रात का अँधेरा चारों और फ़ैल चुका था । रजनी के काले आँचल में चमकते चाँदी के मोतियों से झिलमिलाते सितारे एक लुभावना दृश्य पैदा कर रहे थे । इस पहाङी की सुरम्य गोद में बहती ठण्डी शीतल हवा तन मन को बेहद सुकून सा पहुँचा रही थी । काली गहरी रात का ये रंगीन मौसम हर प्रेमी जोङे को एक दूसरे की बाँहों में समा जाने के लिये प्रेरित कर रहा था । पर प्रसून इस खुशनुमा माहौल में बैचैनी से करवटें बदल रहा था । उसका सारा बदन किसी दहकती भट्टी के समान तप रहा था ।
- माँ ! उसके मुँह से कराह सी निकली - तू कहाँ है । आज मुझे तेरी बहुत याद आ रही है । आज मुझे तेरी बहुत जरूरत महसूस हो रही है । मेरे पास आ ना माँ । मुझे अपने ममता के आँचल में सुला ले ।
वह चारपाई से उठकर बैठ गया । उसकी उदास सूनी सूनी आँखों में से आँसू मोती बनकर गालों पर आ रहे थे । वह पिछले तीन दिनों से तेज बुखार में जल रहा था । और खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहा था । आज उसे अपना बचपन याद आ रहा था । माँ की ममतामयी गोद याद आ रही थी । वह सोच रहा था । किसी जादू की तरह माँ उसके करीब होती । और वह उसके आँचल में छुपकर किसी मासूम बच्चे की भांति सो जाता । उसने सोचा । सच है माँ ..माँ ही होती है । उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता ।
वह जी भर के किसी बच्चे की भांति फ़ूट फ़ूट कर रोना चाहता था । माँ के सीने से लग जाना चाहता था । पर माँ नहीं थी । दूर दूर तक नहीं थी । उसने उँगलियों से खुद ही अपने बहते हुये आँसुओं को पोंछा । और रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । रात के 9 बजने ही वाले थे ।
इस समय वह कामाक्षा मन्दिर की सबसे ऊपरी छत पर था । और एकदम अकेला था । कामाक्षा मन्दिर में किसी कामरूपा देवी की स्थापना थी । जो वहाँ के पुजारी चाऊँ बाबा के अनुसार कामहीनता से गृसित स्त्री पुरुषों की उनकी पूजा के आधार पर मनोकामना पूर्ण करती थी । कोई पुरुष पौरुषहीनता का शिकार हो । किसी स्त्री में कामेच्छा उत्पन्न न होती हो । सम्भोग में तृप्ति न होती हो । स्त्रियों के अंग विकसित न होते हो । आदि ऐसी इच्छाओं को कामरूपा से मन्नत माँगने पर वे अक्सर पूरी हो जाती थी ।
कामाक्षा मन्दिर अजीव स्टायल में बना था । एक बेहद ऊँची पहाङी के ठीक पीछे उसकी तलहटी में बना ये मन्दिर हर दृष्टि से अजीव था । मन्दिर की सबसे ऊपरी तिमंजिला छत और पहाङी की चोटी लगभग बराबर थी । वह पहाङी घूमकर मन्दिर से इस तरह सटी हुयी थी कि मन्दिर की इस छत से सीधा पहाङी पर जा सकते थे । पहाङी के बाद लगभग एक किमी तक छोटी बङी अन्य पहाङियों का सिलसिला था । और उनके बीच में कई तरह के जंगली वृक्ष झाङियाँ आदि किसी छोटे जंगल के समान उगे हुये थे । इस छोटे से पहाङी जंगल के बाद बायपास रोड था । जिस पर 24 आवर वाहनों का आना जाना लगा रहता था । मन्दिर के बैक साइड में कुछ ही दूर चलकर यमुना नदी थी । यहाँ यमुना का पाट लगभग 300 मीटर चौङा हो गया था । और गहराई बहुत ज्यादा ही थी । यमुना पार करके कुछ दूर तक खेतों का सिलसिला था । फ़िर एक बङा मैदान और लम्बी चौङी ऊसर जमीन थी । इसी ऊसर जमीन पर बहुत पुराना शमशान था । और इसके बाद शालिमपुर नाम का गाँव था ।
फ़िर वह उठकर टहलने लगा । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और हल्का सा कश लिया । मगर तेज बुखार में वह सिगरेट उसे एकदम बेकार बेमजा सी लगी । उसने सिगरेट को पहाङी की तरफ़ उछाल दिया । और यमुना के पार दृष्टि दौङाई । दूर शालिमपुर गाँव में जगह जगह जलते बल्ब किसी जुगनू की भांति टिमटिमा रहे थे । शमशान में किसी की चिता जल रही थी । चिता..इंसान को सभी चिन्ताओं से मुक्त कर देने वाली चिता । एक दिन उसकी भी चिता जल जाने वाली थी । और तब वह जीता जागता चलता फ़िरता माटी का पुतला फ़िर से माटी में मिल जाने वाला था । क्या इस जीवन की कहानी बस इतनी ही है ?
किसी फ़िल्मी परदे पर चलती फ़िल्म । शो शुरू । फ़िल्म शुरू । शो खत्म । फ़िल्म खत्म ।
वह पिछले आठ दिनों से कामाक्षा में रुका हुआ था । और शायद बेमकसद ही यहाँ आया था । अब तो उसे लगने लगा था । उसकी जिन्दगी ही बेमकसद थी । क्या मकसद है ? इस जिन्दगी का ?
