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हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

भाग - 1

मेरी सारी जिन्दगी घूमने में ही बीती है। इस घुमक्कड़ जीवन के तीसरे पहर में खड़े होकर, उसके एक अध्याापक को सुनाते हुए, आज मुझे न जाने कितनी बातें याद आ रही हैं।

यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल 'छि:-छि:' सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी 'छि:-छि:' के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका। किन्तु बहुत काल के बाद जब आज मैं कुछ याद और कुछ भूली हुई कहानी की माला गूँथने बैठा हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के उस प्रभात में ही क्यों उस सुदीर्घ 'छि:-छि:' की भूमिका अंकित हो गयी थी, तब हठात् यह सन्देह होने लगता है कि सब लोग इस 'छि: छि:' को जितनी बड़ी बनाकर देखते थे उतनी बड़ी शायद वह नहीं थी। जान पड़ता है, भगवान जिसे अपनी सृष्टि के ठीक बीच में जबरन धकेल देते हैं शायद उसे भला लड़का कहलाकर एग्जाम पास करने की सुविधा नहीं देते; और न वे उसे गाड़ी-घोड़े पालकी पर लाव-लश्कर के साथ भ्रमण करके 'कहानी' नाम देकर छपाने की ही अभिरुचि देते हैं। उसे बुद्धि तो शायद, वे कुछ दे देते हैं, परन्तु दुनियादार लोग उसे 'सु-बुद्धि' नहीं कहते। इसी कारण उसकी प्रवृत्ति ऐसी असंगत, ऐसी निराली होती है, और उसके देखने की चीजें, और जानने की तृष्णा, स्वभावत: ऐसी बेजोड़ होती हैं कि यदि उसका वर्णन किया जाय तो, शायद, 'सु-बुद्धि' वाले हँसते-हँसते मर जाँय। उसके बाद वह मन्द बालक; न जाने किस तरह, अनादर और अवहेलना के कारण, बुरों के आकर्षण से और भी बुरा होकर, धक्के और ठोकरें खाता हुआ, अज्ञात-रूप से अन्त में किसी दिन अपयश की झोली कन्धों पर रखकर कहीं चल देता है, और बहुत समय तक उसका कोई पता नहीं लगता।

अतएव इन सब बातों को रहने देता हूँ। जो कुछ कहने बैठा हूँ वही कहता हूँ। परन्तु कहने से ही तो कहना नहीं हो जाता। भ्रमण करना एक बात है और उसका वर्णन करना दूसरी बात। जिसके भी दो पैर हैं, वह भ्रमण कर सकता है किन्तु दो हाथ होने से ही तो किसी से लिखा नहीं जा सकता। लिखना तो बड़ा कठिन है। सिवाय इसके, बड़ी भारी मुश्किल यह है कि भगवान ने मेरे भीतर कल्पना-कवित्व की एक बूँद भी नहीं डाली। इन अभागिनी ऑंखों से जो कुछ दीखता है, ठीक वही देखता हूँ। वृक्ष को ठीक वृक्ष ही देखता हूँ और पहाड़-पर्वतों को पहाड़-पर्वत। जल की ओर देखने से वह जल के सिवाय और कुछ नहीं जान पड़ता। आकाश में बादलों की तरफ ऑंखें फाड़कर देखते-देखते मेरी गर्दन अवश्य दु:खने लगी है, बादल बादल ही नजर आए हैं, उनमें किसी की निबिड़ केश-राशि तो क्या दीखेगी, कभी बाल का टुकड़ा भी खोजे नहीं मिला। चन्द्रमा की ओर देखते-देखते ऑंखें पथरा गयी हैं; परन्तु उसमें भी कभी किसी का मुख-उख नजर न आया। इस प्रकार भगवान ने ही जिसकी विडम्बना की हो उसके द्वारा कवित्व-सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि हो सकती है तो केवल यही कि वह सच-सच बात सीधी तरह से कह दे। इसलिए मैं यही करूँगा।

किन्तु मैं घुमक्कड़ क्यों हो गया, यह बताने के पहले उस व्यक्ति का कुछ परिचय देना आवश्यक है जिसने जीवन के प्रभात में ही मुझे इस नशे में मत्त कर दिया था। उसका नाम था इन्द्रनाथ। हम दोनों का प्रथम परिचय एक फुटबाल-मैच में हुआ। जानता नहीं कि वह आज जीवित है या नहीं। क्योंकि, बरसों पहले एक दिन वह बड़े सुबह उठकर, घर-बार, जमीन-जायदाद और अपने कुटुम्ब को छोड़कर केवल एक धोती लेकर चला गया और फिर लौटकर नहीं आया। ओह, वह दिन आज किस तरह याद है।

स्कूल के मैदान में बंगाली और मुसलमान छात्रों में फुटबाल-मैच था। संध्याख हो रही थी। मगन होकर देख रहा था। आनन्द की सीमा न थी। हठात्-अरे यह क्या! तड़ातड़-तड़ातड़ शब्द और 'मारो साले को, पकड़ो साले को' की पुकार मच गयी। मैं विह्वल-सा हो गया। दो-तीन मिनट,- बस इतने में कहाँ कौन गायब हो गया, निश्चय ही न कर पाया। ठीक तौर से पता लगा तब, जब कि मेरी पीठ पर आकर एक छतरी का पूरा बेंट तड़ाक से टूट गया तथा और भी दो-तीन बेंट सिर और भी दो-तीन बेंट सिर और पीठ पर पड़ने को उद्यत दीखे। देखा, पाँच-सात मुसलमान छोकरों ने मेरे चारों ओर व्यूह-रचना कर ली है और भाग जाने को जरा-सा भी रास्ता नहीं छोड़ा है।

और भी एक बेंट,- और भी एक। ठीक इसी समय जो मनुष्य बिजली के वेग से उस व्यूह को भेदता हुआ मेरे आगे आकर खड़ा हो गया, वह था इन्द्रनाथ।

रंग उसका काला था। नाक वंशी के समान, कपाल प्रशस्त और सुडौल, मुख पर दो-चार चेचक के दाग। ऊँचाई मेरे बराबर ही थी, किन्तु उम्र मुझसे कुछ अधिक थी। कहने लगा, ''कोई डर नहीं है, तुम मेरे पीछे-पीछे बाहर निकल आओ।''

उस लड़के की छाती में जो साहस और करुणा थी, वह दुर्लभ होते हुए भी शायद असाधारण नहीं थी। परन्तु इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि उसके दोनों हाथ असाधारण थे। यही नहीं कि वे बहुत बलिष्ठ थे, वरन् लम्बाई में भी घुटनों तक पहुँचते थे। सिवाय इसके, उसे एक सुविधा यह भी थी कि जो उसे जानता नहीं था उसके मन में यह आशंका भी न हो सकती थी कि विवाद के समय यह भला आदमी अकस्मात् अपना तीन हाथ लम्बा हाथ बाहर निकालकर मेरी नाक पर एकाएक इस अन्दाज का घूँसा मार सकेगा। वह घूँसा क्या था, उसे बाघ का पंजा कहना ही अधिक उपयुक्त होगा।

दो ही मिनट के भीतर मैं उसकी पीठ से सटा हुआ बाहर आ गया; और तब, इन्द्र ने बिना किसी आडम्बर के कहा, ''भागो।''

भागना शुरू करके मैंने पूछा, ''और तुम?'' उसने रूखाई से जवाब दिया, ''अरे तू तो भाग-गधे कहीं के।''

गधा होऊँ- या चाहे जो होऊँ, मुझे खूब याद है, मैंने हठात् लौटकर और खड़े होकर कहा, ''नहीं, मैं नहीं भागूँगा।''

बचपन में मार-पीट किसने न की होगी? किन्तु, मैं था गाँव का लड़का- दो-तीन महीने पहले ही लिखने-पढ़ने के लिए शहर में बुआजी के यहाँ आया था। इसके पहले, इस प्रकार दल बाँधकर, न तो मैंने मार-पीट ही की थी, और न किसी दिन इस तरह दो पूरे छतरी के बेंट ही मेरी पीठ के ऊपर टूटे थे। फिर भी मैं अकेला भाग न सका। इन्द्र ने एक बार मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, ''नहीं भागेगा, तो क्या खड़े-खड़े मार खाएगा? देख, उस तरफ से वे लोग आ रहे हैं-अच्छा, तो चल, खूब कसकर दौड़ें।''

यह काम तो मैं खूब कर सकता था। दौड़ते-दौड़ते जब हम लोग बड़ी सड़क पर पहुँचे, तब शाम हो गयी थी। दुकानों में रोशनी हो गयी थी और रास्ते पर म्युनिसिपल के केरॉसिन के लैम्प, लोहे के खम्भों पर, एक यहाँ और दूसरा वहाँ, जल रहे थे। ऑंखों में जोर होने पर, ऐसा नहीं है कि एक के पास खड़े होने पर दूसरा दिखाई न पड़ता। आततायियों की अब कोई आशंका नहीं थी। इन्द्र अत्यन्त स्वाभाविक सहज स्वर से बात कर रहा था। मेरा गला सूख रहा था, परन्तु आश्चर्य है कि इन्द्र रत्ती-भर भी नहीं हाँफा था। मानो कुछ हुआ ही न हो- न मारा हो, न मार खाई हो और न दौड़ा ही हो। जैसे कुछ हुआ ही न हो, ऐसे भाव से उसने पूछा, ''तेरा नाम क्या है रे?''

'' श्रीकान्त।''

''श्रीकान्त? अच्छा।'' कहकर उसने अपनी जेब से मुट्ठी-भर सूखी पत्ती बाहर निकाली। उसमें से कुछ तो उसने खा ली और कुछ मेरे हाथ में देकर कहा, ''आज खूब ठोका सालों को, ले खा।''

''क्या है यह?''

''बूटी।''

मैंने अत्यन्त विस्मित होकर कहा, ''भाँग? यह तो मैं नहीं खाता।''

उसने मुझसे भी अधिक विस्मित होकर कहा, ''खाता नहीं? कहाँ का गधा है रे। खूब नशा होगा- खा, चबाकर लील जा।''

नशे की चीज का मजा उस समय ज्ञात नहीं था; इसलिए सिर हिलाकर मैंने उसे वापस कर दिया। वह उसे भी चबाकर निगल गया।

''अच्छा, तो फिर सिगरेट पी।'' यह कहकर उसने जेब से दो सिगरेट और दियासलाई बाहर निकाली। एक तो उसने मेरे हाथ में दे दी और दूसरी अपने हाथ में रखी। इसके बाद, वह अपनी दोनों हथेलियों को एक विचित्र प्रकार से जुटाकर, उस सिगरेट को चिलम बनाकर जोर से खींचने लगा। बाप रे,- कैसे जोर से दम खींचा कि एक ही दम में सिगरेट की आग सिरे से चलकर नीचे उतर आई! लोग चारों तरफ खड़े थे- मैं बहुत ही डर गया। मैंने डरते हुए पूछा, ''पीते हुए यदि कोई देख ले तो?''

''देख ले तो क्या? सभी जानते हैं।'' यह कहकर स्वच्छन्दता से सिगरेट पीता हुआ वह चौराहे पर मुड़ा और मेरे मन पर एक गहरी छाप लगाकर, एक ओर को चल दिया।

आज उस दिन की बहुत-सी बातें याद आती हैं। सिर्फ इतना ही याद नहीं आता, कि उस अद्भुत बालक के प्रति, उस दिन मुझे प्रेम उत्पन्न हुआ था, अथवा यों खुले आम भाँग और तमाखू पीने के कारण, मन ही मन घृणा।

इस घटना के बाद करीब एक महीना बीत गया। एक दिन रात्रि जितनी उष्ण थी उतनी ही अंधेरी। कहीं वृक्ष की एक पत्ती तक न हिलती थी। सब छत पर सोए हुए थे। बारह बज चुके थे, परन्तु किसी की भी ऑंखों में नींद का नाम न था। एकाएक बाँसुरी का बहुत मधुर स्वर कानों में आने लगा। साधारण 'रामप्रसादी' सुर था। कितनी ही दफे तो सुन चुका था, किन्तु बाँसुरी इस प्रकार मुग्ध कर सकती है, यह मैं न जानता था। हमारे मकान के दक्षिण-पूर्व के कोने में एक बड़ा भारी आम और कटहल का बाग था। कई हिस्सेदारों की सम्पत्ति होने के कारण कोई उसकी खोज-खबर नहीं लेता था, इसलिए पूरा बाग निबिड़ जंगल के रूप में परिणत हो गया था। गाय-बैलों के आने-जाने से उस बाग के बीच में से केवल एक पतली-सी पगडंडी बन गयी थी। ऐसा मालूम हुआ कि मानो उसी वन-पथ से बाँसुरी का सुर क्रमश: निकटवर्ती होता हुआ आ रहा है। बुआ उठकर बैठ गयीं और अपने बड़े लड़के को उद्देश्य कर बोलीं, ''हाँ रे नवीन, यह बाँसुरी राय-परिवार का इन्द्र ही बजा रहा है न?'' तब मैंने समझा कि इस बंसीधारी को ये सभी चीन्हते हैं। बड़े भइया ने कहा, ''उस हतभागे को छोड़कर ऐसी दूसरा कौन बजायेगा और उस जंगल में ऐसा कौन है जो ढूँकेगा?''

''बोलता क्या है रे? वह क्या गुसाईं के बगीचे से आ रहा है?''

बड़े भइया बोले, ''हाँ।''

ऐसे भयंकर अन्धकार में उस अदूरवर्ती गहरे जंगल का खयाल करके बुआ मन ही मन सिहर उठीं और डर भरे कण्ठ से प्रश्न कर उठीं, ''अच्छा, उसकी माँ भी क्या उसे नहीं रोकती? गुसाईं के बाग में तो न जाने कितने लोग साँप के काटने से मर गये हैं- उस जंगल में इतनी रात को वह लड़का आया ही क्यों?''

बड़े भइया कुछ हँसकर बोले, ''इसलिए कि उस मुहल्ले से इस मुहल्ले तक आने का वही सीधा रास्ता है। जिसे भय नहीं है, प्राणों की परवाह नहीं है, वह क्यों बड़े रास्ते से चक्कर काटकर आएगा माँ? उसे तो जल्दी आने से मतलब, फिर चाहे उस रास्ते में नदी-नाले हों- चाहे साँप-बिच्छू और बाघ-भालू हों!''

''धन्य है रे लड़के, तुझे!'' कहकर बुआ एक नि:श्वास डालकर चुप हो रहीं। वंशी की ध्वानि क्रमश: सुस्पष्ट होती गयीं और फिर धीरे-धीरे अस्पष्ट होती हुई दूर जाकर विलीन हो गयी।

यही था वह इन्द्रनाथ। उस दिन तो मैं यह सोचता रहा था कि क्या ही अच्छा होता, यदि इतना अधिक बल मुझमें भी होता और मैं भी इसी तरह मार-पीट कर सकता और आज रात्रि को जब तक, सो न गया, तब तक यही कामना करता रहा कि यदि किसी तरह ऐसी वंशी बजा सकता!

परन्तु उससे सद्भाव किस तरह पैदा करूँ? वह तो मुझसे बहुत ऊँचे पर है। उस समय वह स्कूल में भी न पढ़ता था। सुना था कि हेडमास्टर साहब ने अन्याय करके उसके सिर पर ज्यों ही गधे की टोपी लगाने का आयोजन किया, त्यों ही वह मर्माहत हो, अकस्मात् हेडमास्टर की पीठ पर एक धौल जमाकर, घृणा भाव से स्कूल की रेलिंग फाँदता हुआ घर भाग आया और फिर गया ही नहीं। बहुत दिनों बाद उसी के मुँह से सुना था कि वह एक न कुछ अपराध था। हिन्दुस्तानी पंडितजी को क्लास के समय में ही नींद आने लगती थी, सो एक बार जब वे नींद ले रहे थे तब, उनकी गाँठ बँधी चोटी को उसने कैंची से काटकर जरा छोटा भर कर दिया था! और उससे उनकी विशेष कुछ हानि भी नहीं हुई, क्योंकि पण्डितजी जब घर पहुँचे तब अपनी चोटी अपनी चपकन की जेब में ही पड़ी हुई मिल गयी! वह कहीं खोई नहीं गयी, फिर भी पंडितजी का गुस्सा शान्त क्यों न हुआ और क्यों वे हेडमास्टर साहब के पास नालिश करने गये- यह बात आज तक भी इन्द्र की समझ में नहीं आई। परन्तु फिर भी यह बात वह ठीक समझ गया था कि स्कूल से रेलिंग फाँदकर घर आने का रास्ता तैयार हो जाने पर फिर फाटक में से वापिस लौटकर जाने का रास्ता प्राय: खुला नहीं रह जाता। और फाटक का रास्ता खुला रहा या नहीं रहा, यह देखने की उत्सुकता भी, उसे बिल्कुलल नहीं हुई। यहाँ तक कि सिर पर 10-20 अभिभावकों के होने पर भी, उनमें से कोई भी, उसका मुँह किसी भी तरह फिर विद्यालय की ओर नहीं फेर सका।

इन्द्र ने कलम फेंककर नाव का डाँड़ हाथ में ले लिया। तब से वह सारे दिन गंगा में नाव के ऊपर रहने लगा। उसकी अपनी एक छोटी-सी डोंगी थी। चाहे ऑंधी हो चाहे पानी, चाहे दिन हो चाहे रात, वह अकेला उसी पर बना रहता। कभी-कभी एकाएक ऐसा होता कि वह पश्चिम की गंगा के इकतरफा बहाव में अपनी डोंगी को छोड़ देता, डाँड़ पकड़े चुपचाप बैठा रहता और दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक फिर उसका कुछ भी पता न लगता।

एक दिन इसी प्रकार जब वह बिना किसी उद्देश्य के अपनी डोंगी बहाए जा रहा था, तब उसके साथ मिलन की गाँठ को सुदृढ़ करने का मुझे मौका मिला। उस समय मेरी यह एकमात्र कामना थी कि उससे किसी न किसी प्रकार मित्रता का सम्बन्ध दृढ़ किया जाय, और यही बतलाने के लिए मैंने इतना कहा है।

किन्तु जो लोग मुझे जानते हैं वे तो कहेंगे कि यह तो तुम्हें नहीं सोहता भैया, तुम ठहरे गरीब के लड़के और फिर लिखना-पढ़ना सीखने के लिए अपना गाँव छोड़कर पराए घर आकर रहे हो, फिर तुम उससे मिले ही क्यों और मिलने के लिए इतने व्याकुल ही क्यों हुए? यदि ऐसा न किया होता, तो आज तुम-

ठहरो, ठहरो, अधिक कहने की जरूरत नहीं है। यह बात हजारों लोगों ने लाखों ही बार मुझसे कही है; स्वयं खुद मैंने ही यह प्रश्न अपने आपसे करोड़ों बार पूछा है, परन्तु सब व्यर्थ। वह कौन था? इसका जवाब तुममें से कोई भी नहीं दे सकता और फिर, ''यदि ऐसा न हुआ होता तो मैं क्या हो जाता?'' इस प्रश्न का समाधन भी तुममें से कोई कैसे कर सकता है? जो सब कुछ जानते हैं, केवल वे (भगवान) ही बता सकते हैं कि क्यों इतने आदमियों को छोड़कर एकमात्र उसी हतभागे के प्रति मेरा सारा हृदय आकृष्ट हुआ और क्यों उस मन्द से मिलने के लिए मेरे शरीर का प्रत्येक कण उन्मुख हो उठा।

वह दिन मुझे खूब याद है। सारे दिन लगातार गिरते रहने पर भी मेह बन्द नहीं हुआ था। सावन का आकाश घने बादलों से घिरा हुआ था। शाम होते-न-होते चारों ओर अन्धकार छा गया। जल्दी-जल्दी खाकर, हम कई भाई रोज की तरह बाहर बैठकखाने में बिछे हुए बिस्तर पर रेड़ी के तेल का दीपक जलाकर, पुस्तक खोलकर, बैठ गये थे। बाहर के बरामदे में एक तरफ फूफाजी केन्वास की खाट पर लेटे हुए अपनी सांध्यी तन्द्रा का उपभोग कर रहे थे और दूसरी ओर बूढ़े रामकमल भट्टाचार्य अफीम खाकर अन्धकार में ऑंखें मींचे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। डयोढ़ी पर हिन्दुस्तानी दरबान का 'तुलसीदास स्वर' सुन पड़ रहा था और भीतर हम तीनों भाई मँझले भइया की कड़ी देख-रेख में चुपचाप विद्याभ्यास कर रहे थे। छोटे भइया, जतीन और मैं तीसरी और चौथी कक्षा में पढ़ते थे और गम्भीर स्वभाव के मँझले भइया दो दफे एण्ट्रेस फेल होकर तीसरी दफे की तैयारी कर रहे थे। उनके प्रचण्ड शासन में किसी को एक मिनट भी नष्ट करने का साहस न होता था। हम लोगों का पढ़ने का समय था। 7.30 से 9 बजे तक। उस समय बातचीत करके हम उनकी 'पास होने' की पढ़ाई में विघ्न न डाल सकें, इसके लिए वे रोज कैंची से काट-काटकर कागज के 25-30 टिकट जैसे टुकड़े रख छोड़ते। उनमें से किसी में लिखा होता, 'बाहर जाना है', किसी में 'थूकना है', किसी में 'नाक साफ करना है', किसी में 'पानी पीना है' आदि। जतीन भइया ने नाक साफ करने का एक टिकट मँझले भइया के सामने पेश किया। मँझले भइया ने उस पर अपने हाथ से लिख दिया, '8 बजकर 33 मिनट से लेकर 8 बजकर 33.30 मिनट तक।' अर्थात् इतने समय के लिए नाक साफ करने जा सकते हैं। छुट्टी पाकर जतीन भइया टिकट हाथ में लेकर गये ही थे कि छोटे भइया ने थूकने जाने का टिकट पेश कर दिया। मँझले भइया ने उस पर 'नहीं' लिख दिया। इस पर दो मिनट तक छोटे भइया मुँह फुलाए बैठे रहे और उसके बाद उन्होंने पानी पीने की अर्जी दाखिल कर दी। इस बार वह मंजूर हो गयी। मँझले भइया ने इसके लिए लिख दिया, ''हाँ, 8 बजकर 41 मिनट से लेकर 8 बजकर 47 मिनट तक।'' परवाना लेकर छोटे भइया हँसते हुए ज्यों ही बाहर गये त्यों ही जतीन भइया ने लौटकर हाथ का टिकट वापस दे दिया। मँझले भइया ने घड़ी देखकर और समय मिलाकर एक रजिस्टर बाहर निकाला और उसमें वह टिकट गोंद से चिपका दिया। यह सब सामान उनकी हाथ की पहुँच के भीतर ही रक्खा रहता था। सप्ताह सप्ताह होने पर इन सब टिकटों को सामने रखकर कैफियत तलब की जाती थी कि क्यों अमुक दिन तुमने इजाजत से अधिक समय लगा दिया।
 
इस प्रकार मँझले भइया की अत्यन्त सतर्कता और श्रृंखलाबद्धता से- हमारा और उनका खुद का-किसी का जरा-सा भी समय नष्ट न होने पाता था। इस तरह प्रतिदिन, डेढ़ घण्टा, खूब पढ़ लेने के उपरान्त, जब हम लोग रात के 9 बजे घर में सोने को आते थे तब निश्चय ही माता सरस्वती हमें घर की चौखट तक पहुँचा जाती थीं; और दूसरे दिन स्कूल की कक्षा से जो सब सम्मान सौभाग्य प्राप्त करके हम घर लौटते थे वह तो आप समझ ही गये होंगे। परन्तु मँझले भइया का दुर्भाग्य कि उनके बेवकूफ परीक्षक उन्हें कभी न चीह्न सके! वे निज की तथा पराई शिक्षा-दीक्षा के प्रति इतना प्रबल अनुराग तथा समय के मूल्य के सम्बन्ध में अपने उत्तरदायित्व का इतना सूक्ष्म खयाल रखते थे फिर भी, वे उन्हें बराबर फेल ही करते गये। इसे ही कहते हैं अदृष्ट का अन्धा न्याय-विचार। खैर, जाने दो-अब उसके लिए दुखी होने से क्या लाभ?

उस रात्रि को भी घर के बाहर वही घना अन्धकार, बरामदे में तन्द्राभिभूत वे दोनों बुङ्ढे और भीतर दीपक के मन्द प्रकाश के सम्मुख गम्भीर अध्यघयन में लगे हुए हम चार प्राणी थे।

छोटे भइया के लौट आते ही प्यास के मारे मेरी छाती एकबारगी फटने लगी। इसीलिए टिकट पेश करके मैं हुक्म की राह देखने लगा। मँझले भइया उसी टिकटों वाले रजिस्टर के ऊपर झुककर परीक्षा करने लगे कि मेरा पानी पीने के लिए जाना नियम-संगत है या नहीं- अर्थात् कल परसों किस परिमाण में पानी पिया था।

अकस्मात् मेरे ठीक पीछे से एक 'हुम्' शब्द और साथ ही साथ छोटे भइया और जतीन भइया का आर्तकण्ठ से निकला हुआ, ''अरे बाप रे! मार डाला रे' का गगनभेदी चीत्कार सुन पड़ा। उन्हें किसने मार डाला, सिर घुमाकर यह देखने के पहले ही, मँझले भइया ने सिर उठाकर विकट शब्द किया और बिजली की तेजी से सामने पैर फैला दिए, जिससे दीवट उलट गया। तब उस अन्धकार में 'दक्ष-यज्ञ' मच गया। मँझले भइया को थी मिर्गी की बीमारी, इसलिऐ वे 'ओं-ओं' करके दीवट उलटाकर जो चित्त गिरे सो फिर न उठे।

ठेलठाल करके मैं बाहर निकला तो देखा कि फूफाजी अपने दोनों लड़कों को बगल में दबाए हुए, उनसे भी अधिक तीव्र स्वर में चिल्लाकर छप्पर फाड़े डाल रहे हैं। ऐसा लगता था मानो उन तीनों बाप-बेटों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना गला फाड़ सकता है।

इसी अवसर पर एक चोर जी छोड़कर भागा जा रहा था और डयोढ़ी के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया था। फूफाजी प्रचण्ड चीत्कार करके हुक्म दे रहे थे, ''और मारो, साले को, मार डालो।'' इत्यादि।

दम भर में रोशनी हो गयी, नौकर-चाकरों और पास-पड़ोसियों से ऑंगन खचाखच भर गया। दरबानों ने चोर को मारते-मारते अधमरा कर दिया और प्रकाश के सम्मुख खींच लाकर, धक्का देकर गिरा दिया। पर चोर का मुँह देखकर घर-भर के लोगों का मुँह सूख गया-अरे, ये तो भट्टाचार्य महाशय हैं!

तब कोई तो जल ले आया, कोई पंखे से हवा करने लगा, और कोई उनकी ऑंखों और मुँह पर हाथ फेरने लगा। उधर घर के भीतर मँझले भइया के साथ भी यही हो रहा था।

पंखे की हवा और जल के छींटे खाकर रामकमल होश में आकर लगे फफक-फफक कर रोने। सभी लोग पूछने लगे, ''आप इस तरह भागे क्यों जा रहे थे?'' भट्टाचार्य महाशय रोते-रोते बोले, ''बाबा, बाघ नहीं, वह एक तगड़ा भालू था- छलाँग मारकर बैठकखाने में से बाहर आ गया।''

छोटे भइया और जतीन भइया बारम्बार कहने लगे, ''भालू नहीं बाबा, एक भेड़िया था, पूँछ समेटे पायन्दाज के ऊपर बैठा गुर्रा रहा था।''

मँझले भइया, होश में आते ही अधमिची ऑंखों से दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए संक्षेप में बोले, ''दी रॉयल बंगाल टाइगर।''

परन्तु वह है कहाँ? चाहे मँझले भइया का 'दी रॉयल बंगाल' हो, चाहे रामकमल का 'तगड़ा भालू' हो, परन्तु वह यहाँ आया ही किस तरह और चला ही कहाँ गया? जब इतने लोगों ने उसे देखा है तब वह होगा तो कुछ न कुछ अवश्य ही।

तब किसी ने विश्वास किया और किसी ने नहीं किया। किन्तु सभी भय-चकित नेत्रों से लालटेन लेकर चारों तरफ खोजने लगे।

अकस्मात् पहलवान किशोरसिंह 'वह बैठा है' कहकर एक छलाँग में बरामदे में ऊपर चढ़ गया। उसके बाद वहाँ भी ठेला-ठेली मच गयी। उतने सब लोग बरामदे पर एक साथ चढ़ना चाहते थे, किसी से भी क्षण-भर की देर न सही जाती थी। ऑंगन के एक तरफ अनार का दरख्त था। मालूम पड़ा कि उसी की घनी डालियों में एक बड़ा जानवर बैठा है। वह बाघ के समान ही मालूम होता था। पलक मारते न मारते सारा बरामदा खाली हो गया और बैठकखाना खचाखच भर गया। बरामदे में एक भी आदमी न रहा। घर की उस भीड़ में से फूफाजी का उत्तेजित कण्ठ स्वर सुन पड़ने लगा, ''बरछी लाओ-बन्दूक लाओ।'' हमारे मकान के पास के मकान में गगन बाबू के पास एक मुंगेरी बन्दूक थी। उनका लक्ष्य उसी अस्त्र पर था।

'लाओ' तो ठीक, किन्तु लाए कौन? अनार का झाड़ था दरवाजे के ही निकट और फिर उस पर बैठा था भेड़िया। हिन्दुस्तानी सिटपिटाए तक नहीं और जो लोग तमाशा देखने आए थे वे भी सनाका खींचकर रह गये।

ऐसी विपत्ति के समय न जाने कहाँ से इन्द्र आकर उपस्थित हो गया। शायद वह सामने के रास्ते से कहीं जा रहा था और शोरगुल सुनकर अन्दर घुस आया था। पल-भर में सौ कण्ठ एक साथ चीत्कार कर उठे, ''ओ रे, बाघ है बाघ! भाग जा रे लड़के, भाग जा!''

पहले तो वह हड़बड़ाकर भीतर दौड़ आया किन्तु पलभर बाद ही, सब हाल सुनकर, निर्भय हो, ऑंगन में उतर लालटेन उठाकर देखने लगा।

दुमंजिले की खिड़कियों में से औरतें साँस रोककर इस साहसी लड़के की ओर देख-देखकर 'दुर्गा' नाम जपने लगीं। नीचे भीड़ में खड़े हुए हिन्दुस्तानी सिपाही उसे हिम्मत बँधाने लगे और आभास देने लगे कि एकाध हथियार मिलने पर वे भी वहाँ आने को तैयार हैं!

अच्छी तरह देखकर इन्द्र ने कहा, ''द्वारिका बाबू, यह तो बाघ नहीं मालूम होता।'' उसकी बात समाप्त होते न होते वह 'रॉयल बंगाल टाइगर' दोनों हाथ जोड़कर मनुष्य के ही स्वर में रो पड़ा और बोला, ''नहीं, बाबूजी, नहीं, मैं बाघ-भालू नहीं, श्रीनाथ बहुरूपिया हूँ।'' इन्द्र ठठाकर हँस पड़ा। भट्टाचार्य महाशय खड़ाऊँ हाथ में लिये सबसे आगे दौड़ पड़े-

''हरामजादे, तुझे डराने के लिए और कोई जगह नहीं मिली?'' फूफाजी ने महाक्रोध से हुक्म दिया, ''साले को कान पकड़कर लाओ।''

किशोरी सिंह ने उसे सबसे पहले देखा था, इसलिए उसका दावा सबसे प्रबल था। वह गया और उसके कान पकड़कर घसीटता हुआ ले आया। भट्टाचार्य महाशय उसकी पीठ पर जोर-जोर से खड़ाऊँ मारने लगे और गुस्से के मारे दनादन हिन्दी बोलने लगे-

''इसी हरामजादे बदजात के कारण मेरी हड्डी-पसली चूर हो गयी है। साले पछहियों ने घूँसे मार-मारकर कचूमर निकाल दिया।''

श्रीनाथ का मकान बारासत में था। वह हर साल इसी समय एक बार रोजगार करने आता था। कल भी वह इस घर में नारद बनकर गाना सुना गया था। वह कभी भट्टाचार्य महाशय के और कभी फूफाजी के पैर पकड़ने लगा। बोला, ''लड़कों ने इतना अधिक भयभीत होकर, और दीवट लुढ़काकर, ऐसा भीषण काण्ड मचा दिया कि मैं स्वयं भी मारे डर के उस वृक्ष की आड़ में जाकर छिप गया। सोचता था कि कुछ शान्ति होने पर, बाहर आकर, अपना स्वाँग दिखाकर जाऊँगा। किन्तु मामला उत्तरोत्तर ऐसा होता गया कि मेरी फिर हिम्मत ही नहीं हुई।''

श्रीनाथ आरजू-मिन्नत करने लगा; किन्तु फूफाजी का क्रोध कम हुआ ही नहीं। बुआजी स्वयं ऊपर से बोलीं, ''तुम्हारे भाग्य भले थे जो सचमुच का बाघ-भालू नहीं निकला, नहीं, तो जैसे बहादुर तुम और तुम्हारे दरबान हैं- छोड़ दो बेचारे को, और दूर कर दो डयोढ़ी के इन पछहियाँ दरबानों को। एक जरा से लड़के में जो साहस है उतना घर-भर के सब आदमियों में मिलकर भी नहीं है।'' फूफाजी ने कोई बात ही न सुनी; वरन् उन्होंने बुआजी के इस अभियोग पर ऑंखें घुमाकर ऐसा भाव धारण किया कि मानो इच्छा करते ही वे इन सब बातों का काफी और माकूल जवाब दे सकते हैं, परन्तु चूँकि औरतों की बातों का उत्तर देने की कोशिश करना भी पुरुष जाति के लिए अपमानकारक है इसलिए, और भी गरम होकर हुक्म दिया, ''इसकी पूँछ काट डालो।'' तब उसकी रंगीन कपड़े से लिपटी हुई घास की बनी लम्बी पूँछ काट डाली गयी, और उसे भगा दिया गया। बुआजी ऊपर से गुस्से में बोलीं, ''पूँछ को सँभालकर रख छोड़ो, किसी समय काम आएगी!''

इन्द्र ने मेरी ओर देखकर कहा, ''मालूम पड़ता है, तुम इसी मकान में रहते हो, श्रीकान्त!''

मैंने कहा, ''हाँ, तुम, इतनी रात को कहाँ जाते थे?''

इन्द्र हँसकर बोला, ''रात कहाँ है रे, अभी तो संध्यास हुई है। मैं जाता हूँ अपनी डोंगी पर मछली पकड़ने। चलता है?''

मैंने डरकर पूछा, ''इतने अन्धकार में डोंगी पर चढ़ोगे?''

वह फिर हँसा, बोला, ''डर क्या है रे? इसी में तो मजा है। सिवाय इसके क्या अंधेरा हुए बगैर मछलियाँ पाई जा सकती हैं? तैरना जानता है?''

''खूब जानता हूँ।''

''तो फिर चल भाई।'' यह कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। कहा, ''मैं अकेला इतने बहाव में उस तरफ को नाव नहीं ले सकता, ऐसे ही किसी की खोज में था जो डरे नहीं।''

मैंने फिर कुछ न कहा। उसका हाथ पकड़े हुए चुपचाप रास्ते पर आ पहुँचा। पहले तो मानो मुझे अपने आप पर ही विश्वास न हुआ कि सचमुच ही उस रात्रि को मैं नाव चलाने जा रहा हूँ, क्योंकि जिस आह्नान के आकर्षण से उस स्तब्ध निबिड़ निशा में, घर के समस्त शासन-पाश को तुच्छ समझकर, अकेला बाहर चला आया था वह कितना बड़ा आकर्षण था, यह उस समय विचारकर देख सकना मेरे लिए साध्यु ही नहीं था। अधिक समय बीतने के पूर्व ही गोसाईं बाग के उस भयंकर वन-पथ के सामने आ उपस्थित हुआ और इन्द्र का अनुसरण करता हुआ स्वप्नाविष्ट पुरुष की भाँति उसे पारकर गंगा के किनारे जा पहुँचा।

कंकड़-पत्थरों का खड़ा किनारा है। सिर के ऊपर एक बहुत प्राचीन बरगद का वृक्ष मूर्तिमान अन्धकार के समान चुपचाप खड़ा है और उसी के करीब तीस हाथ नीचे सूचीभेद्य अन्धकार के तल में, पूरी बरसात का गम्भीर जल-स्रोत चट्टानों से टकराकर, भँवरों की रचना करता हुआ, उद्दाम वेग से दौड़ रहा है। देखा कि, उसी स्थान पर इन्द्र की छोटी-सी नाव बँधी हुई है। ऊपर से देखने पर ऐसा मालूम हुआ मानो उस खूब तेज जल-धारा के मुख पर केले के फूल का एक छोटा-सा छिलका लगातार टकरा-टकराकर मर रहा है।

मैं स्वयं भी बिल्कुरल डरपोक नहीं था। किन्तु जब इन्द्र ने ऊपर से नीचे तक लटकती हुई एक रस्सी दिखलाकर कहा, ''डोंगी की इस रस्सी को पकड़कर चुपचाप नीचे उतर जा; सावधानी से उतरना, फिसल गया तो फिर खोजने से भी तेरा पता नहीं लगेगा।'' तब दरअसल मेरी छाती धड़क उठी। जान पड़ा कि यह असम्भव है, फिर भी मेरे लिए तो रस्सी का सहारा है-''किन्तु तुम क्या करोगे?''

