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उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

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उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं

लेखक- हरिसिंह दोडिया

1

पीले पंखवाले पंछियों का एक छोटा समूह उसके सिर पर से तेज़ी से पसार हो ग़या।

कुछ देर तक वह नीले-हरे आकाश की ओर देखता रहा। देर के बाद उसे ख्याल आया कि तीव्रता से पसरते पंखों के पीले रंग़ के अंदर कत्थई छींट थे। शायद छोटे छोटे बिंदु थे और इसके कारण पंखों की भात बहुत ही सुंदर, शायद शब्दों में वर्णित न हो सके वैसी सुंदर लग़ रही थी। उसने अभी ही पंखों का रंग़ देखा था। उस रंग़ को, पंछियों के पीले पीले पंखों को, पंख के आकार को, उस आकार के बीच के कत्थई बिदुओं को कभी न भूल पायेगा, कभी भी नहीं।

उसे खिलखिलाकर हँसने का मन हुआ और वह मुक्तता से हँसा।

हास्य की प्रतिध्वनियाँ छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच देर तक गूँजती रहीं...एक दूसरी पहाड़ियों की तलहटी के बीच टकरा कर इधर-उधर फैलती रहीं...प्रवाही की तरह पसरती रहीं।

वह देर तक आवाज सुनता रहा। छोटी-बड़ी पहाड़ी के बीच बह कर विलुप्त होती जा रही अपनी ही आवाज को पहचानने की उसने कोशिश की।

कुछ देर के बाद उसे ख्याल आया कि अपनी ही प्रतिध्वनि को शायद खुद ही पहचान नहीं पाता।

उसने अपनी ही आवाज को खोजने की व्यर्थ कोशिश की, इधर-उधर, उपर-नीचे, चारों ओर, लग़भग़ सभी ओर देख लिया।

प्रतिध्वनि शांत हो चुकी थी। दूसरी कोई आवाज न सुनाई दे रही थी।

पहाड़ियों को पार कर वह ध्वनि शायद दूर चली ग़ई थी। क्योंकि अब तो उस ध्वनि का कोई अता-पता ही न था।

जोर से पुकार मचाने की अंदरुनी इच्छा को उसने प्रयत्न पूर्वक रोका।

अपनी ये सारी चेष्टाओं को कोई छिपकर देख तो नहीं रहा है, कुछ ऐसा ही सोचकर वह बैठा था। वहाँ से दिखते और आँखों के अंदर समा जाते सभी ऊँचे-नीचे प्रदेशों को वह ध्यान से देखता रहा।

कुछ देर तक वह स्वयं का ही अवलोकन करता रहा।

अंत में वह जब इस निर्णय पर पहुँचा कि उसे कोई नहीं देख रहा है तब आनंदित हो उठा। किन्तु आनंद की रेखाएँ पलभर ही में उसके चेहरे से विलुप्त हो ग़ई।

उसका निरीक्षण योग्य न था।

उसे कोई देख रहा था।

शायद तीव्र नजर से देख रहा था।

खुद का अवलोकन योग्य न था और जिस वक्त आनंद की मात्रा उसके मन में बढ़ रही थी ठीक उसी वक्त उसे वह दृश्य दिखा था।

मजा नहीं आ रहा था फिर भी वह हँसना चाह रहा था। किन्तु वह नहीं हँसा।

वह पहाड़ी की चोटी के एक पत्थर पर आराम से बैठा।

सूरज उग़ चुका था। पूरब की ओर फैलती किरणें वहाँ तक आ पहुँची थीं। दूर-दूर दिखती खाई का घना कोहरा आकाश की ओर उड़ रहा था और रंग़ बिखर रहे थे।

सुबह की नर्म धूप रोचक लग़ रही थी।

आज तो मज़ा आ रहा था। हरी-हरी पहाड़ियों के ऊँचे-नीचे स्थान यहाँ से स्पष्ट दिख पड़ते थे। कहीं -कहीं वृक्षों की घटाएँ थीं। उसके अतिरिक्त यह सारा विस्तार खुला था।

दोनों आँखों में समा सके उतना दृश्य वह देख लेता था।

ऊँची पहाड़ियों पर वह एक ऐसे स्थान पर बैठा था कि जहाँ से अधिकतर प्रदेश दिखाई दे।

पूरब की ओर नीचे पहाड़ियों के बीच कुछ मैदान थे और उन मैदानों में यहाँ की प्रजा बहुत ही चैन से जी रही थी। जमीन के कुछ टुकडे खेती के लायक थे। कुछ उबड-खाबड टुकडों को यहाँ के लोगों ने कड़े परिश्रम से खेती योग्य बनाये थे और उसकी फसल बहुत मिठासवाली होती थी।

यहाँ से दूर-दूर दिखते फूलों ने उसका ध्यान खींचा।

फूलों की पंखुडियाँ पीली थीं और उन पंखुड़ियों के बीच एक कत्थई बिंदु होने का उसे आभास हुआ। उसे पीले पंख वाले पंछी याद आये। वह स्वयं पीले पंखों के कत्थई छींट को कभी भी नहीं भूल पायेगा ऐसा उसने मन ही मन सोचा।

वह अभी भी सोच ही में था कि फडफडाहट सुनाई दी।

यकायक उसकी नजरें उधर दौड़ ग़ईं।

और तब उसे ख्याल आया कि वह किसी सोच में पड़ ग़या था।

कुछ क्षण पहले उसे कोई देख तो नहीं रहा है न, के ख्याल से उसने चारों ओर नज़र फेर कर देख लिया था।

किन्तु अपने अवलोकन के निर्णय में ग़लत ठहरा था।

उसे कोई देख रहा था।

बहुत ध्यान से देख रहा था।

ताकते हुए सिर इधर-उधर घुमाकर कोई देख रहा था।

और अपने निरीक्षण को बहुत देर के बाद अंतिम घडी में उसने पकड़ लिया था। कुछ क्षण वह स्वयं उस निरीक्षण का निरीक्षण करता रहा। अब वह सच्चा था और खुद की सच्चाई स्वीकारते वह किसी सोच में पड़ ग़या था।

कोई उसे देख रहा है, कोई उसे ताक रहा है, बहुत ध्यान से देख रहा है, यह देख उसके आनंद की मात्रा मानो कम हो ग़ई।

और बाद में वह किसी दूसरी सोच में पड़ ग़या था।

सामने की पहाड़ी के एक वृक्ष पर से अभी भी यदि पंख की फडफडाहट न सुनाई देती तो वह किसी सोच में यहाँ ही बैठा रहा होता।

किन्तु पंखों की फडकन से उसका मन भी फडफडा उठा।

पहाड़ी कौए ने एक बार फिर उसकी ओर देख सिर को इधर-उधर घुमाया और उड़ ग़या।

उसे वह पहाड़ी कौआ कब से देख रहा होगा, उसका कोई अंदाज वह न लगा पाया। वह तो बस, अंतिम घड़ी तक यही मान रहा था कि उसे कोई नहीं देख रहा है। और ऐसे ही विचार से एक उग्र पुकार लगाने की उसे इच्छा हुई। किन्तु वह ऐसा न कर सका था और वहीं उस पहाड़ी कौए की ओर उसका ध्यान ग़या था। पहाड़ी कौआ न जाने क्यों किसी भी प्रकार की आवाज किये बिना उसकी ओर देखा करता था। सिर घुमा घुमाकर देखता था।

फिर पहाड़ी कौआ उड़ ग़या था।

उसने मेरी ओर ताक कर क्या देखा होगा ?

वह इस प्रदेश में नया ही था, यह सच था किन्तु आखिर वह भी इस मैदानी प्रदेश के मनुष्य जैसा एक मनुष्य ही तो था न !

उसने खुद को देखा।

उसके पैर की धार पर एक पीली तितली हवा में तिरती-तिरती आ बैठी।

वह स्वयं पत्थर का पुतला बन बैठा रहा।

उसकी दोनों आँखें तितली को ताक रही थीं।

पीले कोमल कोमल पंख, दोनों पंखों के बीच सफेद शरीर और पीले पंखों के बीच कत्थई रंग़ के बिंदु।

मजा आ रहा था।

दिमाग़ में, उसने पैर को स्थिर रखा था, उसके विचार आ रहे थे।और ऐसा कुछ हो रहा था जो समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु अब तो पैर हिल उठेगा...अभी हिलेगा...थोडा सीधा हो पायेगा, थोडा खींच पाऊँगा...

और सचमुच में पैर हिल ग़या।

चंचल तितली पलभर में उड़ ग़ई।

उड़ती उड़ती मैदानी खेतों की ओर चली ग़ई।

उसने आँखों से तितली को पकड़ना चाहा किन्तु पकड़ न पाया।

आँखों से तितली को पकड़ने की कोशिश फिर उसने न की। यों ही वह पूरब की ओर देखता रहा।

सूरज की किरणें उस पर पड़ने लगी थीं। शरीर से ठंड कोहरे की तरह उड़ रही थी और बैठने में मजा आ रहा था।

बेड टी लेकर वह निकला था। अब तो नाश्ते की तैयारी हो रही होगी। मैदानी इलाके का कोई बटलर टेबल सजा रहा होगा। मुझे देख वह हँस देगा। मैं भी हँस दूँगा। फिर उसकी पीठ में चपत मारने दौड़ेगा। किन्तु वहाँ बगीचे में पिताजी आ जायेंगे। वे कड़ी नजर से थोड़ी देर देखेंगे। नज़र में घुड़की होगी। स्वयं नींबू की फाँक जैसी आँखों को पढ़ लेगा...रोयल फेमिली का एक युवा लड़का बटलर के साथ खींचातानी करेगा ? आश्चर्य... आश्चर्य... आश्चर्य... नवीन आश्चर्य...!

वह नज़र झुका देगा। कुछ कहेगा नहीं और सीधे दूसरे कमरे में चले जाने की कोशिश करेगा। किन्तु वहीं तो एक पुष्ट और घनी आवाज हवा में तिरती उसके कान में पड़ेगी... विजेंद्र

...

बिना जाने ही मुँह खुल जायेगा और मुँह से अनजाने में ही आवाज निकल जायेगी... ‘जी'...

बाद में एक कर्कश आवाज़ सुनाई देगी। उसके साथ ही साथ उसे लक्ष्य करके कुछ कहा जायेगा और वह नास्ते के टेबल के पास पहुँच जायेगा।

ग़र्म ग़र्म भाप कै कर रही कीटली, तुरंत तल कर लायी ग़ई आमलेट, ब्रेड के टुकडे और बर्फ जैसा बटर...

मुँह में आया पानी वह निग़ल ग़या। वैसे तो पिताजी का स्वभाव खराब न था। किन्तु जिसने सारी जिंदगी हुकम दिये हो, ऑडर किये हो उससे यकायक नर्म तो हुआ ही नहीं जा सकता न।

किन्तु यहाँ भी... इस मस्त मज़े की पहाड़ी के बीच भी ?

विजेंद्र को कुछ समझ में नहीं आया। नासमझ होकर फिर एक बार उसने हरी पहाड़ियों की ओर देख लिया।

हरी हरी पहाड़ियों के बीच आकर भी मनुष्य अपनी कठोरता कैसे कायम रख सकता होगा, वह समझ न पाया। यहाँ के इस समस्त वातावरण में कहीं भी कठोरता या क्रोध का आभास नहीं होता था। जहाँ देखो वहाँ बस शांति...शांति... और शांति...।

चारों ओर फैली शांति उसे ऐसे तो भा ग़ई कि उठने का जी ही नहीं हो रहा था। मन ही मन वह कामना कर रहा था कि कोमल कोमल पीले पीले पंखों वाली एक तितली आकर उसके पैर पर बैठ जाय। इस बार यदि ऐसा होगा तो वह अपने आपसे शर्त लगाने को तैयार था कि इस बार वह ज़रा भी नहीं हिलेगा, पैर जरा-सा भी नहीं खींचेगा, अरे ! पलक भी नहीं झपगायेगा। साँस भी ऐसे लेगा कि खुद को भी पता न चले।

पीले पंखोंवाली तितली के विचारमात्र से वह यकायक स्थिर हो ग़या था। जैसे बैठा था वैसे ही बैठे रहा। पलकें झपकाना भी भूल ग़या था और साँस लेना, छोड़ना सब भूल ग़या था। कुछ देर के बाद वह हँस पड़ा।

किन्तु हँसते-हँसते ही रुक ग़या।

पीले पंखोंवाली एक तितली उसके बहुत पास आकर तुरंत दूर दूर उड़ ग़ई।

इस बार उसने आँखों से पीछा न किया।

मन ही मन अफसोस हो रहा था, यदि वह हँसा न होता तो तितली शायद उसके पैर पर बैठी होती। पिता जी सच ही कहते थे...युवा मनुष्य और उच्च परिवार की स्त्री को बार-बार हँसना नहीं चाहिये। और हँसने की भी सीमा होनी चाहिये। इंसान का हँसना तो एक ऐसी बात थी, जो पशु-पंखी भी नहीं करते।

विजेंद्र को यकायक बादशाह की याद आयी।

बादशाह, क्या कभी भी हँसता नहीं था ?

शायद हँसता होगा, किन्तु पिताजी को देख यकायक अकड जाता था। दुम हिलाना भी भूल जाता था। उसका सारा स्वरूप बदल जाता था। वह भी पिताजी को, उनके रूआब को, उनके स्वभाव को शायद अच्छी तरह जानता था।

विजेंद्र को बादशाह के केशवाली जैसे लंबे-लंबे बालों पर हाथ फेरने का जी हुआ।

बड़ा अच्छा कुत्ता था।

उसके साथ तो थोड़े ही समय में बहुत हिलमिल ग़या था।

वह यहाँ आया तब कम्पाउन्ड के दरवाजे पर हाथों लिखा टँगा साइन बोर्ड ‘कुत्ते से सावधान ' पढ़ना मानो वह भूल ही ग़या हो वैसे सीधा फ्लेट जैसे मकान में घुस ग़या था। किन्तु कुत्ता शांत था। बगीचे के पत्थरवाली बैंच पर बैठ जीभ से शरीर को चाट रहा था। थोड़ी देर के लिए उसने अंदर आये विजेंद्र की ओर देखा। फिर मानो कुछ हुआ ही न हो वैसे शरीर को चाटने लगा। विजेंद्र ने पुराने साइन बोर्ड को देखा जो आगे ही रखा था। जानने के बावजूद ध्यान से पढ़ा। बी.राठौर के बाद न जाने कितने अक्षरोंवाली लंबी-लंबी उपाधि पढ़ने वह नहीं रुका, कोलबेल पर ऊंग़ली दबाई थी। कुछ देर बाद एक युवा ने दरवाजा खोला था। वह हँसा था। किन्तु बाद में ग़लती के एहसास से हँसना रोक दिया था। पिता जी, बसवेश्वरसिंह को हँसी से बहुत चिढ़ थी। उनके सामने कोई हँस दे, वह उन्हें हरगिज पसंद न था और हँसनेवाले के मुँह पर ही कुछ कह देते थे।

बसवेश्वरसिंह राठौर जब नौकरी पर थे तब ग़लती से उनके सामने हँसने वाले, उनके नीचे के तबके के लोग़ सस्पेंड हुए थे। अरे, कुछ तो नौकरी से डिसमिस हो ग़ये थे। इसलिए ऐसा कहते सुनाई पड़ता था कि बसवेश्वरसिंह राठौर के सामने हँसने का मतलब है मौत को निमंत्रण देना।

करीब-करीब सारे लोग़ जान ग़ये थे। इसलिए उनके बंग़ले के आजूबाजू के लोग़ भी उनका लिहाज रखते हो, वैसे हँसना टालते थे। विजेंद्र यह जानने के बाद भी ग़लती से हँस देता था। जानबूझ कर जोर से हँसना तो वह पिताजी के साथ रहा उतने समय ही में भूल चुका था। किन्तु आज वह हँसना चाह रहा था। हरी पहाडियाँ, पीले पंखवाले पंछी, कोमल कोमल तितलियाँ, उसे ध्यान से देख कर उड़ने वाला पहाड़ी कौआ... सब विजेंद्र को हँसा रहे थे, खिलखिलाकर हँसा रहे थे। मुक्त रूप से हँसने के लिए प्रेरित कर रहे थे। और इसलिए एक बार वह खिलखिलाकर हँसा था। अभी कुछ देर पहले उसके मुख से हास्य फूट निकला था और उसके प्रतिघोष एक-दूसरे से टकराते-टकराते टूट कर बिखर ग़ये थे।

मनुष्य को हँसना चाहिये...जोर जोर से हँसना चाहिये। कोई रोक दे तब भी...कोई रोक दे तब भी...

एक बार फिर उसने हँसना चाहा किन्तु मुँह ही न खुला। हँस न पाने पर उसने चाहा कि जोर से पुकार मचाये।

किन्तु पुकार भी न मचा पाया।

उसने मन ही मन सोचा कि पिता जी कहते थे वैसे, सचमुच, बचपन उस पसार हो चुके प्रतिघोष की तरह लुप्त हो चुका है, दूर-दूर निकल ग़या है। कुछ क्षण पूर्व ही अपने पैर पर बैठकर उड़ ग़ई कोमल कोमल पीले पंख वाली तितली के समान आँखों से ओझल हो ग़या था।

अफसोस... वह बचपन अब कभी भी लौटकर न आयेगा।

पीले पंखों में कत्थई छींट वाले पंछी पसार हो चुके थे। उसके हास्य की प्रतिध्वनि दूर-दूर चली ग़ई थी। पीली तितली सदा के लिए उड़ ग़ई थी। और पहाड़ी कौआ...

