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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

नाई ने कहा कि मेरे पाँचवें भाई का नाम अलनसचर था। वह बड़ा आलसी और निकम्मा था। वह रोज किसी न किसी मित्र के पास जा कर बेशर्मी से कुछ भीख माँग लेता और खा-पी कर पड़ा रहता।

मेरा बाप कुछ समय बाद बूढ़ा हो कर मर गया। उसने तीन हजार एक सौ पचास रुपए छोड़े। इन रुपयों को हम सातों भाइयों ने बराबर-बराबर बाँट लिया। अलनसचर ने भी अपना भाग पाया और उससे कुछ व्यापार करने की सोची। उसने साढ़े चार सौ रुपए के शीशे के बरतन खरीदे और उन्हें टोकरी में रख कर बाजार में सड़क के किनारे बैठ गया। वहीं एक दरजी की दुकान थी। दो-एक दिन में दरजी से उसकी दोस्ती हो गई।

अलनसचर वाचाल और मूर्ख तो था ही, हवाई किले भी बनाता रहता था। एक दिन वह दरजी से कहने लगा, मैं इन साढ़े चार सौ के बरतनों को नौ सौ में बेचूँगा और फिर उससे और बरतन लूँगा जिन्हें अठारह सौ में बेचूँगा। इसी तरह व्यापार करते-करते मेरे पास तीस हजार रुपए हो जाएँगे। फिर मैं बहुमूल्य व्यापार सामग्री माणिक, मोती आदि खरीदूँगा और उनसे काफी मुनाफा कमाऊँगा। जब मेरे पास काफी रुपया हो जाएगा तो मैं एक विशाल भवन खरीद कर दास-दासियाँ भी मोल लूँगा और रईसों की तरह रहूँगा और मेरी प्रसिद्धि सारे नगर में हो जाएगी, मेरे यहाँ बड़े-बड़े गवैये और कलावंत आएँगे और मेरे यहाँ रात-दिन रास-रंग होंगे। मेरा व्यापार भी जारी रहेगा। जब बढ़ते-बढ़ते मेरा धन पाँच लाख तक पहुँच जाएगा तो मैं यहाँ के मंत्री के पास संदेश भेजूँगा कि अपनी बेटी का विवाह मुझ से कर दे। उसने स्वीकार किया तो ठीक वरना मैं उसकी बेटी को जबर्दस्ती उठा लाऊँगा।

फिर जब मंत्री की पुत्री से मेरा विवाह हो जाएगा तो मैं दस गुलाम खरीदूँगा और शहजादों जैसे बढ़िया कपड़े पहनूँगा और रत्नजटित जीन लगामवाले असील घोड़े पर चढ़ कर शान से मंत्री के घर जाऊँगा। जब मैं उसके महल में पहुँचूँगा तो सभी छोटे-बड़े लोग भय और आदरपूर्वक मुझे देखेंगे और मेरा पूर्ण सत्कार करते हुए मुझे अंदर ले जाएँगे। जब मैं ऊपर जाना चाहूँगा तो मेरे नौकर और गुलाम और नौकरों के जमादार अदब से जीने में दोनों और खड़े होंगे। वजीर अपना दामाद समझ कर मुझे अपने आसन पर बैठने की जगह देगा और स्वयं मेरे सामने बैठेगा। मैं अपने सेवकों से हजार-हजार अशर्फियों के दो तोड़े लाने को कहूँगा। मैं एक तोड़ा वजीर को दूँगा कि यह तुम्हारी बेटी का महर है और दूसरा अपनी इच्छा से तुम्हें देता हूँ। मेरी उदारता की चर्चा चारों ओर होने लगेगी। फिर मैं वैसे ही ठाठ-बाट से अपने घर आऊँगा।

जब मेरी पत्नी सुनेगी कि मैं उसके पिता से मिलने गया था और उसे भेंट दी थी तो वह मेरा एहसान मानेगी और एक उच्च कर्मचारी द्वारा कृतज्ञता का प्रकाशन करेगी। मैं उस कर्मचारी को बढ़िया इनाम दूँगा। कभी-कभी मैं अपनी पत्नी पर कृपा कर के उसका संग करने के लिए उसके महल में जाऊँगा और वहाँ भी ऐसी गंभीरता से जाऊँगा कि दाएँ-बाएँ किसी ओर निगाह न डालूँगा।

मेरी पत्नी, जिसका मुख पूर्णमासी के चंद्रमा की तरह होगा, बड़ी सज-धज के साथ सोलह श्रृंगार कर के मेरे सामने आएगी तो मैं गर्व के मारे उसकी ओर आँख भी नहीं उठाऊँगा, फिर उसकी प्रधान सेविकाएँ और सखी-सहेलियाँ मेरे सामने आ कर विनय करेंगी कि मालिक, आपकी पत्नी, जो आपकी दासी के समान है, आप की आज्ञा की प्रतीक्षा में है और आप के सामने खड़ी है। कृपा कर के उसे अपने आगे बैठ जाने को कहें। मैं फिर भी उन्हें कोई उत्तर नहीं दूँगा। उन्हें इस बात का बड़ा आश्चर्य होगा कि मैं उनकी ओर और अपनी पत्नी की ओर देखता क्यों नहीं हूँ। वे लोग बड़ी देर तक मेरे सामने खड़ी हो कर मुझ से अपनी पत्नी पर ध्यान देने के लिए अनुनय करती रहेंगी।

फिर मैं एक कृपापूर्ण दृष्टि अपनी पत्नी पर डालूँगा लेकिन फिर निगाह फेर लूँगा। मेरे इस रवैये से मेरी पत्नी की सेविकाएँ और साथिनें समझेंगी कि मैं वैसे किसी बात पर नाराज नहीं हूँ किंतु पत्नी का जो साज-श्रृंगार किया गया है वह मेरे मन का नहीं है इसलिए वे उसे दूसरे कक्ष में ले जाएँगी ताकि उसका नए सिरे से साज-श्रृंगार करें। इतने समय में मैं भी उठ कर नए कपड़े पहन लूँगा।

शयनकक्ष में जाने पर भी मैं अपनी पत्नी से पूर्ण उपेक्षा का बरताव करूँगा। मैं उसकी ओर एक दृष्टि भी नहीं डालूँगा और उससे एक बात भी नहीं करूँगा। मैं पलंग पर उसकी और पीठ कर के सो रहूँगा। मेरी पत्नी रात भर इस उपेक्षा से दुखी हो कर आँसू बहाती रहेगी और सवेरा होने पर अपनी माता यानी मंत्री की पत्नी से रो-रो कर कहेगी कि मेरे पति ने रात में मेरे साथ गर्व और उपेक्षा का बर्ताव किया। उसकी माँ उसे दिलासा देगी, फिर मेरे महल में आ कर सम्मानपूर्वक मेरा हाथ चूमेगी और कहेगी कि जमाई राजा, मेरी बेटी पर इतना अत्याचार न करो कि उसकी ओर देखना ही छोड़ दो। उसका अगर कोई कसूर है तो बताओ मैं उसे दंड दूँगी। वैसे यह तो कहने की जरूरत नहीं कि वह तुम्हारी दासी है और तब मन से तुम्हारी सेवा करना उसका कर्तव्य है। तुम उस पर एक बार तो कृपा दृष्टि करो।

उसके इस अनुनय-विनय का मुझ पर कोई असर नहीं होगा। फिर मेरी सास मेरे पास आ कर मेरा पाँव चूमेगी। मैं इस पर भी टस से मस नहीं हूँगा। फिर मेरी सास शराब का एक प्याला भर कर मेरी पत्नी को देगी कि अपने पति को पिला दो, शायद इससे वह तुम से प्रसन्न हो जाए। मेरी पत्नी मेरे सामने आ कर प्याला लिए बहुत देर तक भयभीत-सी खड़ी रहेगी। फिर वह कहेगी कि आपको उसी भगवान की सौगंध है जिसने आप को इतना ऊँचा बनाया है, कि इस दासी के हाथ से मद्यपात्र ले कर पियें। मैं उसकी इस बात को बदतमीजी समझूँगा और उसके मुँह पर एक तमाचा लगाऊँगा और उठ कर उसके इतने जोर से लात मारूँगा कि वह दालान से नीचे गिर पड़ेगी।

मेरा भाई अपनी कल्पना में इतना खो गया कि उसे अपनी स्थिति का भी ध्यान नहीं रहा। उसने उठ कर उसी टोकरे पर, जिसमें उसके शीशे के बरतन रखे हुए थे, जोर की लात जमाई। टोकरा सड़क पर जा गिरा और उसमें के सारे बरतन टूट-फूट कर बिखर गए। दरजी, जो उसकी बकवास को मजे ले कर सुन रहा था, हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया। उसने मेरे भाई से कहा, मूर्ख, अभागे, तुझे मालूम है कि तेरी यह हानि क्यों हुई है। तूने इतनी सम्मानित और सुंदर स्त्री का जो अपमान किया यह उसी का फल है। अगर मैं तेरे श्वसुर यानी मंत्री की जगह होता तो ऐसी बदतमीजी पर तेरे सौ कोड़े लगवाता और गधे पर बिठा कर सारे शहर में घुमाता कि लोग तुझे दंडित अपराधी के रूप में जान जाएँ।

मेरे भाई को भी अपने माल की बरबादी देख कर बड़ा दुख हुआ और वह रोने-चिल्लाने लगा। बहुत-से लोग उस समय जुमे की नमाज के लिए मस्जिद की ओर आ रहे थे। उसका रोना-पीटना सुन कर वहाँ भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग पूछने लगे कि क्या बात है। जब दरजी ने उन लोगों को पूरा हाल बताया तो वे सब भी हँसने लगे और मेरे भाई का मजाक उड़ाने लगे।

संयोग से उसी समय एक अमीर घराने की स्त्री परदेवाली सवारी पर बैठी कहीं जा रही थी और उस स्थान से गुजर रही थी। उसने सवारी रुकवा कर भीड़ के लोगों से पूछा कि क्या बात है, कौन रो रहा है और उस पर क्या विपत्ति पड़ी है। उन लोगों ने जल्दी में पूरी बात नहीं बताई बल्कि कह दिया कि एक गरीब बरतनवाला एक चबूतरे पर टोकरे में बरतन रखे था, संयोग से ठोकर लगी और सारे बरतन जमीन पर गिर कर चूर-चूर हो गए। उस स्त्री को दया आई। उसने अपने एक सेवक को अशर्फियों की एक थैली दे कर कहा कि उस बेचारे गरीब को दे आओ जिसका नुकसान हुआ है। सेवक ने वह थैली, जिसमें पाँच सौ अशर्फियाँ थीं, मेरे भाई अलनसचर को दी। उसने थैली पा कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की और उस दानी स्त्री को बहुत-से आशीर्वाद दे कर थैली ले कर अपने घर चला आया।

कुछ ही देर में उसका दरवाजा किसी ने खटखटाया। उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक बुढ़िया खड़ी है। बुढ़िया ने कहा, बेटा, नमाज का समय हो गया है। मुझे एक लोटा पानी दो तो मैं वजू कर के नमाज पढ़ लूँ। मेरे भाई ने देखा कि वह काफी बूढ़ी है इसलिए नितांत अपरिचित होने पर भी उसने उसे ला कर पानी दिया। बुढ़िया नमाज पढ़ कर मेरे भाई के सामने आई और उसके सामने ऐसे झुकी जैसे नमाज में भगवान के समक्ष झुकते हैं और फिर उठ कर उसे बराबर आशीर्वाद देती रही। मेरे भाई ने उसके फटे कपड़े देख कर समझा कि यह भीख माँग रही है। उसने अशर्फियों की थैली निकाली और उसे दो अशर्फियाँ देने लगा। बुढ़िया ने वे अशर्फियाँ नहीं लीं। मेरे भाई अलनसचर ने बिगड़ कर पूछा कि क्या तू इतनी भीख से भी संतुष्ट नहीं है। बुढ़िया ने कहा कि तुमने गलत समझा कि मैं भिखारिन हूँ। मैं तो अति धनवान और सुंदर युवती की नौकरानी हूँ, वह मुझे बहुत कुछ देती है और मुझे भीख की जरूरत नहीं है।

मेरा भाई मूर्ख तो था ही, उस बुढ़िया के फरेब को न समझा और उससे कहने लगा कि हमें भी अपनी मालकिन को दिखाओ। इसके लिए वह उसे इनाम देने लगा। बुढ़िया हँस कर बोली, तुम यह इनाम रख लो और मेरे साथ चलो। तुम मेरी मालकिन को तो देखोगे ही, यह भी संभव है कि तुम्हारी सुंदरता देख कर वह तुमसे विवाह कर ले। ऐसा हुआ तो तुम वास्तव में भाग्यशाली हो जाओगे, असंख्य धन और अनिंद्य सुंदरी के स्वामी। मेरे भाई ने अंदर जा कर अच्छे वस्त्र पहने और अशर्फियों की थैली ले कर बुढ़िया के साथ चला। बुढ़िया उसे एक बड़े विशाल और सजे-सजाए मकान के सामने ले गई। उसके आवाज देने पर एक यूनानी दासी ने द्वार खोला। बुढ़िया ने उसे एक सुसज्जित स्थान पर बिठाया और अंदर गई। कुछ ही देर में एक अत्यंत रूपवती युवती आ कर उसके समीप बैठ गई और उससे घुल-मिल कर बातें करने लगी। उसने कहा, यह ऊपरी कपड़े उतार कर आराम से बैठो। अलनसचर ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में वह युवती घर के अंदर यह कह कर चली गई कि मैं अभी आती हूँ।

कुछ ही देर में एक बड़ा लंबा-चौड़ा हब्शी हाथ में नंगी तलवार ले कर आया और गरज कर मेरे भाई से बोला, तू यहाँ मेरे घर में क्या कर रहा है? मेरे भाई की भय के मारे घिग्घी बँध गई। हब्शी ने उसे तलवार के कई हाथ मारे जिससे वह गिर कर बेहोश हो गया। हब्शी ने उसकी कमर से अशर्फियों की थैली खोल ली और आवाज दी कि नमक लाओ। वही यूनानी दासी एक कटोरे में पिसा हुआ नमक ले आई। नमक वह यह देखने के लिए मँगाता था कि उसका शिकार अगर मरा न हो तो वह उसे फिर तलवार मार कर खत्म कर दे। दोनों ने उसके घावों पर नमक छिड़का। मेरा भाई उनका उद्देश्य समझ गया था इसलिए तकलीफ सह कर भी चुप हो कर पड़ा रहा।

हब्शी और दासी उसे पूर्ण मृत जान कर थैली ले कर चले गए। कुछ देर में बुढ़िया फिर आई और मेरे भाई को घसीटती हुई ले गई और एक कोने में बने हुए गढ़े में फेंक आई जहाँ और भी कई लाशें पड़ी हुईं थीं। मेरा भाई इस अरसे में तकलीफ की वजह से बेहोश हो गया था। गढ़े में फेंके जाने के कुछ देर बाद उसे होश आया। वास्तविकता यह थी कि तकलीफ देने के लिए डाला गया नमक ही उसके प्राण बचाने और शक्ति देने का कारण बना। थोड़ी देर के बाद वह उस गढ़े से निकल कर एक कोने में दब कर बैठा फिर छुपता-छुपाता मकान के दरवाजे पर पहुँचा। जो कुछ कहीं पड़ा मिलता खा-पी लेता। दो दिन बाद बुढ़िया फिर नए शिकार की तलाश में निकली तो यह मौका पा कर भाग निकला और मेरे पास आ गया और मुझसे अपनी सारी विपत्तियों का हाल कहा।

महीने भर में उसके सारे घाव भर गए और वह पूर्णतः स्वस्थ हो गया। अब उसने बदला लेने की योजना बनाई। उसने एक बड़ी-सी थैली बनाई और उसमें अशर्फियों के बराबर शीशे के टुकड़े भर दिए। फिर उसने बुढ़ियों जैसे कपड़े पहने और कपड़ों के अंदर तलवार छुपा कर हाथ में थैली ले कर निकल पड़ा।

संयोग से एक गली में वही धोखेबाज बुढ़िया मिल गई। उसने बूढ़ी स्त्रियों के जैसे स्वर में उससे कहा, बहन, मैं फारस देश की रहनेवाली हूँ और इस नगर में नई आई हूँ। मेरे पास पास सौ अशर्फियाँ हैं। मैं चाहती हूँ कि उन्हें परख और तौल कर देख लूँ कि पूरी और ठीक हैं या नहीं। तुम कहीं से मेरे लिए सिक्के तौलने का तराजू ला दो। उसने उत्तर दिया, बहन, तुम मेरे साथ चली आओ। मुझ से अधिक विश्वसनीय व्यक्ति इस नगर में कोई नहीं है। मेरा पुत्र सर्राफे का काम करता है। वह तुम्हारी अशर्फियाँ भली भाँति तौल और परख देगा। लेकिन जल्दी करो, ऐसा न हो कि वह घर से अपनी दुकान को चला जाए।

वह पापिन मेरे भाई को उसी घर में ले गई जिसमें पहले ले गई थी। यूनानी दासी ने पहले की भाँति द्वार खोला और मेरे भाई को अंदर ले जा कर एक अच्छी जगह बिठा दिया। बुढ़िया ने कहा, तुम यहीं बैठो, मैं अभी अपने बेटे को ले कर आती हूँ। कुछ ही देर में उसका तथाकथित पुत्र यानी वही हत्यारा हब्शी आया और कहने लगा कि भाई, मेरे साथ चलो। मेरा भाई अलनसचर बुढ़िया के वेश में उसके पीछे चल दिया। रास्ते में जब वह हब्शी लापरवाह हो गया तो मेरे भाई ने तलवार निकाल कर ऐसा हाथ मारा कि उसका सिर कट कर अलग जा पड़ा। अलनसचर ने उसका सिर और धड़ दोनों खींच कर उसी गढ़े में डाल दिए।

इतने में यूनानी दासी बरतन में पिसा नमक ले कर आई किंतु बुढ़ियों के वस्त्र पहने नंगी तलवार लिए पुरुष को देख बरतन फेंक कर भागने लगी। मेरे भाई ने झपट कर उसे पकड़ा और उसका सिर काट दिया।

दौड़-भाग और चीख-पुकार सुन कर वह बुढ़िया भी वहाँ आ गई। लेकिन वहाँ का हाल देख कर जान बचाकर भागने लगी। मेरे भाई ने दौड़ कर उसे पकड़ा और कहा, दुष्टा, कुकर्मिणी, तूने मुझे पहचाना या नहीं। बुढ़िया काँपती हुई बोली कि मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा, पहचानूँगी कैसे। मेरा भाई बोला, तूने देखा कैसे नहीं है, मैं वही हँ जिससे तूने उस गली में नमाज के लिए पानी माँगा था और फिर यहाँ ला कर अपनी समझ में मरवा डाला है। बुढ़िया हाथ जोड़ कर और गिड़गिड़ा कर कहने लगी कि मेरा अपराध क्षमा कर दो। किंतु मेरे भाई ने उस पर दया न की और उसके भी चार टुकड़े कर दिए।

अब मेरे भाई ने उस सुंदर युवती की तलाश की जिससे उसने पहले प्रेमालाप किया था। वह एक अन्य कक्ष में मिली और मेरे भाई को देख कर काँपने लगी। मेरे भाई ने उसे निरपराध जान कर उससे कोई कटु वाक्य न कहा बल्कि सांत्वना दी और पूछा, सुंदरी, मैंने उन दोनों बदमाश स्त्रियों और हब्शी का अंत कर दिया है। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो, कहाँ की रहनेवाली हो और इन अत्याचारियों के फंदे में कैसे फँस गई। उसने उत्तर दिया, मैं एक धनी व्यापारी की पत्नी थी। यह बुढ़िया कभी-कभी मेरे घर आती थी लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि यह कौन है और क्या करती है। एक दिन इसने आ कर मुझ से कहा कि मेरे घर विवाह है, तुम उसमें शामिल होने के लिए चलो। इसके बहुत अनुनय-विनय करने पर मैं इसके साथ उत्तम-उत्तम वस्त्राभूषण पहन कर और सौ अशर्फियाँ ले कर यहाँ आ गई। यहाँ से इन लोगों ने मुझे अपने घर न जाने दिया और इसी हब्शी के साथ सहवास के लिए मजबूर किया। तीन वर्ष से मैं यहीं रहती हूँ। इस हब्शी से और इन लोगों के कुकृत्यों में विवशतापूर्वक शामिल होने से मैं बड़ी दुखी थी किंतु कुछ कर नहीं पाती थी।

मेरे भाई ने पूछा कि इन लोगों ने भोले-भाले लोगों को मार कर कितना धन जमा किया है। उसने कहा कि धन तो इतना है कि तुम सारी आयु आराम से रह सकते हो। यह कह कर वह उसे कई कमरों में ले गई जहाँ पर कई संदूक मुद्राओं आदि से भरे थे। मेरे भाई की यह देख कर आँखें फट गईं। उस स्त्री ने उससे कहा कि तुम बाहर जा कर कुछ मजदूर ले आओ तो हम लोग यह सब यहाँ से उठा कर ले चलें। मेरा भाई बाहर जा कर बाजार की तरफ दौड़ गया और कई मजदूर ले कर आ गया किंतु उसे देख कर आश्चर्य हुआ कि इतनी देर में वह स्त्री संदूकों के समेत गायब हो गई, केवल एक कोने में अनुमानतः पाँच सौ अशर्फियों के मूल्य का सामान पड़ा हुआ था। मेरे भाई ने सोचा कि चलो, जो कुछ हाथ आया वही बहुत है और मजदूरों से वही सामान उठवा कर अपने घर आ गया।

दुर्भाग्य से मजदूरों को लाने के बाद उसने उस घर का दरवाजा बंद नहीं किया था, न बाहर जाने पर घर को ताला लगाया। अतएव आसपास के लोग वहाँ आ गए और मजदूरों को सामान उठाए हुए जाते देख कर और घर को खाली पा कर काजी के यहाँ चले गए और उससे सारा मामला बता दिया। मेरा भाई अपने घर में एक रात निश्चिंत हो कर सो रहा था कि कई सिपाही आए और उसे पकड़ कर काजी के पास ले गए। काजी ने उससे पूछा कि यह सामान कहाँ मिला। उसने कहा कि मैं ये सारी बातें सच-सच आपको बताऊँगा किंतु आप यह आश्वासन दें कि मुझे दंड न दिया जाएगा। काजी ने कहा, सच बोलने पर मैं तुझे दंड न दूँगा।

अतएव मेरे भाई ने सारी घटनाएँ उसे आद्योपांत बता दीं। काजी ने अपने सेवकों को भेज कर मेरे भाई के घर से सारा सामान उठवा मँगाया और उसे अपने घर भिजवा दिया और उसमें से मेरे भाई को कुछ भी नहीं दिया। इसके बाद उसने मेरे भाई अलनसचर को दो-तीन वर्ष के लिए नगर से निष्कासित कर दिया ताकि वह खलीफा के पास जा कर उससे काजी की शिकायत न कर सके।

मेरा भाई बेचारा उन दो-चार अशर्फियों को ले कर, जो उसकी जेब में पड़ी थीं, शहर से बाहर निकला और एक ओर को चल दिया किंतु दुर्भाग्य ने यहाँ भी उसे धर दबाया। दो-तीन दिन बाद उसे डाकुओं ने घेर लिया। वे उसका सारा धन, यहाँ तक कि पहनने के कपड़े भी, लूट कर ले गए। मुझे मालूम हुआ तो मैं कुछ कपड़े और रुपए ले कर अपने भाई की खोज में निकला और कुछ दिनों बाद उसे खोज निकाला। उसे वस्त्र और रुपए दे कर मैं उसे छुपा कर नगर में ले आया और अपने घर में ला कर रखा। इसके बाद मैं बराबर उसका भरण-पोषण करता रहा था।
 
नाई ने कहा कि अब मेरे आखिरी भाई शाह कबक का वृत्तांत रह गया है। इसे भी सुन लीजिए, फिर मैं आप से विदा लूँ। इस भाई का नाम शाह कबक था और उसके होंठ खरगोश की तरह ऊपर को चढ़े हुए थे और वह चलता भी खरगोश की तरह कूद-कूद कर था। पिता के मरने पर उसे अपने हिस्से के रुपए मिले और उसने उनसे व्यापार किया जिससे उसे काफी मुनाफा हुआ किंतु कुछ दिनों बाद दुर्भाग्य से उसे ऐसा घाटा हुआ कि दाने-दाने को मुहताज हो गया। मतलब यह कि उसके पास बहुत ही कम धन रह गया।

अब उसने यह धंधा शुरू किया कि अमीरों के घर जाता और द्वारपालों से साठ-गाँठ करता और उन्हें घूस देता। वे उसे अंदर जाने देते जहाँ वह गृहस्वामी के पाँव पकड़ कर उससे भीख माँगता। द्वारपाल भी कहते कि बेचारा वास्तव में अत्यंत दुखी है, इसे जरूर कुछ दे दीजिए।

एक दिन घूमते-घूमते वह एक विशाल भवन के सामने गया जहाँ बहुत-से नौकर- चाकर दौड़-भाग कर रहे थे। उसने एक सेवक से पूछा कि यह किसका मकान है। उसने कहा, मालूम होता है तू परदेसी है तभी इस महल के स्वामी का नाम पूछ रहा है। हमारा स्वामी तो सूर्य की भाँति प्रसिद्ध है। उसका नाम जाफर बरमकी है जो खलीफा का विश्वासपात्र मंत्री है। मेरे भाई ने उन सेवकों से पूछा कि क्या मुझे यहाँ कुछ भिक्षा मिल सकती है। उन्होंने कहा कि हमारा स्वामी अति दयालु है, वह किसी याचक को नहीं रोकता, तुम बेखटक अंदर चले जाओ और हमारे मालिक से भीख माँगो, वह तुम्हें निहाल कर देगा।

मेरा भाई अंदर गया तो वहाँ का ऐश्वर्य देख कर उसकी आँखें फट गईं। महल बहुत बड़ा था और अत्यंत मूल्यवान वस्तुओं से सजा हुआ था। उसमें शानदार संगमरमर का फर्श था और हर जगह रंगीन रेशमी परदे लटक रहे थे। कई दालानों और वाटिकाओं से होता हुआ मेरा भाई एक दालान में पहुँचा जहाँ बहुत-से नौकर-चाकर थे और एक वृद्ध पुरुष एक सोने के कामवाली गद्दी पर बैठा था। मेरा भाई समझ गया कि यही बरमकी है। उसने प्रणाम किया तो बरमकी बोला, क्या चाहते हो?

