वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी में करीब सुबह ७ बजे से ही चीफ के केबिन में बैठा....उसका सबसे काबिल और सीनियर डिटेक्टिव अरुण बक्शी था l उसे कल रात को ही चीफ का कॉल आया था जिस बिनाह पे उसे अगले दिन ही हाज़िरी देनी थी l अरुण बक्शी वक़्त का पाबंद था और साथ ही साथ पुलिस के कई पेचीदा केसेस को भी उसने अबतक सॉल्व कर दिखाया था जिस वजह से वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी में उसका रुतबा चीफ के बाद सेकंड हेड के तौर पे था....उम्र लगभग ३० साल थी और चेहरे पे एक अलग ही रौब उभरा हुआ हमेशा रहता था....कॉफ़ी का कप जैसे ही खाली हुआ था I उसी पल चीफ ने अपने कदम केबिन द्वार से अंदर रखे....अरुण ने उठते ही उन्हें गुडमॉर्निंग कहा तो चीफ ने उसे हाथ दिखाके बैठ जाने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए अपने चेयर पे विराजमान होता तत्काल सिगरेट सुलगाया उसने एक बार पलटकर अरुण की ओर देखा और सिगरेट उसे ऑफर करने के लहज़े से सवालात किया...जिसके जवाब में अरुण ने शुक्रिया जताते हुए ना में हाथ हिलाया।
"कहिये सर ऐसी क्या वजह आयी की आज आपको मेरी याद आयी इस फर्म में तो मेरी जगह लेने वाले और भी कई काबिल डिटेक्टिव्स हो चुके"........मुस्कुराते हुए अरुण ने चीफ से कहा।
"हाहाहा देखो अरुण मैं जनता हूँ तुम्हारे काम करने का तरीका अलग है जो मुझे हमेशा से इम्प्रेस करते आया है...और अभी तुम्हारे आगे फर्म के बाकी डिटेक्टिव्स इतने एडवांस नहीं हुए उन्हें भी बहुत केसेस को सॉल्व करना है तब जाके उनमें से कोई तुम्हारी जगह ले पायेगा".....चीफ ने भी मुस्कुराते हुए कहा जिसे सुन अपनी तारीफ में अरुण फूलो न समाया उसे फक्र था अपने पेशे और अपने तजुर्बे पर और उससे भी ज़्यादा वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी का हिस्सा होने पर।
"कल आप मुझे कोई केस के बाबत कुछ बता रहे थे आखिर ऐसी क्या वजह है? जो मेरा इस केस को हैंडल करना इतना जरुरी हो गया।"
"देखो अरुण क्या तुम मेरे इस सवाल का जवाब देना बेहतर समझोगे की क्या तुम्हें भूत प्रेत पिसाच शैतान चुड़ैल इनसब पे यकीन है तुम्हें लगेगा तुम्हारा ये चीफ तुमसे क्या अजीब सा सवालात कर रहा है पर मैं ये जवाब तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूँ।"
"सर,पहली बात पुलिस और डिटेक्टिव की इन्वेस्टीगेशन में कानून,इन्साफ और इंसानी साजिश को छोड़कर किसी भी चीज़ो पे विश्वास नहीं किया जाता भूत प्रेत हाहाहा मैं इनपे कत्तई यकीन नहीं करता और न ही मानता हूँ ये होती है तो क्या मेरे नए केस में कुछ ऐसा ही मसला है".........अरुण ने दिलचस्पी से चीफ की तरफ देखते हुए कहा
"नहीं अरुण ये मैं नहीं कहता ये केस कहता है....दरअसल ये केस काफी कॉम्प्लिकेटेड है और अभी हाल ही में हुए मर्डर ने इसका अट्रैक्शन हमारे नज़रो में किया है...अगर ये केस सॉल्व हो गया तोह मान जाना की वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी की लोकप्रियता और भी बढ़ जायेगी और ये एजेंसी ओवर टॉप पर होगी"
"मैं तो हमेशा से इस एजेंसी के लिए यही उम्मीद करता रहता हूँ सर"
"उम्मीद नहीं अरुण आई वांट रिजल्ट्स खैर केस की तरफ ध्यान देते हुए मैं तुम्हें इस केस के बारें में कुछ चंद बातें बताना चाहता हूँ....डेड लेक का नाम तो सुना ही होगा तुमने".........अरुण ने गौर करते हुए जैसे अध्यन किया
"जो हमारे शहर से १२० किलोमीटर दूर सुनसान जंगल और हाईवे के बीच पड़ता है....उस जगह का नाम डेड लेक आज से नहीं तबसे है जबसे अंग्रेज़ो का मुकम्मल इस शहर में राज था....डेड लेक में एक पुराना झील पड़ता है और ठीक उसके सामने एक पुराना सा वीरान कॉटेज जो कभी उस घर के मालिक और मालकिन का रेजिडेंस होया करता था शहर से दूर उस वीराने में उस कपल ने क्यों घर बनाया ये आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है आज से करीब ३० साल पहले दोनों की एक रहस्मयी तौर से मृत्यु हो गयी थी घर में सिवाए खून के उनकी लाश तक न पायी गयी। लेकिन ये इस केस से जुड़ा दूसरा वाक़्या है उसके बाद वहा इन तीस सालो में कोई नहीं गया लेकिन हाल ही में हुए एक मर्डर ने इस केस को दोबारा रीओपन कर दिया है एक ५० वर्षीय आदमी जिसकी गाड़ी बीच हाईवे पे ख़राब हुयी पनाह के तौर पे उसने उस वीरान कॉटेज में हिम्मत से दस्तक दिया और अगली सुबह किसी हाईवे से गुज़रते मुसाफिर को उसकी गाडी वीरानो में खरी दिखाई दी जब उसने मुयाना किया तो पाया की उस कॉटेज के ठीक सामने बहुत ही बुरी हालत में एक लाश पड़ी हुयी थी उसके ऑर्गन्स बाहर थे जैसे जिस्म को खूब बेदर्दी से किसी धारधार हथ्यारो से फाड़ा हो कॉटेज जिसे मोहरबंद पुलिस ने आज से करीब ३० साल पहले लगाया हुआ था वह दरवाजा खुला था और अंदर जाने की हिम्मत उस मुसाफिर को नहीं हुयी क्यूंकि वो वैसे ही लाश को देखके डर गया था और उसी पल उलटे पाव गाडी में लौटते हुए पुलिस को तुरंत फ़ोन पे सूचित किया ।
"जब आपने कहा दूसरा वाक़्या तो पहले वाक़्या से आपका क्या मतलब?"..........अरुण ने तत्काल सवाल किया
"वही तो रहस्य बना हुआ है उस कॉटेज को जिन मज़दूरों ने बनवाया था उनमें से एक ने पुलिस को ब्यान दिया जब उसने अखबार में उस लाश की तस्वीर कॉटेज के सामने देखी उसने बताया की उसे और बाकियो मज़दूरों को पैसे दिए गए थे क्यूंकि कॉटेज बनने से पहले खुदवाई के वक़्त वहा कई कई ताज़ी और पुराणी लाशें दफ़न थी। और मजे की बात ये है की उसका कहना है की रात होने से पहले ही वो लोग वहा से रुक्सत हो जाया करते थे जिस आदमी ने वहा कॉटेज बनवाया था वो जैसे सब राज़ो से वाक़िफ़ था लेकिन उसकी बदकिस्मती की वो भी वहाँ का एक राज़ बन गया न उसकी लाश मिली और ना ही उसकी पत्नी की....कॉटेज बनने से पहले करीब कई साल पहले की बात की जाए तो वो जगह वैसे ही सुनसान व्यवाण जंगल ही थी और पीछे तालाब और लाशो का जमीन खोद के मिलना साफ़ ज़ाहिर करता है की शहर में हुयी वारदातों का शिकार ूँ खून किये लाशो का वो जगह ठिकाना बन गयी....पहला वाक़्या से जुड़ा एक और वाक़्या मैं बताता जाऊ तुम्हे अरुण....वहाँ अंग्रेज़ो की बनायीं एक पुराणी सी ब्रिज थी जो किसी दुर्घटना में गिर गयी और आज भी उसके कुछ जर्जर अंश वहाँ मौजूद है सुना गया था की ६० लोगो से ज़्यादा अँगरेज़ मुसाफिरों की उस वक़्त मौत हुयी और वो सब के सब उस दलदल में गिरते चले गए....सुना है की वो दलदल अब वहाँ मौजूद नहीं लेकिन एक भी विक्टिम का पता न चला था सब के सब मारे गए थे"
अरुण ने चीफ के खामोश होते ही बड़ी गौर से सोचते हुए कुछ पल बिताये उसके बाद चीफ के ही कुछ कहने का इंतज़ार किया चीफ ने अरुण की तरफ देखा
