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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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आयुष और नेहा बहुत खुश थे...उनकी ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी| अगले छः घंटे तक हम पार्क में एक झूले से दूसरे झूले में घूमते रहे| जब कभी भी मुझे डर लगता तो मैं इनसे चिपक जाती और इन्होने उस समय का भरपूर फायदा उठाया! जैसे ही मैं इनसे लिपट जाती ये मेरे कान में कहते; "i love you!" आयुष और नेहा ने बहुत साड़ी फोटो खींचीं और आखिर में जब हम खाना खाने बैठे तभी इनका फ़ोन बज उठा| ज्यादातर तो ये मेरे सामने ही बात कर लिया करते थे पर आज ये फोन ले कर दूसरी तरफ जा कर किसी से बात करने लगे| पाँच मिनट बाद जब ये वापस आये तो मैंने इनसे पूछा; "किसका फोन था?" तो इन्होने मुझे बस आँख मारी और सवाल बदल दिया; "बच्चों कुछ order किया या नहीं?" मुझे कुछ अजीब लगा क्योंकि मैं इनका इशारा समझी नहीं थी|

खाना खाने के बाद आयुष फिर से जिद्द करने लगा और इस बार तो नेहा भी उसी का साथ दे रही थी| हार कर हमें फिर से अंदर जाना पड़ा और सच पूछो तो बहुत मजा आया| इतना मजा की मैं ये फोन वाली बात भी भूल गई| हम water park के सामने थे और बच्चों का और 'इनका' मन भी था अंदर जाने का पर 'इन्होने' जैसे-तैसे बच्चों को समझा दिया| ये जानते थे की मैं अंदर नहीं जाऊँगी.... मैंने इनका हाथ पकड़ लिया और हथेली दबा कर इन्हें thank you कहा| अब शाम होने लगी थी और हमें फिर से डेढ़ घंटा ड्राइव कर के घर जाना था तो मेरे समझाने पर बच्चे मान ही गए| हम निकलने लगे तो इन्होने फिर से किसी को फोन मिलाया और एक तरफ जा कर बात करने लगे| इस बार इन्होने बस दो मिनट बात की और फिर वापस आ कर गाडी में बैठ गए| मेरा मुंह थोड़ा लटक गया था तो मुझे खुश करने के लिए इन्होने मेरा favorite गाना: roar - katty perry चला दिया| गाना सुनते ही मेरी सारी नाराजगी फुर्र्र हो गई! "I got the eye of the tiger, a fighter, dancing through the fire

cause I am a champion and you're gonna hear me roar

louder, louder than a lion

cause I am a champion and you're gonna hear me roar

oh oh oh oh oh oh oh

oh oh oh oh oh oh oh

oh oh oh oh oh oh oh

you're gonna hear me roar" मेरे साथ बच्चे और 'इन्होने' भी गुनगुनाना शुरू कर दिया| ये पूरा गाना जैसे मेरे लिए ही बनाया गया था| lyrics का एक-एक शब्द मेरी जिंदगी के ऊपर based है| वैसे ये पहला अंग्रेजी गाना है जो इन्होने मुझे सुनाया था ये कह कर की; "ये गाना तुम्हारे लिए है!" तब से मैं इस गाने को बहुत दफा सुन चुकी हूँ| जब कभी भी मैं हारा हुआ महसूस करती हूँ ये गाना सुनती हूँ तो मुझे inspiration सी मिल जाती है| THANKS KATTY PERRY जी!

तभी अचानक से dashboard पर रखा इनका फोन विबरते करने लगा| मैंने फ़ौरन इनका फोन उठा लिया और ये किसी और का नहीं बल्कि 'राजी' का ही फोन था| उसका नाम देखते ही जैसे मेरा खून खौल उठा और मैं disconnect करने ही वाली थी की इन्होने इशारे से मुझे कॉल उठाने को कहा| इन्होने bluetooth लगा रखा था तो मेरे कॉल उठाते ही ये पता नहीं क्या बात करने लगे उससे| आवाज बहुत धीमी थी इसलिए मैं कुछ सुन नहीं पाई| मुझे सच में बहुत गुस्सा आ रहा था और मैंने ये सब कैसे control किया था मैं ही जानती हूँ| मैंने इनके फ़ोन में पुरानी call list चेक की तो पता चला पिछले दो कॉल भी 'राजी' के ही थे| पर असली धमाकेदार सरप्राइज तो घर पर मिलने वाला था! जैसे ही हम घर पहुँचे, इन्होने गाडी पार्क की और हम घर पहुँच गए| इन्होने फिर से किसी से फ़ोन पर बात करनी शुरू कर दी... किसी और से क्या 'राजी' से और किससे! इन्होने आयुष को doorbell बजने को कहा और दरवाजा खुलते ही ये पीछे से जोर से चिल्लाये; "SURPRISE आयुष बेटे!!! Happy Bday!!!" अनदर से 'राजी' माँ और पिताजी भी happy bday वाला गाना गाने लगे| देखा देखि मैंने और नेहा ने भी happy bday गाना शुरू कर दिया| आवाज सुन कर आस-पडोसी भी आ गए और सबने मिलकर आयुष का birthday celebrate किया और केक काटा| पार्टी का सारा अरेंजमेंट 'राजी' ने किया था! जहाँ एक तरफ मुझे ख़ुशी थी की आयुष का जन्मदिन इतनी धूम-धाम से मनाया जा रहा है वहाँ इस बात का गुस्सा भी की ये सब 'राजी' मैनेज कर रही है! पर ऐसा नहीं था की 'राजी' सिर्फ 'इनके' लिए ऐसा कर रही हो| वो जब कभी भी घर आती थी तो वो बच्चों से बहुत प्यार जताती थी| हमेशा उनके लिए चॉकलेट ले कर आती थी, बल्कि आती ही ऐसे समय पर थी जब बच्चे घर पर हों| बच्चे भी उससे बहुत घुल-मिल गए थे| हमेशा उसे 'आंटी' कह कर बुलाते थे| यही कारन था की मैं उस दिन चुप रही और मैं भी पार्टी के रंग में रंग गई......

