उसने थोड़ा सा थूक अपने हाथ मे जमा किया ऑर मेरे लंड पर अच्छी तरह थूक लगा दिया ऑर गीला कर दिया बाकी बचा थूक उसने अपनी चूत पर मल दिया. अब फिर से उसने लंड को निशाने पर रखा ऑर मेरी गान्ड को दबा दिया ये इशारा था कि मैं फिर से ज़ोर लगाऊ इस बार जब मैने झटका मारा तो लंड फिसलता हुआ आधा अंदर चला गया ऑर रुक गया. उसके मुँह से फिर एक ससिईईईईईईईईईईईई की आवाज़ निकली ऑर उसने मेरे कान मे कहा "ये तो बहुत मोटा है मुझे दर्द हो रहा है थोड़ा आराम से करो"
अब मैने उसके मुँह को पकड़के उसके होंठ चूसने शुरू कर दिए ताकि अगले झटके पर वो चीख ना दे अब उसके दोनो होंठ मेरे मुँह मे क़ैद थे ओर मैने एक जोरदार झटका लगाया जो कि उसकी चूत की दीवारो को पिछे धकेल्ता हुआ पूरा लंड अंदर चला गया उसने अचानक से अपना मुँह उपर की तरफ कर लिया ऑर उसका मुँह एक दम से खुल गया ऑर एक तेज़ आआहह उसके मुँह मे ही दबके रह गई उसने अपने सिर को दाए-बाए मारना शुरू कर दिया इसलिए मैने अब उसके मुँह को आज़ाद कर दिया तो उसके मुँह से निकला सीईईईईईई आईईई मर गई अम्मिईीईईईईईई आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह. मेरा अंदाज़ा सही था क्योकि अगर उसका मुँह आज़ाद होता तो नीचे से कोई भी उसकी चीख सुन सकता था. ऐसा नही था कि फ़िज़ा कुँवारी थी लेकिन शायद उसके पति का लंड काफ़ी छोटा था या फिर वो इतने वक़्त से चुदि नही थी तो उसकी चूत अंदर से बंद हो गई थी इसलिए उसको ज़्यादा दर्द हो रहा था. अब मैं कुछ देर के लिए फिर रुक गया ऑर लंड को अंदर अपनी जगह बनाने के लिए थोडा वक़्त दिया ताकि चूत मेरे लंड को पूरी तरह आक्सेप्ट कर ले ऑर फ़िज़ा को दर्द ना हो.
अब मैं लंड फ़िज़ा की चूत मे डाले आराम से उसके मम्मे चूस रहा था ऑर फ़िज़ा मेरे सिर पर ऑर पीठ पर अपने नाज़ुक हाथ फेर रही थी अब फ़िज़ा का दर्द भी ठीक हो गया था इसलिए उसने नीचे से अपनी गान्ड को उपर की तरफ उठाना शुरू कर दिया मैने भी धीरे-धीरे झटके लगाने शुरू कर दिए. कुछ देर बाद हम दोनो की एक लय सी बन गई जब लंड बाहर को जाता तो वो अपनी गान्ड भी नीचे को ले जाती जब लंड अंदर को दाखिल होता तो वो भी अपनी गान्ड उपर को उठा देती हम दोनो मज़े की वादियो मे खोए हुए थे एक दूसरे को बुरी तरह चूम ऑर चाट रहे थे. अचानक फ़िज़ा ने मुझे ज़ोर से झटके मारने को कहा मैने भी धीरे-धीरे अपने झटको मे तेज़ी पैदा की अब नीचे ठप्प्प...ठप्प्प...ठप्प्प की आवाज़े आ रही थी फ़िज़ा की चूत बुरी तरह पानी छोड़ थी अब उसने अपनी गान्ड को नीचे से ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया मैं भी अब उसको ऑर तेज़ी से झटके लगा रहा था .
फ़िज़ा ने अपनी दोनो टांगे हवा मे उठाके मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट ली अचानक उसकी टांगे फिर से काँपने लगी ऑर उसने मुझे ज़ोर से अपने गले से लगा लिया मैं नीचे से लगातार ज़ोर से झटके लगाए जा रहा था ऑर एक तेज़ आआहह नीर मेरिइईईई जानंननननणणन् हेययीयीयियीयियी कहती हुई फ़िज़ा ठंडी पड़ गई मैं अभी भी ठंडा होने के कही करीब भी नही था इसलिए झटके लगाता रहा अब फ़िज़ा ने मुझे उपर से हटने का इशारा किया ऑर खुद मेरे उपर आ गई ऑर मेरे लंड को पकड़ कर चूत के छेद पर सेट करके एक आअहह के साथ लंड पर बैठती चली गई. अब उसकी चूत ने एक ही झटके मे पूरा लंड अंदर ले लिया था बिना फ़िज़ा को किसी क़िस्म का दर्द दिए शायद अब उसकी चूत खुल गई थी. अब वो मेरे उपर थी ऑर मैं नीचे लेटा था फ़िज़ा उपर नीचे हो रही थी उसके इस तरह से करने से उसकी बड़ी गान्ड थप्प्प्प.....थप्प्प्प की आवाज़ पैदा कर रही थी अब वो मेरे उपर लेट गई ऑर फिर से मेरे होंठ चूसने लगी नीचे से उसकी गान्ड लगातार झटके लगा रही थी मैने उसके मम्मों को अपने दोनो हाथो से थाम लिया ऑर उसकी निपल्स को अपने अंगूठे ऑर उंगली की मदद से मरोड़ने लगा जिसमे उसे शायद बोहोत मज़ा आ रहा था कुछ ही देर मे उसके झटके जोरदार हो गये वो लगातार तेज़ी से उपर नीचे हो रही थी
मैने भी नीचे से अब झटके लगाना शुरू कर दिया था वो मज़े से मेरी छाती पर हाथ फेर रही थी ऑर झटके लगा रही थी कुछ ही देर मे वो आअहह.....आअहह करती हुई फिर से ठंडी पड़ गई ओर मेरी छाती पर ही लुडक गई ऑर तेज़-तेज़ साँस लेने लगी. थोड़ी देर लेटने के बाद उसने मेरे कान मे कहा नीर आपका हुआ नही मैने ना मे सिर हिला दिया उसने फिर मेरे कान मे बोला आदमी हो या जानवर मेरा शोहर इतनी देर मे 5 बार ठंडा हो जाता आप एक बार भी नही हुए लगता है आज मुझे भी मेरा असल मर्द मिल ही गया ऑर इतना कहकर उसने फिर से मेरे होंठ चूम लिए ऑर मुझे अपने उपर आने को कहा.
मैं अब अपनी पुरानी आई हुई याद की तरह उसको चोदना चाहता था इसलिए उसकी बाजू पकड़ कर उसको उठाया ऑर घुमा कर उसको दोनो घुटनो पर दोनो हाथो पर किसी जानवर की तरह खड़ा कर दिया उसको कुछ समझ नही आ रहा था क्योकि ये तरीका उसके लिए शायद नया था. मैने अंधेरे मे अंदाज़े से उसकी चूत को ढूँढ कर लंड को निशाने पर रखकर एक जोरदार झटका लगाया मेरा लंड उसकी चूत को खोलता हुआ अंदर चला गया उसके मुँह से एक "आआययईीीईईईई सस्सिईईईईई आराम से करो" की आवाज़ निकली. अब मैने उसकी बड़ी सी गान्ड को अपने दोनो हाथो मे थामा ऑर तेज़-तेज़ झटके लगाने शुरू कर दिए जो उसको ऑर भी मज़ेदार लगे. अब मैने एक हाथ से उसके लंबे बालो को पकड़ लिया था ऑर दूसरे हाथ से उसकी गान्ड पर थप्पड़ मारते हुए उसको बुरी तरह चोदना शुरू कर दिया उसके लिए ये सब नया था इसलिए उसको मेरे ऐसा करने से दर्द भी हो रहा था ऑर मज़ा भी बोहोत आ रहा था इसलिए उसने एक हाथ से अपना मुँह बंद कर लिया ताकि आवाज़ नीचे ना जाए अब मैं बुरी तरह से उसको चोद रहा था ऑर उसके मुँह से सिर्फ़ एम्म्म....एम्म्म की आवाज़ निकल रही थी मेरे इन तेज़ झटको से वो 2 बार ऑर झड चुकी थी लेकिन मेरी इतनी जबरदस्त चुदाई से वो फिर गरम हो जाती थी अब मैं भी मंज़िल के करीब ही था इसलिए अपनी रफ़्तार मे ऑर इज़ाफ़ा कर दिया अब मैने एक हाथ से उसके लंबे बाल पकड़े थे ऑर दूसरा हाथ नीचे से उसके मम्मे को थामे ज़ोर-ज़ोर से दबा रहा था ऑर अचानक एक तेज़ बहाव मेरे लंड मे पैदा हुआ मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे लंड मे से कुछ निकलने वाला है इसलिए मैने अपनी रफ़्तार फुल स्पीड मे करदी...पूरी कोठरी मे तेज़ थप्प्प.....थप्प्प की आवाज़ आ रही थी. लेकिन अब हमें नीचे आवाज़ जाने की भी परवाह नही थी ऑर हम दोनो अपनी मंज़िल को पाना चाहते थे अचानक मेरे लंड ने पहला झटका लिया ऑर एक पिचकारी मेरे लंड से निकली ऑर फ़िज़ा की चूत मे गिरी पहली के बाद दूसरी फिर तीसरी फिर चौथी ऐसे ही मेरे लंड ने कई झटके खाए ओर काफ़ी सारा गाढ़ा माल फ़िज़ा की चूत मे ही छोड़ दिया फ़िज़ा भी अब ठंडी हो चुकी थी लेकिन उसकी चूत अब भी मेरे लंड को अंदर की तरफ दबा रही थी जैसे मेरे लंड को अंदर से चूस रही हो ऑर एक भी कतरा बाहर निकालना उसे मंजूर ना हो. फ़िज़ा अब अपना मुँह बिस्तर पर गिराए हाँफ रही थी मैं भी तेज़-तेज़ साँस ले रहा था मज़े का ये तूफान थम चुका था. हम दोनो ही तेज़ सांसो के साथ एक साथ बिस्तर पर लेटे थे फ़िज़ा मेरे सीने पर सिर रखे मेरे पेट पर हाथ फेर रही थी ओर मेरे सीने को उसके होंठ चूम रहे थे.
usne thoda sa thook apne hath me jama kiya or mere lund par achhi tarah thook laga dia or geela kar diya baki bacha thook usne apni chut par mal diya. ab fir se usne lund ko nishane par rakha or meri gaanD ko daba diya ye ishara tha ki main fir se jor lagau iss baar jab maine jhatka mara to lund fislta hua adha ander chala gaya or ruk gaya. uske munh se fir ek ssiiiiiiiiiiiiii ki awaz nikali or usne mere kaan me kaha "ye to bohot mota hai mujhe dard ho raha hai thoda araam se karo" ab maine uske munh ko pakadke uske honth chusne shuru kar diye taki agle jhatke par wo cheekh na de ab uske dono honth mere munh me kaid the or maine ek jordaar jhatka lagaya jo ki uski chut ki diwaro ko pichhe dhakelta hua poora lund ander chala gaya usne achanak se apna munh upar ki taraf kar liya or uska munh ek dam se khul gaya or ek tez aaaahhhhh uske munh me hi dabke reh gai usne apne sir ko daye-baye marna shuru kar diya isliye maine ab uske munh ko azaad kar diya to uske munh se nikla siiiiiiii aayiiii mar gai ammiiiiiiiiii aaahhh. mera andaza sahi tha kyoki agar uska munh azad hota to niche se koi bhi uski cheekh sun sakta tha. aisa nahi tha ki fiza kanwari thi lekin shayad uske pati ka lund kaafi chhota tha ya fir wo itne waqt se chudi nahi thi to uski chut ander se band ho gai thi isliye usko jyaadaa dard ho raha tha. ab main kuch der ke liye fir ruk gaya or lund ko ander apni jagah banane ke liye thoda waqt diya taki chut mere lund ko poori tarah accept kar le or fiza ko dard na ho.
