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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“आसान काम !”

“कोट ही गायब कर देता !”

“काफी सयाने हो !”

वो खामोश रहा ।

“पढ़ने का काफी शौक है तुम्हें ।” - मैं बोला - “अच्छा कलैक्शन है बुक्स का यहां ।”

उसने सहमति में सिर हिला कर अपने शौक की और अच्छे कलैक्शन की हामी भरी ।

“कलैक्शन में एक ग्रन्थ विष विज्ञान पर भी है !”

उसकी भवें उठीं ।

मैंने शैल्फ में से पुस्तक निकाल कर उसे दिखाई ।

“अच्छा ये !” - वो बोला - “ये किसी ने गिफ्ट की थी ।”

“किसने ?”

“खुद लेखक ने ।”

“आइ सी ।”

“लेकिन ये मेरे इंटरैस्ट का सब्जेक्ट नहीं इसलिये रख छोड़ी बस ।”

“कभी पढ़ी नहीं ?”

“न ! खोल के भी न देखी ।”

“तो किसने पढ़ी ?”

“क्या मतलब ?”

मैंने पुस्तक को वहां से खोल कर उसके सामने किया जहां पन्ना मुड़ा हुआ था और कछ लाइनें रेखांकित थीं ।

उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये, जल्दी से किताब मेरे हाथ से ले कर उसने उसका मुआयना किया ।

“मैं इस बाबत कुछ नहीं जानता ।” - फिर दृढ़ता से बोला - “हो सकता है ये मुझे ऐसे ही मिली हो !”

“लेखक मार्क्ड किताब भला क्यों तुम्हें गिफ्ट करेगा ?”

“तो फिर ये मार्किंग यहां किसी ने की ।”

“किसने ?”

“किसी ने भी । पापा ने, ममी ने, सुरभि ने, किसी गैस्ट ने भी ऐसा किया हो सकता है ।”

“तुम्हारा कमरा इतना असैसिबल है ?”

“है ही । तभी तो आप लोग यहां मौजूद हैं ।”

“ठीक !”

“मुझे नीचे काम है । मैं जा सकता हूं ?”

मैंने यादव र्को तरफ देखा । यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।

शिशिर ने किताब वापिस शैल्फ पर रखी और वहां से चला गया ।

“यहां तुम्हारा मुकाम कहां है ?” - यादव ने देवीलाल से पूछा ।

“पिछवाड़े में सर्वेन्ट्स क्वार्टर है” - देवीलाल तनिक हड़बड़ाया सा बोला - “वहां एक कमरा मेरा भी है ।”

“दिखाओ । ले के चलो ।”

देवीलाल के साथ हम उसके आवास पर पहुंचे ।

वहां की भी तलाशी हुई जिसमें खुद यादव ने सक्रिय हिस्सा लिया । शिशिर का आर्म्स पैचिज वाला ट्विड का कोट तब भी उसके हाथ में था जिसे उसने एक कुर्सी पर डाला और खुद वहां की कई जगहों को टटोला ।

एक अलमारी के टॉप शैल्फ में से एक पैकेट बरामद हुआ जिस पर खोपड़ी और एक दूसरी को क्रॉस करती हड्डियों का खतरे का निशान बना हुआ था और नीचे लिखा था:

चूहे मारने की दवा

स्ट्रिकनिन

“ये क्या है ?” - यादव सख्ती से बोला ।

“वही है, सर” - देवीलाल बोला - “जो लिखा है ।”

“जवाब दे ।”

“चूहे मारने की दवा है ।”

“इतने फैंसी इलाके की इतनी फैंसी कोठी में चूहों का क्या काम ?”

“बैक यार्ड में हैं । गहरी गहरी खोह खोद ली है ।”

“इसे खाते हैं और खोह में ही मर जाते हैं !”

“नहीं, कहीं और जा के मरते हैं ।”

“क्या कह रहा है !”

“इसे खाने से प्यास लगती है । चूहे पानी के लिये तड़पते हैं । पानी की तलाश में भटकते हैं तो यार्ड से निकल जाते हैं ।”

“पढ़ा लिखा है ?”

“बारहवी पास हूं ।”

“छोटे साहब की किताबें निकाल कर पढ़ता है ?”

“निकाल कर नहीं, सर, मांग कर ।”

“क्या पढ़ता है ? क्या पढ़ना पसंद करता है ?”

“नावल । कभी कभार ।”

“वो देते हैं या खुद छांट लेने को बोलते हैं ?”

“खुद छांट लेने को बोलते हैं ।”

“इसलिये कभी नावल की जगह विष विज्ञान की पुस्तक छांट ली !”

“नहीं, सर ।”

“उसी में से ये ज्ञान अर्जित किया कि स्ट्रीकनिन चूहे मारने के भी काम आती थी ?”

“नहीं, सर । मुझे नावल के सिवाय छोटे साहब की किसी किताब में कोई दिलचस्पी नहीं ।”

“वैसे मालूम तो था न कि वैसी एक किताब वहां थी ?”

“मालूम तो था !”

“लेकिन कभी निकाली नहीं, पढ़ी नहीं, मार्क नही की ?”

उसने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।

********************************
 
हम कोठी में लौटे । तब ऊपर बैडरूम में से लाश हटाई जा रही थी और टैकनिशियंस भी रुखसत होने की तैयारी कर रहे थे । बैडरूम के एक कोने में एक टू सीटर सोफा पड़ा था जिस पर हम दोनों जा के बैठे ।

“काफी पिला सकता है ?” - यादव देवीलाल से बोला ।

देवीलाल ने तत्काल सहमति में सिर हिलाया ।

“ले के आ ।”

वो चला गया तो पीछे मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया ।

“क्या हो रहा है ?” - यादव यूं बोला जैसे बड़बड़ा रहा हो, स्वतः भाषण कर रहा हो - “कहीं कोई सिरा ही पकड़ में नहीं आ रहा । साफ साफ रास्ता दिखाने लायक कोई क्लू ही नहीं मिल रहा ।”

“निशां मिलता है कातिल का” - मैं थियेट्रिकल अंदाज से बोला - “मगर कातिल नहीं मिलता ।”

“इस देवीलाल के बारे में क्या कहते हो ?”

“अभी पीछे आरने कमरे में रैट पायजन के बारे में उसने जो कहानी की, वो ठीक हो सकती है, विष विज्ञान ग्रंथ उसने न वाचा हो, ये भी मुमकिन है क्योंकि जब वो स्ट्रीकनिन के बारे में पहले से जानता था तो ग्रंथ पढ़ के ज्ञान अर्जित करने की उसे कोई जरूरत नहीं थी । लेकिन अपनी छतरपुर ट्रिप के बारे में उसने जो कुछ कहा था, उससे मैं मुतमईन नहीं । मालिक के भरोसे का नौकर है फिर भी फार्महाउस में सुरभि की लाश देख कर वो खामोश रहा, ये एक शक उपजाऊ बात है । खामोशी की जो वजह उसने बयान की, वो भी यकीन में आने लायक नहीं । जेलबर्ड वो कभी था लेकिन मालिक का वफादार तो आज भी था । क्यों चुप रहा इतनी बड़ी वारदात की बाबत ! उस पर उस वजह से कोई हर्फ आता तो मालिक - जिसका कि वो वफादार था, जिसकी वो गुड बुक्स में था - बचाता न !”

“तुम्हारी बात ठीक है लेकिन उसकी वारदात की बाबत खामोशी ही उसे कातिल करार दे सकती हो, ऐसा तो नही है । वो कोताही है, नालायकी है, खोटी अक्ल की मिसाल है लेकिन उसके खिलाफ कत्ल का सबूत तो नहीं ! उसको फिर भी कातिल ठहरायें तो केयरटेकर के पीछे पड़े रहने का क्या मतलब बाकी रहा ?”

“देवीलाल मोटे तौर पर केयरटेकर जैसा ही है । ऊपर से पता लगा है कि वो थियेट्रिकल मेकअप का ज्ञाता है । ऐसे शख्स के लिये केयरटेकर विष्णु कसाना का बहुरूप धारण कर लेता क्या बड़ी बात रही होगी !”

“वो ! थियेट्रिकल मेकअप का ज्ञाता ?”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“तुम्हें कैसे मालूम ?”

मैंने सविस्तार उसे जेनयू के प्रोफेसर मजूमदार से हुई अपनी मुलाकात की बाबत बताया ।

“कमाल है ! तो तेरे खयाल से उसने केयरटेकर का बहुरूप धारण करके वारदात की ताकि उसकी करतूत केयरटेकर के सिर थुपती ?”