आज सब बहुत खुश थे..... ऐसा लगा जैसे बरसों बाद खुशियाँ घर आई हों| सबसे बड़ा सरप्राइज तो अनिल ने दिया| या फिर ये कहें की 'इन्होने' ही ये सरप्राइज प्लान किया था| ऑइल को देख कर तो मेरी और आयुष की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था| आखिर वो मेरा पहला बेटा जो है! पार्टी में आयुष के स्कूल के सारे दोस्त और उनके परिवार वाले आये थे| नेहा का कोई भी दोस्त नहीं आया था... शायद किसी को invite नहीं किया गया या फिर 'ये' भूल गए होंगे! 'इनके' और पिताजी के बिज़नेस से जुड़े लोग जो आये थे वो गिफ्टों के बड़े-बड़े बॉक्स ले कर आये थे| कुल-मिलकर करीब 50 लोग आये होंगे| हमारा घर खचाखच भर चूका था.... सारे बच्चे तो आयुष और नेहा के कमरे में बैठे थे, पिताजी के जानने वाले लोग उनके कमरे में बैठे थे| सारी औरतें और माँ हमारे कमरे में और आयुष के दोस्तों के पापा और आस-पडोसी सब बैठक में बैठे थे|

रात दस बजे तक पार्टी चलती रही और साढ़े दस बजे करीब सब लोग चले गए| सब के जाने के बाद तो आयुष गिफ्ट्स खोलने लगा| तभी माँ ने 'इन्हें' याद दिलाया; "राजी ...बेटा रात बहुत हो गई है| तू आज यहीं सो जा|"

"नहीं माँ मैं घर चली जाऊँगी|" 'राजी' ने कहा|

"नहीं बेटा.... बहुत देर हो गई है| तुम अपनी बहन को फोन कर दो और चाहे तो बहु से या फिर मानु की माँ से बात करा दो| वो कह देंगी की आज आप यहीं रुक रहे हो|" पिताजी ने जोर दिया तो वो ना नहीं कह पाई और आखिर उसने अपने घर फोन करके सारी बात बता दी| मैं खामोश रही क्योंकि बात सही भी थी.... इतनी रात गए उसे अकेले कैसे जाने दें| हाँ एक रास्ता और था की 'ये' उसे छोड़ आएं पर मैं जानबूझ कर चुप रही..... क्योंकि मैं नहीं चाहती थी की ये उसे घर छोड़ने जाएँ| खेर जो हो गया सो हो गया, कम से कम इस बात की ख़ुशी थी की मेरे बेटे का ये पहला जन्मदिन जो उसके पापा ने मनाया वो बहुत शानदार था!!!

अब रात में सोने का समय हो चूका था| तो सोने का अरेंजमेंट कुछ इस प्रकार किया गया: 'राजी' और नेहा बच्चों के कमरों में सोये थे..... माँ-पिताजी और आयुष एक साथ सोये.... मैं और 'ये' अपने कमरे में और मेरा बेचारा भाई फिर से सोफे पर| बिचारे को हरबार सोफे ही नसीब होता है! अगर 'राजी' नहीं होती तो अनिल आज बच्चों के कमरे में सोया होता| खेर सब अपने कमरों में चले गए ..... पर आज तो ये बहुत ज्यादा रोमांटिक मूड में थे! मैं dressing table के सामने कड़ी हो कर अपनी बालियाँ उतार रही थी की तभी इन्होने पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया| इनका हाथ मेरी कमर से होकर मेरी नाभि के सामने lock हो चूका था| इनके होंठ मेरी गर्दन पर स्पर्श कर रहे थे…..

“क्या बात है? आज जनाब बहुत रोमांटि हो रहे हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा|

"भई आज ही तो एरी पत्नी ने मुझे एक लड़के का बाप बनाया था....तो थोड़ा romance तो बनता है! आज तो मैं तुम्हें जी पर के thank you कहना चाहता हूँ|"

इनके होठों ने मेरी गर्दन पर आना जादू चलना शुरू कर दिया था| इनके जिस्म की महक मुझे दीवाना बना रही थी.... हम दोनों ही जैसे झूमने लगे थे....

'उम्म्म...रुको ना.....आप बहुत थक गए होगे...." मैंने किसी तरह इनके मन्त्र से मुक्त होने की कोशिश की|

"ना...कुछ नहीं होगा मुझे...."

मैं जानती थी की इन्हें कुछ नहीं होगा पर मैं तो बस बहाना बना रही थी की किसी तरह ये मुझे छोड़ दें पर ना...आज तो इन पर romance का भूत सवार था.... वैसे चाहती तो मैं भी नहीं थी की ये मुझे छोड़ें ही..ही..ही....!!!

"उम्म्म....नहीं... प्लीज.... अनिल है और वो भी तो...." मैंने 'राजी' का नाम नहीं लिया..... बस उसका नाम याद आते ही मुझे फिर से गुस्सा चढ़ने लगा|

"वो? वो कौन?" इन्होने अनजान बनते हुए पूछा| मन तो किया की पलट के उखड़ते हुए जवाब दे दूँ पर चुप रही| पर इनके इस सवाल ने मेरा गुस्सा भड़का तो दिया ही था|

"प्लीज... छोड़ दो मुझे! मेरा मन नहीं है!" मैंने थोड़ा नाराजगी दिखाते उए कहा|

मेरी इस बात का इन्हें बहुत बुरा लगा| इन्होने तुरंत मुझे छोड़ दिया और कहा; "sorry ....!" इससे ज्यादा ये कुछ नहीं बोले और दरवाजे की तरफ जाने लगे| मैंने इन्हें रोकना चाहा; "सुनिए ना...प्लीज...." पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और ये बाहर जा चुके थे और दरवाजा बंद हो चूका था| मुझे राजी पर और गुस्सा आने लगा की उसकी वजह से ये सब हुआ| मेरे पति जिन्हें मैंने आजतक कभी भी खुद को प्यार करने से नहीं रोका आज मैंने उन्हें इस कदर जवाब दिया की उनका दिल तोड़ दिया| वो भी आज के दिन!!! मुझे वो रात याद आने लगी जब मैंने इन्हें वादा किया था की मैं आपको कभी भी खुद को प्यार करने से मना नहीं करुँगी!