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अचानक दरवाज़े पर किसी की दस्तक हुई तो हम दोनो ही चोंक गये अंधेरे मे जल्दी-जल्दी फ़िज़ा अपने कपड़े ढूँढने लगी ऑर अपने साथ मे मेरे भी कपड़े उठाके नीचे भाग गई. दरवाज़े पर लगातार दस्तक हो रही थी लेकिन इस हालत मे फ़िज़ा दरवाज़ा नही खोल सकती थी लिहाजा उसने पहले कपड़े पहने फिर दरवाज़ा खोल दिया मैने रोशनदान से देखा तो ये क़ासिम था जो घर आया था अंदर दाखिल होते ही उसने फ़िज़ा को धक्का मारा ओर अंदर दाखिल हो गया ओर फ़िज़ा को गालियाँ देने लगा कि कहाँ मर गई थी इतनी देर से दरवाज़ा खट-खटा रहा था. चल जा ऑर मेरे लिए खाना बना भूख लगी है मुझे. ये बात मुझे बहुत बुरी लगी क्योंकि क़ासिम फ़िज़ा से ऐसे बात कर रहा था लेकिन मैं कुछ नही कर सकता था. फ़िज़ा भी सिर झुकाए रसोई मे चली गई. मैने कुछ देर फ़िज़ा को रसोई मे देखा जहाँ वो क़ासिम के लिए खाना परोस रही थी. लेकिन आज एक नयी चीज़ मैने उसमे देखी थी अक्सर जो फ़िज़ा क़ासिम की गालियाँ सुनकर रोने लग जाती थी आज वोई फ़िज़ा मंद-मंद मुस्कुरा रही थी ऑर बार-बार रोशनदान की तरफ देख रही थी. शायद वो मेरे बारे मे सोच रही थी. कुछ देर मैं फ़िज़ा को देखता रहा फिर बिस्तर पर आके नंगा ही लेट गया. कब नींद ने मुझे अपनी आगोश मे लिया मुझे पता ही नही चला.
आज मैं काफ़ी देर तक सोता रहा. जब आँख खुली तो उसी कोठारी मे खुद को पाया ऑर रात वाला सारा सीन किसी फिल्म की तरह मेरी आँखो के सामने आ गया लेकिन अभी भी दिल मे कई सवाल थे कि रात ऐसा क्यो हुआ आख़िर फ़िज़ा ने ऐसा क्यो किया. मैं अपनी सोचो मे ही गुम था कि किसी ने कोठारी का दरवाज़ा खट-खाटाया तो मेरा ध्यान खुद पर गया क्योंकि रात के बाद मैं नंगा ही सो गया था मैने जल्दी से सामने पड़े कपड़े पहने ऑर धीमी सी आवाज़ मे आ जाओ कहा. मेरे कहने के साथ ही दरवाजा खुल गया ऑर नाज़ी कोठारी मे आ गई.
नाज़ी: आज तो जनाब बहुत देर तक सोते रहे(मुस्कुराते हुए).
मैं: हां वो आज नींद ही नही खुली (सिर पर हाथ फेरते हुए)
नाज़ी: चलो अच्छी बात है वैसे भी आपने कौनसा कहीं जाना है
मैं: आज आप दूध कैसे ले आई रोज़ तो फ़िज़ा जी लाती है ना
नाज़ी: क्यों मेरे हाथ से दूध पी लेने से कुछ हो जाएगा क्या.
मैं: नही ऐसी बात तो नही है
नाज़ी: भाभी आज रसोई के काम मे मशरूफ थी इसलिए उन्होने मुझे दूध दे कर भेज दिया
मैं: अच्छा...वैसे नाज़ जी मुझे आपसे एक बात करनी थी अगर आप सब को बुरा ना लगे तो.....
नाज़ी: मुझे भी आपको कुछ बताना है
मैं : जी बोलिए क्या बात है
नाज़ी: वो हम कल से खेत जा रहे हैं फसल की कटाई शुरू करनी है फसल तैयार हो गई है इसलिए...
मैं: ये तो बहुत अच्छी बात है.... क्या मैं भी आपकी मदद कर सकता हूँ?
नाज़ी: (हँसते हुए) आप चलने फिरने लग गये हो इसका मतलब ये नही कि आप ठीक हो गये हो अभी कोई काम नही चुप करके आराम करो
मैं: सारा दिन यहाँ पड़े-पड़े क्या करूँ आपकी बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप मुझे भी अपने साथ खेतों मे ले जाए वहाँ मैं आप सबको काम करता देखता रहूँगा तो मेरा दिल भी बहल जाएगा ले चलिए ना साथ मुझे भी.
नाज़ी: बात तो आपकी ठीक है लेकिन क़ासिम भाई को हम सबने आपके बारे मे कुछ नही बताया इस तरह आप हमारे साथ चलोगे तो उनको क्या कहेंगी हम की आप कौन हो ओर फिर बाबा भी पता नही आपको साथ ले जाने की इजाज़त देंगे या नही मैं तो ये भी नही जानती
मैं: वैसे क़ासिम भाई कहाँ है
नाज़ी: (मुँह बनाते हुए) होना कहाँ है होंगे अपने आवारा दोस्तो के साथ वो घर पर कभी टिक कर थोड़ी बैठ ते है. बस नाम का ही बेटा दिया है अल्लाह ने हमे अगर वो काम करने वाले होते तो हम को खेतो मे ये सब काम क्यो करना पड़ता सब नसीब की बात है.
मैं: आपने मेरे लिए इतना कुछ किया है एक अहसान ऑर कर दीजिए हो सकता है मैं क़ासिम भाई की थोड़ी बहुत कमी ही पूरी कर दूं वैसे भी आप दोनो लड़किया इतना काम अकेले कैसे करोगी मैं आप दोनो की मदद कर दूँगा खेतो मे....मान जाइए ना
नाज़ी: (कुछ सोचते हुए) ठीक है मैं भाभी से ऑर बाबा से बात करती हूँ तब तक आप ये दूध पी लीजिए.
मैं: ठीक है
फिर नाज़ी नीचे चली गई उसने पहले फ़िज़ा से ऑर फिर बाबा से बात की मेरे लिए तो वो लोग मान गये मैं ये सब रोशनदान से बड़े आराम से उपर से बैठा देख रहा था. फिर नाज़ी उपर आई ओर उसने मुझे नीचे बुलाया कि बाबा आपको बुला रहे हैं. मैं बाबा के कमरे मे गया तो बाबा हमेशा की तरह चारपाई पर बैठे हुक्का पी रहे थे ओर कुछ सोच रहे थे.
मैं: हंजी बाबा जी आपने मुझे याद किया
बाबा: हाँ बेटा पहले तो ये बताओ कि अब तुम्हारी तबीयत कैसी है
मैं: बाबा जी बहुत बेहतर हूँ अब मैं. अब तो मेरे तमाम ज़ख़्म भी भर चुके हैं
बाबा: बेटा ये तो बहुत अच्छी बात है. अच्छा मैने तुमसे कुछ बात करने के लिए बुलाया है
मैं: जी बोलिए
बाबा: बेटा मेरे 2 ही बच्चे है एक ये नाज़ी ओर एक मेरा बेटा क़ासिम लेकिन क़ासिम अब हाथ से निकल गया है. सोचा था उसका निकाह हो जाएगा तो सुधर जाएगा लेकिन वो कुछ वक़्त बाद फिर से वैसा हो गया. अब वो 5 महीने बाद जैल से निकल कर आया है तो भी उसमे कोई सुधर नज़र नही आ रहा. मेरे दिल पर ये बोझ है कि अंजाने मे मैने अपनी बहू की जिंदगी भी बर्बाद कर दी ऐसे नकारा इंसान के साथ उसकी शादी करके वो बिचारी एक बहू के साथ-साथ एक बेटे के फ़र्ज़ भी निभाती चली आ रही है जब से इस घर मे आई है. फ़िज़ा ने इस घर को भी संभाला मेरी भी अच्छे से देख-भाल की ओर खेतों का काम भी संभालती है. अब कल से खेतों मे कटाई शुरू हो रही है ऑर हर बार की तरह क़ासिम खेतो का काम संभालने की जगह अपने आवारा दोस्तो के साथ ही घूमता रहता है. ये एक बूढ़े की इल्तिजा ही समझ लो आज मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत है अगर तुम बुरा ना मानो तो कुछ दिन जब तक खेतों मे कटाई का काम चल रहा है तब तक तुम इन दोनो लड़कियो के साथ चले जाया करोगे इनकी मदद के लिए.तुम्हारा मुझ बूढ़े पर उपकार होगा.
Achanak darwaze par kisi ki dastak hui to hum dono hi chonk gaye andhere me jaldi-jaldi fiza apne kapde dhundhne lagi or apne sath me mere bhi kapde uthake niche bhaag gai. Darwaze par lagatar dastak ho rahi thi lekin is halat me fiza darwaza nahi khol sakti thi lihaja usne pehle kapde pehne fir darwaza khol diya maine roshandaan se dekha to ye qasim tha jo ghar aaya tha andar daakhil hote hi usne fiza ko dhakka mara or andar daakhil ho gaya or fiza ko gaaliyan dene laga ki kaha mar gai thi itni der se darwaza khat-khata raha tha. chal jaa or mere liye khana bana bhukh lagi hai mujhe. ye baat mujhe bahut buri lagi kyonki qasim fiza se aise baat kar raha tha lekin main kuch nahi kar sakta tha. fiza bhi sir jhukaye rasoyi me chali gai. maine kuch der fiza ko rasoyi me dekha jahan wo qasim ke liye khana paros rahi thi. lekin aaj ek nayi chij maine usme dekhi thi aksar jo fiza qasim ki gaaliyan sunkar rone lag jati thi aaj woi fiza mand-mand muskura rahi thi or bar-bar roshandaan ki taraf dekh rahi thi. shayad wo mere bare me soch rahi thi. kuch der main fiza ko dekhta raha fir bistar par aake nanga hi let gaya. kab neend ne mujhe apni aagosh me liya mujhe pata hi nahi chala.
Aaj main kaafi der tak sota raha. jab aankh khuli to usi kothari me khud ko paya or raat wala sara scene kisi film ki tarah meri aankho ke samne aa gaya lekin abhi bhi dil me kai sawaal the ki raat aisa kyo hua aakhir fiza ne aisa kyo kiya. main apni socho me hi gum tha ki kisi ne kothari ka darwaza khat-khataya to mera dhyaan khud par gaya kyonki raat ke baad main nanga hi so gaya tha maine jaldi se samne pade kapde pehne or dheemi si awaz me aa jao kaha. mere kehne ke sath hi darwaja khul gaya or nazi kothari me aa gai.
Nazi: aaj to janab bahut der tak sote rahe(muskurate hue).
Main: haan wo aaj jaag hi nahi khuli (sir par hath ferte hue)
Nazi: chalo achhi baat hai waise bhi aapne kounsa kahin jana hai
Main: aaj aap doodh kaise le aayi roz to fiza ji laati hai naa
Nazi: kyon mere hath se doodh pee lene se kuch ho jayega kya.
Main: nahi aisi baat to nahi hai
Nazi: bhabhi aaj rasoyi ke kaam me mashroof thi isliye unhone mujhe doodh de kar bhej diya
Main: achha...waise naaz ji mujhe aapse ek baat karni thi agar aap sab ko bura na lage to.....
