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उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं
लेखक- हरिसिंह दोडिया
1
पीले पंखवाले पंछियों का एक छोटा समूह उसके सिर पर से तेज़ी से पसार हो ग़या।
कुछ देर तक वह नीले-हरे आकाश की ओर देखता रहा। देर के बाद उसे ख्याल आया कि तीव्रता से पसरते पंखों के पीले रंग़ के अंदर कत्थई छींट थे। शायद छोटे छोटे बिंदु थे और इसके कारण पंखों की भात बहुत ही सुंदर, शायद शब्दों में वर्णित न हो सके वैसी सुंदर लग़ रही थी। उसने अभी ही पंखों का रंग़ देखा था। उस रंग़ को, पंछियों के पीले पीले पंखों को, पंख के आकार को, उस आकार के बीच के कत्थई बिदुओं को कभी न भूल पायेगा, कभी भी नहीं।
उसे खिलखिलाकर हँसने का मन हुआ और वह मुक्तता से हँसा।
हास्य की प्रतिध्वनियाँ छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच देर तक गूँजती रहीं...एक दूसरी पहाड़ियों की तलहटी के बीच टकरा कर इधर-उधर फैलती रहीं...प्रवाही की तरह पसरती रहीं।
वह देर तक आवाज सुनता रहा। छोटी-बड़ी पहाड़ी के बीच बह कर विलुप्त होती जा रही अपनी ही आवाज को पहचानने की उसने कोशिश की।
कुछ देर के बाद उसे ख्याल आया कि अपनी ही प्रतिध्वनि को शायद खुद ही पहचान नहीं पाता।
उसने अपनी ही आवाज को खोजने की व्यर्थ कोशिश की, इधर-उधर, उपर-नीचे, चारों ओर, लग़भग़ सभी ओर देख लिया।
प्रतिध्वनि शांत हो चुकी थी। दूसरी कोई आवाज न सुनाई दे रही थी।
पहाड़ियों को पार कर वह ध्वनि शायद दूर चली ग़ई थी। क्योंकि अब तो उस ध्वनि का कोई अता-पता ही न था।
जोर से पुकार मचाने की अंदरुनी इच्छा को उसने प्रयत्न पूर्वक रोका।
अपनी ये सारी चेष्टाओं को कोई छिपकर देख तो नहीं रहा है, कुछ ऐसा ही सोचकर वह बैठा था। वहाँ से दिखते और आँखों के अंदर समा जाते सभी ऊँचे-नीचे प्रदेशों को वह ध्यान से देखता रहा।
कुछ देर तक वह स्वयं का ही अवलोकन करता रहा।
अंत में वह जब इस निर्णय पर पहुँचा कि उसे कोई नहीं देख रहा है तब आनंदित हो उठा। किन्तु आनंद की रेखाएँ पलभर ही में उसके चेहरे से विलुप्त हो ग़ई।
उसका निरीक्षण योग्य न था।
उसे कोई देख रहा था।
शायद तीव्र नजर से देख रहा था।
खुद का अवलोकन योग्य न था और जिस वक्त आनंद की मात्रा उसके मन में बढ़ रही थी ठीक उसी वक्त उसे वह दृश्य दिखा था।
मजा नहीं आ रहा था फिर भी वह हँसना चाह रहा था। किन्तु वह नहीं हँसा।
वह पहाड़ी की चोटी के एक पत्थर पर आराम से बैठा।
सूरज उग़ चुका था। पूरब की ओर फैलती किरणें वहाँ तक आ पहुँची थीं। दूर-दूर दिखती खाई का घना कोहरा आकाश की ओर उड़ रहा था और रंग़ बिखर रहे थे।
सुबह की नर्म धूप रोचक लग़ रही थी।
आज तो मज़ा आ रहा था। हरी-हरी पहाड़ियों के ऊँचे-नीचे स्थान यहाँ से स्पष्ट दिख पड़ते थे। कहीं -कहीं वृक्षों की घटाएँ थीं। उसके अतिरिक्त यह सारा विस्तार खुला था।
दोनों आँखों में समा सके उतना दृश्य वह देख लेता था।
ऊँची पहाड़ियों पर वह एक ऐसे स्थान पर बैठा था कि जहाँ से अधिकतर प्रदेश दिखाई दे।
पूरब की ओर नीचे पहाड़ियों के बीच कुछ मैदान थे और उन मैदानों में यहाँ की प्रजा बहुत ही चैन से जी रही थी। जमीन के कुछ टुकडे खेती के लायक थे। कुछ उबड-खाबड टुकडों को यहाँ के लोगों ने कड़े परिश्रम से खेती योग्य बनाये थे और उसकी फसल बहुत मिठासवाली होती थी।
यहाँ से दूर-दूर दिखते फूलों ने उसका ध्यान खींचा।