ओमियो तारा की कैद में बिताये जीवन के 6 महीनों ने उसकी सोच ही बदल दी थी । उसे लगा । सब कुछ बेकार है । सब कुछ । सत्य शायद कुछ भी नहीं है । और कहीं भी नहीं है । वह 3 आसमान तक पहुँच रखने वाला योगी था । हजारों लोकों में स्वेच्छा से आता जाता था । पर इससे क्या हासिल हुआ था ? कुछ भी तो नहीं ।
ये ठीक ऐसा ही था । जैसे प्रथ्वी के धन कुबेर अपने निजी जेट विमानों से कुछ ही देर में प्रथ्वी के किसी भी स्थान पर पहुँच जाते थे
लेकिन उससे क्या था । प्रथ्वी वही थी । सब कुछ वही था । फ़िर सत्य कहाँ था । सत्य कहाँ है ?
वह तमाम लोकों में गया । सब जगह । सब कुछ यही तो था । वही सूक्ष्म स्त्री पुरुष । वही कामवासना । वैसा ही जीवन । सब कुछ वैसा ही । क्या फ़र्क पङना था । अपनी कुछ योग उपलब्धियों के बाद वह इनमें से किसी लोक का वासी हो जाता । और लम्बे समय के लिये हो जाता । मगर अभी तलाश पूरी कहाँ हुयी । वह तलाश जिसके लिये उसने अपना जीवन ही दाव पर लगाया था । सत्यकीखोज । आखिर सत्य क्या है ?
यह रहस्यमय अजूबी सृष्टि आखिर किसने बनाई । कैसे बनी । किस नियम से चलती है । इसका नियन्त्रण आखिर कहाँ है । यह सब कुछ जानना तो दूर । उसे एक भी प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिला था ।
ओमियो तारा जैसा योगी अपनी योग शक्तियों से भगवान बैठता है । स्वयँभू भगवान । और अन्ततः अपने ही जाल में फ़ँस जाता है । न सिर्फ़ खुद फ़ँसता है । बल्कि अपने 4D पिंजरे के जाल में कई निर्दोष आत्माओं को फ़ँसा देता है ।
ओमियो तारा की याद आते ही प्रसून के शरीर में अनजाने भय की झुरझुरी सी दौङ गयी । वह खुद बङी मुश्किल से 4D Matter होते होते बचा था । अगर वह 4D Matter हो जाता । फ़िर उसका क्या होता ? क्या उसके गुरु उसे बचाते । वह कितने समय तक उस स्थिति में रहता । ऐसे तमाम सवालों का कोई जबाब उसके पास नहीं था ।
बेचारा नीलेश उसे जाने क्या क्या समझ बैठा था । और छोटी मोटी तन्त्र मन्त्र उपलब्धियों को पाकर समझता था कि वह जीवन के अन्तिम सत्य को एक दिन उसकी सहायता से समझ ही जायेगा । अब वह उसे कैसे समझाये । वह अन्तिम सत्य के करीव अभी दूर दूर तक भी नहीं फ़टका था । और शायद उसके गुरु भी । क्या.. शायद द्वैत में अन्तिम सत्य है ही नहीं । अब उसका यही विचार पक्का होने लगा था ।
यही सब सोचते हुये वह फ़िर से चारपाई पर बैठ गया । चारपाई पर मच्छरों से बचने के लिये मच्छरदानी लगी हुयी थी । और मच्छरदानी की छत पर एक मोटा कपङा ओस से बचने के लिये तना हुआ था । फ़िर भी मच्छरों के झुँड आसपास मँडरा रहे थे । उसने दो क्वाइल इकठ्ठी जलाकर चारपाई के नीचे लगा दी । तभी उसे सीङियों पर किसी के आने की आहट हुयी ।
कुछ ही क्षणों में चाऊँ बाबा किसी अनजाने आदमी के साथ ऊपर आया । उसके हाथ में चाय से भरे दो गिलास थे । वे दोनों बहीं पङी बेंच पर बैठ गये । चाऊँ ने उसका हाथ थामकर बुखार देखा । और आश्चर्य से चीखते चीखते बचा । प्रसून का बदन किसी तपती भट्टी के समान दहक रहा था । उसने प्रसून के चेहरे की तरफ़ गौर से देखा । पर वह एकदम शान्त था । बस पिछले कुछ दिनों से उदासी स्थायी रूप से उसके चेहरे पर छाई हुयी थी ।
- आप कुछ औषधि क्यों नहीं लेते ? चाऊँ बेहद सहानुभूति से बोला ।
प्रसून ने कोई उत्तर नहीं दिया । उसका चेहरा एकदम भावशून्य था । वह यमुना पार के शमशान में जलती हुयी चिता को देखने लगा । चाऊँ ने साथ आये आदमी का उससे परिचय कराया । और रात के खाने के लिये उससे पूछा । जिसके लिये उसने साफ़ मना कर दिया । तब चाऊँ नीचे चला गया ।
प्रसून धीरे धीरे चाय सिप करने लगा । बाबा लोगों की इस खास तीखी चाय ने उसे राहत सी दी ।
दूसरे आदमी का नाम महावीर था । और वह इस जलती चिता के पार बसे शालिमपुर गाँव का ही रहने वाला था । चाऊँ से यह जानकर प्रसून एक पहुँचा हुआ योगी है । उच्च स्तर का तान्त्रिक मान्त्रिक है । उसे प्रसून से मिलने की जबरदस्त इच्छा हुयी । और वह ऊपर चला आया । पर प्रसून को देखकर उसे बङी हैरत हुयी । वह किसी बङी दाढी लम्बे केश और महात्मा जैसी साधुई वेशभूषा की कल्पना करता हुआ ऊपर आया था । और चाऊँ के मुँह से उसकी बढाई सुनकर श्रद्धा से उसके पैरों में लौट जाने की इच्छा रखता था ।