उसने कहा, ''तेरे नीचे जाते ही मैं रस्सी खोल दूँगा और फिर नीचे उतरूँगा। डर की बात नहीं है, मेरे नीचे उतरने के लिए बहुत-सी घास की जड़ें झूल रही हैं।''

और कुछ न कहकर मैं रस्सी के सहारे बड़ी सावधानी से बमुश्किल नीचे उतरकर नाव पर बैठ गया। इसके बाद उसने रस्सी खोल दी और वह झूल गया। वह किस चीज के सहारे नीचे उतरने लगा सो मैं आज भी नहीं जानता हूँ! डर के मारे मेरी छाती इतने जोर से धड़कने लगी कि उसकी और मैं देख भी न सका। दो-तीन मिनट तक विपुल जल-धारा के उन्मत्त गर्जन के सिवाय कहीं से कोई शब्द भी नहीं सुनाई दिया। एकाएक एक हलकी-सी हँसी के शब्द से चौंककर मुँह फिराया तो देखता हूँ कि इन्द्र ने दोनों हाथों से डोंगी को जोर से धक्का देकर ठेल दिया है और आप कूदकर उस पर चढ़ बैठा है। क्षुद्र तरी एक चक्कर-सा खाकर नक्षत्र-वेग से बहने लगी।

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कुछ ही देर में सामने और पीछे सब कुछ सघन अन्धकार से लिप-पुतकर एकाकार हो गया। रह गयी दाहिनी ओर बाईं ओर दोनों सीमाओं तक फैली हुई विपुल उद्दाम जल की धारा, और उसके ऊपर खूब तेजी से चलने वाली वह छोटी-सी नाव और उस पर किशोरवय के दो बालक। यद्यपि प्रकृति देवी के अपरिमेय गम्भीर रूप को समझने की उम्र वह नहीं थी, किन्तु उसे मैं आज भी नहीं भूल सका हूँ। वायुहीन, निष्कम्प, निस्तब्ध, नि:संग, निशीथनी की मानो वह एक विराट काली मूर्ति थी। उसके निबिड़ काले बालों से आकाश और पृथ्वी ढँक गयी थी और उस सूची-भेद्य अन्धकार को विदीर्ण करके, कराल दाढ़ों की रेखा के समान, उस दिगन्त-विस्तृत तीव्र जलधारा से मानो एक तरह की अद्भुत निश्चल द्युति, निष्ठुर दबी हुई हँसी के समान, बिखर रही थी। आसपास और सामने, कहीं तो जल की उन्मत्त धारा तल देश में जाकर तथा ऊपर को उठकर फट पड़ती थी, कहीं परस्पर के प्रतिकूल गति संघात से आवर्तों की रचना करती हुई चक्कर खाती थी, और कहीं अप्रतिहित जल-प्रवाह पागल की तरह दौड़ा जा रहा था।

हमारी डोंगी एक कोने से दूसरे कोने की ओर जा रही है, बस इतना ही मालूम हो रहा था। किन्तु उस पार के उस दुर्भेद्य अन्धकार में, किस जगह लक्ष्य स्थिर करके, इन्द्र हाल को पकड़े चुपचाप बैठा है, यह मैं कुछ न जानता था। इस उम्र में वह कितना पक्का माझी बन गया था, इसकी मुझे उस समय कल्पना भी न थी। एकाएक वह बोला-

''क्यों रे श्रीकान्त, डर लगता है क्या?''

मैं बोला, ''नहीं।''

इन्द्र खुश होकर बोला, ''यही तो चाहिए। जब तैरना आता है तब फिर डर किस बात का?'' प्रत्युत्तर में मैंने एक छोटे-से नि:श्वास को दबा दिया कि कहीं वह सुन न ले। किन्तु, ऐसी गहरी अंधेरी रात में, ऐसी जल-राशि और ऐसे दुर्जय प्रवाह में, तैरना जानने और न जानने में क्या अन्तर है, सो मेरी समझ में न आ सका। उसने भी और कोई बात नहीं कही। बहुत देर तक इसी तरह चलते रहने के बाद कहीं से कुछ आवाज-सी आई, जो कि अस्फुट और क्षीण थी, किन्तु नौका जैसे-जैसे अग्रसर होने लगी वैसे ही वैसे वह आवाज भी स्पष्ट और प्रबल होने लगी। मानो लोगों का बहुत दूर से आता हुआ क्रुद्ध आह्नान हो- मानो कितने ही बाधा-विघ्नों को लाँघकर, हटाकर, वह आह्नान हमारे कानों तक आ पहुँचा हो। वह आह्नान थका हुआ-सा था, फिर भी न उसमें विराम था और न विच्छेद ही- मानो उनका क्रोध न कम होता था न बढ़ता ही था और न थमना ही चाहता था। बीच-बीच में एकाध दफा 'भप्-भप् शब्द भी होता थ। मैंने पूछा, ''इन्द्र यह काहे की आवाज सुन पड़ती है?'' उसने नौका का मुँह कुछ और सीधा करके कहा, ''जल के प्रवाह से उस पार के कगारे, टूट-टूटकर गिर रहे हैं, उसी का यह शब्द है।''

मैंने पूछा, ''कितने बड़े कगारे हैं? और कैसा प्रवाह है?''

''बड़ा भयानक प्रवाह है। ओह! तभी तो- कल पानी बरस गया है,- आज उसके तले से न गया जायेगा। कहीं एक भी कगारा गिर पड़ा तो नाव और हम सभी पिस जाँयगे। अच्छा, तू तो डाँड़ चला सकता है न?''

''चला सकता हूँ।''

''तो चला।''

मैंने डाँड़ चलाना शुरू कर दिया। इन्द्र ने कहा, ''वही, वही जो बायीं ओर काला-काला दीख पड़ता है, वह चड़ा¹ है। उसके बीच में से एक नहर-सी गयी है, उसी में से होकर निकल जाना होगा- परन्तु बहुत आहिस्ते। अगर कहीं धीवरों को जरा भी पता लग गया, तो फिर लौटना न हो सकेगा। वे लग्गी की मार से सिर फोड़कर इसी कीचड़ में गाड़ देंगे।''

यह क्या? मैंने डरते हुए कहा, ''तो फिर उस नहर में होकर मत चलो।'' इन्द्र ने शायद कुछ हँसकर कहा, ''और तो कोई रास्ता ही नहीं है। उसके भीतर होकर तो जाना ही होगा। द्वीप के बायीं ओर की रेहं को ठेलकर तो जहाज भी नहीं जा सकता- फिर हम कैसे जाँयगे? लौटती में वापिस आ सकते हैं किन्तु जा नहीं सकते।''

''तो फिर मछलियों के चुराने की जरूरत नहीं है भइया।'' कहकर मैंने डाँड़ ऊपर उठा लिया। पलक मारते ही नाव चक्कर खाकर लौट चली। इन्द्र खीझ उठा। उसने आहिस्ते से झिड़कते हुए कहा, ''तो फिर आया क्यों? चल-तुझे वापिस पहुँचा आऊँ। कायर कहीं का!'' उस समय मैंने चौदह पूरे करके पन्द्रहवें में पैर रक्खा था। मैं कायर? झट से डाँड़ को पानी में फेंककर प्राणप्रण से खेने लगा। इन्द्र खुश होकर बोला, ''यही तो चाहिए, किन्तु भाई धीरे-धीरे चलाओ- साले बहुत पाजी हैं। मैं झाऊ के वन के पास से, मकई के खेतों के भीतर होकर, इस तरह बचाकर ले चलूँगा कि सालों को जरा भी पता न पड़ेगा!'' फिर कुछ हँसकर बोला, ''और यदि सालों को पता लग भी गया तो क्या? पकड़ लेना क्या इतना सहज है? देख श्रीकान्त, कुछ भी डर नहीं है- यह ठीक है कि उन सालों की चार नावें हैं- किन्तु यदि देखो कि घिर ही गये हैं, और भाग जाने की कोई जुगत नहीं है, तो चट से कूदकर डुबकी लगा जाना और जितनी दूर तक हो सके उतनी दूर जाकर निकलना, बस काम बन जायेगा। इस अन्धकार में देख सकने का तो कोई उपाय ही नहीं है- उसके बाद मजे से सतूया के टीले पर चढ़कर भोर के समय तैरकर इस पार आ जाँयगे और गंगा के किनारे-किनारे घर पहुँच जाँयगे- बस, फिर क्या कर लेंगे साले हमारा?''

¹ नदी में मिट्टी जमकर जो द्वीप जैसे बन जाते हैं उन्हें 'चड़ा' कहते हैं।

 
यह नाम मैंने सुना था; कहा, ''सतूया का टीला तो 'घोर' नाले के सामने है, वह तो बहुत दूर है।''

इन्द्र ने उपेक्षा के भाव से कहा, ''कहाँ, बहुत दूर है? छ:-सात कोस भी तो न होगा! तैरते-तैरते यदि हाथ भर आवें तो चित्त होकर सुस्ता लेना; इसके सिवाय, मुर्दे जलाने के काम आए हुए बहुत-से बड़े-बड़े लक्कड़ भी तो बहते मिल जाँयगे।''

आत्म-रक्षा का जो सरल रास्ता था सो उसने दिखा दिया, उसमें प्रतिवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। उस अंधेरी रात में, जिसमें दिशाओं का कोई चिह्न नजर न आता था, और उस तेज जल-प्रवाह में, जिसमें जगह-जगह भयानक आवत्त पड़ रहे थे, सात कोस तक तैरकर जाना और फिर भोर होने की प्रतीक्षा करते रहना! सवेरे से पहले इस तरफ के किनारे पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं। दस-पन्द्रह हाथ ऊँचा खड़ा हुआ बालू का कगारा है, जो टूटकर सिर पर आ सकता है,- और इसी तरफ गंगा का प्रवाह भीषण टक्करें लेता हुआ अर्ध्दवृत्ताकार दौड़ा जा रहा है।

वस्तुस्थिति का अस्पष्ट आभास पाकर ही मेरा विस्तृत वीर-हृदय सिकुड़कर बिन्दु जैसा रह गया। कुछ देर तक डाँड़ चलाकर मैं बोला, ''किन्तु हमारी नाव का क्या होगा?''

इन्द्र बोला, ''उस दिन भी मैं ठीक इसी तरह भागा था, और उसके दूसरे ही दिन आकर नाव निकाल ले गया था- कह दिया था कि घाट पर से डोंगी चोरी करके कोई और ले आया होगा- मैं नहीं लाया।''

तो यह सब इसकी कल्पना ही नहीं है- बिल्कुयल परीक्षा किया हुआ प्रत्यक्ष सत्य है! क्रमश: नौका खाड़ी के सामने आ पहुँची। देख पड़ा कि मछुओं की नावें कतार बाँधकर खाड़ी के मुहाने पर खड़ी हैं और उनमें दीए भी टिमटिमा रहे हैं। दो टीलों के बीच का वह जल-प्रवाह नहर की तरह मालूम होता था। घूमकर हम लोग उस नहर के दूसरे किनारे पर जाकर उपस्थित हो गये। उस जगह जल के वेग से अनेक मुहाने से बन गये हैं और जंगली झाऊ के पेड़ों ने परस्पर एक-दूसरे को ओट में कर रक्खा है। उनमें से एक के भीतर होकर कुछ दूर जाने से ही हम नहर के भीतर जा पहुँचे। धीवरों की नावें वहाँ से दूर पर खड़ी हुई काली-काली झाड़ियों की तरह दिखाई पड़ती थीं। और भी कुछ दूर जाने पर हम उद्दिष्ट स्थान पर पहुँच गये।

धीवर देवताओं ने, नहर का सिंहद्वार सुरक्षित है-यह समझकर इस स्थान पर पहरा नहीं रक्खा था। इसे 'माया-जाल' कहते हैं। नहर में जब पानी रहता है तब इस किनारे से लेकर उस किनारे तक ऊँचे-ऊँचे लट्ठ मजबूती से गाड़ दिए जाते हैं और उनके बाहरी ओर जाल टाँग दिया जाता है। बाद में वर्षा के समय, जब जल के प्रवाह में बड़े-बड़े रोहू, कातला आदि मच्छ बह कर आते हैं, तब इन लट्ठों से बाधा पाकर वे कूदकर इस बाजू आ जाना चाहते हैं और डोरी के जाल में फँस जाते हैं।

दस-पन्द्रह बीस सेर के पाँच-छह रोहू-कातला मच्छ दम-भर में पकड़कर इन्द्र ने नाव पर रख लिये। विराटकाय मच्छराज अपनी पूँछों की फटकार से हमारी उस छोटी-सी नौका को चूर्ण-विचूर्ण कर डालने का उपक्रम करने लगे और उनका शब्द भी कुछ कम नहीं हुआ।

''इतनी मछलियों का क्या होगा, भाई?''

''जरूरत है। बस, अब और नहीं, चलो भाग चलें।'' कहकर उसने जाल छोड़ दिया। अब डाँड़ चलाने की जरूरत नहीं रही। मैं चुपचाप बैठ रहा। उसी प्रकार छिपे-छिपे उसी रास्ते से बाहर जाना था। अनुकूल बहाव में दो-तीन मिनट प्रखर गति से बहने के उपरान्त, एकाएक एक स्थान पर मानो जरा धक्का खाकर, हमारी वह छोटी डोंगी पास के मकई के खेत में प्रवेश कर गयी। उसके इस आकस्मिक गति-परिवर्तन से मैंने चकित होकर पूछा, ''क्यों? क्या हुआ?''

इन्द्र ने एक ओर धक्का देकर, उसे कुछ और भी अन्दर ले जाते हुए कहा, ''चुप, सालों को मालूम हो गया है- चार नावों को खोलकर साले यहीं आ रहे हैं-वह देखो।'' इन्द्र ठीक कह रहा था। जोर के साथ जल को काटती और 'छप-छप्' शब्द करती हुई तीन नौकाएँ हमें निगल जाने के लिए कृष्णकाय दैत्यों के समान दौड़ी आ रही थीं। उस तरफ तो जाल से रास्ता बन्द था; और इस तरफ से ये लोग आ रहे थे- भागकर छुटकारा पाने का जरा-सा भी अवकाश नहीं था। इस मकई के खेत के बीच अपने आपको छिपाया जा सकेगा, यह भी मुझे सम्भव नहीं जान पड़ा।

''अब क्या होगा भाई।'' कहते-कहते ही अदम्य वाष्पोच्छवास से मेरा कण्ठ रुद्ध हो गया। इस अन्धकार में, इस पिंजरे के भीतर, अगर ये लोग हमारा खून करके भी इस खेत में गाड़ दें, तो इन्हें कौन रोकेगा?''

इसके पहले पाँच-छह बार इन्द्र 'चोरी की विद्या बड़ी विद्या है', इस बात को सप्रमाण सिद्ध करके निर्विघ्न निकल गया था; इतने दिन, पीछा किये जाने पर भी हाथ न आया था, किन्तु आज?

उसने मुख से कहा कि, ''डर की कोई बात नहीं है।'' किन्तु मानो गला उसका काँप गया। किन्तु वह रुका नहीं, प्राण-प्रण से लग्गी ठेलकर धीरे-धीरे भीतर छिपने की चेष्टा करने लगा। समस्त टीका जलमय हो गया था। उसके ऊपर आठ-आठ, दस-दस हाथ लम्बे मकई और ज्वार के पेड़ थे और भीतर हम दोनों चोर। कहीं तो पानी छाती तक था, कहीं कमर तक और कहीं घुटनों से अधिक नहीं। ऊपर निबिड़ अन्धकार और आगे-पीछे दायें-बायें निर्भेद्य जंगल। लग्गी कीचड़ में धाँसने लगी और डोंगी अब एक हाथ भी आगे नहीं बढ़ती। पीछे से धीवरों की अस्पष्ट बातचीत कानों में आने लगी। इस बात में अब जरा भी संशय नहीं रहा कि कुछ संदेह करके ही वे लोग चले हैं और अब भी खोजते फिर रहे हैं।

सहसा डोंगी एक ओर कुछ झुककर सीधी हो गयी। ऑंख उठाकर देखा कि मैं अकेला ही रह गया हूँ, दूसरा व्यक्ति नहीं है। डरते हुए मैंने आवाज दी, ''इन्द्र।'' पाँच-छह हाथ दूर वन के बीच से आवाज आई, ''मैं नीचे हूँ।''

''नीचे क्यों?''

''डोंगी खींचकर निकालनी होगी। मेरी कमर से रस्सी बँधी है।''

''खींचकर कहाँ ले जाओगे?''

''उस गंगा में। थोड़ी ही दूर ले जाने पर बड़ी धारा मिल जायेगी।''

सुनकर मैं चुप हो गया और क्रम-क्रम से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। अकस्मात् कुछ दूर पर वन के बीच कनस्तर पीटने और फटे बाँसों के फटाफट शब्द से मैं चौंक उठा। डरते हुए मैंने पूछा, ''वह क्या है भाई?'' उसने उत्तर दिया, ''खेतिहर लोग मचान पर बैठे हुए जंगली सूअरों को भगा रहे हैं।''

''जंगली सूअर! कहाँ हैं वे?'' इन्द्र नाव खींचते-खींचते लापरवाही से बोला, ''मुझे क्या दीख पड़ते हैं, जो बताऊँ? होंगे यहीं कहीं।'' जवाब सुनकर मैं स्तब्ध हो रहा। सोचा, किसका मुँह देखा था आज सुबह! सरेशाम ही तो आज घर के भीतर बाघ के हाथ पड़ गया था, अब यदि इस जंगल में बनैले सूअरों के हाथ पड़ जाऊँ, तो इसमें विचित्र ही क्या है? फिर भी मैं तो नाव में बैठा हूँ, किन्तु, यह आदमी, छाती तक कीचड़ और जल में, इस जंगल के भीतर खड़ा है! एक कदम हिलने-डुलने का उपाय भी तो इसके पास नहीं है! कोई पन्द्रह मिनट इसी तरह सोच-विचार में निकल गये। और भी एक वस्तु पर मैं ध्यायन दे रहा था। अक्सर देखता था कि पास ही किसी न किसी ज्वार या मकई के पेड़ का अगला हिस्सा एकाएक हिलने लगता था और 'छप-छप' शब्द होता था। एक दफे तो मेरे हाथ के पास ही हरकत हुई। सशंक होकर उस तरफ मैंने इन्द्र का ध्या न आकर्षित किया कि ''बड़ा सूअर न सही, कोई बच्चा-कच्चा हो नहीं है?''

इन्द्र ने अत्यन्त सहज भाव से उत्तर दिया, ''वह, कुछ नहीं-साँप लिपटे हैं; आहट पाकर जल में कूद पड़ते हैं।''

''कुछ नहीं, साँप!'' काँपकर मैं नाव के बीच सिकुड़कर बैठ गया। अस्फुट स्वर में पूछा, ''कैसे साँप भाई?''

इन्द्र ने कहा, ''सब किस्म के साँप हैं!-टोंडा, बोंडा, कौंडियाल, काले आदि। पानी में बहते-बहते आए और झाड़ों में लिपट रहे- कहीं भी तो सूखी जमीन नहीं है, देखते नहीं हो?''

''सो तो देखता हूँ।'' भय के मारे मेरे तो पैरों के नख से लेकर सिर के बाल तक खड़े हो गये। परन्तु उस भले मानुस ने भूरक्षेप तक न किया, अपना काम करते-करते ही वह कहने लगा, ''किन्तु ये काटते नहीं है। ये खुद ही बेचारे डर के मारे मरे जा रहे हैं, दो-तीन तो मेरे ही शरीर को छूते हुए भाग गये हैं। कई एक तो खूब मोटे हैं, मालूम पड़ता है कि वे टोंडा, बोंडा होंगे। और यदि कदाचित् काट ही खायँ, तो क्या किया जाय, मरना तो एक दिन होगा ही भाई! इसी प्रकार वह और भी कुछ अपने मृदु स्वाभाविक कण्ठ से बोलता रहा, मेरे कानों तक कुछ तो पहुँचा और कुछ नहीं पहुँचा। मैं निर्वाक्, निष्पन्द काठ के समान जड़ होकर एक ही स्थान पर एक ही भाव से बैठा रहा। श्वास छोड़ने में भी मानो भय मालूम होने लगा- 'छप' से कहीं कोई मेरी नाव में ही न आ गिरे।

और चाहे जो हो, किन्तु वह क्या आदमी है?, मनुष्य देवता, पिशाच-वह क्या है? किसके साथ मैं इस जंगल में घूम रहा हूँ? यदि मनुष्य है तो क्या वह नहीं जानता कि इस विश्व-संसार में भय नाम की भी कोई चीज होती है? हृदय क्या उसका पत्थर से बना है? क्या वह हमारी ही तरह सिकुड़ता-फैलता नहीं है? तो फिर उस दिन, खेल के मैदान में, सबके भाग जाने पर, बिल्कुशल अपरिचित होते हुए भी, मुझे अकेले को निर्विघ्न बाहर निकाल देने के लिए जो वह शत्रुओं के मध्यद में घुस आया था, सो क्या वह दया-माया भी इस पत्थर में ही विनिहित थी? और आज विपत्ति का सब हाल राई-राई, तिल-तिल, जानते-सुनते हुए भी चुपचाप अकुंठित चित्त से वह इस भयावह और अति भीषण मृत्यु के मुख में उतरकर खड़ा है। एक बार मुँह से यह भी नहीं कहता कि ''श्रीकान्त भाई, एक बार तू नीचे उतर आ।'' वह तो मुझे जबरन नीचे उतारकर नौका खिंचवा सकता था। यह केवल खेल तो है नहीं! जीवन और मृत्यु के आमने-सामने खड़े होकर इस उम्र में, ऐसा स्वार्थ-त्याग कितने आदमियों ने किया है? बिना आडम्बर के कितने सहज भाव से उसने कह दिया कि, 'मरना तो एक दिन होगा ही भाई।' कितने लोग ऐसी सच बात कहते दिखाई देते हैं? यह सच है कि इस विपत्ति में वही मुझे खींच लाया है, फिर भी उसके इतने बड़े स्वार्थ-त्याग को मनुष्य की देह धारण करते हुए मैं किस तरह भूल जाऊँ भला? किस तरह भूलूँ उसे,- जिसके हृदय के भीतर से इतना बड़ा अयाचित दान इतनी सरलता से बाहर आ गया? उस हृदय को किसने किस चीज से गढ़ा होगा? उसके बाद कितने काल और कितने सुख-दु:खों में से होकर मैं आज इस बुढ़ापे को प्राप्त हुआ हूँ। कितने देश, कितने प्रान्त, कितने नद-नदी, पहाड़-पर्वत, वन-जंगल, घूमा फिरा हूँ-कितने प्रकार के मनुष्य इन दो ऑंखों के सामने से गुजर गये हैं- किन्तु इतना बड़ा महाप्राण व्यक्ति तो और कभी देखने को नहीं मिला! परन्तु वह अब नहीं रहा, अकस्मात् एक दिन मानो बुद्बु की तरह शून्य में मिल गया। आज उसकी याद आते ही दोनों सूखी ऑंखें जल से भर आती हैं, केवल एक निष्फल अभिमान हृदय के तल-देश को आलोड़ित करके ऊपर की ओर फेन के माफिक तैर आता है। हे सृष्टिकर्ता! क्यों तूने उस अद्भुत, अपार्थिव वस्तु को सृष्ट करके भेजा था और इस प्रकार व्यर्थ करके क्यों उसे वापिस बुला लिया? बड़ी ही व्यथा से मेरा यह असहिष्णु मन आज बारम्बार यही प्रश्न करता है- भगवान! तुम्हें रुपया-पैसा, धन-दौलत, विद्या-बुद्धि तो अपने अखूट, भंडार से ढेर की ढेर देते हुए देखता हूँ किन्तु इतने बड़े महाप्राण व्यक्ति आज तक तुम कितने दे सके हो? खैर, जाने दो इस बात को। घोर जल-कल्लोल क्रमश: पास में आता-जाता है, इस बात को मैं जान रहा था; इसलिए और कोई सवाल किये बगैर मैंने समझ लिया कि इस जंगल के बीच में ही वह भीषण प्रवाह प्रवाहित हो रहा है जिसको स्टीमर भी पार नहीं कर पाते। मैं खूब अनुभव कर रहा था कि पानी का वेग बढ़ रहा है और धूसर वर्ण का फेन का पुंज विस्तृत रेत-राशि का भ्रम उत्पन्न कर रहा है। इन्द्र नौका पर चढ़ आया और डाँड़ को हाथ में लेकर सामने के उद्दाम स्रोत का सामना करने को तैयार हो बैठा। वह बोला, ''अब कोई डर नहीं है, हम बड़ी गंगा में आ पहुँचे हैं।'' मैंने मन ही मन कहा- अब, डर नहीं है तो अच्छा है। किन्तु डर तुम्हें काहे का है सो तो मैं समझा ही नहीं। क्षण-भर बाद ही नौका एक बार मानो सिर से पैर तक काँप उठी और पलक मारने के पहले ही मैंने देखा कि वह बड़ी गंगा के स्रोत में पड़कर उल्का के वेग से दौड़ी जा रही है।

उस समय छिन्न बादलों की आड़ में मालूम हुआ, मानो चन्द्रमा उदय हो रहा है क्योंकि जैसे अन्धकार में हम अभी तक यात्रा करते आ रहे थे वैसा अन्धकार अब नहीं रहा था। अब बहुत दूर तक, चाहे साफ भले ही न हो, दिखाई देने लगा था। मैंने देखा जंगली झाऊ और मकई-जुआरवाला टीला दाहिनी ओर छोड़कर हमारी नाव सीधी चली जा रही है।

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''बहुत जोर से नींद आ रही है इन्द्र, अब घर लौट चलो भाई!'' इन्द्र ने कुछ हँसकर ठीक स्त्री-सुलभ स्नेहार्द्र कोमल स्वर में कहा, ''नींद आने की तो बात ही है भइया, पर क्या किया जाय श्रीकान्त आज तो कुछ देर होगी ही- अभी बहुत-सा काम पड़ा है। अच्छा एक काम करो न, इसी जगह थोड़ा-सा लेट लो।''

दुबारा अनुरोध की जरूरत ही नहीं हुई, मैं गुड़मुड़ होकर उसी स्थान पर लेट गया। परन्तु नींद नहीं आई। अधामुँदी ऑंखों से मैं चुपचाप आकाश में बादलों और चाँद की ऑंख-मिचौनी देखने लगा। यह डूबा, वह निकला, फिर डूबा, हँसा। और कान में आने लगी जल-प्रवाह की, वही सतत हुंकार। यह एक ही बात प्राय: मेरे मन में आया करती है कि मैं उस दिन इस प्रकार सब कुछ भूल-भालकर बादलों और चन्द्रमा के बीच कैसे डूब गया था? तन्मय होकर चाँद देखने की अवस्था तो मेरी उस समय थी नहीं। किन्तु बड़े-बूढ़े लोग पृथ्वी के अनेक व्यापार देख-सुनकर कहा करते हैं कि यह बाहरी चाँद कुछ नहीं है, बादल भी कुछ नहीं है- सब माया है, मिथ्या है, दरअसल कुछ चीज है तो यह अपना मन है। वह जब जिसे जो दिखता है विभोर होकर तब वह केवल वही देखता है। मेरी भी यही दशा थी। इतने प्रकार की भयंकर घटनाओं में से, इस प्रकार सही-सलामत बाहर निकल आने के उपरान्त, मेरा निर्जीव मन, उस समय, शायद, ऐसी ही किसी एक शान्त तसवीर के भीतर विश्राम लेना चाहता था।

इतने में घण्टे-दो घण्टे निकल गये, जिनकी मुझे खबर ही नहीं हुई। एकाएक मुझे मालूम हुआ कि मानो चाँद बादलों के बीच एक लम्बी डुबकी लगा गया है, और एकाएक दाहिनी ओर से बाईं ओर जाकर अपना मुँह बाहर निकाल रहा है। गर्दन कुछ ऊपर उठाकर देखा, नौका अब उस पार जाने की तैयारी में है। प्रश्न करने अथवा कुछ कहने का उद्यम भी, शायद उस समय मुझमें शेष नहीं था; इसलिए मैं फिर उसी तरह लेट गया। फिर वही ऑंखें भरकर प्रवाह का गर्जन-तर्जन देखने-सुनने लगा। शायद इस तरह एक घण्टा और भी बीत गया।

खस्-से-रेत के टीले पर नौका टकराई। व्यस्त होकर मैं उठकर बैठ गया। अरे, यह तो इस पार आ पहुँचे। परन्तु यह जगह कौन-सी है? घर मेरा कितनी दूर है? रेत के ढेर के सिवाय और तो कहीं कुछ दीख ही नहीं रहा है? सवाल करने के पहले ही एकाएक कहीं पास ही कुत्तों का भूँकना सुनकर मैं और भी सीधा होकर बैठ गया। निश्चय ही कहीं पास में बस्ती है।

इन्द्र बोला, ''तनिक ठहर श्रीकान्त, मैं थोड़ा-सा घूमकर अभी लौट आऊँगा- तुझे अब कुछ डर नहीं है। इस कगारे के उस पार ही धीवरों के मकान हैं।''

साहस की इतनी परीक्षाएँ पास करने के उपरान्त अन्त में यहाँ आकर फेल हो जाने की मेरी बिल्कुनल इच्छा नहीं थी; और खास करके मनुष्य की इस किशोर अवस्था में, जिसके समान महा-विस्मयकारी वस्तु संसार में शायद और कोई नहीं है। एक तो वैसे ही मनुष्य की मानसिक गतिविधि बहुत ही दुर्जेय होती है; और फिर किशोर-किशोरी के मन का भाव तो, मैं समझता हूँ, बिल्कुनल ही अज्ञेय है। इसीलिए शायद, श्रीवृन्दावन के उन किशोर-किशोरी की किशोरलीला चिरकाल से ऐसे रहस्य से आच्छादित चली आती है। बुद्धि के द्वारा ग्राह्य न कर सकने के कारण किसी ने उसे कहा, 'अच्छी' किसी ने कहा, 'बुरी'-किसी ने 'नीति' की दुहाई दी, किसी ने 'रुचि' की और किसी ने कोई भी बात न सुनी-वे तर्क-वितर्क के समस्त घेरों का उल्लघंन कर बाहर हो गये। जो बाहर हो गये, वे डूब गये, पागल हो गये; और नाचकर, रोकर, गाकर-एकाकार करके संसार को उन्होंने मानो एक पागलखाना बना छोड़ा। तब, जिन लोगों ने 'बुरी' कहकर गालियाँ दी थीं उन्होंने भी कहा कि- और चाहे जो हो किन्तु, ऐसा रस का झरना और कहीं नहीं है। जिनकी 'रुचि' के साथ इस लीला का मेल नहीं मिलता था उन्होंने भी स्वीकार किया- इस पागलों के दल को छोड़कर हमने ऐसा गान और कहीं नहीं सुना। किन्तु यह घटना जिस आश्रय को लेकर घटित हुई, जो सदा पुरातन है, और साथ ही चिर-नूतन भी- वृन्दावन के वन-वन में होने वाली किशोर-किशोरी की उस सुन्दरतम लीला का अन्त किसने कब खोज पाया है, जिसके निकट वेदान्त तुच्छ है और मुक्ति-फल जिसकी तुलना में बारिश के आगे वारि-बिन्दु के समान क्षुद्र है! न किसी ने खोज पाया है और न कोई कभी खोज पायेगा। इसीलिए तो मैंने कहा कि उस समय मेरी वही किशोर अवस्था थी। भले ही उस समय यौवन का तेज और दृढ़ता न आई हो, परन्तु फिर भी उसका दम्भ तो आकर हाजिर हो गया था! आत्मसम्मान की आकांक्षा तो हृदय में सजग हो गयी थी! उस समय अपने सखा के निकट अपने को कौन डरपोक सिद्ध करना चाहेगा? इसलिए मैंने उसी दम जवाब दिया, ''मैं डरूँगा क्यों? अच्छा तो है, जाओ।'' इन्द्र ने और दूसरा वाक्य खर्च न किया और वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अदृश्य हो गया।

ऊपर सिर पर अन्धकार-प्रकाश की वह ऑंख-मिचौनी हो रही थी, पीछे बहुत दूर तक अविश्रान्त सतत गर्जन-तर्जन हो रहा था और सामने वही रेती का किनारा था। यह कौन स्थान है, सोच ही रहा था कि इन्द्र दौड़ता हुआ आकर खड़ा हो गया। बोला, ''श्रीकान्त, तुझसे एक बात कहने को लौट आया हूँ। यदि कोई मच्छ माँगने आवे तो खबरदार देना नहीं- कहे देता हूँ, खबरदार, हरगिज न देना। ठीक मेरे समान रूप बनाकर यदि कोई आवे, तो भी मत देना। कहना, तेरे मुँह पर धूल, इच्छा हो तो तू खुद ही उठा ले जा, खबरदार! हाथ से किसी को उठाकर न देना, भले ही मैं ही क्यों न होऊँ- खबरदार!''

''क्यों भाई?''

''लौटने पर बताऊँगा- किन्तु खबरदार।'' यह कहते-कहते वह जैसे आया था वैसे ही दौड़ता हुआ चला गया।

इस दफे नख से शिख तक मेरे सब रोंगटे खड़े हो गये। जान पड़ा कि मानो शरीर की प्रत्येक शिरा उपशिरा में से बरफ का गला हुआ पानी बह चला है। मैं बिल्कुयल बच्चा तो था नहीं, जो उसके इशारे का मतलब बिल्कुंल न भाँप सकता! मेरे जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं जिनकी तुलना में यह घटना समुद्र के आगे गौ के खुर के गढ़े में भरे हुए पानी के समान थी। किन्तु फिर भी इस रात्रि की यात्रा में जो भय मैंने अनुभव किया, उसे भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मालूम होता था कि भय के मारे होश-हवास गुम करने की अन्तिम सीढ़ी पर आकर ही मैंने पैर रख दिया है। प्रतिक्षण जान पड़ता था कि कगार के उस तरफ से मानो कोई झाँक-झाँककर देख रहा है। जैसे ही मैं तिरछी दृष्टि से देखता हूँ, वैसे ही मानो वह सिर नीचा करके छिप जाता है।

समय कटता नहीं था। मानो इन्द्र ने जाने कितने युग हुए चला गया है- और लौट नहीं रहा है।

ऐसा मालूम हुआ मानो किसी मनुष्य की आवाज सुनी हो। जनेऊ को अंगूठे में सैकड़ों बार लपेटकर मुख नीचा करके कान खड़े करके सुनने लगा। गले की आवाज क्रमश: अधिक साफ होने लगी, अच्छी तरह मालूम पड़ने लगा कि दो-तीन आदमी बातचीत करते हुए इसी तरह आ रहे हैं। उनमें से एक तो इन्द्र है और बाकी दो हिन्दुस्तानी। वे हों चाहे जो, किन्तु उनके मुख की ओर देखने के पूर्व मैंने यह अच्छी तरह देख लिया कि चाँदनी में उनकी छाया जमीन पर पड़ी है या नहीं! क्योंकि इस अवि-संवादी सत्य को मैं छुटपन से ही अच्छी तरह जानता था कि 'उन लोगों' (भूतों) की छाया नहीं पड़ती!''

आ:, यह तो छाया है! उतनी ही साफ, फिर भी छाया है! संसार में उस दिन किसी भी आदमी ने और किसी वस्तु को देखकर, क्या मेरे जैसी तृप्ति पाई होगी? पाई हो या न पाई हो, परन्तु यह बात तो मैं बाजी लगाकर कह सकता हूँ कि दृष्टि का चरम आनन्द जिसे कहते हैं, वह यही था। जो लोग आए उन्होंने असाधारण तेजी से उन बड़े-बड़े मच्छों को नाव में से उठाकर एक जाल जैसे वस्त्र के टुकड़े में बाँध लिया, और उसके बदले में उन्होंने इन्द्र की मुट्ठी में जो कुछ थमा दिया उसने 'खन्' से एक मृदु-मधुर शब्द करके अपना परिचय भी मेरे आगे पूर्णत: गुप्त न रहने दिया।

इन्द्र ने नाव खोल दी; परन्तु बहाव में नहीं छोड़ी। धार के पास-पास, प्रवाह के प्रतिकूल, लग्गी से ठेलते हुए वह धीरे-धीरे अग्रसर होने लगा।

मैंने कोई बात नहीं कही, क्योंकि मेरा मन उस समय उसके विरुद्ध घृणा के भाव से और एक प्रकार के क्षोभ से लबालब भर गया था। किन्तु यह क्या! अभी-अभी ही तो उसे चन्द्रमा के प्रकाश में छाया डालते हुए, लौटते देखकर अधीर आनन्द से दौड़कर छाती से लगा लेने के लिए उन्मुख हो उठा था!

हाँ, सो मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। तनिक-सा दोष देखते ही, कुछ क्षणपूर्व की सभी बातें भूलते उसे कितनी-सी देर लगती है! राम! राम! राम! उसने इस तरह रुपये प्राप्त किये! अब तक मछली चुराने का यह व्यापार मेरे मन में, बहुत स्पष्ट तौर से, चोरी के रूप में शायद स्थान न पा सका था! क्योंकि लड़कपन से ही, रुपये पैसों की चोरी ही मानो वास्तविक चोरी है-और सब, अनीती भले ही हो किन्तु, न जाने क्यों ठीक-ठीक चोरी नहीं है- इस तरह की अद्भुत धारणा प्राय: सभी लड़कों की होती है। मेरी भी यही धारणा थी। ऐसा न होता तो इस 'खन्' शब्द के कान में जाते ही इतने समय का इतना वीरत्व, इतना पौरुष, सब कुछ क्षण-भर में इस प्रकार शुष्क तृण के समान न झड़ जाता। यदि उन मच्छों को गंगा में फेंक दिया जाता- अथवा और कुछ किया जाता- केवल रुपयों के साथ उनका संसर्ग घटित न होता, फिर भी हमारी उस मत्स्य-संग्रह-यात्रा को कोई 'चोरी' कहकर पुकारता, तो शायद गुस्से में आकर मैं उसका सिर फोड़ देता और समझता कि उसने वास्तव में जो सजा मिलनी चाहिए वही पाई है- किन्तु राम! राम! यह क्या! यह काम तो जेलखाने के कैदी किया करते हैं!

इन्द्र ने बात शुरू की पूछा, ''तुझे दूसरा भी डर न लगा, क्यों रे श्रीकान्त?''

मैंने संक्षेप में जवाब दिया, ''नहीं!''

इन्द्र बोला, ''किन्तु तेरे सिवा वहाँ और कोई बैठा न रह सकता, यह जानता है तू? तुझे मैं खूब प्यार करता हूँ- मेरा ऐसा दोस्त और कोई नहीं है। मैं अब जब आऊँगा, सिर्फ तुझे ही लाऊँगा। क्यों?''

मैंने जवाब नहीं दिया। किन्तु इसी समय उसके मुख पर तुरंत के मेघ मुक्त चन्द्रमा का जो प्रकाश पड़ा, उससे मुख पर जो कुछ दिखाई दिया उससे एकाएक मैं अपना इतनी देर का सब क्रोध, क्षोभ भूल गया। मैंने पूछा, ''अच्छा इन्द्र, तुमने कभी 'उन सब को1 देखा है?''

''किन सबको?''

''वही जो मच्छ माँगने आते हैं?''

''नहीं भाई, देखा तो नहीं है, लेकिन लोग जो कहते हैं वह सुना है।''

''अच्छा तुम यहाँ अकेले आ सकते हो?''

इन्द्र हँसा, बोला, ''मैं तो अकेला ही आया करता हूँ।''

''डर नहीं लगता?''

''नहीं राम का नाम लेता हूँ, फिर वे किसी तरह नहीं आ सकते।''

कुछ देर रुककर फिर कहना शुरू किया, ''राम-नाम क्या कोई साधारण चीज है रे? यदि तू राम का नाम लेते-लेते साँप के मुँह में चला जाय, तो तेरा कुछ न बिगडेग़ा। देखेगा, कि मारे डर के सभी रास्ता छोड़कर भागने लगे हैं। किन्तु डरने से काम नहीं चलता। तब तो वे जान जाते हैं कि, यह सिर्फ चालाकी कर रहा है-वे सब अन्तर्यामी जो हैं!''