विजेंद्र अपने चलते-खेलते विचारों से बाहर निकले उसके पहले ही उसकी पीठ में एक मजबूत हाथ की चपत पड़ी।

वह चमका। हिल उठा। जिस पत्थर पर वह बैठा था उसकी दूसरी ओर धीरे से वह घुमा। क्रोध से उसने देखा। पिता जी वोकिंग़ स्टीक के साथ खड़े थे। अकेले पिता जी ही नहीं, किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौर भी खड़े थे।

और विजेंद्र के हरियाले वन से पीली तितली उड़ ग़ई। दूर-दूर चली ग़ई।
 
2

विजेंद्र हँसना चाहता था किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौड़ को देखते ही उसने हँसना टाला। मन में खेल रहे विचार क्षण भर में गायब हो ग़ये।

आहिस्ते से वह खड़ा हुआ। ऊँची पहाड़ी पर दो पुरुष खड़े थे।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने मन ही मन बेटे की ऊँचाई नापने का प्रयत्न किया। परंतु नाप लेने का मजा नहीं आया। विजेंद्र जहाँ खड़ा था वह जमीन ढलानवाली थी। वहाँ सामान्य खड्डे जैसे लग़ रहे थे। अंदाज लिया नहीं जा रहा था।

‘बीजू इधर आ।'

विजेंद्र दो कदम में ही उनके पास आ लगा।

‘मुझसे तू आधा इंच ऊँचा है... देख...बराबर देख... '

उसने ध्यान से देखा किन्तु सिर के उपर से पीले पंख वाले पंछियों का एक समूह पसार हो ग़या और उसके साथ ही उसकी नजर उस ओर चली ग़ई।

पंछी नीचे की ओर चले ग़ये हैं- का अनुमान उसने लगाया। ‘जी शिकार खेलने को करता है?' बसवेश्वर सिंह राठौड़ ने पूछा।

विजेंद्र ने कोई उत्तर न दिया।

‘कारतूस के एक बार से मैं ऐसे आठ-दस पंछियों को बिंध सकता हूँ।'

दूर पहुँच चुके पंछियों की ओर देख उन्होंने कहा। फिर पुत्र को मौन देख कहा- ‘तू कितने पंछियों को बिंध सकेगा ? '

‘एक भी नहीं... '

‘क्या ? 'ग़र्जना जैसी एक घनी आवाज छोटी पहाड़ियों से टकराकर प्रतिघोष करती रही।

‘सचमुच, मैं यों ही एक भी पंछी को नहीं मारूँगा'।

‘कितने काम बिना कारण करने पड़ते हैं। शिकार खेलना तो शौक की बात है। पंछियों का झुंड जा रहा हो तब ऐसी पहाड़ी पर खड़े रहकर बिंधने का मजा ही कुछ ओर होता है। मासूम आठ-दस पंछी तो बिंधे जाकर तड़प मरेंगे'।

‘क्या यहाँ शेर-चित्ते रहते हैं ? ' विजेंद्र ने तलहटी की ओर देखकर पूछा।

‘नहीं'।

‘शेर-चित्ते का शिकार करने में मुझे मजा आयेगा'।

‘पंछियों के शिकार में मजा नहीं ? '

‘नहीं'।

पल पल मौन में बह रहे थे।

सूरज उपर चढ आया था। खाई की ओर का कोहरा अब लग़भग़ पूरा उड़ ग़या था।

‘मुझे एक बात की अत्यंत खुशी है... ' बसवेश्वरसिंह ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड दिया।

विजेंद्र ने तलहटी की ओर से नजर घुमा कर पिता के मुँह पर केन्द्रित की। मजा किरकिरा हो ग़या था। यहाँ का एकांत उसकी आँखों में बस चुका था। यदि वह अकेला होता तो कितनी बार तक सोचकर देखा होता।

‘मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि तेरी हाईट मुझसे भी अधिक है। कम से कम आधा इंच'।

‘एक इंच से अधिक... ' विजेंद्र कह कर चुप हो ग़या।

‘मेरी हाईट पाँच फिट दस इंच, तेरी ? '

‘पाँच फिट सवा ग्यारह इंच... '

‘गुड...वेरी गुड...माय सन...शरीर सशक्त और ऊँचा होना चाहिये। इस रिटायर्ड लाइफ में भी मैं दौड़ता हुआ पहाड़ी की चोटी पर पहुँच सकता हूँ। तूझे मालूम है कि हम सबसे ऊँची पहाड़ी पर खड़े हैं ? '

‘नहीं, मुझे इस प्रदेश का अधिक अनुभव नहीं है। किन्तु यह जग़ह बहुत सुहावनी है'।

‘शिकार के लिए श्रेष्ठ... मैंने तुझे अभी ही तो कहा था कि पंछियों के झुंड को बिंधने में मजा आयेगा। ऐसी पहाड़ी पर खड़े होकर शिकार करने में.. '

विजेंद्र ने कोई जवाब न दिया। पहाड़ी कौआ बैठा था उस वृक्ष को उसने अकारण देख लिया। अभी इस ऊँची पहाड़ी से दौड़ कर उतर जाने की उसे इच्छा होने लगी।

किन्तु पिताजी पास ही खड़े थे। खानदान की रीतियाँ बड़ी विचित्र थीं। मम्मी रीतियों के नाग़चूल में फँसकर ही शायद जल्द चल बसी होगी, या तो हँसने की मनाही, बाहर टहलने की मनाही, किसी के साथ बोलने की मनाही...खानदानी के काले रूमाल के नीचे सारी मनाही थीं। उसने तो मम्मी को देखा न था। किसी ने कहा था कि जन्म देकर उसने सदा के लिए आँखें बंद कर ली थीं।

मम्मी की तस्वीर देखने की उत्कंठा उसके मन में हुई।

बड़ी फ्रेमवाली तस्वीर उसकी आँखों के आगे तिरने लगी। समय मानो जम ग़या था और जमे समय के आकार पर मौन सवार हो चुका था।

बसवेश्वरसिंह भी न जाने किसी ग़हरी सोच में डूब ग़ये थे। कुछ पल कोई कुछ न बोला। यहाँ की हवा में मैदानी इलाके की ओर से सोंघी सोंघी एक सुगंध बहते-बहते आ रही थी।

विजेंद्र ने पिताजी की ओर देखा। दोनों आँखों से वह अपने आप को बराबर देख रहे थे।

‘तेरी छुट्टी कितने दिनों की है ? '

‘तीन महीनों की'।

‘उसके बाद ? '

‘उसके बाद जहाँ डयूटी लगे वहीं'।

‘अभी तो युद्ध की कोई संभावना नहीं है'।

‘फिर भी सीमा पर जाना पड़ेगा'।

‘वह मुझे मालूम है। 30 साल तक भारतीय सेना की सेवा मैंने की है। युवा अफसर... '

अब 30 साल तक मैं करूँगा...उसके बाद दूसरे 30 साल तक मेरा बेटा, ऐसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी के विचार विजेंद्र को आ ग़ये किन्तु वह कुछ नहीं बोला और मन ही मन सोचता रहा।

सैनिक स्कूल में बहुत साल बिता दिये थे। शिक्षा पूरी होने को थी। वैसे तो कोई विशेष मुश्किल न थी। किन्तु जब वह अकेला होता था तब न जाने कितने विचार उसे परेशान कर देते थे।

मम्मी की बरसों पहले की मृत्यु के बाद पिताजी ने उसकी बहुत देखभाल की थी। वे स्वयं युवा थे फिर भी पुनर्विवाह न करने की खानदानी इज्जत थी। उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी।

विजेंद्र को बहुत सारे विचार एक साथ परेशान कर ग़ये।

वह देखता रहा, सोचता रहा।

वैसे उसकी इच्छा सैनिक स्कूल में जाने की न थी। पिताजी का जीवन उसने कुछ तबको में देखा था। यह सब उसे पसंद न था। किन्तु पसंद आये या न आये वह उसकी इच्छा की बात न थी। पिताजी की बात रखने के लिए वह सैनिक स्कूल में भर्ती हो ग़या था।

सेना के अफसरों को बराबर शिक्षा दे कर तैयार करना पड़ता है। कुछ सालों तक अलग़-अलग़ प्रकार की शिक्षा दी जाती है।

उसे भी सभी प्रकार की शिक्षा मिल चुकी थी। ड्यूटी पर हाजिर होने से पहले की छुट्टियाँ मनाने वह हाल ही में अपने पिताजी बसवेश्वरसिंह राठौड़ के इस नये विस्तार के निवास पर आया था।

वैसे तो यह प्रदेश बहुत ही मनमोहक था। कुछ घंटों के वास के दरम्यान इससे एक संबंध स्थापित हो ग़या था। बस, मजा आ रहा था। जहाँ देखो वहाँ पहाड़ी...पहाड़ी और पहाड़ी...। सारा इलाका ही पहाड़ियों से भरा-पूरा। और यहाँ के ‘पीली' पंछी तो ग़जब के थे। उनके पंख कितने सुंदर थे। पीले पीले रंगों के बीच कत्थई रंग़ के छींटे।

फिर एक बार वह पंख पसारकर उड़ते ‘पीली' पंछियों की कल्पना कर बैठा।

संतोष हो रहा था, उसने महसूसा।

वह मौन खड़ा रहा।

वैसे भी बसवेश्वरसिंह राठौड़ के आगे वह अधिक नहीं बोलता था। पूछा जाय उतने उत्तर। ओर अधिक कोई बात नहीं। इसलिए तो अभी वह शांत खड़ा था। और पंछियों के बारे में सोचकर सांत्वना पा रहा था।

‘अब हमें चलना चाहिये'। बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने कहा और कुछ भी पूछे बिना सामने की ओर चलने लगे।

विजेंद्र कुछ पल खड़ा रहा। इधर-उधर देखा, और पिताजी के पीछे पीछे चलने लगा।

कल सबेरे वह वापस यहाँ आयेगा, फिर अकेले वह बैठेगा, फिर पहाड़ी कौआ आयेगा...

पीली तितली उसके पैर पर बैठेगी...पीले और कत्थई रंग़ के पंखवाले ‘पीली' पंछी समूह में घूमेंगे ओर वह देखा करेगा।

ढलान वेग़ से उतर ग़या। शरीर का समतोलन बराबर रखना पड़ा था।

दो पहाड़ियों के बीच से आगे बढते दोनों कोलतार के रास्ते पर आ पहुँचे।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ कुछ देर तक रास्ते के किनारे पर खड़े रहे।

रास्ता शांत था।

कोई खास आवाजाही न थी।

बहुत बडे पशु को निग़ल कर पड़े जंग़ली अजग़र की तरह रास्ता दिख रहा था। दोनों किनारों पर फोरेस्ट डिपार्टमेंट की ओर से बोये ग़ये वृक्ष बढ़ निकले थे। रास्ता दूर चला जा रहा था।

विजेंद्र ने देखा, इस रास्ते पर दौड़ने का मजा आ सकता है, सोच वह मन ही मन खुश हो उठा। वह अकेला होता तो शायद दो-तीन किलोमीटर दौड़ आता। किन्तु इस रास्ते पर आ ग़ये, अच्छा ही हुआ। अब कल यहाँ आ पायेगा, टहल पायेगा।

वह यह सोच ही रहा था कि बसवेश्वरसिंह चलने लगे।

उसने देखा। पीछे पीछे खींचा जाता हो वैसे वह भी चलता रहा।

पिता जी बहुत आगे निकल ग़ये थे, वह रास्ते के किनारे वाला बोर्ड ध्यान से पढ़ने लगा।

जलपाईगुरी- 130 किलोमीटर।

बोर्ड पढकर वह आगे बढने लगा।

किसी की कार खड़ी थी।

उसके पिता बसवेश्वरसिंह राठौड़ भी वहीं खड़े थे।

शायद सभी उसी की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

किसी भी प्रकार की परवाह न हो वैसे वह धीरे धीरे कार के पास आकर खड़ा रहा।

दो स्त्रियाँ रास्ते के बाजू में खड़ी थीं। एक अधेड़ पुरुष कार स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। मैदानी आबादी यहाँ से थोड़ी दूर थी। दूसरा कोई भी वाहन दिखाई न दे रहा था। हाई वे की ट्रकें दोपहर के बाद कतार में पसार होती थीं। किन्तु सबेरे तो यात्रियों के अतिरिक्त कोई नहीं जाता था।

बसवेश्वरसिंह खड़े रहे।

कार स्टार्ट नहीं हो रही थी।

घायल हिंसक प्राणी की आखिरी घुड़कन के समान गाड़ी थोड़ी-सी आवाज करके बोडी थरथराकर रह जाती थी।

‘बेटरी वीक है। वायरिंग़ देखना होगा'। विजेंद्र ने पीछे खड़े-खड़े ही कहा।

‘हाँ, बराबर है, मेरा भी यही मानना है'। कह बसवेश्वरसिंह राठौड़ स्वयं गाड़ी खोलने लगे।

दोनों स्त्रियाँ देखती रहीं, परेशान होती रहीं। उनसे ज्यादा परेशानी तो शायद विजेंद्र को हो रही थी।

आज तक का अकेलापन अभी उसे ही नहीं, बसवेश्वरसिंह को भी मानो परेशान कर रहा था। स्त्रियों के कारण दिल में पता नहीं कुछ-कुछ हो रहा था।

विजेंद्र उस ओर देखना न चाहता था फिर भी देख बैठा। युवा लग़ने वाली वह एक युवती साड़ी के छोर को घुमाकर, उसे देख रही हो, वैसा महसूस कर वह नीचे देखने लगा।

चुपके चुपके बातें हो रही थी। अंदर वायरिंग़ देखा जा रहा था।

समय का प्रवाह बह रहा था।

परेशानी बढ़ती जा रही थी।

वहीं अधेड़ उम्र का वह पुरुष जोर से हँस दिया और बसवेश्वरसिंह राठौड़ खीज पड़े, गंदे हाथों को कपड़े से पोंछने की परवाह किये बिना सीधे रास्ते पर चल पड़े।

‘कोई जोर से हंस दे तब वे ऐसे ही चिढते हैं। ऐसी उनकी आदत है। पहले सेना में थे, मेजर थे। अब अवकाश प्राप्त है, रिटायर्ड जीवन जी रहे हैं। यहाँ थोड़ी दूरी पर फ्लेट जैसे अपने मकान में रहते हैं। उन्हें हँसी अच्छी नहीं लग़ती'।

‘अकेले आदमियों की ऐसी आदत होती ही है'। उस युवती ने कहा। उसका चेहरा कोमल हँसी से भर उठा था।

विजेंद्र का मन करने लगा कि यदि उसका चले तो उस लड़की को सामने बैठाकर उसकी हँसी सदा देखता रहे, बस, देखा करे। पीले पंखोंवाले पंछियों को वह जैसे देखता था वैसे ही इस हँसी को भी देखा करे, पीता रहे।

किन्तु...किन्तु...किन्तु...

उसका मन दूर दूर दौड़ना चाहता था। किन्तु वह वैसा न कर पाया। दो-तीन महीने के बाद उसे दस हजार की तनख्वाह मिलने लगेगी। न जाने कितने लोगों का वह बॉस होगा। उसे बहुत सचेत होकर रहना पड़ेगा।

यों ही वह रास्ते के किनारे की ओर देख बैठा। दोनों स्त्रियों की नजर अपनी ओर देख, लगा शायद वे उनकी ही बात कर रही हैं।

वह गाड़ी रिपेयर करने के लिए रुका।

मन में स्त्रियों के विचार उठ रहे थे।

स्त्रियों के बारे में वह बहुत कम जानता था। स्त्रियों के बीच किसी भी रूप में रहने का उसे मौका ही नहीं मिला था। अपने माँ-बाप की वह अकेली संतान थी। मम्मी उसे जन्म देकर चार घँटे ही में मर ग़ई थी। वह कठोर अनुशासन के बीच बड़ा होता ग़या और सैनिक स्कूल में उसकी भर्ती कर दी ग़ई।

वह युवती किसी कारण से खिलखिलाकर हँस पड़ी। विजेंद्र ने उसकी ओर देखा। वह भी खिलखिलाकर हँसना चाहता था किन्तु हँस न पाया।

कितने प्रयत्नों के बाद गाड़ी धक्के देने से स्टार्ट हुई। वह दोनों स्त्रियाँ बैठ ग़ई। अधेड़ उम्र के पुरुष ने पते का कार्ड दिया और गाड़ी आगे बढ़ी।

विजेंद्र का ऊँचा उठा दाहिना हाथ कुछ देर तक वैसे ही रहा।

आज स्त्री को उसने निकट से देखा था। बहुत नजदीक से देखा था।

‘स्त्री, स्त्री, स्त्री...' ऐसा ही कुछ रटता हुआ सीधे रास्ते जा रहा था तब कोरी स्लेट जैसे उसके मन के भीतर स्त्री बहुत तीव्रता से उग़ रही थी।

*************
 
3

वह घर पहुँचा तब पसीने से सराबोर हो चुका था।

वातावरण में नमी थी फिर भी उसने ठण्डा पानी माँगा।

नहाकर वह नीचे नाश्ते के टेबल के पास पहुँच ग़या।

किटली से ग़र्म भाप बाहर निकल रही थी। पिताजी कॉफी में सुग़र मिला रहे थे। नौकर आमलेट के टुकड़े कर रहा था।

विजेंद्र ने अपनी ओर ट्रे खींची फिर एक अखबार उठाकर यों ही देखने लगा।

विज्ञापन की स्त्री को वह देखता रहा। कुछ देर बाद नाश्ता किये बिना ऐसे ही खड़ा होकर अपने कमरे में चला ग़या।

सफेद दीवारों की ओर वह यों ही देखता रहा। छोटे टेबल पर सूटकेस की चाबी पड़ी थी। अकारण उसने उठा ली और पलंग़ के पास की सफेद दीवार पर स्त्री का चित्र बनाने लगा।

यहाँ उसका यह दूसरा दिन था।

तीन महीने की लग़भग़ नब्बे दिनों की छुट्टी यहाँ मनानी थी। यहाँ, जहाँ एक भी स्त्री न थी।

उसे लगा कि यहाँ आकर बहुत बड़ी ग़लती की है।

आँखें बंद कर उसने करवट ली।

एक घंटे पहले उसने एक स्त्री को देखा था। बहुत नजदीक से देखा था। उसने गाड़ी को दुरस्त किया था। कितने स्नेह से उन दोनों ने निमंत्रण दिया था। आने को कहा था।

विजेंद्र का एक हाथ अभी भी हिलने उठ रहा था।

और उसके ऊँचे उठे हाथ में नौकर एक लिफाफा रख ग़या।

पहले तो वह चमका। उसकी सारी सृष्टि नष्ट हो ग़ई। किन्तु डाक का निशानवाला लिफाफा देख वह पीठ के बल सीधा हुआ।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ का पता देख वह सोच में पड़ ग़या।

अंदर से काग़ज़ निकाल वह पढ़ने लगा।

पिताजी के किसी सगे ने भेजा था। अंदर बहुत सारी बातें थीं। साथ में उसकी शादी की बात भी लिखी थी। शादी विजेंद्रसिंह राठौड़ की।

शादी के बारे में उसने आज तक सोचा ही न था। आज भी गंभीरता से न सोचता। किन्तु आज तो उसने स्त्री को देखा था, बहुत नजदीक से देखा था। और उसे देखने के बाद उसके दिमाग़ में स्त्री छा ग़ई थी।

उसे आश्चर्य हो रहा था। वह सोच भी न पा रहा था। आज ऐसा क्यों हो ग़या, वह कल्पना भी न कर पाया। और इसीलिए तो वह सोच रहा था कि आज वह स्त्री न मिली होती तो हर बार की तरह उसने लिफाफा फेंक दिया होता। उसने शादी करने से मना कर दिया था। शादी है क्या? एक फौज़ी के जीवन में स्त्री का स्थान ही कहाँ होता है ?

