्तर में इशारे से कहा कि आपका यहाँ स्वागत है।

मैं ने उस से नाड़ी दिखाने को कहा तो उस ने बायाँ हाथ बढ़ा दिया। मैं ने समझा कि इसे मालूम नहीं है कि नाड़ी दाहिने हाथ की देखी जाती है किंतु मैं ने बहस बगैर नाड़ी देखी और दवा लिख दी। नौ दिन तक मैं उसे देखने को जाता रहा। नवें दिन मैं ने कहा, अब आप बिल्कुल स्वस्थ हैं, स्नान कीजिए। दमिश्क के हाकिम ने मुझे यथेष्ट पारितोषिक दिया और मुझे शाही दवाखाने का प्रमुख बना दिया। जिस युवक का मैं ने इलाज किया था वह भी मुझे बहुत मानने लगा। उस ने कहा, 'मैं आप की निगरानी ही में स्नान करूँगा।' अतएव मैं स्नानागार में उस के साथ गया।

उस के कपड़े उतारने पर मैं ने देखा कि उस का दाहिना हाथ कटा हुआ है। वह हाथ कटने ही से बीमार पड़ा था और इसी कारण बायाँ हाथ दिखाया करता था। मुझे वह देख कर बड़ा दुख हुआ। उस ने मेरी आँखों की करुणा देख कर कहा, 'आप मेरा दाहिना हाथ कटा देख कर ही आश्चर्य और दुख में डूबे हैं। अगर आप मेरी कहानी सुनेंगे तो और भी आश्चर्य करेंगे। स्नान के बाद जब मैं भोजन करने बैठूँगा तो आप को पूरी कहानी सुनाऊँगा। लेकिन यह बताइए कि क्या इस समय बाग की सैर करने से मुझे कुछ हानि होगी।' मैं ने कहा, 'बाग की सैर करने से तुम्हें फायदा ही होगा, नुकसान नहीं। उस ने कहा, ठीक है, बाग की सैर करते-करते ही मैं आप को सारा किस्सा सुनाऊँगा। फिर उस ने अपने सेवकों को भोजन तैयार करने की आज्ञा दी। और हम दोनों बाग में गए। हमने दो-तीन चक्कर लगाए और फिर वहाँ पर बिछे एक कालीन पर बैठ गए और उस युवक ने अपना वृत्तांत आरंभ किया।

उस ने कहा कि मैं मोसिल का रहनेवाला हूँ। मैं एक बड़े घराने का लड़का हूँ। मेरे पितामह के दस बेटे थे जिनमें मेरे पिता सबसे बड़े थे। अपने पिता का मैं एकमात्र पुत्र था और मेरे किसी चचा की कोई संतान नहीं थी। मेरे पिता ने मेरी शिक्षा-दीक्षा पर बहुत ध्यान दिया और मुझे प्रत्येक पाठनीय विषय की शिक्षा ही नहीं दिलाई बल्कि अनेक कला के क्षेत्रों में पारंगत करवा दिया।

एक दिन मैं अपने पिता और चचा के साथ जुमे की नमाज को गया। नमाज के बाद सारे नमाजी अपने-अपने काम पर चले गए और मेरे पिता और चचा बातें करने लगे। मेरे चचा ने कहा कि कोई देश मिस्र जैसा सुंदर नहीं है। उन्होंने मिस्र देश और उसमें बहनेवाली नील नदी की इतनी प्रशंसा की कि मेरा मन बेतहाशा उस देश को देखने के लिए होने लगा। घर पर भी यही चर्चा रही। मेरे पिता भी मिस्र देश के बड़े प्रशंसक थे। मेरे दूसरे चचा लोग कह रहे थे कि बगदाद जैसी सुंदर जगह कोई नहीं है किंतु मेरे पिता ने उनकी बात का विरोध किया और मिस्र की बहुत प्रशंसा की।

उन्होंने कहा, 'जिसने मिस्र नहीं देखा उस ने ईश्वर की महिमा भी नहीं देखी। वहाँ की भूमि सोना उगलती है, वहाँ के निवासी बड़े धन-संपन्न हैं। मिस्र की स्त्रियाँ अत्यंत रूपवती और चतुर होती हैं। नील नदी जैसी कोई नदी नहीं है। उस का पानी बहुत स्वादवाला और पाचक होता है और कई रोगों की दवा जैसा काम करता है। वह सारे देश को हरा-भरा रखती है। वहाँ की मिट्टी बड़ी नरम है और खेती करने में बहुत श्रम नहीं पड़ता। वहाँ के निवासी अरबी भाषा में नील की प्रशंसा में गीत गाते हैं जिनका भाव यह है कि नील नदी तुम्हारे लिए कितनी लंबी यात्रा करती है और बड़े खेद की बात होगी अगर तुम उसे छोड़ कर अन्यत्र जा बसो।'

यह कहने के बाद मेरे पिता ने कहा, 'मिस्र में सारी ॠतुओं में हरियाली रहती है। वहाँ नाना प्रकार के स्वादिष्ट फलों के वृक्ष और भाँति-भाँति के पशु-पक्षी रहते हैं। वहाँ की राजधानी काहिरा की आबादी बहुत अधिक हैं। वहाँ मीठे पानी की बहुत-सी नहरें बहती हैं और वहाँ के निवासी कला-कौशल में बड़े प्रवीण हैं। वहाँ के महल बहुत बड़े-बड़े और रत्नजटित हैं। मैं ने कई नगर देखे हैं और सैकड़ों कलाकारों और विद्वानों से मिला हूँ। मिस्र जैसा देश और वहाँ के निवासियों जैसे लोग कहीं भी नहीं देखे।'

उस जवान ने कहा कि अपने पिता के मुँह से मिस्र की इतनी प्रशंसा सुन कर मेरी उत्कंठा बहुत बलवती हो गई और रात-दिन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि वह कुछ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दे कि मुझे मिस्र देश को देखने का अवसर मिल जाए। मेरे पिता के मुँह से मिस्र की प्रशंसा सुन कर मेरे चचाओं ने कहा, हम लोगों को भी चल कर मिस्र देश देखना चाहिए। उन्होंने मेरे पिता से कहा कि आप भी हमारे साथ चलिए। उन्होंने इसे स्वीकार किया। मेरे चचाओं ने, जो सब व्यापार करते थे, तरह-तरह का दिसावर का माल खरीदा ताकि मिस्र में सैर की सैर हो और व्यापार का व्यापार। रात- दिन उन लोगों में मिस्र की यात्रा की चर्चा होती रहती थी।

जब मैं ने यह तैयारियाँ देखीं तो एक दिन रोता हुआ अपने पिता के पास गया और कहा कि मैं भी आप लोगों के साथ मिस्र को जाना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि तुम अभी छोटे हो, तुम्हें यात्रा के दौरान बहुत कष्ट होगा, तुम यहीं रहो। मुझे बड़ा दुख हुआ किंतु मैं ने प्रयत्न न छोड़ा, एक-एक करके सभी चचाओं के पास गया कि मेरे पिता से मुझे भी साथ ले चलने की सिफारिश करें। उन्होंने मेरे पिता से कहा कि लड़का इतना चाहता है तो उसे भी साथ ले चलिए। मेरे पिता मुझे मिस्र तक ले जाने को राजी न हुए लेकिन यह मान गए कि मुझे दमिश्क तक ले चलेंगे और जब दमिश्क से मिश्र की ओर बढ़ेंगे तो इसे वापिस मोसिल भेज देंगे। दमिश्क भी जलवायु, पानी और सौंदर्य के लिहाज से बहुत अच्छा नगर है।

यद्यपि मेरी इच्छा मिस्र देश को देखने की थी तथापि मैं ने इसी बात को गनीमत जाना कि मुझे दमिश्क देखने को मिलेगा। कुछ दिन बाद मैं अपने पिता और चचाओं के साथ विदेश यात्रा पर चल पड़ा। हम लोग कई नगरों से होते हुए दमिश्क पहुँचे। मुझे यह नगर बड़ा सुंदर जान पड़ा और मैं उसे देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ। हम लोग एक सराय में ठहरे। कई दिनों तक हम वहाँ के बागों और महलों की सैर करते रहे। वास्तव में मुझे ऐसा मालूम होता था कि स्वर्ग के बाद अगर कोई जगह है तो यहाँ है।

मेरे पिता और चचाओं ने वहाँ काफी अच्छा व्यापार किया। मेरे हिस्से का भी जो माल बिका उस पर पाँच प्रति सैकड़ा का लाभ हुआ। यह लाभ की राशि मुझे दे दी गई। मेरे पास काफी पैसा हो गया। यह तय हुआ कि जब सब लोग मिस्र से वापस होंगे तो मुझे साथ लेते हुए मोसिल को जाएँगे। मैं ने अपने रुपयों को बड़ी होशियारी और किफायत से खर्च किया। एक छोटी हवेली अपने रहने के लिए किराए पर ली। बड़ी खूबसूरत संगमरमर की बनी हवेली थी जिसकी दीवारों पर मनोहर चित्रकारी थी और जिसके अंदर एक सुंदर पुष्प वाटिका थी। मैं ने उसे दो अशर्फी के किराए पर लिया।

मैं ने किफायत से किंतु सुरुचिपूर्वक अपने निवास स्थान को सजाया। उस का मालिक पहले अब्दुर्रहीम नाम का एक व्यक्ति था जिससे उसे उस के तत्कालीन मालिक ने मोल लिया था। यह व्यक्ति एक प्रसिद्ध जौहरी था। मैं ने अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप कुछ दास-दासियाँ भी खरीदीं और माननीय नगर निवासियों से जान-पहचान बढ़ाई। कभी वे लोग मुझे अपने घरों पर खाने के लिए बुलाते कभी में उन लोगों की दावत अपने घर पर किया करता था। मतलब यह कि अपने पिता और चचाओं की अनुपस्थिति में मैं ने बड़ी सुख-सुविधा के साथ दमिश्क नगर में जीवन यापन किया।

एक दिन भोजन करने के बाद मैं अपनी हवेली में बाहर के हिस्से में बैठा था। इतने में एक स्त्री आई जो अति मूल्यवान वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित थी। उस ने पूछा, क्या तुम कपड़े के व्यापारी हो किंतु मेरे मुँह से कोई उत्तर निकले इस से पहले ही वह मकान के अंदर चली गई। मैं भी उठ कर दरवाजा अंदर से बंद करके उस के पास एक दालान में जा बैठा, मैं ने कहा कि मैं कपड़े का व्यापार अवश्य करता हूँ किंतु खेद है इस समय मेरे पास थान नहीं है। उस ने अपने सुंदर मुख से नकाब लगभग उलट दी और कहा, 'मैं ही कहाँ कपड़े लेने आई हूँ। मैं तो तुमसे मिलने आई हूँ। मैं चाहती हूँ कि सुबह तक यहीं रहूँ। किंतु मुझे भूख लगी है, मुझे कुछ खिलाओ।' मैं ने अपने सेवकों को भोजन आदि लाने को कहा। वे भोजन के साथ फल आदि भी लाए, जिन्हें मैं भी इस रमणी का साथ देने के लिए में खाने लगा। आधी रात तक हम लोग इसी प्रकार बातचीत करते रहे फिर हम एक साथ सोने के लिए चले गए। सुबह मैं ने दस अशर्फियाँ निकाल कर उसे दी किंतु उस ने उन्हें लेने से इनकार ही नहीं किया बल्कि दस अशर्फियाँ मुझे दीं। मैं ने जब कहा कि मैं तुम्हारा धन नहीं लूँगा बल्कि तुम्हें अशर्फियाँ जरूर दूँगा, वह बोली, 'मैं तो रोज तुम्हारे पास आने को सोचती थी किंतु अगर तुम मेरी बात न मानोगे और अपनी बात पर अड़े रहोगे तो मैं न आऊँगी।'

इस बार मजबूर हो कर मुझे उस से अशर्फियाँ लेनी पड़ीं और वह चली गई। शाम को वह फिर आई और हम लोगों ने रात भर राग-रंग किया और दूसरी सुबह वह फिर मुझे दस अशर्फियाँ दे कर कहने लगी कि आज शाम को फिर आऊँगी।

तीसरी रात को जब हम दोनों मदिरा के नशे में आलिंगनबद्ध थे तो उस ने मुझ से पूछा, 'प्यारे, तुम मुझे सुंदर समझते हो या नहीं?' मैं ने कहा, 'तुम कैसी बातें कर रही हो? क्या तुम अपने लिए मेरे प्रेम को नहीं जानती? मैं तुम्हें संसार की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी मानता हूँ।' वह हँस कर कहने लगी, 'यह बेकार की बात है। मेरी एक सहेली मुझ से कहीं अधिक सुंदर है। उसे एक बार देखोगे तो मेरी ओर मुँह भी नहीं करोगे। वह मुझ से आयु में भी कम है और बड़ी कोमल है। उसे भी तुम्हें देखने की बड़ी लालसा है। मैं उसे यहाँ लाऊँगी।' मैं ने कहा, 'मैं तो तुम्हें ही चाहता हूँ। तुम चाहो तो उसे ले आओ लेकिन मैं प्रेमी तो तुम्हारा ही रहूँगा।'

उस स्त्री ने कहा, 'तुम ने जो कहा है उस पर दृढ़ रहना। मैं उसे सामने ला कर तुम्हारी परीक्षा लूँगी।' यह कह कर वह स्त्री विदा हुई। उस दिन उस ने मुझे पचास अशर्फिया दीं जो मुझे लेनी पड़ीं। जाते समय वह कहने लगी, 'दो दिन बाद मैं आऊँगी और एक नया मेहमान भी लाऊँगी और उस की अभ्यर्थना के लिए भोजन आदि की अच्छी व्यवस्था रखना।'

जिस दिन की बात तय हुई थी उस दिन मैं ने घर की सफाई करवाई, फर्श बगैरा झड़वाया और नाना प्रकार के फल तथा खाद्य सामग्री घर में तैयार रखी। शाम को दोनों स्त्रियाँ आईं। उन्होंने अपने चेहरों से नकाब उतार लिए। वास्तव में पहली स्त्री से नई स्त्री हर बात में सवाई थी। अगर पहली पर एक बार नजर जाती थी तो दूसरी पर बार-बार जाती थी। उस का सौंदर्य इतना मनमोहक था कि नजर उस पर से हटती ही नहीं थी। जब उस की प्रेमदृष्टि मुझ पर पड़ती मैं अधीर हो जाता था। मैं ने दोनों स्त्रियों के प्रति आभार प्रगट किया कि वे मेरे यहाँ आईं। नई स्त्री ने कहा कि आभारी तो मुझे होना चाहिए कि आप ने मुझे अपने घर तक आने की अनुमति दी।

मैं ने दोनों स्त्रियों को भोजन पर बिठाया। मैं अपनी नई मेहमान के सामने जा बैठा और बराबर उसे देखता रहा। वह स्त्री चाहते हुए भी मेरी तरफ न आँख भर कर देख सकी न हँस-बोल सकी। लगता था जैसे वह पहली स्त्री से भयभीत है। फिर भी कभी-कभी तिरछी नजर से मुझे देख लिया करती थी। जब उस ने देखा कि मेरी निगाहों में प्यार उमड़ रहा है तो उस ने भी प्रेम की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया।

