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आजाद पंछी जम के चूस complete

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सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में वो कितनी खूबसूरत लग रही थी लंबी-लंबी टाँगों से लेकर जाँघो तक बिल्कुल सफेद और चिकनी थी वो कमर के चारो ओर पैंटी फँसी हुई थी जो की उसकी जाँघो के बीच से होकर पीछे कही चली गई थी

बिल्कुल सपाट पेट और उसपर गहरी सी नाभि और उसके ऊपर उसके ब्रा में क़ैद दो ठग हाँ… रवि उनको ठग ही कहता था मस्त उभार लिए हुए थे आरती अपने शरीर को मिरर में देखते हुए कही खो गई थी और अपने हाथों को अपने पूरे शरीर पर चला रही थी और अपने अंदर सोई हुई ज्वाला को और भी भड़का रही थी वो नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा पर उसे ऐसा अच्छा लग रहा था आज पहली बार आरती अपने जीवन काल में अपने को इस तरह से देखते हुए खेल रही थी

वो अपने आपसे खेलते हुए पता क्यों अपनी ब्रा और पैंटी को भी धीरे से उतार कर एक तरफ बड़े ही स्टाइल से फेक दिया और बिल्कुल नग्न अवस्था, में खड़ी हुई अपने आपको मिरर में देखती रही उसने आपने आपको बहुत बार देखा था पर आज वो अपने आपको कुछ अजीब ही तरह से देख रही थी उसके हाथ उसे पूरे शरीर पर घूमते हुए उसे एक अजीब सा एहसास दे रहे थे उसके अंदर एक ज्वाला सा भड़क रही थी जो कि अब उसके बर्दास्त के बाहर होती जा रही थी उसकी उंगलियां धीरे-धीरे अपने निपल्स के ऊपर घुमाती हुई आरती अपने पेट की ओर जा रही थी और अपने नाभि को भी अंदर तक छू के देखती जा रही थी दूसरे हाथों की उंगलियां अब उसकी जाँघो के बीच में लेने की कोशिश में थी वो उसके मुख से एक हल्की सी सिसकारी पूरे कमरे में फेल गई और वो अपने सिर को उचका करके नाक से और मुख से सांसें छोड़ने लगी उसकी जाँघो के बीच में अब आग लग गई थी वो उसके लिए कुछ भी कर सकती थी हाँ… कुछ भी वो एकदम से नींद से जागी और फिर से अपने आपको मिरर में देखते हुए अपने आपको वारड्रोब के पास ले गई और एक सफेद पेटीकोट और ब्लाउस निकाल कर पहनने लगी बिना ब्रा के ब्लाउस पहनने में उसे थोड़ा सा दिक्कत हुई पर, ठीक है वो तैयार थी अपने बालों को एक झटका देकर वो अपने को एक बड़े ही मादक पोज में मिरर की ओर देखा और लड़खड़ाती हुई सीढ़ियों तक पहुँची और किचेन का दरवाजा देखा और हल्के स्वर में आवाज लगाई और एक दम से पीछे हट गई

किचेन में हल्की आवाज आते ही रामू उठा और बाहर देखा।

आरति ने तुरंत खुद को छिपा लीया, और खंबे के पीछे खुद को रखकर तेज-तेज सांसें लेने लगी

उसके अंतर मन में एक ग्लानि सी उठ रही थी ना चाहते हुए भी उसने आवाज दी और बिस्तर पर बैठे बैठे सोचने लगी क्या कर रही है वो एक इतने बड़े घर की बहू को क्या यह सोभा देता है अपने घर के नौकरके साथ और वो भी इसी घर में क्या वो पागल हो गई है नहीं उसे यह सब नहीं करना चाहिए वो सोचते हुए बिस्तर पर लूड़क गई और अपने दोनों हाथों से अपने को समेटे हुए वैसे ही पड़ी रही उसका पूरा शरीर जिस आग में जल रहा था उसके लिए उसके पास कोई भी तरीका नहीं था बुझाने को पर क्या कर सकती थी वो जो वो करना चाहती थी वो गलत था पर पर हाँ… नहा लेती हूँ सोचकर वो एक झटके से उठी और तौलिया हाथ में लिए बाथरूम की ओर चल दी उसका पूरा शरीर थर थर काप

रहा था और शरीर से पसीना भी निकल रहा था वो कुछ धीरे कदमो से बाथरूम की ओर जा ही रही थी कि दरवाजे पर एक हल्की सी क्नॉच से वो चौंक गई

वो जहां थी वही खड़ी हो गई और ध्यान से सुनने की कोशिस करने लगी नहीं कोई आहट नहीं हुई थी शायद उसके मन का भ्रम था कोई नहीं है दरवाजे पर जया, नही जया तो नीचे बाहर कपड़े धो रही होंगी और कौन हो सकता है रामू काका, अरे नहीं वो इतनी हिम्मत नहीं कर सकता वो क्यों आएगा

और उधर रामू काका ने आवाज सुनी थी खड़ा का खड़ा रह गया था सोचता हुआ कि क्या हुआ बहू को कही कोई चीज तो नहीं चाहिए शायद भूल गई हो नीचे या फिर कोई काम था उससे या कुछ और वो धीरे से किचेन से निकला और ऊपर सीडियो की ओर देखता रहा पर कही कोई आवाज ना देखकर वो बड़ी ही हिम्मत करके ऊपर की ओर चला और बहू के कमरे की ओर आते आते पशीना पशीना हो गया बड़ी ही हिम्मत की थी उसने आज दरवाजे पर आकर वो चुपचाप खड़ा हुआ अंदर की आवाज को सुनने की कोशिश करने लगा था एक हल्की सी आहट हुई तो वो कुछ सोचकर हल्के से दरवाजे पर एक कान करके खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा था पर कोई आहट नहीं हुई तो यह सोचते हुए नीचे की ओर चल दिया की शायद बहू सो गई होगी

अंदर आरति का पूरा ध्यान दरवाजे पर ही था नारी मन की जिग्याशा ही कहिए वो अपने को उस नोक का कारण जानने की कोशिश में दरवाजे की ओर चली और कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगी कि कही कोई आहट या फिर कोई चहल पहल की आवाज हो रही है कि नहीं पर कोई आवाज ना देखकर वो दरवाजे की कुण्डी खोलकर बाहर की ओर देखती है पर कोई नहीं था वहाँ कुछ भी नहीं था तो वो बाहर आ गई थी बाहर भी कोई नहीं था लेकिन आचनक ही उसकी नजर सामने सीढ़ियो पर पड़ी तो वहां रामू खड़ा था जो कि अब उसी की ओर देख रहा था आरति ने अब भी सफेद ब्लाउस और पेटीकोट ही पहना हुआ था और हाथ में तौलिया था वो रामू काका को सीढ़ियो में देख कर सबकुछ भूल गई थी उसे अपने आपको ढकने की बात तो दूर वो फिर से अपने को उस आग की गिरफ़्त में पाती जा रही थी जिस आग से वो अब तक निकलने की कोशिश कर रही थी

उसकी सांसों में अचानक ही तेजी आ गई थी और वो उसकी धमनिओ से टकरा रही थी रामु सीढ़ियो में खड़ा-खड़ा बहू के इस रूप को देख रहा था बहू तो कल जैसे ही स्थिति में है ती क्या वो आज भी मालिश के बहाने उसे बुला रही थी हाँ शायद पर अब क्या करे वो हिम्मत करके सीढ़ियो में ही घुमा और बहू की ओर कदम बढ़ाया अपने सामने इस तरह से खड़ी कोई स्वप्न सुंदरी को कैसेछोड़ कर जा सकता था वो उसका दीवाना था वो तो उस रूप का पुजारी था उस रूप को उसकाया को वो भोग चुका था उसकी मादकता और नाजूक्ता का अनुमान था उसे उसके लिए वो तो कब से लालायित था और वो उसके सामने इस तरह से खड़ी थी । रामू अपने आपको रोक ना पाया और बड़े ही सधे हुए कदमो से बहू की ओर बढ़ने लगा

और आरती ने जब रामु काका को अपनी ओर बढ़ते हुए देखा तो जैसे वो जमीन में गढ़ गई थी उसकी सांसें जो कि अब तक उसकी धमनियों से ही टकरा रही थी अब उसके मुँह से बाहर आने को थी हर सांस के साथ उसके मुख से एक हल्की सी सिसकारी भी निकलने लगी थी उसके शरीर के हर एक रोएँ में सेक्स की एक लहर दौड़ गई थी उसे रामु काका के हाथ और उनके शरीर के बालों का गुच्छे याद आने लगे थे कल जब रामु काका ने उसे अपनी बाहों में लेकर रोंधा था वो एक-एक वाकया उसे याद आने लगा था वो खड़ी-खड़ी काँपने लगी थी उसका शरीर ने एक के बाद एक झटके लेना शुरू कर दिया था वो खड़े-खड़े लड़खड़ा गई थी और दीवाल का सहारा लेने को मजबूर हो गई थी उसकी और रामु काका की आखें एक दूसरे की ओर ही थी एक बार के लिए भी नहीं हटी थी अब आरती पीछे दीवार के सहारे खड़ी थी कंधा भर टिका था दीवाल से और पूरा शरीर पाँव के सहारे खड़ा था सांसों की तेजी के साथ आरती की चूचियां अब ज्यादा ही ऊपर की ओर उठ जा रही थी वो नाक और मुख से सांस लेते हुए रामू काका को अपने करीब आते देख रही थी रामू करीब और करीब आते हुए उसके बहुत नजदीक खड़ा हो गया अब रामु की नजर बहू के शरीर का अवलोकन कर रही थी वही शरीर जिसे कल उसने भोगा था और बहुत ही अच्छे तरीके से भोगा था जैसा मन किया था वैसे ही आज फिर वो उसके सामने खड़ी थी कल जैसे ही परिस्थिटी में और, खुल्ला आमंत्रण था रामु को वो सिर से पैर तक बहू को निहारता रहा और

रामु की नजर एक बार फिर से बहू के चेहरे पर पड़ी और उनको देखते हुए उसने अपने हाथों को बहू की ओर बढ़ाया धीरे से उसने बहू के पेट को छुआ

आरती- आआआआआआअह्ह उूुुुुुुुुउउम्म्म्मममममममममम

रामु के हाथों में जैसे मखमल आ गया हो नाजुक नाजुक और नरम नरम सा बहू का पेट उसकी सांसों के साथ अंदर-बाहर और ऊपर नीचे होते हुए वो अपने हाथों को एक जगह नहीं रख पाया वो अपने दूसरे हाथ को भी लाकर बहू के पेट पर रख दिया और अपने दोनों हाथों से उसको सहलाने लगा बल्कि कहिए उनका नाप लेने लगा वो अपने हाथों से बहू के पेट का आकार नाप रहा था और उस ऊपर वाले की रचना को महसूस कर रहा था वो अपनी आखें गढ़ाए बहू के पेट को ऊपर से देख भी रहा था और अपने हाथों से उस रचना की तारीफ भी कर रहा था उसकी आखों के सामने बहू की दोनों चूचियां अपनी जगह से आजाद होने की कोशिश कर रही थी वो अपने हाथों को धीरे से बहू के ब्लाउसकी ओर ले जाने लगा कि आचनक ही बहू लड़खड़ाई और रामु की सख़्त बाहों ने बहू को संभाल लिया अब बहू भीमा की ग्रफ्त में थी और बेसूध थी उसकी आखें बंद सी थी नथुने फूल रहे थे मुख से सिसकारी निकल रही थी उसका पूरा शरीर अब रामू के हाथों में था उसके भरोसे में था वो चाहे तो वही पटक कर बहू को भोग सकता था या फिर उठाकर अपने कमरे में ले जा सकता था या फिर अंदर उसी के कमरे में कल जैसे बिल्कुल नंगा करके उसके सारे शरीर को जो चाहे वो कर सकता था उसकी आखें बहू की चेहरे पर थी वो अपना सबकुछ रामु के हाथों में सौंप कर लंबी-लंबी सांसें लेते हुई उसकी बाहों ले लटकी हुई थी। रामु उस अप्सरा को अपने बाहों में संभाले हुए अपने एक हाथों से उसकी पीठ को सहारा दिया और दूसरे हाथ से उसके पैरों के नीचे से हाथ डालकर एक झटके से उसे उठाकर उसी के बेडरूम में घुस गया वो कमरे में आते ही अपने हाथों की उस सुंदर और कामुक काया को कहाँ रखे सोचने लगा उसके हाथों में आरती एक बेसूध सी जान लग रही थी एक रति के रूप में वो लगभग बेहोशी की मुद्रा में थी उसे सब पता था कि

क्या चल रहा था पर उसके हाथों से अब बात निकल चुकी थी वो अब रामू को भेट चढ़ चुकी थी या कहिए वो अपने को रामु के सुपुर्द कर चुकी थी अब वो इस खेल का हिस्सा बनने को तैयार थी । अब वो उसे दैत्यकाय के हर उस पुरुषार्थ को सहने को तैयार थी जो कि उसे चाहिए था जो कि उसे रवि से नहीं मिला था या फिर उसे नहीं पता था इतनी दिनों तक वो अब अपने आपको किसी भी स्थिति में रोकना नहीं चाहती थी रामु के गोद में वो ऐसी लग रही थी कि कोई बनमानुष उसे उठाकर अपने हवस का शिकार करने जा रहा हो वो तैयार थी उस बनमानुष को झेलने को उसे राक्षस को अपने अंदर समा लेने को वो चुपचाप उस राक्षस का साथ दे रही थी उसके हर कदम को देख भी रही थी और समझ भी रही थी जैसे कह रही हो करो और करो जो मन में आए करो पर मेरे तन की आग को ठंडा करो प्लीज

रामु अपने हाथों में बहू को उठाए कमरे में दाखिल हुआ और सोचने लगा की अब क्या करे पर वो खुद ही बिना किसी इजाज़त के बहू को उसके बिस्तर तक ले गया और धीरे से हाँ बहुत ही धीरे से बहू को उसके बिस्तर पर लिटा दिया बहू अब सिर और नितंबों और पैरों के तले को रखकर बिस्तर पर लेटी हुई थी। आरती को जैसे ही रामु ने बिस्तर पर रखा वो एक जल बिन मछली की तरह से तड़प उठी उसके हाथ पाँव और सिर बिस्तर पर अपने आपसे इधर उधर होने लगे थे वो अपने को रामु के शरीर से अलग नहीं करना चाहती थी वो जब रामु उसे अपने गोद में भरकर लाया था तो उसके नथुनो में रामु के पसीने की खुशबू को सूंघ कर ही बेसूध हो गई थी कितनी मर्दानी खुशबू थी कितनी मादक थी यह खुशबूओ काम अग्नि में जलती हुई आरती का पूरा शरीर अब रामु के रहमो करम पर था वो चाहती थी कि रामु कल जैसे उससे निचोड़ कर रख दे उसके शरीर में उठ रही हर एक लहर को अपने हाथों से रोक दे, वो अपने आपको अकेला सा पा रही थी बिस्तर पर और रामु पास खड़े हुए बहू की इस स्थिति को अपने आखों से देख रहा था बहू के ब्लाउसमें फँसे हुए उसके गोल गोल बड़े-बड़े चुचो को वो वही खड़े-खड़े निहार रहा था उसके ऊपर-नीचे होते हुए आकर को बढ़ते घटते देख रहा था उसके पेट को अंदर-बाहर होते देख रहा था जाँघो में फाँसी हुई पेटीकोट को उसकी टांगों के साथ ऊपर-नीचे होते हुए देख रहा था उसकी आखें बहू के हर हिस्से को देख रही थी और उसकी सुंदरता को अपने अंदर उतारने की कोशिश कर रही थी वो खड़े-खड़े देख ही रहा था कि उसके हाथों से बहू की नाजुक हथेली टकराई वो उसकी मजबूत हथेली को अपनी हथेली में लेने की कोशिश कर रही थी वो अपनी हथेली को रामु की हथेली पर कस कर पकड़ बनाने की कोशिश कर रही थी और अपने पास खींच रही थी उसके हाथ रामु को अपने पास और पास आने का न्यौता दे रहे थे। रामु भी अब कहाँ रुकने वाला था वो भी बहू के हाथों के साथ अपने आपको आगे बढ़ाया और बहू के हाथों का अनुसरण करने लगा बहू अपने हाथों को रामु के हाथों के सहारे अपने चूची तक लाने में सफल हो गई थी उसके चूचियां और भी तेज गति से ऊपर की ओर हो गये।

आरती के मुख से एक आआअह्ह निकली और वो रामू के हाथों को अपने चूची के ऊपर घुमाने लगी थी रामू को तो मन की मुराद ही मिल गई थी जो खड़े-खड़े देख रहा था अब उसके हाथों में था वो और नहीं रुक पाया वो अपने अंदर के शैतान को और नहीं रोक पाया था वो अपने दोनों हाथों से बहू की दोनों चूचियां को कस कर पकड़ लिया और ब्लाउज के ऊपर से ही दबाने लगा । आरती का पूरा शरीर धनुष की तरह से अकड गया था वो अपने सिर के और कमर के बल ऊपर को उठ गई थी

आरती- उूुुुुउउम्म्म्मममम आआआआआआआअह्ह

और रामू के होंठ उसकी आवाज को दबाने को तैयार थे उसके होंठों ने आरती के होंठों को सील दिया और अब खेल शुरू हो गया दोनों एक दूसरे से बिना किसी ओपचारिकता से गुथ गये थे रामु कब बिस्तर पर उसके ऊपर गिर गया पता ही नहीं चला वो आरती को अपने बाहों में जकड़े हुए निचोड़ता जा रहा था और उसकी दोनों चुचियों को अपने हाथों से दबाते जा रहा था आरती जो कि नीचे से रामु को पूरा समर्थन दे रही थी अब अपनी जाँघो को खोलकर रामु को अपने बीच में लेने को आतुर थी वो सेक्स के खेल में अब देरी नहीं करना चाहती थी उसकी जाँघो के बीच में जो हलचल मची हुई थी वो अब उसकी जान की दुश्मन बन गई थी वो अब किसी तरह से रामु को जल्दी से जल्दी अपने अंदर समा लेना चाहती थी पर वो तो अब तक धोती में था और ऊपर भी कुछ पहने हुए था अब तो आरती भूखी शेरनी बन गई थी वो नहीं चाहती थी कि अब देर हो रामु को अपने ऊपर से पकड़े ही उसने हिम्मत करके एक हाथ से उसकी धोती को खींचना चालू किया और अपने को उसके साथ ही अड्जस्ट करना चालू किया रामु जो कि उसके ऊपर था बहू के इशारे को समझ गया था और आश्चर्य भी हो रहा था कि बहू आज इतनी उतावली क्यों है पर उसे क्या वो तो आज बहू को जैसे चाहे वैसे भोग सकता था यही उसके लिए वरदान था वो थोड़ा सा ऊपर उठा और अपनी धोती और अंदर अंडरवेअर को एक झटके से निकाल दिया और वापस बहू पर झुक चुका क्या झुका लिया गया नीचे पड़ी आरती को कहाँ सब्र था वो खुद ही अपने हाथों से रामु को पकड़कर अपने होंठों से मिलाकर अपनी जाँघो को खोलकर रामू को अड्जस्ट करने लगी थी रामु का लण्ड उसकी चुत के आस-पास टकरा रहा था बहुत ही गरम था और बहुत ही बड़ा पर उससे क्या वो तो कल भी इससे खेल चुकी थी उसको उस चीज का मजा आज भी याद था वो और ज्यादा सह ना पाई

आरती- आआआआआआह्ह उूुउउंम्म काका प्लीज़ करो ना प्लीज

और रामु काका के कानों में एक मादक सी घुल जाने वाली आवाज़ ने कहा तो रामु के अंदर तक आग सी दौड़ गई और रामु का लण्ड एक झटके से अंदर हो गया और

आरति- ईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई उूुुुुुुुउउम्म्म्मममममममम आवाज रामु काका के गले में कहीं गुम हो गई

रामू का लण्ड बहू के अंदर जाते ही जैसे कमरे में तूफान सा आ गया था बिस्तर पर एक द्वंद युद्ध चल गया था दोनों एक दूसरे में समा जाने की कोशिस में लगे थे और एक दूसरे के हर अंग को छूने की कोशिश में लगे हुए थे आरति तो जैसे पागल हो गई थी कल की बातें याद करके आज वो खुलकर रामु के साथ इस खेल में हिस्सा ले रही थी वो अपने आपको खुद ही रामु काका के हाथों को अपने शरीर में हर हिस्से को छूने के लिए उकसा रही थी वो अपने होंठों को रामु के गालों से लेकर जीब तक को अपने होंठों से चूस-चूसकर चख रही थी और रामु तो जैसे अपने नीचे बहू की सुंदर काया को पाकर समझ ही नहीं पा रहा था वो अपने हाथों को और अपने होंठों को बहू के हर हिस्से में घुमा-घुमाकर चूम भी रहा था और चाट चाट कर उस कमसिन सी नारी का स्वाद भी ले रहा था और अपने अंदर के शैतान को और भी भड़का रहा था

वो किसी वन मानुष की तरह से बहू को अपने नीचे रोंध रहा था और उसे अपनी बाहों में भरकर निचोड़ता जा रहा था उसके धक्कों में कोई कमी नहीं आई थी बल्कि तेजी ही आई थी और हर धक्के में वो बहू को अपनी बाहों में और जोर से जकड़ लेता था, ताकि वो हिल भी ना पाए और उसके नीचे निस्चल सी पड़ी रहे और आरती की जो हालत थी उसकी वो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी रामु के हर धक्के पर वो अपने पड़ाव की ओर बढ़ती जा रही थी और हर धक्के की चोट पर रामु काका की गिरफ़्त में अपने आपको और भी कसा हुआ महसूस करती थी उसकी जान तो बस अब निकल ही जाएगी सोचते हुए वो अपने मुकाम की ओर बढ़ चली थी और वो रामु काका के जोर दार झटको को और नहीं सह पाई और वो झड़ गई थी झरना इसको कहते है उसे पता ही नही चला लगा कि उसकी चुत से एक लंबी धार बाहर की ओर निकलने लगी थी जो कि रुकने का नाम भी नहीं ले रही थी और रामू तो जैसे पागलों की तरह अपने आपसे गुम बहू को अपनी बाहों में भरे हुए अपनी पकड़ को और भी मजबूत करते हुए लगा तार जोरदार धक्के लगाता जा रहा था वो भी अपनी पीक पर पहुँचने वाला था पर अपने नीचे पड़ी बहू को ठंडा होते देख कर वो और भी सचेत हो गया और बिना किसी रहम के अपनी गति को और भी बढ़ा दिया और अपने होंठों को बहू के होंठों के अंदर डाल कर उसकी जीब को अपने होंठों में दबाकर जोर्र दार धक्के लगाने लगा था। आरती जो कि झड कर शांत हो गई थी रामु काका के निरंतर धक्कों से फिर जाग गई थी और हर धक्के का मजा लेते हुए फिर से अपने चरम सीमा को पार करने की कोशिश करने लगी थी उसके जीवन काल में यह पहली बार था कि वो एक के बाद दूसरी बार झड़ने को हो रही थी रामु काका की हर एक चोट पर वो अपनी नाक से सांस लेने को होती थी और नीचे से अपनी कमर और योनि को उठाकर रामू को और अंदर और अंदर तक उतर जाने का रास्ता भी देती जा रही थी उसके हर एक कदम ने उसका साथ दिया और रामु का ढेर सारा वीर्य जब उसकी योनि पर टकराया तो वो एक बार फिर से पहली बार से ज्यादा तेजी से झड़ी थी उसका शरीर एकदम से सुन्न हो गया था पर रामु कका की पकड़ अब भी उसके शरीर पर मजबूती से कसा हुआ था वो हिल भी नहीं पा रही थी और नाही ठीक से सांस ही ले पा रही थी हाँ अब दोनों धीरे-धीरे शांत हो चले थे । रामू भी अब बहू के होंठो को छोड़ कर उसके कंधे पर अपने सिर को रखकर लंबी-लंबी सांसें ले रहा था और अपने को सयम करने की कोशिश कर रहा था उसकी पकड़ अब बहू पर से ढीली पड़ती जा रही थी और उसके कानों में आरति की सिसकारियां और जल्दी-जल्दी सांस लेने की आवाज भी आ रही थी जैसे वो सपने में कुछ सुनाई दे रही थी रामु अपने आपको संभालने में लगा था और अपने नीचे पड़ी हुई बहू की ओर भी देख रहा था उसके बाल उसके नीचे थे बहू का चेहरा उस तरफ था और वो तेज-तेज सांसें ले रही थी बीच बीच में खांस भी लेती थी उसकी चूचियां अब आज़ादी से उसके सीने से दबी हुई थी। रामु की जाँघो से बहू की जांघे अब भी सटी हुई थी उसका लण्ड अब भी बहू के अंदर ही था वो थोड़ा सा दम लगाकर उठने की चेष्टा करने लगा और अपने लण्ड को बहू के अंदर से निकालता हुआ बहू के ऊपर ज़ोर ना देता हुआ उठ खड़ा हुआ या कहिए वही बिस्तर पर बैठ गया बहू अब भी निश्चल सी बिस्तर पर अपने बालों से अपना चेहरा ढके हुए पड़ी हुई थी रामु ने भी उसे डिस्टर्ब ना करते हुए अपनी धोती और अंडरवेर उठाया और उस सुंदर काया के दर्शन करते हुए अपने कपड़े पहनने लगा

उसके मन की इच्छा अब भी पूरी नहीं हुई थी उस अप्सरा को वैसे ही छोड़ कर वो नहीं जाना चाहता था वो एक बार वही खड़े हुए बहू को एक टक देखता रहा और उसके साथ गुजरे हुए पल को याद करता रहा बहू की कमर के चारो ओर उसका पेटीकोट अब भी बिखरा हुआ था पर ब्लाउस के सारे बटन खुले हुए थे और उसके कंधों के ही सहारे थे उसकी चूचियां अब बहुत ही धीरे-धीरे ऊपर और नीचे हो रही थी नाभि तक उसका पेट बिल्कुल बिस्तर से लगा हुआ था जाँघो के बीच काले बाल जो कि उस हसीना के अंदर जाने के द्वार के पहरेदार थे पेट के नीचे दिख रहे थे और लंबी-लंबी पतली सी जाँघो के बाद टांगों पर खतम हो जाती थी

रामु की नजर एक बार फिर बहू पर पड़ी और वो वापस जाने को पलटा पर कुछ सोचकर वापस बिस्तर तक आया और बिस्तर के पास झुक कर बैठ गया और बहू के चेहरे से बालों को हटाकर बिना किसी डर के अपने होंठों को बहू के होंठों से जोड़ कर उसका मधु का पान करने लगा वो बहुत देर तक बहू के ऊपर फिर नीचे के होंठों को अपने मुख में लिए चूसता रहा और फिर एक लंबी सी सांस छोड़ कर उठा और नीचे रखी एक कंबल से आरती को ढँक कर वापस दरवाजे से बाहर निकल गया।

उसने लेटे हुए उसने रामु को अच्छे से देखा था उतना अच्छे से तो उसने अपने पति को भी नहीं देखा था पर ना जाने क्यों उसे रामू काका को इस तरह से छुप कर देखना बहुत अच्छा लग रहा था और जब वो जाते जाते रुक गये थे और पलटकर आके उसके होंठों को चूमा था तो उसका मन भी उनको चूमने का हुआ था पर शरम और डर के मारे वो चुपचाप लेटी रही थी उसे बहुत मजा आया था

उसके पति ने भी कभी झड़ने के बाद उसे इस तरह से किस नहीं किया था या फिर ढँक कर सुलाने की कोशिश नहीं की थी वो लेटी लेटी अपने आपसे ही बातें करती हुई सो गई और एक सुखद कल की ओर चल दी उससे पता था कि अब वो रामु काका को कभी भी रोक नहीं पाएगी और वो यह भी जानती थी कि जो उसकी जिंदगी में खाली पन था अब उसे भरने के लिए रामू काका काफी है वो अब हर तरीके से अपने शरीर का सुख रामू काका से हासिल कर सकती है

और किसी को पता भी नहीं चलेगा और वो एक लंबी सी सुखद नींद के आगोस में समा गई

दोपहर बाद 3 बजे दरवाजे पर नोक के साथ ही उसकी नींद खुली और उसने झट से आवाज दी

आरती- हाँ…

- जी वो सोनल आने वाली है, आप भी चाय के लिए नीचे आएंगी क्या।

आरती - हाँ…

लेकिन आचनक ही उसके दिमाग की घंटी बज गई अरे यह तो रामू काका थे पर क्यों अभी तो जया भी आ सकती थी

तभी उसका ध्यान अपने आप पर गया अरे वो तो पूरी तरह से नंगी थी उसके जेहन में सुबह की बातें घूमने लगी थी वो वैसे ही बिस्तर पर बैठी अपने बारे में सोचने लगी थी वो जानती थी कि आज उसने क्या किया था सेक्स की भूख खतम होते ही उसे अपनी इज़्ज़त का ख्याल आ गया था वो फिर से चिंतित हो गई और कंधे पर पड़े अपने ब्लाउज को ठीक करने लगी और धीरे से उठ कर बाथरूम की ओर चल दी