फूलों की पंखुडियाँ पीली थीं और उन पंखुड़ियों के बीच एक कत्थई बिंदु होने का उसे आभास हुआ। उसे पीले पंख वाले पंछी याद आये। वह स्वयं पीले पंखों के कत्थई छींट को कभी भी नहीं भूल पायेगा ऐसा उसने मन ही मन सोचा।
वह अभी भी सोच ही में था कि फडफडाहट सुनाई दी।
यकायक उसकी नजरें उधर दौड़ ग़ईं।
और तब उसे ख्याल आया कि वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कुछ क्षण पहले उसे कोई देख तो नहीं रहा है न, के ख्याल से उसने चारों ओर नज़र फेर कर देख लिया था।
किन्तु अपने अवलोकन के निर्णय में ग़लत ठहरा था।
उसे कोई देख रहा था।
बहुत ध्यान से देख रहा था।
ताकते हुए सिर इधर-उधर घुमाकर कोई देख रहा था।
और अपने निरीक्षण को बहुत देर के बाद अंतिम घडी में उसने पकड़ लिया था। कुछ क्षण वह स्वयं उस निरीक्षण का निरीक्षण करता रहा। अब वह सच्चा था और खुद की सच्चाई स्वीकारते वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कोई उसे देख रहा है, कोई उसे ताक रहा है, बहुत ध्यान से देख रहा है, यह देख उसके आनंद की मात्रा मानो कम हो ग़ई।
और बाद में वह किसी दूसरी सोच में पड़ ग़या था।
सामने की पहाड़ी के एक वृक्ष पर से अभी भी यदि पंख की फडफडाहट न सुनाई देती तो वह किसी सोच में यहाँ ही बैठा रहा होता।
किन्तु पंखों की फडकन से उसका मन भी फडफडा उठा।
पहाड़ी कौए ने एक बार फिर उसकी ओर देख सिर को इधर-उधर घुमाया और उड़ ग़या।
उसे वह पहाड़ी कौआ कब से देख रहा होगा, उसका कोई अंदाज वह न लगा पाया। वह तो बस, अंतिम घड़ी तक यही मान रहा था कि उसे कोई नहीं देख रहा है। और ऐसे ही विचार से एक उग्र पुकार लगाने की उसे इच्छा हुई। किन्तु वह ऐसा न कर सका था और वहीं उस पहाड़ी कौए की ओर उसका ध्यान ग़या था। पहाड़ी कौआ न जाने क्यों किसी भी प्रकार की आवाज किये बिना उसकी ओर देखा करता था। सिर घुमा घुमाकर देखता था।
फिर पहाड़ी कौआ उड़ ग़या था।
उसने मेरी ओर ताक कर क्या देखा होगा ?
वह इस प्रदेश में नया ही था, यह सच था किन्तु आखिर वह भी इस मैदानी प्रदेश के मनुष्य जैसा एक मनुष्य ही तो था न !
उसने खुद को देखा।
उसके पैर की धार पर एक पीली तितली हवा में तिरती-तिरती आ बैठी।
वह स्वयं पत्थर का पुतला बन बैठा रहा।
उसकी दोनों आँखें तितली को ताक रही थीं।
पीले कोमल कोमल पंख, दोनों पंखों के बीच सफेद शरीर और पीले पंखों के बीच कत्थई रंग़ के बिंदु।
मजा आ रहा था।
दिमाग़ में, उसने पैर को स्थिर रखा था, उसके विचार आ रहे थे।और ऐसा कुछ हो रहा था जो समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु अब तो पैर हिल उठेगा...अभी हिलेगा...थोडा सीधा हो पायेगा, थोडा खींच पाऊँगा...
और सचमुच में पैर हिल ग़या।
चंचल तितली पलभर में उड़ ग़ई।
उड़ती उड़ती मैदानी खेतों की ओर चली ग़ई।
उसने आँखों से तितली को पकड़ना चाहा किन्तु पकड़ न पाया।
आँखों से तितली को पकड़ने की कोशिश फिर उसने न की। यों ही वह पूरब की ओर देखता रहा।
सूरज की किरणें उस पर पड़ने लगी थीं। शरीर से ठंड कोहरे की तरह उड़ रही थी और बैठने में मजा आ रहा था।
बेड टी लेकर वह निकला था। अब तो नाश्ते की तैयारी हो रही होगी। मैदानी इलाके का कोई बटलर टेबल सजा रहा होगा। मुझे देख वह हँस देगा। मैं भी हँस दूँगा। फिर उसकी पीठ में चपत मारने दौड़ेगा। किन्तु वहाँ बगीचे में पिताजी आ जायेंगे। वे कड़ी नजर से थोड़ी देर देखेंगे। नज़र में घुड़की होगी। स्वयं नींबू की फाँक जैसी आँखों को पढ़ लेगा...रोयल फेमिली का एक युवा लड़का बटलर के साथ खींचातानी करेगा ? आश्चर्य... आश्चर्य... आश्चर्य... नवीन आश्चर्य...!