यह सब पहली स्त्री की आँखों में छुपा न रहा। वह हँस कर कहने लगी, 'तुम इसे बार-बार क्यों देख रहे हो। तुम ने तो मुझ से प्रतिज्ञा की थी कि मेरे अलावा किसी पर भी आँख नहीं डालोगे। इतनी जल्दी अपना वादा भूल गए।' मैं ने उसी की भाँति हँस कर कहा, 'तुम बेकार ही मुझ पर शक करती हो। आखिर तुम्हीं तो इन्हें कृपापूर्वक यहाँ लाई हो। मैं यह कैसे कर सकता हँ कि इन पर वैसी नजर डालूँ। यदि मैं ऐसा करूँ तो तुम दोनों के लिए घृणा का पात्र हो जाऊँगा।'

हम लोग देर तक मद्यपान करते रहे और हमें नशा चढ़ गया। नशे में मैं और नई स्त्री एक-दूसरे की ओर अत्यंत प्रेम तथा वासना से भरी निगाहों से देखने लगे। यह खुला प्रेम व्यापार देख कर पहली स्त्री ईर्ष्या और द्वेष से जलने-भुनने लगी। कुछ देर में वह यह कह कर उठ खड़ी हुई कि मैं अभी आती हूँ। दो-चार क्षणों में मेरे पास बैठी हुई स्त्री के चेहरे का रंग बदल गया और वह मरणासन्न-सी दिखाई देने लगी। मैं ने उठ कर उसे सँभाला कि वह गिर न जाए किंतु उस ने देखते ही देखते मेरी बाँहों में दम तोड़ दिया। मैं ने घबरा कर अपने सेवकों को पुकारा कि इसे सँभालो और इस के साथ आई हुई स्त्री को बुलाओ। उन्होंने कहा कि वह तो घर से निकल कर फलाँ गली में चली गई थी।

अब मैं ने जाना कि यह सब उसी दुष्टा की करतूत है। वह इस बेचारी के अंतिम मदिरा पात्र में विष घोल कर चली गई। इस अचानक आई मुसीबत से मैं बदहवास हो गया। मैं डर के मारे काँपने-सा लगा कि अब भगवान ही जाने मुझ पर क्या विपत्ति आए। मैं ने सोचा जो होना होगा वह तो होगा ही, पहले लाश को तो ठिकाने लगाया जाए।

मैं ने सेवकों से कहा कि कमरे का संगमरमर का फर्श होशियारी से धीरे-धीरे उखाड़ें। उन्होंने ऐसा किया तो मैं ने गड्ढा खुदवा कर लाश को उसी गड्ढे में दबा दिया।

फिर मैं ने अपने साथ सारा धन लिया और सेवकों को विदा कर के हवेली में ताला लगाया और ताले को मुहरबंद कर दिया। फिर मकान मालिक जौहरी के पास जा कर उसे एक वर्ष का पेशगी किराया दिया और उस से कहा कि मैं आवश्यकतावश काहिरा जा रहा हँ। फिर मैं कोहिरा चला गया और अपने चचाओं से मिला। उन्होंने पूछा कि तुम कैसे आए तो मैं ने कहा कि आप लोगों का कुछ हाल नहीं मिला था इसलिए चला आया। मैं बहुत दिनों तक काहिरा में रहा। किंतु मैं अच्छी तरह काहिरा न देख पाया था कि उन्होंने वापस मोसिल जाने की तैयारी शुरू कर दी। मैं उनकी निगाहों से छुपा रहा। उन्होंने बहुत ढूँढ़ा पर मुझे पा न सके। मजबूरी में मेरे बगैर ही वापस चले गए।

इस के बाद मैं तीन वर्ष तक काहिरा में रहा। मैं साल साल पर दमिश्क के जौहरी के पास किराया भिजवा दिया करता था। फिर मैं दमिश्क वापस आया। यहाँ पर मुझ पर वह मुसीबत पड़ी कि कहा नहीं जाता। यहाँ आ कर जौहरी से चाबी माँग कर घर खुलवाया और देखा कि सारी वस्तुएँ यथावत हैं। मैं ने कुछ नए सेवक रखे और उन से मकान साफ करवाया। सफाई के दौरान एक सेवक को एक सोने का हार मिला जिसमें दस बड़े-बड़े मोती जड़े हुए थे। वह उसे मेरे पास ले आया। मैं ने पहचाना कि यह वही हार है जो उस नई स्त्री के गले में पड़ा था जिस की लाश मैं ने गड़वाई थी।

मैं ने उस की स्मृति के तौर पर वह हार कपड़े में लपेट कर अपनी गर्दन में डाल दिया। फिर मैं वहाँ रहने लगा किंतु कुछ करने में मेरा मन नहीं लगता था। फलतः मेरे पास का सारा धन धीरे-धीरे खर्च हो गया और मैं घर का सामान बेच कर गुजारा करने लगा। जब सब कुछ बिक गया तो मैं ने सोचा कि इस मुक्ताजटित हार को बेचने के सिवा कोई उपाय नहीं है। किंतु मोती उसमें ऐसे लगे थे जिनके मूल्य का मुझे कोई अंदाजा ही नहीं था। फिर भी मैं उसे बेचने पर मजबूर था और उसे बेच कर मैं ने बहुत बड़ी मुसीबत मोल ले ली।

मैं बाजार में उस हार को ले कर गया तो अपने मकान मालिक जौहरी की दुकान पर जा कर अपना मंतव्य कहा कि मैं एक हार बेचना चाहता हूँ। उस ने एक दलाल बुला दिया। मैं ने दलाल के साथ जा कर उसे हार दिखाया। उस ने कहा कि मुझे भी ऐसे मोतियों का मूल्य नहीं मालूम, आप उसी जौहरी की दुकान पर बैठें, मैं और जौहरियों को यह हार दिखा कर इसका दाम पूछ कर आता हूँ।

मैं अपने मकान मालिक की दुकान पर बैठा। कुछ देर में दलाल ने आ कर कहा कि इसका मूल्य तो दो हजार अशर्फियाँ लगाया गया है लेकिन इस समय कोई व्यापारी इसे लेने का इच्छुक नहीं है, सिर्फ एक व्यापारी है जो इसे पचास मुद्राओं में लेने को तैयार है। मैं ने कहा कि जो दाम मिले उसी पर बेच दो। किंतु जब दलाल उस जौहरी के पास पचास अशर्फियों में हार बेचने गया तो जौहरी उसे पकड़ कर कोतवाली ले गया और शिकायत लिखाई कि यह आदमी चोरी का हार लाया है इसीलिए इतना सस्ता बेच रहा है।

दलाल ने कहा कि मैं तो दलाल हूँ, इसे बेचनेवाला तो फलाँ दुकान पर बैठा है, वही इसे पचास अशर्फी में बेचने को राजी है। कोतवाल ने मुझे पकड़वा बुलाया। उस ने पूछा कि तुम्हीं यह हार बेच रहे हो। मेरे हाँ कहने पर उस ने कहा कि यह चोरी का माल है, इसीलिए सस्ता बेच रहे हो। मेरे इनकार करने पर उस ने मुझे इतना पिटवाया कि मुझे लगा मेरी जान ही निकल जाएगी। इसीलिए मैं ने घबरा कर कह दिया कि यह चोरी का है। इस पर कोतवाल ने मेरा दाहिना हाथ कटवा दिया। उस ने हार भी मालखाने में जमा करा दिया।

मैं पीड़ा से व्याकुल गिरता-पड़ता अपने घर आया। नौकर-चाकर पुलिस के डर से भाग गए थे। मैं किसी तरह खुद ही अपना काम चलाता था। चौथे दिन बहुत-से पुलिसवाले मेरे घर में घुस आए और मुझे पकड़ ले गए। उनके साथ मकान मालिक भी था और वह जौहरी भी जिसने मुझ पर चोरी का आरोप लगाया था। उन्होंने मुझे बहुत गालियाँ दीं और कहा कि यह हार शहर के हाकिम का है, यह तीन वर्ष हुए खो गया था, उसी समय से हाकिम की पुत्री भी लापता है। यह कह कर उन्होंने मुझे रस्सी से बाँधा और हाकिम के सामने पेश कर दिया। मैं पहले तो घबराया कि यह और बड़ी मुसीबत गले पड़ी। फिर मैं ने सोचा कि हाकिम अधिक से अधिक मुझे मरवा ही तो देगा और वह भी इस कष्ट, निर्धनता और लज्जा के जीवन से अच्छा है। किंतु हाकिम ने मुझे देख कर कहा, 'यह आदमी चोर नहीं हो सकता। जिसने इस पर चोरी का आरोपी लगाया है वह मारा जाए।' अतएव वह व्यापारी कत्ल कर दिया गया।

अब हाकिम ने समस्त उपस्थित व्यक्तियों को जाने का आदेश दिया, सिर्फ मुझे रोक रखा। एकांत होने पर उस ने मुझ से कहा, 'बेटे, अब तुम बेखटके पूरा हाल बता दो कि यह हार तुम्हारे हाथ किस तरह लगा। यह ध्यान रहे कि मुझ से कोई छोटी से छोटी बात भी न छुपाई जाए।' अतएव मैं ने पूरी तरह बताया कि किस तरह पहली स्त्री दूसरी को मेरे पास लाई थी और किस तरह उस ने उसे विष दे कर मार डाला। मैं ने यह भी बताया कि दूसरी स्त्री की लाश कहाँ गड़ी है।

हाकिम ने यह सब सुन कर ठंडी साँस भरी और कहा, 'भगवान की इच्छा के आगे सब लोग विवश हैं। मैं भी वह सब विनयपूर्वक स्वीकार करता हँ जो उस की इच्छा से हुआ। तुम पर जो कुछ मुसीबत पड़ी उस का मुझे अत्यंत खेद है। अब तुम मेरा हाल सुनो कि मुझ पर कैसे-कैसे दुख पड़े। वे दोनों स्त्रियाँ मेरी बेटियाँ थीं। पहले जो तुम्हारे पास गई वह मेरी बड़ी बेटी थी और बाद में जिसे वह ले गई वह उस की छोटी बहन थी। बड़ी बेटी का विवाह मैं ने अपने भतीजे से कर दिया जो काहिरा में रहता था। वह कुछ दिनों बाद अचानक मर गया। मेरी बेटी कई वर्ष तक वैधव्य की दशा में भी काहिरा में रही और वहाँ उस ने तरह-तरह के दुष्कर्म सीख लिए। फिर वह यहाँ आ गई।'

'दूसरी बेटी जो उस से छोटी थी और जो तुम्हारी बाँहों में मरी बड़ी समझदार और सदाचारिणी थी। उस से मुझे कोई शिकायत नहीं हुई लेकिन उस की बड़ी बहन ने उसे भी आवारा बनने पर राजी कर लिया। जब छोटी मरी तो मैं ने दूसरे दिन बड़ी से पूछा कि तुम्हारी बहन कहाँ है। उस ने ठंडी साँस भर कर कहा, मैं तो सिर्फ इतना जानती हूँ कि कल वह बहुत मूल्यवान वस्त्राभूषण पहन कर घर से निकली थी और अभी तक नहीं आई। मैं ने अपनी बेटी की बहुत खोज कराई किंतु उस का कहीं पता नहीं चला। कुछ समय बाद बड़ी बेटी भी, जो रात-दिन अपने पाप कर्म को याद करके रोती रहती थी, बीमार हो कर मर गई।'

यह वृत्तांत सुना कर हाकिम ने मुझ से कहा, 'बेटे, हम-तुम दोनों ही दुर्भाग्य के मारे हुए हैं। किंतु अब तुम किसी बात की चिंता न करो। मैं अपनी तीसरी बेटी से, जो अपनी दोनों बहनों से अधिक सुंदर और बुद्धिमती है, तुम्हारा विवाह कर दूँगा। तुम मेरे घर को अपना घर समझो। मैं मरणोपरांत तुम्हें अपनी संपत्ति का उत्तराधिकार देने का वसीयतनामा लिख दूँगा।' मैं ने कहा कि आप का हर प्रकार मुझ पर उपकार है, मैं आप को बुजुर्ग समझता हूँ और जो कुछ आप का आदेश होगा वैसा ही करूँगा। हाकिम ने कहा कि फिर देर करने की क्या जरूरत है। उस ने गवाहों को तुरंत बुलाया और दिखावाटी राग-रंग के बगैर काजी के द्वारा अपनी पुत्री से मेरा विवाह करवा दिया।

इस के अतिरिक्त उस ने अपनी संपत्ति भी अपने मरणोपरांत मेरे नाम करने के कागज लिख दिए। आप ने भी देखा होगा कि हाकिम मुझ पर कैसा दयालु है।

यह कह कर उस जवान ने कहा कि कल ही मोसिल से मेरे चचाओं का पत्र ले कर एक आदमी आया है। पत्र में लिखा था कि तुम्हारे पिता का देहांत हो गया है और तुम आ कर जायदाद में अपना हिस्सा सँभालो। मैं ने उन्हें लिखवा दिया कि मैं भगवान की दया से यहाँ अच्छी तरह हूँ किंतु मेरे लिए मोसिल आना संभव नहीं है। मैं ने यह भी लिखवा दिया कि पिता से मिलनेवाली जायदाद खुशी से आप लोगों को दे रहा हूँ। यह कह कर उस जवान ने मुझ से कहा कि अब मैं ने आप को अपना पूरा हाल बता दिया कि किस तरह से मेरा दाहिना हाथ जाता रहा।

यहूदी हकीम ने यह कथा सुना कर काश कर के बादशाह से कहा कि जब मैं दमिश्क में था तो मैं ने मोसिल के व्यापारी के मुँह से यह कहानी सुनी। जब तक दमिश्क का हाकिम जीवित रहा मैं उस की सेवा में रहा। उस के मरने पर मेरी तबीयत वहाँ न लगी। मैं फारस देश चला गया। वहाँ के कई नगरों की सैर करके हिंदुस्तान आ गया। वहाँ से आप की राजधानी में आया और यहाँ हकीमी का सिलसिला डाल दिया।

बादशाह ने कहा, 'तुम्हारी कहानी पहली दोनों से अधिक मनोरंजक है। किंतु तुम लोगों को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि उस के कारण तुम्हारी जानें बच जाएँगी। कुबड़े की कथा अब भी तुम लोगों की कथाओं से अधिक विचित्र है। अगर उस से अच्छी कहानी न सुनाई गई तो तुम चारों की मृत्यु निश्चित है।' अब दरजी ने उठ कर सिर नवाया और कहा कि मेरी भी कहानी सुन लीजिए, मुझे पूरा विश्वास है कि आप इसे सुन कर प्रसन्न होंगे।
 
बादशाह के सामने दरजी की कथा

दरजी ने कहा कि इस नगर के व्यापारी ने एक बार अपने मित्रों को भोज दिया और उनके लिए भाँति-भाँति के व्यंजन बनवाए। मुझे भी बुलाया गया। मैं जब वहाँ पहुँचा तो देखा कि बहुत-से निमंत्रित लोग मौजूद हैं किंतु मकान मालिक नहीं है। थोड़ी देर में हम लोगों ने देखा कि मकान मालिक एक लँगड़े किंतु अति सुंदर व्यक्ति को ले कर यहाँ आया और अतिथियों के बीच बैठ गया। लँगड़ा आदमी वहाँ बैठनेवाला ही था कि उस की दृष्टि वहाँ पर उपस्थित एक नाई पर पड़ी। वह बैठने के बजाय सभा से बाहर जाने लगा। आतिथ्यकर्ता व्यापारी ने आश्चर्य से पूछा कि मित्र, तुम जा क्यों रहे हो, अभी भोजन आनेवाला है, तुम भोजन के बिना कैसे चले जाओगे। किंतु उस लँगड़े ने, जो परेदशी जान पड़ता था, कहा, 'श्रीमान, मुझे आपके घर पर ठहर कर मरने की इच्छा नहीं है। मैं इस मनहूस नाई का मुँह नहीं देखना चाहता जिसे आप ने अपनी दावत में बुलाया है। मुझे जाने ही दीजिए।'