Nazi: mujhe bhi aapko kuch batana hai
Main : ji boliye kya bat hai
Nazi: wo hum kal se khet jaa rahe hain fasal ki katayi shuru karni hai fasal tiyaar ho gai hai isliye...
Main: ye to bahut achhi bat hai.... kya main bhi aapki madad kar sakta hun?
Nazi: (hansate hue) aap chalne firne lag gaye ho iska matlab ye nahi ki aap thik ho gaye ho abhi koi kaam nahi chup karke araam karo
Main: sara din yahan pade-pade kya karu aapki badi meharbani hogi agar aap mujhe bhi apne sath kheton me le jaye wahan main aap sabko kaam karta dekhta rahunga to mera dil bhi behal jayega le chaliye na sath mujhe bhi.
Nazi: baat to aapki thik hai lekin qasim bhai ko hum sabne aapke bare me kuch nahi bataayaa iss tarah aap hmare sath chaloge to unko kya kahengi hum ki aap koun ho or fir baba bhi pata nahi aapko sath le jane ki ijajat denge ya nahi main to ye bhi nahi janti
Main: waise qasim bhai kahan hai
Nazi: (munh banate hue) hona kahan hai honge apne awaara dosto ke sath wo ghar par kabhi tikk kar thodi baith te hai. bas naam ka hi beta diya hai allah ne hume agar wo kaam karne wale hote to ham ko kheto me ye sab kaam kyo karna padta sab naseeb ki baat hai.
Main: aapne mere liye itna kuch kiya hai ek ahsaan or kar dijiye ho sakta hai main qasim bhai ki thodi bahut kami hi poori kar doo waise bhi aap dono ladkiya itna kaam akele kaise karogi main aap dono ki madad kar dunga kheto me....maan jayiye naa
Nazi: (kuch sochte hue) thik hai main bhabhi se or baba se baat karti hun tab tak aap ye doodh pee lijiye.
Main: thik hai
fir naazi niche chali gai usne pehle fiza se or fir baba se baat ki mere liye to wo log maan gaye main ye sab roshandaan se bade araam se upar se baitha dekh raha tha. fir nazi upar aayi or usne mujhe niche bulaya ki baba aapko bula rahe hain. main baba ke kamre me gaya to baba hamesha ki tarah charpayi par baithe hukka pee rahe the or kuch soch rahe the.
Main: hanji baba ji aapne mujhe yaad kiya
Baba: ha beta pehle to ye bataao ki ab tumhari tabiyat kaisi hai
Main: baba ji bahut behtar hun ab main. ab to mere tamaam zakham bhi bhar chuke hain
Baba: beta ye to bahut achhi baat hai. achha maine tumse kuch baat karne ke liye bulaya hai
Main: ji boliye
Baba: beta mere 2 hi bache hai ek ye nazi or ek mera beta qasim lekin qasim ab hath se nikal gaya hai. socha tha uska nikaah ho jayega to sudhar jayega lekin wo kuch waqt baad fir se waisa ho gaya. ab wo 5 maheene baad jail se nikal kar aaya hai to bhi usme koi sudhaar nazar nahi aa raha. mere dil par ye bojh hai ki anjane me maine apni bahu ki jindagi bhi barbaad kar di aise nakara insaan ke sath uski shaadi karke wo bichari ek bahu ke sath-sath ek bete ke farz bhi nibhati chali aa rahi hai jab se is ghar me aayi hai. fiza ne is ghar ko bhi sambhala meri bhi achhe se dekh-bhaal ki or kheton ka kaam bhi sambhalti hai. ab kal se kheton me katayi shuru ho rahi hai or har baar ki tarah qasim kheto ka kaam sambhalne ki jagah apne awara dosto ke sath hi ghumta rehta hai. ye ek budhe ki iltija hi samajh lo aaj mujhe tumhari madad ki jarurat hai agar tum bura na mano to kuch din jab tak kheton me katayi ka kaam chal raha hai tab tak tum inn dono ladkiyo ke sath chale jaya karoge inki madad ke liye.tumhara mujh budhe par upkaar hoga.
मैं: बाबा जी आप मुझे ऐसा बोलकर शर्मिंदा ना करे मेरी एक-एक साँस आप सबकी कर्ज़दार है आज मैं ज़िंदा हूँ तो आप सबकी मेहरबानी से हूँ अगर मैं आप लोगो के कुछ काम आ सकूँ तो ये मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है मैं कल से रोज़ इनके साथ खेतों पर चला जाया करूँगा.
बाबा: जीते रहो बेटा अल्लाह तुम्हे लंबी उम्र दे... मुझे तुमसे यही उम्मीद थी आज से तुम भी मेरे बेटे हो (मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए)
मैं: लेकिन बाबा क़ासिम भाई से आप क्या कहोगे कि मैं कौन हूँ कहाँ से आया
बाबा: बेटा मैं अब भी इस घर का मालिक हूँ मुझे किसी को कुछ कहने की ज़रूरत नही है
(इतने मे नाज़ी बीच मे बोलते हुए)
नाज़ी: उसकी फिकर आप लोग ना करे मैं हूँ ना मैं संभाल लूँगी क़ासिम भाई को वो कुछ नही कहेंगे
मैं: ठीक है
बाबा: बेटी इनका बिस्तर भी मेरे कमरे मे लगा दो आज से ये भी इस घर का बेटा है अब इसको क़ासिम से छुप कर रहने की कोई ज़रूरत नही है आज से ये भी मेरे साथ मेरे कमरे मे ही सोएगा. तुम्हे कोई ऐतराज़ तो नही नीर बेटा..???
मैंना मे सिर हिलाते) नही मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है
ऐसे ही सारा दिन निकल गया ऑर शाम को मैं बाबा के कमरे मे बैठा उनके पैर दबा रहा था कि क़ासिम घर आ गया. पहले तो वो मुझे देखकर थोड़ा हैरान हुआ फिर बाबा से पूछा कि कौन है तो बाबा ने उससे झूठ बोला कि जब तू जैल मे था तब मेरी तबीयत खराब हो गई थी इस नौजवान ने मेरी बहुत देख-भाल की थी ऑर मुझे संभाला था इस बिचारे का दुनिया मे कोई नही था ये नौकरी की तलाश मे था इसलिए मैं इसको भी अपने घर मे ले आया. क़ासिम ये बात सुनकर आग-बाबूला हो गया ओर कहने लगा कि आप कैसे किसी अजनबी को घर मे उठा के ला सकते हो. वो मेरे सामने ही बाबा से झगड़ा करने लगा मैं वहाँ बस खामोश बैठा सब सुनता रहा. अंत मे बाबा ने ये कहकर बात ख़तम करदी कि मैं अब भी इस घर का मालिक हूँ मुझे किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नही कि मेरे घर मे कौन रहेगा कौन नही जिसको मेरा फ़ैसला मंजूर नही वो ये घर छोड़ कर जा सकता है. क़ासिम की ये बात सुनकर गुस्से से आँखें लाल हो गई थी लेकिन फिर भी वो खुद को बे-बस सा महसूस करके पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल गया ऑर रात भर घर नही आया.
रात को मैं अपने बिस्तर पर पड़ा आने वाले दिन के बारे मे सोच रहा था ऑर बहुत खुश था कि कल सुबह मुझे भी घर से बाहर निकलने का मोक़ा मिल रहा है क्योंकि इतने महीनो से मैं बस एक खिड़की से ही सारी दुनिया देखा करता था. वैसे तो मैं यहाँ कई महीनो से था लेकिन आज पहली बार मैं इस घर से बाहर निकल रहा था बाहर की दुनिया से मैं एक दम अंजान था. ये सब बाते मुझे एक अजीब सी खुशी दे रही थी. इन्ही सोचो के साथ मैं कब सो गया मुझे पता ही नही चला. लेकिन आधा रात को फिर मेरी नींद खुल गई. फिर वही अजीब सा अहसास मुझे महसूस होने लगा पाजामे के अंदर मेरा लंड फिर से सख़्त हुआ पड़ा था ऑर मुझे बेचैन सा कर रहा था लेकिन आज मुझे मज़े की वादियो मे ले जाने वाली फ़िज़ा साथ नही थी. आज कोई मेरे बदन को चूम नही रहा था. खुद मे एक अजीब सा ख़ालीपन सा महसूस कर रहा था. आज मुझे फिर उसी नाज़ुक बदन की ज़रूरत थी जिसने कल रात मेरे बदन के हर हिस्से के साथ खेला था ऑर एक अजीब सा मज़ा मुझे दिया था. एक पल के लिए मेरे दिल मे आया कि आज अगर फ़िज़ा नही आई तो मैं उसके कमरे मे चला जाउ ऑर फिर उन्ही मज़े की वादियो मे खो जाउ लेकिन मेरी उसके कमरे मे जाने की हिम्मत नही हुई इसलिए बिस्तर पड़ा फ़िज़ा का इंतज़ार करता रहा. लेकिन फ़िज़ा नही आई ऑर मैं फिर से उन्ही नींद की वादियो मे खो गया.
सुबह जब मेरी आँख खुली तो खुद को बहुत खुश महसूस कर रहा था क्योंकि आज मैं बाहर की दुनिया देखने वाला था. मैं जल्दी से बिस्तर से उठा ओर तैयार होने लग गया लेकिन पहन ने के लिए मेरे पास कपड़े नही थे. इसलिए मैं उदास होके वापिस कमरे मे आके बैठ गया. तभी नाज़ी कमरे मे आई ओर मुझे कंधे से हिलाके बोली...
नाज़ी: जाना नही है क्या खेत मे....कल तो इतना बोल रहे थे आज आराम से बैठे हो क्या हुआ?
मैं: कैसे जाउ मेरे पास पहन ने के लिए कपड़े ही नही है
नाज़ी: (हँसती हुई) भाभी ने कल ही क़ासिम भाईजान के कुछ कपड़े निकाल दिए थे आपके लिए. वो जो सामने अलमारी है उसमे सब कपड़े आपके ही है बस पूरे आ जाए आपका क़द कौनसा कम है (हँसते हुए)
मैं: कोई बात नही मैं पहन लूँगा हँसो मत
नाज़ी: ठीक है जल्दी से कपड़े पहन लो फिर खेत में चलेंगे हम आपका बाहर इंतज़ार कर रही है
मैं: (हाँ मे सिर हिलाते हुए) ठीक है अब जाओ तो मैं कपड़े पहनु.
नाज़ी: अच्छा जा रही हूँ लम्बूऊऊऊऊ (हस्ती हुई ज़ीभ दिखा कर भाग गई)
फिर मैं जल्दी से कपड़े पहन कर तैयार हो गया. कमीज़ मुझे काफ़ी तंग थी इसलिए मैने कमीज़ के बटन खोलकर ही कमीज़ पहन ली ऑर पाजामा मुझे पैरो से काफ़ी उँचा था मैं ऐसे ही कपड़े पहनकर बाहर निकल आया जब मुझे फ़िज़ा ऑर नाज़ी ने देखा तो ज़ोर-ज़ोर से हँसने लग गई मैने वजह पूछी तो दोनो ने कुछ नही मे सिर हिला दिया. उसके बाद मैं भी सिर झटक कर नाज़ी ऑर फ़िज़ा के साथ खेत के लिए निकल गया. आज मैं बहुत खुश था ऑर हर तरफ नज़र घुमा के देख रहा था. गाँव के सब लोग मुझे अजीब सी नज़रों से घूर-घूर कर देख रहे थे ऑर हँस रहे थे उसकी वजह शायद मेरा पहनावा थी. लेकिन गाँव वालो के इस तरह मुझ पर हँसने से नाज़ी ऑर फ़िज़ा को बुरा लगा था इसलिए दोनो का चेहरा उतरा हुआ था ऑर चेहरा ज़मीन की तरफ झुका हुआ था. कुछ देर मे हम खेत पहुँच गये वहाँ सरसो के लहलहाते पीले फूल, गेहू की फसल ऑर उसका सुनेहरा रंग ऑर ये खुला आसमान देख कर मेरी खुशी का ठिकाना ही नही था मैं किसी छोटे बच्चे की तरह दोनो बाहें फेलाए खेतो मे भाग रहा था क्योंकि मेरे लिए ये सब नज़ारा नया था. कुछ देर मैं इस क़ुदरत की सुंदरता को निहारता रहा फिर मेरा ध्यान नाज़ी ऑर फ़िज़ा पर गया जो कि खेतो मे काम करने मे लगी थी ऑर मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी.