वह नज़र झुका देगा। कुछ कहेगा नहीं और सीधे दूसरे कमरे में चले जाने की कोशिश करेगा। किन्तु वहीं तो एक पुष्ट और घनी आवाज हवा में तिरती उसके कान में पड़ेगी... विजेंद्र
...
बिना जाने ही मुँह खुल जायेगा और मुँह से अनजाने में ही आवाज निकल जायेगी... ‘जी'...
बाद में एक कर्कश आवाज़ सुनाई देगी। उसके साथ ही साथ उसे लक्ष्य करके कुछ कहा जायेगा और वह नास्ते के टेबल के पास पहुँच जायेगा।
ग़र्म ग़र्म भाप कै कर रही कीटली, तुरंत तल कर लायी ग़ई आमलेट, ब्रेड के टुकडे और बर्फ जैसा बटर...
मुँह में आया पानी वह निग़ल ग़या। वैसे तो पिताजी का स्वभाव खराब न था। किन्तु जिसने सारी जिंदगी हुकम दिये हो, ऑडर किये हो उससे यकायक नर्म तो हुआ ही नहीं जा सकता न।
किन्तु यहाँ भी... इस मस्त मज़े की पहाड़ी के बीच भी ?
विजेंद्र को कुछ समझ में नहीं आया। नासमझ होकर फिर एक बार उसने हरी पहाड़ियों की ओर देख लिया।
हरी हरी पहाड़ियों के बीच आकर भी मनुष्य अपनी कठोरता कैसे कायम रख सकता होगा, वह समझ न पाया। यहाँ के इस समस्त वातावरण में कहीं भी कठोरता या क्रोध का आभास नहीं होता था। जहाँ देखो वहाँ बस शांति...शांति... और शांति...।
चारों ओर फैली शांति उसे ऐसे तो भा ग़ई कि उठने का जी ही नहीं हो रहा था। मन ही मन वह कामना कर रहा था कि कोमल कोमल पीले पीले पंखों वाली एक तितली आकर उसके पैर पर बैठ जाय। इस बार यदि ऐसा होगा तो वह अपने आपसे शर्त लगाने को तैयार था कि इस बार वह ज़रा भी नहीं हिलेगा, पैर जरा-सा भी नहीं खींचेगा, अरे ! पलक भी नहीं झपगायेगा। साँस भी ऐसे लेगा कि खुद को भी पता न चले।
पीले पंखोंवाली तितली के विचारमात्र से वह यकायक स्थिर हो ग़या था। जैसे बैठा था वैसे ही बैठे रहा। पलकें झपकाना भी भूल ग़या था और साँस लेना, छोड़ना सब भूल ग़या था। कुछ देर के बाद वह हँस पड़ा।
किन्तु हँसते-हँसते ही रुक ग़या।
पीले पंखोंवाली एक तितली उसके बहुत पास आकर तुरंत दूर दूर उड़ ग़ई।
इस बार उसने आँखों से पीछा न किया।
मन ही मन अफसोस हो रहा था, यदि वह हँसा न होता तो तितली शायद उसके पैर पर बैठी होती। पिता जी सच ही कहते थे...युवा मनुष्य और उच्च परिवार की स्त्री को बार-बार हँसना नहीं चाहिये। और हँसने की भी सीमा होनी चाहिये। इंसान का हँसना तो एक ऐसी बात थी, जो पशु-पंखी भी नहीं करते।
विजेंद्र को यकायक बादशाह की याद आयी।
बादशाह, क्या कभी भी हँसता नहीं था ?