दरजी ने कहा कि उस लँगड़े की यह बात सुन कर हम सब को और भी आश्चर्य हुआ। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि उस नाई से उस लँगड़े को इतनी नाराजगी किस कारण हो सकती है।

हम लोग उत्सुकतावश उस लँगड़े के चारों ओर जमा हो गए और पूछने लगे कि क्या बात है। उस लँगड़े ने कहा, 'मित्रो, मैं इसी कमबख्त नाई के कारण लँगड़ा हुआ हूँ और इस के कारण अन्य विपत्तियाँ भी झेली हैं। मैं ने प्रण किया था कि न केवल इसका मुख न देखूँगा बल्कि यह जहाँ रहेगा वहाँ रहूँगा भी नहीं। मैं बगदाद का रहनेवाला हूँ, मैं ने बगदाद नगर इसीलिए छोड़ा कि यह वहाँ रहता था। अपने नगर को छोड़ कर मैं यहाँ आया, लेकिन यह मेरी जान का दुश्मन यहाँ भी मौजूद है। इसीलिए अब मैं इस सभा या इस नगर में बिल्कुल नहीं ठहर सकता। मुझे आप लोग क्षमा करें। मुझे यह देश छोड़ना पड़ेगा वरना यह दुष्ट न जाने मेरी क्या-क्या दुर्गति करेगा।'

यह कह कर लँगड़ा अतिथि गृह स्वामी की अनुमति के बगैर ही सभा से बाहर जाने लगा। हम लोगों ने उसे दौड़ कर रोका और दूसरे मकान में ले जा कर भोजन कराया। फिर गृह स्वामी ने कहा कि कृपापूर्वक हमें यह बताएँ कि इस नाई ने आपके साथ क्या दुष्टता की है। वह बड़ी मुश्किल से यह कहानी कहने को तैयार हुआ, लेकिन कहानी सुनाते समय नाई की ओर पीठ करके बैठ गया। नाई भी सिर झुकाए हुए चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। लँगड़े ने अपना वृत्तांत इस प्रकार कहा।
 
लँगड़े आदमी की कहानी

मेरा पिता बगदाद के सम्मानित व्यक्तियों में से था और हम लोग आनंदपूर्वक वहाँ रह रहे थे। मैं अपने पिता का अकेला बेटा था। जिस समय मेरे पिता की मृत्यु हुई उस समय तक मैं न केवल विद्याध्ययन पूरा कर चुका था बल्कि व्यापार के कार्य में भी प्रवीण हो गया था। मेरे पिता ने अपने जीवनकाल ही में अपनी संपत्ति मेरे नाम कर दी थी। मैं धन के व्यय में होशियारी से काम लेता था। नगरनिवासी मुझे बहुत चाहते थे। यद्यपि मेरी यौवन की अवस्था थी तथापि मैं स्त्रियों के व्यवहार और उनकी प्रीति से अनभिज्ञ था। मुझे स्त्रियों से मिलने में लज्जा भी लगती थी।

एक दिन मैं कहीं जा रहा था कि सामने से कई स्त्रियाँ आती दिखाई दीं। मैं उनसे बच कर एक छोटी गली में घुस गया और एक मकान के सामने पड़े तख्त पर बैठ गया कि जब स्त्रियाँ निकल जाएँ तो मैं अपनी राह पकड़ूँ। मेरी आँखों के आगे एक खिड़की थी और उसमें से बहुत-से फूल दिखाई दे रहे थे। वह खिड़की पहले थोड़ी ही खुली थी। अचानक वह पूरी खुल गई और उसमें से एक षोडशी दिखाई दी। मैं उसका सौंदर्य देख कर ठगा-सा रह गया। वह मेरी ओर देख कर मुस्कुराई और कुछ देर पौधों में पानी देने के बाद खिड़की बंद कर के चली गई।

कहाँ तो मैं स्त्रियों से भागता था और कहाँ उस सुंदरी के चले जाने से इतना दुखी हुआ कि अचेत हो गया। जब होश आया तो देखा कि नगर का बड़ा काजी बड़े समारोह के साथ उस मकान में प्रविष्ट हुआ। मैं ने समझ लिया कि वह सुंदरी इसी की पुत्री है। मैं अपने घर वापस आ गया किंतु उस रमणी का ध्यान मुझे बिल्कुल नहीं भूलता था। दो चार दिन में विरह-व्याधि से मैं ऐसा पीड़ित हुआ कि बिस्तर से लग गया। मेरे मित्रों और संबंधियों को मेरी दशा से बड़ी चिंता हुई और सब आ कर मेरा हाल पूछने लगे। मैं ने लज्जावश उन्हें कुछ न बताया। इस पर वे हकीम को ले आए किंतु उस हकीम तथा अन्य हकीमों की दवाओं से मुझे कोई लाभ न हुआ। मेरी दशा क्षय के रोगी की भाँति निरंतर बिगड़ती गई।

एक दिन एक बुढ़िया मुझे देखने को आई। यह वृद्धा मेरे कुछ संबंधियों की परिचिता थी। उसने बड़े ध्यानपूर्वक मेरा सिर से पाँव तक निरीक्षण किया किंतु किसी रोग के लक्षण मुझ में नहीं पाए। वह कुछ सोचती रही, फिर उसने अन्य लोगों को वहाँ से हटा दिया और कहा कि मैं एकांत में इस को देख कर बताऊँगी कि क्या रोग है। जब सब लोग चले गए तो बुढ़िया ने धीमे स्वर में मुझसे कहा, देखो, तुम्हारे रोग को मैं भली-भाँति पहचान गई हूँ। तुम्हें किसी प्रकार का कोई शारीरिक रोग नहीं है। तुम किसी सुंदरी पर मोहित हो और लज्जावश किसी से अपना भेद नहीं कहते। इसी से तुम्हारी ऐसी दशा हुई है। अगर तुम मुझ से सारी बात साफ-साफ बताओ और अपनी प्रेयसी का पता ठिकाना बताओ तो मैं तुम्हारी सहायता करूँ। मैं केवल एक ठंडी साँस भर कर रह गया क्योंकि संकोच ने मेरी जबान बंद कर रखी थी। लेकिन बुढ़िया मेरे पीछे पड़ गई कि ऐसी हालत में लज्जा ठीक नहीं है और अपने हितचिंतकों की सहायता लेनी ही चाहिए।

बुढ़िया के इतना कहने-सुनने से मेरी झिझक भी खुल गई और मैं ने उससे अपने दिल का हाल कह कर कहा कि अगर तुम्हारी मध्यस्थता से मुझे एक बार वह देखने को भी मिल जाए और उसे मेरे प्रेम का हाल मालूम हो जाए तो मेरा जीवन सफल हो जाए। बुढ़िया बोली, बेटे जिस रूपसी की बात तुम कर रहे हो वह शहर के बड़े काजी की पुत्री है। इसमें संदेह नहीं कि उस जैसी सुंदर और मनमोहिनी स्त्री सारे बगदाद में शायद ही कोई हो। किंतु वह लड़की और उसका पिता दोनों ही महागर्वीले और कटुभाषी है। बड़ा काजी अपनी पुत्रियों को घर के अंदर ही बंद रखता है। उसने उन्हें आज्ञा दी है कि अगर आवश्यकतावश बाहर भी निकलो तो किसी पुरुष की ओर न देखना। जब वे बाहर जाती हैं तो उनकी आँखों पर पट्टियाँ बाँध दी जाती हैं ओर दासियाँ उनका हाथ पकड़ कर गलियों में से निकलती हैं जैसे अंधों को ले जाते हैं। ऐसा अजीब हाल है उनके पिता का। अच्छा होता यदि तुम किसी और स्त्री के प्रति आकृष्ट हुए होते।

मैं यह सुन कर चुप हो रहा। मेरी निराशा देख कर बुढ़िया ने कहा, यह जो मैं ने तुम से कहा है पूर्वाग्रह भी हो सकता है। संभव है सफलता की कोई राह निकल आए। सब कुछ भगवान की इच्छा पर निर्भर है। देखो, मैं जा कर अपनी-सी कोशिश करती हूँ। यह कह कर बुढ़िया चली गई।

दो चार दिन बाद वह फिर आई और मुझसे कहने लगी, बेटा, मैं पहले ही कहती थी कि वह स्त्री अत्यंत मानिनी और गर्वीली है। मैं ने उसे बहुत समझाया-बुझाया किंतु इसका उस पर कुछ असर न हुआ। जब मैं ने तुम्हारी बीमारी की बात की तो वह चुपचाप रही किंतु जब मैं ने तुमसे भेंट करने के लिए उससे कहा तो वह बिगड़ पड़ी और मुझ से कहा कि तुम बड़ी बदतमीज हो, अगर ऐसी बेशर्मी की बातें तुमसे सुनूँगी तो तुम्हें धक्के मार कर निकाल दूँगी। यह कह कर भी बुढ़िया ने मुझे धीरज दिया और कहा कि परेशान होने की जरूरत नहीं, मैं अपना प्रयत्न जारी रखूँगी। यह कह कर वह चली गई। उसके इतना दिलासा देने पर भी मेरी निराशा कम न हुई और मेरी शारीरिक दशा पहले से खराब होने लगी। बीच-बीच में बुढ़िया आती और उससे बातें कर के मुझे किंचित धैर्य होता। एक दिन जब वह आई तो मेरे पास कई रिश्तेदार स्त्रियाँ बैठी थीं। बुढ़िया ने मेरे कान में कहा कि मैं तुम्हारे लिए खुशखबरी लाई हूँ। यह सुन कर मुझ में नई शक्ति का संचार हुआ और मैं वृद्धा को ले कर बगलवाले कमरे में चला गया ताकि उसका लाया हुआ समाचार सुनूँ।

बुढ़िया ने कहा, कल सोमवार था। मैं उस सुंदरी के पास गई। वह प्रसन्न मुद्रा में थी और मैं ने सोचा कि काम बन सकता है। मैं ने अपनी दशा बड़ी दुखपूर्ण बनाई ओर कुछ देर में आँसू बहाने लगी। उसने पूछा कि अम्मा, क्या बात है, तुम रो क्यों रही हो। मैं ने कहा क्या कहूँ, मैं उस आदमी की दशा सोच कर रो रही हूँ, वह बेचारा अब तक रो रहा है और तुम्हारे प्रेम के कारण मृत्यु के समीप जा पहुँचा है। ओर तुम इतनी कठोर- हृदया हो कि उस की जान लेने पर तुली हो। वह कहने लगी तुम क्या बक रही हो, मैं उसे जानती भी नहीं तो उस की जान क्यों लूँगी। तुम बेकार के आरोप मुझ पर न लगाया करो।

मैं ने कहा : सुंदरी, तुम शायद भूल गई हो कि मैं ने तुम्हें पहले ही बताया था कि यह वही आदमी है जो तुम्हारे सामनेवाले मकान के चबूतरे पर बैठा था। तुमने खिड़की खोली थी और वृक्षों पर पानी दिया था। वह उसी समय तुम पर मोहित हो गया और तब से तुम्हारे विछोह में रात-दिन घुल रहा है।

अब उसमें साँस के आने-जाने के अलावा कुछ नहीं रहा। उस दिन मैं ने उस की बात की थी तो तुम बुरी तरह बिगड़ गई थी। यह बात जब उसे मालूम हुई तो उस की दशा और बिगड़ने लगी। अब अगर तुम्हारी कुछ कृपा हो तो शायद वह बच जाए, वरना तो उसे गया ही समझो।

यह कहने के बाद मैं ने अपने स्वर और आँखों में और दुख भर कर ठंडी साँसें लेना और आँसू बहाना आरंभ किया। फिर उस मनमोहिनी ने कहा अम्मा, तुम ठीक कहती हो कि मेरे प्रेम ने उस की यह दशा कर दी है। फिर कुछ देर बाद वह बोली कि अगर मुझे देखने और मुझसे बात करने भर से उस की दशा सुधर जाए तो कोई हर्ज नहीं। मैं ने ठंडी साँस भर कर कहा, तुम्हारी इतनी ही कृपा बहुत होगी। उसने कहा कि तुम उससे कहो कि अगर वह मुझे देखना और मुझसे बात करना चाहता है तो मैं इसके लिए तैयार हूँ किंतु इतने से अधिक कोई आशा मुझ से न रखे। और आगे की बात तभी हो सकती है जब मेरे पिता की रजामंदी से उसके साथ मेरा विवाह हो जाए।

मैं ने उसे अनेक आशीर्वाद दिए और कहा कि मैं अब यह प्राणदायक समाचार जा कर उसे सुनाती हूँ। उस सुंदरी ने कहा, मेरे पिताजी शुक्रवार को जुमे की नमाज जामा मस्जिद में जा कर पढ़ते है। उस समय वह आदमी यहाँ अकेला आए तो मैं उसे अंदर बुला लूँगी और पिता के आने के एक घड़ी पहले उसे विदा कर दूँगी, उस समय वह जी भर कर मुझे देख सकता है और मुझ से बातें कर सकता है।

जब बुढ़िया ने यह सब बातें मुझ से कहीं तो मैं खुशी से पागल हो गया। मुझ में जैसे नई जीवनी शक्ति आ गई। मैं ने उस बुढ़िया को बार-बार धन्यवाद दिया और एक हजार अशर्फियाँ उसे इनाम में दे डालीं। अगले शुक्रवार मैं जल्दी उठ गया। मैं ने सोचा मैं हजामत बनवा कर अच्छे कपड़े पहन कर और इत्र लगा कर बड़े काजी के महल में जाऊँ और अपनी प्रेयसी से भेंट करूँ। अतएव मैं ने एक सेवक को आज्ञा दी कि किसी अच्छे नाई को बुला लाए जिससे मैं हजामत बनवाऊँ। वह इसी दुष्ट नाई को ले आया जो इस समय मेरे पीछे बैठा है।

इसने आते ही मुझे देख कर कहा, आप अभी हाल ही में बहुत बीमार जान पड़ते हैं। मैं ने कहा कि हाँ, मैं ने बहुत दिनों तक बीमारी से बड़ा कष्ट उठाया है और अभी हाल ही में अच्छा हुआ हूँ।

उसने कहा, भगवान आपको दीर्घायु करें और सदा नीरोग रखें। मैं ने कहा, सब उस की इच्छा पर निर्भर है, वह जैसे चाहे वैसे रखें। इसके बाद यह बोला कि मुझे क्या आज्ञा है, मैं आपकी हजामत बनाऊँ या फस्द खोलूँ। मुझे गुस्सा आ गया और मैं ने कहा, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? अभी मैं कह चुका हूँ कि मैं लंबी बीमारी से उठा हूँ। फस्द खुलवा कर और खून निकलवा कर क्या मुझे जान देनी है। तुम जल्दी से मेरी हजामत बनाओ और अपनी राह पकड़ो। मुझे दोपहर को एक जरूरी काम से जाना है।