बाथरूम में जाने के बाद उसने आपने आपको ठीक से साफ किया और फिर से कमरे में आ गई थी वारड्रोब से सूट निकालकर वो जल्दी से तैयार होने लगी थी पर ध्यान उसका पूरे समय मिरर पर था उसका चेहरा दमक रहा था जैसे कोई चिंता या कोई जीवन की समस्या ही नहीं हो उसके दिमाग पर हाँ… आज तक उसका चेहरा इतना नहीं चमका था उसने मिरर के पास आके और गौर से देखा उसकी आखों में एक अजीब सा नशा था और उसके होंठों पर एक अजीब सी खुशी उसका सारा बदन बिल्कुल हल्का लग रहा था

दोपहर के सेक्स के खेल के बाद वो कुछ ज्यादा ही चमक गया था वो सोचते ही उसके शरीर में एक लहर सी दौड़ गई और उसके निपल्स फिर से टाइट होने लगे थे उसने अपने हाथों से अपनी चुचियों को एक बार सहलाकर छोड़ दिया और वो अपने दिमाग से इस घटना को निकाल देना चाहती थी वो जल्दी से तैयार होकर नीचे की ओर चली सीडियो के कोने से ही उसने देख लिया था कि सोनल अपने कमरे से अभी स्कूल ड्रेस चेंज करके निकली है अच्छा हुआ रामू ने जगा दिया था नहीं तो वो तो सोती ही रह जाती

वो जल्दी से सोनल के पास पहुँच गई और दोनों की चाय सर्व करने लगी वो शांत थी

सोनल - मम्मी आज जाओगी कार चलानी सीखने।

आरती- हां।

सोनल - अरे मनोज अंकल के साथ नहीं जाना गाड़ी चलाने

आरती- अरे हाँ… बस चाय पीकर तैयार होती हूँ।

सोनल-- ठीक है मम्मी मैं भी जा रही हु ट्यूशन।
 
सोनल बारहवीं कक्षा में थी और उसकी परीक्षा आने वाली थी। वो पढ़ाई में ज्यादा तेज़ नहीं थी और परीक्षा बोर्ड की थी। स्कूल का प्रिंसीपल जो मैथ का टीचर भी था। वो उसे बहुत प्यार से बुलाता था और उसके बदन को छूता रहता था। उसके प्यार से बात करने की वजह उसे पता थी क्योंकि पूरी कक्षा में वो सबसे दब्बू और सदारण लड़की थी जो उसकी बातों को किसी से भी नही कह सकती थी।

परीक्षा पास आते देख सोनल ने ट्यूशन उन्हीं के पास रख ली वो मैथ, साइंस और इंगलिश पढा़ते थे। उन्होंने रवि को बोला वो ट्यूशन नहीं पढा़ते लेकिन सोनल को पढ़ाई करवाएंगे और कोशिश करेंगे पहले दर्जे में पास हो और कोई ट्यूशन फीस नहीं।

उनके क्लास की दो ओर लडकिया भी उनसे उनके घर पढ़ने जाती थी और उनकी हरकते जानते हुए भी सोनल ने ट्यूशन उनसे ही पढ़ने का मन बना लिया। क्यो ये तो वो ही जानती थी। एक सामान्य घरेलू लड़की ऐसे टीचर के पास क्यो जाना चाहती थी पढ़ने।

उनका नाम प्रेम गर्ग था लेकिन सोनल उनको सर बुलाती थी। तब उनकी आयु 50 साल की थी। उनका रंग सांवला कद करीब 5 फीट 8 इंच है। चेहरा क्लीन शेव है और सिर के बालों पर काला रंग लगाते हैं। उनकी आंखें काली हैं और नज़र का चश्मा लगा हुआ है। उनके एक बेटा और बेटी हैं दोनों शादीशुदा हैं। बेटी ससुराल में रहती है बेटा दूसरे शहर में नौकरी करता है तो अपनी पत्नी के साथ वहीं रहता है।

प्रेम सर की पत्नी 40 किमी दूर एक बैंक में नौकरी करती थी जो शाम को करीब 6 बजे घर आती थी।

दोपहर को 2 बजे स्कूल में छुट्टी हो जाती थी और सोनल बैग घर में रखकर खाना खा कर 2:30 बजे सर के घर पहुंच जाती थी, तब सर घर में अकेले ही होते थे। सोनल स्कूल की यूनीफॉर्म बदल कर जींस टॉप या जींस शर्ट पहन कर जाती थी जो कि टाईट होते थे। उन कपड़ों में उनके बदन का एक एक उभार (जो भी उसके शरीर पर था) अच्छे से दिखाई देता था।

सर सब सब्जेक्ट एक एक घंटा पढा़ते थे। पढा़ते टाईम उनकी नजर लड़कियों के बूब्ज़ पर होती थी। वो पढ़ाई कम करवाते और अपनी ठर्क ज्यादा पूरी करते थे। जब उनकी पत्नी घर आ जाती तब छुट्टी करते थे।

अब परीक्षा में 3 मंथ बाकी थे और सोनल को डर लग रहा था।

आज सोनल सर के पास पढ़ाई के लिए गई और उसकी क्लासमेट नही आई थी।

सोनल ने सर् से कहा- सर परीक्षा पास आ रही है और मुझे डर लग रहा है कि अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो अच्छे कॉलेज़ में दाखिला नहीं मिलेगा।

सर उसकी पीठ सहलाते हुए कहा- डर मत सोनल, मैं हूं न, तेरे कम से कम 80% नंबर आएंगे।

सोनल ने कहा- पर कैसे सर, आप जानते ही हो मैं इतनी होशियार नहीं हूं, 50% नंबर लेना भी मुश्किल लग रहा है।

सर हंस पडे़ और कहा- जितना आता हो उतना लिख देना, बाकी हमारे पास एक घंटा होता है और सुपरअटेंडेंट और सुपरवाईज़र सब मेरी पहचान के हैं, परीक्षा के बाद मैं करवा दिया करू़गा। मैं जो बोलता जाऊंगा तुम लिखती जाना।

सोनल ने कहा- थैंक्स सर, आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हो, यह एहसान में कभी नहीं चुका पाऊंगी।

सर ने कहा- ये कोई एहसान नहीं है इसके बदले मुझे भी कुछ चाहिए।

सोनल ने कहा- आप बोलो, मैं पापा से बोल कर आपको वो दिलवा दू़ंगी।

सर ने कहा- वो तुम्हारे पापा नहीं तुम दे सकती हो।

सोनल ने कहा- मैं क्या दे सकती हूं?

सर ने कहा- मुझे खुश करना होगा!

सोनल ने कहा- कैसे सर?

सोनल को कुछ समझ नही आ रहा था कि सर क्या चाहते है।

सर ने कहा- जैसा मैं कह वैसा करती जाना मैं खुश हो जाऊँगा, मैं तुम्हे परीक्षा में मदद कर दूँगा। तुमहारी सहेलियां भी ऐसा ही करेगी।

सोनल ने बिना सोचे हां कर दी।

तभी सर ने अपनी पैंट से लंड बाहर निकाल लिया और कहा- देखो सोनल, कैसे खड़ा है।

सोनल ने पहली बार किसी मर्द का लंड देखा था और मैं गौर से देखने लगी, सर का लंड काफी मोटा, लंबा और जानदार था।

सर ने अपने लंड की चमड़ी पीछे खींच ली और बीच से लाल रंग का टोपा निकल आया। सोनल की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी वो समझ ही नही पाई क्या करे क्या न करे। उसको रोना आ रहा था। घर मे चुलबुली रहने वाली बाहर आते ही डब्बू बन जाती थी जैसे विरोध करना उसके लिए पाप हो सब झेल जाती थी। उसका रोना देख कर सर ने कहा- अभी मेरी पत्नी आने वाली होगी, टाईम कम है। कल को सुबह नौं बजे मेरे घर आ जाना और घर बोल कर आना स्कूल में 3 बजे तक पढ़ाई होगी और फिर सर के पास पढ़ने जाना है. 6 बजे घर आऊंगी।

सोनल ने कुछ नही कहा और अपना बैग उठा कर वहा से निकल आयी। उसको रोना आ रहा था और सोच रही थी कल क्या होगा।
 
घर आकर सोनल कुछ नही किया और सीधा अपने रूम में घुस गई। वैसे भी उसकी मम्मी आज कार चलाने सीखने गयी है। अकेले कमरे में बैठी वो बस अपने सर के लण्ड को याद कर रही थी, इतनी पास से पहली बार लण्ड देखा था उसने, वो कंफ्यूज थी कि क्या करे,क्या न करे। चाहती तो वो सर को सबक सिखा सकती है। बस एक बार अपने पापा को बताना है, लेकिन वो कुछ नही कर रही है ओर न ही सर के साथ करना

चाहती है। अजीब जद्दोजहद में पड़ी है।

सोचते सोचते पता नहीं कब नींद आ गई सोनल को। शाम के समय सो गई सोते ही सोनल के सपने में सर आके उसकी पैंटी खींच कर अपने लंड को उसके मुंह में डाल दिया और उसकी चूंत चाटने लगे फिर उसके हाथ पकड़ कर दोनों ऊपर बांध दिये और उसका टाप उतार कर ब्रा को फाड़ दिये, अब सर दोनों हाथों से बूब्स दबाने लगे और चूचियों को पकड़ कर अपने मुंह में लेकर चूसने लगे फिर उसकी गान्ड को चूमने लगे और चाटने लगे और बोले सोनल तेरी गांड के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं।

फिर सीधा करके टांगे फैला कर अपनी जीभ से सोनल की चूंत को चाट चाट कर बिल्कुल पागल कर दिया फिर सर बोलने लगे कि अब मेरा लौड़ा चाटो सोनल और सोनल के मुंह में डाल दिया अपना मस्त लंड,सोनल पूरा लंड चूस चूस कर चाटी अब सर उसके बालों को पकड़ कर बोले सोनल मैं तुम्हें चोदू, सोनल बोली हां सर अपनी स्टुडेंट को चोदो ताकि पागल हो जाऊं, इतना चोदिये कि मैं पागल होके जन्नत का मजा ले लूं। सर बोले ओके सोनल मैं तुम्हें आज छिनाल की तरह चोदूंगा, सोनल ने कहा थैंक यू सर, तभी सर ने सोनल टांगें फैला कर चौड़ी कर दी और अपना लंड उनकी चूत में रख दिया और टांगे ऊपर कर दी और एक झटके में पूरा लौड़ा अन्दर उसकी चूत में डाल दिया।

और एक दम से सोनल की आंख खुल गयी। वो पूरे पसीने से भीगे हुए थी। अभी तक जो लड़की कभी अपनी चुत भी नही छुई हो आज उसे एक दम चुदाई भर सपना आया था। अभी भी उसके सामने सपने की यादें घूम रही थी। उसकी सांसे धौकनी के जैसे चल रही थी।

उधर आरति आज कार चलाने के लिए मनोज अंकल के स्कूल पहुच गयी थी। और अभी कार में मनोज अंकल के साथ कार में थी।

आरती थोड़ी सी ठिठकी पर अपने अंदर उठ रही सनश्य को रोक कर वो गाड़ी के अंदर बैठ गयी, मनोज अंकल भी सामने की सीट पर बैठ गये थे और गाड़ी गेट के बाहर की ओर चल दी गाड़ी सड़क पर चल रही थी और बाहर की आवाजें भी सुनाई दे रही थी पर अंदर एकदम सन्नाटा था शायद सुई भी गिर जाए तो आवाज सुनाई दे जाए। मनोज अंकल गाड़ी चला रहा था पर उसका मन पीछे बैठी हुई आरती को देखने को हो रहा था पर बहुत देर तक वो देख ना सका। पहली बार आरती उसके साथ अकेली आई थी वो सुंदरी जिसने कि उसके मन में आग लगाई थी उस दिन जब वो पार्टी में गई थी और आज तो पता नहीं कैसे आई है । (मनोज ने पार्टी में आरति का सेक्सी रूप देखा था।)

एक बड़ा सा लबादा पहने हुए सिर्फ़ साड़ी क्यों नहीं पहने हुए है आरती। मनोज ने थोड़ी ही हिम्मत करके रियर व्यू में देखने की हिम्मत जुटा ही ली देखा की आरती पीछे बैठी हुई बाहर की ओर देख रही थी गाड़ी सड़क पर से तेजी से जा रही थी । मनोज को मालूम था कि कहाँ जाना है , रवि ने कहा था कि ग्राउंड में ले जाना वहां ठीक रहेगा थोड़ी दूर था पर थी बहुत ही अच्छी जगह दिन में तो बहुत चहल पहेल होती थी वहां पर अंधेरा होते ही सबकुछ शांत हो जाता था पर उसे क्या वो तो इस घर का पुराना जानकार था और बहुत भरोसा था रवि को उसपर वो सोच भी नहीं सकता था कि आरती ने उस सोए हुए मनोज के अंदर एक मर्द को जनम दे दिया था जो कि अब तक एक लकड़ी के तख्त की तरह हमेशा खड़ा रहता था अब एक पेड़ की तरह हिलने लगा था उसके अंदर का मर्द कब और कहाँ खो गया था इतने सालो में उसे भी पता नहीं चला था वो बस जी सर् और जी मैडम के सिवा कुछ भी नहीं कह पाया था इतने दिनों में

पर उस दिन की घटना के बाद वो एक अलग सा बन गया था,जब पार्टी में आरती का मनमोहिनी रूप देखा था, जब भी वो खाली समय में बैठता था तो आरती का चेहरा उसके सामने आ जाता था उसके चेहरे का भोलापन और शरारती आखें वो चाह कर भी उसकी वो मुश्कान को आज तक नहीं भूल पाया था वो बार-बार पीछे की ओर देख ही लेता था पर नजर बचा के

और पीछे बैठी आरती का तो पूरा ध्यान ही मनोज अंकल पर था वो दिखा जरूर रही थी कि वो बाहर या फिर उसका ध्यान कही और था पर जैसे ही मनोज अंकल की नजर उठने को होती वो बाहर की ओर देखने लगती और आरती मन ही मन मुस्कुराई वो जानती थी कि मनोज के मन में क्या चल रहा है वो जानती थी कि मनोज अंकल के साथ आज वो पहली बार अकेली आई है और उस दिन के बाद तो शायद मनोज अंकल भी इंतजार में ही होंगे कि कब वो आरती को फिर से नजर भर के देख सके यह सोच आते ही आरती के पूरे शरीर में फिर से एक झुनझुनी सी फैल गई और वो अपने आपको समेट कर बैठ गई वो जानती थी कि मनोज अंकल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो कुछ कह सके या फिर कुछ आगे बढ़ेंगे तो आरती ने खुद ही कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की

आरती- और कितनी दूर है अंकल

मनोज जो कि अपनी ही उधेड़ बुन में लगा था चलती गाड़ी के अंदर एक मधुर संगीत मई सुर को सुन के मंत्रमुग्ध सा हो गया और बहुत ही हल्के आवाज में कहा

मनोज- बस दो 3 मिनट लगेंगे

आरती- जी अच्छा

और फिर से गाड़ी के अंदर एक सन्नाटा सा छा गया दोनो ही कुछ सोच में डूबे थे पर दोनो ही आगे की कहानी के बारे में अंजान थे दोनो ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे पर एक दूसरे के आकर्षण से अंजान थे हाँ… एक बात जो आम सी लगती थी वो थी कि नजर बचा कर एक दूसरे की ओर देखने की जैसे कोई कालेज के लड़के लड़कियाँ एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने के बाद होता था वो था उन दोनों के बीच मे .

पीछे बैठी आरति थोड़ा सा सभाल कर बैठी थी और बाहर से ज्यादा उसका ध्यान सामने बैठे मनोज अंकल की ओर था वो बार-बार एक ही बात को नोटीस कर रही थी कि मनोज अंकल कुछ डरे हुए थे और, कुछ संकोच कर रहे है वो तो वो नहीं चाहती थी वो तो चाहती थी कि मनोज अंकल उसे देखे और खूब देखे उनकी नजर में जो भूख उसने उस दिन देखी थी वो उस नजर को वो आज भी नहीं भुला पाई थी उसको उस नजर में अपनी जीत और अपनी खूबसूरती दिखाई दी थी अपनी सुंदरता के आगे किसी की बेबसी दिखाई दी थी उसकी सुंदरता के आगे किसी इंसान को बेसब्र और चंचल होते देखा था उसने वो तो उस नजर को ढूँढ़ रही थी उसे तो बस उस नजर का इंतजार था वो नजर जिसमें की उसकी तारीफ थी उसके अंग अंग की भूख को जगा गई थी वो नजर रामु और मनोज में कोई फरक नहीं था आरती के लिए दोनों ही उसके दीवाने थे उसके शरीर के दीवाने उसकी सुंदरता के दीवाने और तो और वो चाहती भी यही थी इतने दिनों की शादी के बाद भी यह नजर उसके पति ने नहीं पाई थी जो नजर उसने रामु की और मनोज अंकल के अंदर पाई थी उनके देखने के अंदाज से ही वो अपना सबकुछ भूलकर उनकी नज़रों को पढ़ने की कोशिश करने लगती थी और जब वो पाती थी कि उनकी नजर में भूख है तो वो खुद भी एक ऐसे समुंदर में गोते लगाने लग जाती थी कि उसमें से निकलना रामू काका या फिर मनोज अंकल के हाथ में ही होता था आज वो फिर उस नजर का पीछा कर रही थी पर मनोज अंकल तो बस गाड़ी चलाते हुए एक दो बार ही पीछे देखा था उस दिन तो पार्टी में रवि के साथ होते हुए भी कितनी बार मनोज ने पीछे उसे भीड़ मे नजर बचा कर देखा था और सीढ़िया उतरते उतरते भी उसे नहीं छोड़ा था आज कहाँ गई वो दीवानगी और कहाँ गई वो चाहत आरति सोचने को मजबूर थी कि अचानक ही उसने अपना दाँव खेल दिया वो थोड़ा सा आगे हुई और अपने सम्मर कोट के बटनों को खोलने लगी और धीरे से बहुत ही धीरे से अपने आपको उसकोट से अलग करने लगी

मनोज जिसका कि गाड़ी चलाने पर ध्यान था पीछे की गति विधि को ध्यान से देखने की कोशिश कर रहा था उसकी आखों के सामने जैसे किसी खोल से कोई सुंदरता की तितली बाहर निकल रही थी उूुुुुुुुुुुउउफफफफफफफफफफफ्फ़ क्या नज़ारा था जैसे ही आरति ने अपने कोट को अपने शरीर से अलग किया उसका यौवन उसके सामने था आँचल ढलका हुआ था और बिल्कुल ब्लाउज के ऊपर था नीचे गिरा हुआ था कोट को उतार कर आरति ने धीरे से साइड में रखा और अपने दाँये हाथ की नाजुक नाजुक उंगलियों से अपनी साड़ी को उठाकर अपनी चुचियों को ढका या फिर कहिए मनोज को चिड़ाया कि देखा यह में हूँ और आराम से वापस टिक कर बैठ गई थी

जैसे कि कह रही हो लो अंकल मेरी तरफ से तुम्हें गिफ्ट मेरी ओर से तो तुम्हें खुला निमंत्रण है अब तुम्हारी बारी है।

वो अपने को और भी ठीक करके बैठने की कोशिश कर रही थी ठीक से क्या अपने आपको अंकल के दर्शान के लिए और खुला निमंत्रण दे रही थी वो थोड़ा सा आगे की ओर हुई और अपनी दोनों बाहों को सामने सीट पर ले गई और बड़े ही इठलाते हुए कहा

आरती- और कीईईतनीईिइ दुर्र्ररर है हाँ…

मनोज- जी बस पहुँच ही गये

और गाड़ी मैदान में उतर गई थी और एक जगह रोक गई

मनोज ने अपने तरफ का गेट खोलकर बाहर निकलते समय पीछे पलटकर आरती की ओर देखते हुए कहा

मनों- जी आइए ड्राइविंग सीट पर

आरती ने लगभग मचलते हुए अपने साइड का दरवाजा खोला और जल्दी से नीचे उतर कर बाहर आई और लगभग दौड़ती हुई इचे से घूमती हुई आगे ड्राइविंग सीट की ओर आ गई

बाहर मनोज़ डोर पकड़े खड़ा था और अपने सामने स्वप्न सुंदरी को ठीक से देख रहा था वो अपनी नजर को नीचे नहीं रख पा रहा था वो उस सुंदरता को पूरा इज़्ज़त देना चाहता था वो अपनी नजर को झुका कर उस सुंदरता का अपमान नहीं करना चाहता था वो अपने जेहन में उस सुंदरता को उतार लेना चाहता था वो अपने पास से आरती को ड्राइविंग सीट की ओर आते हुए देखता रहा और बड़े ही अदब से उसका स्वागत भी किया थोड़ा सा झुक कर और थोड़ा सा मुस्कुराते हुए वो आरती के चेहरे को पढ़ना चाहता था वो उसकी आखों में झाँक कर उसके मन की बातों को पढ़ना चाहता था वो अपने सामने उस सुंदरी को देखना और देखना चाहता था वो एकटक आरती की ओर नजर गढ़ाए देखता रहा जब तक वो उसके सामने से होते हुए ड्राइविंग सीट पर नहीं बैठ गई आरती का बैठना भी एक और दिखावा था वो तो मनोज को अपने शरीर का दीदार करा रही थी बैठते ही उसका आचाल उसके कंधे से ढलक कर उसकी कमर तक उसको नंगा कर गया सिर्फ़ ब्लाउसमें उसके चूचियां जो की आधे से ज्यादा ही बाहर थी मनोज के सामने उजागर हो गया पर आरती का ध्यान ड्राइविंग सीट पर बैठे ही स्टियरिंग पर अपने हाथों को ले जाने की जल्दी में था वो बैठते ही अपने आपको भुलाकर स्टियरिंग पर अपने हाथों को फेरने लगी थी और उसके होंठों पर एक मधुर सी मुस्कान थी पर बाहर खड़े हुए मनोज की तो जैसे जान ही निकल गई थी अपने सामने ड्राइविंग सीट पर बैठी हुई उसे काम अग्नि से जलाती हुई स्वर्ग की उस अप्सरा को वो बिना पलके झपकाए आखें गढ़ाए खड़ा-खड़ा देख रहा था उसकी सांसें जैसे रुक गई थी वो अपने मुख से थूक का घुट पीते हुए डोर को बंद करने को था कि उसकी नजर आरती के साड़ी पर पड़ी जो की डोर से बाहर जमीन तक जा रही थी और आरती तो स्टियरिंग पर ही मस्त थी उसने बिना किसी तकल्लूफ के नीचे झुका और अपने हाथों से आरती की साड़ी को उठाकर गाड़ी के अंदर रखा और अपने हाथों से उसे ठीक करके बाहर आते हुए हल्के हाथों से आरती की जाँघो को थोड़ा सा छुआ और डोर बंद कर दिया

वो जल्दी से घूमकर अपने सीट पर बैठना चाहता था पर घूमकर आते आते उसने पेनट को और आपने अंडरवेर को थोड़ा सा हिलाकर अपने लण्ड को आकड़ने से रोका या कहिए थोड़ा सा सांस लेने की जगह बना दी वो तो तूफान खड़ा किए हुए था अंदर। आरति अब भी उसी स्थिति में बैठी हुई थी उसने अपने पल्लू को उठाने की जहमत नहीं की थी और अपने हाथों को स्तेरिंग पर अब भी घुमाकर देख रही थी मनोज के आने के बाद वो उसकी ओर देखकर मुस्कुराई और

आरती- हाँ… अब क्या

मनोज साइड की सीट पर बैठे हुए थोड़ा सा हिचका था पर फिर थोड़ा सा दूरी बना के बैठ गया और आरती को देखता रहा ब्लाउज के अंदर से उसकी गोल गोल चूचियां जो कि बाहर से ही दिख रही थी उनपर नजर डालते हुए और गले को तर करते हुए बोला

मनोज- जी आप गाड़ी स्टार्ट करे

आरती- कैसे

और अपने पल्लू को बड़े ही नाटकीय अंदाज से अपने कंधे पर डाल लिया ना देखते हुए कि उससे कुछ ढका कि नहीं

मनोज- जी वो चाबी घुमा के साइड से

और आखों का इशारा करते हुए साइड की ओर देखा आरती ने भी थोड़ा सा आगे होकर कीस तक हाथ पहुँचाया और घुमा दिया

गाड़ी एक झटके से आगे बड़ी और फिर आगे बढ़ी और बंद

मनोज ने झट से अपने पैरों को साइड से लेजाकर ब्रेक पर रख दिया और ध्यान से आरतीकी ओर देखा

मनोज के ब्रेक पर पैर रखते ही आरती का सारा बदन जल उठा उसकी जाँघो पर अब मनोज अंकल की जांघे चढ़ि हुई थी और उसकी नाजुक जांघे उनके नीचे थी भारी और मजबूत थी उनकी जांघे और हाथ उसके कंधे पर आ गये थे साड़ी का पल्लू फिर से एक बार उसकी चुचियों को उजागर कर रहा था वो अपनी सांसो को नियंत्रण करने में लगा था मनोज ने जल्दी से अपने पैरों को उसके ऊपर से हठाया और गियर पर हाथ लेजाकर उसे न्यूट्रल किया और आरती की ओर देखता रहा उसकी जान ही अटक गई थी पता नहीं अब क्या होगा उसने एक बहुत बड़ी गलती कर ली थी

पर आरति तो नार्मल थी और बहुत ही सहज भाव से पूछी

आरती- अरे अंकल हमें कुछ नहीं आता ऐसे थोड़ी सिखाया जाता है गाड़ी

मनोज- जी जी जी वो

क्या कहे उसके सामने जो चीज बैठी है, उसको देखते ही उसके होश उड़ गये है और क्या कहे कैसे कहे

आरती- अरे अंकल आप थोड़ा इधर आके बैठो और हमें बताओ कि क्या करना है और ब्रेक बागेरा सबकुछ हमें कुछ नहीं पता है

मनोज- जी जी

और मनोज अपने आपको थोड़ा सा संभालता हुआ आरती की ओर नजर गढ़ाए, हुए उसे बताने की कोशिश करने लगा

मनोज- जी वो लेफ्ट तरफ वाला ऐक्सीलेटर है बीच में ब्रेक है और दायां में क्लच है और बताते हुए उसकी आखें आरती के उठे हुए उभारों को और उसके नीचे उसे पेट और नाभि तक दीदार कर रहे थे ब्लाउज के अंदर जो उथल पुथल चल रही थी

वो उसे भी दिख रहा था पर जो शरीर के अंदर चल रहा था वो तो सिर्फ़ कमी को ही पता था उसके निपल्स टाइट औट टाइट हो धुके थे जाँघो के बीच में गीला पन इतना बढ़ चुका था कि लग रहा था की सूसू निकल गई है पैरों को जोड़ कर रखना उसके लिए दूभर हो रहा था वो अब जल्दी से अपने शरीर में उठ रही अग्नि को शांत करना चाहती थी और मनोज अंकल की नजर अब उसपर थी और वो अंकल को और भी भड़का रही थी वो जानती थी कि बस कुछ ही देर में वो मनोज के हाथों का खिलोना बन जाएगी और मनोज उसे रामू काका जैसे ही रौंद कर रख देंगे वो चाहत लिए वो हर उसकाम को अंजाम दे रही थी जिससे कि वो जल्दी से मुकाम को हासिल कर सके

आरती- उउउफ़्फुऊऊ अंकल एक काम कीजिए आप घर चलिए ऐसे मैं तो कभी भी गाड़ी चलना सीख नहीं पाऊँगी

मनोज- जी पर कोशिश तो आप को ही करनी पड़ेगी

आरती- जी पर मैं तो कुछ भी नहीं जानती आप जब तक हाथ पकड़कर नहीं सिखाएँगे गाड़ी चलाना तो दूर स्टार्ट करना भी नहीं आएगा

और अपना हाथ स्तेरिंग पर रखकर बाहर की ओर देखने लगी मनोज भी सकते में था कि क्या करे वो कैसे हाथ पकड़कर सिखाए पर सिखाना तो है वो अपने आपको संभालता हुआ बोला

मनोज- आप एक काम करे एक्सीलेटर पर पैर आप रखे मैं ब्रेक और क्लच संभालता हूँ और स्तेरिंग भी थोड़ा सा देखा दूँगा

आरती- ठीक है

एकदम से मचलते हुए उसने कहा और नीचे हाथ लेजाकर कीस को घुमा दिया और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया दूसरा पैर फ्री था और मनोज की ओर देखने लगी

मनोज भी नहीं जानता था कि अब क्या करे

आरती - अरे अंकल क्या सोच रहे है आप तो बस ऐसा करेगे तो फिर घर चलिए

घर चलिए के नाम से मनोज के शरीर में जैसे जोश आ गया था अपने हाथों में आई इस चीज को वो नहीं छोड़ सकता अब चाहे कुछ भी हो जाए चाहे जान भी चली जाए वो अब पीछे नहीं हटेगा उसने अपने हाथों को ड्राइविंग सीट के पीछे रखा और थोड़ा सा आगे की ओर झुक कर अपने पैरों को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा ताकि उसके पैर ब्रेक तक पहुँच जाए पर कहाँ पहुँचे वाले थे पैर आरती मनोज की इस परेशानी को समझते हुए अपने पल्लू को फिर से ऊपर करते हुए

आरती- अरे अंकल थोड़ा इधर आइए तो आपका पैर पहुँचेगा नहीं तो कहाँ

मनोज- जी पर वो

आरती- उउउफफ्फ़ ऊऊ आप तो बस थोड़ा सा टच हो जाएगा तो क्या होगा आप इधर आईई और अपने आपको भी थोड़ा सा डोर की ओर सरक के वो बैठ गई