मुझे खुद पर थोड़ी शर्मिंदगी हुई कि मैं यहाँ इनके साथ कम करवाने आया था ऑर यहाँ मस्ती करने लग गया. इसलिए मैं वापिस उनके पास आ गया ऑर उनसे काम के लिए पुच्छने लगा उन्होने जो सरसो ऑर गेहू की फसल काट ली थी ऑर उसकी गठरी सी बना ली थी. जिसको मुझे उठाकर एक जगह जमा करना था ऑर बाद मे सॉफ करके बोरियो मे भरना था. ऐसे ही सारा दिन मैं उनके साथ काम करता रहा. शाम को जब हम घर आ रहे थे तब नाज़ी फ़िज़ा के कान मे कुछ बोल कर कही चली गई ऑर मुझे फ़िज़ा के साथ घर जाने का बोल गई मुझे कुछ समझ नही आया कि नाज़ी कहाँ गई है लेकिन फिर भी मैं ऑर फ़िज़ा घर के लिए चल पड़े. काफ़ी दूर तक हम दोनो खामोशी से चलते रहे अब हम दोनो मे उस रात के बाद एक झिझक थी ऑर अब भी मेरे दिमाग़ मे वही रात वाला सीन था मैं फ़िज़ा से पुछ्ना चाहता था कि उसने ऐसा क्यो किया. लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ बोल पता फ़िज़ा खुद ही बोल पड़ी.
फ़िज़ा: नीर उस रात के लिए मुझे माफ़ कर दो मैं जज़्बात मे बह गई थी ऑर खुद पर काबू नही रख पाई
मैं: कोई बात नही लेकिन मुझे तो वो अहसास बहुत अच्छा लगा था
फ़िज़ा: (चोन्कते हुए) नही ये गुनाह है हम वो सब नही कर सकते क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ ऑर उस दिन जो हमारे बीच हुआ वो सिर्फ़ एक शोहार ऑर उसकी बीवी के बीच ही हो सकता है किसी ऑर के साथ ये सब करना गुनाह होता है समझे बुद्धू....
मैं: ठीक है मैं समझ गया
फ़िज़ा: उस रात जो हुआ वो आप भी भुला दीजिए ऑर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया था क़ासिम की मार ने मुझे अंदर से तोड़ दिया था लेकिन आपके प्यार के 2 मीठे बोल ने मुझे बहका दिया था. लेकिन आगे से हम ऐसा कुछ नही करेंगे ठीक है
मैं: ठीक है
ऐसे ही बाते करते हुए हम घर आ गये ऑर हमारे घर आने के कुछ देर बाद नाज़ी भी आ गई उसके हाथ मे एक थेला था जिसको उसने छुपा लिया ऑर भागती हुई अपने कमरे मे चली गई मुझे कुछ समझ नही आया कि ये क्या लेके आई है फिर भी चुप रहा ऑर आके बिस्तर पर लेट गया फ़िज़ा रसोई मे चली गई रात खाना बनाने के लिए. इतने मे नाज़ी मेरे पास आ गई एक फीता लेकर ऑर उसने मेरा माप लिया. मुझे कुछ भी समझ नही आ रहा था कि नाज़ी क्या कर रही है इसलिए हाथ पैर फेलाए खड़ा रहा जैसे वो खड़ा होने को कहती हो रहा था लेकिन वो बस अपने काम किए जा रही थी लेकिन मेरे कोई भी सवाल का जवाब नही दे रही थी. माप लेकर नाज़ी वापिस अपने कमरे मे चली गई ऑर मैं वापिस बिस्तर पर लेट गया.आज मेरा पूरा बदन दर्द से टूट रहा था. रात के खाने के बाद मुझे बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ गई. शायद किसी ने सच ही कहा है कि जो मज़ा मेहनत करके रोटी खाने मे है वो हराम की रोटी खाने मे नही आ सकता.
Main: baba ji aap mujhe aisa bolkar sharminda na kare meri ek-ek saans aap sabki karjdaar hai aaj main zinda hun to aap sabki meharbani se hun agar main aap logo ke kuch kaam aa saku to ye mere liye badi khushi ki baat hai main kal se roz inke sath kheton par chala jaya karunga.
Baba: jeete raho beta allah tumhe lambi umer de... mujhe tumse yhi ummeed thi aaj se tum bhi mere bete ho (mere sir par hath ferte hue)
Main: lekin baba qasim bhai se aap kya kahoge ki main koun hun kahan se aaya
Baba: beta main ab bhi is ghar ka malik hun mujhe kisi ko kuch kehne ki jarurat nahi hai
(itne me nazi bich me bolte hue)
Nazi: uski fikar aap log na kare main hun na main sambhaal lungi qasim bhai ko wo kuch nahi kahenge
Main: thik hai
Baba: beti inka bistar bhi mere kamre me laga do aaj se ye bhi is ghar ka beta hai ab isko qasim se chhup kar rehne ki koi jarurat nahi hai aaj se ye bhi mere sath mere kamre me hi soyegaa. tumhe koi aitraaz to nahi Neer beta..???
Mainnaa me sir hilate) nahi mujhe kya aitraaz ho sakta hai
aise hi sara din nikal gaya or shaam ko main baba ke kamre me baitha unke pair daba raha tha ki qasim ghar aa gaya. pehle to wo mujhe dekhkar thoda hairaan hua fir baba se puchaa ki koun hai to baba ne usse jhooth bola ki jab tu jail me tha tab meri tabiyat kharab ho gai thi is naujawan ne meri bahut dekh-bhaal ki thi or mujhe sambhala tha is bichare ka duniya me koi nahi tha ye naukari ki talash me tha isliye main isko bhi apne ghar me le aaya. qasim ye baat sunkar aag-baboola ho gaya or kehne laga ki aap kaise kisi ajnabi ko ghar me utha ke laa sakte ho. wo mere samne hi baba se jhagada karne laga main wahan bas khamosh baitha sab sunta raha. ant me baba ne ye kehkar baat khatam kardi ki main ab bhi is ghar ka malik hun mujhe kisi se ijajat lene ki jarurat nahi ki mere ghar me koun rahega koun nahi jisko mera faisala manjoor nahi wo ye ghar chod kar jaa sakta hai. qasim ki ye baat sunkar gusse se aankhen laal ho gai thi lekin fir bhi wo khud ko be-bas sa mehsoos karke pair patakta hua ghar se bahar nikal gaya or raat bhar ghar nahi aaya.
Raat ko main apne bistar par pada aane wale din ke bare me soch raha tha or bahut khush tha ki kal subah mujhe bhi ghar se bahar nikalne ka moqa mil raha hai kyonki itne maheeno se main bas ek kheedki se hi sari duniya dekha karta tha. Waise to main yahan kai maheeno se tha lekin aaj pehli baar main iss ghar se bahar nikal raha tha bahar ki duniya se main ek dam anjaan tha. ye sab baate mujhe ek ajeeb si khushi de rahi thi. inhi socho ke sath main kab so gaya mujhe pata hi nahi chala. lekin adha raat ko fir meri jaag khul gai. fir wahi ajeeb sa ahsaas mujhe mehsoos hone laga pajame ke andar mera lund fir se sakht hua pada tha or mujhe bechain sa kar raha tha lekin aaj mujhe maze ki wadiyo me lejane wali fiza sath nahi thi. aaj koi mere badan ko chum nahi raha tha. khud me ek ajeeb sa khalipan sa mehsoos kar raha tha. aaj mujhe fir usi nazuk badan ki jarurat thi jisne kal raat mere badan ke har hisse ke sath khela tha or ek ajeeb sa maza mujhe diya tha. ek pal ke liye mere dil me aaya ki aaj agar fiza nahi aayi to main uske kamre me chala jau or fir unhi maze ki wadiyo me kho jau lekin meri uske kamre me jane ki himmat nahi hui isliye bistar pada fiza ka intzaar karta raha. lekin fiza nahi aayi or main fir se unhi neend ki wadiyo me kho gaya.
subah jab meri aankh khuli to khud ko bahut khush mehsoos kar raha tha kyonki aaj main bahar ki duniya dekhne wala tha. main jaldi se bistar se utha or taiyaar hone lag gaya lekin pehan ne ke liye mere pass kapde nahi the. isliye main udaas hoke wapis kamre me aake baith gaya. tabhi nazi kamre me aayi or mujhe kandhe se hilake boli...
Nazi: jana nahi hai kya khet me....kal to itna bol rahe the aaj aram se baithe ho kya hua?
Main: kaise jau mere pass pehan ne ke liye kapde hi nahi hai
Nazi: (hasti hui) bhabhi ne kal hi qasim bhaijaan ke kuch kapde nikal diye the aapke liye. wo jo samne almari hai usme sab kapde aapke hi hai bas poore aa jaye aapka qad kounsa kam hai (hansate hue)
Main: koi bat nahi main pehan lunga hasso mat
Nazi: thik hai jaldi se kapde pehan lo fir khet chalenge hum aapka bahar intzaar kar rahi hai
Main: (haa me sir hilate hue) thik hai ab jao to main kapde pehnu.
Nazi: achha jaa rahi hun lamboooooooooo (hasti hui zeebh dikha kar bhaag gai)
fir main jaldi se kapde pehan kar teiyaar ho gaya. kameez mujhe kaafi tang thi isliye maine kameez ke button kholkar hi kameez pehan lee or pajama mujhe pairo se kaafi uncha tha main aise hi kapde pehankar bahar nikal aaya jab mujhe fiza or nazi ne dekha to zor-zor se hasne lag gai maine wajah poochi to dono ne kuch nahi me sir hila diya. uske baad main bhi sir jhatak kar nazi or fiza ke sath khet ke liye nikal gaya. aaj main bahut khush tha or har taraf nazar ghumake dekh raha tha. gaav ke sab log mujhe ajeeb si nazaro se ghunr-ghunr kar dekh rahe the or hass rahe the uski wajah shayad mera pehnava thi. Lekin gaav walo ke iss tarah mujh par hasna nazi or fiza ko bura laga tha isliye dono ka chehra utra hua tha or chehra zameen ki taraf jhuka hua tha. kuch der me hum khet pohonch gaye wahan sarso ke lehlahate peele phunl, gehu ki fasal or uska sunehra rang or ye khula asmaan dekh kar meri khushi ka thikana hi nahi tha main kisi chhote bache ke tarah dono bahe felaye kheto me bhaag raha tha kyonki mere liye ye sab nazara naya tha. kuch der main iss qudrat ki sundarta ko niharta raha fir mera dhyaan nazi or fiza par gaya jo ki kheto me kaam karne me lagi thi or mujhe dekh kar muskura rahi thi. mujhe khud par thodi sharmindagi hui ki main yahan inke sath kam karwane aaya tha or yahan masti karne lag gaya. isliye main wapis unke pass aa gaya or unse kaam ke liye puchhne laga unhone jo sarso or gehu ki fasal kaat lee thi or uski gathari si bana lee thi. jisko mujhe uthakar ek jagah jama karna tha or baad me saaf karke boriyo me bharna tha. aise hi sara din main unke sath kam karta raha. shaam ko jab hum ghar aa rahe the tab nazi fiza ke kaan me kuch bol kar kahi chali gai or mujhe fiza ke sath ghar jane ka bol gai mujhe kuch samajh nahi aaya ki nazi kaha gai hai lekin fir bhi main or fiza ghar ke liye chal pade. kaafi door tak hum dono khamoshi se chalte rahe ab hum dono me uss raat ke baad ek jhijhak thi or ab bhi mere dimaag me wahi raat wala scene tha main fiza se puchhna chahta tha ki usne aisa kyo kiya. lekin isse pehle ki main kuch bol pata fiza khud hi bol padi.