मेरे भाई ने उसे झुक कर सलाम किया और कहा, सरकार मैं निर्धन मनुष्य हूँ और आप जैसे ऐश्वर्यवान व्यक्ति से कुछ माँगने आया हूँ। बरमकी इस बात से खुश हुआ और उसकी दीन-हीन दशा देख कर बोला कि आश्चर्य है कि हमारे बगदाद शहर में भी कोई ऐसा निर्धन व्यक्ति है। मेरा भाई यह समझा कि यह मुझे बहुत कुछ देगा और उसने बरमकी को बहुत आशीर्वाद दिया। बरमकी ने उससे कहा कि मैं तुम्हें ऐसा दान दूँगा जिसे तुम जीवन भर याद रखोगे। फिर मेरा भाई बोला कि मैं सौगंधपूर्वक कहता हूँ कि मैंने अभी तक कुछ नहीं खाया है। बरमकी बोला, यह तो बड़े दुख की बात है कि तुम अत्यंत भूखे भी हो। मैं तुम्हारे लिए अभी भोजन मँगवाता हूँ।

यह कह कर बरमकी ने जोर से आवाज दी, छोकरे, हाथ धोने के लिए पानी ला। न कोई छोकरा आया न पानी किंतु बरमकी अपने हाथ ऐसे मल-मल कर धोने लगा जैसे कि उन पर कोई पानी डाल रहा हो। उसने मेरे भाई से कहा कि तुम भी आगे आओ और हाथ धोओ। मेरे भाई ने सोचा कि बरमकी परिहास-प्रिय है। वह भी आगे बढ़ कर झूठ-मूठ हाथ धोने लगा। फिर बरमकी बोला कि अभी भोजन भी आ रहा है। कुछ क्षणों के बाद वह अपने मुँह तक हाथ ले गया और ऐसे मुँह चलाने लगा जैसे ग्रास को चबा रहा है। उसने मेरे भाई से कहा कि तुम भी खाओ। संकोच क्यों कर रहे हो। इस घर को अपना ही समझो। मेरा भाई, जो वास्तव में भूखा था, इस झूठ-मूठ की दावत से कुढ़ कर रह गया और कुछ न बोला।

बरमकी ने कहा, क्या बात है? क्या तुम्हें यह शीरमाल और यह कबाब अच्छे नहीं लगते? तुम खा क्यों नहीं रहे हो? मेरे भाई ने कुछ और उपाय न देख कर बरमकी की भाँति ही झूठ-मूठ खाना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद बरमकी ने पुकार कर कहा, सच कहो तुमने ऐसा स्वादिष्ट चकोर और बटेर का मांस कभी खाया है। फिर इसी प्रकार उसने झूठ-मूठ बतख का मांस खाया और खिलाया। फिर बरमकी बोला कि देखो यह मुर्गे का कैसा स्वादिष्ट मांस है, एक टाँग और एक बाजू तुम भी लो। फिर कहा, देखो यह बकरी के बच्चे का भुना मांस है। उसे भी उसने झूठ-मूठ खाया और खिलाया।

इसी प्रकार कई प्रकार के कल्पित व्यंजन उसने मँगाए और झूठ-मूठ खाए और खिलाए। फिर एक व्यंजन का एक ग्रास ले कर मेरे भाई के मुँह की ओर ले गया और कहा कि इसे मेरे हाथ से खाओ।

शाह कबक ने उस झूठे ग्रास को चबाया और कहा, वास्तव में इसका स्वाद अद्वितीय है। बरमकी बोला कि मैं पहले ही कहता था कि तुम इसे पसंद करोगे, अच्छा अब एक और चीज खा कर देखो। यह कह कर वह फिर एक हवाई ग्रास शाह कबक के मुँह की ओर ले गया। शाह कबक ने यूँ ही मुँह चला कर कहा, वाह, इसके स्वाद का क्या कहना, यह भी पिछले व्यंजन से कम नहीं है। इसमें से अंबर, लौंग, जायफल और जावित्री सब की सुगंध आ रही थी और कोई सुगंध किसी दूसरी सुगंध को दबा नहीं रही है। बरमकी बोला कि जी भर कर इसे खाओ।

फिर बरमकी ने छोकरे को (जो कहीं उपस्थित नहीं था) आवाज दी कि खाने के बरतन उठा ले और फल ला। फिर मेरे भाई से कहा कि यह बादाम आज ही तोड़े गए हैं। इसके बाद वे दोनों काल्पनिक रूप से बादामों को तोड़ कर उनका छिलका फेंक कर गूदा खाने लगे। इसी प्रकार और भी भाँति-भाँति के मेवों और फलों को बरमकी ने झूठ-मूठ खाया खिलाया। शाह कबक ने खूब तारीफ की और कहा कि बहुत ही स्वादिष्ट चीजें खाने को मिलीं जिनसे मुँह थक गया लेकिन मन न भरा।

अब बरमकी ने मुस्कुरा कर उसकी ओर हाथ बढ़ाया और कहा कि यह मदिरा पियो। शाह कबक ने कहा कि हमारे परिवार में मदिरापान वर्जित है किंतु बरमकी बराबर जोर देता रहा तो उसने झूठ-मूठ का प्याला अपने गले में उड़ेल लिया और कहा, मालिक, मैंने सुना था कि शराब में नशा होता है, मुझे तो बिल्कुल नशा नहीं चढ़ा। बरमकी ने कहा कि अब मैं तुम्हें एक नए प्रकार की तेज शराब पिलाता हूँ। यह कह कर उसने एक काल्पनिक प्याला मेरे भाई की ओर बढ़ाया। उसने उसे झूठ-मूठ पी लिया और मद्यप की तरह चेष्टाएँ करने लगा। कुछ देर में उसने बरमकी को एक घूँसा मारा, फिर एक और घूँसा मारा। तीसरी बार बरमकी ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि तू पागल हो गया है क्या?

मेरे भाई ने ऐसा हाव-भाव दिखाया जैसे नशे से चौंका हो। फिर वह हाथ जोड़ कर बोला, सरकार, मुझ से बड़ा अपराध हुआ। आप ने मुझे इतने सुस्वादु व्यंजन खिलाए और मैंने आप के साथ ऐसी धृष्टता की। किंतु आपने मुझे तेज शराब भी पिला दी। मैंने आपसे पहले ही निवेदन किया था कि मेरे परिवार में मद्यपान नहीं होता है और मुझे इसकी आदत नहीं है। इसी के नशे में मुझ से भूल हुई। मुझे क्षमा करें।

बरमकी यह सुन कर क्रुद्ध होने के बजाय हँस पड़ा और बोला, मुझे बहुत दिनों से तेरे जैसे मनुष्य की ही तलाश थी। मैं तेरा अपराध इस शर्त पर क्षमा कर सकता हूँ कि तू यहीं हमेशा मेरे साथ रह। अभी तक हम लोगों ने झूठ-मूठ का भोजन किया है, अब सचमुच का करेंगे। यह कह कर उसने सेवकों को आज्ञा दी और वे सब एक-एक कर के वहीं व्यंजन लाए जिन्हें अब तक बरमकी ने झूठमूठ खाया और खिलाया था। मेरे भाई ने रुचिपूर्वक वे स्वादिष्ट व्यंजन पेट भर खाए। फिर बरतन उठाए गए और उत्तम मदिरा के पात्र लाए गए। मद्यपान के बीच ही कई रूपसी नवयुवतियाँ आईं और उन्होंने सुरीले वाद्यों के साथ मधुर स्वर में देर तक गाना-बजाना किया।

मेरा भाई इन सब बातों से स्वभावतः ही बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने बरमकी की उदारता की बड़ी प्रशंसा की और उसे बहुत आशीर्वाद दिया। बरमकी ने कहा कि अब तुम यह फटे-पुराने कपड़े उतारो और कायदे के कपड़े पहनो। यह कह कर उसने सेवकों को आज्ञा दी कि इसके लिए नए कपड़े लाओ। वे बरमकी के अपने वस्त्रागार से बहुमूल्य वस्त्र शाह कबक के लिए ले आए।

बरमकी ने मेरे भाई को हर तरह से बुद्धिमान और व्यवहार-कुशल पाया और अपने घर का सारा प्रबंध उसके सुपुर्द कर दिया। इस प्रकार वह बड़ा संतुष्ट और प्रसन्न हो कर बरमकी के महल में रहने लगा। किंतु उसके इस सौभागय ने बहुत दिनों तक उसका साथ न दिया। खलीफा ने बरमकी के मरने पर उसकी सारी संपत्ति और धन जब्त कर लिया। मेरे भाई ने जो संपत्ति अर्जित की थी वह भी उससे छीन ली गई। वह बेचारा अपना थोड़ा-बहुत बचा हुआ रुपया ले कर व्यापारियों के एक दल के साथ विदेश को चला कि कुछ व्यापार करें। किंतु रास्ते में डाकुओं ने उन सब व्यापारियों पर हमला कर के उन्हें लूट लिया और उन्हें गुलाम बना कर बेच दिया।

मेरा भाई भी एक जंगली आदमी के हाथ बेच दिया गया। वह जंगली उसे मारा-पीटा करता और कहता कि मुझे इतने रुपए दे तो तुझे आजाद कर दूँगा। मेरे भाई ने कसम खा कर कहा कि मेरे पास एक पैसा भी नहीं है। इस पर उस जंगली ने छुरी निकाल कर मेरे भाई के होंठ चीर डाले। इस पर भी उस पर दया न की और होंठ ठीक हो जाने के बाद उसे कठिन परिश्रम के काम पर लगा दिया गया। बेचारा इसी तरह दुख में जीवन बिताने लगा।

उस जंगली की पत्नी बड़ी सुंदर थी। वह जब लूट-मार करने जाता था तो अपनी पत्नी की रक्षा का भार मेरे भाई पर छोड़ जाता था। पति के जाने के बाद वह स्त्री शाह कबक से बड़ी मीठी-मीठी बातें करती, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती और बड़े आकर्षक हाव-भाव दिखाती। शाह कबक समझ गया कि यह मुझे चाहती है और मेरे साथ भोग की इच्छुक है। किंतु अपने जंगली मालिक के डर से शाह कबक उससे अलग ही रहता और जब एकांत में वह उसे आकर्षक हाव-भाव दिखाती तो आँखें नीचे कर लेता।

एक दिन प्रेमावेश में वह स्त्री पति की उपस्थिति ही में शाह कबक के सामने ऐसी चेष्टाएँ करने लगी। जंगली ने उसे शाह कबक की शरारत समझा और क्रोध में आ कर एक ऊँट पर अपने पीछे उसे बिठाया और एक ऊँचे पहाड़ पर ले जा कर उसे छोड़ दिया ताकि वह भूख-प्यास से मर जाए। वह स्वयं अकेला ऊँट पर बैठ कर नीचे उतर आया। कुछ दिनों में उधर से कुछ लोग बगदाद की तरफ आते हुए निकले। वे स्वयं तो मेरे भाई को न लाए किंतु बगदाद आ कर मुझे उसका हाल बता दिया। मैंने जा कर उसे सांत्वना दी और उसे अपने घर ले आया।

नाई ने कहा कि यह सब कथाएँ सुन कर खलीफा बहुत हँसा। उसने मुझे अच्छा इनाम दिया और गंभीर व्यक्ति का खिताब दिया। लेकिन कहा कि तुम बगदाद से निकल जाओ। कुछ वर्षों बाद मैंने सुना कि खलीफा का देहांत हो गया है इसलिए अपने घर वापस आया। उस समय तक मेरे छहों भाई भी मर गए थे। इसके बाद कई वर्ष तक मैंने इस लँगड़े और उसके बाप की सेवा की जैसा कि आप लोगों ने स्वयं ही इसके मुँह से सुना है। फिर भी यह अत्यंत दुख की बात है कि इनकी इतनी भलाई करने पर भी इसने कृतघ्नता का सबूत दिया और मुझसे घृणा करता रहा। इसके शहर से निकलने पर इसे ढूँढ़ता हुआ मैं काशगर पहुँचा।

दरजी ने काशगर के बादशाह के सामने नाई के मुख से सुना वृत्तांत सुना कर कहा कि नाई की कहानी के बाद सब लोगों ने भोजन किया और तीसरे पहर मैं अपनी दुकान पर गया। शाम को घर आने लगा तो देखा कि यह कुबड़ा शराब में धुत्त हो कर मेरी दुकान के सामने बैठा गा-बजा रहा है। मैं उसे अपने घर ले गया। मेरी पत्नी ने उस दिन मछली पकाई थी। हम दोनों के खाने के लिए वह कई मछलियाँ लाई। मैंने कुबड़े को कुछ मछलियाँ खाने को दीं। वह मूर्ख उनके काँटे निकाले बगैर ही उन्हें खा गया। काँटे उसके गले में अटक गए और वह बेहोश हो कर गिर पड़ा। मैंने उसे ठीक करने के बहुत- से प्रयत्न किए किंतु जब वह मर गया तो मैं उसे यहूदी हकीम के दरवाजे से टिका कर घर लौट आया।

दरजी ने फिर कहा, जहाँपनाह, इसके बाद की सारी बातें आप को ज्ञात हैं। हकीम ने उसे मरा जान कर व्यापारी के गोदाम में गिरा दिया। व्यापारी ने उसे चोर समझ कर उसको थप्पड़ लगाए और समझा कि यह उसी मार से मर गया है अतएव इसे बाजार में एक दुकान के सहारे खड़ा कर दिया। मैंने सारी बातें सच-सच आप को बता दीं। अब आप को अधिकार है चाहे मुझे मृत्युदंड दें या क्षमादान करें।

बादशाह दरजी की बात सुन कर संतुष्ट हो गया और बोला कि दरजी और बाकी तीनों लोग निर्दोष हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए। उसने यह भी कहा कि मैं लँगड़े और नाई के छह भाइयों के किस्से सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ, निस्संदेह यह कुबड़े की कहानियों से भी अधिक मनोरंजक हैं। लेकिन उसने आज्ञा दी कि उस नाई को, जो इसी शहर में है, यहाँ लाया जाए और जब तक वह यहाँ न आए न कुबड़े की लाश को दफन किया जाए और न किसी अभियुक्त को घर जाने दिया जाए।

अतएव बादशाह के आदेश से उसके नौकर-चाकर दरजी के साथ गए और कुछ देर में खोज कर के नाई को बादशाह के सामने ले आए। नाई की अवस्था नब्बे वर्ष की थी, उसकी दाढ़ी, मूँछें और भवें बर्फ की तरह सफेद थीं। उसकी नाक बहुत लंबी थी और उसके कान बुढ़ापे के कारण काफी लटक आए थे। बादशाह को उसका यह विचित्र रूप देख कर बरबस हँसी आ गई। उसने नाई से कहा, मैंने सुना है कि तुम बड़ी विचित्र और विस्मयकारी कहानियाँ कहते हो। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी कुछ कहानियाँ तुम्हारे मुँह से सुनूँ।

नाई ने हाथ जोड़ कर कहा, हे पृथ्वीनाथ, मैं आपका दासानुदास हूँ। मुझे जो भी आज्ञा होगी उसके पालन में मैं सदैव तत्पर हूँ। किंतु कहानियाँ सुनाने के पहले एक प्रश्न पूछने की धृष्टता करना चाहता हूँ। कृपया यह बताएँ कि यह दरजी, यह यहूदी हकीम और इतने सारे नागरिक यहाँ क्यों जमा हैं और यह कुबड़ा आदमी जमीन पर किस लिए लेटा है। बादशाह ने कहा, तुझे इन बातों से क्या लेना-देना। नाई ने कहा, मैं सिर्फ यह साबित करना चाहिता हूँ कि मैं बकवासी नहीं हूँ। मैं बोलता हूँ तो सुनना भी चाहता हूँ।

बादशाह उसकी यह बात सुन कर हँस पड़ा और उसने पूरी घटना बताई कि किस तरह कुबड़े की हत्या के अपराध पर चार आदमी फाँसी चढ़ाए जानेवाले थे। नाई यह कथा सुनते समय गंभीरतापूर्वक सिर हिलाता रहा जैसे वह सब समझ रहा है और किसी ऐसे भेद को पा गया है जो वह अपने हृदय में छुपाए है। फिर उसने बादशाह से कुबड़े को देखने की अनुमति चाही। अनुमति मिलने पर वह उठ कर कुबड़े के पास गया और बहुत देर तक उसके शरीर का निरीक्षण करता रहा और नाड़ी, आँखें आदि देखता रहा।

यकायक वह बड़े जोर से हँसा। वह हँसता ही रहा और हँसते-हँसते पीठ के बल गिर पड़ा। उसे यह भी ध्यान न रहा कि बादशाह के सामने इस प्रकार हँसना बड़ी उद्दंडता है। उठने के बाद भी बहुत देर तक हँसता रहा। फिर बोला सरकार, इस कुबड़े की कहानी तो ऐसी है कि स्वर्णाक्षरों में लिखवा कर रखी जाए। लोग उसकी बात सुन कर आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे कि या तो इस नाई का मस्तिष्क फिर गया है या बुढ़ापे के कारण इसकी मति मारी गई है। बादशाह ने भी विनोदपूर्वक कहा, हे अल्पभाषी, बुद्धिसागर महोदय, आपको इतनी हँसी किस कारण आ रही है?

नाई ने कहा, पृथ्वीपाल, मैं आपकी न्यायप्रियता और क्षमाशीलता की सौंगध खा कर कहता हूँ कि यह कुबड़ा मरा ही नहीं है। मैं इसे ठीक कर सकता हूँ। आप अनुमति दें तो मैं इसका इलाज करूँ। अगर मैं सफल न होऊँ तो फिर आप मुझे दुर्बुद्धि या विक्षिप्त जो भी चाहें ठहराएँ और जो दंड चाहें वह दें। बादशाह से अनुमति पा कर नाई ने अपना संदूकचा खोला और उसमें से एक तेल निकाल कर कूबड़े के हाथ और गले पर कुछ देर तक मलता रहा। फिर उसने एक औजार से कुबड़े का मुँह खोला और एक चिमटी उसके मुँह के अंदर डाल कर उसके गले में अटका मछली का काँटा पकड़ा और जोर लगा कर उसे बाहर निकाल लिया। उसने काँटा सभी उपस्थित व्यक्तियों को दिखाया। कुछ ही देर में कुबड़े के हाथ-पैरों में हरकत हुई और उसने अपनी आँखें खोल दीं। इसके अतिरिक्त भी उसके शरीर में जीवन के कई चिह्न दिखाई दिए।

काशगर का बादशाह और सारे उपस्थित व्यक्ति इस बात को देख कर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि एक पूरे दिन-रात मुर्दों के समान पड़े रहने के बाद भी कुबड़ा यकायक जी उठा। सभी लोगों को इस बात से खुशी हुई। बादशाह ने आज्ञा दी कि कुबड़े की तथाकथित मृत्यु की घटना और नाई की कही हुई कहानियाँ लिपिबद्ध की जाएँ और शाही ग्रंथागार में रखी जाएँ। उसने यह भी आज्ञा दी कि चूँकि दरजी, यहूदी हकीम, मुसलमान व्यापारी और ईसाई को कुबड़े की वजह से बड़ा मानसिक और शारीरिक कष्ट सहना पड़ा है इसलिए इन लोगों को शाही खजाने से काफी इनाम दे कर विदा किया जाए। उसने तीसरी आज्ञा यह दी कि नाई का कुछ मासिक वेतन नियत कर के दरबार में रख लिया जाए ताकि वह अपनी कहानियों से हमारा मनोरंजन किया करे।

मंत्री की बेटी शहरजाद इस संपूर्ण कथा को कहने के बाद चुप हो रही। दुनियाजाद ने कहा, दीदी, यह तो बहुत अच्छी कहानी थी। मैंने तो समझा था कि बेचारा कुबड़ा मर ही गया होगा। वास्तव में नाई बहुत ही कुशल और बुद्धिमान था कि उसने उसे जीवनदान दे दिया।

हिंदुस्तान के बादशाह शहरयार ने कहा, मैं भी इस कहानी को सुन कर, विशेषतः लँगड़े और नाई के वृत्तांतों को सुन कर अत्यंत प्रसन्न हूँ। शहरजाद ने कहा, यदि बादशाह सलामत मुझे आज प्राणदान दें तो मैं बका के पुत्र अबुल हसन और खलीफा हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहार की कहानी सुनाऊँगी। यह कहानी कुबड़े की कहानी से भी अधिक मनोरंजक है।

चुनांचे उस कहानी के सुनने की इच्छा के कारण बादशाह ने उस दिन भी शहरजाद का वध न करवाया। वह दिन भर दरबार में बैठ कर अपने राज्य प्रबंध में लगा रहा और रात को आ कर शहरजाद के साथ सो गया। दूसरी सुबह होने के एक पहर पहले दुनियाजाद ने शहरजाद को जगा कर कहा कि अब वह कहानी सुनाओ जिसे सुनाने को कहा था। शहरयार भी जाग गया और कहानी सुनने को उत्सुक हो गया। शहरजाद ने कहना शुरू किया।
 
अबुल हसन और हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी

खलीफा हारूँ रशीद के शासनकाल में बगदाद में एक अत्यंत धनाढ्य और सुसंस्कृत व्यापारी रहता था। वह शारीरिक रूप से तो सुंदर था ही, मानसिक रूप से और भी सुंदर था। वहाँ के अमीर-उमरा उसका बड़ा मान करते। यहाँ तक कि खलीफा के आवास के लोगों में भी वह विश्वस्त था और महल की उच्च सेविकाएँ उसी के यहाँ से वस्त्राभूषण आदि लिया करती थीं। खलीफा का कृपापात्र होने के कारण सभी प्रतिष्ठित नागरिक उसके ग्राहक थे और उसका व्यापार खूब चलता था। बका नामक एक अमीर का बेटा अबुल हसन विशेष रूप से उसका मित्र था और रोज दो-तीन घंटे उसकी दुकान पर बैठता था। बका फरस देश के अंतिम राजवंश का व्यक्ति था इसलिए अबुल हसन को भी शहजादा कहा जाता था।

अबुल हसन अत्यंत रूपवान युवक था। जो स्त्री-पुरुष भी उसे देखता वह मोहित हो जाता था। इसके अतिरिक्त अबुल हसन बड़ा कला प्रवीण था। गायन-वादन और कविता करने में भी वह अद्वितीय था। वह व्यापारी की दुकान में जब गाना-बजाना शुरू कर देता था तो उसे सुनने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी।

एक दिन शहजादा अबुल हसन व्यापारी की दुकान पर बैठा था। उसी समय चितकबरे रंग के खच्चर पर सवार एक युवती आई। उसके आगे-पीछे दस सेविकाएँ भी थीं। वह सुंदरी कमर में एक सफेद पटका बाँधे थी जिसमें चार अंगुल चौड़ी लेस टँकी हुई थी। वह हीरे-मोती जड़े इतने आभूषण पहने थी जिनके मूल्य का अनुमान भी कठिन काम है। उसकी दासियों की सुंदरता भी झिलमिले नकाबों के अंदर से झलक मारती थी, फिर स्वयं स्वामिनी की सुंदरता का क्या कहना।

वह युवती अपनी जरूरत का कुछ सामान लेने के लिए उक्त व्यापारी की दुकान पर आई। व्यापारी उसे देख कर झपट कर आगे बढ़ा और अत्यंत स्वागत-सत्कारपूर्वक उसे दुकान के अंदर ले आया और एक सज्जित कक्ष में बिठाया। शहजादा अबुल हसन भी एक कमख्वाब से मढ़ी हुई तिपाई ले आया और सुंदरी के सामने उसे रख कर उसके पाँव उस पर रखे और झुक कर कालीन की उस जगह का चुंबन किया जहाँ उसके पाँव रखे थे।

अब उस सुंदरी ने सुरक्षित स्थान समझ कर अपने चेहरे का नकाब उतार दिया। शहजादा अबुल हसन उसके अनुपम सौंदर्य को देख कर आश्चर्यचकित रह गया। वह सुंदरी भी शहजादे के मोहक रूप को देख कर मोहित हो गई। दोनों एक दूसरे के प्रेम-पाश में जकड़ गए। सुंदरी ने कहा कि आप बैठ जाएँ, मेरे सन्मुख आपका खड़े रहना ठीक नहीं। अबुल हसन बैठ तो गया किंतु चित्रवत उसे देखता ही रहा।