अब मनोज के अंदर एक आवेश आ गया था और वो अपने को रोक ना पाया उसने अपने लेफ्ट पैर को गियर के उस तरफ कर लिया और आरती की जाँघो से जोड़ कर बैठ गया उसकी जांघे आरती की जाँघो को रौंद रही थी उसके वेट से आरती की जाँघो को तकलीफ ना हो सोचकर मनोज थोड़ा सा अपनी ओर हुआ ताकि आरती अपना पैर हटा सके पर आरती तो वैसे ही बैठी थी और अपने हाथों को स्टियरिंग पर घुमा रही थी

मनोज ने ही अपने हाथों से उसके जाँघो को पकड़ा और थोड़ा सा उधर कर दिया और अपनी जाँघो को रखने के बाद उसकी जाँघो को अपने ऊपर छोड़ दिया वह कितनी नाजुक और नरम सी जाँघो का स्पर्श था वो कितना सुखद और नरम सा मनोज अपने हाथों को सीट के पीछे लेजाकर अपने आपको अड्जस्ट किया और आरती की ओर देखने लगा । आरती अब थोड़ा सा उससे नीचे थी उसका आचल अब भी अपनी जगह पर नहीं था उसकी दोनों चूचियां उसे काफी हद तक दिख रही थी वो उत्तेजित होता जा रहा था पर अपने पर काबू किए हुआ था अपने पैरों को वो ब्रेक तक पहुँचा चुका था और अपनी जाँघो से लेकर टांगों तक आरती के स्पर्श से अविभूत सा हुआ जा रहा था वो अपने नथुनो में भी आरती की सुगंध को बसा कर अपने आपको जन्नत की सैर की ओर ले जा रहा था

आरती लगभग उसकी बाहों में थी और उसे कुछ भी ध्यान नहीं था वो अपनी स्वप्न सुंदरी के इतने पास था वो सोच भी नहीं सकता था

गाड़ी स्टार्ट थी और गियर पड़ते ही चालू हो जाएगी

मनोज का दायां हाथ अब गियर के ऊपर था और उसने क्लच दबा के धीरे से गियर चेंज किया और धीरे-धीरे क्लच को छोड़ने लगा और

मनोज- आप धीरे से आक्सेलेटर बढ़ाना

मनोज- जी हमम्म्ममममम

मनोज ने धीरे से क्लच को छोड़ा पर आक्सेलोटोर बहुत कम था सो गाड़ी फिर रुक गई

आरती अपनी जगह पर से ही अपना चेहरा उठाकर

उसके गले में सारी आवाज ही फँस गई थी ।

अंकल की ओर देखा और

आरती- क्या हुआ

मनोज- जी थोड़ा सा और एक्सीलेटर दीजिएगा

और अपने दाँये हाथ से गियर को फ्री करके रुका पर आरती की ओर से कोई हरकत ना देखकर लेफ्ट हैंड से उसके कंधे पर थोड़ा सा छूके कहा

मनोज- जी वो गाड़ी स्टार्ट कजिए हमम्म्ममम

आरती- जी हाँ

किसी इठलाती हुई लड़की की तरह से हँसी और झुक कर कीस को घुमाकर फिर से गाड़ी स्टार्ट की । मनोज की हालत खराब थी वो अपने को अड्जस्ट ही कर रहा था उसका लण्ड उसका साथ नहीं दे रहा था वो अपने आपको आजाद करना चाह-ता था। मनोज ने फिर से अपने पेण्ट को अड्जस्ट किया और अपने लण्ड को गियर के सपोर्ट पर खड़ा कर लिया ढीले अंडरवेअर से उसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी अब वो गियर चेंज करने वाला ही था कि आरती का हाथ अपने आप ही गियर रोड पर आ गया था ठीक उसके लण्ड के उउऊपर था जरा सा नीचे होते ही उसके लण्ड को छू जाता । मनोज थोड़ा सा पीछे हो गया और अपने हाथों को आरती के हाथों रख दिया और जोर लगाकर गियर चेंज किया और धीरे से क्लुच छोड़ दिया गाड़ी

आगे की ओर चल दी

मनोज- जी थोड़ा सस्स्साअ और एक्सीलेटर दबाइए हमम्म्ममम

उसकी गरम-गरम सांसें अब आरती के चेहरे पर पड़ रही थी और आरती की तो हालत ही खराब थी वो जानती थी कि वो किस परस्थिति में है और उसे क्या चाहिए उसने आपने आप पर से नियंत्रण हटा लिया था और सबकुछ मनोज के हाथों में सौंप दिया था उसकी सांसें अब उसका साथ नहीं दे रही थी उसके कपड़े भी जहां तहाँ हो रहे थे उसके ब्लाउज के अंदर से उसकी चूचियां उसका साथ नहीं दे रही थी वो एक बेसूध सी काया बन कर रह गई थीजो कि बस इस इंतजार में थी कि मनोज अंकल के हाथ उसे सहारा दे

उसने बेसुधि में ही अपनी आखें आगे की ओर गढ़ाए, हुए स्टियरिंग को किसी तरह से संभाला हुआ था गाड़ी कभी इधर कभी उधर जा रही थी

मनोज का लेफ्ट हैंड तो अब आरती के कंधे पर ही आ गया था और उस नाजुक सी काया का लुफ्त ले रहा था और दायां हैंड कभी उसके हाथो को स्टियरिंग में मदद करते तो कभी गियर चेंज करने में वो भी अपनी स्थिति से भली भाँति परिचित था पर आगे बढ़ने की कोशिश भी कर रहा था पूरी थाली सजी पड़ी थी बस हाथ धोकर श्री गणेश करना बाकी था हाँ बस ओपचारिकता ही उन्हें रोके हुए थी।

मनोज अपने दाँये हाथ से आरती का हाथ पकड़कर स्टियरिंग को डाइरेक्ट कर रहा था और अपने लेफ्ट हैंड से आरती के कंधों को अब ज़रा आराम से सहला रहा था उसकी आखें आरती की ओर ही थी और कभी-कभी बाहर ग्राउंड पर भी उठ जाती थी पर आरती की ओर से कोई भी ना नुकर ना होने से उसके मन को वो और नहीं समझ सका उसका लेफ्ट हैंड अब उसके कंधों से लेकर बूब्स तक को छूने लगे थे पर बड़े ही प्यार से और बड़े ही नाजुक तरीके से वो उस स्पर्श का आनंद ले रहा था उसके लेफ्ट हैंड अब थोड़ा सा आगे की ओर उसके गर्दन तक आ जाता और उसके गले को छूते हुए फिर से कंधे पर पहुँच जाता मनोज अपने को उस सुंदरता पर मर मिटने को तैयार कर रहा था उसकी साँसे अब आरती से तेज चल रही थी वो थोड़ा सा झुक कर आरती के बालों की खुशबू भी अपने अंदर उतार लेता था और फिर से उसके कंधो पर ध्यान कर लेता था उसके हाथ फिर से आरती के कंधे को छूते हुए गले तक पहुँचे थे कि छोटी उंगलियों को उसने और भी फैला कर उसके पैरो के ऊपर छूने की कोशिश करने लगा था

और उधर आरती अंकल की हर हरकत को अपने अंदर समेट कर अपनी आग को और भी भड़का कर जलने को तैयार थी उसके पल्लू ने तो कब का उसका साथ छोड़ दिया था उसकी सांसें भी उखड़ उखड़ कर चल रही थी । मनोज के हाथों का कमाल था कि उसके मुख से अब तक रोकी हुई सिसकारी एक लंबी सी आआह्ह बनकर बाहर निकल ही आई और उसका लेफ्ट हैंड स्टियरिंग से फिसल कर गियर रॉड पा आ गया

ठीक गियर रोड के साथ ही मनोज अपने लण्ड को टिकाए हुए था। आरती के उंगलियां उससे टकराते ही मनोज का दायां हैंड आरती के ब्लाउज के अंदर और अंदर उतर गया और उसके हाथों में वो जन्नत का मजा या कहिए रूई का वो गोला आ गया था जिससे वो बहुत देर से अपनी आँखे टिकाए देख बार रहा था वो थोड़ा सा आगे हुआ और अपने लण्ड को आरती की उंगलियों को छुआ भर दिया और अपने दाएँ हैंड से आरती की चूचियां को दबाने लगा था

और आरती के हाथों में जैसे कोई मोटा सा रोड आ गया था वो अपने हाथों को नीचे और नीचे ले गई थी और उसके लण्ड को पेण्ट के ऊपर से कसकर पकड़ लिया उसकी हथेली में नहीं आ रहा था पर गरम बहुत था कपड़े के अंदर से भी उसकी गर्मी वो महसूस कर रही थी वो गाड़ी चलाना भूल गई थी, ना ही उसे मालूम था कि गाड़ी कहाँ खड़ी थी उसे तो बस पता था कि उसके ब्लाउज के अंदर एक बालिस्ट सा हाथ उसकी चुचियों को दबा दबाकरउसके शरीर की आग को बढ़ा रहा था और उसके हाथों में एक लण्ड था जिसके आकार का उसे पता नहीं था उसके चेहरे को देखकर कहा जा सकता था कि उसे जो चाहिए था वो उसे बस मिलने ही वाला था

तभी उसके कानों में एक आवाज आई

आप बहुत सुंदर आहियीईई

यह अंकल की आवाज थी बहुत दूर से आती हुई और उसके जेहन में उतरती चली गई उसका लेफ्ट हैंड भी अब उठकर अंकल के हाथों का साथ देने लगा था उसके ब्लाउज के ऊपर से अंकल का दूसरा हाथ यानी की दायां हाथ अब आरती की दांई चुचि को ब्लाउज के ऊपर से दबा रहा था और होंठो से आरती के गले और गालों को को गीलाकर रहे थे। आरती सबकुछ भूल कर अपने सफर पर रवाना हो चुकी थी और अंकल के हाथों का खिलोना बन चुकी थी वो अपने शरीर के हर हिस्से में अंकल के हाथों का इंतजार कर रही थी और होंठों को घुमाकर अंकल के होंठों से जोड़ने की कोशिश कर रही थी। मनोज ने भी आरती को निराश नहीं किया और उसके होंठों को अपने होंठों में लेकर अपनी प्यास बुझानी शुरू कर दी

अब तो गाड़ी के अंदर जैसे तूफान सा आ गया था कि कौन सी चीज पकड़े या किस पर से हाथ हठाए या फिर कहाँ होंठों को रखे या फिर छोड़े दोनों एक दूसरे से गुथ से गये थे। आरती की पकड़ मनोज के लण्ड पर बहुत कस गई थी और वो उसे अपनी और खींचने लगी थी पर मनोज क्या करता वो लेफ्ट हैंड से अपनी पैन्ट को ढीलाकरके अपने अंडरवेर को भी नीचे कर दिया ।
 
और फिर से आरती के हाथों को पकड़कर अपने लण्ड पर रख दिया और फिर से आरती के होंठों का रास्पान करने लगा। लेफ्ट हैंड से उसने कब आरती की साड़ी ऊपर उठा दी थी। आरती को पता ही नही चला पर हाँ मनोज की पत्थर जैसी हथेली का स्पर्श जैसे ही उसकी जाँघो और टांगों पर हुआ तो वो अपनी जाँघो को और नहीं जोड़ कर नही रख सकी थी वो अपने आपको अंकल के सुपुर्द करके मुख को आजाद करके सीट के हेड रेस्ट पर सिर रख कर जोर-जोर से साँसे ले रही थी और मनोज उस मस्त चीज का पूरा लुफ्त उठा रहा था

तभी आचनक ही मनोज अपनी सीट से आलग होकर जल्दी से बाहर की ओर लपका और घूमकर अपनी ढीली पेण्ट और अंडरवेर को संभालता हुआ ड्राइविंग सीट की ओर लपका और एक झटके में ही डोर खोलकर आरती को खीच कर उसकी टांगों को बाहर निकल लिया और उसकी जाँघो और टांगों को चूमने लगा कितनी सुंदर और सुडौल टाँगें थी । आरती की और कितनी चिकनी और नरम उूउऊफ वो अपने हाथों को बहुके पेटीकोट के अंदर तक बिना किसी झिझक के ले जा रहा था और एक झटके में उसकी पैंटी को खींचकर बाहर भी निकल भी लिया और देखते ही देखते उसके जाँघो को किस करते हुए उसकी चुत तक पहुँच गया

और आरती ने अपने जीवन का पहला अनुभव किया अपनी चुत को छूने का उसका पूरा शरीर जबाब दे गया था और उसके मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकल गई और वो बुरी तरह से अपने आपको अंकल की ग्रिफ्त से छुड़ाने की कोशिश करने लगी थी पर कहाँ अंकल की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो कुछ भी ना कर पाई हाँ… इतना जरूर था कि उसकी चीख अब उसके बस में नहीं थी वो निरंतर अपनी चीख को सुन भी सकती थी और उसके सुख का आनंद भी ले सकती थी उसे लग रहा था कि जैसे उसका हार्ट फैल हो जाएगा उसके अंदर उठ रही काम अग्नि अपने चरम सीमा पर पहुँच चुकी थिया और वो अंकल की जीब और होंठों का जबाब ढूँढ़ती और अपने को बचाती वो अंकल के हाथों में ढेर हो गई पर अंकल को कहाँ चैन था वो तो अब भी अपने होंठों को आरती की चुत में लगाकर उसके जीवन का अमृत पीरहा था उसका पूरा चेहरा आरती की चुत से निकलने वाले रस से भर गया था और वो अपने चेहरे को अब भी उसपर घिस रहा था आरती जो कि अब तक अपने को संभालने में लगी थी उसे नहीं पता था कि वो किस परिस्थिति में है हाँ पता था तो बस एक बात की वो एक ऐसे जन्नत के सफर पर है जिसका की कोई अंत नहीं है उसके शरीर पर अब भी झुकने से उसकी चुत से रस्स अब तक निकल रहा था और अपनी चुत पर उसे अभी तक के होंठों का और जीब का एहसास हो रहा था उसकी जाँघो पर जैसे कोई सख़्त सी चीज ने जकड रखा था और उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी वो चाह कर भी अपनी जाँघो को हिला नहीं पा रही थी।

और उधर मनोज अपनी जीब को अब भी आरती की चुत के अंदर आगे पीछे करके अपनी जीब से आरती के अंदर से निकलते हुए रस्स को पी रहा था जैसे कोई अमृत मिल गया हो और वो उसका एक भी कतरा वेस्ट नहीं करना चाहता था उसके दोनों हाथ आरती की जाँघो के चारो और कस के जकड़े हुए थे और वो आरती की जाँघो को थोड़ा सा खोलकर सांस लेने की जगह बनाने की कोशिश कर रहा था पर आरती की जाँघो ने उसके सिर को इतनी जोर से जकड़ रखा था कि वो अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उसकी जाँघो को अलग नहीं कर पा रहा था

वो इससे ही अंदाजा लगा सकता था कि आरती कितनी उत्तेजित है या फिर कितना मजा आ रहा है वो अपने को और भी आरती की चुत के अंदर घुसा लेना चाहता था पर उसने अपने को छुड़ाने की कोशिश में एक झटके से अपना चेहरा उसकी जाँघो से आजाद कर लिया और बाहर आके सांस लेने लगा तब उसकी नजर आरती पर पड़ी जो कि अब भी ड्राइविंग सीट पर लेटी हुई थी और जाँघो तक नंगी थी उसकी सफेद और सुडोल सी जांघे और पैर बाहर कार से लटके हुए थे दूर से आ रही रोशनी में उसके नंगे शरीर को चार चाँद लगा रहे थे मनोज का पूरा चेहरा आरती के रस्स से भीगा हुआ था और वो अब भी आरती को,

एक भूखे शेर की तरह देख रहा था और अपने मजबूत हाथों से उसकी जाँघो को और उसके पैरों को सहला रहा था आरती का चेहरा उसे नहीं दिख रहा था वो अंदर कही शायद गियर रोड के पास से नीचे की ओर था मनोज उठा और सहारा देकर आरती को थोड़ा सा बाहर खींचा ताकि आरती का सिर किसी तरह से सीट पा आ जाए । वो नहीं चाहता था कि आरती को तकलीफ हो पर अपनी वासना को भी नहीं रोक पा रहा था उसने एक बार आरती की ओर देखा और उठ खड़ा हुआ और अपनी कमीज से अपना चेहरा पोंछा और थोड़ा सा अंदर घुसकर आरती की ओर देखने लगा। आरती अब भी शांत थी पर उसके शरीर से अब भी कई झटके उठ रहे थे बीच बीच में थोड़ा सा खांस भी लेती थी पर अंकल को अचानक ही अपने ऊपर झुके हुए देखकर वो थोड़ा सा सचेत हो गई

और अपनी परिस्थिति का अंदाज लगाने लगी।अंकल का चेहरा बहुत ही सख्त सा दिखाई दे रहा था, उस अंधेरे में भी उसे उनकी आखों में एक चमक दिखाई दे रही थी उसके पैरों पर अब थोड़ा सा नंगेपन का एहसास उसे हुआ तो उसने अपने पैरों को मोड़ कर अपने नंगे पन को छुपाने की कोशिश की

तो अंकल ने उसके कंधों को पकड़कर थोड़ा सा उठाया और

अंकल- मैडम

आरती- ----

अंकल ने जब देखा कि आरती की ओर से कोई जबाब नहीं है तो वो बाहर आया और अपने हाथों से आरती को सहारा देकर बैठा लिया अंकल जो कि बाहर खड़ा था और लगभग आरती के चेहरे तक उसकी कमर आ रही थी। आरती के बैठते ही उसने आरती को कंधे से जकड़कर अपने पेट से चिपका लिया । आरती भी अंकल की हरकत को जानकर अपने को रोका नहीं पाई पर जैसे ही वो अंकल के पेट से लगी तो उसके गले पर एक गरम सी चीज टकराई गरम बहुत ही गरम उसने अपने चेहरे को नीचे करके उस गरम चीज़ को अपने गले और चिन के बीच में फँसा लिया और हल्के से अपनी चिन को हिलाकर उसके एहसास का मजा लेने लगी। आरती के शरीर में एक बार फिर से उत्तेजना की लहर उठने लगी थी और वो वैसे ही अपने गले और चिन को उस चीज पर घिसती रही उधर मनोज अपने लण्ड के आकड़पन को अब ठंडा करना चाहता था वो उत्तेजित तो था ही पर आरती की हरकत को वो और नहीं झेल पा रहा था उसने भी आरती को अपनी कमर पर कस्स कर जकड़ लिया और अपनी कमर को आरती के गले और चेहरे पर घिसने लगा वो अपने लण्ड को शायद अच्छे से दिखा लेना चाहता था कि देख किस चीज पर आज हाथ साफ किया है या कभी देखा है इतनी सुंदर हसीना को या फिर तेरी जिंदगी का वो लम्हा शायद फिर कभी भी ना आए इसलिए देख ले

और उधर आरती की हा;लत फिर से खराब होने लगी थी वो अपने चेहरे पर और गले और गालों पर अंकल के लण्ड के एहसास को झुटला नहीं पा रही थी और वो भी अपने आपको अंकल के और भी नजदीक ले जाना चाहती थी उसने अपने दोनों हाथों को अंकल की कमर में चारो ओर कस्स लिया और खुद ही अपने चेहरे को उनके लण्ड पर घिसने लगी थी पहली बार जिंदगी में पहली बार वो यह सब कर रही थी और वो भी एक अनजाने से सक्श के के साथ। उसने अपने पति का लण्ड भी कभी अपने चेहरे पर नहीं घिसा था या शायद कभी मौका ही नहीं आया था पर हाँ… उसे अच्छा लग रहा था उसकी गर्मी के एहसास को वो भुला नहीं पा रही थी उसके शरीर में एक उत्तेजना की लहर फिर से दौड़ने लगी थी उसकी जाँघो के बीच में फिर से गुदगुदी सी होने लगी थी ठंडी हवा उसकी जाँघो और, योनि के द्वार पर अब अच्छे से टकरा रही थी।

और वो अपने चेहरे को घिस कर अपने आपको फिर से तैयार कर रही थी उसके लिप्स भी कई बार अंकल के लण्ड को छू गये थे पर सिर्फ़ टच और कुछ नहीं उसके होंठों का टच होना और मनोज के शरीर में एक दीवाने पन की लहर और उसे पर उसका वहशीपन और भी बढ़ गया था वो अपने लण्ड को अब आरती के होंठों पर बार-बारछूने की कोशिश करने लगा था वो अपने दोनो हाथों को एक बार फिर आरती की पीठ और बालों को सहलाने के साथ उसकी चूची की ओर ले जाने की कोशिश करने लगा। आरतीके बाल कमर के चारो और चिपके होने से उसे थोड़ी सी मसक्कत करी पड़ी पर हाँ… कामयाब हो ही गया वो अपने हाथों को आरती की चूचियां पर पहुँचने में ब्लाउज के ऊपर से ही वो उनको दबाने लगा और उनके मुलायम पन का आनंद लेने लगा एक तरफ तो वो आरती की चुचियों से खेल रहा था और दूसरे तरफ वो अपने लण्ड को आरती के होंठों पर घिसने की कोशिश भी कर रहा था

उसके हाथ अब उसके इशारे पर नहीं थे बल्कि उसको मजबूर कर रहे थे की आरती की चुचियों को अंदर से छुए तो वो अपने हाथों से आरती के ब्लाउज के बटन को खोलेकर एक ही झटके से उसकी ब्रा को भी आजाद कर लिया और उसकी दोनों चुचियों को अपने हाथों में लेकर तोलने लगा उसके निप्पल्स को भी अपनी उंगलियों के बीच में लेकर हल्के सा दबाने लगा नीचे आरती के मुख से एक हल्की सी सिसकारी ने उसे और भी दीवाना बना दिया था और वो अपनी उंगलियों के दबाब को उसके निपल्स पर और भी ज्यादा जोर से मसलने लगा था

आरती की सिसकारी अब धीरे धीरे बढ़ने लगी थी और उसका चेहरा भी अब कुछ ज्यादा ही उसके पेट पर घिसने लगा था मनोज अपने हाथो का दबाब खड़े-खड़े उसकी चुचियों पर भी बढ़ाने लगा था और अब तो कुछ देर बाद वो उन्हें मसलने लगा था आरती के मुख से निकलने वाली सिसकारी अब थोड़ी बहुत दर्द भी लिए हुए थी पर मना नहीं कर रही थी बल्कि आरती की पकड़ उसकी कमर पर और भी ज्यादा होती जा रही थी और उसका चेहरा भी उसके ठीक लण्ड के ऊपर और उसके लण्ड के चारो तरफ कुछ ज्यादा ही इधर-उधर होने लगा था मनोज ने एक बार नीचे आरती की ओर देखा और जोर से उसकी चुचियों को दबा दिया दोनों हाथों से और जैसे ही उसके मुख से आआह्ह निकली अंकल ने झट से अपने लण्ड को उसके सुंदर और साँस लेने की लिए खुले होंठों के बीच में रख दिया और एक झटका से अंदर गुलाबी होंठों में फँसा दिया

आरती के तो होश ही गुम हो गये जैसे ही उसके मुख में अंकल का लण्ड घुसा उसे घिंन सी आई और वो अपने आपको आजाद कराने की कोशिश करने लगी और अपने मुख से अंकल का लण्ड को निकालने में लग गई थी पर अंकल की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो अपने आपको उनसे अलग तो क्या हिला तक नहीं पाई थी अंकल का एक हाथ अब उसके सिर के पीछे था और दूसरे हाथ से उसके कंधो को पकड़कर उसे अपने लण्ड के पास और पास खींचने की कोशिश कर रहे थे आरती का सांस लेना दूभर हो रहा था उसकी आखें बड़ी-बड़ी हो रही थी और वो अपने को छुड़ा ना पाकर अंकल की ओर बड़ी दयनीय स्थिति में देखने लगी थी पर अंकल का पूरा ध्यान अपने लण्ड को आरती के मुख के अंदर घुसाने में लगा था और वो उसपरम आनंद को कही से भी जाने नहीं देना चाहते थे वो अपने हाथों का दबाब आरती के सिर और कंधे पर बढ़ाते ही जा रहे थे और अपने लण्ड को उसके मुँह पर अंदर-बाहर धीरे से करते जा रहे थे

आरती जो कि अपने को छुड़ाने में असमर्थ थी अब किसी तरह से अपने मुख को खोलकर उस गरम चीज को अपने मुख में अड्जस्ट करने की कोशिस करने लगी थी घिंन के मारे उसकी जान जा रही थी और अंकल के लण्ड के आस पाश उगे बालों पर से एक दूसरी गंध आ रही थी जिससे कि उसे उबकाई भी आ रही थी पर वो बेबस थी वो अंकल जैसे बालिस्त इंसान से शक्ति में बहुत कम थी वो किसी तरह से अपने होंठों को अड्जस्ट करके उनके लण्ड को उनके तरीके से अंदर-बाहर होने दे रही थी पर जैसे ही उसने अपने मुख को खोलकर अंकल के लण्ड को अड्जस्ट किया । अंकल और भी वहशी से हो गये थे वो अब इतना जोर का झटका देते थे कि उसके गले तक उनका लण्ड चला जाता था और फिर थोड़ा सा बाहर की ओर खींचते थे तो आरती को थोड़ा सा सुकून मिलता अंकल अपनी गति से लगे हुए थे और आरती अपने को अड्जस्ट करने में पर ना जाने क्यों थोड़ी देर बाद आरती को भी इस खेल में मजा आने लगा था अब वो उतना रेजिस्ट नहीं कर रही थी बल्कि अंकल के धक्को के साथ ही वो अपने होंठों को जोड़े ही रखा था और धीरे धीरे अंकल के लण्ड को अपने अंदर मुख में लेते जा रही थी अब तो वो अपनी जीब को भी उनके लण्ड पर चलाने लग गई थी उसे अब उबकाई नहीं आ रही थी और ना ही घिन ही आ रही थी उसके शरीर से उठ रही गंध को भी वो भूल चुकी थी और तल्लीनता से उनके लण्ड को अपने मुँह में लिए चुस्स रही थी। मनोज ने जैसे ही देखा कि आरती अब उसके लण्ड को चुस्स रही थी और उसे कोई जोर नहीं लगाना पड़ रहा था तो उसने अपने हाथ का दबाब उसके सिर पर ढीला छोड़ दिया और अपनी कमर को आगे पीछे करने में ध्यान देने लगा उसका लण्ड आरती के छोटे से मुख में लाल होंठों से लिपटा हुआ देखकर वो और भी उत्तेजित होता जा रहा था वो अब किसी भी कीमत पर आरती की चुत के अंदर अपने आपको उतार देना चाहता था वो जानता था कि अगर आरती के मुख में वो ज्यादा देर रहा तो वो झड जाएगा और वो मजा वो उसकी चुत पर लेने से वंचित रह जाएगा उसने जल्दी से आरती के कंधों को पकड़कर एक झटके से उठाया और अपने होंठों को उसके होंठों से जोड़ दिया और उसके लाल लाल होंठों को अपने मोटे और भद्दे से होंठों की भेंट चढ़ा दिया वो पागलो की तरह से आरती के होंठों को चुस्स रहा था और अपनी जीब से भी उसके मुख की गहराई को नाप रहा था । आरती जब तक कुछ समझती तब तक तो अंकल अपने होंठों से जोड़ चुके थे और पागलो की तरह से किस कर रहे थे किस के टूट-ते ही वो आरती के ऊपर थे और अंकल का लण्ड उसके योनि के द्वार पर था और एक ही झटके में वो उसके अंदर था अंकल के वहशीपन से लगता था की आज उसका इम्तहान था या फिर उनके पुरुषार्थ को दिखाने का समय या फिर आरती को भोगने का उतावलापन वो भूल चुका था कि वो सिर्फ उसका कार इंस्ट्रक्टर है और जो आज उसके साथ है वो उस्की स्टूडेंट है एक बड़े घर की बहू उसे तो लग रहा था की उसके हाथों में जो थी वो एक औरत है और सिर्फ़ औरत जिसके जिश्म का वो दीवाना था और जैसे चाहे वैसे उसे भोग सकता था वो आरती को चित लिटाकर अपने लण्ड को उसके चुत के द्वार पर रखकर एक जोरदार धक्के के साथ उसके अंदर समा गया उसके अंदर घुसते ही आरती के मुख से एक चीत्कार निकली जो कि उस सुनसांन् ग्राउंड के चारों ओर फेल्ल गई और शायद गाडियो की आवाज में दब कर कही खो गई दुबारा धक्के के साथ ही मनोज अपने होंठों को आरती के होंठों पर ले आया और किसी पिस्टन की भाँति अपनी कमर को धक्के पर धक्के लगाने लगा वो जानता था कि वो ज्यादा देर का मेहमान नहीं है उसकी उत्तेजना शिखर पर है और वो इस कामुक सुंदरी को ज्यादा देर नहीं झेल पाएगा सो वो अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने की जल्दी में था और बिना किसी रोक टोक के अपने शिखर की ओर बढ़ने लगा था

और आरती जो कि नीचे अंकल के हर धक्के के साथ ही अपने को एक बार फिर उस असीम सागर में गोते लगाने लगी थी जिसमें डूब कर अभी-अभी निकली थी पर कितना सुखद था यह सफर कितना सुख दाई था यह सफर एक साथ दो-दो बार उसकी चुत से पानी झरने को था अब भी उसकी चुत इतनी गीली थी कि उसे लग रहा था कि पहली बार पूरी नहीं हो पाई थी कि दूसरे की तैयारी हो चली थी वो भी अपनी कमर को उठाकर अंकल की हर चोट का मजा भी ले रही थी और उसका पूरा साथ दे रही थी अब तो वो भी अपनी जीब अंकल के साथ लड़ाने लग गई थी वो भी अपने होंठों को उसके होंठों से जोड़ कर उन्हें चूमने लग गई थी कि अचानक ही उसके मुख से निकला