"देखो अरुण वैसे तो ये जान जोखिम जैसा केस है मर्डर्स होना किसी साज़िश का अबतक का दावा है जिसपे हम विश्वास करते है लेकिन मुझे क्यों नहीं लगता की ये साज़िश नहीं किसी और वजह से हो रहा कोई ऐसा रहस्य है जिससे हम नावाक़िफ़ है इसलिए मैं चाहता हूँ तुम अपनी पूरी मर्ज़ी से इस केस पे ध्यान दो और पता लगाने की कोशिश करो की आखिर वो क्या रहस्य है पता लगाओ"..........चीफ को इतना किसी केस में दिलचस्पी लेता देख पहली बार अरुण ने देखा था।
चीफ उर्फ़ प्रकाश वर्मा अपने वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी के हेड थे हर कोई उन्हें सर से ज़्यादा चीफ कहता था...यही नहीं वह कई केसेस में जूनियर्स की हेल्प तक करते आये थे जिन वजह से उन्हें मास्टर चीफ भी कहा जाता था। अरुण बक्शी को दिए उस केस से कई उम्मीदेँ चीफ को अरुण बक्शी से थी। कारण उसके एजेंसी उसके फर्म की नीव इज़्ज़त और कामयाबी का जरिया दूसरी ही ओर अरुण बक्शी जैसे होनहार के आगे एक चैलेंज न कहना जैसे उसके कायदे में नहीं था।
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पुलिस डिपार्टमेंट को वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी का जब रिक्वेस्ट आया की वो उस डेड लेक केस को हैंडल करना चाहते है तो उन्होने काफी सोच विचार के बाद थक हारके ये केस चीफ के फर्म को सौंप दिया...इस केस को हैंडल करने का एकमात्र भार अरुण बक्शी के कंधो पर दे दिया गया...उस दिन से ही अरुण बक्शी ने डेड लेक जाने का दौरा किया...लेकिन वहाँ सिर्फ मुआना नहीं वहाँ रूककर उस रहस्य को जानने का निश्चय भी कर लिया था। यही उसकी ज़िन्दगी की आखरी भूल थी यूँ तो उसने कई जोखिम कई केसेस में उठाये थे पर उस केस में उठाके उसे जैसे ज़िन्दगी की एक सबसे बरी भूल कर देनी पड़ी थी जब उसे इस बात का अहसास हुआ तबतक देर हो चुकी थी बहुत देर
रात के उस वक़्त वो गाडी तेज़ी से अपनी गति में चलते हुए हाईवे रास्ते से गुज़र रही थी....गाड़ी में वो अकेला मुसाफिर था खुद अपनी गाड़ी ड्राइव कर रहा था...गाडी शहर से कोसो दूर आ चुकी थी आगे आगे दूर दूर तक उसे नीम अँधेरे और कभी न खत्म होने वाली सड़क ही दिख रही थी....जिसपे हेडलाइट की रौशनी फैकते हुए उसकी कार आगे बढ़ रही थी....इतने में उसे अहसास हुआ की करीब ७ घंटो से वो महज़ गाड़ी ही ड्राइव कर रहा है....उसके हाथ अब स्टीयरिंग व्हील को पकडे दुखने लगे थे...उसने एक बार चारो तरफ देखा और फिर गाडी बीच सड़क पे ही रोक दी...न उस तरफ से कोई वहां उसे आता दिखा और न अपने बैक साइड से....उसने गाडी थामी.....फिर हेडलाइट्स ऑफ किये....गाड़ी से बाहर निकलते ही उसे अहसास हुआ सर्द हवा का...घने जंगल में जैसे हवाएं भी तेज़ हो उठी थी....उसने अपने जैकेट को और सकती से अपने जिस्म से ढांक लिया और अपने दोनों बाज़ुओं को हाथो से सहलाते हुए पॉकेट से एक सिगरेट बाहर निकला....छक्क से लाइटर की आवाज़ हुयी और सिगरेट सुलग गयी..एक-एक कश लेता हुआ धुएं को छोड़ते अपने होंठो के बीच से....वो एक बार चारो तरफ गौर करता है.....अचानक उसे दिखता है।
कि सामने एक पुराण सा कॉटेज है और हलकी सी रौशनी ठीक दरवाजे से सटे खिड़की से बाहर कि ओर पढ़ रही है..."एक सुनसान व्यावान जंगलो के ठीक बीच बना वो कॉटेज उस शख्स को जैसे अपनी तरफ खींच रहा था...शख्स के मैं में यही बात उठी की इतनी शहर से दूर एक सुनसान जंगल और हाईवे के रास्ते कोई रहता भी है। धीरे धीरे वह घडी की तरफ निगाह दौड़ता है जो उसके कलाई पे बंधी होती है......रात बारह बजके पेंतालिस ऐसे में अब उसमें और ड्राइव करने की ताक़त तो न बची थी....सिगरेट का एक लम्बा कश लेते हुए वो आगे बढ़ता है....वो उस शहर से नहीं था अगर होता तो वाक़िफ़ होता की वो कॉटेज कई राज़ो में दफ़न था अगर वो वाक़िफ़ होता तो उस कॉटेज के करीब न बढ़ता बल्कि वहां अपनी गाड़ी तक न रोकता...उसने एक बार कॉटेज के दरवाजे के दो हाथ फासले खड़े होके एक बार उसने कॉटेज का जायज़ा लिया।
उसकी बनावट ही उसकी पुराने होने की गवाही दे रहा था...लकड़ियों से बना वो कॉटेज करीब काफी लम्बाई और चौड़ाई में था....उसका पिछला हिस्सा जंगल की ओर था जिस ओर तालाब था और वही से जंगल शुरू हो रहा था.....रात के उस घने....सिगरेट को उंगलियों में फसाये कई पलो तक अपलक खड़ा वो आदमी धीरे से दरवाजे पे दस्तक देता है....उसके दरवाजे पे दस्तक देने से पहले ही दरवाजा अपने आप चर्चारती आवाज़ के साथ खुलने लगता है....वो आदमी ठिठकते हुए दरवाजे के पुरे खुल जाने तक वैसे ही मूर्ति के भाति खड़ा रहता है....
अगले ही शरण उसे सामने एक लम्बे डेस्क के पीछे एक कुर्सी पे बैठा आदमी दीखता है जिसने काले रंग की फ्रेम का चश्मा पहना हुआ था....जैसे जैसे वो आदमी अंदर दाखिल होता है....उसे अपने कदमो की आवाज़ खुद उस खामोशी में सुनाई देने लगती है.....एका एक वो बैठा शख्स अपने सर को ऊपर उठाये सामने खड़े आदमी को देख मुस्कुराता है।
"बोलिये सर"...........हैरत से देखता वो आदमी उस शख्स को घुररता है उसके मुस्कुराते चेहरे से वो न जाने क्यों एक पल को अजीब सा महसूस करता है
"जी दरअसल वो क्या ये कोई होटल है? मुझे आज की रात यहाँ रुकना है"........
"जी सर बस आप जैसे ही कुछ मुसाफिर यूँ भटकते हुए या राह गुज़रते हुए बस यहाँ आ जाते है कभी कभार"
"जी चार्जेज?".......आदमी अपने जेब से निकालते नोट देने के लहज़े से कहता है
"जरुरत नहीं पड़ेगी"
"मेरा मतलब है जब आपको यहाँ से जाना होगा तब अदाई कर दीजियेगा यहाँ का यही उसूल है"
"जी बस मुझे एक रात के लिए रुकना है"............जैसे सुन वो बैठा शख्स मुस्कुराता है
"चलिए मैं आपको आपका कमरा दिखा देता हूँ".........बिना कुछ कहे रिसेप्शन से उठते हुए वो शख्स आदमी के साथ साथ चलने लगता है
इस बीच उस आदमी को अजीब लगता है...न कोई कर्मचारी न ही किसी के होने का अहसास ऐसा लगता है जैसे उस गुमनाम कॉटेज में उस घडी सिर्फ वो अकेला ही है....न उसने सवालात किया न कुछ पहचान के तौर पे कोई छानबीन की उससे...उसे ये बर्ताव देख अजीब लगा....लेकिन वह खुद उस घडी काफी थका और बध्यान था। वो शख्स दरवाजा खोलता हुआ मुस्कुराये उसे देख वापिस उलटे पाव जाने लगता है लेकिन दो कदम आगे बढ़ते ही वो रूककर पीछे घूमते हुए फिर उसी मुस्कुराये चेहरे से उस आदमी की ओर देख पूछता है कि "रात का खाना?"........"जी नहीं शुक्रिया वैसे एक बात पूछनी थी आप यहाँ अकेले रहते है? या इस कॉटेज का कोई और भी मालिक है?".........."हाहाहा जी नहीं यहाँ का मैं ही मालिक हूँ मेरा नाम जोसफ मैं अपनी बीवी मैरी के साथ यहाँ रहता हूँ। चलिए आप आराम कीजियेगा और हाँ अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो आप बस मुझे याद कीजियेगा गुड नाईट "..........इतना कहते हुए वो एक शरण में तेज़ कदमो में जैसे चलते हुए उस गुप् अँधेरे सीढ़ियों में उतारते हुए जैसे गायब हो गया....
