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Guest
उसकी बात में सेक्स भी था और डाँट भी. उसकी ये बात मेरे दिल को छू गई. उसे भी मेरी फिक्र थी. वो मुझे दुखी नहीं देख सकता. क्या वो भी मुझसे प्यार करता है? इस बात का जवाब मेरे पास नहीं था लेकिन इतना तो पक्का था कि वो मेरी परवाह करता है.
खैर, वो उठकर दोबारा रसोई में गया और एक बड़ी सी थाली लेकर वापस आ गया. उसने थाली चारपाई पर रखी और हुक्के को हटाकर साइड में रखा स्टूल उठाकर दोनों चारपाई के बीच में रख दिया. स्टूल पर थाली रखते हुए बोला- आ जा, रोटी खा ले.मैंने कहा- ठीक है, पर पहले मुझे हाथ धोने हैं.वो बोला- क्यों, हाथों में गोबर लगा हुआ है क्या?मैं फिर हँस पड़ा।उसने कहा- दांत मत दिखा, जल्दी बाहर जाकर वॉशबेसिन में हाथ धो ले और आकर रोटी खा ले.
मैं जल्दी से हाथ धोकर आ गया. थाली में देखा तो 8-10 रोटियों का ढेर था. उस पर ढेर सारा मक्खन, एक बड़ा कटोरा सब्जी का और साथ में मट्ठे के दो बड़े-बड़े ग्लास.मैंने कहा- इतनी सारी रोटियां किसके लिए हैं?उसने कहा- हमारे लिए हैं और किसके लिए है? तू जाट के घर में है, यहां ऐसे ही खाया जाता है.मैं उसके मुंह की तरफ देखता रह गया.
वो बोला- खा ले अब, मेरा थोबड़ा ही देखता रहेगा?(मेरा चेहरा ही देखता रहेगा क्या)मैंने कहा- तुम्हारे चेहरे से नज़र हटती ही नहीं.वो बोला- नौटंकी मत कर, चुपचाप रोटी खा ले.
मैं उसके साथ बैठकर खाना खाने लगा. उसे मेरी बातें नौटंकी लग रही थीं. लेकिन मेरी नज़र सच में उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी। मैं खाते-खाते भी उसे ही देख रहा था. निवाला जब वो मुंह में ले जाता तो उसके मजबूत भारी डोले फूलकर टी-शर्ट में फंस जाते थे। जब वो घी लगी उंगलियां चाटता तो मन करता उसकी उंगलियों को मैं ही चाट लूं.
देखते ही देखते वो 5-6 रोटियाँ खा गया. और मुझसे पूछा- तू खा नहीं रहा?मैं हंस पड़ा. मन ही मन कह रहा था ‘सारी रोटियां तो खुद ही खा गया और मुझसे कह रहा है कि तू खा ही नहीं रहा.’
मुझे उसके इस चुलबुले अंदाज़ से बहुत प्यार था. मैं सोच रहा था कि काश… मैं लड़की होता तो शायद ये मेरे प्यार को समझ पाता. लेकिन फिर ये भी सोचा कि अगर लड़की होता तो क्या पता इसके साथ होता या नहीं होता.कहते हैं कि जो होता है पहले से लिखा होता है. अगर मेरी किस्मत में रवि का साथ लिखा है, उसके लंड से चुदने का अहसास लिखा है तो मुझे समलैंगिक होने में कोई परेशानी नहीं है.
मैं इन्हीं ख्यालों में था कि उसने कहा- और खाएगा क्या?मैंने कहा- नहीं, मेरा पेट भर गया.वैसे भी जब वो सामने होता था तो मेरा पेट वैसे ही भर जाता था. बस मन नहीं भरता था उसे देखकर. उसके लाल रसीले होंठ, उसकी काली शरारती आँखें और देसी अंदाज़. मैं उसके लिए पागल था.
वो थाली उठाकर ले जाते हुए बोला- आ जा हाथ धो ले.मैंने उठकर हाथ धो लिए, हाथ धोकर मैं कमरे में वापस आ गया.