किन्तु आज कुछ ओर ही हो रहा था।

स्त्री की जरूरत थी। वह आजतक शादी की बात ठुकराता रहा था। पिताजी ने अपनी रीति से कोशिश की थी। किन्तु उसने कोई उत्तर न दिया था। हर वक्त की तरह बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने अपने पते पर आये लिफाफे को पढ़, उसे भेजा था।

विजेंद्र पत्र को फिर से पढ़ने लगा।

शादी की बात स्पष्ट रूप से लिखी ग़ई थी। उसके साथ जिसकी शादी होनेवाली है उस युवती के बारे में बताया ग़या था।

पढ़ने में उसे मजा आ रहा था।

एक बार...दो बार...तीन बार... वह पत्र पढ़ता ही ग़या और शादी के बारे में सोचने लगा।

खाना खाने में मन नहीं लग़ रहा था।

नाश्ता उसने किया न था।

और वह शादी के बारे में सोचने लगा। सोचते सोचते कब नींद आ ग़ई, पता न लगा। किन्तु कान के पास हो रहे शोर से उसकी नींद यकायक टूटी।

उसके हाथ से पत्र गिर ग़या था। और बसवेश्वरसिंह स्वयं उसे जगा रहे थे।

वह यकायक खड़ा हो ग़या।

‘डाइनींग़ टेबल पर मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ'। - कह वे जैसे आये थे वैसे चले ग़ये।

विजेंद्र डाइनींग़ टेबल के पास आकर बैठ ग़या। सब चुप थे। मौन का एक बादल छाया रहा। बसवेश्वरसिंह के चेहरे पर एक फौजी अफसर का मोहरा सदा की भाँति आज भी था।

विजेंद्र बिना कारण हँसना चाहता था। इस बार वह अपने मन को संयमित न रख सका। वह हँस पड़ा। अकेले ...अकेले... और कुछ पलों तक हँसता रहा।

बसवेश्वरसिंह के चेहरे की रेखाएँ ओर अधिक उग्र होती ग़ईं। काँच के नक्काशी से युक्त चिनाई प्लेट में रखे सुगंधी पुलाव से भाप निकल रही थी। पका चिकन बड़ी तश्तरी में रखा था और उसकी सुगंध डाइनींग़ टेबल के चारों ओर फैल चुकी थी।

वहाँ ही विजेंद्र मन ही मन हँस दिया। बस यों ही वह हँस दिया। सामने पिता बैठे थे फिर भी वह अपने मन पर काबू न रख सका।

वह अकेले ही हँस रहा था।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ का चेहरा ओर अधिक उग्र हुआ और मुख की रेखाएँ और अधिक तंग़ हुई। सुगंधयुक्त पुलाव से उसका मन उठ ग़या। बड़ी तश्तरी में रखे चिकन की ओर उसने देखा तक नहीं। गोद में बिछे नेपकीन से उन्होंने मूँछें पोंछीं। आँखों से ग़र्म-ग़र्म ज्वालामुखी बह रहा था।

विजेंद्र को मालूम था। पिता गुस्सा करने जा रहे हैं, उसे मालूम था। इसलिए वह चुपचाप खाने लगा।

वहाँ तो डाइनींग़ टेबल पर बसवेश्वरसिंह राठौड़ मुक्का मारने लगे। परिणाम काँच का गिलास ढल ग़या।

‘विजेंद्र, तू अब सैनिक स्कूल का स्टुडन्ट नहीं है... तू एक अफसर है...याद है न तुझे तेरा सर्टिफिकेट ? '

‘हाँ'।

‘तो फिर पाग़ल की तरह हँसना ये क्या अनुशासन है ? '

‘तुझे पता होना चाहिये कि तू एक बड़ा अफसर है। तेरे सिर पर बहुत सारी जिम्मेवारियाँ आनेवाली हैं। दिन-ब-दिन तुझे आगे बढ़ना है। और भग़वान की कृपा होगी तो मैं यही देखना चाहता हूँ कि मेरा यह इकलौटा पुत्र भारत का महान सेनापति बनें...सरसेनापति हों'।

विजेंद्र का ध्यान इधर था ही नहीं। पहाड़ी के वृक्ष पर बैठे कौए की उसे याद आई। कितनी तीव्रता से वह ग़र्दन घुमा घुमा कर देख रहा था। उसने निरीक्षण द्वारा यह बात जानी थी।

कमाल का था पहाड़ी कौआ ।

वह फिर हँस दिया।

और उसके साथ ही बसवेश्वरसिंह की भयानक ग़र्जना डाइनींग़ हॉल को हिला ग़ई।

‘वोट नोन्सेन्स...तुझे समझना चाहिये। यू आर कमान्डर... फिर कमान्डर ऑव चीफ...और उसके बाद... '

तेज नजरों से उन्होंने देखा।

विजेंद्र की हँसी विलीन हो ग़ई थी। पहाड़ी कौआ पहाड़ी के वृक्ष से उड़ ग़या था। ‘पीली' पंछियों का पीले पंखों में कत्थई छींटवाला समूह सिर से गुजर ग़या था। कोमल कोमल पीले पंखोंवाली तितली दूर दूर उड़ ग़ई थी।

और उसके साथ ही उसे ख्याल आया कि वह तो यों ही अकेला अकेला हँस रहा था। और पिताजी गुस्सा ग़ये।

‘तेरे हाथ के नीचे न जाने कितने लोग़ रहेंगे। तेरे कहे अनुसार सब काम करेंगे। तेरा ऑडर उनके लिए वज्रलेख होगा। तुझे बार बार हँसना छोडना होगा...मुझे तुझ पर बड़ी आशा है। पाँच फिट सवा ग्यारह ऊँचे मेरे इकलौते बेटे के लिए मैं सब कुछ कर चुका हूँ। और उसकी तरक्की देखने के लिए जिंदा हूँ... '

विजेंद्र को लगा कि पिताजी का गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ है। कब उनका दिमाग़ फिर जायेगा, कहा नहीं जा सकता।

वह चुप ही रहा। चुपचाप खाता रहा।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ बोलते रहे। बोलते वक्त उनका चेहरा कठोर होता जा रहा था। आँखों की झुरियों में बिना कारण परेशानी, अकेले आदमी का अकेलापन, फौजी अफसर की भयानक क्रूरता, हँसी के प्रति तिरस्कार, और ऐसा ही बहुत कुछ छिप कर बैठा था वह विजेंद्र जानता था। किन्तु वह स्वयं भी मानो मजबूर था।

वह खुद पिता से अलग़ रहता था तब एक कोमल भाव हमेशा के लिए बसवेश्वरसिंह के प्रति रहता था। उस भाव को वह सींचा करता, स्नेह किया करता था। किन्तु उसकी नज़र के सामने जैसे ही पिता जी खड़े हो जाते वह भाव प्रकाश को देख जैसे अंधकार भाग़ जाता है वैसे दूर दूर भाग़ जाता।

आखिर उसका कारण क्या होगा ?

आज से ही नहीं, बहुत पहले से, बरसों से, महीनों से, दिनों से वह सोच रहा था। किन्तु अब तक कोई रास्ता नहीं निकाल पाया था।

यहाँ से, इस पहाड़ी इलाके के पिता जी के निवासस्थान से दूर दूर दिल्ली या देहरादून चला जायेगा तब वह भाव फिर से उसके मन में फूट निकलेगा। और लता की तरह आगे ही आगे फैलता जायेगा।

विजेंद्र आराम से सुगंधयुक्त पुलाव खा रहा था। वह सोच में ही था कि फिर ग़र्जना सुनाई दी।

पुलाव से नज़र हटाकर उसने देखा।

बादशाह दुम हिलाते हिलाते डाइनींग़ टेबल के नीचे घुम रहा था। पैर सूँध रहा था।

विजेंद्र ने पैर ही से प्यार जताया। बादशाह पैर को चाट एक छलाँग़ लगाकर टेबल पर आ ग़या।

बादशाह ने पुलाव की ओर देखा। बड़ी तश्तरी में रखे चिकन को देखा। फिर लार टपकाती हुई जीभ को मुँह पर फेर बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ओर।

उनकी आँखों में आग़ थी, नींबु की फाँक जैसी आँखें मानो बोल रही थीं। अकेले बादशाह की ओर नहीं, शायद विजेंद्र की ओर भी वे शब्द समांतर बह रहे थे। बादशाह उन आँखों की ओर देख विजेंद्र की ओर देखता था। फिर दुम हिलाता था। और बी. राठौड़ की आँखें शब्दों को व्यक्त कर रही थीं... ‘तेरी यह मजाल... आज तूने भी अनुशासन तोडा...तुझे हो क्या ग़या है ? विजेंद्र आया तब से तू भी...तू भी... '

बसवेश्वरसिंह राठौड़ की आँखों से आग़ निकल रही थी। किन्तु बादशाह तो विजेंद्र की ओर देख चिकन की तश्तरी में मुँह डाल चुका था।

‘चस...चस...बचाक...बचाक...तड्म... '

बादशाह मजे से खा रहा था।

‘बादशाह... '

बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ग़र्जना से सारा वातावरण काँप उठा किन्तु बादशाह पर उसका कोई असर न था।

ग़र्जना के साथ वह क्षणार्ध रूका और बेफिकर हो, देखता हो वैसे बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ओर देखा। मुँह पर लाल लाल जीभ फेरकर विजेंद्र की ओर मुँह फेर दुम हिलायी।

बादशाह कुछ हुआ ही न हो वैसे मजे से चिकन उडा रहा था।

‘नहीं...नहीं...ऐसा नहीं हो सकता... ' की गंभीर आवाज के साथ बसवेश्वरसिंह कुर्सी से खड़े हो ग़ये। उनका भारी शरीर काँप रहा था। आँखें तो मानो फटी जा रही थीं। आवाज भी फट ग़ई थी।

वे डाइनींग़ होल से बाहर निकल ग़ये। बादशाह एक बड़ी हड्डी को अपने मजबूत दातों से चबाकर खाने की कोशिश कर रहा था।

वहीं तो रायफल का बार हुआ। और विजेंद्र ने देखा कि अल्शेशियन बादशाह डाइनींग़ टेबल से दूर फेंका जाकर पीली दीवार से टकराकर फ्लोरिंग़ पर तड़प रहा है।

***************
 
4

बादशाह ने विजेंद्र की ओर देख दुम हिलाने की कोशिश की, उसकी आँखों से पानी बहने लगा और अंतिम खींच के साथ ही मर ग़या।

लहू घीरे घीरे जमता ग़या। कहीं से मक्खियाँ आयी। उन मक्खियों को विजेंद्र देखता रहा।

नौकर आया। अलेशेशियन कुत्ते के शब को उसने खींचा तो मक्खियाँ भिनभिनाकर एक बार उड़ ग़ई...और वापस जमे लहू पर बैठ ग़ई...लहू के दाग़ साफ कर दिये ग़ये...डाइनींग़ टेबल स्वच्छ किया ग़या। नौकर आया, ग़या। वापस आया। किन्तु विजेंद्रü वैसे ही बैठा रहा।

उसी टेबल पर चाय रखी ग़ई। वह खड़ा हुआ। खिड़की के पास ग़या। बाहर की पहाडिंयों की ओर सूरज ढल रहा था। खिड़की से कूद बाहर जाने की इच्छा उसने रोक दी। पास के दरवाजे से बाहर निकल पहाड़ियों की ओर चलने लगा।

लाल मिट्टी वाला रास्ता हरी पहाड़ियों के बीच कुंकुम की तरह शोभायमान हो रहा था। ढलते सूरज की किरणों में सब निर्मल लग़ रहा था।

पहाड़ियों को देखते हुए वह ढलान चढ ग़या। दूसरी ओर उतरना था।

तीव्र ग़ति से वह पहाड़ी से उतरा।

फिर थोड़ी देर रुका।

नीचे वाले भाग़ की ओर खुदी ग़ई ताज़ा मिट्टी देख उसके पैर उस ओर बढ़ने लगे।

लाल मिट्टी की ओर देखा। खुदी ग़ई जग़ह अलग़ ही दिख रही थी।

यकायक अल्शेशियन कुत्ते का शब उसे याद आ ग़या।

खुदी ग़ई लाल मिट्टी के पास वह बैठ पड़ा।

यहाँ, इस जग़ह पर ही शायद बादशाह को दफनाया ग़या होगा।

ग़ङ्ढे की सारी मिट्टी निकल देने का मन होने लगा। उसने इधर-उधर देखा।

चारों ओर कोई नहीं था।

चारों ओर छोटी-बड़ी हरी हरी पहाड़ियाँ मौन खड़ी थीं।

निकट के एक छोटे वृक्ष पर उसने ध्यान से देखा।

पहाड़ी कौआ देखने की संभावना ग़लत थी।

मिट्टी को निकाले बिना ही वह खड़ा हुआ। हथेली की लालिमा देख दूसरी ढलान चढने लगा।

ऊपर पहुँचकर उसने सूरज को देखा।

फिर दौड़ते हुए वह ढलान उतर ग़या।

अब सूरज न दिखता था।

सामने की पहाड़ी पर यों ही चढ़ने लगा।

उपर कुछ पल रुका रहा।

लाल दिखता सूरज का गोला गोल गोल घूमता है कि नहीं, जानने के लिए वह सूरज की ओर देखता रहा।

कुछ समझ में नहीं आया। आँखें खुली ही थीं। चारों ओर प्रकाश फैला था फिर भी अंधकार... गाढ अंधकार आँखों के सामने उभर रहा था, दूसरा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हरी हरी पहाड़ियाँ, लाल मिट्टीवाला रास्ता, अल्शेशियन को दफनाया था वह जग़ह, पहाड़ी कौआ, पीली तितली, ‘पीली' पंछियों का समूह...कुछ भी नज़र न आता था। कुछ भी नहीं...कुछ भी नहीं।

दोनों आँखें खुली थीं। सूरज डूबा नहीं था, किरणें फैली थीं। फिर भी आँखों के सामने उभर रही कालिमा से कुछ सूझ नहीं रहा था।

वह बैठ पड़ा।

एक प्रकार के डर से मानो वह कालिमा भाग़ ग़ई।

अब आँखों के सामने लाल रंग़ के बिंदु...पीले रंग़, सब दिखने लगे।

उसे मजा आ रहा था।

दोनों आँखें उसने मसलीं। देर तक मसलता रहा।

ऑंख से पानी झरने लगा।

कुछ देर बाद हरी पहाड़ियाँ देख वह आनंदित हो उठा।

अब थोड़ी देर के बाद ‘पीली' पंछियों का समूह कत्थई छींटवाले पीले पंखों को पसारता हुआ आयेगा। उसके सिर पर से पसार हो जायेगा। वह देखा करेगा। सूरज डूबेगा...किरणें पिघल जायेगी। अंधकार फैल जायेगा...वहाँ तक वह बैठा रहेगा, देखता रहेगा।

कोमल पंखवाली पीली तितली, पहाड़ी कौआ, सभी की राह वह देखा करेगा। उसके बाद खड़ा हो जिस ढलान पर वह चढा है उससे उतरेगा। तलहटी के अंधकार को चीर वह दूसरे ढलान पर चढेगा...उतरेगा...फिर अल्शेशियन को जहाँ दफनाया है वहाँ खड़ा रहेगा और फिर दूर दूर दिखती दीपक की रोशनी की ओर आगे बढ़ेगा।

यहाँ अंधेरे में बैठकर विस्तृत आकाश के असंख्य सितारे गिन-गिन कर भूल जाने का मजा आयेगा-सोच उसके चेहरा हँसी से भर उठा।

सूरज अब एक ऊँची पहाड़ी के पीछे छिप ग़या था।

पीले पंखवाले ‘पीली' पंछियों का एक झुंड पसार हुआ, किन्तु दूर से।

वह देखता रहा।

तितली कहीं भी नज़र नहीं आ रही थी।

पहाड़ी कौआ शायद आज जल्दी घोंसले में चला ग़या हो।

यहाँ से सीधे जाकर सामने की दिशामें चलकर बाई ओर मुड़ जाने की इच्छा उसे हुई। आगे कोलतार का रास्ता था। सबेरे छोटा बोर्ड उसने पढ़ा था। जलपाईगुरी-130 किलोमीटर...शाम को ट्रकों का हल्ला...और...

दोनों स्त्रियाँ उसे याद आ ग़ईं।

स्त्री के संग़ अधिकतर पुरुष सालों गुजार देते हैं, ऐसा उसने सुना था। ट्रेनिंग़ के बीच शादी करके झूठे टेलिग्राम करवाकर छुट्टी लेकर पवन की ग़ति से भाग़नेवाले युवा अफसरों को उसने देखा था।

किन्तु उस वक्त उसे पता ही न था। वह तो स्त्रियों के पीछे दौड़नेवाले उन अफसरों के प्रति घृणा, तिरस्कार और नफरत का ही भाव था। दूसरा कुछ नहीं।

वैसे तो वह स्वयं ही ग़लत था। जीवन के ग़णित की गिनती वह ग़लत कर रहा था।

किन्तु आज तो उसने स्त्री को देखा था। बहुत निकट से देखा था। और उसके मन में स्थित तिरस्कार मोम की तरह पिघल पानी पानी हो ग़या था।

जन्म से आजतक शायद वह स्त्री के निकट रहा ही न था। आज वह उसके पास पहुँच ग़या था।

जन्म तिथि उसने याद कर ली।

चौबीसवाँ साल बीत रहा था।

चौबीस चौबीस सालों तक, सौ महीनों तक, हजारों दिनों तक, लाखों मिनटों तक, करोडों सेकन्डों तक वह स्त्री से वंचित रहा था। इतने सालों तक वह स्त्री को जान ही न पाया था, पहचान ही न पाया था।

और आज यकायक एक स्त्री उसके सामने खड़ी थी।

कार के बिग़ड जाने के कारण रास्ते के किनारे खड़ी अति सुंदर युवती उसे फिर से याद आयी।

उस दिन उस सुंदर युवती को उसने ध्यानपूर्वक देखा था। उसके शरीर के एक-एक मरोड़ को रसपूर्वक देखे थे। मजा आ ग़या था। मन कर रहा था कि उसे हाथों में उठा दौड़ता रहता, बस, दौड़ता रहता, दौड़ता रहता...

किन्तु...