सबकुछ जैसे वाक़ई बेहद अजीब था....ज़्यादा दिमाग पे जोर न देते हुए उस आदमी ने दरवाजे को खोला और कमरे के भीतर कदम रखा.....उसने एक बार कमरे का जायज़ा लिया। ऐसा लगता नहीं था की कोई भी चीज़ नयी हो सब बेहद पुराणी थी....बस एक छोटी सी खिड़की थी जो अध्खुली थी...उसे खोलते ही तेज़ सर्द हवा जैसे उसके चेहरे से होके गुज़री...उसका जिस्म काँप उठा और उसने तुरंत खिड़किया और परदे लगाए...बिस्तर पे ढेर होते हुए उसे अहसास हुआ की जैसे नींद उसे अपनी आगोश में खींचना चाह रही थी। उसने उठके अपने कपड़े उतारे वापिस अपने बिस्तर पे आके लेट गया कुछ ही पल हुए थे उसे लेटे हुए की अचानक उसे एक बेहद अजीब सी चीख सुनाई दी...वो इतनी करीब से सुनाई दे रही थी कि एक पल को वो आदमी फ़ौरन बिस्तर पे जैसे एक झटके में उठ बैठा....ख़ामोशी छायी हुयी थी उसे लगा की शायद ये उसका वेहम था लेकिन अभी तो उसने एक दिल को दहला देने वाली चीख सुनी थी.....उसने जैसे ही अभी लेटने का निश्चय किया ही था की एकदम से वो चीख दोबारा गूंज उठी...."आह्ह्ह्हह्ह्हह्हह्ह्ह्ह".....वो आवाज़ किसी औरत की थी किसी के दर्दनाक चीख थी वो आवाज़...."कौंन है?"......जोर से कह उठा और पलंग से उतर खड़ा हुआ वो आदमी।
इतने देर में उसे अहसास हुआ की वो आवाज़ करीब क्यों सुनाई दे रही थी? न वो चीख बाहर से आ रही थी और न ही उसके अपने कमरे से बल्कि वो चीख ठीक उसके बाए ओर से आ रही थी...धीरे धीरे लकड़ी के उस दिवार पे हाथ फेरते हुए आदमी ने अपने कानो को जैसे खरा किये उस दिवार से चिपका लिए......आने के वक़्त उसने पाया था की सब दरवाजे बंद थे और उनपे ताले झूल रहे थे....यानी उसी के आने से ये कमरा सिर्फ खुला छोड़ गया था जोसफ.....अभी कुछ शरण उसने सोचा ही था की इतने में फिर एक खौफनाक दर्द से भरी वो दहाड़ वो चीख उसके कानो में जैसे सुनाई दी...."कौंन है?".......उस आदमी ने जोर से हड़बड़ाते बड़ी बड़ी सांस लेते हुए दिवार पे एक लात मारें कहा
उसकी आँखे जैसे बाहर निकलने को आ रही थी......उसका कलेजा काँप उठ रहा था...क्यूंकि सामने की वो लकड़ी की दिवार का एक एक पल्ला अपने आप उसे गिरता दिखाई दे रहा था.......वो अब उसकी कल्पना से कई भयंकर मंज़र में तब्दील होने को थी...और ठीक उसी पल!
"आह्ह्ह्ह ससस उफ्फ्फ क्या भयंकर सपना था?"........उस आदमी ने अपने चेहरे पे आते पसीने को पोंछते हुए पाया की वह एक बुरा ख्वाब दे रहा था...उसके जान में जैसे जान आयी...और जैसे ही उसे अहसास हुआ की वो महज़ सपना नहीं था....वो जिस बिस्तर पे लेटा हुआ था। उसपे धुल जमी हुयी थी सिर्फ वही नहीं उस पुरे कमरे की ऐसी हालत हो राखी थी जैसे कई सालो से वो जगह बंद पड़ी हुयी हो....कमरे के चारो तरफ मकड़ियों के जाली और पुराने उन मूर्तियों पे धुल और मकड़ियों की जाली लगी हुयी थी....कमरे के सब चीज़ो का वही हाल था...स्विच बोर्ड काम नहीं कर रहा था.....एक पल को उस आदमी को अहसास हुआ की जब वो यहाँ आया था तब कॉटेज ऐसा नहीं था सबकुछ सलिहत से था। जबकि जोसफ ने खुद उसके सामने बत्ती जलाई थी जो अब काम नहीं कर रही थी उसने जब सर उठाया तोह पाया की वो लैंप जो न जाने कितने दिनों से दिवार पे लगी हुयी थी आधी टूटी हुयी झूल रही थी।
एक पल को ऐसा लगा जैसे वो कही और पहुंच गया हो वो भागता हुआ दरवाजे खोलके बाहर की ओर निकला उसे अँधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था...एक पल को जब वो सीढ़ियों के करीब पंहुचा तो उसे किसी के वहाँ होने की आहट सी हुयी उसने अपना लाइटर जेब से निकला और कांपते हाथो से जैसे जलाया तो उस हाथ ने आगे बड़के उस जलती आग पे अपना हाथ रखते हुए सकती से लाइटर पकड़े उस आदमी के हाथ को जैसे थाम लिया
"नं..नही छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे बचाओ somebuddy हेल्प"......वो उलटे पाओ भागना चाह रहा था लेकिन तभी उसे सकती से उस हाथ ने जैसे अपनी तरफ खींचा हो और ठीक उसी पल वो आदमी अपना संतुलन खोते हुए सीढ़ियों पे ही लुड़कते हुए नीचे जा गिरा
जब उसे होश आया तो सामने जोसफ खड़ा मजूद था और वो वैसे ही मुस्कुरा रहा था। हड़बड़ाते हुए वो आदमी उठ खरा हुआ "ओह माय गॉड उफ़ ये सब क्या हो रहा है? ये सब ये कॉटेज को क्या हुआ ऐसा लग रहा है जैसे बरसो से यहाँ कोई नहीं आया सबकुछ ऐसे क्यों? मेरी आँखे कॉटेज में घुसते वक़्त धोका नहीं खा सकती वो चीख जो मैंने सुनी वो बगल का वो कमरा"..................
"हाहाहा हाहाहा हाहाहाहा ".........जोसफ एक एक ठहाका लगाए हस्सन लगा
"हस्स क्यों रहे हो? I said why are u laughing ?".....जोर से उसे अपनी ओर खींचते ही जैसे उस आदमी के प्राण सुख गए..क्यूंकि सामने ठहाका लगाए जोसफ जैसे नहीं था उसके दोनों आँखों से खून बह रहा था और उसकी दोनों आँखे जैसे एकदम सुर्ख लाल हो रही थी
ये भयानक मंज़र देख वो कापते हुए पीछे होने लगा..."न..नहीं नहीं नही दूर रहो मुझसे"......वो दरवाजा खोलने के लिए आगे बड़ा की इतने में उसे अपने पाव सुन परे महसूस हुए वो चाहते हुए भी आगे एक कदम और न बढ़ सका
"आज से नहीं कई सालो से ये वीरनियत ये सुनसनीयत छायी हुयी है न कभी बाहर से किसी ने दरवाजे पे दस्तक दी न ही कभी किसी ने यहाँ आने की कोशिशें की कितने खुश थे हम कितने खुश? न जाने क्यों आये थे हम यहाँ? खो दिया मैंने अपना सबकुछ सबकुछ अपनी बीवी मैरी को खुद को और हमारे जिन्दगियो को".........जैसे दहाड़ उठा वो भयानक आवाज़ में तब्दील होता जोसफ
"ये ख्वाब नहीं यही हकीकत है वो आवाज़ किसी और की नहीं मौत की उस दर्दनाक चीख की आवाज़ है जो आज यहाँ फिर गुज़रेगी जो साये इतने सालो से जिस इंसान के इंतज़ार में थे वो अब फिर एक बार सुनने को चाह में है हाहाहा हाहाहाहा ".....एका एक भयंकर होती चली गयी जोसफ की वो हसी और उसी शरण किसी के तेज़ कदम ठक ठक सुनाई देने लगे उस आदमी को
जोसफ के रख्त हीन चेहरे पे जैसे मुस्कराहट छाने लगी उसकी गर्दन अपने आप पीछे की ओर सीढ़ियों से उतरती उस साये की ओर हुयी...एक एक उस आदमी की भी निगाह उस साये की ओर हुयी और जो उसने देखा उससे उसका कलेजा मुंह को आने लगा....एक मैली सी nightie उसने पहनी हुयी थी जिसपे खून के अनगिनत धब्बे लगे हुए थे वो चल ज़रूर रही थी लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुर्दा कब्र से उठके उसके सामने आ रहा हो....घसीटते अपने पाव को एक बार जब उसके चेहरे की ओर निगाह हुयी तो अहसास हुआ की उसकी आँखे उसके चेहरे पे दिख ही नहीं रही थी बस उन जगहों से खून का क़तरा बह रहा था...."मिलो इससे मेरी वाइफ माय लवली मैरी"....दोनों साये जैसे एकदूसरे को थामे उसे लगभग बेहोश कर देने वाले थे...