मैंने जल्दी से कपडे बदले और बाहर आई तो देखा ये अनिल के साथ बैठे गप्पें लगा रहे थे| मुझे दरवाजे पर खड़ा देख इन्होने हँसते हुए मुझसे कहा; "सुनो... तुम आज राजी वाले कमरे में सो जाओ ताकि मैं नेहा और अनिल bedroom में सो जाएं| बेचारा जब भी आता है इसे सोफे पर ही सोना पड़ता है|" मैं हैरान थी की इतनी जल्दी इनका गुस्सा कहाँ काफूर हो गया? फिर मन ने कहा अच्छा है... शायद घर पर मेहमान हैं और ये सबका मूड ख़राब नहीं करना चाहते इसलिए नाराज नहीं हैं| मैंने मन ही मन सोचा की ठीक है अनिल के जाने के बाद मैं इन्हें कैसे ना कैसे कर के मना लूँगी| पर अभी की समस्या ये थी की मुझे राजी वाले कमरे में रात गुजारनी थी| अब जाहिर सी बात है की वो कुछ ना कुछ तो बात अवश्य करेगी और अगर मैंने जवाब ना दिया तो उसे बुरा लगेगा और फिर ये नाराज हो जायेंगे... और अगर अकड़ के जवाब दिया तो भी उसे बुरा लगेगा और ये नाराज हो जायेंगे| तो मैंने सोचा की बात बिगड़ने से अच्छा है की थोड़ा बहुत ड्रामा ही कर लिया जाए| वैसे भी थकावट इतनी है की मुझे जल्दी नींद आ जाएगी ....... इस बीच अगर उसने कोई बात की तो हंस के जवाब दे दूंगी और क्या!"

मैंने नेहा को बैठक में भेजा और मैं खुद उसकी जगह लेट गई| कुछ देर बाद बैठक से आने वाली आवाजें बंद हुईं मतलब की ये, नेहा और अनिल तीनों कमरे में जा चुके थे| राजी की शायद आँख लग चुकी थी इसलिए हमारी कोई बात नहीं हुई और मुझे भी बहुत नींद आ रही थी सो मैं भी सो गई|

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मैंने मन ही मन सोचा की ठीक है अनिल के जाने के बाद मैं इन्हें कैसे ना कैसे कर के मना लूँगी| पर अभी की समस्या ये थी की मुझे राजी वाले कमरे में रात गुजारनी थी| अब जाहिर सी बात है की वो कुछ ना कुछ तो बात अवश्य करेगी और अगर मैंने जवाब ना दिया तो उसे बुरा लगेगा और फिर ये नाराज हो जायेंगे... और अगर अकड़ के जवाब दिया तो भी उसे बुरा लगेगा और ये नाराज हो जायेंगे| तो मैंने सोचा की बात बिगड़ने से अच्छा है की थोड़ा बहुत ड्रामा ही कर लिया जाए| वैसे भी थकावट इतनी है की मुझे जल्दी नींद आ जाएगी ....... इस बीच अगर उसने कोई बात की तो हंस के जवाब दे दूंगी और क्या!"

मैंने नेहा को बैठक में भेजा और मैं खुद उसकी जगह लेट गई| कुछ देर बाद बैठक से आने वाली आवाजें बंद हुईं मतलब की ये, नेहा और अनिल तीनों कमरे में जा चुके थे| राजी की शायद आँख लग चुकी थी इसलिए हमारी कोई बात नहीं हुई और मुझे भी बहुत नींद आ रही थी सो मैं भी सो गई|

अब आगे .....

अगली सुबह जब मैं उठी तो देखा की 'राजी' मुझसे पहले जाग चुकी थी और उसी ने सब के लिए चाय बनाई थी| माँ-पिताजी dining table पर बैठे चाय पी रहे थे और 'ये' बच्चों को स्कूल के लिए ready कर रही थे| मैंने घडी पर नजर डाली तो सात बज रहे थे! ये देख कर मैं फ़ौरन बाथरूम में घुस गई और जब बाहर आई तो 'राजी' किचन से निकल रही थी और उसके हाथ में चाय थी| अब मुझे मजबूरन उससे बात करनी पड़ी; "अरे आपने क्यों तकलीफ की? ......मुझे जगा दिया होता?"