वह सुंदरी शहजादे की दशा से समझ गई कि यह मुझ पर मुग्ध है। उसने उठ कर व्यापारी को अलग ले जा कर अपनी इचिछत वस्तुओं के बारे में पूछताछ और मोलभाव किया और फिर उस शहजादे का नाम-पता पूछा। व्यापारी ने कहा, महोदया, यह नौजवान अबुल हसन है। यह बका का पुत्र है। इसका दादा ईरान का अंतिम बादशाह था। इसके परिवार की कई कन्याएँ खलीफा के वंश में ब्याही गई हैं। वह सुंदरी इस बात से बड़ी प्रसन्न हुई कि उच्चवंशीय है। उसने व्यापारी से कहा, मुझे यह नौजवान बड़ा सुसंस्कृत लगता है और इसके साथ बात कर के मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। आप की सहायता से मुझे इससे भेंट होने की आशा है। मैं एक विशेष दासी को आपके पास भेजूँगी। उस समय आप इसे अपने साथ ले कर मेरे यहाँ आएँ। मैं इसे अपने बाग और महल की सैर कराऊँगी और इससे उसका जी खुश होगा। आप मुझ पर कृपा कर के इसे अपने साथ जरूर लाएँ।

व्यापारी समझ गया कि सुंदरी भी शहजादे पर मुग्ध है। उसने शहजादे को लाने का वादा किया। इसके बाद वह अनिंद्य सुंदरी अपने रूप की छटा बिखेरती हुई अपने घर को चल दी। शहजादा बड़ी देर तक टकटकी लगाए उस मार्ग को देखता रहा जहाँ से हो कर वह गई थी। काफी देर इसी तरह बीती तो व्यापारी ने कहा, भाई, यह तुम्हें क्या हो गया है? एक ही जगह पागल की तरह देखे जा रहे हो। लोग तुम्हें इस दशा में देखेंगे तो कितना हँसेंगे। तुम अपने को सँभालो और दूसरी बातों में ध्यान लगाओ।

शहजादे ने कहा, मित्र, यदि तुम मेरे हृदय की दशा जानते तो शायद ऐसा न कहते। जब से मैंने उस मनमोहिनी को देखा है, मैं उसी का हो रहा हूँ। उसका ध्यान बिल्कुल नहीं भुला पा रहा हूँ। भगवान के लिए यह तो बताओ कि उसका नाम क्या है और वह कहाँ रहती है। व्यापारी ने कहा, मेरे प्यारे मित्र, इस सुंदरी का नाम शमसुन्निहार है। यह खलीफा की सबसे चहेती सेविका है। अबुल हसन ने कहा, यह सुंदरी यथा नाम तथा गुण है। शमसुन्निहार का अर्थ है दोपहर का सूर्य। इसका सौंदर्य वास्तव में दोपहर की सूर्य की भाँति प्रखर है जिस पर निगाह नहीं ठहरती। इसीलिए एक बार इसे देखने पर मैं और कुछ देख नही पा रहा हूँ।

व्यापारी ने समझाना चाहा कि उस सुंदरी के प्रेम में फँसना ठीक नहीं है। उसने कहा, यह खलीफा की सबसे प्यारी सेविका है और वे इसे इतना मानते है कि मुझे कह रखा है कि इसे जिस चीज की जरूरत हो इसे तुरंत दी जाए, यह मेरा निश्चित आदेश है। इस प्रकार व्यापारी ने और भी बातें कहीं कि खलीफा का प्रेम-प्रतिद्वंद्वी बनने में जान का खतरा है। लेकिन अबुल हसन पर उसके समझाने-बुझाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह शमसुन्निहार के लिए तड़पता रहा।

यह सब चल रहा था कि एक दिन शमसुन्निहार की भेजी हुई विशेष दासी आई। उसने चुपके से व्यापारी से कहा कि स्वामिनी ने आपको और शहजादे को बुलाया है। वे दोनों तुरंत उसके साथ हो लिए। शमसुन्निहार खलीफा के विशाल राजप्रासाद के एक कोने में बने हुए भव्य आवास में रहती थी। दासी दोनों आदमियों को अपनी स्वामिनी के आवास में एक गुप्त द्वार से ले गई। अंदर ले जा कर उसने दोनों को एक स्वच्छ और सुंदर स्थान पर बिठाया। तुरंत ही सुसंस्कृत सेवकों ने सोने की तश्तरियों में भाँति-भाँति के खाद्य पदार्थ ला कर रख दिए। जब वे लोग जी भर खा चुके तो एक दासी उनके लिए सुगंधित मदिरा मूल्यवान प्यालों में लाई। मद्यपान के बाद उनके हाथ धुलवाए गए और भाँति-भाँति के इत्र उनके सामने लाए गए जिन्हें उन्होंने अपने कपड़ों पर मला।

इसके बाद वही विश्वस्त दासी इन लोगों को एक अति सुंदर बारहदरी में ले गई। उसकी छत गुंबद की तरह थी और उसमें रत्न जड़े थे। सामने की ओर संगमरमर के दो विशाल खेमे थे जिनमें नीचे की ओर भाँति-भाँति के पशु-पक्षियों के सुंदर रंगों में मनोहारी चित्र बने थे। बारहदरी के फर्श पर भी तरह-तरह के फूल-बूटों के चित्र बने थे। एक ओर नाजुक-सी दो अल्मारियाँ रखी थीं। जिनमें चीनी, बिल्लौर, संगमूसा आदि के अत्यंत सुंदर पात्र रखे हुए थे। उन पात्रों पर सोने के पानी से बड़े सुंदर चित्र बने थे और सुलेख लिखे हुए थे। दूसरी ओर के खंभों में दरवाजे लगे थे। जिसके बाद बरामदा था। बरामदे के बाद बाग था। बाग की जमीन पर भी रंगीन पत्थर जड़े हुए थे। बारहदरी के दोनों ओर दो सुंदर और बड़े हौज थे जिनमें सैकड़ों फव्वारे छूट रहे थे। बाग में बीसियों तरह के पक्षी वृक्षों पर बैठे चहचहा रहे थे।

यह लोग उस अनुपम शोभा का आनंद ले ही रहे थे कि बहुत-सी दासियाँ जो सुंदर वस्त्राभूषण पहने थीं आईं और बारहदरी में बिछी हुई सुनहरे काम की चौकियों पर बैठ गईं और तरह-तरह के वाद्ययंत्र अपने सामने रख कर उन्हें ठीक करने लगीं ताकि आज्ञा मिलते ही गाना-बजाना शुरू कर दें। यह दोनों भी ऐसे स्थान पर बैठ गए जहाँ से सब कुछ देख सकें। उन्होंने देखा कि एक ओर ऊँची रत्नजटित चौकी रखी है। व्यापारी ने शहजादे से चुपके से कहा, अनुमानतः यह बड़ी चौकी स्वयं शमसुन्निहार के बैठने के लिए है। यह महल खलीफा के राजप्रासाद ही का एक भाग है किंतु इसे विशेष रूप से शमसुन्निहार के लिए बनवाया गया है। कारण यह है कि खलीफा के महल में जितनी दासियाँ और सेविकाएँ हैं उनमें वह सब से अधिक शमसुन्निहार ही को चाहता है। शमसुन्निहार को अनुमति है कि जहाँ चाहे खलीफा से पूछे बगैर चली जाए। खलीफा स्वयं भी जब इसके पास आना चाहता है तो पहले से संदेश भिजवा कर आता है। वह अभी आती ही होगी।

व्यापारी शहजादे से यही वार्ता कर रहा था कि एक दासी ने आ कर गानेवालियों से कहा कि गाना-बजाना शुरू करो। उन लोगों ने तुरंत अपने-अपने साजों को बजाना शुरू कर दिया और गानेवालियाँ गाने लगीं। शहजादा उस स्वर्गोपम संगीत को सुन कर मुग्ध- सा रह गया। इतने में दासियों ने शमसुन्निहार के आने की घोषणा की। शहजादा भी सँभल कर बैठ गया। सब से पहले वही विशेष और मुख्य दासी आई जिसने दस मजदूरिनों से उठवा कर बड़ी चौकी शहजारे के बैठने की जगह के पास रखवाई। फिर कई हब्शिन बाँदियाँ हथियार ले कर उस चौकी के पीछे पंक्तिबद्ध हो कर खड़ी हो गईं। बीस गायिकाएँ और वाद्यकर्मियाँ सामने खड़ी हो गईं जहाँ से वह आनेवाली थीं।

कुछ ही देर में मंद-मंद हंसगति से चलती हुई शमसुन्निहार उन्हीं प्रतीक्षारत सेविकाओं के मध्य अपनी चौकी की ओर आने लगी। उसकी दासियाँ भी सुंदर थीं किंतु उसके रूप की छटा सब से निराली थी। वह सिर से पाँव तक रत्नजटित आभूषणों से लदी थी और दो दासियों के कंधों पर हाथ रखे हुए धीरे-धीरे चल रही थी। वह आ कर अत्यंत शालीनतापूर्वक अपने आसन पर विराजमान हुई। बैठने के बाद उसने संकेत से उसका अभिवादन किया। फिर शमसुन्निहार ने गाने-बजानेवाली सेविकाओं को आज्ञा दी कि अपनी कला का प्रदर्शन करें। हब्शिनों ने गानेवालियों की चौकियाँ उस जगह के समीप लगा दीं जहाँ व्यापारी और शहजादे की चौकी बिछी थी। वे गानेवालियाँ व्यवस्थापूर्वक अपनी चौकियों पर बैठ गईं।

शमसुन्निहार ने एक गानेवाली से कहा कि कोई श्रृंगारिक राग गाओ। उसने अत्यंत मृदु स्वर में एक तड़पता हुआ गीत गाया। यह गीत शहजादे और शमसुन्निहार की दशा को व्यक्त कर रहा था। शहजादा भावातिरेक में बेहाल हो गया। उसने एक वादिका से बाँसुरी ली और बाँसुरी पर तड़पते हुए प्रेम की एक ध्वनि निकाली और बहुत देर तक उसे बजाता रहा। जब उसने बजाना खत्म किया तो शमसुन्निहार ने वही बाँसुरी उससे ली और एक हृदयग्राही ध्वनि निकाली जिसमें शहजादे की बजाई रागिनी से अधिक तड़प थी। शहजादे ने फिर एक वाद्य यंत्र लिया और एक अति मोहक रागिनी उस पर बजानी शुरू की। अब ऐसा वातावरण हो गया कि शहजादा और शमसुन्निहार इतने प्रेम विह्वल हो गए कि उनका संयम जाता रहा। शमसुन्निहार अपनी चौकी से उठ कर बारहदरी के अंदरूनी हिस्से में जाने लगी। शहजादा भी उसके पीछे चल दिया। दो क्षण बाद ही दोनों आलिंगनबद्ध हो गए और सुध-बुध खो कर जमीन पर गिर पड़े।

दासियों ने दौड़ कर दोनों को सँभाला और बेदमुश्क का अरक छिड़क कर दोनों को चैतन्य किया। शमसुन्निहार ने होश में आते ही पूछा कि व्यापारी कहाँ है। व्यापारी बेचारा अपनी जगह बैठा काँप रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस कांड की परिणति कहाँ होगी और खलीफा को यह हाल मालूम हो जाएगा तो क्या होगा। शहजादे ने आ कर कहा कि शमसुन्निहार तुम्हें बुलाती है तो वह उठ कर उसके पास आया। शमसुन्निहार ने उससे कहा कि मैं आप की बड़ी आभारी हूँ कि आप ने शहजादे से मेरा मिलन करवा दिया। व्यापारी ने कहा, मुझे यह आश्चर्य है कि आप लोग एक-दूसरे से मिलन होने पर भी इतने विह्वल क्यों हैं। शमसुन्निहार ने कहा कि सच्चे प्रेमियों की यही दशा होती है, उन्हें वियोग का दुख तो सालता ही है, मिलन में भी उनकी व्याकुलता कम नहीं होती।

यह कहने के बाद शमसुन्निहार ने दासियों को भोजन लाने की आज्ञा दी। शमसुन्निहार, शहजादे और व्यापारी ने रुचिपूर्वक भोजन किया। फिर शमसुन्निहार ने शराब का प्याला उठाया और एक गीत गा कर उसे पी गई। दूसरा प्याला उसने शहजादे को दिया। उसने भी एक गीत गा कर प्याला पी लिया।

यह आनंद मंगल हो ही रहा था कि एक दासी ने धीरे से कहा कि खलीफा का प्रधान सेवक मसरूर खलीफा का संदेश लाया है और आपकी प्रतीक्षा में खड़ा है। शहजादा और व्यापारी यह बात सुन कर बड़े भयभीत हुए और उनके मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। शमसुन्निहार ने उन्हें धीरज बँधाया और दासी से कहा कि तुम मसरूर को कुछ देर बातों में उलझाओ ताकि मैं शहजादे को छुपा सकूँ, मैं शहजादे को छुपा लूँगी तो मसरूर को बुलाऊँगी। वह दासी गई तो शमसुन्निहार ने आज्ञा दी कि बारहदरी के दरवाजे बंद कर दो और बाग की तरफ लगे बड़े परदे गिरा दो ताकि रोशनी न आए। फिर उसने शहजादे और व्यापारी को बारहदरी के ऐसे कोने में बिठा दिया जहाँ से वे किसी को दिखाई न दें। यह सब कर के उसने पूर्ववत गाने-बजाने वालियों को कला प्रदर्शन की आज्ञा दी और आदेश दिया कि मसरूर को अंदर लाया जाए।
 
मसरूर बीस दासों के साथ आया और शमसुन्निहार को झुक कर अभिवादन करने के बाद बोला कि खलीफा आपके विरह में व्याकुल हैं और आपसे भेंट के लिए बड़े इच्छुक हैं। शमसुन्निहार ने खुश हो कर कहा, यह तो मेरा बड़ा भाग्य है कि वे कृपा करना चाहते हैं। मैं तो उनकी दासी हूँ। जब चाहें आएँ। लेकिन मसरूर साहब, आप कुछ देर लगा कर ही उन्हें लाएँ। कहीं ऐसा न हो कि जल्दी में खलीफा के स्वागत के प्रबंध में कुछ त्रुटि रह जाए।

यह कह कर शमसुन्निहार ने मसरूर और उसके सेवकों को विदा किया और खुद आँखों में आँसू भर कर शहजादे के पास आई। व्यापारी उसे आँसू बहाते देख कर घबराया कि कहीं ऐसा न हो कि भेद खुल गया हो। शहजादा भी प्रेम-मिलन में यह अचानक व्याघात देख कर अत्यंत दुखी हो कर आहें भरने लगा। इतने ही में एक विश्वसनीय दासी ने शमसुन्निहार से कहा कि आप बैठी क्या कर रही हैं, नौकर-चाकर आने लगे हैं और खलीफा किसी भी समय आ सकते हैं। शमसुन्निहार ने सर्द आह खींच कर कहा कि भगवान भी कैसा निर्दयी है कि मिलन होते ही विरह का दुख हम पर डाल दिया। यह कह कर उसने दासी से कहा, इन दोनों को ले जा कर उस मकान में रखो जो बाग के दूसरे कोने पर है। इन्हें बिठा कर मकान में ताला लगा देना। फिर अवसर पाने पर इन्हें मकान के गुप्त द्वार से निकाल कर दजला नदी के किनारे ले जा कर नाव पर बिठा देना।

यह कह कर उसने शहजादे का आलिंगन कर के उसे विदा किया। दासी ने होशियारी के साथ शहजादे और व्यापारी को दजला नदी के तटवाले मकान में पहुँचा कर कहा कि तुम बेखटके यहाँ रहो, किसी को पता नहीं चलेगा। यह कह कर दासी तो मकान में बाहर से ताला लगा कर चली गई किंतु यह दोनों काफी देर तक इधर-उधर घूम कर देखते रहे कि शायद कहीं भागने का रास्ता मिल जाए, किंतु उन्हें कोई रास्ता नहीं मिला। फिर उन्होंने झरोखे से देखा कि खलीफा के अंगरक्षक पैदल और सवार बाग में आ रहे हैं। यह देख कर इन दोनों के प्राण सूखने लगे। फिर देखा कि एक ओर से बहुत-से नौजवान सेवक हाथों में मोमबत्तियाँ लिए आ रहे हैं, उनके पीछे सौ हथियारबंद अंगरक्षक हैं और उनके मध्य खलीफा और उसका प्रधान भृत्य मसरूर हैं। जब खलीफा रात को किसी प्रेयसी के घर जाता था तो पूरी सुरक्षा का प्रबंध किया जाता था।

शमसुन्निहार अपने मकान से निकल कर बीस सुंदर सुसज्जित दासियों के साथ खलीफा के स्वागत के लिए बाग में आ खड़ी हुई। उसके साथ ही दासियाँ स्वागत गान गाने लगीं। खलीफा आया तो शमसुन्निहार आगे बढ़ी और उसने सिर खलीफा के पाँवों पर रख दिया। खलीफा ने उसे उठा कर सीने से लगाया और कहा, तुम पैरों पर न गिरो, मेरे बगल में बैठो ताकि मैं तुम्हारे सौंदर्य को देख कर तृप्त होऊँ। शमसुन्निहार खलीफा के बगल में बैठी और उसने एक गानेवाली को इशारा किया। गानेवाली ने एक विरह संबंधी गीत बड़े करुण स्वर में गाया। खलीफा ने समझा कि यह मेरी उपेक्षा से पैदा हुए अपने विरह दुख की अभिव्यक्ति करना चाहती है जब कि वास्तविकता यह थी कि शमसुन्निहार शहजादे के विरह में अपनी दशा की अभिव्यक्ति चाहती थी।

शमसुन्निहार यह विरह गीत सुन कर इतनी विह्वल हुई कि गश खा कर गिरने लगी। दासियों ने दौड़ कर उसे सँभाला। उधर शहजादा भी उस गीत को सुन कर इतना व्याकुल हुआ कि अचेत हो कर गिर पड़ा। उसे व्यापारी ने सँभाला। कुछ ही क्षणों में वही विश्वस्त दासी आ कर व्यापारी से कहने लगी, तुम दोनों का यहाँ रहना ठीक नहीं है, जल्दी से जल्दी यहाँ से चले जाओ। वहाँ सभा के रंग-ढंग अच्छे नहीं दिखाई देते। किसी क्षण भी कोई बात हो सकती है। व्यापारी बोला, तुम यह तो देखो कि शहजादा बेहोश हो गया है, ऐसी दशा में हम लोग बाहर किस तरह जा सकते हैं।

दासी झपट कर पानी और बेहोशी में सुँघानेवाली दवा ले आई और इस तरह शहजादा अपने होश में आया।

अब व्यापारी ने शहजादे से कहा कि हम लोगों का यहाँ रहना खतरनाक है, हमें तुरंत यहाँ से चल देना चाहिए। इसके बाद वह दासी दोनों को गुप्त द्वार से बाहर निकाल कर उस नहर पर लाई जो बाग से हो कर जाती थी और दजला नदी से मिलती थी। वहाँ पहुँच कर उसने धीरे से आवाज लगाई। एक आदमी नाव खेता हुआ उस स्थान पर आ गया। दासी ने उन दोनों को नाव पर बिठा दिया। माँझी शीघ्रता से नाव खेता हुआ दजला नदी में ले गया। शहजादे की हालत अब भी खराब थी। व्यापारी उसे बराबर समझाता जा रहा था कि तुम अपने को सँभालो, हमें दूर जाना है, अगर इस अरसे में हमें गश्त के सिपाही मिल गए तो हमारी जान के लाले पड़ जाएँगे क्योंकि वे हमें चोर समझेंगे।

खुदा-खुदा कर के यह लोग एक सुरक्षित स्थान पर नाव से उतरे। किंतु न शहजादे की मानसिक अवस्था ही ठीक थी न उसमें चलने की शक्ति ही अधिक थी। व्यापारी इसी चिंता में था कि क्या किया जाए। अचानक उसे याद आया कि उस जगह के समीप ही उसका एक मित्र रहता है। वह शहजादे को किसी तरह खींचखाँच कर अपने मित्र के घर ले गया। मित्र उसे देखते ही दौड़ा आया। उसने दोनों को अपनी बैठक में ला कर बिठाया और पूछा कि तुम ऐसी हालत में कहाँ से आए हो। व्यापारी ने कहा, अजीब झंझट में पड़ा हूँ। एक आदमी पर मेरा काफी रुपया उधार है। मुझे मालूम हुआ कि वह शहर छोड़ कर भागा जा रहा है। मुझे उसका पीछा कर के अपना रुपया वसूल करने की चिंता हुई। यह आदमी जो मेरे साथ है उस भगोड़े को जानता है। इसकी मदद से मैंने उसका पीछा किया। किंतु मेरा यह साथी रास्ते में अचानक बीमार हो गया। वह भगोड़ा भी मेरे हाथ से निकल गया और इस बीमार साथी को भी मुझे सँभालना पड़ रहा है। अब हम लोग रात को यहाँ रहेंगे और सुबह ही यहाँ से चलेंगे।

व्यापारी का मित्र शहजादे की चिकित्सा का यत्न करने लगा किंतु व्यापारी ने कहा कि तुम कुछ चिंता न करो, यह रात भर आराम से सोएगा तो सुबह घर जाने योग्य हो जाएगा। मित्र ने दोनों के बिस्तर एक हवादार कमरे में लगा दिए। शहजादा सो तो गया किंतु कुछ ही देर में उसने स्वप्न देखा कि शमसुन्निहार मूर्छित हो कर खलीफा के पाँवों में गिर पड़ी है। वह जाग कर फिर रोने-बिसूरने लगा। व्यापारी भी खुदा-खुदा कर के रात काट रहा था ताकि सुबह होते ही अपने घर पहुँचे। वह जानता था कि उसके घरवाले चिंता में पड़े होंगे क्योंकि वह कभी रात को घर से बाहर नहीं रहता था। सुबह होते ही वह मित्र से विदा हुआ और शहजादे को ले कर अपने घर पहुँचा। उसे देख कर घरवालों को धैर्य हुआ। उसने बात बना दी कि व्यापार के एक जरूरी काम से उसे अचानक बाहर जाना पड़ गया था। अपने हृदय में वह भगवान को धन्यवाद देता था कि कितनी खतरनाक जगह से प्राण बचा कर निकल आने में सफल हुआ था।

शहजादा दो-तीन दिन व्यापारी के घर रहा, फिर उसके रिश्तेदार आए और उसे उसके घर ले गए। विदा होते समय शहजादे ने व्यापारी से कहा, भाई तुम मेरी दशा को भुला न देना। जब से मैंने स्वप्न में शमसुन्निहार को अचेत देखा है मेरी अवस्था बड़ी शोचनीय हो गई है। उसका कुछ हाल मिले तो मुझ से जरूर कहलवा देना। व्यापारी ने कहा, तुम चिंता न करो। वह विशेष दासी जरूर शमसुन्निहार का समाचार मुझ तक पहुँचाएगी।

व्यापारी दो-तीन दिन बाद शहजादे को देखने उसके घर गया तो देखा कि वह बिस्तर पर पड़ा कराह रहा है और उसके रिश्तेदार और कई हकीम उसके बिस्तर के आसपास बैठे परिचर्चा कर रहे हैं। उन लोगों ने व्यापारी को बताया कि हकीम लोग बहुत प्रयत्न कर रहे हैं किंतु शहजादे को कोई लाभ नहीं हो रहा है। दो क्षण बाद शहजादे ने आँखें खोलीं और व्यापारी को देख कर मुस्कुराया बल्कि हँसने भी लगा। हँसी के दो कारण थे। एक तो यह कि व्यापारी आया है और शमसुन्निहार की खबर लाया होगा, दूसरा कारण यह है कि हकीम लोग बेकार ही सिर खपा रहे हैं क्योंकि इस रोग का उनके पास कोई इलाज नहीं है।

शहजादे ने हकीमों और रिश्तेदारों से कहा, मैं इनसे अकेले में बात करना चाहता हूँ। उनके जाने पर उसने व्यापारी से कहा, मित्र, तुम देख रहे हो कि इस अनिंद्य सुंदरी का वियोग मुझे किस तरह घुला-घुला कर मारे डालता है। सारे कुटुंबीजन और मित्रगण मेरी यह अवस्था देख कर बराबर दुखी रहते हैं। उन लोगों को दुखी देख कर मेरा दुख और बढ़ता है। मुझे अपना हाल उनसे कहने में लज्जा भी आती है इसलिए मैं जी ही जी में घुटता जा रहा हूँ। तुम्हारे आने से मुझे बड़ा धैर्य हुआ। अब तुम बताओ कि शमसुन्निहार का क्या समाचार लाए हो। उस दासी ने तुम से कब बात की ओर अपनी स्वामिनी का क्या हाल बताया।