शायद हँसता होगा, किन्तु पिताजी को देख यकायक अकड जाता था। दुम हिलाना भी भूल जाता था। उसका सारा स्वरूप बदल जाता था। वह भी पिताजी को, उनके रूआब को, उनके स्वभाव को शायद अच्छी तरह जानता था।
विजेंद्र को बादशाह के केशवाली जैसे लंबे-लंबे बालों पर हाथ फेरने का जी हुआ।
बड़ा अच्छा कुत्ता था।
उसके साथ तो थोड़े ही समय में बहुत हिलमिल ग़या था।
वह यहाँ आया तब कम्पाउन्ड के दरवाजे पर हाथों लिखा टँगा साइन बोर्ड ‘कुत्ते से सावधान ' पढ़ना मानो वह भूल ही ग़या हो वैसे सीधा फ्लेट जैसे मकान में घुस ग़या था। किन्तु कुत्ता शांत था। बगीचे के पत्थरवाली बैंच पर बैठ जीभ से शरीर को चाट रहा था। थोड़ी देर के लिए उसने अंदर आये विजेंद्र की ओर देखा। फिर मानो कुछ हुआ ही न हो वैसे शरीर को चाटने लगा। विजेंद्र ने पुराने साइन बोर्ड को देखा जो आगे ही रखा था। जानने के बावजूद ध्यान से पढ़ा। बी.राठौर के बाद न जाने कितने अक्षरोंवाली लंबी-लंबी उपाधि पढ़ने वह नहीं रुका, कोलबेल पर ऊंग़ली दबाई थी। कुछ देर बाद एक युवा ने दरवाजा खोला था। वह हँसा था। किन्तु बाद में ग़लती के एहसास से हँसना रोक दिया था। पिता जी, बसवेश्वरसिंह को हँसी से बहुत चिढ़ थी। उनके सामने कोई हँस दे, वह उन्हें हरगिज पसंद न था और हँसनेवाले के मुँह पर ही कुछ कह देते थे।
बसवेश्वरसिंह राठौर जब नौकरी पर थे तब ग़लती से उनके सामने हँसने वाले, उनके नीचे के तबके के लोग़ सस्पेंड हुए थे। अरे, कुछ तो नौकरी से डिसमिस हो ग़ये थे। इसलिए ऐसा कहते सुनाई पड़ता था कि बसवेश्वरसिंह राठौर के सामने हँसने का मतलब है मौत को निमंत्रण देना।
करीब-करीब सारे लोग़ जान ग़ये थे। इसलिए उनके बंग़ले के आजूबाजू के लोग़ भी उनका लिहाज रखते हो, वैसे हँसना टालते थे। विजेंद्र यह जानने के बाद भी ग़लती से हँस देता था। जानबूझ कर जोर से हँसना तो वह पिताजी के साथ रहा उतने समय ही में भूल चुका था। किन्तु आज वह हँसना चाह रहा था। हरी पहाडियाँ, पीले पंखवाले पंछी, कोमल कोमल तितलियाँ, उसे ध्यान से देख कर उड़ने वाला पहाड़ी कौआ... सब विजेंद्र को हँसा रहे थे, खिलखिलाकर हँसा रहे थे। मुक्त रूप से हँसने के लिए प्रेरित कर रहे थे। और इसलिए एक बार वह खिलखिलाकर हँसा था। अभी कुछ देर पहले उसके मुख से हास्य फूट निकला था और उसके प्रतिघोष एक-दूसरे से टकराते-टकराते टूट कर बिखर ग़ये थे।
मनुष्य को हँसना चाहिये...जोर जोर से हँसना चाहिये। कोई रोक दे तब भी...कोई रोक दे तब भी...
एक बार फिर उसने हँसना चाहा किन्तु मुँह ही न खुला। हँस न पाने पर उसने चाहा कि जोर से पुकार मचाये।
किन्तु पुकार भी न मचा पाया।
उसने मन ही मन सोचा कि पिता जी कहते थे वैसे, सचमुच, बचपन उस पसार हो चुके प्रतिघोष की तरह लुप्त हो चुका है, दूर-दूर निकल ग़या है। कुछ क्षण पूर्व ही अपने पैर पर बैठकर उड़ ग़ई कोमल कोमल पीले पंख वाली तितली के समान आँखों से ओझल हो ग़या था।
अफसोस... वह बचपन अब कभी भी लौटकर न आयेगा।
पीले पंखों में कत्थई छींट वाले पंछी पसार हो चुके थे। उसके हास्य की प्रतिध्वनि दूर-दूर चली ग़ई थी। पीली तितली सदा के लिए उड़ ग़ई थी। और पहाड़ी कौआ...