वो खाट पर लेटा हुआ था, मुझे देखकर उसने लोअर के ऊपर से अपने लंड पर हाथ फिराते हुए मेरा तरफ मुस्कुराकर देखा. जवाब में मैंने भी उसके लंड पर प्यार से हाथ फिरा दिया. उसकी हल्की सी सिसकी निकल गई- आहहह…रवि बोला- सोनू, तुझे तो लड़की होना चाहिए था. इतना मज़ा तो लड़कियाँ भी नहीं देती, जितना तेरी गांड मारकर आया मुझे!
उसके मुंह से ये बात सुनकर मैं हल्के से मुस्कुरा दिया, मैंने कहा- और आप जितना प्यार मुझे किसी ने नहीं दिया आज तक!वो बोला- क्या हर वक्त प्यार-प्यार लगा रहता है. मज़े लिया कर जिंदगी के… प्यार व्यार सब 4 दिन के चोंचले हैं. ऐसा कुछ नहीं होता.
उसका जवाब सुनकर मेरा मुंह उतर गया. फिर भी मैं उस पर कोई हक नहीं जताना चाहता था. वो मेरे साथ था, मेरे लिए यही काफी था. लेकिन कमबख्त दिल है न, एक बार जो चीज़ मिल जाती है फिर उसके लिए इसमें घमंड पैदा हो जाता है, सोचता है कि इस पर उसी का हक है.
रवि के दिल में मेरे लिए क्या था, यह तो मैं नहीं जानता था लेकिन मुझे लगने लगा था कि उस पर मेरा ही हक़ है. मैं उसे किसी और के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकता था शायद. चाहे वो लड़की हो या कोई लड़का.प्यार इतना पज़ेसिव क्यूं होता है? लेकिन प्यार कभी भी हक़ नहीं जताता, प्यार तो बस प्यार होता है, जिससे है उसके लिए हर हद पार कर जाने को तैयार और बदले में कुछ नहीं मांगता, प्यार तो बस देने के लिए बना है. ये बात जब मुझे समझ आई तब तक काफी देर हो चुकी थी.
आगे की कहानी जल्द ही लेकर लौटूंगा.
खैर, वो उठकर दोबारा रसोई में गया और एक बड़ी सी थाली लेकर वापस आ गया. उसने थाली चारपाई पर रखी और हुक्के को हटाकर साइड में रखा स्टूल उठाकर दोनों चारपाई के बीच में रख दिया. स्टूल पर थाली रखते हुए बोला- आ जा, रोटी खा ले.मैंने कहा- ठीक है, पर पहले मुझे हाथ धोने हैं.वो बोला- क्यों, हाथों में गोबर लगा हुआ है क्या?मैं फिर हँस पड़ा।उसने कहा- दांत मत दिखा, जल्दी बाहर जाकर वॉशबेसिन में हाथ धो ले और आकर रोटी खा ले.
मैं जल्दी से हाथ धोकर आ गया. थाली में देखा तो 8-10 रोटियों का ढेर था. उस पर ढेर सारा मक्खन, एक बड़ा कटोरा सब्जी का और साथ में मट्ठे के दो बड़े-बड़े ग्लास.मैंने कहा- इतनी सारी रोटियां किसके लिए हैं?उसने कहा- हमारे लिए हैं और किसके लिए है? तू जाट के घर में है, यहां ऐसे ही खाया जाता है.मैं उसके मुंह की तरफ देखता रह गया.
वो बोला- खा ले अब, मेरा थोबड़ा ही देखता रहेगा?(मेरा चेहरा ही देखता रहेगा क्या)मैंने कहा- तुम्हारे चेहरे से नज़र हटती ही नहीं.वो बोला- नौटंकी मत कर, चुपचाप रोटी खा ले.
