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इंसाफ कुदरत का

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- ओ के..ओ के. सिल्वी ! प्रसून उसे जल्दी से रोकता हुआ बोला - मैं यहाँ एक खास काम से आया हूँ । ये बहुत अच्छा हुआ । तुम मुझे मिल गयी । क्या तुम्हें पता है । यहाँ की कुछ प्रेत वहाँ । उसने महावीर के टयूब बैल की तरफ़ उँगली उठायी - वहाँ के एक आदमी को मारने या डराने धमकाने जाती हैं । मैं उनके बारे में जानना चाहता हूँ । उनसे मिलना चाहता हूँ । उनकी हेल्प भी चाहता हूँ ।

- ठीक है प्रसून ! वह उठते हुये बोली - आओ मेरे साथ ।

प्रसून उठकर खङा हो गया । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और मार्निंग वाक से अन्दाज में उसके साथ चलने लगा । अब वह खुद को बेहद हलका महसूस कर रहा था । वह सिल्विया के साथ चलता हुआ महुआ बगीची पहुँचा । वहाँ काफ़ी संख्या में प्रेत घूम रहे थे । कपालिनी कामारिका और कंकालिनी भी वहाँ एक साथ ही किसी प्रेत से मस्ती कर रही थी । पर सिल्विया उसे महुआ बगीची से होकर निकालती हुयी आगे लेकर चलती गयी । और फ़िर एक लम्बा बंजर इलाका पार करके वे एक घने पेङों के झुरमुट से पहुँचे । जहाँ शक्तिशाली प्रेतों का स्थायी वास था । या कहिये हेड आफ़िस था । यह एकदम निर्जन क्षेत्र था । और आमतौर पर आदमी से अछूता था । इसके प्रेत एरिया होने की खबर भी स्थानीय लोगों को पता थी । अतः वे उधर जाने से बचते थे । प्रसून का वहाँ भव्य स्वागत हुआ ।

**********

अगले दिन । दोपहर के बारह बजे थे । प्रसून कामाक्षा के ऊपरी कमरे में लेटा हुआ था । और गहरी नींद में सोया हुआ था । कल सुबह भी पाँच बजे ही वह प्रेतवासा से लौटा था । सिल्विया ने उसकी मुलाकात मरुदण्डिका नामक बेहद खतरनाक प्रेतनी से कराई थी । मरुदण्डिका उसका कार्य प्रकार या पद था । वैसे उसका नाम रूपिका था । रूपिका सुलझे स्वाभाव की प्रेतनी थी । और अन्य प्रेतनियों की अपेक्षा उसमें काम भोग वासना बहुत ही कम थी । प्रेतों के आम स्वभाव से भी उसका स्वभाव अलग और हटकर था ।

मरुदण्डिका प्रेतनियाँ दरअसल वे स्त्रियाँ बनती हैं । जो अपने जीवन में सख्त मिजाज वाली होती हैं । अपने पति बच्चों और घर को अपने ही कङे अनुशासन में चलाती हैं । ये अनुशासन इतना अधिक सख्त होता है कि वे पति को अपने साथ सेक्स भी लिमिट और तरीके से करने देती हैं । जिसको सिर्फ़ औपचारिक सेक्स कह सकते हैं । ये न सिर्फ़ घर में वरन अपने स्वभाव के चलते सोसायटी में भी अपनी उपस्थिति में अनुशासन का माहौल बना देती हैं ।

इनकी धारणा होती है कि इंसान को सलीके और कायदे से इंसानियत के आधार पर जिन्दगी को जिन्दगी के नियमों से गुजारना चाहिये । फ़िर बहुत से कारणों में से किसी कारणवश ये अपनी कर्म त्रुटि से या अकाल मृत्यु से मृत्यु उपरान्त मरुदण्डिका प्रेत स्थिति में रूपान्तरण हो जाती हैं । और जैसा कि इंसानी जीवन में होता है । व्यक्ति को उसके गुण और योग्यता के आधार पर ही काम और पद सौंपा जाता है । यहाँ भी वही बात घटित होती है ।
 
रूपिका से प्रसून की काफ़ी देर बात होती रही । महावीर को डराने वही जाती थी । और उसे जल्द से जल्द अंजाम मौत देना ही उसका मकसद था । लेकिन समस्या ये थी कि महावीर प्रेतभाव में नहीं आ पा रहा था । उसके अन्दर रात की परिस्थितियों में घूमते रहने से भय का लगभग अभाव ही था । और किसी भी प्रेत भाव को आरोपित करने हेतु इंसान का डरपोक या भय भाव में होना आवश्यक ही होता है । रूपिका उसके घर वालों और अन्य बहुतों को भी तिगनी का नाच नचाने वाली थी । पर वहाँ भी वही प्राब्लम थी । किन्हीं नियमों के चलते वह शालिमपुर के उस आवादी क्षेत्र में तब तक ऐसा तांडव नहीं मचा सकती थी । जब तक वह स्थान एक खास भाव से दूषित न हो जाय । और दूसरे पहले के कुछ अन्य कारणों से बहाँ तांत्रिक इंतजाम थे । इसलिये बह विवशता से कसमसा रही थी ।

प्रसून ने उसकी इच्छानुसार ये सभी बाधायें खत्म करने का वादा किया । तब उसके चेहरे पर अनोखी चमक पैदा हुयी । लक्ष्य को प्राप्त करने की चमक ।

शाम के ठीक 5 बजे मोबायल के अलार्म से प्रसून की आँख खुली । वह अपने कमरे से उठकर नीचे कामाक्षा में पहुँचा । उसने चाय पी । और वहीं से कार लेकर बाजार चला गया ।

शाम आठ बजे वह वापस कामाक्षा लौटा । और सीधा अपने कमरे में चला गया । फ़िर वहाँ से निबटकर वह सीधा शालिमपुर के शमशान पहुँचा । और किसी चिता की राख को पैकेट में भरने लगा । उसने एक निगाह खोह की तरफ़ डाली । पर रत्ना उसे दिखाई न दी । और स्वयँ अभी उसकी कोई तवज्जो भी उसकी तरफ़ नहीं थी ।

इस वक्त उसने अपना हुलिया बदल सा रखा था । और आमतौर पर एक पढा लिखा मगर देहाती सा नजर आ रहा था । फ़िर सारी तैयारी के बाद वह अपने आपको बचाता हुआ शालिमपुर गाँव में जाकर ऐसे घूमने लगा । मानों किसी खास आदमी से मिलने जा रहा हो । और उसका घर आदि जानता हो । हलका अँधेरा होने से यह कोई नहीं देख पा रहा था कि उसके हाथ में थमे पैकेट से बहुत थोङी थोङी चिता की राख उसके चलने के साथ साथ जमीन पर गिरती जा रही थी । और दूसरे हाथ के टिन के डब्बे से एक महीन छेद से शराब और सुअर का खून आदि मिश्रित दृव की पतली लकीर भी गिर रही थी । जो उसने बाजार से हासिल किये थे । इस तरह उसने कुछ ही मिनटों में पूरे गाँव का चक्कर लगाया । कुछ स्थानों पर जहाँ जहाँ उसे तांत्रिक इंतजामात नजर आये । उसने जेब से एक मोटी कील निकालकर जमीन में दबा दी । और वापस निकाल ली ।

अब मरुदण्डिका और उसकी प्रेत फ़ौज आराम से निर्विघ्न गाँव पर धावा बोल सकती थी । बस उसे इसके लिये एक बार आहवान बस और करना था । ये उसका सौभाग्य ही था कि इस बीच किसी ने भी उसकी तरफ़ कोई खास ध्यान नहीं दिया था । टोका नहीं था । और उसे गाँव में ही आया कोई व्यक्ति या गाँव का ही कोई व्यक्ति समझा था ।

अब उसे आहवान के लिये किसी उचित स्थान की तलाश थी । पहले उसने सोचा कि इसके लिये गाँव से दूर हटकर किसी पेङ का चुनाव करे । मगर वैसी हालत में वह जो देखना चाहता था । उससे वंचित रह सकता था । अतः सावधानी बरतता हुआ वह महावीर के घर से थोङा हटकर अँधेरे में खङे ऊँचे और विशाल पेङ पर ऊँचा ही चढता चला गया । और बैठने योग्य घनी मजबूत डालियों का चुनाव कर उस पर बैठ गया । बस अब कामलीला शुरू होने में थोङी ही देर थी ।

यह सर्वाधिक रहस्यमय इंसान और विलक्षण योगी उस पुराने पेङ की डालियों पर किसी आसन की भांति बैठा बीज मन्त्रों के साथ शक्तिशाली प्रेत मन्त्रों का बहुत धीमे स्वर में उच्चारण करने लगा । कुछ ही क्षणों में उसे मरुदण्डिका की किलकारियाँ मारती हुयी हर्षित सेना कपालिनी कामारिका जैसे गणों के साथ ध्यान में नजर आने लगी । वे शालिमपुर पर टूट पङने को बेताब हो रहे थे । और उधर ही सरपट भागे आ रहे थे । प्रसून के होठों पर मन्द मुस्कान तैर उठी । और फ़िर कुछ ही क्षणों में शालिमपुर में ऐसे भगदङ मच गयी । जैसे अचानक आतंकवादी हमला हुआ हो । घर की औरते बच्चे आदमी बदहवास से गलियों में भागते नजर आये । भागती हुयी औरतें अपने वस्त्र उतारकर निर्वस्त्र होती जा रही थी । और पुरुषों को गन्दी गन्दी गालियाँ देती हुयी उनके पीछे भाग रही थी । अचानक इन घर की औरतों को क्या हो गया । सोचकर पुरुषों की हालत खराब थी । और वे मानों जान बचाकर भाग रहे थे । औरतें उन्हें ईंट पत्थर लात घूँसों से मार देने पर ही तुल गयी थी ।
 
प्रसून खुलकर किसी राक्षस की भांति अट्टाहास करना चाहता था । फ़िर बङी मुश्किल से उसने इस इच्छा को नियन्त्रित किया । और अचानक वह बदले भाव में रो पङा । उसके आँसू निकल आये । फ़िर वह भर्राये स्वर में बोला - रत्ना बहन ! मैंने तेरे ऊपर हुये जुल्म के बदले का बिगुल बजा दिया है । बस अपने इस भाई को थोङी मोहलत और दे दे ।