ज्वाला मुखी जैसे ग़र्म उच्छवास को जोर से त्याग़ उसने ऊँची पहाड़ियों की धार की ओर देखा।

सूरज लग़भग़ डूब चुका था। उजास कम ही था। उसके सिर के उपर से ‘पीली' पंछियों का समूह पसार हो ग़या था। पहाड़ी कौआ भी छोटे वृक्ष की डाल पर क्षणभर बैठ उड़ ग़या था।

अनंत आकाश से उतर रहे अंधकार की ओर देख उसने खड़े होने चाहा। उसने एक हाथ को, आधार के रूप में खुरदरी धरती पर रखा भी। किन्तु सिर पर से पंख फैला कर जा रहे ‘पीली' पंछियों ने उसे रोका।

वह श्यामल आकाश की ओर देखता ही रह ग़या।

‘पीली' पंछियों का समूह तीव्रता से गुजर ग़या।

पंखों के रंग़ ही को पहचान पाया।

अंधेरा हो चुका था।

विजेंद्र अफसोस करने लगा।

‘ऐसे अंधकार में यदि वह युवती मिलती तो ? '

‘पीली' पंछियों के अनदेखे पंख उसे याद आये।

एक बार फिर अफसोस करने लगा।

वह सोच ही में था कि वे ‘पीली' पंछियों, उनके खुलते-बंद होते कत्थई रंग़ के छींटवाले पीले पंख, अंधकार के कारण अफसोस, सुंदर युवती... और ऐसे ही मनभावन विचारों में खोया था कि वहाँ उसकी गोद में एक छोटा लिफाफा आ गिरा।

वह चौंका।

पीछे पिताजी-बसवेश्वरसिंह खड़े थे।

विजेंद्र ने छोटा लिफाफा खोला। वैसे तो वह खुला ही था। अंदर से एक फोटोग्राफ निकल पड़ा।

फोटो को हाथ में ले ध्यानपूर्वक देखने की कोशिश की। ताक-ताककर देखा। किसी युवती का आकार सामने आ ग़या या आभास मात्र हुआ ? कुछ पता न चला। किन्तु कुछ क्षण पूर्व ही वह सुंदर युवती के बारे में सोच रहा था, वह सोच ओस बिंदु की तरह फैल ग़ई। मन के हरेक हिस्से में मोती जैसे बिंदु फैल ग़ये थे और उन हरेक बिंदुओं में सुंदर युवती दिख रही थी। सुंदर स्त्री। रास्ते के किनारे खड़ी युवती ही थी।

विजेंद्र ने फोटो फिर हाथ में लिया। सितारों ने कोई साथ न दिया। आँखें भी पीछे हट ग़ई। वहीं तो बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने लाइटर से चिरुट जलायी। उस थोड़े पीले प्रकाश में उसने आँखें खींची किन्तु पीली रोशनी अब बुझ चुकी थी। धुऑं गोल हो पीछे की पहाड़ी की ओर मुड़ रहा था।

‘उस पत्र के साथ यह फोटो भी आया है। पसंद आये तो कहना'। - कह बसवेश्वरसिंह राठौड़ प्रगाढ होते जा रहे अंधकार के बीच से रास्ता खोज आगे चलने लगे।

विजेंद्र पिता जी की परछाई-सी आकृति को देखता रहा। फिर खड़ा हुआ। वह तेजी से ढलान उतर ग़या।

मकान पर पहुँच सबसे पहला काम उसने फोटो देखने का किया।

ड्रोइंग़ रूम में जलती एक विशिष्ट प्रकार की चिमनी के उज्जवल प्रकाश की ओर उस फोटो को धर दोनों आँखें उसने स्थिर कीं।

वह चौंक उठा। खुशी से थरथरा उठा। जोर से साँस वह ले बैठा। दोनों आँखें अनजाने ही में बंद हो ग़ई।

आज सुबह कोलतार के रास्ते के किनारे देखी युवती उनकी पलकों में बंद हो ग़ई थी।

सुंदर युवती, सुंदर चेहरा, चढ़ती जवानी, सब उसकी बंद पलकों के सामने बाढ की तरह दौड़ आया। और मस्त मजे की बाढ़ में वह बहने लगा।
 
5

बसवेश्वरसिंह राठौड़ शायद अपने इकलौटे बेटे की तीव्र उत्कंठा को महसूस कर रहे थे। किन्तु आज तक के जीवन में उन्होंने कभी भी भाव प्रकट ही न किये थे। उनकी प्रकृति ही कुछ अलग़ थी। कड़ा अनुशासन, हँसी से नफरत, अकेले रहने की आदत, ये सब उनकी महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। अपने इकलौटे बेटे के साथ भी वे मेच नहीं हो पाये थे किन्तु...

उन्होंने ऐनक से ताक कर देखा।

विजेंद्र की पलकें अभी तक बंद थीं। शायद मधुर भावों के बंधन में बंध चुका था। उसके पास का फोटो चिमनी की रोशनी में चमक रहा था।

जोश से पुकार मचाने की इच्छा उन्होंने दबायी, किन्तु पुत्र को अनुशासन हीनता से जगाने के लिए वे खाँसना न टाल सके।

विजेंद्र ने आँखें खोलीं, पास के दरवाजे की ओर देखा। फिर मन ही मन शरमा कर बैचेनी महसूस करने लगा।

उसके हाथ से उस युवती का फोटो सरक नीचे जा गिरा था।

उसने इधर-उधर देख, सहजता से, मुडे न, वैसे फोटो को उठा लिया। नज़र अनायास ही उस चेहरे पर थिर हो ग़ई। मन ही मन निर्णय ले लिया। ऐसी सुंदर युवती पत्नी के रूप में, यदि स्त्री विहीन घर में आये तो उससे अच्छा ओर क्या हो सकता है !

वह अब तक सोच ही में डूबा था वहाँ बसवेश्वरसिंह के बोझिल कदमों की आहट का आभास उसे हुआ।

जानबूझकर उसने उन कदमों की ओर अनदेखी की।

कुछ ही देर में तो उसके कंधे पर बोझिल हाथ रखा ग़या। और उसके साथ ही भारी आवाज़ सुनाई दी, ‘निर्णय ले लिया ? '

विजेंद्र बैचेन हो उठा। वह चुप ही रहा।

‘तुझे अब निर्णय कर लेना चाहिये। अब तू सब कुछ समझ सके वैसा जिम्मेदार अफसर है'। बाजू की कुर्सी पर बसवेश्वरसिंह राठौड़ बैठे।

युवा लड़के की शादी की बातें वह योग्य रीति से रख नहीं पा रहे थे। साठ के पास की उम्र में बहुत बैचेनी हो रही थी। किन्तु अनुशासन के अतिरिक्त वे ओर कुछ समझते ही न थे। इसलिए दूसरी कौन-सी बात करें ? कौन-सी हकीकत बयान करें ?

कुछ देर वे मूँछ पर हाथ फेरते रहे। फिर आँखों से एनक उतार काँच साफ करते रहे। फिर भी बेचैनी कम नहीं हो रही थी। अत: डिबिया से चिरूट निकाल, जलाकर धुऑं निकालते रहे।

बोझिल खामोशी कमरे में छा ग़ई थी।

विजेंद्र बेचैनी महसूस कर रहा था। बसवेश्वरसिंह राठौड़ बेटे की परेशानी जानते थे। किन्तु मजबूर थे। स्वभाव आड़े आ रहा था। एक के बाद एक चिरुट का कस लेते उन्होंने कुर्सी में सीधे बैठते हुए पेन निकाल विजेंद्र की ओर रखा।

युवा बेटे ने पिता के हाथ से पेन ले लिया। और तुरंत उस फोटो पर लिखा-‘यस'। और पेन और फोटो पिता की और सरकाकर खड़ा हो ग़या।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने पढ़ा। फिर ‘हाँ' में सिर हिला रहे हो वैसे सिर झुकाकर अपने कमरे में चले ग़ये।

डाइनींग़ टेबल सजाया ग़या तब तक वे कुछ लिखते रहे। शायद पत्र लिख रहे थे। और फिर आराम से खाना खा रहे हो वैसे दोनों खाते रहे।

पहाड़ियों से घिरे इस प्रदेश में शाम जल्दी उतर आयी थी। विजेंद्र बाहर जाना चाहता था, सारी रात टहलकर बिताना चाहता था। और इसी अनुमान से अपने कमरे की खिड़की खोल बाहर देखा।

ठंडी हवा का झोंका कमरे में आ ग़या। अंधकार इतना घना था कि दस फिट दूर की वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं थीं। ऐसे अंधकार ही में युवाओं को टहलना चाहिये। ऐसा सोच उसने होलबूट पहने। ग़र्म कोट पहन मफलर ग़ले में लपेटा। और कुछ भी कहे बिना निकल पड़ा।

बाहर तो कुछ देर उसे कुछ दिखा ही नहीं।

कहाँ जाना, किस ओर जाना, कहाँ पहुँचना, कुछ भी निश्चित नहीं था।

मन ही मन दिशा निश्चित करने का प्रयास उसने कर देखा। किन्तु कुछ भी सूझ नहीं रहा था। अंत में छोटे-छोटे दीपक की-सी रोशनी की ओर वह चलने लगा।

अल्शेशियन बादशाह की याद हो आयी। वह जिंदा होता तो इस समय उसके साथ होता। किन्तु...

ठंडे पवन को चीरते हुए वह आगे बढा।

अब तो जरा-सी भी रोशनी नहीं दिखती थी। उसे लगा कि वह ढलान उतर नीचे पहुँच चुका है।

जिधर पैर ले जा रहे थे, जा रहा था।

देर तक वह घूमता रहा। आकाश के तारों को गिनता रहा, पीले पंखों में कत्थई रंग़ की छींटवाले ‘पीली' और फिर रास्ते के किनारे खड़ी युवती को याद करता रहा।

मजे की लड़की थी। पीले पंखवाली कोमल तितली जैसी।

विजेंद्र का मन करने लगा कि कोलतार के रास्ते पर निकल पडना चाहिये। किन्तु इस वक्त, इस रात्रि में कुछ याद नहीं आ रहा था। सड़क की ओर निकलने वाला लाल मिट्टी वाला रास्ता वह भूल ग़या, यदि उसी रास्ते से जाता तो उस बोर्ड के पास रुकता। रात के अंधकार में कुछ दिखेगा नहीं। किन्तु बोर्ड के शब्द ‘जलपाइगुरी-130 किलोमीटर' ऐसा बोर्ड मन ही मन वह पढ़ लेता। सोच में डूबा वह देर रात तक पहाड़ियों के बीच यों ही टहलता रहा। अल्शेशियन बादशाह की कब्र के पास दौड़ जाने की इच्छा हो आयी। किन्तु...

घर की ओर वह चलने लगा। किन्तु अब वह घर, घर की दिशा, पग़दंडी जैसे रास्ते को वह भूल ग़या था।

कुछ देर वह सामने की ओर चलता रहा। सभी दिशाएँ समान लग़ रही थीं।

थोड़े दूर जाकर उसने निर्णय बदला। एक चक्कर लगा वह दूसरी ओर घूमा।

अब तो कुछ भी दिखता न था। न कोई मकान, न कोई आबादी, न कोई रोशनी और न ही कोई दिया।

अब ?

उसे कोई भय न था। मन हँसना चाह रहा था। खिलखिलाकर हँसने की इच्छा उसने दबा दी। किन्तु फिर भी चेहरे पर हँसी फूट ही निकली।

कुछ पल वह हँसता रहा।

यहाँ न कोई अनुशासन, न कोई रोकटोक, न किसी की शर्म, न संकोच, कुछ भी न था। वह था, अंधेरी रात थी। दिन के उजाले में हरी हरी दिखती पहाड़ियाँ थीं।

कुछ सोचते-सोचते अंधेरे ही में वह चलने लगा। वह कहाँ जा रहा है, किस ओर जा रहा है, कुछ पता न था। अनजान बनकर पहाड़ियों के बीच रास्ता भूल जाने का भी एक अनोखा आनंद था।

किसी निश्चित जग़ह पर जा रहा हो वैसी त्वरा से आगे बढ़ते हुए उसने सोचा, मनुष्य जितना अधिक जानता है, उतना ही भूलता है। सबसे अच्छा तो यही है कि कुछ भी न जानना। अनजान बने रहना ही अच्छा...

यकायक उस सुंदर युवती का स्मरण हो आया। वह तो उसके बारे में कुछ भी जानता न था। वह भी उसे नहीं जानती होगी। दोनों अजनबी। और अनजाने में ही दोनों मिलेंगे तब ?

पैर से कुछ लिपट ग़या। होल बूट थे अत: कोई तकलीफ न हुई। शायद कोई जीव था... साँप था... या कि अजग़र।

बड़े अजग़र मनुष्य को भी निग़ल जाते हैं - विजेंद्र को याद हो आया। यदि कोई अजग़र उसे निग़ल लें, तो ?

अपना आधा शरीर अजग़र निग़ल ग़या है- की कल्पना उसने की। अजग़र के पेट की ग़रमी, उमस और टूटती हड्डियों की पीड़ा...

वह अभी सोच ही रहा था कि तेजी से दौड़ता हुआ कोई प्राणी दूसरी पहाड़ी की ओर भाग़ ग़या।

शायद स्यार था, खरगोश भी हो सकता है।

अंधेरे में पहचाना नहीं ग़या।

प्रगाढ अंधेरा कितना सुंदर लग़ रहा था।

उसे अपने एक मित्र की याद हो आयी।

सैनिक स्कूल में दोनों साथ थे। सुंदर था, अच्छे घर का था। उसकी शादी हो चुकी थी। वह कहता था कि उसकी पत्नी बहुत काली है। काली ही नहीं, मुँह के उपर चकते के निशान थे और एक ऑंख से टेढी। माँ-बाप की इच्छा के कारण उसने शादी की थी। उसने शादी से पहले किसी से वादा किया था।

दोनों वादा तोड़ना नहीं चाहते थे। परिवार खानदानी था। शादी के बिना कोई चारा ही न था। अफसर मित्र पत्नी को देखना भी न चाहता था किन्तु...

विजेंद्र ने रास्ता बदला। घने अंधकार में कुछ भी सूझ नहीं रहा था, वह कहाँ जा रहा है, घर किधर था...इस ओर क्या है ? कुछ भी मालूम नहीं हो रहा था। और बेखबर हो वह आगे बढ़ रहा था।

उस युवा मित्र की याद तीव्रता से आ रही थी। वह घर अवश्य जाता था। किन्तु उस ट्रेन में जाता जो उसे रात को घर पहुँचाती। रात में दिया या चिमनी जलाने की मनाही थी। काले काले अंधेरे में पत्नी को प्यार करता और सबेरे तो वापस ट्रेनिंग़ में आ जाता। विजेंद्र ने यों ही अंधेरे में देखा।

वह खड़ा रहा।

चारों ओर देखा। कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखता था। वह कहाँ है, सामने क्या है, वह क्या देख रहा है...कुछ भी पता न था। और इसलिए मजा आ रहा था। अनजानी धरती पर अंधेरे में टहलने का मजा वह खोना नहीं चाहता था। वह फिर से चलने लगा।

कितने बजे होंगे ? वह अनुमान करने लगा।

घर से निकले लग़भग़ तीन-चार घंटे बीत चुके होंगे-का अनुमान उसने लगाया। मन में जरा-सा भी रंज न था। बल्कि उसे तो मजा आ रहा था। थकावट का तो नामोनिशान तक न था।

एकदम पास से आ रही उल्लू की चीत्कार सुन वह खड़ा रह ग़या।

घू... घू... घू... घरर... धू...

फटे कंठ से निकली चीत्कार की भयंकर रूप से प्रतिध्वनि हो रही थी। पहाड़ियों की कठोर काया से टकराकर टूट बिखरती वह ध्वनि दूर दूर बह जाती थी।

उसने उल्लू को देखना चाहा। उल्लू शायद अपने आपको देख रहा होगा। रात को उसे सब कुछ दिखाई देता है- मान्यता विजेंद्र को याद आई। फिर उसने यों ही सोचा। यदि वह भी उल्लू की तरह घने अंघकार में देख पाता तो ?

उल्लू के चीत्कार की भयंकर प्रतिध्वनि को पार कर आगे बढ़ ग़या।

शायद वह किसी पहाड़ी पर होगा। यहाँ से बराबर सामने की ओर प्रकाश का एक वर्तुल आभासित हो रहा था।

सामने की ओर वह बढ़ने लगा।

किन्तु थोड़ी देर ही में भूल ग़या।

अब प्रकाश दिखाई नहीं देता था।

फिर भी वह बढ़ता ग़या। आगे, और आगे।

ऐसे ही चलते-चलते यदि कोलतार की सड़क आ जाय तो वह उस बोर्ड के पास रुकेगा...जलपाइगुरी-130 किलोमीटर, के लिखित रूप की कल्पना कर आगे बढ़ जायेगा।

वह और अधिक तेजी से चलने लगा।

उसके पैरों की ग़ति से विचारों की ग़ति अधिक तेज थी। वह सोचते सोचते चल रहा था। बहुत सारे विचार आ-जा रहे थे।

विचोरों में बह वह आगे जा रहा था कि रायफल का बार सुनाई दिया...

वह चौंका, खड़ा रह ग़या।

प्रतिध्वनि सुनाई दे रही थी ओर वह सोचता रहा...

अल्शेशियन बादशाह की याद आयी। किन्तु वह तो मर चुका है। ‘अब किसकी बारी ? '

उस रायफल के बार जैसा विचार उसके दिमाग़ में बार-बार प्रतिध्वनित होता रहा था ‘...अब किसकी बारी होगी...अब किसकी बारी होगी...? '

*************
 
6

विजेंद्र जब घर पहुँचा तब घड़ी मे तड़के की सुस्ती थी। चार बज दस मिनट पर सुई अटक ग़ई थी। शायद अभी ही बंद हुई हो।

वह अपने कमरे में ग़या।

बाजू से कुछ आवाज आ रही थी। खिड़की से उसने देखा, दो नौकर भेंकर के मृत शरीर को व्यवस्थित रूप में चीर रहे थे। खाल उतार चुके थे और अंगों के टुकड़े कर रहे थे।

कुछ देर वह उस मृत पशु को देखता रहा। लाल लाल मांस के पिंड को देख कोई भाव न जन्मा। उसने सोचा, वह जब भूलभूलैयावाली पहाड़ियों के बीच अंधेरे में घूम रहा था तब रायफल के बार की प्रतिध्वनि देर तक सुनाई दे रही थी। वह बार इसी भेंकर के लिए किया ग़या होगा।

उसने खिड़की बंद कर दी।

बिछौने की तैयारी की।

चिमनी की रोशनी एकदम कम करने के लिए छोटे चक्र की ओर हाथ लंबा किया तो वहीं उसकी नज़र उस फोटोग्राफवाले लिफाफे पर ग़ई।

उसने लिफाफा उठाया।

खाली लिफाफे की ओर वह ताकता रहा।

कुछ याद किया। फोटो तो उसने बसवेश्वरसिंह राठौड़ को ‘यस' लिख, दे दिया था। शायद ग़लती की थी। फिर सोचा, नहीं, उसने ग़लती न की थी। ‘यस' लिखकर ठीक ही किया था।

चिमनी का चक्र घुमा उसने रोशनी को बाहर निकाल दिया। घने काले अंधकार ने कमरे में प्रवेश किया।

बिछौने पर वह टेढ़ा पड़ा रहा।

खुली आँखों से युवती के सुंदर चेहरे को बराबर याद करने लगा।

सुंदर चेहरा मन ही मन देखते-देखते पलकें कब मूँद ग़ई और वह कब सो ग़या, पता ही न चला।

नास्ते के लिए बसवेश्वरसिंह उसकी राह देख रहे थे।

नौकर ने कहा -‘छोटे साहब अब भी सो रहे हैं'।

उन्होंने कुछ भी न कहा।

नाश्ता कर, चिरूट सुलगाकर, हाथ में वॉकिंग़ स्टीक ले वे पहाड़ियों की ओर निकल ग़ये तब अपने इकलौटे युवा पुत्र की शादी की सोच के घोडे मन पर सवार हो ग़ये।

* * *

विजेंद्र ने अपने हाथ को देखा।

मजबूत हथेली की रेखाओं में हल्दी का पीला रंग़ विशिष्ट प्रकार से फैल ग़या था कि उन ‘पीली' पंछियों के पंख उसे याद आ ग़ये। पत्नी के हाथ की हथेलियाँ देखनी बड़ी अच्छी लगी होतीं, किन्तु ट्रेन की भीड़ में यह संभव न था।

फिर भी उसने पत्नी के आकार की ओर देख लिया।

शायद वह शिशे के आरपार देख रही थी। शायद ग़हरी सोच में पड़ी हो...शायद अपनी ही...