"no problem ... मिट्ठू ने आपको .....जग....जगाने से..... मना किया ता!" उस ने हँसते हुए जवाब दिया| अब ये सुनते ही मेरी नस-नस में आग लग गई| पर 'इनके' दर से चुप हो गई की कहीं 'इन्हें' बुरा ना लग जाए... already कल रात मैंने इनका mood ख़राब कर दिया था| मैं जल्दी से नाश्ते की तैयारी करने लगी की तभी मदद करनी की इच्छा जताई .... पर मैंने झूठ में मुस्कुरा कर कह दिया; "अरे नहीं...आप बातें करो... मैं कर लूँगी|" इतने में 'ये' भी बाहर आ गए और बैठक में राजी के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गए| (वैसे वो उनकी पसंदीदा कुर्सी है|) अनिल और राजी बात कर रहे थे पर as usual उसे हिंदी थोड़ा समझने में दिक्कत हो रही थी| तो मेरे 'ये' translator का काम करने लगे और उसे शब्दों का मतलब example दे कर समझने लगे| तीनों बड़ा हँस-हँस के बातें कर रहे थे और इधर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था| तो मैंने अपना गुस्सा आँटा गूंदने पर निकालना शुरू कर दिया| किसी punching bag की तरह उसे मारने लगी! नाश्ते में मैंने आलो के परांठे बनाये.... बच्चों का टिफ़िन पैक किया और उन्हें स्कूल भेजा| स्कूल जाते-जाते बच्चे 'इनके' पास आये इन्हें kiss किया और फिर दादा-दादी के पैर हाथ लगाये और चले गए| बाकी सब dining table पर बैठ गए और नाश्ता करने लगे| आलू के परांठे सबसे ज्यादा अगर किसी को पसंद आये तो वो थी 'राजी'| वो तो मुझसे उनकी recipe पूछने लगी! .....खेर मैंने उसे recipe बता दी|

नाश्ते के बाद पिताजी इन्हें बोल गए की; "बेटा राजी को तुम दोनों घर छोड़ आना|" और जवाब में इन्होने "जी पिताजी" कहा| पिताजी तो निकल गए पर राजी मना करने लगी.... तब माँ ने उसे समझाया की ऐसे ठीक नहीं होता.... बहु और मानु तुम्हें खुद घर छोड़ आएंगे| मैं जा कर तैयार होने लगी तो देखा की मेरी नई नाइटी गायब है? मैंने उसे एक बार भी नहीं पहना था!!!! मुझे पक्का यक़ीन था की वो नाइटी 'राजी' ने ही पहनी होगी| पर 'इनके' डर की वजह से मैं चुप रही और तैयार होकर बाहर आई| तब देखा की 'राजी' बाथरूम से वही नाइटी ले कर निकल रही है.... वो भी धुली-धुलाई| इससे पहले मैं उससे कुछ कह पाती 'ये' आ गए और बोले; "रात में इनके पास सोने के लिए कुछ कपडे नहीं थे इसलिए मैंने तुम्हारी नई वाली नाइटी दी थी पहनने के लिए|" अब डर के मारे मुझे तो समझ नहीं आया की क्या कहूँ; "अरे पर आपने इसे धोया क्यों? मैं धो देती|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा.... जबकि मेरा दुःख सिर्फ मैं ही जानती थी|

"नहीं...मैं पहना न ये...तो आपसे कैसे wash करने को कहते?" उसने फिर से अपनी टूटी-फूटी हिंदी में जवाब दिया| उसे wash की हिंदी नहीं आती थी! ही..ही..ही..ही.... खेर हम उसे छोड़ने कार से निकले और रास्ते भर दोनों बातें करते रहे और मैं साथ में हाँ-हुनकर करती रही| मैंने दोनों को जरा भी भनक नहीं लगने दी की मुझे इन दोनों की इस नजदीक से कितनी तकलीफ है| जब हम राजी के घर पहुंचे तो मुझे लगा की उसे सिर्फ नीचे छोड़ कर हम चले जायेंगे.. पर ये तो ऊपर चलने के लिए आतुर हो गए थे और ये मुझे भी जबरदस्ती ले गए| इन्होने डिक्की में कुछ गिफ्ट्स रखे थे जिन्हें देख कर मैं भी हैरान थी की ये कब आये? आज पहलीबार मैं एक "christian" घर में कदम रखने जा रही थी| थोड़ा अजीब लग रहा था... पर क्या करूँ? 'राजी' के घर में उसकी बड़ी बहन और उसका जीजा और एक छोटी बच्ची ही थे| हैरानी की बात तो ये थी की वो सब 'इन्हें' जानते थे| हमारा बहुत अच्छा स्वागत हुआ... सबसे ज्यादा हैरानी तो मुझे तब हुई जब वो छोटी बच्ची अंदर से आई और भागती हुई इनकी गोद में आ गई| और ये भी उस बच्ची को गोद में ले कर दुलार करने लगे| "मेरा childhood फ्रेंड कैसा है?" ये सुनकर तो मैं हैरान पढ़ गई और मेरी ये हैरानी मेरे चेहरे पर झलकने लगी|

"मिट्ठू कहते...की ये बच्ची है means child और मिट्ठू का friend है... इसलिए childhood friend .... ही..ही...ही...ही..." राजी की ये बात सुनकर तो मुझे भी हँसी आ गई|

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"actually जब मैं पहलीबार 'राजी' से मिला तो ये बच्ची भी साथ आई थी| तो उस दिन मुझे एक साथ दो फ्रेंड मिल गए...इसलिए मैं मेरे dear friend को childhood friend कहता हूँ|" ये सुन कर सब हँस पड़े| इतनी देर में 'राजी' की दीदी पानी ले आईं| इन्होने गिलास ले लिया और मुझे भी पानी पीना ही पड़ा| हमारे गाँव में तो हम किसी दूसरी जात के यहाँ पानी नहीं पीते और ये दूसरे धर्म के हैं! यही हिचकिचाहट मुझ में भी भरी हुई थी.... पर ये ऐसा कतई नहीं सोचते थे| इन्होने उसे बच्ची से मेरा introduction कुछ इस तरह कराया; "angel.... she's wife .... and since you're my childhood friend so she's your friend also." ये सुनकर वो हँसने लगी| उस बच्ची की स्माइल बहुत प्यारी थी और उसे मुस्कुराता हुआ देख मैं खुद को उसे गोद लेने से रोक ना पाई और अपनी बाहें खोल कर उसे गोद में लेना चाहा| angel भी बिना नखरा किये मेरी गोद में आ गई और उस पल मुझे एहसास हुआ की छोटे बच्चों को देख कर हम कभी भी ये भेद-भाव नहीं करते की ये किस धर्म का है...जब वो बच्चा बड़ा हो जाता है तभी हमारे अंदर ये भेद-भाव की भावना पैदा होती है| वरना एक छोटे बच्चे की हँसी का तो कोई धर्म नहीं होता! उसे गोद में लेने के बाद मुझे ख़ुशी हुई........ और खुद से घृणा भी| कहाँ तो मैं एक christian family के घर जाने से कतरा रही थी और कहाँ इस छोटी सी बच्ची के गोद में आते ही मैं वो सब भूल गई| सच में मित्रों मेरी तरह के orthodox लोग भी हैं इस दुनिया में!