आरती- आआआआह्ह अंकल और जोर से

अंकल@#&$^-

आरती- अऔरर्र ज्ज्जूऊऔरर्र्रर सस्स्सीईए उूुुुुुुुुुुउउम्म्म्मममममममममम

और वो अंकल के चारो ओर अपनी जाँघो का घेरा बना कर उसकी बाहों में झूल गई और अंकल के हर धक्के को अंदर अपने अंदर बहुत अंदर महसूस करने लगी उसकी योनि से एक बहुत ही तेज धार जो कि शायद अंकल के लण्ड से टकराई और अंकल भी अब झड़ने लगे अंकल की गिरफ़्त आरती के चारो तरफ इतनी कस्स गई थी कि आरती का सांस लेना भी दूभर हो गया था वो अपने मुख को खोलकर बुरी तरह से सांसें ले रही थी और हर सांस लेने से उसके मुख से एक लंबी सी सस्सशह्ह्ह्ह्ह्ह निकलती

अंकल भी अब अपना दम खो चुका था और धीरे धीरे उसकी पकड़ भी आरती पर से ढीली पड़ने लगी थी वो अपने को अब भी आरती के बालों और कंधों के सहारे अपने चेहरे को ढँके हुए था और अपनी सांसों को कंट्रोल कर रहा था दोनों शांत हो चुके थे पर एक दूसरे को कोई भी नहीं छोड़ रहा था पर धीरे धीरे हल्की सी ठंडक और तेज हवा का झौंका जब उनके नंगे शरीर पर पड़ने लगा या फिर उनको एहसास होने लगा तो जैसे दोनों ही जागे हो और अपनी पकड़ ढीली की और बिना एक दूसरे से नजर मिलाए अंकल ने सहारा देकर आरती के पैर जमीन पर टिकाए और नीचे गर्दन नीची किए दूसरी तरफ पलट गया वो आरती से नजर नहीं मिला पा रहा था और आरती की भी हालत ऐसी ही थी वो अपने बाप समान अंकल के सामने ऊपर से बिल कुल नंगी थी । नीचे खड़े होने से उसकी साड़ी ने उसके नीचे का नंगा पन तो ढँक लिया था पर ऊपर तो सब खुला हुआ था वो भी एक सुनसान से ग्राउंड में आरती को जैसे ही अपनी परिस्थिति का ग्यान हुआ वो दौड़कर पीछे की सीट पर आ गई और जल्दी से दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई और अपने कंधे पर पड़े हुए ब्रा और ब्लाउसको ठीक करने लगी उसकी नजर बाहर गई तो कि बाहर अंकल अपनी अंडरवेअर ठीक करने के बाद अपनी पेंट को पहन रहे थे और अपने चेहरे को भी पोंछ रहे थे तब तक आरती ने अपने आपको ठीक किया और जल्दी से कोट भी पहन लिया ताकि वो घर चलने से पहले ठीक ठाक हो जाए अपनी साड़ी को अंदर बैठे बैठे ठीक किया और नीचे की ओर झटकारने लगी उसकी नजर बीच बीच में बाहर खड़े हुए अंकल पर भी चली जाती थी अंकल अब पूरी तरह से अपने आपको ठीक ठाक कर चुके थे और बाहर खड़े हुए शायद उसी का इंतजार कर रहे थे या फिर अंदर आने में झिहक रहे थे वो शायद उसके तैयार होने का इंतजार बाहर खड़े होकर कर रहे थे पर आरती में तो इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो अंकल को अंदर बुला ले पर उसने अंकल को तभी ड्राइविंग साइड कर गेट खोलते हुए देखा तो झट से उसने अपना सिर बाहर खिड़की की ओर कर लिया और बाहर देखने लगी पर कनखियों से उसने देखा कि अंकल ने नीचे से कुछ उठाया और उसको गाड़ी की लाइट में देखा और अंदर की ओर आरती की तरफ भी उनकी नजर हुई पर आरती की नजर उस चीज पर नहीं पड़ पाई जो उन्होंने उठाई थी पर जब अंकल को उसे अपने मुख के पास लेकर सूँघते हुए देखा तो वो शरम से पानी पानी हो गई वो उसकी पैंटी थी जो कि अंकल के हाथ में थी वो अंदर आके बैठ गये और अपने एक हाथ को पीछे करके उसकी पैंटी को साइड सीट की ऊपर रख दिया ताकि आरती की नजर उसपर पड़ जाए और गेट बंद कर लिया और गाड़ी का इग्निशन चालू कर गाड़ी को धीरे से ग्राउंड के बाहर की ओर दौड़ा दिया

गाड़ी जैसे ही ग्राउंड से बाहर की दौड़ी वैसे ही आरती ने अपनी पैंटी को धीरे से हाथ बढ़ाकर अपने पास खींच लिया ताकि अंकल की नजर में ना आए पर कनखियो से मनोज की नजर से वो ना बच पाई थी हाँ… पर मनोज को एक चिंता अब सताने लगी थी कि अब क्या होगा, जो कुछ करना था वो तो वो कर चुके लेकिन वो चिंतित था कही आरती ने इस बात की शिकायत कही रवि से कर दी तो या फिर कही आरती को कुछ हो गया तो या फिर कही उसका ड्राइविंग स्कूल बंद करवा दिया गया तो

इसी उधेड़बुन में अंकल अपनी गति से गाड़ी चलाते हुए बंगलो की ओर जा रहे थे और उधर आरती भी अपने तन की आग बुझाने के बाद अपने होश में आ चुकी थी वो बार-बार अपनी साड़ी से अपनी जाँघो के बीच का गीलापन और चिपचिपापन को पोन्छ रही थी उसका ध्यान अब भी बाहर की ओर ही था और मन ही मन बहुत कुछ चल रहा था वो अंकल के साथ बिताए वक्त की बारे में सोच रही थी वो जानती थी कि उसने बहुत बड़ी भूलकर ली है पहले रामू काका और अब मनोज अंकल दोनों के साथ उसने वो खेल लिया था जिसका कि भविष्य क्या होगा उसके बारे में सोचने से ही उसका कलेजा काप उठ-ता था पर वो क्या करती वो तो यह सबकुछ नहीं चाहती थी वो तो उसके मन या कहिए अपने तंन के आगे मजबूर हो गई थी वो क्या करती जो नजर उस पड़ पड़ी थी रामू काका की या फिर मनोज अंकल की वो नजर तो आज तक रवि की उस पर नहीं पड़ी थी क्या करती वो उसने जानबूझ कर तो यह नहीं किया हालात ही ऐसे बन गये कि वो उसे रोक नहीं पाई और यह सब हो गया

अगर रवि उसे थोड़ा सा टाइम देता या फिर वो कही एंगेज रहती या फिर उसके लिए भी कोई टाइम टेबल होता तो क्या उसके पास इतना टाइम होता कि वो इन सब बातों की ओर ध्यान देती आज से पहले वो तो कालेज और स्कूल और दोस्तों के साथ कितना घूमी फिरी है पर कभी भी इस तरह की बात नहीं हुई या फिर उसके जेहन में भी इस तरह की बात नहीं आई थी सेक्स तो उसके लिए बाद की बात थी पहले तो वो खुद थी फिर उसकी जिंदगी और फिर सेक्स वो भी रात को अपने पति के साथ। घर के नौकरके साथ सेक्स वो तो कभी सोच भी नहीं पाई थी कि वो इतना बड़ा कदम कभी उठा भी सकती थी वो भी एक बार नहीं दो बार पहली को तो गलती कहा जा सकता था पर दूसरी और फिर आज भी वो भी बाहर दूसरे अनजान आदमी के साथ

यह गलती नहीं हो सकती थी यही सोचते सोचते कब घर आ गया उसे पता भी ना चला और जैसे ही गाड़ी रुकी उसने बाहर की ओर देखा घर का दरवाजा खुला था पर गाड़ी के दरवाजे पर अंकल को नजर झुकाए खड़े देखकर एक बार फिर आरती सचेत हो गई और जल्दी से गाड़ी के बाहर निकली और लगभग दौड़ती हुई सी घर के अंदर आ गई और जल्द बाजी से अपने कमरे की ओर चली गई कमरे में पहुँचकर सबसे पहले अपने आपको मिरर में देखा अरे बाप रे कैसी दिख रही थी पूरे बाल अस्त व्यस्त थे और चेहरे की तो बुरी हालत थी पूरा मेकप ही बिगड़ा हुआ था अगर कोई देख लेता तो झट से समझ लेता की क्या हुआ है आरती जल्दी से अपने आपको ठीक करने में लग गई और बाथरूम की ओर दौड़ पड़ी।
 
कुछ देर बाद आरति अपने को ठीक करके सोनल के रूम में जाति है। वहा सोनल बहुत हताश और चिंतित दिखती है।

आरती--- बेटा, क्या हुआ कुछ प्रॉब्लम है क्या।

सोनल चोंकते हुए--नही मम्मी जी कुछ भी तो नही, वो न एग्जाम नजदीक आ रहे है बस उस्की टेंसन है।

आरती-- अरे तुमारे प्रेम सर् है ना वो तो कह रहे थे सोनल इस बार 80% लाएगी।

प्रेम सर का नामसुनकर सोनल मन मे-- वही तो टेंसन है।

मम्मी जी फिर भी एग्जाम की चिंता तो होगी ही।

आरती-- अच्छा ठीक है, और बताओ क्या चल रहा है आजकल।

सोनल-- कुछ नही मम्मी।

ऐसे ही दोनो मा बेटी अपनी अपनी धून में खोए बात करती रही।

आरति को ध्यान आया हाँ आज तो उसके पति तो लेट आने वाले थे चलो खाना खा लेते है फिर इंतजार करूँगी

वे नीचे आ गई और सोनल के साथ खाना खाने लगी पर अब सोनल तो बस बड बड किए ही जा रही थी उसका बिल्कुल मन नहीं था कोई भी बात का जबाब देने का पर क्या करे

सोनल--/मम्मीजी, कैसा रहा आज का आपका क्लास

आरती- बस बेटा

क्या बताती आरती की कैसा रहा

सोनल- क्यों कुछ सीखा की नहीं मम्मी।

आरती- खास कुछ नहीं बस थोड़ा सा

क्या बताती कि उसने क्या सीखा बताती कि उसने अपने जीवन का वो सुख पाया था जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था आज पहली बार किसी ने उसकी चुत को अपने होंठों से या फिर अपने जीब से चाटा था सोचते ही उसे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई थी

सोनल- चलो शुरू तो किया आपने, अब किसी तरह से जल्दी से सीख जाएगें तब हम दोनों खूब घूमेंगे

आरती- हा

आरती का खाना कब का हो चुका था पर सोनल बक बक के आगे वो कुछ भी कह पा रही थी वो जानती थी कि सोनल भी कितनी अकेली है और उससे बातें नहीं करेंगी तो बेचारी तो मर ही जाएँगी वो बड़े ही हँस हँस कर आरती की ओर देखती हुई अपनी बातों में लगी थी और खाना भी खा रही थी जब खाना खतम हुआ तो दोनों उठे और बेसिन में हाथ मुँह धो कर आरती अपने कमरे की चल दी और सोनल अपने कमरे की ओर ऊपर जाते हुए आरती ने सोनल को कहते सुना

सोनल - अरे रामू दादा ध्यान रखना, पापा को आने में देर होगी।

रामू- जी बिटिया जी आप निश्चिंत रहे

तब तक आरती अपने कमरे में घुस चुकी थी उसकी थकान से बुरी हालत थी जैसे शरीर से सबकुछ निचुड चुका था वो जल्दी से चेंज करके अपने बिस्तर पर ढेर हो गई और पता ही नहीं चला कि कब सो गई और कब सुबह हो गई थी

सुबह जब नींद खुली तो रोज की तरह बाथरूम के अंदर से आवाजें आ रही थी मतलब रवि जाग चुका था और बाथरूम में था वो । आरती भी बिस्तर छोड़ कर उठी और बाथरूम में जाने की तैयारी करने लगी । रवी के निकलते ही वो बाथरूम की और लपकी

रवि- कैसा रहा कल का ड्राइविंग क्लास

आरती- जी कुछ खास नहीं थोड़ा बहुत

रवि- हाँ… तो क्या एक दिन में ही सीख लोगी क्या

आरती तब तक बाथरूम में घुस चुकी थी जब वो वापस निकली तो रवि नीचे जाने को तैयार था

और आरती के आते ही दोनों नीचे काफ़ी पीने के लिए चल दिए । रवि कुछ शांत था कुछ सोच रहा था पर क्या। और नहीं कुछ पूछा उसने कि कब आई थी कब गई थी क्या-क्या सीखा और क्या हुआ कुछ भी नहीं

आरती का मूड सुबह सुबह ही बिगड़ गया जब वो नीचे पहुँचे तो जया काकी चाय सर्व कर रही थी और सोनल पेपर पर नजर गढ़ाए बैठी थी , दोनों के आने की अहाट से जया काकी और सोनल सचेत हो गये ,

रवि-- बेटा कैसी चल रही है आपकी पढ़ाई।

सोनल- जी ठीक

रवि - ठीक से पढ़ने पर ध्यान दो। तुमारे प्रेम सर बहुत अच्छे टीचर है

सोनल- जी

वो जानती थी कि प्रेम सर कितने अच्छे टीचर है और कितनी अच्छी उसकी टीचिंग है उसके शरीर में एक लहर फिर से दौड़ गई वो अपने चाय की चुस्की लेती रही और सर के बारे में सोचने लगी कि कल उसने क्या किया एक दम से अपना लण्ड दिख दिया, कही आंटी आ जाती तो और कुछ अनहोनी हो जाती तो

उसके शरीर में एक सेक्स की लहर दौड़ गई वो चाय पी तो रही थी पर उसका पूरा ध्यान अपने साथ हुए हादसे या फिर कहिए कल की घटना पर दौड़ रही थी वो ना चाहते हुए भी अपने को रुक नहीं पा रही थी बार-बार उसके जेहन में कल की घटना की घूम रही थी और वो धीरे-धीरे अपनी उत्तेजना को छुपाती जा रही थी

चाय खतम होते होते सोनल की हालत बहुत ही खराब हो चुकी थी वो अब अपने कमरे में अकेली होना चाहती थी और उसके शरीर की आग को वो अब कंट्रोल नहीं कर पा रही थी तभी उसके होंठों से एक लंबी सी सांस निकली और सबका ध्यान उसकी ओर चला गया

रवि- क्या हुआ बेटा।

सोनल - (घबरा गई ) कुछ नहीं बस

सभी की चाय खतम हो गई थी सभी अपने कमरे की ओर चल दिए, रवि शोरुम जाने की तैयारी में थे चाय की टेबल पर रवि और आरती कल शाम की बातें ही करते रहे और सोनल भी अपने साथ हुई घटना के बारे में सोचते रही।

सोनल अपने कमरे में गुसी और एक दम बेड पर पसर गयी।

उधर जब रवि और आरति दोनों कमरे में आए तो रवि कल की घटना को अंजाम देने के लिए जल्दी बाजी में था और तैयार होकर शोरुम जाने को और आरती भी कल की घटना के बारे में सोचते हुए इतना गरम हो चुकी थी की वो भी उसको अंजाम देना चाहती थी पर जैसे ही कमरे में वो लोग घुसे

रवि- सुनो जल्दी से ड्रेस निकल दो आज से थोड़ा जल्दी ही जाना होगा शोरुम कभी भी बैंक वाले आ सकते है इनस्पेक्षन के लिए

आरती- जी पर रोज तो आप 10 30 बजे तक ही जाते है आज क्यों जल्दी

रवि- अरे कहा ना आज से थोड़ा सा जल्दी करना होगा

और कहता हुआ वो बाथरूम में घुस गया आरती का दिमाग खराब हो गया वो झल्ला कर अपने बिस्तर पर बैठ गई और गुस्से से अपने पैरों को पटकने लगी रवि को कोई सुध नहीं है मेरी हमेशा ही शोरुम और बिज़नेस के बारे में सोचता रहता है अगर कही जाना भी होता है तो अगर उसकी इच्छा हो तो नहीं तो मना।

और मनोज अंकल के बारे में सोचने लगी कि कल उसने क्या किया एक ग्राउंड में वो भी खुले में कोई देख लेता तो और कुछ अनहोनी हो जाती तो

पर कल तो मनोज अंकल ने कमाल ही कर दिया था जब उसके चुत पर उन्होंने अपना मुख दिया था तो वो तो जैसे पागल ही हो गई थी और अपना सबकुछ भूलकर वो अंकल का कैसे साथ दे रही थी वो सोचते ही आरती एक बार फिर से गरम होने लगी थी सुबह सुबह ही उसके शरीर में एक सेक्स की लहर दौड़ गई वो बेड पर रवि का इंतज़ार तो कर रही थी पर उसका पूरा ध्यान अपने साथ हुए हादसे या फिर कहिए कल की घटना पर दौड़ रही थी वो ना चाहते हुए भी अपने को रुक नहीं पा रही थी बार-बार उसके जेहन में कल की घटना की घूम रही थी और वो धीरे-धीरे अपनी उत्तेजना को छुपाती जा रही थी

इंतज़ार खतम होते होते आरती की हालत बहुत ही खराब हो चुकी थी वो अब अपने पति के साथ अपने कमरे में चुदना चाहती थी और अपने तन की भूख को मिटाना चाहती थी।

आरती को अपने ऊपर गुस्सा आरहा था वो अपने पैरों को झटकते हुए अपने शरीर में उठ रहे ज्वार को भी ठंडा कर रही थी वो जानती थी कि अब उसे किसी भी हालत में रवि की ज़रूरत है पर रवि को तो जैसे होश ही नहीं है उसकी पत्नी को क्या चाहिए और क्या उसकी तमन्ना है उसे जरा भी फिकर नहीं है

क्या करे वो कल की घटना उसे बार-बार याद आ रही थी मनोज अंकल की जीब की चुभन उसे अभी भी याद थी उसके शरीर में उठने वाले ज्वार को वो अब नजर अंदाज नहीं कर सकती थी वो रवि के आते ही लिपट जाएगी और, उसे मजबूर कर देगी कि वो उसके साथ वो सब करे वो सोच ही रही थी कि दरवाजे पर नोक हुई, आरति ने मन मारकर दरवाजा खोला, बाहर जया काकी खड़ी थी

जया - अरे बहूरानी ,

आरती- जी काकी,

जया काकी- रवि बाबू से कह देना कि अभी शोरूम से फ़ोन आया था।

आरती- बाथरूम में है आते ही बता देती हूँ

वो सोच ही रही थी की रवि बाथरूम से निकला और मिरर के सामने आकर खड़ा हो गया आरती ने सोचा था वो सब धरा का धरा रह गया ।

आरती--- अभी शो रूम से फ़ोन आया था नीचे।

रवि-- हां वो इनक्सपेक्सन वाले आ गये होंगे।

आरती के जैसे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई हो उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि रवि उसको ऐसे ही छोड़ कर चला जायेगा।

आरती को अपने पति पर बहुत गुस्सा आ रहा था उनकी बातों में कही भी नहीं लगा था कि वो उसकी फीलिंग को समझ रहे है।

रवि- ऐसे ही कही घूम आना नहीं तो घर में बैठी बोर हो जाओगी और तुम थोड़ा बहुत घर से निकला भी करो बैठी बैठी मोटी हो जाओगी आंटियों की तरह

आरती- हाँ… अकेली अकेली जाऊ और जाऊ कहाँ बता दो तुम्हें तो काम से फुर्सत ही नहीं है

रवि- अरे काम नहीं करूँगा तो फिर यह शानो शौकत कहाँ से आएगी

आरती- नहीं चाहिए यह शानो शौकत

रवि- हाँ… तुम तो पता नहीं किस दुनियां में रहती हो कोई नहीं पूछेगा अगर घर में नौकार चाकर नहीं हो और खर्चा करने को जेब में पैसा ना हो समझी

और रवि मुँह बनाते हुए जल्दी से तैयार होने लगा फिर बाहर निकल गया।

आरती का दिमाग गुस्से से भर गया था कितना मतलबी है उसका पति सिर्फ़ अपनी ही सोचते रहते है पता नहीं क्या हुआ होगा पत्नी को और यह है की जब से सिरफ शोरूम की सोच रहे है आरती का चेहरा एकदम गुस्से से लाल था

पर रवी तो अपनी धुन में ही था और जल्दी से तैयार होकर नीचे चला गया

जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो वो भी गुस्से से उठी और अपने पति के पीछे-पीछे नीचे डाइनिंग रूम में चली आई। आरती ने सुबह की ड्रेस ही पहने हुई थी और दिमाग खराब वो गुस्से में तो थी ही पर खाने के टेबल पर जया काकी और रामू काका के रहते उसने कुछ भी ऐसा नहीं दिखाया कि किसी को उसके बारे में कोई शक हो वो शांत थी और खाने को परोस कर दे रही थी

रवि भी किसी भूत की तरह जल्दी-जल्दी खाना खतम करके बाहर की ओर भागा जब रवि चला गया तो----

उसी समय सोनल बिस्तर पर लेटी हुई अपनी मम्मी की तरह कल की यादों में खोई हुई थी और उसकी आंख लग गयी और सो गई। सोते ही सपने में खो गईईईई----

एक झटके में पूरा लौड़ा अन्दर उसकी चूत में डाल दिया जोर से, वो चिल्ला उठी बोली सर बहुत दर्द हो रहा है बाहर निकालो, सर बोले 5 मिनट रुको और फिर देखना, वो दर्द से तड़प रही थी और सर अब अपना लंड अंदर बाहर उसकी चूत में डाल कर उसे मसल रहे थे। सर उसे जमके चोदते हुए बोले अब दर्द कैसा है सोनल,

सोनल बिल्कुल ठीक हो गई दर्द नहीं रहा और एकदम से सोनल सर से लिपट गई उनके होठों को चूमने लगी और बोली सर और डालो चोदो मुझे, चोदो सर बहुत मस्त मजा आ रहा है..…......................

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और आरती अपने कमरे की चली गई जाते हुए भी उसका मन कुछ भी नहीं सोच पा रहा था अपने पति की कही हुई बात उसे याद आ रही थी और अपने पति के स्वार्थी पन का अंदाज़ा वो लगा रही थी वो भी तो उसके लिए एक चीज ही बनकर रह गई थी जो उसका मन होता तो बहुत ही अच्छे से बात करते नहीं तो कोई फिकर ही नहीं जब मन में आया यूज़ किया और फिर भूल गये बस उनके दिमाग में जो बात हमेशा घर किए हुए रहती थी वो बस उनके दिमाग में जो बात हमेशा घर किए हुए रहती थी वो थी पैसा सिर्फ़ पैसा

आरती झल्लाती हुई अपने कमरे में घुसी और चिढ़ती हुई सी बिस्तर पर बैठ गई पर जल्दी ही उठी और बाथरूम में घुस गई वो नहीं चाहती थी कि सोनल को कुछ भी पता चले क्योंकी उसे मम्मी और पापा से कोई शिकायत नहीं होने चाहिए थी वो जल्दी से नहा दो कर तैयार होकर जल्दी से नीचे पहुँची ताकि सोनल को बुलाना न पड़े ।

पर नीचे जब वो पहुँची तो सोनल अब तक नहीं आई थी वो, अरे 10 बज गए मैं भी कहा खोई रहती हूं, और ये लड़की क्या स्कूल नही जाना सोनल को, या चली गयी है आरति सोचते हुए,

सोनल के रूम की तरफ चली गयी और रूम के दरवाजे को थपथपथपथपथप किया, और उधर सोनल सपने में,

तभी आरति रूम में जाकर बोल रही थी कि देख सुबह के 10:00 बज गए और अभी भी सो रही है उठ सोनल, स्कूल नही जाना था तुझे,

और सोनल को उठा दिया और सोनल का सपना वहीं टूट गया क्या मस्त सपना देख रही थी। उठते ही उसके दिमाग में वही सपना चलने लगा कि सपने में किस तरह से प्रेम सर ने उसे चोदा और सोच सोच कर उसकी पुसी गीली हो जा रही थी। उस्की हालत अब बिल्कुल मदहोश सी होने लगी।

सोनल-- मम्मी आज तबियत ठीक नही है, इसलिए नींद आ गयी थी फिर से ,

आरति -- क्या हुआ मेरी गुडिया को।

सोनल-- मम्मी सुबह सर दुख रहा था अब ठीक है।

आरती- ठीक है बेटा, जा जल्दी से नहाकर आ जा खाना खा लेते है

सोनल- जी मम्मी जी,

सोनल को मालूम था कि अगर आज स्कूल गयी तो सर उसके साथ कुछ न कुछ गलत जरूर करेंगे, इसलिए आज वो स्कूल नही गयी।

आरति वापिश अपने कमरे में चली गयी।

पर नीचे जब वो पहुँची तो सोनल अब तक नहीं आई थी वो जैसे ही डाइनिंग रूम में दाखिल हुई उसकी नजर रामू काका पर पड़ गई जो कि बहुत ही तरीके से टेबल को सजा रहे थे जैसे ही रूम में आवाज आई तो उसकी नजर भी आरती की ओर उठ गई थी और रामू और आरती की नजर एक बार फिर मिली और दोनों के शरीर में एक सनसनी सी दौड़ गई आरती जो की अब तक अपने पति के बारे में सोच रही थी एकदम से अपने को जिस स्थिति में पाया उसके लिए वो तैयार नहीं थी

पर रामु काका की नजर जैसे ही उससे टकराई वो सबकुछ भूल गई और अपने शरीर में उठ रही सनसनी को सभालने में लग गई वो वही खड़ी-खड़ी कुछ सोच भी नहीं पा रही थी की इस स्थिति से कैसे लडे पर ना जाने क्यों अपने होंठों पर एक मधुर सी मुस्कान लिए हुए वो आगे बढ़ी और सोनल के आने पहले ही अकेली डाइनिंग टेबल पर पहुँच गई

आरती- क्या बनाया है काका

और टेबल पर पड़े हुए बौल को खोलकर देखने लगी वो जिस तरह से झुक कर टेबल पर रखे हुए चीजो को देख रही थी उससे उसके सूट के गले से उसकी चुचियों को देख पाना बड़ा ही सरल था रामू ना चाहते हुए भी अपनी नजर उसपर से ना हटा सका वो अपना काम भूलकर आरती को एकटक देखता रहा कितनी सुंदर और कोमल सी आरती जिसके साथ उसने कुछ हसीन पल बिताए थे वो आज फिर से उसके सामने खड़ी हुई अपने शरीर का कुछ हिस्सा उसे दिखा रही थी जान भुज कर या अन जाने में पता नहीं पर हाँ… देख जरूर रहा था वो आरती कि चुचियों के आगे बढ़ा और उसकी पतली सी कमर तक पहुँचा ही था कि सोनल के आने की आहट ने सबकुछ बिगाड़ दिया और वो जल्दी से किचेन की ओर चला गया

सोनल - अरे मम्मी आपने जल्दी नहा लिया

आरति- सोचा तुमसे पहले ही आ जाऊ

सोनल- क्या बनाया है रामू दादा ने आज खाने में।

आरति-- तुम्हारी फेवरट आलू छोले और पूरी। जल्दी खा लो फिर बाहर चलेंगे।

पर सोनल का मन बिल्कुल नहीं था , अपनी मम्मीजी के साथ म जाने का पर कैसे मना करे सोचने लगी वो कही भी नहीं जाना चाहती थी पर

आरति - आज कुछ शॉपिंग करके आते है काफी दिन हो गए है तू भी चल क्या करेगी घर में

सोनल- जी पर

आरती- पर क्या थोड़ा बहुत घूम लेगी और क्या में कौन सा कह रही हूँ कि पहाड़ तोड़ना है

सोनल- जी तो फिर

आरती- अरे वहां आसपास्स गार्डेन है तू थोड़ा घूम लेना और में भी ज्यादा देर कौन सा रुकने वाली हूँ वो तो एक शादी आने वाली है अपने यहा इसलिए शॉपिंग करनी है ।

सोनल - जी

और दोनों खाना खाने लगे थे और बातों का दौर चलता रहा आरति और सोनल खाने के बाद उठे और हाथ मुँह दो कर वही थोड़ा सा बातें करते रहे और

आरति - रामू काका टेबल साफ कर दो

और फिर सोनल की ओर मुड़ गई

रामू किचेन से निकला और टेबल पड़े झुटे बर्तन उठाने लगा पर हल्की सी नजर आरती पर भी डाल ली आरती उसी की तरफ चेहरा किए हुए थी और सोनल की पीठ उसके त्तरफ थी

वो चोर नजर से आरती को देख रहा था और समान भी लपेट रहा था आरती की नजर भी कभी-कभी काका की हरकतों पर पड़ रही थी और उसके होंठों पर एक मुस्कान दौड़ गई थी जो कि रामू से नहीं छुप पाई और वो एकटक आरती की ओर देखता रहा पर जैसे ही आरती की नजर उस पड़ पड़ी तो दोनों ही अपनी नजरें झुका के आरती अपने कमरे की ओर और भीमा अपने किचेन की ओर चल दिए