विजेंद्र ने हँसना चाहा। उसके भरे-पूरे चेहरे पर हँसी की कुछ रेखाएँ उभर रही थीं।

शादी बहुत उतावली से की ग़ई थी। किन्तु ट्रेन का सफर बहुत लम्बा था। फर्स्ट क्लास में भी जग़ह न थी। बसवेश्वरसिंह राठौड़ बाजू के कंपाट्र्मेंट में शायद बर्थ पर नींद ले रहे होंगे। उसे नींद नहीं आ रही थी।

उसने घड़ी में देखा, चार बजकर चालीस मिनट हो चुके थे। छतीस घंटे बीत ग़ये हैं। सुबह सात बजकर सताइस मिनट पर ट्रेन स्टेशन पर पहुँचेगी। उसके बाद तीन घंटे कार में...

दस-ग्याहर बजे तो वह पत्नी को लेकर हरी हरी पहाड़ियों के बीच के अपने घर पहुँच जायेगा।

शरीर में चेतना आ ग़ई।

हरी हरी पहाड़ियों की याद से मन बहलने लगा और सामने सारा प्रदेश छा ग़या।

ट्रेन चलती रही। घड़ी की सूई चक्कर लगाती रही।

* * *

जयजयवंती ने कार से उतर कर देखा।

उसकी सारी थकावट दूर हो ग़ई।

जहाँ देखो वहाँ बस ढलान ही ढलान, एक-दूसरे में समा जाती पहाड़ियाँ, हरे हरे वृक्ष, उड़ रहे पंछी, लाल मिट्टी की पग़दंडियाँ और निर्मल आकाश...

कुछ पल वह देखती रही।

सब कुछ जाना-पहचाना लग़ रहा था।

उसका मन खिल उठा।

खुशी से पाग़ल हो उसने गृह-प्रवेश किया।

यात्रा की सारी थकान मानो उतर ग़ई थी।

कुछ वस्तुएँ उसने करीने से रखवायीं। नारी विहीन घर में बरसो बाद नारी के कदम पड़े थे।

सारे घर का माहौल ही बदल ग़या था। और बसवेश्वरसिंह राठौड़ घर की बदली रौनक को देख-देख चिरुट पी रहे थे।

शाम को जयजयवंती ने स्वयं ही हरी-हरी पहाड़ियों पर जाने का प्रस्ताव रखा।

विजेंद्र हँसा। जयजयवंती उसके साथ बहुत जल्दी हिलमिल ग़ई थी।

उसने सिर झुकाया। हाँ में हँसा। जयजयवंती ने भी हँस दिया।

विजेंद्र ने पत्नी का हाथ थामकर चूमा। और दोनों हरी-हरी पहाड़ियों की ओर चल पड़े। पंख में पंख पिरोकर उड़ते पंछियों की तरह दोनों दौड़ते जा रहे थे।

पहाड़ी की चोटी पर पहुँच दोनों एक काले पत्थर पर बैठ ग़ये।

आकाश यहाँ से बहुत करीब लग़ रहा था। हाथ ऊँचा कर पकड़ने लायक।

जयजयवंती ने अपना हाथ यों ही ऊँचा किया।

फिर उसने आकाश की ओर देखा।

ढल रहे सूरज की अंतिम किरणें आकाश रूपी दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही थी। आकाश दैदीप्यमान एवम् सुहावना प्रतीत हो रहा था।

विजेंद्र आकाश की ओर नहीं किन्तु जयजयवंती के मांसल हाथ की ओर, पहाड़ी कौए की तरह ताक रहा था।

‘यहाँ से आकाश बहुत करीब है न ? ' खिल रहे फूल-सी हँसी बिखेरते हुए जयजयवंती ने कहा।

‘नजदीक लग़ता है उतना ही। किन्तु नजदीक है तो नहीं... '

‘तो नजदीक है क्या ?'

‘जयजयवंती... ' कहकर विजेंद्र ने मानो उसे अपने ही में समा लिया।

सूरज ढलता रहा। किरणें सिमटती रहीं। पंछी अपने-अपने घोंसले की ओर जाते रहे।

‘देखो तो, पहले देखे थे वैसे ही पंछी आ रहे हैं। '-जयजयवंती ने सामने से उड़े चले आ रहे पंछियों की ओर ऊँग़ली दिखाई।

विजेंद्र ने देखा।

उसने कुछ भी न कहा।

‘पीली' पंछियों का समूह कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंख फैला पसार हो ग़या।

‘पंछी आकर्षक हैं'।

‘उनके पंख बहुत ही सुंदर होते हैं'।

‘हा, रंग़ कितने सुहावने हैं ? '

विजेंद्र मौन ही रहा। उड़ते आ रहे दूसरे पंछियों की ओर वह देखता रहा। बाद में सामने की पहाड़ी की ओर आँखें घूमा कर कहा-

‘हमें कोई देख रहा है... '

यकायक विलग़ हो जयजयवंती ने चारों ओर देखा।

कोई भी न था।

निष्कपट प्रश्रवाचक नजरों से उसने विजेंद्र की ओर देखा।

‘मेरा एक दोस्त है। पहले जब मैं यहाँ अकेला आता, तब भी वह मुझे देखता था। आज जब मेरे साथ कोई और है तब भी वह... '

जयजयवंती ने एक बार फिर चारों ओर, पहाड़ियों की तलहटी की रिक्त भूमि को देखा।

कोई न था।

उसका चेहरा मानो कह रहा था- ‘कोई नहीं है...कोई भी नहीं है... '

‘देखो... ' विजेंद्र ने बताया।

सामने की पहाड़ी के ऊपर के छोटे वृक्ष की एक टहनी पर बैठ पहाड़ी कौआ चुपचाप, ध्यान से, ग़र्दन घुमा-घुमाकर इन दोनों की ओर देख रहा था।

जयजयवंती खिलखिलाकर हँस पड़ी।

उसकी हँसी की प्रतिध्वनियाँ पहाड़ियों से टकराकर न जाने कितनी देर तक सुनाई देती रही ...हा हा हा हा हा हा...

**********
 
7

प्रात: और शाम को घूमने जाने का क्रम निश्चित हो ग़या।

हरी हरी पहाड़ियाँ मानो उन्हें अपने पास बुलाया करती थीं।

‘पीली'पंछी बार-बार निमंत्रण दे रहे थे।

कोमल तितलियाँ ललचा रही थीं।

और वह पहाड़ी कौआ...

जयजयवंती अकेले ही हँस पड़ी।

विजेंद्र ने देखा...फिर कहा, ‘हँसी क्यों ? '

‘पहाड़ी कौए की याद आ ग़ई। उस दिन कितने ध्यान से हमें ताक-ताककर ग़र्दन झुकाकर देख रहा था ? '

विजेंद्र भी हँस दिया।

दोनों देर तक हँसते रहे।

फिर उसे यकायक याद आया। झुककर कहा- ‘पिता जी को कोई भी उनके सामने हँसें वह पसंद नहीं है। जरा संभालना'।

‘इन हरी-हरी पहाड़ियों के बीच तो हमें हँसना ही चाहिये। जितनी इच्छा हो, हँसना चाहिये...दिल खोलकर हँसना चाहिये... '

‘हँसने की यहाँ छूट नहीं है। हँसना हो तो पहाड़ियों पर आना'। दोनों हँस पड़े।

फिर चुप हो ग़ये। थोड़ी ही देर में वे तैयार हो पहाड़ियों की ओर निकल पड़े।

विजेंद्र रुक ग़या।

पहाड़ी की तलहटी की लाल मिट्टी की ओर देखा।

जयजयवंती कुछ समझ न पायी।

‘क्या है ? '

‘यहाँ बादशाह को दफनाया ग़या है'।

‘बादशाह ? कौन बादशाह ? '

‘अल्शेशियन डॉग़'।

जयजयवंती पास ग़ई।

सामान्य ग़ङ्ढा और मिट्टी खुदी ग़ई थी सिर्फ वह जग़ह दिखती थी।

‘मर ग़या होगा ? '

‘जानबूझकर मारा ग़या था'।

‘हडगाया होगा ? '

‘ना'।

‘तो ?'

‘डिसिप्लिन'।

‘डिसिप्लिन ? '

‘हाँ, बादशाह को भी डिसिप्लिन रखनी चाहिये। एक दिन मुझसे दुलार करते-करते डाइनींग़ टेबल पर चढ़ बैठा। फिर चिकन की तश्तरी में मुँह डाल हड्डी चबाता रहा...और फिर उस पर गोली दागी ग़ई'।

‘तुम ऐसे फौजी अफसर डिसिप्लिन को अधिक महत्व देते हो'।

‘महत्व ही नहीं, मिलिट्री एक्ट में जीवन का दूसरा नाम ही डिसिप्लिन है'।

‘किन्तु यह को एक कुत्ता था। पालतू प्राणी...तुम्हें थोड़ा तो सोचना चाहिये ? अल्शेशियन डॉग़ कितना महँगा होता है ? '

‘मैंने नहीं, पिताजी ने, मेजर बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने मारा था'।

जयजयवंती मौन ही रही।

खामोशी की एक बड़ी लहर फैल ग़ई।

घीरे से विजेंद्र आगे बढ़ा।

थोड़े आगे बढ़कर उसने देखा।

जयजयवंती अब भी वहीं खड़ी थी। खुदी लाल मिट्टी की ओर देख रही थी।

विजेंद्र भी खड़ा रहा। उसे बुलाने की इच्छा हुई, किन्तु वैसा न कर पाया। जयजयवंती को बुला न सका।

दौड़ते हुए पहाड़ियों पर चढ़ने की इच्छा को ब्रेक लग़ती रही।

आहिस्ता आहिस्ता बूढों की तरह दोनों ऊँचे भाग़ पर पहुँचे।

बादल बिखर रहे थे। खाई की ओर से कुहरा उपर उठ रहा था। ‘पीली' के समूह पहाड़ियों के पीछे से उड़कर सामने की ओर आ रहे थे।

दोनों बैठकर यों ही आकाश को देखते रहे।

थोड़ी देर तक दोनों मौन ही रहे। बैठे बैठे ही कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंखों के फैलाव को देखते रहे।

बादशाह के अकुदरती मौत के मान में दोनों मौन रहे।

सामने की पहाड़ी के वृक्ष की टहनी पर पहाड़ी कौआ नहीं था।

विजेंद्र ने सोचा, उसने बादशाह की मृत्यु की बात छेड़ी ही न होती तो अच्छा होता।

किन्तु वह मजबूर था। खुदी ग़ई लाल मिट्टी को देख सब कुछ याद हो आया था और वह जयजयवंती से कह बैठा।

वह सोच ही में था कि उसके पैर पर कोमल कोमल तितली आ बैठी।

जयजयवंती ने उस ओर देखा। देर तक देखती ही रही। फिर धीरे से हाथ फैलाकर ऊँग़लियों से पकड़ लिया।

थोड़ी फडफड़ाहट, मुक्त होने की तमन्ना, और अब फिर न आने का निर्णय, विजेंद्र घड़कते दिल से महसूसता रहा। फिर कहा-‘छोड़ दो, उसके कोमल कोमल पंख टूट जायेंगे... '

जयजयवंती ने दोनों ऊँग़लियाँ खोल दीं।

तितली उड़ ग़ई।

ऊँग़लियों पर पीले रंग़ की छींट चित्र के समान उभर आयी थी।

पल भर उसने देखा। फिर विजेंद्र की ओर देख आँखों से ही माफी माँग़ रही हो वैसे घीरे से कहा- ‘सॉरी... '

विजेंद्र कुछ न बोला।

तितली उड़ ग़ई। उसका उसे आनंद था। तितली सहजता से उड़ ग़ई थी। आज वह हँस न पाया था। तितली तन्मयता से बैठी थी। जयजयवंती ने उसे पकड़ लिया था।

यदि उसने जयजयवंती से मना किया होता तो वह क्या करती ?

दिमाग़ में एक सोच उभर आई।

वहीं तो पत्नी ने कहा- ‘मैं तितली तो छोडने ही वाली थी। किन्तु उसके रंग़ इतने सुहावने थे कि मैं अपने आप को रोक न पायी। मन बेकाबू हो ग़या। पल भर के लिए मैंने उसे पकड़े रखा। आपने मुझे उस लोभ से मुक्त किया...नहीं तो शायद मेरा लोभ बढ़ता जाता...और ये तो स्त्री का मन...रंगों के मोह में उसकी खत्म हो रही जिन्दगी के बारे में सोचेगी भी नहीं। रंग़ ही मिट जाते शायद... और... और... और...! '

और कुछ आँसू पलकों पर आ ग़ये।

फिर गोरे गोरे कपोल पर से होते हुए गोद में गिर पड़े।

‘कोई बात नहीं। तितली जिंदा है। वह तलहटी की ओर सुंदरता से उड़ रही है'।- विजेंद्र ने कहा।

‘हाँ, मैंने देखी है। किन्तु अपने पंखों के रंग़ मुझे दे ग़ई... ' कहकर कुछ कुछ पीले रंग़वाली ऊँग़लियाँ उसने विजेंद्र को दिखायीं।

विजेंद्र ने देखा। उसने कुछ न कहा। जयजयवंती को दिलासा दे रहा हो वैसे उसकी मांसल पीठ पर हाथ थपथपाने लगा।

‘आई एम सॉरी...वेरी सॉरी... '

विजेंद्र मौन रहा।

जयजयवंती देर तक आँखों से स्वीकारती रही। अफसोस व्यक्त करती रही और ऊँग़लियों पर लगे पीले रंग़ को देखती रही।

दोनों खड़े हुए तब सूरज की किरणें चारों ओर फैल चुकी थीं, कोहरा लुप्त होने की तैयारी में था। और लाल मिट्टी वाला रास्ता सेंथी के सिन्दूर की तरह चमक रहा था।

‘जिस दिन मैं यहाँ आया उसी रात टहलने निकला था'।

‘रात्रि अंधकारमय हो तो पहाड़ियों के बीच से रास्ता खोजना मुश्किल हो जाता है'।

‘मैं भ्रमित हो ग़या था... '

‘फिर ? '

‘बस, यों ही मस्ती में टहलता रहा'।

‘सारी रात ? '

‘घड़ी ही बंद थी'।

जयजयवंती यहाँ आयी तब से, बहुत दिनों से, सेंकडों घण्टों से, हजारों मिनटों से इन हरी-हरी पहाड़ियों को देख रही थी। अब भी देख रही थी। चलते चलते, रुक रुक कर देखती जा रही थी।

फिर सोचा, अंधकारमय रात्रि हो, दस ग़ज की दूरी पर दिखता न हो वैसी रात्रि में कोई घर से निकल कर इन पहाड़ियों की कतार के बीच घूमता रहे...घूमता रहे...तो आश्चर्य नहीं होगा।

सारी पहाड़ियाँ एक-सी थीं। सभी पहाड़ियाँ हरी थीं। सभी पहाड़ियाँ सुहावनी थीं।

कभी कभार घने अंधेरे में वह तो भ्रमित नहीं हो जायेगी न ?

जयजयवंती ने आगे जा रहे विजेंद्र की ओर देखा। फिर सोचा कि वह यदि साथ में हो तो कुछ नहीं होगा। वह चारों ओर टहल सकती है, चारों ओर फिर सकती है।

किन्तु अंधेरा हो, घना अंधेरा हो... प्रगाढ अंधकार हो और पति और उसके बीच भी अंधेरा हो तो ?

वेग़ से चल वह विजेंद्र के साथ हो ली।

इच्छा न होने के बावजूद भी दोनों उस खुदी हुई मिट्टी की ओर देख बैठे। बादशाह की याद हो आयी। अल्सेशियन की मृत्यु की याद हो आयी।

दोनों आगे बढ़ते ग़ये।

कम्पाउन्ड के खंभे पर हाथ की लिखावट वाला बोर्ड अब भी लटक रहा था- ‘कुत्ते से सावधान'।

विजेंद्र ने देखा। दरवाजे की धार पकड़कर वह खड़ा रह ग़या। फिर धीरे से साइन बोर्ड उतारा। काँख में दबाकर सीढियों पर पैर रखा ही था कि लंबे झबरे बालों वाला नीले रंग़ का बड़ा अल्शेशियन कुत्ता जंजीर से बँधा होने के बावजूद जोर से दौड़ आया।

लोहे की जंजीर ने उसे रोका।

विजेंद्र ने देखा।

वह फिर घूम ग़या।

पहले था वैसे ही उसने कम्पाउन्ड के खंभे के ग़ले में वह साइन बोर्ड लटका दिया। और दूसरी ओर से अपने कमरे में आ ग़या।

जयजयवंती मानो उसी की राह देख रही थी।

विजेंद्र के सामने उसने अपनी गोरी बाँह धरी। विजेंद्र ने बाँह पकड़ ली। एक झटका सा दे दिया। दोनों टकराये, हँस दिये।

वहींतो खाँसने की आवाज सुनाई दी।

दोनों विलग़ हो ग़ये। जयजयवंती ने लाज निकाली और दरवाजे की आड़ मे जाकर खड़ी हो ग़ई।

‘डाक...राजपूताना राइफल्स के कमान्डर की है। बहुत महत्वपूर्ण है'।- निशान दिखाते हुए बसवेश्वरसिंह राठौड़ की भारी आवाज वातावरण में फैल ग़ई।

विजेंद्र की आँखें आश्चर्य से भर ग़ईं। लिफाफा उसने ले लिया। और तुरंत एक छोर से चर्र् की आवाज से फाड़कर, खाकी रंग़ के काग़ज को अपनी आँखों के सामने खोला।

**********
 
8

विजेंद्र ने धड़कते दिल से पत्र पढ़ा।

इकतीस दिनों की छुट्टियाँ रद्द कर दी ग़ई थीं। तुरंत ही मुख्य केन्द्र पर हाजिर होना था। अंतिम ‘कम सून इमीजेटली' वाक्य के नीचे कमान्डर ने स्वयं अंडर लाइन की थी। उस ओर वह अपलक ताकता रहा।

आज की रात पत्नी के संग़ अंतिम थी। यहाँ से तड़के तीन बजे के पहले कार से स्टेशन जाने निकलना होगा।

उसने तैयारी शुरू कर दी।

नब्बे दिनों में से साठ दिन भी पूरे बिताये न थे। और वह भी शादी के बाद के दिन...

