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आजाद पंछी जम के चूस complete

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StoryPublisher

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. आजाद पंछी जम के चूस .

.शहर के पाश कॉलोनी में शांति कुंज के नाम से एक बड़ा सा मकान है दो मंजिला मकान है। जिसमे तीन लोगो की फैमिली रहती है।

रवि सिंह----- उम्र 39 साल, शहर की मैन बाजार में कपड़े का व्यवसायी। तन्दरुस्त 5'6 इंच, और एक माचो मैन जिसका सपना हर एक महिला देखे।

आरती-----उम्र 37साल, रवि की पत्नी, एक जबरदस्त फिगर की मालकिन,( रंग गोरा, पतले पतले होंठ,मोटे मोटे बॉब्स,बाहर को उभरी हुई गांड जिसको देख कर हर कोई पाना चाहता है) एक घेरलू औरत है रवि की नजर में , बाकी जो ये है आगे कहानी में देखते है।

सोनल-----18 उम्र रवि और आरती की इकलौती संतान। अभी गर्ल्स स्कूल में 12th में पढ़ती है। अपने पिता और माता से बिल्कुल अलग। अभी अभी जवान हुई है। चुचिया बाहर आने की बेताब , सुडौल गांड, और साधारण चेहरे की मालकिन। अभी तक लड़को के संपर्क से अनजान। बिलकुल चुपचुप सी, छुईमुई सी। जिसको देख कर सायद ही कोई सेक्स करना चाहे।

रामु---- 58 साल घर का नॉकर पिछले 25 सालों से । रवि के पिताजी का रखा हुआ।

जया--- 53 साल रामु की पत्नी। रामु के साथ घर का काम करती है।

मोनिका--- 24 साल रामु और जया की बेटी। एक सेक्स की आग में जल रही लड़की। दो साल पहले विवाह हुआ था लेकिन शादी के एक साल बाद ही पति की मौत हो गयी, जहरीली शराब के पीने के कारण। तब से अपने माँ- बाप के साथ रहती है और अपनी माँ का हाथ बढ़ाती है घर के कामो में।

रात के 10 बजे है, आधा घणटे पहले रवि अपनी दुकान से वापिश आया है। और फ्रेश होकर खाना खा कर बैडरूम में बेड पर आज की दुकान की सैल परचेस

अपने लैपटॉप पर चढ़ा रहा था। तभी आरती एक छोटी सी सेक्सी सी मैक्सी पहनकर बाहर आती है बाथरूम से। आरती सेक्स की देवी लग रही थी। आज आरती का मूड सेक्स का था। रवि वैसे तो सेक्स में काफी अच्छा था लकीन कुछ समय से आरती के साथ उसका इंटरेस्ट कम हो गया था। महिने में एक दो बार ही आरती को खुश करने या अपना मूड बनने पर चुदाई करता था।

आरती को लगता था कि रवि अब काम की थकान की वजह से चुदाई नही करता। इसलिये वही कभी कभी पहल करती है। लेकिन आरती के जीवन में कुछ खालीपन था जो वो खुद भी नहीं समझ पाती थी की क्या?सबकुछ होते हुए भी उसकी आखें कुछ तलाशती रहती थीं। क्या?पता नहीं?पर हाँ कुछ तो था जो वो ढूँढ़ती थी। कई बार अकेले में आरती बिलकुल खाली बैठी शून्य को निहारती रहती, पर ढूँढ़ कुछ ना पाती।

आज आरती का यह रूप देखकर रवि हैरान था, ये मैक्सी रवि काफी समय पहले लेकर आया था लेकिन आरती ने एक बार पहन कर फिर कभी यूज़ नही की। लेकिन आज आरती ने खुद इसको पहना था और बिना ब्रा और पैंटी के।

आज आरती का पूरा शरीर जल रहा था। वो जाने क्यों आज बहुत उत्तेजित थी। रवि के साथ लिपट-ते ही आरती पूरे जोश के साथ रवि का साथ देने लगी। रवि को भी आरती का इस तरह से उसका साथ देना कुछ आजीब सा लगा पर वो तो उसका पति ही था उसे यह पसंद था। पर आरती हमेशा से ही कुछ झिझक ही लिए हुए उसका साथ देती थी। पर आज का अनुभब कुछ अलग सा था। रवि आरती को उठाकर बिस्तर पर ले गया और जल्दी से आरती को कपड़ों से आजाद करने लगा।

रवि भी आज पूरे जोश में था। पर आरती कुछ ज्यादा ही जोश में थी। वो आज लगता था कि रवि को खा जाएगी। उसके होंठ रवि के होंठों को छोड़ ही नही रहे थे और वो अपने मुख में लिए जम के चूस रही थी। कभी ऊपर के तो कभी नीचे के होंठ आरती की जीब और होंठों के बीच पिस रहे थे। रवि भी आरती के शरीर पर टूट पड़ा था। जहां भी हाथ जाता कसकर दबाता था। और जितना जोर उसमें था उसका वो इस्तेमाल कर रहा था। रवि के हाथ आरति की जाँघो के बीच में पहुँच गये थे। और अपनी उंगलियों से वो आरती की योनि को टटोल रहा था। आरती पूरी तरह से तैयार थी। उसकी योनि पूरी तरह से गीली थी। बस जरूरत थी तो रवि के आगे बढ़ने की। रवि ने अपने होंठों को आरती से छुड़ा कर अपने होंठों को आरती की चूचियां पर रख दिया और खूब जोर-जोर से चूसने लगा। आरती धनुष की तरह ऊपर की ओर हो गई।

और अपने हाथों का दबाब पूरे जोर से उसने रवि के सिर पर कर दिया रवि का पूरा चेहरा उसके चूचियां से धक गया था उसको सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। पर किसी तरह से उसने अपनी नाक में थोड़ा सा हवा भरा और फिर जुट गया वो आरती की चूचियां पर। आरती जो कि बस इंतेजर में थी कि रवि उसपर छा जाए। किसी भी तरह से बस उसके शरीर को खा जाए। और। उसके अंदर उठ रही ज्वार को शांत कर्दे। रवि भी कहाँ देर करने वाला था। झट से अपने को आरती की गिरफ़्त से आजाद किया और अपने को आरती की जाँघो के बीच में पोजीशन किया और। धम्म से लण्ड चुत के अंदर।

आआआआआह्ह। आरती के मुख से एक जबरदस्त। आहह निकली।

और रवि से चिपक गई। और फिर अपने होंठों को रवि के होंठों से जोड़ दिया। और अपनी सांसें भी रवि के मुख के अंदर ही छोड़ने लगी। रवि आवेश में तो था ही। पूरे जोश के साथ। आरती की चुत के अंदर-बाहर हो रहा था। आज उसने कोई भी रहम या। ढील नहीं दी थी। बस किसी जंगली की तरह से वो आरती पर टूट पड़ा था। पता नही क्यों रवि को आज आरती का जोश पूरी तरह से नया लग रहा था। वो अपने को नहीं संभाल पा रही थी। उसने कभी भी आरती से इस तरह से संभोग करने की नहीं सोची थी। वो उसकी पत्नी थी। सुंदर और पढ़ी लिखी। वो भी एक अच्छे घर का लड़का था। संस्कारी और अच्छे घर का। उसने हमेशा ही अपनी पत्नी को एक पत्नी की तरह ही प्यार किया था किसी। जंगली वा फिर हबसी की तरह नहीं। आरती नाम के अनुरूप ही सुंदर और नाजुक थी। उसने बड़े ही संभाल कर ही उसे इस्तेमाल किया था। पर आज आरती के जोश को देखकर वो भी। जंगली बन गया था। अपने को रोक नहीं पाया था।

धीरे-धीरे दोनों का जोश ठंडा हुआ तो दोनों बिस्तर पर चित लेटके। जोर-जोर से अपने साँसे। छोड़ने लगे और। किसी तरह अपनी सांसों पर नियंत्रण पाने की कोशिश करने लगे। दोनों थोड़ा सा संभले तो एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराए। रवि आरती की ओर देखता ही रहा । आज ना तो उसने अपने को ढँकने की कोशिश की और नहीं अपने को छुपाने की। वो अब भी बिस्तर पर वैसे ही पड़ी हुई थी। जैसा उसने छोड़ा था। बल्कि उसके होंठों पर मुश्कान ऐसी थी की जैसे आज उसको बहुत मजा आया हो। रवि ने पलटकर आरती को अपनी बाहों में भर लिया और।

रवि- क्या बात है। आज कुछ खास बात है क्या।

आरती- उउउहह। हूँ। नही।

रवि- फिर। आज कुछ बदली हुई सी लगी।

आरती- अच्छा वो कैसे।

रवि- नहीं बस यूही कोई फिल्म वग़ैरह देखा था क्या।

आरती- नहीं तो। क्यों।

रवि- नहीं। आज कुछ ज्यादा ही मजा कर रही थी। इसलिए।

और हँसते हुए। उठ गया और। बाथरूम की ओर चला गया।

आरती वैसे ही बिस्तर पर बिल्कुल नंगी ही लेटी रही। और अपने और रवि के बारे में सोचने लगी। कि

रवि को भी आज उसमें चेंज दिखा है। क्या चेंज। आज का सेक्स तो मजेदार था। बस ऐसा ही होता रहे। तो क्या बात है। आज रवि ने भी पूरा साथ दिया था। आरती का।

इतने में उसके ऊपर चादर गिर पड़ी और वो अपने सोच से बाहर आ गई

रवि- चलो सो जाओ।

आरती रवि की ओर देख रही थी। क्यों उसने उसे ढक दिया। क्या वो उसे इस तरह नहीं देखना चाहता क्या वो सुंदर नहीं है। क्या वो बस सेक्स के खेल के समय ही उसे नंगा देखना चाहता है। और बाकी समय बस ढँक कर रहे वो। क्यों क्यों नहीं चाहता रवि उसे नंगा देखना। क्यों नहीं वो चादर को खींचकर गिरा देता है। और फिर उसपर चढ़ जाता है। क्यों नहीं करता वो यह सब। क्या उसका मन भर गया है।

जो हमेशा अपने पति के पीछे-पीछे घूमती रहती थी या फिर उनके आने और उठने का इंतजार करती रहती थी वो अब आजाद पंछी की तरह आकाश में उड़ना चाहती थी और बहुत खूल कर जीना चाहती थी उसके तन और मन की पूर्ति को देखकर ऐसा नहीं लगता था कि अभी-अभी कुछ देर पहले जो भी वो की थी उससे उसे कोई थकान भी नही हुई है वह फिर से चाहती थी करना।

रवि लेटेते ही सो गया। लकीन आरती की आंखों में कुछ चल रहा था। आज जो उसने दिन में देखा था वो उसको याद आ रहा था जिसके कारण आरती आज पहली बार बेकाबू हुई थी।
 
आरती धीरे से उठी और चाददर लपेट कर ही बाथरूम की ओर चल दी। लेकिन अंदर जाने से पहले जब पलट कर देखा तो रवि के खराटे शुरु हो गए थे। आरती चुपचाप बाथरूम में घुस गई और। अपने को साफ करने के बाद जब वो बाहर आई तो रवि गहरी नींद सो चुका था। वो अब भी चादर लपेटे हुई थी। और बिस्तर के कोने में आकर बैठ गई थी। सामने ड्रेसिंग टेबल पर कोने से उसकी छवि दिख रही थी। बाल उलझे हुए थे। पर चेहरे पर मायूसी थी। आरती के।

ज्यादा ना सोचते हुए आरती अपनी जगह पर खड़ी हुई और सोचने लगी क्या वो सेक्सी दिखती है। वैसे आज तक रवि ने तो उसे नहीं कहा था। वो तो हमेशा ही उसके पीछे पड़ा रहता था। पर आज तक उसने कभी भी आरती को सेक्सी नहीं कहा था। न हीं उसने खुद अपने पूरे जीवन काल में ही अपने को इस नजरिए से ही देखा था। पर आज बात कुछ आलग थी। आज ना जाने क्यों। आरती को अपने आपको मिरर में देखने में बड़ा ही मजा आ रहा था। वो अपने पूरे शरीर को एक बड़े ही नाटकीय तरीके से कपड़ों के बिना ऊपर से देख रही थी। और हर उभार और गहराई में अपनी उंगलियों को चला रही थी। वो कुछ सोचते हुए अपने चद्दर को उतार कर फेक दिया और न्नगी मिरर के सामने खड़ी होकर देखती रही। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। जब उसकी नजर अपने उभारों पर गई। तो वो और भी खुश हो गई। उसने आज तक कभी भी इतने गौर से अपने को नहीं देखा था। शायद साड़ी के बाद जब भी नहाती थी या फिर रवि कभी तारीफ करता था तो शायद उसने कभी देखा हो पर आज जब उसकी नजर अपने उभारों पर पड़ी तो वो दंग रह गई। साड़ी के बिना वो कुछ और भी ज्यादा गोल और उभर गये थे। शेप और साइज का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता था कि करीब 25% हिस्सा उसका ब्लाउज से बाहर की ओर रहता था और 75% जो कि अंदर रहता था। एक बहुत ही आकर्षक और सेक्सी महिला के लिए काफी था। आरती अपने को फिर से मिरर में देखने लगी। पतली सी कमर और फिर लंबी लंबी टांगों के बीच में फँसी हुई उसकी चुत। गजब का लग रहा था। देखते-देखते कामया धीरे-धीरे अपने शरीर पर अपना हाथ घुमाने लगी। पूरे शरीर पर। चुचियो और चुत पर। आआह्ह। क्या सुकून है। उसके शरीर को। कितना अच्छा लग रहा था। अचानक ही उसे दिन के उसके कठोर हाथ याद आ गये। और वो और भी बिचलित हो उठी। ना चाहते हुए भी उसके हाथों की उंगलियां। उसकी योनि की ओर बढ़ चली और धीरे धीरे वो अपने योनि को सहलाने लगी। एक हाथ से वो अपनी चूचियां को धीरे से दबा रही थी। और दूसरे हाथ से अपने योनि पर। उसकी सांसें तेज हो चली थी। खड़े हो पाना दूभर हो गया था। टाँगें कंपकपाने लगी थी। मुख से। सस्शह। और। आअह्ह। की आवाजें अब थोड़ी सी तेज हो गई थी। शायद उसे सहारे की जरूरत है। नहीं तो वो गिर जाएगी। वो हल्के से घूमकर बिस्तर की ओर बढ़ी ही थी कि अचानक उसे कमरे की खिड़की पर दो जोड़ी आंखे दिखी।
 
वो आंखे उसे देखते ही वहा से हट गई। कौन हो सकताहै इस वक़्त न्नगी होने कर कारण जा भी नही सकती थी बाहर।

ज्यादा ना सोचते हुए। आरती भी धम्म से अपनी जगह पर गिर पड़ी और। कंबल के अंदर बिना कपड़े के ही घुस गई। और सोने की चेष्टा करने लगी। न जाने कब वो सो गई और सुबह भी हो गई।

उठते ही आरती ने बगल में देखा। रवि उठ चुका था। शायद बाथरूम में था। वो बिना हीले ही लेटी रही। पर बाथरूम से ना तो कुछ आवाज ही आ रही थी। ना ही पूरे कमरे से। वो झट से उठी और घड़ी की ओर देखा।

बाप रे 8:30 हो चुके है। रवि तो शायद नीचे होगा।

जल्दी से आरती बाथरूम में घुस गई और। फ्रेश होकर नीचे आ गई। उसकी लाडली सोनल और रवि बाहर गार्डन में बैठे थे। चाय बिस्कट रखा था। टेबल पर। आरती की आहट सुनते ही दोनो पलटे

रवि- क्या बात है। आज तुम्हारी नींद ही नहीं खुली।

आरति-- जी।

रवि -और क्या। सोया कर । कौन सा तुझे। जल्दी उठकर घर का काम करना है। आराम किया कर और खूब घुमा फिरा कर और। मस्ती में रह। तंज कसा रवि ने

सोनल---क्या पापा औरक्या करेगी घर पर मम्मी। बोर भी तो हो जाती है। रामु दादा और जय दादी काम कर लेती है सभी। फिर मम्मी उठ कर क्या करेगी।क्यों ना कुछ दिनों के लिए हम नाना के घर हो आते है।

इतने में रवि की चाय खतम हो गई और वो उठ गया।

रवि- चलो। में तो चला तैयार होने। और सोनल तुम्हे नही तैयार होना, आज स्कूल नही जाना क्या।

सोनल- हाँ… हाँ… आ जाऊँगी पापा। अभी रेडी होती हूं।

रवि के जाने के बाद आरती भी उठकर जल्दी से रवि के पीछे भागी। यह तो उसका रोज का काम था। जब तक रवि शोरुम नहीं चला जाता था। उसके पीछे-पीछे घूमती रहती थी। और चले जाने के बाद कुछ नहीं बस इधर-उधर फालतू काम के बिजी।

रवि अपने कमरे में पहुँचकर नहाने को तैयार था। एक तौलिया पहनकर कमरे में घूम रहा था। जैसे ही आरती कमरे में पहुँची। वो मुश्कुराते हुए। आरती से पूछा।

कामेश- क्यों अपने पापा मम्मी के घर जाना है क्या। थोड़े दिनों के लिए।

आरती- क्यों। पीछा छुड़ाना चाहते हो।

और अपने बिस्तर के कोने पर बैठ गई।

रवि- अरे नहीं यार। वो तो बस मैंने ऐसे ही पूछ लिया। पति हूँ ना तुम्हारा। और सोनल भी कह रही थी। इसलिए नहीं तो हम कहा जी पाएँगे आपके बिना।

और कहते हुए। वो खूब जोर से खिलखिलाते हुए हँसते हुए बाथरूम की ओर चल दिया।

आरती- थोड़ा रुकिये ना। बाद में नहा लेना।

रवि- क्यों। कुछ काम है। क्या।

आरती- हाँ… (और एक मादक सी मुश्कुराहट अपने होंठों पर लाते हुए कहा।)

रवि भी अपनी बीवी की ओर मुड़ा और उसके करीब आ गया। आरती बिस्तर पर अब भी बैठी थी। और रवि की कमर तक आ रही थी। उसने अपने दोनों हाथों से रवि की कमर को जकड़ लिया और अपने गाल को रवि के पेट पर घिसने लगी। और अपने होंठों से किस भी करने लगी।

रवि ने अपने दोनों हाथों से आरती का चेहरे को पकड़कर ऊपर की ओर उठाया। और आरती की आखों में देखने लगा। आरती की आखों में सेक्स की भूख उसे साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन अभी टाइम नहीं था। वो। अपने शो रूम के लिए लेट नहीं होना चाहता था।

रवि- रात को। अभी नहीं। तैयार रहना। ठीक है।

और कहते हुए नीचे जुका और। अपने होंठ को आरती के होंठों पर रखकर चूमने लगा। आरती भी कहाँ पीछे हटने वाली थी। बस झट से रवि को पकड़कर बिस्तर पर गिरा लिया। और अपनी दोनों जाँघो को रवि के दोनों ओर से रख लिया। अब रवि आरती की गिरफ़्त में था। दोनों एक दूसरे में गुत्थम गुत्था कर रहे थे। आरती तो जैसे पागल हो गई थी। उसने कस पर रवि के होंठों को अपने होंठों से दबा रखा था। और जोर-जोर से चूस रही थी। और अपने हाथों से रवि के सिर को पकड़कर अपने और अंदर घुसा लेना चाहती थी। रवी भी आवेश में आने लगा था, । पर दुकान जाने की चिंता उसके दिलोदिमाग़ पर हावी थी थोड़ी सी ताकत लगाकर उसने अपने को आरती के होंठों से अपने को छुड़ाया और झुके हुए ही आरती के कानों में कहा।

रवि- बाकी रात को।

और हँसते हुए आरती को बिस्तर पर लेटा हुआ छोड़ कर ही उठ गया। उठते हुए उसकी टावल भी। खुल गया था। पर चिंता की कोई बात नहीं। वो तौलिया को अपने हाथों में लिए ही। जल्दी से बाथरूम में घुस गया।

आरती रवि को बाथरूम में जाते हुए देखती रही। उसकी नजर भी रवि के लिंग पर गई थी। जो कि सेमी रिजिड पोजीशन में था वो जानती थी कि थोड़ी देर के बाद वो तैयार हो जाता। और आरती की मन की मुराद पूरी हो जाती। पर रवि के ऊपर तो दुकान का भूत सवार था। वो कुछ भी हो जाए उसमें देरी पसंद नहीं करता था। वो भी चुपचाप उठी और रवि का इंतेजार करने लगी। रवि को बहुत टाइम लगता था बाथरूम में। शेव करके। और नहाने में। फिर भी आरती के पास कोई काम तो था नहीं। इसलिए। वो भी उठकर रवि के ड्रेस निकालने लगी। और बेड में बैठकर इंतजार करने लगी। रवि के बाहर आते ही वो झट से उसकी ओर मुखातिब हुई। और।

आरती- आज जल्दी आ जाना शो रूम से। (थोड़ा गुस्से में कहा कामया ने।)

रवि- क्यों। कोई खास्स है क्या। (थोड़ा चुटकी लेते हुए रवि ने कहा)

आरती- अगर काम ना हो तो क्या शोरुम में ही पड़े रहोगे।

रवि- हाँ… हाँ… हाँ… अरे बाप रे। क्या हुआ है तुम्हें। कुछ नाराज सी लग रही हो।

आरती- आपको क्या। मेरी नाराजगी से। आपके लिए तो बस अपनी दुकान। मेरे लिए तो टाइम ही नहीं है।

रवि- अरे नहीं यार। मैं तो तुम्हारा ही हूँ। बोलो क्या करना है।

आरती- जल्दी आना कही घूमने चलेंगे।

रवि- कहाँ

आरती- अरे कही भी बस रास्ते रास्ते में। और फिर बाहर ही डिनर करेंगे।

रवि- ठीक है। पर जल्दी तो में नहीं आ पाऊँगा। हाँ… घूमने और डिनर की बात पक्की है। उसमें कोई दिक्कत नहीं।

आरती- अरे थोड़ा जल्दी आओगे तो टाइम भी तो ज्यादा मिलेगा।

रवि- तुम भी। आरती। कौन कहता है अपने को कि जल्दी आ जाना या फिर देर तक बाहर नहीं रहना। क्या फरक पड़ता है। अपने को। रात भर बाहर भी घूमते रहेंगे तो भी सोनल अब बच्ची तो है नही कि घर पर अकली नही रह सकती।

