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14
सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर ग़या हो, उसने महसूस किया।
अभी संदेशवाहक आयेगा। पत्र अब नहीं आयेंगे। किन्तु उसने पत्नी को जो आखिरी पत्र लिखा है, वह ले जायेगा। चौथे या पाँचवें दिन उसे मिल जायेगा। और तब से दोनों सदा के लिए पति-पत्नी मिट जायेंगे। अपने सिवा किसी ओर के साथ रंग़रेलियाँ मनाने वाली पत्नी को वह नहीं रख सकता, कभी भी नहीं...
विजेंद्र सोच ही में था कि संदेशवाहक तंबू के पास हँसता हुआ सलाम करके खड़ा रहा।
विजेंद्र को आश्चर्य हुआ कि अब किसका पत्र आयेगा ?
उसने कुछ न कहा। संदेशवाहक ने उसके हाथ में पोस्टकार्ड रखा, थोड़ी देर आशा से खड़ा रहा, फिर चला ग़या।
जेल सुप्रिन्टेन्डन्ट के हस्ताक्षर से युक्त जेल से लिखा ग़या पिताजी का पत्र था-
‘बिजु,
तुझे जानकारी मिली होगी। मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया। तुझे आश्चर्य इस बात का हुआ होगा कि मैंने जयजयवंती को क्यों नहीं मारा ?
उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। उसे जो सजा करनी हो वह तू कानून के अनुसार कर सकता है।
-बसवेश्वरसिंह राठौड़'
उसने पत्र पढ़ा।
पिताजी पत्नी को सजा देने को बता रहे थे... वह तो उसे कड़ी से कड़ी सजा दे चुका। पति-पत्नी के संबंध को ही विच्छेद कर दिया था। उससे कड़ी सज़ा ओर क्या हो सकती है ?
शरीर को उसने कठोर बिछौने पर डाला।
सारा जीवन ही मानो बिखर ग़या था। सब नष्ट हो ग़या था। समुद्र की रेत में खड़े किये ग़ये महल और मंदिर, सभी ज्वार की लहरों की एक ही चपेट में टूटकर रहावन बन ग़या था। कुछ भी बच न पाया था।
अब कोई याद न आ रहा था। न तो कोई पत्नी थी। न ही किसी का प्रेम था। अब किसी का पत्र नहीं आयेगा। न ही किसी की प्रतीक्षा करनी होगी।
अब तो वह था और थी राजपूताना रायफल्स की टुकड़ी नं.117 ।
उसने अभी तो करवत भी न ली थी कि एक डाकिया तंबू के दरवाजे पर समाचार लेकर आ पहुँचा था।
विजेंद्र ने चारों ओर से सील किया ग़या लिफाफा लिया। डाकिये को हस्ताक्षर दे, भेज दिया।
ऑडर था।
आज रात को आठ बजे के बाद पूरब की ओर की दुश्मन की छावनी पर एक साथ हमला करना है। सैनिकों को तैयार रखना। पीछे सहायता आ रही है।
विजेंद्र की यही तो चाह थी।
बिना युद्ध घुटन-सी हो रही थी।
अब तो मन कर रहा था कि युद्ध हो। पहले की बात अलग़ थी।
तैयार हो वह बाहर निकल पड़ा।
रात तक तैयारियाँ होती रहीं। अन्य किसी को पता न था। इतनी ही सूचना दी ग़ई थी कि रात के आठ बजे प्रस्थान के लिए तैयार रहना होगा।
पहला हमला 117 नंबर की टुकड़ी को करना था। और उसके नेता विजेंद्रसिंह राठौड़ थे।
काम बहुत कठिन न था। किन्तु दुश्मन को यदि इस बात की जानकारी मिल जाय तो बड़ी मुश्किल हो सकती थी। इस लिए हरेक प्रकार की सावधानियाँ बरती जा रही थीं।
पूरब की ओर बर्फ का जो मैदानी इलाका था, उसे छोड़ने के बाद ग़हरी खाई आती थी। उससे होकर सामने जाना था और दुश्मनों की महत्वपूर्ण छावनी पर आज रात ही में कब्जा जमाना था।
खाई में उतरना कठिन था।
पहल कौन करें ?
विजेंद्रसिंह राठौड़ ने सिर पर कफ़न बाँध लिया था। अब जीवन के प्रति कोई मोह न था, मृत्यु से भय न था।
वह उतर पड़ा।
धीरे-धीरे सारी टुकड़ी उतर ग़ई।
अब सामने जाना था।
चढ़ना कठिन था किन्तु इस महत्वपूर्ण टुकड़ी का हरेक जवान होशियारी से उपर चढ़ ग़या।
खाई की धार पर पेट के बल सो ग़ये।
थोड़ी देर पड़े रहे।
सामने से किसी भी प्रकार की हिलचाल मालूम नहीं हो रही थी।
विजेंद्रसिंह राठौड़ ने पेट के बल सरकने की सूचना दी।
सब चौकी की ओर सरकने लगे।
फिर सभी को रुकने का आदेश दिया ग़या।
सब ‘जैसे थे'की स्थिति में रुके रहे।
सब से आगे विजेंद्रसिंह राठौड़ ने स्वयं ही रहना निश्चित किया।
वह आगे बढ़ ग़या।
टुकड़ी पीछे आ रही थी।
दुश्मन की चौकी असावधान थी।
पाँच मिनट के अंदर फायरिंग़ शुरू हो ग़या।
फायरिंग़ देर तक होता रहा।
दुश्मन की चौकी बहुत बड़ी थी। निकट ही छावनी थी। सहायता पहुँच चुकी थी। और युद्ध तीन घण्टे तक चलता रहा था।
चौकी पर भारतीय तिरंगा लहरा रहा था।
किन्तु विजेंद्रसिंह राठौड़, उस युवा बहादुर अफसर का कोई अता-पता ही न था।
सब उसे खोज रहे थे।
आखिरकार लाश-से हाल में जब उसका शरीर मिला तब सभी ने संतोष की साँस ली।
उसे तुरंत छावनी केम्प के अस्पताल में भेजने की व्यवस्था की ग़ई।
मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के बेहोश शरीर को जब अस्पताल में दाखिल किया ग़या तब डॉक्टर ने भी उसके बचने की कोई आशा न बतायी थी।
लहू विपुल मात्रा में बह ग़या था।
सिर के पिछले हिस्से में ग़हरी चोट लगी थी।
वह कब होश में आयेगा या नहीं, निश्चित नहीं था।
नर्सें इधर-उधर दौड़ रही थीं। डॉक्टर उपचार करने लग़ ग़ये थे।
लहू दिया जा रहा था।
सभी प्रकार के उपचार किये जा रहे थे।
तात्कालिक रूप से जो भी उपचार किया जा सके, कर के, इस गंभीर दर्दी को, घायल अफसर को सैनिक अस्पताल में डॉक्टर पेड्रिक के पास भेजने के बारे में विचारणा हो रही थी।
किन्तु प्रश्र यह था कि वह होश में आये या कराहने लगे... उसके जीने की कोई आश बंधे तभी उसे बड़े अस्पताल में भेजा जा सकेगा।
विजेंद्रसिंह राठौड़ का नाम चौकी जीतनेवाले के रूप में फैल चुका था। कमान्डर इन चीफ ने भी उसके हाल पूछे थे और पूरी देखभाल करने तथा सारे उपचार करने की सूचना दी थी। और अग़र आवश्यकता महसूस हो तो सैनिक अस्पताल में भेजने की व्यवस्था करने के हुक्म भी कर दिये थे।
सब उसके साहस की प्रशंसा कर रहे थे।
तीन दिन उसके हाल बहुत ही नाजुक रहे। जीवन-मृत्यु के बीच झूलते हुए जब उसने पलकें खोलने की कोशिश की तब सभी को विश्वास आया कि बड़े अस्पताल में उसकी पूरी देखभाल की जायेगी।
सैनिक अस्पताल के ऊपरी डॉ.पेट्रिक को टेलिग्राम कर दिया ग़या।
कच्चे रास्ते से जीप द्वारा, एम्ब्यूलन्स में, फिर ट्रेन के द्वारा जब उसे सैनिक अस्पताल पहुँचाया ग़या तब वह सिर्फ आधे मिनट के लिए आँखें खोल पा रहा था।
अशक्ति, कमज़ोरी, रुई-सा चेहरा...
मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ पहचाना भी नहीं जा रहा था।
डॉ.पेड्रिक को तुरंत जानकारी दी ग़ई।
अफसरों के लिए बनाये ग़ये स्पेश्यल रूम में उसे ले जाया ग़या।
फिर से जाँच की ग़ई।
केम्प अस्पताल के रिपोर्टों को डॉ.पेड्रिक ने दो बार देखा।
फिर से उपचार किये जाने लगे।
इंजेक्शन... लहू... ग्लूकोज...
सब दिया जा रहा था...
दिन के बाद दिन बीत रहे थे।
कुछ दिनों के बाद डॉ.पेड्रिक ने नर्स को बुलाकर सूचना दी कि घायल मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के सामान में क्या-क्या है ? उसे जाँचा जाये।
एक घण्टे के भीतर रिपोर्ट आ ग़या।
कपड़े, दैनिक उपयोगी वस्तुएँ, पेन, कुछ पत्र और अन्य चीजें...
डॉ.पेड्रिक ने सारे पत्र अपने पास मँगाये।
विजेंद्रसिंह राठौड़ की सुंदर पत्नी जयजयवंती के सभी पत्र उन्होंने पढ़े। पत्नी से प्रगाढ़ प्यार था। वह पति को बहुत चाहती थी। हरी-हरी पहाड़ियों के बीच घूमते हुए हरदम पति को याद करती थी और सब कुछ बताती थी।
पढ़ी-लिखी युवती थी।
उसे ये जानकारी देनी होगी। उसके आने से संभव है कि मेजर में खुशी का संचार हो। ये जल्दी अच्छा हो जाय। इसे राहत महसूस हो।
डॉ.पेड्रिक ने स्वयं पत्र लिखा-
‘हमारे प्यारे मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ की पत्नी होने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है वह आनंद की बात है। मैं यह बताते हुए दिलगीर हूँ कि एक महत्वपूर्ण चौकी को जीतते हुए वे थोड़े घायल हुए हैं। देहरादून सैनिक अस्पताल में मैं इसका उपचार कर रहा हूँ। मेजर आपको बार-बार याद करता है। आप कुछ दिनों के लिए यहाँ आ सको तो मुझे बड़ी खुशी होगी।
अन्य सग़-संबंधियों को सैनिक अस्पताल में प्रवेश नहीं मिलता, वह आप जानती हैं।
मेजर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
कब आ रही हो ?
मैं टेलिग्राम की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
-डॉ.पेड्रिक'
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15
जयजयवंती को नौकर ने जब पत्र दिया तो चकित रह ग़ई।
वैसे अब उसके पत्र कभी-कभार ही आते थे।
पीहर में पिताजी के अतिरिक्त कोई करीबी रिश्तेदार न था।
ससुर जेल में थे।
पति का अंतिम पत्र मिल चुका था।
जेल से कभी बसवेश्वरसिंह का पत्र आता। धैर्य रखने और जो सज़ा होगी, भुग़तने की तैयारी का उल्लेख होता। ज़मीन की बात कभी ही लिखते।
जयजयवंती बिछौने में बैठ ग़ई।
उसने शरीर को थरथराकर स्फूर्ति लाने की कोशिश की।
फिर लिफाफे की ओर देखा।
देहरादून के सैनिक अस्पताल से उसके नाम पत्र था। अब पत्र में उसकी कोई रुचि न थी।
उसने सोचा, कोई सगा-संबंधी तो देहरादून में नहीं था।
उसने लिफ़ाफ़ा फाड़ पत्र निकाला।
एक ही साँस में उसने डॉ.पेड्रिक का पत्र पढ़ डाला।
कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
वह ये क्या पढ़ रही थी ?