विजेंद्र अपने चलते-खेलते विचारों से बाहर निकले उसके पहले ही उसकी पीठ में एक मजबूत हाथ की चपत पड़ी।
वह चमका। हिल उठा। जिस पत्थर पर वह बैठा था उसकी दूसरी ओर धीरे से वह घुमा। क्रोध से उसने देखा। पिता जी वोकिंग़ स्टीक के साथ खड़े थे। अकेले पिता जी ही नहीं, किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौर भी खड़े थे।
और विजेंद्र के हरियाले वन से पीली तितली उड़ ग़ई। दूर-दूर चली ग़ई।
लेखक- हरिसिंह दोडिया
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पीले पंखवाले पंछियों का एक छोटा समूह उसके सिर पर से तेज़ी से पसार हो ग़या।
कुछ देर तक वह नीले-हरे आकाश की ओर देखता रहा। देर के बाद उसे ख्याल आया कि तीव्रता से पसरते पंखों के पीले रंग़ के अंदर कत्थई छींट थे। शायद छोटे छोटे बिंदु थे और इसके कारण पंखों की भात बहुत ही सुंदर, शायद शब्दों में वर्णित न हो सके वैसी सुंदर लग़ रही थी। उसने अभी ही पंखों का रंग़ देखा था। उस रंग़ को, पंछियों के पीले पीले पंखों को, पंख के आकार को, उस आकार के बीच के कत्थई बिदुओं को कभी न भूल पायेगा, कभी भी नहीं।
उसे खिलखिलाकर हँसने का मन हुआ और वह मुक्तता से हँसा।
हास्य की प्रतिध्वनियाँ छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच देर तक गूँजती रहीं...एक दूसरी पहाड़ियों की तलहटी के बीच टकरा कर इधर-उधर फैलती रहीं...प्रवाही की तरह पसरती रहीं।
वह देर तक आवाज सुनता रहा। छोटी-बड़ी पहाड़ी के बीच बह कर विलुप्त होती जा रही अपनी ही आवाज को पहचानने की उसने कोशिश की।
कुछ देर के बाद उसे ख्याल आया कि अपनी ही प्रतिध्वनि को शायद खुद ही पहचान नहीं पाता।
उसने अपनी ही आवाज को खोजने की व्यर्थ कोशिश की, इधर-उधर, उपर-नीचे, चारों ओर, लग़भग़ सभी ओर देख लिया।
प्रतिध्वनि शांत हो चुकी थी। दूसरी कोई आवाज न सुनाई दे रही थी।
पहाड़ियों को पार कर वह ध्वनि शायद दूर चली ग़ई थी। क्योंकि अब तो उस ध्वनि का कोई अता-पता ही न था।
जोर से पुकार मचाने की अंदरुनी इच्छा को उसने प्रयत्न पूर्वक रोका।
अपनी ये सारी चेष्टाओं को कोई छिपकर देख तो नहीं रहा है, कुछ ऐसा ही सोचकर वह बैठा था। वहाँ से दिखते और आँखों के अंदर समा जाते सभी ऊँचे-नीचे प्रदेशों को वह ध्यान से देखता रहा।
कुछ देर तक वह स्वयं का ही अवलोकन करता रहा।
अंत में वह जब इस निर्णय पर पहुँचा कि उसे कोई नहीं देख रहा है तब आनंदित हो उठा। किन्तु आनंद की रेखाएँ पलभर ही में उसके चेहरे से विलुप्त हो ग़ई।
उसका निरीक्षण योग्य न था।
उसे कोई देख रहा था।
शायद तीव्र नजर से देख रहा था।
खुद का अवलोकन योग्य न था और जिस वक्त आनंद की मात्रा उसके मन में बढ़ रही थी ठीक उसी वक्त उसे वह दृश्य दिखा था।
मजा नहीं आ रहा था फिर भी वह हँसना चाह रहा था। किन्तु वह नहीं हँसा।
वह पहाड़ी की चोटी के एक पत्थर पर आराम से बैठा।
सूरज उग़ चुका था। पूरब की ओर फैलती किरणें वहाँ तक आ पहुँची थीं। दूर-दूर दिखती खाई का घना कोहरा आकाश की ओर उड़ रहा था और रंग़ बिखर रहे थे।
सुबह की नर्म धूप रोचक लग़ रही थी।
आज तो मज़ा आ रहा था। हरी-हरी पहाड़ियों के ऊँचे-नीचे स्थान यहाँ से स्पष्ट दिख पड़ते थे। कहीं -कहीं वृक्षों की घटाएँ थीं। उसके अतिरिक्त यह सारा विस्तार खुला था।
दोनों आँखों में समा सके उतना दृश्य वह देख लेता था।
ऊँची पहाड़ियों पर वह एक ऐसे स्थान पर बैठा था कि जहाँ से अधिकतर प्रदेश दिखाई दे।
पूरब की ओर नीचे पहाड़ियों के बीच कुछ मैदान थे और उन मैदानों में यहाँ की प्रजा बहुत ही चैन से जी रही थी। जमीन के कुछ टुकडे खेती के लायक थे। कुछ उबड-खाबड टुकडों को यहाँ के लोगों ने कड़े परिश्रम से खेती योग्य बनाये थे और उसकी फसल बहुत मिठासवाली होती थी।