आरती भी कुछ नहीं कह पाई। बात बिल्कुल सच थी कि घर से कोई भी बंदिश नहीं थी आरती और रवि के ऊपर लेकिन आरती चाहती थी कि रवि जल्दी आए तो वो उसके साथ कुछ सेक्स का खेल भी खेल लेती और फिर बाहर घूमते फिरते और फिर रात को तो होना ही था।

आरती भी चुप हो गई। और रवि को तैयार होने में मदद करने लगी। तभी

रवि- अच्छा एक बात बताओ तुम अगर घर में बोर हो जाती हो तो कही घूम फिर क्यों नहीं आती।

आरती- कहाँ जाऊ

रवि- अरे बाबा। कही भी। कुछ शापिंग कर लो कुछ दोस्तों से मिल-लो। ऐसे ही किसी माल में घूम आओ या फिर। कुछ भी तो कर सकती हो पूरे दिन। हाँ…

आरती- मेरा मन नहीं करता अकेले। और कोई साथ देने वाला नहीं हो तो अकेले क्या अच्छा लगता है।

रवि- अरे अकेले कहाँ कहो तो। आज से जया काकी से कह दूँगा मेरे जाने के बाद वो तुम्हें घुमा फिरा कर ले आएगी।

आरती- नहीं।

रवि- अरे एक बार निकलो तो सही। सब अच्छा लगेगा। ठीक है।

आरती- अरे नहीं। मुझे नहीं जाना। बस। काकी के साथ । नहीं। हाँ यह आलग बात थी कि मुझे गाड़ी चलानी आती होती तो में अकेली जा सकती थी।

रवि- अरे वाह तुमने तो। एक नई बात। खोल दी। अरे हाँ…

आरती- क्या।

रवि- अरे तुम एक काम क्यों नहीं करती। तुम गाड़ी चलाना सीख क्यों नहीं लेती। घर में 2 गाड़ी है। एक तो घर में रखे रखे धूल खा रही है। छोटी भी है। तुम चलाओ ना उसे।

रवि के घर में 2 गाड़ी थी। नई गाड़ी लेने के बाद आल्टो गाड़ी जो कि अब वैसे ही खड़ी थी घर मे।

आरती- क्या यार तुम भी। कौन सिखाएगा मुझे गाड़ी। आपके पास तो टाइम नहीं है।

रवि- अरे क्यों। अपने मनोज अंकल है ना उनका कार ड्राइविंग स्कूल तो है ही। मैं आज ही उन्हें कह देता हूँ। तुम्हें गाड़ी सीखा देगे।

और एकदम से खुश होकर आरती ने रवि के गालों को और फिर होंठों को चूम लिया।

रवि- और जब तुम गाड़ी चलाना सीख जाओगी। तो मैं पास में बैठा रहूँगा और तुम गाड़ी चलाना

आरती- क्यों।

रवि- और क्या। फिर हम तुम्हारे इधर-उधर हाथ लगाएँगे। और बहुत कुछ करेंगे। बड़ा मजा आएगा। ही। ही। ही।

आरती- धात। जब गाड़ी चलाउन्गी तब। छेड़छाड़ करेंगे। घर पर क्यों नहीं।

रवि- अरे तुम्हें पता नहीं। गाड़ी में छेड़ छाड़ में बड़ा मजा आता है। चलो यह बात पक्की रही। कि तुम। अब गाड़ी चलाना सीख लो। जल्दी से।

आरती- नहीं अभी नहीं। मुझे सोनल से पूछना है। इसके बाद। कल बताउन्गी ठीक है। और दोनों। नीचे आ गये डाइनिंग टेबल पर रवि का नाश्ता तैयार था। रामु काका का काम बिल्कुल टाइम से बँधा हुआ था। कोई भी देर नहीं होती थी। आरती आते ही रवि के लिए प्लेट तैयार करने लगी। जया काकी और मोनिका रसोई घर मे थी। सोनल का नास्ता तैयार कर रही थी।

रवि ने जल्दी से नाश्ता किया और घर के बाहर की ओर चल दिये बाहर रामु काका गाड़ी को सॉफ सूफ करके चमका कर रखते थे। रवि खुद ड्राइव करता था।

रवि के जाने के बाद आरती भी अपने कमरे में चली आई और कमरे को ठीक ठाक करने लगी। दिमाग में अब भी रवि की बात घूम रही थी। ड्राइविंग सीखने की। कितना मजा आएगा। अगर उसे ड्राइविंग आ गई तो। कही भी आ जा सकती है। और फिर रवि से कहकर नई गाड़ी भी खरीद सकती है। वाह मजा आ जाएगा यह बात उसके दिमाग में पहले क्यों नहीं आई। और जल्दी से अपने काम में लग गई। नहा धो कर जल्दी से तैयार होने लगी। वारड्रोब से चूड़ीदार निकाला और पहन लिया वाइट और रेड कॉंबिनेशन था। बिल्कुल टाइट फिटिंग का था। मस्त फिगर दिख रहा था। उसमें उसका।

तैयार होने के बाद जब उसने अपने को मिरर में देखा। गजब की दिख रही थी। होंठों पर एक खूबसूरत सी मुश्कान लिए। उसने अपने ऊपर चुन्नी डाली और। मटकती हुई नीचे जाने लगी। सीढ़ी के ऊपर से डाइनिंग स्पेस का हिस्सा दिख रहा था। वहां रामु काका। टेबल पर खाने का समान सजा रहे थे। उनका ध्यान पूरी तरह से। टेबल की ओर ही था। और कही नहीं। सोनल अभी तक टेबल पर नहीं आई थी। आरती थोड़ा सा अपनी जगह पर रुक गई। उसे कल की बात याद आ गई रामु काका की नजर और हाथों का सपर्श उसके जेहन में अचानक ही हलचल मचा दे रहा था।

उसे कल दोपहर की बात याद आने लगी । जया काकी को मैले कपड़े निकाल कर वाशिंग मशीन में वाशिंग के लिए दे कर बाहर गार्डन में आ गयी थी। ऐसे ही घूमते घूमते वो रामु काका के सर्वेंट क्वाटर के पास आ गयी।

तभी आरती को कुछ सिकारियो की आवाज आई। उसके कान खड़े हो गए ये आवाजे इस समय क्वाटर रूम से आ रही थी। वो दबे पांव क्वाटर की खिड़की के पास पहुची तो उसकी आंखें फटी रह गयी।

उसने अपने जीवन मे जो सोच भी नही सकति थी वो नजारा उनके सामने था।

मोनिका और उसके बापू रामु काका दोनो एक दूसरे से लिपटे हुए थे।

मोनिका ने उस समय पेटीकोट के नीचे कुछ नहीं पहना था और रामु काका उसके बूब्स के खड़े निप्पल को अपनी मुठ्ठी में भरकर दबा रहे थे और साथ ही वो उसके दोनों बूब्स को भी मसल रहे थे. उस वजह से मोनिका मस्ती से भरी मज़ा ले रही थी. तभी रामु काका ने उससे पूछा, क्यों बेटी तुमको अच्छा लग रहा है? तो उसने कहा कि हाँ पापा मुझे बहुत मज़ा आ रहा है और रामु काका कहने लगे कि तुम इसी तरह कुछ देर बैठो, क्योंकि आज में तुमको शादी वाला पूरा मज़ा देता हूँ क्योंकि अभी तुम जवान हो और तुम यह मज़े लेने के लायक भी हो , आज मैं तुमको बहुत मज़े दूंगा. तुम अब प्यासी मत रहा करो। जब तक दोबारा तुमारा विवाह नही होता मैं ही तुमको खुश किया करुगा। रामु काका उसके खड़े बूब्स को निचोड़कर बोले, तो मोनिका एकदम उतावली होकर बोली उफ्फ्फ हाए पापा ऊहह्ह्ह सीईईईईइ इस तरह तो मुझे और भी अच्छा लगता है जब तुम कपड़े उतारकर नंगी होकर मज़ा लोगी तब और भी ज़्यादा मज़ा आएगा, वाह तुम्हारे बूब्स बड़े मस्त है.

आरती बाहर खड़ी हैरान और परेशान थी इन बाप बेटी की रास लीला देख कर ।

फिर मोनिका ने रामु काका से पूछा कि मेरे बूब्स इतने छोटे क्यों है? मा के तो बहुत बड़े है? वो कहने लगे कि तुम घबराओ मत बेटी तुम्हारे बूब्स को भी में तुम्हारी मा की तरह बड़ा कर दूँगा. बेटी तुम अपने पूरे कपड़े उतारकर नंगी होकर बैठो तब बड़ा मज़ा आएगा. फिर जब तक तुम्हारी दोबारा शादी नहीं होती तब में ही तुमको शादी वाला मज़ा दूँगा और तुम्हारे साथ में ही सुहागरात मनाऊंगा तुम्हारे बूब्स बहुत टाइट है और रामु काका पेटीकोट अंदर अपना एक हाथ डालकर उसके दोनों को बूब्स को दबातें हुए बोले कि बेटी अब तुम नंगी हो जाओ.

उसके बाद मोनिका अपने पूरे कपड़े उतारकर नंगी होकर रांड की तरह अपने दोनों पैरों को फैलाकर उस कुर्सी पर बैठ गयी. मोनिका के छोटे छोटे बूब्स तने हुए थे और उसको ज़रा सी भी शरम नहीं आ रही थी.

वहा आरती की दोनों गोरी जाँघो के बीच चूत पानी से लबालब भर गई थी

और उधर रामु काका मोनिका की गदराई हुई चूत को बहुत गौर से देख रहे थे. चूत का वो गुलाबी छेद बड़ा मस्त था, अब रामु काका अपने एक हाथ से गुलाबी कली को सहलाते हुए बोले हे राम बेटी तुम्हारी तो अभी जवान पड़ी है.

फिर उन्होंने मोनिका की चूत को ज़ोर से दबा दिया और काका के हाथ से मोनिका चूत के दबाए जाने पर में एकदम सनसना गयी और में मस्ती से भरी अपनी चूत को देख रही थी. तभी काका ने अपने अंगूठे को क्रीम से चुपड़कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मोनिका की चूत को क्रीम से चिकनी कर रहे थे.

उधर अंगूठा अंदर जाते ही इधर आरती का बदन कांप गया और उसका हाथ अपने आप उसकी चुत पर चला गया और चुत को रगडने लगा।

तभी काका ने मोनिका की चूत से उनका अंगूठा बाहर किया तो वो उस पर लगे चूत के रस को देखकर बोले कि बेटी यह क्या है? क्या तुमने अच्छे से चुदवाकर मज़ा नही लिया है?

अब आरती काका के अनुभव को देखकर एकदम दंग रह गयी

अब जब काका ने मोनिका को चूत को फैलाने के लिए कहा तो उसने तुरंत अपने दोनों हाथ से अपनी चूत की दरार को फैलाकर पूरा खोल दिया. अब रामु काका अपने घुटनों के बल नीचे बैठ गये और वो उसकी रोयेदार चूत पर अपने होंठो को रख चूमने लगे.

आरती के लिए ये सब नया था शादी के इतने साल बाद भी रवि ने कभी उस्की चुत को नही चूमा था। वो आंखे फाडे सब देख रही थी।

फिर काका के पहली बार चूमने पर मोनिका कांप गयी. फिर दो चार बार चूमने के बाद काका ने अपनी जीभ को चूत के चारों तरफ चलाते हुए उन्होंने अब चूत को चाटना शुरू कर दिया और वो हल्के हल्के बाल भी चाट रहे थे, जिसकी वजह से मोनिका को ग़ज़ब का मज़ा आ रहा था. अब रामु काका चूत को चाटते हुए चूत का दाना भी चाट रहे थे मोनिका उस वजह से बड़ी मस्त थी

और रवि तो बस आरती को जल्दी से चोदकर सो जाता था न उसने कभी ज्यादा बूब्स दबाए थे जिसकी वजह से कुछ मज़ा और जोश नहीं आता था

, लेकिन यहा रामु काका तो एकदम चालाक समझदार खिलाड़ी की तरह मोनिका को वो पूरा मज़ा दे रहे थे और उन्होंने चूत के बाहर से चाट चाटकर पूरा गीला कर दिया था.

अब रामु काका ने अपनी जीभ को गुलाबी चूत के छेद में डाल दिया और जब उनकी जीभ चूत के छेद में गयी तो मोनिका की हालत पहले से ज्यादा खराब हो गयी और वो अब उस मस्ती से तड़प उठी

कुछ देर बाद रामु काका चूत को चाटकर अलग हुए और अब उन्होंने अपने खड़े लंड को चूत पर लगा दिया वो अपने लंड से आपनी बेटी की चूत को रगड़ने लगे थे.

कुछ देर पहले चूत की चटाई के बाद अब उनके लंड की रगड़ाई ने आरती को बिल्कुल पागल बना दिया था और वो अपने उतावलेपन से चुत को जोर जोर से रगडने लगी।

उधर मोनिका रामु काका से कहने लगी ,उफ्फ्फ्फ़ प्लीज बापू अब आप चोद भी दो मेरी चूत को आअहह ऊऊहह.

फिर रामु काका ने तड़पती हुई उस आवाज़ पर मोनिका के बूब्स को उसी समय ज़ोर से कसकर पकड़कर अपनी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठाकर धक्का मार दिया. फिर एक करारा धक्का लगने पर रामु काका का आधा लंड मोनिका की चूत में चला गया और काका का मोटा और लंबा लंड मोनिका की छोटी सी चूत को ककड़ी की तरह चीरकर अंदर घुसा था और लंड के आधा अंदर जाते ही में दर्द से तड़पकर उनसे बोली आअहह्ह्ह ऊऊईईईई स्सीईईइ माँ में मर गयी बापू, प्लीज धीरे धीरे बापू आपका बहुत मोटा है उफ्फ्फ्फ़ बापू मेरी चूत इससे अब पूरी तरह से फट गयी है, मुझे बहुत अजीब सा दर्द हो रहा है, में मर जाउंगी प्लीज.

रामु काका का वो मोटा और लंबा लंड उसकी चूत में एकदम कसा हुआ था. मोनिका के उस दर्द और करहाने की वजह से काका ने उसी समय धक्के मारना बंद कर दिया और उन्होंने उसके बूब्स को मसलना शुरू किया. अब उसे कुछ देर बाद दोबारा थोड़ा सा मज़ा आने लगा था. फिर करीब 6-7 मिनट बाद उसका वो दर्द एकदम खत्म हो गया था और अब रामु काका अपने लंड को उसकी चूत में बिना रुके लगातार धक्के लगा रहे थे जिसकी वजह से धीरे धीरे काका का पूरा लंड उसकी चूत को चीरता फाड़ता हुआ अंदर घुस गया, लेकिन वो दोबारा उस दर्द से छटपटाने लगी थी

और आरती को ऐसा लगा जैसे किसी ने मोनिका की चूत में चाकू घुसाया है जिसने उस्की चूत के सभी जगह से छीलकर दर्द जलन पैदा कर दी थी और जिसको अब सहना उसके लिए बहुत मुश्किल था.

अब अपनी कमर को झटकते हुए मोनिका बोली उफ्फ्फ्फ़ आह्ह्ह्ह बापू आज मेरी फट गयी है, प्लीज अब इसको बाहर निकालो मुझे नहीं चुदवाना.

फिर रामु काका अपना लंड डालते हुए उसके गाल चाट रहे थे और वो उनके गाल चाटते हुए उससे बोले कि बेटी रो मत, अब तो पूरा चला गया, हर लड़की को पहली बार मोटा लण्ड लेने में दर्द होता है, लेकिन फिर मज़ा भी उसको उतना ही आता है. कुछ देर के बाद उसका करहाना अब बंद हुआ तो रामु काका ने धीरे धीरे धक्के देकर चोदने लगे. रामु काका का लंड कस कसकर उसकी चूत के अंदर आ जा रहा था और अब सच में उसे मज़ा आ रहा था. अब जब भी काका ऊपर से धक्का लगाते तो वो भी नीचे से अपनी गांड को उछालने लगती और मोनिका कहती है, "उसका पति तो मुझे केवल ऊपर से रगड़कर चोदकर चला गया , मेरी असली चुदाई तो अब मेरे बापू कर रहे है" फिर देखते ही देखते रामू काका ने अपना पूरा लंड उसकी चूत के अंदर तक डाल दिया था.

फिर आरती ने महसूस किया कि रामु काका का लंड तो रवि के लंड से बहुत दमदार और मज़ेदार था.

तभी रामु काका ने उससे पूछा क्यों बेटी अब तुम्हे दर्द तो नहीं हो रहा है ना? तो मोनिका ने उनसे कहा कि नहीं बापू अब तो मुझे बहुत मज़ा आ रहा है आह्ह्हहह बापू और ज़ोर ज़ोर से आप मुझे धक्के देकर चोदो और

रामु काका इसी तरह करीब बीस मिनट तक लगातार धक्के देकर मोनिका को चोदते रहे और फिर बीस मिनट के बाद रामू काका के लंड से गरम गरम मलाईदार पानी मोनिका की चूत में गिरने एक एक बूंद टपकने लगी,

जिसको बाहर आरती भी बहुत अच्छी तरह से महसूस कर रही थी और खुद भी एक हल्की सी चीख के साथ झड़ गयी। और उसकी चीख रामु और मोनिका ने सुन ली। दोनो ने एक साथ खिड़की की तरफ देखा। दोनो आरती को देख कर सकपका गए और एक दम से अलग होकर अपने कपड़े पहनने लगे।

आरती भी जान गई कि वो पकड़ी गई है और जैसे तैसे खुदको संभाला और घर की तरफ मुड़ कर दौड़ लगाई।

इसलिए अचानक उसका पाव मुड़ा और वो गिर गयी।
 
आरती का पैर गार्डन के खड्डे में लचक खाकर मुड़ गया। दर्द के मारे आरती की हालत खराब हो गई।

वो वहीं नीचे, जमीन में बैठ गई और जोर से जया को आवाज लगाई- “जया काकी, जल्दी आओ…”

जया काकी दौड़ती हुई आयी और आरती को जमीन पर बैठा देखकर पूछा- क्या हुआ बहू रानी?

आरती- “उउउफफ्फ़…”और आरती अपनी एड़ी पकड़कर जया काकी की ओर देखने लगी।

जया जल्दी से कामया के पास जमीन पर ही बैठ गयी और नीचे झुक कर वो आरती की एड़ी को देखने लगी।

आरती- “अरे काकी देख क्या रही हो? कुछ करो, बहुत दर्द हो रहा है…”

जया- पैर मुड़ गया क्या?

आरती- “अरे हाँ… ना… प्लीज काकी, बहुत दर्द हो रहा है…”

जया जो की आरती के पैर के पास बैठी थी कुछ कर पाती तब तक रामु काका वहा आ गए और उन्होंने ने जया का हाथ पकड़कर हिला दिया, औरकहा- क्या सोच रही हो, कुछ करो गी या मदद करू?

जया- “नहीं नहीं, मैं कुछ करती हूँ,रुकिये। आप इन्हें उठाइये और वहां चेयर पर बैठाइए

आरती- “क्या काका… थोड़ा सपोर्ट तो दो…”

दर्द में आरती थोड़ी देर का मंजर भूल गयी थी कि वो क्या देख कर आ रही थी।

रामु थोड़ा सा आगे बढ़ा और आरती के बाजू को पकड़कर उठाया और थोड़ा सा सहारा देकर डाइनिंग चेयर तक ले जाने लगा। आरती का दर्द अब भी वैसा ही था। लेकिन बड़ी मुश्किल से वो रामु काका का सहारा लिए चेयर तक पहुँची और धम्म से चेयर पर बैठ गई। उसके पैरों का दर्द अब भी वैसा ही था। वो चाहकर भी दर्द को सहन नहीं कर पा रही थी, और बड़ी ही दयनीय नजरों से रामु काका की ओर देख रही थी।

रामु काका भी कुछ करने की स्थिति में नहीं था। जिसने आज तक आरती को नजरें उठाकर नहीं देखा था, वो आज आरती की बाहें पकड़कर चेयर तक लाया था। कितना नरम था आरती का शरीर, कितना मुलायम और कितना चिकना। रामु काका ने आज तक इतना मुलायम, चिकनी और नरम चीज नहीं छुआ था। रामु अपने में गुम था की उसे आरती की आवाज सुनाई दी।

आरती- “क्या काका, क्या सोच रहे हो?”और आरती ने अपनी साड़ी को थोड़ा सा ऊपर कर दिया और रामु की ओर देखते हुए अपने एड़ी की ओर देखने लगी।

रामु अब भी आरती के पास नीचे जमीन पर बैठा हुआ आरती की चिकनी टांगों की ओर देख रहा था। इतनी गोरी है बहू रानी और कितनी मुलायम। रामु अपने को रोक ना पाया, उसने अपने हाथों को बढ़ाकर आरती के पैरों को पकड़ ही लिया और अपने हाथों से उसकी एड़ी को धीरे-धीरे दबाने लगा। और हल्के हाथों से उसकी एड़ी के ऊपर तक ले जाता, और फिर नीचे की ओर ले आता था। और जोर लगाकर एड़ी को ठीक करने की कोशिश करने लगा।

रामु एक अच्छा मालिश करने वाला था उसे पता था की मोच का इलाज कैसे होता है? वो यह भी जानता था की आरती को कहां चोट लगी है, और कहां दबाने से ठीक होगा। पर वो तो अपने हाथों में बहू रानी की सुंदर टांगों में इतना खोया हुआ था की उसे यह तक पता नहीं चला की वो क्या कर रहा था? रामू अपने आप में खोया हुआ आरती के पैरों की मालिश कर रहा था और कभी-कभी जोर लगाकर आरती की एड़ी में लगी मोच को ठीक कर रहा था।

कुछ देर में ही आरती को आराम मिल गया और वो बिल्कुल दर्द मुक्त हो गई। उसे जो शांती मिली, उसकी कोई मिशाल नहीं थी। जो दर्द उसकी जान लेने को था अब बिल्कुल गायब था।

इतने में डोर से आवाज आई--- मम्मी,“क्या हुआ मम्मी?”