यह नाई इस पर भी काफी देर तक बकवास करता रहा। न तो इसने अपनी औजारों की पेटी खोली न कोई उस्तरा निकाल कर तेज किया। हाँ, कुछ देर बाद उसने अपनी पेटी से एक यंत्र-सा निकाला और आँगन में जा कर उसे सूर्य की ओर लगा दिया। फिर उँगलियों पर गिन कर कहने लगा कि आप को प्रसन्न होना चाहिए, आज बृहस्पति और मंगल का बड़ा अच्छा योग है और हजामत के लिए इससे अच्छा कोई अन्य योग नहीं हो सकता। किंतु इसके अतिरिक्त एक दुर्भाग्य का योग भी है। ग्रहों की गति से मालूम हो रहा है कि आप पर बड़ा कष्ट पड़ेगा आज। किंतु आपके प्राणों को कोई खतरा नहीं है। हाँ कष्ट ऐसा होगा कि आप उसे जीवन भर न भूल सकेंगे। आप कृपा कर मुझे साथ रखें तो शायद मुसीबत पड़ने पर मैं आपके काम आऊँ।

यह कह कर लँगड़े आदमी ने कहा कि दोस्तो, आप लोग खुद ही सोचें कि मेरी क्या दशा होगी। एक ओर मेरी जीवनदायिनी प्रेयसी ने मुझे अकेले ऐसी जगह बुलाया जहाँ चिड़िया भी उड़ कर न जा सके, दूसरी ओर यह दुष्ट बेकार की बकबक में समय नष्ट कर रहा है। मुझे क्रोध तो बहुत आया किंतु मैं ने उस पर काबू पा कर कहा कि देखो मैं ने तुम्हें यहाँ सलाह लेने और मुहूर्त देखने को नहीं बुलाया, हजामत बनवाने को बुलाया है। तुम्हें हजामत बनानी है तो बनाओ वरना चले जाओ, मैं दूसरा नाई बुला लूँगा।

इसने दाँत निपोरते हुए कहा, आप इतना क्रुद्ध क्यों हो रहे हैं। मेरे जैसा गुणी नाई आपको सारे संसार में नहीं मिलेगा। मैं अनेक विद्याओं में पारंगत हूँ जिनमें से कुछ का उल्लेख कर रहा हूँ। मैं हकीमी जानता हूँ, ज्योतिष, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वेदांत, न्याय व्यवस्था आदि सब जानता हूँ। मैं गणित भी जानता हूँ और खगोलशास्त्र भी और सारे बादशाहों के इतिहासों से भी परिचित हूँ। मेरे स्वर्गवासी पिता ने, जिन की याद से मेरा दिल अब भी भर जाता है, सारी विद्याएँ मुझे सिखाई थीं जिससे मैं आप सज्जनों की सेवा भी करूँ और सुरक्षा भी।
 
उस की यह बकवास सुन कर मुझे क्रोध की बजाय हँसी आ गई। मैं ने कहा, तुम कब तक बकबक किए जाओगे और किस समय मेरी हजामत बनाओगे। इसने कहा, यह भी अच्छी रही। और लोग तो कहते हैं कि मैं बहुत कम बोलता हूँ और आप कहते हैं कि मैं बकबक करता हूँ। अब सुनिए, मेरे छह भाई हैं। बड़े का नाम है बकबक, दूसरे का बकबारह, तीसरे का बूबक, चौथे का अलकूज, पाँचवें का अलनसचर और छठे का शाहकुबक। इसमें संदेह नहीं कि यह सब बड़े बकवासी हैं। मैं इन सब से छोटा हूँ और बहुत कम बोलता हूँ।

दरजी ने कहा कि लँगड़े व्यक्ति ने यह कह कर कहा कि मित्रो, अब आप ही लोग न्याय करें कि इतना बकबक करने पर भी यह अपने को अल्पभाषी कहता है। अब मैं ने दूसरे सेवक से जो घर की व्यवस्था देखता था कहा कि इस नाई को तीन अशर्फियाँ दे कर विदा कर दो, मैं आज हजामत नहीं बनवाऊँगा। इस नाई ने कहा, मालिक यह आप क्या कह रहे हैं। मैं कोई अपने आप तो आ नहीं गया, आपने बुलाया है तो आया हूँ। मैं तो अब आपकी हजामत बनाए बगैर जाऊँगा नहीं। आप मेरे गुणों को नहीं जानते इसीलिए मेरी कद्र नहीं करते। मेरा दुर्भाग्य है। आपके पिता मेरी कद्र जानते थे। वे जब मुझे बुलाते तो इतना स्नेह करते जैसे गोद में बिठा लेंगे, अपने साथ ही मुझे भोजन कराते थे और मेरी जानकारी और बुद्धिमत्ता की बातें सुन कर बड़े प्रसन्न होते थे। एक दिन उन्होंने मेरे काम से खुश हो कर मुझे सौ अशर्फी और एक भारी जोड़े का इनाम दिया, यानी एक बार ही फस्द खोजने में मेरे पास इतना धन आ गया जो मेरे सारे जीवन के लिए काफी है। मुझे उनकी कृपा बहुत याद आती है।

यह कह कर भी यह नाई चुप नहीं हुआ और दूसरी कहानी शुरू कर दी। मैं बड़ा दुखी हो गया कि यह तो किसी प्रकार पीछा छोड़ता ही नहीं। मैं ने सोचा कि डाँट-फटकार का तो इस पर कुछ असर होता ही नहीं, इसे मीठी बातों से बहलाना चाहिए। मैं ने कहा, भाई, तुम बहुत अच्छी बातें करते हो लेकिन इस समय चुप रहो, जल्दी से मेरी हजामत बना दो क्योंकि मुझे एक जगह जाना है।

यह हँस कर बोला, निस्संदेह आप को कोई बड़ा जरूरी काम होगा जिसके कारण आप इतनी जल्दी कर रहे हैं। आप यह काम मुझे जरूर बताएँ बल्कि मुझे अपने साथ ले चलें ताकि मैं हर मौके पर आप की सहायता कर सकूँ। मैं तो यह कहूँगा कि हर महत्वपूर्ण काम आप मेरी सलाह से ही करें जैसा कि आपके पिता और पितामह किया करते थे। आप मुझे अपना नौकर बल्कि गुलाम समझिए। आप बेझिझक मुझ से अपने मन की बात कहिए।

मैं ने चीख कर कहा, तू बकबक कर के मेरा मगज चाटे जा रहा है, भाग यहाँ से। यह कह कर मैं उठ खड़ा हुआ और जमीन पर पाँव पटकने लगा। इस बेशर्म नाई ने फिर भी अपनी हरकतें नहीं छोड़ीं। मुझे अति क्रुद्ध देख कर बोला कि आप नाराज न हो, मैं अभी आप की हजामत बनाए देता हूँ। यह कह कर इसने अपनी पेटी खोली और मेरी हजामत शुरू की। बहुत देर तक तो यह मेरे सिर पर पानी ही रगड़ता रहा, फिर थोड़ी जगह उस्तरा चला कर ठहर गया और कहने लगा कि आप न मेरे बुढ़ापे का ख्याल करते हैं न मेरे गुणों की कद्र करते हैं, यह सब बातें अच्छी नहीं हैं। मैं ने कहा, चुपचाप अपना काम करो, अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। इसने कहा, ऐसा महत्वपूर्ण काम क्या आ पड़ा है जिसके लिए आपको इतनी जल्दी और घबराहट है। मैं ने फिर बिगड़ कर कहा, तू यहाँ हजामत बनाने आया है या दुनियाभर के झगड़ों में पड़ने? तुझे इस से क्या लेना देना कि मुझे क्या काम है?

इस निर्लज्ज ने कहा, मेरे मालिक, आप चाहे जितना क्रोध करें मैं तो यही कहूँगा कि मुझे डर है कि आप बगैर समझे-बूझे जल्दी में काम करेंगे और आपकी हानि होगी। बुद्धिमानों का कहना है कि हर काम सोच-समझ कर करना चाहिए। आप कृपा कर के मुझे अपना काम जरूर बताएँ। अभी तो दोपहर होने में तीन घड़ी बाकी हैं, ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं ने कहा, जो लोग वादे के पक्के होते हैं वे नियत समय से पहले ही निश्चित स्थान पर पहुँच जाते हैं। तुम फौरन हजामत बनाओ। इसने धीरे-धीरे मेरा सिर मूँड़ना शुरू किया और आधा सिर मूँड़ कर खड़ा हो गया और सूर्य की ओर देख कर कहने लगा कि अभी हजामत पूरा करने की साइत नहीं आई। मैं ने कहा, मुझे ज्योतिष पर विश्वास नही, तू जल्द हाथ चला।

इसने कहा, अच्छा आप कहते है तो बनाए देता हूँ लेकिन डर है कि आप कहीं बीमार न पड़ जाएँ। यह कह कर इसने काम तो शुरू किया लेकिन यह हाल कि एक बाल मूँड़ता था तो दस बातें कहता था। मैं ने इसे धोखा देने के लिए कहा कि मेरे मित्रों ने मेरे स्वास्थ्य लाभ की खुशी में भोज दिया है, मुझे उसमें जाना है। यह सुन कर ये उछल पड़ा और बोला, आपने अच्छी याद दिलाई। मैं ने भी अपने मित्रों को भोजन पर बुलाया था लेकिन मैं भूल गया और कुछ भी तैयारी नहीं की। मैं ने कहा, भाई, तुम इसकी फिक्र न करो, मैं तुम्हें अपनी रसोई से पका-पकाया खाना दिलवा दूँगा। पिताजी तुम्हारी बातों से खुश हो कर इनाम देते थे, मैं तुम्हें उनसे बढ़ कर इनाम दूँगा मगर इस शर्त पर कि तुम चुप रहो।

इसने कहा कि भगवान आपको प्रसन्न रखे, लेकिन न जाने आपका दिया हुआ सामान काफी होगा या नहीं। मैं ने कहा कि छह भुने हुए मुर्ग हैं, तरह-तरह के मांस के पकवान तथा अन्य खाद्य सामग्री है, सत्तर-अस्सी आदमियों के लिए काफी भोजन होगा। मैं ने नौकरों से कहा कि सारा पका खाना इस कमबख्त को दे दो और मदिरा की सुराहियाँ भी। इसने कहा कि कुछ फलों को देने की कृपा करें। मैं ने कहा इसे फल भी दे दो।

लेकिन इसकी दुष्टता का अंत नहीं हुआ। इसने हजामत आधी ही छोड़ कर हर चीज को परखना शुरू किया और काफी देर लगा दी। फिर मैं ने डाँटा तो आ कर हजामत बनाने लगा लेकिन कुछ ही देर में उस्तरे को रख कर कहने लगा, आपके स्वर्गीय पिता ने मुझे कभी धनाभाव न होने दिया लेकिन भगवान की कृपा से आप भी मेरे कद्रदान हैं और मुझे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। मैं ने तो आपके पिता के अलावा किसी के आगे हाथ न फैलाया। मैं कोई ऐसा-वैसा आदमी नहीं हूँ। देखिए, एक आदमी जो नाइयों का दलाल था बड़ा अच्छा नाचता-गाता था, उसे हम लोग झिंझोटी कहते थे। एक आदमी था जिसका नाम शावल था, वह गलियों में घूम-घूम कर भुने चने बेचता था, एक शातिर था जो बाकला और दूसरी तरकारियाँ बेचने का धंधा करता था, एक आदमी था आबूबकर वह गलियों में पानी छिड़कने का काम किया करता था। यह सब बड़े अच्छे आदमी थे और मेरी तरह कम बोलनेवाले थे जिसकी वजह से बड़े सफल रहे। और हाँ, एक कासिम भी था जो खलीफा के यहाँ प्यादागिरी करता था। अब मैं झिंझोटी भाई का एक मशहूर गीत आपको सुनाऊँगा और उसका नाच भी दिखाऊँगा।

यह कह कर इसने उठ कर नाचना-गाना आरंभ कर दिया। मैं ने इसे बहुत डाँटा-फटकारा किंतु इसने पूरा गीत सुना कर ही दम लिया। फिर कहने लगा, अब मैं अपने मित्रों को भोजन करा आऊँ फिर आ कर आपकी हजामत बनाऊँगा, बल्कि आप भी ऐसा कीजिए कि अपने मित्रों की दावत छोड़िए और मेरे यहाँ चल कर मेरे मित्रों के साथ भोजन कीजिए। मुझे क्रोध तो बहुत था किंतु मैं इस मूर्खता की बात पर हँस पड़ा और बोला कि किसी और दिन मैं तुम्हारे दिन भोजन के लिए आऊँगा। यह जिद करने लगा कि आज ही चलिए। मैं ने डाँट कर कहा कि आज मैं किसी प्रकार नहीं जा सकता। फिर यह कहने लगा कि मुझे ही अपने साथ ले चलिए, यह खाना मैं अपने घर ले जा कर अपने मित्रों को खिला दूँ, फिर आ कर आपके साथ आपके मित्रों की दावत में चलूँगा। आप क्या वहाँ अकेले जाते अच्छे लगेंगे।

मैं अपने मन में बड़ा दुखी हुआ। मैं ने दिल ही दिल में रो कर कहा कि हे भगवान, इस दुष्ट नाई से मेरा पीछा किस प्रकार छूटेगा। फिर मैं ने इससे कहा, तुम तुरंत मेरी हजामत बना कर अपने घर जाओ और अपने मित्रों को खिलाओ-पिलाओ। मेरे मित्र अकेले मेरा ही इंतजार कर रहे हैं, वे किसी को मेरे साथ अतिथि नहीं बनाना चाहते। मैं तुम्हें ले गया तो शायद मुझे भी उस दावत में न बैठने दिया जाए। इसने कहा, आप भी खूब मजाक करते हैं। जब आपके मित्र हैं तो आप के साथ एक और आदमी के आने पर उन्हें क्या आपत्ति होगी। फिर मैं तो बड़ा सुभाषी हूँ, मेरे जाने से आपके सभी मित्रों को बड़ी प्रसन्नता होगी।

लँगड़े आदमी ने कहा कि मित्रो, इसकी यह बात सुन कर मैं बिल्कुल निराश हो गया कि आज का सारा मामला तो इसने चौपट कर दिया। यह भी सोचा कि इसको बिगड़ने से भी कोई लाभ नहीं। मैं ने इसकी बात का कुछ उत्तर न दिया।

इतने में जुमे की नमाज की पहली अजान हुई। मैं चुप हो रहा तो इसने भी अपना काम शुरू किया और थोड़ी ही देर में हजामत पूरी कर दी। फिर मैं ने इससे प्रसन्नतापूर्वक कहा कि तुम मेरे नौकरों से खाने-पीने का सामान उठवा कर अपने घर जाओ और अपने मित्रों को खिलाओ-पिलाओ। फिर आ जाना तो मैं तुम्हें दावत में ले चलूँगा। यह किसी तरह मेरे घर से टला तो मैं जल्दी से नहा कर और नए कपड़े पहन कर दूसरी अजान की प्रतीक्षा करता रहा ताकि मेरी प्रेमिका का पिता नमाज को चला जाए तो मैं वहाँ पहुँचूँ। दूसरी अजान होते ही मैं घर से चला किंतु यह दुष्ट वहीं गली में छुपा था और मेरे पीछे चुपचाप चलने लगा।