आरती ने अपने कमरे की ओर जाते जाते

आरती- 1 बजे तक तैयार हो जाना टक्सी वाले को बोल दिया है

सोनल- जी, मम्मी

और मुड़कर सोनल की ओर देखती पर उसकी नजर रामू काका पर वापस टिक गई जो कि फिर से किचेन से निकल रहे थे रामू भी निकलते हुए सीढ़ियो पर जाती हुई आरती को देखना चाहता था इसलिए वो वापस जल्दी से पलटकर डाइनिंग स्पेस पर आ गया था वो तो आरती की मस्त चाल का दीवाना था जब वो अपने कूल्हे मटका मटकाकर सीढ़ी चढ़ती थी तो उसका दिल बैठ जाता था और वो उसी के दीदार को वापस आया था पर जैसे ही उसकी नजर आरती पर पड़ी तो वो भी झेप गया पर अपनी नजर को वो वहाँ से हटा नहीं पाया था

उसे आरती की नजर में एक अजीब सी कशिश देखी थी एक अजीब सा नशा था एक अजीब सा खिचाव था जोकि शायद वो पहले नहीं देख पाया था वो आरती को अपनी ओर देखते हुए अपने कमरे की जाते हुए देखता रहा जब तक वो उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गई

एक लंबी सी सांस छोड़ कर वो फिर से काम में लग गया और उधर जब सोनल ने उसे पुकार कर कहा तब वो जबाब देते हुए पलटी तो काका को अपनी ओर देखते पाकर वो भी अपनी नजर काका की नजर से अलग नहीं कर पाई थी वो काका की नजर में एक भूख को आसानी से देख पा रही थी उसके प्रति एक भूख उसके प्रति एक लगाव या फिर उसके प्रति एक खिचाव को वो काका की नजर में देख रही थी उसके शरीर में एक आग फिर से आग लग गई थी जिसे उसने अपनी सांसों को कंट्रोल करके संभाला और एक तेज सांस छोड़ कर अपने कमरे की चली गई । आरती कमरे में घुसकर वापस बिस्तर पर ढेर हो गई और अपने बारे में सोचती रही उसे क्या हो गया है जब देखो उसे ऐसा क्यों लगता रहता है वो तो सेक्स की भूखी कभी नहीं थी पर आज कल तो जैसे उसके शरीर में जब देखो तब आग लगी रहती है क्या कारण है क्या वो इतनी कामुक हो गई है की पति के ना मिलने पर वो किसी के साथ भी सेक्स कर सकती है दो जनों के साथ तो वो सेक्स कर चुकी थी

वो भी इस घर के नौकर के साथ भी जिनकी हसियत ही क्या है उसके सामने पर आख़िर क्यों वो काका और मनोज अंकल को इतना मिस करती है क्यों उनके सामने जाते ही वो अपना सबकुछ भूल जाती है अभी भी तो काका उसकी तरफ जैसे देख रहे थे अगर सोनल ने देख लिया होता तो वो अपने आपको संभालने की कोशिश करने लगी थी नहीं यह गलत है उसे इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए वो एक घर की बहू है उसका पति है संपन्न घर है वो सिर्फ़ सेक्स की खातिर अपने घर को उजड़ नहीं सकती

उसने एक झटके से अपने दिमाग से रामू काका को और मनोज अंकल को निकाल बाहर किया और सूट चेंज करने के लिए वारड्रोब के सामने खड़ी हो गई उसने गाउन निकाला और जैसे ही पलटी उसकी नजर कल के ब्लाउस और पेटीकोट पर पड़ गई जो की उसने पहना था काका के लिए

वो चुपचाप उसपर अपनी नजर गढ़ाए खड़ी रही और धीरे से अपने हाथों से लेकर उनको सहलाने लगी पता नहीं क्यों उसने गाउन रखकर फिर से वो पेटीकोट और ब्लाउस उठा लिया और बाथरूम की चल दी चेंज करने को जब वो बाथरूम में चेंज कर रही थी तो जैसे-जैसे वो ड्रेस को अपने शरीर पर कस रही थी उसके शरीर में फिर से सेक्स की आग भड़कने लगी थी वो अपने सांसों को कंट्रोल नहीं कर पा रही थी उसकी सांसें अब बहुत तेज चलने लगी थी और उसकी चूचियां उसके कसे हुए ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को हो रही थी पेटीकोट और ब्लाउस पहनकर उसने अपने को मिरर में देखा तो वो किसी अप्सरा सी दिख रही थी।

वो अपने हाथों से एक बार अपने को सहलाते हुए अपने को मिरर में देखती रही और पलटकर जल्दी से कमरे में आ गई थी और बिस्तर पर धम्म से गिर गई उसका पूरा शरीर में आग लगी हुई थी पर उसने किसी तरह से अपने को कंट्रोल किया हुआ था उसने चद्दर खींचकर अपने को ढका और सबकुछ भूलकर सोने की कोशिश करने लगी उसने रवि के तकिए को भी चद्दर के अंदर खींच लिया और अपने आपको अपनी बाहों में भर कर सोने की कोशिश करने लगी थी

और उधर रामू अपने काम से फुर्सत हो गया था पर उसकी नजर बार-बार सीढ़ियों पर ही थी उसे आज भी उम्मीद थी कि आरती जरूर उसे बुला लेगी पर जब बहुत देर तक कोई आवाज नहीं आयी तो उसने कई बार बाहर आकर भी देखा । किचेन में ही खड़ा-खड़ा इंतजार करने लगा था पर कोई आवाज़ नहीं आयी वो अपने आपको उस हसीना के पास जाने को रोक नहीं पा रहा था पर अपनी हसियत और अपने छोटे पन का अहसास उसे रोके हुए था पर कभी वो निकलकर सीडियो की ओर देखता और वापस किचेन की ओर चला जाता वो अपने को रोकते हुए भी कब सीढ़ियो की ओर उसके पैर उठ गये वो नहीं जानता था

कहाँ से उसमें इतनी हिम्मत आ गई वो नहीं जानता था पर हाँ… वो अब सीढ़िया चढ़ रहा था बार-बार पीछे की ओर देखते हुए और बार अपने को रोकते हुए उसका एक कान किचेन में और दूसरा कान घर में होने वाली हर आहट पर भी था वो जब आरती के कमरे के पास पहुँचा तो घर में बिल्कुल शांति थी रामू की सांसें फूल रही थी जैसे की बहुत दूर से दौड़ कर आ रहा हो या फिर कुछ भारी काम करके आया हो रामू अपने कानों को आरती के दरवाजे पर रखकर अंदर की आहट को सुनने लगा पर कोई भी आहट नहिहुई थी अंदर

वो पलटकर वापस जाने लगा पर थोड़ी दूर जाके रुक गया क्या कर रही है आरती कही उसका इंतजार तो नहीं कर रही है अंदर। बुला नहीं पाई होगी शायद शरम से या फिर उसे लगता है कि कल ही तो उसने बुलाया था तो आज बुलाने की क्या जरूरत है हाँ शायद यही हो वो वापस मुड़ा और फिर से आरती के कमरे के बाहर आके खड़ा हो गया धीरे से बहुत ही धीरे से दरवाजे पर एक थपकी दी पर अंदर से कोई आवाज नहीं आई और नहीं कल जैसे दरवाजा ही खुला

पर रामू तो जैसे अपने दिल के हाथों मजबूर था उसका दिल नहीं मान रहा था वो देखना चाहता था कि आरती क्या कर रही है शायद उसका इंतेजार ही कर रही हो और वो अपने कारण इस चान्स को खो देगा वो हिम्मत करके धीरे से दरवाजे को धकेल ही दिया दरवाजा धीरे से अंदर की ओर खुल गया थोड़ा सा पर हाँ अंदर देख सकता था अंदर जब उसने नजर घुमाकर देखा तो पाया कि आरती तो बिस्तर पर सोई हुई है एक चद्दर ढँक कर तकिया पकड़कर एक टाँग जो कि चद्दर के अंदर से निकलकर बाहर से तकिये के ऊपर लिया था वो पूरी नंगी थी सफेद सफेद जाँघो के दर्शान उसे हुए उसकी हिम्मत बढ़ी और वो थोड़ा सा और आगे होके देखने की कोशिश करने लगा वो लगभग अंदर ही आ गया था और धीरे-धीरे

आरती के बिस्तर की ओर बढ़ने लगा था उसकी आखों में आरती की जांघे और फिर गोरी गोरी बाहें भी देखने लगी थी चादर ठीक से नहीं ओढ़ रखी थी आरती ने पर वो जो कुछ भी देख रहा था वो उसके शरीर में जो आग लगा रही थी और उसके अंदर एक ऐसी हिम्मत को जनम दे रही थी की अब तो चाहे जो हो जाए वो आरती को देखे बगैर बाहर नहीं जाएगा वो आरती के बिस्तर के और भी पास आ गया था आरती अब तक सो रही थी पर उसकी चद्दर के अंदर से उसके शरीर का हर उतार चढ़ाव उसे दिख रहा था वो थोड़ा सा झुका और अपने हाथों को आरती की जाँघो पर ले गया वो धीरे-धीरे उसकी जाँघो को अपनी हथेली से महसूस करने लगा उसके हाथो में जैसे कोई नरम सी और चिकनी सी चीज आ गई हो वो बड़ी ही तल्लीनता से आरती की जाँघो को उसके पैरों तक और फिर ऊपर बहुत ऊपर तक उसकी कमर तक ले जाने लगा था पर बहुत ही आराम से जैसे

उसे डर था कही आरती उठ ना जाए पर नहीं आरती के शरीर पर कोई हरकत नहीं हुई थी उसकी हिम्मत और बढ़ी और वो धीरे से आरती के ऊपर से चद्दर को हटाने लगा आरती की पीठ उसकी तरफ थी पर वो आरती की सांसों के साथ उसके शरीर के उठने बैठने के तरीके से समझ गया था कि वो सो रही थी उसने हिम्मत करके आरती के ऊपर से चद्दर को धीरे से हटा दिया

उूुुुउउफफफफफफफफफफ्फ़ क्या शरीर था चद्दर के अंदर गजब का दिख रहा था, सफेद ब्लाउस और पेटीकोट था पहने हाँ… वही तो था कल वाला तो क्या आरती उसके लिए ही तैयार हुए थी आआआआअह्ह

रामू के मुख से अचानक ही एक आह निकली और उसके हाथ आरती की पीठ पर धीरे-धीरे घूमने लगे थे उसकी मानो स्थिति उस समय ऐसी थी कि वो चाह कर भी अपने पैरों को वापस नहीं लेजा सकता था वो अब आरती के रूप और रंग का दीवाना था और किसी भी हालत में उसे फिर से हासिल करना चाहता था वो दीवानों की तरह अपने हाथों को आरती के शरीर पर घुमा रहा था और ऊपर वाले की रचना को को अपने हाथों से महसूस कर रहा था उसके मन में बहुत सी बातें भी चल रही थी वो अपने चेहरे को थोड़ा सा आगे करके आरती को देख भी लेता था और उसके स्थिति का जायजा भी लेता जा रहा था सोते हुए आरती कितनी सुंदर लगती थी बिल्कुल किसी मासूम बच्चे की तरह कितना सुंदर चेहरा है और कितनी सुंदर उसकी काया है उसके हाथ अब आरती कि जाँघो को बहुत ऊपर तक सहला रहे थे।
 
और लगभग उसकी कमर तक वो पहुँच चुका था वो धीरे से आरती के बिस्तर पर बैठ गया और आरती कि दोनों टांगों को अपने दोनों खुरदुरे हाथों से

सहलाने लगा था कितना मजा आ रहा था रामू को यह वो किसी को भी बता नहीं सकता था उसके पास शब्द नहीं थे उस एहसास का वर्णन करने को उसके हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ-ते और फिर आरती की जाँघो की कोमलता का एहसास करते हुए नीचे उसकी टांगों पर आकर रुक जाते थे वो अपने को रोक नहीं पाया और उस सुंदरता को चखने के लिए वो धीरे से नीचे झुका और अपने होंठों को आरती के टांगों पर रख दिया और उन्हें चूमने लगा बहुत धीरे से और अपने हाथों को भी उन पर घुमाते हुए धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठने लगा वो अपने जीवन का वो लम्हा सबकुछ भूलकर आरती की जाँघो को समर्पित कर चुका था उसे नहीं पता था कि इस तरह से वो आरती को जगा भी सकता था पर वो मजबूर था और अपने को ना रोक पाकर ही वो इस हरकत पर उतर आया था उसकी जीब भी अब आरती की जाँघो को चाट चाट कर गीलाकर रहे थे और होंठों पर इतनी कोमल और चिकनी काया का स्पर्श उसे जन्नत का वो सुख दे रही थी जिसकी कि उसने कभी भी कल्पना भी नहीं की थी वो अपने मन से आरती की तारीफ करते हुए धीरे-धीरे अपने काम में लगा था और अपने हाथों की उंगलियों को ऊपर-नीचे करते हुए आरती की जाँघो पर घुमा रहा था

उसके उंगलियां आरती की जाँघो के बीच में भी कभी-कभी चली जाती थी वो अपने काम में लगा था कि अचानक ही उसे महसूस हुआ कि आरती की जाँघो और टांगों पर जब वो अपने हाथ फेर रहा था तो उनपर थोड़ा सा खिंचाव भी होता था और आरती के मुख से सांसों का जोर थोड़ा सा बढ़ गया था वो चौंक कर थोड़ा सा रुका कही आरती जाग तो नहीं गई और अगर जाग गई थी तो कही वो चिल्ला ना पड़े वो थोड़ा सा रुका पर आरती के शरीर पर कोई हरकत ना देख कर वो धीरे से उठा और आरती की कमर के पास आ गया और अपने हाथों को उसने उसकी कमर के चारो ओर घुमाने लगा था और एक हाथ से वो आरती की पीठ को भी सहलाने लगा था वो आज अच्छे से आरती को देखना चाहता था और उसके हर उसे भाग को छूकर भी देखना चाहता था जिसे वो अब तक तरीके से देख नहीं पाया था शायद हर पुरुष की यही इच्छा होती है जिस चीज को भोग भी चुका हो उसे फिर से देखने की और महसूस करने की इच्छा हमेशा ही उसके अंदर पनपती रहती है

वही हाल रामू का भी था उसके हाथ अब आरती की पीठ और, कमर पर घूम रहे थे और हल्के-हल्के वो उसकी चुचियो की ओर भी चले जाते थे पर आरती जिस तरह से सोई हुई थी वो अपने हाथों को उसकी चूची तक अच्छी तरह से नहीं पहुँचा पा रहा था पर फिर भी साइड से ही वो उनकी नर्मी का एहसास अपने हाथों को दे रहा था लेकिन एक डर अब भी उसके जेहन में थी कि कही आरती उठ ना जाए पर अपने को रोक ना पाने की वजह से वो आगे और आगे चलता जा रहा था

और उधर आरती जो कि अब पूरी तरह से जागी हुई थी जैसे ही रामू काका उसके कमरे में घुसे थे तभी वो जाग गई थी और बिल्कुल बिना हीले डुले वैसे ही लेटी रही उसके तन में जो आग लगी थी रामू काका के कमरे में घुसते ही वो चार गुना हो गई थी वो अपनी सांसों को कंट्रोल करके किसी तरह से लेटी हुई थी और आगे के होने वाले घटना क्रम को झेलने की तैयारी कर रही थी वो सुनने की कोशिश कर रही थी कि रामु काका कहाँ है पर उनके पदछाप उसे नहीं सुनाई दिए हाँ… उसके नथुनो में जब एक महक ने जगह ली तो वो समझ गई थी कि रामू काका अब उसके बिल्कुल पास है वो उस मर्दाना महक को पहचानती थी उसने उस पसीने की खुशबू को अपने अंदर इससे पहले भी महसूस किया था उसके शरीर में उठने वाली तरंगे अब एक विकराल रूप ले चुकी थी वो चाहते हुए भी अपने को उस हालत से निकालने में आसमर्थ थी वो उस सागर में गोते लगाने के लिए तैयार थी बल्कि कहिए वो तो चाह ही रही थी कि आज उसके शरीर को कोई इतना रौंदे कि उसकी जान ही निकल जाए पर वो अपने आपसे नहीं जीत पाई थी इसलिए वो चुपचाप सोने की कोशिश करने लगी थी पर जैसे ही रामू काका आए वो सबकुछ भूल गई थी और अपने शरीर को सेक्स की आग में धकेल दिया था

वो अपने शरीर में उठ रही लहर को किसी तरह रोके हुए रामू काका की हर हरकत को महसूस कर रही थी और अपने अंदर उठ रही सेक्स की आग में डूबती जा रही थी उसे रामू काका के छूने का अंदाज बहुत अच्छा लग रहा था वो अपने को समेटे हुए उन हरकतों का मजा लूट रही थी उसे कोई चिंता नहीं थी वो अपने को एक सुखद अनुभूति के दलदल में धकेलती हुई अपने जीवन का आनंद लेती जा रही थी जब भी काका का हाथ उसके पैरों से उठते हुए जाँघो तक आता था उसकी चुत में ढेर सारा चिपचिपापन सा हो जाता था और चुचियाँ अपने ब्लाउज के अंदर जगह बनाने की कोशिश कर रही थी आरती अपने को किसी तरह से अपने शरीर में उठ रहे ज्वार को संभाले हुए थी पर धीरे-धीरे वो अपना नियंत्रण खोती जा रही थी

रामू काका अब उसकी कमर के पास बहुत पास बैठे हुए थे और और उनके शरीर की गर्मी को वो महसूस कर रही थी उसका पूरा शरीर गरम था और पूरा ध्यान रमु काका के हाथों पर था रामू काका उसकी पीठ को सहलाते हुए जब उसकी चुचियों की तरफ आते थे तो वो अपने को तकिये से अलग करके उनके हाथ को भर देना चाहती थी पर कर ना पाई रामु अब उसके पेट से लेकर पीठ और फिर से जब वो उसकी चुचियों तक पहुँचने की कोशिश की

तो आरती से नहीं रहा गया उसने थोड़ा सा अपने तकिये को ढीला छोड़ दिया और रामू काका के हाथों को अपने चुचियों तक पहुँचने में मदद की और रामू का हाथ जैसे ही आरती की चुचियों तक पहुँचे वो थोड़ा सा चौंका अपने हाथों को अपनी जगह पर ही रोके हुए उसने एक बार फिर से आहट लेने की कोशिश की पर आरती की ओर से कोई गतिविधि होते ना देखकर वो निश्चिंत हो गया और अपने आपको उस खेल में धकेल दिया जहां सिर्फ़ मज ही मजा है और कुछ नहीं वो अपने हाथों से आरती की चुचियों को धीरे दबाते हुए उसकी पीठ को भी सहला रहा था और अपने हाथों को उसके नितंबों तक ले जाता था वो आरती के नथुनो से निकलने वाली सांसों को भी गिन रहा था जो कि अब धीरे-धीरे कुछ तेज हो रही थी पर उसका ध्यान इस तरफ कम और अपने हाथों की अनुभूति की ओर ज्यादा था वो अपने को कही भी रोकने की कोशिश नहीं कर रहा था वो अपने मन से और दिल के हाथों मजबूर था वो अपने हाथ में आई उस सुंदर चीज को कही से भी छोड़ने को तैयार नहीं था।

अब धीरे-धीरे रामु काका की हरकतों में तेजी भी आती जा रही थी उसके हाथों का दबाब भी बढ़ने लगा था उसके हाथों पर आई आरती की चूची अब धीरे-धीरे दबाते हुए उसके हाथ कब उन्हें मसलने लगे थे उसे पता नहीं चला था पर हाँ… आरती के मुख से निकलते हुए आअह्ह ने उसे फिर से वास्तविकता में ले आया था वो थोड़ा सा ढीला पड़ा पर आरती की ओर से कोई हरकत नहीं होते देखकर उसके हाथ अब तो जैसे पागल हो गये थे वो अब आरती के ब्लाउज के हुक की ओर बढ़ चले थे वो अब जल्दी से उन्हे आजाद कंराना चाहता था पर बहुत ही धीरे-धीरे से वो बढ़ रहा था पर उसे आरती के होंठों से निकलने वाली सिसकारी भी अब ज्यादा तेज सुनाई दे रही थी जब तक वो आरती के ब्लाउसको खोलता तब तक आरती के होंठों पर से आआअह्ह और भी तेज हो चुकी थी वो अब समझ चुका था कि आरती जाग गई है पर वो कहाँ रुकने वाला था उसके हाथों में जो चीज आई थी वो तो उसे मसलने में लग गया था और पीछे से हाथ लेजाकर उसने आरती की चुचियों को भी उसके ब्रा से आजाद कर दिया था वो अपने हाथों का जोर उसकी चुचियों पर बढ़ाता ही जा रहा था और दूसरे हाथ से उसकी पीठ को भी सहलाता जा रहा था वो आरती के मुख से सिसकारी सुनकर और भी पागल हो रहा था उसे पता था कि आरती के जागने के बाद भी जब उसने कोई हरकत नहीं की तो उसे यह सब अच्छा लग रहा था वो और भी निडर हो गया और धीरे से आरती को अपनी ओर पलटा लिया और अपने होंठों को आरती की चुचियों पर रख दिया और जोर-जोर से चूसने लगा उसके हाथों पर आई आरती की दोनों चूचियां अब रामू के रहमो करम पर थी वो अपने होंठों को उसकी एक चुचि पर रखे हुए उन्हें चूस रहा था और दूसरे हाथों से उसकी एक चुची को जोर-जोर से मसल रहे थे इतना कि आरती के मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकली और निरंतर निकलने लगी थी आरती के हाथों ने अब रामू के सिर को कस कर पकड़ लिया था और अपनी चुचियों की ओर जोर लगाकर खींचने लगी थी

वो अब और सह नहीं पाई थी और अपने आपको रामू काका की चाहत के सामने समर्पित कर दिया था वो अपने आपको रामू काका के पास और पास ले जाने को लालायित थी वो अपने शरीर को रामू काका के शरीर से सटाने को लालायित थी वो अपनी जाँघो को ऊपर करके और अपना पूरा दम लगाके रमु काका को अपने ऊपर खींचने लगी थी और रामू जो की अब तक आरती की चुचियों को अपने मुख में लिए हुए उन्हें चूस रहा था अचानक ही अपने सिर पर आरती के हाथों के दबाब को पाते ही और जंगली हो गया वो अब उनपर जैसे टूट पड़ा था वो दोनों हाथों से एक चुचि को दबाता और होंठों से उसे चूसता और कभी दूसरे पर मुख रखता और दूसरे को दबाता वो अपने हाथो को भी आरती के शरीर पर घुमाता जा रहा था और नीचे फँसे हुए पेटीकोट को खींचने लगा था जब उससे नाड़ा खुल गया तो एक ही झटके में उसने उसे उतार दिया पैंटी और, पेटीकोट भी और देखकर आश्चर्य भी हुआ की आरती ने अपनी कमर को उठाकर उसका साथ दिया था वो जान गया था की आरती को कोई आपत्ति नहीं है वो भी अपने एक हाथ से अपने कपड़ों से लड़ने लगा था और अपने एक हाथ और होंठों से आरती को एंगेज किए हुए था आरती जो की अब एक जल बिन मछली की भाँति बिस्तर पर पड़ी हुई तड़प रही थी वो अब उसे शांत करना चाहता था वो धीरे से अपने कपड़ों से बाहर आया और आरती के ऊपर लेट गया अब भी उसके होंठों पर आरती के निप्पल थे और हाथों को उसके पूरे शरीर पर घुमाकर हर उचाई और घराई को नाप रहा था तभी उसने अपने होंठों को उसके चूचियां से आलग किया और आरती की और देखने लगा जो की पूरी तरह से नंगी उसके नीचे पड़ी हुई थी वो आरती की सुंदरता को अपने दिल में या कहिए अपने जेहन में उतारने में लगा था पर तभी आरती को जो सुना पन लगा तो उसने अपनी आखें खोल ली और दोनों की आखें चार हुई .

रामू आरती की सुंदर और गहरी आखों में खो गया और धीरे से नीचे होता हुआ उसके होंठों को अपने होंठों से दबा लिया। आरती को अचानक ही कुछ मिल गया था तो वो भी अपने दोनों हाथो को रामू काका की कमर के चारो ओर घेरते हुए अपने होंठों को रामू काका के रहमो करम पर छोड़ दिया और अपने जीब को भी उनसे मिलाने की कोशिश करने लगी थी उसके हाथ भी अब रामू काका के बालिस्त शरीर का पूरा जाएजा लेने में लगे थे खुरदुरे और बहुत से उतार चढ़ाव लिए हुए बालों से भरे हुए उसके शरीर की गंध अब आरती के शरीर का एक हिस्सा सा बन गई थी उसके नथुनो में उनकी गंध ने एक अजीब सा नशा भर दिया था जो कि एक मर्द के शरीर से ही निकल सकती थी वो अपने को भूलकर रामू काका से कस कर लिपट गई और अपनी जाँघो को पूरा खोलकर काका को उसके बीच में फँसा लिया

उसके चुत में आग लगी हुई थी और वो अपनी कमर को उठाकर रामू काका के लण्ड पर अपने आपको घिसने लगी थी उसके जाँघो के बीच में आ के लण्ड की गर्मी इतनी थी कि लगभग झड़ने की स्थिति में पहुँच चुकी थी पर काका तो बस अब तक उसके होंठो और उसकी चुचियों के पीछे ही पड़े हुए थे वो लगातार अपनी चुत को उसके लण्ड पर घिसते हुए अपने होंठों को और जीब को भी काका के अंदर तक उतार देती थी उसकी पकड़ जो कि अब काका की कमर के चारो तरफ थी अचानक ही ढीली पड़ी और एक हाथ काका के सिर पर पहुँच गया और एक हाथ उनके लण्ड तक ले जाने की चेष्टा करने लगी बड़ी मुश्किल से उसने अपने और काका के बीच में जगह बनाई और और लण्ड को पकड़कर अपनी चुत पर रखा और वैसे ही एक झटका उसने नीचे से लगा दिया। रामू काका इस हरकत को जब तक पहचानते तब तक तो आरती के अंदर थे और आरती की जाँघो ने उन्हें कस आकर जकड़ लिया था रामू अपने को एक इतनी सुंदर स्त्री के साथ इस तरह की अपेक्षा करते वो तो जिंदगी में नहीं सोच पाए थे पर जैसे ही वो आरती के अंदर हुए उसका शरीर भी अपने आप आरती के साथ ऊपर-नीचे होने लगा था वो अब भी आरती के होंठों को चूस रहे थे और अपने हाथों से आरती की चुचियों को निचोड़ रहे थे उनकी हर हरकत पर आरती की चीख उनके गले में ही अटक जाती थी हर चीख के साथ रामू और भी जंगली हो जाता था और उसके हाथों का दबाब भी बड जाता था वो पागलो की तरह से आरती को किस करता हुआ अपने आपको गति देता जा रहा था वो जैसे ही आरती के होंठों को छोड़ता आरती की सिसकियां पूरे कमरे में गूंजने लगती तो वो फ़ौरन अपने होंठों से उन्हें सील करदेता और अपनी गति को ऑर भी तेज कर देता पूरे कमरे में आचनक ही एक तूफान सा आ गया था जो कि पूरे जोर पर था कमरे में जिस बिस्तर पर रामू आरती को भोग रहा था वो भी झटको के साथ अब हिलने लगा था

और आरती की जिंदगी का यह एहसास जोकि अभी भी चल रहा था एक ऐसा अहसास था जिसे कि वो पूरी तरह से भोगना चाहती थी वो आज इतनी गरम हो चुकी थी कि रामू के दो तीन झटको में ही वो झड चुकी थी पर रामू के लगातार झटको में वो अपने को फिर से जागते हुए पाया और अपनी जाँघो की पकड़ और भी मजबूत करते हुए रामू काका से लिपट गई और हर धक्के के साथ अपने मुँह से एक जोर दार चीत्कार निकलती जा रही थी वो उन झटकों को बिना चीत्कार के झेल भी नहीं पा रही थी पता नहीं कहाँ जाकर टकराते थे रामू काका के लण्ड के वो ऊपर की ओर सरक जाती थी और एक चीख उसके मुख से निकल जाती थी पर हर बार रामू काका उसे अपने होंठों से दबाकर खा जाते थे उसको रामू काका का यह अंदाज बहुत पसंद आया और वो खुलकर उनका साथ दे रही थी शायद ही उसने अपने पति का इस तरह से साथ दिया हो वहां तो शरम और हया का परदा जो रहता है पर यहां तो सेक्स और सिर्फ़ सेक्स का ही रिस्ता था वो खुलकर अपने शरीर की उठने वाली हर तरंग का मज़ा अभी ले रही थी और अपने आपको पूरी तरह से रामू काका के सुपुर्द भी कर दिया था और जम कर सेक्स का मजा भी लूट रही थी उसके पति का तिरस्कार अब उसे नहीं सता रहा था ना उनकी अप्पेक्षा वो तो जिस समुंदर में डुबकी ले रही थी वहां तो बस मज ही मजा था वो रामू काका को अपनी जाँघो से जकड़ते हुए हर धक्के के साथ उठती और हर धक्के के साथ नीचे गिरती थी और रामू तो जैसे, जानवर हो गया था अपने होंठों को आरती के होंठों से जोड़े हुए लगातार गति देते हुए अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ता जा रहा था उसे कोई डर नहीं था और नहीं कोई शिकायत थी

वो लगातार अपने नीचे आरती को अपने तरीके से चोद रहा था और धीरे धीरे अपने शिखर पर पहुँच गया हर एक धक्के के साथ वो अपने को खाली करता जा रहा था और हर बार नीचे से मिल रहे साथ का पूरा मजा ले रहा था वो अपने को और नहीं संभाल पाया और धम्म से नीचे पड़े हुए आरती के ऊपर ढेर हो गया नीचे आरती भी झड़ चुकी थी और वो भी निश्चल सी उसके नीचे पड़ी हुई गॉंगों करके सांसें ले रही थी उसकी खासी से भी कभी-कभी कमरा गूँज उठा था पर थोड़ी देर में सबकुछ शांत हो गया था बिल कुल शांत। लेकिन