अब की बार तो मैंने angel को इनसे भी ज्यादा दुलार किया! चाय पीने के बाद हम वहाँ से निकले.... राजी और उसका परिवार हमें नीचे तक छोड़ने आया......... अब मेरा मन प्रसन्न था| पर अगले ही पल याद आया की कहीं ये अपना कल रात का गुस्सा मुझ पर ना निकालें? पर ऐसा नहीं हुआ...गाडी में बैठने के बाद इन्होने कहा; "i'm sorry कल मैंने बिना तुमसे पूछे तुम्हारी नई वाली नाइटी राजी को पहनने के लिए दे दी|" इन्होने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा| इनकी ये बात मुझे बहुत अच्छी लगती है (वैसे तो इनकी बहुत सी बातें अच्छी लगती हैं|) की ये अपनी छोटी से छोटी गलती को स्वीकार लेते हैं और सच्चे दिल से माफ़ी माँगते हैं|

"जानू... तो क्या हुआ? एक नाइटी ही तो थी! पर उस बेचारी ने भी सुबह-सुबह नाइटी धोकर वापस दी ये मुझे अच्छा नहीं लगा| मैं धो लेती... इसमें का बात थी|" आधी बात तो मैंने सिर्फ इनका दिल रखने के लिए कही थी|

"नहीं यार वो जानती है की आप पेट से हो ऐसे में वो भला आपको काम कैसे करने देती? वो भी उसके उतारे हुए कपडे धोना! मेरी बीवी के पास सिर्फ यही काम थोड़े ही है?" इन्होने बहुत हँसते हुए कहा और इनका जवाब सुनकर मुझे अछा लगा| लगा जैसे अभी भी इन्हें मेरी परवाह है... मतलब ऐसा नहीं है की इन्हें कभी मेरी परवाह नहीं होती.... पर उन दिनों में कुछ ऐसा ही सोच रही थी| इन्होने गाडी सरोजनी नगर मार्किट की तरफ मोड़ी...... वहाँ पहुँच के इन्होने मुझसे पूछा; "same नाइटी लगी या उससे भी अच्छी?" मैं ये सुनकर हैरान रह गई .............और खुश भी!! मैंने ख़ुशी से झूम कर कहा; "नई!!!" ये भी हँसते हुए निकले और हमने जा कर मेरे लिए एक नई नाइटी खरीदी| और साथ ही एक नई साडी भी ली.... जो 'इन्होने' पसंद की थी| मैं खुश थी.... की कम से कम इनका गुस्सा ठंडा हो गया| अब बारी थी तो उस काम को पूरा करने की जो कल रात मेरी बेवकूफी की वजह से अधूरा रह गया था|आज तो मन बहुत ज्यादा उतावला हो अहा था.... बस रात होने का इन्तेजार कर रही थी| रात होने तक ये मुझसे अब भी हंस कर बात कर रहे थे ...हाँ बस जैसे पहले ये मुझे अकेला पा कर छू लिया करते थे वो नहीं था.... पर मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया| रात में सबके खाने के बाद मैं kitchen समेटने लगी और ये अपने कमरे में जा कर लेट गए| मैंने बच्चों का कमरा देखा और दरवाजा बंद कर दिया ... माँ अभी भी बैठक में बैठीं टी.वी. देख रहीं थीं| मैं कमरे में आई और जल्दी से दरवाजा बंद किया.... इनको देखा तो ये माथे पर हाथ रख कर शायद सो चुके थे| मैंने जल्दी से कपडे बदले और इनके पास आ कर लेट गई| मैं जानती थी की अभी इनकी आँख नहीं लगी है ...इसलिए मैंने इनके दाहिने हाथ को अपना तकिया बनाया और इनसे लिपट गई| इनहोने कुछ भी react नहीं किया... मैं फिर भी इनसे लिपटने लगी .... पर कोई reaction नहीं... आखिर मैंने इनके गाल को kiss किया तब जा कर इनके उन्ह से; "उम्म्म...." निकला|

अब मैं इनके और नदीक आ गई और इनके होठों को kiss करने की कोशिश की तभी....तभी इन्होने मुझे रोक दिया और मेरी आँखों में देखते हुए ना में गर्दन हिलाई| इनका ऐसा reaction देख मैं समझ गई की इनका गुस्सा शांत नहीं हुआ है?

"मुझे माफ़ कर दो.... मुझसे गलती हो गई| कल.....वो....." मैं इनसे झूठ नहीं बोल सकती थी.... इसलिए चुप हो गई|

"कल क्या? तुम्हें पता है कल मुझे कैसा लगा जब तुम ने मुझे इस तरह झिद्दिक दिया था? इसकी उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी! मुझे लगा जैसे मैं तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती कर रहा हूँ! ...... तुम्हारा शोषण कर रहा हूँ......खुद से नफरत करने लगा था| ...................शायद तुम भूल गई की तुमने कभी मुझसे कुछ वादा किया था?" 'इनकी' बातों ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया था|

"पता नहीं मुझे कल क्या होगया था? प्लीज.... मुझे माफ़ कर दो!" मैं रो पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी|

"तुम्हें पता है....पर तुम बताना नहीं चाहती| ठीक है.... मैं नहीं पूछूँगा!" 'इन्होने' मेरे आँसूं पोछे और मुझे चुप कराया|मुझे लगा की इन्होने मुझे माफ़ कर दिया पर ये दूसरी तरफ मुँह कर के सोने लगे| मैंने इनसे पूछा; "आपने मुझे माफ़ कर दिया?" जवाब में इन्होने बस; "हम्म्म्म...." का जवाब दिया| पर मेरे अंदर तूफ़ान सा खड़ा हो गया था.... मन कह रहा था की तूने इनका प्यार खो दिया.... और मैं चाह कर भी इनसे ये पूछने को नहीं रोक पाई; "तो क्या आप मुझे कभी हाथ नहीं लगाओगे?"