जब मैं काजी के घर के सामने पहुँचा तो देखा कि यह अभागा भी पीछे चला आ रहा है। मैं बड़ा चिंतित हुआ किंतु उस अवसर पर कुछ कहना-सुनना भी उचित नहीं था। वहाँ जा कर देखा कि बड़े काजी के घर का मुख्य द्वार आधा खुला है। मुझे आता देख कर वह बुढ़िया जो वहाँ प्रतीक्षारत थी दौड़ी आई और मुझे मेरी प्रेमिका के पास ले गई। हम लोग प्रेम और मैत्री से बातचीत कर ही रहे थे कि बाहर कई मनुष्यों के बोलने की आवाज आई। मैं और मेरी प्रेमिका दोनों खिड़की के बाहर देखने लगे। सब से पहले देखा कि काजी नमाज पढ़ कर वापस आ रहा है। फिर इस नाई को भी देखा कि सामनेवाले मकान के उसी तख्त पर बैठा है जहाँ मैं बैठा था।

मुझे दोनों ही को देख कर डर लगा। मेरी प्रेयसी ने मुझे घबराया देखा तो तसल्ली दी। और पहले से तय की हुई एक जगह दिखाई कि आवश्यकता पड़ने पर यहाँ छुप जाना। क्या बताऊँ, उस दिन इस दुष्ट नाई के कारण मुझ पर ऐसी विपत्ति पड़ी जिसका वर्णन नहीं कर सकता। जिस समय काजी अपने घर पहुँचा उसी समय एक अधीनस्थ कर्मचारी ने किसी नौकर को किसी बात पर मारा। वह नौकर बड़ी जोर से चिल्लाया। उस की चीख-पुकार सुन कर तख्त पर बैठा हुआ यह कमबख्त समझा कि मुझ पर मार पड़ रही है और यह अपने कपड़े फाड़ कर और सिर में धूल डाल कर चीख-पुकार करने लगा और आसपास के लोगों को बुलाने लगा।

उन्होंने आ कर पूछा कि क्या बात है तो इसने रोते हुए सिर्फ इतना कहा कि इस मकान के लोग मेरे स्वामी को मार रहे हैं। इसके बाद यह दौड़ा हुआ मेरे घर पहुँचा और मेरे सगे-संबंधियों और नौकरों-चाकरों से भी यही कहा। वे बेचारे भी यह सुन कर दौड़ आए। काजी के मकान के सामने भीड़ लग गई और लोग चीखने-चिल्लाने और दरवाजा भड़भड़ाने लगे। काजी ने अपने एक सेवक से कहा कि बाहर जा कर देख कि यह लोग क्या चाहते हैं। सेवक ने बाहर आ कर देखा और घबरा कर अंदर जा कर कहा कि हजारों लोग जमा हैं और क्रोध में दरवाजा तोड़े दे रहे हैं। काजी खुद बाहर आया और लोगों से पूछने लगा कि क्यों शोर कर रहे हो।

दरवाजे पर जमा भीड़ ने काजी की प्रतिष्ठा का भी कुछ लिहाज न किया और कहा, पापी, कुकर्मी, तूने एक बेकसूर प्रतिष्ठित व्यक्ति को क्यों घर में बंद कर के मारा। वह हैरान हो कर बोला, न कोई बाहरी आदमी मेरे घर में है न मैं ने किसी को मारा-पीटा है। अब यह मूर्ख नाई आगे बढ़ा और काजी को भद्दी-भद्दी गालियाँ दे कर बोला, 'तेरी बेटी मेरे स्वामी पर जान देती है। उसने उसे दोपहर में मिलने के लिए बुलाया। तूने उसे अंदर पा कर बहुत मारा है। अब तू अपना भला चाहे तो तुरंत उसे छोड़ दे।' काजी ने अपने गुस्से को पी कर कहा, यहाँ कोई तुम्हारा स्वामी नहीं है, तुम लोग चाहो तो अंदर जा कर देख लो।

यह सुन कर यह नाई और मेरे रिश्तेदार अंदर घुस गए और एक-एक कमरे में जा कर देखने लगे। मैं अपनी बदनामी और काजी के क्रोध के भय से वहाँ रखे एक खाली संदूक में घुस गया और मेरी प्रेमिका ने उसे बंद कर के कुंडी लगा दी। यह नाई ढूँढ़ता हुआ आया और संदूक की कुंडी खोल कर ढक्कन जरा-सा उठा कर देख लिया कि मैं उसमें हूँ। फिर इसने संदूक अपने सर पर रख लिया और बाहर भागा। काजी के नौकर-चाकर इतने घबराए हुए थे कि किसी ने रोक-टोक नहीं की। जब यह संदूक ले कर भाग रहा था तो रास्ते में ढक्कन खुल गया और मैं संदूक से बाहर जा गिरा। मैं मुँह छुपा कर अपने मकान की ओर भागने लगा। यह नाई और बहुत-से लोग मेरे पीछे दौड़े आए थे। इसी परेशानी में एक नाले को छलाँगते समय मेरा पैर फिसला और मैं उसमें इतनी बुरी तरह गिरा कि मेरा पाँव टूट गया। किंतु उस समय मुझे पाँव की चिंता न थी। मैं गिरता- पड़ता भागने लगा। जब भीड़ मेरे पास पहुँचती तो मैं जेब से मुट्ठी भर सिक्के उस की ओर फेंकता। वह लोग सिक्के उठाते तब तक मैं और आगे भागता।

काफी दूर निकल जाने पर भीड़ ने मेरा पीछा छोड़ दिया किंतु यह दुष्ट नाई बराबर बकवास करता हुआ मेरे पीछे लगा रहा। यह बराबर चिल्ला कर कह रहा था, देखिए, मैं ने आप का कितना उपकार किया है और आप के लिए कितना कष्ट झेला है और किस भाँति आपको काजी के हाथ से बचाया है। मैं ने पहले ही कहा था कि अगर मुझे साथ न ले चलेंगे तो बड़ी मुसीबत में फँसेंगे। यह जो कुछ हुआ आपकी बुद्धि की कमी के कारण हुआ। और आप फिर बड़ी भूल कर रहे हैं कि मुझसे भाग रहे हैं। आप मुझसे भागेंगे तो फिर मुसीबत में पड़ेंगे।'

यह पापी इसी प्रकार बकवास करता हुआ आ रहा था। सारे सुननेवाले समझ गए कि मैं किस काम के लिए गया था और सभी मुझे देख कर हँसने लगे थे। सभी लोग मेरी खिल्ली उड़ा रहे थे। मेरा जी करने लगा कि इसी जगह इसे पकड़ कर इसका गला दबाऊँ। लेकिन यह सोच कर रह गया कि ऐसा करने में मेरी ही और फजीहत होगी। लोग बराबर मेरा मजाक उड़ा रहे थे और यह बराबर बकता हुआ मेरे पीछे लगा था। मैं लाचार हो कर एक बड़े घर में घुस गया। उसका स्वामी मेरा परिचित था। उसके पास जा कर मैं ने कहा, मित्रवर, मुझे इस राक्षस नाई से बचाओ वरना आज यह मेरी जान ही ले लेगा। मित्र इस अचानक आई मुसीबत से परेशान तो हुआ लेकिन उसने दरवाजे पर आ कर इस नाई को डाँट-फटकार कर और धक्के दिलवा कर भगा दिया।

फिर उसने पूछा कि आखिर बात क्या है। मैं घबराहट, थकन और पाँव की तकलीफ से अधिक बात करने के योग्य नहीं था। मैं ने उससे कहा कि मुझे तनिक सावधान हो लेने दो, फिर मैं तुम्हें सारी बातें बताऊँगा। कुछ देर बाद मैं ने उसे सारा किस्सा, विशेषतः उस दिन की सारी घटनाएँ ब्यौरेवार बताईं। वह हँसने लगा और बोला, अब तो वह दुष्ट भाग गया है, अब तुम प्रसन्नतापूर्वक अपने घर जाओ। मैं ने उससे कहा, भाई, मुझ पर कृपा करो और अपने घर से न भगाओ। अगर मैं अपने घर गया तो यह जानलेवा नाई फिर वहाँ पहुँच जाएगा और मुझे इतना दुख देगा कि मेरी जान ही जाती रहेगी। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि इस अभागे के कारण सारे शहर में मेरी ऐसी बदनामी हो गई है कि मैं यहाँ किसी को मुँह दिखाने के योग्य नहीं रहा हूँ।

मित्र मेरी बात सुन कर चुप हो रहा। मैं कुछ दिनों तक उसके घर में रहा और वहाँ छुपे-छुपे अपने गुमाश्तों को बुला कर अपनी संपत्ति का प्रबंध कर दिया। जब पाँव का घाव ठीक हो गया तो लँगड़ाता हुआ (क्योंकि हड्डी टूटने के कारण मैं सारी उम्र के लिए लँगड़ा तो हो ही गया था) बगदाद को छोड़ कर इस नगर में आ बसा। मुझे आशा थी कि यहाँ इस नाई से छुटकारा मिलेगा किंतु मेरे दुर्भाग्य से यह यहाँ भी मौजूद है। मित्रो, आप लोग स्वयं विचार कर देखें कि इस कमबख्त ने मुझ पर क्या-क्या मुसीबत नहीं डाली। उस चंद्रमुखी से जो मुझ से विवाह करने को राजी थी मैं हमेशा के लिए बिछुड़ गया, अपने नगर में किसी को मुँह न दिखा सकने के कारण वहाँ से भागने को विवश हुआ और जीवन भर के लिए लँगड़ा हो गया वह अलग।

यह कहने के बाद वह लँगड़ा सभा से चला गया। सभी लोग उस की दुर्भाग्यपूर्ण कथा सुन कर बड़े प्रभावित हुए। सब ने उस नाई से पूछा कि इसने जो बातें कहीं क्या वे बातें सच हैं। अगर उसका वृत्तांत सच है तो निस्संदेह तू महामूर्ख और खतरनाक आदमी है और तुझे इसकी अच्छी तरह सजा मिलनी चाहिए। नाई बोला, जो कुछ उस आदमी ने कहा वह बिल्कुल सच है। लेकिन आप ही बताइए कि मेरा क्या कसूर है। मैं तो उस की चीख-पुकार सुन कर उस की सहायता के लिए गया था। वह तो लँगड़ा ही हुआ है, मैं न होता तो उस की जान भी जा सकती थी। वह मुझे उल्टे दोष देता है। मैं तो सात भाइयों में सब से कम बोलनेवाला हूँ। कहो तो अपनी और अपने भाइयों की कहानी कहूँ। यह कह कर उसने बगैर उनकी अनुमति की प्रतीक्षा किए अपनी कहानी शुरू कर दी।
 
दरजी की जबानी नाई की कहानी

खलीफा हारूँ रशीद के काल में बगदाद के आसपास दस कुख्यात डाकू थे जो राहगीरों को लूटते ओर मार डालते थे। खलीफा ने प्रजा के कष्ट का विचार कर के कोतवाल से कहा कि उन डाकुओं को पकड़ कर लाओ वरना मैं तुम्हें प्राणदंड दूँगा। कोतवाल ने बड़ी दौड़-धूप की और निश्चित अवधि में उन्हें पकड़ लिया। वे नदी पार पकड़े गए थे इसलिए उन्हें नाव पर बिठा कर लाया गया। मैं ने, जो बाद में नाव पर चढ़ा था, समझा कि यह लोग मामूली आदमी हैं। दूसरे किनारे पर अन्य सिपाहियों ने उनके साथ मुझे भी बाँध लिया। मैं ने यह भी न कहा कि मैं डाकू नहीं हूँ, क्योंकि आप जानते हैं कि मैं अल्पभाषी हूँ।

खलीफा के सामने हमें पहुँचाया गया तो उसने जल्लाद को आज्ञा दी कि दसों डाकुओं का सिर काट लो। भाग्यवश मुझे सब के अंत में बिठाया गया। जल्लाद ने दसों के सिर काट दिए तो मेरे पास आ कर रुक गया। खलीफा ने ध्यान से मुझे देखा और कहा, मूर्ख बूड्ढे, तू तो डाकू नहीं है, तू किस तरह इन के साथ आ मिला। मैं ने कहा, मालिक, मैं तो इन्हें भला आदमी समझ कर इनके साथ नाव पर बैठ गया था।

खलीफा को यह सुन कर हँसी आई और वह कहने लगा, तू अजीब आदमी है। पहले क्यों नहीं बोला कि तू डाकुओं में नहीं है। मैं ने कहा, सरकार मैं सात भाइयों में सब से छोटा हूँ। मेरे छहों भाई बकवासी हैं, मैं कम बोलता हूँ। मेरा एक भाई कुबड़ा है, दूसरा पोपला, तीसरा काना, चौथा अंधा, पाँचवाँ बूचा यानी कनकटा और छठा खरगोश की तरह होंठकटा है। कहें तो मैं उनका वृत्तांत कहूँ। किंतु शायद वह सुनना न चाहता था इसलिए उसके बोलने के पहले ही मैं ने अपने भाइयों की कथा आरंभ कर दी।
 
सरकार, मेरा सबसे बड़ा भाई जिसका नाम बकबक था, कुबड़ा था। उसने दरजीगीरी सीखी और जब यह काम सीख लिया तो उसने अपना कारबार चलाने के लिए एक दुकान किराए पर ली। उस की दुकान के सामने ही एक आटा चक्कीवाले की दुकान थी। चक्कीवाले का काम अच्छा चलता था और वह बहुत धनवान था किंतु मेरे भाई का काम नया था और वह बेचारा रोज कमाता और रोज खाता था।

एक दिन मेरा भाई काम कर रहा था और सामने चक्कीवाले के मकान की ऊपर की खिड़की खुली थी। कुछ देर में चक्कीवाले की अति सुंदर पत्नी वहाँ आ खड़ी हुई। मेरा भाई उसके रूप पर मर मिटा और उसे टकटकी लगाए देखता रहा। जब स्त्री की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसने तुरंत ही खिड़की बंद कर ली क्योंकि वह बड़ी पतिव्रता थी। दूसरे दिन वह खिड़की न खुली। तीसरे दिन उस स्त्री ने खिड़की खोली तो फिर मेरे भाई को अपनी ओर देखता पाया। वह समझ गई कि यह आदमी मुझ पर बुरी नजर रखता है। वह इस बात पर जल गई किंतु उसने इसे दंड देना चाहा। वह इसकी ओर देख कर मुस्कुरा दी। यह भी हँस दिया। फिर वह शरमा कर चली गई। यह मूर्ख इससे समझा कि स्त्री मुझे चाहने लगी है।

अब उस स्त्री ने अपनी योजना आरंभ की। उसने अपनी सेविका के हाथ कई गज बहुमूल्य कपड़ा दरजी के पास भेजा कि मेरे लिए तुरंत ही अच्छा परिधान बना दे। मेरे भाई ने समझा कि यह वास्तव में मुझे चाहने लगी है नहीं तो इतना मूल्यवान कपड़ा नए दरजी के पास क्यों भेजती। उसने मेहनत से दिन भर लग कर शाम तक परिधान तैयार कर दिया। दूसरे दिन सेविका के आने पर उसने कहा कि अपनी स्वामिनी से कहना कि अपने सारे परिधान मुझी से सिलवाया करें, मैं बहुत शीघ्र और अत्यंत उत्तम सिलाई करता हूँ। सेविका थोड़ी दूर जा कर लौट आई और कहने लगी, मैं तुम्हें अपनी मालकिन का एक संदेश देना तो भूल ही गई। उसने पुछवाया है कि उस की रात तो तुम्हारे ध्यान में जागते ही कटी, तुम्हारी रात कैसी बीती। मेरा भाई यह सुन कर अत्यंत प्रसन्न हुआ और बोला कि उनसे कह देना कि मेरी तो चार रातें उनकी याद में जागते बीती हैं।