Fiza: Neer uss raat ke liye mujhe maaf kar do main jazbat me beh gai thi or khud par kaabu nahi rakh payi
Main: koi baat nahi lekin mujhe to wo ahsaas bahut achha laga tha
Fiza: (chonkte hue) nahi ye gunah hai hum wo sab nahi kar sakte kyonki main shadishuda hun or uss din jo hmare bich hua wo sirf ek shohar or uski biwi ke bich hi ho sakta hai kisi or ke sath ye sab karna gunha hota hai samjhe budhu....
Main: thik hai main samajh gaya
Fiza: uss raat jo hua wo aap bhi bhula dijiye or ho sake to mujhe maaf kar dena mujhse bahut bada gunah ho gaya tha qasim ki maar ne mujhe andar se tod diya tha lekin aapke pyaar ke 2 meethe bol ne mujhe behka diya tha. lekin aagey se hum aisa kuch nahi karenge thik hai
Main: thik hai
aise hi baate karte hue hum ghar aa gaye or hmare ghar aane ke kuch der baad nazi bhi aa gai uske hath me ek thela tha jisko usne chhupa liya or bhagti hui apne kamre me chali gai mujhe kuch samajh nahi aaya ki ye kya leke aayi hai fir bhi chup raha or aake bistar par let gaya fiza rasoyi me chali gai raat khana banane ke liye. itne me nazi mere pass aa gai ek feeta lekar or usne mera maap liya. mujhe kuch bhi samajh nahi aa raha tha ki nazi kya kar rahi hai isliye hath pair felaye khada raha jaise wo khada hone ko kehti ho raha tha lekin wo bas apne kaam kiye jaa rahi thi lekin mere koi bhi sawaal ka jawab nahi de rahi thi. maap lekar nazi wapis apne kamre me chali gai or main wapis bistar par let gaya.Aaj mera poora badan dard se toot raha tha. raat ke khane ke baad mujhe bistar par padte hi neend aa gai. shayad kisi ne sach hi kaha hai ki jo maza mehnat karke roti khane me hai wo haram ki roti khane me nahi aa sakta.
अगले दिन सुबह जब मैं उठा तो मेरे बिस्तर के पास 2 नयी जोड़ी कपड़े पड़े थे अब बात मेरी समझ मे आ गई कि नाज़ी ने रात भर जाग कर मेरे लिए नये कपड़े सिले हैं मैं वो कपड़े उठाए बाहर आया ऑर नाज़ी को शुक्रिया कहा. तो उसने सिर्फ़ इतना ही कहा कि अब देखती हूँ तुम पर कौन हँसता है.मैं आज बहुत खुश था ऑर नये कपड़े पहनकर खेत के लिए निकल रहा था. आज कोई मुझ पर नही हँस रहा था लेकिन आज फ़िज़ा ऑर नाज़ी मुझे देख कर बहुत खुश थी. शायद कल गाँव वालो का मुझ पर हँसना उनको बुरा लगा था इसलिए उन्होने मेरे लिए नये कपड़े सिले थे. ऐसे ही मैं नाज़ी ऑर फ़िज़ा तीनो पूरा दिन खेतो के काम मे लगे रहे.
दिन गुज़रने लगे रोज़ मैं नाज़ी ऑर फ़िज़ा के साथ खेत जाता ऑर उनकी मदद करता. क़ासिम रोज़ दिन भर अपने आवारा दोस्तो के साथ घूमता रहता ऑर रात को कोठे पर पड़ा रहता. बाबा मेरे काम से मुझसे बहुत खुश रहते थे लेकिन क़ासिम मुझसे नफ़रत करता था इसलिए मेरी मोजूदगी मे बहुत कम घर पर रहता. लेकिन एक नयी चीज़ जो मैने महसूस की थी वो ये कि अब फ़िज़ा मुझसे दूर-दूर रहने लगी थी लेकिन नाज़ी मेरा बहुत ख़याल रखने लगी थी किसी पत्नी की तरह. जब कभी पास के खेतों मे काम करने वाली कोई औरत मुझसे हँस कर बात कर लेती तो नाज़ी का चेहरा गुस्से ऑर जलन से लाल हो जाता ऑर बिना वजहाँ मुझसे झगड़ने लग जाती. कुछ ही दिन मे हमने मिलकर सारी फसल की कटाई कर दी थी अब फसल बेचने का वक़्त था. इसलिए मैने नाज़ी से पूछा कि अब इस फसल का क्या करेंगे तो उसने कहा कि हम सब गाँव वाले अपनी फसल गाँव के बड़े ज़मींदार को बेचते हैं.
फ़िज़ा: ज़मींदार हर साल अपने हिसाब से फसल की कीमत लगाता है ऑर खरीद लेता है ऐसे ही हम सब का किसी तरह गुज़ारा हो जाता है.
मैं: लेकिन अगर तुम किसी ऑर को ये फसल बेचो तो हो सकता है कि तुमको ज़्यादा पैसे मिले.
नाज़ी: ये बात हम सब जानते हैं लेकिन उसके लिए हम को शहर जाना पड़ेगा जो हमारे लिए मुमकिन नही क्यो कि हम लड़कियाँ अकेली कैसे शहर जाए ऑर ज़मींदार ये बात कभी बर्दाश्त नही करेगा कि गाँव का कोई भी अपनी फसल बाहर बेचे वो अपने गुंडे भेज कर उस किसान को बहुत बुरी तरह से मारता है.
मैं: (ये सुनकर जाने क्यो मुझे गुस्सा आ गया ऑर मेरे मुँह से निकल गया) मर गये मारने वाले...शेर की जान लेने के लिए फौलाद का कलेजा चाहिए.
नाज़ी: (हैरान होती हुई) ऐसी बोली तुमने कहाँ से सीखी?
मैं: पता नही जब तुमने मार-पीट का नाम लिया तो खुद ही मुँह से निकल गई
ऐसे ही बाते करते हुए हम घर आ गये देखा फ़िज़ा कमरे मे बैठी रो रही थी. हम भागकर उसके पास गये ऑर पूछा कि क्या हुआ रो क्यो रही हो.
फ़िज़ा: क़ासिम अभी आया था उसने कहा है कि इस बार सारी फसल बेचने वो जाएगा
मैं: तो इसमे रोने की क्या बात है ये तो अच्छी बात है ना वो घर की ज़िम्मेदारी उठा रहा है
फ़िज़ा: नही वो अगर फसल बेचेगा तो सारा पैसा जूए ऑर शराब ऑर कोठे मे उड़ा देगा फिर साल भर हम सब क्या खाएँगे. कुछ भी हो जाए ये फसल क़ासिम को मत बेचने देना नीर मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ.
मैं: तुम घबराओ मत जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा लेकिन रोना बंद करो
इतने मे क़ासिम कुछ आदमियो के साथ घर आया ऑर आनाज़ की बोरिया उठवाने लगा तो बाबा ने उसको मना किया लेकिन वो उनकी बात को अनसुनी करते हुए बोरिया उठवाने मे उन आदमियो की मदद करने लगा. मैं ये सब कुछ बैठा देख रहा था. इतने मे बाबा ने मुझे आवाज़ लगाई ऑर क़ासिम को बोरिया लेजाने से रोकने का कहा तो मैं खड़ा हुआ ऑर दरवाज़े के पास जाके रुक गया,
मैं: क़ासिम जब बाबा मना कर रहे हैं तो तुम क्यों फसल बेच रहे हो बाबा खुद अपने हिसाब से बेच लेंगे ना इन आदमियो को यहाँ से जाने का कहो.
क़ासिम: बकवास मत कर कमीने आया बड़ा दलाल साला अब तू मुझे सिखाएगा कि क्या करना चाहिए ऑर क्या नही पहले मेरे घर पर कब्जा कर लिया अब इस अनाज के पैसे पर कब्जा करेगा ऐसा कभी नही होने दूँगा मैं बुढ्ढा तो पागल है. चल मेरे काम मे दखल ना दे नही तो यही ज़िंदा गाढ दूँगा तुझे.
मैं: देखो क़ासिम प्यार से कह रहा हूँ मान जाओ बाबा की बात मुझे गुस्सा ना दिलाओ
क़ासिम: तू ऐसे नही मानेगा ना रुक तेरा इलाज करता हूँ मैं
उसने उन आदमियो को आवाज़ लगाई तो उन लोगो ने आके मुझे दोनो बाजू से पकड़ लिया ऑर क़ासिम ने ऑर एक ऑर आदमी ने मुझे मारना शुरू कर दिया. मेरे पेट मे ऑर मुँह पर घूसों की जैसे बरसात सी हो गई. मेरे मुँह से खून निकल रहा था आँखें बंद हो रही थी कि अचानक एक लोहे का सरिया मुझे मेरे कंधे पर लगा शायद किसी ने पिछे से मुझे सरिया से मारा था. दर्द की एक तेज़ लहर मेरे पूरे बदन मे बह गई ऑर मुँह से बस एक आअहह ही निकल पाई ऑर मैं ज़मीन पर नीचे गिर गया ऑर सब लोग मुझे देख कर हँस रहे थे. नाज़ी ऑर फ़िज़ा को भी 2 आदमियो ने पकड़ रखा था वो दोनो रो रही थी ऑर क़ासिम को रोक रही थी लेकिन क़ासिम किसी की भी बात सुनने को तैयार नही था. अचानक मेरी आँखे बंद होने लगी ओर मेरी आँखो के सामने एक तस्वीर सी दौड़ गई जिसमे मैं एक साथ कई लोगो को पीट रहा हूँ ये देख कर मैने अचानक से आँखे खोली तो मुझे एक लात मेरी छाती की तरफ बढ़ती हुई महसूस हुई. मेरे हाथ अपने आप उस पैर के नीचे चला गया ऑर मैने अपने दोनो हाथो से उस पैर को ज़ोर से गोल घुमा दिया वो आदमी एक तेज़ दर्द के साथ ज़मीन पर घूम कर गिर गया उसका पैर गिरने के बाद भी वैसा ही उल्टा था शायद उसका मैने पैर पूरी तरह से तोड़ दिया था.
अब मैने अपनी दोनो टांगे हवा मे गोल घुमा के अपने हाथ के सहारे एक झटके से खड़ा हो गया. इतने मे एक ऑर आदमी जिसके हाथ मे सरिया था वो मुझे मारने के लिए मेरी तरफ लपका मैने अपनी एक टाँग हवा मे उठाकर उसके मुँह पर मारी तो वो वही गिर गया ऑर उसके मुँह से जैसे खून का फव्वारा सा निकल गया. जैसे ही मैने पलट कर बाकी आदमियो की तरफ नज़र घुमाई तो सब अपने-अपने हथियार छोड़ कर भाग गये. क़ासिम वही खड़ा मेरे सामने काँप रहा था मैं उसकी तरफ बढ़ा तो नाज़ी ऑर फ़िज़ा बीच मे आ गई ऑर मुझे उसको मारने से मना किया. मैने अपनी उंगली उसके मुँह के पास लाके नही में इशारा किया ऑर फिर नीचे ज़मीन पर पड़ी तमाम अनाज की बोरियो को उनकी जगह पर वापिस रख दिया ऑर वापिस अपने कमरे मे आके बाबा के पास बैठ गया. क़ासिम तेज़ कदमो के साथ घर से बाहर निकल गया अब पूरे घर मे एक शांति सी छा गई कोई कुछ नही बोल रहा था थोड़ी देर मे नाज़ी के साथ फ़िज़ा भी कमरे मे आ गई सब मुझे हैरानी से देख रहे थे.