रेती का किनारा खत्म होते ही कंकड़ों का किनारा शुरू हो गया। उस पार की अपेक्षा इस पार पानी का बहाव बहुत कम था। बल्कि यहाँ तो मालूम हुआ मानो बहाव उलटी तरफ जा रहा है। इन्द्र ने लग्गी उठाकर कर्ण (पतवार) हाथ में लेते हुए कहा, ''वह जो सामने वन सरीखा दीख पड़ता है, उसी में से होकर हमें जाना है। यहाँ जरा मैं उतरूँगा। जाऊँगा और आ जाऊँगा। देर न लगेगी। क्यों उतर जाऊँ?''

1. 'उन सब' से तात्पर्य भूतों का है। बंगाल में प्रवाद है कि अकेले में भूत मछली माँगने आते हैं।

इच्छा ने रहते भी मैंने कहा, 'अच्छा' क्योंकि 'नहीं' कहने का रास्ता तो मैं एक प्रकार से आप ही बन्द कर चुका था। और अब इन्द्र भी मेरी निर्भीकता के सम्बन्ध में शायद निश्चिन्त हो गया था। परन्तु बात मुझे अच्छी न लगी। यहाँ से वह जगह ऐसी जंगल सरीखी अंधेरी दीख पड़ती थी कि अभी-अभी राम-नाम का असाधारण माहात्म्य श्रवण करके भी, उस अंधकार में, प्राचीन वट-वृक्ष के नीचे, डोंगी के ऊपर अकेले बैठे रहकर, इतनी रात को राम-नाम का शक्ति-सामर्थ्य जाँच करने की मेरी जरा भी प्रवृत्ति नहीं हुई और शरीर में कँपकँपी होने लगी। यह ठीक है कि मछलियाँ और नहीं थीं, इसलिए मछली लेने वालों का शुभागमन न हो सकेगा, किन्तु उन सबका लोभ मछलियों के ऊपर ही है, यह भी कौन कह सकता है? मनुष्य की गर्दन मरोड़ कर गुनगुना रक्त पीने और मांस खाने का इतिहास भी तो सुना गया है!

बहाव की अनुकूलता और डाँड़ की ताड़ना से डोंगी सर्राटे से आगे बढ़ने लगी। और भी कुछ देर जाते ही, दाहिनी बाजू का गर्दन तक डूबा हुआ जंगली झाऊ और काँस का वन माथा उठाकर हम दोनों असीम-साहसी मानव-शिशुओं की तरफ विस्मय से स्तब्ध हो देखता रहा और उसमें से कोई-कोई झाड़ तो सिर हिलाकर मानो अपना निषेध जताने लगा! बाईं ओर भी उन्हीं के आत्मीय परिजन खूब ऊँचे कंकरीले किनारों पर फैले हुए थे; वे भी उसी भाव से देखते रहे और उसी तरह मना करने लगे। मैं अगर अकेला होता तो निश्चय से उनका यह संकेत अमान्य नहीं करता; परन्तु मेरा कर्णधार जो था, उसके निकट ऐसा मालूम हुआ कि मानो एक राम-नाम के जोर से उनके समस्त आवेदन-निवेदन एक बार ही व्यर्थ हो गये। उसने किसी तरफ भौंहें तक न फिराईं। दाहिनी ओर के टीले के अधिक विस्तार के कारण यह जगह एक छोटी-मोटी झील के समान हो गयी थी- सिर्फ उत्तर की ओर का मुँह खुला हुआ था। मैंने पूछा, ''अच्छा, नाव को बाँधकर ऊपर जाने का घाट तो है नहीं, तुम जाओगे किस तरह?''

इन्द्र बोला, ''यह जो बड़का वृक्ष है, उसके पास में ही एक छोटा-सा घाटहै।''

कुछ देर से न जाने कैसी दुर्गन्ध बीच-बीच में हवा के साथ नाक तक आ रही थी। एकाएक एक हवा के झोंके के साथ वह दुर्गन्ध इतनी निकट होकर नाक में लगी कि असह्य हो गयी। जितना ही आगे बढ़ते थे, उतनी ही वह बढ़ती थी। नाक पर कपड़ा दबाते हुए मैं बोला, ''निश्चय से कुछ सड़ गया है, इन्द्र।''

इन्द्र बोला, ''मुर्दे सड़ गये हैं। आजकल भयानक कालरा जो फैल रहा है। सभी तो लाशों को जला पाते नहीं, मुँह पर जरा आग छुआकर छोड़कर चले जाते हैं। सियार और कुत्ते उन्हें खाते हैं- और वे सड़ती हैं। उन्हीं की तो यह इतनी गन्ध है।''

''लाशों को किस जगह फेंक जाते हैं, भइया?''

''वहाँ से लेकर यहाँ तक- सब ही तो श्मशान हैं। जहाँ चाहें फेंक देते हैं और इस बड़के नीचे के घाट पर स्नान करके घर चले जाते हैं। अरे दुर! डर क्या है रे! वे सियार-सियार आपस में लड़ रहे हैं। अच्छा, आ-आ, मेरे पास आकर बैठ।''

''मेरे गले से आवाज न निकलती थी- किसी तरह मैं घिसटकर उसकी गोद के निकट जाकर बैठ गया। पल-भर के लिए मुझे स्पर्श करके और हँसकर वह बोला, ''डर क्या है श्रीकान्त, कितनी दफे रात को मैं इस रास्ते आया-गया हूँ। तीन बार राम का नाम लेने से फिर किसकी ताकत है जो पास में फटके?''

उसे स्पर्श करके मानो मेरी देह में जरा चेतना आई। मैंने अस्फुट स्वर में कहा, ''नहीं भाई, तुम्हारे दोनों पैर पड़ता हूँ, यहाँ पर कहीं मत उतरो- सीधे ही चले चलो।''

उसने फिर मेरे कन्धों पर हाथ रखकर कहा, ''नहीं श्रीकान्त, एक दफे जाना ही पड़ेगा। यह रुपये दिए बिना काम न चलेगा- वे बैठे राह देख रहे होंगे- मैं तीन दिन से नहीं आ पाया।''

''रुपये कल न दे देना भाई!''

''नहीं भाई, ऐसी बात न कर। मेरे साथ तू भी चल- किन्तु किसी से यह बात कहना मत।''

मैं धीरे से 'ना' कहकर उसे उसी तरह स्पर्श किये हुए, पत्थर की नाईं बैठा रहा। गला सूखकर काठ हो गया था। किन्तु हाथ बढ़ाकर पानी पी लूँ, या हिलने-डोलने की कोई चेष्टा करूँ, यह शक्ति ही नहीं रही थी।

पेड़ों की छाया के बीच में आ पड़ने से पास ही वह घाट दीख पड़ा। जहाँ हमें नीचे उतरना था वह स्थान, ऊपर पेड़ वगैरह न होने से, म्लान ज्योत्सरना के प्रकाश में भी खूब प्रकाशमान हो रहा था- यह देखकर इतने दु:ख में भी मुझे आराम मिला। घाट के कंकड़ों में जाकर डोंगी धक्का न खा जाय, इसलिए इन्द्र पहले से ही उतरने के लिए प्रस्तुत होकर डोंगी के मुँह के पास तक खिसक आया था। किनारे लगते न लगते वह उस पर से फाँद पड़ा; पर फाँदते ही भयभीत स्वर से 'उफ' कर उठा। मैं उसके पीछे ही था, इसलिए दोनों की नजर उस वस्तु पर प्राय: एक ही साथ पड़ी। उस समय वह नीचे था और मैं नौका के ऊपर।

शायद मेरे जीवन में 'अकाल-मृत्यु' कभी उतने करुणा रूप में नजर नहीं आई थी। वह कितनी बड़ी व्यथा का कारण होती है, यह बात, उस तरह न देखी जाय तो, शायद और तरह से जानी ही नहीं जा सकती। गम्भीर रात्रि में चारों दिशाएँ निबिड़ स्तब्धता से परिपूर्ण थीं। सिर्फ बीच-बीच में झाड़-झंखाड़ों में से कहीं श्मशानचारी सियारों का क्षुधार्त कलह-चीत्कार, कहीं वृक्षों पर सोते हुए अर्धसुप्त बृहत्काय पक्षियों के पंखों की फड़फड़ाहट और बहुत दूर से आया हुआ तीव्र जल प्रवाह का 'हू-हू' आर्त्तनाद सुन पड़ता था। हम दोनों, इन सबके बीच, निर्वाक् निस्तब्ध होकर उस महा करुण दृश्य की ओर देखते रहे। एक छह-सात वर्ष का गौरवर्ण हृष्ट-पुष्ट बालक पड़ा हुआ दिखाई दिया, जिसका सर्वाक्ष पानी में डूबा हुआ था और सिर्फ सिर घाट के ऊपर था। शायद सियार हाल में ही उसे पानी से बाहर निकाल रहे थे, और अब केवल हमारे आकस्मिक आगमन के कारण, कहीं पास ही खड़े हुए हमारे जाने की राह देख रहे हैं। बहुत करके उसे मरे हुए तीन-चार घण्टे से अधिक नहीं हुए थे। मानो वह बेचारा विसूचिका (हैजा) की दारुण यातना भोगकर माता गंगा की गोद में ही सो गया था, और माँ मानो बड़ी सावधानी से उसकी सुकुमार सुन्दर देह को अभी-अभी अपनी गोद से उतारकर बिछौने पर सुला रही थी। इस तरह कुछ जल और कुछ स्थल पर पड़ी हुई उस सोते हुए शिशु की देह पर हमारी ऑंखें जा पड़ीं।

मुँह ऊपर उठाया तो देखा कि इन्द्र की दोनों ऑंखों से ऑंसुओं के बड़े-बड़े बिन्दु झर रहे हैं। वह बोला, ''तू जरा हटकर खड़ा हो जा श्रीकान्त, मैं इस बेचार को, नौका में रखकर टीले के उस झाऊ-वन के भीतर रखे आता हूँ।''

यह सत्य है कि उसकी ऑंखों में ऑंसू देखते ही मेरी ऑंखों में भी ऑंसू आ गये, किन्तु इस छूने-ऊने के प्रस्ताव में मैं एकबारगी संकुचित हो उठा। इस बात को मैं अस्वीकार नहीं करता कि दूसरे के दु:ख में दु:खी होकर ऑंखों से ऑंसू बहाना सहज नहीं है, किन्तु इसी कारण, उस दु:ख के बीच अपने दोनों हाथ बढ़ाकर जुट जाना- यह बहुत अधिक कठिन काम है। उस समय छोटी-बड़ी न जाने कितनी जगहों से खिंचाव पड़ता है। अव्वल तो मैं इस पृथ्वी के शिरोभूत हिन्दू-घर में वशिष्ठ इत्यादि के पवित्र पूज्य रक्त का वंशधर होकर जन्मा, इसलिए, जन्मगत संस्कारों के वश मैंने सीख रक्खा था कि मृत देह को स्पर्श करना भी एक भीषण कठिन व्यापार है। दूसरे इसमें न जाने कितने शास्त्रीय विधि-निषेधों की बाधाएँ हैं और कितने तरह-तरह के कर्म-काण्डों का घटाटोप है। इसके सिवा यह किस रोग से मरा है, किसका लड़का है, किस जाति का है- आदि कुछ न जानते हुए और मरने के बाद यह ठीक तौर से प्रायश्चित करके घर से बाहर हुआ था या नहीं, इसका पता लगाए बिना ही इसे स्पर्श किस तरह किया जा सकता है?

कुण्ठित होकर जैसे ही मैंने पूछा, ''किस जाति का मुर्दा है और क्या तुम इसे छुओगे?'' कि इन्द्र ने आगे बढ़कर एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे और दूसरा हाथ घुटनों के नीचे देकर उसे सूखे तिनकों के समान उठा लिया और कहा, ''नहीं तो बेचारे को सियार नोच-नोचकर न खा जाँयगे? अहा, इसके मुँह से तो अभी तक औषधियों की गन्ध आ रही है रे!'' यह कहते-कहते उसने नौका के उसी तख्त पर, जिस पर कि पहले मैं सोया था, उसे सुला दिया और नाव को ठेलकर स्वयं भी चढ़ गया। बोला, ''मुर्दे की क्या जात होती है रे?'' मैंने तर्क किया, ''क्यों नहीं होती?''

इन्द्र बोला, ''अरे यह तो मुर्दा है! मरे हुए की जात क्या? यह तो वैसा ही है जैसे हमारी यह डोंगी- इसकी भला क्या जात है? आम या जामुन जिस कभी भी काठ की बनी हो- अब तो इसे 'डोंगी' छोड़ कोई भी नहीं कहेगा कि यह आम है या जामुन। समझा कि नहीं? यह भी उसी तरह है।''

अब मालूम होता है कि यह दृष्टान्त निरे बच्चों का सा था- किन्तु अन्तर में यह भी तो अस्वीकार करते नहीं बनता कि यहीं कहीं, इसी के बीच, एक अति तीक्ष्ण सत्य अपने आपको छुपाए हुए बैठा है। बीच-बीच में ऐसी ही खरी बातें वह कह जाया करता था। इसीलिए, मैंने अनेक दफे सोचा है कि इस उम्र में, किसी के पास कुछ भी शिक्षा पाए बगैर, बल्कि प्रचलित शिक्षा-संस्कारों को अतिक्रम करके- इन सब तत्वों को उसने पाया कहाँ? किन्तु अब ऐसा जान पड़ता है कि उम्र बढ़ने के साथ मानो मैंने इसका उत्तर भी पा लिया है। कपट तो मानो इन्द्र में था ही नहीं। उद्देश्य को गुप्त रखकर तो वह कोई काम करना जानता ही न था। इसलिए मैं समझता हूँ, उसके हृदय का वह व्यक्तिगत विच्छिन्न सत्य किसी अज्ञात नियम के वंशवर्ती होकर, उस विश्वव्यापी अविच्छिन्न निखिल सत्य का साक्षात् करके, अनायास ही, बहुत ही, सहज में, उसे अपने आप में आकर्षित कर आत्मसात् कर सकता था। उसकी शुद्ध सरल बुद्धि, पक्के उस्ताद की उम्मैदवारी किये बगैर ही, समस्त व्यापार को ठीक-ठीक अच्छी तरह जान लेती थी। वास्तविक, अकपट सहज बुद्धि ही तो संसार में परम और चरम बुद्धि है। इसके ऊपर और कुछ भी नहीं है। अच्छी तरह से देखने पर 'मिथ्या' नाम की किसी भी वस्तु का अस्तित्व इस विश्व-ब्रह्माण्ड में नजर नहीं पड़ता। 'मिथ्या' तो सिर्फ मनुष्य के मानने का और एक फलमात्र है। सोने को पीतल मानना भी मिथ्या है और मनाना भी- यह मैं जानता हूँ। परन्तु इससे सोने का अथवा पीतल का क्या आता-जाता है। तुम्हारी जो इच्छा हो सो उसे मानो, वह तो जो कुछ है, सो ही रहेगा। सोना समझकर उसे सन्दूक में बन्द करके रखने से उसके वास्तविक मूल्य में वृद्धि नहीं होती, और पीतल कहकर बाहर फेंक देने से उसका मूल्य नहीं घटता। उस दिन भी वह पीतल था और आज भी पीतल है। तुम्हारे 'मिथ्या' के लिए तुम्हें छोड़कर न और कोई उत्तरदायी है; और न कोई भ्रूक्षेप ही करता है। इस विश्व-ब्रह्माण्ड का समस्त ही परिपूर्ण सत्य है। मिथ्या का अस्तित्व यदि कहीं है तो वह मनुष्य के मन को छोड़कर और कहीं नहीं है। इसलिए इन्द्र ने इस असत्य को, अपने अन्तर में जाने या अनजाने में, किसी दिन जब स्थान नहीं दिया तब यदि उसकी विशुद्ध बुद्धि मंगल और सत्य को ही प्राप्त करती है, तो इसमें विचित्र ही क्या हुआ?

किन्तु यह बात उसके लिए विचित्र न होने पर भी, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि किसी के लिए भी विचित्र नहीं है। ठीक इसी बहाने, मैंने अपने जीवन में ही जो इसका प्रमाण पाया है, उसे कह देने का लोभ मैं यहाँ संवरण नहीं कर सकता।

उक्त घटना के 10-11 वर्ष बाद एकाएक एक दिन शाम के वक्त यह संवाद मिला कि एक वृद्धा ब्राह्मणी उस मुहल्ले में सुबह से मरी पड़ी है- किसी तरह भी उसके क्रिया-कर्म के लिए लोग नहीं जुटते। न जुटने का हेतु यह है कि वह काशी-यात्रा से लौटते समय रास्ते में रोग-ग्रस्त हो गयी, और उस शहर में, रेल पर से उतरकर सामान्य परिचय के सहारे जिनके घर आकर, उसने आश्रय ग्रहण किया, और दो रात रहकर आज सुबह प्राण-त्याग किया, वे महाशय विलायत से लौटे हुए थे और बिरादरी से अलग थे। वृद्धा का यही अपराध था कि उसे नितान्त निरुपाय अवस्था में इस 'बिरादरी से खारिज' घर में मरना पड़ा।

खैर, अग्नि-संस्कार करके दूसरे दिन सुबह वापस आकर मैंने देखा कि हर एक घर के किवाड़ बन्द हो गये हैं। सुनने में आया कि गत रात को, ग्यारह बजे तक, हरिकेन लालटेन हाथ में लिये हुए, पंच लोगों ने घर-घर फिरकर स्थिर कर दिया है कि इस अत्यन्त शास्त्र-विरुद्ध अपकर्म (दाह) करने के कारण इन कुलांगारों को सिर मुँड़ाना होगा, अपराध स्वीकार करना होगा और एक ऐसी वस्तु (गोबर) खानी पड़ेगी जो कि सुपवित्र होते हुए भी खाद्य नहीं है। उन्होंने घर-घर जाकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि इसमें उनका कोई भी हाथ नहीं है; क्योंकि अपने जीते-जी, वे समाज में किसी भी तरह यह अशास्त्रीय काम नहीं होने दे सकते। हम लोग, और कोई उपाय न रहने पर डॉक्टर साहब के शरण में गये। वे ही उस शहर में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक थे और बिना दक्षिणा के ही बंगालियों की चिकित्सा किया करते थे। हमारी कहानी सुनकर डॉक्टर महाशय क्रोध से सुलग उठे और बोले, ''जो लोग इस तरह लोगों को सताते हैं, उनके घरों में यदि कोई मेरी ऑंखों के सामने बिना चिकित्सा के मरता होगा, तो भी मैं उस ओर ऑंख उठाकर नहीं देखूँगा।'' न मालूम, किसने यह बात पंचों के कानों तक पहुँचा दी। बस, शाम होते न होते मैंने सुना कि सिर मुँड़ाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपराध स्वीकार करके उस सुपवित्र पदार्थ को खा लेने मात्र से काम चल जायेगा! हमारे स्वीकार न करने पर दूसरे दिन सुबह सुना गया, अपराध स्वीकार कर लेने से ही काम हो जायेगा- वह पदार्थ न खाना हो तो न सही! इसे भी न स्वीकार करने पर सुना गया कि चूँकि यह हम लोगों का प्रथम अपराध है, इसलिए, उन्होंने उसे यों ही माफ कर दिया है, प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं है! किन्तु, डॉक्टर साहब बोले, ''ठीक है कि प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं परन्तु दो दिन तक इन्हें जो क्लेश दिया गया है, उसके लिए यदि प्रत्येक आदमी आकर क्षमा प्रार्थना न करेगा, तो फिर, जैसा कि वे पहले कह चुके हैं, वैसा ही करेंगे, अर्थात् किसी के भी घर न जाँयगे।'' इसके बाद उसी दिन संध्यान के समय से डॉक्टर साहब के घर एक-एक करके सभी वृद्ध पंचों का शुभागमन होना शुरू हो गया। आशीर्वाद दे-देकर उन्होंने क्या-क्या कहा, उसे तो अवश्य ही मैं नहीं सुन पाया, किन्तु दूसरे दिन देखा कि डॉक्टर साहब का क्रोध ठण्डा हो गया है और हम लोगों को भी प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं रही है।

जाने दो, क्या कह रहा था और क्या बात बीच में आ पड़ी। किन्तु, वह चाहे जो हो मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि जो लोग जानते हैं वे, इस नाम-धाम-हीन विवरण में से, पूरा सत्य प्राप्त कर लेंगे। मेरे कहने का मूल विषय यह है कि इन्द्र ने इस उम्र में अपने अन्तर के मध्यव में जिस सत्य का साक्षात् कर लिया था, इतने बड़े-बड़े पंच सरदार, इतनी बड़ी उम्र तक भी, उसका कोई तत्व न पा सके थे; और डॉक्टर साहब यदि उस दिन इस प्रकार उनके शास्त्र-ज्ञान की चिकित्सा न कर देते, तो कभी उनकी यह व्याधि अच्छी होती या नहीं, सो जगदीश्वर ही जाने।

टीले पर आकर, आधे डूबे जंगली झाऊ के अन्धकार में, जल के ऊपर, उस अपरिचित शिशु की देह को, इन्द्र ने जब अपूर्व ममता के साथ रख दिया तब रात्रि अधिक नहीं थी। कुछ देर तक वह उस शव की ओर माथा झुकाए रहा और अन्त में जब उसने मुँह उठाकर देखा, तब धुँधली चाँदनी में उसका मुख जितना कुछ दिखाई दिया वह मलिन था और उसके सूखे मुँह पर ठीक वैसा ही भाव प्रकट हो रहा था जैसे कि कोई कान उठाकर किसी की राह देख रहा हो।

मैं बोला, ''इन्द्र, अब चलो।''

इन्द्र अन्यमनस्क भाव से बोला, ''कहाँ?''

''अभी जहाँ चलने के लिए तुमने कहा था।''

''रहने दो, आज नहीं जाऊँगा।''

मैं खुश होकर बोला, ''ठीक, यही अच्छा है भाई-चलो, घर चलें।''

प्रत्युत्तर में इन्द्र मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, ''हाँ रे श्रीकान्त, मरने पर मनुष्य का क्या होता है, जानता है?''

मैंने तुरन्त ही जवाब दिया, ''नहीं भाई, नहीं जानता; अब तो तुम घर चलो। वे सब स्वर्ग चले जाते हैं, भइया, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ, तुम मुझे मेरे घर पहुँचा आओ।''

इन्द्र ने मानो सुना ही नहीं, और कहा, ''सभी लोग तो स्वर्ग जा नहीं सकते। इसके सिवाय, कुछ समय तक तो सभी को यहाँ रहना पड़ता है। देखो, मैंने जब उसको जल के ऊपर सुला दिया था, तब उसने धीरे से साफ-साफ कहा था, 'भइया'।'' मैं काँपते हुए स्वर से रोते हुए बोल उठा, ''क्यों मुझे डराते हो भाई, मैं बेहोश हो जाऊँगा।'' इन्द्र ने न तो कुछ कहा और न अभय ही दिया- धीरे से डाँड़ को हाथ में लेकर उसने नाव को झाऊ-वन में से बाहर कर लिया और फिर सीधा चलाने लगा। मिनट-दो मिनट चुप रहकर उसने गम्भीर मृदु स्वर से कहा, ''श्रीकान्त मन ही मन 'राम' का नाम ले, 'वह' नौका छोड़कर नहीं गया है- हमारे पीछे ही बैठा है!''

उसके बाद मैं उसी जगह मुँह ढँककर औंधा हो गया था। फिर मुझे कुछ सुध नहीं रही। जब ऑंखें खोलीं तब अन्धकार नहीं था- नाव किनारे लगी हुई थी। इन्द्र मेरे पैरों के पास बैठा था; बोला, ''अब थोड़ा चलना होगा, श्रीकान्त, उठ बैठ।''

 
भाग - 2

पैर उठते ही न थे, फिर भी किसी तरह गंगा के किनारे-किनारे चलकर सवेरे लाल ऑंखें और अत्यन्त सूखा म्लान मुँह लेकर घर पहुँचा। मानो एक समारोह-सा हो उठा। ''यह आया! यह आया!'' कहकर सबके सब एक साथ एक स्वर में इस तरह अभ्यर्थना कर उठे कि मेरा हृत्पिण्ड थम जाने की तैयारी करने लगा।

जतीन करीब-करीब मेरी ही उम्र का था। इसलिए आनन्द भी उसका सबसे प्रचण्ड था। वह कहीं से दौड़ता हुआ आया और ''आ गया श्रीकान्त- यह आ गया, मँझले भइया!'' इस प्रकार के उन्मत्त चीत्कार से घर को फाड़ता हुआ मेरे आने की बात घोषित करने लगा और मुहूर्त भर का भी विलम्ब किये बगैर, उसने परम आदर से मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुए मुझे बैठकखाने के पायंदाज पर ला खड़ा किया।

वहाँ पर मँझले भइया गहरा मन लगाए परीक्षा पास करने का पाठ पढ़ रहे थे। मुँह उठाकर थोड़ी-सी देर मेरे मुँह की ओर देखकर उन्होंने फिर पढ़ने में अपना मन लगा दिया अर्थात् बाघ, शिकार को अपने अधिकार में कर लेने के उपरान्त, निरापद स्थान में बैठकर, जिस तरह दूसरी तरफ अवहेलना भरी दृष्टि से देखता है, ठीक उसी तरह उनका भाव था। दण्ड देने का इतना बड़ा महेन्द्र योग उनके भाग्य में पहले और कभी जुटा था या नहीं, इसमें सन्देह है।

मिनट-भर वे चुप रहे। सारी रात बाहर बिताने के कारण दोनों कानों और गालों पर जो कुछ बीतेगी सो मैं जानता था। किन्तु, अब और अधिक देर खड़ा भी न रह सकता था और उधर 'कर्म-कर्ता' को भी तो फुरसत नहीं थी। वे भी तो परीक्षा पास करने की तैयारी में लगे थे!

हमारे इन मँझले भइया को आप शायद इतने जल्दी भूले न होंगे। ये वही हैं जिनकी कठोर देख-रेख में कल शाम को हम सब पाठाभ्यास कर रहे थे और क्षण-भर बाद ही, जिनके सुगम्भीर 'ओं-ओं' शब्द और चिरागदान उलटा देने की चोट से गत रात्रि उस 'दि रॉयल बेंगाल' को भी दिग्भ्रमित होकर एक दफा अनार के वृक्ष पर आश्रय लेना पड़ा था।

'पंचाँग तो देख रे सतीश, आज इस बेला बैंगन खाना अच्छा है या नहीं।'' कहती हुई पास के द्वार को खोलकर बुआजी ने जैसे ही घर में पैर रक्खा वैसे ही मुझे देखकर वे अवाक् हो गयी। ''कब आया रे? कहाँ चला गया था? धन्य है लड़के तुझे- सारी रात नींद नहीं आई- सोच सोचकर मर गयी- उस इन्द्र के साथ चुपके-से जो बाहर गया, सो फिर दिखाई ही नहीं दिया। न खाना, न पीना; कहाँ था बोल तो रे अभागे। मुख स्याह हो गया है, ऑंखें लाल छलछला रही हैं-कहती हूँ, ज्वर तो नहीं चढ़ आया है? जरा पास में तो आ, देखूँ तो ऑंग।'' एक साथ इतने बहुत से प्रश्न करने के उपरान्त बुआ स्वयं ही आगे बढ़कर, मेरे कपाल पर हाथ देकर ही बोल उठीं, ''जो सोचा था आखिर वही हुआ न! ऑंग खूब गरम है। ऐसे लड़कों के तो हाथ-पैर बाँधकर जल-बिछुआ लगा दिया जाय, तभी जी शान्त हो! तुझे घर से बिल्कुील बिदा करके ही अब और कुछ करूँगी। चल, भीतर चलकर सो जा, पाजी!'' वे बैंगन-खाने के प्रश्न को बिल्कुथल ही भूल गयीं। उन्होंने हाथ पकड़कर मुझे अपनी गोद में खींच लिया।

मँझले भइया ने बादलों के समान गम्भीर कण्ठो से संक्षेप में कहा, ''अभी वह न जा सकेगा।''

''क्यों, यहाँ क्या करेगा? नहीं, नहीं, इस समय, अब इसका पढ़ना-लिखना न होगा। पहले दो कौर खाकर थोड़ा सो ले। आ मेरे साथ।'' कहकर बुआजी मुझको लेकर चलने लगीं।

किन्तु शिकार जो हाथ से निकला जाता था! मँझले भइया स्थान-काल भूल गये, जोर से चिल्ला उठे और धमकाकर बोले, ''खबरदार कहता हूँ, यहाँ से मत जा, श्रीकान्त! बुआ तब कुछ चौंक उठीं। इसके बाद मुँह फेर मँझले भइया की ओर देखकर केवल इतना ही बोलीं, ''सतीऽऽ!''

बुआजी गम्भीर प्रकृति की औरत थीं। सारा घर उनसे डरता था। मँझले भइया तो बस उस एक तीखी नजर से ही भय के मारे सिटपिटा गये। और फिर, पास ही के कमरे में बड़े भाई भी बैठे थे। बात कहीं उनके कान तक गयी तो फिर खैर नहीं थी।

बुआजी का एक स्वभाव हम लोग हमेशा से देखते आ रहे थे। कभी किसी भी कारण वे शोरगुल करके लोगों को इकट्ठा करना पसन्द नहीं करती थीं। हजार गुस्सा होने पर भी वे कभी जोर से नहीं बोलती थीं। वे बोलीं, ''जान पड़ता है, तेरे ही डर से यह यहाँ खड़ा है। देख सतीश, जब तब सुना करती हूँ कि तू बच्चों को मारता-पीटता है। आज से यदि कभी किसी को हाथ भी लगाया, और मुझे मालूम हो गया; तो इसी खम्भे से बँधवाकर नौकर के हाथ तुझे बेंत लगवाऊँगी। बेहया खुद तो हर साल फेल हुआ करता है- और फिर दूसरों पर रुआब गाँठता है! कोई पढ़े चाहे न पढ़े, आगे से तू किसी से भी कुछ पूछ न सकेगा!''

इतना कहकर, जिस रास्ते आई थीं कि उसी रास्ते मुझे लेकर वे चली गयी। मँझले भइया अपना-सा मुँह लिये बैठे रहे। यह बात मँझले भइया भली-भाँति जानते थे कि इस आदेश की अवहेलना करना किसी के वश की बात नहीं है।

मुझे अपने साथ ले बुआ अपने कमरे में आयीं, मेरे कपड़े बदलवाए, पेट भरकर गरम-गरम जलेबियाँ खिलाईं, बिस्तर पर सुला दिया और यह बात अच्छी तरह जताकर, बाहर से साँकल लगाकर, चली गयी कि मैं मर जाऊँ तो उनके हाड़ जुड़ा जाएँ!

पाँचेक मिनट के बाद खट-से साँकल खोलकर छोटा भाई हाँफता-हाँफता आया और मेरे बिछौने पर आकर पट पड़ गया। आनन्द के अतिरेक से पहले तो वह बात भी न कर सका, फिर थोड़ा 'दम' लेकर फुसफुसाकर बोला, ''मँझले भइया को माँ ने क्या हुक्म दिया है, जानते हो? हम लोगों के किसी भी काम में पड़ने की उन्हें अब जरूरत नहीं है। अब तुम और मैं दोनों एक कमरे में पढ़ेंगे- मँझले भइया की हम जरा भी 'केयर' (परवाह) न करेंगे।'' इतना कहकर उसने अपने दोनों हाथों के अंगूठे एकत्र करके जोर से नचा दिए।

जतीन भी पीछे-पीछे आकर हाजिर हो गया। यह अपनी कारगुजारी की उत्तेजना में एकबारगी अधीर हो रहा था और छोटे भाई को यह सुसमाचार देकर यहाँ खींच लाया था। पहले तो वह कुछ देर तक खूब हँसता रहा। फिर हँसना बन्द करके अपनी छाती बारम्बार ठोंककर बोला, ''मैं! मैं!! मेरे ही सबब से यह सब हुआ है, सो क्या तुम नहीं जानते? मैं यदि इसे (मुझे) मँझले भइया के सामने न ले गया होता तो क्या माँ ऐसा हुक्म देतीं? पर छोटे भइया, तुम्हें अपना कलदार लट्टू मुझे देना होगा सो कहे देता हूँ।'', ''अच्छा दिया। ले आ, जा, मेरे डेस्क में से।'' छोटे भाई ने उसी क्षण हुक्म दे डाला। किन्तु उसी लट्टू को घण्टे भर पहले शायद वह पृथ्वी की सारी सम्पत्ति के बदले भी न दे सकता।

ऐसा ही मूल्य होता है, मनुष्य की स्वाधीनता का। व्यक्तिगत न्याय अधिकारों को प्राप्त करने का ऐसा ही आनन्द होता है। आज मुझे बार-बार खयाल आता है कि बच्चों के निकट भी उसकी अमूल्यता बिन्दुभर भी कम नहीं है। मँझले भइया, बड़े होने के कारण, स्वेच्छाचार से, अपने से छोटों के जिन समस्त अधिकारों को ग्रास कर बैठे थे, उन्हें फिर से प्राप्त करने के सौभाग्य लाभ से छोटे भाई ने अपनी प्राणों से भी प्रिय वस्तु बिना संकोच के दे डाली। दरअसल मँझले भइया के अत्याचारों की सीमा न थी। रविवार को कड़ी-दुपहरी में एक मील का रास्ता नापकर, उनके ताश खेलनेवाले दोस्तों को बुलाने जाना पड़ता था। गर्मी की छुट्टियों में, दिन में जब तक वे सोते रहते थे तब तक पंखा झलना पड़ता था। सर्दी के दिनों में, जब वे लिहाफ के भीतर हाथ-पैर छिपाकर कछुए की तरह बैठे किताब पढ़ते थे, तब हमें बैठे-बैठे उनकी किताब के पन्ने पलट देने होते थे- यही सब उनके अत्याचार थे। और फिर 'न' कहने का भी कोई उपाय नहीं था। किसी के निकट शिकायत करने की भी ताब नहीं थी। घुणाक्षर-न्याय से भी यदि वे जान पाते तो हुक्म दे बैठते, ''केशव, जा तो अपनी जाग्रफी ले आ, देखूँ तुझे पुराना सबक याद है कि नहीं। जतीन, जा तो एक अच्छी-सी झाऊ की छड़ी तोड़ ला।'' अर्थात् पिटना अनिवार्य था, अतएव आनन्द की मात्रा में इन लोगों में यदि प्रतिस्पर्धा हो रही थी तो इसमें अचरज की बात ही क्या थी?

किन्तु आनन्द कितना ही क्यों न हो, अन्त में उसे स्थगित रखना आवश्यक हो गया; क्योंकि स्कूल का समय हो रहा था। मुझे तो ज्वर था, इसलिए कहीं जाना न था।

याद आता है कि उस रात को बुखार तेज हो गया और फिर, 7-8 दिन तक खाट में ही पड़े रहना पड़ा!

इसके कितने दिनों बाद स्कूल गया और फिर कितने दिनों बाद इन्द्र से भेंट हुई सो याद नहीं है; परन्तु इतना जरूर याद है कि बहुत दिनों बाद हुई। शनिवार का दिन था, जल्दी बन्द हो जाने के कारण मैं जल्दी ही स्कूल से लौट आया था। उन दिनों गंगा में पानी उतरना शुरू हो गया था और गंगा से लगे हुए एक नाले के किनारे मैं बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा था। वहाँ और भी बहुत-से आदमी मछली पकड़ रहे थे। एकाएक मैंने देखा कि एक आदमी, पास में ही सरकी के झुण्ड की आड़ में, बैठकर टपाटप मछलियाँ पकड़ रहा है। आड़ में होने के कारण वह तो अच्छी तरह दिखाई न देता था। परन्तु उसका मछली पकड़ना दिखाई पड़ता था। बहुत देर से मुझे अपनी जगह पसन्द नहीं आ रही थी। मन में सोचा कि चलो, मैं भी उसी के निकट जा बैठूँ। बंसी हाथ में लेकर मेरे एक बार घूमकर खड़े होते ही वह बोला, ''मेरे दाहिनी ओर आकर बैठ जा। अच्छा तो है श्रीकान्त?'' छाती धक् कर उठी। यद्यपि मैं उसका मुँह न देख पाया था तो भी- पहिचान गया कि इन्द्र है। शरीर के भीतर से बिजली का तीव्र प्रवाह बह जाने से, जो जहाँ है वह, एक मुहूर्त में, जैसे सजग हो उठा है, उसके कण्ठ-स्वर से भी मेरी वही दशा हुई। पलक मारते-मारते सर्वांग का रक्त चंचल हो उठा और उद्दाम होकर छाती पर मानो जोर-जोर से पछाड़ खाने लगा। किसी तरह भी मुँह से जरा-सा जवाब न निकला। यह बात मैं लिख तो जरूर गया हूँ किन्तु उस वस्तु को भाषा में व्यक्त करने की बात तो दूर, उसे समझना भी मेरे लिए, अत्यन्त कठिन ही नहीं, शायद असाध्यक था। क्योंकि बोलने के लिए यही बहुव्यवहृत साधारण वाक्य-राशि-जैसे हृदय का रक्त आलोड़ित हो रहा था- उद्दाम या चंचल हो रहा था, बिजली के प्रवाह के समान बह रहा था- आदि के उपयोग के सिवाय और तो कोई रास्ता है नहीं। किन्तु इससे कितना-सा व्यक्त किया जा सकता है? जो जानता नहीं उसके आगे मेरे मन की बात कितनी-सी प्रकाशित हुई? जिसने अपने जीवन में एक दिन के लिए भी यह अनुभव नहीं किया, मैं कहीं उसे यह किस तरह जताऊँ और वही इसे किस तरह जाने? जिसकी कि मैं प्रति समय याद करता रहता था- कामना करता रहता था, आकांक्षा करता रहता था और फिर भी, कहीं उससे किसी रूप में मुलाकात न हो जाय, इस भय के मारे दिन-ब-दिन सूखकर काँटा हुआ जाता था- उसी ने, इस प्रकार अकस्मात् इतने अमानवीय रूप में मेरी ऑंखों के सामने, मुझे अपने पार्श्व में आकर बैठने का अनुरोध किया! उसके पास जाकर बैठ भी गया; परन्तु फिर भी कुछ कह न सका।

इन्द्र बोला, ''उस दिन वापिस आकर तूने बड़ी मार खाई- क्यों न श्रीकान्त? तुझे ले जाकर मैंने अच्छा काम नहीं किया। उसके लिए रोज मुझे बड़ा दु:ख होता है।'' मैंने सिर हिलाकर कहा, ''मार नहीं खाई।'' इन्द्र खुश होकर बोला, ''नहीं खाई? सुन रे श्रीकान्त, तेरे जाने के बाद मैंने काली माता को अनेक दफे पुकारा था जिससे तुझे कोई न मारे। काली माता बड़ी जागृत देवी हैं रे! उन्हें मन लगाकर पुकारने से कभी कोई मार नहीं सकता। माता आकर इस प्रकार भुला देती हैं कि कोई कुछ भी नहीं कर सकता।'' ऐसा कहकर उसने बंसी को रख दिया और हाथ जोड़कर कपाल में लगा लिये, मानो उन्हीं को मन ही मन प्रणाम किया हो। फिर बंसी में चारा लगाकर उसे जल में डालते हुए वह बोला, ''मुझे तो खयाल न था कि तुझे ज्वर आ जायेगा, यदि होता तो मैं वह भी न आने देता।''

मैंने आहिस्ते से प्रश्न किया, ''क्या करते तुम?'' इन्द्र बोला, ''कुछ नहीं, सिर्फ जवाफूल (गुड़हल) लाकर माता के पैरों पर चढ़ा देता। उन्हें जवा फूल बड़े प्यारे हैं। जो जैसी कामना से उन्हें चढ़ाता है उसका वैसा ही फल होता है। यह तो सभी जानते हैं, क्या तू नहीं जानता?'' मैंने पूछा, ''तुम्हारी तबियत तो नहीं बिगड़ी थी?'' इन्द्र ने आश्चर्य से कहा, ''मेरी? मेरी तबियत कभी खराब नहीं होती। कभी कुछ नहीं होता।'' वह एकाएक उद्दिप्त होकर बोला, ''देख श्रीकान्त, मैं तुझे एक चीज सिखाए देता हूँ। यदि तू दोनों बेला खूब मन लगाकर देवी का नाम लिया करेगा, तो वे सामने आकर खड़ी हो जाँयगी- तू उन्हें स्पष्ट देख सकेगा। और फिर वे कभी तेरा बुरा न होने देंगी। तेरा कोई बाल भी बाँका न कर सकेगा- तू स्वयं जान जायेगा-फिर मेरी तरह मन चाहे वहाँ जाना, खुशी पड़े सो करना, फिर कोई चिन्ता नहीं। समझ में आया?''