व्यापारी ने बताया कि दासी अभी तक नहीं आई है। शहजादा यह सुन कर आँसू बहाने लगा। व्यापारी ने कहा कि तुम्हें चाहिए कि अपने को सँभालो, रोने से कुछ भला तो होना नहीं है। शहजादा बोला कि मैं क्या करूँ, मैं लाख अपने को सँभालता हूँ किंतु सँभाल नहीं पाता। व्यापारी ने कहा, तुम बेकार की चिंता न करो। दासी आज नहीं तो कल आएगी ही और शमसुन्निहार की कुशलता का समाचार देगी। इस प्रकार उसे बहुत कुछ धैर्य बँधा कर व्यापारी अपने घर आया। घर आ कर देखा कि शमसुन्निहार की दासी उसकी प्रतीक्षा कर रही है। उसने व्यापारी से कहा कि अपना हाल बताओ कि तुम पर और शहजादे पर महल से निकल कर क्या बीती क्योंकि विदा के समय शहजादे की हालत अच्छी नहीं थी। व्यापारी ने मार्ग के कष्ट और शहजादे की लंबी खिंचती बीमारी का उल्लेख किया।

दासी ने कहा, स्वामिनी का भी वही हाल है जो शहजादे का है। तुम्हें विदा कर के जब मैं उनके महल में गई तो देखा कि बेहोश है। खलीफा को भी आश्चर्य था कि वह बेहोश क्यों हो गई।

उसने हम लोगों से इस बेहोशी का कारण पूछा तो हम असली भेद को छुपा गए। हमने कहा, हमें कुछ नहीं मालूम। हम लोग केवल रोते-धोते रहे। कुछ देर में स्वामिनी की आँखें खुलीं।

खलीफा ने पूछा, शमसुन्निहार, यह बेहोशी तुम्हें क्यों आ गई। स्वामिनी ने कहा, आप ने अचानक मुझ पर इतनी कृपा की कि स्वयं आ कर कृतार्थ किया। इसी आनंदातिरेक को मैं न सँभाल सकी और अचेत हो गई। मैं बड़ी हतभागिनी हूँ कि आपने तो मुझ पर इतनी कृपा की और मैंने आपको चिंता में डाला।

खलीफा ने कहा, हम जानते हैं कि तुम्हें हम से बड़ा प्रेम है। हम इस बात से बड़े प्रसन्न भी हैं। अब तुम किसी और कमरे में न जाना, यहीं बिस्तर लगवा कर सो जाना। ऐसा न हो कि चलने-फिरने से तुम्हारी तबीयत और खराब हो जाए। यह कह कर खलीफा ने विदा ली। उसके जाने के बाद स्वामिनी ने मुझे संकेत से अपने पास बुलाया और तुम लोगों को हाल पूछा। मैंने कहा कि वे दोनों आनंदपूर्वक सकुशल यहाँ से चले गए। मैंने उन्हें शहजादे के बेहोश हो जाने की बात नहीं बताई। फिर भी उसने रो कर कहा, शहजादे, न जाने मेरे विछोह में तुम पर क्या बीती होगी। यह कह कर वे फिर बेहोश हो गईं। दासियों ने दौड़ कर उनके मुँह पर बेदमुश्क का अरक छिड़का तो वे होश में आईं। मैंने कहा, स्वामिनी, क्या आप इस तरह जान देंगी। और हम सब को मारेंगी। आप को अपने प्रिय शहजादे की सौगंध है, अपना मन दूसरी बातों से बहलाएँ। उन्होंने कहा, तुम ठीक कहती हो लेकिन मैं क्या करूँ, मन ही वश में नहीं है। फिर उसने दासी को हटा दिया सिर्फ मुझे अपने पास रहने को कहा। रात भर वह शहजादे का नाम ले-ले कर रोती रही। सुबह मैं उसे उठा कर उसके मुख्य विश्राम कक्ष में ले गई। वहाँ खलीफा के आदेश से भेजा हुआ हकीम पहले ही से मौजूद था। कुछ देर में खलीफा स्वयं वहाँ आ गए। दवा-दारू की गई लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हुआ। उल्टे उसकी दशा और गंभीर होती गई। दो दिन बाद उसे रात को थोड़ी देर के लिए नींद आई। सुबह उठ कर उन्होंने मुझे आज्ञा दी कि मैं तुम्हारे पास आऊँ और शहजादे का समाचार ला कर उन्हें दूँ। व्यापारी ने कहा, उनसे कहो, शहजादा बिलकुल ठीकठाक है किंतु शमसुन्निहार की बीमारी की बात सुन कर बड़ा चिंतित है। उनसे यह भी कहना कि वे ध्यान रखें कि खलीफा के सामने उनके मुँह से कोई ऐसी बात न निकल जाए जिससे हम सब मुसीबत में फँस जाएँ।

व्यापारी ने दासी से यह कह कर उसे विदा किया और स्वयं शहजादे के समीप गया और उसे बताया कि शमसुन्निहार ने तुम्हारा हाल पूछने के लिए दासी भेजी थी। उसने दासी से सुनी हुई बातें विस्तारपूर्वक शहजादे को बताईं। शहजादे ने व्यापारी को रात भर अपने पास रखा। सुबह व्यापारी अपने घर आया। कुछ ही देर हुई थी कि शमसुन्निहार की दासी उसके पास आई और उसे सलाम कर के कहा कि स्वामिनी ने यह पत्र शहजादे के लिए भेजा है। व्यापारी उस दासी को ले कर शहजादे के पास गया और बोला कि शमसुन्निहार ने तुम्हारे लिए यह पत्र भेजा है और साथ ही अपनी दासी को तुम्हारी कुशलता जानने के लिए भेजा है। शहजादा यह सुन कर उठ बैठा। उसने दासी को बुला कर पत्र उससे लिया और पत्र को चूम कर उसे आँखों से लगाया। पत्र में शमसुन्निहार ने अपनी वियोग व्यथा का वर्णन किया था। शहजादे ने उसका उत्तर लिख कर दासी को दे दिया।
 
शहजादे से विदा हो कर दासी और व्यापारी अपने-अपने घर गए। व्यापारी चिंता में पड़ गया कि यह दासी रोज-रोज मेरे पास आती है और मुझे रोज-रोज उसे ले कर शहजादे के पास जाना पड़ता है। शहजादा और शमसुन्निहार तो एक-दूसरे के प्रेम में पागल हैं किंतु अगर खलीफा को पता चलेगा तो मैं मुफ्त में मारा जाऊँगा, मेरी सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी और क्या जाने जान पर भी बन आए और मेरे परिवार पर भी मुसीबत पड़े। इससे अच्छा है कि मैं यह नगर ही छोड़ दूँ और कहीं और जा बसूँ। एक दिन व्यापारी इसी चिंता में अपनी दुकान पर बैठा था कि उसका एक मित्र जो जौहरी था उससे मिलने को आया। वह बराबर व्यापारी के पास शमसुन्निहार की दासी को आते और फिर दोनों को शहजादे के पास आते देख रहा था। व्यापारी को चिंतित देख कर वह समझा कि इस पर कोई बड़ी विपत्ति पड़ी है। अतएव उसने पूछा कि खलीफा के महल की दासी तुम्हारे पास क्यों आया करती है। व्यापारी को इस प्रश्न से भय हुआ। उसने कहा कि यूँ ही कुछ लेन-देन के काम से आती है। जौहरी ने कहा, लेन-देन नहीं, कोई और बात है। व्यापारी ने जब देखा कि जौहरी को उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ तो उसने तय किया कि उसे पूरा हाल बता ही देना ठीक है। उसने भेद गुप्त रखने का वचन ले कर उससे कहा, शमसुन्निहार और फारस का शहजादा एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और मेरी मध्यस्थता से एक-दूसरे का हाल पाते हैं, मैं सोचता हूँ कि कहीं यह बात खलीफा को ज्ञात हो गई तो भगवान जाने मेरा क्या हाल होगा। इसलिए अब मैं सोचता हूँ कि यहाँ का कारोबार समेट कर बसरा चला जाऊँ और वहीं बस जाऊँ।

जौहरी को यह सुन कर आश्चर्य हुआ। कुछ देर में उसने विदा ली। दो दिन बाद वह व्यापारी की दुकान पर आया तो उसे बंद पाया। वह समझ गया कि व्यापारी यहाँ का हिसाब समेट कर बसरा को चला गया है। जौहरी के हृदय में शहजादे के लिए बड़ी करुणा उपजी। बेचारे का एकमात्र सहारा वह व्यापारी था और वह भी चला गया इसीलिए उसने सोचा कि व्यापारी के स्थान पर वह स्वयं शहजादे का सहायक हो जाए। वह शहजादे के पास गया। शहजादे ने यह जान कर कि वह एक प्रतिष्ठित जौहरी है उसका सम्मान किया और बिस्तर से उठ कर बैठ गया और पूछा कि मेरे लायक क्या काम है। जौहरी ने कहा, यद्यपि मैं पहली बार आपसे मिला हूँ तथापि मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। इस समय एक बात पूछना चाहता हूँ। शहजादे ने कहा कि जो पूछना चाहें खुशी से पूछिए।

जौहरी ने कहा, अमुक व्यापारी आपका बड़ा मित्र था। आप मुझे भी उसी की तरह विश्वसनीय समझिए। वह कह रहा था कि मैं बगदाद छोड़ कर बसरा जा बसूँगा। आज मैं उसकी दुकान पर गया तो बंद पाया। मैं समझता हूँ कि व्यापारी वास्तव में बसरा में जा बसा है। क्या आप बता सकेंगे कि उसके बगदाद छोड़ने और बसरा जाने के क्या कारण हैं।

शहजादा जौहरी की बात सुन कर पीला पड़ गया और बोला, क्या तुम्हारी यह बात ठीक है कि व्यापारी बगदाद छोड़ गया? जौहरी ने कहा कि मेरा तो यही विचार है। शहजादे ने अपने एक नौकर से कहा कि व्यापारी के घर जा कर पता लगाए कि वह कहाँ है। सेवक ने कुछ देर बार आ कर कहा कि व्यापारी के घरवाले कहते हैं कि वह दो दिन हुए बसरा चला गया है और वहीं रहेगा। नौकर ने चुपके से यह भी बताया कि किसी अमीर महिला की दासी आप से मिलने आई है। शहजादा समझ गया कि शमसुन्निहार की ही दासी होगी। उसने उसे बुलाया। जौहरी उसके आने के पहले उठ कर दूसरे कक्ष में जा बैठा। दासी ने आ कर शहजादे की दशा अधिक अच्छी देखी और उससे कुछ बातें कर के विदा हुई।

अब जौहरी फिर आ कर शहजादे के पास बैठा और कहने लगा कि आपका तो खलीफा के महल से बड़ा संपर्क जान पड़ता है। शहजादे ने चिढ़ कर कहा, तुम यह कैसे कहते हो? क्या तुम्हें मालूम है कि यह स्त्री कौन है। जौहरी ने कहा, मैं इसको और इसकी स्वामिनी को अच्छी तरह जानता हूँ। यह खलीफा की चहेती सेविका शमसुन्निहार की दासी है और अपनी मालकिन के साथ आया करती है जो कि मेरे दुकान से जवाहारात खरीदने आती-रहती है। मैंने इसे कई बार उस व्यापारी के पास भी आते-जाते देखा है।

शहजादा यह सुन कर डर गया कि यह आदमी हमारे सारे भेद जानता है। वह एक क्षण चुप रह कर बोला, मुझ से सच-सच कहो कि क्या तुम इस दासी के यहाँ आने का भेद जानते हो। जौहरी ने व्यापारी से हुई सारी बातें शहजादी को बताईं और कहा, मैं आपके पास इसी कारण से उपस्थित हुआ हूँ। व्यापारी के चले जाने के बाद मुझे आप पर बड़ी दया आई कि आपका मध्यस्थ कौन होगा। मैंने तय किया कि व्यापारी की जगह मैं ही आपका विश्वासपात्र सेवक बन कर कार्य करूँ। मुझसे अधिक विश्वसनीय व्यक्ति आपको और कोई नहीं मिलेगा।

शहजादे को उसकी बातें सुन कर धैर्य हुआ। उसने अपने मन का भेद जौहरी को बताया किंतु साथ ही कहा, भाई, मुझे तो तुम पर पूरा विश्वास है किंतु शमसुन्निहार की दासी ने तुम्हें यहाँ बैठे देख लिया है। वह तुमसे खुश नहीं मालूम होती। वह कह रही थी कि तुम्हीं ने व्यापारी को यह नगर छोड़ कर बसरा जा बसने की सलाह दी है। दासी ने यह बात अपनी स्वामिनी से भी कही होगी। ऐसी दशा में तुम मध्यस्थ किस तरह बन सकते हो।

जौहरी ने कहा, मैंने व्यापारी को शहर छोड़ने की सलाह नहीं दी। हाँ, यह जरूर है कि जब उसने मुझ से कहा कि मैं बसरा में बसना चाहता हूँ तो मैंने उसे रोका नहीं। मैंने सोचा कि इस व्यक्ति को अपनी प्रतिष्ठा और अपनी जान बचाने की चिंता है तो उसे क्यों रोका जाए। शहजादे ने कहा, तुम्हारी बात मेरी समझ में आती है और मुझे तुम पर पूरा विश्वास है किंतु शमसुन्निहार की दासी ने अपनी स्वामिनी से भी यही बात कही होगी जो मुझसे कही है। अब यह जरूरी हो गया है कि जैसे तुमने मुझे अपनी सदाशयता का विश्वास दिलाया है वैसे ही अपने प्रति दासी में भी विश्वास पैदा करो ताकि शमसुन्निहार भी तुम्हें विश्वस्त समझे।

इस प्रकार दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे और परामर्श करते रहे कि दोनों प्रेमीजनों के मिलन की क्या सूरत निकल सकती है। फिर वह जौहरी शहजादे से विदा ले कर अपने घर गया। शहजादे ने दासी को विदा करते समय कहा था कि अब की बार आना तो शमसुन्निहार से मेरे लिए पत्र लिखवा कर लाना। दासी ने महल में जा कर व्यापारी को शहर छोड़ जाने और शहजादे की पत्र पाने की इच्छा की बातें शमसुन्निहार को बताईं। शमसुन्निहार ने एक लंबा पत्र लिखा जिसमें अपनी विरह-दशा का कारुणिक वर्णन था और इस बात पर भी दुख प्रकट किया गया था कि हम लोगों का मध्यस्थ व्यापारी शहर छोड़ कर चला गया है।

दासी पत्र ले कर शहजादे के पास आने लगी तो रास्ते में उसके हाथ से पत्र गिर गया। दस-बीस कदम आगे जा कर उसने अपनी जेब में पत्र न देखा तो उलटे पाँव लौटी। मार्ग में उसने जौहरी को वह पत्र पढ़ते हुए पाया। इससे दोनों में कहा-सुनी हुई। दासी ने कहा, यह मेरा पत्र है, मुझे वापस दो। जौहरी ने उसकी बात पर ध्यान न दिया और पत्र पढ़ता रहा और फिर अपने घर को चल पड़ा। दासी भी पत्र वापस करने का तकाजा करती हुई उसके पीछे-पीछे चली। जौहरी के घर पहुँच कर उसने कहा, तुम मुझे यह पत्र दे दो। यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है। तुम्हें तो यह भी नहीं मालूम है कि यह पत्र किसने किसके नाम लिखा है। जौहरी ने उसे एक जगह दिखा कर बैठने का इशारा किया।

दासी बैठ गई तो जौहरी ने कहा, यद्यपि इस पत्र पर न लिखनेवाले का नाम है न पानेवाले का नाम तथापि मुझे मालूम है कि यह पत्र शमसुन्निहार ने शहजादा अबुल हसन को लिखा है। दासी यह सुन कर घबरा गई। जौहरी ने कहा, मैं तुम्हें रास्ते ही में यह पत्र दे देता किंतु मुझे तुम से कुछ पूछना है, इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ ले आया। तुम सच-सच बताओ कि क्या तुमने शहजादे से यह नहीं कहा कि इस जौहरी ने व्यापारी को बगदाद छोड़ने की राय दी है। दासी ने स्वीकार किया कि उसने यही कहा है। जौहरी बोला, तू मूर्ख है। मैं तो चाहता हूँ कि अब व्यापारी के बदले मैं ही शहजादे की सहायता करूँ। तू उलटा ही समझे है। निःसंदेह मैंने ही शहजादे को व्यापारी के शहर छोड़ने का समाचार दिया था। पहले शहजादा मुझसे सशंकित था किंतु मेरे विश्वास दिलाने पर उसने सारा भेद मुझसे कह दिया। अब तू मुझे व्यापारी की जगह इस बात में पूरा विश्वासपात्र समझ और अपनी स्वामिनी से भी कहना कि जौहरी तुम्हारी और शहजादे की प्रसन्नता के लिए अपनी प्रतिष्ठा ही नहीं, अपने प्राण भी दाँव पर लगा देगा।

दासी ने कहा, शहजादा अबुल हसन और शमसुन्निहार दोनों बड़े भाग्यशाली हैं कि व्यापारी चला गया तो तुम जैसा बुद्धिमान सहायक उन्हें मिला। मैं तुम्हारी सद्भावना की पूरी बात अपनी स्वामिनी से कहूँगी। जौहरी ने पत्र उसे दे दिया और कहा कि शहजादा उसके उत्तर में जो कुछ लिखे वह भी मुझे लौटते समय दिखाती जाना और साथ ही हमारी इस समय की बातचीत भी शहजादे को बता देना।

दासी पत्र ले कर शहजादे के पास गई। उसने तुरंत ही उस का उत्तर लिख दिया। दासी ने अपने वचन के अनुसार शहजादे का पत्र भी जौहरी को दिखाया। वह शमसुन्निहार के पास पहुँची और शहजादे का पत्र उसे दे कर जौहरी की भी बड़ी प्रशंसा करने लगी। दूसरे दिन सुबह वह फिर जौहरी के पास आई और बोली, मैंने अपनी स्वामिनी से वह सब कहा जो आप ने मुझ से कहा था। वह यह सुन कर अति प्रसन्न हुईं कि व्यापारी चला गया फिर भी आप उसका स्थान ले कर प्रेमियों के बीच मध्यस्थता के लिए प्रस्तुत हैं। मैंने आपकी शहजादे से हुई बातें भी उन्हें बताईं और कहा कि आप उससे भी बढ़ कर हैं। वह और भी खुश हुई और कहने लगी कि मैं चाहती हूँ कि ऐसे भले मानस से भेंट करूँ जो बगैर कहे और बगैर पूर्व परिचय के खतरा उठा कर भी दूसरों की सहायता करने को राजी हो जाता है। मैं स्वयं उसकी बुद्धि और चतुरता देखना चाहती हूँ और तू उसे कल यहाँ ले आ।

जौहरी चिंतित हो कर बोला, शमसुन्निहार मुझे भी व्यापारी इब्न ताहिर जैसा समझे है। इब्न ताहिर को तो राजमहल में सब जानते थे और द्वारपाल उसे बे रोक-टोक आने देते थे। मुझे कौन आने देगा?

दासी ने कहा, जो कुछ आप कहते हैं वह बिल्कुल ठीक है। लेकिन शमसुन्निहार मूर्ख नहीं है। उसने आप को बुलाया है तो आगा-पीछा सोच ही लिया होगा। आप बेधड़क हो कर मेरे साथ चलिए, आपको कोई परेशानी न होगी। आपको कुशलतापूर्वक आपके घर पहुँचाने की जिम्मेदारी मेरी रही। इस प्रकार दासी ने उसे बहुत दिलासा दिया किंतु वह किसी प्रकार भी राजमहल में जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।

फिर वह दासी शमसुन्निहार के पास पहुँची और उससे कहा कि जौहरी यहाँ आने से डरता है और मेरे लाख समझाने पर भी आने को राजी नहीं होता। शमसुन्निहार ने थोड़ी देर सोच कर कहा, उसका डरना ठीक ही है। मैं स्वयं ही गुप्त रूप से यहाँ से निकल कर उससे उसके घर में मिलूँगी। तुम जा कर उसे बता दो कि मैं उसके घर आ कर उससे बात करना चाहती हूँ। दासी ने ऐसा ही किया। जौहरी के घर जा कर उसने कहा, आप कहीं बाहर न जाएँ। कुछ ही देर में मैं मालकिन को ले कर आपके यहाँ आती हूँ।

यह कह कर दासी वापस फिरी और कुछ देर में शमसुन्निहार को ले कर जौहरी के घर पहुँची। जौहरी ने बड़े आदरपूर्वक शमसुन्निहार का स्वागत कर के उसे उच्च स्थान पर बिठाया। जब शमसुन्निहार ने अपने चेहरे से नकाब उतारा तो जौहरी उसे देखता ही रह गया। उसने सोचा कि अगर शहजादा इस स्वर्गोपम सौंदर्य के पीछे पागल है तो क्या आश्चर्य है। फिर शमसुन्निहार उससे बातें करने लगी। अपने प्रेम का पूरा वर्णन करने के बाद उसने कहा, मुझे तुझसे मिल कर बहुत प्रसन्नता हुई है। भगवान की बड़ी कृपा है कि इब्न ताहिर के चले जाने के बाद उसने हम दो प्रेमियों को तुम्हारे जैसा सहायक दिया है। अब मैं विदा होती हूँ, भगवान तुम्हारी रक्षा करें।

शमसुन्निहार के जाने के बाद जौहरी शहजादे के पास गया। शहजादे ने उसे देखते ही कहा, मित्र, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। कल शमसुन्निहार की दासी ने मुझे उसका पत्र ला कर दिया किंतु उससे तो मेरी विरह व्यथा और बढ़ गई। क्या यह संभव नहीं है कि परम सुंदरी शम्सुनिहार कृपा कर के स्वयं ही कोई उपाय ऐसा करे जिससे हम दोनों का मिलन हो। इब्न ताहिर होता तो शायद कोई रास्ता निकलता। उसके जाने के बाद मेरी समझ में नहीं आता कि मैं किस तरह शमसुन्निहार से मिलूँ।

जौहरी ने कहा, इतना निराश होने की जरूरत नहीं है। मैंने आपके उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो उपाय सोचा है उससे बढ़ कर कोई उपाय नहीं हो सकता। यह कह कर जौहरी ने सविस्तार शहजादे को बताया कि किस प्रकार मैंने दासी को राजी किया और किस तरह शमसुन्निहार ने मेरे घर आ कर मुझसे बातचीत की। उसने कहा कि आप दोनों की भेंट अवश्य होगी किंतु मेरा या आपका राजमहल में जाना ठीक नहीं है, मैं एक सुंदर भवन को किराए पर लेने का प्रबंध करूँगा जहाँ आप दोनों मिल सकें।

शहजादा यह सुन कर बड़ा खुश हुआ। उसने जौहरी का बड़ा आभार प्रकट किया और कहा कि तुम जैसा कहोगे वैसा ही करूँगा। जौहरी उससे विदा हो कर अपने घर आया। दूसरे दिन दासी फिर आई। जौहरी ने कहा, बहुत अच्छा हुआ कि तुम आई, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। दासी ने कारण पूछा तो जौहरी ने कहा कि शहजादे का विरह में बुरा हाल है, तुम जैसे भी हो शमसुन्निहार को लाओ ताकि दोनों का मिलन हो सके।

दासी ने कहा, स्वामिनी का भी शहजादे के विरह में यह हाल है जैसे कोई मछली गर्म बालू पर तड़प रही हो। किंतु आपका घर बहुत छोटा है, उन दोनों के मिलन के योग्य नहीं है। जौहरी ने कहा कि मैंने एक बड़ा मकान ठीक किया है, तुम मेरे साथ चल कर उसे देख लो। दासी ने उसके साथ वह मकान देखा और पसंद किया और बोली कि मैं अभी आती हूँ, अगर स्वामिनी आने को राजी होती हैं तो मैं उन्हें ले कर तुरंत आ जाऊँगी। दासी विदा हो कर कुछ ही देर में फिर जौहरी के पास आ गई और जौहरी को अशर्फियों की एक थैली दे कर बोली, यह स्वामिनी ने इसलिए भिजवाई है कि आप उस बड़े मकान में आवश्यक साज-सज्जा करा लें और नाश्ते, पलंग, मसनद आदि वहाँ पर तैयार रखें। यह कह कर दासी चली गई और इधर जौहरी ने अपने व्यापारी मित्रों के यहाँ से कई सोने-चाँदी के बरतनों और गद्दे, तकिया, मसनद, पर्दे आदि मँगवा कर उक्त मकान को सजा दिया।

सारा प्रबंध करने के बाद वह शहजादे के पास गया और उससे अपने साथ चलने को कहा। शहजादा उत्तम और सजीले कपड़े पहन कर जौहरी के साथ चला। जौहरी उसे सुनसान गलियों से हो कर बड़े मकान में ले आया। शहजादा मकान और साज-सज्जा को देख कर प्रसन्न हुआ और जौहरी से इधर-उधर की बातें करता रहा। दिन ढला और शमसुन्निहार अपनी उसी विशिष्ट दासी तथा अन्य दासियों को ले कर वहाँ गई। शहजादा और शमसुन्निहार दोनों एक-दूसरे को देख कर ऐसे प्रसन्न हुए जिसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। बहुत देर तक तो वे बगैर बोले-चाले एक दूसरे को एकटक देखते ही रहे।