खुश हो या निराश, समझ न पायी।
देर तक वह बैठी रही।
उसे उबकाई हो रही थी। वह बाथरूम में दौड़ ग़ई। दो घण्टे पहले कै हुई थी। अब भी वैसा ही लग़ रहा था।
थोड़ी देर के बाद वह सामान्य हो ग़ई।
पत्र फिर से पढ़ा।
इतनी दूर जाना हो तो पूरी तैयारी के साथ जाना होगा।
किन्तु डॉ.पेड्रिक की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
विजेंद्रसिंह का अंतिम पत्र अब भी उसके पास था। वह खड़ी हुई। पत्र को निकाला और पढ़ ग़ई।
उसका मन कहने लगा। विजेंद्रसिंह राठौड़ कभी भी उसे याद नहीं करेगा। ऐसा हो ही नहीं सकता। वह पति के स्वभाव को थोड़े ही दिनों में जान ग़ई थी।
वह अपने आप को धिक्कारती थी। और यह कम हो वैसे उसके पेट में तीन महीने का बच्चा आकार ले रहा था।
जाना चाहिये या नहीं ?
पत्र की बातें सच्ची हो तो संभव है विजेंद्रसिंह ने उसे माफ कर दिया हो या...
एक के बाद एक पत्र वह पढ़ती रही।
पति माफ कर दें, संभव न था। तो क्या डॉ.पेड्रिक ने लिखा था ?
जो होगा, अच्छा ही होगा। हार रहा जुआरी ओर अधिक खेलता है। वह भी यह आखिरी खेल खेल लेगी। जीत हो या हार...
उसने नौकर को कुछ सूचनाएँ दीं। सारा घर सौंपा। वह कुछ ही दिनों में देहरादून से वापस आ जायेगी, का भरोसा दिया। और दूसरे दिन वह निकल पड़ी। स्टेशन से टेलिग्राम कर दिया।
सारे सफर के दौरान सोच उसे सताती रही, डॉ.पेड्रिक वैसे तो उसे पहचानते नहीं है कि ऐसा पत्र लिखें। कि शायद विजेंद्र की हालत नाज़ुक होगी ?
जयजयवंती का दिल एक हकलाहट चूक ग़या।
कुछ न कुछ हुआ ज़रूर है। जीवन की राह ही बदल रही है, ऐसा वह महसूस रहा था।
देहरादून पहुँचने पर वह थक कर लोटपोट हो चुकी थी।
मानसिक त्रास से वह ऊब ग़ई थी।
डॉ.पेड्रिक ने उसका पत्र पढ़ा होगा ?
वह उन्हें कौन-सा मुँह दिखायेगी ?
उसने सोचा कि यहाँ से वापस चली जाऊँ। खाली बैंच पर वह बैठ ग़ई।
देर तक बैठी रही।
फिर सोच बदल अस्पताल की ओर चल निकली।
डॉ.पेड्रिक को उसने जब यह संदेशा भेजा तब उसे तुरंत बड़े ऑफिस रूम में बुलाया ग़या।
‘आपका टेलिग्राम मिला। आपसे मिल कर बड़ी खुशी हुई'।
‘हमारे मेजर की तबियत वैसे तो बहुत अच्छी है...मैंने आपको खास तौर पर पत्र द्वारा बुलाया है। युवा मनुष्य जवानी में बहुत सारे सपने देखता रहता है... उसके पास यदि उसका कोई अपना हो तो... '
‘डॉक्टर, पत्र आपने लिखा है या कि लिखवाया है ? '
बालक के समान निर्दोष हँसी डॉ.पेड्रिक हँस दिये। फिर पूछा, ‘क्यों कोई संदेह है ? '
जयजयवंती ताककर डॉक्टर के झुरियों वाले चेहरे को देखती रही।
वह कुछ समझ न पायी। डॉ.पेड्रिक की भोली हँसी को पहचान न पायी।
फिरसे उसने पूछा, ‘पत्र मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ ने लिखवाया है ? '
‘हाँ... हाँ... उसकी सूचना के अनुसार ही तो ये सब कुछ किया ग़या है'।
‘आप दूर से आयी हैं तो नहा-धोकर फ्रेश हो जाओ, थोड़ा नाश्ता भी कर लो... फिर तो सदा के लिए मिलना ही होगा न !' -कहकर घण्टी बजायी।
‘सिस्टर के साथ जाओ। नहा-धोकर थोड़ा नाश्ता कीजिये। पास ही में रेस्ट हाउस के कमरे हैं। जो आपके लिए अनुकूल रहेंगे'।
जयजयवंती ग़ई।
युवा और सुंदर इस युवती को देखने के बाद डॉ.पेड्रिक ने सोचा कि उसने जो किया है वह उचित ही नहीं, समयानुकूल और जरूरी भी है।
दोपहर के बाद चार बजकर दस मिनट पर जब जयजयवंती तैयार होकर आयी तो डॉक्टर जैसे बुजुर्ग व्यकित भी उसे ताकते रहे।
‘बैठो'।
‘क्या ? पेशन्ट को मिलने की छूट अब भी नहीं है ? '
‘दूसरे के लिए छूट नहीं है। किन्तु तुम्हारे लिए तो.. '.
‘तो ? '
‘मेजर सो रहे हैं। अब उन्हें जगाने का समय हो ग़या है। सिस्टर हमें बताने के लिए आयेगी...'
डॉक्टर की बातों से जयजयवंती के मन में आशा बँधी थी। वह पेड्रिक के चेहरे की झुरियों में कोई उपाय खोज रही थी। किन्तु कुछ भी जान न पा रही थी।
डॉक्टर पेड्रिक दूसरी कोई बात तो करते ही न थे।
वह कोई अन्य बात बता न सकती थी। दोनों वैसे तो आमने-सामने बैठे थे। बीच में एक बड़ा टेबल था। किन्तु जयजयवंती को लग़ रहा था कि उसके अनुमान और डॉक्टर की मान्यता के बीच बड़ी ग़हरी खाई थी। किन्तु न तो उसके मन की बात डॉक्टर ही जान पाते थे और न ही वह डॉक्टर को पहचान पा रही थी !
कुछ बातें डॉक्टर उससे छिपा रहे थे तो कुछ बातें वह डॉक्टर से कह न पा रही थी। पेड्रिक ने कहा था कि विजेंद्रसिंह की सूचना से उसे पत्र लिखा ग़या था। किन्तु ये कैसे संभव था ? अग़र ऐसा नहीं था तो फिर डॉक्टर अकेले ऐसा कैसे लिख पाते ?