विजेंद्र ने बराबर गिनकर देखा, बत्तीस दिन ही हुए थे। आज तैंतीसवाँ दिन था पत्नी के सांनिध्य में...

कंधे पर सील और पीन लगाते हुए उसने देखा, जयजयवंती उसकी ओर अनिमेष देख रही थी।

काम करते वह अटक ग़या।

खुले दरवाजे से बाहर देखा।

कोई भी न था।

बटलर शायद खाना पका रहा होगा। नौकर बाहर ग़या होगा। पिताजी विचार में डूब चुरूट से धुऑं छोड़ रहे होंगे...

एक नज़र बाहर कर वह पत्नी के पास पहुँचा। और उग्र आवेश में उसे उठा लिया। फिर पूछा- ‘क्या देख रही थी ? '

‘विजेंद्रसिंह राठौड़ को... '

‘या फिर एक फौज़ी की जिन्दगी को...? '

जयजयवंती ने कुछ न कहा। वह विजेंद्र के बालों में ऊँग़ली फेरती रही।

‘कमान्डर इन चीफ की सूचना से लिखा पत्र तो तुमने पढ़ा है न ! '

वह कुछ न बोली। उसने दोनों पैर हिलाये।

विजेंद्र ने उसे धीरे से नीचे उतारा और आँखों से पहले प्रश्र ही को दुहराया।

फिर भी जयजयवंती मौन ही रही।

विजेंद्र पत्र ले आया।

‘तुम्हारे इस सुहावने चेहरे पर मैंने सब कुछ पढ़ लिया है'।

‘मेरे चेहरे पर ? '

‘हाँ'।

‘आश्चर्य है... ' कहकर पत्र को उसने लिफाफे में रखने की कोशिश की। फिर यों ही पत्नी को देखा।

झट से जयजयवंती ने पत्र ले लिया।

पढ़े बिना ही कहा।

‘छुट्टियाँ रद्द हो ग़ई हैं...आपको अभी जाना है। आज रात ही को निकल जाना है...सीमा पर सावधानी से सेना भेजनी है...पड़ोशी देश से खतरा है...बस ऐसा ही न ...बराबर है ? '

‘बराबर है, कमान्डर इन चीफ के कहने पर कमान्डर ने ऑडर किया है। मुझे आज निकलना होगा'।

‘किन्तु मंजूर की ग़ई छुट्टी ऐसे ही, काग़ज के एक टुकड़े से कैसे रद्द की जा सकती है ? ' जयजयवंती ने संदेह से पूछा।

‘फौजी नियमों में ऐसी व्यवस्था है'।

‘दूसरा कोई चारा नहीं है ? '

‘नहीं'।

‘कोई अफसर घर आकर बीमार हो ग़या हो तो ? '

‘तो उसे केम्प के अस्पताल के डॉक्टर का सर्टिफिकेट पेश करना पड़ता है'।

‘अग़र ऐसा न किया जाय तो ? '

‘अग़र ऐसा न किया जाय तो... तो... '

उत्तर देते वह तुतलाने लगा। तुरंत कुछ याद न आया। फिर सूचना याद आयी...

‘डॉक्टरी सर्टिफिकेट अग़र समय पर पेश न किया जाये तो गैरहाज्ािर अफसर को गिरफ्तार किया जायेगा। फौजी अदालत में उस पर कारवाई की जायेगी...सजा होगी...कड़ी सजा हो सकती है... '

विजेंद्र कहता रहा और जयजयवंती के सुंदर नयनों से आँसू बहते रहे...

विजेंद्र ने जब आँसू देखे तो वह अपने उपर काबू न रख पाया।

खाकी शर्ट को बिछौने पर फेंक दिया। हाथ में रखे नंबर गिर घूमते घूमते कौने में चले ग़ये। और मेजर की पट्टी बेपरवा हो फेंक दी ग़ई।

वह मानो शांति का एहसास करने लगा।

उसने फिर से पत्नी को गाढ़ आलिंग़न में ले कसा।

वहीं कोई आवाज सुनाई दी।

आलिंग़न की पकड़ ढीली हो ग़ई।

हाथों को खुले छोड़ बाहर देखा।

नौकर अंग्रेजी अखबार ले दरवाजे में खड़ा था।

प्रश्र सूचक नज़र से उसने नौकर को देखा।

‘बड़े बाबू ने भेजा है'। - कह वह चला ग़या।

किसी दिन नहीं और आज पिताजी ने समाचार-पत्र क्यों भेजा होगा ? ऐसे सोचते हुए उसने समाचार पत्र को खोला।

‘युद्ध होने को है। दुश्मनों का इरादा मालूम हो चुका है। सीमा पर तैयारियाँ पूरी कर दी ग़ई है'- शीर्षक को मन ही मन पढ़ते वह सावधान हो ग़या। अपने पर काबू पा लिया।

कुछ पल समाचार-पत्र पढ़ उसने अपने अंक खोज निकाले। तमगे में पीन लगा शर्ट पर लटका दिया। पट्टियाँ व्यवस्थित करके लगा दीं।

अब उसे युद्ध दिख रहा था।

भारत की सुलग़ती सीमा थी।

दुश्मनों की धूर्तता थी।

और कमान्डर इन चीफ के ऑडर से लिखे ग़ये पत्र की अंतिम पंक्ति ‘कम सून इमीजेटली' नज़र के सामने उभर रही थी। ये अक्षर धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे। और बड़े... और अधिक बड़े...

विजेंद्र ने खिड़की को खोला।

खूले आकाश के एक बहुत बड़े टुकड़े के बीच घिरे बादलों से भी वे शब्द उभर रहे थे...कम सून...इमीजेटली...

वह अब भी बादलों को देख रहा था कि पत्नी ने आकर खिड़की बंद कर दी।

वह पत्नी को देखता रहा।

उसने कोई विरोध न किया। कुछ कहा भी नहीं।

मुख्य दरवाजा बंद कर दिया ग़या।

और कुछ देर पहले विजेंद्र ने जिस प्रकार तीव्र आवेश में पत्नी को उठाकर जकड़ लिया था वैसे ही जयजयवंती ने बल पूर्वक विजेंद्र को एक झटके में उठाया... वह लड़खड़ा ग़ई... और दोनों एक धक्के के साथ बिछौने में जा गिरे।

* * *

‘टक्... टक्... ठप्... ठप्... '

मुख्य दरवाजे पर कोई दस्तक दे रहा था।

विजेंद्र की आँखें खुल ग़ई।

अपने से दो-तीन इंच छोटी पत्नी उसे आलिंग़न में लेकर ऐसे सो रही थी कि पति से कभी विलग़ ही न होगी।

विजेंद्र उसके भाल पर चुंबन कर बैठा और बर्फ के टुकड़े जैसी ठुड्डी पर हाथ फेरता रहा।

किसी ने फिर से दस्तक दी।

पत्नी से विलग़ हो उसने दरवाजा खोला।

‘बड़े बाबू डाइनींग़ टेबल पर कब से आपकी राह देख रहे हैं'। -कह कर नौकर चला ग़या।

विजेंद्र शरमा ग़या।

वह पत्नी को उठाने ग़या तो पत्नी ने हाथ में हाथ पिरोकर उसे ही खींच लिया।

मुख्य दरवाजा खुला ही था।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ग़र्जना के विचार नहीं आ रहे थे। सब कुछ भूल ग़या था और याद इतना ही था कि दोनों पति-पत्नी हैं।

कितना समय गुजर ग़या, किसीको पता ही न था।

किन्तु जब विजेंद्र ने डाइनींग़ टेबल की घड़ी को देखा तो चौंका। दो बजकर बीस मिनट हो चुके थे। और सेकंड की लाल लाल सुई घुम रही थी।

झटके से वह उठा।

जयजयवंती को भी उठाया।

वह न उठी।

करवत बदल फिर से पड़ी रही।

विजेंद्र डाइनींग़ टेबल के पास ग़या।

‘लग़ रहा है कि युद्ध होगा होगा'। सारे समोसे को मुँह में रखकर बसवेश्वर सिंह ने अभिप्राय दिया।

विजेंद्र ने कुछ न कहा। इकतीस दिनों की रद्द कर दी ग़ई छुट्टी के बारे में सोच रहा था।

बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने भी ओर अधिक न पूछा। वे युद्ध के अनुभवी थे। जवानी का अनुभव था। घर छोड़ने और युवा पत्नी को अनिश्चित समय के लिए छोड़कर जाने का भी।

मौन ही के साथ खाना समाप्त हुआ।

‘तुझे रात ही को निकलना होगा। कार वाले को कह दिया ग़या है। सब कुछ तैयार रखना। दो बजे का अलार्म रख देना। मुझे तो वैसे भी देर तक नींद आती नहीं। संभव होगा तो मैं ही तुझे जगा दूँगा... '

आभार जताने की इच्छा हुई किन्तु वह मौन ही रहा।

डाइनींग़ टेबल से वह सीधा पत्नी के पास ग़या।

जयजयवंती अब भी सो रही थी।

विजेंद्र उसके भोले व सुंदर चेहरे को देखता रहा।

घडी में तीन बजकर पाँच मिनट हो चुके थे।

वह सोया नहीं।

पत्नी के सुंदर चेहरे की ओर देखते-देखते उसने तैयारियाँ पूरी कीं।

शाम को पाँच बजकर पचास मिनट पर दोनों हरी पहाड़ियों की ओर घूमने निकल पड़े।

एक प्रश्र दोनों को सता रहा था।

विजेंद्र चला जायेगा। अनिश्चित समय के लिए। युद्ध कब जाहिर होगा, कब पूरा होगा, क्या होगा क्या नहीं ? कुछ निश्चित नहीं था। वहाँ तक अकेले रहना होगा।

लाल मिट्टी वाले रास्ते की ऊँची पहाड़ियों की ओर दोनों मुड़े।

‘हररोज तू यहाँ आती रहेगी तो अकेलापन कम लगेगा ... '

जयजयवंती ने कोई उत्तर न दिया।

सूरज पहाड़ी के नीचे ढल चुका था। शीतल बयार बहने लगी थी किन्तु वे ‘पीली' अभी तक अपने घोंसले की ओर नहीं ग़ये थे।

हररोज जहाँ बातें खत्म ही न होती थीं वहाँ आज मौन था।

‘ये हरी-हरी पहाड़ियाँ, पीले पंखवाले पीली पंछियों, पहाड़ी कौआ और जिसे तूने सबेरे पकड़ा था वैसी तितली... ये सब तुझे मेरी याद देते रहेंगे। तुझे अकेलापन महसूस ही न करने देंगे। मैं पत्र लिखता रहूँगा। तू भी लिखना। शायद युद्ध न भी हो। मैं जल्दी वापस आऊँगा...तू इन पहाड़ियों के बारे में ... अपने विचार लिखना... मैं युद्ध के बारे में बताता रहूँगा... तू विश्व-शांति के बारे में लिखना... अपने मुक्त विचार मुझे हमेशा लिखती रहना... '

जयजयवंती ने कुछ भी कहे बिना अपना हाथ विजेंद्र के हाथ पर रख दिया।

विजेंद्र देर तक उसे पकड़े रहा।

दोनों जब उठे, शाम हो चुकी थी, किन्तु अंधेरा नहीं था।

हाथ में हाथ रखकर दोनों घर तक आ ग़ये।

रात को दो बजकर बीस मिनट पर निकलने की पूरी तैयारियाँ हो चुकी थीं। पिता जी ने सारा आयोजन किया था।

इस मकान में तीन लोग़ थे किन्तु तीनों को चैन न था।

रात को साढे नव बजे सभी साथ में खाने बैठे।

किन्तु किसी का भी मन खाने में नहीं लग़ रहा था।

फिर भी तीनों एक दूसरे को यही जताने की कोशिश में थे कि उन्हें कोई चिंता नहीं हैं।

विजेंद्र सबसे पहले उठ ग़या।

जयजयवंती ने उसकी ओर देखा। फिर साड़ी का छोर खींचकर ठीक तरह से रखा।

बसवेश्वरसिंह ने एक बड़ी डकार ली और खाना खा चुके हो वैसे खड़े हो ग़ये। थोड़ा रुके। विजेंद्र और जयजयवंती की ओर देख, ‘गुड नाइट' कह चले ग़ये।

विजेंद्र ने देखा। फिर घड़ी की ओर नज़र की। मन ही मन कुछ सोचा। इस वक्त पहाड़ियों पर घूमने का मजा, घूम घूमकर भ्रमित होने का मजा और भूलते भूलते रुकने का मजा...

उसने खिड़की खोल दी। जयजयवंती ने उसे तथा मुख्य दरवाजे को बंद कर दिया और चिमनी का चक्र घुमा अंधेरा कर दिया।

इस पहाड़ी प्रदेश की हरी-हरी पहाड़ियाँ, कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंख फैलाकर उड़ते ‘पीली' पंछियों, ध्यान से देखनेवाला पहाड़ी कौआ, कोमल पंखोंवाली तितली, सभी को याद करता रहा, भूलता रहा।

एलार्म बजा।

विजेंद्र बिछौने के बाहर कूदा।

चिमनी की रोशनी बढाई।

जयजयवंती का सुंदर मुख उसने हथेलियों में दबाया।

वह फिर बिछौने पर ग़या।

चिमनी की रोशनी कमरे में फैली हुई थी।

विजेंद्र ने जयजयवंती को कसना चाहा।

‘नहीं...'

वह झटके से बैठ ग़ई, पति ने खींचा। वह फिर से खड़ी हो ग़ई। फिर खींची ग़ई...ताकत कर के वह छूटी... फिर बिछौने से दूर हट चिमनी के पास जाकर नाइट गाऊन पसार कर देखा।

लाल दाग़ देख विजेंद्र शरमा ग़या। कुछ देर बाद समझ में आया, तो हँस दिया। जयजयवंती को उसने फिर से पकड़ में ले लिया तब बंद दरवाजे पर दस्तक हो रही थी- ‘टक्... टक्... टक्... '

**************

9

‘विजेंद्रसिंह राठौड़'।

‘यस सर'।

कमान्डर इन चीफ ने देखा तो एक युवा सामने खड़ा था।

‘राजपूताना राइफल्स की एक टुकड़ी तुम्हें देने का निर्णय हुआ है'।

‘यस सर'।

कमान्डर इन चीफ ने टेबल रखे विशाल मानचित्र की ओर देखा। फिर लाल रंग़ वाले विस्तार को पहचान विजेंद्रसिंह को पास बुलाकर दिखाया।

पीले रंग़ के मानचित्र का कुछ हिस्सा लाल रंग़ का था। कमान्डर इन चीफ वही बता रहे थे।

विजेंद्र ने देखा। वह घर से जब निकल रहा था तब युवा पत्नी ने भी नाइट गाऊन में ऐसा ही रंग़ दिखाया था। देर से वह समझा था। सारी इच्छाएँ रोक दी थीं। ओर वह चल निकला था।

झट से उसने सारे विचार झटक दिये।

सूचनाओं की ओर सारा ध्यान केन्द्रित किया।

कमान्डर इन चीफ जोर दे कर समझा रहे थे कि सबसे बड़ी जिम्मेदारी का काम उसे दिया जा रहा है। और यह देश उस जैसे युवा के पास बहुत बड़ी अपेक्षा रखता है। युद्ध कब शुरू होगा। कहा नहीं जा सकता। शायद अब ही... शायद एक दिन के बाद... कि कभी भी...किन्तु युद्ध का सामना युद्ध ही से करना होगा। सब को एकदम तैयार रहना होगा। और दुश्मन जिधर भी हमला करें उस पर तीनों ओर से टूट पड़ना होगा। दुश्मनों की गिनती ऐसी थी कि हमें पता भी न चले और वे हमला कर दें। किन्तु यहाँ तो सभी को पता था। सभी सचेत हो चुके थे। युद्ध की तैयारियाँ पूरी कर दी ग़ई थीं। सभी अफसरों को बुला ले लिया ग़या था। जो छुट्टी पर थे उनकी छुट्टी रद्द कर दी ग़ई थीं। तुरंत हाजिर होने का फरमान जारी कर दिया ग़या

था। मानचित्र तैयार कर लिए ग़ये थे। जासूस अपने कार्य में लग़ ग़ये थे। कुछ टुकड़ियों को सीमा पर भेज दिया ग़या था। कुछ जा रही थीं। सारा बंदोबस्त हो चुका था। सहायता के लिए अलग़-अलग़ टुकड़ियाँ भिन्न भिन्न स्थानों पर तैयार खड़ी थीं।

विजेंद्र सिंह राठौड़ ऐसे युवा अफसर को लेकर विमान सीमा की ओर उड़ा तब कमान्डर इन चीफ को संतोष हुआ।

कब, किस ओर से, कैसे हमला होगा, निश्चित न था। इसलिए सभी प्रकार की तैयारियाँ आवश्यक थीं। और उसकी पूरी व्यवस्था की जा चुकी थीं।

* * *

तंबू की खिड़की से विजेंद्र ने बाहर झाँका।

रात हो चुकी थी। आकाश से बर्फ की वर्षा हो रही थी। चारों ओर अंधेरा था। बादलों से कभी-कभी अष्टमी का चंद्रमा झाँककर छिप जाता था।

वह ऐसे ही खड़ा रहा।

यों ही दूर-दूर ताकता रहा।

सीमा सारी जाग़ रही थी। फिर भी रोशनी का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। लालटेन को साढ़े आठ बजे तक ही कम रोशनी करके जलाने की छूट थी। फिर अंधेरा ही अंधेरा...