फिर दोनों ने अपनी-अपनी विरह व्यथा का इतने कारुणिक रूप से वर्णन किया कि जौहरी की आँखों में आँसू आ गए और शमसुन्निहार की तीनों दासियाँ रोने लगीं। जौहरी ने उन दोनों को तसल्ली दी और धैर्य से काम लेने के लिए समझाया-बुझाया। फिर दोनों को उस जगह लाया जहाँ जलपान की व्यवस्था थी। जलपान के उपरांत वे लोग वहाँ पर आ कर मसनदों पर बैठे जहाँ से उठ कर नाश्ता करने गए थे। वे एक-दूसरे से प्रीतिपूर्वक वार्तालाप करने लगे। शमसुन्निहार ने पूछा कि यहाँ कोई बाँसुरी तो नहीं होगी। जौहरी ने सारा प्रबंध पहले ही कर रखा था। उसने एक बाँसुरी ला कर दे दी। शमसुन्निहार ने बाँसुरी पर बड़ी देर तक प्रेम और विरह को व्यक्त करनेवाली एक धुन बजाई। इसके बाद शहजादे ने भी उसके जवाब में उसी बाँसुरी पर बड़ी कारुणिक ध्वनि में एक विरह-राग निकाला।

इतने ही में मकान के बाहर बड़ा शोरगुल सुनाई दिया। दो क्षण बाद जौहरी का एक नौकर दौड़ा-दौड़ा आया और बोला कि द्वार पर बहुत-से आदमी जमा हैं और वे द्वार तोड़ कर अंदर आना चाहते हैं। उसने कहा कि जब मैंने उनसे पूछा कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो तो उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया और मैं जान बचा कर द्वार बंद कर के अंदर भाग गया। यह सुन कर जौहरी स्वयं द्वार पर गया कि देखे कि क्या बात है। द्वार खोला तो देखा कि सौ आदमी हाथों में नंगी तलवारें लिए खड़े हैं। उसकी हिम्मत न उनसे बात करने की हुई न अंदर वापस आने की। वह एक पड़ोसी की, जिसे वह पहले से जानता था, दीवार पर चढ़ कर उसके मकान में कूद पड़ा। उसने पड़ोसी को बताया कि मुझ पर क्या बीत रही है। पड़ोसी ने उसे घर के एक कोने में छुपा लिया।

आधी रात को पड़ोसी की तलवार ले कर जौहरी बाहर निकला क्योंकि उस समय सारा शोर थम गया था और निस्तब्धता छा गई थी। बड़े मकान में देखा तो उसे सुनसान पाया। न वहाँ शहजादा या शमसुन्निहार या उनकी दासियाँ थीं न कोई साज सामान या बरतन-भाँडे। मकान में घूमते-घूमते एक कोने में उसे एक आदमी का शब्द सुनाई दिया। उसने पूछा, कौन हो? छुपे हुए आदमी ने उसकी आवाज पहचानी और बाहर निकल आया। वह जौहरी का एक सेवक था।
 
जौहरी ने उससे पूछा कि वे हथियारबंद लोग क्या गश्त के सिपाही थे। उसने कहा वे लोग गश्त के सिपाही नहीं थे बल्कि डाकू थे और सब कुछ लूट कर ले गए, कई दिनों से यह लोग लूट-मार कर रहे हैं और कई मुहल्लों में जा कर कई घरों में डाका डाल चुके हैं।

जौहरी को भी विश्वास हो गया कि वे लोग डाकू ही थे क्योंकि वे सारी चीजें भी लूट कर ले गए थे। उसने शहजादा और शमसुन्निहार के साथ सारा साज-सामान भी गायब देखा तो सिर पीटने लगा कि जिन मित्रों से वह चीजें माँग कर लाया था उन्हें क्या जवाब दूँगा। सेवक ने उसे धैर्य देते हुए कहा, विश्वास रखिए कि शहजादा और शमसुन्निहार दोनों कुशलपूर्वक होंगे। जहाँ तक माँगे की चीजों की बात है उसके बारे में भी आपके मित्र कुछ न कहेंगे क्योंकि इस डाके का समाचार तो सब को मालूम ही हो जाएगा। जौहरी सोचने लगा कि इब्न ताहिर ही अच्छा रहा कि समय रहते निकल गया। मेरा माल तो लूटा ही है, देखो आगे क्या होता है, जान भी बचती है या नहीं।

सवेरा होने पर सारे शहर में डाके का समाचार फैल गया। जौहरी के मित्र भी उसके घर पर सहानुभूति प्रकट करने आए क्योंकि उन्हें मालूम था कि वह मकान उसने किराए पर लिया था। जिन मित्रों से चीजें माँग कर लाया था उन्होंने तो कह दिया कि सामान की चिंता न करो, लेकिन जौहरी को शहजादा और शमसुन्निहार की चिंता होने लगी कि न जाने उन पर क्या बीत रही हो। मित्रों के विदा होने के बाद जौहरी के सेवक उसके लिए भोजन लाए किंतु उसे शमसुन्निहार और शहजादे की चिंता इतनी सता रही थी कि उसने नाममात्र को भोजन किया।

वह इसी तरह चिंता में पड़ा था कि दोपहर को एक सेवक ने उससे कहा कि एक आदमी आप से मिलना चाहता है। उस आदमी ने अंदर जा कर जौहरी से कहा कि यहाँ नहीं, अपने किराएवाले बड़े मकान में चलो, वहीं तुमसे बात करूँगा। जौहरी को आश्चर्य हुआ कि इस अजनबी को यह कैसे मालूम है कि मैंने कोई मकान किराए पर लिया था। आदमी उसे घुमावदार गलियों से हो कर ले चला और बोला कि इन्हीं गलियों से हो कर डकैत कल तुम्हारे घर आए थे। जौहरी को यह तो आश्चर्य हो ही रहा था कि इसे सब बातें मालूम कैसे हैं, इस बात पर भी आश्चर्य और भय हो रहा था कि वह उसे उसके दूसरे मकान में भी नहीं ले जा रहा था बल्कि कहीं और ही ले जा रहा था।

चलते-चलते शाम हो गई। जौहरी बहुत थक भी गया था और उसका भय भी बहुत बढ़ गया था किंतु उसकी कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। शाम को वे लोग दजला नदी पर पहुँचे और नाव से नदी पार कर के नदी पारवाले क्षेत्र में भी गलियों में चलते-चलते एक मकान के सामने पहुँचे जहाँ खड़े हो कर उस आदमी ने ताली बजाई।

दरवाजा खुलने पर वह आदमी जौहरी को अंदर ले गया। अंदर दस व्यक्ति बैठे थे जिन्होंने जौहरी का स्वागत किया और आदरपूर्वक अपने पास बिठाया। कुछ देर में उनका सरदार आया जिसके बाद सबने भोजन किया। भोजन के बाद उन लोगों ने जौहरी से पूछा कि क्या तुमने कभी पहले भी हमें देखा है। उसने कहा कि न तो मैंने पहले तुम लोगों ही को देखा न नदी पार के इस हिस्से की गलियाँ ही देखीं। फिर उन लोगों ने कहा कि कल रात जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ वह साफ-साफ बताओ। जौहरी ने आश्चर्य से कहा कि तुम लोगों को यह कैसे मालूम कि कल रात मेरे साथ कोई विशेष घटना घटी थी। उन लोगों ने कहा कि हमें यह उस पुरुष और स्त्री से मालूम हुआ जो कल रात तुम्हारे साथ थे लेकिन हम चाहते हैं कि तुम्हारे मुँह से पूरा विवरण सुनें। जौहरी सोचने लगा कि कहीं यही तो वे डाकू नहीं है जो रात को आए थे।

उसने कहा, भाइयो, जो कुछ होना था वह हो गया किंतु मुझे असली चिंता उसी आदमी और उसी सुंदरी की है। तुम लोगों को उनका कुछ हाल मालूम हो तो बताओ। उन लोगों ने कहा कि तुम उन दोनों की चिंता छोड़ दो, वे दोनों कुशलतापूर्वक हैं। उन्होंने जौहरी को दो कक्ष दिखाए और कहा, वे दोनों अलग-अलग इन्हीं कमरो में हैं। उन्हीं से हमें तुम्हारा पता चला है और उन्होंने बताया है कि तुम उनके सहायक और मित्र हो। हम लोगों का काम किसी पर दया करना नहीं है, फिर भी हमने अपने स्वभाव के विपरीत उन दोनों को बड़ी सुख-सुविधा के साथ रखा और उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दिया। और हम तुम्हें भी कोई कष्ट नहीं होने देंगे।

अब जौहरी को विश्वास हो गया कि वे डाकू हैं। उसने उनकी दया के लिए आभार प्रकट किया और शहजादे तथा शमसुन्निहार की प्रेम-कथा आरंभ से पिछली रात तक विस्तारपूर्वक बताई। उन लोगों ने आश्चर्य से कहा, क्या यह सच है कि यह आदमी फारस के शहजादे बका का पुत्र अबुल हसन है और यह स्त्री खलीफा की प्रेयसी शमसुन्निहार है? जौहरी ने कहा कि मैंने जो कुछ कहा है बिल्कुल सच कहा है। जब डाकुओं को जौहरी के कहने का विश्वास हुआ तो उन्होंने एक-एक कर के अबुल हसन और शमसुन्निहार के पास जा कर अपने अपराध के लिए क्षमा-प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि हम लोग आपको जानते नहीं थे इसीलिए हम से यह अपराध हुआ है।

उन्होंने कहा कि हमने जो कुछ आपके घर से लूटा था वह सब का सब तो वापस नहीं कर सकते क्योंकि उसमें से बहुत कुछ हमारे अन्य साथी ले गए हैं किंतु सोने और चाँदी के बरतन जरूर यहाँ है, उन्हें हम वापस कर देंगे। उन डाकुओं ने बरतन दे कर उन तीनों से कहा कि हम तुम्हें सुरक्षापूर्वक नदी के उस पार पहुँचा देंगे। किंतु तुम लोगों को यह वादा करना पड़ेगा कि हमारा भेद नहीं खोलोगे। उन तीनों ने कसम खाई कि हम लोग तुम्हारे बारे में किसी को नहीं बताएँगे।

इसके बाद वे डाकू उन तीनों को एक नाव में बिठा कर नदी के पार तक छोड़ गए। किंतु ज्यों ही वे तीनों तट पर उतरे कि गश्त के सिपाही इधर आ निकले। डाकू तो उन्हें देखते ही अपनी नाव तेजी से खेते हुए भाग गए किंतु गश्तवालों ने इन तीनों को पकड़ लिया और पूछा कि तुम लोग इस निर्जन स्थान में क्या कर रहे थे।

जौहरी ने सच्ची बात न बताई बल्कि कहा कि डाकू दल मेरे घर डाका डाल कर मुझे पकड़ ले गए और इन दोनों को भी मेरे यहाँ से पकड़ ले गए। आज न जाने क्या सोच कर उन्होंने हम सभी को नदी पार पहुँचा दिया और लूटा हुआ कुछ माल भी वापस कर दिया। उसने कहा कि वे लोग जो नाव में नदी पार कर रहे हैं डाकू ही हैं। गश्त के मुखिया ने उसकी बात का विश्वास कर लिया। उसे छोड़ कर शहजादे और शमसुन्निहार से पूछने लगे कि तुम लोग कौन हो और इस सुंदरी को उसके घर से कौन लाया है। इस पर शहजादा तो कुछ न बोला किंतु शमसुन्निहार ने गश्ती दल के मुखिया को अलग ले जा कर कुछ कहा। उसने तुरंत घोड़े से उतर कर उसे सलाम किया और आदेश दिया कि दो नावें लाई जाएँ। उसके एक पर शमसुन्निहार को बिठा कर उसके घर पहुँचाने का आदेश दिया। दूसरी पर माल की गठरियों के साथ ही शहजादे और जौहरी को बिठा कर अपने दो सिपाही उनके साथ कर दिए ताकि वे उन्हें सुरक्षापूर्वक उनके घर पहुँचा दें।

किंतु वे सिपाही इन लोगों से खुश नहीं थे। उन्होंने नाव को शहर के घाट पर ले जाने के बजाय कारागार की ओर मोड़ दिया और जौहरी के लाख प्रतिवाद करने पर भी उन्हें कारागार में पहुँचा दिया। कारागार के प्रधान अधिकारी ने इन लोगों से पूछा कि तुम लोग कौन हो और तुम्हें क्यों पकड़ा गया है। जौहरी ने इस अधिकारी को भी पूरी बात बताई और कहा कि गश्ती दल के मुखिया ने हमारी बात का विश्वास कर के हमें हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया था किंतु इन दो सिपाहियों ने हमें बंदीगृह में पहुँचा दिया - शायद यह लोग हमसे कुछ घूस चाहते थे और वह न मिलने पर उन्होंने ऐसा किया। कारागृह के अधिकारी को भी जौहरी की बात का विश्वास हो गया।

उसने गश्त के दोनों सिपाहियों को खूब डाँटा-फटकारा और अपने दो सिपाहियों को आदेश दिया कि दोनों को माल-असबाब के साथ शहजादे के घर पर पहुँचा दिया जाए।

जब यह दोनों शहजादे के घर पहुँचे तो इतने थके थे कि एक कदम चलना भी मुश्किल था किंतु शहजादे के नौकरों ने दोनों को सहारा दे कर अंदर पहुँचाया और आराम से बिठाया। जौहरी कुछ ताजादम हुआ तो शहजादे ने अपने नौकरों को आज्ञा दी कि जौहरी को माल-असबाब के साथ आराम से उसके घर पर पहुँचा दिया जाए। जौहरी जब अपने घर आया तो देखा कि घरवाले उसकी चिंता में रो-पीट रहे हैं। जौहरी को सही-सलामत देख कर उन लोगों को ढाँढ़स बँधा और सब उससे पूछने लगे कि तुम कहाँ गए थे और क्या हुआ था। उसने यह कह कर कि मैं बहुत थका हूँ सभी को चुप कर दिया और चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया।

दो दिन में जौहरी अपनी थकान और मानसिक आघात से उबर सका। तीसरे दिन वह अपने एक मित्र के घर जी बहलाने जा रहा था कि मार्ग में एक स्त्री ने उसे अपने पास आने का इशारा किया। जौहरी पास गया तो उसने पहचाना कि यह शमसुन्निहार की विश्वस्त दासी है। जौहरी इतना डरा हुआ था कि उसने उससे वहाँ पर कोई बात न की और उसे अपने पीछे आने का इशारा कर के एक ओर को चलने लगा। दासी भी पीछे-पीछे चली। वे लोग चलते-चलते एक निर्जन मस्जिद में गए और वहाँ दासी ने जौहरी से पूछा कि आप डाकुओं से कैसे बचे। जौहरी ने कहा, पहले तुम अपना हाल बताओ कि तुम और दो अन्य दासियाँ कैसी बचीं। दासी ने कहा कि जब डाकू आपके घर पर आए तो हम तीनों ने समझा कि खलीफा को पता चल गया है और उसने अपने सिपाही भेजे हैं। हम तीनों अपनी जान के डर से मकान की छत पर चढ़ गईं और छतों-छतों होते हुए एक भले मानस के घर में आ गईं। उसने दया कर के हमें रात भर अपने यहाँ सुरक्षित रखा। सवेरे हम लोग अपने आवास पर पहुँचे। अन्य दासियाँ स्वामिनी को हमारे साथ न देख कर चिंतित हुई तो हमने उन्हें दिलासा दिया कि वे अपनी एक सहेली के घर रह गई हैं।

दासी ने कहा, हम लोग भी स्वामिनी के बारे में चिंतित थे। हमने उस शाम को एक नाव पर एक आदमी को भेजा कि अगर किसी सुंदरी को किसी आदमी के साथ भटकते देखें तो यहाँ ले आएँ।

हम लोग आधी रात तक हर आहट पर कान लगाए रहे। आधी रात को अपने आवास के पिछवाड़े के घाट पर नाव का शब्द सुना। जा कर देखा कि हमारे भेजे हुए आदमी तथा एक अन्य व्यक्ति के साथ स्वामिनी नाव पर आई हैं। वे इतनी अशक्त थीं कि एक कदम चल भी नहीं सकती थीं। हम लोग उन्हें सँभाल कर लाए। उन्होंने चुपके से उन दो आदमियों को एक हजार अशर्फी दे कर विदा किया। अब वे अच्छी हैं। उन्होंने हम लोगों को डाकुओं द्वारा पकड़े जाने और छूटने का वृत्तांत भी बताया। दासी के यह कहने के बाद जौहरी ने भी वह सब कुछ बताया जो उस पर और शहजादे पर बीता था।

दासी ने दो थैलियाँ अशर्फियों की दीं और कहा, हमारी स्वामिनी ने यह आपके लिए भेजी हैं क्योंकि उन्हें इस बात का बड़ा ख्याल है कि आपको उनकी वजह से बड़ा कष्ट और नुकसान हुआ है इसलिए आपकी क्षतिपूर्ति की जा रही है। जौहरी ने धन्यवादपूर्वक वह धन ले लिया। उसने उसमें से कुछ इसलिए खर्च किया कि मित्रों से माँगी हुई वस्तुएँ उन्हें खरीद कर लौटा दे। फिर भी काफी बचा जिससे उसने एक विशाल और सुंदर मकान उसी दिन बनवाना आरंभ कर दिया।

फिर वह शहजादे के घर उसका हालचाल पूछने को गया। शहजादे के नौकरों ने बताया वे जब से आए हैं आँखें बंद किए अपने बिस्तर पर पड़े हैं। उन्होंने कुछ भी खाया-पिया नहीं है। जौहरी इससे चिंतित हुआ। उसने शहजादे के पास जा कर उसे बड़ा धैर्य दिया। शहजादे ने जौहरी की आवाज सुन कर आँखें खोलीं और उसकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जौहरी का हाथ दबा कर कहा कि मित्र, तुमने हमारे लिए बड़ा कष्ट सहा, मैं कैसे तुम्हारा आभार प्रकट करूँ। जौहरी ने कहा, मैं आपका सेवक हूँ, आपके लिए सब कुछ कर सकता हूँ किंतु भगवान के लिए खाना-पीना शुरू कीजिए और अपने स्वास्थ्य को ठीक रखिए।

शहजादे ने जौहरी के कहने से कुछ खाया-पिया। फिर एकांत में उसने शमसुन्निहार का समाचार पूछा। जौहरी ने कहा, वह कुशलपूर्वक हैं और कल ही उसने अपनी दासी को भेजा था कि मुझसे आप की कुशलक्षेम पूछें। जौहरी इसके बाद अपने घर आना चाहता था किंतु शहजादे ने उसे रोक लिया और आधी रात तक जाने न दिया। आधी रात को जौहरी अपने घर गया और दूसरे दिन फिर शहजादे के पास पहुँचा। शहजादे ने चाहा कि जौहरी की क्षतिपूर्ति के निमित्त कुछ धन दे दे किंतु जौहरी ने न लिया और कहा कि मुझे शमसुन्निहार ने काफी धन इस हेतु दे दिया है। दोपहर को जौहरी शहजादे से विदा हो कर अपने घर पहुँचा।

उसे घर पहुँचे बहुत देर न हुई थी कि शमसुन्निहार की वही विश्वस्त दासी रोती-पीटती उसके घर पहुँची। उसने बताया कि अब तुम्हारी और शहजादे की जान खतरे में है। अगर तुम लोगों को अपने प्राण प्यारे हैं तो तुरंत शहर छोड़ कर कहीं को निकल जाओ। जौहरी ने हैरान हो कर कहा, आखिर हुआ क्या है? तू क्यों इतना रो-पीट रही है और क्यों मुझे इतना भय दिखा रही है? साफ-साफ पूरी बात बता। उस दासी ने कहा, जब हम लोग उस मकान से भाग कर अपने आवास पर पहुँचे और बाद में शमसुन्निहार भी घर पहुँची तो उसने मेरे साथ की दो दासियों में से एक को किसी बात पर रुष्ट कर उसे दंड देने की आज्ञा दी। उस पर बहुत मार पड़ी और वह उसी रात को भय और क्रोध के कारण शमसुन्निहार के महल से भाग गई और महल के रक्षकों के प्रधान के पास शरण लेने चली गई।

उस दासी ने रक्षकों के प्रमुख से उस रात का सारा हाल बता दिया। रक्षकों के प्रमुख ने उसे न जाने क्या सलाह दी। फिर वह खलीफा के महल में चली गई और संभवतः उसने खलीफा को भी सारी बातें बता दीं। खलीफा ने बीस सिपाही भेज कर शमसुन्निहार को पकड़वा कर बुलाया। इसके आगे मुझे नहीं मालूम कि उसने उसे मरवा डाला या कुछ और किया। मैं यह देख कर सारा हाल तुमसे कहने आई हूँ।

यह सुन कर जौहरी के होश उड़ गए। उसने फिर शहजादे के मकान की ओर दौड़ लगाई। शहजादे को उसकी बदहवासी को देख कर आश्चर्य हुआ और उसने तुरंत जौहरी से बात करने के लिए एकांत करवाया। जब जौहरी ने उसे पूरा हाल बताया और कहा कि खलीफा ने शमसुन्निहार को गिरफ्तार करवा दिया है तो शहजादे को गश आ गया। कुछ देर में होश आने पर उसने पूछा कि शमसुन्निहार के लिए क्या किया जा सकता है। जौहरी ने कहा कि आप शमसुन्निहार के लिए कुछ नहीं कर सकते, लेकिन यहाँ रहे तो स्वयं भी मरेंगे और मुझे भी मरवा डालेंगे। आप कृपा कर के फौरन उठिए और मेरे साथ इवनाजपुर की ओर प्रस्थान करिए। किसी समय भी खलीफा के सिपाही आ कर हम दोनों को पकड़ सकते हैं और बाद में हम दोनों बड़े निरादरपूर्वक मारे जाएँगे।

शहजादे ने फौरन कुछ तीव्रगामी घोड़ों के लाने का आदेश दिया और कई हजार अशर्फियाँ अपने और जौहरी के पास रखीं और कुछ सेवकों के साथ शहर से निकल पड़े। कई रोज वे उसी तरह रात-दिन चलते रहे। एक दिन दोपहर के समय वे थकान के कारण आराम करने के लिए वृक्षों के नीचे लेटे। इतने में डाकुओं के एक दल ने उन पर आक्रमण कर दिया। शहजादे के नौकरों ने उनका सामना किया किंतु सब मारे गए। डाकुओं ने शहजादे और जौहरी के सारे हथियार, घोड़े और धन ले लिया बल्कि उनके शरीर के कपड़े भी उतार लिए और उन दोनों को वैसा ही असहाय छोड़ कर चले गए।

शहजादे ने कहा, संसार में मुझसे अधिक अभागा कौन होगा कि एक विपत्ति समाप्त नहीं होती कि दूसरी आ पड़ती है। यदि इस्लाम में आत्महत्या को पाप न समझा जाता तो मैं अपनी जान अपने हाथों दे देता। अब मैंने तय किया है कि यहाँ से कहीं नहीं जाऊँगा बल्कि शमसुन्निहार की याद में यहीं जान दे दूँगा। जौहरी ने उसे बहुत समझाया-बुझाया कि इस प्रकार निराश नहीं होना चाहिए और भगवान की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए। बहुत समझाने पर शहजादा उठा और दोनों एक पगडंडी पर चलने लगे। कई मील चल कर इन्हें एक मस्जिद मिली। वे दोनों भूखे-प्यासे रात भर वहीं पड़े रहे।

सवेरे एक भला मानस वहाँ नमाज पढ़ने आया। नमाज के बाद उसने दो आदमियों को एक कोने में दुबक कर बैठे देखा। उसने कहा कि तुम लोग परदेसी जान पड़ते हो। जौहरी ने कहा, हमारी दशा आप देख ही रहे हैं। हम लोग बगदाद से आ रहे थे कि रास्ते में डाकुओं ने हमें लूट लिया, कुछ भी हमारे पास न छोड़ा। उस आदमी ने कहा कि आप लोग मेरे घर चलें और आराम करें। जौहरी बोला, कैसे चलें? वे लोग हमारे कपड़े भी ले गए और हम नंगे बैठे हैं। उस आदमी ने बाहर जा कर अपने घर से दो चादरें लीं और मस्जिद में आ कर इन लोगों से चलने को कहा।

अब जौहरी को कुछ और ही शक हुआ कि यह आदमी इतना कृपालु क्यों है। उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि खलीफा ने हम लोगों की गिरफ्तारी के लिए इनामी इश्तिहार दिया हो और यह इनाम के लालच में हमें पकड़वाना चाहता हो। उसने कहा, आपकी कृपा के लिए धन्यवाद किंतु बीमारी और भूख से मेरे साथी की हालत खराब हो गई है और वह चलने-फिरने के योग्य नहीं है। उस भले आदमी ने एक नौकरानी से उन दोनों के लिए कुछ खाना भी भिजवा दिया। जौहरी ने पेट भर खाना खा लिया।

किंतु शहजादे की हालत वास्तव में खराब थी। उससे एक कौर भी नहीं खाया गया। उसने समझ लिया कि मेरा अंत समय आ गया है और वह जौहरी से बोला, भाई, अब मैं बच नहीं सकता तुम देख ही रहे हो कि मैंने शमसुन्निहार के प्रेम में क्या-क्या विपत्तियाँ उठाईं और इस अंत समय में भी उसी की याद कर रहा हूँ। मुझे मरने का दुख नहीं है। अब तुमसे अंतिम प्रार्थना है कि मैं मर जाऊँ तो मेरे शव को कुछ दिनों के लिए इसी भले आदमी की निगरानी में छोड़ना और बगदाद जा कर मेरी माता को मेरी मृत्यु की सूचना देना और कहना कि यहाँ से मेरी लाश उठवा कर ले जाएँ और विधिपूर्वक दफन करवाएँ।