आरती- सोनल बेटा, कुछ नहीं गार्डन में घूमते हुए जरा एड़ी में मोच आ गई थी।

सोनल- “अरे…मम्मी कहीं ज्यादा चोट तो नहीं आई?” तब तक सोनल भी डाइनिंग रूम में दाखिल हो गई और आरती को देखा की वो चेयर पर बैठी है और रामु काका उसकी एड़ी को धीरे-धीरे दबाकर मालिश कर रहा था।

सोनल ने आरती से कहा- “जरा देखकर चलाकरो मम्मी। काका अब कैसी है मौच मम्मी की।

रामु- बिटिया, अब बहू रानी ठीक है

कहते हुए उसने आरती के एडी को छोडते हुए धीरे से नीचे रख दिया और चला गया उसने नजर उठाकर भी आरती की और नहीं देखा

लेकिन रामु के शरीर में एक आजीब तरह की हलचल मच गई थी। आज पता नहीं उसके मन उसके काबू में नहीं था। रवि और आरती की शादी के इतने दिन बाद आज पता नहीं रामु जाने क्यों कुछ बिचालित था। बहू रानी के मोच के कारण जो भी उसने आज किया उसके मन में एक ग्लानि सी थी । क्यों उसका मन बहू के टांगों को देखकर इतना बिचलित हो गया था उसे नहीं मालूम लेकिन जब वो वापस किचेन में आया तो उसका मन कुछ भी नहीं करने को हो रहा था। उसके जेहन में बहू के एड़ी और घुटने तक के टाँगें घूम रही थी कितना गोरा रंग था बहू का। और कितना सुडोल था और कितना नरम और कोमल था उसका शरीर।

सोचते हुए वो ना जाने क्या करता जा रहा था। इतने में

सोनल की आवाज आयी।

सोनल- रामु काका जरा हल्दी और दूध ला दो मम्मी को कही दर्द ना बढ़ जाए।

रामु काका- जी। बिटिया। अभी लाया।

और रामु फिर से वास्तविकता में लाट आया। और दूध और हल्दी मिलाकर वापस डाइनिंग रूम में आया। सोनल और आरती वही बैठे हुए आपस में बातें कर रहे थे। रामु के अंदर आते ही आरती ने नजर उठाकर रामु की ओर देखा पर रामू तो नजर झुकाए हुए डाइनिंग टेबल पर दूध का ग्लास रखकर वापस किचेन की तरफ चल दिया।

आरती- रामु काका थैंक्स

रामू- जी। अरे इसमें क्या में तो इस घर का नौकर हूँ। थैंक्स क्यों बहू जी

कामया- अरे आपको क्या बताऊ कितना दर्द हो रहा था। लेकिन आप तो कमाल के हो फट से ठीक कर दिया।

और कहती हुई वो रामू की ओर बढ़ी और अपना हाथ बढ़ा कर रामु की ओर किया और आखें उसकी। रामु की ओर ही थी। रामू कुछ नहीं समझ पाया पर हाथ आगे करके आरती क्या चाहती है

आरती- अरे हाथ मिलाकर थैंक्स करते है।

और एक मदहोश करने वाली हँसी पूरे डाइनिंग रूम में गूँज उठी। सोनल भी वही बैठी हुई मुश्कुरा रही थी उनके चेहरे पर भी कोई सिकन नहीं थी की मम्मी नोकर से हाथ मिलाना चाहती थी। बड़े ही डरते हुए उसने अपना हाथ आगे किया और धीरे से आरती की हथेली को थाम लिया। आरती ने भी झट से रामु काका के हथेली को कसकर अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया और मुश्कुराते हुए जोर से हिलाने लगी और थैंक्स कहा। रामू काका जो की अब तक किसी सपने में ही था और भी गहरे सपने में उतरते हुए उसे दूर बहुत दूर से कुछ थैंक्स जैसा सुनाई दिया।

उसके हाथों में अब भी आरती की नाजुक हथेली थी जो की उसे किसी रूई की तरह लग रही थी और उसकी पतली पतली उंगलियां जो की उसके मोटे और पत्थर जैसी हथेली से रगड़ खा रही थी उसे किसी स्वप्न्लोक में ले जा रही थी रामू की नज़र आरती की हथेली से ऊपर उठी तो उसकी नजर आरती की दाई चूचि पर टिक गई जो की उसकी महीन लाइट ब्लू कलर की साड़ी के बाहर आ गई थी और डार्क ब्लू कलर के लो कट ब्लाउज से बहुत सा हिस्सा बाहर की ओर दिख रहा था आरती अब भी रामू का हाथ पकड़े हुए हँसते हुए रामु को थैंक्स कहकर सोनल की ओर देख रही थी और अपने दोनों नाजुक हथेली से रामू की हथेली को सहला रही थी।

आरती- अरे हमें तो पता ही नहीं था आप तो जादूगर निकले

रामू अपनी नजर आरती के उभारों पर ही जमाए हुए। उसकी सुंदरता को अपने अंदर उतार रहा था और अपनी ही दुनियां में सोचते हुए घूम रहा था।

तभी आरती की नजर रामू काका की नजरसे टकराई और उसकी नजर का पीछा करती हुई जब उसने देखा की रामु की नजर कहाँ है तो वो। अबाक रह गई उसके शरीर में एक अजीब सी सनसनी फेल गई वो रामू चाचा की ओर देखते हुए जब सोनल की ओर देखा तो पाया की सोनल उठकर अपने कमरे की ओर जा रही थी। आरती का हाथ अब भी रामू के हाथ में ही था। आरती रामू की हथेली की कठोरता को अपनी हथेली पर महसूस कर पा रही थी उसकी नजर जब रामू की हथेली के ऊपर उसके हाथ की ओर गई तो वो और भी सन्न रह गई मजबूत और कठोर और बहुत से सफेद और काले बालों का समूह था वो। देखते ही पता चलता था कि कितना मजबूत और शक्ति शाली है रामू का शरीर। आरती के पूरे शरीर में एक उत्तेजना की लहर दौड़ गई जो कि अब तक उसके जीवन काल में नहीं उठ पाई थी ना ही उसे इतनी उत्तेजना अपने पति के साथ कभी महसूस हुए थी और नही कभी उसके इतनी जीवन में। ना जाने क्या सोचते हुए आरती ने कहा

कहाँ खो गये काका। और धीरे से अपना हाथ रामू के हाथ से अलग कर लिया।

रामु जैसे नींद से जागा था झट से आरती का हाथ छोड़ कर नीचे चेहरा करते हुए।

रामू- अरे बहू रानी हम तो सेवक है। आपके हुकुम पर कुछ भी कर सकते है इस घर का नमक खाया है।

और सिर नीचे झुकाए हुए तेज गति से किचेन की ओर मुड़ गया मुड़ते हुए उसने एक बार फिर अपनी नजर आरती के उभारों पर डाली और मुड़कर चला गया। आरती रामु को जाते हुए देखती रही ना जाने क्यों। वो चाह कर भी रामू की नजर को भूल नहीं पा रही थी। उसकी नजर में जो भूख आरती ने देखी थी। वो आज तक आरती ने किसी पुरुष के नजर में नहीं देखी थी। ना ही वो भूख उसने कभी अपने पति की ही नज़रों में देखी थी। जाने क्यों आरती के शरीर में एक सनसनी सी फेल गई। उसके पूरे शरीर में सिहरन सी रेंगने लगी थी। उसके शरीर में अजीब सी ऐंठन सी होने लगी थी। अपने आपको भूलने के लिए।

उसने अपने सिर को एक झटका दिया और

मुड़कर वापिश हकीकत में लौट आयी जहाँ रामू काका सोनल का नास्ता लगा रहे थे लेकिन आरती शून्य की ओर एकटक देखती रही। रामु काका फिर से उसके जेहन पर छा गये थे। वो अब भी वही अपनी पुरानी धोती और एक फाटूआ पहने हुए थे। (फाटूआ एक हाफ बनियान की तरह होता है। जो कि पुराने लोग पहना करते थे)

वो खड़े-खड़े रामु काका के बाजू को ध्यान से देख रही थी। कितने बाल थे। उनके हाथों में। किसी भालू की तरह। और कितने काले भी। भद्दे से दिखते थे। पर खाना बहुत अच्छा बनाते थे। इतने में आरती के आने की आहट सुनकर रामु जल्दी से किचेन की ओर भागा और जाते जाते। सीडियो की तरफ भी देखता गया सीढ़ी पर कोने में आरती खड़ी थी। नजर पड़ी और चला गया उसकी नजर में ऐसा लगा कि उसे किसी का इंतजार था। शायद आरती का। आरती के दिमाग़ में यह बात आते ही वो सनसना गई। पति की आधी छोड़ी हुई उत्तेजना उसके अंदर फिर से जाग उठी। वो वहीं खड़ी हुई रामु काका को किचेन में जाते हुए। देखती रही। आरती के पीछे-पीछे सोनल भी डाइनिंग रूम में आ गई थी।

आरती ने भी अपने को संभाला और। एक लंबी सी सांस छोड़ने के बाद वो भी जल्दी से नीचे की ओर चल पड़ी। सोनल टेबल पर बैठ गयी थी। आरती जाकर सोनल को खाना लगाने लगी। और इधर-उधर की बातें करते हुए सोनल खाना खाने लगी। आरती अब भी खड़ी हुई। सोनल के प्लेट का ध्यान रख रही थी। सोनल खाना खाने में मस्त थीं। और आरती खिलाने में। खड़े-खड़े सोनल को कुछ देने के लिए। जब उसने थोड़ी सी नजर घुमाई तो उसे। किचेन का दरवाजा हल्के से नजर आया। तो रामू काका के पैरों पर नजर पड़ी। तो इसका मतलब रामू काका किचेन से छुप कर आरती को पीछे से देख रहे है।

आरती अचानक ही सचेत हो गई। खुद तो टेबल पर सोनल को खाना परोस रही थी। पर दिमाग और पूरा शरीर कही और था। उसके शरीर में चीटियाँ सी दौड़ रही थी। पता नहीं क्यों। पूरे शरीर सनसनी सी दौड़ गई थी आरती के। उसके मन में जाने क्यों। एक अजीब सी हलचल सी मच रही थी। टाँगें। अपनी जगह पर नहीं टिक रही थी। ना चाहते हुए भी वो बार-बारइधर-उधर हो रही थी। एक जगह खड़े होना उसके लिए दुश्वार हो गया था। अपनी चुन्नी को ठीक करते समय भी उसका ध्यान इस बात पर था कि रामू काका पीछे से उसे देख रहे है। या नहीं। पता नहीं क्यों। उसे इस तरह का। काका का छुप कर देखना। अच्छा लग रहा था। उसके मन को पुलकित कर रहा था। उसके शरीर में एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी।

आरती का ध्यान अब पूरी तरह से। अपने पीछे खड़े काका पर था। नजर सामने पर ध्यान पीछे था। उसने अपनी चुन्नी को पीछे से हटाकर दोनों हाथों से पकड़ कर अपने सामने की ओर हाथों पर लपेट लिया और खड़ी होकर। सोनल को खाते हुए देखती रही। पीछे से चुन्नी हटने की वजह से। उसकी पीठ और कमर और नीचे नितंब बिल्कुल साफ-साफ शेप को उभार देते हुए दिख रहे थे। आरती जानती थी कि वो क्या कर रही है। (एक कहावत है। कि औरत को अपनी सुंदरता को दिखाना आता है। कैसे और कहाँ यह उसपर डिपेंड करता है।)। वो जानती थी कि काका अब उसके शरीर को पीछे से अच्छे से देख सकते है। वो जान बूझ कर थोड़ा सा झुक कर सोनल को खाने को देती थी। और थोड़ा सा मटकती हुई वापस खड़ी हो जाया करती थी। उसके पैर अब भी एक जगह नहीं टिक रहे थे।

इतने में सोनल का खाना हो गया तो

सोनल- अरे । मम्मी आप भी खा लो। कब तक खड़ी रहोगी। चलो बैठ जाओ।

आरती- नही सोनल अभी भूख नही है मैं थोड़ी देर से खा लूँगी।

सोनल--ठीक है मम्मी,

और बीच में ही बात अधूरी छोड़ कर सोनल भी खाने के टेबल से उठ गई और वाश बेसिन में हाथ दो कर। मूडी तब तक आरती उसका बेग तैयार करके उसके रूम से ले आयी। और सोनल को लेकर बाहर तक छोड़ने आयी।

सोनल स्कूल बस से स्कूल जाती थी।

आरती रवि और सोनल के साथ नास्ता कर लेती थी पर आज उसने जान बूझ कर अपने को रोक लिया था। वो देखना चाहती थी। कि जो वो सोच रही थी। क्या वो वाकई सच है या फिर सिर्फ़ उसकी कल्पना मात्र था। वो अंदर आते ही दौड़ कर अपने कमरे की ओर चली गई।

रामु जब तक डाइनिंग रूम में आता तब तक आरती अपने कमरे में जा चुकी थी। रामु खड़ा-खड़ा सोचने लगा कि क्या बात है आज बहू ने साहब के साथ क्यों नहीं खाया। और टेबल से झूठे प्लेट और ग्लास उठाने लगा। पर भीतर जो कुछ चल रहा था। वो सिर्फ रामू ही जानता था। उसकी नजर बार-बार सीढ़ियो की ओर चली जाती थी। कि शायद बहू उतर रही है। पर। जब तक वो रूम में रहा तब तक आरती नहीं उतरी

रामू सोच रहा था कि जल्दी से आरती खाना खा ले। तो वो आगे का काम निबटाए और क्वाटर में जाकर मोनिका के कुछ मस्ती कर पाए पर पता नहीं आरती को क्या हो गया था। लेकिन वो तो सिर्फ़ एक नौकर था। उसे तो मालिको का ध्यान ही रखना है। चाहे जो भी हो। यह तो उसका काम है। सोचकर। वो प्लेट और ग्लास धोने लगा। रामू अपने काम में मगन था कि किचेन में अचानक ही बहुत ही तेज सी खुशबू फेल गई थी। उसने पलटकर देखा आरती खड़ी थी किचेन के दरवाजे पर।

रामु आरती को देखता रह गया। जो चूड़ीदार वो पहेने हुए थी वो चेंज कर आई थी। एक महीन सी लाइट ईलोव कलर की साड़ी पहने हुए थी और साथ में वैसा ही स्लीव्ले ब्लाउस। एक पतली सी लाइन सी दिख रही थी। साड़ी जिसने उसकी चूचियां के उपर से उसके ब्लाउज को ढाका हुआ था। बाल खुले हुए थे। और होंठों पर गहरे रंग का लिपस्टिक्स था। और आखों में और होंठों में एक मादक मुस्कान लिए आरती किचेन के दरवाजे पर। एक रति की तरह खड़ी थी।

रामू सबकुछ भूलकर सिर्फ़ आरती के रूप का रसपान कर रहा था उसने आज तक आरती को इतने पास से या फिर इतने गौर से कभी नहीं देखा था किसी अप्सरा जैसा बदन था उसका उतनी ही गोरी और सुडोल क्या फिगर है और कितनी सुंदर जैसे हाथ लगाओ तो काली पड़ जाए वो अपनी सोच में डूबा था कि उसे आरती की खिलखिलाती हुई हँसी सुनाई दी

आरती- अरे भीमा रामू काका खाना लगा दो भूख लगी है और नल बंद करो सब पानी बह जाएगा और हँसती हुई पलटकर डाइनिंग रूम की ओर चल दी। रामू आरती को जाते हुए देखता रहा पता नहीं क्यों आज उसके मन में कोई डर नहीं था कि कल जो आरती ने देखा था उसके बाद उसका क्या होना था। लेकिन आज आरती के व्यव्हार को देख कर रामु को कुछ कुछ समझ आ रहा था। जो इज़्ज़त वो इस घर के लोगों को देता था वो कहाँ गायब हो गई थी उसके मन से पता नहीं वो कभी भी घर के लोगों की तरफ देखना तो दूर आखें मिलाकर भी बात नहीं करता था पर जाने क्यों वो आज बिंदास आरती को सीधे देख भी रहा था और उसकी मादकता का रसपान भी कर रहा था जाते हुए आरती की पीठ थी रामू की ओर जो कि लगभग आधे से ज्यादा खुली हुई थी शायद सिर्फ़ ब्रा के लाइन में ही थी या शायद ब्रा ही नहीं पहना होगा पता नहीं लेकिन महीन सी ब्लाउज के अंदर से उसका रंग साफ दिख रहा था गोरा और चमकीला सा और नाजुक और गदराया सा बदन वैसे ही हिलते हुए नितंब जो कि एक दूसरे से रगड़ खा रही थी और साड़ी को अपने साथ ही आगे पीछे की ओर ले जा रही थी

रामु खड़ा-खड़ा आरती को किचेन के दरवाजे पर से ओझल होते देखता रहा और किसी बुत की तरह खड़ा हुआ प्लेट हाथ में लिए शून्य की ओर देख रहा था तभी उसे आरती की आवाज़ सुनाई दी

आरती- काका खाना तो लगा दो

रामू झट से प्लेट सिंक पर छोड़ नल बंद कर लगभग दौड़ते हुए डाइनिंग रूम में पहुँच गया जैसे कि देर हो गई तो शायद आरती उसके नजर से फिर से दूर ना हो जाए वो आरती को और भी देखना चाहता था मन भरकर उसके नाजुक बदन को उसके खुशबू को वो अपनी सांसों में बसा लेना चाहता था झट से वो डाइनिंग रूम में पहुँच गया

रामु- जी बहू अभी देता हूँ

और कहते हुए वो आरती को प्लेट लगाने लगा आरती का पूरा ध्यान टेबल पर था वो रामु के हाथों की ओर देख रही थी बालों से भरा हुआ मजबूत और कठोर हाथ प्लेट लगाते हुए उसके मांसपेशियों में हल्का सा खिचाव भी हो रहा था उससे उसकी ताकत का अंदाज़ा लगाया जा सकता था आरती के जेहन में कल की बात घूम गई जब रामू काका मोनिका के बूब्स दबा रहै थे और जब उसके पैरों की मालिश की थी कितने मजबूत और कठोर हाथ थे और रामु जो कि आरती से थोड़ा सा दूर खड़ा था प्लेट और कटोरी, चम्मच को आगे कर फिर खड़ा हो गया हाथ बाँध कर पर आरती कहाँ मानने वाली थी आज कुछ प्लॅनिंग थी उसके मन में शायद

आरती- अरे काका परोश दीजीएना प्लीज और बड़ी इठलाती हुई दोनों हाथो को टेबल पर रखकर बड़ी ही अदा से रामू की ओर देखा रामू जो कि बस इंतजार में ही था कि आगे क्या करे तुरंत आर्डर मिलते ही खुश हो गया वो थोड़ा सा आगे बढ़ कर आरती के करीब खड़ा हो गया और सब्जी और फिर पराठा और फिर सलाद और फिर दाल और चपाती पर उसकी आँखे आरती पर थी उसकी बातों पर थी उसके शरीर पर से उठ रही खुशबू पर थी नजरें ऊपर से उसके उभारों पर थी जो की लगभग आधे बाहर थे ब्लाउज से

सफेद गोल गोल से मखमल जैसे या फिर रूई के गोले से ब्लाउज का कपड़ा भी इतना महीन था कि अंदर से ब्रा की लाइनिंग भी दिख रही थी रामू अपने में ही खोया आरती के नजदीक खड़ा खड़ा यह सब देख रहा था और आरती बैठी हुई कुछ कहते हुए अपना खाना खा रही थी आरती को भी पता था कि काका की नजर कहाँ है पर वो तो चाहती भी यही थी उसके शरीर में उत्तेजना की जो ल़हेर उठ रही थी वो आज तक शादी के बाद रवि के साथ नहीं उठी थी वो अपने को किसी तरह से रोके हुए बस मजे ले रही थी वो जानती थी कि वो खूबसूरत है पर वो जो सेक्सी दिखती है यह वो साबित करना चाहती थी शायद अपने को ही

पर क्यों क्या मिलेगा उसे यह सब करके पर फिर भी वो अपने को रोक नहीं पाई थी जब से उसे रामू काका और मोनिका की चुदाई की नजर लगी थी वो काम अग्नि में जल उठी थी तभी तो कल रात को रवि के साथ एक वाइल्ड सेक्स का मजा लिया था पर वो मजा नहीं आया था पर हाँ… रवि उतेजित तो था रोज से ज्यादा पर उसने कहा नहीं आरति को कि वो सेक्सी थी आरती तो चाहती थी कि रवी उसे देखकर रह ना पाए और उसे पर टूट पड़े उसे निचोड़ कर रख दे बड़ी ही बेदर्दी से उसे प्यार करे वो तो पूरा साथ देने को तैयार थी पर रवि ऐसा क्यों नहीं करता वो तो उसकी पत्नी थी वो तो कुछ भी कर सकता है उसके साथ पर क्यों वो हमेशा एग्ज़िक्युटिव स्टाइल में रहता है क्यों नहीं सेक्स के समय भूखा दरिन्दा बन जाता क्यों नहीं है उसमें इतनी समझ उसके देखने का तरीका भी वैसा नहीं है कि वो खुद ही उसके पास भागी चली जाए बस जब देखो तब बस पति ही बने रहते है कभी-कभी प्रेमी भी तो बन सकता है वो .