इन्होने कुछ जवाब नहीं दिया...... पर मैंने मन ही मन सोच लिया की मैं इन्हें मना कर ही रहूंगी और इनके दिल में अपना प्यार वापस जगा के रहूँगी|

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"पता नहीं मुझे कल क्या होगया था? प्लीज.... मुझे माफ़ कर दो!" मैं रो पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी|

"तुम्हें पता है....पर तुम बताना नहीं चाहती| ठीक है.... मैं नहीं पूछूँगा!" 'इन्होने' मेरे आँसूं पोछे और मुझे चुप कराया|मुझे लगा की इन्होने मुझे माफ़ कर दिया पर ये दूसरी तरफ मुँह कर के सोने लगे| मैंने इनसे पूछा; "आपने मुझे माफ़ कर दिया?" जवाब में इन्होने बस; "हम्म्म्म...." का जवाब दिया| पर मेरे अंदर तूफ़ान सा खड़ा हो गया था.... मन कह रहा था की तूने इनका प्यार खो दिया.... और मैं चाह कर भी इनसे ये पूछने को नहीं रोक पाई; "तो क्या आप मुझे कभी हाथ नहीं लगाओगे?"

इन्होने कुछ जवाब नहीं दिया...... पर मैंने मन ही मन सोच लिया की मैं इन्हें मना कर ही रहूंगी और इनके दिल में अपना प्यार वापस जगा के रहूँगी|

अब आगे........

रात के करीब बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई| मैं उस समय बाथरूम से निकल रही थी.... मैंने दरवाजा खोला तो नेहा थी और रो रही थी|"आजा बेटा...फिर से बुरा सपना देखा?" 'इन्होने' इशारे से उसे अपने पास बुलाया| ये थोड़ा पीछे की तरफ सरक गए और नेहा आकर इनके दाहिने तरफ लेट गई| इन्होने उसे अपनी छाती से लगा लिया और से चुप करने लगे| "बस...बस...बास...मेरा बेटा तो बहुत बहादुर है ना? बस.... अच्छा कहानी सुनोगे?" नेहा ने सर हाँ में हिलाया| इन्होने कहानी शुरू की पर नेहा को अपनी छाती से अलग नहीं किया|मैं भी इंनके पीछे आ कर लेट गई और इनकी कमर पर हाथ रख दिया| इन्होने मेरा हाथ पकड़ के आगे की तरफ खींचा और नेहा की पीठ पर रख दिया| इनकी कहानी सुनते-सुनते कब मुझे और नेहा को नींद आ गई पता ही नहीं चला|

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I LOVE YOU MY DEAR HUBBY!
 
सारी रात नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए निकली| एक पल के लिए भी उसे खुद से जुदा नहीं होने दिया| अब उसका यूँ रात में चौंक कर उठ जाना मुझे गंवारा ना था| मैं जानता था की मेरी बेटी को कोई दिमागी बिमारी नहीं है पर मुझे कैसे भी कर के उसे उसके डर से बाहर निकलना था| अपने बचपन में मैंने भी डरावने सपने देखे थे, जिन्हें देख कर मैं जाग जाया करता था| जब में तकरीबन नेहा की उम्र का था तब मैंने पडोसी दोस्त के घर 'आहात' नाम का नाटक देखा था और तब से तो मुझे अकेले रहने में बहुत डर लगने लगा था| उस समय हमारे घर में बाथरूम पहली मंजिल पर था, तो अँधेरे में मैं बाथरूम तक नहीं जाया करता था| जब मैंने ये डरने वाली बात अपने माता-पिता को बताई तो माँ ने तो ये कह दिया की तू इतना बड़ा हो गया है और ऐसी चीजों से डरता है? पिताजी ने तो एक दिन मेरी दडे से सुताई कर दी थी, वो भी इस बात पर की मैं रात में अकेले सोने में डरता था| उस दिन उन्होंने मुझे भगा-भगा के मारा था| मेरे दोस्त लोग मेरा मजाक उड़ाया करते थे की ये देखो भूत-प्रेत से डरता है,, मर्द बन मर्द और अपने डर का सामना कर| हुँह कहना बहुत आसान होता है पर करना उतना ही मुश्किल| पर किस्मत से मेरा ये डर उम्र बढ़ने के साथ निकल गया| मैंने अपना मन पूजा-पाठ में लगाया और भगवान पर भरोसा आने लगा की जब तक वो हैं मेरे साथ कुछ भी गलत नहीं होगा| पर अपनी बेटी नेहा के लिए में बेसब्रा हुआ जा रहा था| मुझे जल्द से जल्द उसकी इस परेशानी का जवाब ढूँढना था| पर कैसे? ये सवाल ही मेरी चिंता का कारण था| मैं ने एक नजर नेहा को देखा, वो अब भी सो रही थी और संगीता भी नींद में थी| मैं उठा और नह धो कर भगवान का नाम लेने लगा, अपनी बेटी के लिए दुआ करने लगा की मेरी बेटी को ये डरावने सपने आने बंद हो जाएँ| जब भी मुझे कुछ सुझाई नहीं देता तो मैं भगवान का नाम लेता हूँ, ये सोच कर की वो मुझे कोई न कोई रास्ता अवश्य ही सुझाएंगे|

शायद रास्ता मिल भी गया| उस वक़्त घडी में पाँच बज रहे थे और मेरी बैचनी बढ़ने लगी थी इसीलिए मैंने डॉक्टर सरिता जी को फ़ोन किया:

मैं: हेलो? डॉक्टर सरिता?