बाहर कमरे के दरवाजे पे भूकम्प आ गया था, जितनी स्पीड से वो दोनों जड़े थे उतनी तेज़ी से एक शक्स और भी जड़ा।

लेकिन उसकी आँखों मे नफरत थी उनदोनो के लिए। हालांकि उनकी चुदाई देख रुक नही पाया समुंदर पर एक नफरत ने भी अपना जन्म लिया।

एक हल्की सी चीख सोनल को अपने कमरे में सुनाई दी थी अपनी मम्मी की । जिसको सुनकर वो ऊपर आ गयी अपनी मम्मी के कमरे के दरवाजे पर , वहा उसने अकल्पनीय नजारा देखा, उनके घर का बुडडा नॉकर जिसको वो दादा कहती है उसकी मम्मी को चोद रहा है और मम्मी भी उसका भरपूर सहयोग कर रही है, हालांकि वो खुद आज उनको देख कर अपनी चुत रगड़ ली थी लेकिन उनको माफ भी नही कर पाई।

उसके पापा जोकि उसके लिए हीरो थे हालांकि वो अंतर्मुखी थे लेकिन उसको बहुत प्यार करते थे, और उसकी मम्मी उन्ही के साथ धोखा कर रही थी।

उसने एक फैसला किया मन ही मन, लेकिन क्या ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा, उसने अपने को संभाला और दरवाजे को जोर से पटक कर चली गईईईई---

जिसको सुनकर आरति और रामू काका दोनो हड़बड़ा गए। और चोंकते हुए दरवाजे को देखा, लेकिन वहा उन्हें कोई नही दिखा। उन्होंने झटफ्ट अपने अपने कपड़े पहने और पहले रामू कमरे से बाहर निकल गया और नीचे पहुचा, वहा भी कोई नही था हर तरफ सन्नाटा था।

तभी आरति भी नीचे आ गयी और इशारे से पूछा, रामु काका से उन्होंने कंधे उचका के जवाब दिया कि कुछ नही पता चला। आरती सोनल के कमरे की तरफ गयी और हल्का सा दरवाजा सरका कर देखा, डोर खुला था और सोनल बिस्तर पर लेटी हुई थी जैसे गहरी नींद में हो।

आरति मुड़कर उप्पेर चली गयी सोचते हुए आखिर कौन हो सकता है सोनल,जया काकी या फिर मोनिका।

आरति जोकि अभी सदमे में थी , अब शांत थी उस खड़के के बाद थोड़ा सा हिली पर ना जाने क्यों वो वैसे ही पड़ी रही बिस्तर पर और धीरे धीरे नींद के आगोश में चली गई

दोपहर को ठीक 1:45 पर दरवाजे पर फिर खटखटा हुआ तो वो हड़बड़ा कर उठी और

आरती- हाँ…

रामू काका-- जी वो आपको सोनल के साथ बाजार जाना था इसलिए और रवि साहब का फ़ोन आया था कि शाम को आज मनोज जी नहि आएँगे आज।

कामया ने झट से उठ बैठी कि रामू काका ने क्यो जगाया। अरे वो चिंतित थे कि कही वो सोती रह जाती तो सोनल के साथ वो कैसे बाजार जाती उसके चेहरे पर शिकन थी कि मनोज अंकल आज नही आएंगे वो जल्दी से उठी और बाथरूम की ओर भागी ताकि नहा धो कर जल्दी से तैयार हो सके

लगभग 2बजे वो बिल्कुल तैयार थी साड़ी और मचिंग ब्लाउज के साथ सोनल के साथ जाना था इसलिए थोड़ा सलीके की ब्लाउस और साड़ी पहनी थी पर था तो फिर भी बहुत कुछ दिखाने वाला टाइट और बिल्कुल नाप का साड़ी वही कमर के बहुत नीचे और ब्लाउस भी डीप नेस्क आगे और पीछे से

थोड़ी देर में ही बाहर एक गाड़ी आके रुकी तो वो समझ गई थी कि टक्सी आ गई है वो फ़ौरन बाहर की ओर लपकी ताकि सोनल के साथ ही वो नीचे मिल सके सोनल को बुलाना न पड़े नीचे आते ही सोनल ने एक बार आरती को ऊपर से नीचे तक देखा और हल्की सी रहस्यमयी मुस्कान के साथ

सोनल---मम्मीजी,चले

आरती- हां

और बाहर जहां गाड़ी खड़ी थी आके बैठ गये

गाड़ी में आरती ने बड़े ही हिम्मत करके सोनल को कहा

आरति- सोनल बेटा

- हाँ…

कामया- वो आज दोपहर तुम कमरे में आई थी क्या

सोनल- मम्मी क्या हुआ ऐसे क्यो पूछ रही हो आयी भी हु तो ऐसा क्या हुआ।

आरति - वो असल में मुझे ना ऐसा लगा कि जब मैं सो रही थी तो कोई कमरे में आया था।

सोनल अजीब सी नजरो से आरती को देखती है तो आरति घबरा कर टॉपिक चेंज कर देती है

आरति- अरे ंमुझे न वहा कुछ टाइम लगेगा ही और इतनी भीड़ भाड़ में तुम क्या करोगी , बेटा तू एक काम करना वहां पार्क है तू थोड़ा घूम आना में वहां थोड़ी देर शॉपिंग करूंगी और फिर दोनों घर आ जाएँगे ।

सोनल--- ठीक है मम्मी जी।

कार शॉपिंग मॉल के पार्किंग में रुकी और आरति और सोनल दोनो कार से उतरी। कार से उतरते ही सोनल पार्क की तरफ चली गयी बिना कुछ बोले।

आरती की जान में जान आई वो लोगों की तरफ देखती हुई थोड़ा सा मुस्कुराती हुई सिर पर पल्ला लिए हुए धीरे से आगे बढ़ी और बाहर की ओर चलने लगी बहुत सी आखें उसपर थी

पर एक आखों जो कि दूर से उसे देख रही थी आरती की नजर उसपर जम गई थी वो भीड़ में खड़ा दूर से उसे ही निहार रहा था वो घूमकर उसे देखती पर अपने को उस भीड़ से बच कर जब वो बाहर निकली तो वो आखें गायब थी वो शॉपिंग मॉल के बाहर सीढ़ियो पर आ के फिर से इधार उधर नजरें घुमाने लगी थी पर कोई नहीं दिखा उसे

पर वो ढूँढ़ क्या रही थी और किसे शायद वो उस नजर का पीछा कर रही थी जो उसे भीड़ में दिखी थी पर वो था कौन उसे वो नजर कुछ पहचानी हुई सी लगी थी पर एक झटके से उसने अपने सिर को हिलाकर अपने जेहन से उस बात को निकाल दिया की उसे यहां कौन पहचानेगा वो आज से पहले कभी इस शॉपिंग मॉल में आई ही नहीं वो शॉपिंग की सीढ़िया उतर कर अंदर बने हुए छोटे से कॉम्प्लेक्स में आ गई थी और धीरे-धीरे चहल कदमी करते हुए बार-बारइधर-उधर देखती जा रही थी लोग सभी दुकानों की और जाते हुए दिख रहे थे कुछ उसे देखते हुए तो कुछ नजर अंदाज करते हुए पर तभी उसकी नजर एक शॉप के पास खड़े हुए उस इंसान पर पड़ी जिसे देखते ही उसके रोंगटे खड़े हो गये वो बिल्कुल उप्पेर की सीढ़ियों के पास दीवाल से टिका हुआ खड़ा था वो उसे ही देख रहा था पर बहुत दूर था आरती ने जैसे ही उसे देखा तो वो थोड़ी देर के लिए वही ठिटक गई और, फिर से उसे देखने लगी थी

वो दूर था पर उसे पता चल गया था कि आरती की नजर उसे पर पड़ चुकी थी वो धीरे-धीरे शॉप के पीछे कॉर्डियर की ओर जाने लगा था।
 
आरती अब भी वही खड़ी हुई उसे जाते हुए देखती रही पर पीछे की ओर जाते हुए वो थोड़ा सा अंधेरे में ठिटका और पीछे मुड़कर एक बार फिर से आरती की ओर देखा और अंधेरे में गुम हो गया आरती अपने जगह पर खड़ी हुई उस अंधेरे में देखती रही और उस नजर वाले को तौलती रही वो अपने चारो ओर एक नजर दौड़ाई और धीरे से उस ओर चल दी जहां वो इंसान गायब हुआ था उसके शरीर में एक अजीब सी उमंग उठ रही थी

वो चलते-चलते अपने पीछे और आस-पास का जायजा भी लेती जा रही थी पर सब अपने में ही मस्त थे सभी का ध्यान अपनी अपनी शॉपिंग की ओर ही था और जल्दी से अपनी जगह लेने की कोशिश में थे कामया बहुत ही संतुलित कदमो से उस ओर जा रही थी

वो अब कॉरिडोर के साइड में आ गई थी पर उसे वो इंसान कही भी नहीं दिख रहा था वो थोड़ा और आगे की ओर चली पर वो नहीं दिखा वो अब बिल्कुल अंधेरे में थी और उसकी नजर उस नजर का पीछा कर रही थी जिसके लिए वो यहां तक आ गई थी पर वहां कोई नहीं था वो थोड़ा और आगे की ओर बढ़ी पर अंधेरा ही हाथ लगा वो कुछ और आगे बढ़ी तो उसे एक हल्की सी लाइट दिखी जो की शायद किसी के शॉप कम आफिस के अंदर से आ रही थी वो जिग्याशा बश थोड़ा और आगे की ओर हुई तो उसे वही इंसान एक दरवाजा खोलकर अंदर जाते हुए दिखा वो थोड़ी सी ठिटकि पर जाने क्यों वो पीछे की ओर देखते हुए आगे की ओर बढ़ती ही गई वो उस दरवाजे पर पहुँची ही थी कि अंदर से लाइट आफ हो गई और घुप अंधेरा छा गया

वो वही खड़ी रही और बहुत ही सधे हुए कदमो से आफिस डोर की चौखट को अपने हाथों से टटोल कर पकड़ा और थोड़ा सा आगे बढ़ी अंदर उसे वही आकृति अंधेरे में खड़ी दिखाई दी आरति ने एक बार फिर से अपने चारो ओर देखा कोई नहीं था वहां पर वो वही खड़ी रही शायद अंदर जाने की हिम्मत नहीं थी तभी वो आकृति अंधेरे से बाहर की ओर आती दिखाई दी वो धीरे-धीरे आरती की ओर बढ़ा रही थी और आरती की सांसें बहुत तेज चलने लगी थी वो अपनी जगह पर ही खड़ी-खड़ी अपनी सांसों को तेज होते और अपने शरीर को कपड़ों के अंदर टाइट होते महसुसू करती रही

अचानक ही वो आकृति उसके पास आ गई और उसका हाथ पकड़कर उसे अंदर खींचने लगी धीमे से बहुत ही धीमे से आरती उस हाथ के खिन्चाव के साथ अंदर चली गई और वही अंदर उस इंसान के बहुत ही नजदीक खड़ी हो गई वो इंसान उसके बहुत की करीब खड़ा था और अपने घर में आए मेहमान की उपस्थित को नजर अंदाज नहीं कर रहा था वो खड़े-खड़े आरती की नंगी बाहों को अपने हाथों से सहला रहा था और उसके शरीर की गंध को अपने जेहन में बसा रहा था वो थोड़ी देर तो वैसे ही खड़ा-खड़ा आरती को सहलाता रहा और उसकी नजदीकिया महसूस करता रहा

आरती भी बिल्कुल निश्चल सी उस आकृति के पास खड़ी रही और उसकी हर हरकत को अपने में समेटने की कोशिश करती रही कि वो आकृति उसे छोड़ कर आरती के पीछे चली गई और डोर को अंदर से बंद कर दिया कमरे में एकदम से घुप अंधेरा हो गया हाथों हाथ नहीं सूझ रहा था पर आरती वही खड़ी रही और उस इंसान का इंतजार करती रही उसकी नाक में एक अजीब तरह की गंध ने जगह ले ली थी कुछ सिडन की जैसे की कोई पुराना ओफिस में होती है पानी और साफ सफाई की अनदेखी होने से पर आरती को वो गंध भी अभी अच्छी लग रही थी वो खड़ी-खड़ी काप रही थी ठंड के मारे नहीं सेक्स की आग में उस इंसान के हाथों के स्पर्श के साथ ही उसने अपने सोचने की शक्ति को खो दिया था

और वो सेक्स की आग में जल उठी थी कि तभी उस इंसान ने उसे पीछे से आके जकड़ लिया और ताबड तोड उसके गले और पीठ पर अपने होंठों के छाप छोड़ने लगा था वो बहुत ही उतावला था और जल्दी से अपने हाथों में आई चीज का इश्तेमाल कर लेना चाहता था उसे इस बात की कोई फिकर नहीं थी कि साड़ी कहाँ बँधी है या पेटिकोट कहाँ लगा था वो तो बस एक कामुक इंसान था और अपने हाथों में आए उस सुंदर शरीर को जल्दी से जल्दी भोगना चाहता था वो जल्दी में था और उसके हाथ और होंठ इस बात का प्रमाण दे रहे थे उसने आरती के शरीर से एक ही झटके में साड़ी और पेटीकोट का नाड़ा खोलकर उन्हे उतार दिया और जल्दी में उसके शरीर से ब्लाउज के बटनो को भी खोलने लगा था आरती जो की उसके हर हरकत को अपने अंदर उठ रही उत्तेजना की लहर के साथ ही अपने काम अग्नि को

जनम दे रही थी वो भी उस इंसान का हर संभव साथ देने की कोशिश करती जा रही थी उसे कोई चिंता नहीं थी और वो भी उस इंसान का हर तरीके से साथ देती जा रही थी वो भी घूमकर, उस इंसान के गले लग गई थी अंधेरे में उसे कोई चिंता नहीं थी कि कोई उसे देखेगा या फिर क्या सोचेगा वो तो अपने आप में ही

नहीं थी वो तो सेक्स की भेट चढ़ चुकी थी और उस

इंसान का पूरा साथ दे रही थी उसके कपड़े उसके शरीर से अलग हो चके थे और वो पूरी तरह से नग्न अवस्था में उस इंसान की बाहों में थी और वो इंसान उसे अपनी बाहों में लेके जोर-जोर से किस कर रहा था और अपने हाथों को उसके पूरे शरीर में घुमा रहा था पर थोड़ी देर में ही उसकी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी और उसके एक ही झटके में आरती को अपनी गोद में उठा लिया और साइड में पड़ी हुई जमीन में रखी हुई चटाइ पर पटक दिया और अपने कपड़ों से जूझने लगा

वो भी अपने कपड़ों से आजाद हुआ और फिर आरती के होंठों को अंधेरे में ढूँढ़ कर उन्हें चूमने लगा था और आरती की चुचियों को अपने हाथों से जोर-जोर से दबाने लगा था आरती नीचे पड़ी हुई कसमसा रही थी और उसकी हर हरकत को सहने की कोशिश कर रही थी पर उसके दबाब के कारण उसके शरीर का हर हिस्सा आग में घी डाल रहा था आरती ने किसी तरह से अपने को उससे अलग करने की कोशिश की पर कहाँ वो तो जैसे जानवर बन गया था और आरती को निचोड़ता जा रहा था आरती की टांगों को भी एक ही झटके से उसने अपने पैरों से खोला और अपने लण्ड को उसकी चुत के द्वार पर रखकर एक जोरदार धक्का लगा दिया

आरती का पूरा शरीर ही उस धक्के से हिल गया और वो सिहर उठी पर जैसे ही उसने थोड़ी सांस लेने की कोशिश की कि एक ओर झटका और फिर एक ओर धीरे-धीरे झटके पर झटके और आरती भी अब तैयार हो गई थी उसे हर धक्के में नया आनंद मिलता जा रहा था और वो अपने सफर को चलने लगी थी ऊपर पड़े हुए इंसान ने तो जैसे गति पकड़ी थी उससे लगता था कि जल्दी में था और जल्दी-जल्दी अपने मुकाम पर पहुँचना चाहता था आरती भी अपनी दोनों जाँघो को खोलकर उस इंसान का पूरा साथ दे रही थी और अपने शरीर को उससे जोड़े रखा था वो बहुत ही नजदीक पहुँच चुकी थी अपने चरम सीमा को लगने ही वाली थी उस इंसान के हर धक्के में वो बात थी कि वो कब झड जाए उसे पता ही नहीं चलता वो धक्के के साथ ही अपने होंठों को उसके साथ जोड़े रखी थी पर जैसे ही धक्का पड़ता उसका मुख खुल जाता और एक लंबी सी सिसकारी उसके मुख से निकल जाती वो नीचे पड़ी हुई हर धक्के का जबाब अपनी कमर उठाकर देती जा रही थी

पर जैसे ही वो अपने चरम सीमा की ओर जाने लगी थी उसका पूरा शरीर अकड़ने लगा था और वो उस इंसान से और भी सटने लगी थी और अपने मुख से निकलने वाली सिसकारी और भी तेज और उत्तेजना से भरी हुई होती जा रही थी

कि तभी उस इंसान का बहुत सा वीर्य उसके चुत में छूटा और वो दो 4 जबरदस्त धक्कों के बाद वो उसके ऊपर गिर गया और नीचे जब आरती ने देखा कि वो इंसान उसके अंदर छूट चुका है तो वो उससे और भी चिपक गई और अपनी कमर को उठा कर हर एक धक्के पर अपनी चुत के अंदर एक धार सी निकलते महसूस करने लगी उसके होंठों को उसने भिच कर, उस इंसान के कंधो पर नाख़ून गढ़ा दिए थे और अपने हाथों को कस कर जकड़कर उस इंसान को अपने अंदर और अंदर ले जाना चाहती थी उसके मुख से के लंबी सी आहह निकली और

- कल से आप रोज आना प्लीज

- जी

आरती नीचे पड़े हुए अपनी सांसों को नियंत्रित करती हुई बोली

आरती- आज क्यों नहीं आए थे

- जी वो कुछ जवाब नही आगे।

कल से रोज आना मुझे ड्राइविंग सिखाने

वो इंसान और कोई नहीं मनोज अंकल ही थे वो मॉल में भी उसका आफिस था और आज वो जानबूझ कर नहीं गया था क्योंकी उसे डर था कि कही आरती ने शिकायत कर दी तो पर जैसे ही उसने आरती को मॉल में देखा तो वो अपनी सारी गलती भूल गया और आरती को अपने बंध आफिस के अंदर ले आया और आगे तो अपने ऊपर पढ़ ही लिया होगा

तो खेर दोनो अपने आपको शांत करके अब बिल्कुल निश्चल से पड़े हुए थे की मनोज ने अपने आपको उठाया और अंधेरे में ही टटोलते हुए अपने कपड़े और आरति के कपड़ों को उठा लिया और दोनों ही अंधेरे में तैयारी करने लगे जब वो कपड़े पहनकर तैयार हुए तो उसे अपनी परिस्थिति का ध्यान आया वो कहाँ है और कैसी स्थिति में है उसके मन में एक डर घर कर गया था आरती ने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए और अंधेरे में ही बाहर की ओर जाने लगी थी

पर मनोज ने उसे रोक लिया वो पहले बाहर की ओर बढ़ा और दरवाजा खोलकर बाहर एक नजर डाली वहां किसी को ना देखकर वो संतुष्ट हो गया पर जिसको जो देखना था देख कर जा चुकी थी और इशारे से आरती को बुलाया और बाहर को जाने को इशारा किया। आरती भी नजर झुकाए तुरंत बाहर निकल गई और जल्दी से गार्डेन की ओर दौड़ पड़ी जब वो

गार्डेन तक आई तो वहां सबकुछ नार्मल था किसी को भी उसका ध्यान नहीं था वो वही खड़ी हुई अपने बाल और चेहरे को ठीक करने लगी थी कि उसने सोनल को पार्क की सीढ़ियाँ उतरते देखा वो भी थोड़ा सा आगे होकर सोनल के पास चली गई। सोनल टक्सी के अंदर बैठ गई और आरति भी और टक्सी उनके घर की ओर चल दी

पर आरती का

ध्यान अपने आज के अनुभव की ओर ज्यादा था वो बहुत खुश थी और अपने सुख की चिंता अब वो करने लगी थी उसके तन की आग बुझ चुकी थी।

अब उसके पास दो ऐसे लोग थे जो की सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके तन के लिए कुछ भी कर सकते थे उसकी सुंदरता की पूजाकरने वाले और उसके रूप के दीवाने

अब उसे कोई फरक नहीं पड़ता कि उसका पति उसे इंपार्टेन्स देता है कि नहीं उसे इंपार्टेन्स देने वाला उसे मिल गया था सोचते सोचते वो कब घर पहुँच गई पताही नहीं चला पर घर पहुँचकर वो अब एक बिंदास टाइप की हो गई थी

उसके चाल में एक लचक थी और बेफिक्री भी वो जल्दी से अपने कमरे में गई और बाथरूम में घुस गई

चेंज करते-करते उसके पति भी आ गये थे सभी अपने अपने काम से लगे हुए खाने की टेबल पर भी पहुँच गये और फिर अपने कमरे में भी

रवि का कोई इंटेरेस्ट नहीं था सेक्स के लिए और वो कुछ पेपर्स लिए हुए उन्हें पढ़ रहा था आरती भी रवि के पास आकर लेट गई थोड़ा सा मुस्कुराता हुआ

रवि- सो जाओ थोड़ी देर मैं में सोता हूँ

आरती- हाँ…

और पलटकर वो सो गई उसे कोई फरक नहीं पड़ा कि रवि उससे प्यार करता है कि नहीं या फिर उसके लिए उसके पास टाइम है कि नहीं

सुबह भी वैसे ही टाइम टेबल रहा पर हाँ… आरती में चेंज आया था वो सिर्फ़ आरती ही जानती थी आरती अब बेफिक्र थी अपने पति की ओर से वो जानती थी कि उसका पति सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे के पीछे भागने वाला है और उसके जीवन में कुछ और नहीं है तो वो भी अपने सुख को अपने तरीके से ढूँढ कर अपने जीवन में लाने की कोशिश करने लगी थी

रवि के जाने के बाद सोनल को लेने आज बस आयी। अब वो खुश थी कि शाम को अंकल के साथ वो ड्राइविंग करने जा सकती है और अभी भी वो रामू को अपने कमरे में बुला सकती है वो अब सेक्स की चिता में बैठ चुकी थी उसे अब उस आग में जलने से कोई नहीं रोक सकता था और वो अपने को तैयार भी कर चूकी थी। लेकिन उसे नही मालूम था कि घर मे एक और इंसान में चेंज आ चुका था । वो थी सोनल।

उसने फैसला किया कि जैसे उसकी मम्मी पापा को धोखा दे रही है वैसे वो भी अब मम्मी को धोखा देकर अपने पापा से नजदीकियां बढ़ाई गी। और सोनल अपने पापा के साथ ही यह मज़ा लेने की सोचने लगी और सोचने लगी कि कैसे पापा के साथ मज़ा लिया जाए?

आज जैसे तैसे करके में स्कूल जाने के लिए तैयार हुई और ड्रेस पहनकर बाहर आई तो नाश्ते की टेबल पर पापा से सामना हुआ, सोनल रोज सुबह पापा को गुड मॉर्निंग किस करके विश करती थी. तो तब उस दिन भी पापा को किस करके ही विश किया, लेकिन इस बार सोनल ने कुछ ज़्यादा ही गहरा किस किया और थोड़ा अपनी जीभ से उनके गाल को थोड़ा चाट लिया, जिससे उसके पापा पर कुछ असर तो हुआ, लेकिन उन्होंने आरति सामने ज़ाहिर नहीं किया था.

अब सोनल उनके ठीक सामने जाकर कुर्सी पर बैठकर नाश्ता करने लगी थी और फिर नाश्ता करने के बाद सोनल स्कूल की बस पकड़ने के लिए बाहर जाने लगी, लेकिन उसका मन पापा को छोड़कर जाने का नहीं हो रहा था, तो तब सोनल बाहर तो गयी, लेकिन कुछ देर के बाद वापस आकर सोनल ने बहाना बनाया की मेरी बस निकल चुकी है.

अब ऐसी स्थिति में रवि स्कूल छोड़कर आया करते थे, तो तब आरती बोली कि जा पापा से कह दे, वो तुझे स्कूल छोड़ आएँगे. फिर सोनल खुशी-खुशी पापा के कमरे में गयी. अब पापा सिर्फ़ अपने पजामे में थे. फिर सोनल ने पापा से कहा तो रवि सोनल को स्कूल छोड़ने के लिए राज़ी हो गये. अब रवि अपनी पेंट पहनने लगे थे. फिर सोनल ने उनके हाथ से पेंट लेते हुए कहा कि पापा पजामा ही रहने दीजिए, में लेट हो रही हूँ. तो तब रवि बोले कि ठीक है, में टी-शर्ट तो पहन लूँ, तू मेरा बाहर इन्तजार कर, तो सोनल बाहर आकर इन्तजार करने लगी.

रवि सोनल को स्कूल कार में ही छोड़ते थे,

सोनल का स्कूल घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर था, रास्ता लंबा था और सुबह का वक़्त था, तो रोड सुनसान थी. फिर जब दोनो घर से 2 किलोमीटर दूर आ गये, तो तब सोनल ने रवि से कहा कि गाड़ी में चलाऊँगी. तो तब रवि बोले कि बेटी तुझसे गाड़ी नहीं चलेगी, तो सोनल तो ज़िद्द करने लगी. तो तब रवि परेशान होकर बोले कि ठीक है, लेकिन स्टेरिंग में ही पकडूँगा. अब सोनल को अपना प्लान कामयाब होता दिख रहा था.

फिर तब सोनल ने कहा कि ठीक है और रवि ने गाड़ी साईड में रोककर सोनल को अपने आगे बैठाया और सोनल की बगल में से अपने दोनों हाथ डालकर स्टेरिंग पकड़ा और धीरे-धीरे चलाने लगे. लेकिन अब गाड़ी चलाने में किसका ध्यान था? अब सोनल का ध्यान तो रवि के पजामे में लटके उनके लंड पर था. तो तभी गाड़ी जैसे ही खड्डे में गयी, तो सोनल ने हिलने का बहाना करके उनका लंड ठीक अपनी गांड के नीचे दबा लिया.

अब रवि कुछ अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे. अब सोनल अपनी गांड को उनके लंड पर रगड़ने लगी थी. अब गर्मी पाकर उनका लंड धीरे-धीरे खड़ा होने लगा था, जिससे सोनल को भी मस्ती आने लगी थी. अब रवि को भी मज़ा आ रहा था और फिर इस तरह मस्ती करते हुए सोनल स्कूल पहुँच गयी.

रवि को जाते वक़्त सोनल ने एक बार फिर से किस किया. अब रवि शायद सोनल को लेकर कुछ परेशान हो गये थे और सोनल की तो पूछो मत, उसकी हालत तो इतना करने में ही बहुत खराब हो गयी थी और उसकी पेंटी इतनी गीली हो चुकी थी कि उसे लग रहा था उसकी स्कर्ट खराब ना हो जाए.उसने पहले स्कूल के टॉइलेट में जाकर अपनी चुत साफ की फिर क्लास में गयी।

फिर पूरे दिन स्कूल में उसके दिमाग में अपने पापा का लंड ही घूमता रहा और अब उसका दिल कर रहा था कि वो पापा के लंड पर ही बैठी रहै. अब पता नहीं उसे क्या हो गया था? ऐसा कौन सा वासना का तूफान मेरे अंदर था कि सोनल अपने पापा से चुदने के लिए ही सोचने लगी थी. तभी क्लास में पियून आता है और सोनल को कहता है कि प्रिंसीपल सर ने बुलाया है।

सोनल प्रिंसिपल आफिस जाती है।

सोनल--- may I come in sir,

Sir__- yes coming

Sonal--- yes sir आपने बुलाया था मुझे।

P.s--++ हां मैने तुम्हे कल सीधे घर बुलाया था आयी क्यो नही।

सोनल--- सर् अब मैं आपसे ट्यूशन नही पदूगी।

सर-- क्यो सोनल बेटी।

सर उसके कंधे को सहलाते हुए उसे छूने लगे।

सोनल उनके हाथ को छटक कर एक दम खड़ी हो गयी और बोली--- सर मैं क्यो का जवाब देना जरूरी नही समझती और हाँ आज तक जैसे अभी आपने मुझे छुआ या यूज़ किया मैने सहन किया, अगर आगे ऐसी कोई भी हरकत की तो अच्छा नही होगा। और इसे लास्ट वॉर्निंग समझना। हल्के में मत लेना।

सोनल का रौद्र रूप देख कर प्रिंसिपल भी डर गया आज तक डरी सहमी डब्बू सोनल आज कुछ और ही रंग में थी। वो उसे क्लास में जाते हुए देखते रह गए।

फिर सोनल क्लास में आ गयी लेकिन उसके दिमाग मे चुदाई गुसी हुई थी।

खैर आगे बढ़ते है, फिर सोनल चुदाई की इच्छा और गीली पेंटी लेकर घर पहुँची. अब उस वक़्त लगभग 3 बज रहे थे. अब घर में रामु दादा, जया दादी के अलावा कोई नहीं था, आरती कहीं गयी हुई थी और रवि अपने शोरूम पे थे.