“नहीं हो सकता ?”

“दो सवालों का जवाब दे सको तो हो सकता है ।”

“बोलो ।”

“केयरटेकर की एक बांह टेढ़ी है, दूसरी बांह से छोटी है ।”

“देवीलाल अपनी बांह को पूरी आस्तीन से ढंक कर, बांह को आस्तीन में खींच कर, जानबूझ कर टेढ़ी अकड़ा कर ऐसा भ्रम बना सकता है ।”

“फट्टा है ।'

“ये न भूलो कि वक्त रात का था और फार्महाउस में नीमअंधेरा था ।”

“फिर भी.. .कमजोर है ।”

“दूसरी बात ?”

“अगर केयरटेकर बेगुनाह है, अगर जो किया देवीलाल ने उसका बहुरूप धर के किया तो केयरटेकर गायब क्यों है ? थाने से वापिस फार्महाउस लौटने की जगह वो खिसक क्यों गया ? अभी तक भी खिसका क्यों हुआ है ?”

“तुम्हें क्या पता ?”

“क्या मुझे क्या पता ?”

“कि वो खिसका हुआ है ?”

“भई, जब वो गायब है..”

“है या कर दिया गया है ?”

“क्या कहना चाहते हो ?”

“यादव साहब, आइंदा चौबीस घंटों में जमना से उसकी लाश बरामद हो तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी ।”

“अरे, क्या कह रहा है ! पिनक में बोल रहा है !”

“उसकी गुमशुदगी को ‘घाट पर मुलाकात’ से टाई अप करने की कोशिश कर रहा हूं ।”

“नानसैंस ! घाट पर मुलाकात की उसकी बात इमरान डिप्टी के लिये थी, तूने खुद बोला ऐसा ।”

“वो बात मुझे मालूम है ।”

“तो ?”

“ऐसे ही किसी और को भी मालूम हो सकती है ।”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“जमना पर कई घाट हैं ।” - फिर बोला - “तेरे को मालूम है मुलाकात के मैसेज में किस घाट का जिक्र था ?”

“नहीं ।”

“तो देवीलाल को कैसे मालूम होगा !”

“वो केयरटेकर के लैवल का आदमी था, वो और केयरटेकर दोनों तोशनीवाल का स्टाफ है, देवीलाल का अक्सर फार्महाउस पर जाना होता था इसलिये उसका केयरटेकर से वाकिफ होना लाजमी है ।क्या पता उस वाकफियत की वजह से ही देवीलाल को घाट की खबर हो ।”

“वो काफी लेकर आ रहा है, मैं पूछता हूं साले से ।”

“कोई फायदा नहीं होगा । वो कुछ कुबूल नहीं करेगा ।”
 
“बाप का राज है ! जानता नहीं पूछने वाला कौन है !”

“मेरी राय में उसकी निगरानी कराने से बेहतर नतीजा निकल सकता है ।”

“तेरी राय में !”

“यूं उसके कहीं खिसक न जाने की भी गारंटी रहेगी ।”

तभी काफी की ट्रे के साथ देवीलाल करीब पहुंचा । उसने हमें काफी सर्व कर दी तो यादव ने उसे डिसमिस कर दिया । मैंने सिग्रेट को तिलांजलि दी और काफी की तरफ तवज्जो दी ।

“अब क्या कहते हो ?” - फिर मैं बोला ।

“भई, थ्योरी है” - यादव बोला - “बेदम थ्योरी है । मैं राजी नहीं इससे । मेरा दांव अभी भी विष्णु कसाना पर ही है जो कि फरार हो गया, मतवाल चंद के थाने की लापरवाही से खिसकने में कामयाब हो गया । उसने थाने से फार्महाउस लौटना था जो कि वो न लौटा । थाने और फार्महाउस के बीच उसके साथ देवीलाल ने कोई करतब कर दिया, ये हज्म होने लायक बात नहीं ।”

“तो तुम्हारी चायस का कैंडिडेट केयरटेकर ?”

“हां । लेकिन तुम्हारी इस बात से मुझे इत्तफाक है कि केस में किसी दूसरे जने की भी हाजिरी है ।”

“लेकिन वो दूसरा जना देवीलाल तुम्हें कुबूल नहीं ?”

“भई, मेरी निगाह में आल्टरनेट कैण्डीडेट है न !”

“कौन ?”'

“वो छोकरा । शिशिर तोशनीवाल ।”

“क्या बात करते हो !”

“कद काठ के मामले में वो भी कद में हेठों की क्लब का ही मैम्बर है । जमा, अभी तुमने खुद बोला कि, थियेट्रिकल मेकअप का उसे भी तजुर्बा है अपने बाप के सहायक के तौर पर वो भी जेएनयू के ड्रामा ग्रुप का रैगुलर विजिटर है ।”

“वो गंजा नहीं है ।”

“विग इंडस्ट्री की तरक्की कमाल की है । गंजा विग कोई दुर्लभ आइटम नहीं ।”

“आंखों का रंग जुदा है । केयरटेकर की आंखें काली हैं, लड़के की भूरी हैं ।”

“कांटैक्ट लैंस हर रंग के मिलते हैं ।”

“यादव साहब, जिस रोल में तुम बेटे को फिट कर रहे हो, उसमें तो फिर बाप भी फिट है ! वो तो गंजा भी रेडीमेड है, उसे तो विग की भी जरूरत नहीं । उसकी तो आंखें भी काली हैं । और जेएनयू के ड्रामा ग्रुप का सरपरस्त तो वो है ही - बेटे और सर्वेंट से पहले है ।”

“तौबा ! ये साला हर कोई एक ही सांचे में ढला क्यों है ?”

“क्यों है ?”

“पर डिप्टी नहीं है ।”

“डिप्टी ।”

“इमरान डिप्टी ! वो भी कहीं न कहीं फिट जान पड़ता है । सुलतान बार में केयरटेकर का मैसेज उसके लिये था ।”

“इमरान डिप्टी लम्बा है, गोरा है ।”

“जब मेकअप से बड़े से बड़ा कमाल हो सकता है तो शक्ल की रंगत भी जैसी मर्जी तब्दील की जा सकती है । लम्बा वो कोई ढ़ेर ज्यादा नहीं है । फ्लैट हील पहने, जिस्म ढ़ीला छोड़ दे, कंधे झुका ले तो कद के हेठों की क्लब का ही मेम्बर लगने लगेगा ।”

“क्या कहने !”

“वो कहीं न कहीं फिट जान पड़ता है बराबर । सुलतान बार में केयरटेकर का मैसेज उसके लिये था । लिहाजा वो केयरटेकर से बाखूबी वाकिफ था । सिद्धार्थ एन्क्लेव में कैसे साले ने चुटकियों में तिजोरी खोल ली थी !”

“पहले से खुली थी ।”

“बकवास न कर ।”

“सच में...”

“क्या सच में ! किसलिये बुलाया था उसे वहां ? तिजोरी खोलने के लिये न !”

मैं खामोश रहा ।

“अब जवाब तो दे ! हां न कुछ तो बोल !”

“हां ।”

“मैंने मान ली तेरी बात कि तिजोरी पहले से खुली थी । न खुली होती तो वो क्या करता ! वही करता न जिसके लिये कि वो वहां बुलाया गया था ? जिसका कि वो एक्सपर्ट था ?”

“हां ।”

“तो तिजोरी पहले से खुली होने से उसकी औकात बदल गयी !”

“औकात तो उसकी बदली ही हुई है । अब वो वो नहीं है जो पहले था ।”

“वन्स ए थीफ, आलवेज ए थीफ । वन्स ए सेफ क्रैकर, आलवेज ए सेफ क्रैकर ।”

मैं काफी चुसकने लगा ।

“साला यहां भी था । और क्या औकात बना के यहां था ! सारे मेहमान फीके लग रहे थे उसके सामने । जी में आया था तभी गुद्दी नाप दूं । बड़ी मुश्किल से सब्र किया । कैसे घुस आया ?”

“तुम उसके खिलाफ हो इसलिये घुस आया कह रहे हो । क्या पता तोशनीवाल का वाकिफ ही और मातमपुर्सी के लिये आया हो !”

“मैं नहीं मानता । साला कोई आकिफ-वाकिफ नहीं था, गेट क्रैशर था । बिनबुलाया मेहमान था ।”

“तोशनीवाल से पूछ के देखो !”

“मैं जरूर पूछूंगा । साला कत्ल की हवा लगते ही खिसक गया । मेहमान था तो क्यों खिसक गया ? मातमपुर्सी के लिये आया था तो डबल मातमपुर्सी का मौका आने पर फूट क्यों लिया ?”