डॉक्टर सरिता: हेलो

मैं: माफ़ कीजिये सरिता जी मैंने आपको इतनी सुबह तंग किया?

डॉक्टर सरिता: अरे कोई बात नहीं मानु| सब ठीक तो है ना?

मैं: जी नहीं| नेहा को हर तीसरे दिन बुरे सपने आते हैं और वो डर के मारे रोने लगती है और आधी-आधी रात को उठ कर मेरे पास आ जाती है| जब-जब मैं उसके साथ सोता हूँ तो वो ठीक रहती है और आराम से सोती है| प्लीज सरिता जी मदद कीजिये!

डॉक्टर सरिता: घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा| मैं तुम्हें डॉक्टर अंजलि का नंबर देती हूँ वो बच्चों की मनौवैज्ञानिक हैं| तुम, संगीता और नेहा उनसे जा कर मिलो वो तुम्हारी जर्रूर मदद करेंगी|

मैं: जी ठीक है| आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!

डॉक्टर सरिता: मैं तुम्हें अभी नंबर मैसेज करती हूँ|

अगले पाँच मिनट में डॉक्टर सरिता का मैसेज आ गया| मन तो कर रहा था की अभी फ़ोन करूँ पर ये ठीक नहीं होता| इसलिए मैं घडी में दस बजने का इन्तेजार करने लगा| पर ये घडी कम्बखत बहत धीरे चल रही थी| माँ-पिताजी भी उठ चुके थे तो मैंने सोचा की चलो चाय ही बना लूँ|चाय बना कर जब मैं माँ-पिताजी को देने गया तो मेरे हाथ में चाय देख कर माँ-पिताजी परेशान हो गए|

माँ: बहु की तबियत ठीक है ना?

मैं: जी ठीक है|

पिताजी: फिर चाय तू क्यों ले कर आया?

मैं: वो मैं जल्दी उठ गए तो सोचा आज मैं ही चाय बना लूँ|

पिताजी: अच्छा अब जा कर बहु और बच्चों को भी उठा दे|

मैं अपनी और संगीता की चाय ले कर कम्मर में पहुँचा| संगीता बाथरूम से निकल रही थी और मेरे हाथ में चाय का कप देख वो सकपका गई|

संगीता: आप? चाय?

मैं: सारी रात सोया नहीं, लेटे-लेटे ऊब गया था तो उठ कर नहाया फिर पूजा की और फिर भी समय नहीं कटा तो सोचा चाय बना लूँ|

संगीता: नींद क्यों नहीं आई? अब भी नाराज हो मुझसे?

मैं: नहीं यार| मैं नेहा के लिए परेशान हूँ|

संगीता: उसके बुरे सपनों को ले कर? जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी ये बुरे सपने आना बंद हो जायेंगे|

मैं: अब और उसे रोते हुए नहीं देख सकता| तुम चाय पियो मैं बच्चों को उठाता हूँ|

बच्चों को उठा कर स्कूल के लिए तैयार किया और इतनी देर में संगीता ने उनका टिफ़िन भी बना दिया| बच्चों को स्कूल छोड़ कर घर आया तो सोचा की माँ-पिताजी से नेहा के बारे में बात कर लूँ|पिताजी अखबार पढ़ रहे थे और माँ साग चुन रही थी| संगीता भी माँ के साथ साग चुन रही थी|

मैं: माँ ... पिताजी... आप लोगों से कुछ बात करनी है|

पिताजी ने अखबार मोड़ के रख दिया और माँ और संगीता भी रूक गए| सबका ध्यान मेरी तरफ था:

मैं: पिताजी मैंने डॉक्टर सरिता को फ़ोन किया था|

पिताजी: किस लिए?

मैं: कल रात को नेहा फिर से ..... (मैंने अपनी बात पूरी नहीं की और पिताजी भी समझ गए|)

पिताजी: बेटा तू क्यों चिंता करते है| बुरे सपने सब बच्चों को आते हैं और चूँकि वो छोटे होते हैं इसलिए दर जाते हैं| जब वो बड़े हो जाते हैं तो उनका ये दर खत्म हो जाता है| तू चिंता ना कर वरना फिर से बीमार पड़ जायेगा|

संगीता: पिताजी कल रात भर नहीं सोये| (संगीता ने मेरी चुगली की|)

माँ: बेटा एक बात बता तू फिर से बीमार पड़ना चाहता है?

मैं: नहीं माँ ऐसा नहीं है| आप एक बात बताओ, क्या आप लोग कभी मेरी आँखों में आँसूं देख पाते थे? फिर मैं अपनी बेटी को रोता हुआ कैसे देखूं? और चलो एक आध बार की बात होती तो ठीक था पर हर तीसरे दिन उसका इस कदर डर जाना?

संगीता(मेरी बात काटते हुए): ये सब मेरी.......

मैं (संगीता की बात काटते हुए): Shut up संगीता!