में बाथरूम में गयी और गंदे कपड़ो में से रवि की अंडरवेयर ढूंढकर अपनी चूत पर रगड़ते हुए हस्तमैथुन किया. अब उसे बहुत मज़ा आया था और फिर सोनल सो गयी. फिर सोनल की आँख खुली तो शाम के 5 बज रहे थे. फिर सोनल नहा धोकर कपड़े पहने और उसने कपड़े भी उस दिन कुछ सेक्सी दिखने वाले पहने थे, उसने एक शॉर्ट स्कर्ट और फिटिंग टी-शर्ट पहनी थी.

सोनल ने चाय के लिए आरति को बुलाया। आरती सोनल की ड्रेस देख कर अचंभित हो गयी। एक लड़की जो अभी तक बिल्कुल सदारण रहती थी,आज सेक्स बम लग रही थी। दोनो डाइनिंग टेबल पर बैठ गए और च्याय पीने लगे। आज रमु भी सोनल का ये रूप देख कर उसे आंखे फाडे देख रहा था।

सोनल--- दादा क्या देख रहै है।

रामू झेंपते हुए--- कुछ नही बिटिया।

और खिसक गया वहा से। आरति को अच्छा नही लगा कि सोनल ने रामू काका से ऐसे बात की।

वैसे भी आरती का मूड ऑफ था पिछले तीन दिन से मनोज अंकल नही आ रहे थे। और न ही कुछ सूचना थी उनकी। उस दिन मॉल में उन्होंने कहा था कि वो आएंगे फिर भी नही आये।
 
रात को डिनर के बाद आरती अपने कमरे में चली गयी।

लेकिन सोनल वही टीवी देखती रही। जब रामू काका आये तो उनको बोल दिया कि वो सोने जा सकते है, जब रवि आएंगे तो उनको खाना वो खुद दे देगी।

रामू बहुत हैरान हुआ कि आज पहली बार सोनल कैसे अपने पापा के लिए जगी है। लकीन कुछ कह नही सकता था तो वापिश चला गया अपने क्वाटर पर।

क्वाटर पर जया और मोनिका दोनो अपने आपने बिस्तर पर सोने जा चुकी थी।

रामु जब क्वाटर का डोर खोलता है तो दोनों उठ बैठती है, रामु सीधा जया के पास जाकर बिस्तर पर बैठ जाता है।

जया--- क्या हुआ जी आज कुछ परेशान से लग रहे हो।

रामू--- नही कुछ नही हुआ, तुम सो जाओ।

जया---- क्या बात है आजकल हमसे सीधे मुह बात भी नही करते हो जी।

रामू-- सो जाओ फालतू की बात में क्यो माथा पची करती हो।

रामु अपने बिस्तर पर लेट जाता है और सोचता है कि इन तीन चार दिनों में क्या क्या हो गया, कही सोनल का बदला रूप इसलिए तो नही उस दिन दिन में डोर पर सोनल ही थी। और अपनी मम्मी की चुदाई देख कर उसने अपना नेचर चेंज किया हो।

कही सोनल में भी चुदाई की आग लग गयी हो जैसे बहु रानी में लगी है मोनिका की चुदाई देख कर , क्या सोनल भी मुझसे चुद सकति है?

कहते है ना बंदर के हाथ अगर अदरक लग जाये तो वो पंसारी बन जाता है,

वही हाल रामू का हो रहा था। अब उसकी नजर सोनल पर थी।

रामु अपनी उदेडबुन में था कि जया काकी उनके लण्ड को मसलने लगती है, रामु झुंझला जाता है और उसका हाथ झटक देता है और काकी को डपट देता है, ऐसा नही था कि रामू काका शक्तिमान थे जो एक साथ तीन ओरतो को संतुष्ट कर सके। वो तो पहली बार उसको एक बड़े घर की महिला मिली थी तो बुढ़ापे में जवान हो गया था लेकिन दिन में आरति के साथ करने के बाद रात को जया या मोनिका को चोदने की इच्छा नही होती थी लेकिन मोनिका कोसिस जरूर करती थी अपनी माँ के सोने के बाद।

उसे डाउट होने लगा था कि जहाँ पहले उस्का बापू उसको मौका मिलते ही चोद देता था अब हाथ भी नही लगा रहा है।

रात को जया के सोते ही मोनिका अपने बापू पर टूट पड़ी। रामू न चाहते हुए भी मोनिका की चुदाई करता है।

उधर फिर रात के 10 बजे रवि ने घंटी बजाई तो सोनल दौड़ती हुई गयी और दरवाजा खोला. फिर रवि उसे देखकर थोड़े चकित हुए और सोनल को गले लगाकर उसके गालों पर किस करते हुए बोले कि बेटा आज तो बहुत स्मार्ट लग रही हो. अब सोनल को इतनी खुशी हुई थी कि वो पापा को फंसाने में धीरे-धीरे सफल होती जा रही थी.

अंदर आकर रवि ने कहा कि रामू काका को बोलो की एक कप चाय बना कर लाये तो सोनल खुद किचन में जाकर चाय बनाने लगी.

पहले अभी तक आरती जगी रहती थी लेकिन अब दिन में रामू से चुदने के बाद खाना खा कर जल्दी सो जाती थी, अब भी बेफिक्र सो रही थी इस बात से अनजान की एक नॉकर कि चुदाई के चक्कर मे जिस पति को वो भूल बैठी है अब उस पति को उसकी अपनी बेटी उससे बहुत दूर ले जाएगी। रवि कमरे में पहुचता है और आरति को सोते हुए पाता है। फिर रवि भी फ्रेश होकर नीचे आ गये। नीचे सोनल को किचन में च्याय बनाते देखता है तो रामु काका का पूछता हैं।

सोनल--- मैने उन्हें सोने भेज दिया है, अबसे मैं अपने पापा का ख्याल रखूंगी

और दोनो इधर उधर की बातें करने लगे थे, किचन में खड़े होकर। रवि को सुबह की बात याद आने लगती है,

और उसकी नजर सोनल पर पड़ती है, उसको सोनल की गोरी गोरी न्नगी टांगे दिखती है, थोड़ी देर में रवि सोनल की गोरी जांघो देखकर गर्म हो गये और सोनल के पीछे खड़े होकर अपना लंड उसकी गांड से सटाने की कोशिश करने लगे थे. तब सोनल भी अपनी गांड को उनके लंड पर रगड़ने लगी. अब सोनल को तो ऐसा लग रहा था कि जैसे वो जन्नत में है और बस ऐसे ही खड़ी रहै।

ख़ैर अब चाय बन चुकी थी और फिर उसने रवि से डाइनिंग रूम में जाकर बैठने को कहा और चाय वहाँ सर्व करके बाथरूम में जाकर फिर से उंगली करने लगी थी. फिर में झड़ने के बाद बाहर आई, तो तब तक आरती भी नीचे आ चुकी थी.

उसे मम्मी पर बहुत गुस्सा आया, क्योंकि सोनल को अपने पापा से अभी और मज़ा लेना था और मम्मी के सामने में कुछ नहीं कर सकती थी. अब रवि भी आरती के आने से थोड़े दुखी हो गये थे, क्योंकि आरती वैसे भी अब उससे दूर जा चुकी थी. अब रवि सोनल को देखकर बार-बार अपना लंड पजामे के ऊपर से ही सहला रहे थे और सोनल को भी उन्हें सताने में बहुत मज़ा मिल रहा था.

आरती---- सोनल बेटा, तुम क्यो जग रही हो, रामू काका है ना वो च्याय बना देते।

सोनल को गुस्सा आ रहा था, पहले तो आरती नीचे आकर उसके मंसूबो पर पानी फेर चुकी थी,और अब रामू काका का जिक्र कर रही थी।

सोनल(तंजिया अंदाज में)------ मम्मी, रामू काका बेचारे अब बुड्ढे हो गए है और अब वैसे भी ज्यादा काम नही कर सकते, और आप वैसे भी दिन भर उनसे काफी काम लेती है तो मैंने सोचा कि थक जाते होंगे इसलिए मैंने उन्हें आराम के लिए भेज दिया। वैसे भी पापा की नोकरो के भरोशे नही रहने दूँगी मैं, अब उनकी बेटी बड़ी हो गयी है क्यो पापा।

रवि-- हा क्यो नही बेटा

आरति सोनल की बात सुनकर झेप जाती है,जिस अंदाज में देखते हुए सोनल ने आरति को ये बात कही वो अंदर से कांप जाती है, उसको यही लग रहा कि जैसे सोनल कह रही है कि वो बुड्ढे को चुदाई करवाके थका देती है।

रवि फिर खाना खाता है और फिर तीनो सोने चले जाते है।

अगले दिन सब अपने अपने रूटीन से उठते है और सोनल स्कूल और रवि आफिस चले जाते है।

सोनल स्कूल में पहुचकर कुछ कमजोरी महसूस करती है और वापिश घर आ जाती है, स्कूल peon उसके लिए एक ओटो कर देते है। जब वो घर पहुचती है तो घर का डोर खुला मिलता है, वो अंदर जाकर रामू काका को आवाज देती है पानी के लिए।

लेकिन रामु नही आता है, वो उठकर किचन में देखती है लेकिन रामु नही मिलता वो दौड़कर आरती के रूम की तरफ जाती है लेकिन ये क्या आरती भी कमरे में नही थी वो पूरा घर देखती है दोनो कहि नही मिलते। वो दौड़कर गार्डन में क्वाटर की तरफ जाती है लेकिन वहा सिरफ़ जया काकी और मोनिका दिखती है, वो मयूश हो कर वापिश आ रही है तो उसको थर्ड फूलोर पर कुछ मूवमेंट दिखती है, थर्ड फ़्लोर पर भी एक सर्वेंट र्रोम था, वो फुर्ती से घर मे घुसती है और उप्पेर दौड़ती है, उप्पेर फ्लोर पर अपनी रफ्तार कम करती है और सर्वेंट रूम के पास पहुचती है, रूम का दरवाजा सिरफ़ दलका हुआ था क्लोज नही था, सोनल ने अंदर झांकर देखा तो आंखों के सामने रामू काका आरती को चूमते हुए जैसे ही ऊपर उठे तो फिर से आरती के होंठों को अपने होंठों से दबाकर चूमते रहे, और अपने कपड़ों से अपने को आजाद कर लिया वो आरती को कसकर पकड़े हुए उसके होंठों का रस पान करते जा रहे थे और अपने हाथों का दबाब भी उसके कंधे पर बढ़ाते जा रहे थे ताकि आरती नीचे की ओर बैठ जाए

आरती भी उनके इशारे को समझ कर धीरे से अपने घुटनों को पकड़ कर बैठी जा रही थी और अपने होंठों को रामू काका के होंठों से आजाद करते ही उसके गालों और गर्दन से होते हुए नीचे उनके सीना से होते हुए और भी नीचे ले गई और उनकी कमर के आते ही वो बैठने लगी पर रामू काका की तो कुछ और ही इच्छा थी उन्होंने कस कर आरती के सिर को अपने एक हाथ से पकड़ा और नीचे अपने लण्ड की ओर ले जाने लगा उसके हाथों में इतना जोर था कि आरती अपने सिर को नहीं छुड़ा पाई और दोनों हाथों से रामू काका की जाँघो का सहारा लेके ऊपर काका की ओर बड़ी ही दयनीय तरीके से एक बार देखा

पर रामू काका की आँखों में जो जंगली पन था उसे देखकर वो सिहर उठी, साथ ही उसकी दयनीय हालत को देखकर सोनल भी हैरान थी कि उसकी मम्मी एक नोकर के सामने इतनी मजबूर दिख रही थी।

आरती- नही प्लीज नहीं

रामू - चूस और अपने लण्ड को आरती के चेहरे पर घिसने लगे और अपनी पकड़ को और भी ज्यादा मजबूत कर लिया था

आरती को उबकाई आ रही थी, और सोनल को घिन। रामू काका के लण्ड के आस-पास बहुत गंद थी और बालों का अंबार लगा था पर वो अपने आप को छुड़ा नहीं पा रही थी अब तो रामू अपने लण्ड को उसके चेहरे पर भी घिसने लगे थे और वो इतना गरम था कि उसका सारा शरीर फिर से एक बार काम अग्नि में जलने लगा था तभी उसके कानों में रामू काका की आवाज टकराई और वो सुन्न हो गई

रामू- चूस इसे चूस (उनकी आवाज में एक गुस्सा था

और सोनल भी गुस्से से काँपने लगी

आरती- प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज नहीं

और अपना हाथ लेजाकर धीरे से उनके लण्ड को अपने कोमल हाथों से पकड़ लिया ताकि वो अपने लण्ड को उसके मुख में डालने से रुक जाए

आरती की हथेली में जैसे ही रामू का लण्ड आया वो थोड़ा सा रुके और अपनी कमर को आरती के हाथों में ही आगे पीछे करने लगे। आरती भी खुश और बहुत ही सलीके से उसने रामू के लण्ड को सहलाते हुए अपने चेहरे पर मलने लगी थी

रामू- चूस इसे अभी आआआआअह्ह

आरती- प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज काका आआआआअह्ह सस्स्स्स्स्स्स्स्स्शह ऐसे ही कर देती हूँ प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज

अपनी मम्मी को ऐसे गिड़गिड़ाते देख सोनल को बहुत ही गुस्सा आ रहा था लेकिन अभी वो आगे नही बढी थी,वो देखना चाह रही थी उसकी मम्मी कितना गिरती हैं। तभी फिर रामू की आवाज आई।

रामु- चूस ले थोड़ा बड़ा मजा आएगा कर्दे रण्डी,

आरती के कानों पर जैसे ही यह बात टकराई वो सुन्न हो गई थी तो क्या अब काका उसे रण्डी समझने लगे हैं।

आरती- उूुुुुुुउउम्म्म्ममममममममममम आआआआआआआअह्ह

धीरे से रामु ने अपने लण्ड को उसके होंठों पर रख दिया था और उसके नरम नरम होंठों के अंदर धकेलने लगता

रामू- चूस ले तुझे भी तो मजा आता है उसका तो बहुत मजे में चूसा था मेरा क्यों नहीं

और धीरे धीरे वो अपने लण्ड को आरती के मुख में आगे पीछे करने लगा था

आरती के जेहन में बहुत सी बातें चल रही थी पर उसका पूरा ध्यान अपने मुख में लिए हुए रामू काका के लण्ड पर था वो थोड़ा सा भी इधर-उधर ध्यान देती थी तो, रामू काका के धक्के से लण्ड उसके गले तक चला जाता था इसलिए वो बाकी चीजो को ध्यान हटाकर बस रामू काका के लण्ड पर ही अपना ध्यान देने लगी थी अब उसे वो इतना बुरा नहीं लग रहा था

उनका लण्ड थोड़ा मोटा था और बहुत ही गरम था आरती रामु काका के लण्ड को अपने गले तक जाने से रोकने के लिए कभी-कभी अपने जीब से भी उसे रोकती पर रामू काका उसपर और भी जोर लगाते।

अब आरती की बाँहे रामू काका के कमर के चारो ओर थी और सिर पर काका के हाथ थे जो कि आरती के सिर को आगे पीछे कर रहे थे पर जैसे ही रामू ने देखा कि अब उन्हें जोर नहीं लगाना पड़ रहा है तो वो थोड़ा सा अपने हाथ को ढीला छोड़ दिया और आरती के गालों से खेलने लगे थे ।

सोनल भी अब देख कर हैरान थी कि इतनी आसानी से उस्की मम्मी उस गनदे लण्ड को मुह में लेकर चूसने लगी है।

आरती को भी थोड़ी सी राहत मिली जैसे ही उसके सिर पर से काका का हाथ हटा वो भी थोड़ा सा रुकी

रामु- रुक मत बहू करती जा देख कितना मजा आरहा है

आरती भी फिर से अपने मुख को उनके लण्ड पर चलाने लगी और अब तो उसे भी मजा आने लगा था इतनी गरम और नाजुक सी चीज को वो अपने मुख के साथ-साथ अपने जीब से भी प्यार करने लगी थी और अब तो वो खुद ही अपने चेहरे को आगे पीछे करके ऊपर की ओर देखने लगी थी ताकि जो वो कर रही है उससे काका को मजा आ रहा है कि नहीं

पर काका तो बस आखें बंद किए मज़े में सिसकारियाँ ले रहे थे

रामू- आआह्ह बहू तेरे मुँह का जबाब नहीं कितनी अच्छी है तू

आरती को तो जैसे सुध बुध ही नहीं थी वो अपने को पूरी तरह से काका के लण्ड पर झुकाए हुई थी और अब तो खूब तेजी से उनके लण्ड को चूस रही थी आचनक ही उसे लगा कि रामू काका की पकड़ उसके माथे पर जोर से होने लगी है वो अपने सिर को किसी तरह से उसके लण्ड से हटाने की कोशिश करने लगी पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो अपना सिर नहीं हटा पाई और रामु काका के लण्ड से एक पिचकारी ने निकलकर उसके गले तक भर दिया

वो खाँसते हुए अपने मुख को खोलदिया और ढेर सारा वीर्य उसके मुख से बाहर की ओर गिरने लगा रामु काका अब भी उसके सिर को पकड़े उसके मुख में आगे पीछे हो रहे थे पर आरती तो जैसे मरी हुई किसी चीज की तरह से रामू काका से अपने आपको छुड़ाने की कोशिश करती रही जब रामू पूरा झड गया तो उसकी पकड़ ढीली हुई तो आरती धम्म से पीछे गिर पड़ी और खाँसते हुए अपने मुख में आए वीर्य को वही जमीन पर थूकने लगी रामू काका खड़े हुए आरती की ओर ही देख रहे थे और अपने लण्ड को हिला-हिलाकर अपने वीर्य को जमीन पर गिरा रहे थे

अचानक ही वो अपनी धोती ले के आए और आरती के चेहरे को पकड़कर अपनी ओर मोड़ा और उसका मुँह पोछने लगे

आरती की नजर में डर था वो भीमा चाचा की ओर देखती रही पर कुछ ना कह सकी

जैसे ही रामू ने उसका मुख पोंछा तो पास के टेबल से एक गंदी सी बोतल उठा लाया

रामू- ले थोड़ा पानी पीले

आरती ने उस गंदी सी बोतल की ओर देखा पर कह ना पाई कुछ और बोतल से पानी पीने लगी।

तभी सोनल तालिया बजाते हुए कमरे में अंदर दाखिल होती है

सोनल--- वाह मम्मी वाह क्या बात है क्या खूब काम कर रही हो।

आरति सोनल को देख कर सून हो जाती है, उसको कुछ कहते नही बन रहा था, रामू काका बगल में न्नगे खड़े थे, अपने दोनों हाथों से अपना लण्ड छुपके खड़ा था। उसने नजर झुका ली और हल्का हल्का कंम्पकम्पा रहा था।

आरती--- सोनलल्लल मेरी बात सुन बेटा, वो में तुम्हे समझाती हु।

मम्मी , तुम दो कौड़ी की रंडी बन गयी… मेरी माँ ऐसी होगी सात जन्म में भी सोच भी नही सकती थी… तू तो वो छीनाल निकली है, जिसने ना जाने कितनी ज़िंदगियाँ बरबाद की हैं… अपने पति की, उसके पूरे परिवार की, मेरी, … चुड़ेल,

फिर आरती सोनल के पैर पकड़ कर, कहने लगी – मुझे माफ़ कर दो… प्लीज़, मुझे माफ कर दो बेटी,

सोनल---- माफ कर दु मैं कौन होती हू माफ तो अब पापा करेंगे। क्यों मम्मी यहाँ चकला चला रही है क्या मेरा बाप तुझे कम पड़ रहा है, तूम मुझे ज्ञान दे रही थी देर से घर आने का। रुक आने दे पापा को तेरी असलियत बताती हूँ, कि तूम यहाँ नंगा नाच कर रही है ?

आरती--- नही बेटा मेरी बात तो सुन एक बार, देख गलती हो गयी मुझसे।

सोनल--- गलती इसे गलती कहती हो तुम, अपने बाप की उम्र के इंसान, वो भी एक नॉकर और ये घिनोना काम, छि अपने मुह में , मुझे उलटी आ रही है सोचक्र भी।

आरति सुबकते हुए रामू काका को देखती है, तभी सोनल एक दम से वहा से निकल कर नीचे दौड़ लगाती है, आरती उसे भागती देख समझ जाती है कि ये नीचे जाकर फ़ोन करेगी रवि को, वो भी अपने कपड़े समेटते हुए नीचे जाती है और पीछे पीछे रामु काका।

नीचे सोनल सोफे पे बैठी tv देख रही थी। आरती नीचे आकर देखती है तो उसके पास पहुचती है,

सोनल उसकी तरफ देखती भी नही है,

तभी सोनल रामु को आवाज देती है,

रामू कहा है बोल उसको चाय बनाये एक कप,

आजतक सोनल ने रामू काका को दादा के बिना नही बोली थी आज पहली बार उसने डायरेक्ट रामु कहा था।

आरती--- सोनल ऐसे कैसे बोल रही है , बस यही तमीज रह गयी है,

सोनल--- आप तो तमीज की बात करो ही मत, और क्या बोल दिया मैने आजतक इतना सम्मान दिया इस बुड्ढे को तो कोनसा इसने महानता दिखा दी। ये नोकर है और नॉकर ही रहेगा। मेरी मम्मी को चोद कर मेरा बाप नही बन गया है।

आरति चीखते हुए---- सोनलल्ललल्लल..........

सोनल---- मिर्ची लग गयी मम्मी, सच सुनकर, मम्मी सोच ये अभी तक इस घर मे है मैंने इसको धक्के मारकर नही निकाला , ये ही बहुत है, औऱ अब से मुझे धमकाने की कोसिस भी मत करना , अब से अगर मुझे कुछ समझाने या कहने की कोशिस भी की तो ये बुडडा ही नही तुम भी इस घर से बाहर जाने की तैयारी कर लेना, पापा के साथ साथ नाना और मामा को भी जवाब देने को रेडी रहना।

आरति अपने बाप और भाई का नाम सुनते ही सहम गयी। जिस्म की भूख इतनी जल्दी उसे यहा तक ले आएगी, अभी भी आरति ये नही सोच रही थी कि उसने गलत किया वो ये सोच रही थी कि उसने बहुत कम समय मे ही बिना ध्यान रखे सेक्स करती रही। आगे ध्यान रखेगी बस अभी एक बार सोनल को मनाना है,

उधर सोनल मन मे सोच लेती है कि वो अपनी मम्मी को सजा देगी अपने हिसाब से , वो दिखाएगी की रवि को खोकर आरती ने कितनी बड़ी गलती की है, रामू उसे चुदाई से खुश कर सकता है लेकिन उसकी दूसरी जरूरते नही, सेक्स कम हो चल जाता है लेकिन जिंगदी की दूसरी जरूरते पूरी होनी ही चाहिए, सोनल को ये दुख नही था कि उसकी मम्मी ने सेक्स किया, उसे दुख सिर्फ इतना था कि उसकी मम्मी ने अपने स्टेटस को ध्यान में नही रखा, एक बुड्ढे नोकर के साथ और आज तो उसने अपने जीवन का सबसे घृणित काम भी देख लिया। उसका मन अभी भी सोचक्र उल्टी का हो रहा था, अभी तक सोनल ने ठीक से सिर्फ अपने सर का लण्ड देखा था जोकि साफ सुथरा था जिसको देखकर खुद मुह में लेने का मन कर जाए लेकिन यहा उसने एक बुड्ढे नॉकर का लण्ड बदबूदार गनदे बालो से भरे लन्ड को आपनि मम्मी को चूसते हुए देखा था और फिर लण्ड का पानी अपने मुह में लेते हुए, जो लड़की कभी भी सेक्स की abc नही जानती हो और वो डायरेक्ट ये सब देख ले तो उसकी मन के हालात क्या होंगे सोच सकते है।

सोनल ने सर झटक कर उन खयालो से बाहर निकली और

चाय बनी की नही, रामू या अभी भी कुछ रहा गया है,, सोनल ने आवाज लगाई।

रामू---- जी बिटिया जी अभी लाया बस तैयार है।

आरती का खून खोल रहा था लेकिन कर कुछ नही सकती थी।,

रामू काका चाय ले आये और टेबल पर रख कर जाने लगे, बाकी दिनों चाय या खाना घर मे खुद या आरती ही सर्व करती थी,

लेकिन आज सोनल कुछ ओर मूड में थी,

चाय डालने के लिए कोई ओर नोकर रखु क्या,

सोनल की आवाज सुनते ही रामू काका और आरती दोनो सकपका गए।

रामु समझ गया कि उसे बहु की चुदाई के बदले अब सोनल की जिल्लत सहनि होगी और कुछ कह भी नही सकता।

रामू काका वापिश आकर च्याय कप में डाल कर सोनल को पकड़ा दी।

सोनल ने चाय पीकर अपने पापा को फ़ोन कर दिया कि आज उसकी तबियत ठीक नही है और वो आज स्कूल से जल्दी घर आ गयी है,

वैसे तो रवि अपने काम को छोड़ कर कभी नही आता है लेकिन एक दो दिन से सोनल जो जलवे उसको दिखा रही थी, उसमे उसको कुँवारी चुत की खुसबु आ रही थी तो रवि 20 मिनट बाद ही घर आ पहुँचा था।

रवि-- क्या हुआ मेरी गुड़िया को,

आरती जैसे ही रवि को देखती है वो आश्चर्य चकित रह जाती है और साथ ही घबरा भी जाति है कि कही सोनल कुछ बता न दे।

आश्चर्य चकित इसलिए कि आजतक रवि कभी उसके बुलाने पर भी घर नही आया था और आज बिन बुलाए आ गया।

सोनल और रवि इधर उधर की बातों में लग जाते है और आरती रामू को खाना लगाने को बोलती है।
 
खाना खाने के बाद सोनल रवि को बाहर घूमने को बोलती है। रवि सोनल को लेकर घर के बाहर आ गया। फिर बाहर आकर उनका मूड चेंज हुआ और रवि सोनल से बोले कि चल बेटा पिक्चर देखने चलते है.

तब सोनल को रवि पर इतना प्यार आया कि पापा मेरे साथ अकेला रहने की कितनी कोशिश कर रहे है? खैर फिर दोनो कार में पर होकर एक सिनिमा में पहुँच गये और रास्ते में ही आरती को फोन कर दिया कि हम पिक्चर देखने जा रहे है. जब सिनिमा में कोई पुरानी मूवी लगी होने की वजह से ज़्यादा भीड़ नहीं थी, पूरे हॉल में लगभग 30-40 लोग ही होंगे.

अब सोनल रवि की समझदारी पर बहुत खुशी हुई थी, वो चाहते तो सोनल को किसी बढ़िया पिक्चर दिखाने ले जाते, लेकिन उन्हें शायद कुछ ज़्यादा मज़े लेने थे. फिर उन्होने सबसे महेंगे टिकट लिए और फिर दोनो लोग बालकनी में जाकर बैठ गये. उनका नसीब इतना बढ़िया चल रहा था की बालकनी में सिर्फ़ दोनो के अलावा सिर्फ़ एक ही लड़का था, जिसकी उम्र लगभग 18 साल थी और वो भी आगे की सीट पर बैठ गया था. अब तो दोनों को और भी आराम हो गया था.

पिक्चर चालू हुई, लेकिन पिक्चर पर तो किसका ध्यान था? अब सोनल का दिमाग तो उसके पापा के लंड की तरफ था और रवि भी तिरछी नजर से उसकी छोटी-छोटी चूचीयों की तरफ देख रहे थे. अब बस शुरुआत करने की देर थी कि कौन करे? अब सोनल तो पापा का स्पर्श पाने के लिए वैसे ही मरी जा रही थी और फिर उसी वक़्त जैसे बिल्ली के भागों छिका टूटा हो, सोनल के पैर पर किसी जानवर ने काटा हो, में उउउइई करती हुई खड़ी हो गयी.

फिर तब रवि ने घबराते हुए पूछा कि क्या हुआ? तो तब सोनल ने बताया कि उसके पैर पर किसी कीड़े ने काटा है. तो तब रवि बोले कि बैठ जा और अब काटे तो तुम मेरी सीट पर आ जाना. तो सोनल बैठ गयी और फिर 5 मिनट के बाद फिर से उछलती हुई खड़ी हो गयी, लेकिन इस बार उसे किसी ने काटा नहीं था बल्कि वो जानबूझकर खड़ी हुई थी. खैर फिर रवि हंसते हुए बोले कि तू मेरी सीट पर आ जा.

तब सोनल बोली कि पापा कोई बात नहीं जैसे उस कीड़े ने मुझे काटा है, ऐसे ही आपको भी काट लेगा. तो तब रवि बोले कि तू एक काम कर मेरी गोद में बैठ जा. अब सोनल तो पहले से ही तैयार थी तो रवि के बोलते ही में उनकी गोद में बैठ गयी और पर्दे की तरफ देखने लगी थी. अब सोनल उनकी गोद में बैठी हुई बिल्कुल छोटी सी लग रही थी, उस्की उम्र उस वक़्त 18 साल ही तो थी.

अब रवि उसकी गर्मी पाकर गर्म होने लगे थे. अब उसका लंड फिर से खड़ा होने लगा था. अब सोनल को भी उनके लंड पर बैठना बहुत अच्छा लग रहा था, वैसे तो उनकी नजर पर्दे की तरफ थी, लेकिन ध्यान सिर्फ़ अपनी-अपनी टाँगो के बीच में था. अब सोनल का बदन तो जैसे किसी भट्टी की तरह तप रहा था. अब सोनल की स्कर्ट में उसकी चड्डी बिल्कुल गीली हो रही थी.