मैंने सिर हिलाकर कहा, ''ठीक है।'' फिर बंसी में चारा लगाकर और उसे पानी में डालकर मृदु-कण्ठ से पूछा, ''अब तुम किसे साथ लेकर वहाँ जाते हो?''

''कहाँ?''

''उस पार मछली पकड़ने।''

इन्द्र बंसी को उठाकर और सावधानी से पास में रखकर बोला, ''अब मैं नहीं जाता।'' उसकी बात सुनकर मुझे अचरज हुआ। पूछा, ''उसके बाद क्या तुम एक दिन भी नहीं गये?''

''नहीं, एक दिन भी नहीं- मुझे सिर की कसम रखकर।'' बात को पूरा किये बगैर ही कुछ सिटपिटाकर इन्द्र चुप हो गया।

उसके सम्बन्ध में मुझे यह बात रह-रहकर काँटे जैसी चुभती रही है। किसी तरह भी उस दिन की वह मछली बेचने की बात भूल न सका था, इसलिए यद्यपि वह चुप हो रहा पर मैं न रह सका। मैंने पूछा, ''किसने तुम्हें सिर की कसम रखाई भाई? तुम्हारी माँ ने?''

''नहीं, माँ ने नहीं।'' कहकर इन्द्र फिर चुप हो रहा। बंसी में धीरे-धीरे डोरी लपेटता हुआ बोला, ''श्रीकान्त, अपनी उस रात की बात घर में तूने किसी से कही तो नहीं?''

''नहीं, किन्तु यह सभी जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ चला गया था।''

इन्द्र ने और कोई प्रश्न न किया। मैंने सोचा था कि अब वह उठेगा। किन्तु वह नहीं उठा, चुप बैठा रहा। उसके मुँह पर हमेशा हँसी का-सा भाव रहता था, परन्तु इस समय वह नहीं था। मानो, वह कुछ मुझसे कहना चाहता हो और किसी कारण, कुछ न कह सकता हो, तथा साथ ही, बिना कुछ कहे रहा भी न जाता हो- बैठे-बैठे भी मानो वह आकुलता का अनुभव कर रहा हो। आप लोग शायद यह कह बैठेंगे कि, ''यह तो बाबू, तुम्हारी बिल्कु।ल मिथ्या बात है, इतना मनस्तत्व आविष्कार करने की उम्र तो वह तुम्हारी नहीं थी।'' मैं भी इसे स्वीकार करता हूँ। किन्तु आप लोग भी इस बात को भूले जाते हैं कि मैं इन्द्र को प्यार करता था; एक आदमी दूसरे के मन की बात को जान सकता है तो केवल सहानुभूति और प्यार से- उम्र और बुद्धि से नहीं। संसार में जिसने प्यार किया है, दूसरे के मन की भाषा उसके आगे उतनी ही व्यक्त हो उठी है। यह अत्यन्त कठिन अन्तर्दृष्टि सिर्फ प्रेम के ज़ोर से ही प्राप्त की जा सकती है, और किसी तरह नहीं। उसका प्रमाण देता हूँ।

इन्द्र ने मुँह उठाकर मानो कुछ बोलना चाहा परन्तु बोल न सकने से उसका समस्त मुख आकरण ही रँग गया। चट से सरकी का एक सोंटा उसने तोड़ लिया और वह उसे नीचा मुँह किये, पानी पर पटकने लगा; फिर बोला, ''श्रीकान्त!''

''क्या है भइया?''

''तेरे-पास रुपये हैं?''

''कितने रुपये?''

''कितने? अरे यही चार-पाँच रुपये।''

''हैं। तुम लोगे?'' कहकर मैंने बड़ी प्रसन्नता से उसके मुख की ओर देखा। ये थोड़े से रुपये ही मेरे पास थे। इन्द्र के काम में आने की अपेक्षा इनके और अधिक सद्व्यवहार की मैं कल्पना भी न कर सकता था! किन्तु कहाँ, इन्द्र तो कुछ खुश न हुआ। उसका मुँह तो मानो और भी अधिक लज्जा के कारण कुछ विचित्र किस्म का हो गया। कुछ देर चुप रहने के उपरान्त वह बोला, ''किन्तु मैं इन रुपयों को तुम्हें लौटा न सकूँगा।''

''मैं इन्हें लौटाना चाहता भी नहीं,'' यह कहकर गर्व के साथ मैं उसकी ओर देखने लगा।

और भी थोड़ी देर तक नीचा मुँह किये रहने के उपरान्त वह धीरे से बोला, ''रुपये मैं स्वयं अपने लिए नहीं चाहता। एक आदमी को देने होंगे; इसी से मैंने माँगे हैं। वे लोग बेचारे बड़े दु:खी हैं- उन्हें खाने को भी नहीं मिलता। क्या तू वहाँ चलेगा?'' निमेष-मात्र में ही मुझे उस रात की बात याद आ गयी। बोला, ''वही न, जिनको रुपया देने के लिए उस दिन तुम नाव पर से उतरे जा रहे थे?'' इन्द्र ने अन्यमनस्क भाव से सिर हिलाकर कहा, ''हाँ, वही। रुपया तो मैं खुद ही बहुत-से दे सकता था, परन्तु जीजी तो किसी तरह लेना ही नहीं चाहतीं। तुझे भी साथ चलना होगा श्रीकान्त, नहीं तो इन रुपयों को वे न लेंगी, सोचेंगी कि मैं माँ के बक्से में से चोरी करके लाया हूँ। चलेगा श्रीकान्त?''

''मालूम होता है वे तुम्हारी जीजी होती हैं?''

इन्द्र ने कुछ हँसकर कहा, ''नहीं, जीजी होती नहीं हैं- जीजी कहता हूँ। चलेगा न?'' मुझे चुप देखकर वह बोला, ''दिन को जाने में वहाँ कुछ भय नहीं है। कल रविवार है, तू खा-पीकर यहाँ आ जाना, मैं तुझे ले चलूँगा; तुरंत ही लौट आवेंगे। चलेगा न भाई?'' इतना कहकर वह जिस प्रकार मेरा हाथ पकड़कर मेरे मुँह की ओर देखने लगा, उससे मेरा 'नहीं' कहना सम्भव नहीं रहा, मैं दुबारा उसकी नौका में जाने का वचन देकर घर लौट आया।

वचन तो सचमुच ही दे आया, किन्तु वहाँ जाना कितना बड़ा दु:साहस है, यह तो मुझसे बढ़कर कोई न जानता था। उसी समय से मेरा मन भारी हो गया और नींद के समय में प्रगाढ़ अशान्ति का भाव मेरे सर्वांग में विचरण करता रहा। सुबह उठते ही, पहले यही मन में आया कि आज जिस जगह जाने के लिए वचन-बद्ध हुआ हूँ, उस जगह जाने से किसी भी तरह मेरा भला न होगा। किसी सूत्र से यदि कोई जान जायेगा, तो वापिस लौटने पर जो सजा भुगतनी पड़ेगी, उसकी चाहना तो शायद मँझले भइया के लिए भी छोटे भइया न कर सकेंगे। अन्त में खा पीकर, पाँच रुपये छिपाकर, जब मैं घर से बाहर निकला तब यह बात भी अनेक बार मन में आई कि, जाने की जरूरत नहीं है। बला से, न रक्खा अपने वचन को, और इससे मेरा आता-जाता ही क्या है?

यथा-स्थान पहुँचकर देखा कि सरकी के झुण्ड के नीचे, उसी छोटी-सी नाव के ऊपर, इन्द्र सिर ऊपर उठाए मेरी राह देख रहा है। ऑंख से ऑंख मिलते ही उसने इस तरह हँसकर मुझे बुलाया कि न जाने की बात अपने मुँह से मैं निकाल ही न सका। सावधानी से, धीरे-धीरे उतरकर, चुपचाप, मैं नाव पर चढ़ गया। इन्द्र ने नाव खोल दी।

आज मैं सोचता हूँ कि बहुत जन्म के पुण्यों का फल था जो उस दिन मैं भय के मारे लौट न आया। उस दिन को उपलक्ष्य करके जो चीज मैं देख आया, उसे देखना, सारे जीवन सारी पृथ्वीि छान डालने पर भी कितने से लोगों के भाग्य में होता है? स्वयं मैं भी वैसी वस्तु और कहाँ देख सका हूँ? जीवन में ऐसा शुभ मुहूर्त अनेक बार नहीं आता। यदि कभी आता भी है तो, वह समस्त चेतना पर ऐसी गम्भीर छाप मार जाता है कि बाद का सारा जीवन मानो उसी साँचे में ढल जाता है। मैं समझता हूँ कि इसीलिए मैं स्त्री-जाति को कभी तुच्छ रूप में नहीं देख सका। इसीलिए बुद्धि से मैं इस प्रकार के चाहे जितने तर्क क्यों न करूँ कि संसार में क्या पिशाचियाँ नहीं हैं? यदि नहीं, तो राह घाट में इतनी पाप-मूर्तियाँ किनकी देख पड़ती हैं? सब ही यदि इन्द्र की जीजी हैं, तो इतने प्रकार के दु:खों के स्रोत कौन बहाती हैं? तो भी, न जाने क्यों, मन में आता है कि यह सब उनके बाह्य आवरण हैं, जिन्हें कि वे जब चाहें तब दूर फेंककर ठीक उन्हीं के (दीदी के) समान उच्च आसन पर जाकर विराज सकती हैं। मित्र लोग कहते हैं कि यह मेरा अति जघन्य शोचनीय भ्रम है। मैं इसका भी प्रतिवाद नहीं करता, सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि यह मेरी युक्ति नहीं है, संस्कार है! इस संस्कार के मूल में जो है, नहीं मालूम, वह पुण्यवती आज भी जीवित है या नहीं। यदि हो भी तो वह कैसे, कहाँ पर है, इसकी खोज-खबर लेने की चेष्टा भी मैंने नहीं की है। किन्तु फिर भी मन ही मन मैंने उन्हें कितनी बार प्रणाम किया है, इसे भगवान ही जानते हैं।

श्मशान के उसी सँकरे घाट के पास, बड़ के वृक्ष की जड़ों से, नाव को बाँधकर जब हम दोनों रवाना हुए तब बहुत दिन बाकी था। कुछ दूर चलने पर, दाहिनी तरफ, वन के भीतर अच्छी तरह देखने से एक रास्ता-सा दिखाई दिया। उसी से होकर इन्द्र ने अन्दर प्रवेश किया। करीब दस मिनट चलने के बाद एक पर्णकुटी दिखाई दी। नजदीक जाकर देखा कि भीतर जाने का रास्ता एक बेंड़े से बन्द है। इन्द्र ने सावधानी से, उसका बन्धन खोलकर, प्रवेश किया; और मुझे अन्दर लेकर फिर उसे उसी तरह बाँध दिया। मैंने वैसा वास-स्थान अपने जीवन में कभी नहीं देखा। एक तो चारों तरफ निबिड़ जंगल, दूसरे सिर के ऊपर एक प्रकाण्ड इमली और पाकर के वृक्ष ने सारी जगह को मानो अन्धकारमय कर रक्खा था। हमारी आवाज पाकर मुर्गियाँ और उनके बच्चे चीत्कार कर उठे। एक तरफ बँधी हुई दो बकरियाँ मिमियाँ उठीं। ध्यान से सामने देखा तो- अरे बाबा! एक बड़ा भारी अजगर, टेढ़ा-मेढ़ा होकर, करीब-करीब सारे ऑंगन को व्याप्त करके पड़ा है! पल-भर में एक अस्फुट चीत्कार करके मुर्गियों को और भी भयभीत करता हुआ, मैं एकदम उस बेंड़े पर चढ़ गया। इन्द्र खिल-खिलाकर हँस पड़ा, बोला, ''यह किसी से नहीं बोलता है रे, बड़ा भला साँप है- इसका नाम है रहीम।'' इतना कहकर वह उसके पास गया और उसने उसे, पेट पकड़कर ऑंगन की दूसरी ओर, खींचकर सरका दिया। तब मैंने बेंड़े पर से उतरकर दाहिनी ओर देखा। उस पर्णकुटी के बरामदे में बहुत-सी फटी चटाइयों और फटी कथरियों के बिछौने पर बैठा हुआ एक दीर्घकाय दुबला-पतला मनुष्य प्रबल खाँसी के मारे हाँफ रहा है। उसके सिर की जटाएँ ऊँची बँधी हुई थीं और गले में विविध प्रकार की छोटी-बड़ी मालाएँ पड़ी थीं। शरीर के कपड़े अत्यन्त मैले और एक प्रकार के हल्दी के रंग में रँगे हुए थे। उसकी लम्बी दाढ़ी कपड़े की एक चिन्दी के जटा के साथ बँधी हुई थी। पहले तो मैं उसे पहिचान नहीं सका; परन्तु पास में आते ही पहिचान गया कि वह सँपेरा है। पाँच-छ: महीने पहले मैं उसे करीब-करीब सभी जगह देखा करता था। हमारे घर भी वह कई दफे साँप का खेल दिखाने आया है। इन्द्र ने उसे 'शाहजी' कहकर सम्बोधन किया। उसने हमें बैठने का इशारा किया और हाथ उठाकर इन्द्र को गाँजे का साज-सरंजाम और चिलम दिखा दी। इन्द्र ने कुछ कहे बगैर ही उसके आदेश का पालन करना शुरू कर दिया। जब चिलम तैयार हुई तब शाहजी, खाँसी से बेदम होने पर भी, मानो 'चाहे मरुँ चाहे बचूँ' का प्रण करके, दम खींचने लगा और रत्ती भर भी धुऑं कहीं से बाहर न निकल जाय, इस आशंका के मारे उसने अपनी बाईं हथेली से नाक और मुँह अच्छी तरह दबा लिया, फिर सिर के एक झटके के साथ उसने चिलम इन्द्र के हाथ में दे दी और कहा, ''पियो।''

इन्द्र ने चिलम पी नहीं। धीरे-से उसे नीचे रखते हुए कहा, ''नहीं।'' शाहजी ने अत्यन्त विस्मित होकर कारण पूछा, किन्तु उत्तर के लिए एक क्षण की भी प्रतीक्षा नहीं की। फिर स्वयं ही उसे उठा लिया और खींच-खींचकर नि:शेष करके उलटकर रख दिया! इसके बाद दोनों के बीच कोमल स्वर में बातचीत शुरू हुई जिसमें से अधिकांश को न तो मैं सुन सका और न समझ ही सका। किन्तु एक बात को मैंने लक्ष्य किया कि शाहजी हिन्दी बोलते रहे और इन्द्र ने बंगला छोड़ और किसी भाषा का व्यवहार न किया।

शाहजी का कंठ-स्वर क्रम-क्रम से गर्म हो उठा और देखते ही देखते वह पागलों की-सी चिल्लाहट में परिणत हो गया। इन्द्र को उद्देश्य करके वह जो गाली-गलौज करने लगा वह ऐसी थी कि न सुनी जा सकती है और न सही। इन्द्र ने तो उसे सह लिया परन्तु मैं कभी नहीं सहता। इसके बाद वह बेंड़े के सहारे बैठ गया और दम-भर बाद ही गर्दन झुका करके सो गया। दोनों जनों के, कुछ देर तक, वैसे ही चुपचाप बैठे रहने के कारण मैं ऊब उठा और बोला, ''समय जा रहा है, तुम्हें क्या वहाँ नहीं जाना?''

''कहाँ श्रीकान्त?''

''अपनी जीजी के यहाँ। क्या रुपये देने नहीं जाना है?''

''अपनी जीजी के लिए ही तो मैं बैठा हूँ। यही तो उनका घर है।''

''यही क्या तुम्हारी जीजी का घर है? यह तो सँपेरे-मुसलमान हैं!'' इन्द्र कुछ कहने को उद्यत हुआ-पर फिर उसे दबा गया और चुप रहकर मेरी ओर ताकने लगा। उसकी दृष्टि बड़ी भारी व्यथा से मानो म्लान हो गयी। कुछ ठहरकर बोला, ''एक दिन तुझे सब कहूँगा। साँप खिलाना देखेगा श्रीकान्त?''

उसकी बात सुनकर मैं अवाक् हो गया। ''क्या साँप को खिलाओगे तुम? यदि काट खाए तो?''

इन्द्र उठकर घर के अन्दर गया और एक छोटी-सी पिटारी और सँपेरे की तूँबी (बाजा) ले आया। उसने उसे सामने रखा, पिटारी का ढक्कन खोला और तूँबी बजाई। मैं डर के मारे काठ हो गया, ''पिटारी मत खोलो भाई, भीतर यदि गोखरू साँप हुआ तो?'' इन्द्र ने इसका जवाब देने की भी जरूरत नहीं समझी, केवल इशारे से बता दिया कि मैं गोखरू साँप को भी खिला सकता हूँ। दूसरे ही क्षण सिर हिला-हिलाकर तूँबी बजाते हुए उसने ढक्कन को अलग कर दिया। बस फिर क्या था, एक बड़ा भारी गोखरू साँप एक हाथ ऊँचा होकर फन फैलाकर खड़ा हो गया। मुहूर्त मात्र का भी विलम्ब किये बगैर इन्द्र के हाथ के ढक्कन में उसने जोर से मुँह मारा और पिटारी में से बाहर निकल पड़ा।

'अरे बाप रे!' कहकर इन्द्र ऑंगन में उछल पड़ा। मैं बेंडे पर चढ़ गया। क्रुद्ध सर्पराज, तूँबी पर और एक आघात करके, घर के भीतर घुस गये। इन्द्र का मुँह काला हो गया। उसने कहा, ''यह तो एकदम जंगली है। जिसे मैं खिलाया करता था, वह यह नहीं है!'' भय, झुँझलाहट और खीझ से मुझे करीब-करीब रुलाई आ गयी। मैं बोला, ''क्यों ऐसा काम किया? उसने जाकर कहीं शाहजी को काट खाया तो?'' इन्द्र असीम शर्म के मारे गड़ा जा रहा था। बोला, ''घर का अर्गल लगा आऊँ? किन्तु यदि पास में ही छिपा हुआ हो तो?'' मैं बोला, ''तो फिर, निकलते ही उसे काट खाएगा।'' निरुपाय भाव से इधर-उधर देखकर इन्द्र बोला, ''काटने दो बच्चू को जंगली साँप रख छोड़ा है जो- साले गँजेड़ी को इतनी भी अक्ल नहीं है- यह लो वह जीजी आ गयी। आना मत! आना मत! वहीं खड़ी रहो।'' मैंने सिर घुमाकर इन्द्र की जीजी को देखा। मानो राख से ढँकी हुई आग हो। जैसे युग-युगान्तरव्यापी कठोर तपस्या समाप्त करके अभी आसन से ही उठकर आई हों। बाईं ओर कमर पर रस्सी से बँधी हुई थोड़ी-सी सूखी लकड़ियाँ थीं और दाहिने हाथ में फूलों की डलिया के समान एक टोकनी में कुछ शाक-सब्जी थी। पहिनावे में हिन्दुस्तानी मुसलमानिन के कपड़े थे, जो गेरुए रंग में रंगे हुए थे, परन्तु मैले नहीं थे। हाथ में लाख की दो चूड़ियाँ थीं। माँग हिन्दुस्तानियों के समान सिन्दूर से भरी थी। उन्होंने लकड़ी का बोझा नीचे रख दिया और बेंड़ा खोलते-खोलते कहा, ''क्या है?'' इन्द्र बहुत ही व्यस्त होकर बोला, ''खोलो मत जीजी, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ- एक बड़ा भारी साँप घर में घुस गया है।'' उन्होंने मेरे मुँह की ओर देखकर मानो कुछ सोचा। इसके बाद थोड़ा-सा हँसकर कहा, ''वही तो। सँपेरे के घर में साँप घुसा है, यह तो बड़े अचरज की बात है! है न, श्रीकान्त?'' मैं अनिमेष दृष्टि से केवल उन्हीं के मुँह की ओर देखता रहा। ''किन्तु, यह तो कहो इन्द्रनाथ, वह अन्दर किस तरह गया?'' इन्द्र बोला, ''पिटारी के भीतर से निकल पड़ा है। एकदम जंगली साँप है।''

''शायद वे अन्दर सो रहे हैं, क्यों?'' इन्द्र ने गुस्से से कहा, ''गाँजा पीकर एकदम बेहोश पड़े हैं। चिल्ला-चिल्लाकर मर जाने पर भी न उठेंगे।'' उन्होंने फिर हँसकर कहा, ''और यही सुयोग पाकर तुम श्रीकान्त को साँप का खिलाना दिखाने चले थे, क्यों न? अच्छा, आओ, मैं पकड़े देती हूँ।''

''तुम मत जाना जीजी, तुम्हें काट खायगा। शाहजी को उठा दो- मैं तुम्हें न जाने दूँगा।'' यह कहकर और दोनों हाथ पसारकर वह रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसके इस व्याकुल कण्ठ-स्वर में जो प्रेम प्रकाशित हो उठा, उसे उन्होंने खूब ही अनुभव किया। मुहूर्त-भर के लिए उनकी दोनों ऑंखें छल छला उठीं; किन्तु उन्हें छिपाकर वे हँसकर बोलीं, ''अरे पागल, इतना पुण्य तेरी इस जीजी ने नहीं किया। मुझे वह नहीं काटेगा, अभी पकड़े देती हूँ देख...'' कहकर बाँस के मंच पर से एक किरोसीन की डिबिया उठाकर और जलाकर वे घर में गयी। एक मिनट-भर में ही साँप को पकड़ लाईं और उसे पिटारी में बन्द कर दिया। इन्द्र ने चट से उनके पैरों पर गिरकर नमस्कार किया और पैरों की धूल सिर पर लगाकर कहा, ''जीजी, यदि तुम कहीं मेरी जीजी होतीं!'' उन्होंने दाहिना हाथ बढ़ाकर इन्द्र का चिबुक स्पर्श किया और उस अंगुली को चूम लिया। फिर मुँह फेरकर अलक्ष्य में मानो उन्होंने अपनी दोनों ऑंखें पोंछ डालीं।
 
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सारी घटना सुनते-सुनते इन्द्र की जीजी हठात् दो-एक बार इस तरह सिहर उठीं कि यदि इन्द्र का उस तरफ तनिक भी ध्याकन होता, तो उसे बड़ा आश्चर्य होता। वह तो न देख पाया, परन्तु मैंने देख लिया। वे कुछ देर तक चुपचाप उसकी ओर देखकर स्नेहभरे तिरस्कार से बोलीं, ''छि: भइया, ऐसा कार्य अब और कभी मत करना। इन सब भयानक जानवरों से क्या खिलवाड़ किया जाता है? भाग्य से तुम्हारे हाथ की पिटारी के ढक्कन पर ही उसने फन मारा, नहीं तो आज कैसा अनर्थ हो जाता, बोलो तो?''

''मैं क्या ऐसा बेवकूफ हूँ जीजी।'' इतना कहकर उसने अपनी धोती का छोर खींचकर कमर में से सूत से बँधी हुई एक सूखी जड़ी दिखाकर कहा, ''यह देख जीजी, पूरी सावधानी के साथ बाँध रखी है। यदि यह न होती तो क्या आज वह मुझे काटे बिना छोड़ देता? शाहजी के पास से इसे प्राप्त करने में क्या मुझे कम कष्ट उठाने पड़े हैं? इसके होते हुए तो मुझे कोई भी नहीं काट सकता, और यदि काट भी लेता- तो भी क्या बिगड़ता? शाहजी को तुरंत ही जगाकर उनसे जहर-मोहरा लेकर कटी जगह पर रख देता। अच्छा, जीजी, यह जहर-मोहरा कितनी देर में सब विष खींच लेता है? आधा घण्टे में? एक घण्टे में? नहीं, इतनी देर न लगती होगी, क्यों जीजी?''

जीजी, किन्तु उसी तरह, चुपचाप देखती रहीं। इन्द्र उत्तेजित हो गया था, बोला, ''आज दो न जीजी मुझे एक जहर-मोहरा-तुम्हारे पास तो दो-तीन पड़े हैं- कितने दिनों से मैं माँग रहा हूँ।'' फिर उत्तर के लिए प्रतीक्षा किये बगैर ही वह क्षुब्ध अभिमान के स्वर में उसी क्षण बोल उठा, ''मुझसे तो तुम लोग जो भी कहते हो मैं वही कर देता हूँ- पर तुम लोग मुझे हमेशा झाँसा देकर कहते हो, आज नहीं कल, कल नहीं परसों-यदि नहीं देना है तो साफ क्यों नहीं कह देते? मैं फिर नहीं आऊँगा- जाओ।''

इन्द्र ने लक्ष्य नहीं किया, किन्तु मैंने जीजी की तरफ देखते हुए खूब अनुभव किया कि उनका मुख, किसी असीम व्यथा और लज्जा के कारण, मानो एकदम काला हो गया है। किन्तु दूसरे ही क्षण कुछ हँसी का भाव अपने सूखे होठों पर जबर्दस्ती लाकर उन्होंने कहा, ''हाँ रे इन्द्र, क्या तू अपनी जीजी के यहाँ सिर्फ साँप के मन्त्र और जहर-मोहरा के लिए ही आया करता है?''

इन्द्र नि:संकोच होकर बोल उठा, ''और नहीं तो क्या!'' फिर निद्रित शाहजी की ओर तिरछी नजर से देखकर बोला, ''किन्तु वह मुझे हमेशा झाँसा ही देते रहते हैं- इस तिथि को नहीं, उस तिथि को नहीं-केवल वह एक झाड़ने का मन्त्र दिया था, बस और कुछ देना ही नहीं चाहते। किन्तु, आज मुझे खूब मालूम हो गया है जीजी, कि तुम भी कुछ कम नहीं हो- तुम भी सब जानती हो। अब और उनकी खुशामद नहीं करूँगा जीजी, तुम्हारे पास से ही सब मन्त्र सीख लूँगा।'' इतना कहकर उसने मेरी ओर देखा और फिर सहसा एक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर शाहजी को लक्ष्य करके उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करते हुए कहा, ''शाहजी गाँजा-वाँजा जरूर पीते हैं श्रीकान्त, किन्तु तीन दिन के मरे हुए मुर्दे को आधा घण्टे के भीतर ही उठाकर खड़ा कर सकते हैं- इतने बड़े उस्ताद हैं ये! हाँ जीजी, तुम भी तो मुर्दे को जिला सकती हो?''

जीजी कुछ देर चुपचाप देखती रहीं और फिर एकाएक खिलखिलाकर हँस पड़ीं। वह कितना मधुर हास था! इस तरह मैंने बहुत ही थोड़े लोगों को हँसते देखा है; किन्तु वह हास, मानो निबिड़ मेघों से भरे हुए आकाश की बिजली को चमक की तरह, दूसरे ही क्षण अन्धकार में विलीन हो गया।

किन्तु इन्द्र ने उस तरफ ध्या न ही नहीं दिया, वह एकदम जीजी के गले पड़ गया और बोला, ''मैं जानता हूँ कि तुम्हें सब मालूम है; परन्तु मैं कहे देता हूँ कि एक-एक करके तुम्हें अपनी सब विद्याएँ देनी होंगी। जितने दिन जाऊँगा उतने दिन तुम्हारा पूरा गुलाम होकर रहूँगा। तुमने कितने मुर्दे जिलाए हैं जीजी?''

जीजी बोली, ''मैं तो मुर्दे जिलाना जानती नहीं, इन्द्रनाथ!''

इन्द्र ने पूछा, ''तुम्हें शाहजी ने यह मन्त्र नहीं दिया?'' जीजी ने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं।'' इन्द्र, मिनट-भर तक उनके मुँह की ओर देखते रहने के उपरान्त, स्वयं भी अपना सिर हिलाते-हिलाते बोला, ''यह विद्या क्या कोई शीघ्र देना चाहता है जीजी? अच्छा, कौड़ी चलाना तो तुमने निश्चय ही सीख लिया होगा?''

जीजी बोली, ''कौड़ी चलाना किसे कहते हैं, सो भी तो मैं नहीं जानती भाई।''

इन्द्र को विश्वास नहीं हुआ। वह बोला, ''हुश्, जानती कैसे नहीं! नहीं दूँगी, यही कह दो न!'' फिर मेरी ओर देखकर बोला, ''कौड़ी चलाना कभी देखा है श्रीकान्त? दो कौड़ियाँ मन्त्र पढ़कर छोड़ दी जाती हैं, वे जहाँ साँप होता है वहाँ जाकर उसके सिर पर जा चिपटती हैं और उसे दस दिन तक के रास्ते से खींच लाकर हाजिर कर देती हैं। ऐसा ही मन्त्र का जोर है! अच्छा जीजी, घर बाँधना, देह-बाँधना, धूल पढ़ना- यह सब तो तुम जानती हो न? यदि जानती न होतीं, तो इस तरह साँप को कैसे पकड़ लेतीं?'' इतना कहकर वह जिज्ञासु-दृष्टि से जीजी के मुँह की ओर देखने लगा।

जीजी ने बहुत देर तक सिर झुकाए हुए चुपचाप मन ही मन मानो कुछ सोच लिया और फिर मुँह उठाकर धीरे से कहा, ''इन्द्र, तेरी जीजी के पास ये सब विद्याएँ कानी-कौड़ी की भी नहीं हैं किन्तु; क्यों नहीं है, सो यदि तू विश्वास करे भाई, तो आज तेरे आगे सब बातें खोलकर अपनी छाती का बोझ हलका कर डालूँ। बोलो, तुम लोग आज मेरी सब बातों पर विश्वास करोगे?'' बोलते-बोलते ही उनके पिछले शब्द एक तरह से कुछ भारी-से हो उठे।

अभी तक मैं प्राय: कुछ भी न बोला था। इस दफे, सबसे आगे जोर से बोल उठा, ''मैं तुम्हारी सब बातों पर विश्वास करूँगा जीजी! सब पर- जो तुम कहोगी, सब पर। एक भी बात पर अविश्वास न करूँगा।''

मेरी ओर देखकर वे कुछ हँसीं और बोलीं, ''विश्वास क्यों न करोगे भाई, तुम भले घरों के लड़के जो ठहरे! इतर (छोटे) लोग ही अनजान अपरिचित लोगों की बात में सन्देह करते और भय से पीछे हट जाते हैं। सिवाय इसके मैंने तो कभी झूठ बोला नहीं भाई!'' इतना कहकर उन्होंने एक दफे सिर हमारी ओर देखकर म्लान भाव-से थोड़ा-सा हँस दिया।

उस समय संध्याे की धुंध दूर होकर, आकाश में चन्द्रमा का उदय हो रहा था और उसकी धुँधली-सी किरण-रेखाएँ, वृक्षों की घनी शाखाओं और पत्तों में से छनकर नीचे के गहरे अन्धकार में पड़ रही थीं।

कुछ देर चुप रहकर जीजी एकाएक बोल उठीं, ''इन्द्रनाथ, सोचा था कि आज ही अपनी सब कहानी तुम्हें सुना दूँ। किन्तु सोचकर देखा कि नहीं, अभी वह समय नहीं आया है। परन्तु मेरी एक बात पर अवश्य विश्वास कर लो कि हम लोगों की सारी करामात शुरू से आखिर तक प्रवंचना ही है। इसलिए अब तुम झूठी आशा से शाहजी के पीछे-पीछे चक्कर मत काटो। हम लोग मन्त्र-तन्त्र कुछ नहीं जानते, मुर्दे को भी नहीं जिला सकते; कौड़ी फेंककर साँप को भी पकड़कर नहीं ला सकते। और कोई कर सकता है या नहीं, सो तो मैं नहीं जानती, परन्तु हम लोगों में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है।''

न मालूम क्यों इस अत्यल्प काल के परिचय से ही मैंने उनके प्रत्येक शब्द पर असंशय विश्वास कर लिया; किन्तु, इतने दिनों के घनिष्ठ परिचय के होते हुए भी इन्द्र विश्वास न कर सका। वह क्रुद्ध होकर बोला, ''यदि शक्ति नहीं है तो तुमने साँप को पकड़ किस तरह लिया?''

जीजी बोलीं, ''यह तो सिर्फ हाथ का कौशल-भर है इन्द्र, किसी मन्त्र का जोर नहीं। साँप का मन्त्र हम लोग नहीं जानते।''

इन्द्र बोला, ''यदि नहीं जानते; तो तुम दोनों ने धूर्तता से मुझसे इतने रुपये क्यों ठग लिये?''

जीजी तत्काल जवाब न दे सकीं; शायद अपने को कुछ सँभालने लगीं। इन्द्र ने फिर कर्कश कण्ठ से कहा, ''तुम सब ठग, धूर्त, चोट्टे हो- अच्छा दिखाता हूँ तुम लोगों को इसका मजा।''

पास में ही एक किरासन की डिबिया जल रही थी। मैंने उसी के प्रकाश में देखा, जीजी का मुँह मुर्दे के समान सफेद हो गया है। वे भय और संकोच के साथ बोलीं, ''हम लोग मदारी जो हैं भाई- ठगना ही तो हमारा व्यवसाय है।''

''तुम्हरा व्यवसाय मैं अभी सब बाहर निकाले देता हूँ- चल रे श्रीकान्त, इन साले धूर्तों की छाया से भी बचना चाहिए। हरामजादे, बदजात, धूर्त, बदमाश!'' यह कहकर इन्द्र सहसा मेरा हाथ पकड़कर और जोर से एक झटका देकर खड़ा हो गया और जरा भी विलम्ब किये बिना मुझे खींच ले गया।

इन्द्र को दोष नहीं दिया जा सकता; क्योंकि उसकी बहुत दिनों की बड़ी-बड़ी आशाएँ, मानो पलक मारते ही, भूमिसात हो गयी थीं। किन्तु मैं अपनी दोनों ऑंखों को जीजी की उन ऑंखों की ओर से फिर न लौटा सका। मैं बलपूर्वक इन्द्र से अपना हाथ छुड़ाकर पाँच रुपये सामने रखते हुए बोला, ''तुम्हारे लिए लाया था जीजी-इन्हें ले लो।''

इन्द्र ने झपटकर उन्हें उठा लिया और कहा, ''अब और रुपये! धूर्तता से इन्होंने मुझसे कितने रुपये लिये हैं, सो क्या तुझे मालूम है श्रीकान्त? मैं तो अब यही चाहता हूँ कि ये लोग बिना खाए-पिए सूखकर मर जाँय।''

मैंने उसका हाथ दबाकर कहा, ''नहीं इन्द्र, दे देने दो- मैं ये जीजी के लिए ही लाया हूँ?''

''ओ:, बड़ी आई तेरी जीजी!'' कहकर वह मुझे खींचकर बेंड़े के पास घसीट लाया!

इतने में इस गोल माल से शाहजी का नशा उचट गया। ''क्या हुआ! क्या हुआ!'' कहते हुए वह उठ बैठा।

इन्द्र मुझे छोड़कर उसकी ओर बढ़ गया और बोला, ''डाकू साले! कभी रास्ते में देख पाया तो चाबुक से तेरी पीठ का चमड़ा उधेड़ दूँगा।'' ''क्या हुआ?'', ''बदमाश साला, जानता कुछ भी नहीं, फिर भी कहता फिरता है, मन्त्र के जोर से मुर्दे जिलाता हूँ! यदि कभी रास्ते पर दिखाई दिया तो अबकी बार अच्छी तरह 'देखूँगा तुझे?'' इतना कहकर उसने एक ऐसा अशिष्ट इशारा किया जिससे कि शाहजी चौंक उठा।

एक तो नशे की खुमारी फिर अकस्मात् यह अचिन्तय काण्ड। इससे यह 'किंतर्कव्य-विमूढ़' हो गया और उसी भाव से टुकुर-टुकुर देखने लगा।

इन्द्र मुझे लेकर जब तक द्वार के बाहर आया, तब तक शायद वह कुछ होश में आकर शुद्ध बंगाली में पुकार उठा, ''सुन इन्द्रनाथ, क्या हुआ है बोल तो?'' यह पहले ही पहल मैंने उसे बंगाली में बोलते सुना।

इन्द्र लौटकर बोला, ''जन्त्र-मन्त्र तुम कुछ नहीं जानते, फिर क्यों' झूठ मूठ मुझे धोखा देकर इतने दिनों तक रुपया ऐंठते रहे? इसका जवाब दो!''

वह बोला, ''नहीं जानता, यह तुमसे किसने कहा?''

इन्द्र ने उसी क्षण उस स्तब्ध नतमुखी जीजी की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, ''इन्होंने कहा कि तुम्हारे पास कानी कौड़ी की भी विद्या नहीं है। विद्या है सिर्फ धूर्तता की और लोगों को ठगने की। यही तुम लोगों का व्यवसाय है! मिथ्यावादी, चोर!''

शाहजी की ऑंखें भक से जल उठीं। वह कैसी भीषण प्रकृति का आदमी है, इसका परिचय मुझे तब तक भी नहीं था। उसकी केवल उस दृष्टि से ही मेरे शरीर में मानो काँटे उठ आए। वह अपनी बिखरी हुई जटाओं को बाँधते-बाँधते उठ खड़ा हुआ और सामने आकर बोला, ''कहा है, तूने?''