मैंने संगीता को झिड़कते हुए कहा| उसका कारन ये था की मैंने अपने माँ-पिताजी को संगीता और अपने बारे में सब कुछ नहीं बताया था| वरना उनके मन में शायद संगीता की वो छबि न बन पाती जो मैं चाहता था| अब आप लोग इसे सही कहें या गलत ये आपके ऊपर है|

मेरा इस कदर संगीता को झिड़कना पिताजी और माँ को पसंद नहीं आया क्योंकि वे मुझे घूर कर देख रहे थे| मेरी झिड़की से संगीता सहम गई और खामोश हो गई थी तथा अपना सर झुका कर बैठी थी| मैंने अपनी बात जारी रखी:

मैं: अगर ये सब प्राकर्तिक भी है तो भी मैं एक बार अपने मन की तसल्ली के लिए डॉक्टर से मिलना चाहता हूँ| डॉक्टर सरिता ने मुझे मुझे एक बाल मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अंजलि का नंबर दिया है| मैं उन्हें फोन कर के कल की अपॉइंटमेंट ले लेता हूँ|

पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे, पर तू नेहा को क्या कहेगा?

मैं: यही की आगे चल कर उसे क्या करना है इसके लिए एक जानकार से परामर्श लेने जा रहे हैं| उसे ये सब बोल कर मैं मानसिक रोगी नहीं बनाना चाहता| उसके सामने हम ऐसे ही पेश आएंगे जैसे ये कोई आम बात है|

पिताजी: ठीक है|

इतना कह कर पिताजी उठ कर चले गए|//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg
 
Thanks kamini Ji & naik Bhai //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f337.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg
 
पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे, पर तू नेहा को क्या कहेगा?

मैं: यही की आगे चल कर उसे क्या करना है इसके लिए एक जानकार से परामर्श लेने जा रहे हैं| उसे ये सब बोल कर मैं मानसिक रोगी नहीं बनाना चाहता| उसके सामने हम ऐसे ही पेश आएंगे जैसे ये कोई आम बात है|

पिताजी: ठीक है|

इतना कह कर पिताजी उठ कर चले गए|

अब आगे.........

नाश्ते के बाद पिताजी तो साइट पर निकल गए| पर मैं घर पर रूक कर डॉक्टर अंजलि को फ़ोन करने लगा| एक बार मिलाया, पर नंबर व्यस्त था| पंद्रह मिनट बाद मिलाया फ़ोन फिर से व्यस्त था| अब धीरे-धीरे मन व्याकुल होने लगा और इस बार भगवान का नाम ले कर फिर मिलाया| इस बार.... फ़ोन लग गया| फ़ोन उनकी सेक्रेटरी ने उठाया, मैं गुस्से में इस कदर जल रहा था की मैं उसी पर बरस पड़ा| मैंने उसे इतना डाँटा... इतना डाँटा की वो बेचारी मुझसे माफियाँ माँगने लगी| वो लड़की अपने बॉयफ्रेंड से लैंडलाइन पर बात करने में व्यस्त थी| उसने मुझे परसों की अप्पोइंमेंट दी पर जब मैंने उसे धमकाया तो उसने मुझे कल की अपॉइंटमेंट दे दी| चूँकि कुछ देर पहले मैं उस लड़की डाँट रहा था तो जाहिर था की मेरी ऊँची आवाज मेरी बेगम संगीता के कानों तक पहुँची थी| उन्होंने जब मेरी नाराजगी का कारण पूछा तो मैंने उन्हें सब बात बताई| मेरी बात सुन कर वो भी मेरी बात से सहमत थीं|

मैं: मुझे माफ़ कर दो, मैंने उस समय तुम्हें इस कदर झिड़क दिया| दरअसल मैं नहीं चाहता की तुम उन पुरानी बातों को माँ-पिताजी के सामने दोहराओ| मैंने कुछ सोच-समझ कर उन्हें ये बातें नहीं बताई| और जो कुछ भी हुआ उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी| तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी वही करता|

संगीता: नहीं.... आप नेहा के साथ ऐसा कभी नहीं करते| नेहा के साथ क्या आप किसी भी बच्चे की परवरिश के साथ ऐसी लापरवाही कभी नहीं करते| आप बच्चों से बहुत प्यार करते हो! मैंने जो किया वो बहुत गलत था.... बहुत-बहुत गलत|

मैं: पर अब तो ऐसा नहीं है| अब तो हम सब साथ हैं|

संगीता: शायद... सच पूछो तो अब मेरे अंदर आपके सिवा किसी और के लिए प्यार नहीं बचा| बच्चों के लिए भी नहीं! जानती हूँ की आप उनकी परवरिश बहुत अच्छे से कर सकते हो और करोगे भी|

आगे मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही फ़ोन की घंटी बज उठी| कुछ जर्रुरी काम की वजह से मुझे फटफट निकलना पड़ा| निकलने से पहले मैंने संगीता को एक प्यारी सी झप्पी दी और फिर मैं निकल गया| गाडी चलते हुए मेरे दिमाग में बस संगीता की बातें गूँज रही थीं| मैं जानता था की वो मुझसे कितना प्यार करती है और मुझे पाने के लिए कुछ भी कर सकती है| पर मैं चाहता था की वो बच्चों को भी उतना ही प्यार दे| कहीं मेरे कारन मेरे बच्चे अपनी माँ के प्यार से वंचित न रह जाएँ| मुझे ये बात संगीता को समझनी थी पर सही समय आने पर|

अपॉइंटमेंट वाले दिन मैं, नेहा और संगीता डॉक्टर अंजलि के चैम्बर पहुँच गए| नेहा को बाहर छोड़ कर हम दोनों अंदर डॉक्टर के केबिन में बैठ गए| हमने डॉक्टर साहिबा को सारी बात बता दी|हमारी सारी बात इत्मीनान से सुनने के बाद उन्होंने हमें बाहर बैठने को कहा और नेहा को अंदर बुलाया|नेहा से करीबन 20 मिनट तक बात करने के बाद उन्होंने हमें अंदर बुलाया और नेहा को फिर से बाहर बैठने को कहा| मैंने अपना मोबाइल नेहा को दे दिया ताकि वो उसमें कुह गेम आदि खेले और बोर न हो जाए|

**************************************************आगे अपडेट संगीता लिखेगी|.....
 
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