जैसे तैसे हड़बड़ाते खौफ्फ़ में चीखते चिल्लाते हुए उस आदमी ने कॉटेज के दरवाजे को झिंझोड़ डाला उसी शरण दरवाजा खट्ट से खुल गया। वो अंधाधुंध उस नीम अँधेरे में न जाने किस ओर भागे जा रहा था...वो इतना डर गया था की पीछे मुड़के देख भी नहीं सकता था की कब उसके सामने वो दोनों खड़े हो जाये ...और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ की वो घने जंगलो के बीचो बीच था खामोशी छायी हुयी थी अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था उसे ख्याल आया की जलने के लिए उसके पास टोर्च पीछे गाडी में छूट गयी थी उसने जैसे तैसे पेड़ की आड़ में खुद को छुपाते हुए सिगरेट अपने होंठो के बीच फसाया और कांपती हाथो से जब लाइटर तलाशने लगा तो अहसास हुआ की वो पीछे उस कॉटेज में वो छोड़ आया था...उसने घरी पे नज़र दौड़ाई अभी वक़्त कोई ३ बजे ही थे...अचानक उसे किसी की आहट सुनाई दी
और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ कुछ अजीब सा...एका एक वो आहट उसके बेहद करीब सुनाई देने लगी...उसकी अपलक दृष्टि अपने पीछे की ओर थी...और ठीक उसी पल उसने पाया की वहाँ कोई मौजूद नहीं था आहट भी सुनाई अब नहीं दे रही थी....उसने एक लम्बा सांस खींचते हुए अपने आप पर काबू किया...और ठीक उसी पल उसे उस अजीब चीज़ ने जैसे अपनी ओर आकर्षित किया "ये आवाज़ कैसी?"....एका एक उसके कदम उस ओर बढ़ चले....और जैसे ही वो पास आया ठीक उसी पल उसने खदकते उस दलदल की ओर देखा...."नं..नही नही ये नहीं हो सकता नहीं"....कधकते उस दलदल में से एक एक कर बहुत से हाथ निकलने लगे थे....एका एक उसे अहसास हुआ की वो हाथ जैसे इंसानो के नहीं किसी मुर्दा के थे उन हाथो पे ज़ख्म और खून था और तभी उसे किसी ने जोर से धक्का दिया...
वो दलदल में जा गिरा...और ठीक उसी पल उसे उन हाथो ने दबोचा "नहीं न..नहीं नहीं छोड़ दो मुझे जाने दो नही"...वो घुटती आवाज़ में तड़पते हुए चिल्लाये मदद की गुहार लगा रहा था...लेकिन कौन उस वीराने में उसकी सुनता? सामने उसने देखा की जोसफ और उसकी पत्नी मैरी खरे ठहाका लगाए जा रहे थे उनकी हसी पुरे घने वादियों में गूंज रही थी...."नही नहीं नही छोड़ दो मुझे नहीं"......दलदल उसे अपने गिरफ्त में लिए अंदर खींच रहा था उस आदमी ने पूरी कोशिशें की लेकिन उन हाथो ने उसे जैसे कसके थामे रखा था...एक ने उसकी गले को पकड़ा तो एक ने उसकी गर्दन को एक ने उसके सांस घुटते चेहरे को दबोचे रखा हुआ था....और कुछ ही शरण में एक और चीख गूंज उठी एक और दर्दनाक चीख।
अपने चीफ प्रकाश वर्मा से मिलने के बाद से ही अरुण ने इस केस पे अपना पूरा ध्यान लगा दिया था......वो हाल ही में हुए उस आदमी के ब्रूटल मर्डर और उससे भी ज़्यादा उसके रहसमयी मौत की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ था......केस को हैंडल करते ही चीफ ने केस से जुडी तमाम सबूत अपने डिटेक्टिव अरुण बक्शी के लिए मुहैया करवा दिया था। अरुण ने उन तस्वीरो पे निगाह दौड़ाई तो जैसे उसका जिस्म सिहर गया। उसने आज तक कई केसेस में डेडबॉडी को काफी करीब से देखा था लेकिन कोई भी खून उसने इतनी बेदर्दी से हुयी नहीं देखी थी। तस्वीर में साफ़ लाश की बुरी हालत ब्यान हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी हिंसक जंगली जानवर की ही ये हरकत हो सकती है जिसने इतनी बेदर्दी से लाश को चिर फाड़ा था की उसके शरीर की सभी ऑर्गन्स बाहर निकले हुए थे। न जाने क्यों वो उस रात वहां गया था अपनी मौत के लिए।
सूत्रों के अनुसार वहां लाश को छोड़के किसी भी अन्य शख्स का कोई सुराग न मिला था। पुलिस ने काफी तफ्तीश और जांच पड़ताल के बाद ये शक किया था की जो ३० साल पहले कॉटेज को सील कर गयी थी वो अचानक से कैसे खुली? क्या ये हरकत उस मुसाफिर की थी जिसकी बेदर्दी से वहां मौत हुयी थी या फिर कोई और वजह.......अरुण ने काफी जांच पड़ताल किया और एक चक्कर पुलिस डिपार्टमेंट का भी काट आया जहा उसे मालूम चला की कॉटेज में सबकुछ ऐसे हालातो में था जैसे बरसो से वह कोई न आया हो सभी कमरों में ताले झूल रहे थे कॉटेज जर्जर होने के आलम में था.....कोई भी ऐसा सुराग हाथ न लगा जिससे ये महसूस हो की वहां कोई और भी मौजूद था....बस लाश के ही जूतों के निशान पीछे तालाब के नज़दीक पाए गए थे जैसे उसने भागते हुए जंगलो का ही रुख किया था फिर उसे मार्के उसकी लाश कॉटेज के सामने किसी ने फैक दी पुलिस को यही शक था की मर्डर किसी जंगली जानवर ने किया हो सकता है....
