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रवि उस लड़के के साथ भीगे हुए लंगोट में मेरे करीब तक आ पहुंचा. उसके भीगे लंगोट में कैद उसके लौड़े का नज़ारा ही अलग था. लेकिन मैंने पल भर से ज्यादा उसे देखने की हिम्मत नहीं की क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि कोई ऐसी हरकत नहीं करूंगा जिससे उसको मेरी तरफ से शर्मिंदा होना पड़े.रवि की टीशर्ट और लोअर मेरे हाथ में थी. वो जैसे ही मेरे पास आया मैंने कपड़े उसकी तरफ बढ़ा दिए. उसने मेरे हाथ से कपड़े लेते हुए साथ वाले लड़के को बताया कि यही है वो दोस्त जो कल से मेरे घर आया हुआ है.मुझे देख कर उस लड़के ने मुझ से हाथ मिलाया और हाल चाल पूछा.
रवि ने अपनी टी-शर्ट पहन ली. मैंने मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया क्योंकि वो लंगोट खोलने वाला था. जब उसने लोअर पहन ली तो मुझे चलने के लिए कहा- चल सोनू, घर चलते हैं.
हम तीनों रवि के घर की तरफ बढ़ चले। रास्ते में मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि संदीप और रवि के बीच में बात तो हुई लेकिन न तो संदीप के चेहरे से कुछ निष्कर्ष निकल सका और रवि भी बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा है.यही सोचते-सोचते हम रवि के घर तक आ पहुंचे. घर के पास पहुंच कर वो लड़का आगे निकल गया और हम गेट से अंदर आ गए.
मेरे मन में अब सौ तरह के सवाल उछल-कूद कर रहे थे कि आख़िर इन दोनों के बीच में बात क्या हुई. लेकिन मैंने अपनी जिज्ञासा की प्यास को धीरज का पानी पिलाना जारी रखा. सोचा कि बात कुछ हो या न हो लेकिन सामने तो आ ही जाएगी.
सुबह के 7 बज चुके थे, आंटी ने हमारे घर आते ही दूध के गिलास हाथ में थमा दिए. गिलास इतने बड़े कि अगर पूरा पी लूं तो मैं पूरे दिन खाना न खाऊं, लेकिन रवि गटक गटक करते हुए कुछ ही सेकेंड्स में गिलास खाली कर गया और एक तरफ रख दिया.मैंने कहा- मुझ से इतना दूध नहीं पीया जाएगा आंटी.वो बोलीं- हां, वो तो तेरी सेहत देखकर लग ही रहा है.रवि और उसकी मां दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े.
मैं भी मुस्कुरा दिया, मैंने रवि का गिलास उठाया और उसमें आधा दूध डालकर पीने लगा. रवि के झूठे गिलास में दूध पीने के अहसास ने मेरे अंदर के आत्मविश्वास और रवि के लिए मेरे प्यार को और बढ़ा दिया. दूध पीकर मैंने गिलास आंटी को वापस दे दिया।आंटी बोली- बेटा, मैं दूसरा गिलास दे देती.
मैंने रवि की तरफ देखा और आंटी से कहा- नहीं आंटी, दूध बहुत अच्छा था.आंटी बोली- और पी ले फिर?मैंने रवि वाला गिलास ही आगे करते हुए कहा, इसी में डाल दो.आंटी ने बाकी बचा दूध भी डाल दिया और मैं उसको रवि के चेहरे की तरफ देखते-देखते गटक गया.दूध तो पी लिया लेकिन पेट जैसे फूलकर गुब्बारा हो गया.आंटी बोली- और दूं?मैंने कहा- नहीं आंटी, पेट में जगह नहीं बची.
आंटी ने कहा- अभी थोड़ी देर में खाने का टाइम हो जाएगा.मेरी आंखें फटी रह गईं.वो दोनों मेरे चेहरे की हवाईयों को देखकर हंसने लगे.
