• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

आखिरी शिकार complete

उसी क्षण एक दूसरा आदमी बाथरूम में से निकला । उसने आगे बढकर कमरे का द्वार बन्द कर दिया । दूसरा एक हैट और एक लम्बा ओवरकोट पहने हुये था ।

राज ने कमरे में दृष्टि दौड़ाई ।

उसका सूटकेस पलंग पर खुला पड़ा था । सूटकेस का सारा सामान पलंग पर फैला हुआ था । वैसी ही हालत में उसका ब्रीफकेस भी था । ब्रीफकेस में मौजूद एक-एक कागज पलंग पर बिखरा पड़ा था।

"इस हरकत का क्या मतलब हुआ ?" - राज ने क्रोधित स्वर से पूछा।

इन्स्पेक्टर ने अपना रिवाल्वर वाला हाथ नीचे झुका लिया और पूर्ववत् मधुर स्वर से बोला - "मेरा नाम इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड है ।"

"मैंने नाम नहीं पूछा ।"

"फिर भी मुझे बताना तो था ही । आप मिस्टर राज है न?"

"हां, लेकिन..." "हमें विश्वस्त सूत्रों से पता लगा है कि आप स्मगलिंग का धन्धा करते हैं और अपने देश से अपने साथ चरस लाये हैं ।"

"आपका दिमाग तो नहीं खराब हो गया है ?" - राज चिल्लाकर बोला - "आप..."

"धीरे बोलिये ।" - इन्सपेक्टर डांट कर बोला । '

"क्यों धीरे बोलूं ?" - राज और ज्यादा चिल्लाकर बोला - "आप जानते हैं, मैं कौन हूं? मैं प्रेस प्रतिनिधि के रूप में अपने देश के प्रधानमन्त्री के साथ यहां कामनवैल्थ प्रीमियर्स की कांफ्रेंस कवर करने के लिये आया हूं और आप मुझे चरस का स्मगलर सिद्ध कर रहे हैं

"प्रेस प्रतिनिधि होने के साथ-साथ आप स्मगलर भी हो सकते हैं।"

"लेकिन मैं स्मगलर नहीं हूं।"

"हमारी सूचना यही कहती है ।"

"आपकी सूचना गलत है और आपने मेरी गैरहाजिरी में मेरे कमरे में घुसकर और मेरे सामान की तलाशी लेकर एक अनाधिकार चेष्टा की है । मैं इसकी रिपोर्ट अपने देश के हाई कमिश्नर से करूंगा।"

"आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे ।" - इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड शान्त स्वर में बोला।

"क्यों नहीं करूंगा? कौन रोकेगा मुझे?"

"आपको रोकेगा कोई नहीं लेकिन आपके पास वक्त नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"कल सुबह के प्लेन से आप लन्दन से भारत के लिये प्रस्थान कर रहे हैं ।"

“मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा हूं । आप मुझे जबरदस्ती यहां से नहीं निकाल सकते । मेरे पास लीगल पासपोर्ट और वीसा है और मैं अपने देश के प्रधानमन्त्री के साथ आया हूं | आप मेरे साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं कर सकते ।"

"जबरदस्ती कौन कर रहा है, साहब ! आप अपनी मर्जी से कल सुबह यहां से रवाना हो रहे है

"मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा हूं | और मैं अभी तुम्हारी रिपोर्ट करता हूं।"

राज लम्बे डग भरता टेलीफोन की ओर बढा ।

उसी क्षण लम्बे ओवरकोट वाले का हाथ हवा में घूमा ।

कोई भारी चीज राज की खोपड़ी के पृष्ठ भाग से टकराई।

राज की आंखों के आगे अंधेरा छा गया । उसके घुटने मुड़ गये और उसके हाथों ने अपने आप उठकर सिर को थाम लिया ।

इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड अपनी रिवाल्वर को नाल की ओर से पकड़े उसकी ओर बढा ।

राज ने अपने सिर को झटका दिया । फिर उसने उस अधबैठी स्थिति में ही टेलीफोन की ओर छलांग लगा दी। उसने जल्दी से रिसीवर को क्रेडल से खींचा और हांफता हुआ माउथपीस में बोला - "हैल्प ! हैल्प !!"