लेकिन अरुण बक्शी पेशेवर डिटेक्टिव था उसने कॉटेज से आज से करीब ३० साल पहले जो मर्डर्स हुए उस कपल के जो उस कॉटेज के मालिक और मालकिन थे उसके बाबत सवाल किया तो उसे मालूम चला की दोनों में से न ही किसी की लाश मिली और ना ही किसी का कोई सुराग ऐसा हुआ जैसे आसमान उन्हें निगल गयी या ज़मीन उन्हें खा गयी उनकी सारी चीज़े वैसे ही वह मौजूद थी जो आज भी वहाँ मौजूद है। अरुण बक्शी ने फिर अंग्रेज दौर में बने उस ब्रिज का ज़िकर किया जो उस कॉटेज से काफी नज़दीक था तो कमिश्नर ने सिर्फ इतना कहा की कोई ख़ास जानकारी तो नहीं पर आप उसे इंटरनेट पे आसानी से उसकी हिस्ट्री निकालके पढ़ सकते है। वो ब्रिज रेलवे की थी और १० साल के अंदर ही वो ठहर न पायी और उस दुर्घटना के बाद फिर किसी ने उस ब्रिज के तरफ ध्यान न दिया वो आधा टुटा ब्रिज आज भी वैसे ही वहाँ मौजूद है उसका रास्ता घने जंगलो से होके जाता है।
अरुण बक्शी को घर आते आते शाम हो गया। वो अकेला रहता था उसके परिवार उसके साथ नहीं थे। घर आकर उसने थके हारे महसूस करते ही खुद को.....पास रखी व्हिस्की की वो बोतल निकाली और उसका एक जाम बनाये उसे पीने लगा....आँखों में नींद ना थी उसके जैसे किसी गहरी सोच को बुनता जा रहा था। उसी श्रण उसने अपने लैपटॉप को खोलते हुए उसमे इंटरनेट ऑन किया उसने डैड लेक के पास वाली उस ब्रिज की हिस्ट्री काफी मशक्कत के बाद आखिर निकाल ली....अरुण की आँखे बड़ी ही गौर से उस आर्टिकल को पढ़ रही थी।
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वो रात करीब १० बजे का वक़्त था। 1933 का वो दौर जब अंग्रेजो का मुकम्मल शाशन हिंदुस्तान के सर जमीन पे था। उस रात घने जंगलो से गुज़रती हुयी ईंधन के धुएं को छोड़ती वो ट्रैन बड़ी ही तेज़ी से रेल ट्रैक पे चल रही थी। पेसेंजरो में ज़्यादातर अँगरेज़ थे जिनमें कुछ वृद्ध कुछ व्यापारी तो कुछ अफसर हर कोई अपनी कीमती सूट,कोट और लिबासो में सार्ड उस रात की हवाओ को महसूस करते हुए अपने अपनों में व्यस्त बैठे हुए थे....ट्रैन जैसे ही उस लाल ब्रिज पे चढ़ने लगी तो ट्रैन चालक को अहसास हुआ ट्रैन के ज़्यादा हिलने का उसने पहले तो गौर नहीं किया लेकिन जब ट्रैन बहुत ज़्यादा कांपने लगी तो उसे अहसास हुआ की कोई खतरा था...उसने खिड़की से झाका तो उसके प्राण काँप उठे क्यूंकि कई लम्बी ब्रिज के ऊपर चूँकि ट्रेन गुज़र रही थी और सिर्फ गुज़र नहीं रही थी वो बहुत ज़्यादा हिल रही थी....जल्द ही ट्रैन के हर पैसेंजर्स को समझ आने लगा और वो इस खतरे को भांप गए..........ट्रैन जैसे ही आधे ब्रिज पे आयी होगी की ब्रिज की ईमारत जैसे अब बुरी तरीके से टूटने के कगार पे आ गयी....एक एक इट करीब आती ट्रैन के वजहों से उसके भार को संभाल न पाते हुए टूट टुटके गिरने लगी थी...."ओह गॉड ओह जीसस सेव अस"....पैसेंजर को शान्तना देते हुए ट्रैन में सवार उन कर्मचारियों ने शान्ति बनानी चाही लेकिन जब ट्रैन एकदम बुरी तरीके से हिल उठी तो उनके वो शान्तना भी किसी काम न आ सके
और ठीक उसी पल हड़कंप मच गयी चीख चिल्लाहट और शोर मचने लगा खौफ्फ़ से हर कोई सिहर गया। और ठीक उसी पल ब्रिज एक अजीब सी भयंकर गूंज के साथ टूट गया ट्रैन सीधे उस आधे टूटे ब्रिज के साथ करीब १०० फट निचे गहरी खाई में जा गिरी उसके बाद जो बेहद भयंकर हादसा हुआ उसे ब्यान करना मुश्किल है......मलवो की ढेर आग में लापति पैसेंजर्स की बॉगी और कटी लाशें जैसे बिछी हुयी थी। "आहहह ससस कोई है कोई है आहहह"........उस भीषण एक्सीडेंट के बाद भी जैसे उस बेजान जिस्म से एक घुटती सी चीख निकल उठी....वो घायल लड़की ने अपने आस पास जब नज़र फैरा तो उसे उसी की हालत में कई लाशें और बुरी हालत में दिखी तो कही मलवो का ढेर और उससे उठता धुआँ..उसने निकलना चाहा पर उसे अहसास हुआ की वो एक दलदल में जा फसी थी और सिर्फ वही नहीं जो लाशें जो मलवो का ढेर वहाँ आस पास था हर चीज़ उस गहरे दलदल में डूबती जा रही थी।
एक बार फिर आतंकित भाव से उसने चीखते चिल्लाते हुए मदद की गुहार लगायी..."somebuddy हेल्प somebuddy plss हेल्प me "............वो डूबती चली गयी हर चीख घुटती चली गयी....और ठीक उस दलदल में छटपटाते हुए उसका जिस्म अंदर तक दुब गया सिर्फ बाहर ठहर गया तो सिर्फ उसके खून से सने वो हाथ और उसके बाद जैसे सबकुछ फिर खामोश हो गया
"उफ़ कितना भयानक सपना था"...........पसीने से लथपथ जब अरुण को अहसास हुआ की वो एक बेहद भयंकर सपना देखकर उठा था तो जैसे उसकी जान में जान आयी
उसने वाशबेसिन के पास जाके अपने चेहरे पे पानी डाला और अपने चेहरे को पोंछते हुए मुड़कर पाया की बिस्तर पे उसका लैपटॉप खुला था और वो कब आर्टिकल वो पढ़ते हुए सो गया उसे पता न चला...उसने पास आके एक बार उस पुरानी सी तस्वीर जिसमे उस ट्रैन और ब्रिज दुर्घटना के मलवो का कुछ हिस्सा और कुछ लाशें ही दिख रही थी उसे गौर से देखा। उसके बाद काफी जांच पड़ताल के बाद पुलिस को महज़ वो एक दुर्घटना लगी और उसके बाद अंग्रेज शाशन के ख़त्म होते ही फिर दोबारा कभी उस हादसे का कुछ मालूमात न चला आर्टिकल को पड़ते हुए अरुण ने उसके राइटर का नाम जाना उसका नाम था मोह्द दीप अरुण ने पाया की वो आर्टिकल किसी परोनॉमल साइट पे लिखा हुआ था और उस साइट पे ऐसे ही कई तमाम किस्से और उनके हिस्ट्री ज़्यादातर उस मोह्द दीप ने लिखे थे। अरुण को लगा शायद इस केस की बाबत उसे और जानकारी उस मोह्द दीप से मिल सकती है लेकिन उसने जो निर्णय लिया था खुद वहाँ उस बंद कॉटेज में ठहरने का शायद उसपे शायद ही उसका बॉस चीफ प्रकाश वर्मा इजाजत देता।
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कई महीने गुज़र गए लेकिन अरुण बक्शी की इन्वेस्टीगेशन में उसे कुछ भी ख़ास कामयाबी न मिल सकी उसने फैसला किया की अब उसे अकेले ही शायद इस पुरे गुत्थी को सुलझाना होगा जो की बेहद खतरनाक फैसला था उसका। जैसे जैसे वक़्त बीतता गया पुलिस का भी ध्यान उस केस से उठ चूका था यही यकीन था की वारदात को अंजाम किसी जंगली जानवर ने दिया था यही पुलिस की अबतक की इन्वेस्टीगेशन का हिस्सा था.....जिस वजह से धीरे धीरे उस कॉटेज से फिर एक बार सबकी निगाह हट चुकी थी।
अपने ऑफिस के केबिन में बैठा वो २८ वर्षीय नौजवान लैपटॉप में उस फिल्म को देख रहा था....जिसमें एक ज़िंदा मुर्दा कबर की मिट्टियो से खुद पे खुद निकल रहा था....लड़की चीखें जा रही थी और साथ में खड़ा उसका हाथ पकडे वो युवक भी खौफ्फ़ से सहमा हुआ था....दोनों भागते हुए अपनी गाडी की ओर आये ही थे की तभी उस लड़की के दोनों गले पे उन हाथो ने अपनी पकड़ मज़बूती से बिछा ली लड़की चीख रही थी चिल्ला रही थी और ठीक उसी पल लड़का बौखलाए उलटे पाव जैसे ही पीछे की ओर पलटा उसे अपने चारो तरफ वैसे ही ज़िंदा मुर्दे अपनी तरफ आते दिखे वो चीखता रहा चिल्लाता रहा और एक एक कर सबने उसे जैसे अपने गिरफ्त में खींच लिया उसके बाद एक दर्दनाक चीख की गूंज उठी और ज़मीन पे एक सर कटी लाश गिर उठी।
"डिसगस्टिंग उफ़ is this what u called horror ?"...........उस नौजवान ने एक नज़र अपने राइटर साहिल की ओर दौडाते हुए कहा
"अब यही हमसे हो पाया आखिर फिल्म में"..........अपनी मज़बूरी को ज़ाहिर करते हुए साहिल ने कहा जो उस फिल्म का स्क्रिप्ट राइटर था
"देखो साहिल पिछले दस फिल्मो से हमारी प्रोडक्शन को काफी नुकसान हो रहा है और ये सब की वजह है लॅक ऑफ़ ऑडियंस आर यू अंडरस्टैंड व्हाट आई ऍम सेइंग टू यू"...........साहिल ने डायरेक्टर एंड प्रोडूसर राम के बातों में अपने सर को सहमति में हिलाते हुए जैसे स्वीकार किया
"तो फिर ये समझो की इस साल मुझे एक हॉट फिल्म के साथ साथ एक हॉरर बेस्ड मूवी फिरसे शूट करनी है और मुझे एक कम्पलीट फ्रेश स्क्रिप्ट की दरक़ार हैं और वो उम्मीद तुमसे है और वैसे भी प्रोडक्शन का जो हाल है अगर ये फिल्म भी फ्लॉप रही तो मुझे लगता है प्रोडक्शन हाउस मेरी क़र्ज़ में ज़रूर डुब जाएगी"...........एका एक राम ने सिगरेट जलाते हुए उसे अपने होंठो पे फसा लिया ।
"रिलैक्स सर इस बार मैंने तफ्सील से एक ऐसी स्टोरी लिखी है जिसे पढ़कर आप पक्का मेरी स्क्रिप्ट को सेलेक्ट कर लेंगे लेकिन हम्हें लोकेशन एकदम वैसी ही चाहिए"
"हॉन्टेड"......एका एक मुस्कुराते हुए राम ने कहा
साहिल ने सर सहमति में हिलाते हुए मुस्कुराया......"एक है मेरी नज़र में डैड लेक का नाम तो सुना ही होगा वहाँ एक कॉटेज है उस कॉटेज में हुए करीब २ वारदातों ने उसे हॉन्टेड हाउस घोषित कर दिया है और मजे की बात ये है की मैं वही अपने नए फिल्म को शूट करूँगा और इस बार मुझे यकीन है की हमारी फिल्म पहले से ज़्यादा बिज़नेस करेगी"
"पर सर उस जगह में तो अभी हाल ही में एक हादसा हुआ था हादसा नहीं मर्डर"
"हाहाहा हुआ होगा हम कौन सा वहाँ रहने जा रहे है २ दिन में ही अपनी शूटिंग ख़त्म करके वापिस हाहाहा"...........साहिल भी मुस्कुराते हुए जैसे राम के बातों से सहमत था।
राम पेशे से एक डायरेक्टर था जो लौ-बजट फिल्म्स का निर्माता था उसने काफी फिल्मो को न ही सिर्फ प्रोडूस किया बल्कि उसे डायरेक्ट भी किया था....उसकी फिल्में ज़्यादातर हॉरर एलिमेंट के साथ साथ अश्लीलता को दर्शाती थी यही वजह थी की कई बार तो उसकी फिल्में कॉन्ट्रोवर्सीज में घेरि जा चुकी थी लेकिन वो अपनी आदत से बाज नहीं आया था....क्यूंकि हॉट फिल्म्स के चलते ही उसकी जेब में मोटी कमाई जाती थी....लेकिन बदकिस्मती से कई पिछली १० फिल्में उसकी यूँ ही फ्लॉप होती जा रही थी जो उसकी मुस्किलो का कारण बन रही थी..