यह कह कर शहजादे ने अपने प्राण छोड़ दिए। जौहरी उसके लिए बहुत देर तक विलाप करता रहा। उस दिन उस भले आदमी के पास लाश रखवा कर एक यात्री दल के साथ बगदाद की ओर चला। बगदाद पहुँच कर उसने शहजादे की मृत्यु की सूचना उसकी माँ को दी। बेचारी वृद्धा जवान बेटे के लिए सिर पीट-पीट कर बहुत रोई। फिर कई सेवकों के साथ वहाँ गई जहाँ शहजादे का शव रखा हुआ था।

इधर जौहरी अपने घर में बैठा शोक मना रहा था कि उसके पूरे प्रयत्नों के बाद भी इस प्रेम-प्रसंग का ऐसा दुखद अंत हुआ। एक दिन वह इसी शोक में अपने घर के सामने घूम रहा था कि उसे शमसुन्निहार की वही विश्वस्त दासी मिली। वह उसे अपने घर में ले गया और उसे बताया कि उसकी सूचना के बाद जब शहजादे के साथ मैं भागा तो क्या हुआ और किस प्रकार उस शहजादे ने शमसुन्निहार की याद करते हुए प्राण छोड़ दिए। और अब शहजादे की माँ अपने बेटे की लाश लेने गई है।

यह सुन कर दासी भी सिर पीट-पीट कर रोने लगी। बाद में दासी ने कहा, अब शमसुन्निहार भी इस दुनिया में नहीं है। खलीफा ने उसे पकड़वा मँगाया तो उसने खलीफा के सामने स्वीकार कर लिया कि वह अबुल हसन के प्रेम में पागल है। अबुल हसन का नाम लेने के साथ ही वह इस तरह तड़पने और छटपटाने लगी कि उसके सच्चे प्रेम से खलीफा भी प्रभावित हुआ और उसके हृदय में क्रोध के बजाय सहानुभूति जागृत हो गई। उसने शमसुन्निहार को गले लगाया और बहुत कुछ भेंट और पारितोषक दे कर उसे विदा किया। उसने अपने महल में आ कर मुझसे कहा कि तूने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है किंतु मैं भी अब दो घड़ी की मेहमान हूँ। मैंने उसे धैर्य दिया और कहा ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। शाम को खलीफा फिर उसके पास आया और गाना-बजाना शुरू हुआ किंतु प्रेम-संगीत ने उसकी दशा खराब कर दी और वह मर गई।

खलीफा ने पहले तो उसे बेहोश समझा और उसे होश में लाने के बहुत प्रयत्न करवाता रहा किंतु जब निश्चय हुआ कि वह मर गई तो उसने शोक में आज्ञा दी कि समस्त वाद्य-यंत्र तोड़ दिए जाएँ। अब उस सभा में संगीत के बदले रुदन के स्वर उठने लगे। खलीफा खुद भी वहाँ अधिक न बैठ सका और अपने महल को चला गया। मैं रात भर स्वामिनी के शव के पास बैठी रही। सुबह मैंने लाश को नहलाया और महल के अंदर बड़े मकबरे में, जहाँ दफन होने की अनुमति शमसुन्निहार ने पहले ही खलीफा से ले ली थी, दफन किया। अब मैं चाहती हूँ कि जब शहजादे की लाश आए तो उसे भी स्वामिनी की कब्र के बगल में गाड़ा जाए ताकि दोनों प्रेमी मर कर तो एक जगह रहें।

जौहरी ने कहा कि खलीफा की अनुमति के बगैर यह कैसे संभव है। दासी ने कहा, इसकी चिंता न करें। खलीफा ने मुझसे कहा कि तू हमेशा उसकी वफादार रही, अब मरने के बाद भी उसकी सेवा में रह और उसकी कब्र की देखभाल कर। खलीफा ने मुझे वहाँ का सारा अधिकार दे दिया है। वैसे भी उसे शहजादे और शमसुन्निहार के प्रेम का हाल मालूम है और वह इस प्रसंग से नाराज भी नहीं है।

जब शहजादे की लाश बगदाद पहुँची तो जौहरी ने उस दासी को इसकी सूचना भिजवाई। वह आ कर शहजादे की लाश को शहजादे की माता की अनुमति ले कर महलवाले मकबरे में ले गई। शहजादे की शवयात्रा में हजारों आदमी शामिल थे। अंततः शहजादे को भी अपने प्रेयसी के बगल में दफन कर दिया गया। तब से दूर-दूर के देशों से लोग आ कर उनकी कब्रों पर मनौती मानते हैं।

शहरजाद ने यह कथा समाप्त की तो उसकी बहन दुनियाजाद ने कहा कि यह कहानी बहुत ही सुंदर थी, क्या तुम्हें और भी कोई कहानी आती है। शहरजाद बोली, यदि मुझे आज प्राणदंड न मिला तो मैं कल शहजादा कमरुज्जमाँ की कहानी सुनाऊँगी। बादशाह शहरयार ने नई कहानी सुनने के लालच में उस दिन भी शहरजाद का वध नहीं करवाया और अगली सुबह के पूर्व शहरजाद ने नई कहानी आरंभ कर दी।
 
कमरुज्जमाँ और बदौरा की कहानी

फारस देश में बीस दिन की राह पर एक देश खलदान है। उस देश में कई टापू भी शामिल हैं। बहुत दिन पहले वहाँ का बादशाह शाहजमाँ था। उसके चार पत्नियाँ थीं और सात विशेष दासियाँ। वह बड़ा प्रतापी राजा था, उसके देश में समृद्धि और शांति का राज्य था। कोई शत्रु उसके देश पर निगाह नहीं लगाए था किंतु उसे एक बड़ा दुख था कि उसके कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसने अपने मंत्री से कहा कि मेरी अवस्था व्यर्थ ही बीती जाती है और मेरे बाद इतने बड़े राज्य का क्या होगा, क्योंकि मेरे कोई संतान नहीं है, मालूम होता है भगवान भी मुझे भूल गया है।

मंत्री ने कहा, पृथ्वीपाल, आप इस प्रकार की निराशा की बातें न करें। भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। वह किसी को भूलता नहीं है। आप दीनतापूर्वक रात-दिन भगवान से संतान की भीख माँगें। इसके अतिरिक्त फकीरों, दरवेशों के आशीर्वाद लें तो मनोकामना पूर्ण होगी।

मंत्री के परामर्श के अनुसार बादशाह ने पूरे जोर से धार्मिक कृत्य शुरू किए और फकीरों को खूब दान दिया और उनसे संतान का आशीर्वाद चाहा। कुछ काल के उपरांत उसकी रानी को गर्भ ठहर गया। नौ महीनों के बाद उससे एक पुत्र का जन्म हुआ। बादशाह की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने लाखों रुपया फकीरों के दान और अपने अधीनस्थ कार्यकर्ताओं के इनाम पर खर्च किए, यहाँ तक कि उसके देश में कोई भी व्यक्ति भूखा-नंगा नहीं रहा और महीनों तक राजमहल में उत्सव होता रहा।

राजकुमार अत्यंत रूपवान था। उसका नाम रखा था कमरुज्जमाँ। बादशाह ने उसके कुछ बड़े होने पर उसकी शिक्षा के लिए कई विशेषज्ञ नियुक्त किए जो हर प्रकार के कला-कौशल और विद्याओं में उसे शिक्षा देते थे। और तो सब ठीक रहा किंतु शिक्षा के दौरान उस पर न जाने क्या प्रभाव पड़ा कि उसे स्त्रियों से घृणा हो गई। जब वह जवान होने लगा तो बादशाह ने उसे एक दिन अपने पास बुला कर कहा, मैं चाहता हूँ कि अब तुम्हारा विवाह करवा दूँ। तुम क्या कहते हो?

शहजादे को इस बात से बुरा लगा। उसने पिता की बात का कोई उत्तर न दिया और बहुत देर तक चुपचाप खड़ा रहा। जब बादशाह ने जोर दे कर अपनी बात का उत्तर चाहा तो उसने हाथ जोड़ कर कहा, पिताजी, आपका आदेश न मानना निश्चय ही बड़ी अशोभनीय बात है किंतु इस मामले में मैं विवश हूँ। मैं विवाह बिल्कुल नहीं करना चाहता। सभी स्त्रियाँ झूठी और कुटिल होती है। बादशाह को यह सुन कर बड़ा क्रोध आया। उसने कहा, मेरा जी तो चाहता है कि तुम्हें अभी इस अशिष्टता का दंड दूँ किंतु मैं तुम्हें एक वर्ष का अवसर देता हूँ।

किंतु एक वर्ष के बाद भी शहजादा इस बात पर अड़ा रहा कि मुझे विवाह नहीं करना है। उसने कहा कि मैंने सारी पुस्तकों में स्त्रियों की बुराइयाँ ही पढ़ी हैं, मैं कैसे उनका विश्वास करूँ। बादशाह बहुत ही नाराज हुआ और इस बात के लिए तैयार हो गया कि शहजादे को कोई कठोर दंड दे। किंतु मंत्री के कहने पर उसने शहजादे को अपना निश्चय बदलने के लिए एक वर्ष का और समय दिया।

यह समय भी बेकार गया क्योंकि शहजादा अब भी इस पर अड़ा हुआ था कि मैं विवाह नहीं करूँगा। बादशाह ने एक बार फिर अपने क्रोध पर संयम किया और शहजादे की माँ, रानी फातिमा से कहा कि तुम अपने बेटे को समझाओ नहीं तो मैं उसे बड़ा कठोर दंड दूँगा। फातिमा ने शहजादे को समझाया कि तुम्हारे वंश में सदा से यह विवाह की रीति चली आती है, तुम्हारे लिए इसका उल्लंघन करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। कमरुज्जमाँ ने वही दलील दी कि स्त्रियाँ भ्रष्ट और धोखेबाज होती हैं। माँ ने समझाया, बेटे, तुम सभी स्त्रियों के लिए यह बात कैसे कह सकते हो। कुछ स्त्रियाँ दुष्ट होती हैं तो कई पवित्र भी होती हैं। मैंने भी कई दुष्ट पुरुषों की कथाएँ पढ़ी हैं किंतु इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सारे पुरुष दुराचारी होते हैं।

किंतु माँ के लाख समझाने-बुझाने पर भी शहजादा टस से मस न हुआ। कुछ और समय बीता। अंत में बादशाह स्वयं पर संयम न रख सका। उसने आदेश दिया कि शहजादे को एक पुराने और छोटे-से मकान में, जिसमें हवा-रोशनी भी ठीक से नहीं आती थी, बंद कर दिया जाए। उसने कहा कि उसके लिए दो-चार कपड़े वहाँ रखवा दो और एक बूढ़ी दासी उसकी सेवा में रख दो और दो-चार पुस्तकें पढ़ने के लिए रखवा दो, किंतु उसे मकान से बाहर न निकलने दिया जाए।

लेकिन कमरुज्जमाँ को कोई परवाह नहीं थी। वह आनंदपूर्वक उस मकान में गया, दिन में पुस्तकें पढ़ता रहा और रात को अपने पलंग पर लेट कर सो गया। उस मकान में एक कुआँ था जिसमें जिन्नों के बादशाह दिउमर्स की परी बेटी मैमून रहती थी। रात को मैमून संसार भ्रमण के लिए रोज की तरह कुएँ से निकली। उसे मकान में प्रकाश देख कर आश्चर्य हुआ कि यहाँ रहने के लिए कौन आ गया। यद्यपि शहजादे का शयनकक्ष बाहर से बंद किया हुआ था तथापि परी को इससे क्या बाधा होती। वह कमरे के अंदर जा कर सोने के पलंग पर रेशमी चादर ओढ़ कर सोते हुए शहजादे को एकटक देखने लगी।

कमरुज्जमाँ का अनुपम सौंदर्य देख कर वह ठगी-सी रह गई। उसने धीरे से चादर खिसका कर उसे सिर से पाँव तक देखा। कुछ देर उसे देखने के बाद उसने शहजादे के मुँह और माथे का चुंबन किया और पहले की भाँति उसे चादर उढ़ा दी। इसके बाद वह उड़ कर आकाश में गई और संसार भ्रमण करने लगी। तभी उसे अपने पीछे पंखों की सरसराहट सुनाई दी। उसने आवाज दी, कौन जा रहा है, इधर आ। उड़नेवाला भी एक जिन्न था। वह जिन्नों के एक सरदार शहमर का बेटा नहस था। जिन्नों की शहजादी की आवाज सुन कर वह उसके पास आया। मैमून ने पूछा कि तुम कहाँ जा रहे हो। उसने कहा, मैं इस समय चीन देश से आ रहा हूँ। चीन बहुत बड़ा देश है और उसके अंतर्गत कई द्वीप हैं। वहाँ के बादशाह का नाम गोर है। उसकी बेटी बदौरा है। वह इतनी सुंदर है कि मालूम होता है विधाता ने उससे अधिक सुंदर किसी को नहीं पैदा किया है। न मनुष्यों में और न हमारी जाति में उससे बढ़ कर कोई रूपवान है।

नहस ने आगे कहा, शहजादी बदौरा के होंठ मूँगे की तरह हैं, आँखें तिरछी और मदभरी हैं, उसकी केशराशि श्यामल घटा की भाँति है जिसमें लगे चाँदी के सितारे बिजली की तरह चमकते हैं, उसकी नाक बड़ी ही सुडौल है और माथा बड़ा उज्ज्वल है। उसकी दंत-पंक्ति जैसे मोती की लड़ी हो। उसकी चाल हंसिन की भाँति है और उसकी आवाज में चाँदी की घंटियों की खनक है। वह हँसती है तो नैर फूल झड़ते हैं। उसका यौवन उन्नत और पुष्ट हैं। संक्षेप में वह हर मामले में अद्वितीय है।

बादशाह गौर ने करोड़ों अशर्फियों की लागत से अपनी प्यारी बेटी के लिए एक सतखंडा महल बनवाया है। उसका पहला खंड बिल्लौर पत्थर का है, दूसरा खंड ताँबे का, तीसरा फौलाद का, चौथा पीतल का, पाँचवाँ कसौटी के पत्थर का है, छठा खंड चाँदी का है और सातवाँ खंड सोने का। इस महल के चारों ओर मनोहर वाटिका है। इसमें हर प्रकार के फलों और हर प्रकार के फूलों के वृक्ष हैं। उस वाटिका में हर समय पके फलों और सुगंधित फूलों की खुशबू गमगमाती रहती है। जगह-जगह फव्वारे चलते हैं और स्वच्छ जल की नहरें और तालाब जगह-जगह बने हैं। कुछ पेड़ ऐसे घने हैं जिनके नीचे धूप नहीं आती और वहाँ आराम करने में सारी थकन मिट जाती है।

उस बादशाह का ऐश्वर्य और शहजादी के रूप की प्रशंसा सुन कर दूर-दूर के देशों के राजकुमारों ने उससे विवाह का प्रस्ताव किया है। बादशाह ने अपनी बेटी को अनुमति दे रखी है कि जिससे चाहे विवाह करे किंतु शहजादी को विवाह से चिढ़ है। उसके माँ-बाप ने बहुत समझाया किंतु वह राजी नहीं होती और कहती है कि अगर आप लोगों ने विवाह के लिए जोर दिया तो आत्महत्या कर लूँगी। बादशाह ने उसे एक मकान में बंदी बना रखा है। उसकी सेवा के लिए दस बूढ़ी स्त्रियाँ नियत की गई हैं जिनकी प्रमुख वह स्त्री है जिसका दूध राजकुमारी ने बचपन में पिया है। अब न शहजादी स्वयं कहीं जा सकती है न उसके पास कोई जा सकता है। बादशाह ने अपनी पुत्री को पागल समझ कर यह विज्ञापित कर दिया है कि जो हकीम या ज्योतिषी या तांत्रिक उसे अच्छा कर देगा उसी के साथ राजकुमारी का विवाह हो जाएगा। मुझे इस बात का बड़ा दुख है कि वह परम सुंदरी राजकुमारी इस प्रकार से बंदीगृह के दुख भोग रही है।

मैमून ने हँस कर नहस से कहा, मालूम होता है तुम्हारी अकल ठिकाने नहीं है। एक बेकार-सी लड़की के रूप की इतनी प्रशंसा कर रहे हो। अगर तुम उस शहजादे को देखो जिसे मैंने देखा है और जिसने मेरा मन मोह लिया है तो तुम्हें मालूम होगा कि सौंदर्य किसे कहते हैं। बल्कि मुझे विश्वास है कि शहजादे को देख कर तुम चीन की राजकुमारी का सौंदर्य भूल ही जाओगे।

नहस ने कहा, शहजादी, वह रूपवान शहजादा कहाँ है? मैमून ने कहा, वह तो अति निकट है। वह भी बंदी हो कर एक मकान में पड़ा है क्योंकि उसने भी विवाह करने से इनकार कर दिया है। वह उसी मकान में बंद है जिसके कुएँ में मैं रहती हूँ। नहस ने कहा, मैं उस शहजादे को देखने के बाद ही कह सकता हूँ कि वह कितना सुंदर है। फिर भी मैं कहता हूँ कि चीन की शहजादी अधिक सुंदर है। परी बोली कि तुम झख मारते हो, शहजादी उसके मुकाबले में क्या होगी। इसी तरह वे दोनों बड़ी देर तक बहस करते रहे। अंत में जिन्न बोला, परी रानी, तुम्हें इस प्रकार मेरी बात का विश्वास नहीं होगा। मैं उसे उसके मकान से उड़ा कर लाता हूँ फिर तुम खुद ही देख लेना। मैमून बोली, अच्छी बात है, तुम उसे ला कर शहजादे के पास लिटा दो ताकि दोनों की तुलना हो सके।

जिन्न ने उड़ान भरी और कुछ ही क्षणों में चीन की राजकुमारी को ला कर उसने शहजादे के बगल में लिटा दिया। लेकिन इससे भी बात न बनी। परी जिद करती रही कि कमरुज्जमाँ अधिक सुंदर है और नहस राजकुमारी बदौरा की प्रशंसा करता रहा। अंत में दोनों ने तय किया कि किसी तीसरे व्यक्ति को ला कर फैसला करवाएँ कि कौन अधिक सुंदर है। परी ने जमीन पर पाँव पटका तो जमीन फट गई और उसमें से एक लँगड़ा, काना और कुबड़ा जिन्न निकला जिसके सिर पर छह सींग थे और हाथ-पाँव बहुत ही लंबे थे। उसने आ कर परी मैमून को दंडवत प्रणाम किया और पूछा कि मुझे किस सेवा के लिए बुलाया गया है। परी ने कसकस नामी इस भयानक जिन्न से कहा कि मेरे और नहस के बीच बहस पड़ गई है कि इन दोनों में कौन अधिक सुंदर है, तू इस बात का फैसला कर दे।

कसकस बहुत देर देर तक दोनों को देखता रहा किंतु कुछ निर्णय न कर सका। उसने कहा, अभी तो कुछ नहीं कह सकता। कोई एक बात में बढ़ कर है कोई दूसरी बात में। अगर यह बारी-बारी से जाग कर एक दूसरे को प्रेमदृष्टि से देखें तो संभव है कि उनका वास्तविक सौंदर्य प्रकट हो। मैमून और नहस ने कसकस का यह सुझाव पसंद किया। पहले मैमून खटमल बन गई और उसने शहजादे की गर्दन में जोर से काट लिया। शहजादे ने खटमल पकड़ने के लिए हाथ मारा किंतु मैमून फुर्ती से अपनी असली सूरत में आ गई और फिर तीनों अदृश्य हो कर देखने लगे कि शहजादा क्या करता है। कमरुज्जमाँ ने आँखें खोलीं और शहजादी को अपने बगल में लेटा देख कर उस पर तुरंत मोहित हो गया। कहाँ तो उसे स्त्रियों के नाम से चिढ़ थी कहाँ वह इतना प्रेम-विवश हो गया कि बेतहाशा उसका मुख और कपोल चूमने लगा। इस बीच नहस के जादू से शहजादी बेखबर हो कर सोती रही, उसे कुछ पता न चला।

शहजादे ने सोचा कि कदाचित यह वही सुंदरी है जिसके साथ मेरे माँ-बाप मेरा विवाह करना चाहते थे, अगर मैं इसे पहले देख लेता तो शादी करने से क्यों इनकार करता। उसे अपनी इस मूर्खता पर बड़ी लज्जा आई कि बेकार ही माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन किया। उसने शहजादी को जगाना चाहा किंतु वह तो जिन्न नहस के जादू के प्रभाव से बेखबर सो रही थी। कमरुज्जमाँ ने शहजादी की नीलम की अँगूठी उतारी और उसकी जगह अपनी हीरे की अँगूठी पहना दी और स्वयं शहजादी की नीलम की अँगूठी पहन कर अपनी जगह पहले की तरह लेटा रहा और कुछ ही क्षणों में मैमून के जादू से अचेत हो कर सो गया।

अब जिन्न नहस ने मच्छर बन कर शहजादी के होंठ पर डंक मारा जिसके दर्द से वह जाग उठी। उसे यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसके बगल में यह सुंदर युवक कैसे आ कर सो गया। वह भी विवाह से बहुत चिढ़ती थी किंतु कमरुज्जमाँ पर तुरंत मोहित हो गई। उसने सोचा कि मेरे पिता शायद मेरा विवाह इसी युवक से करना चाहते थे और मैं अपनी मूर्खता और हठवादिता के कारण इनकार करती रही। किंतु उसे यह बड़ा अजीब लगा कि मेरा प्रियतम मेरे पास आ कर भी केवल सो रहा है और न प्रेम-दृष्टि डालता है न बातचीत करता है। कुछ देर बाद वह स्वयं को न रोक सकी। उसने शहजादे की बाँह पकड़ कर कई झटके दिए किंतु वह तो मैमून के जादू से अचेत हो कर सोया था। फिर शहजादी उसका हाथ चूमने लगी। उसने देखा कि मेरी अँगूठी इसकी उँगली में है। अपना हाथ देखा तो उसने दूसरी अँगूठी पाई। उसने सोचा कि शायद मुझे याद नहीं रहा है किंतु मेरा विवाह इस युवक के साथ हुआ है वरना यह अँगूठियाँ कैसे बदली जातीं। उसने शहजादे को गले से लिपटा कर बहुत प्यार किया और फिर सो रही। मैमून ने नहस से कहा, तुमने देख लिया कि शहजादा अधिक सुंदर है तभी शहजादी पागल की तरह उसे प्यार कर रही थी। अब तुम शहजादी को उसके महल में पहुँचा दो। यह कह कर उसने कसकस को भी विदा दी और स्वयं अपने कुएँ में वापस आ गई।

कमरुज्जमाँ सुबह जागा और उसने शहजादी को अपने पास न देखा। उसने सोचा कि शायद मेरे पिता ने उसे बुला भेजा है। उसने अपनी सेवा के लिए नियत दास को पुकारा। वह शहजादे के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। शहजादे ने हाथ-मुँह धो कर पूछा कि जो सुंदरी रात को मेरे पास सो रही थी वह कहाँ गई। दास ने कहा, सरकार, मैंने तो किसी सुंदरी को नहीं देखा। फिर यहाँ कोई सुंदरी आ कैसे सकती है, इस कमरे पर तो बाहर की ओर से ताला लगा रहता है। आपने निश्चय ही कोई स्वप्न देखा होगा।

कमरुज्जमाँ को यह सुन कर बड़ा क्रोध आया। उसने दास को बहुत मारा और बराबर पूछता रहा कि वह सुंदरी कहाँ गई। दास बेचारा क्या बताता। कमरुज्जमाँ ने कहा कि तू बहुत दुष्ट है। साधारण दंड से नहीं मानेगा। यह कह कर उसने अन्य दासों को बुला कर इस दास को रस्सी से बँधवाया और कुएँ में लटकवा दिया। दास ने सोचा कि मैं अपनी सच बात पर अड़ता हूँ तो इसी तरह मर जाऊँगा क्योंकि शहजादा निश्चय ही पागल हो गया है। उसने पुकार कर कहा, सरकार, मुझे प्राणों की भिक्षा दें तो मैं सही बात बता दूँ। शहजादे ने उसे निकलवाया और कहा कि अब मेरी बात का जवाब दे। उसने हाँफते हुए कहा कि मुझे जरा दम तो लेने दीजिए।
 
कुछ क्षणों में वह दास लघुशंका के बहाने उठा। उसने बाहर आ कर फिर कमरे में ताला डाल दिया और दौड़ कर बादशाह के पास गया। उसने शहजादे की सारी बातें बताईं कि किसी कल्पित सुंदरी के पीछे उसने मुझे बहुत मारा और कुएँ में लटकवा दिया और मैं बहाना बना कर यहाँ आया हूँ। उसने कहा, पृथ्वीपाल, आप स्वयं ही विचार कर देखें कि जब बाहर से ताला बंद है तो कोई स्त्री कैसे अंदर जा सकती है और बाहर आ सकती है। बादशाह को भी यह सब सुन कर आश्चर्य हुआ। उसने मंत्री को आदेश दिया कि वह शहजादे के पास जा कर पूरा हाल मालूम करे।

मंत्री ने शहजादे के मकान में जा कर उसे प्रणाम किया और कहा कि आप के पिता आपकी बातें सुन कर चिंतित हैं। उन्होंने मुझसे कहा है कि मैं आप से उस स्त्री के बारे में पूछूँ जिसे आपने स्वप्न में देखा है। शहजादे ने कहा, इस दुष्ट दास के कहने से आपने भी समझ लिया कि मैंने स्वप्न देखा है? मेरा वास्तव में उसके साथ विवाह हो चुका है और मैं उसके विरह में आतुर हूँ। बादशाह मुझे पहले ही उसे दिखा देते तो मैं विवाह से क्यों इनकार करता?