राज ने इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड का रिवाल्वर वाला हाथ अपनी खोपड़ी की ओर घूमता देखा । वह नीचे झुक कर वार बचा गया ।

लम्बे ओवरकोट वाला भी हाथ में छोटा-सा डन्डा लिये उसकी ओर बढ़ रहा था ।

 
लम्बे ओवरकोट वाला भी हाथ में छोटा-सा डन्डा लिये उसकी ओर बढ़ रहा था ।

राज ने टेलीफोन को रिसीवर सहित उठा लिया एक झटके से उसने टेलिफोन के प्लग को साकेट से निकाल दिया । उसने टेलीफोन को दुबारा

अपने पर वार करने को तत्पर इन्स्पेक्टर के ऊपर खींच मारा।

टेलीफोन भड़ाक से इन्स्पेक्टर के चेहरे पर से टकराया । उसके हाथ से रिवाल्वर निकल कर जमीन पर जा गिरी।

राज रिवाल्वर पर झपटा ।

उसी क्षण काले ओवरकोट वाला उसके सिर पर पहुंच गया। उसके हाथ में थमे डन्डे का भरपूर प्रहार फिर राज के सिर पर पड़ा। उसके बाद क्या हुआ, राज को पता नहीं लगा

उसकी चेतना लुप्त हो चुकी थी।

***

जब राज की आंख खुली तो उसने अपने आप को अस्पताल के एक कमरे में पाया ।

उसके जिस्म का जोड़-जोड़ दुख रहा था और उसके सिर पर पट्टी बंधी हुई थी।

उसने सिर घुमाकर कमरे में चारों ओर देखा । कमरा खाली था ।

फिर उसे पलंग के साथ काल बैल का पुश लटका दिखाई दिया । उसने पुश का बटन दबाया और

उस पर से हाथ हटाना भूल गया ।

एक आदमी भागता हुआ कमरे में घुसा । वह एक सफेद कोट पहने हुये था और उसके गले में स्टेथस्कोप लटक रहा था ।

"क्या करते हो, मिस्टर ?" - वह जल्दी से बोला

राज ने पुश पर से हाथ हटा लिया ।

"तुम डॉक्टर हो ?" - राज बोला ।

"हां ।" - उत्तर मिला। “

मैं कहां हूं?"

"तुम सिल्वर जुबली अस्पताल में हो ।" - डॉक्टर ने बताया ।

"मैं यहां कैसे पहुंचा ?"

"तुम एक दुर्घटना के शिकार हो गये थे ।"

"कैसे?"

"तुम्हें नहीं मालूम ?" - डॉक्टर तनिक हैरानी भरे स्वर में बोला।

राज ने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया । "हद से ज्यादा शराब पीने का यही अन्जाम होता है।" - डॉक्टर धीरे से बोला ।

"किसने पी थी शराब ?" - राज तीव्र स्वर से बोली।

"तुमने और किसने ? तभी तो सड़क पर चलते हुये कार से जा टकराये थे ।"

"कहां?"

"प्रिंस एल्बर्ट रोड पर | जब तुम अस्पताल में लाये गये थे, तब भी तुम्हारे मुंह से शराब के भभूके छूट रहे थे।"

"लेकिन कल मैंने शराब नहीं पी थी । बल्कि शराब को चखा तक नहीं था ।"

"तुम शराब नहीं पीते ?"

"पीता तो हूं लेकिन..." '

"तो क्या रात को किसी ने शराब जबरदस्ती तुम्हारे हलक में उड़ेल दी थी ?"

"हां, यह हो सकता है।" डाक्टर विचित्र नेत्रों से उसकी ओर देखने लगा |

"मेरी हालत कैसी है ?"

"खुशकिस्मत हो तुम | कोई हड्डी नहीं टूटी है और बाकी जिस्म पर भी थोड़ी बहुत खरोचें ही आई हैं । सिर्फ सर में ज्यादा चोट आई है।"

"मैं यहां कैसे पहुंचा ?"

"किसी भले आदमी ने तुम्हें सड़क पर पड़ा पाया था । वह तुम्हें यहां अस्पताल में छोड़ गया था ।"

 
"किसी ने मुझे कार से टकराते देखा था ?"

"उसी आदमी ने देखा था जो तुम्हें यहां छोड़ने आया था ।"

"उसके अलावा ?"