अभी अपने स्क्रिप्ट राइटर साहिल से उसने बात चीत का दौर बीच में अधूरा ही छोड़ा था की इतने में केबिन के दरवाजे से अंदर आती बला की खूबसूरत रैना को देख राम ने उसका स्वागत खड़े होते हुए किया..."वेलकम माय बेब रैना कैसी हो?"..........."मैं तो ठीक हूँ राम लेकिन मुझे बुलाने की वजह मैंने सुना तुम मुझे अपनी कोई अपकमिंग फिल्म में दोबारा सिग्न करना चाहते हो"............"हाहाहाहा एस अ लीड देखो रैना इस बार हम एक हॉन्टेड कॉटेज में इस फिल्म को शूट करेंगे और हमारे साथ वही हमारी छोटी सी क्रू चलेगी जिसमें साहिल,तुम मैं और मेरी अस्सिटेंट डायरेक्टर सौम्या और कैमरामैन जावेद साथ होगा"
"लेकिन मैंने सुना है की वहाँ मनाही है"
"ऐसे कई हादसे होते रहते है रैना और उसके बाद सबकुछ फिर ठंडा पड़ जाता है और फिर जैसा था सबकुछ वैसा चलने लगता है और मैं जहा तक बिलीव करता हूँ की वहाँ पे ऐसी कोई भी भूत पालित वाली बात नहीं सिवाय अफवाओं के"
"तो फिर वो मर्डर"
"हो सकता है कोई जंगली जानवर का काम हो वो फ़िक्र मत करो हम पुरे इन्तेज़ामात के साथ जाएंगे एंड डिस इस नॉट योर फर्स्ट टाइम विद अस हम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी सब सेट हो जायेगा बस २ डेज उसके बाद हम्हे उस जगह से कोई मतलब नहीं"
सबने सहमति में राम की बातों से हामी भरी......"फिल्म का टाइटल भी वही होगा "हॉन्टेड" हाहाहा"......ठहाका लगाए राम ने अपने बचे कूचे सिगरेट को तिलांजलि दी
Morgue रूम के ठीक सामने दरवाजे पे खड़ा अरुण बक्शी एक बार उस बड़े से हॉल रूम में झांकता है जहाँ अनगिनत स्ट्रेचर पर सफ़ेद चादरों में ढकी कई लाशें पड़ी हुयी थी| एक बार जैसे morgue रूम में घुसने से पहले वो अपने दिल को जैसे मज़बूत करता है....आगे बढ़ते हुए ठीक उसके पीछे वार्ड बॉय और साथ में फॉरेंसिक डॉक्टर डॉ अनिल भी उसके साथ आगे चलते हुए उस बंद लाकर के सामने जा खड़े होते है | हॉल में गुप् चुप्पी जैसे साधी सी हुयी थी सबने इतने देर तक.....इसी बीच डॉ अनिल ने अपनी चुप्पी को तोड़ते हुए कहा
"मिस्टर अरुण यही पे उस लाश को प्लेस किया गया है गिव मी अ मोमेंट प्लीज"......इतना कहते हुए फट से डॉ अनिल ने उस लाकर में चाबी डालते हुए घुमाया और फिर एक बड़ी ज़ोरदार आवाज़ के साथ डॉ के लाकर को बाहर करते ही उसमें रखी लाश ठीक अरुण के सामने प्रस्तुत थी...लाकर को बहार खींचने पे उस वक़्त morgue हॉल की ख़ामोशी में जैसे उस आवाज़ ने लगभग खौफ्फ़ सा दिला दिया था|
एक पल को अपनी नज़रें दूसरी ओर किये फिर धीरे धीरे अरुण ने लाश की तरफ मुड़कर देखा उसने अपने नाक पे रुमाल रख लिया...लाश की बहुत बुरी हालत थी....जैसे ही डॉ अनिल ने आदेश अनुसार उसके बदन से जैसे उस सफ़ेद कपड़े को हटाया लाश के शरीरो पे अब सिलाइया तातो से की हुयी अरुण को दिखी जो की अनगिनत उसके शरीर के छाती से लेके निचले भाग तक जा रहे थे शरीर के मॉस इस तरह से काटे गए थे जैसे किसी नरभक्षी ने उस लाश को महज़ मारा न हो बल्कि उसे खाया भी हो|
"शरीर के कई हिस्सों पे काफी गहरे ज़ख्म थे और ऑर्गन्स तक जैसे किसी ने इस क़दर बाहर निकाला हो की जैसे किसी हिंसक जानवर ने शिकार किया हो सकता है....कई जगह हम्हें दांतों के निशाँ जैसे गर्दन पीठ और आगे नब्ज़ों पे जैसे खरोचों के गहरे निशान मिले"
"आपको क्या लगता है? वो निशानात ये सब किसी इंसान का काम है?"
"हरगिज़ नहीं अगर इंसान का काम होता तो ऐसे लाश को यूँ जानवरों की तरह न शिकार के तरीके से मारा होता मुझे तो ये उस घने गहरे जंगल में किसी बहुत ही खतरनाक जानवर का ये काम लगता है"
"क्या पता? anyway वैसे अब तक इस विक्टिम की लाश कोई लेने नहीं आया जो इतने महीनो से"
"इसका नाम राजेंद्र था ये इस शहर के नहीं है| दरअसल जब पुलिस ने इनके परिवार की मालूमात करते हुए जाना तो इनकी घर में सिर्फ इनकी पत्नी ही पायी गयी.....पुलिस की इन्फॉर्म करते ही लाश की शिनकत करने से पहले ही उन्हें दिल का दौरा आया और वो"........कहते कहते डॉ अनिल रुक सा गया उसने जैसे अपने अफ़सोस को जाहिर किया
"तो फिर लाश का यहाँ रखने का क्या मतलब? अबतक तो अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए था"........