मंत्री ने कहा, यह आप क्या कर रहे है? बंद कमरे में कोई स्त्री कैसे आ सकती है। आपने स्वप्न ही देखा होगा। शहजादा उन्मत्त हो ही रहा था, उसने मंत्री की दाढ़ी पकड़ कर झटके दिए और उसे थप्पड़ मारे। मंत्री ने यह कह कर जान बचाई कि संभव है महाराज ने कोई स्त्री भेजी हो, मैं जा कर पूछता हूँ। हो सकता है वह सारा हाल सुनने पर उसे फिर आपके पास भेजें। शहजादे ने कहा, बुढ़ऊ, अब तुम राह पर आए हो। जल्दी से जाओ और मेरी प्राणप्रिया को मेरे पास पहुँचाने का प्रबंध करो।

मंत्री भाग कर बादशाह के पास आया और कहा, मालिक, उस गुलाम की बात बिल्कुल ठीक है। शहजादे ने मुझे भी मारा है और अपनी कोमलांगी प्रेयसी को भिजवाने के लिए मुझसे कहा है। बादशाह की चिंता यह सुन कर और बढ़ी। उसने स्वयं शहजादे के पास जा कर बात करने का निश्चय किया। उसके पास जा कर कहा, बेटे, यह सब क्या मामला है? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम किस स्त्री की बात कर रहे हो कि वह तुम्हारे बगल में आ कर सोई थी। यह भी समझ में नहीं आता है जब कमरा बाहर से बंद था तो वह स्त्री यहाँ पर आई कैसे।

शहजादे ने कहा, अब्बा हुजूर, मैंने उस स्त्री को स्वप्न में नहीं बल्कि सचमुच अपने पास लेटे देखा है। इस बात का प्रमाण यह अँगूठी है जो मैंने उससे बदली है। अगर मैंने स्वप्न में देखा होता तो यह अँगूठी मेरे पास कैसे आती। आप विश्वास मानिए कि मैं पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य में हूँ। न मैं मूर्ख हूँ न पागल। आप कृपा कर के उस सुंदरी को मेरे पास भेजें। यदि आप पहले ही उस कोमलांगी को दिखा देते तो मैं क्यों शादी से इनकार करता और क्यों आपकी आज्ञा का उल्लंघन करता।

बादशाह अँगूठी देख कर सोचने लगा कि वास्तव में यह अँगूठी शहजादे की नहीं है बल्कि उसके देश भर में ऐसी गढ़त की अँगूठियाँ नहीं बनती हैं और इसका नीलमणि भी अत्यंत मूल्यवान है। मालूम होता है कि शहजादे की बात गलत नहीं है, फिर भी यह समझ में नहीं आता कि ताला-बंद कमरे में कोई स्त्री कैसे आई गई, विशेषकर जब वह अति सुंदर तरुणी हो।

उसने सोच-विचार कर कमरुज्जमाँ को कैद से निकाल कर अपने महल में रखा और उसे बहुत दिलासा दिया कि तुम चिंता न करो, हम उस तरुणी को तुम्हारे लिए जरूर ढूँढ़ निकालेंगे और उसका विवाह तुम्हारे साथ करेंगे। वह स्वयं भी अधिकतर शहजादे के समीप रहने लगा। इससे राज्य प्रबंध को यथोचित समय न दे पाता था। अतएव एक दिन उसके मंत्री ने कहा, आप पूर्ववत राजकाज में संलग्न हो जाएँ ताकि देश को किसी प्रकार की हानि न हो। और जहाँ तक शहजादे का प्रश्न है उसे समुद्र के बीच में बसे खिरद नामी द्वीप के किले में भेज दीजिए। वहाँ हर देश के जहाज और हर देश के लोग आते ही रहते हैं, उनसे बात कर के शहजादे का जी बहला रहेगा। फिर वह स्थान यहाँ से दूर भी नहीं है, आप जब चाहे उसके पास जा सकते हैं। बादशाह को मंत्री की राय पसंद आई। उसने शहजादे को खिरद टापू के किले में भेज दिया। वह स्वयं भी कभी-कभी उसे देखने जाया करता था।

अब इधर का हाल सुनिए। नहस जिन्न ने जब शहजादी को ले जा कर उसके आवास में छोड़ दिया तो दूसरे दिन सवेरे वह अपने साधारण नियमानुसार जागी। उसने अपने आसपास शहजादा कमरुज्जमाँ की खोज की। उसे न पा कर अपनी रक्षिका वृद्धा दासी को पुकारा और घबरा कर पूछने लगी कि वह सुंदर युवक जो रात को मेरे साथ सो रहा था कहाँ चला गया है, उसे तुरंत ही मेरे पास ला। बुढ़िया को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा, प्यारी बेटी, तुम्हें क्या हो गया है? यह क्या कह रही हो? तुम्हारे शयनगृह में चिड़िया तक का प्रवेश तो संभव नहीं है, सुंदर युवक कहाँ से आ जाएगा। तुमने अवश्य कोई सपना देखा है। भगवान के लिए ऐसी बातें न करो। तुम्हारी बातों का तुम्हारे माता-पिता को पता चलेगा तो मेरी गर्दन उड़ा दी जाएगी।

शहजादी बदौरा को दासी की बात पर बड़ा गुस्सा आया। उसने बुढ़िया के केश पकड़ लिए और उसे बेतहाशा मारना शुरू किया। बुढिया तड़प कर उसकी पकड़ से निकल गई और भागी-भागी राजमहल में पहुँची। वहाँ जा कर उसने बादशाह और बेगम को बताया कि बदौरा कैसी पागलपन की बातें करती है। वे दोनों परेशान हो कर शहजादी के पास पहुँचे और बोले - बेटी, तुमने रात को क्या स्वप्न देखा जिससे तुम इतनी परेशान हो गई हो कि बेकार बकवास करने लगी?

शहजादी बदौरा ने लज्जावश सिर झुका कर कहा, मुझे बड़ा खेद है कि आप लोग मेरा विवाह करना चाहते थे और मैं नादानी से जिद कर के आपकी आज्ञा का उल्लंघन करती रही किंतु जिस युवक को आपने मेरे लिए चुना है वह रात को मेरे साथ आ कर सोया था। मैं सच कहती हूँ कि अगर आप पहले से उसे दिखा देते तो मैं विवाह से इनकार ही क्यों करती। अब कृपया उसे तलाश कराइए, न जाने वह कहाँ चला गया है। मुझे उसके प्रेम ने ऐसा जकड़ लिया है कि मैं उसके बगैर एक क्षण नहीं रह सकती। वह न मिला तो मैं आत्महत्या कर लूँगी। अगर आप को विश्वास न हो तो यह देखिए, वह अपनी अँगूठी मुझे दे गया है।

उसके माता-पिता को यह देख कर वास्तव में आश्चर्य हुआ कि अँगूठी किसी और की है, शहजादी की नहीं। वे बहुत सोचते रहे किंतु उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि इतनी कड़ी कैद के बाद भी कोई आदमी कैसे यहाँ तक आया और अँगूठी बदल गया। बहुत सिर मारने पर भी उनकी समझ में बेटी की बात नहीं आई और उन्होंने समझ लिया कि वह बिल्कुल पागल हो गई है, उन्होंने सोने की जंजीरे मँगा कर उनसे बेटी के हाथ-पाँव जकड़ दिए और अति दुखित हो कर अपने महल को वापस आए। उन्होंने आदेश दिया कि एक विश्वस्त बूढ़ी दासी के अलावा इसके पास कोई नहीं जा सकेगा। उन्होंने बंदीगृह के चारों ओर का पहरा भी बड़ा सख्त कर दिया। इसके अतिरिक्त बादशाह ने दरबार में सारे अमीरों और सामंतों के समक्ष घोषणा की कि मेरी बेटी पर उन्माद का प्रकोप हुआ है। कोई भी व्यक्ति जो उसे अच्छा कर देगा उसके साथ कुमारी का विवाह कर दिया जायगा और युवराज बना दिया जायगा। किंतु जो व्यक्ति इस प्रयत्न में असफल होगा उसे प्राणदंड दिया जाएगा।

इस घोषणा के बाद बहुत-से हकीम, वैद्य, तांत्रिक, योगी आदि शहजादी के इलाज के लिए आए और विफल हो कर प्राण गँवा बैठे। दो-तीन वर्षों में लगभग डेढ़ सौ व्यक्तियों को इस सिलसिले में मृत्युदंड मिला। बादशाह ने शहर की रक्षाभित्ति के साथ उन सभी के सिरों को लटकवा दिया। अब किसी का साहस शहजादी के इलाज के लिए आगे आने का नहीं होता था। जो दासी उस शहजादी की सेवा के लिए नियुक्त थी उसके पुत्र के साथ शहजादी बचपन में खेली थी। उस युवक का नाम मर्जुबन था। वह चीन के बाहर विद्याध्ययन करने गया था। कई वर्ष बाद वह वापस लौटा तो उसे रक्षाभित्ति के साथ इतने सारे सिर लटके देख कर आश्चर्य हुआ। फिर वह अपने घर गया तो अपने घरवालों से बातों-बातों में अपनी बचपन की सहेली शहजादी बदौरा का हाल पूछा।

उसके संबंधियों ने बताया कि शहजादी पागल हो गई है, बादशाह ने उसे जंजीरों में जकड़ कर कैदखाने में डाल दिया है। बादशाह ने घोषणा की है कि जो भी उसे अच्छा कर देगा उसके साथ शहजादी ब्याह दूँगा और उसे युवराज बना दूँगा किंतु जो उससे अच्छा नहीं कर सका तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। यह घोषणा सुन कर बहुत-से गुणीजन - वैद्य, ज्योतिषी, रमलकर्ता, तांत्रिक आदि आए और इस प्रयत्न में असफल हो कर प्राण गँवा बैठे, उन्हीं के सिरों को रक्षाभित्ति के सहारे लटकाया गया है। बाकी बातें तुम्हें अपनी माँ से मालूम होंगी। इस समय शहजादी के पास तुम्हारी माँ के अतिरिक्त किसी को जाने की अनुमति नहीं दी जाती। अपने सेवाकार्य से अवकाश पा कर मर्जबान की माँ घर आई तो उसे बेटे के वापस आने से बड़ी प्रसन्नता हुई । मर्जबान के पूछने पर उसने राजकुमारी का हाल ब्योरेवार बताया। मर्जबान ने पूछा कि क्या यह संभव है कि मैं गुप्त रूप से शहजादी से भेंट करूँ और देखूँ कि उसे क्या बीमारी है। उसकी माँ ने कहा कि यह काम बड़ी जोखिम का है। किंतु जब मर्जवान ने बहुत जिद की तो उसने कहा कि मैं देखभाल कर बताऊँगी कि कुछ प्रबंध हो सकता है या नहीं।

दूसरे दिन बुढ़िया जब शहजादी की सेवा के लिए गई तो उसने पहरे के सिपाहियों के प्रधान से कहा, भैया, मैं तुम्हारी थोड़ी-सी कृपा चाहती हूँ। उसने कहा, बोलो क्या चाहती हो। बुढ़िया बोली, तुम्हें शायद मालूम हो कि मेरी एक बेटी शहजादी ही की उम्र की है। दोनों ने एक साथ ही मेरा दूध पिया था। कई वर्ष पूर्व मैंने उसका विवाह कर दिया था। अब वह पहली बार ससुराल से आई है। उसने अपनी बचपन की सहेली का हाल सुना तो उसे बड़ी चिंता हुई है। वह उसे देखना चाहती थी किंतु वह बड़ा सख्त पर्दा करती है और किसी को यह भी नहीं बताना चाहती कि वह कहाँ आती-जाती है। तुम्हारी अनुमति हो तो मैं अपनी बेटी को शहजादी से मिलवा दूँ। प्रधान रक्षक ने इसमें कोई हर्ज नहीं समझा। उसने कहा, एक पहर रात गए बादशाह शयन के लिए जाते हैं। तुम अपनी बेटी को उसी समय लाना। मैं इस मकान का दरवाजा खुला रखूँगा। शहजादी का मन बहलाने के लिए उसकी सहेली उससे मिले तो अच्छी ही बात होगी।

अतएव बुढ़िया ने मर्जबान को जनाने कपड़े पहना कर नकाब से उसका मुँह ढका और नियत समय पर शहजादी के आवास में ले गई। उसे बाहरी कमरे में छोड़ कर शहजादी के पास जा कर बोली कि मेरा बेटा छद्म वेश में तुम्हारा हाल-चाल पूछने आया है। शहजादी को अपने बचपन के साथी के आने पर प्रसन्नता हुई। उसने मर्जबान को बुलाया और जब वह प्रणाम कर के दूर खड़ा हुआ तो बोली, मर्जबान भाई, पास आओ। भाई-बहन में क्या तकल्लुफ? मेरा जी बहुत घबरा रहा था। तुम्हारे साथ दो घड़ी बात कर के मेरी तबीयत बहलेगी।

मर्जबान ने अपनी ज्योतिष, रमल आदि की पुस्तकें निकालीं और शहजादी के रोग के निदान का प्रयत्न करने लगा। शहजादी बदौरा बोली, मर्जबान, बड़े दुख की बात है कि तुम भी मुझे औरों की तरह पागल समझे हुए हो। मैं तुम से जोर दे कर कहती हूँ कि मैं मानसिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ हूँ। जो लोग मेरे इलाज को आते हैं वे मेरी कहानी तो जानते नहीं इसलिए मुझे पागल समझते हैं।

यह कहने के बाद शहजादी बदौरा ने उसे सविस्तार बताया कि उसकी कैसे एक युवक से भेंट हुई जिसने उसके सोते में उसकी अँगूठी बदल ली। मैं पागल नहीं हूँ। जिस समय मुझे मेरा प्रियतम मिल जाएगा मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊँगी।

मर्जबान यह सुन कर बहुत देर तो चुपचाप खड़ा रहा फिर बोला, राजकुमारी, औरों ने चाहे आपकी बात का विश्वास न किया हो किंतु मुझे विश्वास है। आप निश्चिंत रहें। मैं आपके मनोवांछित पुरुष की खोज में जाता हूँ। ईश्वर की इच्छा हुई तो उसे खोज ही लाऊँगा। अगर ऐसा न हो सका तो मैं यहाँ मुँह न दिखाऊँगा। अब जब आप सुनें कि मर्जबान नगर में है तो समझ लें कि आपका प्रियतम भी उसके साथ आया है। यह कह कर वह विदा हो गया। अपने नगर से निकल कर वह देश-देश की, नगर-नगर की यात्रा करता रहा और पूछताछ करता रहा। किंतु उसकी यह भी समझ में नहीं आया था कि क्या पूछे।

संयोग से वह एक दिन वह सुंदर नगर में ठहरा हुआ था जो एक नदी के तट पर बसा हुआ था। यह उसके चीन से जाने के लगभग चार महीने की बात है। कुछ सैलानियों ने उसे बताया कि फारस का शहजादा कमरुज्जमाँ अजीब तरह से उन्माद से ग्रस्त है। वह सख्त पहरे के अंदर था, फिर भी कहता है कि उसके साथ एक सुंदरी लेटी जिससे उसने अँगूठी बदली है। मर्जबान को आशा हुई कि शायद यह वही पुरुष है जिसका उल्लेख बदौरा ने किया है। उसने उस द्वीप का मार्ग पूछा जहाँ कमरुज्जमाँ किले में कैद था। मालूम हुआ कि दो रास्ते हैं। एक थल मार्ग है जो निरापद है किंतु लंबा है, दूसरा समुद्री माग है किंतु वह खतरनाक है। मर्जबान ने खतरनाक समुद्री मार्ग ही से जाना निश्चित किया।

कुछ दिनों तक तो यात्रा ठीक रही किंतु बाद में एक तेज तूफान आया जिसने जहाज को एक पहाड़ के जल मार्ग पर पटक दिया। जहाज टुकड़े-टुकड़े हो कर गहरे समुद्र में आ गिरा। जहाज के सारे लोग डूब गए किंतु मर्जबान कुशल तैराक भी था। वह एक तख्ते का सहारा ले कर तैरता रहा और धीरे-धीरे उसी द्वीप के तट पर आ लगा जहाँ कमरुज्जमाँ को कैद कर रखा गया था। संयोग की बात थी कि उसी समय बादशाह वहाँ समुद्र को देख कर मन बहला रहा था। मर्जबान को तख्ते के सहारे तैरते देख कर उसने मंत्री को आज्ञा दी कि इस आदमी को तुरंत डूबने से बचाया जाय। माँझी लोग आज्ञा पा कर समुद्र में गए और मर्जबान को निकाल कर उसे बादशाह के समक्ष ले गए। बादशाह ने उससे बात करने के बाद आदेश दिया कि यह व्यक्ति शिक्षित और बुद्धिमान है और शहजादे का समवयस्क भी अतएव इसे उसके साथी के रूप में शहजादे के पास रखा जाए। उसने शहजादे की बीमारी का हाल उससे कहा।
 
मर्जबान अँगूठी बदलने की बात सुन कर समझ गया कि बदौरा इसी शहजादे की बातें करती है। उसने बादशाह से प्रार्थना की कि अगर उसे एकांत में शहजादे से बात करने दिया जाए तो संभव है कि शहजादे का रोग दूर हो जाए। बादशाह ने इसकी अनुमति दे दी। अकेले में कमरुज्जमाँ ने मर्जबान से पूछा कि तुम कौन हो और कहाँ से आए हो। उसने धीरे से कहा, सरकार, मैं चीन से आया हूँ। जो सुंदरी आपके समीप आ कर लेटी थी और जिससे आपने अपनी अँगूठी बदली है उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। वह चीन के महापराक्रमी सम्राट की पुत्री है। उसका नाम बदौरा है। जिस प्रकार आप उसके वियोग में उन्मत हो गए हैं वैसे ही वह भी आपके विछोह में जलविहीन मछली की तरह तड़पती रहती है।

मर्जबान ने आगे बताया, मैं उसका दूध भाई हूँ और उसे मुझ पर पूरा विश्वास है, इसलिए उसने मुझे अपना और आपका हाल ब्योरेवार बताया है। आप ही की भाँति वह भी अपने पिता के आदेशानुसार कैद में है बल्कि आप से अधिक दुर्दशा में है क्योंकि उसे सोने की जंजीरों से बाँध दिया गया है। उसके पिता ने मुनादी करवा दी है कि जो कोई मेरी बेटी को ठीक कर देगा उसे मैं अपना दामाद और युवराज बना दूँगा। किंतु जो इस प्रयत्न में असफल हुआ उसे मरवा डालूँगा। इसी चक्कर में लगभग डेढ़ सौ ज्योतिषियों, रमल के जानकारों, तांत्रिकों, हकीमों ने अपनी जान गँवा दी है और नगर की रक्षाभित्ति के सहारे उनके सिर लटके हैं। अगर आप वहाँ जाएँगे तो निश्चय ही शहजादी ठीक हो जाएगी और सम्राट अपने वचन के अनुसार उससे आप का विवाह करा देंगे और आप को सम्राट के मरणोरपरांत वहाँ का राज्य भी मिलेगा। इसीलिए अब सबसे पहले तो जरूरी है कि आप ठीक तरह से स्वास्थ्यवर्धक भोजन कर के अपने शरीर में शक्ति पैदा करें और फिर मेरे साथ चीन चलें।

कमरुज्जमाँ को यह सुन कर इतनी प्रसन्नता हुई कि वह उत्साह के मारे खड़ा हो गया। उसे अपनी प्रियतमा से मिलने की आशा हो गई थी। उसने स्नान कर के अच्छे वस्त्र धारण किए और सब से साधारण रूप में हँसने-बोलने लगा। उसने अपने पिता के साथ डट कर भोजन किया। बादशाह यह देख कर फूला न समाया। उसने अपने पुत्र को गले लगाया और खिरद द्वीप के किले से निकाल कर अपने महल में ले गया। उसने राज्य भर में शहजादे के स्वास्थ्यलाभ पर बड़ा भारी उत्सव कराया और महल में सामंतों और प्रमुख नागरिकों की बड़ी शानदार दावत की। उसने दीन, अनाथ और भिखारियों को मुँह माँगा दान भी दिया। राज्य के सभी लोग अपने शहजादे के स्वास्थ्य लाभ से बहुत प्रसन्न हुए और कई दिनों तक उत्सव चलता रहा।

कमरुज्जमाँ ने अब स्वास्थ्यकारी भोजन करना आरंभ कर दिया था। इसलिए कुछ ही दिनों में उसके शरीर में पूर्ववत शक्ति आ गई। फिर उसने मर्जबान से कहा कि अब मुझमें वियोग सहने की और शक्ति नहीं है, मैं तुम्हारे साथ चीन के लिए तुरंत ही रवाना होना चाहता हूँ किंतु मेरे पिताजी मुझे इतना चाहते हैं कि इतनी दूर की यात्रा की अनुमति न देंगे। यह कह कर वह रोने लगा।

मर्जबान ने कहा, आपकी बात ठीक है किंतु एक तरकीब है जिससे आप यहाँ से निकल सकते हैं। आप अपने पिता से दो-तीन दिन के लिए आखेट पर जाने की अनुमति लीजिए और अपने साथ मुझे और कुछ सेवकों को रखिए। साथ में दो असील तीव्रगामी घोड़े भी ले चलें। वहाँ से हम दोनों चीन को चल देंगे।

शहजादे को उसकी राय पसंद आई। उसने बादशाह से आखेट की अनुमति माँगी जो उसने प्रसन्नतापूर्वक दे दी। यह लोग पूर्व दिशा की ओर चल दिए। सायं होने पर यह लोग एक सराय में रुके। खाने-पीने के बाद और लोग सो गए किंतु आधी रात को यह दोनों अपने तेज घोड़े पर निकल पड़े। उन्होंने एक तीसरा मामूली घोड़ा भी लिया और राजसेवकों जैसी एक पोशाक भी। पाँच-छह घंटे चलने के बाद वे उस चौराहे पर पहुँचे जहाँ से जंगल शुरू होता था। मर्जबान ने शहजादे से कहा कि आप अपने कपड़े उतार कर मुझे दे दें और यह नौकरों जैसे कपड़े पहन लें। शहजादे ने ऐसा ही किया। मर्जबान ने तीसरे घोड़े को मार डाला और उसके खून में कमरुज्जमाँ की शाही पोशाक फाड़ कर लिथेड़ दी और घोड़े की लाश को खींच कर छुपा दिया और चौराहे के पास खून से सनी और तार-तार शाही पोशाक डाल दी। शहजादे ने आश्चर्य से पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया।

मर्जबान ने कहा, आप के सेवकगण आप को ढूँढ़ते हुए यहाँ आएँगे और इन कपड़ों को देख कर समझेंगे कि कोई वन्य पशु आपको खा गया। फिर आपकी तलाश छोड़ दी जाएगी और हम आराम से चलेंगे।

तत्पश्चात वे दोनों बहुत-सी अशर्फियाँ और जवाहिरात ले कर कभी समुद्री और कभी थल मार्ग से यात्रा करते हुए चीन पहुँचे। उन्होंने एक सराय में ठहर कर तीन दिन तक विश्राम किया। इस बीच मर्जबान ने शहजादे के लिए हकीमों जैसे कपड़े बनवा लिए। फिर हम्माम में दोनों ने स्नान किया और शहजादे ने हकीमी लिबास पहना। मर्जबान ने कहा कि अब तुम बादशाह के पास हकीम बन कर जाओ और बदौरा की चिकित्सा की बात करो और मैं बदौरा के पास जा कर तुम्हारे आगमन का समाचार देता हूँ। यह कह कर वह अपने घर गया और अपनी माँ से कहा कि तुम तुरंत शहजादी को मेरे आने की खबर करो।

इधर कमरुज्जमाँ महल में नीचे पहुँचा और पुकार कर कहने लगा, मैं दूर देश से आया हुआ हकीम हूँ। मैं शहजादी का इलाज करना चाहता हूँ। यदि शहजादी मेरे इलाज से अच्छी हो जाएगी तो बादशाह अपने वचनानुसार उससे मेरा विवाह कर दें वरना मुझे मृत्युदंड दे दें। बादशाह के सेवकों ने उसकी सौंदर्य और यौवनावस्था को देख कर दुख किया कि यह कहाँ मरने के लिए आ गया है। उन्होंने उसे बहुत समझाया कि क्यों अपनी जान का दुश्मन हुआ है, तेरे जेसे न मालूम कितने आदमी मर गए हैं। किंतु कमरुज्जमाँ अपनी बात पर दृढ़ रहा। सेवक उसे सम्राट के पास ले गए।