आंटी मुस्कुराते हुए रसोई में चली गई और हम हुक्के वाले कमरे में जाकर अलग अलग चारपाई पर जाकर गिर गए। रवि को कुश्ती की थकान थी और मुझे पेट को संभालने की.रवि बोला- अब तो खुश है न तू? मुझे लंगोट में देखना चाहता था, देख लिया ना?मैंने कहा- हां, खुश हूं.मैंने सोचा- रवि संदीप के बारे में कुछ बात नहीं कर रहा है. मामला क्या है, ये कैसे जानता है उसे, और अगर जानता है तो उसने क्या बताया इसे?
मैंने हिम्मत करके बात छेड़ते हुए कहा- अखाड़े में सब पहलवान तुम्हारे ही गांव के थे क्या?वो बोला- नहीं, मेरे गांव के 3 ही थे उनमें.
मैंने कहा- एक तो हमारे साथ ही आया था.रवि बोला- हां, और 2 जो पैदल जा रहे थे.मैंने पूछा- और बाकी के 2?वो बोला- उनमें से वो छोटे वाला मालापुर का था और लम्बे वाला जो तगड़ा सा था वो नेवली खुर्द का।
ये नाम सुनते ही मैं सहम-सा गया। मैंने अंजान बनते हुए कहा- नेवली खुर्द भी पास ही का गांव है क्या?वो बोला- हां, क्यों, तुझे पसंद आ गया क्या वो पहलवान?रवि ने मुझे चिढ़ाते हुए पूछा.मैंने कहा- कौन?रवि बोला- संदीप…मैंने कहा- नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था.कहते हुए मेरी आवाज़ जैसे गले में ही आते आते दबी जा रही हो.
उसने मेरे चेहरे के भाव देखकर कहा- कित खो गया तू…?(क्या सोच रहा है)मैंने ना में गर्दन हिला दी, यहां वहां कमरे में देखने लगा.मैंने बात बदलते हुए कहा- तुम्हारा कमरा यही है क्या?वो बोला- ये तो बैठक वाला कमरा है. अभी बापू आता ही होगा हुक्का पीने।
इतने में उसके पापा कमरे में दाखिल हुए, मैंने उनको नमस्ते की।रवि बोला- चल, हम साथ वाले कमरे में बैठते हैं.कह कर वो उठ गया और उसके साथ मैं भी पीछे पीछे कमरे से बाहर निकल गया।
रवि ने अपनी टी-शर्ट पहन ली. मैंने मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया क्योंकि वो लंगोट खोलने वाला था. जब उसने लोअर पहन ली तो मुझे चलने के लिए कहा- चल सोनू, घर चलते हैं.
हम तीनों रवि के घर की तरफ बढ़ चले। रास्ते में मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि संदीप और रवि के बीच में बात तो हुई लेकिन न तो संदीप के चेहरे से कुछ निष्कर्ष निकल सका और रवि भी बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा है.यही सोचते-सोचते हम रवि के घर तक आ पहुंचे. घर के पास पहुंच कर वो लड़का आगे निकल गया और हम गेट से अंदर आ गए.
मेरे मन में अब सौ तरह के सवाल उछल-कूद कर रहे थे कि आख़िर इन दोनों के बीच में बात क्या हुई. लेकिन मैंने अपनी जिज्ञासा की प्यास को धीरज का पानी पिलाना जारी रखा. सोचा कि बात कुछ हो या न हो लेकिन सामने तो आ ही जाएगी.
सुबह के 7 बज चुके थे, आंटी ने हमारे घर आते ही दूध के गिलास हाथ में थमा दिए. गिलास इतने बड़े कि अगर पूरा पी लूं तो मैं पूरे दिन खाना न खाऊं, लेकिन रवि गटक गटक करते हुए कुछ ही सेकेंड्स में गिलास खाली कर गया और एक तरफ रख दिया.मैंने कहा- मुझ से इतना दूध नहीं पीया जाएगा आंटी.वो बोलीं- हां, वो तो तेरी सेहत देखकर लग ही रहा है.रवि और उसकी मां दोनों ठहाका मार कर हंस पड़े.