जीजी उसी तरह नीचा मुँह किये निरुत्तर बैठी रही। इन्द्र ने मुझे एक धक्का देकर कहा, ''रात हो गयी- चल न।'' मैंने कहा, ''रात अवश्य हो रही है, परन्तु मेरे पैर तो जैसे अपनी जगह से हिलते ही नहीं हैं।'' किन्तु इन्द्र ने उस ओर भ्रूक्षेप भी न किया। वह मुझे प्राय: जबर्दस्ती ही खींच ले चला।

कुछ कदम आगे बढ़ते ही शाहजी का कंठ-स्वर फिर सुनाई दिया, ''क्यों कहा तूने?''

प्रश्न तो जरूर सुना किन्तु प्रत्युत्तर न सुन सका। थोडे क़दम और अग्रसर होते ही अकस्मात् चारों ओर के उस निबिड़ अन्धकार की छाती को चीरता हुआ एक तीव्र आर्त्त-स्वर पीछे की अंधेरी झोंपड़ी में से हमारे कानों को बेधता हुआ निकल गया; और ऑंख की पलक गिरते-न गिरते इन्द्र उस शब्द का अनुसरण करके अदृश्य हो गया। किन्तु मेरे भाग्य में कुछ और ही था। सामने ही एक बड़ी कँटीली झाड़ी थी। मैं जोर से उसी पर जा गिरा और काँटों से मेरा सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया। यह जो हुआ, सो हुआ किन्तु अपने को काँटों से छुड़ाने में ही मुझे करीब दस मिनट लग गये। इस काँटे को छुड़ाओ तो किसी अन्य काँटे में कपड़ा बिंध जाता और उसे छुड़ाओ तो किसी तीसरे में जा अटकता। इस प्रकार अनेक कष्ट और विलम्ब के उपरान्त जब मैं शाहजी के घर के ऑंगन के किनारे पहुँचा, तब देखा कि उस ऑंगन के एक हिस्से में जीजी मूर्च्छित पड़ी हुई हैं और दूसरे हिस्से में दोनों का- गुरु-शिष्य का बाकायदा मल्ल-युद्ध हो रहा है। पास ही में एक तेजधार वाली बर्छी पड़ी हुई है।

शाहजी-शरीर से अत्यन्त बलवान था, किन्तु उसे पता न था कि इन्द्र उससे भी कितना अधिक बली है। यदि होता तो शायद वह इतने बड़े दु:साहस का परिचय न देता। देखते ही देखते इन्द्र उसे चित्त करके उसकी छाती पर चढ़ बैठा और उसकी गर्दन को जोर से दबोचने लगा। वह ऐसा दबोचना था कि यदि मैं बाधा न देता तो, शायद, शाहजी का मदारी-जीवन उसी समय समाप्त हो जाता।

बहुत खींच-तान के बाद जब मैंने दोनों को पृथक किया तब इन्द्र की अवस्था देखकर डर के मारे एकदम रो दिया। पहले मैं अन्धकार में देख न सका था कि उसके सब कपड़े खून से तर-ब-तर हो रहे हैं। इन्द्र हाँफते-हाँफते बोला, ''साले गँजेड़ी ने मुझे साँप मारने का बर्छा मारा है- यह देख?'' कुरते की आस्तीन उठाकर उसने बताया, भुजा में करीब दो-तीन इंच गहरा घाव हो गया है, और उसमें से लगातार खून बह रहा है।

इन्द्र बोला, ''रो मत, इस कपड़े से मेरे घाव को खूब खींचकर बाँध दे। अरे खबरदार! ठीक ऐसा ही बैठा रह, उठा तो गले पर पैर रखकर तेरी जीभ खींचकर बाहर निकाल लूँगा, हरामजादे सूअर! ले इन्द्र, तू खींचकर बाँध, देरी न कर।'' इतना कहकर उसने चर्र-चर्र अपनी धोती के छोर का एक अंश फाड़ डाला। मैं काँपते हाथों से घाव को बाँधने लगा और शाहजी निकट ही, आसन्न मृत्यु विषैले सर्प की तरह, बैठा हुआ, चुपचाप देखने लगा।

इन्द्र बोला, ''नहीं, तेरा विश्वास नहीं है, तू खून कर डालेगा। मैं तेरे हाथ बाँधूँगा।'' यह कहकर उसने उसी की गेरुए रंग की पगड़ी से खींच-खींचकर उसके दोनों हाथ खूब कसकर बाँध दिए। उसने कोई बाधा नहीं दी, प्रतिवाद नहीं किया, जरा-सी चूँ-चपड़ भी न की।

जिस लाठी के प्रहार से जीजी बेहोश हो गयी थीं उसे उठाकर एक तरफ रखते हुए इन्द्र बोला, ''कैसा नमकहराम शैतान है यह साला! मैंने इसे अपने पिता के न जाने कितने रुपये चुराकर दिए हैं, और यदि जीजी ने सिर की कसम रखाकर रोका न होता तो और भी देता। इतने पर भी यह मुझे बर्छी मार बैठा! श्रीकान्त, इस पर नजर रख जिससे यह उठ न बैठे- मैं जीजी की ऑंखों और चेहरे पर जल के छींटे देता हूँ।''

पानी के छींटे देकर हवा करते हुए वह बोला, ''जिस दिन जीजी ने कहा कि इन्द्रनाथ तेरे कमाए हुए पैसे होते तो मैं ले लेती- किन्तु इन्हें लेकर मैं अपना इहलोक-परलोक मिट्टी न करूँगी।' उस दिन से अब तक इस शैतान के बच्चे ने उन्हें कितनी मार मारी है, इसका कोई हिसाब नहीं। इतने पर भी जीजी लकड़ी ढोकर कंडे बेचकर किसी तरह इसे खिलाती-पिलाती हैं, गाँजे के लिए पैसे देती हैं- फिर भी यह उनका अपना न हुआ। किन्तु अब मैं इसे पुलिस के हाथ में दूँगा, तब छोड़ूँगा- नहीं तो यह जीजी का खून कर डालेगा, यह खून कर सकता है।''

मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मानो वह मनुष्य इस बात से सिहर उठा और सिर उठाकर उसे तुरंत नीचा कर लिया। यह सब निमेष-भर में ही हो गया। किन्तु अपराधी की निबिड़ आशंका मैंने उसके चेहरे पर इस प्रकार परिस्फुट होती हुई देखी कि उसका उस समय का वह चेहरा मुझे आज भी साफ-साफ याद आ जाता है।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ, कि इस कहानी को, जिसे कि आज मैं लिख रहा हूँ, इतना ही नहीं कि सत्य मानकर ग्रहण करने में लोग दुविधा करेंगे परन्तु इसे विचित्र कल्पना कहकर उपहास करने में भी शायद संकोच न करेंगे। फिर भी, यह सब कुछ जानते हुए भी, मैंने इसे लिखा है और यही मेरी अभिज्ञता का सच्चा मूल्य है। क्योंकि सत्य के ऊपर खड़े हुए बगैर, किसी भी तरह यह सब कथा मुँह से बाहर नहीं निकाली जा सकती। पग-पग पर डर लगता है कि लोग इसे हँसी में न उड़ा दें। जगत में वास्तविक घटनाएँ कल्पना को भी बहुत दूर पीछे छोड़ जाती हैं-यह कैफियत, स्वयं उसे लेखबद्ध करने में, किसी तरह की मदद नहीं करती, बल्कि हाथ की कलम को बार-बार खींचकर रोकती है।

पर जाने दो इस बात को। जीजी जब ऑंखें खोलकर उठ बैठीं तब शायद आधी रात हो गयी थी। उनकी विह्वलता दूर होते और भी एक घण्टा बीत गया। इसके बाद हमारे मुँह से सारा वृत्तान्त सुनकर वे उठकर धीरे-धीरे खड़ी हो गयीं और शाहजी को बन्धन-मुक्त करके बोलीं, ''जाओ; अब सो रहो।''

उसके चले जाने के उपरान्त उन्होंने इन्द्र को पास बुलाकर और उसका दाहिना हाथ अपने सिर पर रखकर कहा, ''इन्द्र, मेरे इस सिर पर हाथ रखकर शपथ तो कर भाई, कि अब फिर कभी तू इस घर में न आयेगा। हमारा जो होना हो सो हो, तू अब कोई खबर न लेना।''

इन्द्र पहले तो अवाक् हो रहा; परन्तु दूसरे ही क्षण आग की तरह जल उठा और बोला, ''ठीक ही तो है! मेरा खून किये डालता था, सो तो कुछ भी नहीं। और मैंने जो उसे थोड़ी देर के लिए बाँध दिया, सो इस पर तुम्हारा इतना गुस्सा! ऐसा न हो तो फिर यह कलियुग ही क्यों कहलावे! परन्तु तुम दोनों कितने नमकहराम हो! आ रे श्रीकान्त, चलें, बस हो चुका।''

जीजी चुप हो रहीं- उन्होंने इस अभियोग का जरा भी प्रतिवाद नहीं किया। क्यों नहीं किया सो, पीछे मैंने चाहे जितना क्यों न समझा हो, परन्तु उस समय मैं बिल्कुथल न समझ सका। तथापि मैं अलक्ष्य रूप से चुपचाप वे पाँच रुपये वहीं खम्भे के पास रखकर इन्द्र के पीछे-पीछे चल दिया। ऑंगन के बाहर आकर इन्द्र चिल्लाकर बोला, ''हिन्दू की लड़की होकर जो एक मुसलमान के साथ भाग आती है, उसका धर्म-कर्म ही क्या! चूल्हे में चली जाय, अब मैं न कोई खोज ही करूँगा और न खबर ही लूँगा। हरामजादा, नीच कहीं का!'' यह कहकर वह तेजी से उस वन-पथ को लाँघकर चल दिया।

हम दोनों नाव में आकर बैठ गये, इन्द्र चुपचाप नाव खेने लगा और बीच-बीच में हाथ उठा-उठाकर ऑंखें पोंछने लगा। यह साफ-साफ समझकर कि वह रो रहा है, मैंने और कोई भी प्रश्न नहीं किया।

श्मशान के उसी रास्ते से मैं लौट आया और उसी रास्ते अब भी चला जा रहा हूँ, परन्तु न मालूम क्यों, आज मेरे मन में भय की कोई बात ही नहीं आती। मालूम होता है, शायद, उस समय मन इतना विह्वल और इतना ढँका हुआ था कि इतनी रात को किस तरह घर में घुसूँगा और घुसने पर क्या दशा होगी, इसकी चिन्ता भी उसमें स्थान न पा सकी।

प्राय: पिछली रात को नाव घाट पर आ लगी। मुझे उतारकर इन्द्र बोला, ''घर चला जा श्रीकान्त, तू बड़ा अपशकुनिया है। तुझे साथ लेने से एक न एक फसाद उठ खड़ा होता है। आज से अब तुझे किसी भी कार्य के लिए न बुलाऊँगा- और तू भी अब मेरे सामने न आना। जा, चला जा।'' इतना कहकर वह गहरे पानी में नौका ठेलकर देखते ही देखते घुमाव की तरफ अदृश्य हो गया। विस्मित, व्यथित और स्तब्ध होकर मैं निर्जन नदी के तीर पर अकेला खड़ा रह गया।

 
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निस्तब्ध गम्भीर रात में पाता गंगा के किनारे बिल्कुाल अकारण ही, जब इन्द्र मुझे बिल्कुसल अकेला छोड़कर चला गया, तब मैं रुलाई को और न सँभाल सका। उसे मैं प्यार करता हूँ, इसका उसने कोई मूल्य ही नहीं समझा। दूसरे के घर में रहते हुए कठोर शासन-जाल की उपेक्षा करके, उसके साथ गया, इसकी भी उसने कोई कद्र नहीं की। सिवाय इसके, मुझे अपशकुनिया अकर्मण्य कहकर और अकेले असहाय अवस्था में विदा करके, बेपरवाही से चला गया। उसकी यह निष्ठुरता मुझे कितनी अधिक चुभी इसको बताने की चेष्टा करना भी निरर्थक है। इसके बाद, बहुत दिनों तक न उसने मुझे खोजा और न मैंने ही उसे। दैवात् यदि कभी राह-घाट में मिल भी जाता तो मैं इस तरह मुँह मोड़कर चला जाता मानो उसे देखा ही न हो। किन्तु मेरा यह 'मानो' मुझे ही हमेशा तुस की आग की तरह जलाया करता, उसकी जरा-सी भी हानि न कर सकता। लड़कों के दल में उसका बड़ा सम्मान था। फुटबाल-क्रिकेट का वह दलपति था, जिमनास्टिक अखाड़े का मास्टर था। उसके कितने ही अनुचर थे, और कितने ही भक्त। मैं तो उसकी तुलना में कुछ भी न था। फिर-क्यों वह दो ही दिन के परिचय में मुझे 'मित्र' कहने लगा और फिर क्यों उसने त्याग दिया? परन्तु जब उसने त्याग दिया तब मैं भी जबर्दस्ती करके उससे सम्बन्ध जोड़ने नहीं गया।

मुझे खूब याद है कि मेरे संगी-साथी जब इन्द्र का उल्लेख करके उसके सम्बन्ध में तरह-तरह की अद्भुत अचरजभरी बातें कहना शुरू कर देते, तब मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहता। छोटी-सी बात कहकर भी मैंने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वह मुझे जानता है अथवा उसके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूँ। न जाने कैसे मैं उस उम्र में ही यह जान गया था कि 'बड़े' और 'छोटे' की दोस्ती का परिणाम प्राय: ऐसा ही होता है। भविष्य जीवन में मैं भाग्यवश अनेक 'बड़े' मित्रों के संसर्ग में आऊँगा इसलिए, शायद, भगवान ने दया करके यह सहज-ज्ञान मुझे दे दिया था जिससे कि मैं कभी किसी भी कारण से अपनी अवस्था का अतिक्रमण करके अर्थात् अपनी योग्यता का खयाल किये बिना मित्रता का मूल्य ऑंकने न जाऊँ। नहीं तो देखते-देखते 'मित्र' प्रभु बन जाता है, और साध की 'मित्रता' का पाश दासत्व की बेड़ी बनकर 'छोटे' के पैरों को जकड़ लेता है। यह दिव्यज्ञान इतने सहज में और इस तरह सत्य रूप में मुझे प्राप्त हो गया था कि इसमें मैं हमेशा के लिए अपमान और लांछनाओं से छुटकारा पा गया हूँ।

तीन-चार महीने कट गये। दोनों ने ही दोनों को त्याग दिया- भले ही इसकी वेदना किसी पक्ष के लिए कितनी ही निदारुण क्यों न हो; किसी ने किसी की भी खोज-खबर नहीं ली।

दत्त-परिवार के घर में काली-पूजा के उपलक्ष्य में उस मुहल्ले का शौकिया नाटक-स्टेज तैयार हो रहा था। 'मेघनाद वध' का अभिनय होने वाला था। इसके

¹ बंगाल में जो दृश्य-पट हीन अभिनय होते हैं, उन्हें 'यात्रा' कहते हैं, जैसे कि यहाँ पर रामलीला होती है।

पहले देहात में यात्रा¹ तो अनेक बार देखी थी किन्तु नाटक अधिक नहीं देखे थे। मैंने सारे दिन न नहाया, न खाया और न विश्राम ही किया। स्टेज बनाने में सहायता कर सकने से ही मैं मानो बिल्कुतल कृतार्थ हो गया था। इतना ही नहीं, जो सज्जन राम का अभिनय करने वाले थे, उन्होंने स्वयं मुझसे उस दिन एक रस्सी पकड़े रहने के लिए कहा था। इसलिए मुझे बड़ी आशा थी कि रात्रि में जब लड़के कनात के छेदों में से अन्दर ग्रीन-रूम में ढूँकेंगे और मार तथा लाठी के हूले खायँगे, तब मैं 'श्रीराम' की कृपा से बच जाऊँगा। शायद, वे मुझे देखकर भीतर भी एकाध बार जाने दें। किन्तु हाय रे दुर्भाग्य! सारे दिन जी-जान लगाकर जो परिश्रम किया, संध्यान के बाद उसका कुछ भी पुरस्कार नहीं मिला। घण्टों ग्रीन-रूम के द्वार पर खड़ा रहा, 'रामचन्द्र' कितने ही बार आए और गये; किन्तु, उन्होंने मुझे न पहिचाना। एक बार पूछा भी नहीं कि मैं इस तरह खड़ा क्यों हूँ। हाय रे! अकृतज्ञ राम! क्या रस्सी पकड़वाने का मतलब भी तुम्हारा एकबारगी समाप्त हो गया?

रात्रि के दस बजे नाटक की पहली घण्टी बजी। नितान्त खिन्न चित्त से, सारे व्यापार के प्रति श्रद्धाहीन होकर, परदे के सामने ही एक जगह पर मैंने दखल जमाया और वहीं बैठ गया। किन्तु थोड़ी ही देर में सारा रूठना भूल गया। कैसा सुन्दर नाटक था! जीवन में मैंने बहुत-से नाटक देखे हैं, किन्तु वैसा कभी नहीं देखा। मेघनाद स्वयं एक अद्भुत तमाशा था। उसकी छह हाथ ऊँची देह और चार-साढ़े चार हाथ पेट का घेरा था। सभी कहते थे कि यदि यह मर गया तो बैलगाड़ी पर ले जाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं। बहुत दिनों की बात हो गयी। मुझे सारी घटना का स्मरण नहीं है। किन्तु इतना स्मरण है, कि उसने उस दिन जो विक्रम दिखाया वह हमारे देस के हारान पलसाई भीम के अभिनय में सागौन की डाल कन्धों पर रखकर दाँत किड़मिड़ाकर भी नहीं दिखा सकते।

ड्रॉप सीन उठा। जान पड़ा- वे लक्ष्मण ही होंगे-थोड़ा-बहुत वीरत्व प्रकाश कर रहे हैं। इसी समय वही मेघनाद कहीं से एक छलाँग मारकर सामने आ धमका। सारा स्टेज चरमराकर काँप उठा, फूट-लाइट के पाँच-छ: गोले उलटकर बुझ गये- और साथ ही साथ उसका खुद का पेट बाँधने का जरी का कमरपट्टा भी तड़ाक से टूट गया! एक हलचल सी मच गयी। उसे बैठ जाने के लिए कई लोग तो भयभीत चीत्कार कर उठे, और कई लोग सीन ड्राप कर देने के लिए चिल्ला उठे- परन्तु बहादुर मेघनाद, किसी की भी किसी बात से, विचलित नहीं हुआ। बाएँ हाथ के धनुष को फेंककर उसने पटलून को थाम लिया और दाहिने हाथ से केवल तीरों से ही युद्ध करना शुरू किया।

धन्य वीर! धन्य वीरत्व! मानता हूँ कि मैंने तरह-तरह के युद्ध देखे हैं किन्तु हाथ में धनुष नहीं, बाएँ हाथ की अवस्था भी युद्ध-क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं-फिर भी केवल दाहिने हाथ और सिर्फ तीरों से लगातार लड़ाई क्या कभी किसी ने देखी है! अन्त में उसी की जीत हुई। शत्रु को भागकर आत्म-रक्षा करनी पड़ी।

आनन्द की सीमा नहीं थी, मग्न होकर देख रहा था और मन ही मन इस विचित्र लड़ाई के लिए उसकी शत-कोटि प्रशंसा कर रहा था। ऐसे ही समय पीठ के ऊपर अंगुली का दबाव पड़ा। मुँह घुमाकर देखा तो इन्द्र।

वह धीरे-से बोला, ''बाहर आ श्रीकान्त- जीजी तुझे बुलाती हैं।'' बिजली के द्वारा छू जाने के समान मैं सीधा खड़ा हो गया और बोला, ''क्हाँ हैं वे?''

''बाहर तो आ, कहता हूँ।'' रास्ते पर आने पर वह, सिर्फ 'मेरे साथ चल' कहकर चलने लगा।

गंगा के घाट पर पहुँचकर देखा, उसकी नाव बँधी हुई है- चुपचाप हम दोनों उस पर जा बैठे, इन्द्र ने बन्धन खोल दिया।

फिर उसी अन्धकारपूर्ण जंगल के रास्ते से होते हुए दोनों जने शाहजी की कुटी में जा पहुँचे। उस समय, शायद रात्रि अधिक बाकी नहीं थी।

किरासिन का एक दीपक जलाए जीजी बैठी हुई थीं। उनकी गोद में शाहजी का सिर रक्खा हुआ था और उनके पैरों के पास एक बड़ा लम्बा काला साँप पड़ा था।

जीजी ने कोमल स्वर में सारी घटना संक्षेप में कह सुनाई। आज दोपहर को किसी के घर से साँप पकड़ने का बुलावा आया था। वहाँ इस साँप को पकड़ने में जो इनाम मिला उसने उससे ताड़ी लेकर पी ली और चढ़े नशे में संध्यां के कुछ पहले घर लौट आया। फिर जीजी के बार-बार मना करने पर भी वह उस साँप को खिलाने के लिए उद्यत हुआ और देर तक खिलाता भी रहा। परन्तु अन्त में खेल को समाप्त करने के पहले, जब वह उसे पूँछ पकड़कर हंडी में बन्द करने लगा तब नशे की झोंक में आकर ज्यों ही उसके मुख को अपने मुख के पास लाकर, चुम्बन करके, अपना प्यार प्रकट करने गया, त्यों ही उसने भी अपना प्यार व्यक्त करने को शाहजी के गले पर तीव्र चुम्बन अंकित कर दिया।

जीजी ने अपने मैले ऑंचल के छोर से अपनी ऑंखें पोंछते हुए मुझे लक्ष्य करके कहा, ''श्रीकान्त, उसी समय उसे ज्ञात हुआ कि अब समय अधिक नहीं है। तब उन्होंने यह कहकर कि 'आ रे, अब हम दोनों इस दुनिया से एक साथ ही कूच करें' साँप के सिर को पैर के नीचे दबा लिया और दोनों हाथों से उसकी पूँछ खींचकर इतना लम्बा करके फेंक दिया। इसके बाद दोनों का ही 'खेल' समाप्त हो गया!'' इतना कहकर उन्होंने, हाथ से अत्यन्त वेदना के साथ, शाहजी के मुख के ऊपर का कपड़ा दूर कर दिया और बहुत सावधानी से उसके नीले होठों को अपने हाथ से स्पर्श करके कहा, ''जाने दो, अच्छा ही हुआ इन्द्रनाथ, भगवान को मैं तनिक भी दोष नहीं देती।''

हम दोनों में से किसी से भी बोलते न बन पड़ा। उस कण्ठ-स्वर में जो मर्मान्तिक वेदना, जो प्रार्थना और जो घना अभिमान प्रकाशित हुआ, उसे जिसने सुना उसके लिए, भूल जाना इस जीवन में कभी सम्भव नहीं, किन्तु किसके लिए था यह अभिमान! और प्रार्थना भी किसके लिए?

कुछ देर स्थिर रहकर वे बोलीं, ''तुम लोग अभी बच्चे हो, किन्तु, दोनों को छोड़कर मेरा तो कोई और है नहीं भाई; इसीलिए तुमसे भिक्षा माँगती हूँ कि इनका कुछ उपाय कर जाओ!'' फिर अंगुली से कुटी के दक्षिण ओर के जंगल को बताकर कहा, ''वहाँ पर जगह है। इन्द्रनाथ, बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि यदि मैं मर जाऊँ तो उसी जगह जा सोऊँ। सुबह होते ही उसी जगह ले जाकर इन्हें सुला देना। इस जीवन में इन्होंने अनेक कष्ट भोगे हैं- वहाँ कुछ शान्ति पाएँगे।''

इन्द्र ने पूछा, ''शाहजी क्या बर में दफनाए जाँयगे!''

जीजी बोलीं, ''मुसलमान जब हैं तब कब्र में ही दफनाना होगा भाई!''

इन्द्र ने पुन: पूछा, ''जीजी, क्या तुम भी मुसलमान हो?''

जीजी बोली, ''हाँ, मुसलमान नहीं तो और क्या हूँ?''

उत्तर सुनकर इन्द्र भी मानो कुछ संकुचित और कुण्ठित हो उठा। उसके चेहरे के भाव से अच्छी तरह देख पड़ता था कि इस जवाब की उसने आशा नहीं की थी। जीजी को वह दरअसल चाहता था। इसीलिए मन ही मन वह एक गुप्त आशा पोषण कर रहा था कि उसकी जीजी उसी के समाज की एक स्त्री है। परन्तु मुझे उनके कहने पर विश्वास नहीं हुआ। खुद उनके मुँह से स्वीकारोक्ति सुनकर भी मेरे मन में यह बात न बैठी कि वे हिन्दू-कन्या नहीं हैं।

बाकी रात भी कट गयी। इन्द्र निर्दिष्ट स्थान में जाकर कब्र खोद आया और हम तीनों जनों ने ले जाकर शाहजी की मृत देह को समाहित कर दिया। गंगाजी के ठीक ऊपर, कंकरों का एक कगारा, टूटकर, मानो किसी की ठीक अन्तिम शय्या के लिए ही अपने आप यह जगह बन गयी थी। 20-25 हाथ नीचे ही जाद्रवी मैया की धारा थी- और सिर से ऊपर वन्य-लताओं का आच्छादन। किसी प्रिय वस्तु को सावधानी से लुका रखने के लिए मानो यह स्थान बनाया गया था। बड़े ही भाराक्रान्त हृदय से हम तीनों जनें पास ही बैठे- और एक जन हमारी गोद के ही पास मिट्टी के नीचे चिर-निद्रा में अभिभूत होकर सो गया। तब भी सूर्योदय नहीं हुआ था- नीचे से मन्द-स्रोता भागीरथी का कलकल शब्द कानों में आने लगा- सिर के ऊपर, आसपास, वन के पक्षी प्रभाती गाने लगे। कल जो था आज वह नहीं है। कल सुबह क्या यह सोचा था कि आज रात इस तरह बीतेगी? कौन जानता था कि एक मनुष्य का शेष मुहूर्त इतने निकट आ पहुँचा है?

हठात् जीजी उसकी कब्र पर लेट गयी और विदीर्ण कण्ठ से चिल्लाकर रो पड़ी, ''माँ गंगा, मुझे भी अपने चरणों में स्थान दो, मेरे लिए अब और कहीं जगह नहीं है।'' उनकी यह प्रार्थना, वह निवेदन, कितना मर्मान्तिक सत्य था यह उस दिन मैं उतनी तीव्रता से अनुभव नहीं कर सका था जितना कि उसके दो दिन बाद कर सका। इन्द्र ने एक बार मेरी ओर ऑंखें उठाकर देखा, इसके बाद उस आर्त्त-स्वर में कहा, ''जीजी, तुम मेरे यहाँ चलो- मेरी माँ अब भी जीती हैं, वे तुम्हें फेंकेंगी नहीं, अपनी गोद में उठा लेंगी। वे प्रेम-मूर्ति हैं, एक बार चलकर तुम सिर्फ उनके सामने खड़ी भर हो जाना। चलो, तुम हिन्दू ही की लड़की हो जीजी, मुसलमानिन किसी तरह भी नहीं!''

जीजी कुछ बोली नहीं, कुछ देर उसी तरह मूर्च्छित-सी पड़ी रहीं और अन्त में उठ बैठीं। इसके बाद उठकर हम तीनों ने गंगा-स्नान किया। जीजी ने हाथ की चूड़ियाँ और सुहाग की कण्ठी तोड़कर गंगा में बहा दी। मिट्टी से मस्तक का सिन्दूर पोंछकर, सद्य-विधवा के वेष में सूर्योदय के साथ ही साथ वे कुटी में लौट आईं।

इतने दिनों बाद पहले-पहल आज उन्होंने कहा कि शाहजी उनका पति था किन्तु, इन्द्र के मन में यह बात अच्छी तरह जमकर बैठती ही नहीं थी। संदिग्ध स्वर से उसने प्रश्न किया, ''किन्तु तुम तो हिन्दू की लड़की हो जीजी?''

जीजी बोली, ''हाँ, ब्राह्मण की लड़की हूँ और वे भी ब्राह्मण थे।''

इन्द्र कुछ देर अवाक् हो रहा, फिर बोला, ''उन्होंने अपनी जात क्यों छोड़ दी?''

जीजी बोली, ''सो बात मैं अच्छी तरह नहीं जानती भाई। किन्तु जब उन्होंने अपनी जात खो दी, तो उसके साथ मेरी भी खो गयी। स्त्री सहधर्मिणी जो है! नहीं तो वैसे मैंने अपने हाथों अपनी जाति भी नहीं छोड़ी- और किसी दिन किसी तरह का अनाचार भी नहीं किया।''

इन्द्र गाढ़े स्वर में बोला, ''सो तो मैं देखता हूँ जीजी! इसीलिए तो जब तब मेरे मन में यही बात आती रही है, मुझे माफ करना जीजी- तुम कैसे यहाँ आ पड़ीं, तुम्हारी किस तरह ऐसी दुर्बुद्धि हुई। परन्तु अब मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूँगा, मेरे घर तुम्हें चलना ही पड़ेगा। चलो, इसी वक्त चलो।''

जीजी देर तक चुपचाप मानो कुछ सोचती रहीं, फिर मुँह उठाकर धीरे-धीरे बोलीं, ''अभी मैं कहीं भी जा न सकूँगी, इन्द्रनाथ।''

''क्यों नहीं जा सकोगी जीजी?''

जीजी बोलीं, ''मुझे मालूम है कि वे कुछ 'देना' कर गये हैं। जब तक उसे चुका न दूँ, तब तक मैं कहीं हिल नहीं सकती।''

इन्द्र हठात् क्रुद्ध हो उठा, बोला, ''सो तो मैं भी जानता हूँ। ताड़ी की दुकान का, गाँजे की दुकान का जरूर कुछ देना होगा; किन्तु इससे तुम्हें क्या? किसकी ताकत है कि तुमसे रुपया माँगे? चलो तुम मेरे साथ, देखूँ कौन रोकता है तुम्हें?''

इतने दु:ख में भी जीजी को कुछ हँसी आ गयी। बोलीं, ''अरे पागल, मुझे रोकने वाला मेरा खुद का ही धर्म है। पति का ऋण मेरा खुद का ही ऋण है और उन लेने वालों को तुम किस तरह रोक सकोगे भाई? यह नहीं हो सकता। आज तुम लोग घर जाओ- मेरे पास जो कुछ थोड़ा-बहुत है, उसे बेच-बाच कर कर्ज चुकाने की कोशिश करूँगी। कल-परसों फिर किसी दिन आना।''

इतनी देर मैं चुपचाप ही था। इस बार बोला, ''जीजी, मेरे पास घर में और भी चार-पाँच रुपये पड़े हैं- ले आऊँ क्या?'' बात पूरी भी न होने पाई थी कि वे उठकर खड़ी हो गयी और छोटे बच्चे की तरह मुझे अपनी छाती से लगाकर, मेरे मस्तक पर अपने होंठ छुआकर, मेरे मुँह की ओर प्रेम से देखती हुई बोलीं, ''नहीं भइया, और लाने को जरूरत नहीं है। उस दिन तुम पाँच रुपये रख गये थे, तुम्हारी वह दया मैं मरने तक याद रखूँगी, भइया! आशीर्वाद दिये जाती हूँ कि भगवान सदा तुम्हारे हृदय के भीतर बसें और इसी तरह दुखियों के लिए ऑंसू बहाते रहें।'' बोलते-बोलते ही उनकी ऑंखों से झर-झर नीर झरने लगा।

करीब आठ-नौ बजे हम घर जाने को तैयार हुए। उस दिन वे साथ-साथ रास्ते तक पहुँचाने आयीं। जाते समय इन्द्र का एक-हाथ पकड़कर बोलीं, ''इन्द्रनाथ, श्रीकान्त को तो आशीर्वाद दे दिया, किन्तु तुम्हें आशीर्वाद देने का साहस मुझ में नहीं है। तुम मनुष्य के आशीर्वाद के परे हो। इसलिए मैंने आज मन ही मन तुम्हें भगवान के श्रीचरणों में सौंप दिया है। वे तुम्हें अपना लें।''

इन्द्र को उन्होंने पहिचान लिया था। रोकते हुए भी इन्द्र ने उनके पैरों की धूलि सिर पर लेकर प्रणाम किया और रोते-रोते कहा, ''जीजी, इस जंगल में तुम्हें अकेली छोड़ जाने को मेरा किसी तरह साहस नहीं होता। मन में न जाने क्यों, ऐसा लगता है कि मैं तुम्हें और न देख पाऊँगा!''

जीजी ने उनका कुछ जवाब नहीं दिया, सहसा मुँह फेरकर ऑंखें पोंछती हुईं वे उसी वन-पथ से अपनी शोक से ढँकी हुई उस शून्य कुटी में लौट गयीं। जहाँ तक दिखाई देती रहीं वहाँ तक मैं उनकी ओर देखता रहा। किन्तु उन्होंने एक बार भी लौटकर नहीं देखा-उसी तरह, मस्तक नीचा किये, एक ही भाव से चलती हुई वे दृष्टि से ओझल हो गयीं और तब, उन्होंने लौटकर क्यों नहीं देखा, इसे मन ही मन हम दोनों ही जनों ने अनुभव किया।

तीन दिन बाद स्कूल की छुट्टी होते ही बाहर आकर देखा कि इन्द्रनाथ फाटक के बाहर खड़ा है। उसका मुँह अत्यन्त शुष्क हो रहा था, पैरों में जूते नहीं थे और वे घुटनों तक धूल में भरे हुए थे। उस अत्यन्त दीन चेहरे को देखकर मैं भयभीत हो गया। वह बड़े आदमी का लड़का था और साधारणतया बाहर से कुछ शौकीन भी था। ऐसी अवस्था में मैंने उसको कभी नहीं देखा था और मैं समझता हूँ कि और किसी ने भी न देखा होगा। इशारा करके मुझे मैदान की ओर ले जाकर उसने कहा, ''जीजी नहीं हैं। कहीं चली गयीं। मेरे मुँह की ओर उसने ऑंख उठाकर भी नहीं देखा। बोला, ''कल से कितनी जगह जाकर मैं खोज आया हूँ, परन्तु कहीं वे नहीं दिखाई दीं। तेरे लिए वे एक चिट्ठी लिखकर रख गयी हैं; यह ले।'' इतना कहकर एक मुड़ा हुआ पीला कागज मेरे हाथ में थमाकर वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ दूसरी ओर चल दिया। जान पड़ा कि हृदय उसका इतना पीड़ित, इतना शोकातुर हो रहा था कि किसी के साथ आलोचना करना उसके लिए असाध्यक था।

उसी जगह मैं धम से बैठ गया और घड़ी खोलकर उस कागज को मैंने अपनी ऑंखों के सामने रखा। उसमें जो कुछ लिखा था, इतने समय बाद, यद्यपि वह सब याद नहीं रहा है फिर भी बहुत-सी बातें याद कर सकता हूँ- लिखा था, ''श्रीकान्त, जाते समय मैं तुम लोगों को आशीर्वाद दिए जाती हूँ। केवल आज ही नहीं, जितने दिन जीऊँगी तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी। किन्तु मेरे लिए तुम दु:ख मत करना। इन्द्रनाथ मुझे ढूँढ़ता फिरेगा, यह मैं जानती हूँ; किन्तु तुम उसे समझाकर रोकना। मेरी सब बातें तुम आज ही नहीं समझ सकोगे; किन्तु, बड़े होने पर एक दिन अवश्य समझोगे, इस आशा से यह पत्र लिखे जा रही हूँ। अपनी कहानी अपने ही मुँह से तुमसे कह जा सकती थी, परन्तु, न जाने क्यों, नहीं कह सकी; कहूँ-कहूँ सोचते हुए भी न जाने क्यों चुप रह गयी। परन्तु, यदि आज न कह सकी तो फिर कभी कहने का मौका न मिलेगा।

''मेरी कहानी सिर्फ मेरी कहानी ही नहीं है भाई- मेरे स्वामी की कहानी भी है। और फिर, वह भी कुछ अच्छी कहानी नहीं है। मेरे इस जन्म के पाप कितने हैं, सो तो मैं नहीं जानती; किन्तु पूर्व जन्म के संचित पापों की कोई सीमा-परिसीमा नहीं, इसमें जरा भी सन्देह नहीं। इसीलिए, जब-जब मैंने कहना चाहा है तब-तब मेरे मन में यही आया है कि स्त्री होकर, अपने मुँह से, पति की निन्दा करके, उस पाप के बोझ को और भी भाराक्रान्त नहीं करूँगी। किन्तु, अब वे परलोक चले गये। और परलोक चले गये इसलिए उसके कहने में कोई दोष नहीं है, यह मैं नहीं मानती। फिर भी, न जाने क्यों, अपनी इस अन्तविहीन दु:ख-कथा को तुम्हें जनाए बगैर, मैं किसी तरह भी विदा लेने में समर्थ नहीं हो रही हूँ।

''श्रीकान्त, तुम्हारी इस दु:खिनी जीजी का नाम अन्नदा है। पति का नाम क्यों छिपा रही हूँ, इसका कारण, इस लेख को, शेष पर्यन्त पढ़ने के बाद, मालूम होगा।

''मेरे पिता बड़े आदमी हैं। उनके कोई लड़का नहीं है। हम सिर्फ दो बहनें थीं। इसीलिए, मेरे पिता ने मेरे पति को एक दरिद्र के घर से लाकर, अपने पास रखकर, पढ़ा-लिखाकर 'आदमी' बनाना चाहा था। वे उन्हें पढ़ा-लिखा तो अवश्य सके, किन्तु 'आदमी' नहीं बना सके। मेरी बड़ी बहन विधवा होकर घर ही रहती थी- उसी की हत्या करके वे एक दिन लापता हो गये। यह दुष्ट कर्म उन्होंने क्यों किया, इसका हेतु, तुम अभी बच्चे हो, इसलिए न समझ सकोगे, फिर भी किसी दिन जान लोगे। पर कहो तो श्रीकान्त, यह दु:ख कितना बड़ा है? यह लज्जा कितनी मर्मान्तिक है? फिर भी तुम्हारी जीजी ने सब कुछ सह लिया। किन्तु पति बनकर जिस अपमान की अग्नि को उन्होंने अपनी स्त्री के हृदय में जला दिया था उस ज्वाला को तुम्हारी जीजी आज तक भी बुझा नहीं सकी। पर जाने दो उस बात को-

''उक्त घटना के सात वर्ष के बाद मैं उन्हें फिर देख पाई। जिस वेश में तुमनें उन्हें देखा था उसी वेश में वे हमारे घर के सामने साँप का खेल दिखा रहे थे। उन्हें और कोई तो नहीं पहिचान सका, किन्तु मैंने पहिचान लिया। मेरी ऑंखों को वे धोखा नहीं दे सके। सुना है कि यह दु:साहस उन्होंने मेरे लिए ही किया था। परन्तु यह झूठ है! फिर भी, एक दिन गहरी रात में, खिड़की का द्वार खोलकर मैंने पति के लिए ही गृह-त्याग कर दिया। किन्तु सबने यही सुना, यही जाना कि अन्नदा कुल को कलंक लगाकर घर से निकल गयी।

''यह कलंक का बोझा मुझे हमेशा ही अपने ऊपर लादे फिरना होगा। कोई उपाय नहीं है क्योंकि, पति के जीवित रहते तो अपने आपको प्रकट नहीं कर सकी-पिता को पहचानती थी; वे कभी, किसी तरह भी, अपनी संतान की हत्या करने वाले को क्षमा नहीं कर सकते। किन्तु आज यद्यपि वह भय नहीं है- आज जाकर यह सब हाल उनसे कह सकती हूँ, किन्तु इस पर, इतने दिनों बाद, कौन विश्वास करेगा? इसलिए पितृ-गृह में मेरे लिए अब कोई स्थान नहीं है। और फिर, अब मैं मुसलमानिन हूँ।

''यहाँ पर जो पति का कर्ज था वह सब चुक गया है। मैंने अपने पास सोने की दो बालियाँ छिपाकर रख छोड़ी थीं, उन्हें आज बेच दिया है। तुम जो पाँच रुपये एक दिन रख गये थे उन्हें मैंने खर्च नहीं किया। बड़े रास्ते के मोड़ पर जो मोदी की दुकान है, उसके मालिक के पास उन्हें रख दिया है- माँगते ही वे तुम्हें मिल जाँयगे। मन में दु:ख मत करना भइया! ये रुपये तो अवश्य मैंने लौटा दिए हैं, किन्तु तुम्हारे उस कच्चे कोमल छाटे-से हृदय को मैं अपने हृदय में रखे लिए जाती हूँ। और तुम्हारी जीजी का यह एक आदेश है श्रीकान्त, कि तुम लोग मेरी याद करके अपना मन खराब न करना। समझ लेना कि तुम्हारी जीजी जहाँ कहीं भी रहेगी अच्छी ही रहेगी। क्योंकि दु:ख सहन करते-करते उसकी यह दशा हो गयी है, कि उसके शरीर पर अब किसी भी दु:ख का असर नहीं होता। किसी तरह भी उसे व्यथा नहीं पहुँच सकती। मेरे दोनों भाइयों, तुम्हें मैं क्या कहकर आशीर्वाद दूँ, सो मैं ढूँढकर भी नहीं पा सकती हूँ। इसीलिए, केवल यही कहे जाती हूँ कि, भगवान-यदि पतिव्रता स्त्री की बात रखते हैं तो, वे तुम लोगों की मैत्री चिरकाल के लिए अक्षय करेंगे। -तुम्हारी जीजी, अन्नदा।''

 


भाग - 3

आज मैं अकेला जाकर मोदी के यहाँ खड़ा हो गया। परिचय पाकर मोदी ने एक छोटा-सा पुराना चिथड़ा बाहर निकाला और गाँठ खोलकर उसमें से दो सोने की बालियाँ और पाँच रुपये निकाले। उन्हें मेरे हाथ में देकर वह बोला, ''बहू ये दो बालियाँ मुझे इकतीस रुपये में बेचकर शाहजी का समस्त ऋण चुकाकर, चली गयी हैं। किन्तु कहाँ गयी हैं सो नहीं मालूम।'' इतना कहकर वह किसका कितना ऋण था इसका हिसाब बतलाकर बोला, ''जाते समय बहू के हाथ में कुल साढ़े पाँच आने पैसे थे।'' अर्थात् बाईस पैसे लेकर उस निरुपाय निराश्रय स्त्री ने संसार के सुदुर्गम पथ में अकेले यात्रा कर दी है! पीछे से, उसके ये दोनों प्यारे बालक, कहीं उसे आश्रय देने के व्यर्थ प्रयास में, उपायहीन वेदना से व्यथित न हों, इस भय से बिना कुछ कहे ही वे बिना किसी लक्ष्य के घर से बाहर चली गयी हैं- कहाँ, सो भी किसी को उन्होंने जानने नहीं दिया। नहीं दिया-इतना ही नहीं, किन्तु मेरे पाँच रुपये भी नहीं स्वीकार किये। फिर भी, मन में यह समझकर कि वे उन्होंने ले लिये हैं, मैं आनन्द और गर्व से, न जाने कितने दिनों तक, न जाने कितने आकाश-कुसुमों की सृष्टि करता रहा था। पर वे मेरे सब कुसुम शून्य में मिल गये। अभिमान के मारे ऑंखों में जल छल छला आया जिसे उस बूढ़े से छिपाने के लिए मैं तेजी से बाहर चल दिया। बार-बार मन ही मन कहने लगा कि इन्द्र से तो उन्होंने कितने ही रुपये लिये, किन्तु, मुझसे कुछ भी नहीं लिया- जाते समय 'नहीं' कहकर वापिस करके चली गयीं!