“तुम ठीक कह रहे हो ।”

“ठीक ही कह रहा हूं । तुम्हारे आने के बाद मेरी तवज्जो उसकी तरफ से हट गयी थी लेकिन अब मुझे अच्छी तरह से याद पड़ता है कि मकतूला की चीख गूंजने पर भी - उससे पहले भी वो यहां नहीं था । तुम बोलो । था वो तब यहां ?”

“दिखाई तो नहीं दिया था ! लेकिन इसका मतलब क्या हुआ ? कत्ल उसने किया ? नीचे से चुपचाप खिसक कर, कमंद डाल कर यहां ऊपर वो चढ़ा ?”

“किया या नहीं किया लेकिन एक सम्भावना है ये भी बराबर । और इतने विकट मल्टीमर्डर केस में हर सम्भावना पर विचार करना पड़ता है, भले ही वो कितनी ही दूर की कौड़ी जान पड़े ।”

“ठीक ।”

“इसकी एक और भी स्पैशलिटी है जिससे सिर्फ मैं वाकिफ हूं ।”

“क्या ?”

“जब वो बतौर सेफ क्रैकर रॉबरी केस में गिरफ्तार हुआ था तो मैं उसका अरैस्टिंग आफिसर था । उन दिनों इसका पसंदीदा हथियार नाइयों वाला उस्तरा होता था जो कि हजामत बनाने के काम आता है और जो ऐसी सफाई से गला काट सकता है कि फौरन तो शिकार को पता भी न चले कि उसका गला कट गया था । वैसा उस्तरा पास रखने पर कोई पाबंदी भी नहीं क्योंकि वो हथियार नहीं कहलाता, क्योंकि वैसे उस्तरे से बाज लोग बाग अपनी शेव खुद भी बनाते हैं । अब डियर पार्क वाले मर्डर को याद करो ।”

मैं एकाएक उठ खड़ा हुआ ।

“मैं चलता हूं ।” - फिर मग एक ओर रखता बोला ।

“क्यों ! क्या हुआ ?”

“जो याद करने को कह रहे हो, वो मेरा दिल हिला रहा है ।”

यादव हंसा ।

“गुड नाइट ।”

“कहां गुड है नाइट ! लेकिन ठीक है, तुम कहते हो तो ।”

********************************
 
मैं जैसे मुर्दों से शर्त लगा के सोया ।

सुबह साढ़े दस बजे भी मुझे टेलीफोन की निरंतर बजती घंटी ने जगाया । मैंने मोबाइल पर निगाह डाली तो उस पर चार मिस्ड काल - एकइंस्पेक्टर यादव की और तीन रजनी की - और एक मेल की इंटीमेशन दर्ज पायी ।

मैंने लैंड लाइन का रिसीवर उठा कर कान से लगाया ।

“गुड मार्निंग ।” - रजनी की आवाज आयी ।

“गुड मार्निंग ।” - मैं बोला ।

“जाग जाइये ।”

“अरे, जाग गया हूं तो जवाब दे रहा हूं न !”

“बहन जी को भी जगा दीजिये ।”

“बहन जी ! कौन सी बहन जी ?”

“जो आपके पहलू में है । जिसकी वजह से दोपहर सिर पर है, तब भी सो रहे हैं ।”

“पागल हुई है ! कोई मेरे पहलू में होता तो सो रहा होता ! पलक न झपकी होती ।”

वो हंसी ।

“अब बोल कैसे फोन किया ?”

“आपके फेवरेट इंस्पेक्टर साहब आपको पूछ रहे थे ।”

“यादव ?”

“वही । कह रहे थे मोबाइल पर रिस्पांस नहीं है, लैंडलाइन भी बस बजती ही रही ।'

“पूछने की कोई वजह बताई ?”

“नहीं । आपको काल बैक को बोला है ।”

“ठीक है । करता हूं ।”

“आपकी चरणरज से आपका आफिस आज कृतार्थ होगा ?”

“संस्कृत क्यों बोल रही है ? क्या कहना चाहती है ?”

“आफिस आयेंगे ?”

“पता नहीं । पहले यादव की सुन लूं फिर बोलूंगा ।”

“बहन जी की भी सुननी होगी !”

“दिमाग न चाट सबेरे सबेरे ।”

वो फिर हंसी ।

“बंद करता हूं ।”

मैंने यादव को उसके मोबाइल पर काल लगायी ।

तत्काल उत्तर मिला ।

“कहां था ?” - वो भुनभुनाता सा बोला ।

“घर पर ही था ।”

“तो काल क्यों न ली ?”

“मरा पड़ा था ।”

“क्या बकता है ?”

“कैसे याद किया ?”

“शर्मा, ये पहला मौका है जबकि डोर और पतंग जैसा साथ बना हुआ है तेरा मेरा । मेरे पल्ले पड़ी हर वारदात में तेरी हाजिरी है इसलिये सोचा कि नई वारदात की भी तुझे खबर होनी चाहिये ।”

“वारदात ?”

“हां ।”

“नई ?”

“हां ।”

“फिर ?”

“हां ।”

“अब क्या हुआ ?”

“तोशनीवाल जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है ।”

“हे भगवान ! अव उसे क्या हुआ ?”

“जहर हुआ । किसी ने जहर दे कर उसे मार डालने कीं कोशिश की ।”

“किसी ने क्या मतलब ? जिसने कल आखिरी धमकी जारी की, उसी ने तो अपनी धमकी पर खरा उतर कर दिखाया !”

“किसी ने’ में वो भी शामिल है ।”

“जहर कहीं स्ट्रीकनिन ही तो नहीं ?”

“वही ।”

“बहुत जल्दी एक्ट किया ! कैसे कर पाया ?”

“क्या पता तोशनीवाल का बयान होगा तो कुछ पता चलेगा ।”

“है कहां ?”

“वसंतलोक । होली एंजेल्स में ।”

“बच तो जायेगा ?”

“पता नहीं । डाक्टर लोग अभी बोले नहीं कुछ ।”

“ओह ! कोई और बात ?”

“है तो सही !”

“केस से ही ताल्कुक रखती ?”

“हां ।”

“तो बताओ न, यार !”

“यार !”

“प्लीज ।”

“केयरटेकर के सुलतान बार में छोड़े मैसेज की रू में हमने जमना के घाटों पर पूछताछ कराई थी तो ओखला बैराज का भीकू नाम का एक नाववाला काबू में आया था जिसने कि तीन चार दिन पहले रात को केयरटेकर को वहां घाट पर देखा था ।”

“पहचाना था उसे ?”

“नहीं । लेकिन जो हुलिया - खास, डिस्टिंक्ट हुलिया - उसने बयान किया, खास तौर से टेढ़ी बांह और लंगड़ी चाल वाला हैण्डीकैप बयान किया, वो साफ साफ केयरटेकर का था ।”

“आई सी ।”

“नाव वाला कहता है वहां केयरटेकर एक दूसरे शख्स के साथ था ।”

“वो तो होगा ही । मैंने बताया तो था कि सुलतान बार पर विष्णु कसाना के साथ कोई और शख्स था जिसका वहां दिल नहीं लगा था जिसने घाट पर तफरीह का प्रोग्राम बनाया था । केयरटेकर की किसी दूसरे शख्स से सुलतान बार पर मुलाकात का जो किस्सा मैंने डिप्टी से सुना था, वो मैं तुम्हें सुना तो चुका हूं ।”

“हां । लेकिन डिप्टी ने तुमसे और तुमने मेरे से दूसरे शख्स का हुलिया बहुत मौटे तौर पर भी बयान नहीं किया था, कहा था हुलिये के बारे में जितने मुंह उतनी बातें थीं । नहीं ?”

“हां ।”

“नाव वाले ने वही हुलिया काफी बारीकी से बयान किया था ।”

“गुड ! उससे कोई शख्स पहचान में आया ?”

“आया तो सही ।”

“कौन ? देवीलाल ?”

“देवीलाल क्यों ?”

“ऐसे ही पूछा । उससे ताल्लुक रखती काफी बातें शक के दायरे में आती हैं, समझो, उनकी वजह से उसका नाम जेहन में कौंधा ।”

“नहीं, देवीलाल नहीं ।”

“तो कौन ?”

“इमरान डिप्टी ।”

“ओह, नो !”