वह सोच रही थी।
हस्ताक्षर करते-करते डॉ.पेड्रिक जयजयवंती को देख लेते।
यह युवा स्त्री एक ऐसी सोच में डूब ग़ई थी कि उसे जान पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव लग़ता था। नहीं तो ऐसी युवा विवाहिता तो धाँधली मचा देती। अस्पताल के नियमों को तोड़ पति के पास पहुँच जाती। आजिजी करती, आँसू बहाती थीं।
किन्तु ये तो ऐसा कुछ भी नहीं कर रही थी।
उससे कोई ग़लती तो नहीं हो ग़ई ?
सिस्टर ने आकर बताया कि मेजर विजेंद्रसिंह देख रहे हैं।
‘अच्छा, हम आते हैं'। कह डॉक्टर खड़े हुए।
लंबी-लंबी लोबी पसार कर दोनों एक कमरे के पास आकर रुके।
यहाँ नीरव शांति थी।
कोलाहल बिल्कुल न था।
डाक्टर ने इशारा किया। आँखों से ही कहा कि ‘जरा रुको। अभी बुलाता हूँ'।
वे चले ग़ये।
थोड़ी ही देर में सिस्टर आयी और जयजयवंती को बुला ले ग़ई।
सिस्टर के पीछे-पीछे वह ग़ई।
इस स्पेश्यल कमरे की सुमधुर हवा उसे भा ग़ई।
दिल में धक-धक होने लगा था।
उसके पेट में पल रहा बच्चा मानो उछलने लगा था। जो उसे यहाँ से वापस जाने को कह रहा था।
वह रुक ग़ई।
पलंग़ पर विजेंद्रसिंह राठौड़ का घायल शरीर पड़ा था।
जयजयवंती का जी आक्रंद करने लगा।
पति था। फिर भी... फिर भी... फिर भी...
‘आइये, आइये, निकट आइये... '
वह पलंग़ के एकदम करीब सरक ग़ई।
कुछ सूझ ही न रहा था।
उसे लगा कि वह काँप रही है।
ग़ले से काँपती आवाज निकली-‘कैसे हैं ? अब ठीक हो ? '
कोई उत्तर न मिला।
जयजयवंती का चेहरा झेंप ग़या।
उसे हुआ कि वह वहाँ से दूर-दूर भाग़ जाये।
वहाँ तो विजेंद्रसिंह राठौड़, उसके पति ने उसकी ओर देख हँस दिया। और उसके गोरे-गोरे चेहरे को देखते हुए देर तक हँसता रहा, मुस्कुराता रहा।
जयजयवंती सब कुछ भूल ग़ई। पति का अंतिम पत्र-उसका इकरार...टूट चूका संबंध...सब भूल ग़ई। वह पति के सीने तक झुक कर उसके मुख, भाल और विशाल कंधे पर हाथ फेरने लगी।
‘अब उसे आराम की जरूरत है'।- डॉक्टर ने कहा, और खड़े हो ग़ये। पहले से ये अधिक गंभीर लग़ रहे थे।
जयजयवंती का चेहरा खिल उठा। अब उसके मन में कोई संदेह न था कि पति ने उसे माफ कर दिया है। वह खुश हो उठी। वह नया जीवन शुरू करना चाहती थी। किन्तु पेट में तो एक बच्चा पल रहा...
डॉक्टर के पीछे-पीछे वह बाहर आयी।
फिर से एक नया सिलसिला शुरू हो ग़या।
डॉक्टर पेड्रिक तेज़ी से ऑफिस में आये।
पीछे-पीछे जयवंती।
‘बैठो, हम दर्दी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बात करेंगे'।
जयजयवंती बैठ ग़ई।
डॉक्टर पेड्रिक ने एनक उतारे, दोनों काँच साफ किये, फिर से एनक पहने। वे कुछ कहना चाहते थे किन्तु कह नहीं पा रहे थे।
कुछ समय तक वे मन ही मन उलझते रहे।
वहीं तो जयजयवंती ने पूछा, ‘मेजर का हँसना, मैं समझ न पायी'।
‘क्यों ? '
उत्तर में जयजयवंती ने विजेंद्रसिंह राठौड़ का अंतिम पत्र डॉक्टर के सामने रख दिया।
डॉ.पेड्रिक सोच में पड़ ग़ये। पत्र उन्होंने ही लिखा था वह बात जयजयवंती जान चुकी थी।
मौन का एक जाला उस शांत कमरे में बुना जाने लगा।
पल-पल गुजर रहे थे। एक के बाद एक, एक के बाद...
कोई घटना घटी होगी। युवा को बहुत जल्दी झटका लग़ जाता है... डॉक्टर पेड्रिक ने फिर एनक उतारी, फिर से साफ की, फिर पहनी।
जयजयवंती की निर्दोष आँखों में आँसू उभर आये। सारा इकरार उसने किया। अपने अंतिम पत्र में उसने जो बातें लिखी थीं, वह भी बतायीं।
डॉ.पेड्रिक सुनते रहे।
‘उस इकरार के बाद विजेंद्रसिंह ने आपके साथ के सारे संबंध तोड़ दिये थे, सच है न ? '
‘हाँ, वह पत्र जो अभी ही मैंने आपको दिखाया... '
डॉ.पेड्रिक को सारी बातें याद हो आयीं।
वे इस सुंदर और कबूतर जैसी भोली स्त्री को देखने लगे।
उन्होंने भी उससे छलना ही का खेल खेला था न !
किन्तु अब तो उसे हकीकत बतानी होगी। सच कहना ही होगा।
किन्तु सच बताना सरल न था। सुनना भी आसान न था।
यह भोली-भाली युवती अपने पति के हाल सुन पायेगी क्या ?