पर सामने जींस और ढीली ढाली शर्ट पहने इस फ़िल्मी हीरो को देखकर उसकी सारी श्रद्धा कपूर के धुँये की भांति उङ गयी । और जैसे तैसे वह मुश्किल से नमस्कार ही कर सका ।
महावीर धीरे धीरे चाय के घूँट भरता हुआ प्रसून को देख रहा था । और प्रसून रह रहकर उस जलती चिता को देख रहा था । क्या गति हुयी होगी ? इस मरने वाले की । जीवन की परीक्षा में यह पास हुआ होगा । या फ़ेल । यमदूतों से पिट रहा होगा । या बाइज्जत गया होगा । या सीधा 84 में फ़ेंक दिया गया होगा ।
वह सुरेश था । अचानक महावीर की आवाज सुनकर उसकी तन्द्रा भंग हुयी । महावीर ने उसकी निगाह का लक्ष्य समझ लिया था । अतः उसके पीछे पीछे उसने भी जलती चिता को देखा । और बोला - मेरा खास परिचय वाला था । पर किसी विशेष कारणवश मैं इस । उसने चिता की तरफ़ उँगली की - इस अंतिम संस्कार में नहीं गया । कल तक अच्छा खासा था । जवान था । पठ्ठा था । चलता था । तो धरती हिलाता था । बङा अच्छा इंसान था । आज खत्म हो गया । कहते हैं ना । मौत और ग्राहक के आने का कोई समय नहीं होता । अपने पीछे दो बच्चों और जवान बीबी को छोङ गया है ।
- कैसे मरे ? प्रसून भावहीन स्वर में निगाह हटाये बिना ही बोला ।
- अब कहें तो । बङा ताज्जुब सा ही है । बस दोपहर को बैठे बैठे अचानक सीने में दर्द उठा । घबराहट सी महसूस हुयी । एक छोटी सी उल्टी भी हुयी । जिसमें थोङा सा खून भी आया । लोग तेजी से डाक्टर के पास शहर ले जाने को हुये । मगर तब तक पंछी पिजरा खाली करके उङ गया । पता तो तभी लग गया था । अब इसमें कुछ नहीं रहा । मगर फ़िर भी गाङी में डालकर डाक्टर के पास ले गये । डाक्टर ने छूते ही बता दिया । मर गया है । ले जाओ ।
वापस घर ले आये । घर से वहाँ ले आये । कहते कहते महावीर ने चिता की तरफ़ उँगली उठाई - वहाँ । जहाँ से अब कहीं नहीं ले जाना । देखिये ना । कितने आश्चर्य की बात है । आज सुबह तक ऐसा कुछ भी किसी को नहीं मालूम था । सुबह मैं इसको चलते हुये देख रहा था । और अब जलते हुये देख रहा हूँ । इसी को कहते हैं ना । खबर नहीं पल की । तू बात करे कल की ।
प्रसून ने एक गहरी साँस भरी । उसने गिलास नीचे रख दिया । अब उसे कुछ फ़ुर्ती सी महसूस हुयी । सिगरेट पीने की इच्छा भी हुयी । उसने फ़िर से एक सिगरेट सुलगा ली ।
प्रसून जी ! कुछ देर बाद महावीर बोला - पिछले कुछ महीनों से मैं एक बङी अजीव सी स्थिति का सामना कर रहा हूँ । सोच रहा हूँ । आपको कहूँ । या न कहूँ । चाऊँ महाराज आपकी बङी तारीफ़ कर रहे थे । वैसे मैं इसी सामने के गाँव में रहता हूँ । ग्रामीण भी हूँ । पर मेरे विचार एकदम आधुनिक ही हैं । साफ़ साफ़ शब्दों में कहूँ । तो मेरा ख्याल है कि भूत प्रेत जैसा कुछ नहीं होता । यह सब आदमी के दिमाग की उपज है । निरा भृम है । और किवदन्तियों से बन गयी महज एक कल्पना ही है । आपका क्या ख्याल है ? इस बारे में ।
बरबस ही प्रसून की निगाह शमशान क्षेत्र के आसपास घूमते हुये रात्रिचर प्रेतों पर चली गयी । जहाँ कुछ छोटे गणों का झुँड घूम रहा था । चिता का जलना अब समाप्ति पर आ पहुँचा था ।
उसने कलाई घङी पर निगाह डाली । दस बजने वाले थे ।
- सही हैं । फ़िर वह बोला - आपके विचार एकदम सही हैं । भूत प्रेत जैसा कुछ नहीं होता । यह आदमी की आदमी द्वारा रोमांच पैदा करने को की गयी कल्पना भर ही है । अगर भूत होते ।.. वह फ़िर से प्रेतों को देखता हुआ बोला - तो कभी न कभी । किसी न किसी को । दिखाई तो देते । उनका कोई सबूत होता । कोई फ़ोटो होता । अन्य कैसा भी कुछ तो होता । जाहिर है । यह समाज में फ़ैला निरा अँधविश्वास ही है ।