“खामखाह ओह नो ! जुड़ा तो हुआ है उसका नाम केयरटेकर के साथ पान में लौंग की तरह ! कल भी तो केयरटेकर का उसी के लिए मैसज था घाट पर मिलने की बाबत ।”

“यादव साहब, अगर केयरटेकर का चार दिन पहले का जोड़ीदार इमरान डिप्टी होता तो सुलतान बार पर - जहां वो नोन फिगर है - हर किसी ने ऐसा बोला होता ! औना-पौना, सही-गलत हुलिया किसी ने बयान किया ही न होता, साफ बोला होता कि केयरटेकर का उस रात का जोड़ीदार इमरान डिप्टी था ।”

लाइन पर खामोशी छा गयी ।

“हल्लो !” - मैं व्यग्र भाव से बोला - “लाइन पर हो ?”

“हां ।”

“तो बोलते क्यों नहीं हो ?”

“बोल रहा हूं ।”

“डिप्टी सजायाफ्ता मुजरिम है, नाववाले को रिकार्ड में मौजूद उसकी तसवीर दिखाई होती !”

“बच्चे न पढ़ा, शर्मा ।”

“यानी दिखाई थी ?”

“हां ।”

“क्या नतीजा निकला ?”

“नाववाला निर्विवाद रूप से, गारंटी से, दो टूक नहीं कह सकता था कि तसवीर उसी शख्स की थी जिसका उसने हुलिया बयान किया था ।”

“सो देयर ।”

“शर्मा, रिकार्ड में क्लोजअप्स होते हैं - जैसे फेस का फ्रंट पोज, राइट प्रोफाइल, लैफ्ट प्रोफाइल । घाट पर नाववाले को वो शख्स रूबरू दिखाई दिया, रात के नीमअंधेरे में दिखाई दिया, तो हुलिया बयान करते वक्त उसका जोर शक्ल सूरत पर कम और कद काठ, पोशाक वगैरह पर ज्यादा था । इसीलिये डिप्टी की तसवीर देख कर वो गारंटी से न कह सका कि घाट पर उस रात केयरटेकर का जोड़ीदार शख्स डिप्टी था । वैसे...”

“वैसे क्या ?”

“जो हुलिया नाववाले ने बयान किया था, वो एक दूसरे शख्स से भी मिलता है ।”

“किससे ?”

“तोशनीवाल से ।”

“नानसेंस ! वो केयरटेकर से - अपने मुलाजिम से - बेवड़े के अड्डे पर मुलाकात करेगा ! घाट पर तफरीह के लिये पहुंचेगा ।”

“नाममुकिन !”

“मुझे तेरी बात से इत्तफाक है लेकिन जो मुझे लगा, मैंने बोल दिया ।”

“गलत लगा ! जो लगा उसकी कोई बुनियाद नहीं दिखाई देती । इट डज नाट स्टैण्ड टु रीजन ।”

“मुझे तेरी बात से इत्तफाक है ।”

“नाववाला और क्या बोला ?”

“बोला तो सही और भी कुछ !”

“यार, किस्तों में न बताओ । पहेलियां न बुझाओ । सस्पेंस न फैलाओ ।”

“वो कहता है शाम ढले घाट पर घूंट के ऐसे रसिया भी अक्सर आते हैं जो नदी में नौकाविहार का आनंद लेते हुए घूंट का आनंद लेना चाहते हैं । नाववाला कहता है कि उसने केयरटेकर को और उसके जोड़ीदार को - जो कोई भी वो था - ऐसी ही शौकीन जोड़ी समझा था और अपनी नाव आफर की थी लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया था और घाट पर उससे दूर कहीं अंधेरे में चले गये थे । वो कहता है कि बीस मिनट बाद एक दूसरा नाववाला ये शिकायत करता उसके पास आया था कि किनारे पर से उसकी नाव गायब थी ।”

“गायब थी !”

“हां । पहला नाववाला उसके साथ गया था तो नावों की सैटिंग में वो जगह खाली थी जहां कि दूसरे नाववाले ने अपनी नाव बांधी थी । उन्होंने तब नाव की इधर उधर तलाश की कोशिश की थी तो वो थोड़ी दूर लावारिस सी पानी में डोलती पायी गयी थी ।”
 
“ठीक से बांधी नहीं होगी !”

“बहुत मुमकिन है ।”

“नाव कौन चुराता ? क्यों चुराता ?”

“वही तो !”

“नौका विहार के पैसे बचाने के लिये कोई नाव चुराता तो कितने पैसे बचाता !”

“सौ रुपये । नाववाला कहता था कि उधर सभी नाव वाले दरिया में तफरीह के तमन्नाई मनचलों से एक घंटे का सौ रुपया चार्ज करते थे ।”

“कोई सौ रुपये बचाने के लिये नाव घुसता तो उसे उसकी खेना भी तो खुद पड़ता ! ये तफरीह हुई या मजदूरी हुई !”

“तू ठीक कह रहा है । अभी एक बात और सुन ।”

“अभी और भी ?”

“हां ।”

“क्या ?”

“नाववाला कहता है कि उसने उन दो जनों को - पहले वाले दो जनों को - वहां से जाते फिर देखा था लेकिन तब उसे एक जना मोटा लगा था जब कि न केयरटेकर मोटा था और न उसका जोड़ीदार जिसका कि उसने हुलिया बयान किया था ।”

“क्या मतलब हुआ इसका ?”

“सिवाय इसके क्या हो सकता है कि उसे मुगालता लगा, अंधेरे में वहम हुआ, एक पतला मोटा लगने लगा ।”

“ठीक ! बहरहाल वो दो जने तफरीह के लिये आये और तफरीह करके लौट गये ?”

“जाहिर है ।”

“बीस मिनट की तफरीह ! बस इतने के लिए वो महरौली से वहां पहुंचे ?

“मूड की बात है । मिजाज की बात है ।”

“अब क्या होगा ?”

“भई, होली एंजेल्स के डॉक्टर ही बताएंगे ।”

“अरे तोशनीवाल का नहीं, डिप्टी का !”

“जवाबतलबी तो होगी बराबर उससे ! काबू में करेंगे, देखेंगे क्या कहता है उस रात घाट की हाजिरी की बाबत ! फिर कोई फैसला करेंगे ।”

“ठीक ।”

“अब तेरा क्या इरादा है ?”

“इजाजत दो तो आता हूं....”

“आ ।”

“मिलता हूं ।”

सम्बंधविछेद हो गया ।

फिर मैंने मेल की तरफ तवज्जो दी ।

विशु जी, दानी ! मेरा नेपाल में बसा दोस्त !

मैं लैपटॉप के हवाले हुआ ।

विशु ने सुजित त्रेहन की बाबत मेरी इंक्वायरी का जवाब भेजा था ।

जवाब मेरी आशा के अनुरूप था ।

मैंने लैपटॉप को प्रिंटर से जोड़ा और मेल की, उसके साथ के अटैचमेंट की, कापियां निकाली ।

********************************

मैं वसंत लोक और आगे होली एंजेल्स हस्पताल पहुंचा ।

यादव मुझे लॉबी में ही दिखाई दे गया । उस घड़ी उसके साथ उसका सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर भी था ।

“क्या पोजीशन है ?” - अभिवादन के बाद मैंने यादव से पूछा ।

“पोजीशन अभी पूरी तरह से क्लियर नहीं है ।” - यादव गम्भीरता से बोला - “अभी उसको अटेंड करता बड़ा डॉक्टर - शुक्ला नाम है - मिला था, बोलता था थोड़ी देर में कोई छोटा मोटा बयान देने के काबिल हो जायेगा । अब उसी घड़ी के इंतजार में हूं ।”

“आई सी ।”

दस मिनट खामोशी से गुजरे ।

उस वक्त सिग्रेट मुझे बहुत याद आया क्योंकि वो हस्पताल था, वहां धूम्रपान की पाबन्दी थी, ऐसा ना होता तो शायद मेरी उसकी तरफ तवज्जो न गयी होती ।

एक नर्स यादव के पास पहुंची ।

“डाक्टर शुक्ला ने बोला है” - वो यादव से सम्बोधित हुई - “आप पेशेंट से मिल सकते हैं ।”

यादव ने राहत की सांस लेते सहमति में सिर हिलाया ।

नर्स ने हमें उसी फ्लोर पर आपरेशन थियेटर के बाजू में स्थित रिकवरी रूम में पहुंचाया जहां कि कई तरह की नलकियों ट्यूबों के बीच शिव मंगल तोशनीवाल पीठ के बल बैड पर पड़ा था । डाक्टर शुक्ला भी उस घड़ी वहां मौजूद था ।

आहट पा कर तोशनीवाल ने आखें खोली, फिर पुतलियां व्याकुल भाव से कटोरियों में फिरीं ।

“दो मिनट ।”- डाक्टर चेतावनी भरे स्वर में बोला ।

सहमति में सिर हिलाता यादव बैड के सिरहाने पहुंचा ।

“क्या हुआ था ?” - वो सहानुभूतिपूर्ण स्वर में तोशनीवाल से सम्बोधित था ।

“प - पता नहीं ।” - तोशनीवाल क्षीण स्वर में बोला - “मैं और शिशिर सुबह ब्रेकफास्ट टेबल पर थे । चाय का घूंट भरा तो....तो ...ब्लैक आउट । बस इतना ही याद है। अभी होश आया तो यहां...यहां था ।”

“शिशिर ? आपका बेटा जो आपके साथ ब्रेकफास्ट में शामिल था, वो...वो...”