डॉक्टर पेड्रिक एक बार फिर उन भोले नयनों की ओर देख बैठे।
उन आँखों में एक ही नहीं, हजारों सवाल उभर रहे थे।
‘डॉक्टर... डॉक्टर... सच-सच कहो, मेरे पति को क्या हुआ है ? '
‘क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? '
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सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर ग़या हो, उसने महसूस किया।
अभी संदेशवाहक आयेगा। पत्र अब नहीं आयेंगे। किन्तु उसने पत्नी को जो आखिरी पत्र लिखा है, वह ले जायेगा। चौथे या पाँचवें दिन उसे मिल जायेगा। और तब से दोनों सदा के लिए पति-पत्नी मिट जायेंगे। अपने सिवा किसी ओर के साथ रंग़रेलियाँ मनाने वाली पत्नी को वह नहीं रख सकता, कभी भी नहीं...
विजेंद्र सोच ही में था कि संदेशवाहक तंबू के पास हँसता हुआ सलाम करके खड़ा रहा।
विजेंद्र को आश्चर्य हुआ कि अब किसका पत्र आयेगा ?
उसने कुछ न कहा। संदेशवाहक ने उसके हाथ में पोस्टकार्ड रखा, थोड़ी देर आशा से खड़ा रहा, फिर चला ग़या।
जेल सुप्रिन्टेन्डन्ट के हस्ताक्षर से युक्त जेल से लिखा ग़या पिताजी का पत्र था-
‘बिजु,
तुझे जानकारी मिली होगी। मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया। तुझे आश्चर्य इस बात का हुआ होगा कि मैंने जयजयवंती को क्यों नहीं मारा ?
उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। उसे जो सजा करनी हो वह तू कानून के अनुसार कर सकता है।
-बसवेश्वरसिंह राठौड़'
उसने पत्र पढ़ा।
पिताजी पत्नी को सजा देने को बता रहे थे... वह तो उसे कड़ी से कड़ी सजा दे चुका। पति-पत्नी के संबंध को ही विच्छेद कर दिया था। उससे कड़ी सज़ा ओर क्या हो सकती है ?
शरीर को उसने कठोर बिछौने पर डाला।
सारा जीवन ही मानो बिखर ग़या था। सब नष्ट हो ग़या था। समुद्र की रेत में खड़े किये ग़ये महल और मंदिर, सभी ज्वार की लहरों की एक ही चपेट में टूटकर रहावन बन ग़या था। कुछ भी बच न पाया था।
अब कोई याद न आ रहा था। न तो कोई पत्नी थी। न ही किसी का प्रेम था। अब किसी का पत्र नहीं आयेगा। न ही किसी की प्रतीक्षा करनी होगी।
अब तो वह था और थी राजपूताना रायफल्स की टुकड़ी नं.117 ।
उसने अभी तो करवत भी न ली थी कि एक डाकिया तंबू के दरवाजे पर समाचार लेकर आ पहुँचा था।
विजेंद्र ने चारों ओर से सील किया ग़या लिफाफा लिया। डाकिये को हस्ताक्षर दे, भेज दिया।
ऑडर था।
आज रात को आठ बजे के बाद पूरब की ओर की दुश्मन की छावनी पर एक साथ हमला करना है। सैनिकों को तैयार रखना। पीछे सहायता आ रही है।
विजेंद्र की यही तो चाह थी।
बिना युद्ध घुटन-सी हो रही थी।
अब तो मन कर रहा था कि युद्ध हो। पहले की बात अलग़ थी।
तैयार हो वह बाहर निकल पड़ा।
रात तक तैयारियाँ होती रहीं। अन्य किसी को पता न था। इतनी ही सूचना दी ग़ई थी कि रात के आठ बजे प्रस्थान के लिए तैयार रहना होगा।
पहला हमला 117 नंबर की टुकड़ी को करना था। और उसके नेता विजेंद्रसिंह राठौड़ थे।
काम बहुत कठिन न था। किन्तु दुश्मन को यदि इस बात की जानकारी मिल जाय तो बड़ी मुश्किल हो सकती थी। इस लिए हरेक प्रकार की सावधानियाँ बरती जा रही थीं।
पूरब की ओर बर्फ का जो मैदानी इलाका था, उसे छोड़ने के बाद ग़हरी खाई आती थी। उससे होकर सामने जाना था और दुश्मनों की महत्वपूर्ण छावनी पर आज रात ही में कब्जा जमाना था।
खाई में उतरना कठिन था।
पहल कौन करें ?
विजेंद्रसिंह राठौड़ ने सिर पर कफ़न बाँध लिया था। अब जीवन के प्रति कोई मोह न था, मृत्यु से भय न था।
वह उतर पड़ा।
धीरे-धीरे सारी टुकड़ी उतर ग़ई।
अब सामने जाना था।
चढ़ना कठिन था किन्तु इस महत्वपूर्ण टुकड़ी का हरेक जवान होशियारी से उपर चढ़ ग़या।
खाई की धार पर पेट के बल सो ग़ये।
थोड़ी देर पड़े रहे।
सामने से किसी भी प्रकार की हिलचाल मालूम नहीं हो रही थी।
विजेंद्रसिंह राठौड़ ने पेट के बल सरकने की सूचना दी।
सब चौकी की ओर सरकने लगे।
फिर सभी को रुकने का आदेश दिया ग़या।
सब ‘जैसे थे'की स्थिति में रुके रहे।
सब से आगे विजेंद्रसिंह राठौड़ ने स्वयं ही रहना निश्चित किया।
वह आगे बढ़ ग़या।
टुकड़ी पीछे आ रही थी।
दुश्मन की चौकी असावधान थी।
पाँच मिनट के अंदर फायरिंग़ शुरू हो ग़या।
फायरिंग़ देर तक होता रहा।
दुश्मन की चौकी बहुत बड़ी थी। निकट ही छावनी थी। सहायता पहुँच चुकी थी। और युद्ध तीन घण्टे तक चलता रहा था।
चौकी पर भारतीय तिरंगा लहरा रहा था।
किन्तु विजेंद्रसिंह राठौड़, उस युवा बहादुर अफसर का कोई अता-पता ही न था।
सब उसे खोज रहे थे।
आखिरकार लाश-से हाल में जब उसका शरीर मिला तब सभी ने संतोष की साँस ली।