थोड़ी देर में सेविका फिर आई और कहने लगी कि मेरी मालकिन ने यह रेशमी कपड़ा दिया है कि उसके लिए परिधान बनाया जाए। मेरा मूर्ख भाई मनोयोग से उसे सीने लगा। सेविका के जाने के थोड़ी देर बाद वह मनमोहिनी फिर खिड़की पर आ गई और तरह-तरह के हाव-भाव के साथ अपनी लंबी केशराशि, उन्नत यौवन और पतली कमर का प्रदर्शन कर के चली गई। इस मूर्ख ने प्रेम के नशे में दिन भर लग कर वह कपड़ा भी सी दिया। शाम को सेविका आ कर यह दूसरा वस्त्र भी ले गई। सिलाई उसने न पहले कपड़े की दी न दूसरे कपड़े की। अतएव मेरे भाई को दूसरे दिन भी भूखा ही सोना पड़ा। भूख से व्याकुल हो कर उसने शाम को अपने मित्रों से कुछ पैसा उधार लिया और किसी तरह पेट भरा।

दूसरे दिन सवेरे सेविका ने आ कर उससे कहा कि मेरे मालिक ने तुम्हें बुलाया है। पहले तो मेरा भाई घबराया किंतु फिर सेविका के इस कथन से आश्वस्त हो गया कि मालकिन ने मालिक को तुम्हारे सिए हुए वस्त्र दिखाए कि तुमने कितनी होशियारी से उस की ठीक नाप के कपड़े बनाए हैं। इससे मालिक भी बहुत खुश हुए और चाहते हैं कि अपने वस्त्र भी तुमसे सिलवाएँ। दरअसल मेरी मालकिन चाहती हैं कि इसी बहाने तुम्हारा उनके घर आना हो जाए जिससे बाद में मिलन की कोई तरकीब निकल सके।

मेरा भाई यह सुन कर फूला न समाया। वह सेविका के साथ चला गया। चक्कीवाले ने उस की बड़ी प्रशंसा की और खूब स्वागत-सत्कार किया। उसने उसे एक थान दिया कि इसमें से मेरे लिए कई वस्त्र बना दो और जो कपड़ा बचे मुझे वापस कर दो। मेरे भाई ने लग कर पाँच-सात दिन में वे वस्त्र तैयार कर दिए। चक्कीवाला इन्हें देख कर बड़ा खुश हुआ। उसने एक कीमती थान और दिया कि वैसे ही उत्तम वस्त्र सिए जाएँ। मेरे भाई ने फिर कर्ज ले कर अपने खाने-पीने का काम चलाया और दूसरे थान के कपड़े भी सी दिए।

कपड़े ले कर वह चक्कीवाले के पास गया तो चक्कीवाला और प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि तुम्हें सिलाई तो अभी मैं ने दी नहीं। मेरा भाई चुप रहा तो चक्कीवाले ने खुद हिसाब लगा कर सारे कपड़ों की उचित सिलाई के पैसे दिए। मेरा भाई उन्हें लेनेवाला ही था कि वही कमबख्त दासी चक्कीवाले के पीछे खड़ी हो कर इशारा करने लगी कि खबरदार, कुछ न लेना, वरना काम बिगड़ जाएगा। मेरा भाई ऐसा मूर्ख निकला कि उसने सिलाई तो क्या उस डोरे का दाम भी नहीं लिया जो उसने सीने में लगाया था। कहने लगा कि सिलाई देने की क्या जरूरत है, फिर देखा जाएगा।

चक्कीवाले से विदा हो कर वह अपने मित्रों के पास फिर कर्ज लेने पहुँचा किंतु उसे निराश होना पड़ा। मित्रों ने कहा कि तुम उधार ले कर कभी वापस तो करते नहीं, तुम्हें एक पैसा भी नहीं देंगे। फिर वह मेरे पास आया कि कुछ पैसे दो, मैं कई दिन से भूखा हूँ। मैं ने उसे थोड़ा-सा धन दिया क्योंकि मैं भी कौन अमीर था। इन पैसों से उसका कुछ दिन तक इस तरह काम चला कि रोज दो-एक सूखी रोटियाँ खा लेता था।

एक दिन मेरा भाई फिर चक्कीवाले के यहाँ गया। वह उस समय चक्की पर काम कर रहा था। उसने समझा कि यह सिलाई माँगने आया है। उसने जेब में हाथ डाल कर कुछ सिक्के उसे देने के लिए निकाले। इसी समय सेविका ने पीछे से इशारा किया कि अगर सिलाई ली तो हमेशा के लिए काम बिगड़ जाएगा। अतएव उस बेचारे ने उस दिन भी कुछ न लिया और कहा कि मैं सिलाई लेने नहीं आया था, यूँ ही पड़ोसी होने के नाते तुम्हारी कुशल-क्षेम पूछने के लिए आया था। चक्कीवाला उस की भद्रता से बड़ा प्रभावित हुआ और उसे एक और कपड़ा सीने को दिया। मेरे भाई ने उसे भी उसी दिन सी दिया और दूसरे दिन चक्कीवाले के पास ले गया। चक्कीवाले ने सारे पैसे देने चाहे लेकिन सेविका ने फिर इशारा किया कि एक पैसा भी लिया तो मालकिन कभी तुम्हारे सामने न आएँगी। इसलिए उसने कहा, जल्दी क्या है, साहब? पैसे भी ले लूँगा। मैं तो आपका हाल-चाल पूछने के लिए आता हूँ, पैसे के लिए नहीं आता। यह कह कर फिर वह बेचारा अपनी दुकान में आ कर भूखा-प्यासा काम करने लगा।

लेकिन चक्कीवाले की पत्नी को इतनी बात से संतोष न हुआ। पैसे तो उसे बाद में मिल जाने ही थे। वह उसे कठोर दंड दिलवाना चाहती थी। इसलिए एक दिन उसने अपने पति को पूरी बात बता दी कि वह मुझ पर बुरी नजर रखता है, इसीलिए उसने इतने ढेर सारे कपड़े सी कर भी सिलाई नहीं ली। चक्कीवाला यह सुन कर बड़ा क्रुद्ध हुआ। उसने दो-चार दिन तक सोच विचार कर के मेरे भाई को अच्छी तरह दंड देने की योजना बनाई। उसने एक दिन इसे शाम के खाने पर बुलाया। खाना खाने के बाद दोनों देर तक बातें करते रहे। फिर चक्कीवाले ने कहा कि अब बहुत रात बीत गई है, कहाँ जाओेगे इस समय। यह कह कर उसे एक जगह सुला दिया।

आधी रात को उसने मेरे भाई को जगाया और कहा, भाई, मेरी मदद करो नहीं तो मेरी बड़ी हानि हो जाएगी। मेरा खच्चर जो चक्की चलाता था बीमार पड़ गया है और चक्की बंद पड़ी है।

मेरे भाई ने कहा, चक्की चलवाने के लिए क्या कर सकता हूँ। उसने कहा कि तुम खच्चर की जगह चक्की में बँध जाओ और उसे चारों ओर दौड़ कर घुमाओ। मेरे भाई को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह आनाकानी करने लगा। किंतु चक्कीवाले ने उसे चक्की से बाँध ही दिया और कहा कि तेज दौड़ो। मेरे भाई ने चलना शुरू किया तो चक्कीवाले ने उसे एक चाबुक मारा। इसने पूछा यह क्या बात है। उसने कहा कि खच्चर को मैं इसी तरह तेज चलाया करता हूँ, तुम भी तेज न चलोगे तो सारा अनाज बगैर पिसा रह जाएगा। मेरा भाई बेचारा दौड़ने लगा लेकिन दो-चार चक्कर लगाने के बाद बेदम हो कर बैठ रहा। चक्कीवाले ने दस बार चाबुक उसे मारे और उसे खूब गालियाँ दीं जैसी वह खच्चर को दिया करता था।

मेरे भाई की सुबह तक यही दशा रही। सुबह चक्कीवाला उसे वैसा ही बँधा छोड़ कर अपनी स्त्री के पास यह कहने को गया कि अपने प्रेमी की दशा देख लो। इसी बीच सेविका ने आ कर उसे खोला और कहा कि मुझे और मालकिन को तुम पर दया आई है, इसीलिए मैं ने तुम्हें छुड़ाया है। इसने कुछ उत्तर न दिया और गिरता पड़ता अपने घर आया। इस प्रकार उसके सिर से प्रेम का भूत उतरा।

खलीफा ने कहा कि आज ईद है, इस नाई को इनाम दे कर विदा करो। मैं ने यह कह कर विदा ली कि सारे भाइयों की बातें सुना कर ही इनाम लूँगा।
 
नाई के दूसरे भाई बकबारह की कहानी

दूसरे रोज खलीफा के सामने पहुँच कर मैं ने कहा कि मेरा दूसरा भाई बकबारह पोपला है। एक दिन उससे एक बुढ़िया ने कहा, मैं तुम्हारे लाभ की एक बात कहती हूँ। एक बड़े घर की स्वामिनी तुम से आकृष्ट है। मैं तुम्हें उसके घर ले जा सकती हूँ। उस की कृपा हो गई तो तुम शीघ्र ही धनवान हो जाओगे। मेरे भाई ने उसका बड़ा अहसान माना और कुछ पैसे भी बुढ़िया को दिए।

बुढ़िया ने कहा, लेकिन मैं एक चेतावनी तुम्हें देती हूँ। उस सुंदरी की उम्र कम है और उसका बचपन और खिलंदरापन अभी नहीं गया है। वह अपने मित्रों और उन सभी लोगों के साथ तरह-तरह के तंग करनेवाले मजाक करती है, इसी में उसे आनंद आता है। और अगर कोई उसके शारीरिक परिहासों का बुरा मानता है तो वह उससे हमेशा के लिए बिगड़ जाती है और कभी उसका मुँह नहीं देखती। इसलिए यह जरूरी है कि वह और उस की सहेलियाँ और दासियाँ तुम से कितनी ही छेड़छाड़ या खींचतान करें तुम किसी बात का बुरा न मानना। मेरे भाई ने यह बात स्वीकार कर ली।

फिर एक दिन वह बुढ़िया मेरे भाई को वहाँ ले गई। मेरे भाई बकबारह को उस भवन की विशालता और भव्यता को देख कर अति आश्चर्य हुआ। बुढ़िया के साथ होने से उसे किसी द्वारपाल ने नहीं रोका। बुढ़िया ने फिर ताकीद की कि वह सुंदरी या उसके साथ की स्त्रियाँ हँसी-मजाक करें तो बुरा न मानना। महल बहुत ही शानदार था और निवास कक्षों के सामने एक मनोहर उद्यान था। बुढ़िया उसे एक दालान में बिठा कर अंदर गई कि उसके आने का समाचार गृहस्वामिनी को दे। कुछ देर में उसने कई स्त्रियों के आने की आवाज सुनी।

वह चैतन्य हो कर बैठ गया। बहुत सी स्त्रियों का समूह वहाँ आ गया। वे सब परिचारिकाएँ लग रही थीं। बकबारह को देख कर वे सब हँसने लगी। उन सेविकाओं के बीच में एक अति सुंदर रमणी मूल्यवान वस्त्राभूषण पहने शालीनतापूर्वक आ रही थी। स्पष्टतः वह उनकी स्वामिनी थी।

बकबारह इतने स्त्रियों को देख कर घबरा-सा गया। उसने उसे झुक कर सलाम किया। उस सुंदरी ने उसे बैठ जाने को कहा और मुस्कुरा कर बोली, हम लोगों को तुम्हारे आगमन से बड़ी प्रसन्नता हुई है, अब तुम बताओ कि तुम क्या चाहते हो। मेरे भाई ने कहा कि मैं केवल यह चाहता हूँ कि आपकी सेवा में रहूँ। उसने कहा कि अच्छी बात है, मैं भी यही चाहती हँ कि हम लोग चार घड़ी हँस-बोल कर काटें।

यह कह कर उसने अपनी दासियों को भोजन लाने की आज्ञा दी। दासियों ने भोजन परोसा और भोजन के लिए बकबारह को अपनी स्वामिनी के सम्मुख ही बिठाया। जब बकबारह ने खाने के लिए मुँह खोला तो उसने देखा कि इसके मुँह में एक भी दाँत नहीं है। उसने अपनी सेविकाओं को इशारे से यह दिखाया और हँसने लगी। वे सब भी हँसीं। मेरा भाई समझा कि मेरी संगत से यह प्रसन्न है इसलिए वह भी हँसने लगा। फिर उस सुंदरी ने अपनी दासियों को हट जाने का इशारा किया और अपने हाथ से कौर उठा- उठा कर उसे खिलाना शुरू किया। खाने के बाद सुंदरी की परिचारिकाएँ आईं और नाचने- गाने लगीं। मेरा भाई भी उन लोगों के साथ नाचने-गाने लगा। केवल वह सुंदरी ही चुपचाप बैठी रही।

नाच-गाना समाप्त होने के बाद सब सेविकाएँ बैठ कर आराम करने लगीं। मेरे भाई को उस सुंदरी ने एक गिलास भर कर शराब दी और एक गिलास खुद पी। मेरे भाई ने कृतज्ञतावश खड़े हो कर पिया क्योंकि स्वयं अपने हाथों से मदिरा दे कर सुंदरी ने उसे सम्मानित किया था। सुंदरी ने उसे अपने पास बिठाया। वह सलाम कर के बैठ गया। सुंदरी ने उसके गले में बाँह डाल दी और उसके मुँह पर धीरे-धीरे तमाचे मारने लगी।

मेरा भाई स्वयं को संसार का सबसे भाग्यशाली मनुष्य समझ रहा था कि ऐसी सुंदर और धनवान स्त्री उसे इतना प्यार दे रही है। किंतु अचानक ही उस स्त्री ने उसे जोर-जोर से तमाचे मारना शुरू कर दिया। अब वह बिगड़ कर उस सुंदरी से दूर जा बैठा। बुढ़िया भी कुछ दूर पर मौजूद थी। वह इशारा करने लगी कि तुम नाराज हो कर ठीक नहीं कर रहे हो, मैं ने तुम से क्या कहा था। मेरा मूर्ख भाई फिर उस सुंदरी के पास जा कर बैठ गया और कहने लगा कि आप यह न समझें कि मैं नाराज हो कर आप से दूर जा बैठा था। दरअसल दूसरी ही बात थी। उस सुंदरी ने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया।

सुंदरी ने प्रकट में तो उस पर बड़ी कृपा की किंतु अपनी दासियों को इशारा कर दिया और वे उसे भाँति-भाँति से दुखी करे लगीं। उन्होंने मेरे भाई को बिल्कुल विदूषक बना डाला। कोई उस की नाक पकड़ कर खींचती कोई उसके सिर पर धौलें मारती। इसी बीच मौका पा कर मेरे भाई ने बुढ़िया से कहा कि तुम ठीक कहती थीं, ऐसे विचित्र स्वभाव की स्त्री कहीं संसार में नहीं मिलेगी और तुम भी देखो कि मैं इन लोगों को प्रसन्न करने के लिए कैसे-कैसे दुख सह रहा हूँ। उसने कहा कि अभी देखते जाओ क्या होता है।