"मुझे खबर नहीं।"

"और वह भला आदमी जो मुझे यहां छोड़कर गया था, इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड था ।"

"इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड !" - डॉक्टर उलझनपूर्ण स्वर से बोला।

"हां | लाल चेहरे वाला लम्बा-तगड़ा आदमी । चेहरे पर चेचक के दाग, माथे पर एक चोट का लम्बा निशान..."

"नहीं, नहीं वह आदमी तो..." “एक लम्बा ओवरकोट पहने हुए था और उसके सिर पर हैट था ।"

"तुम्हें कैसे मालूम ? तुम तो बेहोशी की हालत में यहां लाये गये थे।"

"डॉक्टर साहब, आपकी जानकारी के लिये न मैंने शराब पी थी और न मैं किसी एक्सीडेन्ट का शिकार हआ था । जो लम्बे ओवरकोट वाला आदमी मझे यहां छोडकर गया था, उसने और इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड ने मेरे कमरे में मेरी यह हालत बनाई थी।"

"क्यों ?" - डॉक्टर संदिग्ध स्वर से बोला ।

"मालूम नहीं।"

डॉक्टर के चेहरे पर से अविश्वास के भाव झलकने लगे।

"मुझे मालूम था, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं आयेगा।"

"तुमने घण्टी क्यों बजाई थी ?"

"मैं पुलिस को रिपोर्ट करना चाहता हूं । नहीं... यहां के पुलिस वालों ने ही तो मेरी यह हालत बनाई है । उन्हें रिपोर्ट करने का क्या फायदा ? मैं अपने देश के हाई कमीशन के किसी अधिकारी से बात करना चाहता हूं।"

उस समय रात के बारह बजे थे लेकिन फिर भी डॉक्टर ने राज की भारतीय हाई कमीशन के एक अधिकारी से उसकी बात करवा दी ।

राज ने अधिकारी को अपनी दास्तान सुनाई । अधिकारी ने फौरन एक्शन लेने का वादा किया और टेलीफोन बन्द कर दिया ।

रात को दो बजे उसी अधिकारी से उसकी फिर टेलीफोन पर बात हुई।

"मिस्टर राज" - अधिकारी बोला - "मैंने सार मामले की खुद छानबीन की है और मुझे खेद के साथ सूचित करना पड़ता है कि मुझे आपकी कहानी एकदम तथ्यहीन लगी है । मैंने अस्पताल के एमरजेन्सी वार्ड के डॉक्टर से बात की है। उसके कथनानुसार आप मोटर दुर्घटना के ही शिकार हुये हैं। आपके शरीर पर जिस प्रकार की

चोट आई है, उससे जाहिर होता है कि आप किसी चलती कार की साइड से टकराये थे । कार ने आपको फुटपाथ पर उछाल दिया था और आपका सिर एक बिजली के खम्भे से जा टकराया था। और यह बात हर किसी ने नोट की थी कि आपके मुंह से शराब के भभूके छूट रहे थे..."

"लेकिन..." - राज ने प्रतिवाद करना चाहा । "सुनते रहिये । मैं आपके होटल के कमरे में भी गया था । वहां मुझे ऐसा की सूत्र नहीं मिला था जिससे यह जाहिर होता हो कि वहां लड़ाई

झगड़ा हुआ था । वहां न टेलीफोन टूटा हुआ था

और न ही आपका सामान बिखरा हुआ था । हर चिज उसी तरतीब में थी जैसी में कि वह होनी चाहिये थी । और आपकी जानकारी के लिये लन्दन पुलिस फोर्स में क्राफोर्ड नाम का कोई इन्स्पेक्टर नहीं है और न ही उस हुलिये का कोई

आदमी पुलीस में है जो कि आपने इन्स्पेक्टर क्राफोर्ड का सहकारी बताता था ।"

 
कुझ क्षण राज के मुंह से बोल नहीं फूटा । फिर वह गुस्से से फट पड़ा।

"तो आप" - वह चिल्लाकर बोला - "यह कहना चाहते हैं कि मैं झूठ बोल रहा हूं?"

"मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है ।" - दूसरी ओर से हाई कमीशन के अधिकारी का शान्त स्वर सुनाई दिया - "मैं तो आप पर केवल अपनी तफ्तीश का नतीजा जाहिर कर रहा हूं । सम्भव है जो आप कह रहे हैं वह सच हो लेकिन हालात इसी ओर संकेत कर रहे हैं । आप चूंकि यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि आपने प्रधानमन्त्री की प्रेस पार्टी का सदस्य होते हुए इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत की है यानी आप शराब पीकर एक एक्सीडेन्ट का शिकार हो गये हैं और उसी का वजह से इस वक्त अस्पताल में पड़े हैं। हालात से यह जाहिर होता है कि आपने अपने सम्मान की रक्षा की खातिर एक कहानी गढ ली है कि यहां कि पुलिस वाले आपको खामखाह फंसा रहे हैं । मेरे कहने का मतलब यह है कि वर्तमान स्थिति में हम कोई ऐसी आफिशियल शिकायत यहां की पुलिस में दर्ज नहीं करवा सकते कि

आपके साथ यहां की पुलिस द्वारा कोई ज्यादती की गई है।"

राज चुप रहा।

"और आप की सूचनार्थ इस सारी घटना की सूचना प्रधानमन्त्री के निजी सचिव तक पहुंच गई है । उनकी निगाह में आपने एक निहायत गलत हरकत की है और आपने अपने देश और देश के प्रधानमन्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाई है । इस विषय में शायद प्रधानमन्त्री के निजी सचिव

आपसे बात करें।"

सम्बन्ध विच्छेद हो गया ।

राज हताशापूर्ण नेत्रों के हाथ में थमे रिसीवर को देखता रहा । फिर उसने रिसीवर को क्रेडल पर पटक दिया ।

आर्डरली ने टेलीफोन प्लग साकेट में से निकाला और टेलीफोन लेकर कमरे से निकल गया ।

फिर एक नर्स कमरे में प्रविष्ट हुई।

"रात के दो बज गये हैं, मिस्टर राज ।" - वह अपने व्यवसाय सुलभ मधुर स्वर से बोली - "अब आपको आराम करना चाहिये ।" राज बिना प्रतिवाद किये पलंग पर लेट गया ।

नर्स ने उसे कम्बल ओढाया और बिजली का स्विच ऑफ करके कमरे से बाहर निकल गई।

राज ने नेत्र बन्द कर लिये ।

***

 
अगली कुछ घटनायें बड़ी तेजी से घटीं।

सुबह छः बजे ही प्रधानमन्त्री का निजी सचिव अस्पताल में पहुंच गया। आते ही उसने दो टूक बात की। "तबीयत कैसी है ?" - उसने पूछा।

"ठीक ही मालूम होती है ।" - राज बोला ।

"चल फिर सकते हैं आप?"

"चल फिर कर देखा तो नहीं मैंने लेकिन मेरा ख्याल है कि मैं चल फिर सकता हूं।"

"प्रधानमन्त्री जी आपकी पिछली रात की गैरजिम्मेदाराना हरकत से बहुत नाराज हैं । एक तो आप शराब पी कर कहीं एक्सीडेन्ट कर बैठे

और दूसरे आपने यहां की पुलिस फोर्स को बदनाम करने की कोशिश की । मेरा इतनी सुबह यहां आने का मतलब यह है कि मैं नहीं चाहता कि बात तूल पकड़े, यहां के अखबारों के लिये

आप एक स्कैण्डल बन जायें और आपकी वजह से अन्य भारतीय प्रतिनिधियों पर छींटाकशी हो । आपका सामान आपके होटल के कमरे से एयरपोर्ट पर पहुंचा दिया गया है । एयर इन्डिया की फ्लाइट नम्बर 110 आठ बजे लन्दन से मुम्बई के लिये रवाना हो रही है । मैंने उसमें

आपकी सीट बुक करवा दी है । हाई कमीशन की एक गाड़ी आपको अभी एयरपोर्ट ले जायेगी और मैंने इस बात का इन्तजाम कर दिया है कि प्लेन रखना होने तक अखबार वालों की आप तक पहुंच न हो सके । बाकी बातें भारत पहुंचकर होंगी।"

राज को यूं लगा जैसे सचिव ने आखिरी वाक्य एक धमकी के तौर पर कहा हो ।

राज चुप रहा । कुछ कह पाने की गुंजाइश नहीं थी । प्रधानमन्त्री का निजी सचिव उसे एक अन्य आदमी के हवाले करके वहां से विदा हो गया ।