अगले दिन दोपहर के बारह बजे थे । लेकिन दिन का समय किसी भी अच्छे योगी के लिये रात के समान ही होता है । सो वह गहरी नींद में सोया हुआ था । और घोङे बेचकर सोया हुआ था । पिछले कुछ दिनों से जबसे वह रत्ना के जीवन से रूबरू हुआ था । उसकी आत्मा पर एक बोझ सा लदा हुआ था । कभी कभी कितने अजीब क्षण जीवन में आते हैं । क्यों ये हवसी इंसान ऐसा जुल्म करता है । जिसकी कोई इंतिहा नहीं । जिसकी शायद कोई सुनवाई नहीं ।

कितनी सही बात कही थी किसी ने - कुछ न कहने से भी छिन जाता है राजाजी सुखन । जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है । हन्ते को हनिये । इसमें दोष न जनिये । उसका दिल यही कर रहा था । उसके हाथ में सेमी ओटोमैटिक रायफ़ल होती । और वह रत्ना के अक्यूज्ड को सरेआम भून देता । पर इसमें तमाम कानूनी झमेले थे । शरीफ़ इंसान को डराने दहशत में रखने वाले कानूनी झमेले । और गुनहगारों की मदद करने वाले कानूनी झमेले ।

शालिमपुर में कोई एक घण्टा प्रेत सेना उत्पात मचाती रही । फ़िर वापस चली गयी । तब तक वह बराबर पेङ पर ही शान्त बैठा रहा । पर उसकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया । और जाने का सवाल भी नहीं था ।

एक बजे के करीब उसकी मोबायल के अलार्म से आँख खुली । और वह आँखे मलता हुआ उठकर बैठ गया । चाँऊ बाबा उसके लिये गरम चाय ले आया था । तब उसे पीते हुये उसने अपना मेल चेक किया । और एक दिलचस्प मेल पर अटक कर रह गया । मेल भेजने वाली उसके लिये अज्ञात थी ।

लिखा था - हेल्लो प्रसून जी ! मै आपको बेहतर से जानती हूँ । कैसे ? उसको छोडिये । मैं आपसे अपने दिल की ये बात इसलिये कह बैठी । क्यूँ कि पिछ्ले हफ़्ते सपने में मैंने 1 अजनबी से सेक्स किया था । मैंने आपको देखा तो नहीं है । लेकिन मैं आपके बारे में अक्सर सोचती रहती हूँ । सपने में बबलू घर पर नहीं था । मेरा छोटा बच्चा सोया हुआ था । और मैं अपने बेडरूम में किसी अजनबी से सेक्स कर रही थी । सेक्स के दौरान मेरे मुँह से ये निकल रहा था - प्रसून जी ! जरा आराम से प्लीज ! उस दृश्य में कोई बहुत सुन्दर आदमी था । जिसे मैं प्रसून जी कहकर बुला रही थी । सपने में वो व्यक्ति बेड पर बिलकुल निर्वस्त्र लेटा हुआ था । मैं उसकी तरफ़ मुँह करके उसकी गोद में थी । उसका पौरुषत्व मेरे इन था । उसके हाथ मेरे नितम्बों पर थे । मैं अपने हाथों से उसके बाल सहला रही थी । मेरा एक उरोज उसके... । वो मेरे...को... कर.... पी रहा था ।

प्रसून जी ! जो मुझे सपना पिछ्ले हफ़्ते आया । मैंने ज्यूँ का त्यूँ बता दिया । ये सपना क्यूँ आया ? क्या ये सिर्फ़ 1 इत्तफ़ाक था । या सिर्फ़ 1 कल्पना । ये मुझे पता नहीं । मैंने आपको तो कभी देखा नहीं । लेकिन जिसे मैं सपने में प्रसून जी कहकर बुला रही थी । वो आदमी बहुत ही जवान और सुन्दर था । अब आप इस रहस्य से पर्दा उठाईये ।

मेल पढकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आयी । और फ़िर वह..आय लव यू प्रसून..हाय डियर..हाय डार्लिंग..जैसे तमाम मेल्स को बिना ओपन किये ही सिलेक्ट करता गया । और फ़िर डिलीट कर दिया । उसे हैरत थी । वह कई बार अपनी मेल आई डी और फ़ोन नम्बर बदल चुका था । फ़िर भी लोगों को पता चल ही जाता था । इसका कारण भी बह जानता था । आप मुझे बता दीजिये । कसम से किसी से नहीं कहूँगा । जैसा प्रोमिस करने वाले भी एक दूसरे को और दूसरा तीसरे को..इस तरह सैकङों लोग जान जाते थे ।

उसने 7 इंच स्क्रीन की वह पी सी नोटबुक बैग में डाल दी ।

और सिगरेट सुलगाता हुआ खिङकी के पास आकर बाहर शालिमपुर की तरफ़ देखने लगा । कल की ही रात शालिमपुर वालों की नींद हराम नहीं हुयी होगी । बल्कि बहुत समय के लिये हो गयी थी । वह देर तक ऐसे ही विचारों में खोया रहा । और शाम होने का इंतजार कर रहा था ।

उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । दोपहर के तीन बजने वाले थे । तभी उसे सीङियों पर किसी के आने की आहट हुयी । और अगले कुछ ही मिनटों में बदहवास सा महावीर दो अन्य आदमियों के साथ आया । उसके चेहरे पर हवाईयाँ उङ रही थी । वह बिना किसी भूमिका के - प्रसून जी जल्दी से मेरे साथ चलिये । की टेर लगाने लगा ।

बङी मुश्किल से प्रसून ने उसे शान्त किया । और सब बात बताने को कहा । उसके जल्दी चलिये जल्दी चलिये पर उसने तर्क दिया । बिना बात समझे । बिना तैयारी के नहीं जाया जा सकता । तब वे तीनों वहीं तख्त पर बैठ गये । और महावीर प्रसून को कल की घटना बताने लगा । उसकी आँखों के सामने कल का दृश्य जीवन्त हो उठा ।
 
*********

इससे एक दिन पहले की बात थी । रात के 9 बजने ही वाले थे । शालिमपुर के ज्यादातर घरों में रात्रि भोजन हो रहा था । शहर के नजदीक होने से इस गाँव में लाइट की अच्छी व्यवस्था थी । केबल टीवी इंटरनेट की भी घर घर में पहुँच थी । सो ज्यादातर स्त्री पुरुष बच्चे आन टीवी के सामने ही भोजन आदि से निबट रहे थे । महावीर भी भोजन कर चुका था । और कमरे में तकिये से टेक लगाये टीवी पर नेतागीरी की खबरें देख रहा था । उसकी औरत भी खाना आदि से फ़ारिग होकर उसके पास ही बैठी थी । उसका नाम फ़ूलमती थी । जिसे ग्रामीण संस्कृति के अनुसार फ़ूला फ़ूला कहने लगे ।

ग्रामीण आवोहवा और शुद्ध भोजन की उपलब्धता में पली बढी फ़ूला किसी तन्दुरस्त पंजाबन के से लूक वाली थी । पर उसमें हिन्दू संस्कार के चलते काम भावना सीमित ही थी । या जो थी भी । उसको वह व्यक्त नहीं कर पाती थी । कुछ भी हो वह महावीर का घर कुशलता से चला रही थी ।

तब टीवी देखते हुये अधलेटे से महावीर की निगाह अचानक फ़ूला पर गयी । वह मादक अन्दाज में अंगङाईंया ले रही थी । उसने अपने बालों का जूङा खोल दिया था । और उन्हें बार बार झटक रही थी । उसका मुँह थोङा सा तिरछा था । अतः महावीर उसके चेहरे के हाव भाव नहीं देख सकता था । अचानक महावीर को उसका बदन ऐंठता सा लगा । और उसकी साँसे यूँ तेज तेज चलने लगी । मानों नागिन फ़ुफ़कार रही हो । वह एकदम चौंक गया । ये नार्मल साँस लेने की आवाज नहीं थी । ऐसा लगता था । जैसे उसके पेट में कोई प्राब्लम हुयी हो । और वह फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽऽऽ करती हुयी पेट की वायु को निकालने की कोशिश कर रही हो । बङी अजीव सी स्थिति में महावीर ने उसका हाथ पकङकर अपनी तरफ़ घुमाया । और उसके छक्के छूट गये । उसका चेहरा बुरी तरह अकङ गया था । और उसकी एकदम गोल गोल हो चुकी आँखों से मानों चिंगारियाँ निकल रही थी । उसका चेहरा बदलकर वीभत्स हो चुका था । और किसी चिता की राख से पुता सा मालूम होता था । उसकी नाक के नथुने एकदम फ़ूलकर रह गये थे । और मुँह से जहरीली नागिन की तरह फ़ुसकार निकल रही थी ।

उसने फ़ूला फ़ूला क्या हुआ फ़ूला करते हुये उसे हिलाने की कोशिश की । तो उसने पलटकर इतना झन्नाटेदार थप्पङ उसके गाल पर मारा कि वह चारों खाने चित्त जमीन पर जा गिरा । एक ही थप्पङ में महावीर की आँखों के सामने सितारे घूमने लगे । एक औरत का थप्पङ किसी पहलवान की लात जैसा शक्तिशाली हो सकता है । ये उसने कभी सोचा भी न था । और सोच भी नहीं सकता था ।

महावीर का इससे पहले ऐसी स्थिति से कोई वास्ता न पङा था । उसकी समझ में न आया कि वह क्या करे । एकदम उसके दिमाग में भूत प्रेत जैसी बात जैसे शब्द आये अवश्य । पर वह तो उनको मानता ही नहीं था । उनके बारे में कुछ जानता ही न था । पर कभी कहीं देखे दृश्य के अनुसार उसके दिमाग में आया कि प्रेत गृस्त औरत के बाल पकङ कर उसका परिचय प्रश्न आदि पूछने से वह वश में हो जाती है । और साथ में हनुमान चालीसा पढते जाओ । या बजरंग वली का नाम लेते जाओ ।

सो उसने तात्कालिक बनी बुद्धि के अनुसार ऐसा ही किया । और भूत पिशाच निकट नहीं आवे । महावीर जब नाम सुनावे । बारबार कहते हुये उसने फ़ूला के लम्बे लहराते बाल पकङ लिये । और हिम्मत करके बोला - ऐ कौन है तू ?