किन्तु अब मेरे मन में वह अभिमान नहीं है। सयाना होने पर, अब मैंने समझा है कि मैंने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था जो उन्हें दान दे सकता! उस जलती अग्नि-शिखा में जो भी मैं देता वह जलकर खाक हो जाता- इसीलिए जीजी ने मेरा दान वापिस कर दिया! किन्तु इन्द्र? इन्द्र और मैं क्या एक ही धातु के बने हुए हैं जो जहाँ वह दान करे वहाँ ढीठता से मैं भी अपना हाथ बढ़ा दूँ? इसके सिवा, यह भी तो मैं समझ सकता हूँ कि आखिर किसका मुँह देखकर उन्होंने इन्द्र के आगे हाथ फैलाया था- खैर जाने दो इन बातों को।

इसके बाद अनेकों जगह मैं घूमा-फिरा हूँ; किन्तु इन जली ऑंखों से मैं कहीं भी उन्हें नहीं देख पाया। मुझे वे फिर नहीं दिखाई दीं, किन्तु हृदय में वह हँसता हुआ मुँह हमेशा वैसा ही दीख पड़ता है। उनके चरित्र की कहानी का स्मरण करके जब कभी, मैं मस्तक झुकाकर मन ही मन उन्हें प्रणाम करता हूँ, तब केवल यही बात मेरे मन में आती है कि भगवान, यह तुम्हारा कैसा न्याय है? हमारे इस सती-सावित्री के देश में, तुमने पति के कारण सहधर्मिणी को अपरिसीम दु:ख देकर, सती के माहात्म्य को उज्ज्वल से उज्ज्वलतर करके संसार को दिखाया है, यह मैं जानता हूँ। उनके समस्त दु:ख दैन्य को चिर-स्मरणीय कीर्ति के रूप में रूपान्तरित करके, जगत की सम्पूर्ण नारी जाति को कर्तव्य के ध्रुव-पथ पर आकर्षित करने की तुम्हारी इच्छा है, इसको भी मैं अच्छी तरह समझ सकता हूँ; किन्तु हमारी ऐसी जीजी के भाग्य में इतनी बड़ी विडम्बना और अपयश क्यों लिख दिया? किसलिए तुमने ऐसी सती के मुँह पर असती की गहरी काली छाप मारकर उसे हमेशा के लिए संसार से निर्वासित कर दिया? उनको तुमने क्यों नहीं छुड़ा लिया? उनकी जाति छुड़ाई, धर्म छुड़ाया- समाज, संसार, प्रतिष्ठा, सभी कुछ तो छुड़ा लिया। और जो अपरिमित, दु:ख तुमने दिया है, उसका तो मैं आज भी साक्षी हूँ। इसका भी मुझे दु:ख नहीं है जगदीश्वर! किन्तु जिनका आसन, सीता, सावित्री आदि सतियों के समीप है, उन्हें उनके माँ-बाप, कुटुम्बी, शत्रु-मित्र आदि ने किस रूप में जाना? कुलटा रूप में, वेश्या रूप में! इससे तुम्हें, क्या लाभ हुआ? और संसार को भी क्या मिला?

हाय रे, कहाँ हैं उनके वे सब आत्मीय स्वजन और भाई-बन्धु? यदि एक दफे भी मैं जान सकता, वह देश फिर कितनी ही दूर क्यों न होता, इस देश से बाहर ही क्यों न होता, तो भी, मैंने वहाँ जाकर अवश्य कहा होता- यही हैं तुम्हारी अन्नदा और यही उनकी अक्षय कहानी! तुमने अपनी जिस लड़की को कुल-कंलकिनी मान लिया है, उसका नाम यदि सुबह एक दफे भी ले लिया करोगे तो अनेक पापों से छुट्टी पा जाओगे?

इस घटना से मैंने एक सत्य को प्राप्त किया है। पहले भी मैं एक दफे कह चुका हूँ कि नारी के कलंक की बात पर मैं सहज ही विश्वास नहीं कर सकता; क्योंकि मुझे जीजी याद आ जाती हैं। यदि उनके भाग्य में भी इतनी बड़ी बदनामी हो सकती है, तो फिर संसार में और क्या नहीं हो सकता? एक मैं हूँ, और एक वे हैं जो सर्व काल के सर्व पाप-पुण्य के साक्षी हैं- इनको छोड़कर दुनिया में ऐसा और कौन है, जो अन्नदा को जरा से स्नेह के साथ भी स्मरण करे। इसीलिए, सोचता हूँ कि न जानते हुए नारी के कलंक की बात पर अविश्वास करके संसार में ठगा जाना भला है, किन्तु विश्वास करके पाप का भागी होना अच्छा नहीं!

उसके बाद बहुत दिनों तक इन्द्र को नहीं देखा। गंगा के तीर घूमने जाता था तो देखता था कि उसकी नाव किनारे बँधी हुई है। वह पानी में भीग रही है और धूप में फट रही है। सिर्फ एक दफे और हम दोनों उस नाव पर बैठे थे। उस नौका पर वही हमारी अन्तिम यात्रा थी। इसके बाद न वही उस नाव पर चढ़ा और न मैं ही। वह दिन मुझे खूब याद है। सिर्फ इसीलिए नहीं कि वह हमारी नौका-यात्रा का समाप्ति-दिवस था, किन्तु इसलिए कि उस दिन अखण्ड-स्वार्थपरता का जो उत्कृष्ट दृष्टान्त देखा था, उसे मैं सहज में नहीं भूल सका। वह कथा भी कहे देता हूँ।

वह कड़ाके की शीत-काल की संध्याख थी। पिछले दिन पानी का एक अच्छा झला पड़ चुका था, इसलिए जाड़ा सूई की तरह शरीर में चुभता था। आकाश में पूरा चन्द्रमा उगा था। चारों तरफ चाँदनी मानो तैर रही थी। एकाएक इन्द्र आ टपका; बोला, ''थियेटर देखने चलेगा?'' थियेटर के नाम से मैं एकबारगी उछल पड़ा। इन्द्र बोला, ''तो फिर कपड़े पहिनकर शीघ्र हमारे घर आ जा।'' पाँच मिनट में एक रैपर लेकर बाहर निकल पड़ा। उस स्थान को ट्रेन से जाना होता था। सोचा, घर से गाड़ी करके स्टेशन पर जाना होगा- इसलिए इतनी जल्दी है।

इन्द्र बोला, ''ऐसा नहीं, हम लोग नाव पर चलेंगे। मैं निरुत्साहित हो गया, क्योंकि, गंगा में नाव को उस ओर खेकर ले जाना पड़ेगा, और इसलिए बहुत देर हो जाने की सम्भावना थी। शायद समय पर पहुँचा न जा सके। इन्द्र बोला, ''हवा तेज है, देर न होगी। हमारे नवीन भइया कलकत्ते से आए हैं, वे गंगा से ही जाना चाहते हैं।''

खैर, दाँड लेकर, पाल तानकर ठीक तरह से हम लोग नाव में बैठ गये- बहुत देर करके नवीन भइया घाट पर पहुँचे। चन्द्रमा के आलोक में उन्हें देखकर मैं तो डर गया। कलकत्ते के भयंकर बाबू! रेशम के मोजे, चमचमाते पम्प शू, ऊपर से नीचे तक ओवरकोट में लिपटे हुए, गले में गुलूबन्द, हाथ में दस्ताने, सिर पर टोपी- शीत के विरुद्ध उनकी सावधानी का अन्त नहीं था। हमारी उस साधाकी डोंगी को उन्होंने अत्यन्त 'रद्दी' कहकर अपना कठोर मत जाहिर कर दिया; और इन्द्र के कन्धों पर भार देकर तथा मेरा हाथ पकड़कर, बड़ी मुश्किल से, बड़ी सावधानी से, वे नाव के बीच में जाकर सुशोभित हो गये।

''तेरा नाम क्या है रे?''

डरते-डरते मैंने कहा, ''श्रीकान्त।''

उन्होंने आक्षेप के साथ मुँह बनाकर कहा, ''श्रीकान्त- सिर्फ 'कान्त' ही काफी है। जा हुक्का तो भर ला। अरे इन्द्र, हुक्का-चिलम कहाँ है? इस छोकरे को दे, तमाखू भर दे!''

अरे बाप रे! कोई अपने नौकर को भी इस तरह की विकट भाव-भंगी से आदेश नहीं देता। इन्द्र अप्रतिभ होकर बोला, ''श्रीकान्त, तू आकर कुछ देर डाँड़ पकड़ रख। मैं हुक्का भरे देता हूँ।''

उसका जवाब न देकर मैं खुद ही हुक्का भरने लगा। क्योंकि वे इन्द्र के मौसेरे भाई थे, कलकत्ते के रहने वाले थे और हाल ही में उन्होंने एल.ए. पास किया था। परन्तु मन मेरा बिगड़ उठा। तमाखू भरकर हुक्का हाथ में देते ही उन्होंने प्रसन्न मुख से पीते-पीते पूछा, ''तू कहाँ रहता है रे कान्त? तेरे शरीर पर वह काला-काला सा क्या है रे? रैपर है? आह! रैपर की क्या ही शोभा है। इसके तेल की बास से तो भूत भी भाग जावें! छोकरे-फैलाकर बिछा तो दे यहाँ उसे, बैठें उस पर।''

''मैं देता हूँ, नवीन भइया, मुझे ठण्ड नहीं लगती। यह लो'' कहकर इन्द्र ने अपने शरीर पर की अलवान चट से उतारकर फेंक दी। वह उसे मजे से बिछाकर बैठ गया और आराम से तमाखू पीने लगा।

शीत ऋतु की गंगा अधिक चौड़ी नहीं थी- आधा घण्टे में ही डोंगी उस किनारे से जा भिड़ी। साथ ही साथ हवा बन्द हो गयी।

इन्द्र व्याकुल हो बोला, ''नूतन भइया, यह तो बड़ी मुश्किल हुई- हवा बन्द हो गयी। अब तो पाल चलेगा नहीं।''

नूतन भइया बोले, ''इस छोकरे के हाथ में दे न, डाँड़ खींचे।'' कलकत्तावासी नूतन भइया की जानकारी पर कुछ मलिन हँसी हँसकर इन्द्र बोला, ''डाँड़! कोई नहीं ले जा सकता। नूतन भइया, इस रेत को ठेलकर जाना किसी के किये भी सम्भव नहीं। हमें लौटना पड़ेगा।''

प्रस्ताव सुनकर नूतन भइया मुहूर्त भर के लिए अग्निशर्मा हो उठे, ''तो फिर ले क्यों आया हतभागे? जैसे हो, तुझे वहाँ तक पहुँचाना ही होगा। मुझे थियेटर में हारमोनियम बजाना ही होगा- उनका विशेष आग्रह है।'' इन्द्र बोला, ''उनके पास बजाने वाले आदमी हैं नूतन भइया, तुम्हारे न जाने से वे अटके न रहेंगे।''

''अटके न रहेंगे? इस गँवार देश के छोकरे बजावेंगे हारमोनियम! चल, जैसे बने वैसे ले चल।'' इतना कहकर उन्होंने जिस तरह का मुँह बनाया, उससे मेरा सारा शरीर जल उठा। उसका हारमोनियम बजाना भी हमने बाद में सुना, किन्तु वह कैसा था सो बताने की जरूरत नहीं।

इन्द्र का संकट अनुभव करके मैं धीरे से बोला, ''इन्द्र, क्या रस्सी से खींचकर ले चलने से काम न चलेगा?'' बात पूरी होते न होते मैं चौंक उठा। वे इस तरह दाँत किटकिटा उठे, कि उनका वह मुँह आज भी मुझे याद आ जाता है। बोले, ''तो फिर जा न, खींचता क्यों नहीं? जानवर की तरह बैठा क्यों है?''

इसके बाद एक दफे इन्द्र और एक दफे मैं रस्सी खींचते हुए आगे बढ़ने लगे। कहीं ऊँचे किनारे के ऊपर से, कहीं नीचे उतर कर, और बीच-बीच में उस बरफ सरीखे ठण्डे जल की धारा में घुसकर, हमें अत्यन्त कष्ट से नाव ले चलना पड़ा। और फिर बीच-बीच में बाबू के हुक्के को भरने के लिए भी नाव को रोकना पड़ा। परन्तु बाबू वैसे ही जमकर बैठे रहे- जरा भी सहायता उन्होंने नहीं की। इन्द्र ने एक बार उनसे 'कर्ण' पकड़ने को कहा तो जवाब दिया, कि ''मैं दस्ताने खोलकर ऐसी ठण्ड में निमोनिया बुलाने को तैयार नहीं हूँ।'' इन्द्र ने कहना चाहा, ''उन्हें खोले बगैर ही...''

''हाँ, कीमती दस्तानों को मिट्टी कर डालूँ, यही न! ले, जा जो करना हो कर।''

वास्तव में मैंने ऐसे स्वार्थ पर असज्जन व्यक्ति जीवन में थोड़े ही देखे हैं। उनके एक वाहियात शौक को चरितार्थ करने के लिए हम लोगों को- जो उनसे उम्र में बहुत छोटे थे- इतना सब क्लेश सहते हुए अपनी ऑंखों देखकर वे जरा भी विचलित न हुए। कहीं से जरा-सी ठण्ड लगाकर उन्हें बीमार न कर दें, एक छींटा जल पड़ जाने से कहीं उनका कीमती ओवरकोट खराब न हो जाय, हिलने-चलने में किसी तरह का व्याघात न हो- इसी भय से वे जड़ होकर बैठे रहे और चिल्ला-चिल्लाकर हुक्मों की झड़ी लगाते रहे।

और भी एक आफत आ गयी- गंगा की रुचिकर हवा में बाबू साहब की भूख भड़क उठी और, देखते-ही-देखते, अविश्राम बक-झक की चोटों से, और भी भीषण हो उठी। इधर चलते-चलते रात के दस बज गये हैं-थियेटर पहुँचते-पहुँचते रात के दो बज जाँयगे, यह सुनकर बाबू साहब प्राय: पागल हो उठे। रात के जब ग्यारह बजे तब, कलकत्ते के बाबू बेकाबू होकर बोले, ''हाँ रे इन्द्र, पास में कहीं हिन्दुस्तानियों की कोई बस्ती-अस्ती है कि नहीं? चिउड़ा-इउड़ा कुछ मिलेगा?''

इन्द्र बोला, ''सामने ही एक खूब बड़ी बस्ती है नूतन भइया, सब चीजें मिलती हैं।''

''तो फिर चला चल- अरे छोकरे, जरा खींच न जोर से- क्या खाने को नहीं पाता? इन्द्र, बोल न तेरे इस साथी से, थोड़ा और जोर करके खींच ले चले?''

इन्द्र ने अथवा मैंने किसी ने इसका जवाब नहीं दिया। जिस तरह चल रहे थे उसी तरह चलते हुए हम थोड़ी देर में एक गाँव के पास जा पहुँचे। यहाँ पर किनारा ढालू और विस्तृत होता हुआ जल में मिल गया था। नाव को बलपूर्वक धक्का देकर, उथले पानी में करके, हम दोनों ने एक आराम की साँस ली।

बाबू साहब बोले, ''हाथ-पैर कुछ सीधे करना होगा। उतरना चाहता हूँ।'' अतएव इन्द्र ने उन्हें कन्धों पर उठाकर नीचे उतार दिया। वे ज्योत्स्ना के आलोक में गंगा की शुभ्र रेती पर चहलकदमी करने लगे।

हम दोनों जनें उनकी क्षुधा-शान्ति के उद्देश्य से गाँव के भीतर घुसे। यद्यपि हम लोग जानते थे कि इतनी रात को इस दरिद्र खेड़े में आहार-संग्रह करना सहज काम नहीं है तथापि चेष्टा किये बगैर भी निस्तार नहीं था। इस पर, अकेले रहने की भी उनकी इच्छा नहीं थी। इस इच्छा के प्रकाशित होते ही इन्द्र उसी दम आह्नान करके बोला, ''नवीन भइया, अकेले तुम्हें डर लगेगा- हमारे साथ थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। यहाँ कोई चोर-ओर नहीं है, नाव कोई नहीं ले जायेगा। चले न चलो।''

नवीन भइया अपने मुँह को कुछ विकृत करके बोले, ''डर! हम लोग दर्जी पाड़े के लड़के हैं- यमराज से भी नहीं डरते- यह जानते हो? फिर भी नीच लोगों की डर्टी (गन्दी) बस्ती में हम नहीं जाते। सालों के शरीर की बू यदि नाक में चली जाय तो हमारी तबियत खराब हो जाए।'' वास्तव में उनका मनोगत अभिप्राय यह था कि मैं उनके पहरे पर नियुक्तर होकर उनका हुक्का भरता रहूँ।

किन्तु उनके व्यवहार से मन ही मन में इतना नाराज हो गया था कि इन्द्र के इशारा करने पर भी मैं किसी तरह, इस आदमी के संसर्ग में, अकेले रहने को राजी नहीं हुआ। इन्द्र के साथ ही चल दिया।

दर्जीपाड़े के बाबू साहब ने हाथ-ताली देते हुए गाना शुरू कर दिया। हम लोगों को बहुत दूर तक नाक के स्वर की उनकी जनानी तान सुनाई देती रही। इन्द्र खुद भी मन ही मन अपने भाई के व्यवहार से अतिशय लज्जित और क्षुब्ध हो गया था। धीरे से बोला, ''ये कलकत्ते के आदमी ठहरे, हमारी तरह हवा-पानी सहन नहीं कर सकते- समझे न श्रीकान्त?''

मैं बोला, ''हूँ।''

तब इन्द्र उनकी असाधारण विद्या बुद्धि का परिचय, शायद श्रद्धा आकर्षित करने के लिए देते हुए चलने लगा। बातचीत में यह भी उसने कहा कि वे थोड़े ही दिनों में बी.ए. पास करके डिप्टी हो जाँयगे। जो हो, अब इतने दिनों के बाद भी इस समय वे कहाँ के डिप्टी हैं अथवा उन्हें वह पद प्राप्त हुआ या नहीं, मुझे नहीं मालूम। परन्तु, जान पड़ता है कि वे डिप्टी अवश्य हो गये होंगे, नहीं तो बीच-बीच में बंगाली डिप्टियों की इतनी सुख्याति कैसे सुन पड़ती? उस समय उनका प्रथम यौवन था। सुनते हैं, जीवन के इस काल में हृदय की प्रशस्सता, संवेदना की व्यापकता, जितनी बढ़ती है उतनी और किसी समय नहीं। लेकिन, इन कुछ घण्टों के संसर्ग में ही जो नमूना उन्होंने दिखाया इतने समय के अन्तर के बाद भी वह भुलाया नहीं जा सका। फिर भी, भाग्य से ऐसे नमूने कभी-कभी दिखाई पड़ जाते हैं- नहीं तो, बहुत पहले ही यह संसार बाकायदा पुलिस थाने के रूप में परिणत हो जाता। पर रहने दो अब इस बात को।

परन्तु, पाठकों को यह खबर देना आवश्यक है कि भगवान भी उन पर क्रुद्ध हो गये थे। इस तरफ के राह-घाट, दुकान-हाट, सब इन्द्र के जाने हुए थे। वह जाकर एक मोदी की दुकान पर उपस्थित हो गया। परन्तु दुकान बन्द थी और दुकानदार ठण्ड के भय से दरवाजे-खिड़कियाँ बन्द करके गहरी निद्रा में मग्न था। नींद की वह गहराई कितनी अथाह होती है, सो उन लोगों को लिखकर नहीं बताई जा सकती, जिन्हें खुद इसका अनुभव न हो। ये लोग न तो अम्ल-रोगी निष्कर्मा जमींदार हैं और न बहुत भार से दबे हुए, कन्या के दहेज की फिक्र से ग्रस्त बंगाली गृहस्थ। इसलिए सोना जानते हैं। दिन भर घोर परिश्रम करने के उपरान्त, रात को ज्यों ही उन्होंने चारपाई ग्रहण की कि फिर, घर में आग लगाए बगैर, सिर्फ चिल्लाकर या दरवाजा खटखटाकर उन्हें जगा दूँगा- ऐसी प्रतिज्ञा यदि स्वयं सत्यवादी अर्जुन भी, जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा के बदले कर बैठते तो, यह बात कसम खाकर कही जा सकती है कि उन्हें भी मिथ्या प्रतिज्ञा के पाप से दग्ध होकर मर जाना पड़ता।

हम दोनों जनें बाहर खड़े होकर तीव्र कण्ठ से चीत्कार करके तथा जितने भी कूट-कौशल मनुष्य के दिमाग में आ सकते हैं, उन सबको एक-एक करके आजमा करके, आधा घण्टे बाद खाली हाथ लौट आए। परन्तु घाट पर आकर देखा तो वह जन-शून्य है। चाँदनी में जहाँ तक नजर दौड़ती थी वहाँ तक कोई भी नहीं दिखता। 'दर्जीपाड़े' का कहीं कोई निशान भी नहीं। नाव जैसी थी वैसी ही पड़ी हुई है- फिर बाबू साहब गये कहाँ? हम दोनों प्राणपण से चीत्कार कर उठे-'नवीन भइया' किन्तु कहीं कोई नहीं। हम लोगों की व्याकुल पुकार, बाईं और दाहिनी बाजू के खूब ऊँचे कगारों से टकराकर, अस्पष्ट होती हुई, बार-बार लौटने लगी। आस-पास के उस प्रदेश में, शीतकाल में, बीच बीच में बाघों के आने की बात भी सुनी जाती थी। गृहस्थ किसान इन दलबद्ध बाघों की विपत्ति से व्यस्त रहते थे। सहसा इन्द्र इसी बात को कह बैठा, ''कहीं बाघ तो नहीं उठा ले गया रे!'' भय के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। यह क्या कहते हो? इसके पहले उनके निरतिशय अभद्र व्यवहार से मैं नाराज तो सचमुच ही हो उठा था परन्तु, इतना बड़ा अभिशाप तो मैंने उन्हीं नहीं दिया था!

सहसा दोनों जनों की नजर पड़ी कि कुछ दूर बालू के ऊपर कोई वस्तु चाँदनी में चमचमा रही है। पास जाकर देखा तो उन्हीं के बहुमूल्य पम्प-शू की एक फर्द है? इन्द्र भीगी बालू पर लेट गया- ''हाय श्रीकान्त! साथ में मेरी मौसी भी तो आई हैं। अब मैं घर लौटकर न जाऊँगा!'' तब धीरे-धीरे सब बातें स्पष्ट होने लगीं। जिस समय हम लोग मोदी की दुकान पर जाकर उसे जगाने का व्यर्थ प्रयास कर रहे थे, उसी समय, इस तरफ कुत्तों का झुण्ड इकट्ठा होकर आर्त्त चीत्कार करके इस दुर्घटना की खबर हमारे कर्णगोचर करने के लिए व्यर्थ मेहनत उठा रहा था, यह बात अब जल की तरह हमारी ऑंखों के आगे स्पष्ट हो गयी। अब भी हमें दूर पर कुत्तों का भूँकना सुन पड़ता था। अतएव जरा भी संशय नहीं रहा कि बाघ उन्हें खींच ले जाकर जिस जगह भोजन कर रहे हैं, वहीं आस-पास खड़े हो ये कुत्ते भी अब भौंक रहेहैं।

अकस्मात् इन्द्र सीधा होकर खड़ा हो गया और बोला, ''मैं वहाँ जाऊँगा।'' मैंने डरकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, ''पागल हो गये हो भइया!'' इन्द्र ने इसका कुछ जवाब नहीं दिया। नाव पर जाकर उसने कन्धों पर लग्गी रख ली, एक बड़ी लम्बी छुरी खीसे में से निकालकर बाएँ हाथ में ले ली और कहा, ''तू यहीं रह श्रीकान्त, मैं न आऊँ तो लौटकर मेरे घर खबर दे देना- मैं चलता हूँ।''

उसका मुँह बिल्कुतल सफेद पड़ गया था, किन्तु दोनों ऑंखें जल रही थीं। मैं उसे अच्छी तरह चीन्हता था। यह उसकी निरर्थक, खाली उछल-कूद नहीं थी कि हाथ पकड़ कर दो-चार भय की बातें कहने से ही, मिथ्या दम्भ मिथ्या में मिल जायेगा। मैं निश्चय से जानता था कि किसी तरह भी वह रोका नहीं जा सकता- वह जरूर जायेगा। भय से जो चिर अपरिचित हो, उसे किस तरह और क्या कहकर रोका जाता? जब वह बिल्कुसल जाने ही लगा तो मैं भी न ठहर न सका; मैं भी, जो कुछ मिला, हाथ में लेकर उसके पीछे-पीछे चल दिया। इस बार इन्द्र ने मुख फेरकर मेरा एक हाथ पकड़ लिया और कहा, ''तू पागल हो गया है श्रीकान्त! तेरा क्या दोष है? तू क्यों जायेगा?''

उसका कण्ठ-स्वर सुनकर मेरी ऑंखों में एक मुहूर्त में ही जल भर आया। किसी तरह उसे छिपाकर बोला, ''तुम्हारा ही भला, क्या दोष है इन्द्र? तुम ही क्यों जाते हो?''

जवाब में इन्द्र ने मेरे हाथ से बाँस छीनकर नाव में फेंक दिया और कहा, ''मेरा भी कुछ दोष नहीं है भाई, मैं भी नवीन भइया को लाना नहीं चाहता था। परन्तु, अब अकेले लौटा भी नहीं जा सकता, मुझे तो जाना होगा।''

परन्तु मुझे भी तो जाना चाहिए। क्योंकि, पहले ही एक दफे कह चुका हूँ कि मैं स्वयं भी बिल्कुतल डरपोक न था। अतएव बाँस को फिर उठाकर मैं खड़ा हो गया और वाद-विवाद किये बगैर ही हम दोनों आगे चल दिए। इन्द्र बोला, ''बालू पर दौड़ा नहीं जा सकता-खबरदार, दौड़ने की कोशिश न करना। नहीं तो, पानी में जा गिरेगा।''

सामने ही एक बालू का टीला था। उसे पार करते ही दीख पड़ा, बहुत दूर पर पानी के किनारे छह-सात कुत्ते खड़े भौंक रहे हैं। जहाँ तक नजर गयी वहाँ तक थोड़े से कुत्तों को छोड़कर, बाघ तो क्या, कोई शृंगाल भी नहीं दिखाई दिया। सावधानी से कुछ देर और अग्रसर होते ही जान पड़ा कि कोई एक काली-सी वस्तु पानी में पड़ी है और वे उसका पहरा दे रहे हैं। इन्द्र चिल्ला उठा, ''नूतन भइया!''

नूतन भइया गले तक पानी में खड़े हुए अस्पष्ट स्वर से रो पड़े, ''यहाँ हूँ मैं!''

हम दोनों प्राणपण से दौड़ पड़े, कुत्ते हटकर खड़े हो गये, और इन्द्र झप से कूद कर गले तक डूबे हुए मूर्च्छित प्राय: अपने दर्जीपाड़े के मौसेरे भाई को खींचकर किनारे पर उठा लाया। उस समय भी उनके एक पैर में बहुमूल्य पम्प-शू, शरीर पर ओवरकोट, हाथ में दस्ताने, गले में गुलूबन्द और सिर पर टोपी थी। भागने के कारण फूलकर वे ढोल हो गये थे! हमारे जाने पर उन्होंने हाथ-ताली देकर जो बढ़िया तान छेड़ दी थी, बहुत सम्भव है, उसी संगीत की तान से आकृष्ट होकर, गाँव के कुत्ते दल बाँधकर वहाँ आ उपस्थित हुए थे! और उस अभूतपूर्व गीत और आदरपूर्ण पोशाक की छटा से विभ्रान्त होकर इस महामान्य व्यक्ति के पीछे पड़ गये थे। पीछा छुड़ाने के लिए इतनी दूर भागने पर भी आत्मरक्षा का और कोई उपाय न खोज सकने के कारण अन्त में झप से पानी में कूद पड़े; और इस दुर्दान्त शीत की रात में, तुषार-शीतल जल में आधे घण्टे गले तक डूबे रहकर अपने पूर्वकृत् पापों का प्रायश्चित करते रहे। किन्तु, प्रायश्चित के संकट को दूर करके उन्हें फिर से चंगा करने में भी हमें कम मेहनत नहीं उठानी पड़ी। परन्तु सबसे बढ़कर अचरज की बात यह हुई की बाबू साहब ने सूखे मैं पैर रखते ही पहली बात यही पूछी, ''हमारा एक पम्प-शू कहाँ गया?''

''वह वहाँ पड़ा हुआ है।'' यह सुनते ही वे सारे दु:ख-क्लेश भूलकर उसे शीघ्र ही उठा लेने के लिए सीधे खड़े हो गये। इसके बाद, कोट के लिए गुलूबन्द के लिए, मोजों के लिए, दस्तानों के लिए, पारी-पारी से एक-एक के लिए शोक प्रकाशित करने लगे और उस रात को जब तक हम लोग लौटकर अपने घाट पर नहीं पहुँच गये, तब तक यही कहकर हमारा तिरस्कार करते रहे कि क्यों हमने मूर्खों की तरह उनके शरीर से उन सब चीजों को जल्दी-जल्दी उतार डाला था। न उतारा होता तो इस तरह धूल लगकर वे मिट्टी न हो जाते। हम दोनों असभ्य लोगों में रहने वाले ग्रामीण किसान हैं, हम लोगों ने इन चीजों को पहले कभी ऑंख से देखा तक नहीं होगा- यह सब वे बराबर कहते रहे। जिस देह पर, इसके पहले, एक छींटा भी जल गिरने से वे व्याकुल हो उठते थे, कपड़े-लत्तों के शोक में वे उस देह को भी भूल गये। उपलक्ष्य वस्तु असल वस्तु से भी किस तरह कई गुनी अधिक होकर उसे पार कर जाती है, यह बात, यदि इन जैसे लोगों के संसर्ग में न आया जाए, तो इस तरह प्रत्यक्ष नहीं हो सकती।

रात को दो बजे बाद हमारी डोंगी घाट पर आ लगी। मेरे जिस रैपर की विकट बूसे कलकत्ते के बाबू साहब, इसके पहले, बेहोश हुए जाते थे, उसी को अपने शरीर पर डालकर- उसी की अविश्रान्त निन्दा करते हुए तथा पैर पोंछने में भी घृणा होती है, यह बार-बार सुनाते हुए भी- और इन्द्र की अलवान ओढ़कर, उस यात्रा में आत्म रक्षा करते हुए घर गये। कुछ भी हो, हम लोंगों पर दया करके जो वे व्याघ्र-कवलित हुए बगैर सशरीर वापिस लौट आए, उनके उसी अनुग्रह के आनन्द से हम परिपूर्ण हो रहे थे। इतने उपद्रव-अत्याचार को हँसते हुए सहन करके और आज नाव पर चढ़ने के शौक की परिसमाप्ति करके, उस दुर्जय शीत की रात में, केवल एक धोती-भर का सहारा लिये हुए, काँपते-काँपते, हम लोग घर में लौट आए।

 
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लिखने बैठते ही बहुत दफा मैं आश्चर्य से सोचता हूँ कि इस तरह की बेसिलसिले घटनाएँ मेरे मन में निपुणता से किसने सजा रक्खी हैं? जिस ढंग से मैं लिख रहा हूँ इस ढंग से वे एक-के बाद एक श्रृंखलाबद्ध तो घटित हुई नहीं। और फिर साँकल की क्या सभी कड़ियाँ साबुत बनी हुई हैं? सो भी नहीं। मुझे मालूम है कि कितनी ही घटनाएँ तो विस्मृत हो चुकी हैं, किन्तु फिर भी तो श्रृंखला नहीं टूटती। तो कौन फिर उन्हें नूतन करके जोड़ रखता है?