फिर उस सुंदरी ने मेरे भाई से कहा, तुम तो बड़े बिगड़ैल जान पड़ते हो। हम लोग जरा-सा हँसी-मजाक करते है तो तुम बुरा मान जाते हो। हम तो तुम से खुश हैं और तुम पर मेहरबानियाँ करना चाहते हैं और तुम्हारे मिजाज ही नहीं मिलते। मेरे भाई ने कहा, नहीं मेरी सरकार, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं आपकी प्रसन्नता के लिए प्रस्तुत हूँ। जैसा चाहेंगी वैसा ही करूँगा। जब उस स्त्री ने देखा कि वह निपट मूर्ख उसके कहने में पूरी तरह आ गया और हर बात बर्दाश्त कर लेगा तो उसके गले में बाँहें डाल कर कहने लगी कि अगर तुम वास्तव में हमें प्रसन्न करना चाहते हो तो हमारी तरह हो जाओ। मूर्ख बकबारह बिल्कुल न समझा कि उसका क्या तात्पर्य है।

उस मदमाती नवयौवना ने अपनी सेविकाओं से कहा कि गुलाब जल और इत्र- फुलेल लाओ ताकि हम अपने मेहमान का आदर-सत्कार करें। यह चीजें आने पर उसने अपने हाथ से मेरे भाई पर गुलाब जल छिड़का और उसके कपड़ों पर इत्र लगाया। वह यह सब देख कर फूला नहीं समाता था। फिर उस सुंदरी ने अपनी सेविकाओं को फिर राग रंग की आज्ञा दी और उन्होंने फिर नाचना-गाना शुरू किया। फिर उसने दासियों से कहा कि इस आदमी को दूसरे कमरे में ले जाओ और जिस तरह मैं चाहती हूँ इसे सजा-सँवार कर ले आओ। बकबारह यह सुन कर बुढ़िया के पास गया और पूछा कि यह लोग मेरे साथ क्या करेंगी। उसने कहा, यह सुंदरी तुम्हें स्त्री रूप में देखना चाहती हैं। अब यह परिचारकाएँ तुम्हारी भौंहों को रंग कर सजाएँगी और तुम्हारी मूँछें मूड़ कर तुम्हें स्त्रियों जैसे वस्त्र पहनाएँगी।

बकबारह ने कहा, स्त्रियों के कपड़े मैं पहन लूँगा और भौंहें भी रँगवा लूँगा क्योंकि उन्हें पानी से धो सकता हूँ किंतु मूँछें नहीं मुड़वाऊँगा। इससे तो मेरी सूरत बड़ी अजीब लगेगी। बुढ़िया ने कहा, इस मामले में कोई बहस या कोई जिद न करना। यह सुंदरी तुम पर मोहित है। तुम से जरा-सा हँसी-ठट्ठा करना चाहती है तो कर लेने दो, क्या हर्ज है। यह तुम्हें इतना धन देगी जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस मामले में अगर तुमने हुज्जत की तो सारा मामला खराब हो जाएगा। तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।

इस पर वह बेचारा राजी हो गया और दासियों से कहने लगा कि मेरे साथ जो चाहो वह करो। दासियाँ उसे दूसरे कमरे में ले गईं। उन्होंने तरह-तरह से उस की भौंहों को रँगा और उस की मूँछें मूँड़ दीं। फिर उन्होंने उस की दाढ़ी मूँड़नी चाही तो उसने फिर प्रतिरोध किया। वे कहने लगीं कि यदि दाढ़ी बचानी थी तो मूँछें क्यों मुड़वाईं, स्त्रियों के वस्त्रों के साथ दाढ़ी कैसे चलेगी। अब वह बेचारा दाढ़ी मुड़वाने को भी तैयार हो गया। दासियों ने उस की दाढ़ी मूड़ कर उसे स्त्रियों के कपड़े पहनाए। इसके बाद वे उसे सुंदरी के पास ले आईं। वह इसका यह रूप देख कर हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई। उसने कहा, तुम ने यहाँ तक मेरी बात मानी है तो एक बात और मान लो। तुम सर पर हाथ रख कर और नाक पर उँगली रख कर स्त्रियों की भाँति नाच कर दिखाओ। वह उसी प्रकार नाचने लगा। सारी सेविकाएँ यहाँ तक कि गृहस्वामिनी भी उसके साथ नाचने लगी। वे सब इस तमाशे पर हँसते-हँसते पागल-सी होती जा रही थीं।

उन स्त्रियों ने उसे केवल नचाया ही नहीं, और भी दुर्गति की। उन्होंने उसके हाथ-पाँव बाँध दिए, उसे खूब थप्पड़ और लातें मारीं और उसे उठा-उठा कर एक दूसरे पर फेंकने लगीं। यह देख कर बुढ़िया ने पूर्व योजनानुसार उन सब को डाँटा कि यह बेहूदगी बंद करो। अभिप्राय यह था कि वह बुढ़िया को हितचिंतक समझे और उसके कहने से और तमाशे करे।

अब बुढ़िया ने उसे एक ओर ले जा कर कहा, तुम्हें दुखी तो बहुत किया गया किंतु अब केवल एक बात ही रह गई है। उसमें सफल हो गए तो पौ बारह समझो। यह सुंदरी जब किसी पर प्रसन्न होती है तो उसके साथ एक खेल जरूर करती है। शराब पीने के बाद यह उस व्यक्ति को, उसके सारे कपड़े उतरवा कर और कमर पर एक छोटा कपड़ा भर बँधवा कर अपने सामने बुलाती है और उसके आगे दौड़ती हुई उससे कहती है कि मुझे पकड़ो और कमरे-कमरे और दालान-दालान में दौड़ती फिरती है। जब वह थक कर खड़ी हो जाती है और वह व्यक्ति उसे पकड़ लेता है तो उस की बाँहों में चली जाती है।

अतएव मेरे भाई ने एक लँगोट को छोड़ कर सारे कपड़े उतार डाले और वह स्त्री उससे बीस कदम आगे भागने लगी। भागते-भागते वह उसे एक बिल्कुल अँधेरे कमरे में ले गई। वह स्वयं तो न जाने कहाँ निकल गई, वह बेचारा अँधेरे में भटकता रहा।

अंत में एक ओर प्रकाश देख कर वह उधर दौड़ा। वह पिछवाड़े का दरवाजा था। मेरा भाई वहाँ से ज्यों ही निकला कि वह द्वार बंद हो गया। पिछवाड़े की गली में चर्मकार रहते थे। उन्होंने एक दाढ़ी, मूँछ मुड़ाए, भौंहे रँगाए, लँगोट पहने आदमी को देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ और शरारत भी सूझी। उन्होंने हँसना और तालियाँ बजाना और चपतियाना शुरू किया। फिर वे एक गधा पकड़ लाए और उस पर उसे बिठा दिया और बाजार की तरफ ले जाने लगे। मेरे भाई के दुर्भाग्य से रास्ते में काजी का घर पड़ता था। काजी ने शोर सुन कर अपने नौकर से पुछवाया कि क्या बात है।

नौकरों ने सब लोगों को काजी के सामने ला खड़ा किया। काजी के पूछने पर चर्मकारों ने कहा, सरकार, हमने इस आदमी को इसी दशा में उस गली में पाया जो मंत्री के महल के पिछवाड़े खुलती है। यह वहीं घूम रहा था। काजी ने मंत्री के महल का नाम सुन कर कहा, यह पागल और खतरनाक आदमी मालूम होता है। इसे लिटा कर इसके पाँव उठवा कर तलवों पर सौ डंडे मारे जाएँ और उसके बाद इसे शहर से निकाल दिया जाए। इसके बाद इसके नगर में प्रवेश पर हमेशा के लिए रोक लगा दी जाए। अतएव ऐसा ही किया गया।

इसके बाद नाई ने कहा कि सरकार, यह मेरे दूसरे भाई बकबारह की कहानी है जो मैं ने आपको सुनाई है। अब मैं आपको अपने तीसरे भाई की कहानी सुनाता हूँ। यह कह कर बगैर खलीफा की अनुमति लिए वह कहानी सुनाने लगा।
 
नाई ने कहा, सरकार, मेरा तीसरा भाई बूबक था जो बिल्कुल अंधा था। वह बड़ा अभागा था। वह भिक्षा से जीवन निर्वाह करता था। उसका नियम था कि अकेला ही लाठी टेकता हुआ भीख माँगने जाता और किसी दानी का द्वार खटखटा कर चुपचाप खड़ा रहता। वह अपने मुँह से कुछ न कहता और दानी जो कुछ भी देता उसे ले कर आगे बढ़ जाता। इसी प्रकार एक दिन उसने एक दरवाजा खटखटाया। गृहस्वामी ने, जो घर में अकेला रहता था, आवाज दी कि कौन है। मेरा भाई अपने नियम के अनुसार कुछ नहीं बोला लेकिन दुबारा दरवाजा खटखटाने लगा। गृहस्वामी ने फिर पुकारा कि कौन है। यह बगैर बोले फिर द्वार खटखटाने लगा। अब घर के मालिक ने दरवाजा खोला और पूछा कि तू क्या चाहता है।

बूबक ने कहा कि मैं गरीब भिखमंगा हूँ, भगवान के नाम पर कुछ भीख दो। गृहस्वामी ने कहा कि क्या तू अंधा है, उसने कहा कि हाँ। फिर गृहस्वामी ने कहा, हाथ बढ़ा। यह समझा कि कुछ भीख मिलेगी। उसने हाथ फैलाया तो घर का स्वामी उसे खींच कर ऊपर ले गया। फिर उसने बूबक से पूछा कि तू भीख लेता है तो कुछ देता भी है? उसने कहा, मैं आशीर्वाद ही दे सकता हूँ, तुझे आशीर्वाद देता हूँ। उस आदमी ने कहा कि मैं भी तुझे आशीर्वाद देता हूँ कि तेरी आँखों की ज्योति लौट आए।

बूबक ने उससे कहा, तू यह बात पहले ही कह देता। मुझे जीना चढ़ा कर क्यों लाया? उसने कहा, मैं ने तुझे दो बार आवाज दी थी। तू कुछ न बोला तो मुझे भी बेकार जीना उतरना-चढ़ना पड़ा। बूबक बोला कि अच्छा, मुझे जीने से उतार तो दे। उसने कहा कि सामने ही तो जीना है, तू खुद उतर जा। मजबूर हो कर बेचारा बूबक टटोल-टटोल कर जीना उतरने लगा लेकिन एक जगह उसका पाँव फिसल गया और वह लुढ़कता हुआ नीचे आ रहा। उसके सिर और पीठ में बड़ी चोट आई जिससे वह तिलमिला उठा। बेचारा बड़ी देर तक अपनी चोटों को सहलाता हुआ गृहस्वामी को गालियाँ देता और उस की भर्त्सना करता रहा। फिर वह लाठी टेकता हुआ आगे भीख माँगने के लिए बढ़ गया।

कुछ देर में उसे अपने दो साथी अंधे भिखारी मिले। उन्होंने पूछा कि तुम्हें आज भिक्षा में क्या मिला। बूबक ने सारा वृत्तांत कहा कि किस तरह एक घर का निवासी उसे पकड़ कर ऊपर ले गया और वहाँ जा कर उसके साथ कैसा निष्ठुर परिहास किया और उसे हाथ पकड़ कर उतारा भी नहीं। उसने यह भी बताया कि जीना उतरते समय पाँव फिसलने से उसे कैसा कष्ट हुआ। फिर मेरे भाई ने उनसे कहा कि आज मुझे कुछ नहीं मिला है लेकिन मेरे पास पहले के कुछ पैसे पड़े है, तुम जा कर उनसे कुछ भोजन सामग्री खरीद लाओ।

जो मनुष्य बूबक को जीने से ऊपर चढ़ा ले गया था वह वास्तव में एक ठग था। वह चुपके से बूबक के पीछे आ रहा था। वे तीनों अंधे जब अपने निवास स्थान पर आए तो वह भी उनके पीछे पीछे चल कर उनके घर में आ घुसा। मेरे भाई ने फिर अपनी जेब से कुछ पैसे निकाल कर एक अन्य अंधे से कहा कि बाजार से कुछ खाने को ले आओ लेकिन पहले हम लोग अपना हिसाब-किताब साफ कर लें, तुम लोग देख-भाल कर दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लो कि कोई बाहरी आदमी न देखे। ठग उनका व्यापार देखना चाहता था इसलिए वह छुपने के लिए छत में बँधी हुई एक रस्सी पकड़ कर ऊँचा लटक रहा।

अंधों ने अपनी लाठियों से सारे घर को टटोला और फिर दरवाजा बंद कर लिया। ठग ऊँचा लटका था इसलिए लाठियों की टटोल से बच गया। अब मेरे भाई ने कहा कि तुम लोगों ने मुझे ईमानदार समझ कर अपने जो रुपए मेरे पास रखे थे उन्हें वापस ले लो, अब मैं उन्हें अपने पास नहीं रखूँगा। यह कह कर वह अपनी एक पुरानी गुदड़ी उठा लाया जिसके अंदर बयालीस हजार चाँदी के सिक्के सिले थे। उसके साथियों ने कहा कि इन्हें अपने पास ही रहने दो, हम न इन्हें लेंगे न गिनेंगे क्योंकि तुम पर हमें पूरा विश्वास है। बूबक ने टटोल-टटोल कर गुदड़ी की माल का अंदाजा लगाया और फिर गुदड़ी को यथास्थान रख आया।

फिर बूबक ने जेब से पैसे निकाल कर खाना लाने के लिए कहा। एक अंधे ने कहा, तुम पैसे रखो, बाजार से कुछ लाने की जरूरत नहीं है। मुझे आज एक अमीर आदमी के घर से बहुत-सा खाना मिला है। कुछ तो मैं ने खा लिया है लेकिन अब भी बहुत कुछ बचा हुआ है। यह कह कर उसने अपनी झोली से बहुत-सी रोटियाँ और पनीर तथा फल-मेवे निकाले। तीनों अंधे भोजन करने लगे। ठग भी अपने को रोक न सका और मेरे भाई के दाहिनी तरफ बैठ कर यह सुस्वादु वस्तुएँ खाने लगा।

ठग ने अपने को छुपाने का पूरा प्रयत्न किया था किंतु उसके मुँह से खाना चबाने की ध्वनि सुन कर बूबक चौंका। उसने मन में सोचा कि महाविपत्ति आ गई, यहाँ कोई अन्य व्यक्ति है जो हमारे साथ खाना भी खा रहा है और जिसने गुदड़ी का भेद जान लिया है। उसने एक दम से ठग का हाथ पकड़ लिया और चोर चोर चिल्लाता हुआ उसे घूँसे मारने लगा। अन्य दोनों अंधों ने भी ठग को चिल्ला-चिल्ला कर मारना शुरू कर दिया। चोर भी जहाँ तक उससे हो सका उन अंधों की मार से बचता हुआ उन्हें मारने लगा। वह भी चिल्लाने लगा कि मुझे बचाओ, चोर मुझे मारे डालते हैं।

आसपास के लोग चीख-पुकार सुन कर दरवाजा तोड़ कर अंदर घुस आए और पूछने लगे कि क्या बात है। मेरे भाई ने कहा कि मैं जिसे पकड़े हुए हूँ वह चोर है, यह हमारी भीख से बचाए हुए रुपए चुराने आया है। ठग ने लोगों को देख कर आँखें बंद कर लीं और अंधेपन का अभिनय करने लगा और बोला, भाइयो, यह अंधा बिल्कुल झूठ बकता है। सच्ची बात यह है कि हम चारों अंधों ने भीख माँग कर यह रुपया जमा किया है। अब यह तीनों बेईमान मुझे मेरा हिस्सा नहीं देते। यह मुझे चोर बना रहे हैं और मुझे मार रहे हैं। भगवान के लिए मेरा न्याय करो और मुझे इनसे बचाओ।