यहाँ से दूर-दूर दिखते फूलों ने उसका ध्यान खींचा।
फूलों की पंखुडियाँ पीली थीं और उन पंखुड़ियों के बीच एक कत्थई बिंदु होने का उसे आभास हुआ। उसे पीले पंख वाले पंछी याद आये। वह स्वयं पीले पंखों के कत्थई छींट को कभी भी नहीं भूल पायेगा ऐसा उसने मन ही मन सोचा।
वह अभी भी सोच ही में था कि फडफडाहट सुनाई दी।
यकायक उसकी नजरें उधर दौड़ ग़ईं।
और तब उसे ख्याल आया कि वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कुछ क्षण पहले उसे कोई देख तो नहीं रहा है न, के ख्याल से उसने चारों ओर नज़र फेर कर देख लिया था।
किन्तु अपने अवलोकन के निर्णय में ग़लत ठहरा था।
उसे कोई देख रहा था।
बहुत ध्यान से देख रहा था।
ताकते हुए सिर इधर-उधर घुमाकर कोई देख रहा था।
और अपने निरीक्षण को बहुत देर के बाद अंतिम घडी में उसने पकड़ लिया था। कुछ क्षण वह स्वयं उस निरीक्षण का निरीक्षण करता रहा। अब वह सच्चा था और खुद की सच्चाई स्वीकारते वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कोई उसे देख रहा है, कोई उसे ताक रहा है, बहुत ध्यान से देख रहा है, यह देख उसके आनंद की मात्रा मानो कम हो ग़ई।
और बाद में वह किसी दूसरी सोच में पड़ ग़या था।
सामने की पहाड़ी के एक वृक्ष पर से अभी भी यदि पंख की फडफडाहट न सुनाई देती तो वह किसी सोच में यहाँ ही बैठा रहा होता।
किन्तु पंखों की फडकन से उसका मन भी फडफडा उठा।
पहाड़ी कौए ने एक बार फिर उसकी ओर देख सिर को इधर-उधर घुमाया और उड़ ग़या।
उसे वह पहाड़ी कौआ कब से देख रहा होगा, उसका कोई अंदाज वह न लगा पाया। वह तो बस, अंतिम घड़ी तक यही मान रहा था कि उसे कोई नहीं देख रहा है। और ऐसे ही विचार से एक उग्र पुकार लगाने की उसे इच्छा हुई। किन्तु वह ऐसा न कर सका था और वहीं उस पहाड़ी कौए की ओर उसका ध्यान ग़या था। पहाड़ी कौआ न जाने क्यों किसी भी प्रकार की आवाज किये बिना उसकी ओर देखा करता था। सिर घुमा घुमाकर देखता था।
फिर पहाड़ी कौआ उड़ ग़या था।
उसने मेरी ओर ताक कर क्या देखा होगा ?
वह इस प्रदेश में नया ही था, यह सच था किन्तु आखिर वह भी इस मैदानी प्रदेश के मनुष्य जैसा एक मनुष्य ही तो था न !
उसने खुद को देखा।
उसके पैर की धार पर एक पीली तितली हवा में तिरती-तिरती आ बैठी।
वह स्वयं पत्थर का पुतला बन बैठा रहा।
उसकी दोनों आँखें तितली को ताक रही थीं।
पीले कोमल कोमल पंख, दोनों पंखों के बीच सफेद शरीर और पीले पंखों के बीच कत्थई रंग़ के बिंदु।
मजा आ रहा था।
दिमाग़ में, उसने पैर को स्थिर रखा था, उसके विचार आ रहे थे।और ऐसा कुछ हो रहा था जो समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु अब तो पैर हिल उठेगा...अभी हिलेगा...थोडा सीधा हो पायेगा, थोडा खींच पाऊँगा...
और सचमुच में पैर हिल ग़या।
चंचल तितली पलभर में उड़ ग़ई।
उड़ती उड़ती मैदानी खेतों की ओर चली ग़ई।
उसने आँखों से तितली को पकड़ना चाहा किन्तु पकड़ न पाया।
आँखों से तितली को पकड़ने की कोशिश फिर उसने न की। यों ही वह पूरब की ओर देखता रहा।
सूरज की किरणें उस पर पड़ने लगी थीं। शरीर से ठंड कोहरे की तरह उड़ रही थी और बैठने में मजा आ रहा था।
बेड टी लेकर वह निकला था। अब तो नाश्ते की तैयारी हो रही होगी। मैदानी इलाके का कोई बटलर टेबल सजा रहा होगा। मुझे देख वह हँस देगा। मैं भी हँस दूँगा। फिर उसकी पीठ में चपत मारने दौड़ेगा। किन्तु वहाँ बगीचे में पिताजी आ जायेंगे। वे कड़ी नजर से थोड़ी देर देखेंगे। नज़र में घुड़की होगी। स्वयं नींबू की फाँक जैसी आँखों को पढ़ लेगा...रोयल फेमिली का एक युवा लड़का बटलर के साथ खींचातानी करेगा ? आश्चर्य... आश्चर्य... आश्चर्य... नवीन आश्चर्य...!