कमरुज्जमाँ दरबार में जा कर धड़धड़ाता हुआ सम्राट के बगल में बैठ गया। सम्राट को इस बात पर क्रोध आना चाहिए था किंतु वह इस जवान हकीम की हालत पर तरस खाने लगा। उसके समझाने पर भी जब कमरुज्जमाँ न माना तो सम्राट ने उससे प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराए और बदौरा के आवास में उसे भेज दिया। वहाँ का प्रधान रक्षक शहजादे को बाहर बिठा कर बदौरा को बताने गया कि तुम्हारा इलाज करने के लिए एक हकीम आया है। शहजादी ने कहा, उसे भी लाओ।

प्रधान रक्षक ने आ कर कहा कि शहजादी तुम्हें बुलाती हैं। कमरुज्जमाँ ने कहा कि मेरे वहाँ जाने की जरूरत नहीं है। यहीं से उसे ठीक कर दूँगा। शहजादे ने कलम- दवात निकाल कर एक पत्र लिखा जिसमें उनकी मिलन-रात्रि का वर्णन था और उस पत्र को बदौरा की अँगूठी के साथ बदौरा के पास भेज दिया। बदौरा ने पत्र पढ़ा और अपनी अँगूठी पहचान ली और समझ गई कि यह मेरा प्रिय पुरुष है। उसने झटके से जंजीरें तोड़ डालीं और दौड़ती हुई वहाँ आई जहाँ शहजादा बैठा था। दोनों ने एक-दूसरे को पहचान आलिंगनबद्ध हो गए।

शहजादी की परिचारिका बुढ़िया ने दोनों को अंदर बैठाया। दोनों प्रेम की बातें करने लगे। बदौरा ने अपनी अँगूठी शहजादे को दे कर कहा, तुम इसे अपने पास ही रखो और मैं भी तुम्हारी अँगूठी अपनी जान से भी प्यारी समझ कर अपने पास रखूँगी।

बदौरा के प्रधान रक्षक ने दौड़ कर सम्राट को सूचना दी कि हकीम ने तो दूर ही से शहजादी को स्वस्थ कर दिया और अब वह बिल्कुल सामान्य रूप से बातचीत कर रही है। सम्राट तुरंत ही बदौरा के आवास में आया और बेटी को पूर्ण स्वस्थ देख कर अपने सीने से लगा लिया। फिर उसने बदौरा का हाथ कमरुज्जमाँ के हाथ में दे कर कहा कि मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी बेटी तुम्हें दे रहा हूँ। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो और कहाँ से आए हो। कमरुज्जमाँ ने कहा कि मैं न हकीम हूँ न तांत्रिक। मैं फारस देश के खलदान नामक भाग के बादशाह का पुत्र हूँ। फिर उसने अपने प्रेम का सविस्तार वर्णन सम्राट के सन्मुख किया। सम्राट को यह सब सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने आदेश दिया कि इस वृत्तांत को स्वर्णाक्षरों में लिखवा कर शाही ग्रंथागार में रखवा दिया जाए। फिर उसने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि विवाह की तैयारियाँ की जाएँ। कुछ दिनों में तैयारियाँ पूरी हो गईं और बदौरा का करुज्जमाँ के साथ विवाह हो गया। दोनों प्रेमियों की बड़े दिनों की मनोकामना पूरी हुई और वे आनंदपूर्वक रहने लगे। सम्राट ने कमरुज्जमाँ को अपना मंत्री नियुक्त कर दिया और उससे राज्य प्रबंध में सहयोग लेने लगा।

किंतु यह आनंद-उल्लास कुछ दिनों बाद ठंडा पड़ गया। हुआ यह कि कमरुज्जमाँ ने एक रात यह स्वप्न देखा कि उसका पिता मरणासन्न है और रो-रो कर कह रहा है कि हाय मेरा इकलौता बेटा मुझसे बिछुड़ गया और उसके वियोग में मेरे प्राण निकल रहे हैं। कमरुज्जमाँ यह स्वप्न देख कर चौंक उठा और दुख के मारे रोने लगा। उसके रोदन से उसकी पत्नी जाग गई और परेशान हो कर पूछने लगी कि तुम्हें क्या हो गया है, रो क्यों रहे हो। कमरुज्जमाँ ने उसे बताया कि मैंने क्या सपना देखा है।

शहजादी बदौरा समझ गई कि उसे अपने पिता की बहुत याद आएगी और उसका जी इस देश में नहीं लगेगा। उसने शहजादे को दिलासा दिया कि मैं तुम्हें तुम्हारे पिता से मिलवाने का प्रबंध करूँगी। इससे दूसरे दिन उसने अपने पिता से कहा कि हम लोग एक वर्ष के लिए देशाटन को जाना चाहते हैं। उसने खेदपूर्वक यह बात स्वीकार कर ली और बहुत-से सेवक, घोड़े, हाथी, अशर्फियाँ और रत्नादि दे कर कहा कि तुम लोग एक वर्ष में वापस जरूर आ जाना। वह स्वयं भी कुछ दूर तक उनके साथ गया।

अब यहाँ से कमरुज्जमाँ पर नई विपत्तियाँ पड़नी शुरू हो गईं। एक महीने की यात्रा के बाद वे लोग एक विशाल वन के किनारे पहुँचे। कमरुज्जमाँ थक गया, उसने बदौरा से कहा कि कहो तो यहाँ डेरा डाल कर कुछ समय तक आराम कर लें। बदौरा भी यही चाहती थी। उसने कहा कि मैं तुमसे भी अधिक थक गई हूँ, यहाँ तक की यात्रा में हमारे बहुत-से सेवक पीछे छूट गए हैं, वे भी हम लोगों के साथ आ कर मिल जाएँगे।

कमरुज्जमाँ की आज्ञा पा कर उसके सेवक फर्राशों ने सघन पेड़ों की छाया में तंबू लगा लिया। उनके अन्य साथी और सैनिक भी अपने तंबू तान बैठे, बदौरा गर्मी और थकन से बड़ी व्यथित थी। वह डेरे के सज जाने पर उसमें जा कर उसमें बिछे पलंग पर लेट गई और लेटते ही सो गई। कुछ समय के बाद बाहरी प्रबंध की देख-भाल कर के कमरुज्जमाँ भी वहाँ आया और पत्नी के बगल में लेट रहा।

बदौरा ने लेटने से पहले अपनी कमर का पटका खोल कर वहीं पास में डाल दिया था। यह पटका रत्नजड़ित था और इसमें जरदोजी के काम का एक बटुआ भी बँधा था। कौतूहलवश शहजादे ने वह बटुआ उठाया तो मालूम हुआ कि उसके अंदर कोई ठोस और कठोर-सी वस्तु है। कमरुज्जमाँ ने बटुआ खोल कर उसे निकाला तो देखा कि वह एक बड़ा-सा लाल था जिस पर कुछ यंत्र जैसा बना था। शहजादे को ताज्जुब हुआ कि बदौरा ने उसे सुरक्षापूर्वक किसी पेटिका में न रख कर ऐसी बेपरवाही से क्यों फेंक दिया। वास्तव में यह यंत्र बदौरा की माँ ने उसकी रक्षा के लिए दिया था। शहजादा उसे डेरे से बाहर लाया ताकि प्रकाश में उसके अक्षर पढ सके किंतु तभी एक पक्षी उसे उसके हाथ से ले कर उड़ गया।

शहजादे को बड़ी परेशानी हुई कि उसकी प्रिया की यह अमूल्य वस्तु उसके हाथ से ही निकली। उसने पक्षी का पीछा किया। पक्षी कुछ दूर जा बैठा। जब शहजादा उसके पास गया तो वह उड़ कर फिर कुछ दूर जा बैठा। शहजादा फिर उसके पास पहुँचा तो पक्षी ने वह लाल निगल लिया और फिर कुछ दूर तक उड़ कर बैठ गया। कमरुज्जमाँ इसी प्रकार उसका पीछा करता रहा। शाम तक वह पक्षी इसी प्रकार कमरुज्जमाँ को भटकाता रहा। कमरुज्जमाँ अपने लश्कर से दूर निकल गया था और उसे दिशा ज्ञान भी नहीं रहा। उसने पेड़ों के कुछ फल खाए और एक पेड़ की छाँह में सो रहा।

सवेरे उसने देखा कि वह पक्षी उसी पेड़ पर बैठा है। कमरुज्जमाँ ने उसे पकड़ना चाहा तो वह फिर उड़ कर दूर जा बैठा। इसी प्रकार दूसरे दिन भी उस पक्षी ने कमरुज्जमाँ को दिन भर अपने पीछे दौड़ाया। वह बेचारा दिन भर पक्षी का पीछा करता और रात को किसी पेड़ के नीचे सो रहता।

वह सोचता कि वापस जाऊँ भी तो लश्कर का पता कहाँ मिलेगा। इससे अच्छा है कि इस पक्षी को पकड़ कर इसके अंदर से माणिक निकाल लूँ।

ग्यारहवें दिन वह पक्षी एक नगर के समीप पहुँचा। कमरुज्जमाँ भी उसके पीछे-पीछे चला। अब वह पक्षी तेजी से उड़ा और एक विशाल भवन के पीछे जा कर ऐसा लोप हुआ कि कमरुज्जमाँ के लाख ढूँढ़ने पर भी वह दिखाई नहीं दिया। कमरुज्जमाँ की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। वह नगर समुद्र के तट पर बसा था। कमरुज्जमाँ बहुत देर तक उस नगर की सड़कों और गलियों में भटकता रहा ताकि किसी नागरिक से सहायता माँगे किंतु वहाँ के किसी आदमी ने उससे बात ही नहीं की।

अब वह बेचारा शहर से निकल कर समुद्र तट पर घूमने लगा। उसे एक बाग दिखाई दिया और उसके अंदर जाने को उद्यत हुआ किंतु बाग के माली ने उसे देख कर बाग का फाटक बंद कर लिया। कमरुज्जमाँ को इस से आश्चर्य हुआ और उसने माली से पूछा कि तुमने मुझे देख कर फाटक क्यों बंद कर लिया। माली ने उत्तर दिया, यह मैंने इसलिए किया कि तुम मुसलमान हो। तुम परदेसी हो इसलिए यहाँ की बातें नहीं जानते। यह देश प्रस्तर पूजकों का है। यहाँ के लोग मुसलमानों को उत्पीड़ित करना अपने धर्म का एक भाग समझते हैं। मुझे इस बात का आश्चर्य है कि तुम इतनी देर से यहाँ घूम रहे हो और किसी ने तुम्हें अब तक कोई यातना नहीं दी। इसे भगवान की तुम पर अति कृपा कहनी चाहिए।
 
कमरुज्जमाँ की समझ में बिल्कुल न आया कि क्या करूँ। उसकी परेशानी को देख कर बूढ़े माली को दया आई। उसने कहा, खैर तुम भूखे-प्यासे और परेशान मालूम होते हो। चुपके से बाग के अंदर आ जाओ और मेरे झोपड़े में छुप कर बैठो और खा-पी कर कुछ देर आराम करो। कमरुज्जमाँ ने उसके प्रति आभार प्रकट किया और झोपड़े में जा कर कुछ खाया-पिया और फिर माली के पूछने पर अपना सारा हाल बयान किया कि किस प्रकार वह दुष्ट पक्षी मुझे भटकता हुआ यहाँ ले आया है। अपना हाल सुनाते-सुनाते वह रोने लगा कि न जाने अब मेरे प्यारी पत्नी से मेरी भेंट होगी भी या नहीं और उसे ले कर अपने पिता से भी मिल पाऊँगा या नहीं। उसने कहा कि यह भी तो ठीक नहीं है कि मेरी पत्नी अब भी उसी वन में हो जिसमें मैं उन्हें छोड़ आया था।

माली ने उसे बताया, मुसलमानों के देश यहाँ से बहुत दूर हैं। कम से कम एक वर्ष की यात्रा करनी होती है उनमें जाने के लिए। उनमें से सब से निकट का देश अवौनी है। अवौनी भी समुद्र तट पर है और वहाँ से लोग समुद्र के रास्ते आसानी से तुम्हारे पिता के खलदानी द्वीपों में पहुँच जाते हैं। साल में एक बार अवौनी का एक व्यापारी यहाँ आता है और अपने यहाँ की वस्तुएँ यहाँ ला कर बेचता है और यहाँ की पैदावार खरीद कर वापस अपने देश को चला जाता है। वह कुछ दिन पहले ही आया था। तुम उस समय यहाँ होते तो मैं उससे तुम्हारा परिचय करा देता और वह अपने जहाज पर तुम्हें अवौनी ले जाता। किंतु अब वह एक वर्ष के बाद आएगा, तब तक तुम मेरे झोपड़े में आराम से रहो। हाँ, किसी से अपने मुसलमान होने का जिक्र न करना नहीं तो मेरी भी मुसीबत आ जाएगी।

कमरुज्जमाँ ने माली के प्रस्ताव को भी भगवान की दया समझा और वह उसके सहायक के रूप में जीवन यापन करने लगा। दिन भर वह बाग की साज-सँवार करता और रात को बिस्तर पर लेट कर बदौरा की याद में आँसू बहाया करता। उसे एक वर्ष बाद वहाँ से छुटकारे की तो आशा थी किंतु बदौरा से मिलने की कोई उम्मीद कम ही रह गई थी।

उधर बदौरा उस दिन नींद से उठी तो कमरुज्जमाँ को न देख कर बड़े आश्चर्य में पड़ी। फिर उसने अपने पटके को देखा तो मालूम हुआ कि उसमें से बटुआ खोल लिया गया है। वह समझ गई कि शहजादा ही उसे देखने को ले गया होगा। रात होने पर भी शहजादा न लौटा तो वह बड़ी निराश हुई और रोने लगी। उसने क्रोध में यंत्र के निर्माता को खूब गालियाँ दीं जिसके कारण उसके प्रियतम पर यह विपत्ति पड़ी थी। लेकिन वह बुद्धिमती थी, उसने साहस नहीं खोया और तय कर लिया कि आगे क्या करना चाहिए।

शहजादे के जाने का हाल दो-एक दासियों के अलावा किसी को नहीं मालूम था। बदौरा ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी कि वे किसी भी दशा में शहजादे के जाने का समाचार किसी को न दें। वह सोचती थी कि लश्करवाले इस समाचार को सुन कर बगावत न कर दें और उसे कोई हानि न पहुँचाएँ। उसने खुद शहजादे के कपड़े पहने और उसी की तरह साज-सज्जा की। फिर उसने लश्कर के लोगों के लिए आदेश पहुँचवाया कि कल सुबह अँधेरा रहते ही यहाँ से कूच कर दिया जाए। उसने अपनी पालकी में अपनी जगह एक दासी को बिठा दिया और स्वयं एक तीव्रगामी घोड़े पर सवार हो गई। शाही लश्कर के कूच करते ही मौका पा कर उसने एक अन्य दिशा में अपना घोड़ा दौड़ा दिया।

वह कई मास तक कभी जल मार्ग और कभी थल मार्ग से यात्रा करती हुई, जिसके दौरान हर जगह अपने पति का पता लगाती जाती थी, अवौनी में पहुँची। उसने अपना नाम खलदान द्वीप का शहजादा कमरुज्जमाँ बताया था। अवौनी के बादशाह अश्शम्स को उसके आगमन का समाचार मिला तो वह उससे भेंट करने के लिए स्वयं ही सागर तट पर गया जहाँ बदौरा के जहाज ने लंगर डाला था। अवौनी और खलदान देशों के बादशाहों में मैत्री के संबंध थे। बादशाह ने बदौरा को कमरुज्जमाँ समझ कर उसका बड़ा सम्मान किया और आदरपूर्वक उसे अपने महल में ले आया और तीन दिन तक उसके सम्मान में कई भोज और समारोह किए। इसके बाद कमरुज्जमाँ रूपी बदौरा ने विदा की अनुमति चाही।

अवौनी का बादशाह उसके रूप और चातुर्य पर मुग्ध था और चाहता था कि उसे अपने पास रखूँ। लेकिन इस बात को सीधी तरह न कह कर उसने कहा, मेरे युवा मित्र, तुम जानते हो कि मैं अब वृद्ध और अशक्त हो गया हूँ और राज्य संचालन में मुझे कठिनाई होती है। मेरा कोई पुत्र नहीं है जो मेरी सहायता करे। मेरे केवल एक बेटी है जो अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान है। मैं चाहता हूँ कि उसका विवाह उसी के अनुरूप किसी सुंदर और चतुर व्यक्ति के साथ कर के निश्चिंत हो जाऊँ। तुम हर तरह से उसके योग्य हो, इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम उससे विवाह कर लो और मेरे राज्य के उत्तराधिकारी बन जाओ। तुम्हें इस बारे में क्या कहना है?

बदौरा बड़ी उलझन में पड़ी। सोचने लगी यदि मैं वास्तव में पुरुष होती तो इससे अच्छा अवसर मेरे जीवन में आना नहीं था। लेकिन मैंने तो मजबूरी में यह वेश धारण किया है, मैं राजकुमारी के साथ विवाह कैसे कर सकती हूँ? सुहागरात ही में मेरा भेद खुल जाएगा और फिर सभी अपने-परायों में मेरा न जाने कितना अपमान होगा। और अगर मैं विवाह से इनकार करती हूँ तो बादशाह नाराज हो जाएगा और नाराज हो कर न जाने मुझ पर क्या-क्या अत्याचार करे, संभव है आजीवन कारावास दे दे। अभी तक मेरे पति का भी पता नहीं चला है और मुझे उसका पता लगाना है। यह सब सोच कर उसने विवाह के लिए स्वीकृति इस शर्त पर दे दी कि एक दिन का अवकाश दिया जाए जिसमें साथ के लोगों की सलाह भी ले ली जाए। बादशाह ने इसकी अनुमति दे दी और अपने सामंतों और दरबारियों को बुला कर कहा कि मैंने इस नवागंतुक से अपनी बेटी का विवाह करने का निश्चय किया है, आप लोग इस बारे में क्या कहते हैं? उन लोगों ने कहा कि आपका निर्णय अत्युत्तम है।

अतएव बड़ी धूमधाम से कमरुज्जमाँ बनी हुई बदौरा का विवाह अवौनी की शहजादी के साथ हो गया। इसके बाद बादशाह ने उतनी ही धूमधाम से अपने तथाकथित दामाद को युवराज बनाने की रस्म पूरी की और राज्य का प्रबंध उसके सुपुर्द कर दिया। सभी सामंतों ने उसे भेंटें दीं। रात को बदौरा को शहजादी के शयनकक्ष में पहुँचा दिया गया। बदौरा आधी रात तक ईश्वर की वंदना में लगी रही और जब शहजादी सो गई तो पलंग के किनारे खुद भी सो गई। अवौनी की रस्म थी कि बेटी का उसके पति से प्रथम संभोग होने पर बड़ी धूमधाम से समारोह किया जाता था। इसलिए दूसरे दिन बादशाह ने इशारे से अपनी बेटी से रात का हाल पूछा।

शहजादी सिर झुका कर बैठी रही। उसकी उदासी देख कर बादशाह समझ गया कि इसकी इच्छापूर्ति नहीं हुई। उसने कहा, शायद तुम्हारा पति दिन के कामकाज के कारण कल रात को बहुत थक गया था इसीलिए तुम से बोला-चाला नहीं। आज की रात देखो क्या होता है। लेकिन होना क्या था, उस रात भी बदौरा अलग-थलग हो कर लेटी रही। दूसरे दिन बादशाह को मालूम हुआ तो वह क्रोध से भर गया। वह कहने लगा, इस युवक में इतनी धृष्टता आ गई कि मेरी बेटी का अपमान कर रहा है। अगर आज रात भी वह इसी तरह अलग-थलग रहा तो मैं कल उसे मृत्युदंड दूँगा, उससे छुटकारा पाने पर मेरी बेटी का दूसरा विवाह तो हो सकेगा।

तीसरी रात को भी आधी रात तक ईशवंदना करने के उपरांत जब बदौरा शहजादी को सोता जान कर पलंग पर एक ओर लेटी तो शहजादी उठ बैठी और बोली, प्यारे, आखिर बात क्या है। दो रातें हो गईं और तुमने मुझे स्पर्श करना तो क्या मुझसे बात तक नहीं की। मैं तो तुम पर जी-जान से मुग्ध हूँ और तुम बात भी नहीं करते। मुझसे क्या अपराध हुआ है जो तुम क्रुद्ध हो? मुझमें कोई कमी है जिससे तुम असंतुष्ट हो? मेरे पिताजी कहते थे कि अगर बेटी आज रात को भी कुँवारी रही तो दामाद को मरवा डालूँगा।

बदौरा यह सुन कर अत्यंत व्याकुल हुई किंतु चुप रही। वह सोच रही थी कि अपना असली भेद बताती हूँ तो बादशाह धोखेबाजी पर जरूर मुझे मरवा देगा और अगर चुप रहती हूँ तो भी उसकी कोपाग्नि में मुझे जल मरना ही होगा। उसे चुप देख कर शहजादी उससे लिपट गई और कहने लगी, प्राणप्रिय, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा। तुम्हारे चेहरे का रंग क्यों उड़ गया। तुम अपनी चिंता मुझे क्यों नहीं बताते? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, हर प्रकार तुम्हें सुखी ही देखना चाहती हूँ।

यह सुन कर बदौरा की अश्रुधारा बह निकली और उसे अशक्तता के कारण गशी आने लगी। किंतु उसने स्वयं को स्थिर किया और बोली, मेरी प्यारी, मैंने तुम्हारा बड़ा अपकार किया है। मैं अपना सारा वृत्तांत तुम से ब्योरेवार कहती हूँ, इसके बाद तुम्हें अधिकार होगा कि चाहे मेरी मजबूरी देख कर मुझे क्षमा कर दो या अपराधी समझ कर मरवा डालो।

उसने शहजादी को अपनी छाती खोल कर दिखाई और बोली, बहन, मैं भी तुम्हारी तरह औरत हूँ। मैं चीन के सम्राट की बेटी हूँ। अब अपना पूरा हाल कहती हूँ। यह कह कर बदौरा ने आरंभ से ले कर उस दिन तक की सारी आपबीती विस्तारपूर्वक शहजादी को सुनाई। फिर वह हाथ जोड़ कर बोली, मेरी तुम से प्रार्थना है कि जब तक मेरे पति का पता न चले तुम मेरा यह भेद छुपाए रखो। मुझे पूरी आशा है कि उससे भेंट अवश्य होगी। जब वह आ जाए तो तुम भी उससे विवाह कर के मेरे साथ सपत्नी बन कर रहना। हम दोनों मिल कर उसकी सेवा करेंगे और बहनों की तरह आपस में प्रीतिपूर्वक रहेंगे।

अवौनी की शहजादी बदौरा के साहस से बड़ी प्रभावित हुई और बोली, तुमने मुझे सब कुछ बता कर बहुत अच्छा किया। अब तुम पुरुष के रूप में निश्चिंत हो कर राजकाज करो, तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। सब मुझ पर छोड़ दो।

दूसरे दिन शहजादी ने अपनी दासियों को ऐसे इशारे दिए जिनसे स्पष्ट हो गया कि उसके साथ उसके पति ने संभोग कर लिया है। पहले भी रात में उसने ऐसी ध्वनियाँ कीं जिससे बाहर बैठी हुई दासियाँ समझें कि रात-कार्य हो रहा है। अतएव दूसरे दिन खूब धूमधाम हुई। बदौरा दिन भर राजकाज करती और रात को दोनों सहेलियाँ एक-दूसरे का आलिंगन कर के सो जातीं।

उधर कमरुज्जमाँ प्रस्तर पूजकों के देश में माली के साथ रहता हुआ मालीगीरी में दिन बिता रहा था। एक दिन माली ने कहा, आज यहाँ प्रस्तर पूजकों का महोत्सव है। आज के दिन यहाँ के लोग न खुद काम करते हैं न किसी को करने देते हैं। आज वे मुसलमानों या किन्हीं अन्य धर्मावलंबियों को दुख भी नहीं देते। तुम आराम से नगर में घूमो और वहाँ के खेल-तमाशे देखो। मैं भी अपने मित्रों के पास जा रहा हूँ। मैं उनसे पूछूँगा कि अवौनीवाला जहाज कब छूटेगा ताकि मैं तुम्हारे लिए यथेष्ट खाद्य सामग्री उस पर रख दूँ।

यह कह कर माली समुद्र की ओर चल दिया। कमरुज्जमाँ का जी न चाहा कि नगर में जा कर वहाँ के खेल-तमाशों में मन बहलाए। वह खाली समय पा कर अपनी पत्नी की याद में रोने लगा। कुछ देर में उसने स्वयं को सँभाला और निरुद्देश्य इधर-उधर देखने लगा। इतने में उसने देखा कि समीप के वृक्ष पर दो पक्षी आ कर लड़ने लगे। काफी देर की लड़ाई के बाद उनमें से एक पक्षी मर कर नीचे गिर पड़ा और दूसरा उड़ गया। कुछ ही देर में उसी प्रकार के किंतु बड़े डील-डौलवाले दो पक्षी आए और मृत पक्षी के सिर और दुम की ओर बैठ कर सिर हिलाने लगे जैसे उसकी मृत्यु पर शोक कर रहे हों। फिर उन्होंने चोंचों और पंजों से एक गढ़ा खोद कर मृत पक्षी को उसमें गाड़ा और उड़ गए। कुछ देर में वे उस पक्षी को, जिसने पहले पक्षी को मारा था, अपने पंजों में दबा लाए और उसे भूमि पर रख कर उन्होंने उसके पंख नोच डाले और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इसके बाद वे उड़ गए।
 
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