बाबा: बेटा तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया आज तुम ना होते तो मेरी बच्चियों की साल भर की मेहनत जाया हो जाती
मैं: आपने मुझे बेटा कहा था ना तो ये कैसे हो सकता है कि एक बेटे के होते उसके घरवालो की मेहनत जाया हो जाए
बाबा: (मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए) तुम सदा खुश रहो बेटा. फ़िज़ा बेटी देखो नीर के कितने चोट लगी है इसको दवा लगा दो
नाज़ी: कोई बात नही बाबा दवा मैं लगा देती हूँ.
फ़िज़ा: (मेरी तरफ देखते हुए)लेकिन आपने ऐसा लड़ना कहाँ सीखा?
मैं: पता नही जब वो लोग मुझे मार रहे थे तो पता नही मेरे सामने एक तस्वीर सी आई जिसमे मैं बहुत सारे लोगो को एक साथ मार रहा था बस उसके बाद क्या हुआ तुमने देखा ही लिया है.
नाज़ी: वैसे कुछ भी कहो मज़ा आ गया क्या मारा है....वाआहह अब वो लोग कम से कम 6 महीने बिस्तर से नही उठेंगे
फ़िज़ा: चल पागल कहीं की तुझे मज़े की आग लगी है मुझे तो अब ये डर लग रहा है कि ज़मींदार क्या करेगा नीर ने उसके आदमियो को मारा है.
मैं: आप फिकर ना करो अब इस घर की तरफ कोई उंगली भी उठाके नही देख सकता ज़मींदार तो क्या उसका बाप भी अब कुछ नही कर सकता.मैं हूँ ना.
फ़िज़ा: लेकिन हम को आपकी भी तो फिकर है ना...आपको कुछ हो गया तो.... देखो आज भी आपको कितनी चोट लग गई है कही कुछ हो जाता तो....वो तो गुंडे मवाली है उनका ना आगे कोई ना पिछे कोई लेकिन आपका अब एक परिवार है.
मैं: अर्रे आप लोग फिकर क्यो कर रहे हो कुछ नही हुआ मुझे थोड़ी सी खराश आई सब ठीक हो जाएगा कुछ दिन मे.
Update-8
Agle din subah jab main utha to mere bistar ke pass 2 nayi jodi kapde pade the ab baat meri samajh me aa gai ki nazi ne raat bhar jaag kar mere liye naye kapde sile hain main wo kapde uthaye bahar aaya or nazi ko shukariya kaha. to usne sirf itna hi kaha ki ab dekhti hun tum par kaun hasta hai.main aaj bahut khush tha or naye kapde pehankar khet ke liye nikal raha tha. aaj koi mujh par nahi hass raha tha lekin aaj fiza or nazi mujhe dekh kar bahut khush thi. shayad kal gaav walo ka mujh par hasna unko bura laga tha isliye unhone mere liye naye kapde sile the. aise hi main nazi or fiza teeno poora din kheto ke kaam me lage rahe.
Din guzarne lage roz main nazi or fiza ke sath khet jata or unki madad karta. qasim roz din bhar apne awara dosto ke sath ghumta rehta or raat ko kothe par pada rehta. baba mere kaam se mujhse bahut khush rehte the lekin qasim mujhse nafrat karta tha isliye meri mojudgi me bahut kam ghar par rehta. Lekin ek nayi chij jo maine mehsoos ki thi wo ye ki ab fiza mujhse door-door rehne lagi thi lekin nazi mera bahut khayaal rakhne lagi thi kisi patni ki tarah. jab kabhi pass ke kheto me kaam karne wali koi aurat mujhse hass kar baat kar leti to nazi ka chehra gusse or jalan se laal ho jata or bina wajahan mujhse jhagadne lag jati. kuch hi din me hamane milkar sari fasal ki katayi kar di thi ab fasal bechne ka waqt tha. Isliye maine nazi se pucha ki ab is fasal ka kya karenge to usne kaha ki hum sab gaav wale apni fasal gaav ke bade zameendaar ko bechte hain.
Fiza: zameendar har saal apne hisaab se fasal ki keemat lagata hai or khareed leta hai aise hi hum sab ka kisi tarah guzara ho jata hai.
Main: lekin agar tum kisi or ko ye fasal becho to ho sakta hai ki tumko jyaadaa paise mile.
Nazi: ye baat hum sab jante hain lekin uske liye ham ko shehar jana padega jo hmare liye mumkin nahi kyo ki hum ladkiya akeli kaise shehar jaye or zameendar ye baat kabhi bardasht nahi karega ki gaav ka koi bhi apni fasal bahar beche wo apne gunde bhej kar uss kisaan ko bahut buri tarah se marta hai.
Main: (ye sunkar jane kyo mujhe gussa aa gaya or mere munh se nikal gaya) mar gaye marne wale...sher ki jaan lene ke liye faulaad ka kaleja chahiye.
Nazi: (hairaan hoti hui) aisi boli tumne kaha se seekhi?
Main: pata nahi jab tumne maar-peet ka nam liya to khud hi munh se nikal gai
aise hi baate karte hue hum ghar aa gaye dekha fiza kamre me baithi rou rahi thi. hum bhagkar uske pass gaye or puchaa ki kya hua rou kyo rahi ho.
Fiza: qasim abhi aya tha usne kaha ki iss bar sari fasal bechne wo jayega
Main: to isme rone ki kya baat hai ye to achhi baat hai na wo ghar ki zimmedari utha raha hai
Fiza: nahi wo agar fasal bechega to sara paisa joowe or sharab or kothe me udaa dega fir saal bhar hum sab kya khayenge. kuch bhi ho jaye ye fasal qasim ko mat bechne dena neer main tumhare aagey hath jodti hun.
Main: tum ghabrao mat jaisa tum chahti ho waisa hi hoga lekin rona band karo
itne me qasim kuch aadmiyo ke sath ghar aaya or anaaz ki boriya uthwane laga to baba ne usko mana kiya lekin usne unki baat ko ansuni karte hue boriya uthwane me unn aadmiyo ki madad karne laga. main ye sab kuch baitha dekh raha tha. itne me baba ne mujhe awaz lagayi or qasim ko boriya lejane se rokne ka kaha to main khada hua or darwaze ke pass jake ruk gaya,
Main: qasim jab baba mana kar rahe hain to tum kyo fasal bech rahe ho baba khud apne hisaab se bech lenge naa inn aadmiyo ko yahan se jane ka kaho.
Qasim: bakwas mat kar kameene aya bada dalaal sala ab tu mujhe sikhayega ki kya karna chahiye or kya nahi pehle mere ghar par kabja kar liya ab iss anaaj ke paise par kabja karega aisa kabhi nahi hone dunga main budhdha to pagal hai. chal mere kaam me dakhal na de nahi to yhi zinda gaad dunga tujhe.
Main: dekho qasim pyaar se keh raha hun maan jao baba ki baat mujhe gussa na dilao
Qasim: tu aise nahi manega na ruk tera ilaaj karta hun main
usne unn aadmiyo ko awaz lagayi to unn logo ne aake mujhe dono baaju se pakad liya or qasim ne or ek or aadmi ne mujhe marna shuru kar diya. mere pet me or munh par ghuso ki jaise barsaat si ho gai. mere munh se khun nikal raha tha aankhen band ho rahi thi ki achanak ek lohe ka sariya mujhe mere kandhe par laga shayad kisi ne pichhe se mujhe sariye se mara tha. Dard ki ek tez lehar mere poore badan me beh gai or munh se bas ek aaahhh hi nikal payi or main zameen par niche gir gaya or sab log mujhe dekh kar hass rahe the. nazi or fiza ko bhi 2 admiyo ne pakad rakha tha wo dono rou rahi thi or qasim ko rok rahi thi lekin qasim kisi ki bhi baat sunne ko tiyaar nahi tha. Achanak meri aankhe band hone lagi or meri aankho ke samne ek tasveer si doud gai jisme main ek sath kai logo ko peet raha hun ye dekh kar maine achanak se aankhe kholi to mujhe ek laat meri chaatee ki taraf badhti hui mehsoos hui. mere hath apne aap uss pair ke niche chala gaya or maine apne dono hatho se uss pair ko jor se gol ghuma diya wo admi ek tez dard ke sath zameen par ghum kar gir gaya uska pair girne ke baad bhi waisa hi ulta tha shayad uska maine pair poori tarah se tod diya tha. Ab maine apni dono taangey hawa me gol ghuma ke apne hath ke sahare ek jhatke se khada ho gaya. itne me ek or aadmi jiske hath me sariya tha wo mujhe marne ke liye meri taraf lapka maine apni ek taang hawa me uthakar uske munh par maari to wo wahi gir gaya or uske munh se jaise khun ka fawara sa nikal gaya. jaise hi maine palat kar baki admiyo ki taraf nazar ghumayi to sab apne-apne hathiyar chod kar bhaag gaye. qasim wahi khada mere samne kaamp raha tha main uski taraf badha to nazi or fiza bich me aa gai or mujhe usko marne se mana kiya. maine apni ungali uske munh ke pass lake nahi me ishara kiya or phir niche zameen par padi tamaam anaaj ki boriyo ko unki jagah par wapis rakh diya or wapis apne kamre me aake baba ke pas baith gaya. Qasim tez kadmo ke sath ghar se bahar nikal gaya ab poore ghar me ek shanti si chha gai koi kuch nahi bol raha tha thodi der me nazi ke sath fiza bhi kamre me aa gai sab mujhe herani se dekh rahe the.
Baba: beta tumhara bahut-bahut shukriya aaj tum na hote to meri bachiyo ki saal bhar ki mehnat jaya ho jati
Main: aapne mujhe beta kaha tha na to ye kaise ho sakta hai ki ek bete ke hote uske gharwalo ki mehnat jaya ho jaye
Baba: (mere sir par hath ferte hue) tum sada khush raho beta. fiza beti dekho neer ke kitne chot lagi hai isko dawa laga do
Nazi: koi baat nahi baba dawa main laga deti hun.
Fiza: (meri taraf dekhte hue)Lekin aapne aisa ladna kaha seekha?
Main: pata nahi jab wo log mujhe maar rahe the to pata nahi mere samne ek tasweer si aayi jisme main bahut sare logo ko ek sath maar raha tha bas uske baad kya hua tumne dekha hi liya hai.
Nazi: waise kuch bhi kaho maza aa gaya kya mara hai....waaaahhhh ab wo log kam se kam 6 maheene bistar se nahi uthenge
Fiza: chal pagal kahi ki tujhe maze ki aag lagi hai mujhe to ab ye darr lag raha hai ki zameendar kya karega neer ne uske aadmiyo ko mara hai.
Main: aap fikar na karo ab iss ghar ki taraf koi ungali bhi uthake nahi dekh sakta zameendar to kya uska baap bhi ab kuch nahi kar sakta.Main hun na.
Fiza: lekin ham ko aapki bhi to fikar hai naa...apko kuch ho gaya to.... dekho aaj bhi apko kitni chot lag gai hai kahi kuch ho jata to....wo to gunde mawali hai unka na aagey koi na pichhe koi lekin aapka ab ek parivaar hai.
Main: arre aap log fikar kyo kar rahe ho kuch nahi hua mujhe thodi si kharash aayi sab thik ho jayega kuch din me.