“मा... मालूम नहीं । मुझे कुछ मालूम नहीं । गॉड ! गॉड ! कोई पता करके दो ।”

“पेशेंट इज गैटिंग एक्साइटेड ।” - डाक्टर जल्दी से बोला - “खत्म कीजिये ।”

मैंने देखा तोशनीवाल ने आंखें बंद कर ली थीं - जैसे यूं जाहिर कर रहा हो कि वो ही वार्तालाप जारी नहीं रखना चाहता था ।

“फिर कब बात कर सकते हैं ?” - यादव डाक्टर से पूछ रहा था ।

“शाम को पता करना ।” - डाक्टर बोला ।

“कितने बजे ?”

“चार बजे ।”

“ओके । थैंक्यू ।”

हम बाहर निकले और वापिस लॉबी में पहुंचे ।

वहां शिशिर और देवीलाल मौजूद थे ।

यानी लड़का सही सलामत था, बाप की तरह जहर का शिकार नहीं हुआ था ।

यानी सुजित त्रेहन को मकतूला श्यामली का दावा कुबूल हुआ था कि शिशिर उसका बेटा था और इसी वजह से आखिरी धमकी सिर्फ तोशनीवाल के लिये थी ।

“तुम्हारी चाय में जहर नहीं था ?” - फिर भी मैंने पूछा ।

“तब कुछ नहीं मालूम था मेरे को ।” - शिशिर परेशानहाल लहजे से बोला - “चाय मैंने पी ही नहीं थी ।”

“वजह ?”

“नौबत ही नहीं आयी थी । मैंने कप उठाया ही था, होंठों की तरफ बढ़ाया ही था कि डैड का एक घूंट चाय पीते ही फौरन बुरा हाल होता देखा था । चाय छोड़ कर मैं उन्हें सम्भालने में लग गया था ।”

“ओह ।”

“वैसे बाद में पुलिस के बताये मुझे मालूम हुआ था कि मेरी चाय में जहर नहीं था ।”

“आई सी ।”

“इन लोगों ने एम्बुलेंस बहुत जल्दी भेजी” - देवीलाल बोला - “वर्ना...” - गमगीन भाव से सिर हिलाता वो खामोश हो गया ।

“कितनी जल्दी ?” - मैंने पूछा ।

“बहुत ही जल्दी । साहब ने होश खोया नहीं कि एम्बुलेंस पहुंच गयी ।”

“हूं ।”

मैं रिसैप्शन पर पहुंचा ।
 
“एम्बुलेंस के लिये काल कहां रिसीव की जाती है ?” - काउंटर के पीछे मौजूद युवती से मैंने सवाल किया ।

उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“क्यों पूछ रहे हैं ?” - फिर बोली ।

“जवाब दो, भई !”

“क्यों पूछ रहे हैं ?”

मैंने आवाज देकर यादव को करीब बुलाया ।

“ये पुलिस इंस्पेक्टर हैं ।” - मैं सख्ती से बोला - “ये पूछ रहे हैं ।”

“क्या बात है ?” - यादव बोला ।

“मैं पूछ रहा हूं एम्बुलेंस के लिये काल कहां रिसीव की जाती है, जवाब नहीं देती ।”

“स्विच बोर्ड पर ।” - युवती जल्दी से बोली - “आपरेटर रिसीव करती है ।”

“स्विच बोर्ड कहां है ?”

उसने रिसैप्शन के पिछवाड़े में ही एक बंद दरवाजे की तरफ इशारा किया ।

मैं उस दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

यादव तनिक हिचकिचाता मेरे पीछे हो लिया । स्विच बोर्ड के पीछे मौजूद युवती वर्दी देख कर सकपकाई ।

“नाम बोलो ?” - मैं बोला ।

“शांता ।” - उसने बिना हुज्जत जवाब दिया ।

“कब से ड्यूटी पर हो ?”

“सुबह सात बजे से ।”

“वसंत कुंज से, शिव मंगल तोशनीवाल के रैजीडेंस से, एम्बुलेंस के लिये काल तुमने रिसीव की थी ?”

“हां ।”

“कितने बजे !”

“आठ बज कर नौ मिनट पर ।”

“ठीक से याद है ?”

“एम्बुलेंस काल का रिकार्ड रखना पड़ता है ।”

“गुड । ये भी मालूम है एम्बुलेंस कब रवाना हुई ?”

“हां । काल आते ही रवाना हो गयी थी । काल के बड़ी हद दो मिनट बाद ।”

“काल करने वाला कौन था ?”

“नाम नहीं मालूम । उसने बताया नहीं । लेकिन कोई औरत थी जो बहुत घबराई बौखलाई बोल रही थी ।”

“ओके । थैंक यू ।”

हम वहां से बाहर निकले ।

“किस फिराक में है ?” - यादव बोला ।

“किसी तरह केस हल हो, बस इसी फिराक में हूं । ये तुम्हारे भी फायदे की बात होगी...”

“अरे, इस घड़ी किस फिराक में है ?”

“साथ चलो, मालूम पड़ जायेगा ।”

“मैं यहां से नहीं जा सकता । डाक्टर शुक्ला ने चार बजे के लिये बोला लेकिन तोशनीवाल उससे पहले, कहीं पहले, फिर बातचीत के काबिल हो सकता है । मुझे रुकना पड़ेगा ।”

“ठीक है फिर । बाई दि वे, डिप्टी के बारे में फोन पर जो बोला था, उसकी बाबत मीडिया को कोई बयान दिया ?”

“अभी नहीं । क्यों ?”

“होल्ड करके रखना । ज्यादा देर नहीं तो शाम तक होल्ड करके रखना ।”

“क्यों ?”

“नाववाले के बयान में झोल निकल सकता है ।”

“कैसा झोल ?”

“देखना । शाम तक की तो बात है !”

“तू तो ऐसे कह रहा है जैसे शाम तक केस हल करके दिखा देगा ! सब कुछ वाइंड अप करके दिखा देगा !”

“देखना ।”

“क्या देखना देखना भजता है ! तेरे खयाल से डिप्टी का कहीं कोई दखल नहीं ?”

“हो सकता है । कोई दखल बराबर हो सकता है । लेकिन उस दखल की बाबत पहले डिप्टी का वर्शन सुन लेने में क्या हर्ज है ?”

“तू उसकी हिमायत कर रहा ।”

“खामखाह ! मामा लगता है वो मेरा ?”

“तेरे किसी अहसान के तले दबा जान पड़ता है । तभी तो तेरी एक टेलीफोन काल पर सिद्धार्थ एन्क्लेव दौड़ा चला आया ।”

“मुलाहजे में । जो दोतरफा काम करता है, कभी उसकी एक टेलीफोन काल पर मुझे भी कहीं दौड़ा चला जाना पड़ सकता है ।”

“उसका वर्शन मुझे हफ्ता सुनने को न मिला तो...”

“अरे, मेरे बाप, मैं शाम तक बोला कि नहीं बोला ?”

“बोला । ठीक है । शाम तक ।”

“थैंक यू ।”

मैं वहां से रुखसत हुआ और सीधा भगवानदास रोड अपने फ्लैट पर पहुंचा । क्योंकि अब मुझे लग रहा था कि आइंदा मुझे हथियारबंद होना चाहिये था । दरवाजा खोल कर फ्लैट में कदम रखते ही जैसे भूचाल आ गया और फ्लोर से ऊपर की सारी मंजिलें मेरे ऊपर आ कर गिरीं ।

********************************
 
मुझे होश आया तो मैंने खुद को हवाओं के हिंडोले में झूलता पाया । मैं फर्श पर ढ़ेर था लेकिन मेरा सिर यूं घूम रहा था कि मुझे लगता था कि मैं हवा में उड़ रहा था । बड़ी शिद्दत से मैं खुद पर काबू पाने की कोशिश करने लगा ।

इतना अब मेरी समझ में आ रहा था कि कोई मेरे फ्लैट में पहले से मौजूद था, मेरे एकाएक वहां पहुंच जाने पर जिसने खुलते दरवाजे की ओट से मेरे पर हमला कर दिया था ।

मैंने जबरन आंखें खोलीं और व्याकुल भाव से चारों तरफ निगाह दौड़ाई ।

“होश में आ रिया है, जंटलमैन ।” - कोई मेरे सिर के करीब से बोला ।

दूसरे पहलू से कोई हंसा, फिर बोला - “तगड़ा हो जा ।”

बड़ी मेहनत से मैं उठ कर बैठ पाया तो मुझे अपनी तरफ तनी गन की नाल दिखाई दी ।

गन !