ये कहना ही मानों गजब हो गया । फ़ूला का फ़ौलादी मुक्का सनसनाता हुआ उसके पेट में लगा । महावीर को लगा । मानों उसकी अंतङिया बाहर ही आ गयी हों । पेट पकङकर वह दोहरा हो गया । फ़ूला उसके गिरते ही उसकी छाती पर सवार हो गयी । और उसकी नाक में जोरदार दुहत्थङ मारा । और तब महावीर को उसकी शक्ल स्पष्ट दिखाई दी । टयूबबैल पर सपने में आने वाली आज उसके घर में उसकी छाती पर साक्षात बैठी थी । फ़ूला दूर दूर तक कहीं न थी । उसका साफ़ साफ़ चेहरा उसे दिख रहा था ।

बस आगे की बात समझते उसे देर नहीं लगी । और वह उठकर किसी तरह उससे जान बचाकर बाहर भागा । फ़ूला उसके पीछे पीछे साले हरामी कहते हुये भागी । उसके मुँह से भयंकर फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽ की सीटी सी बज रही थी । मगर बाहर निकलकर तो उसकी हालत और भी खराब हो गयी । गाँव की ज्यादातर औरतें बच्चे मानों पागल हो गये थे । और एक दूसरे पर विभिन्न तरीकों से आकृमण कर रहे थे । तब वह किससे क्या कहता । किससे मदद की गुहार करता । बस उसने एक बात जरूर नोट की थी कि ये पागलपन सिर्फ़ औरतों पर ही सवार हुआ था । मर्द सिर्फ़ पिट रहे थे । और भाग रहे थे । छोटे बच्चे भी उनको ईंटों से मार रहे थे । सारे गाँव में आतंकवादी हमले जैसी भगदङ थी । जिसे जहाँ जगह मिल रही थी । जान बचाकर भाग रहा था । और बस भाग ही रहा था । अभी वह क्या करे । और कैसे करे । ये न कोई बताने वाला था । और न ही कोई पूछने की स्थिति में था ।

इस तरह ये तांडव लगभग एक घण्टे चला । और अपने आप ही शान्त हो गया । फ़िर भी सभी मर्द सशंकित से रात के बारह बजे डरते डरते ही घर लौटे । इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा ।

महावीर तो अपनी बात बताते समय अपनी धुन में मग्न था । अतः वह कोई खास प्रसून के हाव भाव नहीं जान सका । पर वे दोनों आदमी बङी गौर से प्रसून को ही देख रहे थे । घटना को गौर से सुनते हुये वह मानों थरथर काँप उठता था । उसके चेहरे पर हवाईंयाँ सी उङ रही थी । और ऐसा लग रहा था । किसी भी क्षण डर के मारे उसका पेशाब ही निकल जायेगा । और निकल भी गया हो । तो कोई आश्चर्य नहीं । ऐसा वे दोनों आदमी सोच रहे थे ।

वे यह भी सोच रहे थे । महावीर क्या सोचकर इस लौंडे के पास अपनी करुण कथा सुनाकर समय को बरबाद कर रहा है । पर अब आ ही गये हैं । तो आगे आगे देखें होता है क्या । सोचकर वह चुप बैठे थे ।
 
हालांकि कल की घटना में वह खास पीङितों में से नहीं थे । पर क्या पता अगली कल में वह भी हो जायें । यही सोचकर आगे के लिये सतर्क सावधान हो जाना उनकी उत्तम सोच थी । मौत से किसकी रिश्तेदारी है । आज मेरी तो कल तेरी बारी है । यह उनका पक्का जीवन दर्शन था ।

- हाँ तो बताईये प्रसून जी ! महावीर के बोलने से अचानक उन दोनों की सोच भंग हुयी । गौर से सुनता हुआ प्रसून भी जैसे एकदम चौंका - ये सब क्या था । क्या है ?

प्रसून हाथों की उँगलियों को आपस में उलझाकर ऐसे चटकाने लगा । मानों उसे कोई उपाय सूझ न रहा हो । उसके चेहरे पर गहन निराशा और अफ़सोस के भाव थे । उनके लिये दुख और बेबसी उसके चेहरे से मानों मूसलाधार बरसात की तरह बरस रही थी । और वह डर के मारे पीला पङा हुआ था । महावीर को कुछ कुछ हैरत सी हो रही थी । पर फ़िलहाल वही डूबते को तिनके का सहारा था ।

फ़िर उसने सिगरेट सुलगायी । और मानों गहरे सोच में डूब गया । उसकी आँखें शून्य 0 में स्थिर थी ।

कुछ देर बाद वह बोला - सारी ! मुझे बङा अफ़सोस है । पर मुझे नहीं लगता कि ये मेरे बस की बात है । अपनी जिन्दगी में मैंने आज तक ऐसा प्रेतक हमला न देखा । न सुना । जिसमें पूरा गाँव ही प्रभावित हुआ हो । बताईये । जब प्रेत किसी टेरिरिस्ट की तरह अटैक कर रहे हों । तब कहाँ गद्दी लगेगी । मन्त्र कहाँ पढा जायेगा । कौन हेल्परी करेगा । और सवाल ये है । आवेशित गद्दी पर कैसे बैठेगा । अब कोई तांत्रिक भूतों के पीछे भागता हुआ तो तांत्रिकी करने से रहा । अब मैं क्या बताऊँ । महावीर जी मेरी समझ में खुद नहीं आ रहा । आपने किन्ही और तांत्रिकों से बात नहीं की ।

महावीर के चेहरे पर गहन निराशा के बादल मंडराने लगे । वह गहरी सोच में डूब गया ।

प्रसून का दिल कर रहा था । वह खुलकर राक्षसों की भांति अट्टाहास करे । और हँसता ही चला जाये । हँसता ही चला जाये । इस स्टोरी को सुनते हुये वह दिल ही दिल में मरुदण्डिका को हजारों बार थेंक्स बोल चुका था । उसे बहुत अफ़सोस इस बात का था कि वह हरामी सुरेश पहले ही मर गया था । बङी आसान मौत मर गया था । उसे कुछ दिन और जिन्दा रहना चाहिये था । और वह शायद रहता भी । जो उसकी मरुदण्डिका से पहले मुलाकात हो जाती । पर अब क्या हो सकता था । तीर कमान से निकल चुका था ।

- और तांत्रिको से.. । महावीर कुछ सोचता हुआ सा बोला - कई तांत्रिकों के पास सुबह से गाङी लेकर घूम रहा हूँ । पर सबने यही कहा । यह प्रेतक नहीं । दैवीय प्रकोप है । और अगर प्रेतक प्रकोप है भी । तो कम से कम उनके बस की बात नहीं । तब मुझे आपका ध्यान आया । चाँऊ महाराज ने आपकी बहुत तारीफ़ की थी । मैंने सोचा । आपके पास इसका कोई हल शायद हो । शायद । शायद ।

- शायद ! प्रसून उसका ही शब्द दोहराता हुआ बोला - शायद इसका हल है तो । मगर बह मेरे पास नहीं है । वैसे..। अचानक उसे कुछ याद आया । और वह बोला - हाँ ये बताओ । इस हमले से गाँव के सभी बच्चे औरतें पीङित हुये । या सिर्फ़ कुछ ही घरों के लोग ? मेरा मतलब बाद में मामला शान्त होने पर जानकारी तो हुयी होगी ।

हाँ ! महावीर कुछ याद करता हुआ भय से काँपकर बोला - खास तीन घर ही अधिक प्रभावित हुये थे । मेरा । इतवारी का । और जो कुछ दिन पहले बेचारा जवान लङका मरा सुरेश । ये ज्यादा प्रभावित हुये थे । पर थोङा थोङा प्रभाव सभी घरों पर हुआ था । बस कुछ गिनती के घर ही बचे थे । जो बहुत सीधे साधे घरों के लोग थे । और उन्हें तो ठीक से उस समय जानकारी भी नहीं हो पायी कि गाँव में हंगामा बरपा हुआ है । उनमें से बहुत से जल्दी सो गये थे । वे आराम से सोते रहे । उन्हें दूसरे दिन ही पता चला । बहुत छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी प्रभावित नहीं हुये । सुरेश के घर की जवान लङकियाँ तो खुद नंगा होकर गलियों में नाची ।

- ओह ओह..। प्रत्यक्ष में गहरी सहानुभूति दिखाता हुआ प्रसून मन ही मन घृणा से बोला - उल्लू के पठ्ठे । साले । हरामी । फ़िर भी तुझे समझ में नहीं आया । अपने पाप याद नहीं आये । और पाप का प्रायश्चित करने के बजाय । खुद के इलाज को भागा भागा फ़िर रहा है । अगर तुझे जरा भी अक्ल होती । तो तुझे तो तुरन्त भगवान के आगे कनफ़ेस करना चाहिये था । सर फ़ोङ देना चाहिये था अपना । उसके न्याय में देर है । अँधेर नहीं । उसकी लाठी बे आवाज होती है साले कुत्ते ।

सोचते सोचते उसके आँसू फ़िर से निकलने को हुये । जिसे उसने जबरन ही रोका । और अपनी आवाज को भर्राये जाने से बचाता हुआ बोला - देखिये । अगर इंसान खुद को सुधारना चाहे । तो...। अपनी बात का रियेक्शन उसने गौर से महावीर के चेहरे पर देखा । और बोला - मेरा मतलब कोई स्थिति बिगङ गयी है । तो इलाज तो हो ही जाता है । पर जिन्दगी की हर बात में शायद अवश्य जुङी होती है । और शायद का मतलब है । अनिश्चितिता । शायद ऐसा हो जाय । और शायद ऐसा न भी हो । शायद । है ना ।

महावीर ने तुरन्त उम्मीद की एक नयी रोशनी के साथ उसकी तरफ़ देखा । वे दोनों आदमी भी यकायक चौंककर देखने लगे ।