दूसरे आदमी ने राज को अस्पताल के कपड़े उताकर, अपने कपड़े पहनने में सहायता की। नर्स ने गीले तौलिये से उसका थोड़ा-बहुत हुलिया सुधार दिया, उसे एक इन्जेक्शन दे दिया और कुछ कैप्सूल और गोलियां उसके कोट की जेब में डाल दीं।

"दुर्घटना में मेरे सूट की हालत नहीं बिगड़ी ?" - एकाएक राज बोला । "बिगड़ी थी।" - नर्स बोली- “यह तीन जगह से रफू करवाया गया है और इसे झाड़-पोंछ कर फिर प्रेस किया गया है।"

राज चुप हो गया।

वह दूसरे आदमी के साथ अस्पताल से विदा हो गया।

दूसरा आदमी हाई कमीशन की एक बन्द गाड़ी में उसे एयरपोर्ट पर ले आया ।

प्लेन चलने के समय से केवल पन्द्रह मिनट पहले उसने राज का टिकट उसके हाथ में रखा और गाड़ी का दरवाजा खोल दिया ।

राज चुपचाप कस्टम के बैरियर की ओर बढ़ गया।

उसने अपना फैल्ट हैट अपने सिर पर इस प्रकार जमाया था कि सिर पर बन्धी पट्टी छुप गई।

उसने अपना पासपोर्ट वगैरह चैक करवाया और आगे बढा ।

एकाएक उसकी दृष्टि हवाई पट्टी को एयरपोर्ट की इमारत से अलग करने वाले लोहे के रेलिंग पर पड़ी।

वहां वह आदमी खड़ा था जिसने पिछली रात को अपना नाम इन्सपेक्टर क्राफोर्ड बताया था। उसकी निगाह राज से मिली और उसके चेहरे पर एक इत्मीनान भरी मुस्कराहट उभर आई । उस समय वह एक ट्वीड का सूट

और उसके ऊपर एक लम्बा ओवरकोट पहने था जिसके सामने के सारे बटन खुले हुये थे । उसकी मोटी उंगलियों में एक सिगार बना हुआ था ।

राज को अपनी ओर देखते पाकर उसने अभिवादन के रूप में अपना हाथ हिलाया ।

राज अंगारों पर लोट गया ।

उसने उस ओर से दृष्टि फिरा ली और सीधा प्लेन की ओर बढा।

वह प्लेन में जा बैठा।

ठीक आठ बजे प्लेन हवाई पट्टी पर दौड़ने लगा।

आखिरी क्षण में राज ने प्लेन की खिड़की से बाहर झांका।

वह आदमी अभी भी बैरियर के पास खड़ा सिगार पी रहा था । शायद उसे शक था कि कहीं आखिरी क्षण पर राज प्लेन से उतर न आये |

प्लेन टेक ऑफ कर गया ।

राज ने हैट उतार कर अपनी गोद में रख लिया

और अपनी सीट की पीठ से अपना सिर टिका दिया।

 
उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था।

"प्लेन का अगला स्टापेज कौन-सा है ?" - राज ने गैंगवे से गुजरती एयर होस्टेस से हिन्दोस्तानी में पूछा।

"पेरिस ।" - उत्तर मिला।

ठीक नौ बजकर पांच मिनट पर प्लेन पेरिस के ओरली एयरपोर्ट पर उतरा ।

एयर होस्टेस से ही उसे मालूम हुआ था कि वहां प्लेन चालीस मिनट रुकने वाला था ।

पेरिस से प्लेन में कितने ही और यात्री सवार हो गये । एयर होस्टेस उन्हें विभिन्न सीटों की ओर निर्देशित करती रही।

वहां उतरने वाला कोई नहीं था ।

एकाएक राज अपने स्थान से उठा और एयर होस्टेस के समीप पहुंचा।

"आई एम सारी टु बादर यू" - वह बोला - "लेकिन मुझे यहीं उतरना पड़ेगा।"

"लेकिन आप तो हमारे साथ मुम्बई तक जाने वाले थे?" - एयर होस्टेस बोली ।

"जाने वाला था लेकिन अब नहीं जा पाऊंगा।" - राज खेदपूर्ण स्वर से बोला - "मेरे कुछ बहुत महत्वपूर्ण कागजात लन्दन में ही रह गये हैं । मुझे यहीं से फौरन वापिस जाना होगा | भारत के लिये मैं शाम तक कोई दूसरी फ्लाइट पकड़ लूंगा