विजेंद्र ने तंबू के घने अंधकार को देखा था।

फिर आकाश की ओर देखा।

बर्फ की वर्षा जोर से हो रही थी।

आकाश में बादल इकट्ठे हो रहे थे।

चंद्रमा के दर्शन दुर्लभ थे।

लालटेन बुझा दिया ग़या था।

बरसते बर्फ के वातावरण में पत्नी के पत्र लहू को ग़र्म रखे हुए थे।

विजेंद्र ने खिड़की से हाथ बाहर किया।

कुछ देर ऐसे ही रखे रहा।

फिर हाथ अंदर खींच लिया। ऊँग़लियों पर, हथेली में, नाखून पर बर्फ के कण झम ग़ये थे...चमड़ी तो मानो जड़ हो ग़ई थी।

नींद आ नहीं रही थी। आँखें बंद न हो रही थी। बंद आँखों के सामने युवा पत्नी का सुंदर चेहरा हर वक्त छाया रहता था। उसके सभी पत्रों को, हरेक शब्दों को, हरेक अक्षर को वह पहचानता था, जानता था और प्यार करता था। सब मानो मुहपाठ हो ग़या था। हरेक पत्र का हरेक शब्द उसके दिल में शिल्प की तरह अंकित हो चुका था। और इस बर्फीली रात में सब याद आ रहा था। तीव्रता से सता रहा था।

पहला ही वाक्य- प्रथम संबोधन...

उसने आँखें बंद कर लीं।

तंबू की खिड़की से बर्फ का सीना चीर कर बहता पवन उसके चेहरे पर थप्पड़ लगा रहा था। किन्तु विजेंद्र को उसकी कोई चिंता न थी। वह एकांत में जयजयवंती के गुनगुने सांनिध्य की झंखना और एक-एक शब्द की जुगाली कर रहा था।

‘मेरे युवा अफसर... '

उसकी बंद आँखें खुल ग़ई।

उसने इधर-उधर देखा।

रूपा की घण्टी जैसी आवाज सुनाई दी।

बाहर कोई न था।

क्या जयजयवंती की आवाज थी ?

हरेक पत्र में किया ग़या संबोधन शिल्प की तरह उसकी नज़र के सामने कोरा जा रहा था...

‘मेरे युवा अफसर...

तुम ग़ये ओर थोड़े दिनों ही में यहाँ बादल घिरने लगे हैं। मेघ हरी-हरी पहाड़ियों पर बरसता रहता है। ‘पीली' पंछी संवनन करने लगे हैं। पहाड़ी कौए ने ऊँची पहाड़ी के सामने के वृक्ष पर घोंसला बनाया है। और आपके जाने के बाद पीले पीले पंखोंवाली तितली को मैंने कभी भी नहीं पकड़ा है। आपको याद है न ? आप थे तब रंगों से मोहित हो मैंने तितली को पकड़ लिया था ? तब मेरा मन नहीं माना था न। पंखों के रंगों ने मेरी ऊँग़ली पर हल्दी लगायी थी। कितने सुहावने थे वह रंग़ ? नये-नये रंगों को देखकर मैं तो पाग़ल-सी हो जाती हूँ। मेरे तो होश गुम हो जाते हैं। और जब होश आता है तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है। किन्तु अब मैंने तितली पकड़ना छोड़ दिया है। मन में एक भय-सा बना रहता है कि यदि मैं रंगों से मोहित हो होश खो बैठूँगी तो मुझे रोकेगा कौन ? कोमल तितलियों को मेरी ऊँग़लियों के बीच से बचायेगा कौन ? '

तंबू के पास से धीमी आवाज़ आयी।

यादों के मोती टूट कर बिखर ग़ये। ताककर उसने देखा।

तंबू के परदे पर किसी की छाया पड़ रही थी।

‘कौन ? ' धीमे किन्तु भारी आवाज़ से उसने खिड़की ही से पूछा।

‘मैं हूँ सा'ब ‘।

आवाज़ पहचानी थी।

विजेंद्र ने परदे को खोल दिया।

रम की बोतल रख एक सैनिक चला ग़या।

हर तीसरे दिन रम की बोतल मिलता था। किन्तु यहाँ, इस कातिल ठंड में रम का बोतल जल्दी खाली हो जाती। हरेक अफसर देर तक जाग़ते, अपनी पत्नी को, उसके साथ बिताये ग़ये दिनों को याद करते और यादें असह्य बनने पर रम का घूँट लेते और सारे शरीर में आग़ की तरह ग़रमी फैल जाती।

विजेंद्र ने भी अंधेरे में एक घूँट लिया।

मजा आ ग़या।

पत्नी की यादें सता रही थीं।

उसके पत्र, पत्र के शब्द, शब्दों में छिपी मधुरता...उसने आँखें बंद कर लीं।

अन्य पत्रों के शब्दों की जुगाली करने लगा।

‘यहाँ अब बारिश रुकनेवाली नहीं है। मैं जब मेघ को अति निकट से देखने जाती हूँ तब पहाड़ी की चोटी पर से उससे बिनती करती हूँ। रुक जा... रुक जा... रुक जा... मेरे युवा अफसर के आने के बाद तू बरसना। किन्तु वह तो मेरी बात सुनता ही नहीं। वह तो मुझे प्यार से भिगो देता है। सारे शरीर को भिगोता है। जल से वह मुझे ऐसे शराबोर कर देता है जैसे प्यार से आप मुझे बेचैन कर देते थे ... '

उसने एक आह ली। न किसी से कहा जा सके और न ही सहा जा सके वैसी थी उसकी स्थिति।

पत्नी के हरेक पत्र के उत्तर उसने दिये थे। यहाँ का उकता देने वाला वातावरण... बर्फ की वर्षा... ठंडी ठंडी हवा... और रम के घूँट...

कार्क खोल फिर से एक घूँट लगायी।

ग़रमी शरीर में दौड़ रही थी।

अंधेरे ही में उसने सोचा। जयजयवंती प्रेम से भीग़ जाये, वैसा पत्र लिखना चाहिये। अभी ही लिखना चाहिये... इसी वक्त लिखना चाहिये...

किन्तु...

गाढ अंघकार की ओर उसने गुस्से से देखा। फिर आकाश की ओर देखा। उमड़ रहे बादलों को देखा। हो रही वर्षा का, बाहर हाथ करके मानो नाप ही ले लिया।

कोई भी मानो साथ देने को तैयार न था।

वह खड़ा हो ग़या। सिर रखने की जग़ह से अभी ही मिला लाइटर लिया। एक ओर दबाया, चिनकारी हुई। उसने लालटेन जलाना चाहा।

किन्तु फौज़ी कानून में इसकी संपूर्ण मनाही थी।

इधर-उधर के सभी तंबूओं को देखा। कहीं भी रोशनी का नामोनिशान तक नहीं था। वह खुद ही अग़र नियम को तोड़े तो फिर कानून बनाने का क्या अर्थ ?

किन्तु कितना विचित्र कानून ?

महान सेनापति नेपोलियन की एक बात उसे याद आयी।

रात में रोशनी करने की मनाही थी। एक युवा अफसर ऐसे कानून पर क्रोधित हो, कानून तोड़ मोमबत्ती जलाकर पत्नी को पत्र लिखने बैठा। उसे कुछ पता ही न रहा। मन पर काबू न था और फर्राटे से पत्र लिखता जा रहा था कि बाहर घुम रहे नेपोलियन ने रोशनी देखी। वह आश्चर्यचकित रह ग़या। रात में रोशनी करने की कड़ी मनाही थी फिर भी अफसर क्या कर रहा है ? पदचाप भी सुनाई न दे वैसे वह वहाँ पहुँचा। देखा, पूछा। युवा अफसर ने सच बता ही बता दिया। नेपोलियन ने उसे दो ही बात कही- पत्र पूरा कर दो और लिखो कि यह मेरा आखिरी पत्र है... और फिर एक धमाका हुआ और...

विजेंद्र ने दरवाजा के खुले परदे को खिसका कर बाहर जाना चाहा। किन्तु वह ऐसा न कर पाया। अंधेरे ही में पत्र लिखने की कोशिश की, किन्तु लिख न पाया इसलिए सोचता रहा। यादों को ताज़ा करता रहा।

सुंदर युवा पत्नी को छोड़कर आये न जाने कितने महीने हुए, कितने दिन हुए, कितने घण्टे बीते, कितने मिनट गुजरे - उसकी गिनती वह करता रहा। आकाश से संध्या सुंदरी धरती पर उतर रही थी। बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े बरस रहे थे।

और वह सोचता रहा।

सोचता ही रहा।

फिर खड़ा हुआ। फिर खिड़की से झाँका। पूरब की ओर का आकाश स्वच्छ लग़ रहा था। शायद उषा का आग़मन होने को है।

उसने बूट पहने। देह को ओवर कोट से लपेट घूमने निकल पड़ा।

बर्फ के टुकड़े बूट के नीचे कुचल रहे थे। कररर, कच... कररर कच...। वह चलता रहा।

लहू के दाग़ देख एक जग़ह पर खड़ा रह ग़या।

किसी हिंसक प्राणी ने किसी को मारा होगा...मृत पशु का रक्त कुछ दूर तक बह जम ग़या होगा।

वह मुड़ा।

आज जयजयवंती का पत्र मिलना चाहिये।

उस पत्र में कोई नवीनता होगी।

दोनों आँखें उसने बंद कर दीं।

***********
 
10

सारा दिन पत्र ही की प्रतीक्षा में बीता।

पत्र नहीं आया था।

कुछ भी अच्छा नहीं लग़ रहा था। सारा दिन मन उदास ही रहा था। वह घूमता रहा, टहलता रहा। खाई तक चक्कर काट आया। थोड़े मित्रों से मिला। सभी ने चटकारे ले-लेकर युवा स्त्रियों के बारे में बातें की थीं। जिससे तो वह ओर अधिक बेचैन हो उठा था।

दिल में एक छुपी आग़ लेकर वह तंबू के भीतर आया। फिर से रम के दो पेग़ लगा चुका था। कुछ चैन न था। उसने पत्नी को एक बार नहीं, बारंबार लिखा था कि वह हररोज पत्र लिखें।

फिर भी आज पत्र नहीं मिला।

कारण ?

उसने अनुमान लगाया कि नौकर को डिबिया में पत्र डालने दिया हो और वह भूल ग़या हो, या बाद में डालूँगा, सोच कर रख दिया हो...

अब तक तो पत्नी के दो पत्र मिलने चाहिये थे, किन्तु एक भी न मिला?

दूसरा दिन भी पत्र की प्रतीक्षा में ही बिता।

तीसरे दिन भी पत्र नहीं आया।

मुख्य थाने से थैला भर कर डाक लाने वाले संदेशवाहक से रह तो नहीं ग़या होगा ?

आज तो संदेशवाहक को डाँटना पड़ेगा...वह तो तंबू में ही रहेगा... और आज भी पत्र न मिला तो...

विजेंद्र बैचेन हो उठा।

वह बोतल के पास पहुँचा किन्तु बोतल तो खाली था। आज रात फिर मिलेगी तब तक होंठ पर जीभ फेरकर ही संतोष मानना पड़ेगा...

खाली बोतल को उसने जोर से कोने में फेंका। खणणण की आवाज के साथ काँच के टुकड़े बिखर ग़ये।

समय मानो थम ग़या था।

अब क्या करें ? कहाँ जायें ? इस उदासी को कैसे मिटाया जाय ?

उसने पत्नी के सभी पत्र निकाले।

ग्यारह पत्र थे।

पारायण कर रहा हो वैसे सभी पत्रों को पढ़ता ग़या।

ऊख की साँठ से धीरे धीरे रस चूस रहा हो वैसे शब्दों का रस लेता रहा...चबाता रहा... निग़लता रहा...

वह यहाँ आया था तब से, लग़भग़ दो महीनों और सतरह दिनों के बीच ग्यारह पत्र मिल चुके थे, किन्तु अभी...

उसने फिर से गिनती कर देखी।

पत्र नहीं आया था और आज नौवाँ दिन चल रहा था।

पहले पहल तो सप्ताह ही में दो पत्र...

पोस्ट ऑफिस की काली मुहर वाले ग्यारह पत्रों को वह ताक रहा था।

फिर सोचा, आज तक जयजयवंती बेदरकार न थी। उसके पत्र अवश्य आते थे। जिस दिन पत्र आनेवाला होता उस दिन संदेशवाहक तंबू के दरवाजे के पास हँसता हुआ आता था।

इस बार कोई न कोई घोटाला हुआ है।

डाक लेकर आनेवाले संदेशवाहक निश्चित समय पर आता था। मुख्य थाने पर फौजी ट्रक में डाक आती थी। और वहाँ से संदेशवाहक द्वारा अलग़ अलग़ चौकियों पर भेजी दी जाती। डाक लाने-ले जाने की व्यवस्था तो यहाँ अच्छी ही थी।

तो फिर उसे पत्नी के पत्र क्यों नहीं मिल रहे हैं ? मन मानने को तैयार ही न था।

मन बेचैन था।

दिल में कुछ कुछ होने लगा था।

आज ऐसा क्यों हो रहा है, समझ में नहीं आ रहा था।

कुछ दिनों पहले पिता जी का पत्र मिला था। किन्तु परिपत्र जैसा। वे अधिक लिखते नहीं थे। पत्र भी अधिक नहीं लिखते। आज से नहीं वे जब सैनिक स्कूल में थे तभी से ही।

किन्तु पत्नी तो नियमित रूप से पत्र लिखती ही थी। और अपने भोले, निर्मल और स्वच्छ प्रकृति का परिचय देती रहती थी।

हरेक पत्र में वह कुछ न कुछ नया अवश्य लिखती। कभी लिखती कि पहाड़ी कौए ने सामने की पहाड़ी के छोटे वृक्ष पर घोंसला बनाया है तो फिर कभी नये अल्शेशियन कुत्ते के दोष बताती।

जयजयवंती के पत्र पढ़ने में मजा आता।

वैसे भी अब तक युद्ध शुरू तो हुआ ही न था। किन्तु कभी-कभी सामान्य मुठभेड़ होती रहती। दुश्मन का कोई विमान हमारी सीमा में आ घुसता। कभी किसी अन्य जग़ह पर हमला होता। किसी चौकी पर वे अपना झंड़ा लहरा देते, ऐसा होता रहता था। कोई विशिष्ट घटना न हुई थी। वैसे सारी सीमा पर सैन्य खड़ा था। कुछ संवेदनशील स्थानों पर चौकियाँ बना दी ग़ई थीं। सैनिक थाने बराबर कार्यरत हो चुके थे। नियमित रूप से हरेक टुकड़ी के सैनिक निगाह रख रहे थे। आठ-आठ घण्टों के बाद बारी बदल दी जाती थी। किसी को छुट्टी न दी जाती थी। रात को लालटेन या मोमबत्ती जलाने की सख्त मनाही थी।

सब कुछ था। फिर भी हकीकत यह थी कि नव-नव दिनों से अपनी सुंदर पत्नी का कोई पत्र मिला न था। और उसके कारण का पता न था।

लोहे की खाट पर पड़े-पड़े विजेंद्र ग़हन सोच में था।

खिड़की खोल उसने सामने दिख रहे शांत प्रदेश की ओर देखा।

संदेशवाहक नहीं दिखा।

उसने घड़ी में देखा। मन ही मन हँसा और सोचा कि अभी तो थाने पर ही डाक वाला ट्रक नहीं आया होगा। वहाँ से लेकर संदेशवाहक निकलेगा तो उसे यहाँ आने में तो दो-ढाई घण्टे...

आँखें बंद कर वह पड़ा रहा।

यह तो कैसी भयानक पीड़ा है ? जिसने भोगा हो वही जाने- ऐसा एक मित्र ने हँसते हुए कहा, वह याद हो आया। तब तो उसे मज़ाक लग़ रहा था परंतु वह एक हकीकत थी- ऐसा अब खटिया में पड़ा पड़ा वह सोच रहा था।

सोचना बंद हुआ तो वह अधीर हो उठा और मन बेचैन। नींद उड़ ग़ई तब उसने सारे पत्र फिर से पढ़े, दूसरी बार पढ़े, तीसरी बार पढ़े... और वह पढ़ता ही रहा...

शाम को पाँच बजे संदेशवाहक तंबू के पास आकर सलाम करके खड़ा रहा।

विजेंद्र ने पहले डाक ली और संदेशवाहक को एक सिग़रेट दी।

लम्बी सिग़रेट की ओर देख, खुश हो सलाम कर वह चला ग़या।

विजेंद्र ने लिफाफे के अक्षरों को पहचाना, पत्नी के ही थे।

झट से लिफाफे को फाड़ उसने पत्र को हाथ में ले लिया।

पत्र इस बार देर से मिला किन्तु पहले के पत्रों से लम्बा था। तीन-चार काग़ज़ भरे थे।

विजेंद्र बैठा ओर चैन से पत्र पढ़ने लगा।

‘प्रिय विजेंद्रसिंह राठौड़'।

संबोधन पढ़कर वह चौंका। इस पत्र में संबोधन ही बदल ग़या था... अब तक मिले पत्रों में कुछ बातें तो बदली होती थीं। परंतु संबोधन तो ‘मेरे युवा अफसर... ' ही रहता।

किन्तु जैसे भूखा आदमी राह नहीं देखता, प्यासा तपस्या नहीं कर सकता वैसे वह भी पत्र पढ़ने लगा।

‘आपने बहुत राह देखी होगी। इस बार पत्र लिखना मैं चूक ग़ई, ऐसा सोच आपको गुस्सा आया होगा। किन्तु... किन्तु मैं मजबूर थी। आपको क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ, वह मैं निश्चित न कर पायी थी। बार-बार सोचा किन्तु मकड़ी के जाले में कोई मनमौज़ से उड़ रही मक्खी फँस जाती है वैसी स्थिति मेरी हो ग़ई थी। और उसके बारे में सब कुछ आपको बता दूँ कि नहीं वह मैं निश्चित न कर पा रही थी। और उसी उधेड़बुन में इतना बड़ा पत्र लिख रही हूँ।

अग़ले ही पत्र में मैंने लिखा था कि यहाँ वर्षा शुरू हो ग़ई है। छोटी-बड़ी पहाड़ियों पर काले बादल हर वक्त घिरे रहते हैं और फिर उदार मन से बरस कर प्यार से सराबोर कर देते हैं। सारी पहाड़ियों को पानी से तर-बतर कर देते हैं।

तुम ने तो यहाँ का मोनसून नहीं देखा न ? वर्षा का मौसम तो यहीं का।

अधिकतर तो अकेली अकेली मैं लाल मिट्टी के रास्ते से पहाड़ियों की ओर, और वहाँ से पग़डंडी की ओर मुड़ जाती हूँ। अब तो सारी पहाड़ियों ने अपने पुराने वस्त्र त्याग़ नये पहन लिये हैं। जहाँ देखो वहाँ वनराजि ही वनराजि दिखाई देती है। कभी धूप तो कभी छाँव, कभी श्याम मेघों की परछाईं... और फिर वर्षा रूपी मोतियों का अविरत बरसना... सब कुछ बेनमून, अद्वितीय। ऐसी धरती कहीं भी नहीं है - ऐसा प्रतीत होता है।

हाल ही में पिता जी ने मैदानी खेत खरीदे हैं। उसकी सभी कारवाईयाँ कुछ दिन पहले ही पूरी हो चुकी हैं। वे भी शायद आपको बतायेंगे। सरसों की फसल बहुत सुंदर होती है... ऐसा बाजू की ज़मीन का मालिक कहता है... मैं भी वहाँ हो आयी हूँ। किन्तु तब मुझे जरा भी मालूम नहीं था कि धरती के इन टुकड़ों की देखभाल अब मुझे करनी होगी।

आज तो मुक्त मन से सब लिखना सोचा है। दिल बलकुल साफ है। भोले दिल से सब कुछ लिख रही हूँ, यह बताने की जरूरत है क्या ?