लेकिन उनकी तरफ़ कोई ध्यान न देकर वह बोला - हिमालय के ऊपरी दुर्गम पहाङ उतरकर तिब्बत की तरफ़ आप... एक मिनट..। कहकर उसने पी सी नोट बुक निकाली । और नेट पर मैप के द्वारा उन्हें समझाने लगा - यहाँ से जब आप घाटी में उतरेंगे । तो चेन जिंगप्पा नाम का एक बूढा साधु टायप आपको यहाँ मिलेगा । यह हमेशा यहीं रहता है । और ऐसे ही बङे केसेज की डील में जाता है । एण्ड योर केस इज वेरी इंट्रेस्टिंग । मीन उनकी स्पेशलिटी के मुताबिक । सो वे दौङे चले आयेंगे ।

यह सुनते ही तीनों के दिमाग में तत्काल एक ही ख्याल आया । ये आदमी है । या पूरा गधा । गधा नम्बर 1 । एक बार को तो प्रसून के इस सुझाव पर उन्हें इस कदर झुँझलाहट हुयी कि इस बेहूदा आदमी के पास से तुरन्त चले जायें । लेकिन फ़िर उन्होंने सोचा कि अपनी तत्काल हाऊ हाऊ परिस्थिति उन्हें ऐसा सोचने पर विवश कर रही है । जबकि प्रसून सामान्यतया सही ही कह रहा है । वह जितना जानता है । और जैसा जानता है । बता रहा था । इंसान को आसान और नजदीक उपाय की स्वभाव अनुसार अपेक्षा होती ही है । पर कभी कभी उसके लाइलाज जैसे रोग का इलाज बहुत दूर भी होता है । सात समन्दर पार भी होता है । और वहाँ जाना ही होता है । जैसे किसी सात समन्दर पार प्रेमिका के पास भी अभिसार हेतु जाने की व्याकुलता सी होती ही है । अगर वह वहाँ ही रहती हो ।
 
फ़िर भी वह बेबसी से उँगलियाँ चटकाता हुआ ढीटता से बोला - प्रसून जी ! वैसे आप ठीक ही कह रहे हो । पर क्या आप खुद जानते हो । आप क्या कह रहे हो । इसका मतलब कुछ कुछ ऐसा ही है कि टट्टी हिन्दुस्तान में लग रही है । लग क्या रही है । बल्कि निकली पङ रही है । निकलने वाली है । और आप कह रहे हो । पाखाना पाकिस्तान में है । मेरी बात समझने की कोशिश करो भाई ।

- खैर..। प्रसून ने रिस्टवाच में समय देखा । 6 बजने वाले थे । फ़िर वह अचानक मानों कुछ निर्णय सा लेता हुआ बोला - आप ये बताओ । मुझसे क्या चाहते हो ? क्योंकि आप बङी उम्मीद से मेरे पास आये हो । इसलिये मेरा फ़र्ज बनता है कि आप लोगों की..।

लेकिन उसका वाक्य अधूरा ही रह गया । जीने पर भागते हुये कदमों की आहट आयी । और तुरन्त दो युवक लगभग भागते हुये ही आये । और सीधा कमरे में आ गये । उनके चेहरे पर हवाईंया उङ रही थी ।

- दद्दा जल्दी चलो । जल्दी चलो । कहते हुये वह अपनी बात ठीक से कह भी नहीं पा रहे थे । महावीर भी हङबङा गया । और वह और प्रसून दोनों हैरानी से एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे ।

उन्होंने उसी हङबङाहट में जल्दी जल्दी बताया । अभी आधा घण्टा पहले ही उसके घर की फ़ूला सहित गाँव की कुछ औरते पगला सी गयीं हैं । और गाँव में बंदूक रिवाल्वर आदि हथियार लिये घूम रही हैं । वे आपको और इतवारी को गन्दी गन्दी गालियाँ देती हुयी घूम रही हैं । और सुरेश के घर में घुसकर सबको मार रही हैं । और आग लगाने की बात कर रही हैं । उन्होंने अपने कपङे जगह जगह से फ़ाङ लिये हैं । वे किसी दैवीय प्रभाव में मालूम होती हैं । और किसी के वश में नहीं आ रही हैं । अतः बस आप जल्दी से चलिये ।

महावीर के होश उङ गये । उसने घबराकर प्रसून की तरफ़ देखा । वे जल्दी चलने को कह रहे थे । जबकि वह देर में भी नहीं जाना चाहता था । बिलकुल भी नहीं जाना चाहता था । शायद अब जिन्दगी भर नहीं जाना चाहता था । प्रसून का दिल फ़िर से खुलकर राक्षसी अट्टाहास लगाने को हुआ । मगर अब फ़ैसले की घङी आ चुकी थी ।

वास्तव में ये मरुदण्डिका ने उसके लिये ही संदेश भेजा था कि आज की रात कयामत की रात होगी । फ़ैसले की रात होगी । और मरुदण्डिका को उसकी सहायता की आवश्यकता थी । आन द स्पाट आवश्यकता थी । क्योंकि प्रसून का फ़ैलाया निर्मित तन्त्र सिर्फ़ चार दिन ही काम करने वाला था । उसके बाद फ़िर से मरुदण्डिका और उसकी प्रेत सेना गाँव में नहीं जा सकती थी । इसलिये इससे पहले कोई और रुकावट आये । वह अपना काम खत्म करना चाहती थी । क्योंकि उसे मालूम था कि महावीर और इतवारी इस समय उसके पास बैठे हैं । इसलिये उसने अपने ही स्टायल में संदेश भेजा था । यानी मियाँ की जूती । और मियाँ का ही सिर । मरने वाला खुद मौत की तरफ़ भागे । आ बैल मुझे मार ।
 
थैंक्स..मरु..। बेख्याली में प्रसून के मुँह से निकल ही गया । महावीर ने चौककर उसकी तरफ़ देखा । तो वह तेजी से संभलकर बोला - आय मीन । थैंक गाड..आप यहाँ पर हो । तो सचेत हो सकते हो । वरना शायद वे तो आपको मार भी देती ।

महावीर के शरीर में तेज झुरझुरी सी दौङ गयी । उसने गले तक डूब गये अतैराक इंसान की तरह से भयभीत और बुझी बुझी आँखों से प्रसून की तरफ़ देखा । पर प्रसून के दिल में कोई सहानुभूति न हुयी । लेकिन मामला जल्दी वाला था । और उसे स्टायल से डैथ गेम में शामिल रहना था । अतः उसने तुरन्त निर्णय सा लिया । और बाकी लोगों से बोला - आप लोग तुरन्त वापस गाँव पहुँचिये । लेकिन अभी जब तक मैं न पहुँचू । गाँव में अन्दर मत जाना । बाहर से ही निगाह रखना । तब तक मैं अपनी गाङी से इन दोनों..। उसने महावीर और इतवारी की तरफ़ उँगली दिखाई - को अपने साथ लेकर आता हूँ ।.. मौत के मुँह में..। ये शब्द उसने मन ही मन कहे । फ़िर आगे बोला - हम तीनों गाङी से सावधानी से स्थिति का जायजा लेते हुये जायेंगे । और शालिमपुर जाने के लिये यमुना पर ब्रिज थोङा घूमकर भी है । अतः दूसरे रास्ते से पहुँचेंगे । तब तक आप लोग पहुँच कर स्थिति को संभालो ।

देखो भाई ! वह भावहीन स्वर में बोला - साफ़ साफ़ सुन लो । मुझसे ज्यादा उम्मीद मत रखना । पर मेरे से जितना बन पङेगा । मैं आपकी हेल्प करूँगा । अगर आप बोलो । तो चलूँ । ना बोलो । तो ना चलूँ । भले आदमियों के साथ..। उसने महावीर और इतवारी की तरफ़ फ़िर से देखा - भगवान भी कुछ न्याय करता है । आखिर उसका भी कोई इंसाफ़ है । इंसान की सोच से परे इंसाफ़ । वह किसी दीन दुखी की पुकार पर..। उसे फ़िर से रत्ना की याद आयी - पर ध्यान न दे । ऐसा हो नहीं सकता । जब उसने मुझे निमित्त बनाकर आपको मेरे पास भेजा है । तो कुछ सोचकर ही भेजा होगा । इसलिये मैं भी अपनी समझ से पूरा इंसाफ़ ही करूँगा । ये मेरा इंसाफ़ होगा । प्रसून का इंसाफ़ ।

महावीर और इतवारी को ऐसा लगा । मानों वे मरने के बाद जिन्दा हो गये हैं । प्रसून के हिम्मती स्वर ने उनके मुर्दा जिस्म में फ़िर से प्राण से फ़ूँक दिये थे । बोलते वक्त कैसा खुदाई मसीहा सा नजर आ रहा था वो । आसमान से उतरा दिव्य फ़रिश्ता । दुखियों का दुख समझने वाला ।

उसके चुप होने पर सबने एक दूसरे की तरफ़ देखा । और मुक्त भाव से उसका समर्थन भी किया । जाने क्यों उसकी एक एक बात । एक एक शब्द । उन्हें सच्चाई से ओतप्रोत दिव्य वाणी सा महसूस हो रहा था । जैसे ये आवाज किसी इंसान के मुँह से नहीं । बल्कि किसी पाक रूह से आ रही थी । जिसका एक एक लफ़्ज । उनकी आत्मा को झंकृत कर रहा था ।

तुरन्त ही सबकी सहमति बन गयी । और महावीर और इतवारी को वहीं छोङकर वे दोनों युवक और वह आदमी वापस रवाना हो गये ।

प्रसून तेजी से दोनों के साथ कामाक्षा के अहाते में खङी वैगन आर से पहुँचा । और कुछ ही देर में उसकी कार शालिमपुर के लिये फ़र्राटा भरने लगी । इतवारी उसकी ड्राइविंग देखकर हैरान था । कार मानों दौङने के बजाय उङ रही हो । टेङी मेङी सङक पर भी फ़ुल स्पीड से दौङती गाङी को वह ऐसे काटता था कि दोनों का कलेजा बाहर निकलने को हो जाता । गाङी किलर झपाटा स्टायल में सिर्फ़ सूंयऽऽऽऽ सूंय़ऽऽऽऽऽ कर रही थी । दूर से आते वाहन भी घबराकर धीमे हो गये । और उसे पर्याप्त जगह देते हुये काफ़ी फ़ासला देकर साइड से हो गये ।