"ऐज यू विश ।"

"मैं कस्टम पर जा रहा हूं मेरा सामान उतरवा दीजिये ।"

"ओके।"

राज अपना हैट दुबारा अपने सिर पर जमा लिया और एयरपोर्ट की इमारत की ओर बढा । कस्टम से निपटने के बाद वह एयपोर्ट से बाहर निकल गया।

वह ओरली एयरपोर्ट से टैक्सी पर सवार हुआ और सेन्ट्रल बस टरमिनल पर पहुंच गया । वहां से वह एक बस में सवार हो गया । बस नारमंडी के समुद्र तट पर स्थित इलाके शेरबोर्ग तक जाती थी।

लगभग साढे बारह बजे वह शेरबोर्ग पहुंचा । अपना सूटकेस उसने बस टरमिनल के क्लाकरूम में जमा करवा दिया । और ब्रीफकेस हाथ में लटकाये समुद्र तट की ओर बढा ।

अगले दो घन्टों में उसने एक ऐसा मछियारा खोज निकाला जो एक स्टीमर का स्वामी था और जो रात के अन्धकार में इंगलिश चैनल पार करके उसे इंगलैंड के किसी सुनसान समुद्र तट पर छोड़

आने के लिये तैयार था बशर्ते कि उसे एक मोटी रकम एडवांस में दे दी जाती ।

राज ने ऐसा ही किया ।

उसने भोजन किया, बस टरमिनल से अपना सूटकेस लिया और वापिस मछियारे के स्टीमर में पहुंच गया । दिन भर वह स्टीमर में सोया रहा ।

रात के लगभग सात बजे मछियारे ने स्टीमर को पायर से खोला और उसे समुद्र की छाती पर दौड़ा दिया । इंग्लैंड और फ्रांस दोनों देशों की पैट्रोल पुलिस से बचता हुआ वह मछियारा राज को इंग्लैंड में साउथेम्पटन के एक उजाड़ समुद्र तट पर छोड़ गया ।

राज फिर इंग्लैंड में था ।

अपना सूटकेस और ब्रीफकेस सम्भाले लोगों की निगाहों से बचता-बचाता वह रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया । वहां वह लन्दन की ओर जाती एक ट्रेन पर सवार हो गया ।

लन्दन रेलवे स्टेशन पर उतर कर वह एक टैक्सी पर सवार हुआ और वोरचेस्टर स्क्वायर पर स्थित कैलवर्ली गैस्ट हाउस के सामने टैक्सी से उतर गया । गैस्ट हाउस में उसे बड़ी सहूलियत से एक कमरा मिल गया । उसने ब्रीफकेस और सूटकेस कमरे में रखा और लगभग फौरन ही बाहर निकल आया।

उसने एक टैक्सी पकड़ी और उस पते पर पहुंच गया जहां पिछली रात वह मिलर के साथ गया था।

राज गली से बाहर ही टैक्सी से उतर गया ।

उसने घड़ी पर दृष्टिपात किया। साढे ग्यारह बज चुके थे।

पथरीले रास्ते से होता हुआ वह उस पुरानी-सी इमारत के सामने पहुंच गया जहां पिछली रात उसे मिलर लाया था ।

उसने धीरे से कालबैल का पुश दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। भीतर से कोई उत्तर नहीं मिला। राज ने फिर घन्टी बजायी।

भीतर से किसी प्रकार की आवाज नहीं आई।

राज ने द्वार को धीरे से धक्का दिया।

द्वार थोड़ा-सा खुल गया । वह भीतर से बन्द नहीं था ।

राज सावधानी से भीतर प्रविष्ट हो गया । उसने पीछे द्वार बन्द कर दिया ।

भीतर एकदम अन्धेरा था ।

 
उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था।

"प्लेन का अगला स्टापेज कौन-सा है ?" - राज ने गैंगवे से गुजरती एयर होस्टेस से हिन्दोस्तानी में पूछा।

"पेरिस ।" - उत्तर मिला।

ठीक नौ बजकर पांच मिनट पर प्लेन पेरिस के ओरली एयरपोर्ट पर उतरा ।

एयर होस्टेस से ही उसे मालूम हुआ था कि वहां प्लेन चालीस मिनट रुकने वाला था ।

पेरिस से प्लेन में कितने ही और यात्री सवार हो गये । एयर होस्टेस उन्हें विभिन्न सीटों की ओर निर्देशित करती रही।