उसे तुरंत छावनी केम्प के अस्पताल में भेजने की व्यवस्था की ग़ई।
मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के बेहोश शरीर को जब अस्पताल में दाखिल किया ग़या तब डॉक्टर ने भी उसके बचने की कोई आशा न बतायी थी।
लहू विपुल मात्रा में बह ग़या था।
सिर के पिछले हिस्से में ग़हरी चोट लगी थी।
वह कब होश में आयेगा या नहीं, निश्चित नहीं था।
नर्सें इधर-उधर दौड़ रही थीं। डॉक्टर उपचार करने लग़ ग़ये थे।
लहू दिया जा रहा था।
सभी प्रकार के उपचार किये जा रहे थे।
तात्कालिक रूप से जो भी उपचार किया जा सके, कर के, इस गंभीर दर्दी को, घायल अफसर को सैनिक अस्पताल में डॉक्टर पेड्रिक के पास भेजने के बारे में विचारणा हो रही थी।
किन्तु प्रश्र यह था कि वह होश में आये या कराहने लगे... उसके जीने की कोई आश बंधे तभी उसे बड़े अस्पताल में भेजा जा सकेगा।
विजेंद्रसिंह राठौड़ का नाम चौकी जीतनेवाले के रूप में फैल चुका था। कमान्डर इन चीफ ने भी उसके हाल पूछे थे और पूरी देखभाल करने तथा सारे उपचार करने की सूचना दी थी। और अग़र आवश्यकता महसूस हो तो सैनिक अस्पताल में भेजने की व्यवस्था करने के हुक्म भी कर दिये थे।
सब उसके साहस की प्रशंसा कर रहे थे।
तीन दिन उसके हाल बहुत ही नाजुक रहे। जीवन-मृत्यु के बीच झूलते हुए जब उसने पलकें खोलने की कोशिश की तब सभी को विश्वास आया कि बड़े अस्पताल में उसकी पूरी देखभाल की जायेगी।
सैनिक अस्पताल के ऊपरी डॉ.पेट्रिक को टेलिग्राम कर दिया ग़या।
कच्चे रास्ते से जीप द्वारा, एम्ब्यूलन्स में, फिर ट्रेन के द्वारा जब उसे सैनिक अस्पताल पहुँचाया ग़या तब वह सिर्फ आधे मिनट के लिए आँखें खोल पा रहा था।
अशक्ति, कमज़ोरी, रुई-सा चेहरा...
मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ पहचाना भी नहीं जा रहा था।
डॉ.पेड्रिक को तुरंत जानकारी दी ग़ई।
अफसरों के लिए बनाये ग़ये स्पेश्यल रूम में उसे ले जाया ग़या।
फिर से जाँच की ग़ई।
केम्प अस्पताल के रिपोर्टों को डॉ.पेड्रिक ने दो बार देखा।
फिर से उपचार किये जाने लगे।
इंजेक्शन... लहू... ग्लूकोज...
सब दिया जा रहा था...
दिन के बाद दिन बीत रहे थे।
कुछ दिनों के बाद डॉ.पेड्रिक ने नर्स को बुलाकर सूचना दी कि घायल मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के सामान में क्या-क्या है ? उसे जाँचा जाये।
एक घण्टे के भीतर रिपोर्ट आ ग़या।
कपड़े, दैनिक उपयोगी वस्तुएँ, पेन, कुछ पत्र और अन्य चीजें...
डॉ.पेड्रिक ने सारे पत्र अपने पास मँगाये।
विजेंद्रसिंह राठौड़ की सुंदर पत्नी जयजयवंती के सभी पत्र उन्होंने पढ़े। पत्नी से प्रगाढ़ प्यार था। वह पति को बहुत चाहती थी। हरी-हरी पहाड़ियों के बीच घूमते हुए हरदम पति को याद करती थी और सब कुछ बताती थी।
पढ़ी-लिखी युवती थी।
उसे ये जानकारी देनी होगी। उसके आने से संभव है कि मेजर में खुशी का संचार हो। ये जल्दी अच्छा हो जाय। इसे राहत महसूस हो।
डॉ.पेड्रिक ने स्वयं पत्र लिखा-
‘हमारे प्यारे मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ की पत्नी होने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है वह आनंद की बात है। मैं यह बताते हुए दिलगीर हूँ कि एक महत्वपूर्ण चौकी को जीतते हुए वे थोड़े घायल हुए हैं। देहरादून सैनिक अस्पताल में मैं इसका उपचार कर रहा हूँ। मेजर आपको बार-बार याद करता है। आप कुछ दिनों के लिए यहाँ आ सको तो मुझे बड़ी खुशी होगी।
अन्य सग़-संबंधियों को सैनिक अस्पताल में प्रवेश नहीं मिलता, वह आप जानती हैं।
मेजर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
कब आ रही हो ?
मैं टेलिग्राम की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
-डॉ.पेड्रिक'
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15
जयजयवंती को नौकर ने जब पत्र दिया तो चकित रह ग़ई।
वैसे अब उसके पत्र कभी-कभार ही आते थे।
पीहर में पिताजी के अतिरिक्त कोई करीबी रिश्तेदार न था।
ससुर जेल में थे।
पति का अंतिम पत्र मिल चुका था।
जेल से कभी बसवेश्वरसिंह का पत्र आता। धैर्य रखने और जो सज़ा होगी, भुग़तने की तैयारी का उल्लेख होता। ज़मीन की बात कभी ही लिखते।
जयजयवंती बिछौने में बैठ ग़ई।
उसने शरीर को थरथराकर स्फूर्ति लाने की कोशिश की।
फिर लिफाफे की ओर देखा।
देहरादून के सैनिक अस्पताल से उसके नाम पत्र था। अब पत्र में उसकी कोई रुचि न थी।
उसने सोचा, कोई सगा-संबंधी तो देहरादून में नहीं था।
उसने लिफ़ाफ़ा फाड़ पत्र निकाला।
एक ही साँस में उसने डॉ.पेड्रिक का पत्र पढ़ डाला।
कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
वह ये क्या पढ़ रही थी ?