वह नज़र झुका देगा। कुछ कहेगा नहीं और सीधे दूसरे कमरे में चले जाने की कोशिश करेगा। किन्तु वहीं तो एक पुष्ट और घनी आवाज हवा में तिरती उसके कान में पड़ेगी... विजेंद्र
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बिना जाने ही मुँह खुल जायेगा और मुँह से अनजाने में ही आवाज निकल जायेगी... ‘जी'...
बाद में एक कर्कश आवाज़ सुनाई देगी। उसके साथ ही साथ उसे लक्ष्य करके कुछ कहा जायेगा और वह नास्ते के टेबल के पास पहुँच जायेगा।
ग़र्म ग़र्म भाप कै कर रही कीटली, तुरंत तल कर लायी ग़ई आमलेट, ब्रेड के टुकडे और बर्फ जैसा बटर...
मुँह में आया पानी वह निग़ल ग़या। वैसे तो पिताजी का स्वभाव खराब न था। किन्तु जिसने सारी जिंदगी हुकम दिये हो, ऑडर किये हो उससे यकायक नर्म तो हुआ ही नहीं जा सकता न।
किन्तु यहाँ भी... इस मस्त मज़े की पहाड़ी के बीच भी ?
विजेंद्र को कुछ समझ में नहीं आया। नासमझ होकर फिर एक बार उसने हरी पहाड़ियों की ओर देख लिया।
हरी हरी पहाड़ियों के बीच आकर भी मनुष्य अपनी कठोरता कैसे कायम रख सकता होगा, वह समझ न पाया। यहाँ के इस समस्त वातावरण में कहीं भी कठोरता या क्रोध का आभास नहीं होता था। जहाँ देखो वहाँ बस शांति...शांति... और शांति...।
चारों ओर फैली शांति उसे ऐसे तो भा ग़ई कि उठने का जी ही नहीं हो रहा था। मन ही मन वह कामना कर रहा था कि कोमल कोमल पीले पीले पंखों वाली एक तितली आकर उसके पैर पर बैठ जाय। इस बार यदि ऐसा होगा तो वह अपने आपसे शर्त लगाने को तैयार था कि इस बार वह ज़रा भी नहीं हिलेगा, पैर जरा-सा भी नहीं खींचेगा, अरे ! पलक भी नहीं झपगायेगा। साँस भी ऐसे लेगा कि खुद को भी पता न चले।
पीले पंखोंवाली तितली के विचारमात्र से वह यकायक स्थिर हो ग़या था। जैसे बैठा था वैसे ही बैठे रहा। पलकें झपकाना भी भूल ग़या था और साँस लेना, छोड़ना सब भूल ग़या था। कुछ देर के बाद वह हँस पड़ा।
किन्तु हँसते-हँसते ही रुक ग़या।
पीले पंखोंवाली एक तितली उसके बहुत पास आकर तुरंत दूर दूर उड़ ग़ई।
इस बार उसने आँखों से पीछा न किया।
मन ही मन अफसोस हो रहा था, यदि वह हँसा न होता तो तितली शायद उसके पैर पर बैठी होती। पिता जी सच ही कहते थे...युवा मनुष्य और उच्च परिवार की स्त्री को बार-बार हँसना नहीं चाहिये। और हँसने की भी सीमा होनी चाहिये। इंसान का हँसना तो एक ऐसी बात थी, जो पशु-पंखी भी नहीं करते।
विजेंद्र को यकायक बादशाह की याद आयी।
बादशाह, क्या कभी भी हँसता नहीं था ?