तब महावीर को उसमें कुछ दम नजर आयी । स्टेयरिंग सीट पर बैठे आत्मविश्वास से भरे प्रसून को देखकर उसे समझ आया कि चाँऊ बाबा क्यों इस लङके की मुक्त कण्ठ से तारीफ़ करता था ।

पर इस सबसे बेपरवाह प्रसून के दिमाग में रत्ना घूम रही थी । कुछ ही देर में उसकी गाङी यमुना ब्रिज पार करती हुयी शालिमपुर के शमशान में खङी थी । उसने गाङी रत्ना की खोह से काफ़ी पहले ही रोक दी थी । और उनको समझा दिया था कि वह कुछ खास इंतजाम कर रहा है । इसलिये वह गाङी से बाहर न आयें । और यहीं उसका इंतजार करें । वे उसके इस नये कदम पर हैरान तो हुये । पर उनकी समझ में कुछ नहीं आया । और वैसे भी प्रसून जानता था । उन पर हावी हुआ मौत का डर । न तो उन्हें कुछ सोचने देगा । और न ही गाङी से निकलने देगा । जबकि वह इस वक्त शमशान में और खङा था ।

उसने रत्ना को बुलाकर कुछ समझाया । और 15 मिनट तक समझाता रहा । हालाँकि उसने रत्ना को खुलकर कुछ नहीं बताया कि क्या होने वाला है । पर जब से वह उससे मिला था । किसी भी प्रेत ने उसे तंग नहीं किया था । उसकी एक एक बात सच हुयी थी । इसलिये रत्ना पूरे आदर से उस पर विश्वास करती थी । दरअसल प्रसून उसे सरप्राइज करना चाहता था । और लाइव दिखाना चाहता था । इसलिये वह खास बात गोल ही कर गया ।

फ़िर वह लौटा । और गाङी में सवार हो गया । उसकी गाङी शालिमपुर की ओर रवाना हो गयी । जिसके ऊपर छत पर बैठी हुयी रत्ना अपने पिया के गाँव एक बार फ़िर वापस जा रही थी । उसके बच्चे आराम से खोह में सोये हुये थे । प्रसून के होते जाने क्यों वह उनकी तरफ़ से एकदम निश्चिन्त थी । और उसकी हर बात खुशी से मान लेती थी ।

गाङी शालिमपुर की गलियों में दाखिल होकर रुक गयी । महावीर ने अन्दर बैठे बैठे ही बाहर देखा । उसके छक्के छूट गये । भय से हवाईंया उसके चेहरे पर उङने लगी । वह आँखें फ़ाङ फ़ाङकर बाहर भौंचक्का सा देखने लगा ।

डाण्ट वरी ! कहता हुआ प्रसून उसको थपथपा कर गाङी से बाहर आ गया ।
 
महावीर की औरत फ़ूला और इतवारी की औरत सुषमा को उसी पेङ से रस्सियों से जकङकर बाँध दिया गया था । जिस पर बैठकर योगी ने उल्टा मारक आहवान किया था । उनके चारों और गाँव वालों का हुजूम सा इकठ्ठा हो गया था । दरअसल एक स्पेशल नाटक के तहत थोङा उत्पात मचाकर प्रेतनियाँ शान्त हो गयीं थी । और तब लोगों की समझ में यही आया कि तांत्रिक के आने तक अगली किसी घटना को बचाने के लिये उन्हें मजबूती से बाँध दिया जाय ।

सो कभी गाँव के मर्दों बूङों के आगे सिर भी न खोलने वाली वे औरतें पूरी बेहयाई से अधफ़टे वस्त्रों में खङी थी । और रस्सियाँ तोङने को मचल रही थी । वे खुलकर उन पर गन्दी नंगी अश्लील गालियों की बौछार सी कर रही थी । लेकिन मजबूर से वे सब शान्ति से सिर झुकाये खङे थे । किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । उन्हें महावीर का इंतजार था । जो किसी पहुँचे हुये तांत्रिक को बुलाने गया था ।

इसलिये गाङी रुकते ही सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ । और कई लोग गाङी में झांक झांक कर किसी लम्बी दाङी वाले साधु महात्मा की तलाश करने लगे । उन्होंने इशारे से महावीर से पूछा भी । पर उसने चुप रहने का इशारा कर दिया । तब उन सबका ध्यान प्रसून की तरफ़ गया ।

पर उन सबकी मनोदशा से एकदम बेपरवाह सा चलता हुआ वह पेङ से बँधी औरतों के पास पहुँचा । उसकी पीठ भीङ की तरफ़ थी । फ़ूला ने सबकी निगाह बचाकर उसे आँख मारी । और अश्लील भाव से स्तन हिलाये । प्रसून ने ऐसे माहौल में कहीं हँसी न निकल जाये । इसलिये फ़ौरन उसकी तरफ़ से मुँह फ़ेर लिया । उसकी निगाह कार की छत पर बैठी रत्ना पर गयी । जो बङी हैरत से यह सब देख रही थी । गाँव के सभी लोगों को वह स्वाभाविक ही पहचानती ही थी ।

उसने यूँ ही हाथ को फ़ालतू सा घुमाते हुये निगाह बचाकर समय देख लिया । साढे दस से ऊपर ही होने वाले थे । रामलीला की जगह कामलीला शुरू होने ही वाली थी । दर्शक जमा हो चुके थे । आज पूरा गाँव ही चर्चा फ़ैल जाने से यहाँ इकठ्ठा हो गया था । गली के पोल पर जलते दो बल्बों से लाइट का पर्याप्त इंतजाम था । बस कलाकारों की एंट्री होना शेष थी । वे खास कलाकार । जो उसके निमन्त्रण पर आने वाले थे ।

वह ऐसे सीरियस माहौल में सिगरेट पीना नहीं चाहता था । पर अपनी तेज तलब को वह रोक नहीं पाया । और पब्लिक की तरफ़ बहाने से एक मिनट कहता हुआ सिगरेट बीच में ही सुलगाता हुआ गाङी की तरफ़ आया । अपने पीछे लपकती भीङ को इशारे से उसने वहीं रोक दिया ।

और कार की खिङकी से अन्दर झांककर फ़ुसफ़ुसाता हुआ बोला - महावीर जी ! बङी गङबङ है यहाँ । साक्षात मौत का खेल जान पङता है । प्रेतों की संख्या बीस से भी ऊपर महसूस हो रही है । मेरे लिये संभालना बहुत ही मुश्किल जान पङ रहा है । पर मैं सिर्फ़ भागते भूत की लंगोट ही सही । जितना काम तो शायद कर ही लूँगा । देखो मैं इनको वश अश में तो नहीं कर पाऊँगा । क्योंकि बहुत बङे प्रेत हैं । लेकिन उनकी मिन्नतें करके समझौता कराने की कोशिश करूँगा ।

इसलिये आपको मेरी सलाह है कि कार से कतई बाहर न निकलें । चाहे कुछ भी हो जाय । समझो अभी प्रलय भी आ जाय । फ़िर भी नहीं निकलना । मौत से किसी की रिश्तेदारी नहीं होती । अन्दर से लाक भी लगा लो । क्योंकि इतना तो मैं जानता हूँ । भूत प्रेत लाक खोलकर अन्दर आपको मारने । उसने मारने शब्द पर जोर दिया - मारने नहीं आ सकते । वैसे आप निश्चिन्त रहो । मुझे उम्मीद है । समझौता हो ही जायेगा । भगवान आपके साथ पूरा इंसाफ़ करेगा । सच्चा इंसाफ़ ही करेगा । एकदम सच्चा इंसाफ़ ।

महावीर ने बङे श्रद्धा भाव से सिर हिलाया । और उसको वापस जाते देखता हुआ भयभीत इतवारी से बोला - कितना अच्छा और सच्चा इंसान है । एकदम भगवान के जैसा । मुझे तो इसमें ही साक्षात भगवान नजर आता है । भगवान ।

वह फ़िर से वापस पेङ के पास पहुँच गया । उसने एक निगाह बँधी औरतों और जमा पब्लिक पर डाली । फ़िर उसने नीचे गन्दी जमीन की तरफ़ देखा । उसका इशारा समझते ही तुरन्त आनन फ़ानन ही वहाँ गद्दी जैसे साजो सामान की सब व्यवस्था हो गयी ।

वह गद्दी पर बैठ गया । उसके पलकों पर आँसू तैरने लगे । उसने आज तक कभी इस ज्ञान का उपयोग किसी के बुरे के लिये नहीं किया था । सदा भले के ही लिये किया था । पर आज उसकी खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जो वह करने जा रहा था । वह भला था । या बुरा । एक पल के लिये वह कमजोर सा पङने लगा । उसका आत्मविश्वास डगमगाया । नहीं । शायद ये गलत होगा । तभी उसकी निगाह रत्ना पर गयी । और उसके दिमाग में जमा उसकी जिन्दगी की रील उसके आगे घूमने लगी । वहशी दरिन्दे सुरेश के आगे गिङगिङाती एक असहाय अवला की चीखें - मेरे ब ब बच्चों पर र र रहम करो भईयाऽऽऽ ।

दूसरे ही पल उसके शिथिल होते शरीर में फ़िर से तनाव जागृत होने लगा । उसकी निर्बलता एकदम गायब हो गयी । और वह भावहीन कर्तव्यनिष्ठ योगी सा नजर आने लगा । उसकी आँखें एकदम गोल शून्य 0 होकर चमकने लगी ।

उसने शक्तिशाली सम्मोहिनी तन्त्र से पूरे गाँव क्षेत्र को ही बाँध दिया । ये उसी तरह से था । जैसे जादू वाले निगाह बाँध देते है । कुछ अच्छे जानकार सिद्ध बुद्धि को भी बाँध देते हैं । फ़िर उसने एक तगङा सामूहिक गण आहवान प्रयोग किया । और आँखे बन्द कर मन्त्र जगाने लगा । तुरन्त उसे मरे जानवर पर मंडराते चील कौवों की भांति छोटे बङे प्रेतों के हिल्लारते दल नजर आने लगे । कुछ ही मिनटों में उसने कार्यवाही पूरी कर दी ।