खुश हो या निराश, समझ न पायी।
देर तक वह बैठी रही।
उसे उबकाई हो रही थी। वह बाथरूम में दौड़ ग़ई। दो घण्टे पहले कै हुई थी। अब भी वैसा ही लग़ रहा था।
थोड़ी देर के बाद वह सामान्य हो ग़ई।
पत्र फिर से पढ़ा।
इतनी दूर जाना हो तो पूरी तैयारी के साथ जाना होगा।
किन्तु डॉ.पेड्रिक की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
विजेंद्रसिंह का अंतिम पत्र अब भी उसके पास था। वह खड़ी हुई। पत्र को निकाला और पढ़ ग़ई।
उसका मन कहने लगा। विजेंद्रसिंह राठौड़ कभी भी उसे याद नहीं करेगा। ऐसा हो ही नहीं सकता। वह पति के स्वभाव को थोड़े ही दिनों में जान ग़ई थी।
वह अपने आप को धिक्कारती थी। और यह कम हो वैसे उसके पेट में तीन महीने का बच्चा आकार ले रहा था।
जाना चाहिये या नहीं ?
पत्र की बातें सच्ची हो तो संभव है विजेंद्रसिंह ने उसे माफ कर दिया हो या...
एक के बाद एक पत्र वह पढ़ती रही।
पति माफ कर दें, संभव न था। तो क्या डॉ.पेड्रिक ने लिखा था ?
जो होगा, अच्छा ही होगा। हार रहा जुआरी ओर अधिक खेलता है। वह भी यह आखिरी खेल खेल लेगी। जीत हो या हार...
उसने नौकर को कुछ सूचनाएँ दीं। सारा घर सौंपा। वह कुछ ही दिनों में देहरादून से वापस आ जायेगी, का भरोसा दिया। और दूसरे दिन वह निकल पड़ी। स्टेशन से टेलिग्राम कर दिया।
सारे सफर के दौरान सोच उसे सताती रही, डॉ.पेड्रिक वैसे तो उसे पहचानते नहीं है कि ऐसा पत्र लिखें। कि शायद विजेंद्र की हालत नाज़ुक होगी ?
जयजयवंती का दिल एक हकलाहट चूक ग़या।
कुछ न कुछ हुआ ज़रूर है। जीवन की राह ही बदल रही है, ऐसा वह महसूस रहा था।
देहरादून पहुँचने पर वह थक कर लोटपोट हो चुकी थी।
मानसिक त्रास से वह ऊब ग़ई थी।
डॉ.पेड्रिक ने उसका पत्र पढ़ा होगा ?
वह उन्हें कौन-सा मुँह दिखायेगी ?
उसने सोचा कि यहाँ से वापस चली जाऊँ। खाली बैंच पर वह बैठ ग़ई।
देर तक बैठी रही।
फिर सोच बदल अस्पताल की ओर चल निकली।
डॉ.पेड्रिक को उसने जब यह संदेशा भेजा तब उसे तुरंत बड़े ऑफिस रूम में बुलाया ग़या।
‘आपका टेलिग्राम मिला। आपसे मिल कर बड़ी खुशी हुई'।
‘हमारे मेजर की तबियत वैसे तो बहुत अच्छी है...मैंने आपको खास तौर पर पत्र द्वारा बुलाया है। युवा मनुष्य जवानी में बहुत सारे सपने देखता रहता है... उसके पास यदि उसका कोई अपना हो तो... '
‘डॉक्टर, पत्र आपने लिखा है या कि लिखवाया है ? '
बालक के समान निर्दोष हँसी डॉ.पेड्रिक हँस दिये। फिर पूछा, ‘क्यों कोई संदेह है ? '
जयजयवंती ताककर डॉक्टर के झुरियों वाले चेहरे को देखती रही।
वह कुछ समझ न पायी। डॉ.पेड्रिक की भोली हँसी को पहचान न पायी।
फिरसे उसने पूछा, ‘पत्र मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ ने लिखवाया है ? '
‘हाँ... हाँ... उसकी सूचना के अनुसार ही तो ये सब कुछ किया ग़या है'।
‘आप दूर से आयी हैं तो नहा-धोकर फ्रेश हो जाओ, थोड़ा नाश्ता भी कर लो... फिर तो सदा के लिए मिलना ही होगा न !' -कहकर घण्टी बजायी।
‘सिस्टर के साथ जाओ। नहा-धोकर थोड़ा नाश्ता कीजिये। पास ही में रेस्ट हाउस के कमरे हैं। जो आपके लिए अनुकूल रहेंगे'।
जयजयवंती ग़ई।
युवा और सुंदर इस युवती को देखने के बाद डॉ.पेड्रिक ने सोचा कि उसने जो किया है वह उचित ही नहीं, समयानुकूल और जरूरी भी है।
दोपहर के बाद चार बजकर दस मिनट पर जब जयजयवंती तैयार होकर आयी तो डॉक्टर जैसे बुजुर्ग व्यकित भी उसे ताकते रहे।
‘बैठो'।
‘क्या ? पेशन्ट को मिलने की छूट अब भी नहीं है ? '
‘दूसरे के लिए छूट नहीं है। किन्तु तुम्हारे लिए तो.. '.
‘तो ? '
‘मेजर सो रहे हैं। अब उन्हें जगाने का समय हो ग़या है। सिस्टर हमें बताने के लिए आयेगी...'
डॉक्टर की बातों से जयजयवंती के मन में आशा बँधी थी। वह पेड्रिक के चेहरे की झुरियों में कोई उपाय खोज रही थी। किन्तु कुछ भी जान न पा रही थी।
डॉक्टर पेड्रिक दूसरी कोई बात तो करते ही न थे।
वह कोई अन्य बात बता न सकती थी। दोनों वैसे तो आमने-सामने बैठे थे। बीच में एक बड़ा टेबल था। किन्तु जयजयवंती को लग़ रहा था कि उसके अनुमान और डॉक्टर की मान्यता के बीच बड़ी ग़हरी खाई थी। किन्तु न तो उसके मन की बात डॉक्टर ही जान पाते थे और न ही वह डॉक्टर को पहचान पा रही थी !
कुछ बातें डॉक्टर उससे छिपा रहे थे तो कुछ बातें वह डॉक्टर से कह न पा रही थी। पेड्रिक ने कहा था कि विजेंद्रसिंह की सूचना से उसे पत्र लिखा ग़या था। किन्तु ये कैसे संभव था ? अग़र ऐसा नहीं था तो फिर डॉक्टर अकेले ऐसा कैसे लिख पाते ?