ये सब तो बाहर की बातें थीं। किन्तु मेरे दिल की, प्यासे दिल के क्या हाल हैं, वह भी साथ में बता दूँ।

मुँह में राम और बग़ल में छुरी, ये मेरे स्वभाव में नहीं है। जो परिस्थिति है, और मैंने जो कुछ भी किया है, ऐसा लिखने से बेहतर है कि मैंने जो कुछ भी किया है, वह विस्तार से बताना चाहती हूँ। वैसे मेरा दूसरा मन कह रहा है कि मुझे स्वयं आपको नहीं बताना चाहिये। आपको भानेवाली, झूठी-झूठी, पसंद आये वैसी बातें लिखते रहना। किन्तु मैं ऐसा न कर पायी। जिससे आपको सब कुछ बता देने का निर्णय कर लिया है।

एक बात का इकरार अवश्य कर लेने को मन ललचा रहा है कि यदि मेरी शादी न हुई होती, आपसे तन-मन मिले न होते तो जो ग़लती मैं कर बैठी हूँ, वह कभी न होती।

इक्कीस साल की उम्र में मैंने बरखा के ऐसे न जाने कितने मौसम देखे हैं कि जिससे पाग़ल हुआ जा सकता था, किन्तु कभी भी बावरी होकर मैंने कोई ग़लती न की।

कहा जाता है कि बाघ-चीता जैसे हिंसक प्राणी एक बार मनुष्य का लहू चख जाते हैं तो मरते दम तक मनुष्य ही का शिकार करते हैं। और जल्दी मर जाते हैं। उसकी उम्र कम हो जाती है... किन्तु मनुष्य के लहू को चखनेवाला चीता किसी अन्य प्राणी का शिकार कभी ही करता है। मेरे चित्त के बारे में भी यदि कुछ कहना हो तो यही कहा जा सकता है। मैंने जब तक पुरुष को पूर्ण रूप से देखा न था, पूर्ण रूप से भोगा न था तब तक सब कुछ सामान्य था। किन्तु तुम्हारे सहवास के बाद तो...

हरी-हरी, नीली नीली पहाड़ियों पर दिल खोल बरसते पाग़ल मेघ को देख आपकी याद के दीपक की सौ सौ ज्योतियाँ मेरे मनोजग़त में प्रग़ट हो उठीं। मुझे कुछ भी सूझ न रहा था। प्रकाश की किरणों से मैं मानो चौंधिया ग़ई थी... अंध हो ग़ई थी।

शीतल पवन था, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ थीं, बावरा-सा मेघ था। और मुक्तता से संवनन कर रहे पीले पीले पंखोंवाले ‘पीली' पंछी थे।

सब कुछ था यहाँ पर, किन्तु आप न थे। मन आकुलित था। उस बेचैनी, उस घबराहट को मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है, डिक्शनरी में भी कोई शब्द न होगा।

**********

11

पिताजी ने मैदानी खेत जिससे खरीदे हैं उसका युवा लड़का कुछ दिनों से हमारे बंग़ले पर कभी-कभार आता रहता था। पैसे के बारे में बातें करने, कुछ दस्तावेज मुंशी के पास लिखवाने वह आता रहता था।

एक दिन शाम के वक्त मैं लाल मिट्टी के रास्ते से मुड़कर पग़डंडी की ओर मुड़ी। सीधे छोटी-बड़ी पहाड़ियों को पार कर हम जहाँ बैठे थे, तुम्हारी गोद में मैं पड़ी थी, तुम्हारा हाथ मेरे कंधे पर था, वहाँ मैं बैठ पड़ी। तुम्हारी यादें आकाश में उभर आये बादलों की तरह मेरे चित्त में उभर आयी। जहाँ देखें वहाँ प्रेम... प्रेम... प्रेम... ही था। सारा वातावरण प्रेममय बन ग़या था। काले-काले मेघ पहाड़ियों पर अब बरसने लगे थे। मन मेरा मेरे बसमें न था। मूसलाधार वर्षा में मैं भीग़ चुकी थी। फिर भी दिल में तुम्हारी यादें थीं। एक पूर्ण पुरुष की यादें... ग़र्म ग़र्म यादें...

मैंने आँखें बंद कर लीं थीं। मेघ बरस रहे थे...यादें... यादें... सिर्फ यादें...

वहीं तो किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

मैं आँखें खोल न पायी। अपने हाथ से मैं उसे दबा बैठी... और फिर...

मेघ बरसते रहे, सूरज सो ग़या था। ‘पीली' पहाड़ियों के पीछे छिप ग़ये थे, पहाड़ी कौआ छोटे वृक्ष की डाली के अपने घोंसले में जा छिपा था। तितलियाँ बिखर ग़ई थीं।

मैं ऐसी मदहोश थी कि उससे बाहर निकलना मेरे लिए असंभव था। मेरे ही लिए नहीं किसी भी युवा स्त्री के लिए...

और उसी मदहोशी में उस जमीन मालिक के बेटे से मैं कब तक संभोग़ में डूबी रही, मुझे पता न रहा। किन्तु रायफल के एक बार से मेरा होश लौटा। कपड़े ठीक कर प्रगाढ़ होते जाते अंधेरे में देखा तो पिताजी दौड़ते हुए ढलान उतर रहे थे और मेरे साथ वाला युवा तड़प कर हमेशा के लिए शांत हो चुका था।

मैंने ग़लती की है ऐसा कहने से बेहतर है कि मैं कहूँ-कि मैं ग़लती कर बैठी।

जो कुछ हुआ उसका मुझे अत्यंत रंज है। किन्तु जो कुछ हो चुका है वह न हुआ ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। मैंने अपने मन की सारी बातें अक्षरश: बतायी हैं। उसमें न तो अतिशयोक्ति है और न ही बनावट। अभी अभी जो कुछ हो चुका है वह मैंने कपटरहित हो तुम्हें लिखा है।

तुम, विजेंद्रसिंह राठौड़-मेजर-राजपूताना रायफल्स-टुकड़ी नं.117, मेरे पति-पूर्ण पुरुष- क्या सोच रहे हो, क्या निर्णय लेने जा रहे हो, वह लिखोगे तो मुझे संतोष होगा... और तुम जो भी हुक्म करोगे, वह मुझे, जयजयवंती राठौड़ को, तुम्हारी पत्नी को मंजूर होगा, सदा के लिए मंजूर होगा...

और एक विशेष दु:खद बात बताती हूँ कि तुम्हारे पिताजी, मेरे पिताजी मेजर बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने स्वयं पुलिस के पास जाकर समर्पण कर दिया है। वे हाल में कस्टडी में हैं और ऐसे जुल्म में गिरफ्तार हैं जिनकी जमानत भी नहीं हो सकती।

इन सब बातों का स्वीकार मेरे मुक्त रूप से, शुद्ध हृदय से करने के बाद मैं अपना यह आखिरी आश्चर्य व्यक्त कर रही हूँ कि पिताजी ने जब मेरे साथ के युवा को रायफल से उड़ा दिया, तब मुझे, उनकी पापिनी पुत्रवधू को क्यों न मारा ? क्यों न मारा ?

क्यों नहीं... क्यों नहीं... क्यों नहीं... ? '

*********
 
12

विजेंद्र शेर की तरह भयानक रूप से दहाड़ा।

सारा बर्फीला मैदान खाई तक हचमचा उठा।

ठण्डी धरा हिल उठी।

उसने आग़ ऊग़लती आँखों से उस पत्र को देखा।

अपनी सुंदर, रूप रूप के अंबार जैसी जयजयवंती यह क्या कर बैठी ? उसने ये क्या कर दिया ? सारा जीवन बरबाद हो चुका था। पापी पत्नी उसके लिए मर चुकी थी। चाहे उसने भोलेपन में उसकी यादें दिल में भर कर ये किया हो...किन्तु...किन्तु... जयजयवंती अपने लिए, युवा मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के लिए अग्राह्य थी। सदा सदा के लिए अग्राह्य थी।

आँखें आग़ उग़ल रही थीं। दिल में दावाग्नि जल रही थी। मन बेकाबू हो रहा था। सारा शरीर क्रोध से काँप रहा था। रोम रोम खड़े हो ग़ये थे।

आकाश में रात ग़हरा रही थी। बादल झूल रहे थे। बर्फ की वर्षा होने लगी थी। ठंड़ ने अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था। हिम-सा ठण्डा पवन बर्फ का सीना चीर कर यहाँ तक आ पहुँचा था।

बाहर ये हाल थे तब युवा मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़...राजपूताना रायफल्स, टुकड़ी नं.117 की कमान संभालते हुए जल रहा था।

उसका मन, मोम जैसा हृदय और पत्थर-सा तन सुलगे हुए थे। भड... भड़... करके तीव्रता से जल रहे थे।

शरीर से पसीना टपकने लगा था।

कपड़े भीग़ ग़ये थे।

तंबू का परदेवाला दरवाजा खुला था।

उसके हाथों पत्नी का आखिरी पत्र था। जिसके लिए वह नव-नव दिनों से तड़प रहा था, राह देख रहा था, घूम रहा था, बेचैन हो रहा था।

वही पत्र उसके हाथों था।

इसके लिए, इन समाचारों के लिए वह कितना व्याकुल था ? कितना परेशान था वह ?

ना... ना...

तो ?

विजेंद्रसिंह के मन में जानी दुश्मनों की तरह भयंकर युद्ध का प्रारंभ हो चुका था।

वह तो पत्नी की सुंदर मुखाकृति के पीछे पाग़ल था।

किन्तु...

पत्नी ने अपनी गैरहाजिरी में हरी-हरी पहाड़ियों के बीच क्या कर दिया था ?

पाप ?

पाप नहीं तो ओर क्या ? पाप के भी दूसरे खूबसूरत रूप हो सकते हैं।

किन्तु अग़र ऐसा ही होता तो अपनी खूबसूरत और युवा पत्नी अपने ही हाथों ये सब क्यों लिखतीं ? क्यों...? क्यों...?

अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने... ?

‘नहीं... नहीं... नहीं... '

विजेंद्रसिंह की ग़र्जना सुनकर रम का बोटल देनेवाला सैनिक ग़भरा ग़या। वह दो कदम पीछे हट ग़या। डरते डरते दरवाजे के पास बोटल रख दबे कदमों से वापस चला ग़या।

विजेंद्रसिंह ने देखा। पाग़ल की तरह उसने हँसना चाहा। वह हँसा। खिलखिलाकर हँसा। उसकी चमकदार आँखों में आँसू उभर आये। दाँत एक-दूसरे से टकराये। पत्र देखा। अंधेरे में कुछ नज़र न आया। किन्तु पत्नी का सुंदर चेहरा आँखों के सामने उभर आया।

थप्पड़ मारकर उसने उस मस्त चेहरे को हटाना चाहा किन्तु हटा न पाया। चेहरा जहाँ था वहाँ ही स्थिर था। अब उसका रूप उसके किस काम का ? अब उस यौवन का क्या करें ? अब उस मस्त शरीर से क्या काम ?

कुछ भी नहीं...कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...

क्यों ?

वेश्याएँ क्या सुंदर नहीं होतीं ? उनकी काया क्या खूबसूरत नहीं होती ? विजेंद्रसिंह राठौड़ को वेश्या जैसी पत्नी से अब क्या लेना-देना ?

अब भी वह काँप रहा था।

अब भी शरीर में कँपकँपी थी।

दिल अब भी दुख रहा था।

अब भी मन में आग़ लगी हुई थी।

और अब भी आँखों के सामने जयजयवंती का चेहरा हूबहू नज़र आ रहा था।

विजेंद्रसिंह ने पास के कोने से रायफल उठा ली।

एक हाथ में पत्नी का पत्र था।

दूसरे में रायफल थी।

चमकदार आँखों के सामने खूबसूरत पत्नी थी।

उसने काँपते हाथ से पत्र को रायफल की नोक पर खोंस दिया और फिर ऑंख के सामने के पत्नी के चेहरे पर निशान ताका।

और फायरिंग़ किया।

ठण्डी रात की घनी हवा अशांत हो ग़ई।

टूटती आवाज खाई की ओर दौड़ पड़ी। जिसने भी ये आवाज सुनी वे सब चौंक पड़े।

बर्फ के बीच की खोखली जग़ह में रहने वाले ठण्डे पंछी पंख फड़फड़ाकर उड़ ग़ये। कुछ अफसर आशंकित हो दौड़ आये।

और रायफल की नोक पर खोंसे पत्नी की निर्दोषता के सारे शब्द टुकड़े-टुकड़े हो उड़ ग़ये।

**********

13

किन्तु...

किन्तु पत्नी के चेहरे को वह भुला न पाया।

रायफल के बार से, नोक की ओर का मोटा हथेली-सा कपड़ा फट ग़या था किन्तु पत्नी का कोमल चेहरा नहीं मिटा था।

अब भी वह चेहरा आँखों के सामने उभरा हुआ था।

ऐसा कैसे हो सकता है ?

आग़ उग़ल रही आँखों की तुलना में रम का बोतल कुछ काम न आया।

उसने बोतल उठा लिया।

रायफल की लोहे की नली से बोतल का मुँह तोड़ डाला।

जलते अंगारों पर घिसते हुए पेट्रोल गिर पड़ा हो वैसे रम ग़ले के भीतर उतारता रहा... आवाज थिर हवा पर तिरती रही... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट...

होंठ पर काँच लग़ने से लहू निकल रहा था। होंठ चरचराते ग़ये किन्तु उसे पता न था। टूटे बोतल को बेपरवा से फेंक वह तंबू में जा-आ रहा था। बर्फ के टुकड़ों को तोड़ता हुआ इधर-उधर देख रहा था।

वह जोर से चीखना चाहता था, आत्महत्या करने की इच्छा होने लगी। पत्नी की तंदुरस्त और सुहावनी काया के टुकड़-टुकड़े कर देने का मन हो रहा था। और वह नर्म नर्म बर्फ पर घूमता रहा... बेकाबू हो नाचता रहा...पैर मारता रहा... क्रोध से ग़ङ्ढा करता रहा...

खुले आसमान से बर्फ की वर्षा हो रही थी।

विजेंद्रसिंह नशे में चकनाचूर था।

उसे कुछ भी याद न आ रहा था।

वह सब कुछ भूल चुका था।

एक ही बात पत्नी की निर्दोषता के इकरार की याद थी।

पत्र के शब्द जैसे जैसे याद आते वैसे वैसे वह बर्फ में लात मारता था। गिरता था। मैं... मैं... बोल रहा था।

देर तक वह तंबू के बाहर की बर्फ पर घूमता रहा।

वह थक ग़या।

बहुत थक ग़या था।

मन से संपूर्ण रूप से टूट चुका था।

पहले जो मन उत्साह, आरजू और अभीप्सा से भरा था, अब निराशा से भर ग़या था। आशा की कोई किरण नज़र नहीं आती थी। चारों ओर अंधेरा...सिर्फ अंधेरा छाया था। कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था, कहीं कोई रोशनी न थी, कोई सुख न था, और शांति भी न थी।

कहीं भी नहीं...

अब कोई पत्नी न थी, कोई सुंदरी न थी। कोई मदमस्त जयजयवंती नहीं थी।

अब कुछ भी बचा न था।

कुछ भी नहीं।

थकावट के कारण वह तंबू के दरवाजे के पास गिर कर बेहोश-सा पड़ा रहा।

सबेरा हुआ। सूरज निकला। खाई पर दिखा। किरणें फैलीं।

विजेंद्रसिंह राठौड़ की लाल-लाल आँखें जब खुलीं तब वह बर्फ में पैर डालकर पड़ा हुआ था। आधा शरीर तंबू के बाहर था। सारे शरीर में दर्द हो रहा था, आँखें लाल हो ग़ई थीं।

यादें, आहिस्ता आहिस्ता, खाई की ओर से मलयानिल की तरह फिर से लौट रही थीं, पत्नी, उसका चेहरा, पत्र, पत्र के शब्द, रम का बोतल, रायफल का बार, क्रोध से बर्फ पर घूमना...

सब याद हो आया।

फिर से सारे बदन में आग़ लग़ ग़ई।

उसने पानी पिया, जी भर पिया।

फिर वह पत्नी को आखिरी पत्र लिखने बैठा।

काँपते हाथ से पेन लिया।

क्या लिखना, समझ में नहीं आ रहा था।

कुछ देर गुस्से में ही बैठा रहा।

फिर लिखा-

‘जयजयवंती,

तेरा पत्र पढ़ा। मैं तुझे स्वीकार नहीं सकता। मैं तुझे माफ भी नहीं कर सकता। अब हम एक-दूसरे को सदा के लिए भूल जाते हैं। मैं सिर्फ विजेंद्रसिंह राठौड़ हूँ, तू सिर्फ जयजयवंती है। मैं पति था, तू पत्नी थी, वह सब अतीत हो चुका है। अब उसमें से कुछ भी नहीं है। अब मैं एक पुरुष हूँ और तू एक स्त्री मात्र, मेरा मकान, मेरी जमीन सबकुछ तेरे हैं। अब मैं कभी भी उन हरी-हरी पहाड़ियों में दर्द पाने के लिए नहीं आऊँगा। वहाँ रहकर तू सदा से जलती रहे, यही मेरी कामना है। तेरी मनोकामना क्या है, वह मैं नहीं जानता। किन्तु अंत में इतना जरूर बता देता हूँ कि तू मेरी पत्नी नहीं रही और न ही मैं तेरा पति। मैं तेरा पति नही हूँ, नहीं... नहीं... कोई भी नहीं... कोई भी नहीं... कोई भी नहीं... '

पत्र को लिफाफे में बंद कर उसने डाक की डिबिया में डलवा दिया।

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