मैंने आंखें मिचमिचा कर फिर देखा ।

बत्तीस कैलीबर की रिवाल्वर ।

गनवाला टिपकिल ओल्ड दिल्ली फेस - ठिगना, मोटा, काईयां, खतरनाक ।

“कौन हो, भई ?” - मैं बोला - “क्या चाहते हो ?”

गन वाला हंसा, उसने नाल से मेरी कनपटी को टहोका ।

“खुद चाहते हो या किसी और के जमूरे हो ?”

“अबे, बिरजे !” - बायें पहलू वाला बोला - “जमूरा बोल रिया है ये तेरे को ।”

“साला, ढ़क्कन !” - गन वाला गुस्से से बोला - “नाम क्यों लेता है !”

“वो तो चलो गलती हुई मेरे से लेकिन आगे किसी को नाम बोलने के वास्ते ये बचेगा तो तब न !”

“बस कर । काबू रख जुबान पर । मेरे को बात करने दे इससे । हां, भई, पहलवान” - उसने गन से फिर मेरी कनपटी ठकठकाई - “टांग बहुत लम्बी है न तेरी ! कहीं भी जा फंसती है ! छोटी करनी पड़ेगी । काट के गेरनी पड़ेगी । नहीं ?”

मैं खामोश रहा ।

“अभी क्या नाम सुना ?”

मैंने फिर जवाब न दिया तो उसने नाल से मेरी कनपटी सेंकी ।

मैं पीड़ा से बिलबिलाया ।

बड़ी मुश्किल से टिकी मेरी खोपड़ी फिर घूमने लग गयी ।

“अबे, जवाब दे रिया है कि नहीं दे रिया ?”

“नहीं सुना ।” - मैं बड़ी मुश्किल से बोल पाया ।

“सुना नहीं या भूल गया ?”

“भूल गया । याददाश्त बचपन से खराब है मेरी ।”

“आज ठीक हो जायेगी हमेशा के लिये तेरे बचपन की अलामत । अभी बस निपट लें तेरे से ।”

“अरे, ये तो बोलो कौन हो ? किसके आदमी हो ? क्यों मेरे पीछे पड़े हो ?”

“अबे, बिरजे.. .सारी, उस्ताद.. .ये तो सवाल पर सवाल कर रिया है । तू इसको जवाब देने को बोला, ये सवाल कर रिया है । कहे तो जुबान लम्बी कर दूं खींच के इसकी !”

“शागिर्द ठीक कह रिया है ।” - गनवाला बोला - “सवाल न कर,पहलवान, जवाब दे । वो आइटम कहां हैं जो तूने सेफ से निकाली ?”

“कौन सी आइटम ? कौन सी सेफ ?”

“सब मालूम तेरे को । कल सिद्धार्थ एन्क्लेव में क्या कर रिया था ? सेफ खुलवा रिया था । सेफ खुलवा ली थी । फिर आइटम की खबर क्यों नहीं तेरे को ? जो सेफ में थी पर गायब हो गयी ! तेरे सिवाय खुली सेफ के करीब कोई नहीं था । अभी बोल रिया है कि नहीं बोल रिया कि आइटम कहां है ?”

“तुम्हें कोई गलतफहमी हो रही है...”

“उस्ताद, पुड़िया दे रिया है ।” - शागिर्द बोला ।

“चुप रह जरा ।” - उस्ताद - बिरजे - बोला - “हां तो पहलवान, क्या जवाब है तेरा ?”

मेरे पास कोई जवाब होता तो मैं देता न !

“मैं तीन तक गिनूंगा । तब भी आइटम की बाबत मुंह न खोला तो नाल मुंह में घुसेड़ के गन खाली कर दूंगा । एक !”

उसकी उंगली ट्रीगर पर कसी ।

“दो !”

अंगूठे से उसने गन का कुत्ता खींच। ।

“ती...”

आगे ‘न’ उसके मुंह से न निकल पाया ।

एक खुला उस्तरा हवा में सनसनाता हुआ आया और उसके गन वाले हाथ से टकराया । गन उसके हाथ से निकल गयी और वो दूसरे हाथ से अपनी घायल, खून का फव्वारा बनी, कलाई को थाम कर चीखता चिल्लाता यूं नाचने फुदकने लगा जैसे दहकते कोयलों पर पांव पड़ रहे हों । मैंने फर्श पर लुढकी पड़ी गन को नाल से थाम के उठाया और अपने काबू में किया ।

तब मैंने दरवाजे की तरफ देखा ।

वहां इमरान डिप्टी खड़ा था और उस घड़ी पांव की ठोकर से अपने पीछे दरवाजा बंद कर रहा था ।

“जनाब, करम हुआ काली कमली वाले का” - वो बोला - “जो मैं ऐन टाइम पर पहुंचा वर्ना इस नामाकूल ने तो आपका तिया पांच एक कर ही डाला था ।”

“कैसे पहुंच गये, इमरान भाई ?” - मैं मंत्रमुग्ध स्वर में बोला ।

“जनाब, बोला तो था विष्णु कसाना की बाबत बोलने आऊंगा ।”

“ओह !”

“सालों से कोताही हुई कि भीतर से लॉक न किया दरवाजा वर्ना मेरे को खबर ही न लगती भीतर क्या हो रहा था, मैं ये सोच के लौट गया होता कि आप घर पर नहीं थे ।”

“घर पर तो मैं सच में ही नहीं था । बस, थोड़ी देर पहले लौटा था और ये दोनों पहले ही भीतर घुसे बैठे थे ।”

“ओह ! अब इनका क्या करेंगे ?”

“सोचते हैं । अभी जरा निगाह रखना इन पर ।”

“निगाह ही निगाह है, जवाब ।” - डिप्टी लापरवाही से बोला - “ये कोई हरकत तो करे ! इस बार कलाई की जगह गला कटा होगा ।”

“बढिया !”

मैं भीतर बैडरूम में और आगे वार्डरोब पर पहुंचा ।

मेरी लाइसेंसशुदा स्मिथ एण्ड वैसन ब्रांड गन जहां होनी चाहिये थी, वहां मौजूद थी । लगता था उनकी तलाशी अभी भीतर बैडरूम तक नहीं पहुंची थी - पहले ही मेरी आमद की सूरत में विघ्न आ गया था - या उस पर उनकी निगाह नहीं पड़ी थी ।

मैंने उस्ताद की गन को एक शापिंग बैग के हवाले किया और अपनी गन हाथ में ले ली ।

मैं वापिस ड्राईंगरूम में लौटा ।

जहां शागिर्द दो रूमाल जोड़ कर उस्ताद की घायल कलाई पर पट्टी कसने की कोशिश कर रहा था ।

वहां मैंने पहला काम ये किया कि मोबाइल निकाल कर दोनों की क्लोजअप में तसवीरें खींच लीं ।

“ये क्या करते हो ?” - उस्ताद ने तत्काल विरोध किया ।

“ऐतराज है तेरे को ?” - मैं उसकी तरफ अपनी गन तानता हिंसक भाव से बोला ।

“ल - लेकिन...”

“कर एतराज ! फिर मैं तेरे को खींचता हूं । तेरे शागिर्द को भी । सालो, गन लेकर सेंधमारों की तरह घर में घुस आये, यहां मरे पड़े होगे तो कौन सवाल करेगा तुम्हारी बाबत मेरे से !”