और भी एक अचरज की बात है। पण्डित लोग कहा करते हैं कि बड़ों के बोझ से छोटे पिस जाते हैं। परन्तु यदि ऐसा ही होता तो फिर जीवन की प्रधन और मुख्य घटनाएँ तो अवश्य ही याद रहने की चीजें होतीं। परन्तु सो भी तो नहीं देखता हूँ। बचपन की बातें कहते समय एकाएक मैंने देखा कि स्मृति-मन्दिर में बहुत-सी तुच्छ क्षुद्र घटनाएँ भी, न जाने कैसे, बहुत बड़ी होकर ठाठ से बैठ गयी हैं और बड़ी घटनाएँ छोटी बनकर न जाने कब कहाँ झड़कर गिर गयी हैं। इसलिए बोलते समय भी यही बात चरितार्थ होती है। तुच्छ बातें बड़ी हो कर दिखाई देती हैं, और बड़ी याद भी नहीं आतीं। और फिर ऐसा क्यों होता है इसकी कैफियत भी पाठकों को मैं नहीं दे सकता। जो होता है, सिर्फ उसे ही मैंने बता दिया है।

इसी प्रकार की एक तुच्छ-सी बात है जो मन के भीतर इतने दिनों तक चुपचाप छिपी रहकर, इतनी बड़ी हो उठी है कि आज उसका पता पाकर मैं स्वयं भी बहुत विस्मित हो रहा हूँ। उसी बात को आज मैं पाठकों को सुनाऊँगा। किन्तु, बात ठीक-ठीक क्या है सो, जब तक कि मैं उसका पूरा परिचय न दे दूँ तब तक, उसका रूप किसी तरह भी स्पष्ट न होगा! क्योंकि, यदि मैं प्रारम्भ में ही कह दूँ कि वह एक 'प्रेम का इतिहास' है- तो उससे यद्यपि मिथ्या भाषण का पाप न होगा, किन्तु वह व्यापार अपनी चेष्टा से जितना बड़ा हो उठा है, मेरी भाषा शायद उसको भी उल्लंघन कर जायेगी। इसलिए बहुत ही सावधन होकर कहने की जरूरत है।

वह बहुत बाद की बात है। जीजी की स्मृति भी उस समय धुँधली हो गयी थी। जिनके मुख की याद मन में लाते ही, न मालूम कैसे, प्रथम यौवन की उच्छृंखलता अपने आप अपना सिर झुका लेती है, उन जीजी की याद उस समय उस तरह नहीं आती थी। यह उसी समय की कहानी है। एक राजा के लड़के के द्वारा निमन्त्रित होकर मैं उसकी शिकार-पार्टी में जाकर शामिल हुआ था। उसके साथ बहुत समय तक स्कूल में पढ़ा था, गुपचुप अनेक बार उसके गणित के सवाल हल कर दिए थे- इसीलिए वह मुझे खूब चाहता था। इसके बाद एन्ट्रेंस क्लास से हम दोनों अलग हो गये। मैं जानता हूँ कि राजाओं के लड़कों की स्मरण-शक्ति कम हुआ करती है, किन्तु यह नहीं सोचा था कि वह मेरा स्मरण करके पत्र-व्यवहार करना शुरू कर देगा। बीच में एक दिन उससे एकाएक मुलाकात हो गयी। उसी समय वह बालिग हुआ था। बहुत-से जमा किये हुए रुपये उसके हाथ लगे और उसके बा... इत्यादि इत्यादि। राजा के कानों में बात पहुँची- अतिरंजित होकर ही पहुँची, कि राइफल चलाने में मैं बेजोड़ हूँ, तथा और भी कितने ही तरह के गुणों से मैं, इस बीच में ही, मण्डित हो गया हूँ कि जिनसे मैं एकमात्र बालिग राजपुत्र का अन्तरंग मित्र होने के लिए सर्वथा योग्य हूँ। आत्मीय बन्धु-बान्धव तो अपने आदमी की प्रशंसा कुछ बढ़ा-चढ़ाकर ही करते हैं, नहीं तो सचमुच ही, इतनी विद्याएँ इतने अधिक परिमाण में मैं उस छोटी-सी उम्र में ही अर्जित करने में समर्थ हो गया था; यह अहंकार मुझे शोभा नहीं देता। कम से कम कुछ विनय रखना अच्छा है खैर, जाने दो इस बात को। शास्त्रकारों ने कहा है कि राजे-रजवाड़ों के सादर आह्नान की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हिन्दू का लड़का ठहरा, शास्त्र अमान्य तो कर नहीं सकता था, इसलिए मैं चला गया। स्टेशन से दस-बारह कोस हाथी पर बैठकर गया। देखा, बेशक राजपुत्र के बालिग होने के सब लक्षण मौजूद हैं! कोई पाँच तम्बू गड़े हुए हैं, एक स्वयं उनका, एक मित्रों का, एक नौकरों का और एक रसोई का। इनके सिवाय और एक तम्बू कुछ फासले पर था- उसके दो हिस्से करके उनमें दो वेश्याएँ और उनके साजिन्दे अवजमाए हैं।

संध्यार हो चुकी है। प्रवेश करते ही मैं जान गया कि राजकुमार के खास कमरे में बहुत देर से संगीत की बैठक जमी हुई है। राजकुमार ने बड़े आदर से मेरा स्वागत किया यहाँ तक कि आदर के अतिरेक से खड़े होने को तैयार होकर वे तकिये के सहारे लेट गये! मित्र दोस्त, विह्वल-कण्ठ से आइए, आइए, पधारिए, कहकर संवर्धन करने लगे। मैं सर्वथा अपरिचित था। किन्तु वह, उन लोगों की जो अवस्था थी उससे, अपरिचय के कारण रुकने वाली नहीं थी।

ये 'बाईजी' पटने से, बहुत-सा रुपया पाने की शर्त पर, दो सप्ताह के लिए आई थीं। इस काम में राजकुमार ने जिस विवेचना और विलक्षणता का परिचय दिया था उसकी तारीफ तो करनी ही होगी। बाईजी, खूब सुन्दर, सुकण्ठ और गाने में निपुण थीं।

मेरे प्रवेश करते ही गाना थम गया। इसके बाद समयोचित वार्तालाप और अदब-कायदे का कार्य समाप्त होने में भी कुछ समय चला गया। राजकुमार ने अनुग्रह करके मुझसे गाने की फरमाइश करने का अनुरोध किया। राजाज्ञा पाकर पहले तो मैं अत्यन्त कुण्ठित हो उठा, किन्तु थोड़ी ही देर में मालूम हो गया कि संगीत की उस मजलिस में, सिर्फ मैं ही कुछ धुँधला-सा देख सकता हूँ और सब ही छछूँदर के माफिक अन्धे हैं।

बाईजी खिल उठीं। पैसे के लोभ से बहुत-से काम किये जा सकते हैं, सो मैं जानता था; किन्तु, इन निराट मूर्खों के दरबार में वीणा बजाना वास्तव में ही इतनी देर तक, उसे बड़ा कठिन मालूम हो रहा था। इस दफे एक समझदार व्यक्ति पाकर मानो वे बच गयीं। इसके बाद, रात को देर तक, मानो केवल मेरे लिए ही, उन्होंने अपनी समस्त विद्या, समस्त सौन्दर्य और कण्ठ के समस्त माधुर्य में हमारे चारों तरफ की उस समस्त कदर्न्य मदोन्मत्ता को डुबा दिया और अन्त में वे स्तब्ध हो गयीं।

बाईजी पटने की रहने वाली थीं। नाम था 'प्यारी'। उस रात्रि को उन्होंने जिस तरह अपनी सारी शक्ति लगाकर गाना सुनाया उस तरह शायद पहले कभी नहीं सुनाया होगा॥ मैं तो मुग्ध हो गया था। गाना बन्द होते ही मेरे मुँह से यही निकला- ''वाह, खूब!''

प्यारी ने मुँह नीचा करके हँस दिया। इसके बाद दोनों हाथों को मस्तक पर लगाकर प्रणाम किया- सलाम नहीं। मजलिस उस रात के लिए खत्म हो गयी।

उस समय दर्शकों में कोई सो रहा था, कोई तन्द्रा में था और अधिकांश बेहोश थे। अपने तम्बू में जाने के लिए बाईजी सब सदलबल बाहर निकल रही थीं, तब मैं आनन्द के अतिरेक से हिन्दी में बोल उठा-''बाईजी मेरा, बड़ा सौभाग्य है कि तुम्हारा गाना रोज दो सप्ताह तक सुनने को मिलेगा।'' बाईजी पहले तो ठिठककर खड़ी हो रहीं, पर दूसरे ही क्षण कुछ नजदीक आकर अत्यन्त कोमल कण्ठ से परिष्कृत बंगला में बोलीं, ''रुपये लिये हैं, सो मुझे तो गाना ही पड़ेगा; परन्तु क्या आप भी इन पन्द्रह सोलह दिनों तक इनकी मुसाहबी करते रहेंगे? जाइए, कल ही आप अपने घर चले जाइए।''

यह बात सुनकर हतबुद्धि-सा होकर मैं मानो काठ हो गया और क्या जवाब दूँ, यह ठीक कर सकने के पहले ही देखा कि बाईजी तम्बू के बाहर हो गयी हैं।

सुबह शोर गुल मचाकर कुमार साहब शिकार के लिए बाहर निकले। मद्य-मांस की तैयारी ही सबसे अधिक थी। साथ में दस-बारह शिकारी नौकर थे। पन्द्रह बन्दूकें थीं- जिसमें छ: राइफलें थीं। स्थान था एक अधसूखी नदी के दोनों किनारे। इस पार गाँव था और उस पार रेत का टीला। इस पार कोस भर तक बड़े-बड़े सेमर के वृक्ष थे और उस पार रेती के ऊपर जगह-जगह काँस और कुशों के झुरमुट। यहाँ ही उन पन्द्रह बन्दूकों को लेकर शिकार किया जायेगा। सेमर के वृक्षों पर मुझे कबूतर की जाति के पक्षी दीख पड़े और अधसूखी नदी के मोड़ के पास ऐसा जान पड़ा कि दो पक्षी, चकवा-चकई, तैर रहे हैं।

कौन-किस ओर जाय, इस बात पर अत्यन्त उत्साह से परामर्श करते-करते सब ही ने दो-दो प्याले चढ़ाकर देह और मन को वीरों की तरह कर लिया। मैंने बन्दूक नीचे रख दी। एक तो बाईजी के व्यंग्य की चोट खाकर रात से ही मन विकल हो रहा था, उस पर यह शिकार का क्षेत्र देखकर तो सारा शरीर जल उठा।

कुमार ने पूछा, ''क्यों जी कान्त, तुम तो बड़े गुमसुम हो रहे हो? अरे यह क्या! बन्दूक ही रख दी!''

''मैं पक्षियों को नहीं मारता।''

''यह क्या जी? क्यों, क्यों?''

''मुँह पर रेख निकलने के बाद से मैंने छर्रेवाली बन्दूक नहीं चलाई- मैं उसे चलाना भी भूल गया हूँ।''

कुमार साहब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गये। किन्तु उस हँसी का द्रव्य-गुण से कितना सम्बन्ध था, यह बात अवश्य दूसरी है।

सूरज के ऑंख-मुँह लाल हो उठे। वे इस दल के प्रधन शिकारी और राजपुत्र के प्रिय पार्श्वचर थे। उनके अचूक निशाने की ख्याति मैंने आते ही सुन ली थी। वे रुष्ट होकर बोले, ''चिड़ियों का शिकार क्या कुछ शर्म की बात है?''

मेरा मिजाज भी ठिकाने पर नहीं था, इसलिए जवाब दिया, ''सबके लिए नहीं, परन्तु मेरे लिए तो है! खैर! कुमार साहब, मेरी तबियत ठीक नहीं है।'' कहकर मैं तम्बू में लौट आया। इस पर कौन हँसा, किसने ऑंखें मिचकाईं। किसने मुँह बनाया, सो मैंने नजर उठाकर भी नहीं देखा।

तम्बू में लौटकर मैं फर्श पर चित्त लेटा ही था और एक प्याला चाय तैयार करने का आदेश देकर एक सिगरेट पी ही रहा था कि बैरे ने आकर अदब के साथ कहा, ''बाईजी आपसे मिलना चाहती हैं।'' ठीक इसी बात की मैं आशा कर रहा था और आशंका भी। पूछा, ''क्यों मिलना चाहती हैं?''

''सो तो मैं नहीं जानता।''

''तुम कौन हो?''

''मैं बाईजी का खानसामा हूँ।''

''बंगाली हो?''

''जी हाँ, जाति का नाई हूँ। नाम मेरा रतन है।''

''बाईजी हिन्दू हैं?''

रतन हँसकर बोला, ''न होतीं तो मैं कैसे रहता बाबू?''

मुझे साथ ले जाकर और तम्बू का दरवाजा दिखाकर रतन चला गया। पर्दा उठाकर भीतर देखा कि बाईजी अकेली बैठी हुई प्रतीक्षा कर रही हैं। कल रात को पेशवाज और ओढ़नी के कारण मैं ठीक तौर से पहिचान न सका था, परन्तु आज देखते ही पहिचान लिया कि हो कोई; पर बाईजी हैं बंगाली की ही लड़की। बाईजी गरद की साड़ी पहने हुए मूल्यवान कार्पेट के ऊपर बैठी थीं। भीगे हुए बिखरे बाल पीठ के ऊपर फैल रहे थे। हाथों के पास पान-दान रक्खा था और सामने हुक्का। मुझे देखकर उठ खड़ी हुयीं और हँसकर सामने का आसन दिखाते हुए बोलीं, ''बैठिए। आपके सामने अब और तमाखू नहीं पीऊँगी- अरे रतन, हुक्का उठा ले जा। यह क्या खड़े क्यों हैं! बैठ जाइए न!''

रतन आकर हुक्का ले गया। बाईजी बोलीं, ''आप तमाखू पीते हैं, यह मैं जानती हूँ; किन्तु दूँ किस तरह? और जगह आप चाहे जो करें, किन्तु मैं जान-बूझकर तो आपको अपना हुक्का दे न सकूँगी। अच्छा, चुरुट लाए देती हूँ। अरे ओ...''

''ठहरो, ठहरो, जरूरत नहीं। मेरी जेब में चुरुट हैं।''

''हैं? अच्छा तो ठण्डे होकर जरा बैठ जाइए, बहुत-सी बातें करनी हैं। भगवान कब किससे मिला देते हैं, सो कोई नहीं कह सकता, यह स्वप्न में भी अगोचर है। शिकार के लिए गये थे, एकाएक लौट क्यों आए?''

''तबीयत न लगी।''

''न लगने की ही बात है। कैसी निष्ठुर है यह पुरुषों की जात। निरर्थक जीव-हत्या करने में इन्हें क्या मजा आता है सो ये ही जानें। बाबूजी तो अच्छे हैं न?''

''बाबूजी का स्वर्गवास हो गया।''

''हैं, स्वर्गवास हो गया! और माँ?''

''वे तो उनसे भी पहले चल बसी थीं।''

''ओह-तभी तो!'' कहकर बाईजी एक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर मेरी ओर देखती रह गयीं। एक दफा तो जान पड़ा मानो उनकी ऑंखें छलछला आयीं हैं, किन्तु, शायद वह मेरी भूल हो। परन्तु, दूसरे ही क्षण जब वे बोलीं तब भूल के लिए कोई जगह न रही। उस मुखरा नारी का चंचल और परिहास लघु कण्ठस्वर सचमुच ही मृदु और आर्द्र हो उठा था। बोलीं, ''तो फिर यों कहो कि अब तुम्हारा जतन करने वाला कोई न रहा। बुआजी के पास ही रहते हो न? नहीं तो, और फिर कहाँ रहोगे? ब्याह हुआ नहीं, यह तो मैं देख ही रही हूँ। पढ़ते-लिखते हो? या वह भी इसके साथ ही समाप्त कर दिया?''

अब तक तो मैं उसके कुतूहल और प्रश्नमाला को भरसक बरदाश्त करता रहा। किन्तु न जाने क्यों पिछली बात मानो मुझे एकाएक असह्य हो उठी। मैं खीझकर रूखे स्वर में बोल उठा, ''अच्छा, कौन हो तुम? तुम्हें जीवन में कहाँ देखा है, यह तो याद आता नहीं। मेरे सम्बन्ध में इतनी बातें तुम जानना ही क्यों चाहती हो और जानने से तुम्हें लाभ क्या है?''

बाईजी को गुस्सा न आया, वे हँसकर बोलीं, ''लाभ-हानि ही क्या संसार में सब कुछ है? माया, ममता, प्यार-मुहब्बत कुछ नहीं? मेरा नाम है प्यारी, किन्तु जब मेरा मुख देखकर भी न पहिचान सके, तब लड़कपन का नाम सुनकर भी मुझे कैसे पहिचान सकोगे? इसके सिवाय मैं तुम्हारे उस गाँव की लड़की भी तो नहीं हूँ।''

''अच्छा तुम्हारा घर कहाँ है?''

''नहीं, सो मैं नहीं बताऊँगी।''

''तो फिर, अपने बाप का नाम ही बताओ?''

बाईजी जीभ काटकर बोलीं, ''वे स्वर्ग चले गये हैं-राम-राम, क्या उनका नाम इस मुँह से उच्चारण कर सकती हूँ?''

मैं अधीर हो उठा। बोला, ''यदि नहीं कर सकतीं तो फिर मुझे तुमने पहिचाना किस तरह, यही बताओ? शायद यह बतलाने में कोई दोष न होगा।''

प्यारी ने मेरे मन के भाव को लक्ष्य करके मुसकरा दिया। कहा, ''नहीं, इसमें कुछ दोष नहीं है, परन्तु क्या तुम विश्वास कर सकोगे?''

''कह देखो न।''

प्यारी ने कहा, ''तुम्हें पहिचाना या महाराज, दुर्बुद्धि की मार से- और किस तरह? तुमने मेरी ऑंखों से जितना पानी बहवाया है, सौभाग्य से सूर्यदेव ने उसे सुखा दिया है। नहीं तो ऑंखों के उस जल से एक तालाब भर गया होता। पूछती हूँ, क्या इस पर विश्वास कर सकते हो?''

सचमुच ही मैं विश्वास न कर सका। परन्तु वह मेरी भूल थी। उस समय यह किसी तरह खयाल भी न आया कि प्यारी के होठों की गठन कुछ इस किस्म की है कि मानो हर बात वह मजाक में ही कहती है और मन ही मन हँसती हैं। मैं चुप रह गया। वह भी कुछ देर तक चुप रहकर इस बार सचमुच ही हँस पड़ी। परन्तु, इतनी देर में न जाने किस तरह मुझे जान पड़ा कि उसने अपनी लज्जित अवस्था को मानो सँभाल लिया है। हँसकर कहा, ''नहीं महाराज, तुम्हें जितना भोला समझा था उतने भोले तुम नहीं हो। यह जो मेरा कहने का ढंग है, इसे तुमने बराबर समझ लिया है। किन्तु, यह भी कहती हूँ कि तुम्हारी अपेक्षा अधिक बुद्धिमान भी इस बात पर अविश्वास नहीं कर सकते। सो यदि आप इतने अधिक बुद्धिमान हैं तो यह मुसाहबी का व्यवसाय आपने किसलिए ग्रहण किया है? यह नौकरी तो तुम्हारे जैसे आदमी से होने की नहीं। जाओ, यहाँ से चटपट खिसक जाओ!''

क्रोध के मारे मेरा सर्वांग जल उठा, किन्तु मैंने उसे प्रकट नहीं होने दिया। सहज भाव से कहा, ''नौकरी जितने दिन हो, उतने ही दिन अच्छी। बैठे से बेगार भली- समझीं न! अच्छा, अब मैं जाता हूँ। बाहर के लोग शायद और ही कुछ समझ बैठें।''

प्यारी बोली, ''समझ बैठें, तो यह तुम्हारे लिए सौभाग्य की बात है महाराज, यह क्या कोई अफसोस की बात है?''

उत्तर दिये बिना ही जब मैं द्वारपर आ खड़ा हुआ तब वह अकस्मात् हँसी की फुहार छोड़कर कह उठी, ''किन्तु देखो बाबू, मेरी वह ऑंखों के ऑंसुओं की बात मत भूल जाना। दोस्तों में, कुमार साहब के दरबार में, प्रकट कर दोगे तो सम्भव है तुम्हारी तकदीर खुल जाय।''

मैं उत्तर दिये बिना ही बाहर हो गया, परन्तु उस निर्लज्जा की वह हँसी और यह कदर्य परिहास मेरे सर्वांग में व्याप्त होकर बिच्छू के काँटे की तरह जलने लगा।

अपने स्थान पर आकर, एक प्याला चाय पीकर और चुरुट मुँह में दबाकर अपने को भरसक ठण्डा करके मैं सोचने लगा- यह कौन है? मैं अपनी पाँच-छ: वर्ष की उम्र तक की सब घटनाएँ स्पष्ट तौर से याद कर सकता हूँ। किन्तु अतीत में जितनी भी दूर तक दृष्टि जा सकती थी, उतनी दूर तक मैंने खूब छान-बीन कर देखा, कहीं भी इस प्यारी को नहीं खोज पाया। फिर भी, यह मुझे खूब पहचानती है। बुआ तक की बात जानती है। मैं दरिद्र हूँ, सो भी इससे अज्ञात नहीं है। इसीलिए, और तो कोई गहरी चाल इसमें हो नहीं सकती; फिर भी, जिस तरह हो, मुझे यहाँ से भगा देना चाहती है। परन्तु यह किसलिए? मेरे यहाँ रहने न रहने से इसे क्या? बातों ही बातों में उस समय इसने कहा था- संसार में लाभ-हानि ही क्या सब कुछ है? प्यार-मुहब्बत कुछ नहीं है? मैंने जिसे पहले कभी ऑंख से भी नहीं देखा, उसके मुँह की यह बात याद करके भी मुझे हँसी आ गयी। किन्तु सारी बातचीत को दबाकर, उसका आखिरी व्यंग्य ही मानो मुझे लगातार छेदने लगा।

संध्याय के समय शिकारियों का दल लौट आया। नौकरों के मुँह से सुना कि आठ पक्षी मारकर लाय गये हैं। कुमार ने मुझे बुला भेजा। तबीयत ठीक न होने का बहाना करके बिस्तरों पर ही मैं पड़ रहा; और इसी तरह पड़े-पड़े रात को देर तक प्यारी का गाना और शराबियों की वाह-वाह सुनता रहा।

इसके बाद तीन-चार दिन प्राय: एक ही तरह से कट गये। 'प्राय:' कहता हूँ, क्योंकि, सिर्फ शिकार को छोड़कर और सब बातें रोज एक-सी ही होती थीं। प्यारी का अभिशाप मानो फल गया हो- प्राणी-हत्या के प्रति किसी में कुछ भी उत्साह मैंने नहीं देखा। मानो कोई तम्बू के बाहर भी न निकलना चाहता हो। फिर भी मुझे उन्होंने नहीं छोड़ा। मेरे वहाँ से भाग जाने के लिए कोई विशेष कारण हो, सो बात न थी; किन्तु इस बाईजी के प्रति मुझे मानो घोर अरुचि हो गयी। वह जब हाजिर होती, तब मानो मुझे कोई मार रहा हो ऐसा लगता- उठकर वहाँ से जब चला जाता तभी कुछ शान्ति मिलती। उठ न सकता, तो फिर और किसी ओर मुँह फिराकर, किसी के भी साथ, बातचीत करते हुए अन्यमनस्क होने की चेष्टा किया करता। इस पर भी वह हर समय मुझसे ऑंखें मिलाने की हजार तरह से चेष्टा किया करती, यह भी मैं अच्छी तरह अनुभव करता। शुरू में दो-तीन दिन उसने मुझे लक्ष्य करके परिहास करने की चेष्टा भी की; किन्तु, फिर मेरे भाव को देखकर वह बिल्कुरल सन्न हो रही।

शनिवार का दिन था। अब किसी तरह भी मैं ठहर नहीं सकता। खा-पी चुकने के बाद ही आज रवाना हो जाऊँगा, यह स्थिर हो जाने से आज सुबह से ही गाने-बजाने की बैठक जम गयी थी। थककर बाईजी ने गाना बन्द किया ही था कि हठात् सारी कहानियों से श्रेष्ठ भूतों की कहानी शुरू हो गयी। पल-भर में जो जहाँ था उसने वहीं से आग्रह के साथ वक्ता को घेर लिया।

पहले तो मैं लापरवाही से सुनता रहा। परन्तु अन्त में उद्विग्नज होकर बैठ गया। वक्ता थे गाँव के ही एक वृद्ध हिन्दुस्तानी महाशय। कहानी कैसे कहनी चाहिए सो वे जानते थे। वे कह रहे थे कि ''प्रेत-योनि के विषय में यदि किसी को सन्देह हो-तो वह आज, इस शनिवार की अमावस्या तिथि को, इस गाँव में आकर, अपने चक्षु-कर्णों का विवाद भंजन कर डाले। वह चाहे जिस जाति का, चाहे जैसा, आदमी हो और चाहे जितने आदमियों को साथ लेकर जाए, आज की रात उसका महाश्मशान को जाना निष्फल नहीं होगा। आज की घोर रात्रि में उग्र श्मशानचारी प्रेतात्मा को सिर्फ ऑंख से ही देखा जा सकता हो सो बात नहीं- उसका कण्ठस्वर भी सुना जा सकता है और इच्छा करने पर उससे बातचीत भी की जा सकती है।'' मैंने अपने बचपन की बातें याद करके हँस दिया। वृद्ध महाशय उसे लक्ष्य करके बोले, ''आप मेरे पास आइए।'' मैं उनके निकट खिसक गया। उन्होंने पूछा, ''आप विश्वास नहीं करते?''

''नहीं।''

''क्यों नहीं करते? नहीं करने का क्या कोई विशेष हेतु है?''

''नहीं।''

''तो फिर? इस गाँव में ही दो-एक ऐसे सिद्ध पुरुष हैं जिन्होंने अपनी ऑंखों देखा है। फिर भी जो आप विश्वास नहीं करते, मुँह पर हँसते हैं सो यह केवल दो पन्ने अंगरेजी पढ़ने का फल है। बंगाली लोग तो विशेष करके नास्तिक म्लेच्छ हो गये हैं।'' कहाँ की बात कहाँ आ पड़ी, देखकर मैं अवाक् हो गया। बोला, ''देखिए, इस सम्बन्ध में मैं तर्क नहीं करना चाहता। मेरा विश्वास मेरे पास है। मैं भले ही नास्तिक होऊँ, म्लेच्छ होऊँ- पर भूत नहीं मानता। जो कहते हैं कि हमने ऑंखों से देखा है वे या तो ठगे गये हैं, अथवा झूठे हैं, यही मेरा धारणा है।''

उस भले आदमी ने चट से मेरे दाहिने हाथ को पकड़कर कहा, ''क्या आप आज रात को श्मशान जा सकते है?'' मैं हँसकर बोला, ''जा सकता हूँ, बचपन से ही मैं अनेक रात्रियों में अनेक श्मशानों में गया हूँ।'' वृद्ध चिढ़कर बोल उठे, ''आप शेखी मत बघारिए बाबू।'' इतना कहकर उन्होंने उस श्मशान का, सारे श्रोताओं को स्तम्भित कर देने वाला, महाभयावह विवरण विगतवार कहना शुरू कर दिया। ''यह श्मशान कुछ ऐसा-वैसा स्थान नहीं है। यह महाश्मशान है। यहाँ पर हजारों नर-मुण्ड गिने जा सकते हैं। इस श्मशान में, हर रात को, महाभैरवी अपने साथियों सहित नर-मुण्डों से गेंद खेलती हैं और नृत्य करती हुई घूमती हैं। उनके खिलखिला कर हँसने के विकट शब्द से कितनी ही दफे, कितनी ही अविश्वासी अंगरेज जजों, मजिस्ट्रेटों के भी हृदय की धड़कन बन्द हो गयी है।'' इस किस्म की लोमहर्षक कहानी वे इस तरह से कहने लगे कि इतने लोगों के बीच, दिन के समय, तम्बू के भीतर बैठे रहने पर भी, बहुत से लोगों के सिर के बाल तक खड़े हो गये। तिरछी नजर से मैंने देखा कि प्यारी न जाने कब पास आकर बैठ गयी है और उन बातों को मानो सारे शरीर से निगल रही है।

इस तरह जब वह महाश्मशान का इतिहास समाप्त हुआ तब वक्ता ने अभिमान के साथ मेरी ओर कटाक्ष फेंककर प्रश्न किया, ''क्यों बाबू साहब, आप जाँयगे?''

''जाऊँगा क्यों नहीं?''

''जाओगे! अच्छा, आपकी मरजी। प्राण जाने पर-''

मैं हँसकर बोला, ''नहीं महाशय, नहीं। प्राण जाने पर भी तुम्हें दोष न दिया जायेगा, तुम इससे मत डरो। किन्तु बेजानी जगह में मैं भी तो खाली हाथ नहीं जाऊँगा- बन्दूक साथ जायेगी!''

आलोचना अत्यधिक तेज हो उठी है, यह देखकर मैं वहाँ से उठ गया। ''पक्षी मारने की तो हिम्मत नहीं पड़ती, बन्दूक की गोली से भूत मारेंगे साहब! बंगाली लोग अंगरेजी पढ़कर हिन्दू-शास्त्र थोड़े ही मानते हैं- ये मुर्गी तक तो खा जाते हैं- मुँह से ये लोग कितनी ही शेखी क्यों न मारें, काम के समय भाग खड़े होते हैं-एक धौंस पड़ते ही इनके दन्त कपाट लग जाते हैं!'' इस तरह की समालोचना शुरू हुई। अर्थात्, जिन सब सूक्ष्म युक्ति-तर्कों की अवधारणा करने से हमारे राजा रईसों को आनन्द मिलता है, और जो उनके मस्तिष्क को अतिक्रम नहीं कर जाते- अर्थात् वे स्वयं भी जिनमें घुसकर दो शब्द कह सकते हैं- ऐसे ही वे सब युक्तितर्क थे।

इन लोगों के दल में सिर्फ एक आदमी ऐसा था जिसने स्वीकार किया कि मैं शिकार करना नहीं जानता और जो साधारणत: बातचीत भी कम करता था, शराब भी कम पीता था। नाम था उसका पुरुषोत्तम। शाम को आकर उसने मुझे पकड़ लिया और कहा, ''मैं भी साथ चलूँगा- क्योंकि इसके पहले मैंने भी कभी भूत नहीं देखा। इसलिए, आज अब ऐसा अच्छा मौका मिला है, तब मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता।''- ऐसा कहकर वह खूब हँसने लगा। मैंने पूछा, ''तुम क्या भूत नहीं मानते?''

''बिल्कुील नहीं।''

''क्यों नहीं मानते?''

''भूत नहीं है, इसलिए नहीं मानता।'' इतना कहकर वह प्रचलित तर्क उठा-उठाकर बारम्बार अस्वीकार करने लगा। किन्तु, मैंने इतने सहज में उसे साथ ले जाना स्वीकार नहीं किया। क्योंकि, बहुत दिनों की जानकारी से मैंने जाना था कि, यह सब युक्ति-तर्क का व्यापार नहीं- यह तो संस्कार है। बुद्धि के द्वारा जो बिल्कुकल ही नहीं मानते, वे भी भय के स्थान पर आ पड़ने पर भय के मारे मूर्च्छित हो जाते हैं।

पुरुषोत्तम किन्तु इस तरह सहज में छोड़ने वाला नहीं था। वह लाँग कसकर एक पक्के बाँस की लकड़ी कन्धों पर रखकर बोला, ''श्रीकान्त बाबू, आपकी इच्छा हो तो भले ही आप बन्दूक ले चलें; किन्तु अपने हाथ में लाठी रहते, भूत हो चाहे प्रेम- मैं किसी को भी पास न फटकने दूँगा।''

''किन्तु वक्त पर हाथ में लाठी रहेगी भी?''

''ठीक इसी तरह रहेगी बाबू, आप उस समय देख लेना। कोस-भर का रास्ता है, रात को ग्यारह के भीतर ही रवाना हो जाना चाहिए।''

मैंने देखा, उसका आग्रह मानो कुछ अतिरिक्त-सा है।

जाने के लिए उस समय भी करीब घण्टे-भर की देर थी। मैं तम्बू के बाहर टहलकर इस विषय पर मन ही मन आन्दोलन करके, देख रहा था कि वस्तु वास्तव में क्या हो सकती है। इन सब विषयों में मैं जिसका शिष्य था, उसे भूत का भय बिल्कुसल नहीं था। लड़कपन की बातें याद आ रही थीं- उस रात्रि को जब इन्द्र ने कहा था, ''श्रीकान्त, मन ही मन राम-नाम लेता रह; वह लड़का मेरे पीछे बैठा हुआ है।'' केवल उसी दिन भय के मारे मैं बेहोश हो गया था, और किसी दिन नहीं। फिर डरने का मौका ही नहीं आया। किन्तु आज की बात सच हो, तो वह वस्तु है क्या? इन्द्र स्वयं भूत में विश्वास करता था। किन्तु उसने भी कभी ऑंखों से नहीं देखा। मैं भी अपने मन ही मन चाहे जितना अविश्वास क्यों न करूँ, स्थान और काल के प्रभाव से मेरे शरीर में उस समय सनसनी न पैदा हो, यह बात नहीं। सहसा सामने के उस दुर्भेद्य अमावस्या के अन्धकार की ओर देखकर मुझे एक और अमावस्या की रात की बात याद आ गयी। वह दिन भी ऐसा ही एक शनिवार था।

पाँच-छह वर्ष पहले, हमारी पड़ोसिन, हतभागिनी नीरू जीजी बाल विधवा होकर भी जब प्रसूति रोग से पीड़ित होकर और छह महीने तक दु:ख भोग भोगकर मरीं, तब उनकी मृत्यु-शय्या के पार्श्व में मेरे सिवा और कोई नहीं था। बाग के बीच एक मिट्टी के घर में वे अकेली रहती थीं। सब लोगों की सब तरह से रोग-शोक में, सम्पत्ति-विपत्ति में इतनी अधिक सेवा करने वाली, नि:स्वार्थ परोपकारिणी स्त्री मुहल्ले-भर में और कोई नहीं थी। कितनी स्त्रियों को लिखा-पढ़ाकर, सूई का काम सिखाकर और गृहस्थी के सब किस्म के दुरूह कार्य समझाकर, उन्होंने मनुष्य बना दिया था, इसकी कोई गिनती नहीं थी। अत्यन्त स्निग्धा शान्त-स्वभाव और चरित्र के कारण मुहल्ले के लोग भी उन्हें कुछ कम नहीं चाहते थे। किन्तु उन्हीं नीरू जीजी का जब तीस वर्ष की उम्र में हठात् पाँव फिसल गया और भगवान ने इस अत्यन्त कठिन व्याधि के आघात से उनका जीवनभर का ऊँचा मस्तक बिल्कुछल मिट्टी में मिला दिया, तब इस मुहल्ले के किसी भी आदमी ने उस दुर्भागिनी का उद्धार करने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। पाप-स्पर्श लेशहीन निर्मल हिन्दू समाज ने उस हतभागिनी के मुख के सामने ही अपने सब खिड़की-दरवाजे बन्द कर लिये, और जिस मुहल्ले में शायद एक भी आदमी ऐसा नहीं था जिसने कि किसी न किसी तरह नीरू जीजी के हाथ की प्रेमपूर्ण सेवा का उपयोग न किया हो, उसी मुहल्ले के एक कोने में, अपनी अन्तिम शय्या डालकर वह दुर्भागिनी, घृणा और लज्जा के मारे सिर नीचा किये हुये अकेली, एक-एक दिन गिनती हुई, सुदीर्घ छ: महीने तक बिना चिकित्सा के पड़ी-पड़ी अपने पैर फिसलने का प्रायश्चित करके, श्रावण महीने की एक आधी रात के समय, इस लोक को त्याग कर जिस लोक को चली गयी उसका ठीक-ठीक ब्यौरा चाहे जिस स्मार्ट पण्डित से पूछते ही जाना जा सकता है।

मेरी बुआ अत्यन्त गुप्त रीति से उनकी सहायता करती थीं, यह बात मैं और मेरे घर की एक बड़ी दासी के सिवा इस दुनिया में और कोई नहीं जानता था। बुआ एक दिन मुझे अकेले में बुलाकर बोलीं, ''भइया श्रीकान्त, तू तो इस तरह रोग-शोक में जाकर अनेकों की खबर लिया करता है; उस छोकरी को भी एकाध दफे क्यों नहीं देख आया करता?'' तब से मैं बराबर बीच-बीच में जाकर उन्हें देखा करता और बुआ के पैसों से यह चीज- वह चीज- खरीद कर दे आया करता। उनकी मृत्यु के समय केवल मैं ही अकेला उनके पास था। मरण-समय में ऐसा परिपूर्ण विकास और परिपूर्ण ज्ञान मैंने और किसी के नहीं देखा। विश्वास न करने पर भी, भय के मारे शरीर में जो सनसनी फैल जाती है, उसी के उदाहरण स्वरूप मैं यह घटना लिख रहा हूँ।

वह श्रावण की अमावस्या का दिन था। रात्रि के बारह बजने के बाद ऑंधी और पानी के प्रकोप से पृथ्वी मानो अपने स्थान से च्युत होने की तैयारी कर रही थी। सब खिड़की-दरवाजे बन्द थे- मैं खाट के पास ही एक बहुत पुरानी आधी टूटी हुई आराम-कुर्सी पर लेटा हुआ था। नीरू जीजी ने अपने स्वाभाविक मुक्त स्वर से मुझे अपने पास बुलाकर, हाथ उठाकर, मेरा कान अपने मुख के पास ले जाकर, धीरे से कहा, ''श्रीकान्त, तू अपने घर जा।''

''सो क्यों नीरू जीजी, ऐसे ऑंधी-पानी में?''

''रहने दे ऑंधी-पानी। प्राण तो पहले हैं।'' वे भ्रम में प्रलाप कर रही हैं, ऐसा समझकर मैं बोला, ''अच्छा जाता हूँ, पानी जरा थम जाने दो।'' नीरू जीजी अत्यन्त चिन्तित होकर बोल उठीं, ''नहीं, श्रीकान्त, तू जा, जा भाई, जा- अब थोड़ी भी देर मत ठहर- जल्दी भाग जा।'' इस दफा उनके कण्ठस्वर के भाव से मेरी छाती का भीतरी भाग काँप उठा। मैं बोला, ''मुझसे जाने के लिए क्यों कहती हो?''

प्रत्युत्तर में मेरा हाथ खींचकर और बन्द खिड़की की ओर लक्ष्य करके, वे चिल्ला उठीं, ''जायेगा नहीं, तो क्या जान दे देगा? देखता नहीं है, मुझे ले जाने के लिए वे काले-काले सिपाही आए हैं। तू यहाँ पर मौजूद है, इसीलिए वे खिड़की में से ही मुझे डरा रहे हैं।''

इसके बाद उन्होंने कहना शुरू किया, ''वे इस खाट के नीचे हैं, वे सिर के ऊपर हैं। वे मारने आ रहे हैं! यह लिया! वह पकड़ लिया!'' यह चीत्कार रात के अन्तिम समय में तब समाप्त हुआ जब कि उनके प्राण भी प्राय: शेष हो चुके थे।

उक्त घटना आज भी मेरी छाती के भीतर गहरी जमकर बैठी हुई है। उस रात्रि को मुझे डर तो लगा ही था- याद-सा आता है कि मानो कुछ चेहरे भी देखे थे। यह सच है कि इस समय उस घटना की याद आने से हँसी आती है; परन्तु, यदि मुझे उस समय इस बात पर असंशय विश्वास न होता, कि किवाड़ खोलकर बाहर होते ही मैं नीरू जीजी के काले-काले सिपाही-सन्तरियों की भीड़ में जरूर पड़ जाऊँगा, तो उस दिन, अमावस्या के उस घोर दुर्योग को तुच्छ करके भी शायद मैं भाग खड़ा होता। साथ ही यह सब कुछ भी नहीं है, कुछ भी न था, यह भी जानता था; और मरणासन्न व्यक्ति केवल निदारुण विकार की बेहोशी में ही यह प्रलाप कर रहा था, सो भी समझता था। इतने में-

''बाबू!''

चौंककर मैं घूमा, देखा, रतन है।

''क्या है रे?''