वहां उतरने वाला कोई नहीं था ।

एकाएक राज अपने स्थान से उठा और एयर होस्टेस के समीप पहुंचा।

"आई एम सारी टु बादर यू" - वह बोला - "लेकिन मुझे यहीं उतरना पड़ेगा।"

"लेकिन आप तो हमारे साथ मुम्बई तक जाने वाले थे?" - एयर होस्टेस बोली ।

"जाने वाला था लेकिन अब नहीं जा पाऊंगा।" - राज खेदपूर्ण स्वर से बोला - "मेरे कुछ बहुत महत्वपूर्ण कागजात लन्दन में ही रह गये हैं । मुझे यहीं से फौरन वापिस जाना होगा | भारत के लिये मैं शाम तक कोई दूसरी फ्लाइट पकड़ लूंगा

"ऐज यू विश ।"

"मैं कस्टम पर जा रहा हूं मेरा सामान उतरवा दीजिये ।"

"ओके।"

राज अपना हैट दुबारा अपने सिर पर जमा लिया और एयरपोर्ट की इमारत की ओर बढा । कस्टम से निपटने के बाद वह एयपोर्ट से बाहर निकल गया।

वह ओरली एयरपोर्ट से टैक्सी पर सवार हुआ और सेन्ट्रल बस टरमिनल पर पहुंच गया । वहां से वह एक बस में सवार हो गया । बस नारमंडी के समुद्र तट पर स्थित इलाके शेरबोर्ग तक जाती थी।

लगभग साढे बारह बजे वह शेरबोर्ग पहुंचा । अपना सूटकेस उसने बस टरमिनल के क्लाकरूम में जमा करवा दिया । और ब्रीफकेस हाथ में लटकाये समुद्र तट की ओर बढा ।

अगले दो घन्टों में उसने एक ऐसा मछियारा खोज निकाला जो एक स्टीमर का स्वामी था और जो रात के अन्धकार में इंगलिश चैनल पार करके उसे इंगलैंड के किसी सुनसान समुद्र तट पर छोड़

आने के लिये तैयार था बशर्ते कि उसे एक मोटी रकम एडवांस में दे दी जाती ।

राज ने ऐसा ही किया ।

उसने भोजन किया, बस टरमिनल से अपना सूटकेस लिया और वापिस मछियारे के स्टीमर में पहुंच गया । दिन भर वह स्टीमर में सोया रहा ।

रात के लगभग सात बजे मछियारे ने स्टीमर को पायर से खोला और उसे समुद्र की छाती पर दौड़ा दिया । इंग्लैंड और फ्रांस दोनों देशों की पैट्रोल पुलिस से बचता हुआ वह मछियारा राज को इंग्लैंड में साउथेम्पटन के एक उजाड़ समुद्र तट पर छोड़ गया ।

राज फिर इंग्लैंड में था ।

अपना सूटकेस और ब्रीफकेस सम्भाले लोगों की निगाहों से बचता-बचाता वह रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया । वहां वह लन्दन की ओर जाती एक ट्रेन पर सवार हो गया ।

लन्दन रेलवे स्टेशन पर उतर कर वह एक टैक्सी पर सवार हुआ और वोरचेस्टर स्क्वायर पर स्थित कैलवर्ली गैस्ट हाउस के सामने टैक्सी से उतर गया । गैस्ट हाउस में उसे बड़ी सहूलियत से एक कमरा मिल गया । उसने ब्रीफकेस और सूटकेस कमरे में रखा और लगभग फौरन ही बाहर निकल आया।

उसने एक टैक्सी पकड़ी और उस पते पर पहुंच गया जहां पिछली रात वह मिलर के साथ गया था।

राज गली से बाहर ही टैक्सी से उतर गया ।

उसने घड़ी पर दृष्टिपात किया। साढे ग्यारह बज चुके थे।

पथरीले रास्ते से होता हुआ वह उस पुरानी-सी इमारत के सामने पहुंच गया जहां पिछली रात उसे मिलर लाया था ।

उसने धीरे से कालबैल का पुश दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। भीतर से कोई उत्तर नहीं मिला। राज ने फिर घन्टी बजायी।