दोनों के शरीर में स्पष्ट झुरझुरी दौड़ी ।
 
“अब इनका क्या करेंगे ?” - डिप्टी ने अपना सवाल दोहराया ।

“मुश्किल सवाल है ।” - मैं बोला - “पुलिस को बुलाया तो इसकी घायल कलाई की जवाबदारी करनी होगी ।”

“मेरा इशारा इसी बात की तरफ था ।”

“सोचते हैं कुछ । पहले अपना औजार काबू में करो ।”

डिप्टी ने आगे बढ़ कर फर्श पर गिरा पड़ा अपना उस्तरा उठाया और उसके फल को उस्ताद की जैकेट के कंधे से रगड़ कर अच्छी तरह से साफ किया । फिर उसने उसे दोहरा करके अपनी जेब के हवाले किया ।

मैं उन दोनों के सामने जा खड़ा हुआ ।

“बिरजे !” - मैं बोला - “खून करने को आमादा बिरजे ! अब तेरा क्या होगा रे, बिरजे !”

उसने अपने सूख आये होंठों पर जुबान फेरी ।

“पूरा नाम बोल । जोड़ीदार का भी ।”

वो परे देखने लगा ।

“कलाई कटी है । जल्दी कोई डाक्टरी इमदाद न हासिल हुई तो ब्लीडिंग से ही मर जायेगा ।”

वो भयभीत दिखाई देने लगा ।

“किसने भेजा ?”

उसने जवाब न दिया ।

“सवाल करते वक्त जिन तरीकों को तू मेरे पर आजमा रहा था, वो मेरे को भी आजमाने आते हैं । देख !”

मैंने गन की नाल से उसकी कनपटी ठकठकाई ।

पहले से ही पीड़ा से बिलबिलाते उस्ताद की आंखों से आंसू छलक आये ।

“जवाब दे ।”

उसने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।

“मैं सच में जान ले लूंगा, कमीनो । मौके की नजाकत समझो । दोनों को मार दूंगा तो भी मेरे पर कोई हर्फ नहीं आयेगा ।”

“मार दो ।” - वो दृढ़ता से बोला - “जान जाती है तो चली जाये, जुबान नहीं खुलवा पाओगे ।”

“क्या कहने ! मालिक के लिये ऐसी वफादारी ! अमूमन कुत्तों में पायी जाती है ।”

“जो मर्जी कहो, लेकिन ....”

उसने कस के जबड़े भींचे ।

“मैं कोशिश करूं, जनाब ?” - डिप्टी बोला ।

मेरी भवें उठीं ।

डिप्टी ने उस्तरा फिर जेब से निकाल कर हाथ में लिया और बड़े ड्रामाई अंदाज से उसे झटक कर खोला ।

“दूसरी कलाई भी काटता हूं ।” - फिरबोला - “धीरे धीरे । जैसे बकरा जिबह करते हैं । फिर एक कान, फिर दूसरा, फिर नाक ....”

एकाएक उस्ताद त्योराकर फर्श पर ढ़ेर हुआ ।

“बेहोश हो गया है ।” - शागिर्द दहशतनाक लहजे से बोला ।

“मकर मार रहा है ।” – डिप्टी बोला ।

“मेरे खयाल से नहीं ।” - मैं बोला ।

“तो होश में लायें इसे ?”

“मेरे खयाल से ये काम जोड़ीदार बेहतर कर लेगा ।”

“क्या फरमाया, जनाब ?”

“सम्भाल इसे ।” - मैं शागिर्द से बोला ।

“क .. क्या ?” – शागिर्द के मुंह से निकला ।

“और निकल ले ।”

“क्या !” - उसके चेहरे पर गहन अविश्वास के भाव आये ।

“पहली फुरसत में दोनों किसी पीर फकीर की मजार पर पेशानी रगड़ के आना कि मैंने तुम दोनों की जानबख्शी की । अब इससे पहले कि मेरा ख्याल बदल जाये, दफा हो जाओ दोनों यहां से ।”

उसने बेहोश उस्ताद को सहारा दे कर उठाया और उसको सम्भालता लड़खड़ाता बाहर को चल दिया ।

पीछे मैं और डिप्टी अकेले रह गये ।

“ये क्या किया जनाब !”– डिप्टी बोला ।

“तुम्हारी खातिर किया । पुलिस आती तो उस्तरे की जवाबदेही मुश्किल होती ।”

“लेकिन, जनाब, वो नामाकूल, नहंजार आपकी जान लेने पर आमादा था !”

“इमरान भाई, जिसको अल्लाह रक्खे, उसको कौन चक्खे !”

“वो तो बजा फरमाया आपने, जनाब, लेकिन आप कुछ उगलवा भी तो न पाये उनसे ! कुछ कुबुलवा भी तो न पाये !”

“वो फिजूल की कोशिश होती । मुझे दिख रहा था वो जुबान नहीं खोलने वाला था ।”

“दूसरा ?”

“शागिर्द था, उस्ताद से बाहर कैसे जा सकता था ?”

“हूं । लेकिन वो आइन्दा आप से बदला उतारने की कोशिश करेंगे ।”

“मुझे उम्मीद नहीं । वो किसी के पिट्ठू हैं, केस क्लोज हो जाने के बाद उनकी ऐसी कोई कोशिश बेमानी होगी । और जाती दुश्मनी वो ऐसे शख्स से क्यों दिखायेंगे जिसने उनकी जानबख्शी की !”

“बात तो आपकी ठीक है, जनाब !”

“उन्हें सिद्धार्थ एन्क्लेव वाली उस तिजोरी की खबर थी जो कि तुमने खोली थी । कैसे खबर थी ?”

“आप बताइये ।”

“फ्लैट में घुसे बिना, उसको खंगाले बिना तो नही हो सकती थी !”

“यानी मकतूला के फ्लैट की जो दुरगत मैंने देखी थी, उसके लिये ये दोनों जिम्मेदार थे ?”
 
“एक तो यकीनन । उस्ताद तो यकीनन जो कि तिजोरी के हवाले से मेरे से पूछ रहा था कि जो आइटम्स मैंने उसमें से निकाली थी, वो कहां थीं ! उसे ये भी मालूम था कि कल मैं सिद्धार्थ एन्क्लेव वाले फ्लैट में था और सेफ खुलवा रहा था । कम्बख्त ये भी बोला कि खुली सेफ के करीब मेरे सिवाय कोई नहीं था । कैसे मालूम था ?”

“कैसे मालूम था ?”

“अरे, भई, मेरी बात न दोहराओ, जवाब दो ।”

“मेरे को तो कोई जवाब नहीं सूझ रहा, जनाब ।”

“तुम्हीं ने तो कभी, कहीं मुंह न फाड़ा !”

“क्या ! लाहौल ! अरे, जनाब, ऐसी बेएतबारी....”

“इरादतन नहीं, गैरइरादतन । इत्तफाकन !”

“नहीं । बिल्कुल नहीं । जिसकी मर्जी कसम उठवा लीजिये ।”

“जरूरत नही । अब अपनी यहां आमद पर पहुंचो । क्या जाना केयरटेकर के बारे में ?”

“खास तो कुछ न जाना, जनाब । बस, उसी बात की तसदीक हुई जिसका इशारा मैं पहले कर चुका हूं; कुछ दिन पहले किसी दूसरे शख्स के साथ घाट पर देखा गया था । जमा, घाट की तसदीक हुई । ओखला बैराज वाले घाट पर जोड़ीदार के साथ, उस दूसरे शख्स के साथ देखा गया था ।”

“इमरान भाई, इस बात की अब पुलिस को भी खबर है । और आगे ये भी खबर है कि वो दूसरा शख्स कौन था !”

“अच्छा ! कौन था ?”

“तुम थे ।”

“क्या !”

“इमरान डिप्टी था ।”

“क्या बात करते हैं !”

“पुलिस को अपनी इस जानकारी पर पूरा ऐतबार है और अब बड़ी शिद्दत से उन्हें तुम्हारी तलाश है । अभी खामोश तलाश है जो कामयाब न हुई तो वारंट गिरफ्तारी जारी हो सकता है । आल पॉइंट बुलेटिन जारी हो सकता है । इमरान भाई, मौजूदा हालात ऐसे बन गए हैं की तुम्हारा हिरासत में लिया जाना ऐन वक्त की बात है ।”

“आप तो मुझे डरा रहे हैं !”

“अगर कोई गुनाह नहीं किया तो क्यों डरते हो ! बेगुनाह हो तो खुद ही पेश हो जाओ और अपनी बाबत पुलिस की गलतफहमी दूर करो । हो न बेगुनाह ?”

उसने मजबूती से सहमति में सिर हिलाया ।

“तो मैं इंस्पेक्टर यादव को फोन करता हूं और उसको बोलता हूं कि तुम यहां हो ।”

“अच्छा !”