''बाईजी ने प्रणाम कहा है।''

जितना मैं विस्मित हुआ उतना ही खीझा भी। इतनी रात को अकस्मात् बुला भेजना केवल अत्यन्त अपमानकारक स्पर्धा ही मालूम हो, सो बात नहीं, गत तीन-चार दिनों के दोनों तरफ के व्यवहारों को याद करके भी यह प्रणाम कहला भेजना मानो मुझे बिल्कुील बेहूदा मालूम हुआ। किन्तु, इसके फलस्वरूप नौकर के सामने किसी तरह की उत्तेजना प्रकट न हो जाय; इस आशंका से अपने प्राणपण से सँभालकर मैंने कहा, ''आज मेरे पास समय नहीं है रतन, मुझे बाहर जाना है, कल मिल सकूँगा।''

रतन सिखाया-पढ़ाया नौकर था- अदब-कायदे में पक्का। अत्यन्त आदर भरे मृदु स्वर से बोला, ''बड़ी जरूरत है बाबूजी, एक दफे अपने कदमों की धूल देनी ही होगी। नहीं तो, बाईजी ने कहा है, वे स्वयं ही आ जाँयगी।''- सर्वनाश! इस तम्बू में इतनी रात को, इतने लोगों के सामने! मैं बोला, ''तू समझाकर कहना रतन, आज नहीं, कल सवेरे ही मिल लूँगा। आज तो मैं किसी भी तरह नहीं जा सकता।'' रतन बोला, ''तो फिर वे ही आएँगी बाबूजी, मैं गत पाँच वर्षों से देख रहा हूँ कि बाईजी की बात में कभी जरा भी फर्क नहीं पड़ता। आप नहीं चलेंगे तो वे निश्चय ही आवेंगी।''

इस अन्याय असंगत जिद को देखकर मैं एड़ी से चोटी तक जल उठा। बोला, ''अच्छा ठहरो, मैं आता हूँ।'' तम्बू भीतर देखा, वारुणी की कृपा से जागता कोई नहीं है। पुरुषोत्तम भी गम्भीर निद्रा में मग्न है। नौकरों के तम्बू में सिर्फ दो-चार आदमी जाग रहे हैं। झटपट बूट पहिनकर एक कोट शरीर पर डाल लिया। राइफल ठीक रखी ही थी। उसे हाथ में लेकर रतन के साथ-साथ बाईजी के तम्बू में पहुँचा। प्यारी सामने ही खड़ी थी। मुझे आपादमस्तक बार-बार देखती हुई, किसी तरह की भूमिका बाँधो बगैर ही, क्रुद्धस्वर में बोल उठी, ''मसान-वसान में तुम्हारा जाना न हो सकेगा-किसी तरह भी नहीं।''

बहुत ही आश्चर्यचकित होकर मैं बोला, ''क्यों?''

''क्यों और क्या? भूत-प्रेत क्या हैं नहीं, जो इस शनिवार की अमावस्या को तुम श्मशान जाओगे? क्या तुम अपने प्राणों को लेकर फिर लौट आ सकोगे वहाँ से?''

इतना कहकर प्यारी अकस्मात् रोने लगी और ऑंसुओं की अविरल धारा बहाने लगी। मैं विह्वल-सा होकर चुपचाप उसकी ओर देखता रह गया। क्या करूँ, क्या जवाब दूँ, कुछ सोच ही न सका। सोच न सकने में अचरज की बात ही क्या थी? जिससे जान नहीं, पहिचान नहीं, वह यदि हिताकांक्षा से आधी रात को बुलाकर ख़ामख्वाह रोना शुरू कर दे, तो कौन है ऐसा जो हत-बुद्धि न हो जाय! मेरा जवाब न पाकर प्यारी ने ऑंखें पोंछते हुए कहा, ''तुम क्या किसी दिन भी शान्त-शिष्ट नहीं होओगे? ऐसे हठी बने रहकर ही जीवन बिता दोगे? जाओ, देखूँ तुम कैसे जाते हो? मैं भी फिर तुम्हारे साथ चलूँगी।'' इतना कहकर उसने शाल उठाकर अपने शरीर पर डालने की तैयारी कर दी।

मैंने संक्षेप में कहा, ''अच्छा है चलो!'' मेरे इस छिपे हुए ताने से जल-भुनकर प्यारी बोली, ''आहा! देश-विदेश में तब तो तुम्हारी सुख्याति की सीमा-परिसीमा न रहेगी! बाबू शिकार खेलने के लिए आकर, एक नाचने वाली को साथ लेकर, आधी रात को भूत देखने गये थे! वाह! मैं पूछती हूँ, घर से क्या बिल्कुरल ही 'आउट' होकर आए हो? घृणा, विरिक्त, लाज-शरम आदि क्या कुछ भी नहीं रह गयी?'' यह कहते-कहते उसका तीव्र कण्ठ मानो आर्द्र होकर भारी हो गया। बोली, ''कभी तो तुम ऐसे नहीं थे। तुम्हारा इतना अध:पतन होगा, यह तो किसी ने भी कभी सोचा-समझा न था।'' उसकी पिछली बात पर और कोई समय होता तो मैं इतना खीझ उठता कि जिसका पार न रहता; परन्तु इस समय क्रोध नहीं आया। मन ही मन मुझे लगा कि प्यारी को मानो मैंने पहिचान लिया है। ऐसा क्यों मन में आया सो फिर कहूँगा। उस समय मैं बोला, ''लोगों के सोचने-समझने का मूल्य कितना है, सो तो तुम खुद भी जानती हो। तुम भी इतने अध:पतन के रास्ते जाओगी, क्या कभी किसी ने सोचा था?''

क्षण-भर के लिए प्यारी के मुख के ऊपर शरद ऋतु की बदली वाली चाँदनी के समान हँसी की एक सहज आभा दिखाई दे गयी। किन्तु वह क्षण-भर के लिए ही। दूसरे ही क्षण उसने डरती हुई आवाज से कहा, ''मेरे विषय में तुम क्या जानते हो? कौन हूँ मैं, बताओ?''

''तुम हो प्यारी।''

''सो तो सभी जानते हैं।''

''सब जो नहीं जानते, सो भी मैं जानता हूँ- उसे सुनकर क्या तुम खुश होओगी? यदि होती तो खुद ही अपना परिचय दे देतीं। किन्तु जब नहीं दिया है, तब मेरे मुँह से भी कोई बात नहीं सुन पाओगी। इस बीच सोचकर देखो, अपने आपको प्रकट करोगी कि नहीं? किन्तु अब और समय नहीं है- मैं जाता हूँ।''

प्यारी ने बिजली की सी तेजी के साथ मेरा रास्ता रोककर कहा, ''यदि न जाने दूँ, तो क्या जबरन चले जाओगे?''

''किन्तु, जाने ही क्यों न दोगी?''

प्यारी बोली, ''जाने दूँ? सचमुच क्या भूत नहीं होते जो तुम्हारे 'जाने दो' कहने से ही जाने दूँगी? मैं कहे देती हूँ कि मैं बात की बात में 'मैया री मैया' चिल्लाकर हाट लगा दूँगी।'' यह कहकर उसने बन्दूक छीन लेने की चेष्टा की। मैं एक कदम पीछे हट गया। कुछ क्षणों से मेरी खीझ हँसी के रूप में परिवर्तित हो रही थी। इस दफे खूब हँसकर कह दिया, ''सचमुच के भूत होते हैं कि नहीं, सो तो मैं नहीं जानता; परन्तु झूठ-मूठ के भूत हैं, यह जरूर जानता हूँ। वे सामने खड़े होकर बातचीत करते हैं, रास्ता रोकते हैं- ऐसे न जाने कितनी तरह के कीर्ति के काम करते हैं- और जरूरत पड़ने पर गर्दन दबोचकर खा भी जाते हैं!'' प्यारी मलिन हो गयी और क्षण-भर के लिए शायद सोच न सकी कि क्या कहे। इसके बाद बोली, ''यदि ऐसी बात है, तो जो तुम यह कहते हो कि तुमने मुझे पहिचान लिया, सो तुम्हारी भूल है। वे अनेक कीर्ति के काम करते हैं, यह सच है, किन्तु दबोचने के लिए रास्ता रोककर नहीं खड़े होते। उन्हें अपने पराए का बोध होता है।'' मैंने फिर भी हँसकर प्रश्न किया, ''यह तो हुई तुम्हारी खुद की बात, किन्तु तुम क्या भूत हो?''

 
प्यारी बोली, ''भूत ही तो हूँ, और नहीं तो क्या? जो लोग मरकर भी नहीं मरते, वे ही तो भूत हैं; यही तो कहने का मतलब है?'' थोड़ी देर ठहरकर वह स्वयं ही फिर कहने लगी, ''एक हिसाब से तो, जो मैं मर चुकी हूँ सो सत्य है। किन्तु सच हो चाहे झूठ, अपने मरने की बात मैंने प्रसिद्ध नहीं की, मामा के जरिए माँ ने फैलाई थी। सुनना चाहते हो सब हाल?'' मरने की यह बात सुनते ही मेरा संशय दूर हो गया। मैंने ठीक पहिचान लिया कि यह राजलक्ष्मी है। बहुत दिन पहले यह अपनी माता के संग तीर्थ-यात्रा करने गयी थी और फिर लौटकर नहीं आई। माँ ने गाँव में आकर यह बात प्रसिद्ध कर दी कि काशी में हैजे की बीमारी से वह मर गयी। उसे मैंने कभी देखा है, यह बात अवश्य ही मुझे याद न आ रही थी किन्तु उसकी एक आदत पर, मैं जबसे यहाँ आया था तभी से, ध्याहन दे रहा था। जब वह गुस्से में होती थी तब दाँतों के नीचे अधर दबा लिया करती थी। कभी कहीं किसी को मानो ठीक इसी तरह करते अनेक बार देखा है, केवल यही बात बार-बार मन में आने लगी। किन्तु वह कौन था, कहाँ देखा था; कब देखा था- सो कुछ भी याद नहीं आता था। वही राजलक्ष्मी ऐसी हो गयी है, यह देखकर मैं क्षण-भर के लिए अचरज से अभिभूत हो गया। मैं जब अपने गाँव के मनसा पण्डित की पाठशाला में सब छात्रों का सरदार था, तब इसके दो पुश्त के कुलीन बाप ने अपना एक और ब्याह करके इसको घर से निकाल दिया। पति के द्वारा परित्यक्ता माता, सुरलक्ष्मी और राजलक्ष्मी नामक दोनों कन्याओं को लेकर अपने बाप के घर चली आई। उम्र इसकी उस समय आठ-नौ की होगी और सुरलक्ष्मी की बारह-तेरह की। इसका रंग अवश्य ही खूब उजला था किन्तु मलेरिया और प्लीहा के मारे पेट मटके जैसा, हाथ पैर लकड़ी की तरह, सिर के बाल ताँबे के समान थे और कितने थे सो भी गिने जा सकते थे। मेरी मार के डर से यह लड़की करोंदों की झाड़ी में घुसकर करोंदों की माला गूँथ लाकर मुझे दिया करती थी। यदि वह माला किसी दिन छोटी होती तो, मैं पुराना पाठ पूछकर इसे जी भरकर चपतियाता था। मार खाकर यह लड़की होठ चबाती हुई गुमसुम होकर बैठ रहती, किन्तु किसी तरह भी यह नहीं कहती कि रोज करोंदे संग्रह करना उसके लिए कितना कठिन है। जो कुछ भी हो, इतने दिनों तक तो मैं यही समझता था कि वह मेरे भय से इतना क्लेश स्वीकार करती है; किन्तु आज मानो हठात् कुछ संशय उत्पन्न हुआ। खैर जाने दो। उसके बाद इसका विवाह हो गया। वह विवाह भी एक विचित्र व्यापार था। बेचारा मामा भानजियों के ब्याह की चिन्ता के मारे मरा जा रहा था। दैवात् कहीं से यह खबर आई कि विरंचि दत्त का रसोइया कुलीन की सन्तान है। इस कुलीन की सन्तान को दत्त महाशय बाँकुड़े से अपनी बदली होते समय साथ ही लिवा लाए थे। विरंचि दत्त के द्वार पर मामा धरना देकर पड़ गये- ब्राह्मण की जाति-रक्षा करनी ही होगी! इतने दिन तक तो सब यही जानते थे कि दत्त महाशय का रसोइया भोला भाला भला आदमी है परन्तु मतलब के समय देखा गया कि रसोइया महाराज की सांसारिक बुद्धि किसी से भी कम नहीं है। सिर्फ इक्यावन रुपये दहेज की बात सुनकर वह जोर से सिर हिलाकर बोला, ''इतने सस्ते में नहीं हो सकता महाशय- बाजार जाँच देखिए। पचास और एक रुपये में तो एक जोड़ी बड़े बकरे भी नहीं मिलते- और इतने में आप जमाई खोजते हैं! एक सौ और एक रुपये दो, तो एक बार इस पाटे पर और एक बार उस पाटे पर बैठकर दो फूल छोड़ दूँगा। दोनों ही बहिनें एक ही साथ 'पार' हो जाँयगी। क्या एक सौ रुपये- दो साँड़ खरीदने का खर्च-भी आप न देंगे?'' बात कुछ असंगत नहीं थी। फिर भी अनेक मोल-तोल और बड़ी सही सिफारिश के बाद सत्तर रुपये में तय होकर एक ही रात में एक साथ सुरलक्ष्मी और राजलक्ष्मी का विवाह हो गया। दो दिन बाद सत्तर रुपये नकद लेकर वह दो पुश्त का कुलीन जमाई बाँकुड़ा चल दिया। इसके बाद फिर किसी ने उसे नहीं देखा। डेढ़ेक वर्ष बाद प्लिहा के ज्वर से सुरलक्ष्मी मर गयी और उसके भी वर्ष-डेढ़ वर्ष पीछे इस राजलक्ष्मी ने काशी में मरकर शिवत्व प्राप्त किया। यही है प्यारी बाईजी का संक्षिप्त इतिहास।

बाईजी ने कहा, ''तुम क्या सोच रहे हो, बताऊँ?''

''क्या सोच रहा हूँ?''

''तुम सोच रहे हो- आहा! लड़कपन में मैंने इसे कितना कष्ट दिया है। काँटों के बन में भेजकर रोज-रोज करौंदे मँगवाया किया हूँ, और उसके बदले केवल मार-पीट ही करता रहा हूँ। मार खाकर यह गुपचुप हमेशा रोया ही की है, परन्तु चाहा कभी कुछ नहीं। आज यदि यह कुछ बात कहती है तो सुन ही न लूँ। न सही, न गया आज श्मशान को। यही न?''

मैं हँस पड़ा।

प्यारी ने भी हँसकर कहा, ''यह तो होना ही चाहिए। बचपन में जिससे एक दफा प्यार हो जाता है, क्या वह कभी भूलता है? वह यदि अनुरोध करे तो फिर क्या उसे पैर से ठोकर मारकर टाला जा सकता है? संसार में ऐसा निष्ठुर कौन है? चलो, थोड़ा बैठ लो, बहुत-सी बातें करनी हैं। रतन, बाबूजी के जूते तो खोल दे। अरे हँसते हो?''

''हँसता हूँ यह देखकर, कि तुम लोग मनुष्य को भुलाकर किस तरह वश में कर लिया करती हो।''

प्यारी ने भी हँस दिया बोली, ''यह देखकर हँसते हो! दूसरों को तो बातों में भुलाकर वश में किया जा सकता है; किन्तु, होश सँभालते ही स्वयं जिसके वश में रही हूँ, उसे भी क्या बातों में भुलाया जा सकता है? अच्छा आज तो वैसे मैं बात कर लेती हूँ, किन्तु उस समय हर रोज जब काँटों में क्षत-विक्षत होकर माला गूँथ देती थी; तब कितनी बात किया करती थी, कहो न? वह क्या तुम्हारी मार के डर से? यह बात भूलकर भी मन में मत लाना। राजलक्ष्मी ऐसी नहीं है। किन्तु राम! राम! तुम तो मुझे बिल्कुेल ही भूल गये थे, देखकर पहिचान भी न सके!'' यों कहकर हँसते ही, सिर हिलाने से उसके दोनों कानों के हीरे तक हिलकर हँस उठे।

मैंने कहा, ''मैंने तुम्हें मन में स्थान ही कब दिया था, जो भूलता नहीं? वरन् आज मैंने तुम्हें पहिचान लिया, यह देखकर मुझे खुद ही अचरज हो रहा है। अच्छा, बारह बज चुके- जाता हूँ।''

प्यारी का हँसता हुआ चेहरा पल-भर में बिल्कुनल फीका पड़ गया। तनिक सँभलकर उसने कहा, ''अच्छा, भूत-प्रेत मत मानों, किन्तु साँप-बिच्छू, बाघ-भालू, जंगली सूअर आदि भी तो वन-जंगल में अंधेरी रात में फिरते रहते हैं, उन्हें तो मानना चाहिए?''

मैंने कहा, ''इनको तो मैं मानता ही हूँ, और इनसे खूब सावधन रहकर चलता हूँ।''

मुझे जाने को उद्यत देखकर वह धीरे से बोली, ''तुम जिस धातु के बने आदमी हो, उससे मैं जानती थी कि तुम्हें अटका न सकूँगी। यह भय मुझे खूब ही हो रहा था, फिर भी मैंने सोचा कि रो-धोकर, हाथ-पैर जोड़कर, अन्त तक शायद तुम्हें रोक सकूँ। किन्तु देखती हूँ रोना ही सार रहा।'' मुझे जवाब देते न देख वह फिर बोली, ''अच्छा जाओ, पीछे लौटाकर अब और असगुन न करूँगी। किन्तु, यदि कुछ हो जायेगा तो इस विदेश में, पराई जगह, राजे-रजवाड़े या मित्र-दोस्त, कोई काम नहीं आवेंगे, तब मुझे ही भुगतना पड़ेगा। मुझे पहिचान नहीं सकते, यह मेरे मुँह पर ही कहकर तुम अपने पौरुष की डींग हाँककर चल दिए, किन्तु हमारा तो स्त्रियों का मन है! विपत्ति के समय मैं तो यह कह न सकूँगी कि ''मैं तुम्हें पहिचानती ही नहीं।'' यह कहकर उसने एक दीर्घ नि:श्वास दबा लिया। जाते-जाते मैंने लौटकर, खड़े होकर हँस दिया। न जाने क्यों मानो मुझे कुछ कष्ट का अनुभव हुआ। मैं बोला, ''अच्छा तो है बाईजी, यह तो मुझे एक बड़ा लाभ होगा। मेरा तो कोई कहीं नहीं है, तब ही तो मैं जान सकूँगा कि हाँ, मेरा भी कहीं कोई है- जो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!''

प्यारी बोली, ''सो क्या तुम जानते नहीं हो? एक सौ बार 'बाईजी' कहकर तुम मेरा चाहे जितना अपमान क्यों न करो, राजलक्ष्मी तुम्हें छोड़कर न जा सकेगी-यह बात क्या तुम मन ही मन नहीं समझ रहे हो? किन्तु यदि मैं छोड़कर जा सकती, तो अच्छा होता। तुम्हें एक सीख मिल जाती। किन्तु, कितनी बुरी है यह स्त्रियों की जाति। एक दफा भी किसी को प्यार किया कि मरी!''

मैं बोला, ''प्यारी, भले सन्यासी को भी भीख नहीं मिलती, जानती हो, क्यों?''

प्यारी बोली, ''जानती हूँ, किन्तु तुम्हारे इस व्यंग्य में इतनी धार नहीं रही है कि इससे तुम मुझे वेध सको। यह मेरा ईश्वरदत्त धन है। और, जब कि मुझे संसार में भले-बुरे तक का ज्ञान नहीं था; उस समय का यह है। आज का नहीं।'' मैं कुछ नरम होकर बोला, ''अच्छी बात है, चाहता हूँ कि आज मुझ पर कोई आफत आवे और तब तुम्हारे इस ईश्वर-दत्त धन की हाथों-हाथ जाँच हो जाये।''

प्यारी बोली, ''राम-राम! ऐसी बात मत कहो। अच्छे-भले लौट आओ- इस सच्चाई की जाँच करने की जरूरत नहीं है। मेरे ऐसे भाग कहाँ कि वक्त-मौके पर अपने हाथ हिला-डुलाकर तुम्हें स्वस्थ सबल कर सकूँ। यदि ऐसा हो तो समझूँगी कि इस जन्म के एक कर्त्तव्य को पूरा कर डाला।'' इतना कहकर उसने अपना मुँह फेरकर अपने ऑंसू छिपा लिये, यह हरीकेन के क्षीण प्रकाश में भी मैं अच्छी तरह जान गया।

''अच्छा, भगवान तुम्हारी इस साध को कभी किसी दिन पूरा करें,'' कहकर और अधिक देर न करके मैं तम्बू के बाहर आ खड़ा हुआ। कौन जानता था कि हँसी-हँसी में ही मुँह से एक प्रचण्ड सत्य बाहर निकल जायेगी।

तम्बू के भीतर से ऑंसुओं से रुँधे हुए कण्ठ से निकली हुई 'दुर्गा! दुर्गा!' की कातर पुकार कानों में आई और मैं तेज चाल से चल दिया।

मेरा सारा मन प्यारी की ही बातों से ढँक गया। कब मैं आम के बगीचे के बड़े अंधियारे मार्ग को पार कर गया, और कब नदी के किनारे के सरकारी बाँध के ऊपर आ खड़ा हुआ, यह मैं जान ही न सका। सारी राह सिर्फ यही एक बात सोचता-सोचता आया कि स्त्री-जाति का मन भी कैसा विराट अचिन्तनीय व्यापार है। इस पिलही के रोगवाली लड़की ने अपने मटके जैसे पेट और लकड़ी जैसे हाथ-पाँव लेकर, सबसे पहले किस समय मुझे चाहा था और करोंदों की माला से अपनी दरिद्र-पूजा को सम्पन्न किया था, सो मैं बिल्कुहल ही न जान सका। और आज जब मैं जान सका, तब मेरे अचरज का पार नहीं रहा। अचरज कुछ इसलिए भी नहीं था- उपन्यास नाटकों में बाल्य-प्रणय की अनेकों कथाएँ पढ़ी हैं- किन्तु जिस वस्तु को गर्व के साथ, अपनी ईश्वर दत्त सम्पत्ति कहकर प्रकट करते हुए भी वह कुण्ठित नहीं हुई, उसे उसने, इतने दिनों तक, अपने इस घृणित जीवन के सैकड़ों मिथ्या प्रणयाभिनयों के बीच, किस कोने में जीवित रख छोड़ा था? कहाँ से इसके लिए वह खुराक जुटाती रही? किस रास्ते से प्रवेश करके वह उसका लालन-पालन करती रही?

''बाप!''

मैं एकदम चौंक पड़ा। सामने ऑंख उठाकर देखा, भूरे रंग की बालू का विस्तीर्ण मैदान है और उसे चीरती हुई एक शीर्ण नदी की वक्र रेखा टेढ़ी-मेढ़ी होती हुई सुदूर में अन्तर्हित हो गयी है। समस्त मैदान में जगह-जगह काँस के पेड़ों के झुण्ड उग रहे हैं। अन्धकार में एकाएक जान पड़ा कि मानो ये सब एक-एक आदमी हैं, जो आज की इस भयंकर अमावस्या की रात्रि को प्रेतात्मा का नृत्य देखने के लिए आमन्त्रित होकर आए हैं और बालू के बिछे हुए फर्श पर मानो अपना अपना आसन ग्रहण करके सन्नाटे में प्रतीक्षा कर रहे हैं। सिर के ऊपर, घने काले आकाश में, संख्यातीत गृह-तारे भी, उत्सुकता के साथ अपनी ऑंखों को एक साथ खोले हुए ताक रहे हैं। वायु नहीं, शब्द नहीं, अपनी छाती के भीतर छोड़कर, जितनी दूर दृष्टि जाती थी वहाँ तक कहीं भी, प्राणों की जरा-सी भी आहट अनुभव करने की गुंजाइश नहीं। जो रात्रि-चर पक्षी 'बाप' कहकर थम गया, वह भी और कुछ नहीं बोला। मैं पश्चिम की ओर धीरे-धीरे चला। उसी ओर वह महाश्मशान था। एक दिन शिकार के लिए आकर, जिस सेमर के झाड़ों के झाड़ को देख गया था, कुछ दूर चलने पर उनके काले-काले डाल-पत्र दिखाई दिए। यही थे उस महाश्मशान के द्वारपाल। इन्हीं को पार करके आगे बढ़ना होगा। इसी समय से प्राणों की अस्पष्ट आहट मिलने लगी, परन्तु वह ऐसी नहीं थी जिससे कि चित्त कुछ प्रसन्न हो। कुछ और दूर चलने पर वह कुछ और साफ हुई। किसी माँ के 'कुम्भकर्णी निद्रा' में सो जाने पर उसका छोटा बच्चा, रोते-रोते अन्त में बिल्कुील निर्जीव-सा होकर, जिस प्रकार रह-रहकर रिरियाना शुरू कर देता है, ऐसा मालूम हुआ कि ठीक उसी तरह श्मशान के एकान्त में कोई रिरिया रहा है। मैं बाजी लगाकर कह सकता हूँ कि, जिसने उस रोने का इतिहास पहले कभी जाना-सुना न हो, वह ऐसी गहरी अंधेरी अमावस्या की रात्रि में अकेला उस ओर एक पैर भी आगे बढ़ाना नहीं चाहेगा। वह मनुष्य का बच्चा नहीं चमगीदड़ का बच्चा था, जो अंधेरे में अपनी माँ को न देख सकने के कारण रो रहा था- यह बात, पहले से जाने बिना, सम्भव नहीं है कि कोई अपने आप निश्चयपूर्वक कह सके कि यह आवाज मनुष्य के बच्चे की है। और भी नजदीक जाकर देखा, ठीक यही बात थी। झोलों की तरह सेमर की डाल-डाल में लटके हुए, असंख्य चमगीदड़ रात्रि-वास कर रहे हैं और उन्हीं में का कोई शैतान बच्चा इस तरह आर्त्त कण्ठ से रो रहा है।

झाड़ के ऊपर वह रोता ही रहा और उसके नीचे से आगे बढ़ता हुआ मैं उस महाश्मशान के एक हिस्से में जा खड़ा हुआ। सुबह उस वृद्ध ने जो यह कहा था कि यहाँ लाखों नर-मुण्ड गिने जा सकते हैं- मैंने देखा, कि उसके कथन में जरा भी अत्युक्ति नहीं है- कपाल तो वहाँ असंख्य पड़े हुए थे; फिर भी, खिलाड़ी उस समय तक भी आकर नहीं जुट पाए थे। मेरे सिवाय कोई और अशरीरी दर्शक वहाँ उपस्थित था या नहीं, सो भी मैं इन दो नश्वर चक्षुओं से आविष्कृत नहीं कर सका। उस समय घोर अमावास्या थी। इसलिए, खेल शुरू होने में और अधिक देरी नहीं है, यह सोच करके मैं एक रेत के टीले पर जाकर बैठ गया। बन्दूक खोलकर, उसके टोंटे की और एक बार जाँच करके तथा फिर उसे यथास्थान लगाकर, मैंने उसे गोद में रख लिया और तैयार हो रहा। पर हाय रे टोंटे! विपत्ति के समय, उसने जरा भी सहायता नहीं की।

प्यारी की बात याद आ गयी। उसने कहा था, ''यदि निष्कपट भाव से सचमुच ही तुम्हें भूत पर विश्वास नहीं है, तो फिर, वहाँ कर्म-भोग करने जाते ही क्यों हो? और यदि विश्वास में जोर नहीं है, तो फिर मैं, भूत-प्रेत चाहे हों चाहे न हों, तुम्हें किसी तरह जाने न दूँगी।'' सच तो है, यहाँ आया आखिर क्या देखने हूँ? पाप मन से अगोचर तो है नहीं। मैं वास्तव में कुछ भी देखने नहीं आया हूँ। केवल यही दिखाने आया हूँ कि मुझमें कितना साहस है। सुबह जिन लोगों ने कहा था, ''कायर बंगाली काम के समय भाग जाते हैं,'' मुझे तो उनके निकट प्रमाण सहित सिर्फ यही बताना है कि बंगाली लोग बड़े वीर होते हैं।

मेरा यह बहुत दिनों का दृढ़ विश्वास है कि मनुष्य के मरने पर फिर उसका अस्तित्व नहीं रहता। और यदि रहता भी हो, तो भी जिस श्मशान में उसकी पार्थिव देह को पीड़ा पहुँचाने में कुछ भी कसर नहीं रखी जाती वहाँ, उसी जगह लौटकर अपनी ही खोपड़ी में लातें मार मारकर उसे लुढ़काते फिरने की इच्छा होना उसके लिए न तो स्वाभाविक ही है और न उचित ही। कम-से-कम मैं अपने लिए तो ऐसा ही समझता हूँ। यह बात दूसरी है कि मनुष्य की रुचि भिन्न-भिन्न होती है। यदि किसी की होती हो तो, इस बढ़िया रात को रात्रि-जागरण करके, मेरा इतनी दूर तक का आना निष्फल नहीं होगा। और फिर, आज उस वृद्ध व्यक्ति ने इसकी बड़ी भारी आशा भी तो दिलाई है।

एकाएक हवा का एक झोंका कितनी ही रेत उड़ाता हुआ मेरे शरीर पर से होकर निकल गया; और वह खत्म भी होने नहीं पाया कि दूसरा और फिर तीसरा भी, ऊपर से होकर निकल गया। मन में सोचने लगा कि भला यह क्या है। इतनी देर तक तो लेश-भर भी हवा न थी। अपने आप चाहे कितना ही क्यों न समझूँ और समझाऊँ, फिर भी यह संस्कार, कि मरने के बाद भी कुछ अज्ञात सरीखा रहता है, हमारे हाड़-मांस में ही भिदा हुआ है, और जब तक हाड़-मांस हैं तब तक वह भी है, फिर चाहे मैं उसे स्वीकार करूँ चाहे न करूँ। इसलिए उस हवा के झोंके ने केवल रेत और धूल ही नहीं उड़ाई, किन्तु मेरे उस मज्जागत गुप्त संस्कार पर भी चोट पहुँचाई। क्रमश: धीरे-धीरे कुछ और जोर से हवा चलने लगी। बहुत से आदमी शायद यह नहीं जानते कि मृत मनुष्य की खोपड़ी में से हवा के गुजरने से ठीक दीर्घ श्वास छोड़ने का-सा शब्द होता है। देखते ही देखते आसपास, सामने पीछे, चारों ओर से दीर्घ उसासों की झड़ी-सी लग गयी। ठीक ऐसा लगने लगा कि मानो कितने ही आदमी मुझे घेरकर बैठे हैं और लगातार जोर-जोर से हाय-हाय करके उसासें ले रहे हैं; और अंगरेजी में जिसे 'अन्कैनी फीलिंग' (अनमना-सा लगना) कहते हैं, ठीक उसी किस्म की एक आस्वस्ति या बेचैनी सारे शरीर को झकझोर गयी। चमगीदड़ का वह बच्चा तब भी चुप नहीं हुआ था। पीछे-पीछे मानो वह और भी अधिक रिरियाने लगा। मुझे अब मालूम होने लगा कि मैं भयभीत हो रहा हूँ। बहुत जानकारी के फलस्वरूप यह खूब जानता था कि जिस स्थान में आया हूँ वहाँ, समय रहते, यदि भय को दबा न सका, तो मृत्यु तक हो जाना असम्भव नहीं है। वास्तव में इस तरह की भयानक जगह में, इसके पहले, मैं कभी अकेला नहीं आया था। स्वच्छन्दता से जो यहाँ अकेला आ सकता था, वह था इन्द्र- मैं नहीं। अनेकों बार उसके साथ अनेकों भयानक स्थानों में जा-आने के कारण मेरी यह धारणा हो गयी थी कि इच्छा करने पर मैं स्वयं भी उसी के समान ऐसे सभी स्थानों में अकेला जा सकता हूँ। किन्तु, वह कितना बड़ा भ्रम था! और मैं केवल उसी झोंक में उसका अनुकरण करने चला था। एक ही क्षण में आज सब बातें सुस्पष्ट हो उठीं। मेरी इतनी चौड़ी छाती कहाँ? मेरे पास वह रामनाम का अभेद कवच कहाँ? मैं इन्द्र नहीं हूँ जो इस प्रेत-भूमि में अकेला खड़ा रहूँ, और ऑंखें गड़ाकर प्रेतात्माओं का गेंद खेलना देखूँ। मन में लगा कि कोई एकाध जीवित बाघ या भालू ही दिखाई पड़ जाय, तो मैं शायद जीवित बच जाऊँ! एकाएक किसी ने मानो पीछे खड़े होकर मेरे दाहिने कान पर नि:श्वास डाला। वह इतनी ठण्डी थी कि हिम के कणों की तरह मानो उसी जगह जम गयी। गर्दन उठाए बगैर ही मुझे साफ-साफ दिखाई पड़ा कि वह नि:श्वास जिस नाक के बृहदाकार नकुओं में से होकर बाहर आ गयी है, उसमें न चमड़ा है न मांस- एक बूँद रुधिर भी नहीं है। केवल हाड़ और छिद्र ही उसमें हैं। आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ अन्धकार था। सन्नाटे की आधी रात साँय साँय करने लगी। आसपास की हाय-हाय क्रम-क्रम से मानो, हाथों के पास से छूती हुई जाने लगी। कानों के ऊपर वैसी ही अत्यन्त ठण्डी उसासें लगातार आने लगीं और यही मुझे सबसे अधिक परिवश, करने लगीं। मन ही मन ऐसा मालूम होने लगा कि मानो सारे प्रेत-लोक की ठण्डी हवा उस गढ़े में से बाहर आकर मेरे शरीर को लग रही है।

किन्तु, इस हालत में भी मुझे यह बात नहीं भूली कि किसी भी तरह अपने होश-हवास गुम कर देने से काम न चलेगा। यदि ऐसा हुआ, तो मृत्यु अनिवार्य है। मैंने देखा कि मेरा दाहिना पैर थर-थर काँप रहा है। उसे रोकने की चेष्टा की, परन्तु वह रुका नहीं, मानो वह मेरा पैर ही न हो।

ठीक इसी समय बहुत दूर से बहुत से कण्ठों की मिली हुई पुकार कानों में पहुँची, ''बाबूजी! बाबू साहब!'' सारे शरीर में काँटे उठ आय। कौन लोग पुकार रहे हैं? फिर आवाज आई, ''कहीं गोली मत छोड़ दीजिएगा!'' आवाज क्रमश: आगे आने लगी, तिरछे देखने से प्रकाश की दो क्षीण रेखाएँ आती हुई नजर पड़ीं। एक दफे जान पड़ा मानो उस चिल्लाहट के भीतर रतन के स्वर का आभास है। कुछ देर ठहरकर और भी साफ मालूम हुआ कि जरूर वही है। और भी कुछ दूर अग्रसर होकर, एक सेमर के वृक्ष के नीचे आड़ में होकर वह चिल्लाया ''बाबूजी, आप जहाँ भी हों गोली-ओली मत छोड़िए, मैं हूँ रतन।'' रतन सचमुच ही जात का नाई है, इसमें मुझे जरा भी सन्देह नहीं रहा।

मैंने उल्लास से चिल्लाकर उत्तर देना चाहा, किन्तु कण्ठ से आवाज नहीं निकली। प्रवाद है कि भूत-प्रेत जाते समय कुछ-न-कुछ नष्ट कर जाते हैं। जो मेरे पीछे था, वह मेरा कण्ठ स्वर नष्ट करके ही बिदा हुआ था।

रतन तथा और भी तीन आदमी हाथ में लालटेनें और लट्ठ लिये हुए समीप आ उपस्थित हुए। उनमें एक तो था छट्टूलाल जो तबला बजाया करता था, दूसरा था प्यारी का दरबान, और तीसरा गाँव का चौकीदार।

रतन बोला, ''चलिए, तीन बजते हैं।''

''चलो'' कहकर मैं आगे हो लिया। रास्ता चलते-चलते रतन कहने लगा, ''बाबू, धन्य है आपके साहस को। हम चार जने हैं फिर भी जिस तरह डरते-डरते यहाँ आए हैं, उसका वर्णन नहीं हो सकता।''

''तुम आए क्यों?''

रतन बोला, ''रुपयों के लोभ से। हम सबको एक-एक महीने की तनख्वाह जो नकद मिली है!'' इतना कहकर वह मेरे पास आया और गला धीमा करके बोला, ''आपके चले आने पर देखा, माँ बैठी रो रही हैं। मुझसे बोली, ''रतन, न जाने का होनहार है भइया, तुम लोग पीछे-पीछे जाओ। मैं तुम सबको एक-एक महीने की तनख्वाह इनाम दूँगी।'' मैं बोला, ''छट्टूलाल और गणेश को साथ लेकर मैं जा सकता हूँ माँ, परन्तु रास्ता तो मैंने देखा ही नहीं है।'' इसी समय चौकीदार ने हाँक दी। माँ बोली, ''उसे बुला ले रतन, वह जरूर रास्ता जानता होगा।'' बाहर जाकर मैं उसे बुला लाया। चौकीदार जब नकद छ: रुपये पा गया, तब रास्ता दिखाता हुआ ले आया। अच्छा बाबूजी, ''आपने छोटे बच्चे का रोना सुना है?'' इतना कहकर काँपते हुए रतन ने मेरे कोट के पीछे का छोर पकड़ लिया। कहने लगा, ''हमारे गणेश पाण्डे ब्राह्मण हैं, इसी से हम लोग आज बच गये, नहीं तो...''

मैंने कुछ कहा नहीं। प्रतिवाद करके किसी के भ्रम को भंग करने जैसी अवस्था मेरी नहीं थी। आछन्न-अभिभूत की तरह चुपचाप चलने लगा।

कुछ दूर चलने के बाद रतन ने पूछा, ''आज कुछ देखा बाबूजी?''

मैं बोला, ''नहीं।''

मेरे इस संक्षिप्त उत्तर से रतन क्षुब्ध होकर बोला, ''हमारे आने से आप क्या नाराज हो गये, बाबूजी? किन्तु यदि आप माँ का रोना देखते...''

मैं चटपट बोल उठा, ''नहीं रतन, मैं जरा भी नाराज नहीं हुआ।''

तम्बू के पास आ जाने पर चौकीदार अपने घर चला गया, गणेश और छट्टूलाल नौकरों के तम्बू में चले गये। रतन ने कहा, ''माँ ने कहा था कि जाते समय एक बार दर्शन दे जाइएगा।''

मैं ठिठक कर खड़ा हो गया, ऑंखों के आगे साफ-साफ दिखाई पड़ा कि प्यारी दिए के सामने अधीर उत्सुकता और सजल नेत्रों से बैठी-बैठी प्रतीक्षा कर रही है और मेरा सारा मन उन्मत्त उर्ध्वन श्वासें भरता हुआ उस ओर दौड़ा जा रहा है।

रतन ने विनय के साथ बुलाया, ''आइए।''

क्षण-भर के लिए ऑंखें मींचकर अपने अन्तर में डूबकर देखा, वहाँ होश-हवास में कोई नहीं है, सब गले तक शराब पीकर मस्त हो रहे हैं। राम, राम, इन मतवालों के दल को लेकर मैं उससे मिलने जाऊँ? यह मुझसे किसी तरह न होगा।

देर होती देखकर रतन विस्मय से बोला, ''उस जगह अंधेरे में क्यों खड़े हो रहे हैं बाबूजी- आइए न?''

मैं चटपट बोल उठा, ''नहीं रतन, इस समय नहीं-मैं चलता हूँ।''

रतन कुण्ठित होकर बोला, ''माँ, किन्तु, राह देखती बैठी हैं...''

''राह देखती हैं तो देखने दे। उन्हें मेरा असंख्य नमस्कार जताकर कहना, कल जाने के पहले मुलाकात होगी- इस समय नहीं। मुझे बड़ी नींद आ रही है रतन, मैं चलता हूँ।'' इतना कहकर विस्मित, क्षुब्ध रतन को जवाब देने का अवसर दिए बगैर ही मैं, जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ, उस तरफ से तम्बू की ओर चल दिया।

 
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