भीतर से किसी प्रकार की आवाज नहीं आई।

राज ने द्वार को धीरे से धक्का दिया।

द्वार थोड़ा-सा खुल गया । वह भीतर से बन्द नहीं था ।

राज सावधानी से भीतर प्रविष्ट हो गया । उसने पीछे द्वार बन्द कर दिया ।

भीतर एकदम अन्धेरा था ।

 
उसने द्वार के समीप की दीवार को टटोला । शीघ्र ही उसका हाथ बिजली के स्विच से जा टकराया । उसने स्विच ऑन किया लेकिन बिजली नहीं जली।

राज के कोट की जेब में एक फाउन्टेन पैन के आकार की टार्च थी जो वह सदा अपनी जेब में रखता था । उसने टार्च निकाली और उसका स्विच ऑन किया ।

लम्बे गलियारे के निपट अन्धकार में पेन्सिल टार्च का सीमित प्रकाश भी बहुत ज्यादा मालूम हो रहा था ।

राज पेन्सिल टार्च के प्रकाश में सावधानी से गलियारे में आगे बढा ।

वह गलियारे के सिर पर स्थित उस बड़े कमरे में पहुंच गया जहां वह पिछली रात को जान फ्रेडरिक, अनिल साहनी और रोशनी से मिला था | उसने पेन्सिल टार्च के प्रकाश की सहायता से द्वार के बगल में लगा बिजली का स्विच बोर्ड तलाश किया और बारी-बारी उसके सारे स्विच ऑन कर दिये।

कमरे में प्रकाश नहीं हुआ।

शायद मेन स्विच ऑफ था ।

राज कुछ क्षण उलझन में पड़ा अपने स्थान पर खड़ा रहा फिर उसने टार्च का प्रकाश उस बड़े कमरे में चारों ओर घुमाया।

कमरा खाली था।

राज ने कमरे के फर्श पर प्रकाश डाला और फिर उसका मुंह सूखने लगा।

जिन कुर्सियों पर पिछली रात जान फ्रेडरिक, अनिल साहनी और रोशनी बैठे थे उनके पीछे एक मानव शरीर पड़ा था ।

राज सावधानी से आगे बढा ।

कुर्सियों के पीछे पहुंचकर उसने शरीर के चेहरे पर प्रकाश डाला।

वह मिलर था।

मोजर रिवाल्वर की जबरदस्त गोली उसकी छाती को फाड़ती हुई गुजर गई थी। उसी क्षण राज के कानों में किसी की हल्की सी आवाज पड़ी। राज ने फौरन टार्च बुझा दी और एक कुर्सी के पीछे छुपकर द्वार की ओर देखने लगा।

आवाज गलियारे से आई थी।

राज सांस रोके प्रतीक्षा करने लगा।

एक बार फिर खट की आवाज हुई और साथ ही उसे किसी के धीरे-धीरे सांस लेने का स्वर सुनाई दिया।

फिर धीरे से कमरे का द्वार खुला ।

"फ्रेडरिक !" - फिर उसके कानों में एक भर्राया हुआ धीमा लेकिन स्पष्ट विदेशी स्वर पड़ा - "इज दैट यू फ्रेडरिक ?"

"कौन है ?" - राज धीरे बोला । '

आवाज उसके मुंह से निकलने की देर थी कि अन्धकार में एक शोला-सा लपका । साथ ही गोली चलने की आवाज से कमरा गूंज गया । गोली सनसनाती हुई राज के कान के पास से गुजर गई और पीछे दीवार के साथ जा टकराई।

फिर राज को गलियारे में भागते कदमों कीआवाज सुनाई दी।

कुछ क्षण राज स्तब्ध-सा कुर्सी के पीछे छुपा रहा फिर वह बिजली की फुर्ती से अपने स्थान से

उठा और कमरे से बाहर की ओर भागा ।

उसी क्षण उसे बाहर का दरवाजा खुलने और भड़ाक से बंद होने की आवाज सुनाई दी ।

राज तेजी से गलियारे में दौड़ा ।

वह गलियारे के सिर पर पहुंचा और दरवाजा खोलकर बाहर गली में आ गया । '

दूर गली के सिर पर राज को एक साया-सा दिखाई दिया । उसके भागते कदम गली के पथरीले रास्ते से टकराकर रात के सन्नाटे में काफी आवाज पैदा कर रहे थे ।

राज उसके पीछे भागा ।

 
Back
Top