"दरअसल अब इनके परिवार वालो में कोई रहा नहीं तो इसलिए पुलिस ने केस की काफी छानबीन के बाद अब इस लाश को लावारिस अनुसार अंतिम संस्कार करा देने का ही निश्चय किया है बस १-२ दिन के अंदर ही इस लाश को पुलिस लेने आ जाएगी"
"ये तो अच्छा हुआ की मैं पहले पहुंच गया"
"हाँ कमिश्नर साहेब के परमिशन पे ही मैंने आपके लिए ये लाश को दिखाने की परमिशन हमारे हेड से ली एनीवे आपको और कुछ देखना है या कुछ मॉयना करना है"
"नो"
"ऑलराइट"..........कहते हुए जैसे लाकर डॉ अनिल ने खोला था उसे वैसे ही वार्ड बॉय को कहा की बंद करे
"वैसे डेड लेक कॉटेज पे हुए इस मर्डर को पुलिस हादसा ही मानती है"
"लेकिन मुझे इस केस को बारीकी से जांचने की लिए ही ज़िम्मेदारी दी गयी है और जब तक मैं निश्चिंत न हो जाऊ तब तलक मैं इसे हादसा नहीं मान सकता"
"इट्स योर ओन थिंकिंग मिस्टर अरुण बक्शी वैसे जो पोस्टमर्टम और कार्यवाही हमने की उससे तो बस यही बात सामने आती है"
अरुण ने उनका शुक्रियादा किया डॉ अनिल ने इसे अपना फ़र्ज़ समझते हुए शुक्रिये को क़बूल किया फिर डॉक्टर इज़ाज़त लेते हुए दूसरी ओर चले गए.....अपनी सोच में अकेला खड़ा अरुण कश्मकश में जैसे घिरा हुआ था अभीतक कोई भी प्रोग्रेस उसे हासिल न हुयी थी जो की उसकी मुस्किलो का कारण बन रहा था...अभी अरुण हॉस्पिटल से बाहर जा ही रहा था की इतने में उसे खुद को घूरते एक अनजान शख्स को देख हैरानी सी हुयी उसने माथे पे शिखर लाते हुए पाया की सामने सीढ़ियों पे वो लगातार उसे ही घुर्र रहा था लेकिन जैसे ही अरुण की निगाह उसपे हुयी वो वहा से जैसे भागने को हुआ तेज़ कदमो से सीढ़ियों से उतारते हुए वो जाने लगा था|
"एक्सक्यूज़ मी वेट".........अरुण शक भरी नज़रो से उसका पीछा करते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा
उस शख्स ने अपनी लॉन्ग कोट को ठीक करते हुए अपनी हैट को गिरते से जैसे बचाया और तेजी से हॉस्पिटल से निकलते हुए अपनी गाडी में सवार हुआ इतने में रियर व्यू मिरर में उसे अरुण अपने पीछे दौड़ते हुए करीब आते दिखा....इग्निशन में पहले से ही चाबी डाले हुए उस शख्स ने कार स्टार्ट कर ली थी...अरुण को मौका भी न मिला उसकी कार तक को चुने का की वो इतनी स्पीड में वहाँ से निकल गयी...
पीछे अरुण हपसते अपनी साँसों पे काबू पाते हुए खड़े उस गाडी को अपने से दूर जाते देख रहा था लेकिन उसने उस गाडी का नंबर अपने ज़ेहन में नोट ज़रूर कर लिया था|
घर का दरवाजा खोलते हुए तेजी से उस शख्स ने अपने कमरे में दाखिल होते ही एक बार बाहर झांकते हुए देखा और कस्के दरवाजा लगा दिया....उसने एक लम्बी सांस खींची और फिर पास की खिड़किया लगाते हुए पर्दो को बराबर करते हुए.....पास पड़ी कुर्सी पर विराजमान हुआ |
उसने एक बार अपने कमरे को चारो तरफ से घूरते हुए नज़र फेरा कमरे के हर दिवार पर कई रहस्मयी पेंटिंग्स बानी हुयी थी जिसमें कुछ डरावनी किसी तस्वीर में लिलिथ पिशाचनी की नंगी पेंटिंग बानी हुयी थी तो किसी पेंटिंग में इंसान से जानवर बनता कोई शख्स किसी तस्वीर दिखती कोई आत्मा तो कही दीवारों पे तरह तरह के डरावने मास्क्स लटके हुए बिस्तर के ठीक पास एक स्टडी टेबल था जिसपे अनगिनत बुक्स थी जो ज़्यादातर कई लैंग्वेजेज में थे किसी में लिखा था "ड्रैकुला कैसल" "डी हॉन्टेड रोड" "आफ्टर लाइफ" यकीनन वो शख्स का पेशा कुछ ऐसा था जो हॉरर मैटर से रिलेटेड था उसने आँखें मुंदी और फिर सर कुर्सी के ऊपरी सिरहे पर रखकर सुस्ताने लगा....करीब कई दिनों से वो उस मुसाफिर की लाश का मुआना करने के लिए अस्पताल के चक्कर काट रहा था...लेकिन कई पर्यतन के बाद भी उसे morgue रूम में रखी उस डेड लेक में हुए मर्डर विक्टिम की लाश को देखने तक न दिया...आख़िरकार इतने जद्दो जेहेद के बाद उसे कामयाबी मिली और घुस देते हुए वहाँ के एक कर्मचारी को उसने लाश देखने का एक अवसर पा लिया था| वो सुबह सुबह ही उस कर्मचारी के साथ उस रूम में दाखिल हुआ और उसने उस मुसाफिर राजेंद्र की लाश का मुआना किया....उसकी हालत देखते ही जैसे उसके शक में यकीन का पुट आया इससे पहले की वो कुछ और देर वहाँ ठहर पाता इतने में कर्मचारी ने उसे इख़्तिला दी की बाहर डॉक्टर अनिल किसी एजेंसी के जासूस के साथ लाश को एक बार फिर देखने के लिए आ रहे है| उसी पल कर्मचारी ने उसके सामने ही राजेंद्र की लाश को डुप्लीकेट चाबी से लॉकर में दोबारा बंद किया और दोनों किसी की नज़रो में आने से पहले ही वहाँ से निकल भागे|
लेकिन सीढ़ियों से उतरते पाँव वही ठहर गए क्यूँकि जिस डेड लेक पे वो कई सालो से सर्चिंग में था उस बाबत उस केस की बाबत किसी जासूस के hire होने की खबर ने उसकी दिलचस्पी को और बढ़ा दी थी| उसी पल उसने ठहरके वही दोनों का इंतज़ार किया और फिर डॉ अनिल और अरुण बक्शी को morgue रूम में घुसते पाया फिर चोरी छुपे उनकी सारी वार्तालाप सुनी जिससे उसे यकीन हो गया की वो अकेला डेड लेक उस हॉन्टेड कॉटेज केस पे अकेला ध्यान नहीं दे रहा था| उसे लगा पुलिस ने तो हाथ खड़े कर लिए थे तो फिर जासूस के इस केस से जुड़ने का क्या सम्बन्ध?
अँधेरा छाने लगा था.....अचानक उस शख्स की नींद टूटी तो हड़बड़ाहट में उसने पाया की पुरे कमरे में गुप्प अँधेरा हुआ सा था...उफ़ न जाने कितने देर से वो कुर्सी पे यूँ सोया पड़ा हुआ था....उसने उठके पाया की बाहर कुत्ते कई देर से भौंक रहे थे| उसने परदे को सरकाये बाहर गलियारे में झाका वहाँ खामोशी और सन्नाटा छाया हुआ था|
उसने अंगराई लेते हुए पास पड़ी शराब का एक जाम तैयार किया और जैसे ही उसे लबो से लगाने को हुआ तो अचनाक किसी ने बड़ी जोर से दरवाजे पे दस्तक दी...ठक ठक उसने पलटकर सामने बंद दरवाजे की और देखा...रात ९ बज चूका था कौन हो सकता है? आजतक तो वो अकेले ही जिंदगी जीता आया कोई उसे कई सालो से मिलने भी न आया था| परिवार वालो को खोये तो अरसा हो गया था उसके बाद तो वो अपनी जीवन में अकेला ही था| ठक ठक दरवाजे पे फिर दस्तक हुयी इस बार उसने शराब की एक चुस्की ली और फिर तेज कदमो से चलता हुआ दरवाजे के पास पहुँचा | उसने दरवाजा खोला तो पाया की सामने कोई मौजूद नहीं था|
एक बार उसने बाहर अँधेरे रोड पे झाँका न कोई नहीं तो फिर कौन था? उसका दिल धड़क उठा उसने वापिस अंदर होने का निर्णय लिया घर में प्रवेश करते और जैसे ही पलटते हुए दरवाजा वो लगा ही रहा था की इतने में
उस हाथ ने उसके कंधे पे रखते ही उसे चौका दिया.....वो एक पल को सहम उठा और फिर उसने अपनी सांसें धीमी लेते हुए सामने पाया की ये वही उसका पीछा करता सुबह वाला शख्स था अरुण बक्शी.......अरुण उसे मुस्कुराते हुए देख रहा था
"आप डर गए?".
"आपने डराया तो डर गया"........उस शख्स ने नार्मल होते हुए मुस्कुराये जवाब दिया
"हाहाहा दरअसल मुझे लगा की शायद मुझे देखके आप दरवाजा ही न खोले क्यूँकि आज हमारी मुलाक़ात अधूरी जो रह गयी थी"
"क..क्या मतलब?"