ऐसे ही कुछ देर बाद नाज़ी ने मेरे दवाई लगा दी. ऑर फिर हम सब खाना ख़ाके सो गये अगले दिन मैं नाज़ी ऑर फ़िज़ा शहर जाके फसल बेच आए ऑर हमें ज़मींदार से दुगुनी कीमत मिली फसल की जिससे सब लोग बहुत खुश थे. फिर हमने शहर से ही घर का ज़रूरी समान खरीदा ऑर नाज़ी कहने लगी कि उसको नये कपड़े लेने है सबके लिए. उसकी ज़िद के कारण हम तीनो एक दुकान पर गये जहाँ सबके लिए कपड़े खरीदने लग गये. इतने मे फ़िज़ा को एक चक्कर सा आया ऑर वो मेरे कंधे पर गिर गई जिसे मैने ज़मीन पर गिरने से पहले ही संभाल लिया. उसने सिर्फ़ इतना ही कहा कि कमज़ोरी की वजह से चक्कर आ गया होगा ऑर हम सब फिर से कपड़े देखने मे लग गये. ऐसे ही सारा दिन खरीद दारी करने के बाद बस मे घर आ गये. आज घर मे सब बहुत खुश थे सिवाए क़ासिम के. मैने एक जोड़ी कपड़े उठाए ओर क़ासिम को देने उसके कमरे मे चला गया लेकिन उसने वो कपड़े ज़मीन पर फेंक दिए. मैने भी ज़्यादा उसको कुछ नही कहा ऑर कमरे से बाहर आके बाबा के पास बैठ गया जहाँ नाज़ी बाबा को नये कपड़े दिखा रही थी. थोड़ी देर बाद मैं ऑर बाबा ही कमरे मे बैठे थे. रात को सबने मिलकर खाना खाया ऑर सो गये क़ासिम आज भी घर मे नही था. अभी मेरी आँख ही लगी थी कि किसी ने मुझे कंधे से पकड़कर हिलाया तो मेरी नींद खुल गई. ये फ़िज़ा थी जो मुझे उठा रही थी ऑर बाहर चलने का इशारा कर रही थी. मैं उसके पिछे-पिछे कमरे के बाहर आ गया.
मैं: क्या हुआ इतनी रात को क्या काम है
फ़िज़ा: मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी थी
मैं: इस वक़्त...बोलो क्या काम है
फ़िज़ा: एक गड़-बड हो गई है समझ नही आ रहा है कैसे कहूँ
मैं: क्या हुआ खुलकर बताओ ना
फ़िज़ा: वो मैं माँ बनने वाली हूँ
मैं: तो ये तो खुशी की बात है इसमे मेरी नींद क्यो खराब की ये बात तो तुम सुबह भी बता सकती थी
फ़िज़ा: (झुंझलाते हुए) आप बात नही समझ रहे....मैं आपके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ
मैं: क्या.......(हैरानी से) ये कैसे हो सकता है....
फ़िज़ा: उस दिन वो सब हुआ था ना शायद तब ही हो गया.
मैं : ये भी तो सकता है कि ये क़ासिम का बच्चा हो
फ़िज़ा: मुझे पूरा यक़ीन है ये आपका बच्चा है क्योंकि क़ासिम जबसे जैल से आया है उसने मुझे हाथ तक नही लगाया. जाने उस दिन मुझे क्या हो गया था....(ये कहते हुए वो चुप हो गई)
मैं: तो किसी को क्या पता ये किसका बच्चा है तुम बोल देना क़ासिम का है ऑर क्या. मैं भी किसी से कुछ नही कहूँगा
फ़िज़ा: नही क़ासिम को पता चल जाएगा ऑर वो सबको बोल देगा कि ये मेरा बच्चा नही है. क्योंकि उसने तो मुझे छुआ भी नही तो मैं माँ कैसे बन गई (परेशान होते हुए)
मैं: चलो जो होगा देखा जाएगा अभी तुम भी सो जाओ बहुत रात हो गई है हम सुबह कुछ सोच लेंगे तुम फिकर ना करो मैं तुम्हारे साथ हूँ
फ़िज़ा: पक्का मेरे साथ हो ना
मैं: हाँ बाबा
फ़िज़ा: मुझे छोड़ कर कभी मत जाना नीर मैं तुम्हारे बिना बहुत अकेली हूँ (मुझे गले लगाते हुए ऑर रोते हुए)
मैं: नही जाउन्गा मेरी जान चुप हो जाओ (उसके माथे को चूमते हुए)अब जाओ जाके तुम भी सो जाओ बहुत रात हो गई
फ़िज़ा: (हाँ मे सिर हिलाते हुए ओर मेरे गाल को चूम कर) अच्छा आप सो जाओ अब.
फिर हम एक दूसरे से अलग हुए ओर अपने-अपने कमरे मे जाके बिस्तर पर लेट गये नींद दोनो की आँखो से कोसो दूर थी शायद आज हम दोनो ही एक ही चीज़ के बारे मे सोच रहे थे. मेरे अंदर उस दिन के सोए जज़्बात आज फिर जाग गये थे. लंड फिर से खड़ा हो गया था फिर वही एक अजीब सा अहसास महसूस होने लग गया था लेकिन खुद को काबू करते हुए मैने आँखे बंद कर ली ऑर सोने की कोशिश करने लगा. मैं अब बस आने वाले दिन के बारे मे सोच रहा था मेरे दिमाग़ मे कई सारे सवाल थे जिनका जवाब सिर्फ़ आने वाले वक़्त के पास था.
मैं अपनी सोचो के साथ बिस्तर पर आके लेट गया ऑर जल्दी ही नींद ने अपनी आगोश मे मुझे ले लिया. सुबह बाबा जल्दी जाग जाते थे ऑर उनकी आवाज़ से मेरी भी आँख खुल जाती थी. मैं दिन के ज़रूरी कामों से फारिग होके फ़िज़ा ऑर नाज़ी के साथ खेत पर काम के लिए निकल गया. दिन भर हम तीनो खेतो मे काम करते रहे ऑर शाम को जब घर आए तो बाबा ने हम सब को गहरी फिकर मे डाल दिया. क्योंकि क़ासिम कल रात से घर नही आया था ये सुनकर हम तीनो के होश भी उड़ गये क्योंकि लाख लड़ने -झगड़ने के बाद भी वो दिन मे कम से कम एक बार तो घर आ ही जाता था. बाबा की बात सुन कर मुझे भी क़ासिम की चिंता हो रही थी ऑर मैं उसको ढूँढने के बारे मे ही सोच रहा था. कि बाबा ने मुझे कहा......
बाबा : नीर बेटा क़ासिम रात से घर नही आया है.... जाने इस ला-परवाह इंसान को कब अक़ल आएगी.
मैं : बाबा आप फिकर ना करे मैं अभी जाता हूँ ऑर क़ासिम को ढूँढ कर लाता हूँ.
फ़िज़ा : मैं भी आपके साथ चलूं?
मैं : नही आप घर मे ही रूको बाबा के पास मैं अभी क़ासिम भाई को लेकर आता हूँ.
फ़िज़ा : आप अपना भी ख़याल रखना
मैं : अच्छा
फिर मैं क़ासिम को गाँव भर मे ढूंढता रहा शाम से रात हो गई थी लेकिन क़ासिम नही मिला था. मैने उसके तमाम अड्डो पर भी देखा जहाँ वो अक्सर शराब पीने ओर जुआ खेलने जाता था लेकिन वहाँ भी किसी को क़ासिम के बारे मे कुछ नही पता था. तभी मुझे एक आदमी मिला जिसने मुझे बताया कि क़ासिम अक्सर कोठे पर भी जाता है. मैने क़ासिम को बरहाल वही ढूँढने जाने का फ़ैसला किया. आज मैं पहली बार ऐसी किसी जगह की तरफ जा रहा था. मेरे दिल मे हज़ारो सवाल थे लेकिन इस वक़्त मुझे क़ासिम को ढूँढना था इसलिए अपने अंदर की बैचैनि को मैने दर-किनार कर दिया ऑर कोठे की तरफ बढ़ गया.
मैं तेज़ कदमो के साथ कोठे की तरफ जा रहा था ऑर दिल मे डर भी था कि कहीं कोई ये बात फ़िज़ा या नाज़ी को ना बता दे कि मैं भी कोठे पर गया था जाने वो मेरे बारे मे क्या सोचेगी. मैं अपनी सोचो मे ही गुम था कि अचानक मुझे एक इमारत नज़र आई जो पूरी तरह जग-मगा रही थी लाइट की रोशनी के साथ मानो सिर्फ़ उस इमारत के लिए अभी भी दिन है बाकी तमाम गाँव की रात हो चुकी है. इमारत से बहुत शोर आ रहा था मेरी समझ मे भी नही आ रहा था कि क़ासिम के बारे मे किससे पुछू. मैने गेट के सामने खड़े एक काले से आदमी से क़ासिम के बारे मे पूछा....
मैं : सुनिए
आदमी : अंदर आ जाओ जनाब बाहर क्यों खड़े हो
मैं : नही मैं बाहर ही ठीक हूँ मुझे बस क़ासिम के बारे मे पुच्छना था वो कही यहाँ तो नही आया
आदमी : (ज़ोर से हँसते हुए) साहब यहाँ तो कितने ही क़ासिम रोज़ आते हैं ओर रोज़ चले जाते हैं. आपको अगर पुच्छना है तो अंदर अमीना बाई से पूछो.
मैं : ठीक है आपका बहुत-बहुत शुक्रिया.
उस आदमी ने मुझे अंदर जाने के लिए रास्ता दिया ऑर मैने अपने जोरो से धड़कते दिल के साथ चारो तरफ नज़र दौड़ा कर देखा कि कही मुझे कोई देख तो नही रहा ऑर फिर सीढ़िया चढ़ गया. अंदर बहुत तेज़ गानों का शोर था ऑर लोगो की वाह-वाही की आवाज़े आ रही थी. जैसे ही मैं अंदर पहुँचा तो वहाँ एक बहुत ही सुन्दर सी लड़की छोटे-छोटे कपड़ो मे नाच रही थी ऑर उसके चारो तरफ बैठे लोग उस पर नोटो की बारिश सी कर रहे थे. कोई आदमी उसकी चोली मे नोट डाल रहा था तो कोई उसके घाघरे की डोरी के साथ नोट लटका रहा था. वो लड़की बस मस्त होके गोल-गोल घूमे जा रही थी जैसे उसको किसी के भी हाथ लगाने की कोई परवाह ही ना हो . अचानक वो लड़की नाचती हुई मेरी ओर आई ऑर खुद को संभाल ना सकी ऑर मुझ पर गिरने को हुई मैने फॉरन आगे बढ़कर उस लड़की को थाम लिया ऑर गिरने से बचाया. जब मैंने उसे नज़र भरके देखा तो वो पसीने से लथ-पथ थी ऑर उसकी साँस भी फूली हुई थी.
मैं : आप ठीक तो है आपको लगी तो नही?
लड़की : हाए...अब जाके तो क़रार आया है आपने जो थाम लिया है.
मैं : (मुझे कुछ समझ नही आया कि क्या जवाब दूं इसलिए बस मुस्कुरा दिया)
लड़की : हाए तुम्हारा बदन कितना कॅसा हुआ है....कौन हो तुम.... यहाँ पहली बार देखा है
मैं : मेरा नाम नीर है मैं क़ासिम भाई को ढूँढने के लिए आया हूँ वो तो कल रात से घर नही आया...