रवि का लंड ठीक उसकी गांड के छेद पर था और रवि धीरे-धीरे सोनल का पेट सहला रहे थे. अब सोनल का मन कर रहा था कि उसके पापा अपना लंड ज़ोर-ज़ोर से उसकी चूत पर रगड़ दे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था, क्योंकि वो दोनों ही एक दूसरे से शर्मा रहे थे.

कुछ देर तक ऐसे ही बैठे रहने के बाद सोनल अपने हाथ में पानी की बोतल थी वो नीचे गिरा दी और फिर उसको उठाने के लिए झुकी तो अपने पापा का लंड बहाने से अपनी चूत पर सेट किया और फिर सीधी बैठकर मज़े लेने लगी. अब 1 घंटा 30 मिनट निकल गये थे और उन्हें पता ही नहीं चला कि कब इंटरवेल हुआ?

फिर रवि सोनल को पैसे देते हुए बोले कि कैंटीन से जाकर कुछ ले आओ तो सोनल बाहर गयी और कैंटीन से कुछ खाने की चीज़े खरीदी और फिर टॉयलेट में चली गयी और फिर जब तक वापस आई तो पिक्चर चालू हो चुकी थी.

सोनल रवि की गोद में बैठते हुए कहा कि पापा मुझे आपकी गोद में बैठने में ज़्यादा मज़ा आ रहा है. फिर तब रवि बोले कि तो फिर 1 मिनट रुक और बैठे हुए ही अपने लंड को सेट करने लगे थे.

सोनल को अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था और फिर जब रवि ने उसे बैठने को कहा, तो उन्होंने अपना हाथ कुछ इस तरह से उसकी स्कर्ट पर लगाया कि उसकी स्कर्ट ऊपर हो गयी और सोनल उनकी गोद में फिर से बैठ गयी. फिर थोड़ी देर के बाद सोनल को अहसास हुआ कि रवि ने अपना लंड अपनी पेंट में से बाहर निकाल रखा है और इस अहसास के साथ ही जैसे उसके बदन ने एक तगड़ा झटका लिया और अब सोनल का भी मन अपनी चड्डी उतारकर पापा का लंड अपनी चूत से चिपकाने का करने लगा था.

फिर उसके लिए उसने फिर से एक प्लान बनाया और उसके हाथ में कोल्डड्रिंक का जो गिलास था, उसे अपनी जांघों पर उल्टा दिया तो सारी कोल्डड्रिंक उसके पैरो और चड्डी पर गिर गयी, तो तब रवि चौंकते हुए बोले कि यह क्या किया?

तब सोनल ने कहा कि सॉरी पापा गलती से हो गया, मैं तो पूरी गीली हो गयी और मेरे कपड़े भी गीले हो गये. तो तब कपड़ो का मतलब समझते हुए रवि बोले कि जा और टॉयलेट में जाकर साफ कर आ और कपड़े ज़्यादा गीले हो तो उतारकर आ जाना, जल्दी सूख जाएँगे. अब सोनल का मन रवि को छोड़ने का नहीँ था, तो सोनल ने वहीं खड़े होकर अपनी चड्डी उतारी और दूसरी सीट पर रखी और फिर से अपने पापा के लंड पर बैठकर पापा के लंड को अपनी दोनों टाँगों के बीच में ले लिया.

अब उनका लंड बिल्कुल उसकी चूत पर था. अब उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई गर्म लोहे की रोड उसकी जांघों में दबी पड़ी है. अब तो उसका मन कर रहा था कि जल्दी से रवि अपना लंड उसकी चूत में डालकर ज़ोर से रगड़ दे, लेकिन अभी दोनो ऐसा नहीं कर सकते थे.

अब सोनल की बारी थी. फिर सोनल का मन अपनी चूत को उनके लंड पर रगड़ने का हुआ तो तब सोनल अपनी चड्डी उठाने के लिए झुकी और ज़ोर से अपनी चूत आपने पापा के लंड पर रगड़ दी और फिर ऐसे ही 3-4 बार ज़ोर से रगड़ी, तो तब उसे ऐसा लगा कि जैसे उसका पानी निकल जाएगा. अब वो कभी किस बहाने से तो कभी किस बहाने से हिलती और अपनी चूत अपने पापा के लंड पर रगड़ देती थी. अब रवि समझ गया था कि सोनल का मन रगड़ने का हो रहा है.

तब रवि ने उसके पेट पर अपना एक हाथ रखकर दबाया और अपना जूता खोलने के बहाने से कभी खुजाने के बहाने से अपना लंड रगड़ने लगे थे. फिर कुछ ही देर में सोनल को लगा कि जैसे उसके जिस्म में से सारा खून फटकर उसकी चूत में से निकलने वाला है और फिर इसी के साथ उसका पानी झड़ गया. अब सोनल बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी, लेकिन रवि ने 2-3 बार और अपना लंड रगड़ा और फिर रवि भी जैसे अकड़ सा गया और उनका भी पानी निकलकर सोनल की चूत और उसके पेट पर फैल गया.

अब दोनों बिल्कुल शांत थे और बहुत थक गये थे. फिर 5 मिनट के बाद ही पिक्चर ख़त्म हो गयी और लाईट जलती इससे पहले ही सोनल ने अपनी चड्डी यह कहते हुए पहन ली कि अब वो सूख चुकी है. अब दोनों पिक्चर ख़त्म हो चुकी थी एक जो पर्दे पर चल रही थी और एक जो बाप बेटी के बीच में चल रही थी. फिर थोड़ी देर के बाद लाईट जली और फिर दोनों हॉल से बाहर निकले.

बाहर आकर रवि मुस्कुराते हुए बोले कि पिक्चर कैसी लगी? तो तब सोनल ने जवाब दिया कि इससे बढ़िया पिक्चर मैंने आज तक नहीं देखी, तो तब रवि बोले कि मेरे साथ घूमा करेगी तो और भी बढ़िया चीज़े देखने को मिलेंगी और फिर सोनल मस्कुराती हुई गाड़ी में बैठ गयी और फिर दोनो घर की तरफ चल पड़े.
 
सोनल और रवि दोनो घर पहुच गए हंसी मजाक करते हुए, जैसे दो नए प्रेमी जोडा करता है।

घर मे आरती डाइनिंग रूम में ही बैठी थी, जैसे ही दोनो वहा पहुचे तो आरति ने नाराजगी जाहिर करते हुए तो बोली---- मुझे तो नही लेकर जाते सिनेमा,

रवि जवाब दे उससे पहले सोनल बोल पड़ती है,

अरे मम्मी आप दिन में रामू काका के साथ कुछ प्लान कर रही थी न ऊप्पर।

अब आरती तो काटो तो खून नही की हालत में थी।

रवि--- अरे रामू काका के साथ क्या प्लानिंग कर रही थी।

आरती--वो मैं मैंमममममम।

सोनल--- रामू काका को कह रही थी कि ये दोनों आम का आचार डालेंगे। इएलिये मैने सोचा कि मम्मी नही जाएगी।

सोनल ने बात बदल दी तो आरती की सांस में सांस आयी।

अब ऐसे ही तीनो बात करते रहे और सोनल बीच बीच मे आरती को बातो में उलझा देती और खुद ही निकाल देती। दोनो में चूहे बिल्ली का खेल चल रहा था। रात को डिनर का समय हो गया आरति का मूड ही नही था लेकिन फिर भी खाने की टेबल पर बैठ गयी।

खाना खाने के बाद कामया का मूड ही नहीं था पर रवि को कोई फरक नहीं पड़ता था वो तो खाना खाने के बाद उठा और चला गया और सोनल भी और रह गई आकेली आरती वो अब भी डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई अपने बारे में और रवि के बारे ही सोच रही थी कि उसे पदचाप की आवाज सुनाई दी उसने मुड़कर देखा रामू काका थे वो टेबल पर पड़े हुए झूठे बर्तन उठाने को आ रहे थे

वो एक बार रामू काका की ओर देखकर हल्का सा मुस्करायी और उठकर अपने हाथ धोने को सिंक पर चली गई

उसके दिमाग में अब भी बहुत कुछ चल रहा था और गुस्सा भी बहुत आ रहा था न जाने क्या सोचते हुए आरती सीढ़िया चढ़ती जा रही थी, पीछे उसे रामू काका के काम करने की आवाजें भी आ रही थी अचानक ही वो रुकी और पलटकर रामू काका की ओर देखते हुए

आरती- काका जल्दी सो जाते है आप

रामू- जी ?

आरती- जी कुछ नहीं बस आज उप्पेर सोना कमरे में ।

और अपने होंठों पर हँसी को दबाती हुई जल्दी से सीढ़िया चढ़ती हुई अपने कमरे में पहुँच गई

कमरे में रवि बिस्तर पर लेट चुका था शायद सो भी चुका था आरती बाथरूम की ओर अपने कपड़े चेंज करने को जाने लगी थी उसके हाथों में एक गाउन था जो कि रवि को बहुत पसंद था दो स्टीप से ही टंगा रहता था वो गाउन उसके कंधे पर और ए-लाइन टाइप की थी उसके ऊपर बहुत सुंदर और कसा हुआ सा लगता था

जब वो बाथरूम से बाहर आते ही सबसे पहले

आरती- क्यों सो गये क्या

रवि- हाँ… क्यों

आरती- इतनी जल्दी सो जाते हो बातें करनी है

रवि- अरे बहुत थका हुआ हूँ कल सुबह बातें करेंगे

आरती- उठिए ना प्लीज

रवि-- हाँ हाँ… करता हुआ पलटकर सो गया पर आरती तो गुस्से में थी दिन में सोनल ने बीच मे ही उनको रोक दिया था वो आज रवि को कहाँ छोड़ने वाली थी वो लपक कर बेड पर चढ़ि और रवि से सट कर लेट गई और अपने हाथों को उसकी बाहों पर चलाते हुए

आरती- प्लीज ना ,सोइए मत आपसे तो बातें ही नहीं हो पाती

रवि थोड़ा सा पलटकर आरती को अपनी बाहों में भिचता हुआ

रवि- क्या बातें करनी है

और अपने हाथों को आरती की चूचियां पर रखता हुआ उन्हें छेड़ने लगा था

रवि के हाथों में अपनी चूचियां के आते ही आरती के मुख से एक लंबी सी आह निकली और वो रवि से और भी सट गई थी रवि के छूते ही वो अपने आप पर काबू नहीं रख पाती थी यह बात उसे पता थी वो रवि के चेहरे को अपने होंठों से चूमती जा रही थी और उसे और भी उत्तेजित करने की कोशिश करती जा रही थी

रवि तो बेसूध सिर्फ़ आरती के कहने पर ही पलटा था और एक दो बार उसकी चुचियों को दबाने के बाद फिर से नींद के आगोश में चला गया था उसे आरती को अपने चेहरे को चूमते हुए देखना और भी अच्छा लग रहा था पर उसकी थकान उसपर ज्यादा हावी थी

पर आरती तो अपनी उत्तेजना कोठंडा करना चाहती थी वो रवि के लगभग ऊपर चढ़ि जा रही थी और उसे और भी उकसा रही थी पर रवि के ठंडे पन ने उसे एकदम से निराश कर दिया और वो अपने होंठों को उसके चेहरे पर से आजाद करते हुए रवी को एकटक देखती जा रही थी पर रवि तो कही का कही पहुँच गया था

आरती ने गुस्से में आके एक धक्का रवि को दिया और पलटकर सो गई

धक्के से रवि फिर से जागा और आरती की कमर को खींचकर अपने से भिच लिया और फिर से अपने दोनों हाथों को उसके गोल गोल चुचियों पर रखते हुए फिर से नींद के आगोश में चला गया

आरती को नींद कहाँ उसकी चूचियां अब भी रवि की दोनों हथेली में थी और वो आरती को अपने से चिपका कर सो गया था उसके कंधों पर रवि की सांसें पड़ रही थी जो कि लगभग बिल्कुल समान्तर थी वो सो चुके थे गहरी नींद उनके शरीर की गर्मी वो महसूस करसकती थी जो कि उस पतले से गाउनको भेदती हुई उसके शरीर के अंदर तक जा रही थी

आरती फिर सेक्स की भूख की भेट चढ़ती जा रही थी वो अपने को उस आग में जलने से नहीं बचा पा रही थी उसका शरीर अब रवि की बाहों में ही कस मसाने लगा था वो ना चाहते हुए भी रवि के सीने से सटी जा रही थी और अपनी कमर को जितना पीछे ले सके ले जा रही थी पर रवि पर कोई भी असर होते हुए वो नहीं देख रही थी

वो अब भी सो रहा था और आरती के कसमसाने के साथ ही उसकी पकड़ आरती पर से ढीली पड़ने लगी थी वो भी अब चित लेट गया था और थोड़ी देर बाद दूसरी ओर पलट गया था आरती भी चित लेटी हुई थी और सीलिंग की ओर देखती हुई सोच रही थी

आखिर क्यों रवि उसे अवाय्ड कर रहा है अगर वो उसे अवाय्ड ना करे तो और अगर पहले जैसा ही रोज प्यार करे तो कितना मजा है जीने में कितना अच्छा और कितना प्यारा है उसका पति कही से कोई कमी नहीं है रुपया पैसा हो या शानो शौकत हो या फिर दिखने में हो या फिर स्टाइल में हो सब में अच्छा है वो पर क्यों नहीं उसे समझ में आता की आरती को क्या चाहिए

क्यों नहीं रोज उसपर टूट पड़ता वो चाहे सुबह हो या शाम हो या दिन हो या रात हो वो तो कभी भी रवि को सेक्स के लिए मना नही किया था और रवि को भी तो कितना इंटेरेस्ट था लेकिन अब अचानक क्या हो गया क्यों वो रुपये पैसे के चक्कर में पड़ गया और उसे भूल सा गया क्या रुपया पैसा ही उसके जीवन का उद्देश् है और क्या आरती कुछ भी नहीं

पर कभी-कभी तो वो उसके लिए क्या नहीं करता और तो और उसके नाम से जमीन और साइन प्लेक्ष भी बनवा रहा था और उसे पता भी नहीं दूसरे कोई होते तो शायद अपनी दादी या फिर मम्मी या फिर बेटी या फिर कोई देवी देवता के नाम से पर यहां तो मामला ही उल्टा था ना उसे किसी ने बताया ना ही उसे बताने की ही जरूरत समझी और नाम करण भी हो जाता और कोई एहसान भी नहीं जताया किसी ने

क्या यार सबकुछ तो ठीक ठाक है पर रवि ऐसा क्यों हो गया वो क्यों नहीं उसे छेड़ता या फिर उसे प्यार करता वो तो रोज उसका इंतजार करती है उसे भी तो किसी चीज की जरूरत होती है बाजार में मिलने वाली चीजो से तो कोई भी अपना मन भर ले पर जो चीज घर की है वो ही उसे नजर अंदाज करती जा रही है यह तो गलत है पर क्या करे आरती क्या वो रोज रवि से झगड़ा करे या फिर उसे उकसाए या फिर सब कुछ छोड़दे

या फिर जो कर रही है वो ठीक है क्यों अपने पति को उस चीज के लिए जिसके लिए उसके पास टाइम नहीं है क्यों वो उस चीज का इंतजार करे जिस चीज का उसके पास आने का समय वो बाँध नहीं सकती या फिर क्यों वो उस गाड़ी की सवारी करे जो गाड़ी उसके इशारे पर नहीं चले

नहीं बाकी सब तो ठीक है वो जेसे चल रही है वो ही ठीक है उससे उसे भी परेशानी नहीं और नहीं रवि को और नहीं घर में किसी को किसी की भी टाइम को खोटी नहीं करना पड़ेगा और नहीं ही किसी को किसी की चिंता ही करनी पड़ेगी हाँ अब वो वही करेगी जो वो चाहती है और क्या सभी तो इस घर में वैसा ही कर रहे है कोई बंदिश नहीं और नहीं कोई चिंता

क्यों वो आख़िर कार सभी की तरफ देखती रहती है कि कोई उसकी सुने या फिर कोई उसकी इच्छा के अनुसार चले चाहे वो उसका पति हो या फिर सोनल।

वो एकदम से उठ गई बिस्तर से और घूमकर रवि की ओर देखा जो कि गहरी नींद में था और उसकी सांसों को देखकर लगता था कि बहूत थी गहरी नींद में था आरती बेड से उतरी और सेंडल पैर में पहनते हुए धीरे से मिरर के सामने खड़ी हो गई कोई आहट नहीं की उसने और नहीं कोई फिक्र नहीं कोई सोच थी उसके मन में थी तो बस एक ही इच्छा उसके शरीर की उसके अंदर जो आग लगी हुई थी उसे बुझाने की

अपने को मिरर में देखते ही आरती के शरीर में एक फूरफुरी सी दौड़ गई और एक मुश्कान उसके होंठों में वो जानती थी रामु काका उसके इस शरीर के साथ क्या करेंगे वो चाहती भी थी कि उसके इस शरीर के साथ कोई खेले और खूब खेले प्यार करे और उसके पूरे जिस्म को चाटे चूमे और अपनी मजबूत हथेलियो से रगडे और खूब प्यार करे वो खड़ी-खड़ी मिरर में अपने को देखती रही और धीरे से मुस्कुराती हुई अपने कंधे पर से एक स्ट्रॅप को थोड़ा सा नीचे खिसका दिया और मुस्कुराती हुई मूडी और धीरे-धीरे कमरे के बाहर जाने लगी

आरती जब, अपने कमरे से बाहर निकली तो पूरा घर बिल्कुल शांत था और कही भी कोई आवाज नहीं थी वो थोड़ी देर रुकी और अंदर की ओर देखा रवि चुपचाप सोया हुआ था आरती ने धीरे से डोर बंद किया और सीढ़ियो पर से ऊपर चढ़ने लगी वो एक बार फिर से रामु काका के कमरे में जा रही थी। अब खुद से जा रही थी, दिन में तो काका उसे उठा ले गये थे पर अब वो खुद ही जा रही थी उसके पैर काप रहे थे पर अंदर की इच्छा को वो रोक नहीं पा रही थी वो धीरे-धीरे चलते हुए पूरे घर को देखते हुए और हर पद चाप के साथ अपने को संभालती हुई वो रामू काका के कमरे के सामने पहुँच गई थी इस बात से अनजान की दो जोड़ी कदम और उसके पिछे वहा तक पहुच गए है,

अंदर बिल्कुल शांत था शायद काका भी सो गये थे पर अंदर एक डिम लाइट जल रही थी और उसकी रोशनी बाहर डोर के गप से आ रही थी

आरती ने डरते हुए धीरे से डोर को धकेला जो कि खुला हुआ था शायद रामू को कोई दिक्कत नहीं थी तो डोर बंद क्यों करे इसलिए वो खुला रखकर ही सोता था सो डोर को धकेलने से वो थोड़ा सा खुला अंदर रामू काका नीचे बिस्तर पर सोए हुए थे और एक हाथ उनके अपने माथे के ऊपर था पूरा शरीर नंगा था और कमर से नीचे तक एक चदडार से ढँका हुआ था आरती ने दरवाजे को थोड़ा सा और खोला तो डोर धीरे से खुल गया अंदर की डिम लाइट बाहर कारिडोर में फेल गई आरती ने अपने कदम आगे बढ़ाया और अंदर काका के कमरे में घुस गई

कमरे में घुसते ही उसने रामू काका के शरीर में एक हल्की सी हलचल देखी वो वही रुक गई और डिम लाइट में काका की ओर देखने लगी

रामू- दरवाजा बंद कर्दे बहू

मतलब रामू काका भी उसका इंतजार कर रहे थे और एक रवि है जो कि उसके पहले ही सो जाता है

आरती ने धीरे से दरवाजे को ढकेल दिया और

रामू काका के पास चली गयी।

रामु काका ने उसको खिंच कर अपने करीब बैठा लिया

रामू---- बहु रानी डर नही लगा दिन में सोनल ने भी देख लिया था तब भी।

‌आरती क्या कहती कि उससे अब चुदाई बिना नही रहा जाता। उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थी आज का कदम उसे कहाँ ले जाएगा वो नहीं जानती थी हाँ एक बात वो जरूर जानती थी कि वो अपने तन की भूख के आगे झुक गई है और वो उसे शांत करने के लिए अब कोई भी कदम उठा सकती है उसके बिस्तर के पास बैठेते ही रामू अपने आप ही उठकर बैठ गया और एक हाथ से उसने आरती के घुटनों को पकड़कर उसे थोड़ा सा और पास खींचा आरती को तो कोई दिक्कत ही नहीं थी वो और आगे हो गई वो लगभग अब रामु काका के बिस्तर पर ही पड़ी थी। रामू अब धीरे-धीरे आरती के रूप के दर्शन करने के मूड में थे आज पहली बार आरती उसके कमरे में बिना बुलाए आई है वो जानते थे कि आरती को क्या चाहिए और वो भी इसके लिए पूरी तरह से तैयार थे जब आरती ने खाने के बाद उससे पूछा था कि जल्दी सो जाते है क्या तभी से अपने अंदर की आग को किसी तरह से अपने में समेटे हुए थे और जब आरती उसके पास लेटी थी तो वो कहाँ रुकने वाले थे अपने हाथों से आरती के गाउनके ऊपर से ही उसके टांगों को अपने हाथों से सहलाते हुए उस डिमलाइट में आरती की ओर देख रहे थे।

रामु ने जैसे ही आरती को अपने गोद में पाया वो कुछ करता पर एक ही धक्के में वो नीचे गिर पड़ा और आरती को अपने ऊपर अपने लण्ड पर सवार होते हुए देखता रहा आरती की उत्तेजना इतनी थी, कि वो इस इंतजार मे भी नहीं थी कि रामू काका उसके अंदर समाए इससे पहले ही उसने अपने को थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपनी चुत को खोलकर उसके मोटे से लण्ड को अपने अंदर उतार लिया।

बाहर आरती का ये रूप देख कर दो जोड़ी आंखे भी हैरान थी, यहा आरति खुद चुद रही थी।

वो धीरे धीरे उसके लण्ड पर बैठने लगी गीले पन के होते हुए लण्ड बड़े ही आराम से उसके अंदर समा गया आरती के मुख से एक लंबी सी सिसकारी निकली और वो धम्म से रामू काका के ऊपर गिर पड़ी जैसे जो उसे चाहिए था वो तो अब उसके अंदर है अब कौन उससे अलग करेगा वो थोड़ा सा रुकी

पर रामू काका तो तुरंत ही अपने मिशन में लग गये थे धीरे-धीरे अपनी कमर को उचका कर अपने लण्ड को आरती की चुत में अड्जस्ट करने लगे थे आरती भी थोड़ा सा हिल कर अपने आपको उसके साथ ही अड्जस्ट करती हुई उनके शरीर को फिर से पानी बाहों में भरने को कोशिश करती जा रही थी

रामू भी अपनी बाहों को घुमाकर आरती को अपने सीने से लगाए धीरे-धीरे नीचे से धक्के लगाता जा रहा था पर वो जानता था कि वो ज्यादा देर का मेहमान नहीं है क्यों कि जो हरकत आज आरति ने उसके साथ की है अगर वो किसी के साथ करे तो कोई भी आदमी आरति की चुत तक पहुँचने से पहले ही ढेर हो जाएगा वो उन आँखो को भूल नहीं पाया था जो कि उसके लण्ड को चूसते हुए आरती की थी वो नीचे पड़े हुए आरती को अपने बाहों में भरे हुए जोर-जोर से धक्कों को अंजाम दे रहा था और अपने मुकाम की ओर बढ़ रहा था

और आरती अभी अपने अंदर उठ रहे तुफ्फान को धीरे-धीरे थामने की कोशिश में लगी थी पर रामू काका के धक्के इतने जोर दार थे कि वो जितना भी काका को जोर से जकड़े, हर धक्के में वो छूट जाते थे लण्ड अंदर बहूत अंदर तक पहुँच जाता था और उसके अगले कदम के नजदीक ले जाता था वो किसी तरह से अपने को हर धक्के के साथ फिर से एडजस्ट करने की कोशिश करती पर ना जाने क्यों उसने अचानक ही काका को छोड़ कर सीधी उनके लण्ड पर ही बैठ गई अब वो सीधी हर धक्के में ऊपर उछलती और फिर नीचे बैठ जाती,

उसके उछलने से जो नजर रामू देख सकता था वो शायद कामदेव को भी नसीब नहीं हुआ होगा रामू हर धक्कों के साथ ही आरती की उछलती हुई चुचियों को भी अपनी हथेलियो में कस कर निचोड़ता जा रहा था और अपनी गति को भी नहीं धीमा किया था

आरती भी हर धक्के के साथ ही अपनी सीमा को पार करती जा रही थी और काका के कसाव के आगे अपने शरीर में उठने वाली उमंग को अपने शिखर तक पहुँचाने में लगी हुई थी वो निरंतर अपने को रामू काका के हाथों के सहारे छोड़ कर उछलती जा रही थी और अचानक ही अपने अंदर आए उफ्फान के आगे उसका शरीर निश्चल सा हो गया और सांसों को कंट्रोल करते हुए उसका शरीर भी काका के दोनों हाथों के आगे झुक गया

दोनों हाथों के आगे मतलब चुचियों को कसे हुए रामू के दोनों हाथों के आगे आरती को लटके हुए देखता हुआ रामू अब भी, आरती को जोर दार तरीके से निचोड़ता जा रहा था वो भी, अपने आखिरी चरम पर था पर जैसे लगता था कि वो अपना पूरा दिन का गुस्सा आज आरती को निचोड़ कर ही निकाल देना चाहता था सो वो कर रहा था वो भी अपने शरीर की हर इंद्रियो को अपने लण्ड की ओर जाते हुए महसूस करता जा रहा था और ढेर सारा वीर्य उसके लण्ड से चूत पर आरती के अंदर और अंदर तक पहुँच गया

उसकी गिरफ़्त थोड़ी ढीली हुई और आरती धम्म से उसके ऊपर ढेर हो गई रामू की कमर अब भी चल रही थी वो अपनी आख़िरी बूँद को भी निचोड़ कर आरती के अंदर तक उतार देना चाहता था सो वो कर रहा था अपनी दोनों बाहों को उसने आरती के चारो ओर मजबूती से घेर रखा था और धीरे-धीरे वो और भी मजबूत होती जा रही थी

अब दोनों शांत हो गये थे दोनों एकदूसरे के पूरक बन गये थे और शांत थे सांसें गिन रहे थे या फिर एक दूसरे के छोड़ने का इंतजार कर रहे थे कोई नहीं जानता था पर दोनों वैसे ही बहुत देर तक लेटे रहे एक दूसरे के ऊपर और फिर धीरे से रामू ने आरती को हिलाया

रामू- बहू

आरती- उूउउम्म्म्मम

रामू- उठो हहुउऊउउ

आरती भी थोड़ा सा हिली और अपने को रामू से अलग करने लगी वो आज वाकाई बहुत थक चुकी थी।

बाहर से देख रही वो आंखे जा चुकी थी,

किसी तरह से खड़ी हुई और अपनी पैंटी को ढुड़ने लगी पर वो कही नहीं दिखी सो अपनी गाउनको उठाकर रामू काका की ओर पीठ कर उसे अपने सिर के ऊपर से डालकर पहन लिया और धीरे से गाउनको नीचे ले जाते हुए उठ खड़ी हुई और एक बार रामू काका की ओर देखा और मुड़कर बाहर जाने लगी,

रामु--- बहु सोनल का क्या करना है।

आरती-- क्या करना है मतलब?

रामू---- अगर उसने साहब को बता दिया तो ,

आरती---कुछ सोचती हूं मैं।

और कमरे से बाहर निकल गयी।

उसके कदम ठीक से नहीं पड़ रहे थे बहुत ही थकान लग रहा था पर एक तरंग उसके शरीर में थी जो उसे और भी मदहोशी के आलम की ओर ले जा रही थी वो किसी तरह से कमरे से बाहर निकली और सीढ़िया उतरती हुई अपने कमरे में आ गई कमरे में रवि अब भी सो रहा था आरती बाथरूम में गई और अपने को साफ करके वापस रवि के पास आके

सो गई थकान के चलते वो कब सो गई उसे पता नहीं चला हाँ… सुबह जब रवि ने उसे उठाया तो 10 बज चुके थे

रवि उसके लिए चाय कमरे में ही ले आया था आरती चाय पीते हुए अपने पति को तैयार होते देख रही थी वो अब भी बेड पर ही थी

रवि- क्या बात है बहुत देर तक सोई कल रात को नींद नहीं आई क्या

आरती- हाँ…

रवि- रात को कहाँ गई थी

आरती- मुह की च्याय बहार आकर गिरी

उसके सिर पर जैसे आसमान गिर गया हो चेहरा सफेद हो गया था जब रवि ने उससे पूछा ।

रवि ने घबराते देख खुद ही जवाब दिया

रवि- टीवी देख रही थी क्या

आरती- हाँ… नींद नहीं आ रही थी इसलिए

रवि- इसलिए तो कहता हूँ थोड़ा सा घर के बाहर निकलो घर में पड़ी पड़ी बोर भी हो जाती हो और कोई एक्सर्साइज भी नहीं तो थकान कहाँ से होगी

आरती- जी

पर आरती के दिमाग़ में वो बात घूम रही थी कि कल रात को जो उसने किया था अगर रवि बाहर निकलकर उसको ढूँढता तो .........आरति की जान निकल जाती है सोचकर।
 
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