लेकिन रामू काका की नज़रों में उसे वो भूख दिखी जो कि उसे अपने पति में चाहिए थी रामू काका की लालायत नज़रों ने आरती के अंदर एक ऐसी आग भड़का दी थी कि आरती एक शुशील और पढ़ी लिखी बड़े घर की बहू आज डाइनिंग टेबल पर अपने ही नौकर को लुभाने की चाले चल रही थी आरती जानती थी कि रामू काका की नजर कहाँ है और वो आज क्यों इस तरह से खुलकर उसकी ओर देख और बोल पा रहे है वो रामू काका को और भी उकसाने के मूड में थी वो चाहती थी कि काका अपना आपा खो दे और उस पर टूट पड़े इसलिए वो हर वो कदम उठा लेना चाहती थी वो

जान बूझ कर अपनी साड़ी का पल्लू और भी ढीला कर दिया ताकि रामु को ऊपर से उसकी गोलाइयो का पूरा लुफ्त ले सके और उनके अंदर उठने वाली आग को वो आज भड़काना चाहती थी

आरती के इस तरह से बैठे रहने से, रामू ना कुछ कह पा रहा था और नहीं कुछ सोच पा रहा था वो तो बस मूक दर्शक बनकर आरती के शरीर को देख रहा था ओर अपने बूढ़े हुए शरीर में उठ रही उत्तेजना के लहर को छुपाने की कोशिश कर रहा था वो चाह कर भी अपनी नजर आरती की चुचियों पर से नहीं हटा पा रहा था और ना ही उसके शरीर पर से उठ रही खुशबू से दूर जा पा रहा था वो किसी स्टॅच्यू की तरह खड़ा हुआ अपने हाथ टेबल पर रखे हुए थोड़ा सा आगे की ओर झुका हुआ

आरती की ओर एकटक टकटकी लगाए हुए देख रहा था और अपने गले के नीचे थूक को निगलता जा रहा था उसका गला सुख रहा था उसने इस जनम में भी कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि उसके आरती जैसी औरत, एक बड़े घर की बहू इस तरह से अपना यौवन देखने की छूट देगी और वो इस तरह से उसके पास खड़ा हुआ इस यौवन का लुफ्त उठा सकता था देखना तो दूर आज तक उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था नजर उठाकर देखना तो दूर नजर जमीन से ऊपर तक नहीं उठी थी उसने कभी और आज तो जैसे जन्नत के सफर में था वो एक अप्सरा उसके सामने बैठी थी वो उसके आधे खुले हुए चूचों को मन भर के देख रहा था

रामु उसकी खुशबू सूंघ सकता था और शायद हाथ भी लगा सकता था पर हिम्मत नहीं हो रही थी तभी आरती की आवाज उसके कानों में टकराई

आरती- अरे काका क्या कर रहे हो परांठा खतम हो गया

रामू- जी जी यह लो।

और जब तक वो हाथ बढ़ा कर परान्ठा आरती की प्लेट में रखता तब तक आरती का हाथ भी उसके हाथों से टकराया और आरती उसके हाथों से अपना परान्ठा लेकर खाने लगी उसका पल्लू अब थोड़ा और भी खुल गया था उसके ब्लाउज में छुपे हुए चुचे उसको पूरी तरह से दिख रहे थे नीचे तक उसके पेट और जहां से साड़ी बाँधी थी वहां तक रामू काका की उत्तेजना में यह हालत थी कि अगर घर में जया नहीं होती तो शायद आज वो आरती का रेप ही कर देता पर नौकर था इसलिए चुपचाप प्रसाद में जो कुछ मिल रहा था उसी में खुश हो रहा था।
 
वो चुपचाप आरति को निहार रहा था आरती कुछ कहती हुई खाना भी खा रही थी पर उसका ध्यान आरती की बातों पर बिल्कुल नहीं था

हाँ ध्यान था तो बस उसके ब्लाउज पर और उसके अंदर से दिख रहे चिकने और गुलाबी रंग के शरीर का वो हिस्सा जहां वो शायद कभी भी ना पहुँच सके वो खड़ा-खड़ा बस सोच ही सकता था और उसे बस वो इस अप्सरा की खुशबू को अपने जेहन में समेट सकता था इसी तरह कब समय खतम हो गया पता भी नहीं चला पता चला तब जब आरती ने उठते हुए कहा

आरती- बस हो गया काका

रामु- जी जी

और अपनी नजर फिर से नीचे की और झुक कर हाथ बाँधे खड़ा हो गया आरती उठी और वाशबेसिन पर गई और झुक कर हाथ मुँह धोने लगी झुकने से उसके शरीर में बँधी साड़ी उसके नितंबों पर कस गया जिससे कि उसकी नितंबों का शेप और भी सुडोल और उभरा हुआ दिखने लगा रामु पीछे खड़ा हुआ मंत्र मुग्ध सा आरती को देखता रहा और सिर्फ़ देखता रहा आरती हाथ धो कर पलटी तब भी रामु वैसे ही खड़ा था उसकी आखें पथरा गई थी मुख सुख गया था और हाथ पाँव जमीन में धस्स गये थे पर सांसें चल रही थी या नहीं पता नहीं पर वो खड़ा था आरती की ओर देखता हुआ आरती जब पलटी तो उसकी साड़ी उसके ब्लाउज के ऊपर नहीं थी कंधे पर शायद पिन के कारण टिकी हुई थी और कमर पर से जहां से मुड़कर कंधे तक आई थी वहाँ पर ठीक ठाक थी पर जहां ढकना था वहां से गायब थी और उसका पूरा यौवन या फिर कहिए चूचियां जो कि किसी पहाड़ के चोटी की तरह सामने की ओर उठे हुए रामु काका की ओर देख रही थी रामु अपनी नजर को झुका नहीं पाया वो बस खड़ा हुआ आरती की ओर देखता ही रहा और बस देखता ही जा रहा था आरती ने भी रामू की ओर जरा सा देखा और मुड़कर सीढ़ी की ओर चल दी अपने कमरे की ओर जाने के लिए उसने भी अपनी साड़ी को ठीक नहीं किया था क्यों रामू सोचने लगा शायद ध्यान नहीं होगा या फिर नींद आ रही होगी या फिर बड़े लोग है सोच भी नहीं सकते कि नौकर लोग की इतनी हिम्मत तो हो ही नहीं सकती या फिर कुछ और आज आरती को हुआ क्या है या फिर मुझे ही कुछ हो गया है

पीछे से आरती का मटकता हुआ शरीर किसी साप की तरह बलखाती हुई चाल की तरह से लग रहा था जैसे-जैसे वो एक-एक कदम आगे की ओर बढ़ाती थी उसका दिल मुँह पर आ जाता वो आज खुलकर आरती के हुश्न का लुफ्त लेरहा था उसको रोकने वाला कोई नहीं था घर पर जया बाहर कपड़े धो रही थी और मोनिका क्वाटर में थी। आरती अपने कमरे की ओर जा रही थी और चली गई सब शून्य हो गया खाली हो गया कुछ भी नहीं था सिवाए रामू के जो कि डाइनिंग टेबल के पास कुछ झुटे प्लेट के पास सीढ़ी की ओर देखता हुआ मंत्र मुग्ध सा खड़ा था सांसें भी चल रही थी कि नहीं पता नहीं रामू की नजर शून्य से उठकर वापस डाइनिंग टेबल पर आई तो कुछ झुटे प्लेट ग्लास पर आके अटक गई आरती की जगह खाली थी पर उसकी खुशबू अब भी डाइनिंग रूम में फेली हुई थी

पता नहीं या फिर सिर्फ़ रामु के जेहन में थी रामू शांत और थका हुआ सा अपने काम में लग गया धीरे-धीरे उसने प्लेट और झुटे बर्तन उठाए और किचेन की ओर मुड़ गया पर अपनी नजर को सीढ़ियो की ओर जाने से नहीं रोक पाया था शायद फिर से आरती दिख जाए पर वहाँ तो बस खाली था कुछ भी नहीं था सिर्फ़ सन्नाटा था मन मारकर रामु किचेन में चला गया

ओर उधर आरती भी जब अपने कमरे में पहुँची तो पहले अपने आपको उसने मिरर में देखा साड़ी तो क्या बस नाम मात्र की साड़ी पहने थी वो पूरा पल्लू ढीला था और उसकी चुचियों से हटा हुआ था दोनों चूचियां बिल्कुल साफ-साफ ब्लाउज में से दिख रहा था क्लीवेज तो और भी साफ था आधे खुले गले से उसके चूचियां लगभग पूरी ही दिख रही थी वो नहीं जानती थी कि उसके इस तरह से बैठने से रामु काका पर क्या असर हुआ था पर हाँ… कल के बाद से वो बस अंदाज़ा ही लगा सकती थी कि आज काका ने उसे जी भरकर देखा होगा वो तो अपनी नजर उठाकर नहीं देख पाई थी पर हाँ… देखा तो होगा और यह सोचते ही आरती एक बार फिर गरम होने लगी थी उसकी जाँघो के बीच में हलचल मच गई थी निपल्स कड़े होने लगे थे वो दौड़ कर बाथरूम में घुस गई और अपने को किसी तरह से शांत करके बाहर आई

आरती धम्म से बिस्तर पर अपनी साड़ी उतारकर लेट गई सोचते हुए पता नहीं कब वो सो गई शाम को फिर से वही पति का इंतजार।
 
लेटने के बाद आरती को मालूम ही नही चला कि कब तक सोती रही। आज उसको ऐसी नींद आयी कि जैसे किसी ने क्लोरोफॉर्म सूंघा दिया हो, उसकी नींद तब टूटी जब नीचे से सोनल की आवाज आई-----मम्मीजी, कब तक सोएगी उठो भी शाम हो गयी है, पापा का फ़ोन आया था कि शाम को आने में लेट हो जाएंगे

आरती--- अरे बेटा आज थोड़ा तबियत खराब तो लेट गयी तो आंख लग गयी और पता ही नही चला समय का। कब आया तुमारे पापा का फ़ोन।

सोनल--- अभी आया था, अब आ जाईये चाय पीते है।

आरती--- हां आती हु चलो तुम।

आरती मन में--धत्त तेरी की सब मजा ही किरकिरा कर दिया एक तो पूरे दिन इंतजार करो फिर शाम को पता चलता है कि देर से आएँगे कहाँ गये है वो झट से सेल उठाया ओर रवि को रिंग कर दिया

रवि- हेलो

आरती- क्या जी लेट आओगे

रवि- हाँ यार कुछ काम है थोड़ा लेट हो आउन्गा खाना खाकर आउन्गा तुम खा लेना ठीक है

आरती- तुम क्या हो आज ही कहा था कि जल्दी आना कही चलेंगे और आज ही आपको काम निकल आया

आरती का गुस्सा सातवे आसमान में था

रवि- अरे यार बाहर का कुछ अर्जेंट काम है तुम घर में आराम करो में आता हूँ

आरती- और क्या करती हूँ में घर में कुछ काम तो है नहीं पूरा दिन आराम ही तो करती हूँ और आप है कि बस

रवि- अरे यार माफ कर दो आज के बाद ऐसा नहीं होगा प्लीज यार अगर जरूरी नहीं होता तो क्या तुम जैसी बीवी को छोड़ कर काम में लगा रहता प्लीज यार समझा करो

आरती- ठीक है जो मन में आए करो

और झट से फोन काट दिया और गुस्से में पैर पटकती हुई नीचे डाइनिंग टेबल पर पहुँची सोनल टेबल पर आ गई थी और चाय पी रही थी।

आरती भी बैठ गयी और चाय पीते हुए अपनी सोच में गुम हो गयी।

और उसे ध्यान आया कि रवि उससे कार चलाना सीखने के लिए कह रहा था। आरति ने भी सोचा ठीक ही तो है घर में पड़ी पड़ी रवि का इंतजार ही तो करती है शाम को अगर गाड़ी चलाने चली जाएगी तो टाइम भी पास हो जाएगा ओर जब वो लौटेगी तब तक रवि भी आ जाएगा थोड़ा चेंज भी हो जाएगा और गाड़ी भी चलाना सीख जाएगी । आज ही रवि से बात करेगी कि कल से मनोज अंकल को बोल से कार चलानी सिखाने के लिए।

तो आरती ने फाइनल कर लिया कि कल से ही शाम को मनोज अंकल आएँगे और आरती गाड़ी चलाने को जाएगी

थोड़ी देर में चाय खत्म हो गयी सोनल ने रामू काका को आवाज लगा दी

सोनल- रामू काका कप प्लेट उठा लो चाय हो गयी।

रामू- जी बिटिया जी

और लगभग भागता हुआ सा डाइनिंग रूम में आया और नीचे गर्दन कर चुपचाप झूठे बर्तन उठाने लगा

और झूठे प्लेट लेके अंदर चला गया जाते हुए चोर नजर से एक बार आरती को जरूर देखा उसने जो कि आरती की नजर पर पड़ गई थोड़ा सा मुश्कुरा कर आरती और सोनल ड्राइंग रूम में आ गई थोड़ी देर दोनो ने टीवी देखा और रवि का इंतजार करते रहे पर रवि नहीं आया

सोनल- मम्मी, पापा को क्या देर होगी आने में

आरती- हाँ शायद खाना खाके ही आएगा बाहर से कुछ लोग आए है गारमेंट्स मार्चंट्स है एक्सपोर्ट का आर्डर है थोड़ा बहुत टाइम लगेगा

फिर दोनो चुपचाप tv देखने लगे, एक्सपोर्ट ओरडर हो या इम्पोर्ट आर्डर हो आरति को क्या उसका तो बस एक ही इंतजार था रवि जल्दी आ जाए

पर कहाँ रवि तो काम खतम किएबगैर कुछ नहीं सोच सकता था रात करीब 10 30 बजे तक दोनो ने इंतजार किया और फिर दोनो अपने कमरे में चले गये सीढ़िया चढ़ते समय आरती ने रामू काका को आवाज दी, रामु काका साहब आज लेट ही आएगे सोना मत दरवाजा खोल देना ठीक है

रामू- जी बहु जी आप बेफिकर रहिए

और नीचे बिल्कुल सुनसान हो गया।

आरती ने भी कमरे में आते ही कपड़े चेंज किए और झट से बिस्तर पर ढेर हो गई गुस्सा तो उसे था ही और चिढ़ के मारे कब सो गई पता नहीं सुबह जब आखें खुली तो रवि उठ चुका था आरती वैसे ही पड़ी रही बाथरूम से निकलने के बाद रवि आरती की ओर बढ़ा और आरती को कंधे से हिलाकर

रवि- मेडम उठिए 8 बज गये है

पर आरती के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई रवि जानता था आरती अब भी गुस्से में है वो थोड़ा सा झुका और आरती के गालों को किस करते हुए

रवि- सारी बाबा क्या करता काम था ना

आरती- तो जाइए काम ही कीजिए हम ऐसे ही ठीक है

रवि--- अरे सोचो तो जरा यह आर्डर कितना बड़ा है हमेशा एक्सपोर्ट करते रहो ग्राहकों का झंझट ही नहीं एक बार जम जाए तो बस फिर तो आराम ही आराम फिर तुम मर्सिडेज में घूमना

आरती- हाँ… मेर्सिडेज में वो भी अकेले अकेले है ना तुम तो बस नोट कमाने में रहो

रवि- अरे यार में भी तो तुम्हारे साथ रहूँगा ना चलो यार अब उठो सोनल इंतजार करती होगी जल्दी उठो

और आरती को प्यार से सहलाते हुए उठकर खड़ा हो गया आरती भी मन मारकर उठी और मुँह धोने के बाद नीचे सोनल के पास पहुँच गये, फिर तीनोनों चाय की चुस्की ले रहे थे

तीनो अब आरती के ड्राइविंग सीखने की और जाने की बात करते रहे और चाय खतम कर सभी अपने कमरे की ओर रवाना हो गये आगे के रुटीन की ओर कमरे में पहुँचते ही रवि दौड़ कर बाथरूम में घुस गया और आरती रवि के कपड़े वारड्रोब से निकालने लगी

कपड़े निकालते समय उसे गर्दन में थोड़ी सी पेन हुई पर ठीक हो गया अपना काम करके आरती रवि का बाथरूम से निकलने का इंतजार करने लगी रवि हमेशा की तरह वही अपने टाइम से निकला एकदम साहब बनके, बाहर आते ही जल्दी से कपड़े पहनने की जल्दी और फिर जूता मोज़ा पहन कर तैयार 9 बजे तक फुल्ली तैयार आरती बिस्तर पर बैठी बैठी रवि को तैयार होते देखती रही और अपने हाथ से अपनी गर्दन को मसाज भी करती रही

रवि के तैयार होने के बाद वो नीचे चले गये और रवि तो बस हबड ताबड़ कर खाया जल्दी से खाना खा के बाहर का रास्ता करीब 9:30 तक रवि हमेशा ही दुकान की ओर चल देता था सोनल तो करीब 9: 45 तक निकलती थी आरती भी रवि के चले जाने के बाद अपने कमरे की ओर चल दी टेबल पर रामू काका झूठे प्लेट उठा रहे थे एक नजर उनपर डाली और अपने कमरे की ओर जाते जाते उसे लगा कि रामू काका की नज़रें उसका पीछा कर रही है सीढ़ी के आखिरी मोड़ पर वो पलटी

हाँ काका की नज़रें उसपर ही थी पलटते ही काका अपने को फिर से काम में लगा लिए और जल्दी से किचेन की ओर मुड़ गये

आरती के शरीर में एक झुरझुरी सी फेल गई और कमरे तक आते आते पता नहीं क्यों वो बहुत ही कामुक हो गई थी एक तो पति है कि काम से फुर्सत नहीं सेक्स तो दूर की बात देखने और सुनने की भी फुर्सत नहीं है आज कल तो आरती कमरे में पहुँचकर बिस्तर पर चित्त लेट गई सीलिंग की ओर देखते हुए पता नहीं क्या सोचने लगी थी पता नहीं पर मरी हुई सी बहुत देर लेटी रही तभी घड़ी ने 11 बजे का बीप किया आरती झट से उठी और बाथरूम की ओर चली बाथरूम में भी आरती बहुत देर तक खड़ी-खड़ी सोचती रही कपड़े उतारते वक़्त उसके कंधे पर फिर से थोड़ी सी अकड़न हुई अपने हाथों से कंधे को सहलाते हुए वो मिरर में देखकर थोड़ा सा मुश्कुराई और फिर ना जाने कहाँ से उसके शरीर में जान आ गई जल्दी-जल्दी फटाफट सारे काम चुटकी में निपटा लिए और नीचे डाइनिंग टेबल पर आ गयी। आरती खाने की प्लेट लगाने लगी और खाने पीने का दौर शुरू हो गया और आरती के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। किचेन में रामू काका के काम करने की आवाजें भी आ रही थी पर दिखाई कुछ नहीं दे रहा था आरती का ध्यान उस तरफ ज्यादा था क्या रामु काका उसे देख रहे है या फिर अपने काम में ही लगे हुए है आज उसने इस समय सूट ही पहना था रोज की तरह ही था लेकिन टाइट फिटिंग वाला ही उसका शरीर खिल रहा था उस सूट में वो यह जानती थी तो क्या रामु काका ने उसे देख लिया है या फिर देख रहे है पता नहीं खाना खाते समय उसके दिमाग में कितनी बातें उठ रही थी हाँ… और ना के बीच में आके खतम हो जाती थी कभी-कभी वो पलटकर या फिर तिरछी नजर से पीछे की और देख भी लेती थी पर रामू काका को वो नहीं देख पाई थी अब तक

इसी तरह उसका खाना भी खतम हो गया

आरती ने रामू काका को बर्तन उठाने के लिए आवाज दी।

आरती ड्राइंग रूम के दरवाजे पर पहुँच गई पीछे रामू डाइनिंग टेबल से प्लेट उठा रहा था और सामने ड्राइंग रूम के दरवाजे के पास आरती खड़ी थी उसकी ओर पीठ करके वो प्लेट उठाते हुए पीछे से उसे देख रहा था सबकी नजर बचा कर तभी अचानक आरती पलटी और रामू और आरती की नज़रें एक हुई रामू सकपका गया और झट से नज़रें नीचे करके जल्दी से झुटे प्लेट लिए किचेन में घुस गया

आरती ने जैसे ही रामू को अपनी ओर देखते हुए देख

आरती किचेन की ओर चली और दरवाजे पर रुकी

आरती- काका एक मदद चाहिए

रामु- जी बहू कहिए आप तो हुकुम कीजिए

और अपनी नजर झुका कर हाथ बाँध कर सामने खड़ा ही गया सामने आरती खड़ी थी पर वो नजर उठाकर नहीं देख पा रहा था उसकी साँसे बहुत तेज चल रही थी सांसो में आरती के सेंट की खुशबू बस रही थी वो मदहोश सा होने लगा था

आरती- वो असल में अआ आप बुरा तो नहीं मानेंगे ना

रामू का कोई जबाब ना पाकर

आरती- वो असल में कल ना सोने के समय थोड़ा सा गर्दन में मोच आ गई थी में चाहती थी कि अगर आप थोड़ा सा मालिश कर दे

रामु- ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्जििइईईईई

आरती भी रामू के जबाब से कुछ सकपकाई पर तीर तो छूट चुका था

आरती- नहीं नहीं, अगर कोई दिक्कत है तो कोई बात नहीं असल में उस दिन जब आपने मेरे पैरों मोच ठीक किया था ना इसलिए मैंने कहा और आज से तो गाड़ी भी चलाने जाना है ना इसलिए सोचा आपको बोलकर देखूँ

रामू काका की तो जान ही अटक गई थी गले में मुँह सुख गया था नज़रों के सामने अंधेरा छा गया था उसके गले से कोई भी आवाज नहीं निकली वो वैसे ही खड़ा रहा और कुछ बोल भी नही पाया

आरती- आप अपना काम खतम कर लीजिए फिर कर देना ठीक है में उसके बाद खाना खा लूँगी

रामु- जी

आरती- चलिए में आपको बुला लूँगी कितना टाइम लगेगा आपको

रामु- जी 2 घण्टे

आरती- फ्री होकर बता देना में रूम में ही हूँ

और कहकर आरती अपने रूम की ओर पलटकर चली गई

रामू किचेन में ही खड़ा था किसी भूत की तरह सांसें ऊपर की ऊपर नीचे की नीचे दिमाग सुन्न आखें पथरा गई थी हाथ पाँव में जैसे जान ही ना हो खड़ा-खड़ा आरती को जाते हुए देखता रहा पीछे से उसकी कमर बलखाती हुई और नितंबों के ऊपर से उसकी चुन्नी इधर-उधर हो रही थी

सीढ़ी से चढ़ते हुए उसके शरीर में एक अजीब सी लचक थी फिगर जो कीदिख रहा था कितना कोमल था वो सपने में आरती को जैसे देखता था वो आज उसी तरह बलखाती हुई सीढ़ीओ से चढ़कर अपने रूम की ओर मुड़ गई थी रामू वैसे ही थोड़ी देर खड़ा रहा सोचता रहा कि आगे वो क्या करे

आज तक कभी भी उसने यह नहीं सोचा था कि वो कभी भी इस घर की बहू को हाथ भी नही लगा सकता था मालिश तो दूर की बात और वो भी कंधे का मतलब वो आज आरती का शरीर को कंधे से छू सकेगा आआअह्ह उसके पूरे शरीर में एक अजीब सी हलचल मच गई थी बूढ़े शरीर में उत्तेजना की लहर फेल गई उसके सोते हुए अंगो में आग सी भर गई कितनी सुंदर है आरती, कही कोई गलती हो गई तो