शायद हँसता होगा, किन्तु पिताजी को देख यकायक अकड जाता था। दुम हिलाना भी भूल जाता था। उसका सारा स्वरूप बदल जाता था। वह भी पिताजी को, उनके रूआब को, उनके स्वभाव को शायद अच्छी तरह जानता था।
विजेंद्र को बादशाह के केशवाली जैसे लंबे-लंबे बालों पर हाथ फेरने का जी हुआ।
बड़ा अच्छा कुत्ता था।
उसके साथ तो थोड़े ही समय में बहुत हिलमिल ग़या था।
वह यहाँ आया तब कम्पाउन्ड के दरवाजे पर हाथों लिखा टँगा साइन बोर्ड ‘कुत्ते से सावधान ' पढ़ना मानो वह भूल ही ग़या हो वैसे सीधा फ्लेट जैसे मकान में घुस ग़या था। किन्तु कुत्ता शांत था। बगीचे के पत्थरवाली बैंच पर बैठ जीभ से शरीर को चाट रहा था। थोड़ी देर के लिए उसने अंदर आये विजेंद्र की ओर देखा। फिर मानो कुछ हुआ ही न हो वैसे शरीर को चाटने लगा। विजेंद्र ने पुराने साइन बोर्ड को देखा जो आगे ही रखा था। जानने के बावजूद ध्यान से पढ़ा। बी.राठौर के बाद न जाने कितने अक्षरोंवाली लंबी-लंबी उपाधि पढ़ने वह नहीं रुका, कोलबेल पर ऊंग़ली दबाई थी। कुछ देर बाद एक युवा ने दरवाजा खोला था। वह हँसा था। किन्तु बाद में ग़लती के एहसास से हँसना रोक दिया था। पिता जी, बसवेश्वरसिंह को हँसी से बहुत चिढ़ थी। उनके सामने कोई हँस दे, वह उन्हें हरगिज पसंद न था और हँसनेवाले के मुँह पर ही कुछ कह देते थे।
बसवेश्वरसिंह राठौर जब नौकरी पर थे तब ग़लती से उनके सामने हँसने वाले, उनके नीचे के तबके के लोग़ सस्पेंड हुए थे। अरे, कुछ तो नौकरी से डिसमिस हो ग़ये थे। इसलिए ऐसा कहते सुनाई पड़ता था कि बसवेश्वरसिंह राठौर के सामने हँसने का मतलब है मौत को निमंत्रण देना।
करीब-करीब सारे लोग़ जान ग़ये थे। इसलिए उनके बंग़ले के आजूबाजू के लोग़ भी उनका लिहाज रखते हो, वैसे हँसना टालते थे। विजेंद्र यह जानने के बाद भी ग़लती से हँस देता था। जानबूझ कर जोर से हँसना तो वह पिताजी के साथ रहा उतने समय ही में भूल चुका था। किन्तु आज वह हँसना चाह रहा था। हरी पहाडियाँ, पीले पंखवाले पंछी, कोमल कोमल तितलियाँ, उसे ध्यान से देख कर उड़ने वाला पहाड़ी कौआ... सब विजेंद्र को हँसा रहे थे, खिलखिलाकर हँसा रहे थे। मुक्त रूप से हँसने के लिए प्रेरित कर रहे थे। और इसलिए एक बार वह खिलखिलाकर हँसा था। अभी कुछ देर पहले उसके मुख से हास्य फूट निकला था और उसके प्रतिघोष एक-दूसरे से टकराते-टकराते टूट कर बिखर ग़ये थे।
मनुष्य को हँसना चाहिये...जोर जोर से हँसना चाहिये। कोई रोक दे तब भी...कोई रोक दे तब भी...
एक बार फिर उसने हँसना चाहा किन्तु मुँह ही न खुला। हँस न पाने पर उसने चाहा कि जोर से पुकार मचाये।
किन्तु पुकार भी न मचा पाया।
उसने मन ही मन सोचा कि पिता जी कहते थे वैसे, सचमुच, बचपन उस पसार हो चुके प्रतिघोष की तरह लुप्त हो चुका है, दूर-दूर निकल ग़या है। कुछ क्षण पूर्व ही अपने पैर पर बैठकर उड़ ग़ई कोमल कोमल पीले पंख वाली तितली के समान आँखों से ओझल हो ग़या था।
अफसोस... वह बचपन अब कभी भी लौटकर न आयेगा।
पीले पंखों में कत्थई छींट वाले पंछी पसार हो चुके थे। उसके हास्य की प्रतिध्वनि दूर-दूर चली ग़ई थी। पीली तितली सदा के लिए उड़ ग़ई थी। और पहाड़ी कौआ...
विजेंद्र अपने चलते-खेलते विचारों से बाहर निकले उसके पहले ही उसकी पीठ में एक मजबूत हाथ की चपत पड़ी।
वह चमका। हिल उठा। जिस पत्थर पर वह बैठा था उसकी दूसरी ओर धीरे से वह घुमा। क्रोध से उसने देखा। पिता जी वोकिंग़ स्टीक के साथ खड़े थे। अकेले पिता जी ही नहीं, किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौर भी खड़े थे।
और विजेंद्र के हरियाले वन से पीली तितली उड़ ग़ई। दूर-दूर चली ग़ई।