अब स्थिति ये थी कि अदृश्य प्रेतों की पूरी सेना किसी आतंकवादियों की भांति गाँव के एक एक आदमी को कवर किये खङी थी । पूरा गाँव प्रेतों की घेरेबन्दी में आ चुका था । सभी सम्मोहित से गाँव वालों को कुछ अजीव सा महसूस हो रहा था । पर क्या । वे नहीं जानते थे । पर क्यों । वे नहीं जानते थे । वे आधे होश में । और आधे बेहोश से थे ।

- मुझे खोल साले भङुये ! फ़ूला अचानक मचलते हुये बोली । और मुझे भी..सुषमा कसमसाकर बोली ।

प्रसून तेजी से खुद उनके पास गया । और फ़ुसफ़ुसाकर बोला - शर्म नहीं आती कामारिका तुझे । इतने लोगों के सामने नंगी हो गयी । फ़िर वह प्रत्यक्ष में ऊँचे स्वर में बोला - ठीक है । खोल देता हूँ । पर एक शर्त है । तुम लोग कोई बदतमीजी वाला काम नहीं करोगी । ये सब गाँव वाले । उसने चारों तरफ़ उँगली घुमाकर इशारा किया - बेचारे शरीफ़ आदमी हैं । अतः तुम भी पूरी शराफ़त से पेश आओगी । ऐसा मैंने इनसे वादा किया है ।

उन दोनों ने बङी सीधाई से समर्थन में सिर हिलाया । तब प्रसून ने उन्हें खोल दिया । और गाँव वालों को अर्ध बेहोशी से मुक्त कर दिया । ताकि वे आगे की स्थिति भली भांति जान सके । सभी गाँव वाले मानों एकदम नींद से जागे । और चैतन्य होकर देखने लगे ।

- जल्दी करना सालिया । फ़ूला होठ काटकर दबे स्वर में बोली - मुझे तेज खुजली होती है । फ़िर मुझसे बर्दाश्त नहीं होता ।

उसकी बात पर कोई ध्यान न देकर प्रसून अपना काम करने लगा । उसने मानसिक रूप से मरुदण्डिका से सम्पर्क किया । और होठों में ही बोला - ध्यान रहे रूपिका । प्रेत किसी निर्दोष को प्रभावित न करें ।

जबाब उसके इच्छानुसार ही मिला । फ़िर वह मन्त्र पढता हुआ फ़ूलों की पंखरिया उछालने लगा । भीङ में खङी औरतें लहरा लहरा कर एक एक करके झूमती हुयी गद्दी के पास गिरने लगीं । जबकि फ़ूला और सुषमा शान्त बैठी थी । माफ़ी माफ़ी कहती हुयी वे औरतें गद्दी के आगे सिर झुकाती थी । और फ़िर कुछ ठीक सी हालत में चली जाती थी । मुश्किल से पन्द्रह औरतें आयीं । इसका मतलब था । यही लोग रत्ना की घटना में किसी न किसी प्रकार से साझीदार थे । या फ़िर राजदार तो थे ही । मगर सब कुछ जानते हुये भी चुप थे । जैसे ही औरतों के साथ यह क्रिया हुयी । उनसे संबन्धित सामान्य स्वभाव के पुरुष भी किसी अपराध बोध से स्वतः प्रेरित खुद भी माफ़ी माफ़ी करते हुये सिर झुका गये । इस तरह इंसाफ़ के इस मुकद्दमें में मामूली और दया के पात्र मुजरिम उसी वक्त रिहा हो गये ।

और अब मुख्य अभियुक्तों की वारी थी । मुख्य अभियुक्त । जो बङी हैरानी की बात थी कि वहाँ नहीं थे ।

उसने फ़िर से पंखुरियाँ उछाली । और जमीन पर प्रतीकात्मक अभिमन्त्रित हथेली मारी ।

कुछ ही क्षणों में उसे भीङ के पीछे शोर सा नजर आया । फ़िर सुरेश के घर की औरतें लङकियाँ भागती हुयी उधर आयी । और भीङ को चीरती हुयी गद्दी के पास खङी हो गयी । तभी अब तक शान्त बैठी तन्दुरस्त फ़ूला और सुषमा हय्याऽऽ हय्याऽऽ चिल्लाती हुयी खङी हो गयी । और उन औरतों और लङकियों को गिरा गिराकर मारने लगी । उन्होंने बेदर्दी से उनके कपङे फ़ाङ डाले । कुछ हौसला मन्द उनका हस्तक्षेप करने आगे बङे । पर फ़िर किसी अज्ञात प्रेरणा से बँधे हुये से कसमसा कर खङे रह गये ।

शायद ही उस गाँव में ऐसा नंगा नाच कभी हुआ हो । बिलकुल द्रौपदी चीरहरण जैसा दृश्य था । और सभी महाबली नपुंसक की भांति असहाय से खङे थे । और अपने ही घर की औरतों की बेइज्जती का खुद तमाशा देखने को विवश थे । प्रसून की निगाह रत्ना पर गयी । वह मानों बारबार अपने आँसू पोंछ रही थी । आँसू जो प्रेतों को कभी नहीं आते ।

आखिरकार कोई बारह बजे समझौते की बात शुरू हो ही गयी । माध्यम अभी भी वे ही दोनों थी ।

- क्या समझौता करायेगा तू । फ़ूला भङक कर बोली - ये साले इंसान कहाँ है । जो कोई समझौता करेंगे । ये साले हिजङे हैं हिजङे । एक अवला पर मर्दानगी दिखाने वाले हिजङे । किसी गरीब सीधे साधे इंसान का घरबार उजाङ देने वाले नपुंसक । नामर्द साले । और बाबे । तू भी फ़ूट ले । यहाँ से । साले । कोई समझौता नहीं होगा । सबको वहाँ...। उसने शालिमपुर के शमशान की तरफ़ उँगली उठाई । और दाँत पीसकर बोली - वहाँ पहुँचाकर ही छोङूँगी । कुत्तो तुम्हारे आँगन में अब बच्चे नहीं । मौत खेलेगी । सिर्फ़ मौत ।

तमाम भीङ में भय की सिहरन दौङ गयी । उनके रोम का एक एक बाल खङा हो गया । औरतें और लङकियाँ तो फ़ूट फ़ूटकर रोने लगी । यह फ़रमान सुनकर भीङ में चिल्ली सी मच गयी ।

- समझने की कोशिश करो । वह मिन्नतें सी करता हुआ बोला - इंसान गलतियों का पुतला होता है । अगर उसमें गलती ना हो । तो वह देवता ना हो जाये । फ़िर वह फ़ुसफ़ुसाकर बहुत धीमे से बोला - अभी लात पङी ना । तो सब फ़िल्मी डायलाग भूल जायेगी । मुझसे भी मजा ले रही है । कम से कम मुझसे तो तमीज से बोल ।

- ये कोई ऐसी गलती नहीं । वह फ़िर से चिल्लाई - जो माफ़ की जाये महात्मा । बुला उन साले कुत्तों को । जो कार में छुपे बैठे है । भैण के..।

प्रसून ने जोर से आवाज लगाई । तो वे आ गये । फ़ूला और सुषमा को उन्हें देखकर एकदम बिजली सी चमकी । और वे उस पर झपट पङी । उस अदम्य अदभुत शक्ति के आगे प्रसून के बचाते बचाते भी दोनों ने उनको धुन ही दिया । और फ़िर कामारिका और कपालिनी पूरी मस्ती में आ गयी । प्रसून के रोकते रोकते उन्होंने चर्रऽऽ से ब्लाउज फ़ाङ दिया । और मानों घुटन से आजाद होकर मुक्ति महसूस की । महावीर और इतवारी की शर्म से गरदन झुक गयी ।

- क्यों । वह व्यंग्य से बोली - जब दूसरों की औरत को नंगा करते हो । तब शर्म नहीं आती । जब उसको बेआबरू करते हो । तब तुम्हारी शर्म कहाँ जाती है । देखो आज तुम्हारे घर की इज्जत भरे बाजार बेइज्जत हो रही है । अब दो मूँछो पर ताव । सालों हिजङों । थू । थू है तुम पर ।
 
ये सब छोङ । उसने मानों फ़रियाद की - समझौते की बात बोल ।

- मैंने कहा ना । वह जिद भरे स्वर में बोली - कोई समझौता नहीं हो सकता । इन कुत्तों को मरना ही होगा । जैसे को तैसा । ये प्रभु का बनाया नियम है ।

- उसी प्रभु ने । प्रसून झूठी हताशा का प्रदर्शन करता हुआ बोला - दया का भी नियम बनाया है । माफ़ी का भी नियम बनाया है । इंसान को सुधारने हेतु बहुत गुंजाइश है । उसके कानून में ।

- तो सुन बाबा । वह आदतानुसार छिपाकर फ़िर भी प्रसून को आँख मारने से नहीं चूकी । और फ़िर साधारण उच्च स्वर में बोली - इस गाँव में इस दैवीय तवाही का कारण है । नरसी और उसके परिवार पर हुआ बेइंतिहा जुल्म । जिसको इसमें बैठे से बहुत से नामर्द जानते भी हैं । बहुत सी औरतें भी जानती हैं । पर वे चुप हैं । बोलो बोलो । अब क्यों चुप हैं । अतः उसकी कब्जायी जमीन पर गाँव वालों के पैसे से एक शानदार मन्दिर बनबाया जाय । उसमें एक तरफ़ नरसी उसकी बीबी और बच्चों की यादगार मूर्तियाँ लगवायीं जाय । ताकि किसी निर्दोष पर हुये हैवानी जुल्म । और उसके बाद ईश्वर के बेआवाज लाठी की मार से फ़ैला ये दैवीय प्रकोप इस गाँव के इतिहास में सदा के लिये लिख जाय । और कोई जालिम किसी पर जुल्म करने से पहले सौ बार सोचे । हजार बार सोचे ।