महावीर किसी विजेता की तरह मुस्कराया । उसने प्रसून से बिना पूछे ही उसके सिगरेट केस से सिगरेट निकाली । और सुलगाता हुआ बोला - ये हुयी ना । पढे लिखों वाली बात । वरना भारत के लोगों का बस चले । तो हर आदमी को भूत बता दें । और हर औरत को चुङैल । आपकी बात ने तो मानों मेरे सीने से बोझ ही उतार दिया । मेरा सारा डर ही खत्म कर दिया । सारा डर ही । मैं खामखाह कुछ अजीव से ख्यालों से डर रहा था ।
कैसे ख्याल । प्रसून उत्सुकता से बोला - मैं कुछ समझा नहीं ।
- अ अरे व वो कुछ नहीं । महावीर लापरवाही से बोला - जैसे आपने किसी को मरते मारते देख लिया हो । और आपको ख्याल आने लगे कि कहीं ये बन्दा भूत सूत बनकर तो नहीं सतायेगा । ऐसे ही फ़ालतू के ख्यालात । एकदम फ़ालतू बातें । दिमाग में अक्सर आ ही जाती हैं ।
प्रसून चुप ही रहा । उसने बची हुयी सिगरेट फ़ेंक दी । और उँगलियों को चटकाने लगा ।
- लेकिन ! महावीर फ़िर से बोला - लेकिन ! आपकी बात से यह तो सिद्ध हुआ कि भूत प्रेत नहीं होते । लेकिन फ़िर आजकल पिछले कुछ समय से जो मेरे साथ हो रहा है । वह क्या है ? वह कौन है ? प्रसून जी ! आप जानना चाहोगे ?
प्रसून ने आसमान में चमकते तारों को देखा । उसने अपने बालों में उँगलिया घुमाई । और फ़िर महावीर की तरफ़ देखने लगा ।
यही कोई रात के 11 बजे का समय होने जा रहा था । पर महावीर की आँखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था । वह अपने गाँव शालिमपुर से 6 किमी दूर अपने टयूबबैल पर लेटा हुआ था । अक्सर ही वह इस टयूबबैल पर लेटता था । कभी कभी उसके चार भाईयों में से भी कोई लेट जाता था । पर अभी कुछ दिनों से उसके भाईयों को यहाँ लेटने में एक अजीव सा भय महसूस होने लगा था ।
वे कहते थे कि उनकी आम महुआ की बगीची की तरफ़ से कोई औरत सफ़ेद साङी पहने हुये अक्सर टयूब बैल की तरफ़ आती दिखाई देती थी । और तब अक्सर रात के एक दो बजे का समय होता था । हैरानी की बात ये थी कि जब वह दिखना शुरू होती थी । तब वे गहरी नींद में होते थे । उसी नींद में वह उसी तरह महुआ बगीची की तरफ़ से चलकर आती थी । और उन्हें जागते हुये की तरह ही दिखाई देती थी । उसके दिखते ही किसी चमत्कार की तरह उनकी नींद खुल जाती थी । और वे उठकर बैठ जाते थे ।
लेकिन बस उनके आँखे बन्द और खुले होने का फ़र्क हो जाता था । बाकी वह रहस्यमय औरत ठीक उसी स्थान पर होती थी । जहाँ तक वह आँखे बन्द होने की अवस्था में होती थी । उसको देखते ही उनके शरीर के सभी रोगंटे खङे हो जाते थे । उन्हें एकाएक ऐसा भी लगता था कि उन्हें तेज पेशाब सी लग रही है । मगर वह वहीं के वहीं मन्त्रमुग्ध से बैठे रह जाते थे ।
फ़िर वह औरत एक उँगली मोङकर उन्हें पास बुलाने का इशारा करती थी । कामुक इशारे भी करती थी । पर वे भयवश उसके पास नहीं जाते थे । तब वह खीजकर एक उँगली को चाकू की तरह गरदन पर फ़ेरकर इशारा करती थी कि वह उन्हें काट डालेगी । फ़िर वह इधर उधर चक्कर लगाकर वापस बगिया के पीछे जाकर कहीं खो जाती थी ।
ऐसा अनुभव होते ही उसके भाईयों ने टयूबबैल पर लेटना बन्द कर दिया था । उसका भाई घनश्याम तो रात के उसी टाइम टयूबबैल छोङकर घर भाग आया था । और दोबारा नहीं लेटा । दूसरा पटवारी तीन चार दिन हिम्मत करके लेटा । फ़िर उसकी भी हिम्मत जबाब दे गयी । वह अचानक बीमार भी हो गया । और छोटा तो भूतों के नाम से ही काँपता था । सो अब यह जिम्मेवारी महावीर पर ही आ गयी थी ।
उन सबके देखे महावीर दिलेर था । वह भूत प्रेतों को नहीं मानता था । दूसरे कभी कभी वह एक गिरोह के साथ डकैती डालने में भी बतौर डकैत शामिल रहता था । अतः रात बिरात ऐसे बीहङों पर रहने का उसे खासा तर्जुबा था । उसने भूत छोङो । आज तक भूत का चुहिया जैसा बच्चा भी कहीं नहीं देखा था ।