पूरे जीवन काल की बनी बनाई निष्ठा और नमक हलाली धरी रह जाएगी पर मन का क्या करे वो तो चाहता था कि वो आरती के पास जाए भाड़ में जाए सबकुछ वो तो जाएगा वो अपने जीवन में इतनी सुंदर और कोमल लड़की को आज तक हाथ नहीं लगाया था वो तो जाएगा कुछ भी हो जाए वो जल्दी से पलटकर किचेन में खड़ा चारो ओर देख रहा था सिंक पर झूठे प्लेट पड़े थे और किचेन भी अस्त व्यस्त था पर उसकी नजर बार बार बाहर सीढ़ियों पर चली जाती थी

उसका मन कुछ भी करने को नहीं हो रहा था जो कुछ जैसे पड़ा था वो वैसे ही रहने दिया आगे बढ़ने ही हिम्मत या फिर कहिए मन ही नहीं कर रहा था वो तो बस अब आरती के करीब जाना चाहता था वो कुछ भी नहीं सोच पा रहा था उसकी सांसें अब तो रुक रुक कर चल रही थी वो खड़ा-खड़ा बस इंतजार कर रहा था कि क्या करे उसका अंतर मन कह रहा था कि नहीं यह गलत है पर एक तरफ वो आरती के शरीर को छूना चाहता था उसके मन के अंदर में जो उथल पुथल थी वो उसके पार नहीं कर पा रहा था

वो अभी भी खड़ा था और उधर

आरती अपने कमरे में पहुँचकर जल्दी से बाथरूम में घुसी और अपने को सवारने में लग गई थी वो इतने जल्दी बाजी में लगी थी कि जैसे वो अपने बाय फ्रेंड से मिलने जा रही हो वो जल्दी से बाहर निकली और वार्ड रोब से एक स्लीव लेस ब्लाउस और एक वाइट कलर का पेटीकोट निकाल कर वापस बाथरूम में घुस गई

वो इतनी जल्दी में थी कि कोई भी देखकर कह सकता था कि वो आज कुछ अलग मूड में थी चेहरा खिला हुआ था और एक जहरीली मुश्कान भी थी उसके बाल खुले हुए थे और होंठों पर डार्क कलर की लिपस्टिक थी कमर के बहुत नीचे उसने पेटीकोट पहना था ब्लाउस तो जैसे रखकर सिला गया हो टाइट इतना था कि जैसे हाथ रखते ही फट जाए आधे से ज्यादा चुचे सामने से ब्लाउज के बाहर आ रहे थे पीछे से सिर्फ़ ब्रा के ऊपर तक ही था ब्लाउस कंधे पर बस टिका हुआ था दो बहुत ही पतले लगभग 1्2 सेंटीमीटर की ही होगी पट्टी

बाथरूम से निकलने के बाद आरती अपने को मिरर में देखा तो वो खुद भी देखती रह गई कि लग रही थी सेक्स की गुड़िया कोई भी ऋषि मुनि उसे ना नहीं कर सकता था आरती अपने को देखकर बहुत ही उत्तेजित हो गई थी हाँ उसके शरीर में आग सी भर गई थी वो खड़ी-खड़ी अपने शरीर को अपने ही हाथों से सहला रही थी अपने उभारों को खुद ही सहलाकर अपने को और भी उत्तेजित कर रही थी और अपने शरीर को अपने ही हाथों से सहला रही थी अपने उभारों को खुद ही सहलाकर अपने को और भी उत्तेजित कर रही थी और अपने शरीर पर रामु चाचा के हाथों का सपर्श को भी महसूस कर रही थी उसने अपने को मिरर के सामने से हटाया और एक चुन्नी अपने उपर डाल ली और रामू चाचा का इंतजार करने लगी

उधर रामू भी अपने हाथ को साफ करके किचेन में ही खड़ा था सोच रहा था कि क्या करे जाए या नहीं कही किसी को पता चल गया तो लेकिन दिल है कि मानता नहीं वो सीढ़ियों तक पहुँचा और फिर थम गया अंदर एक डर था मालिक और नौकर का रिश्ता था उसका वो कैसे भूल सकता था पागल शेर की तरह वो किचेन में तो कभी किचेन के बाहर तक आता और फिर अंदर चला जाता इस दौरान वो दो बार बाहर का दरवाजा भी चैक कर आया जो कि ठीक से बंद है कि नहीं पागल सा हो रहा था उसने सोचा कि चला ही जाता हूं।

रामु एक सांस में तेज़ी से उप्पेर आरती के कमरे के पास जाता है।

रामु- ज्ज्जिि (उसकी सांसें फूल रही थी )

उधर से आरती की आवाज थी शायद वो और इंतजार नहीं करना चाहती थी

आरती- क्या हुआ काका काम नहीं हुआ आपका

जैसे मिशरी सी घुल गई थी रामु के कानों में हकलाते हुए रामू की आवाज निकली

रमु-- जी बहू बस

आरती- क्या जी जी मुझे खाना भी तो खाना है आओगे कि

जान बूझ कर आरती ने अपना सेंटेन्स आधा छोड़ दिया रामु जल्दी से बोल उठा

रामू- नही नहीं बहू में तो बस आ ही रहा था आप चलिए बस आया

और लगभग दौड़ता हुआ वो एक साथ दो तीन सीडिया चढ़ता हुआ आरती के रूम के सामने था मगर हिम्मत नहीं हो रही थी कि खटखटा सके खड़ा हुआ रामू क्या करे सोच ही रहा था कि दरवाजा आरती ने खोल दिया जैसे देखना चाहती हो कि कहाँ रहा गया है वो सामने से भी सुंदर बिल कुल किसी अप्सरा की तरह खड़ी थी आरती चुन्नी जो कि उसके ब्लाउज के उपर से ढलक गया था उसके आधे खुले बूब्स जो कि बाहर की ओर थे उसे न्यूता दे रहे थे कि आओ और खेलो हमारे साथ चूसो और दबाओ जो जी में आए करो पर जल्दी करो

रामु दरवाजे पर खड़ा हुआ आरती के इस रूप को टक टकी बाँधे देख रहा था हलक सुख गया था इस तरह से आरती को देखते हुए आरती की आखों में और होंठों में एक अजीब सी मुश्कुराहट थी वो वैसे ही खड़ी रामु काका को अपने रूप का रस पिला रही थी उसने अपने चुन्नी से अपने को ढकने की कोशिश भी नहीं की बल्कि थोड़ा सा आगे आके रामु काका का हाथ पकड़कर अंदर खींचा

आरती- क्या काका जल्दी करो ऐसे ही खड़े रहोगे क्या जल्दी से ठीक कर दो फिर खाना खाना है मुझे

रामु किसी कठपुतली की तरह एक नरम सी और कोमल सी हाथ के पकड़ के साथ अपने को खींचता हुआ आरती के कमरे में चला आया नहीं तो क्या आरती में दम था कि रामु जैसे आदमी को खींचकर अंदर ले जा पाती यह तो रामु ही खिंचा चला गया उस खुशबू की ओर उस मल्लिका की ओर उस अप्सरा की ओर उसके सूखे हुए होंठ और सूखा गला लिए आकड़े हुए पैरों के साथ सिर घूमता हुआ और आखें आरती के शरीर पर जमी हुई

जैसे ही रामु अंदर आया आरती ने अपने पैरों से ही रूम का दरवाजा बंद कर दिया और साइड में रखी कुर्सी पर बैठ गई जो कि कुछ नीचे की ओर था बेड से थोड़ी दूर रामु आज पहली बार रवि भैया के रूम में आया था उनकी शादी के बाद कितना सुंदर सजाकर रखा था बहू ने जितनी सुंदर वो थी उतना ही अपने रूम को सजा रखा था इतने में आरती की आवाज उसके कानों में टकराई

आरती- क्या रामू काका क्या सोच रहे हो

रामू- कुछ नही

वो बुत बना आरती को देख रहा था आरती से नजर मिलते ही वो फिर से जैसे कोमा में चला गया क्या दिख रही थी आरती सफेद कलर की टाइट ब्लाउस और पेटीकोट पहने हुए थी और लाल कलर की चुन्नी तो बस डाल रखी थी क्या वो इस तरह से मालिश कराएगी क्या वो आरती को इस तरह से छू सकेगा उसके कंधों को उसके बालों को या फिर

आरती- क्या काका बताइए कहाँ करेंगे यही बैठू

रामु- जी जी .....और गले से थूक निगलने की कोशिश करने लगा

रामु आरती की ओर देखता हुआ थोड़ा सा आगे बढ़ा पर फिर ठिठ्क कर रुक गया क्या करे हाथ लगाए #### उूउउफफ्फ़ क्या वो अपने को रोक पाएगा कही कोई गड़बड़ हो गई तो भाड़ में जाए सबकुछ वो अब आगे बढ़ गया था अब पीछे नहीं हटेगा वो धीरे से आरती की ओर बड़ा और सामने खड़ा हो गया देखते हुए आरती को जो कि सिटी के थोड़ा सा नीचे होने से थोड़ा नीचे हो गये थी

आरती- मैं पलट जाऊ कि आप पीछे आएँगे

आरती रामू काका को अपनी ओर आते देखकर पूछा उसकी सांसें भी कुछ तेज चल रही थी ब्लाउज के अंदर से उसकी चूचियां बाहर आने को हो रही थी रामु की नजर आरती के ब्लाउसपर से नहीं हट रही थी वो घूमते हुए आरती के पीछे की ओर चला गया था उसकी सांसों में एक मादक सी खुशबू बस गई थी जो कि आरती के शरीर से निकल रही थी वो आरती का रूप का रस पीते हुए, उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया उपर से दिखने में आरती का पूरा शरीर किसी मोम की गुड़िया की तरह से दिख रहा था सफेद कपड़ों में कसा हुआ उसका शरीर जो की कपड़ों से बाहर की ओर आने को तैयार था और उसके हाथों के इंतजार में था

आरती अब भी चुपचाप वही बैठी थी और थोड़ा सा पीछे की ओर हो गई थी रामू खड़ा हुआ, अब भी आरती को ही देख रहा था वो आरती के रूप को निहारने में इतना गुम थाकि वो यह भी ना देख पाया कि कब आरति अपना सिर उकचा करके रामू की नजर की ओर ही देख रही थी

आरती- क्या चाचा शुरू करो ना प्लेअसस्स्स्स्सीईईईईई

रामु के हाथ काप गये थे इस तरह की रिक्वेस्ट से आरती अब भी उसे ही देख रही थी उसके इस तरह से देखने से आरती की दोनों चूचियां उसके ब्लाउज के अंदर बहुत अंदर तक दिख रही थी आरति का शरीर किसी रूई के गोले के समान देख रहा था कोमल और नाजुक

रामू ने कपते हुए हाथ से आरती के कंधे को छुआ एक करेंट सा दौड़ गया रामू के शरीर में उसके अंदर का सोया हुआ मर्द अचानक जाग गया आज तक रामू ने इतनी कोमल और नरम चीज को हाथ नहीं लगाया था

एकदम मखमल की तरह कोमल और चिकना था आरती का कंधा उसके हाथ मालिश करना तो जैसे भूल ही गये थे वो तो उस एहसास में ही खो गया था जो कि उसके हाथों को मिल रहा था वो चाह कर भी अपने हाथों को हिला नहीं पा रहा था बस अपनी उंगलियों को उसके कंधे पर हल्के से फेर रहा था और उसका नाज़ुकता का एहसास अपने अंदर भर रहा था वो अपने दूसरे हाथ को भी आरती के कंधे पर ले गया और दोनों हाथों से वो आरति के कंधे को बस छूकर देख रहा था
 
और उधर आरती का तो सारा शरीर ही आग में जल रहा था जैसे ही रामु काका का हाथ उसके कंधे पर टकराया उसके अंदर तक सेक्स की लहर दौड़ गई उसके पूरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गये और शरीर काँपने लगा था उसे ऐसे लग रहा था कि वो बहुत ही ठंडी में बैठी है, वो किसी तरह से ठीक से बैठी थी पर उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था वो ना चाहते हुए भी थोड़ा सा तनकर बैठ गई उसकी दोनों चूचियां अब सामने की ओर बिल्कुल कोई माउंटन पीक की तरह से खड़ी थी और सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी उसकी सांसों की गति भी बढ़ गई थी रामू के सिर्फ़ दोनों हाथ उसके कंधे पर छूने जैसा ही एहसास उसके शरीर में वो आग भर गया था जो कि आज तक आरती ने अपने पूरे शादीशुदा जिंदगी में महसूस नहीं किया था

आरती अपने आपको संभालने की पूरी कोशिश कर रही थी पर नहीं संभाल पा रही थी वो ना चाहते हुए भी रामू काका से टिकने की कोशिश कर रही थी वो पीछे की ओर होने लगी थी ताकि रामु काका से टिक सके

उसके इस तरह से पीछे आने से रामु भी थोड़ा आगे की ओर हो गया अब रामू का पेट से लेकर जाँघो तक आरति टिकी हुई थी उसका कोमल और नाजुक बदन रामु के आधे शरीर से टीके हुए उसके जीवन काल का वो सुख दे रहे थे जिसकी कि कल्पना रामु ने नहीं सोची थी रमु के हाथ अब पूरी आ जादी से आरती के कंधे पर घूम रहे थे वो उसके बालों को हटा कर उसकी गर्दन को अपने बूढ़े और मजबूत हाथों से स्पर्श कर आरती के शरीर का ठीक से अवलोकन कर रहा था वो अब तक आरती के शरीर से उठ रही खुशबू में ही डूबा हुआ था और उसके कोमल शरीर को अपने हाथों में पाकर नहीं सोच पा रहा था कि आगे वो क्या करे पर हाँ… उसके हाथ आरती के कंधे और बालों से खेल रहे थे आरती का सर उसके पेट पर था और वो और भी पीछे की ओर होती जा रही थी आगर रामू उसे पीछे से सहारा ना दे तो वो धम्म से जमीन पर गिर जाए वो लगभग नशे की हालत में थी और उसके मुख से धीमी धीमी सांसें चलने की आवाज आ रही थी उसके नथुने फूल रहे थे और उसके साथ ही उसकी छाती भी अब कुछ ज्यादा ही आगे की ओर हो रही थी

रामु खड़ा-खड़ा इस नज़ारे को देख भी रहा था और अपनी जिंदगी के हँसीन पल को याद करके खुश भी हो रहा था वो अपने हाथों को आरती की गर्दन पर फेरने से नहीं रोक पा रहा था अब तो उसके हाथ उसके गर्दन को छोड़ उसके गले को भी स्पर्श कर रहे थे आरती जो कि नशे की हालत में थी कुछ भी सोचने और करने की स्थिति में नहीं थी वो बस आखें बंद किए रामू के हाथों को अपने कंधे और गले में घूमते हुए महसूस भरकर रही थी और अपने अंदर उठ रहे ज्वार को किसी तरह नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी उसके छाती आगे और आगे की ओर हो रहे थे सिर रामु के पेट पर टच हो रहा था कमर नितंबों के साथ पीछे की ओर हो रही थी

बस रामू इसी तरह उसे सहलाता जाए या फिर प्यार करता जाए यही आरती चाहती थी बस रुके नहीं उसके अंदर की ज्वाला जो कि अब किसी तरह से रामु को ही शांत करना था वो अपना सब कुछ भूलकर रामू का साथ देने को तैयार थी और रामू जो कि पीछे खड़े-खड़े आरती की स्थिति का अवलोकन कर रहा था और जन्नत की किसी अप्सरा के हुश्न को अपने हाथों में पाकर किस तरह से आगे बढ़े ये सोच रहा था वो अपने आप में नहीं था वो भी एक नशे की हालत में ही था नहीं तो आरती जो कि उसकी मालकिन थी उसके साथ उसके कमरे मे आज इस तरह खड़े होने की कल्पना तो दूर की बात सोच से भी परे थी उसके पर आज वो आरती के कमरे में आरती के साथ जो कि सिर्फ़ एक ब्लाउस और पेटीकोट डाले उसके शरीर से टिकी हुई बैठी थी और वो उसके कंधे और गले को आराम से सहला रहा था अब तो वो उसके गाल तक पहुँच चुका था कितने नरम और चिकने गाल थे आरती के और कितने नरम होंठ थे अपने अंगूठे से उसके होंठों को छूकर देखा था रामू ने । रामू थोड़ा सा और आगे की ओर हो गया ताकि वो आरती के होंठों को अच्छे से देख और छू सके रामू के हाथ अब आरती की गर्दन को छू कर आरती के गालों को सहला रहे थे। आरती भी नशे में थी सेक्स के नशे में और कामुकता तो उसपर हावी थी ही रामू अब तक अपने आपको आरती के हुश्न की गिरफ़्त में पा रहा था वो अपने को रोकने में असमर्थ था वो अपने सामने इतनी सुंदर स्त्री को को पाकर अपना सूदबुद खो चुका था उसके शरीर से आवाजें उठ रही थी वो आरती को छूना चाहता था और चूमना चाहता था सबकुछ छूना चाहता था रामू ने अपने हाथों को आरती की चिन के नीचे रखकर उसकी चिन को थोड़ा सा ऊपर की ओर किया ताकि वह उसके होंठों को ठीक से देख सके आरती भी ना नुकर ना करते हुए अपने सिर को उँचा कर दिया ताकि रामू जो चाहे कर सके बस उसके शरीरी को ठंडा करे

उसके शरीर की सेक्स की भूख को ठंडा कर दे उसकी कामाग्नी को ठंडा करे बस रामू उसको इस तरह से अपना साथ देता देखकर और भी गरमा गया था उसके धोती के अंदर उसका पुरुष की निशानी अब बिल्कुल

तैयार था अपने पुरुषार्थ को दिखाने के लिए रामू अब सबकुछ भूल चुका था उसके हाथ अब आरती के गालों को छूते हुए होंठों तक बिना किसी झिझक के पहुँच जाते थे वो अपने हाथों के सपर्श से आरती की स्किन का अच्छे से छूकर देख रहा था उसकी जिंदगी का पहला एहसास था वो थोड़ा सा झुका हुआ था ताकि वो आरती को ठीक से देख सके। आरती भी चेहरा उठाए चुपचाप रामु को पूरी आजादी दे रही थी कि जो मन में आए करो और जोर-जोर से सांस ले रही थी । रामू की कुछ और हिम्मत बढ़ी तो उसने आरती के कंधों से उसकी चुन्नी को उतार फैका और फिर अपने हाथों को उसके कंधों पर घुमाने लगा उसकी नजर अब आरती के ब्लाउज के अंदर की ओर थी पर हिम्मत नहीं हो रही थी एक हाथ एक कंधे पर और दूसरा उसके गालों और होंठों पर घूम रहा था

रामु की उंगलियां जब भी आरती के होंठों को छूती तो आरती के मुख से एक सिसकारी निकल जाति थी उसके होंठ गीले हो जाते थे रामू की उंगलियां उसके थूक से गीले हो जाती थी । रामू भी अब थोड़ा सा पास होकर अपनी उंगली को आरती के होंठों पर ही घिस रहा था और थोड़ा सा होंठों के अंदर कर देता था

रामु की सांसें जोर की चल रही थी उसका लण्ड भी अब पूरी तरह से आरती की पीठ पर घिस रहा था किसी खंबे की तरह था वो इधर-उधर हो जाता था एक चोट सी पड़ती थी आरती की पीठ पर जब वो थोड़ा सा उसकी पीठ से दायां या लेफ्ट में होता था तो उसकी पीठ पर जो हलचल हो रही थी वो सिर्फ़ आरती ही जानती थी पर वो रामु को पूरा समय देना चाहती थी रामू की उंगली अब आरती के होंठों के अंदर तक चली जाती थी उसकी जीब को छूती थी आरती भी उत्तेजित तो थी ही झट से उसकी उंगली को अपने होंठों के अंदर दबा लिया और चूसने लगी थी आरती का पूरा ध्यान रामू की हरकतों पर था वो धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था वो अब नहीं रुकेगा हाँ… आज वो रामु के साथ अपने शरीर की आग को ठंडा कर सकती है वो और भी सिसकारी भरकर थोड़ा और उँचा उठ गई रामू के हाथ जो की कंधे पर थे अब धीरे-धीरे नीचे की ओर उसकी बाहों की ओर सरक रहे थे वो और भी उत्तेजित होकर रामु की उंगली को चूसने लगी रामू भी अब खड़े रहने की स्थिति में नहीं था

वो झुक कर अपने हाथों को आरती की बाहों पर घिस रहा था और साथ ही साथ उंगलियों से उसकी चुचियों को छूने की कोशिश भी कर रहा था पर आरती के उत्तेजित होने के कारण वो कुछ ज्यादा ही इधर-उधर हो रही थी तो रामू ने वापस अपना हाथ उसके कंधे पर पहुँचा दिया और वही से धीरे से अपने हाथों को उसके गले से होते हुए उसकी चुचियों पहुँचने की कोशिश में लग गया उसका पूरा ध्यान आरती पर भी था उसकी एक ना उसके सारी कोशिश को धूमिल कर सकती थी इसलिए वो बहुत ही धीरे धीरे अपने कदम बढ़ा रहा था आरती का शरीर अब पूरी तरह से रामू की हरकतों का साथ दे रहे थे वो अपनी सांसों को कंट्रोल नहीं कर पा रही थी तेज और बहुत ही तेज सांसें चल रही थी उसकी उसे रामु के हाथों का अंदाजा था कि अब वो उसकी चूची की ओर बढ़ रहे है उसके ब्लाउज के अंदर एक ज्वार आया हुआ था उसके सांस लेने से उसके ब्लाउज के अंदर उसकी चूचियां और भी सख़्त हो गई थी निपल्स तो जैसे तनकर पत्थर की तरह ठोस से हो गये थे वो बस इंतजार में थी कि कब रामु उसकी चूचियां छुए और तभी रामू की हथेली उसकी चुचियों के उपर थी बड़ी बड़ी और कठोर हथेली उसके ब्लाउज के उपर से उसके अंदर तक उसके हाथों की गर्मी को पहुँचा चुकी थी आरती थोड़ा सा चिहुक कर और भी तन गई थी रामू जो कि अब आरती की गोलाईयों को हल्के हाथों से टटोल रहा था ब्लाउज के उपर से और उपर से उनको देख भी रहा था और अपने आप पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि वो क्या कर रहा था सपना था कि हकीकत था वो नहीं जानता था पर हाँ… उसकी हथेलियों में आरती की गोल गोल ठोस और कोमल और नाजुक सी रूई के गोले के समान चुचियाँ थी जरूर वो एक हाथ से आरती की चुचियों को ब्लाउज के ऊपर से ही टटोल रहा था या कहिए सहला रहा था और दूसरे हाथ से आरती के होंठों में अपनी उंगलियों को डाले हुए उसके गालों को सहला रहा था वो खड़ा हुआ अपने लण्ड को आरती की पीठ पर रगड़ रहा था और आरती भी उसका पूरा साथ दे रही थी कोई ना नुकर नहीं था उसकी तरफ से आरती का शरीर अब उसका साथ छोड़ चुका था अब वो रामु के हाथ में थी उसके इशारे पर थी अब वो हर उस हरकत का इंतजार कर रही थी जो रामू करने वाला था।
 