मैं उसके साथ बैठकर खाना खाने लगा. उसे मेरी बातें नौटंकी लग रही थीं. लेकिन मेरी नज़र सच में उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी। मैं खाते-खाते भी उसे ही देख रहा था. निवाला जब वो मुंह में ले जाता तो उसके मजबूत भारी डोले फूलकर टी-शर्ट में फंस जाते थे। जब वो घी लगी उंगलियां चाटता तो मन करता उसकी उंगलियों को मैं ही चाट लूं.
देखते ही देखते वो 5-6 रोटियाँ खा गया. और मुझसे पूछा- तू खा नहीं रहा?मैं हंस पड़ा. मन ही मन कह रहा था ‘सारी रोटियां तो खुद ही खा गया और मुझसे कह रहा है कि तू खा ही नहीं रहा.’
मुझे उसके इस चुलबुले अंदाज़ से बहुत प्यार था. मैं सोच रहा था कि काश… मैं लड़की होता तो शायद ये मेरे प्यार को समझ पाता. लेकिन फिर ये भी सोचा कि अगर लड़की होता तो क्या पता इसके साथ होता या नहीं होता.कहते हैं कि जो होता है पहले से लिखा होता है. अगर मेरी किस्मत में रवि का साथ लिखा है, उसके लंड से चुदने का अहसास लिखा है तो मुझे समलैंगिक होने में कोई परेशानी नहीं है.
मैं इन्हीं ख्यालों में था कि उसने कहा- और खाएगा क्या?मैंने कहा- नहीं, मेरा पेट भर गया.वैसे भी जब वो सामने होता था तो मेरा पेट वैसे ही भर जाता था. बस मन नहीं भरता था उसे देखकर. उसके लाल रसीले होंठ, उसकी काली शरारती आँखें और देसी अंदाज़. मैं उसके लिए पागल था.
वो थाली उठाकर ले जाते हुए बोला- आ जा हाथ धो ले.मैंने उठकर हाथ धो लिए, हाथ धोकर मैं कमरे में वापस आ गया.
वो खाट पर लेटा हुआ था, मुझे देखकर उसने लोअर के ऊपर से अपने लंड पर हाथ फिराते हुए मेरा तरफ मुस्कुराकर देखा. जवाब में मैंने भी उसके लंड पर प्यार से हाथ फिरा दिया. उसकी हल्की सी सिसकी निकल गई- आहहह…रवि बोला- सोनू, तुझे तो लड़की होना चाहिए था. इतना मज़ा तो लड़कियाँ भी नहीं देती, जितना तेरी गांड मारकर आया मुझे!
उसके मुंह से ये बात सुनकर मैं हल्के से मुस्कुरा दिया, मैंने कहा- और आप जितना प्यार मुझे किसी ने नहीं दिया आज तक!वो बोला- क्या हर वक्त प्यार-प्यार लगा रहता है. मज़े लिया कर जिंदगी के… प्यार व्यार सब 4 दिन के चोंचले हैं. ऐसा कुछ नहीं होता.
उसका जवाब सुनकर मेरा मुंह उतर गया. फिर भी मैं उस पर कोई हक नहीं जताना चाहता था. वो मेरे साथ था, मेरे लिए यही काफी था. लेकिन कमबख्त दिल है न, एक बार जो चीज़ मिल जाती है फिर उसके लिए इसमें घमंड पैदा हो जाता है, सोचता है कि इस पर उसी का हक है.
रवि के दिल में मेरे लिए क्या था, यह तो मैं नहीं जानता था लेकिन मुझे लगने लगा था कि उस पर मेरा ही हक़ है. मैं उसे किसी और के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकता था शायद. चाहे वो लड़की हो या कोई लड़का.प्यार इतना पज़ेसिव क्यूं होता है? लेकिन प्यार कभी भी हक़ नहीं जताता, प्यार तो बस प्यार होता है, जिससे है उसके लिए हर हद पार कर जाने को तैयार और बदले में कुछ नहीं मांगता, प्यार तो बस देने के लिए बना है. ये बात जब मुझे समझ आई तब तक काफी देर हो चुकी थी.
आगे की कहानी जल्द ही लेकर लौटूंगा.