अतः अपने भाईयों के डरपोक होने की हँसी उङाता हुआ वह टयूबबैल पर खुद लेटने लगा । और आज उसे दस दिन हो गये थे । इन दस दिनों में उसे एक काली सी छाया सिर्फ़ सपने में दिखाई दी । वह एक भयंकर काले रंग की पूर्ण नग्न औरत थी । जो हाथ में एक बङा सा हड्डा पकङे रहती थी । उसको देखते ही वह हङबङाकर जाग गया था । और जब वह उठा । तब वह पसीने से तरबतर था । उसकी साँस धौंकनी के समान चल रही थी । पर जागने पर कहीं कुछ न था । जैसा कि उसके भाई कहते थे । फ़िर ऐसा तीन चार बार हुआ था । बस एक बार ये अन्तर हुआ कि जब वह काली औरत दिखी । तो उसके स्तन और कमर के आसपास काफ़ी बङे बङे बाल थे । मानों वह बालों से बना कोई वस्त्र पहने हो । बस इतना ही दृश्य उसे दिखा था ।
महावीर अपना लायसेंसी रिवाल्वर हमेशा साथ रखता था । अतः यहाँ भी सोते समय वह उसे पूर्ण ऐहतियात के साथ रखने लगा । पर आज तो उसे नींद ही नहीं आ रही थी । वह एक अजीव सी बैचेनी महसूस कर रहा था । अतः वह चारपाई पर उठकर बैठ गया । और बीङी सुलगाकर उसका कश लेते हुये दिमाग को संयत करने की कोशिश करने लगा । फ़िर उसने थोङी दूर स्थिति महुआ बगीची को देखा । बगीची के आसपास एकदम शान्ति छाई हुयी थी । रात के काले अँधेरे में सभी पेङ रहस्यमय प्रेत के समान शान्त खङे थे ।
वह उठकर टहलने लगा । रिवाल्वर उसने कमर में लगा ली । और बीङी का धुँआ छोङते हुये इधर उधर देखने लगा ।
तभी उसकी निगाह यमुना पारी शमशान की तरफ़ गयी । और वह बुरी तरह चौक गया । नीम शीशम के दो पेङो के बीच एक मँझले कद की औरत दो छोटे बच्चों के साथ घूम रही थी । अभी लगभग बारह बजने वाले थे । और यह औरत अकेली यहाँ इन छोटे छोटे बच्चों के साथ क्या कर रही थी । जहाँ इस वक्त कोई आदमी भी अकेले में आता हुआ घबराता है । यह ठीक वैसा ही था । जैसे कोई औरत अपने खेलते हुये बच्चों की निगरानी कर रही हो ।
वह इसका पता लगाने के लिये वहाँ जाना चाहता था । पर उसकी हिम्मत न हुयी । वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा । फ़िर वे लोग अंधेरे में गायब हो गये । दो बच्चों के साथ इस रहस्यमय औरत ने उसे और भी भयानक सस्पेंस में डाल दिया था । क्या माजरा था । क्या रहस्य था । उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ।
अब उसे भी टयूब बैल पर लेटते हुये भय लगने लगा था । पर वह यह बात भला किससे और कैसे कहता । अतः उसे मजबूरी में लेटना पङता था । पर वह बिलकुल नहीं सो पाता था । वह काली नग्न औरत और वह दो बच्चों वाली रहस्यमय औरत उसे अक्सर दिखायी देते थे । जाने किस अज्ञात भावना से अब तक वह यह बात किसी को बता भी नहीं पाया ।
इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा । पर उसे उसके चेहरे पर कोई खास भाव नजर नहीं आया । जबकि वह कुछ जानने की आशा कर रहा था । तब उसने अपनी तरफ़ से ही पूछा ।
- कुछ खास नहीं । प्रसून लापरवाही से बोला - कभी कभी ऐसे भृम हो ही जाते हैं । अब जैसे तेज धूप में रेगिस्तान में पानी नजर आता है । पर होता नहीं है । जिन्दगी एक सपना ही तो है । और सपने में कुछ भी दिखाई दे सकता है । कुछ भी ।
महावीर उसके उत्तर से संतुष्ट तो नहीं हुआ । मगर आगे कुछ नहीं बोला । दरअसल उसे ये अहसास भी हो गया था कि प्रसून अपने तेज बुखार के चलते अशान्त था । और बात करने में परेशानी अनुभव कर रहा था । बस शिष्टाचार के चलते उसे मना नहीं कर पा रहा था ।
अतः उसने भी इस समय उसे तंग करना उचित नहीं समझा । और फ़िर किसी समय आने की सोचकर चला गया ।
वास्तव में यही सच था । प्रसून पर एक आंतरिक चिङचिङाहट सी छायी हुयी थी । पर ऊपर से वह एकदम शान्त लग रहा था । महावीर के जाने के बाद उसने चारपायी पर लेटकर आँखें बन्द कर लीं ।
प्रसून चुपचाप लेटा हुआ था । उसकी आँखों में नींद नहीं थी । जबकि वह गहरी नींद सो जाना चाहता था । बल्कि वह तो अब हमेशा के लिये ही सो जाना चाहता था । जाने क्यों जिन्दगी से यकायक ही उसका मोहभंग हो गया था । वह इस जीवन से ऊब चुका था ।
उसने मोबायल निकालकर उसमें टाइम देखा । रात का एक बजने वाला था । रात काफ़ी गहरा चुकी थी । चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था । सब नींद के आगोश में जा चुके थे । उसने एक सिगरेट सुलगायी । और बैचेनी से फ़िर से उठकर बैठ गया । उसका मुँह यमुना पारी शमशान की तरफ़ था । शमशान में भी पूर्ण शान्ति सन्नाटे का माहौल था । तमाम प्रेत इधर उधर अपनी रात्रिचर्या हेतु चले गये थे । बस राख बना सुरेश ही वहाँ अकेला पङा था ।