रामु अपना सुध बुध खोया हुआ अपने सामने इस सुंदर काया को अपने हाथों का खिलोना बनाने को आजाद था वो चुचियों को तो ब्लाउज के ऊपर से सहला रहा था पर उसका मन तो उसके अंदर से छूने को था उसने दूसरे हाथ को आरती के गालों और होंठों से आजाद किया और धीरे से उसके ब्लाउज के गॅप से उसके अंदर की डाल दिया मखमल सा एहसास उसके हाथों को हुआ और वो बढ़ता ही गया

जैसे-जैसे उसका हाथ आरती के ब्लाउज के अंदर की ओर होता जा रहा था वो आरती से और भी सटता जा रहा था अब दोनों के बीच में कोई भी गॅप नहीं था आरती रामू से पूरी तरह टिकी हुई थी या कहिए अब पूरी तरह से उसके सहारे थी उसकी जाँघो से टिकी अपने पीठ पर रामू काका के लण्ड का एहसास लेती हुई आरती एक अनोखे संसार की सैर कर रही थी उसके शरीर में जो आग लगी थी अब वो धीरे-धीरे इतनी भड़क चुकी थी कि उसने अपने जीवन काल में इस तरह का एहसास नहीं किया था

वो अपने को भूलकर रामू काका को उनका हाथ अपने ब्लाउसमें घुसने में थोड़ा मदद की वो थोड़ा सा आगे की ओर हुई अपने कंधों को आगे करके ताकि रामू काका के हाथ आराम से अंदर जा सके । रामू काका की कठोर और सख्त हथेली जब उसकी स्किन से टकराई तो वो और भी सख्त हो गई उसका हाथ अपने आप उठकर अपने ब्लाउज के ऊपर से रामू काका के हाथ पर आ गया एक फिर दोनों और फिर रामू काका का हाथ ब्लाउज के अंदर रखे हुई थी वो और भी तन गई अपने चूचियां को और भी सामने की और करके वो थोड़ा सा सिटी से उठ गई थी

रामू ने भी आरती के समर्थन को पहचान लिया था वो समझ गये थे कि आरती अब ना नहीं कहेगी वो अब अपने हाथों का जोर उसके चुचियों पर बढ़ने लगे थे धीरे-धीरे रामू उसकी चुचियों को छेड़ता रहा और उसकी सुडोलता को अपने हाथों से तोलता रहा और फिर उसके उंगलियों के बीच में निपल को लेकर धीरे से दबाने लगा

उूुुुुुउऊह्ह आरति के मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकली

आरती- ऊऊह्ह पल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लीीआआआआअसस्स्स्स्स्स्सीईईई आआआआआह्ह

रामू को क्या पता क्या बोल गई थी आरती पर हाँ उसके दोनों हाथों के दबाब से वो यह तो समझ ही गया था कि आरती क्या चाहती थी उसने अपने दोनों हाथों को उसके ब्लाउज के अंदर घुसा दिया इस बार कोई ओपचारिकता नहीं की बस अंदर और अंदर और झट से दबाने लगा पहले धीरे फिर थोड़ा सा जोर से इतनी कोमल और नरम चीज आज तक उसके हाथ में नहीं आई थी वो अपने आप पर विश्वास नहीं कर पा रहा था वो थोड़ा सा और झुका और अपने बड़े और मोटे-मोटे होंठों को आरती के चिकने और गुलाबी गालों पर रख दिया और चूमने लगा चूमने क्या लगा सहद जैसे चाटने लगा था पागलो जैसी स्थिति थी रामू की । अपने हाथों में एक बड़े घर की बहू को वो शरीर रूप से मोलेस्ट कर रहा था और आरती उसका पूरा समर्थन दे रही थी कंधे का दर्द कहाँ गया वो तो पता नहीं हाँ पता था तो बस एक खेल की शुरूरत हो चुकी थी और वो था सेक्स का खेल्ल शारीरिक भूख का खेल एक दूसरे को संत्ुस्त करने का खेल एक दूसरे को समर्पित करने का खेल। आरती तो बस अपने आपको खो चुकी थी । रामू के झुक जाने की बजाह से उसके ब्लाउज के अंदर रामु के हाथ अब बहुत ही सख़्त से हो गये थे वो उसके ब्लाउज के ऊपर के दो तीन बाट्टों को टाफ चुले थे दोनों तरफ के ब्लाउज के साइड लगभग अब उसका साथ छोड़ चुके थी वो अब बस किसी तरह नीचे के कुछ एक दो या फिर तीन हुक के सहारे थे वो भी कब तक साथ देंगे पता नहीं पर आरती को उससे क्या वो तो बस अपने शरीर भूख की शांत करना चाहती थी इसीलिए तो रामू काका को उसने अपने कमरे में बुलाया था वो शांत थी और अपने हाथों का दबाब रामू के हाथों पर और जोर से कर रही थी वो रामू के झुके होने से अपना सिर रामु के कंधे पर टिकाए हुए थी वो शायद सिटी को छोड़ कर अपने पैरों को नीचे रखे हुए और सिर को रामू के कंधे पर टिकाए हुए अपने को हवा में उठा चुकी थी

रामू तो अपने होंठों को आरती के गालों और गले तक जहां तक वो जा सटका था ले जा रहा था अपने हाथों का दबाब भी वो अब बढ़ा चुका था। आरती के चूचियां पर जोर जोर-जोर से और जोर से की आरती के मुख से एक जोर से चीत्कार जब तक नहीं निकल गई

आरती- ईईईईईईईईईईईई आआआआआअह्ह उूुुुउउफफफफफफफफफफफफ्फ़

और झटक से आरती के ब्लाउसने भी आरती का साथ छोड़ दिया अब उसकी ब्लाउस सिर्फ़ अपना अस्तितव बनाने के लिए ही थे उसके कंधे पर और दोनों पाट खुल चुके थे अंदर से उसकी महीन सी पतली सी स्ट्रॅप्स के सहारे आरती के कंधे पर टीके हुए थे और ब्रा के अंदर रामू के मोटे-मोटे हाथ उसके उभारों को दबा दबा के निचोड़ रहे थे रामू भूल चुका था की आरती एक बड़े घर की बहू है कोई गॉव की देहाती लड़की नही या फिर कोई देहात की खेतो में काम करने वाली लड़की नहीं है पर वो तो अपने हाथों में रूई सी कोमल और मखमल सी कोमल नाजुक लड़की को पाकर पागलो की तरह अब उसे रौंदने लगा था।

वो अपने दोनों हाथों को आरती की चुचियों पर रखे हुए उसे सहारा दिए हुए उसके गालों और गले को चाट और चूम रहा था

उसका थूक आरती के पूरे चेहरे को भिगा चुका था वो अब एक हाथ से रामू की गर्दन को पकड़ चुकी थी और खुद ही अपने गालों और गर्दन को इधर-उधर या फिर उचका करके रामु को जगह दे रही थी कि यहां चाटो या फिर यहां चुमो उसके मुख और नाक से सांसें अब रामु के चेहरे पर पड़ रही थी । रामू की उत्तेजना की कोई सीमा नहीं थी वो अधखुली आखों से आरती की ओर देखता रहा और अपने होंठों को उसके होंठों की ओर बढ़ाने लगा। आरती रामू के इस इंतजार को सह ना पाई और उसकी आखें भी खुली रामू की आखों में देखते ही वो जैसे समझ गई थी कि रामू क्या चाहता है उसने अपने होंठों को रामु के होंठो में रख दिया जैसे कह रही हो लो चूमो चाटो और जो मन में आए करो पर मुझे शांत करो । आरती की हालत इस समय ऐसी थी कि वो किसी भी हद तक जा सकती थी वो रामू के होंठों को अपने कोमल होंठों से चूस रही थी और रामु जो कि आरती की इस हरकत को नजर अंदाज नहीं कर पाया वो अब भी आरती की दोनों चुचियों को कसकर निचोड़ रहा था और अपने मुँह में आरती के होंठों को लेकर चूस रहा था वो हब्सियो की तरह हो गया था उसके जीवन में इस तरह की घटना आज तक नहीं हुई थी और आज वो इस घटना को अपने आप में समेट कर रख लेना चाहता था वो अब आरती को चोदे बगैर नहीं छोड़ना चाहता था वो भूल चुका था कि वो इस घर का नौकर है अभी तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मर्द था और उसे भूख लगी थी किसी नारी के शरीर की और वो नारी कोई भी हो उससे फरक नहीं पड़ता था उसकी मालकिन ही क्यों ना हो वो अब नहीं रुक सकता .

उसने आरती को अपने बलिश्त हाथ से खींच लिया लगभग गिरती हुई आरती कुर्सी को छोड़ कर रामू के ऊपर गिर पड़ी पर रामू तैयार था उसने आरती को सहारा दिया और अपनी बाहों में कसकर बाँध लिया उसने आरती को अब भी पीठ से पकड़ा हुआ था उसके हाथों की छीना झपटी में आरती की दोनों चूचियां ब्रा के बाहर आ गई थी

बल्कि कहिए खुद ही आजाद हो गई होंगी कितना जुल्म सहे बेचारी कैद में आरती का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था वो इतनी उत्तेजित हो चुकी थी कि लग रहा था कि अब कभी भी बस झड जाएगी पर रामू की उत्तेजना तो इससे भी कही अधिक थी उसका लण्ड तो जैसे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था । रामू अब नहीं रुकना चाहता था और ना ही कुछ आगे की ही सोच पा रहा था उसने आरती को अपनी ओर कब मोड़ लिया आरती को पता भी ना चला बस पता चला तब जब उसकी सांसें अटकने लगी थी । रामू काका की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो उनकी बाहों में हिल भी नहीं पा रही थी सांस लेना तो दूर की बात वो अपने होंठों को भी रामू काका से अलग करके थोड़ा सा सांस ले ले वो भी नहीं कर पा रही थी

रामू जो कि बस अब आरती के पूरे तन पर राज कर रहा था उसके हाथों का खिलोना पाकर वो उसे अपनी बाहों में जकड़े हुए उसके होंठों को अपने मुख में लेता जा रहा था और अंदर तक वो अपनी जीब को आरती के सुंदर और कोमल मुख में घुसाकर अंदर उसकी लार को अपने मुख में लेकर अमृत पान कर रहा था उसने आरती को इतनी जोर से जकड़ रखा था यह वो नहीं जानता था हाँ… पर उसे यह जरूर पता था रूई की गेंद सी कोई चीज़ जो कि एकदम कही से भी खुरदरी नहीं है उसके बाहों में है उसका लण्ड अब आरती की जाँघो के बीच में रगड़ खा रहा था रामू की हथेली आरती को थोड़ा सा ढीला छोड़ कर अपनी बाहों में आए हुश्न की परिक्रमा करने चल दी और आरती की पीठ से लेकर नितंबों तक घूम आए कब कहाँ कौन सा हाथ था यह आरती भी नहीं जानना चाहती थी नहीं ही रामू हाँ… सपर्श जिसका ही एहसास दोनों को महसूस हो रहा था वो खास था। आरती के शरीर को आज तक किसी ने इस तरह से नहीं छुआ था इतनी बड़ी बड़ी हाथलियो का स्पर्श और इतना कठोर स्पर्श आज तक आरती के शरीर ने नहीं झेला था या कहिए महसूस नहीं किया था रामू जैसे आटा गूँथ रहा था

वो आरती के शरीर को इस तरह से मथ रहा था कि आरती का सारा शरीर ही उसके खेलने का खिलोना था वो जहां मन करता था वही उसे रगड़ रहा था । रामू और आरती अब नीचे कालीन में लेटे हुए थे और रामू नीचे से आरती को अपने ऊपर पकड़कर उससे खेल रहा था उसके होंठ अब भी आरती के होंठों पर थे और एक दूसरे के थूक से खेल रहे थे । आरती अपने को संभालने की स्थिति में नहीं थी उसकी पेटीकोट उसकी कमर के चारो तरफ एक घेरा बना के रह गया था अंदर की पैंटी पूरी तरह से गीली थी और वो रामू काका को अपनी जाँघो की मदद से थोड़ा बहुत पकड़ने की कोशिश भी कर रही थी पर रामू तो जो कुछ कर रहा था उसका उसे अनुभव ही नहीं था वो कभी आरती को इस तरफ और तो कभी उस तरफ करके उसके होंठों को अपने मुख में घुसा लेता था दोनों हाथ आजादी से उसके जिश्म के हर हिस्से पर घूम घूमकर उनकी सुडौलता का और कोमलता का एहसास भी कर रहे थे रामू के हाथ अचानक ही उसके नितंबो पर रुक गये थे और आरती की पैंटी की आउट लाइन के चारो तरफ घूमने लगे थे। आरती का पूरा शरीर ही समर्पण के लिए तैयार था इतनी उत्तेजना उसे तो पहली बार ही हुई थी

उसके पति ने भी कभी उसके साथ इस तरह से नहीं खेला था या फिर उसके शरीर को इस तरह से नहीं छुआ था। रामु काका के हर टच में कुछ नया था जो कि उसके अंदर तक उसे हिलाकर रख देता था उसके शरीर के हर हिस्से से सेक्स की भूख अपना मुँह उठाकर रामू काका को पुकार रही थी वो अब और नहीं सह सकती थी वो रामु काका को अपने अंदर समा लेना चाहती थी। रामू जो कि अब भी नीचे था और आरती को एक हाथ से जकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उसकी पैंटी के चारो और से आउटलाइन बना रहा था अचानक ही उसने अपना हाथ उसकी पैंटी के अंदर घुसा दिया और कस कस कर उसके नितंबों को दबाने लगा फिर दूसरा हाथ भी इस खेल में शामिल हो गया आरती पर पकड़ जैसे ही थोड़ा ढीली हुई आरती अपनी चुत को और भी रामु के लण्ड के समीप ले गई और खुद ही उपर से घिसने लगी रामु का लण्ड तो आजादी के लिए तड़प ही रहा था्

आरती के ऊपर-नीचे होने से वो और भी ख़ूँखार हो गया था वो रामु को परेशान कर रहा था वो अपने जगह पर रह-ही नहीं रहा था अब तो उसे आजाद होना ही था और रामु को यह करना ही पड़ा

आरती ऊपर से रामु के होंठों से जुड़ी हुई अपने हाथों को वो भी रामु के शरीर पर चला रही थी उसके हाथों में बालों का गुछा आ रहा था जहां भी उसका हाथ जाता बाल ही बाल थे और वो भी इतने कड़े कि काँटे जैसे लग रहे थे पर आरती के नंगे शरीर पर वो कुछ अच्छे लग रहे थे यह बाल उसकी कामुकता को और भी बढ़ा रहे थे । रामु की आखें बंद थी पर आरती ने थोड़ी हिम्मत करके अपनी आखें खोली तो रामु के नंगे पड़े हुए शरीर को देखती रह गई कसा हुआ था मास पेशिया कही से भी ढीली नहीं थी थुलथुला पन नहीं था कही भी उसके पति की तरह । रामु में कोई कोमलता भी नहीं थी कठोर और बड़ा भी था बालों से भरा हुआ और उसके हाथ तो बस उसकी कमर के चारो और तक जाते थे कुछ जाँघो के बीच में गढ़ रहा था अगर उसका लण्ड हुआ तो बाप रे इतना बड़ा भी हो सकता है किसी का उसका मन अब तो रामू के लण्ड को आजाद करके देखने को हो रहा था वो अपने को रामू पर जिस तरह से घिस रही थी उसका पूरा अंदाज़ा रामु को था वो जानता था कि आरती अब पूरी तरह से तैयार थी पर वो क्या करे उसका मन तो अब तक इस हसीना के बदन से नहीं भरा था वो चाह कर भी उसे आजाद नहीं करना चाहता था पर इसी उधेड़ बुन में कब आरती उसके नीचे चली गई पता अभी नहीं चला और वो कब उसके ऊपर हावी हो गया नहीं पता वो आरती की पीठ को जकड़े हुए उसके होंठों को अब भी चूस रहा था

आरती के शरीर पर अब वो चढ़ने की कोशिश कर रहा था आरती की पैंटी में एक हाथ ले जाते हुए उसको उतारने लगा उतारने क्या लगभग फाड़ ही दी उसने बची कुची उसके पैरों से आजाद करदी पेटीकोट तो कमर के चारो और था ही जरूरत थी तो बस अपने साहब को आजाद करने की रामू होंठों से जुड़े हुए ही अपने हाथों से अपनी धोती को अलग करके अपने बड़े से अंडरवेयार को भी खोल दिया और अपने लण्ड को आजाद कर लिया और फिर से गुथ गया आरती पर अब उसे कोई चिंता नहीं थी वो अब अपने हर अंग से आरती को छू रहा था

अपने लण्ड को भी वो आरती की जाँघो के बीच में रगड़ रहा था उसके लिंग की गर्मी से तो आरती और भी पागल सी हो उठी अपने जाँघो को खोलकर उसने उसको जाँघो के बीच में पकड़ लिया और रामू से और भी सट गई अपने हाथों को रामू की पीठ के चारो ओर करके रामू काका को अपनी ओर खींचने लगी और आरती की इस हरकत से रामु और भी खुल गया जैसे अपनी बेटी को ही भोग रहा हो वो झट से आरती के शरीर पर छा गया और अपनी कमर को हिलाकर आरती के अंदर घुसने का ठिकाना ढूँडने लगा। आरती भी अब तक सहन ही कर रही थी पर रामु के झटको ने उसे भी अपनी जाँघो को खोलने और अपनी योनि द्वार को रामू के लण्ड के लिए स्वागत पर खड़े होना ही था सो उसने किया पर एक ही झटके में रामु उसके अंदर जब उतरा तो ....

आरती- ईईईईईईईईईईईईईईईई आआआआआआअह्ह कर उठी रामु का लण्ड था कि मूसल बाप रे मर गई आरती की चुत तो शायद फटकर खून निकला होगा आखें पथरा गई थी आरती कि इतना मोटा और कड़ा सा लण्ड जो कि उसके चुत में घुसा था अगर वो इतनी तैयार ना होती तो मर ही जाती पर उसकी चुत के रस्स ने रामु के लण्ड को आराम से अपने अंदर समा लिया पर दर्द के मारे तो आरती सिहर उठी। रामु अब भी उसके ऊपर उसे कस कर जकड़े हुए उसकी जाँघो के बीच में रास्ता बना रहा था। आरती थोड़ी सी अपनी कमर को हिलाकर किसी तरह से अपने को अड्जस्ट करने की कोशिश कर ही रही थी कि रामु का एक तेज झटका फिर पड़ा और आरती के मुख से एक तेज चीख निकल गई

पर वो तो रामु के गले में ही गुम हो गई रामु अब तो जैसे पागल ही हो गया था ना कुछ सोचने की जरूरत थी और नहीं ही कुछ समझने की बस अपने लण्ड को पूरी रफ़्तार से आरती की चुत में डाले हुए अपनी रफ़्तार पकड़ने में लगा था उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि आरती का क्या होगा उसे इस तरह से भोगना क्या ठीक होगा बहुत ही नाजुक है और कोमल भी पर रामू तो बस पागलो की तरह अपनी रफ़्तार बढ़ाने में लगा था और आरति मारे दर्द के बुरी तरह से तड़प रही थी वो अपनी जाँघो को और भी खोलकर किसी तरह से रामु को अड्जस्ट करने की कोशिश कर रही थी पर रामु ने उसे इतनी जोर से जकड़ रखा था कि वो हिल तक नहीं पा रही थी उसके शरीर का कोई भी हिस्सा वो खुद नहीं हिला पा रही थी जो भी हिल रहा था वो बस रामु के झटको के सहारे ही था रामु अपनी स्पीड पकड़ चुका था और आरति के अंदर तक पहुँच गया था हर एक धक्के पर आरति चिहुक कर और भी ऊपर उठ जाती थी पर रामु को क्या आज जिंदगी में पहली बार वो एक ऐसी हसीना को भोग रहा था जिसकी की कल्पना वो तो नहीं कर सकता था वो अब कोई भी कदम उठाने को तैयार था भाड़ में जाए सबकुछ वो तो इसको अपने तरीके से ही भोगेगा और वो सच मुच में पागलो की तरह से आरति के सारे बदन को चूम चाट रहा था और जहां जहां हाथ पहुँचते थे बहुत ही बेदर्दी के साथ दबा भी रहा था