“बल्कि तुम खुद फोन करो । अच्छा इम्प्रेशन बैठेगा ।”

“ठीक है । नम्बर बोलिये ।”

मैंने उसे इंस्पेक्टर यादव का मोबाइल नम्बर बताया ।

उसने मेरी लैंडलाइन से काल लगाई ।

“आदाब अर्ज करता हूं हुजूर ।” - काल लगी तो वो बोला - “आपका खादिम इमरान डिप्टी बोल रहा हूं । अभी मेरे को खबर लगी कि आपको मेरी तलाश है... अब, जनाब, कैसे भी लगी, लगी । खबर गलत है तो बोलिये, सही है तो बोलिये ।.. .सही है ? तो तलाश किस वास्ते ! खादिम हाजिर होता है न आपके हुजूर में ! ... कल सुबह दस बजे । आपके आफिस में । पक्की हाजिरी भरूंगा .... फौरन मुमकिन नहीं है, जनाब, बंदे की भी कुछ मसरूफियात है जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । ... जनाब, कल सुबह न हाजिर होऊं तो जो चोर की सजा, वो मेरी सजा ... क्या फरमाया ! वो सजा मैं काट चुका हूं ! ... ठीक है, सूली पर टांग दीजियेगा इस मर्तबा, ताकि टंटा ही खत्म हो । खुदा हाफिज ।”

उसने फोन बंद किया और पेशानी पोंछने लगा ।

“क्या हुआ ?” - मैं बोला ।

“बहुत जालिम हाकिम है । मेरा नाम कल रात वाले कत्ल से भी जोड़ने की कोशिश कर रहा था ।”

“जबकि उससे तुम्हारा कोई वास्ता नहीं ?”

“दूर दूर तक का नहीं ।”

“थे क्योंकर वहां तुम ?”

“उस वजह से नहीं था जो इंस्पेक्टर साहब सोच रहे थे । या शायद आप सोच रहे हैं ।”

“तो किस वजह से थे ?”

“वही, जो जग जाहिर थी । बेटी इंतकाल फरमा गयी न उनकी ! मातमपुर्सी के लिये गया था ।”

“वाकिफ कैसे थे ?”

“तोशनीवाल साहब रीयल एस्टेट के बिजनेस में आना चाहते हैं । एक बिचौलिये के जरिये इस बिजनेस के एक्सपर्ट के तौर पर मैंने अपने आपको पेश किया था ।”

“हो एक्सपर्ट ?”

“टॉप का तो नहीं, लेकिन हूं ठीक ठीक ।”

“मकसद क्या था ?”

“बिजनेस ही मकसद था । वो दौलतमंद आदमी था, उससे चार पैसे झाड़ लेने की उम्मीद थी, इसलिये ताल्लुकात बना रहा था ।”

“हूं ।'

“और, जनाब, इस सिलसिले में हौसलाअफजाह बात ये थी कि इतने बड़े आदमी को पता नहीं मेरे में क्या भा गया था कि मुझे छूट देने लगा था, बाकायदा मुंह लगाने लगा था ।”

“इसीलिये कल रात उसकी कोठी पर पहुंचे हुए थे ?”

“मुअज्जिज मेहमान की तरह, जनाब । मेरी हैसियत देखिये, औकात देखिये, फिर कल की उस हाजिरी पर गौर फरमाइये ।”

“जहां तुम उसकी छूट और अपनी पर्सनैलिटी को कैश कर रहे थे ?”

“यही समझ लीजिये ।”

“पुलिस की इस नयी जानकारी के बारे में क्या कहते हो कि घाट पर केयरटेकर के साथ तुम थे ?”

“कह नहीं चुका ?”

“फिर कहो ?”

“उनकी जानकारी गलत है ।”

“भीकू नाम के एक नाववाले की सूरत में एक गवाह है उनके पास ।”

“गवाह गलत है ।”

“उसने तुम्हारा हुलिया बयान किया था ।”

“उसका बयान गलत है ।”

“पुलिस को शिनाख्त पर ऐतबार है ।”

“पुलिस गलत है । शिनाख्त गलत है ।”

“सब गलत हैं, सब कुछ गलत हैं, एक तुम ही ठीक हो !”

“इस मर्तबा तो ऐसा ही है, जनाब । कल मिल रहा हूं न सख्त हाकिम से ! यकीन दिला के ही मानूंगा कि उन्हें मेरे बारे में मुगालता है ।”

“दिला लोगे ?”

“बिलाशक । जनाब, जब कोई शख्स एक जगह नहीं होता तो दूसरी जगह होता है । मैं यकीन दिलाऊंगा न इंस्पेक्टर साहब को कि मैं एक जगह नहीं, दूसरी जगह था; घाट पर नहीं, कहीं और था ।”

“ओके । मैं दुआ करूंगा तुम्हारी कामयाबी की ।”

“शुक्रिया, जनाब । इजाजत दीजिये ।”

तभी फोन की घंटी बजी ।

मैंने लाइन पर यादव को पाया ।

“वो वहां था ।” - यादव का भड़का स्वर सुनाई दिया ।

“कौन ?”

“तेरा डिप्टी और कौन !”

“मेरा डिप्टी ?”

“बकवास नहीं कर । पहेलियां नहीं कर ।”

“कैसे जाना ?”

“पूछता है कैसे जाना ! जैसे बहुत मुश्किल काम था । अरे, उसकी काल के वक्त तेरी लैंडलाइन का नम्बर आया था नहीं आया मेरे मोबाइल पर ?”

“ओह !”

“अब कहां है ?”

“चला गया ।”

“चला गया ! रोका क्यों नहीं ?”

“भई, पेशी का वादा करके ही तो गया !”

“कल का । फौरन पेशी का नहीं । नवाब की कुछ मसरूफियात हैं जिनकी वजह से फौरन पेश नहीं हो सकता । एक बार हाथ आ जाये सही, निकालता हूं साले की मसरूफियात भी और नवाबी भी । बहरहाल तूने गलत किया, शर्मा ।”

“अब मुझे क्या पता था उसकी कल सुबह की हाजिरी तुम्हें मंजूर नहीं थी ! उसकी फोन काल के वक्त मुझे एक तरफ की बात ही तो सुनायी दे रही थी न !”

“आया क्यों था ?”

“वो केयरटेकर से वाकिफ था इसलिये कल मैंने उसे केयरटेकर को तलाश करने को बोला था । बताने आया था कि अभी तक तो उसे उसकी कोई खोज खबर नहीं मिल पायी थी ।”

“अच्छा !”

“हां । अभी कहां हो ?”

“हस्पताल में ही हूं । शर्मा, तूने डिप्टी को जान के निकल जाने दिया ताकि तेरी शाम तक होल्ड वाली बात कच्ची न हो ।”
 
अभी मैं उसको बोलता कि और भी दो जने थे जिन्हें मैंने निकल जाने दिया था तो शायद फोन पर गोली मार देता ।

“ऐसी कोई बात नहीं, यादव साहब” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “यकीन करो मेरा ।”

“नहीं करूंगा तो और क्या करूंगा ? मौका तो हाथ से जाता रहा !”

“मौके आते जाते रहते हैं । कोई नफा, कोई नुकसान परमानेंट नहीं होता....”

“बकवास न कर । प्रवचन न कर । और कुछ कहना है तो कह, नहीं तो बंद कर ।”

“कहना है ।”

“क्या ?”

“किसी की शिनाख्त के लिये सरकारी मदद की जरूरत है ।”

“किसकी ? किसी केस से ताल्लुक रखते शख्स की ?”

“अभी पक्का नहीं । शिनाख्त के बाद पक्का होने की उम्मीद है । अभी तुम मदद करो तो...”

“मैं कैसे करूं ? मालूम नहीं तेरे को मैं यहां हस्पताल में फांसी लगा हूं ।”

“सब-इंस्पेक्टर गिरीश तोमर...”

“वो इस घड़ी मेरे से ज्यादा बिजी है ।”

“तो फिर ?”

“शर्मा, अगर वक्त जाया करने वाला काम निकला या अपना उल्लू सीधा करने वाला काम निकला तो ऐसा फिट करूंगा कि याद करेगा ।”

“नहीं निकलेगा । निकला तो जो मर्जी करना ।”

“रावत से बात कर ।”

“वो सुनेगा मेरी ?”

“बात कर । देख ।”

“फिर भी अगर कोई आश्वासन होता तो...”

मैं नाहक बोल रहा था, लाइन कट चुकी थी ।

हाकिम खफा था ।

रावत का मोबाइल मुझे नहीं मालूम था लेकिन उसका होटल कोजी इन में होना लाजमी था क्योंकि उस पर दीक्षा भटनागर की निगरानी की जिम्मेदारी थी ।

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