रात का ये माहौल कभी उसे बेहद पसन्द था । कितनी रहस्यमय होती है । ये रात भी । जो इंसान के लिये रात होती है । वह सिद्धों योगियों सन्तों के लिये दिन होता है । और जो इंसान के लिये दिन होता है । वह योगियों की रात होती है । कोई मामूली चीज नहीं होती है रात । रात में अधिकांश इंसानों की उनके सो जाने से संसार में फ़ैली वासनायें सिमट जाती हैं । और तब दो ही लोग जागते है । भोगी और योगी । काम इच्छा के भोगी रात के शान्त शीतल माहौल में मदन उत्सव मनाते हैं । और योगी अपनी शक्तियों को जगाते हैं । बस इंसानों के स्तर पर रात इन्हीं दो बातों के लिये ही होती है । लेकिन इसके अतिरिक्त रात के रहस्यमय आवरण में क्या क्या छुपा होता है । क्या क्या और होता है । ये बिरला ही जान पाते हैं ।
अतः रात उसके लिये कभी प्रेमिका के समान थी । एक शान्त प्रेमिका । जो प्रेमी का भाव समझकर उसकी इच्छानुसार समर्पण के लिये उसके सामने बिछी रहती है ।
बुखार बिलकुल भी कम नहीं हुआ था । बल्कि शायद और अधिक तेज हो गया था । पर वह एकदम शान्त था । वह चाहता तो बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसी पहाङी से कुछ दूर झाङियों में वह औषधीय पौधे उसने देखे थे । जिनका सिर्फ़ एक बार काङा पीने से बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसके अलावा भी वह आराम से किसी डाक्टर से दबा ले सकता था । पर ये दोनों ही काम वह नहीं कर सकता था ।
इनको करने का मतलब था । फ़ेल होना । योग की परीक्षा में फ़ेल हो जाना । अतः वह शान्त था । और शरीर की प्रयोगशाला में शरीर द्वारा ही शरीर को विकार रहित करने का सफ़ल प्रयोग देख रहा था । वह उन घटकों को स्वयँ शीघ्र भी क्रियाशील कर सकता था । जो उसे जल्द स्वस्थ कर सकते थे । पर ये भी गलत था । एक शान्त योगी के साथ प्रकृति कैसे अपना कार्य करती है । वह इस परीक्षण से गुजर रहा था ।
उसकी निगाह फ़िर से शमशान की तरफ़ गयी । और अबकी बार वह चौंक गया ।
उसके सामने एक अजीव दृश्य था । कपालिनी कामारिका और कंकालिनी नाम से पुकारी जाने वाली तीन गणें शमशान वाले रास्ते पर जा रही थीं । पर उसके लिये ये चौंकने जैसी कोई बात नहीं थी । चौंकने वाली बात ये थी कि वे रास्ते से कुछ हटकर खङी एक मँझले कद की औरत को धमका सा रही थी । औरत के पास ही दो छोटे बच्चे खङे थे । वह औरत उनके हाथ जोङ रही थी । कामारिका आगे खङी थी । और उस औरत के गाल और स्तनों में थप्पङ मार रही थी । फ़िर उसने औरत के बाल पकङ लिये । और तेजी से उसे घुमा दिया । फ़िर कपालिनी और कंकालिनी उसको लातों से मारने लगी ।
प्रसून की आँखों में खून उतर आया । उसका दहकता बदन और भी दुगने ताप से तपने लगा । शान्त योगी एकदम खूँखार सा हो उठा । फ़िर उसने अपने आपको संयत किया । और ध्यान वहीं केन्द्रित कर दिया । अब उसे वहाँ की आवाज सुनाई देने लगी ।
- नहीं नहीं ! वह औरत हाथ जोङते हुये चिल्ला रही थी - मुझ पर रहम करो । मेरे बच्चों पर रहम करो ।
पर खतरनाक पिशाचिनी सी कामारिका कोई रहम दिखाने को तैयार ही न थी । उसने दाँत चमकाते हुये जबङे भींचे । और जोरदार थप्पङ उस औरत के गाल पर फ़िर से मारा । इस पैशाचिक थप्पङ के पङते ही वह औरत फ़िरकनी के समान ही अपने स्थान पर घूम गयी । उसकी चीखें निकलने लगी । उसके बच्चे भी माँ माँ करते हुये रो रहे थे । पर डायनों के दिल में कोई रहम नहीं आ रहा था ।
- भगवान..हे भगवान..मुझे बचा ! वह औरत आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर रोते हुये बोली - मुझे बचा । कम से कम मेरे बच्चों पर रहम कर मालिक ।
- मूर्ख जीवात्मा ! कामारिका दाँत पीसकर बोली - कहीं कोई भगवान नहीं है । भगवान सिर्फ़ एक कल्पना है । चारों तरफ़ प्रेतों का राज चलता है । तू कब तक यूँ भटकेगी ।