अपने भार से आरति को इस तरह से दबा रखा था कि आरती क्या आरती के पूरे घर वाले भी जमा होकर रामु को हटाने की कोशिश करेंगे तो नहीं हटा पाएँगे और आरती जो कि रामु के नीचे पड़े हुए अपने आपको नर्क के द्वार पर पा रही थी अचानक ही उसके शरीर में अजीब सी फुर्ती सी आ गई । रामु की दरिंदगी में उसे सुख का एहसास होने लगा उसके शरीर के हर अंग को रामु के इस तरह से हाथों रगड़ने की आदत सी होने लगी थी यह सब अब उसे अच्छा लगने लगा था वो अब भी नीचे पड़ी हुई रामु के धक्कों को झेल रही थी और अपने मुख से हर चोट पर चीत्कार भी निकालती पर वो तो रामु के गले मे ही गुम हो जाती अचानक ही रामु की स्पीड और भी तेज हो गई और उसकी जकड़ भी बहुत टाइट हो गई अब तो आरति का सांस लेना भी मुश्किल हो गया था पर उसके शरीर के अंदर भी एक ज्वालामुखी उठ रहा था जो कि बस फूटने ही वाला था हर धक्के के साथ आरति का शरीर उसके फूटने का इंतजार करता जा रहा था और रामू के तने हुए लण्ड का एक और जोर दार झटका उसके अंदर कही तक टच होना था कि आरती का सारा शरीर काप उठा और वो झड़ने लगी और झड़ती ही जा रही थी आरति रामु से बुरी तरह से लिपट गई अपनी दोनों जाँघो को ऊपर उठा कर रामु की कमर के चारो तरफ एक घेरा बनाकर शायद वो रामु को और भी अंदर उतार लेना चाहती थी और रामु भी एक दो जबरदस्त धक्कों के बाद झड़ने लगा था वो भी आरती के अंदर ढेर सारा वीर्य उसके लण्ड से निकाला था जो कि आरति की योनि से बाहर तक आ गया था पर फिर भी रामु आख़िर तक धक्के लगाता रहा जब तक उसके शरीर में आख़िरी बूँद तक बचा था और उसी तरह कस कर आरति को अपनी बाहों में भरे रहा, दोनों कालीन में वैसे ही पड़े रहे। आरति के शरीर में तो जैसे जान ही नहीं बची थी वो निढाल सी होकर लटक गई थी । रामु काका जो कि अब तक उसे अपनी बाहों में समेटे हुए थे अब धीरे-धीरे अपनी गिरफ़्त को ढीला छोड़ रहे थे और ढीला छोड़ने से आरति के पूरे शरीर में जैसे जान ही वापस आ गई थी उसे सांस लेने की आजादी मिल गई थी वो जोर-जोर से सांसें लेकर अपने आपको संभालने की कोशिश कर रही थी

रामु आरती पर से अपनी पकड़ ढीली करता जा रहा था और अपने को उसके ऊपर से हटाता हुआ बगल में लुढ़क गया था वो भी अपनी सांसों को संभालने में लगा था रूम में जो तूफान आया था वो अब थम चुका था दोनों लगभग अपने को संभाल चुके थे लेकिन एक दूसरे की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे रामु वैसे ही आरति की ओर ना देखते हुए दूसरी तरफ पलट गया और पलटा हुआ अपनी धोती ठीक करने लगा अंडरवेर पहना और अपने बालों को ठीक करता हुआ धीरे से उठा और दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गया आरती जो कि दूसरी और चेहरा किए हुए थी रामु की ओर ना उसने देखा और ना ही उसने उठने की चेष्टा की वो भी चुपचाप वैसे ही पड़ी रही और सबकुछ ध्यान से सुनती रही उसे पता था कि रामू काका उठ चुके हैं और अपने आपको ठीक ठाक करके बाहर की ओर चले गये है आरति के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी उसके चेहरे पर एक संतोष था एक अजीब सी खुशी थी आखों में और होंठों को देखने से यह बात सामने आ सकती थी पर वो वैसे ही लेटी रही और कुछ देर बाद उठी और अपने आपको देखा उसके शरीर में सिर्फ़ पेटीकोट था जिसका की नाड़ा कब टूट गया था उसे नहीं पता था और कुछ भी नहीं था हाँ… था कुछ और भी रामू के हाथों और दाँतों के निशान और

उसका पूरा शरीर थूक और पसीने से नहाया हुआ था वो अपने को देखकर थोड़ा सा मुस्कुराइ आज तक उसके शरीर में इस तरह के दाग कभी नहीं आए थे होंठों पर एक मुस्कान थी रामु काका के पागलपन को वो अपने शरीर पर देख सकती थी जो की उसने कभी भी अपने पति से नहीं पाया था वो आज उसने रामू काका से पाया था उसकी चुचियों पर लाल लाल हथेली के निशान साफ दिख रहे थे वो यह सब देखती हुई उठी और पेटीकोट को संभालते हुए अपनी ब्लाउस और ब्रा को भी उठाया और बाथरूम में घुस गई जब वो बाथरूम से निकली तो उसे बहुत जोर से भूख लगी थी याद आया कि उसने तो खाना खाया ही नहीं था

अब क्या करे नीचे जाने की हिम्मत नहीं थी रामू काका को फेस करने की हिम्मत वो जुटा नहीं पा रही थी पर खाना तो खाना पड़ेगा नहीं तो भूख का क्या करे घड़ी पर नजर गई तो वो सन्न रह गई 1: 30 हो गये थे तो क्या रामु और वो एक दूसरे से लगभग दो घंटे तक सेक्स का खेल खेल रहे थे। रवि तो 5 से 10 मिनट में ही ठंडा हो जाता था और आज तो कमाल हो गया । आरती का पूरा शरीर थक चुका था उसे हाथों पैरों में जान ही नहीं थी पूरा शरीर दुख रहा था हर एक अंग में दर्द था और भूख भी जोर से लगी थी।

थोड़ी हिम्मत करके उसने नीचे जाने का फैसला किया।

रामु की भी हालत खराब थी वो जब नीचे आया तो उसके हाथ पाँव फूले हुए थे वो सोच नहीं पा रहा था कि वो अब बहू को कैसे फेस करेगा वो अपने आपको कहाँ छुपाए कि बहू की नजर उसपर ना पड़े पर जैसे ही वो नीचे आया तो उसके मन में एक चिंता घर कर गई थी और खड़ा-खड़ा किचेन में यही सोच रहा था कि बहू ने खाना तो खाया ही नहीं

मर गये अब क्या होगा मतलब आरति को खाना ना खिलाकर वो तो किचेन साफ भी नहीं कर सकता और वो बहू को कैसे नीचे बुलाए और क्या बहू नीचे आएगी कही वो अपने कमरे से रवि या फिर सोनल को फोन करके बुला लिया तो कही पोलीस के हाथों उसे दे दिया तो क्या यार क्या कर दिया मैंने क्यों किया यह सब वो अपने हाथ जोड़ कर भगवान को प्रार्थना करने लगा प्लीज भगवान मुझे बचा लो प्लीज अब नहीं करूँगा उसके आखों में आँसू थे वो सच मुच में शर्मिंदा था जिस घर का नमक उसने खाया था उसी घर की इज़्ज़त पर उसने हाथ डाला था अगर किसी को पता चला तो उसकी इज़्ज़त का क्या होगा गाँव में भी उसकी थू-थू हो जाएगी और तो और वो साहब और सोनल को क्या मुँह दिखाएगा सोचते हुए वो

खड़ा ही था की किचन के दरवाजे पे आरति को खड़े देखा, डर के साथ हकलाहट में वो सबकुछ एक साथ कह गया, बहु रानी खाना खा लो, पर दूसरी ओर से कुछ भी आवाज ना आने से वो फिर घबरा गया

रामू-- बहुऊऊ,

आरति- खाना लगा दो

आरति के पास और कुछ कहने को नहीं था अगर भूखी नहीं होती तो शायद नीचे भी ना आती पर क्या करे उसने फिर से वही सुबह वाला सूट पहना और उसे रामु काका जल्दी-जल्दी खाने के टेबल पर उसका खाना लगा रहे थे वो भी बिना कुछ आहट किए चुपचाप डाइनिंग टेबल पर पहुँची आरति को आता सुनकर ही रामु जल्दी से किचेन में वापस घुस गया आरति भी नीचे गर्दन किए खाना खाने लगी थी जल्दी-जल्दी में क्या खा रही थी उसे पता नहीं था पर जल्दी से वो यहां से निकल जाना चाहती थी किसी तरह से उसने अपने मुँह में जितनी जल्दी जितना हो सकता था ठूँसा और उठ कर वापस अपने कमरे की ओर भागी नीचे बेसिन पर हाथ मुख भी नहीं धोया था उसने

कमरे में आकर उसने अपने मुँह के नीवाले को ठीक से खाया और बाथरूम में मुँह हाथ धोकर बिस्तर पर लेट गई अब वो सेफ थी पर अचानक ही उसके दिमाग में बात आई कि उसे तो शाम को ड्राइविंग पर जाना था अरे यार अब क्या करे उसका मन तो बिल्कुल नहीं था उसने फोन उठाया और रवि को रिंग किया

रवि- हेलो

आरति- सुनिए प्लीज आज ना में ड्राइविंग पर नहीं जाऊँगी कल से चली जाऊँगी ठीक है

रवि- हहा ठीक है क्यों क्या हुआ

आरति- अरे कुछ नहीं मन नहीं कर रहा कल से ठीक है

रवि- हाँ ठीक है कल से चलो रखू

आरति- जी

और फोन काट गया

आरती ने भी फोन रखा और बिस्तर पर लेटे लेटे सीलिंग की ओर देखती रही और पता नहीं क्या सोचती रही और कब सो गयी मालूम ही नही चला।

शाम को जब वो उठी तो एक अजीब सा एहसास था उसके शरीर में एक अजीब सी कशिश थी उसके अंदर एक ताजगी सी महसूस कर रही थी वो सिर हल्का था शरीर का दर्द पता नहीं कहाँ चला गया था सोई तो ऐसी थी कि जनम में ऐसी नींद उसे नहीं आई थी

बहुत अच्छी और फ्रेश करने वाली नींद आई थी उठकर जब आरती बाथरूम से वापस आई तो मोबाइल पर रिंग बज रहा था उसने देखा रवि का था

आरती- हेलो

रवि- कहाँ थी अब तक

आरती- क्यों क्या हुआ

रवि--- देखो 6 7 बार कॉल किया

आरती- अरे में तो सो रही थी और अभी ही उठी हूँ

रवि- अच्छा बहुत सोई हो आज तुम

आरती- जी कहिए क्या बात है

रवि- पार्टी में में चलना है रात को

आरति- कहाँ

रवि- अरे बर्तडे पार्टी है मेहता जी के बेटे के बेटे का

आरति- हाँ हाँ ठीक है कितने बजे

‌रवि- वही रात को 9:30 -10 बजे करीब तैयार रहना

आरती- ठीक है

और आरती का फोन कट गया अब आरती ने फ़ोन को देखा कि 6 मिस्ड कॉल थे उसे सेल पर

कितना सोई थी आज वो फ्रेश सा लग रही थी वो
 
मिरर के सामने खड़ी होकर अपने को देखा तो बिल्कुल फ्रेश लग रही थी चेहरा खिला हुआ था और आखें भी नींद के बाद भी खिली हुई थी अपना ड्रेस और बाल को ठीक करने के बाद वो नीचे जाती कि दरवाजा नॉक हुआ

सोनल-- मम्मी जी, चाय नहीं पीनी क्या

आरति- आती हूँ सोनल। चलो।

और भागती हुई नीचे चली गई रामू काका का कही पता नहीं था शायद किचेन में थे। सोनल डाइनिंग टेबल पर थी और आरती का ही इंतजार कर रही थी। आरती भी जाकर सोनल के पास बैठ गई और दोनों चाय पीने लगे

सोनल- मम्मी, पापा का फोन आया था कह रहै थे कि कोई पार्टी में जाना है

आरती--- हां बात हुई थी मेरी भी।

सोनल- हाँ पापा कह रहै थे कि मम्मी फोन नहीं उठा रही है

आरती- सो रही थी सुनाई नहीं दिया

सोनल- हाँ… मैंने भी यही कहा था (कुछ सोचते) थोड़ा बहुत घूम आया करो मम्मी जी पूरा दिन घर में रहने से आप भी पुम्मी आंटी जैसे मोटी हो जाएगी

आरती- अच्छा जी कहाँ जाऊ

सोनल- देखो मम्मी पापा को तो कमाने से फुर्सत नहीं है पर आप तो पढ़ी लिखी है घर के चार दीवारी से बाहर निकलो और देखो दुनियां में क्या चल रहा है और कुछ खर्चा भी किया करो, क्या करेंगे इतना पैसा जमा कर कोई तो खर्चा करे । मुझे तो करने देते नही।हीहीही हीहीही।

आरती- अच्छा दादी अम्मा जी ही ही ही ही

दोनों माँ और बेटी में हँसी मजाक चल रहा था और एक दूसरे को सिखाने में लगे थे

पर आरती का मन तो आज बिल्कुल साफ था आज का अनुभव उसके जीवन में जो बदलाब लाने वाला था उससे वो बिल्कुल अंजान थी। बातों में उसे दोपहर की घटना को वो भूल चुकी थी या फिर कहिए कि अब भी उसका ध्यान उस तरफ नहीं था वो तो सोनल के साथ हँसी मजाक के मूड में थी और शाम की पार्टी में जाने के लिए तैयार होने को जा रही थी। बहुत दिनों के बाद आज वो कही बाहर जा रही थी
 
चाय पीने के बाद सोनल अपने कमरे की ओर चली गई और आरती अपने कमरे की ओर तैयार जो होना था वारड्रोब से साडियो के ढेर से अपने लिए एक जड़ी की साड़ी निकाली और उसके साथ ही मैचिंग ब्लाउस रवि को बहुत पसंद था एक ड्रेस

यही सोचकर वो तैयारी में लग गई 9 तक रवि आ जाएगा सोचकर वो जल्दी से अपने काम में लग गई

करीब 9 15 तक रवि आ गया और अपने कमरे में पहुँचा कमरे में आरति लगभग तैयार थी । रवि को देखकर आरती ड्रेसिंग टेबल छोड़ कर खड़ी हो गई और मुस्कुराते हुए अपने आपको रवि के सामने प्रेज़ेंट करने लगी

रवि जो कि उसका दिमाग़ कही और था, आरती की सुंदरता को अपने सामने खड़े इस तरह की साड़ी में देखता रहता । आरती इस समय एक महीन सी साड़ी पहने हुए थी स्लीव्ले ब्लाउज था और चूचियां को समझ के ढका था पर असल में दिखाने की ज्यादा कोशिश थी साड़ी का पल्लू भी दाई चुचि को छोड़ कर बीच से होता हुआ कंधे पर गया था उससे दाई चूची बाहर की और उछलकर मुँह उठाए देख रहा था

लेफ्ट चुचि ढका क्या था सामने वाले को निमंत्रण था कि कोशिश करो तो शायद कुछ ज्यादा दिख जाए क्लीवेज साफ-साफ नीचे तक दिख रहे थे मुस्कुराते हुए आरती ने पलटकर भी रवि को अपना हुश्न दिखाया पीछे से पीठ आधे से ज्यादा खुले हुए थे पतली सी पट्टी ही उसे सामने से पकड़ी हुई थी और वैसे ही कंधे पर से पट्टी उतरी थी

रवि- (सिटी बजाते हुए) क्या बात है आज कुछ ज्यादा ही तैयार हो हाँ… कहाँ बिजली गिराने वाली हो

आरती- हीही और कहाँ जहां गिर जाए यहां तो कुछ फरक नहीं पड़ता क्यों है ना

रवि- हाँ… फिर आज नहीं जाते यही बिजली गिराती रहो ठीक है

आरती- ठीक है

रवि हँसते हुए बाथरूम में घुस गया और आरती भी वापस अपने आपको मिरर में सवारने का अंतिम टच दे रही थी

रवि भी जल्दी से तैयार होकर आरति को साथ में लेकर नीचे की चल दिया। रवि के साथ आरती भी नीचे की जा रही थी डाइनिंग रूम के पर करते हुए वो दोनों सोनल के कमरे की तरफ चल दिए ताकि उसको बोल कर जा सके

रवि- सोनल बेटा हम जा रहे है

सोनल- ठीक है पापा जी

रवि- बेटा जी, खाना खाकर जल्दी सो जाना।

सोनल--- ठीक है पापा जी। अंदर से ही आवाज दे रही थी।

रवि और आरती मुड़े और पलटकर वो बाहर की ओर चले

रवि- अरे रामु काका दरवाजा बंद कर लेना ।

आरती के शरीर में एक सिहरन सी फेल गई जैसे ही उसने रामू काका का नाम सुना उसने ना चाह कर भी पीछे पलटकर किचेन की ओर देख ही लिया शायद पता करना चाहती हो कि रामु काका ने उसे इस तरह से तैयार हुए देखा की नहीं

क्यों चाहती थी, आरती की रामू काका उसे देखे क्यों? पर आरती थोड़ा सा रुक गई । रवी आगे की ओर निकल गया था पलटकर आरती ने जब किचेन की ओर देखा तो पाया कि किचेन के पीछे के दरवाजे से कोई बाहर की ओर निकलते हुए भागा है।

किचेन में एक दरवाजा पीछे की तरफ भी खुलता था जिससे रामु कचरा बाहर फैंकता था या फिर नौकरो के आने जाने का था । बाहर निकलने वाला शायद कौन होगा

पर जो भी था इस समय किचेन में क्या कर रहा था शायद पानी या फिर कुछ खाने आया होगा जैसे ही वो बाहर को निकला वैसे ही रामू किचेन के दरवाजे पर दरवाजा बंद करने को डाइनिंग स्पेस पर निकलकर आया

अब रामु और आरती एकदम आमने सामने थे। रवि बाहर निकल गया था। आरती ड्राइंग रूम के बीच में खड़ी थी फुल्ली ड्रेसअप बिजली गिराती हुई कामसुख और मादकता लिए हुए सुंदर और सेक्सी दिखती हुई और किसी भी साधु या फिर सन्यासी की नियत को हिलाने के लिए ,

जैसे ही रामु और आरती की नजर आपस में टकराई दोनों जैसे जमीन में धस्स गये थे दोनों एक दूसरे को देखते रह गये। रामु की नजर तो जैसे जम गई थी। आरति के ऊपर नीचे से ऊपर तक एकटक निहारता रह गया वो आरती। को क्या लग रही थी किसी अप्सरा की तरह और रामू को देखकर आरती को दोपहर का वाकया याद आ गया कि कैसे रामू ने उसे रोंदा था और कैसे उसके हाथ और होंठों ने उसे छुआ और चूमा था हर वो पहलू दोनों के जेहन में एक बार फिर ताजा हो गई थी दोनों के आँखों में एक सेक्स की लहर दौड़ गई थी । आरती का पूरा शरीर सिहर गया था उसके जाँघो के बीच में हलचल मच गई थी निपल्स ब्रा के अंदर सख़्त हो गये थे

रामू का भी यही हाल था उसके धोती के अंदर एक बार फिर उसके पुरुषार्थ ने चिहुक कर अपने अस्तित्व की आवाज को बुलंद कर दिया था वो अपने को आजाद करने की गुहार लगाने लग गया था दोनों खड़े हुए एक दूसरे को देखते रह गये किसी ने भी आगे बढ़ने की या फिर नजर झुका के हटने की कोशिश नहीं की

पर बाहर से रवि की आवाज ने आरती और रामु को चौंका दिया। आरति पलटकर जल्दी से गाड़ी की ओर भाग गयी।

बाहर रवि गाड़ी के अंदर बैठ चुका था और गाड़ी का गेट खुला था । आरती ने अपने पल्लू को संभाल कर जल्दी से गाड़ी के पास आई और गाड़ी में बैठ गयी।

रामु मंत्रमुग्ध सा आरती के यौवन को निहारता रहा

और अपने आँखों में उसकी सुंदरता को उतारता रहा कामया ने एक बार ओर रामू काका की ओर देखा और चुपचाप दरवाजे से अंदर जाकर अपनी सीट पर बैठ गई । रामु भी लगभग दौड़ता हुआ दरवाजा बंद करने लगा। बाद में उसे पता ही नहीं चला था कि कैसे दो घंटे बीत गये थे और वो सिर्फ़ बहू के बारे में ही सोचता रहा गया था वो अपने अंदर एक ग्लानि से पीड़ित हो गया था छि छी वो क्या सोच रहा था जिनका वो नमक खाता है उनके घर की बहू के बारे में वो क्या सोच रहा था रवि को उसने दो साल का देखा था और तब से वो इस घर का नौकर था । नहीं उसे यह सब नहीं सोचना चाहिए यह गलत है वो कोई जानवर तो नहीं है वो एक इंसान है जो गलत है वो उसके लिए भी गलत है वो बाहर गार्डन में बैठा था।

पर उसका दिमाग पूरा समय इसी सोच में डूबा था। पर उसके मन का वो क्या करे वो चाह कर भी अपनी नजर बहू के ऊपर से नहीं हटा पाया था पर घर लौटते समय उसने एक बार भी बहू की ओर नहीं देखा था उसने अपने मन पर काबू पा लिया था इंसान अगर कोई चीज ठान ले तो क्या वो नहीं कर सकता बिल्कुल कर सकता है उसने अपने दिमाग पर चल रहे ढेर सारे सवाल को एक झटके से निकाल दिया और फिर से एक नमक हलाल नोकर के रूप में आ गया और गाड़ी घर के अंदर की ओर तेजी से दौड़ चलो थी अंदर बिल्कुल सन्नाटा था घर के गेट पर चौकी दार खड़ा था गाड़ी आते देखकर झट से दरवाजा खुल गया गाड़ी की आवाज से अंदर से रामू भी दौड़ कर आया और घर का दरवाजा खोलकर बाजू में सिर झुकाए खड़ा हो गया।

आरती भी जल्दी से अपनी नजर को नीचे किए रामू काका को पार करके सीधे सीडियो की ओर भागी और अपने रूम में पहुँची रूम में जाकर देखा कि रवि बाथरूम में है तो वो अपनी साड़ी उतारकर सिर्फ़ ब्लाउस और पेटीकोट में ही खड़ी होकर अपने आपको मिरर पर निहारती रही

वो जानती थी कि रवि के बाहर आते ही वो उसपर टूट पड़ेगा इसलिए वो वैसे ही खड़ी होकर उसका इंतजार करती रही हमेशा रवि उसे घूमके आने के बाद ऐसे ही सिर्फ़ साड़ी उतारने को ही कहता था बाकी उसका काम था आग्याकारी पत्नी की तरह आरती खड़ी रवि का इंतजार कर रही थी और बाथरूम का दरवाजा खुला । आरती को मिरर के सामने देखकर रवि भी उसके पास आ गया और पीछे से आरती को बाहों में भरकर उसके चूचियां को दबाने लगा