और ये दोनों परिवार । उसने इतवारी और महावीर की तरफ़ इशारा किया - इस दैवीय प्रकोप और वायु प्रकोप से मुक्ति हेतु किसी वैष्णों देवी जैसे मन्दिर के लिये आज के आज यहीं से निकल जाय । तब कुछ शान्ति संभव है । वरना..। वह बेहद खतरनाक स्वर में बोली - वरना इस गाँव के घरों में चूल्हे नहीं । चितायें जलेगी । चितायें ।

- प्रसून जी ! तभी उसे रूपिका का संदेश सुनाई दिया - कृपया जल्दी खत्म करें इसे । समय ऊपर हो रहा है । चुङैलों का तो ऐसी मस्ती करने का स्वभाव होता है । पर आपको क्यों मजा आ रहा है । मैं समझ नहीं पा रही । कृपया समय पर ध्यान दें । समय अपनी कार्यवाही हेतु तैयार है ।

वास्तव में वह सही कह रही थी । जाने क्यों उसे लग रहा था । ये रात आठ घण्टे के बजाय आठ सौ घण्टे की होती । और वह इन दुष्टों को भरपूर त्रासित करता । जाने क्यों उसके अन्दर एक वक्ती तौर पर राक्षस सा पैदा हो गया था । जो खुलकर अट्टाहास करना चाहता था । खुलकर उन सबको बताना चाहता था । उसके न्याय में तिनका भर रियायत नहीं है । बेबकूफ़ इंसान । उसका कानून है - आँख का बदला आँख । हाथ का बदला हाथ । बेइज्जती का बदला बेइज्जती । और जान का बदला जान । जान ।

उसने इतवारी और महावीर को देखा । और मानों इशारे से पूछा । समझौते की शर्त मंजूर है । या नहीं । पर उनकी हालत तो पैना छुरा लिये कसाई के सामने खङे उस बकरे की तरह थी । जो पूछ रहा था - भाई ! तुझे झटके से हलाल कर दूँ । या धीरे धीरे रेतकर । और बकरा कह रहा था - जैसे मर्जी कर । अब हलाल तो होना ही है ।

सभी गाँव वाले खुश थे । गाँव पर पिछले दो दिन से छाई तबाही उस लङके जैसे महात्मा की कृपा से टल चुकी थी । सभा समाप्त हो गयी थी । इंसाफ़ की अदालत उठ चुकी थी । फ़ैसला सुनाया जा चुका था ।

महावीर और इतवारी सोच रहे थे कि दो चार दिन बाद वैष्णों देवी आदि जायें । उन्होंने प्रसून से इस बात का मशविरा किया । तो उसने बेहद लापरवाही से कहा । जो आपकी मर्जी । जो आपको ठीक लगे । पर तभी और लोगों ने याद दिलाया कि देवियों ने सीधा यही के बाद जाने को कहा था । अतः फ़ालतू में उनको नाराज करना ठीक नहीं । जो फ़िर से कोई नई तवाही आये । इसलिये सूमो से आज का आज ही अभी निकल जाओ । मौत के भय से भयभीत उन दोनों को भी यही उचित लगा ।

और उसी सूमो में महावीर और इतवारी का परिवार उसी समय मामूली तैयारी के साथ अपनी नयी यात्रा हेतु चल पङा । वे सब कोई दस लोग हुये थे ।

तब प्रसून ने मानों फ़ुरसत में रत्ना की तरफ़ देखा । वह चलता हुआ अपनी कार के पास आया । तो रत्ना ने इशारे से अपने घर जाने हेतु पूछा । जिसे इशारे से ही प्रसून ने मना कर दिया । और वहीं का वहीं बैठे रहने को कहा । जब तक वह न कहे । वह शान्त हो गयी ।

सूमो थोङी दूर निकल चुकी थी । तब प्रसून ने गाङी स्टार्ट की । और एक निश्चित फ़ासले के साथ सूमो के पीछे लगा दी । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और बङे सकून के साथ स्टेयरिंग पर हाथ घुमाने लगा । कुछ ही देर में दोनों गाङियाँ बाईपास रोड पर आ गयी । इस सङक पर वाहनों का आना जाना 24 घण्टे ही रहता था । वह बङी बेसबरी से किसी खास बात का इंतजार कर रहा था ।

और तब उसे महावीर की गाङी के ठीक आगे ऊँचाई पर रूपिका नजर आयी । वह अपने आरीजनल रूप में थी । उसके हाथ में हड्डी का बना एक मुगदर सा हथियार था । वह पूर्णतः नग्न थी । और स्याह काली थी । उसकी आँखे बहुत छोटे लाल बल्ब के समान चमक रही थी ।

और तब अचानक ही महावीर की आँखों के सामने एक रील सी चलने लगी । जिन्दगी के बाद चलने वाली । मौत की रील । और मौत से ठीक पहले चलने वाली रील । उसे सफ़ेद साङी पहने लम्बे खुले लहराते बालों वाली रत्ना दिखाई दी । जो बाहें फ़ैलाकर उसको बुला रही थी । उसे उसके दो नन्हें बच्चे दिखाई दिये । जो उसको उँगली के इशारे से बुला रहे थे । उसे नरसी भी दिखाई दिया । वह भी उसे बुला रहा था । उसके जीवन में जो जो हत्यायें उसके सामने या उसके द्वारा हुयी थी । वे सभी जीवित हो उठे । और अपने पास बुलाने लगे ।

फ़िर उसे अपना मृत शरीर दिखाई दिया । जिस पर तमाम चील कौवे मँडरा रहे थे । और तमाम उसको नोच नोच कर खा रहे थे । तब आगे उसने अपने आपको एक चिलचिलाती धूप में एक विशाल बंजर मैदान में खङे अकेले को देखा । फ़िर उसे वे सब जीव जन्तु नजर आये । जिसका उसने कभी आहार किया था । तमाम अण्डे उसके सर पर बारबार गिर गिर कर फ़ूट रहे थे । उसके द्वारा खाये चूजे मुर्गे तीतर उसके घायल शरीर में बारबार चोंच मार रहे थे । वह बुरी तरह पीङा से तङप रहा था । केकङे झींगे मछलियाँ आदि जो कभी उसका आहार बने थे । वे उसका माँस नोच रहे थे । उसके द्वारा खाये बकरे अपने पैने सींगों से उसको बारबार घायल करके फ़िर से सींग घुसा देते थे । इन सबके बीच वह अकेला असहाय पीङा से चीख रहा था । और बारबार भगवान से दुहाई कर रहा था । फ़िर कभी ऐसा पाप न करने की कसम खा रहा था । गिङगिङा रहा था । माफ़ी देने की गुहार लगा रहा था । पर उसकी सुनने वाला कोई नहीं था ।

फ़िर उसे काले भयंकर यमदूत दिखाई दिये । जिनके हाथ में पैने काटेदार हथियार थे । वे उसको निर्दयता से मारते हुये नरक की तरफ़ ले जा रहे थे । और एक लम्बी यातना के बाद उसको विशाल भयानक अग्निकुण्ड के नरक में झोंक दिया गया । जहाँ तमाम अन्य जीवात्मायें हा हाय हा करते हुये तङप रही थी । बिलबिला रहे थे । रहम रहम की पुकार कर रहे थे । पर उस पुकार को सुनने वाला कोई नहीं था ।

- देख लिया । तब अचानक उसे गाङी के शीशे में से आसमान में खङी रूपिका साफ़ साफ़ खुली आँखों से दिखाई दी । और सुनाई भी दी - यही तेरे साथ होना है पापी । ये प्रभु की अदालत है । यह उन सर्वशक्तिमान प्रभु की एक सटीक और स्वचालित न्याय व्यवस्था है । देख गौर से । वह फ़िर चिल्लाई - क्या यहाँ कोई न्यायाधीश है । तुझे नजर आया क्या ? सिर्फ़ तू है । और तेरे कर्मफ़ल हैं । यहाँ तू ही वादी है । तू ही प्रतिवादी है । तू ही खुद गवाह है । तू ही खुद सबूत है । तू ही मुकद्दमा भी है । तू ही खुद अदालत भी है । तू ही फ़ैसला है । और न्यायाधीश भी तू ही है ।

अतः हे आत्मा ! मैं तुझसे फ़रियाद करती हूँ । तू अब अपना न्याय खुद कर । क्योंकि सृष्टि रचना करते समय ये कानून तेरा खुद का बनाया हुआ था । जिसे तू खुद की बनायी माया में फ़ँसकर भूल गया । भूल गया तू । इसलिये न्याय कर । और सही इंसाफ़ कर । सच्चा इंसाफ़ । वही इंसाफ़ । जिसके सख्त कानून से ये पूरी सत्ता एक तिनका भी हिले बिना स्वचालित चल रही है । इसलिये सच्चा इंसाफ़ कर । क्योंकि अब तेरे फ़ैसले का वक्त आ गया है ।

किसी भी जीवन का ये अंतिम अटल सत्य साक्षात देखकर महावीर की आँखों से आँसुओं की मोटी मोटी धारायें बह रही थी । उसका पूरा चेहरा अपने ही आँसुओं से तरबतर था । पर वह मानों अपने होश में नहीं था । स्टेयरिंग पर उसके हाथ आटोमैटिक ही चल रहे थे । वास्तविकता यही थी । वह गाङी बहुत देर से नहीं चला रहा था । बल्कि वह यन्त्र की भांति आटोमैटिक ही चल रही थी । गाङी में बैठे अन्य लोग दीन दुनियाँ से बेपरवाह नींद की झपकियाँ सी ले रहे थे ।

और तब अचानक उसके हाथ स्टेयरिंग पर कस गये । उसने एक निगाह गाङी के लोगों पर डाली । और दृण स्वर में बोला - हाँ.. । हाँ.. मैं अपने सभी अपराध कबूल करता हूँ । और चाहता हूँ कि मुझ पर कोई दया न की जाय । कोई रहम न हो । हे मालिक । तू सर्वशक्तिमान है । और न्यायप्रिय है ।