मैं भी मुस्कुरा दिया, मैंने रवि का गिलास उठाया और उसमें आधा दूध डालकर पीने लगा. रवि के झूठे गिलास में दूध पीने के अहसास ने मेरे अंदर के आत्मविश्वास और रवि के लिए मेरे प्यार को और बढ़ा दिया. दूध पीकर मैंने गिलास आंटी को वापस दे दिया।आंटी बोली- बेटा, मैं दूसरा गिलास दे देती.
मैंने रवि की तरफ देखा और आंटी से कहा- नहीं आंटी, दूध बहुत अच्छा था.आंटी बोली- और पी ले फिर?मैंने रवि वाला गिलास ही आगे करते हुए कहा, इसी में डाल दो.आंटी ने बाकी बचा दूध भी डाल दिया और मैं उसको रवि के चेहरे की तरफ देखते-देखते गटक गया.दूध तो पी लिया लेकिन पेट जैसे फूलकर गुब्बारा हो गया.आंटी बोली- और दूं?मैंने कहा- नहीं आंटी, पेट में जगह नहीं बची.
आंटी ने कहा- अभी थोड़ी देर में खाने का टाइम हो जाएगा.मेरी आंखें फटी रह गईं.वो दोनों मेरे चेहरे की हवाईयों को देखकर हंसने लगे.
आंटी मुस्कुराते हुए रसोई में चली गई और हम हुक्के वाले कमरे में जाकर अलग अलग चारपाई पर जाकर गिर गए। रवि को कुश्ती की थकान थी और मुझे पेट को संभालने की.रवि बोला- अब तो खुश है न तू? मुझे लंगोट में देखना चाहता था, देख लिया ना?मैंने कहा- हां, खुश हूं.मैंने सोचा- रवि संदीप के बारे में कुछ बात नहीं कर रहा है. मामला क्या है, ये कैसे जानता है उसे, और अगर जानता है तो उसने क्या बताया इसे?
मैंने हिम्मत करके बात छेड़ते हुए कहा- अखाड़े में सब पहलवान तुम्हारे ही गांव के थे क्या?वो बोला- नहीं, मेरे गांव के 3 ही थे उनमें.
मैंने कहा- एक तो हमारे साथ ही आया था.रवि बोला- हां, और 2 जो पैदल जा रहे थे.मैंने पूछा- और बाकी के 2?वो बोला- उनमें से वो छोटे वाला मालापुर का था और लम्बे वाला जो तगड़ा सा था वो नेवली खुर्द का।
ये नाम सुनते ही मैं सहम-सा गया। मैंने अंजान बनते हुए कहा- नेवली खुर्द भी पास ही का गांव है क्या?वो बोला- हां, क्यों, तुझे पसंद आ गया क्या वो पहलवान?रवि ने मुझे चिढ़ाते हुए पूछा.मैंने कहा- कौन?रवि बोला- संदीप…मैंने कहा- नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था.कहते हुए मेरी आवाज़ जैसे गले में ही आते आते दबी जा रही हो.
उसने मेरे चेहरे के भाव देखकर कहा- कित खो गया तू…?(क्या सोच रहा है)मैंने ना में गर्दन हिला दी, यहां वहां कमरे में देखने लगा.मैंने बात बदलते हुए कहा- तुम्हारा कमरा यही है क्या?वो बोला- ये तो बैठक वाला कमरा है. अभी बापू आता ही होगा हुक्का पीने।
इतने में उसके पापा कमरे में दाखिल हुए, मैंने उनको नमस्ते की।रवि बोला- चल, हम साथ वाले कमरे में बैठते हैं.कह कर वो उठ गया और उसके साथ मैं भी पीछे पीछे कमरे से बाहर निकल गया।