- ये ऐसे नहीं मानेगी ! कपालिनी आपस में अपने हाथ की मुठ्ठियाँ बजाते हुये बोली ।
फ़िर उसने उसके दोनों बच्चे उठा लिये । और गेंद की तरह हवा में उछालने लगी । बच्चे अरब देशों में होने वाली ऊँट दौङ पर बैठे बच्चों के समान चिंघाङते हुये जोर जोर से रोने लगे । उधर कंकालिनी ने वापिस उसे लात घूँसों पर रख लिया ।
प्रसून को अब सिर्फ़ उस औरत के मुँह से भगवान और मेरे बच्चे तथा दोनों माँ बच्चों के चीखने चिल्लाने की ही आवाज सुनाई दे रही थी । तीनों डायनें मुक्त भाव से अट्टाहास कर रही थी ।
प्रसून की आँखे लाल अंगारा हो गयी । उसका जलता बदन थरथर कांपने लगा । यहाँ तक कि उसे समझ में नहीं आया । क्या करे । उसके पास कोई यन्त्र न था । कोई तैयारी न थी । वे सब वहुत दूर थे । और जब तक वह यमुना पार करके वहाँ पहुँचता । तब तक तो वो डायनें शायद उसका भुर्ता ही बना देने वाली थीं ।
उसने आँखे बन्द कर ली । और उसके मुँह से लययुक्त महीन ध्वनि निकलने लगी - अलख .. बाबा .. अलख .. बाबा .. अलख ।
एक मिनट बाद ही उसने आँखें खोल दी । उसके चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था । उसने हाथ की मुठ्ठी बाँधी । और घङी वाले स्थान तक हाथ के रूप में औरत की कल्पना की । फ़िर उसने सामने देखा । कामारिका कमर पर हाथ टिकाये दोनों डायनों द्वारा औरत और बच्चों को ताङित होते हुये देख रही थी । उसने उसी को लक्ष्य किया ।
फ़िर उसने मुठ्ठी से उँगली का पोरुआ निकाला । और नारी स्तन के रूप में कल्पना की । फ़िर उसने वह पोरुआ बेदर्दी से दाँतों से चबा लिया ।
- हा..आईऽऽऽ ! कामारिका जोर से चिल्लाई । उसने अपने स्तन पर हाथ रखा । और चौंककर इधर उधर देखने लगी । वह पीङा का अनुभव करते हुये अपना स्तन सहला रही थी । कपालिनी कंकालिनी भी सहमकर उसे देखने लगी ।
प्रसून ने उसके दूसरे स्तन का भाव किया । और अबकी दुगनी निर्ममता दिखाई । कामारिका अबकी भयंकर पीङा से चीख उठी । उसने दोनों स्तन पर हाथ रख लिया । और लङखङाकर गिरने को हुयी । दोनों डायनें भौंचक्का रह गयी ।
फ़िर कपालिनी संभली । और दाँत पीसकर बोली - हरामजादे ! कौन है तू ? सामने क्यों नहीं आता । जिगरवाला है । तो सामने आ.. नामर्द ।
तभी कपालिनी को अपने गाल पर जोरदार थप्पङ का अहसास हुआ । थप्पङ की तीवृता इतनी भयंकर थी कि वह झूमती हुयी सी उसी औरत के कदमों में जा गिरी । जिसका अभी अभी वह कचूमर निकालने पर तुली थी ।
- बताते क्यों नहीं ! कामारिका फ़िर से संभलकर सहमकर बोली..त त तुम..आप..आप कौन हो ?
- इधर देख ! प्रसून के मुँह से मानसिक आदेश युक्त बहुत ही धीमा स्वर निकला ।
तीनों ने चौंककर उसकी दिशा में ठीक उसकी तरफ़ देखा । फ़िर - योगी है..कहकर वे बेशर्म स्ट्रिप डांसरों के समान उसकी तरफ़ अश्लील भाव से स्तन हिलाती हुयी भाग गयीं ।
लम्बे लम्बे डग भरता हुआ वह तेजी से उसी तरफ़ चला जा रहा था । जहाँ अभी अभी उसने वह रहस्यमय नजारा देखा था । हालांकि अब वह बहुत ज्यादा उसके लिये रहस्यमय भी नहीं था । वह बहुत कुछ समझ भी चुका था । पर रात के गहन अँधेरे में सन्नाटे में एक प्रेतनियों के आगे लाचार गिङगिङाती औरत और उसके छोटे बच्चों ने उसकी खासी दिलचस्पी जगायी थी । आखिर पूरा मामला क्या था ? कौन थी वह ? और वहाँ क्यों थी । जो जिन्दगी का आखिरी पढाव होता है ।
यही सब विचार उसके दिमाग में तेजी से चक्कर काट रहे थे । कैसा रहस्यमय है ये पूरा जीवन भी । हमसे चार कदम दूर ही जिन्दगी क्या क्या खेल खेल रही है । क्या खेल खेलने वाली है ? शायद कोई नहीं जान पाता । खुद उसने ही थोङी ही देर पहले नहीं सोचा था कि वह यहाँ अकारण ही यहाँ आयेगा । उसे जलती लाश के बारे में मालूमात होगा । पर हुआ था । सब कुछ थोङी देर पहले ही हुआ था ।
चलते चलते वह ठीक उसी जगह आ गया । जहाँ टीले पर वह औरत शान्त बैठी हुयी थी । उसके बच्चे वहीं पास में खेल रहे थे । प्रसून उनकी नजर बचाता हुआ उन्हें छुपकर देखने लगा । कुछ देर शान्ति से उसने पूरी स्थिति का जायजा लिया ।