लोग इस मामले को उलझा हुआ देख कर सब को कोतवाल के पास ले गए। वहाँ अंधा बने हुए ठग ने कहा, मालिक, हम चारों ही दोषी हैं। लेकिन हम कसमें खा कर भी अपना दोष स्वीकार न करेंगे। अगर हम लोगों को एक-एक कर के मार पड़े तो हम अपराध कबूल कर लेंगे। आप पहले मुझ से आरंभ कीजिए, इस पर मेरे भाई ने कुछ कहना चाहा तो कोतवाल ने उसे डाँट कर चुप कर दिया।

ठग पर मार पड़ने लगी। बीस-तीस कोड़े खाने के बाद उसने एक-एक कर के अपनी दोनों आँखें खोल दीं और चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगा, सरकार, हाथ रोक लीजिए। मैं सब कुछ बताऊँगा।

कोतवाल ने पिटाई बंद करवा दी तो ठग बोला, सरकार, असली बात यह है कि मैं और मेरे यह तीनों साथी अंधे नहीं हैं। हम अंधे बने हुए हैं और भीख माँगने के बहाने लोगों के घरों में घुस जाते हैं और मौका देख कर चोरी कर लेते हैं। इस तरह से हमने बयालीस हजार रुपया जमा किया है। आज मैं ने इन लोगों से कहा कि मेरे हिस्से का चौथाई रुपया मुझे दे दो तो इन लोगों ने भेद खुलने के भय से मुझे रुपया न दिया और मेरे जिद करने पर मुझ से मारपीट की। अगर आप को मेरी बात पर विश्वास न हो तो इन्हें भी मेरी तरह एक-एक कर के पिटवाइए। फिर देखिए यह लोग तुरंत अपना अपराध स्वीकार कर लेंगे।

मेरे भाई और दो अन्य अंधों ने भी चाहा कि अपनी बात कहें किंतु उन्हें बोलने नहीं दिया गया।

कोतवाल ने कहा कि तुम सब अपराधी हो। मेरे भाई ने बहुतेरा कहा कि यह ठग है और हम तीनों वास्तव में अंधे हैं। लेकिन कोतवाल ने उसका विश्वास न किया और तीनों पर मार पड़ने लगी।

ठग ने इन चिल्लाते हुए लोगों से कहा, दोस्तो, क्यों अपनी जान दे रहे हो। मेरी तरह तुम भी अपनी आँखें खोल दो और अपना अपराध स्वीकार कर लो। लेकिन वे बेचारे आँखोंवाले होते तो आँखें खोलते, उसी तरह पिटते और चिल्लाते रहे। अब ठग ने कहा, सरकार, यह लोग बड़े पक्के हैं, अगर आप इन्हें पीटते-पीटते मार डालेंगे तो भी यह अपना अपराध स्वीकार नहीं करेंगे। इन्होंने जितना अपराध किया है इन्हें उससे अधिक दंड मिल चुका है। अब हम सभी को काजी के सामने पेश कर दिया जाए। वह ठीक फैसला करेगा।

काजी के सामने उस ठग ने कहा, हम लोगों ने चोरी से वह धन एकत्र किया है। आज्ञा हो तो मैं उस राशि को आपके सामने पेश करूँ। काजी ने अपना एक सेवक उसके साथ कर दिया। ठग उसके साथ जा कर मेरे भाई की गुदड़ी उठा लाया। काजी ने उस रकम का चौथाई भाग ठग को दे दिया जिसे ले कर वह चला गया। शेष रकम उसने अपने पास रख ली और बाकी तीन लोगों को और पिटवाया और देशनिकाला दे दिया।

यह कह कर नाई ने खलीफा से कहा कि मुझे मालूम हुआ तो मैं ढूँढ़ कर बूबक को गुप्त रूप से अपने घर लाया और कई गवाह ले कर काजी के सामने उसको निर्दोष सिद्ध किया। काजी ने ठग को बुला कर उसका रुपया छीन कर उसे दंड दिया किंतु रकम इन लोगों को न दी। खलीफा यह सुन कर बहुत हँसा। फिर नाई ने चौथे भाई की कहानी शुरू कर दी।
 
नाई ने कहा कि मेरा चौथा भाई काना था और उसका नाम अलकूज था। अब यह भी सुन लीजिए कि उसकी एक आँख किस प्रकार गई। मेरा भाई कसाई का काम करता था। उसे भेड़-बकरियों की अच्छी पहचान थी। वह मेढ़ों को लड़ाने के लिए तैयार भी करता था। इस कारण वह नगर में सर्वप्रिय हो गया। वह बड़े अच्छे-अच्छे मेढ़े पालता और प्रतिष्ठित लोग उसके यहाँ मेढ़ों की लड़ाई देखने आते। इसके अलावा वह भेड़ का बहुत अच्छा मांस बेचता था।

एक दिन एक बुड्ढा उसके पास आया और एक पसेरी मांस खरीद कर और उसका मूल्य दे कर चला गया। उसके दिए हुए चाँदी के सिक्के बिल्कुल नए और चमकते हुए थे। मेरे भाई ने उन्हें देख कर एक संदूक में डाल दिया। वह बूढ़ा पाँच महीने तक इसी तरह आता और उतना ही मांस रोज उसकी दुकान से ले जाता रहा और बदले में उतने ही रुपए रोज दे जाता रहा। पाँच महीने बाद मेरे भाई ने जब और भेड़ें खरीदनी चाहीं तो संदूक खोलने पर वहाँ कागज के गोल कटे टुकड़े पाए।

यह देख कर वह अपना सिर पीट-पीट कर रोने-चिल्लाने लगा। उसने पड़ोसियों को बुलाया ओर उन्हें संदूक में भरी हुई कागज की गोल चिंदियाँ दिखाईं। वे भी यह देख कर बड़े आश्चर्य में पड़े। मेरा भाई दाँत पीस-पीस कर कह रहा था कि अगर वह कंबख्त बुड्ढा मिल जाए तो उसकी अक्ल ठिकाने लगाऊँ। संयोग से गली में कुछ दूर पर वह बुड्ढा दिखाई दिया। मेरे भाई ने दौड़ कर उसे पकड़ा और पड़ोसी तथा अन्य कई लोग भी वहाँ एकत्र हो गए। मेरे भाई ने पुकार कर कहा, भाइयो, देखो इस निर्लज्ज पापी ने मेरे साथ कैसी धोखाधड़ी की है। यह कह कर उसने सारा वृत्तांत कहा।

बूढ़ा यह सुन कर मेरे भाई से बोला, तेरे लिए यह अच्छा होगा कि तूने मेरा जो अपमान किया है और जो गालियाँ मुझे दी हैं उनके लिए मुझ से क्षमा माँग और अपना निराधार आरोप वापस ले। तूने ऐसा न किया तो तूने मेरा जितना अपमान किया है उससे अधिक तेरा अपमान कराऊँगा। मैं नहीं चाहता कि तू जो अभक्ष्य वस्तु खिलाता रहा है उसका उल्लेख भी करूँ। मेरे भाई ने कहा, तू यह क्या बकवास कर रहा है? तू जो चाहे कह दे। मैं किसी बात से नहीं डरता क्योंकि मैं कोई काम धोखेबाजी का काम करता ही नहीं।

बूढ़े ने कहा, तू अपनी फजीहत कराना ही चाहता है तो करा। सुनो भाई लोगो, यह अधम कसाई आदमी मारता है और उनका मांस भेड़ और बकरी के नाम पर तुम लोगों के हाथ बेचता है। मेरे भाई ने चिल्ला कर कहा, नीच बूढ़े, तू इस उम्र में भी झूठ बोलने से बाज नहीं आया। क्यों यह बेसिरपैर की हाँक रहा है? उसने कहा, मैं बेसिरपैर की क्या हाँकूँगा। बेसिरवाली आदमी की एक-आध लाश अब भी तुम्हारी दुकान के अंदर के हिस्से में होगी। वहाँ जा कर जो भी देखेगा उसे मालूम हो जाएगा कि झूठा मैं हूँ या तू। अलकूज ने गुस्से में भर कर कहा, जिसका जी चाहे मेरी दुकान देख ले।

अतएव पड़ोसी लोगों ने तय किया कि बूढ़े को दुकान पर ले जाया जाय और अगर उसकी बात झूठ निकले तो जितना रुपया उस पर वाजिब है उससे दुगुना उससे वसूल किया जाए। वहाँ जा कर देखा कि दुकान के भीतरी भाग में वास्तव में एक मनुष्य की बगैर सिर की लाश लटक रही थी जैसे कि कसाइयों की दुकानों पर जानवरों की बेसिर की लाशें लटकी रहती हैं। वास्तविकता यह थी कि वह बूढ़ा जादूगर था और दृष्टि भ्रम पैदा करने में निपुण था। पाँच महीने तक उसने कागज की गोल चिंदियाँ मेरे भाई को दीं और इस समय उस भेड़ को, जिसे मेरे भाई ने कुछ देर पहले मारा था, आदमी बना कर लोगों को धोखा दिया। उसका जादू का खेल कौन समझता। लोगों ने क्रोध में आ कर मेरे भाई को बहुत मारा और उससे चीख-चीख कर कहा कि तुम नीच और पापी हो, हमें नर मांस खिलाते रहे हो। इसी मार के कारण मेरे भाई की एक आँख फूट गई।

मारनेवालों में बूढ़ा भी शामिल था। उसने मार-पीट पर ही पर मामला खत्म नहीं किया बल्कि सारे लोगों के साथ मेरे भाई और उसकी दुकान में टँगी हुई लाश को ले कर काजी के यहाँ पहुँचा। काजी पर भी उसने दृष्टि भ्रम का प्रयोग किया और उसे भी लाश आदमी ही की दिखाई दी। काजी ने मेरे भाई की कहानी पर विश्वास न किया न उसकी चीख-पुकार पर दया दिखाई। उसने आज्ञा दी कि इस कसाई को पाँच सौ कोड़े मारे जाएँ और फिर इसे ऊँट पर बिठा कर सारे शहर में फिराया जाए, फिर नगर से निष्कासित कर दिया जाए। अतएव ऐसा ही किया गया।

जिस समय मेरे भाई पर यह कष्ट पड़ रहा था उस समय मैं बगदाद में था। मेरा भाई किसी गुमनाम जगह पर छुपा रहा और कुछ दिनों के बाद जब उसमें चलने- फिरने की कुछ शक्ति आई तो वह वहाँ से निकला और छुपता-छुपाता एक ऐसे शहर में पहुँचा जहाँ पर उसे कोई नहीं जानता था। किसी तरह उसने कुछ और दिन काटे, कभी काम मिल जाता था तो थोड़ी-बहुत मेहनत-मजदूरी कर लेता था, नहीं तो भीख माँगता था। भीख में भी अगर कुछ नहीं मिलता तो भूखा ही रह जाता।

एक दिन वह एक सड़क पर चला जा रहा था कि उसने अपने पीछे से आती हुई घोड़े की टापों की आवाज सुनी। मुड़ कर देखा तो कई सवारों को अपना पीछा करता पाया। उसने सोचा कि कहीं यह मुझे पकड़ने तो नहीं आ रहे। इसलिए वह दौड़ कर एक बड़े मकान में जाने लगा। वहाँ उसे दो आदमियों ने पकड़ लिया और कहा, भगवान का लाख-लाख धन्यवाद है कि तुम आज खुद ही हमारे हाथ पड़ने के लिए यहाँ आ गए हो। हम तीन दिन से रात-दिन तुम्हारी तलाश में दौड़ रहे थे।

मेरा भाई यह सुन कर बहुत आश्चर्यान्वित हुआ। उसने कहा, मैं कुछ भी नहीं समझा। तुम लोग मुझसे क्या चाहते हो? क्यों मुझे पकड़ा है? तुम्हें कुछ भ्रम हुआ है। उन लोगों ने कहा, हमें कोई भ्रम नहीं हुआ। तू और तेरे कई साथी चोर हैं। तुम लोगों ने हमारे मालिक का सब माल लूट कर उसे लगभग कंगाल कर दिया। इस पर भी तुम्हारी अभिलाषा पूरी नहीं हुई। अब तू हमारे स्वामी के प्राण लेने के लिए भेजा गया है। कल रात भी तू इसी उद्देश्य से आया था और जब हम तुझे पकड़ने को दौड़े तो तेरे हाथ में छुरी देखी थी। अब भी तेरे पास छुरी होगी। यह कह कर उन दोनों ने मेरे भाई की तलाशी ली तो उसके कपड़ों में वह छुरी निकल आई जिससे वह जानवर काटा करता था। छुरी पा कर वे कहने लगे कि अब तो निश्चय ही हो गया कि तू चोर है। मेरे भाई ने रोते हुए कहा, भाई, किसी के पास छुरी निकले तो क्या इतने भर से वह चोर या हत्यारा हो जाएगा? मेरी कहानी सुनो तो तुम्हें मेरी सत्यता का विश्वास होगा। यह कह कर अलकूज ने अपनी सारी विपदाओं का उनसे वर्णन किया।

किंतु यह कहानी सुन कर वह दोनों व्यक्ति अलकूज पर दया करने के बजाय उससे चिमट गए। उन्होंने उसके कपड़े फाड़ दिए और उसकी पीठ और कंधों पर पुरानी चोटों के निशान देख कर बोले कि इन निशानों से मालूम होता है कि तू पुराना अपराधी है और पहले भी मार खा चुका है। यह कह कर उन्होंने उसे मारना शुरू किया। अलकूज रोता-चिल्लाता रहा और भगवान से शिकायत करता रहा कि मैंने ऐसा क्या अपराध किया है जिसका यह दंड मिल रहा है। एक बार की बेकार की मार के बाद, जिसमें मेरा कोई अपराध नहीं था, यह दूसरा दंड क्यों मिल रहा है।

उन लोगों पर उसके रोने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हुआ और वे उसे काजी के पास पकड़ कर ले गए कि यह चोर हमारे स्वामी के यहाँ चोरी करने के बाद उसे मारने के इरादे से छुरी ले कर आया था। मेरे भाई ने काजी से कहा, सरकार, मेरी फरियाद भी सुनिए। मेरी बातें सुनेंगे तो आपके सामने स्पष्ट हो जाएगा कि मुझ जैसा निरपराध व्यक्ति कोई नहीं होगा। उसके पकड़नेवालों ने काजी से कहा, आप इसकी झूठी कहानी न सुनें। इसका इतिहास जानना हो तो इसके शरीर को वस्त्रहीन करें तो देखेंगे कि यह पुराना पापी है और हमेशा मार खाता रहा है।

काजी ने उसका कुरता उतरवा कर देखा तो पुरानी चोटों के निशान देखे। उसने आज्ञा दी कि इसे सौ कोड़े मारे जाएँ और ऊँट पर बिठा कर शहर में घुमाया जाए और इसकी अपराध कथा कही जाए और फिर इसे नगर से निकाल दिया जाए। ऐसा ही किया गया। नाई ने कहा कि मुझ से कुछ लोगों ने जब उसकी दुर्दशा बताई तो मैं वहाँ गया और तलाश कर के अपने भाई को घर लाया। खलीफा का इस कहानी से मनोरंजन हुआ और उसने कहा कि इसे इनाम दे कर विदा करो। लेकिन नाई ने कहा कि सरकार, मेरे बाकी दो भाइयों की कहानी भी सुन लीजिए।
 
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