लड़की : ओह अच्छा वो क़ासिम.... आप अंदर चले जाइए ऑर शबनम से पूछिए वो उसका खास है (आँख मार के)
मैं : शुक्रिया आपकी बहुत मेहरबानी जी
मैं अंदर कमरे मे चला गया जहाँ बहुत सारी लड़कियाँ बैठी हुई थी. मैं वहाँ शबनम का पुच्छने जाने लगा तो एक बुढ़िया ने मुझे रोक दिया कि ओ नवाबजादे अंदर कहाँ घुसा चला आया है ये लड़किया इंतज़ार मे है कोई ऑर बाहर वाली मे से कोई ढूँढ जाके. मुझे उसकी कही हुई बात समझ नही आई इसलिए उसी से पूछा कि मैं शबनम जी को ढूँढ रहा हूँ.
बुढ़िया : शबनम जी (ज़ोर से हँसती हुई) कौन है रे तू चिकने ?
मैं : मेरा नाम नीर है ऑर शबनम जी से मिलना है
शबनम : बोल चिकने क्या काम है मैं हूँ शबनम
मैं : जी मैं क़ासिम को ढूँढ रहा था तो बाहर वाली लड़की ने बताया कि आपको मालूम होगा क़ासिम के बारे मे वो रात से घर नही आया है घर मे सब उसकी फिकर कर रहे है.
शबनम : वो तो काफ़ी दिन से यहाँ भी नही आया. वैसे भी उस कंगाल के पास था क्या... ना साले की जेब मे दम था ना हथियार मे (बुरा सा मुँह बना के).
मैं : यहाँ नही आया तो कहाँ गया
शबनम : मुझे क्या पता उसकी बीवी को जाके पूछ.
Update-9
aise hi kuch der baad nazi ne mere dawayi laga di. or fir hum sab khana khake so gaye agle din main nazi or fiza shehar jake fasal bech aaye or hume zameendar se duguni keemat mili fasal ki jisse sab log bahut khush the. Fir hamane shehar se hi ghar ka jaruri samaan khareeda or nazi kehne lagi ki usko naye kapde lene hai sabke liye. uski jidd ke karan hum teeno ek dukaan par gaye jahan sabke liye kapde khareedne lag gaye. itne me fiza ko ek chakkar sa aaya or wo mere kandhe par gir gai jise maine zameen par girne se pehle hi sambhaal liya. usne sirf itna hi kaha ki kamjori ki wajah se chakkar aa gaya hoga or hum sab fir se kapde dekhne me lag gaye. aise hi sara din khareed dari karne ke baad bus me ghar aa gaye. aaj ghar me sab bahut khush the siwaye qasim ke. maine ek jodi kapde uthaye or qasim ko dene uske kamre me chala gaya lekin usne wo kapde zameen par fenk diye. maine bhi jyaadaa usko kuch nahi kaha or kamre se bahar aake baba ke pas baith gaya jahan nazi baba ko naye kapde dikha rahi thi. thodi der baad main or baba hi kamre me baithe the. raat ko sabne milkar khana khaya or so gaye qasim aaj bhi ghar me nahi tha. abhi meri aankh hi lagi thi ki kisi ne mujhe kandhe se pakadkar hilaya to meri jaag khul gai. ye fiza thi jo mujhe utha rahi thi or bahar chalne ka ishara kar rahi thi. main uske pichhe-pichhe kamre ke bahar aa gaya.
Main: kya hua itni raat ko kya kaam hai
Fiza: mujhe aapse ek jaruri baat karni thi
Main: iss waqt...bolo kya kaam hai
Fiza: ek gad-bad ho gai hai samajh nahi aa raha hai kaise kahu
Main: kya hua khulkar bataao naa
Fiza: wo main maa banne wali hun
Main: to ye to khushi ki baat hai isme meri neend kyo kharab ki ye baat to tum subah bhi bata sakti thi
Fiza: (jhunjhlate hue) aap baat nahi samajh rahe....main aapke bache ki maa banne wali hun
Main: kya.......(herani se) ye kaise ho sakta hai....
Fiza: uss din wo sab hua tha na shayad tab hi ho gaya.
Main : ye bhi toh sakta hai ki ye qasim ka bacha ho
Fiza: mujhe poora yaqeen hai ye aapka bacha hai kyonki qasim jabse jail se aaya hai usne mujhe hath tak nahi lagaya. jane uss din mujhe kya ho gaya tha....(ye kehte hue wo chup ho gai)
Main: to kisi ko kya pata ye kiska bacha hai tum bol dena qasim ka hai or kya. Main bhi kisi se kuch nahi kahunga
Fiza: nahi qasim ko pata chal jayega or wo sabko bol dega ki ye mera bacha nahi hai. kyonki usne to mujhe chhua bhi nahi to main maa kaise ban gai (pareshaan hote hue)
Main: chalo jo hoga dekha jayega abhi tum bhi so jao bahut raat ho gai hai hum subah kuch soch lenge tum fikar na karo main tumhare sath hun
Fiza: pakka mere sath ho naa
Main: ha baba
Fiza: mujhe chod kar kabhi mat jana neer main tumhare bina bahut akeli hun (mujhe gale lagate hue or rote hue)
Main: nahi jaunga meri jaan chup ho jao (uske mathe ko chumte hue)ab jao jake tum bhi so jao bahut raat ho gai
Fiza: (haa me sir hilte hue or mere gaal ko chum kar) achha aap so jao ab.
fir hum ek dusre se alag hue or apne-apne kamre me jake bistar par let gaye neend dono ki aankho se koso door thi shayad aaj hum dono hi ek hi chij ke bare me soch rahe the. mere andar uss din ke soye jazbaat aaj fir jaag gaye the. Lund fir se khada ho gaya tha fir wahi ek ajeeb sa ahsaas mehsoos hone lag gaya tha lekin khud ko kabu karte hue maine aankhe band kar lee or sone ki koshish karne laga. main ab bas aane wale din ke bare me soch raha tha mere dimaag me kai sare sawaal the jinka jawab sirf aane wale waqt ke pass tha.
Main apni socho ke sath bistar par aake let gaya or jaldi hi neend ne apni aagosh me mujhe le liya. Subah baba jaldi jaag jate the or unki awaaz se meri bhi aankh khul jati thi. Main din ke jaruri kaamo se farig hoke fiza or naazi ke sath khet par kaam ke liye nikal gaya. Din bhar hum teeno kheto me kam karte rahe or shaam ko jab ghar aaye to baba ne hum sab ko gehri fikar me daal diya. kyonki Qasim kal raat se ghar nahi aaya tha ye sunkar hum teeno ke hosh bhi udd gaye kyonki lakh ladne -jhagdne ke baad bhi wo din me kam se kam ek baar to ghar aa hi jata tha. Baba ki baat sun kar mujhe bhi qasim ki chinta ho rahi thi or main usko dhundhne ke bare me hi soch raha tha. ki baba ne mujhe kaha......
Baba : neer beta Qasim raat se ghar nahi aaya hai.... jane ye la-parwah insaan ko kab aqal aayegi.
Main : baba aap fikar na kare main abhi jata hun or qasim ko dhundh kar lata hun.
Fiza : main bhi aapke sath chalu?
Main : nahi aap ghar me hi ruko baba ke pass main abhi Qasim bhai ko lekar aata hun.
Fiza : aap apna bhi khayaal rakhna
Main : achha
fir main qasim ko gaav bhar me dhundhta raha shaam se raat ho gai thi lekin qasim nahi mila tha. maine uske tamaam addo par bhi dekha jahan wo aksar sharaab peene or juwa khelne jata tha lekin wahan bhi kisi ko qasim ke bare me kuch nahi pata tha. tabhi mujhe ek aadmi mila jisne mujhe bataayaa ki qasim aksar kothe par bhi jata hai. Maine qasim ko barahaal wahi dhundhne jane ka faisla kiya. Aaj main pehli baar aisi kisi jagah ki taraf jaa raha tha. Mere dil me hazaro sawaal the lekin iss waqt mujhe qasim ko dhundhna tha isliye apne andar ki baichaini ko maine dar-kinaar kar diya or kothe ki taraf badh gaya.
Main tez kadmo ke sath kothe ki taraf jaa raha tha or dil me darr bhi tha ki kahi koi ye baat fiza ya nazi ko naa bata de ki main bhi kothe par gaya tha jane wo mere bare me kya sochegi. Main apni socho me hi gumm tha ki achanak mujhe ek imaarat nazar aayi jo poori tarah jag-magaa rahi thi light ki roshni ke sath mano sirf uss imaarat ke liye abhi bhi din hai baki tamaam gaav ki raat ho chuki hai. Imarat se bahut shor aa raha tha meri samajh me bhi nahi aa raha tha ki qasim ke bare me kisse puchu. maine gate ke samne khade ek kaale se aadmi se qasim ke bare me puchaa....
Main : suniye
Aadmi : andar aa jao janab bahar kyo khade ho
Main : nahi main bahar hi thik hun mujhe bas qasim ke bare me puchhna tha wo kahi yahan to nahi aya
Aadmi : (jor se hansate hue) Saahab yahan to kitne hi qasim roz aate hain or roz chale jate hain. aapko agar puchhna hai to andar ameena bai se pucho.
Main : thik hai aapka bahut-bahut shukriya.
Uss aadmi ne mujhe andar jane ke liye rasta diya or main apne joro se dhadkte dil ke sath charo taraf nazar daudakar dekha ki kahi mujhe koi dekh to nahi raha or fir sidhiya chadh gaya. Andar bahut tez gaano ka shor tha or logo ki wah-waahi ki awaaze aa rahi thi. jaise hi main andar pohoncha to wahan ek bahut hi sunder si ladki chhote-chhote kapdo me naach rahi or uske chaaro taraf baithe log uss par noto ki bareesh si kar rahe the. koi aadmi uski choli me note daal raha tha to koi uske ghaghre ki dori ke sath note latkaa raha tha. Wo ladki bas mast hoke gol-gol ghume jaa rahi thi jaise usko kisi ke bhi hath lagane ki koi parvaah hi na ho . Achanak wo ladki nachti hui mere or aayi or khud ko sambhal na saki or mujh par girne ko hui maine foran aagey badhkar uss ladki ko thaam liya or girne se bachaya. jab main usse nazar bharke dekha to wo paseene se lath-path thi or uski saans bhi phuli hui thi.
Main : aap thik to hai aapko lagi to nahi?
Ladki : Haye...ab jake to qaraar aaya hai aapne jo thaam liya hai.
Main : (mujhe kuch samajh nahi aaya ki kya jawab doo isliye bas muskura diya)
Ladki : haye tumhara badan kitna kassa hua hai....kaun ho tum.... yahan pehli baar dekha hai
Main : mera naam Neer hai main qasim bhai ko dhundhne ke liye aaya hun wo to kal raat se ghar nahi aaya...
Ladki : Oh achha wo qasim.... aap andar chale jayiye or shabanam se puchiye wo uska khass hai (aankh maar ke)
Main : shukriya aapki bahut meharbani ji
Main andar kamre me chala gaya jahan bahut saari ladkiyaan baithi hui thi. main wahan shabanam ka puchhne jane laga to ek budhiya ne mujhe rok diya ki eh nawabzaade andar kaha ghusa chala aaya hai ye ladkiya intzaar me hai koi or bahar wali me se koi dhundh jake. Mujhe uski kahi hui baat samajh nahi aayi isliye usi se puchaa ki main shabanam ji ko dhundh raha hun.
Budhiya : shabanam jiiiii (jor se hansatee hui) kaun hai re tu chikne ?
Main : mera naam Neer hai or shabanam ji se milna hai
Shabanam : bol chikne kya kaam hai main hun shabanam
Main : ji main qasim ko dhundh raha tha to bahar wali ladki ne bataayaa ki aapko malum hoga qasim ke bare me wo raat se ghar nahi aaya hai ghar me sab uski fikar kar rahe hai.
Shabanam : wo to kaafi din se yahan bhi nahi aya. waise bhi uss kangaal ke pass tha kya... naa sale ki jeb me dam tha naa hathiyaar me (bura sa munh bana ke).