टीला मुर्दा जलाने के स्थान से महज सौ मीटर ही दूर था । औरत और बच्चों को देखकर जाने किस भावना से उसके आँसू बहने लगे । फ़िर उसने अपने आपको नियन्त्रित किया । और अचानक ही किसी प्रेत के समान उस औरत के सामने जा प्रकट हुआ । वह तुरन्त सहमकर खङी हो गयी । और बच्चों का हाथ थामकर चलने को हुयी ।
कौन थीं ये ? उसने खुद ही जानबूझ कर मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया - अभी अभी जो..।
वह एकदम से चौंकी । उसने गौर से प्रसून को देखा । पर वह कुछ न बोली । उसने बात को अनसुना कर दिया । और तेजी से वहाँ से जाने को हुयी ।
प्रसून ने असहाय भाव से हथेलियाँ आपस में रगङी । उसकी बेहद दुखी अवस्था देखकर वह यकायक कुछ सोच नहीं पा रहा था । फ़िर वह सावधानी से मधुर आवाज में बोला - ठहरो बहन । कृपया । मैं उनके जैसा नहीं हूँ ।
वह ठिठककर खङी हो गयी । उसके चेहरे पर गहन आश्चर्य था । वह बङे गौर से प्रसून को देख रही थी । और बारबार देख रही थी । और फ़िर अपने को भी देख रही थी । फ़िर वह कंपकंपाती आवाज में बोली - अ अ आप भगवान जी हो क्या ? मनुष्य रूप में ।
प्रसून के चेहरे पर घोर उदासी छा गयी । वह उसी टीले पर बैठ गया । उसने एक निगाह उन मासूम बच्चों पर डाली । फ़िर भावहीन स्वर में बोला - नहीं ।
औरत ने बच्चों को फ़िर से छोङ दिया था । वह असमंजस की अवस्था में इधर उधर देख रही थी । प्रसून उसके दिल की हालत बखूबी समझ रहा था । और इसीलिये वह बात को कैसे कहाँ से शुरू करे । तय नहीं कर पा रहा था । यकायक उस औरत के चेहरे पर विश्वास सा जगा ।
और वह कुछ चकित सा होकर बोली - आप मुझे देख सकते हो । और इन । उसने बच्चों की तरफ़ उँगली उठाई - दो बच्चों को भी ।
प्रसून ने स्नेह भाव से सहमति में सिर हिलाया । पर उस औरत के चेहरे पर अभी भी हैरत थी ।
फ़िर वह बोली - तब और सब क्यों नहीं देख पाते ?
- शायद इसलिये । वह जल चुकी चिता पर निगाह फ़ेंकता हुआ बुझे स्वर में बोला - क्योंकि इंसान सत्य नहीं । सपना देखना अधिक पसन्द करता है । वह जीवन भर सपने में जीता है । सपने में ही मर जाता है ।
- मेरा नाम रत्ना है । उसके मुर्दानी चेहरे पर बुझी राख में इक्का दुक्का चमकते कणों के समान चमक पैदा हुयी । फ़िर वह वहीं उसके सामने जमीन पर ही बैठ गयी ।
प्रसून ने एक सिगरेट सुलगाई । और गहरा कश लिया । जाने क्यों दोनों के बीच एक अजीब सा संकोच हावी हो रहा था । बहुत दिनों बाद रत्ना को कोई उसके हाल पूछने वाला हमदर्द मिला था । वह सब कुछ बताना चाहती थी । पर बता नहीं पा रही थी । कई महीनों बाद उसे कोई इंसान मिला था । कई महीनों क्या ? शायद इस जीवन में ही पहली बार । हैवानों से तो उसका रोज का ही वास्ता था ।
- आपने ही । वह अचानक भय से झुरझुरी लेती हुयी बोली - शायद मुझे उनसे अभी अभी बचाया था ?
प्रसून ने इंकार में सिर हिलाया । उसने दूर विचरते प्रेतों को देखा । और आसमान की ओर उँगली उठा दी - उसने । बहन उसने बचाया है तुझे । सबको बचाने वाला वही है ।
यकायक रत्ना का चेहरा दुख से बिगङ गया । उसके आँसू नहीं आ सकते थे । फ़िर भी प्रसून को लगा । मानों उसका चेहरा आँसुओं में डूबा हो । फ़िर वह भर्राये हुये मासूम स्वर में बोली - और मारने वाला ?
प्रसून को एक झटका सा लगा । कितना बङा सत्य कह रही थी वो । वो सत्य जो उसे जिन्दगी ने दिखाया था । यकायक उसे कोई जबाब न सूझा । शायद जबाब था भी नहीं उसके पास ।
- कितना समय हो गया ? फ़िर वह भावहीन स्वर में बोला ।
- पाँच महीने..से कुछ ज्यादा ।
- और तुम्हारे पति ? वो फ़िर से चिता को देखता हुआ बोला - वो कहाँ हैं ?
अबकी वह फ़फ़क फ़फ़क कर आँसू रहित रोने लगी । प्रसून ने उसे रोने दिया । उसका खाली हो जाना जरूरी था । वह बहुत देर तक रोती रही । बच्चे उसे रोता हुआ देखकर उसके ही पास आ गये थे । और प्रसून को ही सहमे सहमे से देख रहे थे । प्रसून की समझ में नहीं आ रहा था । वह क्या करे ।