वह सोच रही थी।
हस्ताक्षर करते-करते डॉ.पेड्रिक जयजयवंती को देख लेते।
यह युवा स्त्री एक ऐसी सोच में डूब ग़ई थी कि उसे जान पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव लग़ता था। नहीं तो ऐसी युवा विवाहिता तो धाँधली मचा देती। अस्पताल के नियमों को तोड़ पति के पास पहुँच जाती। आजिजी करती, आँसू बहाती थीं।
किन्तु ये तो ऐसा कुछ भी नहीं कर रही थी।
उससे कोई ग़लती तो नहीं हो ग़ई ?
सिस्टर ने आकर बताया कि मेजर विजेंद्रसिंह देख रहे हैं।
‘अच्छा, हम आते हैं'। कह डॉक्टर खड़े हुए।
लंबी-लंबी लोबी पसार कर दोनों एक कमरे के पास आकर रुके।
यहाँ नीरव शांति थी।
कोलाहल बिल्कुल न था।
डाक्टर ने इशारा किया। आँखों से ही कहा कि ‘जरा रुको। अभी बुलाता हूँ'।
वे चले ग़ये।
थोड़ी ही देर में सिस्टर आयी और जयजयवंती को बुला ले ग़ई।
सिस्टर के पीछे-पीछे वह ग़ई।
इस स्पेश्यल कमरे की सुमधुर हवा उसे भा ग़ई।
दिल में धक-धक होने लगा था।
उसके पेट में पल रहा बच्चा मानो उछलने लगा था। जो उसे यहाँ से वापस जाने को कह रहा था।
वह रुक ग़ई।
पलंग़ पर विजेंद्रसिंह राठौड़ का घायल शरीर पड़ा था।
जयजयवंती का जी आक्रंद करने लगा।
पति था। फिर भी... फिर भी... फिर भी...
‘आइये, आइये, निकट आइये... '
वह पलंग़ के एकदम करीब सरक ग़ई।
कुछ सूझ ही न रहा था।
उसे लगा कि वह काँप रही है।
ग़ले से काँपती आवाज निकली-‘कैसे हैं ? अब ठीक हो ? '
कोई उत्तर न मिला।
जयजयवंती का चेहरा झेंप ग़या।
उसे हुआ कि वह वहाँ से दूर-दूर भाग़ जाये।
वहाँ तो विजेंद्रसिंह राठौड़, उसके पति ने उसकी ओर देख हँस दिया। और उसके गोरे-गोरे चेहरे को देखते हुए देर तक हँसता रहा, मुस्कुराता रहा।
जयजयवंती सब कुछ भूल ग़ई। पति का अंतिम पत्र-उसका इकरार...टूट चूका संबंध...सब भूल ग़ई। वह पति के सीने तक झुक कर उसके मुख, भाल और विशाल कंधे पर हाथ फेरने लगी।
‘अब उसे आराम की जरूरत है'।- डॉक्टर ने कहा, और खड़े हो ग़ये। पहले से ये अधिक गंभीर लग़ रहे थे।
जयजयवंती का चेहरा खिल उठा। अब उसके मन में कोई संदेह न था कि पति ने उसे माफ कर दिया है। वह खुश हो उठी। वह नया जीवन शुरू करना चाहती थी। किन्तु पेट में तो एक बच्चा पल रहा...
डॉक्टर के पीछे-पीछे वह बाहर आयी।
फिर से एक नया सिलसिला शुरू हो ग़या।
डॉक्टर पेड्रिक तेज़ी से ऑफिस में आये।
पीछे-पीछे जयवंती।
‘बैठो, हम दर्दी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बात करेंगे'।
जयजयवंती बैठ ग़ई।
डॉक्टर पेड्रिक ने एनक उतारे, दोनों काँच साफ किये, फिर से एनक पहने। वे कुछ कहना चाहते थे किन्तु कह नहीं पा रहे थे।
कुछ समय तक वे मन ही मन उलझते रहे।
वहीं तो जयजयवंती ने पूछा, ‘मेजर का हँसना, मैं समझ न पायी'।
‘क्यों ? '
उत्तर में जयजयवंती ने विजेंद्रसिंह राठौड़ का अंतिम पत्र डॉक्टर के सामने रख दिया।
डॉ.पेड्रिक सोच में पड़ ग़ये। पत्र उन्होंने ही लिखा था वह बात जयजयवंती जान चुकी थी।
मौन का एक जाला उस शांत कमरे में बुना जाने लगा।
पल-पल गुजर रहे थे। एक के बाद एक, एक के बाद...
कोई घटना घटी होगी। युवा को बहुत जल्दी झटका लग़ जाता है... डॉक्टर पेड्रिक ने फिर एनक उतारी, फिर से साफ की, फिर पहनी।
जयजयवंती की निर्दोष आँखों में आँसू उभर आये। सारा इकरार उसने किया। अपने अंतिम पत्र में उसने जो बातें लिखी थीं, वह भी बतायीं।
डॉ.पेड्रिक सुनते रहे।
‘उस इकरार के बाद विजेंद्रसिंह ने आपके साथ के सारे संबंध तोड़ दिये थे, सच है न ? '
‘हाँ, वह पत्र जो अभी ही मैंने आपको दिखाया... '
डॉ.पेड्रिक को सारी बातें याद हो आयीं।
वे इस सुंदर और कबूतर जैसी भोली स्त्री को देखने लगे।
उन्होंने भी उससे छलना ही का खेल खेला था न !
किन्तु अब तो उसे हकीकत बतानी होगी। सच कहना ही होगा।
किन्तु सच बताना सरल न था। सुनना भी आसान न था।
यह भोली-भाली युवती अपने पति के हाल सुन पायेगी क्या ?
डॉक्टर पेड्रिक एक बार फिर उन भोले नयनों की ओर देख बैठे।
उन आँखों में एक ही नहीं, हजारों सवाल उभर रहे थे।
‘डॉक्टर... डॉक्टर... सच-सच कहो, मेरे पति को क्या हुआ है ? '
‘क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? क्या हुआ है... ? '
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