सहसा प्रसून ने गाङी रोक दी । वे काफ़ी दूर आ चुके थे । अब दोनों गाङियाँ बिना फ़ाटक की क्रासिंग लाइन को काटती सङक पर चल रही थीं । उसने गेट खो्ला । और बाहर निकल आया । कुछ ही दूरी पर रेलवे लाइन पर एक्सप्रेस गाङी धङधङाती हुयी तेज रफ़्तार से आ रही थी । एक्सप्रेस और सूमो में मानों उस क्रासिंग प्वाइंट को - पहले मैं..स्टायल में पार करने की शर्त लगी थी ।

फ़िर एक भीषण विस्फ़ोट हुआ । और सूमो के परखच्चे उङ गये । प्रसून ने पहली बार खुलकर राक्षसी अट्टाहास किया । और करता ही चला गया । रूपिका ने उसे डन का अँगूठा दिखाया । और आसमान में ही लुप्त हो गयी । प्रसून ने मुढकर रत्ना की तरफ़ देखा । तो उसने बेहद नफ़रत से मुँह फ़ेर लिया । उसके चेहरे पर प्रसून के लिये अपार नफ़रत थी । उसने महा राक्षस को देवता समझने की भूल की थी ।

प्रसून ने उसकी हालत को समझते हुये भी । उसकी नफ़रत को जानते हुये भी मन ही मन इस देवी को प्रणाम किया । और गाङी वापस कामाक्षा की ओर मोङ दी ।
 
फ़िर उसी दिन । लगभग उसी समय । रात के दस बजे ।

जब महावीर प्रसून से पहली बार मिला था । और सुरेश की चिता जल रही थी । शालिमपुर के शमशान में आज दस चितायें एक साथ जल रही थी ।

आज की सुबह शालिमपुर में हाहाकार मचाती हुयी आयी थी । शहर से 40 किमी दूर हुयी नालन्दा एक्सप्रेस और सूमो की भीषण टक्कर की खबर आग की तरह पूरे शहर में फ़ैल गयी थी । हर न्यूज चैनल पर ये खबर प्रमुखता से प्रसारित हो रही थी । पर प्रसून लापरवाह सा घोङे बेचकर सो रहा था ।

वह रत्ना को छोङने जब शालिमपुर के शमशान तक गया था । तव पौ फ़टने ही वाली थी । रत्ना उसकी तरफ़ देख भी नहीं रही थी । उसके दिल में प्रसून के लिये सिर्फ़ घोर नफ़रत ही थी । घोर नफ़रत । वह चुपचाप बिना उसकी तरफ़ देखे खोह में चली गयी । उसने भी उससे बातचीत करने की कोई कोशिश नहीं की । और वापस कामाक्षा लौट आया । रत्ना की तरह उसके मन में भी कुछ सवाल थे ।

दोपहर के बारह बजे वह उठा । और गाङी लेकर महुआ बगीची पार करके रूपिका के पास पहुँचा । वह खुशी और दुख दोनों एक साथ महसूस कर रहा था ।

- मुझे । वह परेशान सा बोला - यह फ़ैसला कुछ समझ नहीं आया । ये कैसा अजीव इंसाफ़ था । सूमो में बैठे मारे गये अन्य आठ लोगों की किस बात की सजा मिली ? जो उन्हें अकाल मौत मार दिया गया ।

- प्रसून जी ! रूपिका गम्भीरता से बोली - ये अकाल मौत नहीं थी । बल्कि सबकी काल मौत थी । काल उन ग्रामवासियों पर ही नहीं पूरे गाँव पर मंडरा रहा था । यूँ समझो । बाकी सब बहुत सस्ते में छूट गये । माफ़ी पा गये । और आप अफ़सोस मना रहे हो ।

- स्पष्ट बोलो । वह झुँझलाकर बोला - महावीर और इतवारी के परिवार को किस बात का दण्ड मिला । क्या सिर्फ़ इस बात का कि वे उसके परिवार के थे ?

- नहीं । वह दृणता से बोली - कभी किसी को । किसी बात का । दण्ड इसलिये नहीं मिलता कि वह किसी से जुङा है । या उसका परिचित है । या उसके साथ है । सबको अपने अपने कर्मा गति से ही विधान अनुसार दण्ड मिलता है । और विधि के संयोग से ऐसा समय आने पर सब इकठ्ठे हो जाते हैं । और स्वतः ही मृत्यु पथ पर चल देते हैं । और कभी ये भृम भी मत पालो कि ये सब आपने किया है । या मैंने किया है । हम सब बस निमित्त हैं । कठपुतलियाँ हैं । जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ है । वह जैसा चाहता है । नचाता है ।

और प्रसून जी ! मुझे भी कभी कभी हैरत होती है । ये सब कुछ एक बङे ही स्वचालित ढंग से स्वयं ही क्रियान्वित हो रहा है । न कोई मर रहा है । न कोई किसी को मार रहा है । ये सब कुछ स्वयँ ही हो रहा है । तुम ज्ञानी पुरुष हो । फ़िर अज्ञान युक्त वाक्य क्यों बोलते हो । जब वही परमात्मा सब में एक ही है । तो ये सब उसका खेल ही है ।

देखो । वह फ़िर से बोली - इंसान का जीवन एक कच्चे घङे के समान है । जिसमें आयु रूपी जल भरा हुआ है । विभिन्न पाप कर्मों से इस घङे में छेद हो जाता है । तब आयु रूपी जल बूँद बूँद करता हुआ तेजी से कम होने लगता है । और घङा खाली हो जाने पर जीव मृत्यु को प्राप्त होता है । अब ये सब किसने किया । खुद उसी इंसान ने ना ।

देखो । उसने सामने जमीन पर उगे पेङों की ओर इशारा किया - यहाँ अच्छे फ़ूलदार फ़लदार पौधे भी हैं । और तन

को छेद देने वाले । पीङा देने वाले । कांटेदार वृक्ष भी हैं । एक सुख देता है । दूसरा दुख देता है । ये सब अपने कर्मों अनुसार । कोई किसी के पास । कोई किसी के पास । उगने रहने को विवश हैं । फ़िर यहाँ एक तवाही होती हैं । और तव कुछ अच्छे । कुछ बुरे । पेङ पौधे नष्ट हो जाते हैं । और भयंकर तवाही के बाद भी । कुछ आश्चर्यजनक रूप से बच जाते हैं । अब बोलो । तवाही समान रूप से इस क्षेत्र में हुयी । फ़िर अंजाम अलग अलग क्यों हुआ ? सोचो । गहराई से सोचो ।

प्रसून ने पूर्ण सहमति में सिर हिलाया । उसे कुछ समय पूर्व हुयी सुनामी की तवाही याद आयी । जिसमें शहर के शहर । देश के देश । बिलकुल मिट ही गये थे । जबकि दूध पीते अनेकों मासूम बच्चे किसी चमत्कार की तरह सकुशल बचे थे । न सिर्फ़ बचे थे । उन्हें मामूली खरोंच भी नहीं आयी थी ।

उसे यकायक तमाम वे घटनायें याद आयीं । जिनमें 70 मंजिला तक से निर्दयता से फ़ेंके गये दूध पीते बच्चे किसी पेङ आदि की शाखा में उलझकर सकुशल बचे थे । बिना कोई मामूली रगङा खाये भी ।

- इसलिये । रूपिका फ़िर से बोली - ये कभी मत समझो । जो आज घट रहा है । वो आज की वजह से है । या पिछले कुछ दिनों के कर्मों का परिणाम है । या सिर्फ़ इस जीवन के कर्मों की ही वजह से है । वास्तव में ये सिलसिला लाखों जन्मों में कभी पूर्व में किये कर्मों का परिणाम है । जो आज वृक्ष बनकर फ़ल फ़ूल रहा है । ये सभी कर्मफ़ल संयोग जब एक जगह इकठ्ठा हो जाते हैं । तब शालिमपुर जैसी घटना घटती है । मैं बस इतना ही जानती हूँ । और जो मुझे पता था । वो मैंने तुम्हें बताया ।

- दाता ! उसके मुँह से कराह निकली - तेरा अन्त न जाणा कोय ।

- खैर ! वह फ़िर से जान बूझ कर बोला - अब रत्ना और उसके बच्चों के बारे में बोलो । उनका क्या होगा ।

नरसी का क्या होगा ? सुरेश की क्या गति हुयी होगी ? और इन दसों की क्या गति होगी ।

- हाँ । वह भावहीन शून्यता से बोली - सुरेश तो पहले ही नरक में गया । महावीर और इतवारी भी मेरी जानकारी के अनुसार भयानक नरक में जायेंगें । अन्य आठ लोग भी कुछ समय के लिये अपने कर्म अनुसार थोङे समय हेतु साधारण अन्य नरकों में जायेंगे । फ़िर भगवान जाने । उनका क्या होगा । मुझे यही तक की गति मालूम रहती है । क्योंकि ये मेरे कार्यक्षेत्र में आता है ।

और रत्ना और उसके परिवार की आप चिन्ता मत करो । नरसी पहले ही सुरेश की पत्नी के गर्भ में जा चुका है । रत्ना भी उसी के खानदान में जन्म लेगी । और उसके बच्चे भी । इन सभी की आयु अभी शेष है । रत्ना दोबारा से संस्कार शेष होने से नये जन्म में फ़िर से नरसी की पत्नी होगी । उसके बच्चे भी किसी न किसी रूप में उनके सम्बन्धी होंगे । बस खास बात ये होगी कि जिस बीस बीघा जमीन के लिये सुरेश ने उसे मार दिया था । वह तो उसकी होगी ही । और भी उसकी तमाम जमीन का वह मालिक होगा । सुरेश की पत्नी अपने पुत्र और पुत्रवधू को बहुत प्यार करने वाली होगी । और इस सबकी व्यवस्था । मतलब उन तीनों के पुनर्जन्म की व्यवस्था अगले तीन महीनों तक हो जायेगी । और क्योंकि वे जीवात्मायें पुनर्जन्म के लिये विशेष श्रेणी में आ गयीं । इसलिये प्रेत प्रेतनियाँ उनको तब तक मेरे आदेश से कभी तंग नहीं करेंगे ।

कहकर वह चुप हो गयी । प्रसून ने सतुष्टि की एक गहरी सांस भरी ।
 

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