आरती के मुख से एक अया निकली और वो अपने सिर को रवि के कंधों के सहारे छोड़ दिया और रवि के हाथों को अपने शरीर में घूमते हुए महसूस करती रही वो रवि का पूरा साथ देती रही और अपने आपको रवि के ऊपर न्योछाबर करने को तैयार थी। रवि के हाथ आरती की दोनों चुचियों को छोड़ कर उसके पेट पर आ गये थे और अब वो आरती की नाभि को छेड़ रहा था वो अपनी उंगली को उसकी नाभि के अंदर तो कभी बाहर करके आरती को चिढ़ा रह था । अपने होंठों को आरती के गले और गले से लेजाकर उसके होंठों पर रखकर वो आरती के होंठों से जैसे सहद को निकालकर अपने अंदर लेने की कोशिश कर रहा था। आरति भी नहीं रहा गया वो पलटकर रवि की गर्दन के चारो और अपनी बाहों को पहना कर खुद को रवि से सटा लिया और अपने पेट और चुत को वो रवि से रगड़ने लगी थी उसके शरीर में जो आग भड़की थी वो अब रवि ही बुझा सकता था

वो अपने आपको रवि के और भी नजदीक ले जाना चाहती थी और अपने होंठों को वो रवि के मुख में घुसाकर अपनी जीब को रवि के मुख में चला रही थी रवि का भी बुरा हाल था वो भी पूरे जोश के साथ आरती के बदन को अपने अंदर समा लेना चाहता था वो भी आरती को कस्स कर अपने में समेटे हुए धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ा और गिरते ही रवि आरति के ब्लाउसपर टूट पड़ा जल्दी-जल्दी उसने एक झटके में आरति के ब्लाउसको हवा में उछाल दिया और ब्रा भी उसके कंधे से उसी तरह बाहर हो गई थी । आरति के ऊपर के वस्त्र के बाद रवि ने आरति के पेटीकोट और पैंटी को भी खींचकर उत्तार दिया और बिना किसी देरी के वो आरती के अंदर एक ही झटके में समा गया

आरती उउउफ तक नहीं कर पाई अऔर रवि उसके अंदर था अंदर और अंदर और भी अंदर और फिर रवि किसी पिस्टन के तरह आरति के अंदर-बाहर होता चला गया । आरती के अंदर एक ज्वार सा उठ रही थी और वो लगभग अपने शिखर पर पहुँचने वाली ही थी। रवि जिस तरह से उसके शरीर से खेल रहा था उसको उसकी आदत थी वो रवि का पूरा साथ दे रही थी और उसे मजा भा आ रहा था उधर रवि भी अपने आपको जब तक संभाल सकता था संभाल चुका था अब वो भी रवि के शरीर के ऊपर ढेर होने लग गया था अपनी कमर को एक दो बार आगे पीछे करते हुए वो निढाल सा आरती के ऊपर पड़ा रहा और आरति भी रवि के साथ ही झड चुकी थी और अपने आपको संतुष्ट पाकर वो भी खुश थी वो रवि को कस्स कर पकड़े हुए उसके चेहरे से अपना चेहरा घिस रही थी और अपने आपको शांत कर रही थी जैसे ही रवि को थोड़ा सा होश आया वो लुढ़क कर आरति के ऊपर से हाथ और अपने तकिये पर सिर रख कर आरति की ओर देखते हुए

रवि- स्वीट ड्रीम्स डार्लिंग

आरती- स्वीट ड्रीम्स डियर और उठकर वैसे ही बिना कपड़े के बाथरूम की ओर चल दी। तभी उसे खिड़की के बाहर फिर से साया नजर आया। आज फिर वो न्नगी थी खिड़की पर जा नही सकी। वो सोचतेहुए बाथरूम में गुस गयी। जब वो बाहर आई तो रवि सो चुका था और वो अपने कपड़े जो कि जमीन पर जहां तहाँ पड़े थे उसको समेट कर वारड्रोब में रखा और अपनी जगह पर लेट गई और सीलिंग की ओर देखते हुए रवि की तरफ नज़रें घुमा ली जो कि गहरी नींद में था। आरति अपनी ओर पलटकर सोने की कोशिश करने लगी और बहुत ही जल्दी वो भी नींद के आगोस में चली गई।

सुबह रोज की तरह वो लेट ही उठी। रवि बाथरूम में था वो भी उठकर अपने आपको मिरर में देखने के बाद रवि का बाथरूम से निकलने का वेट करने लगी

जब रवि निकला तो वो भी बाथरूम में घुस गई और कुछ देर बाद दोनों चेंज करके नीचे सोनल के साथ चाय पीरहे थे। आरती और रवि एक दूसरे से बातों में इतना व्यस्त थे कि सोनल का ध्यान किसी को नहीं था और न हीं सोनल को कोई इंटेरस्ट था इन सब बातों में वो तो बस अपने आप में ही खुश रहने वाली लड़की थी और कोई ज्यादा अपेक्षा नहीं थी उसे किसी से।

अपने घर वालों से एक तो किसी बात की बंदिश नहीं थी उसे यहां और ना ही कोई रोक टोक और नहीं ही कोई काम था तो क्या शिकायत करे । वो बस अपने मे खुश रहती थी। न ही स्कूल में किसी से ज्यादा मेलजोल। सबकी चाय खतम हुई और सब अपने कमरे की ओर चल दिये। पूरे घर में फिर से शांति सब अपने कमरे में जाने की तैयारी में लगे थे। आरती वही बिस्तर बैठी रवि के बाथरूम से निकलने की राह देख रही थी और उसके कपड़े निकालकर रख दिए थे वो बैठे बैठे सोच रही थी कि रवि बाथरूम से निकलते ही जल्दी से अपने कपड़े उठाकर पहनने लगा

रवि-् हाँ… आरती आज तुम क्या गाड़ी चलाने जाओगी

आरती- आप बताइए

रवि- नहीं नहीं मेरा मतलब है कि शायद मैं थोड़ा देर से आऊँगा तो अगर तुम भी कही बीजी रहोगी तो अपने पति की याद थोड़ा कम आएगी हीही

आरति- कहिए तो पूरा दिन ही गाड़ी चलाती रहूं

रवि- अरे यार तुमसे तो मजाक भी नहीं कर सकते

आरती- क्यों आएँगे लेट

रवि- काम है यार

आरती- ठीक है पर क्या मतलब कब तक चलाती रहूं

रवि- अरे जब तक तुम्हें चलानी है तब तक और क्या मेरा मतलब था कि कोई जरूरत नहीं है जल्दी बाजी करने की

आरती- ठीक है पर क्या रात को इतनी देर तक में वहां ग्राउंड पर मनोज अंकल के साथ मेरा मतलब

रवि- अरे यार तुम भी ना , मनोज अंकल हमारे बहुत ही पुराने जानकार है अपनी जान दे देंगे पर तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे

आरती- जी पर

रविवि- क्या पर वर छोड़ो मैं छोड़ दूँगा तुम तैयार रहेना ठीक है जब भी आए चली जाना

आरति- जी

और दोनों नीचे की ओर चल दिए डाइनिंग रूम में खाना लगा था। रवि के बैठ-ते ही आरति ने प्लेट मे खाना लगा दिया और पास में बैठकर रवि को खाते देखती रही । रवि जल्दी-जल्दी अपने मुख में रोटी और सब्जी ठूंस रहा था और जल्दी से हाथ मुँह धोकर बाहर को लपका रवि के जाने के बाद आरती भी अपने रूम की ओर चल दी पर जाते हुए उसे रामु काका डाइनिंग टेबल के पास दिख गये वो झूठे प्लेट और बाकी का समान समेट रहे थे। आरती के कदम एक बार तो लडखडाये फिर वो सम्भल कर जल्दी से अपने कमरे की ओर लपकी और जल्दी से अपने कमरे में घुसकर दरवाजा लगा लिया पता नहीं क्यों उसे डर लग रहा था अभी थोड़ी देर में ही सोनल भी चली जाएँगी और तब वो क्या करेगी अभी आते समय उसने रामू काका को देखा था पता नहीं क्यों उनकी आखों में एक आजीब सी बात थी की उनसे नजर मिलते ही वो काप गई थी उसकी नजर में एक निमंत्रण था जैसे की कह रहा था कि आज का क्या आरति।

बाथरूम में जल्दी से घुसी और जितनी जल्दी हो सके तैयार होकर नीचे जाने को तैयार थी जब उसे लगा कि सोनल डाइनिंग टेबल पर पहुँच गयी होगी तो वो भी सलवार कुर्ता पहने हुए डाइनिंग टेबल पर पहुँच गई और सोनल के पास बैठ गई । सोनल को भी कोई आपत्ति नहीं थी या फिर कोई शक या शुबह नहीं। रामु काका ने भी आरती का प्लेट लगा दिया और आरती ने नज़रें झुका कर अपना खाना शुरू रखा ।

और सोनल की ओर देखते हुए

आरती- हाँ…सोनल बेटा आज मुझे जाना है गाड़ी सीखने, तुम शाम को घर पर रहना।

सोनल- जी मम्मी जी, रामु काका है ना और मोनिका दी को बुला लुंगी।

और आरति के सोए हुए अरमान फिर से जाग उठे थे जिस बात को वो भूल जाना चाहती थी । सोनल ने एक बार फिर से याद दिला दिया था वो आज अकेले नहीं रहना चाहती थी और ना ही रामु काका के करीब ही आना चाहती थी कल की गलती का उसे गुमान था वो उसे फिर से नहीं दोहराना चाहती थी पर ना जाने क्यों जैसे ही सोनल ने रामु काका का नाम लिया तो उसे कल की दिन की घटना याद आ गई थी और फिर खाते खाते रात की बात

उसके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई थी वो ना चाहते हुए भी एक जोर की सांस छोड़ी और अपने जाँघो को आपस में जोड़ लिया और नज़रें झुका के खाने लगी पर मन था कि बार-बार उसके जेहन में वही बात याद डालती जा रही थी वो आपने आपसे लड़ने लगी थी अपने मन से या फिर कहिए अपने दिमाग से बार-बार वो अपनी निगाहे उठाकर की ओर देखने लगी थी कि शायद कोई और बात हो

तो वो यह बात भूलकर कहीं और इन्वॉल्व हो जाए पर कहाँ सेक्स एक ऐसा खेल है या फिर कहिए एक नशा है कि पेट भरने के बाद सबसे जरूरी शारीरिक भूक पेट की भूख बुझी नहीं कि पेट के नीचे की चिंता होने लगती है और,,,,

आरती तो एक बार वो चख चुकी थी और उसका पूरा मजा भी ले चुकी थी वो तो बस उसको अवाय्ड करना चाहती थी वो यह अच्छे से जानती थी, कि अगर वो ना चाहे तो रामू क्या रामू का बाप भी उसे हाथ नहीं लगा सकता था और वो तो इस घर का नौकर है किसे क्या बताएगा एक शिकायत में तो वो घर से बाहर हो जाएगा इसलिए उसे इस बात की चिंता तो बिल्कुल नहीं थी की रामु उसके साथ कोई गलत हरकत कर सकता है पर वो अपने आपको कैसे रोके यही सोचते हुए ही तो वो आज सोनल के साथ ही खाना खाने को आ गई थी अभी जब रवि गया था तब भी उसकी आखें रामु से टकराई थी उसने रामु काका की आखों में वही भूख देखी थी या फिर शायद इंतजार देखा था जो कि उसके लिए खतरनाक था अगर वो नहीं संभली तो पता नहीं क्या होजायगा

यही सोचते हुए वो अपनी निगाहे झुकाए खाना खा रही थी। सोनल का नास्ता हो गया तो वो जल्दी-जल्दी करने लगी

सोनल- अरे अरे मम्मी आराम से ख़ालो ।

आरती- बस हो गया और आखिरी नीवाला किसी तरह से अपने मुँह में ठूँसा और पानी के ग्लास पर हाथ पहुँचा दिया

सोनल भी हँसते हुए उठ गई और आरति भी

दोनो उठकर हाथ मुँह धोया और बाहर निकल कर बस का इंतजार करने लगे ।

सोनल के जाते ही आरती पीछे-पीछे अपने कमरे की ओर बढ़ गई थी ना जाने क्यों वो अपने को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी या फिर डर था कही कोई फिर से गलत कदम ना उठा ले या फिर अपने शरीर की भूख को संभालने की चेष्टा थी यह जो भी हो वो सोनल के जाते साथ ही अपने कमरे में आ गई थी आते समय जब उसका ध्यान डाइनिंग टेबल पर गया तो देखा कि डिननिग टेबल साफ था मतलब रामू काका ने आज जल्दी ही टेबल साफ कर दिया था नहीं तो वो हमेशा ही सबके अपने कमरे में पहुँचने का इंतजार करता था और फिर आराम से डाइनिंग टेबल साफ करके वर्तन धो कर रख देता था अंदर किचेन से वर्तन धोने की आवजे भी आ रही थी वो कुछ और ज्यादा नहीं सोचते हुए जल्दी से कमरे में घुस गई फिर मुड़ कर वपिश आयी,

एक लंबी सी सांस फेक कर रूम के बाहर आते ही वो थोड़ा सा सचेत हो गई थी उसकी नजर अनायास ही डाइनिंग रूम और फिर उसके आगे किचेन तक चली गई थी पर वहां शांति थी बिल्कुल सन्नाटा वो थोड़ा रुकी और थोड़ा धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाते हुए सीडियो की ओर चली पर उसे कोई भी आहट सुनाई नहीं दी कहाँ है रामू काका किचेन में नहीं है क्या या फिर अपने कमरे में चले गये होंगे ऊपर या फिर सोचते हुए आरति सीडियो पर चढ़ती हुई अपने कमरे की ओर जा रही थी पर ना जाने क्यों उसका मन बार-बार किचेन की ओर देखने को हो रहा था शायद इसलिए कि कल दोपहर को जो घटना हुई थी क्या वो रामू कका भूल गये थे या फिर घर छोड़ कर भाग गये थे या फिर कुछ और ......

वो सीडिया चढ़ती जा रही थी और सोच रही थी क्या रामु काका उससे एक बार खेल कर ही उसे भूल गये है पर वो तो नहीं भूल पाई तो क्या वो जितनी सुंदर और सेक्सी लगती थी वो अब नहीं रही। क्या रामू काका भी एक बार के बाद उसे फिर से अपने साथ सेक्स के लिए लालायित नहीं होंगे मैंने तो सुना था कि आदमी एक बार किसी औरत को भोग ले तो बार-बार उसकी इच्छा करता है और वो तो इतनी खूबसूरत है और उसने इस बात की पुष्टि भी की थी उसे रामू काका की नज़रों में ही यह बात दिखी थी पर अभी तो कही गायब ही हो गये थे वो सीढ़ियाँ चढ़ना भूल गई थी वही एक जगह खड़ी होकर एकटककिचेन की ओर ही देख रही थी

कुछ सोचते हुए वो फिर से नीचे की ओर उत्तरी और धीरे-धीरेकिचेन की ओर चल दी उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था पर फिर भी हिम्मत करके वो किचेन की ओर जा रही थी पर क्यों क्या पता नहीं पर आरती के पैर जो कि अपने आप ही किचेन की ओर जा रहे थे किचेन के दरवाजे पर पहुँचकर उसने अंदर देखा वहाँ शांति थी वो थोड़ा और

आगे बढ़ी तो उसे रामू काका के पैर देखे वो शायद नीचे फ्लोर पर पोछा लगा रहे थे उसे अपने को इस स्थिति में पाकर आगे क्या करे सोचने का टाइम भी ना मिला कि तभी रामु की नजर आरति पर पड़ गई वो आरती को दरवाजे पर खड़ा देखकर जल्दी से उठा और अपने धोती को संभालते हुए हाथ पीछे करके खड़ा हो गया

और

रामू- जी बहू रानी कुछ चाहिए

आरती -- जी वो पानी

रामू- जी बहू रानी

उसकी नजर अब भी नीचे ही थी पर बहू के इस समय अपने पास खड़े होना उसके लिए एक बहुत बड़ा बरदान था वो नजरें झुकाए हुए आरती की टांगों की ओर देख रहा था और पानी का ग्लास फिल्टर से भरकर आरती की ओर पलटा आरती ने हाथ बढ़ाकर ग्लास लिया तो दोनों की उंगलियां आपस में टच हो गये आरती और रामु के शरीर में एक साथ एक लहर सी दौड़ गई और शरीर के कोने कोने पर छा गई वो एक दूसरे को आखें उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे

पर किसी तरह आरती ने पानी पिया पिया वो तो अपने आपको रामू के सामने पाकर कुछ और नहीं कह पाई थी तो पानी माँग लिया था और झट से ग्लास प्लतेफोर्म में रख कर पलट गई और अपने कमरे की ओर चल दी

रामू वही खड़ा-खड़ा अपने सामने सुंदरी को जाते हुए देखता रहा वो चाहता था कि आरती रुक कर उससे बात करे कुछ और नहीं भी करे तो कम से कम रुक जाए और वही खड़े रहे वो उसको देखना चाहता था बस देखना चाहता था नजर भर के पर वो तो जा रही थी उसका मन कर रहा था कि जाके रोक ले वो बहू को और कल की घटना के बारे में पूछे कि कल क्यों उसने वो सब किया मेरे साथ पर हिम्मत नहीं हुई वो अब भी आरती को सीडिया चढ़ते देख रहा था किसी पागल भिखारी की तरह जिसे सामने जाती हुई राहगीर से कुछ मिलने की आसा अब भी बाकी थी

तभी आरती आखिरी सीढ़ी में जाकर थोड़ा सा रुकी और पलट कर किचेन की ओर देखी पर रामू को उसकी तरफ देखता देखकर जल्दी से ऊपर चली गई रामू अब भी अपनी आखें फाड़-फाड़कर सीडियो की ओर यूँ ही देख रहा था पर वहाँ तो कुछ भी नहीं था सबकुछ खाली था और सिर्फ़ उसके जाने के बाद एक सन्नाटा सा पसर गया था उसे कोने में

कोने में ही नही बल्कि पूरे घर में वो भी पलटा और अपने काम में लग गया पर उसके दिमाग में बहू की छवि अब भी घूम रही थी सीधी साधी सी लगने वाली बहू रानी अभी भी उसके जेहन पर राज कर रही थी कितनी सुंदर सी सलवार कमीज पहेने हुए थी और उसपर कितना जम रहा था

उसका चेहरा कितना चमक रहा था कितनी सुंदर लगती थी वो पर वो अचानक किचेन में क्यों आई थी रामू का दिमाग ठनका हाँ… यार क्यों आई थी वो तो कमरे में थी और अगर पानी ही पीना था तो उनके कमरे में भी पानी था तो वो यहां क्यों आई थी कही सिर्फ़ उसे देखने के लिए तो नहीं या फिर कल के बारे में कुछ कह रही हो या फिर उसे फिर से बुला रही हो अरे यार उसने पूछा क्यों नहीं कि और कुछ चाहिए क्या क्या बेवकूफ है वो धत्त तेरी की अच्छा मौका था निकल गया अब क्या करे अभी भी शाम होने को देर थी क्या वो बहू को जा करके पूछे अरे नहीं कही बहू ने शिकायत कर दी तो

वो अपने दिमाग को एक झटका देकर फिर से अपने काम में जुट गया था पर ना चाहते हुए भी उसकी नजर सीडियो की ओर चली ही जाती थी

और उधर आरती ने जब पलटकर देखा था तो वो बस इतना जानना चाहती थी कि रामु क्या कर रहा था पर उसे अपनी ओर देखते हुए पाकर वो घबरा गई थी और जल्दी से अपने कमरे में भाग गई थी और जाकर अपने कमरे की कुण्डी लगाकर बिस्तर पर बैठ गई थी पूरे घर में बिल्कुल शांति थी पर उसके मन में एक उथल पुथल मची हुई थी उसने अपनी चुन्नि को उतार फेका और चित्त होकर लेट गई वो सीलिंग की ओर देखते हुए बिस्तर पर लेटी थी उसकी आखों में नींद नहीं थी उसका दिल जोरो से धड़क रहा था उसके शरीर में एक अजीब सी कसक सी उठ रही थी वो ना चाहते हुए भी अपने आपको अपने में समेटने की कोशिश में लगी हुई थी वो एक तरफ घूमकर अपने को ही अपनी बाहों में भरने की कोशिश कर रही थी

पर नहीं वो यह नहीं कर पा रही थी उसे रामू काका की नज़रें याद आ रही थी उसके पानी देते समय जो उंगलियां उससे टकराई थी वो उसे याद करके सनसना गई थी वो एक झटके से उठी और बेड पर ही बैठे बैठे अपने को मिरर में देखने लगी बिल्कुल भी सामान्य नहीं लग रही थी वो मिरर में पता नहीं क्या पर कुछ चाहिए था क्या पता नहीं हाँ… शायद रामू हाँ… उसे रामू काका के हाथ अपने पूरे शरीर में चाहिए थे उसने बैठे बैठे ही अपनी सलवार को खोलकर खींचकर उतार दिया और अपनी गोरी गोरी टांगों को और जाँघो को खुद ही सहलाने लगी थी जो अच्छी शेप लिए हुए थे उसके टाँगें पतली और सिडौल सी गोरी गोरी और कोमल सी उसकी टांगों को वो सहलाते हुए उनपर रामू काका के सख़्त हाथों की कल्पना कर रही थी उसकी सांसें अब बहुत तेज चलने लगी थी।

उसके हाथ अपने आप ही उसके कुर्ते के अंदर उसकी गोलाईयो की ओर बढ़ चले थे जैसे की वो खुद को ही टटोल कर देखना चाहती थी कि क्या वो वाकई इतनी सुंदर है या फिर ऐसे ही हाँ वो बहुत सुंदर है जब उसके हाथ उसके कुर्ते के अंदर उसकी गोलाईयों पर पहुँचे तो खुद को रोक नहीं पाई और खुद ही उन्हें थोड़ा सा दबाकरदेखा उसके मुख से एक आआह्ह निकली कितना सुख है पर अपने हाथों की बजाए और किसी के हाथों से उसे मजा दोगुना हो जाएगा । रवि भी तो कितना खेलता है इन दोनों से पर अपने हाथों के स्पर्श का वो आनंद उसे नहीं मिल पा रहा था उसने अपने कुर्ते को भी उतार दिया और खड़े होकर अपने को मिरर में देखने लगी थी।
 
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