"अरे जिस अस्पताल का आप चक्कर कुछ दिनों से लगा रहे है उसकी बाबत मुझे सारी जानकारी उस घुस लिए कर्मचारी ने बता दी जिसने मुझे आपका पीछा करते हुए देखा हाँ लेकिन वो मुंह खोल नहीं रहा था धमकी देनी पड़ी पुलिस की तो सब कुछ सच्चाई से उसने बता दिया"
"क्या कहने का मतलब है आपका? ये कैसा इलज़ाम है?"............झूठा ग़ुस्सा दिखाते हुए अपने चोरी को छुपाने के लहज़े में वो शख्स गरजा
"देखिये ये आप deny नहीं कर सकते की मैंने आपको कई आवाज़ें दी पर आप रुके नहीं और मुझे अपना परिचय देने की ज़रूरत नहीं क्यूँकि आप मुझे जानते है तभी तो मुझे घूर रहे थे पहले मेरे इस सवाल का जवाब दीजिये की आप हस्पताल में उस वक़्त क्या कर रहे थे वो भी morgue रूम के पास अगर ना भी कहे तो कोई बात नहीं शायद पुलिस के दबाव में"
"आप यहाँ से जा सकते है मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता"
"घर आये मेहमान को ऐसे आप ट्रीट करते है मिस्टर मोह्द दीप उर्फ़ परनोमालिस्ट"......इतना कहते ही अरुण ने दीप के चेहरे पे उलझन भरे भाव देखे
उसके बाद कुछ भी छुपाना दीप के बस में नहीं था...क्यूँकि वो डिटेक्टिव अरुण बक्शी के आगे कोई झूठ भी नहीं रख सकता था.....बातों के दौरान अरुण ने बताया की वो उसके कार के नंबर प्लेट को नोट करने के बाद ही उसके घर तक पहुँचा था....बाकी तो इंटरनेट पे उससे जुडी पर्सनल इनफार्मेशन उसे आसानी से हाथ लग गयी थी....अरुण ने उससे सवालात किया की आखिर क्यों वो? उस मुसाफिर की लाश देखने वहाँ पहुँचा था और डेड लेक से उसका क्या सम्बन्ध था? अरुण ने बताया की अगर वो साफ़ साफ़ कुछ न कहेगा तो फिर पुलिस छानबीन करेगी और यकीनन उसे डेड लेक से जोड़ेगी और फिर उस हादसे को साज़िश ही मानेगी....दीप को डर घुस गया उसने अरुण के आगे अपने घुटने टेक दिए|
इस बीच दीप ने उसके लिए एक ड्रिंक बनाते हुए सर्व की उसके आगे...अरुण ने मुस्कुराते हुए ड्रिंक क़बूल किया ...उसने चुस्किया लेते हुए एक बार घर को चारो तरफ से देखा उसे बेहद अजीबोगरीब तस्वीरें और किताबो को घूरते देख दीप मुस्कुराया...इस बीच उसने अपने लिए फिर एक नया ड्रिंक बना लिया था|
"मैं पेशे से परनोर्मलिस्ट हूँ भूत-प्रेत पिशाच वेयरवोल्फ आत्माये इन सब पर मेरी मुकम्मल रिसर्च हुयी है और मैंने ये सब की है मैंने अकेले खुद पे खुद स्टडी करते हुए मैं सिर्फ इन सबकी वजूद न ही सिर्फ तलाश करा हूँ बल्कि इनकी कमज़ोरी इनकी होने की वजह सबकुछ निकालता हूँ"......एक पल को दीप ने अरुण की और देखा जिसे शायद इन सब बातों से उसपे हसी आ रही थी|
"मिस्टर मोहद दीप शायद आप भूल रहे है मैं इन सब चीज़ों पे यकीन नहीं करता"
"मैं जनता था आपका यही जवाब मुझे मिलेगा मिस्टर अरुण.....लेकिन आपके यकीन करने या न करने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूँकि कई साल से मैंने डेड लेक उस मनहूस कॉटेज और उस जगह के बारें में बहुत चीज़ें मालूमात करते हुए इस नतीजे पे पहुँचा हूँ की वहाँ कोई जंगली हिंसक जानवर नहीं आत्माओ का बसेरा है एक नहीं कई आत्माये"
"हाहाहा यानी मेरे सीनियर चीफ प्रकाश वर्मा को यकीन आपने दिलाया था"
"मैंने नहीं खुद पे खुद हर किसी को अपने आप समझ आ गया है की वहाँ जाना मतलब मौत के आँगन में पाव रखने जैसा है"
"ठीक है मान लिया की आपकी बात सच है तो फिर आपका आगे क्या विचार है?"
"उस कॉटेज से कई राज़ जुड़े हुए है मैंने पाता लगाया और उन्हें इंटरनेट पे अपने ब्लॉग पे शेयर किया"
"जो मेरी नज़रो से गुज़रा और आपका ही एक मात्रा डेड लेक से जुड़ा टॉपिक मुझे दिखा वरना कोई भी इतनी राज़ो से वाक़िफ़ नहीं जितना आप है"
"रिसर्च की है मैंने बताया न तुम्हें?"
"इंसान जब मरता है तो अगर बुरी मौत या बिन ख्वाहिश के वो मरे तो उसकी आत्मा प्रेत आत्मा का रूप धारण कर लेती है....उसके बाद वो भटकती रहती है जिस वजह से वो हिंसक हो जाती है और वापिस इंसानी दुनिया में आने की चाहत रखने लगते है हम उन्हे देख सकते है लेकिन कुछ पल के लिए वो फिर हवा सी बोझल हो जाती है ऐसे ही वहाँ जो ट्रैन हादसा हुआ था उसके बाद से वहाँ कोई गया नहीं मैं वहाँ कभी गया तो नहीं क्यूँकि ये matter पे मेरी दिलचस्पी इसी वर्ष से शुरू हुयी थी"
"मतलब वहाँ लोगो को मारके काटके फैका गया तो वो सब रूह बन गयी हाहाहा आर यू किडिंग में? इन सब पे आप यकीन करिये ऐसे कई हादसे शहर में भी होते है तो कहाँ है आत्मा हाहाहा?"
"देखना चाहते हो तुम तुम्हे ऐसा इसलिए लगता है की तुम ठहरे एक जासूस कभी साज़िश और शक के घेरे से बहार आओ और इस दुनिया को देखो बहुत राज़ दफ़न है इस सरज़मीं में बहुत से"..........गंभीरता से अरुण की तरफ देखते हुए मोह्द दीप ने कहा
एक पल को अरुण खामोश हो गया....."ये देखो ये किताबे ये देखो ये इनफार्मेशन कहो की मैं झूठा हूँ आजसे करीब ३० साल पहले २ मर्डर्स हुए ये दो कपल थे मैरी और जोसफ फर्नांडेस कॉटेज में करीब ३ दिन बाद ही ये दोनों ऐसे गायब हुए जैसे आसमान ने इन्हे निगल लिया हो कोई अपनी सारी दौलत संपत्ति घर छोड़कर यूँ कही निकल जाता है क्या? आजतक पुलिस को उनका सबूत न मिला पीछे रह गयी उनकी लावारिस वो लाश लेकिन जानते हो...जानते हो वो दोनों वही है हाँ उनकी आत्मा वही है"
"ये क्या बेवकूफ भरी बाते है हो सकता है उनका असल में मर्डर करके कोई उन्हें किसी और जगह ठिकाने उनकी लाश लगाए भाग गया हो देखो दीप अब बहुत हो रहा है शायद मेरा यहाँ आना फ़िज़ूल हुआ"
"मेरी पूरी बात सुनने से पहले तुम नहीं जा सकते".....अरुण इस बार खौफ्फ़ खा गया क्यूँकि दीप ने कस्के उसके बाज़ू को पकड़ा हुआ था उसने पलटके दीप को गुस्से से देखा तो दीप ने मांफी मांगते हुए फिर नार्मल होते हुए खुद को....रिक्वेस्ट भरे लहज़े से फिर अरुण की तरफ देखा
"आई ऍम सॉरी बट प्लीज लिसन टू मी फर्स्ट"
"कहो"
"कॉटेज में ३० साल बाद आज फिर जो कुछ उस मुसाफिर के साथ घटा उससे मेरा शक यकीन में तब्दील हो चूका है की वहाँ उन्ही का बसेरा है और वो सब वहाँ इकट्ठा होकर ज़िन्दगी को मौत बनाने की तलाश में है कोई भी वहाँ भूले भटके जाता है तो उसकी मौत तय लिखी होती है"
"ओह पार्डन मी मैं अब और इस बारें में कुछ नहीं सुन सकता मैं जा रहा हूँ गुड नाईट एंड गुड़ बाय"........कहते हुए अरुण वहाँ से जाने लगा....ऐसा लग रहा था जैसे वो काफी डिस्टर्ब सा हो गया था |
अभी वो दो कदम दरवाजे से बाहर निकलने को हो ही रहा था की इतने में उस आवाज़ ने उसे ठहरने पे मज़बूर कर दिया...उसने घूमकर दीप की ओर देखा जिसके आँखों में दहशत सिमटी हुयी थी जैसे उस वाक़्या को बताते ही वो सिहर गया हो
"आत्माओ से कांटेक्ट करना उनकी नेगेटिव एनर्जी और उन्हें देख लेना ये शक्तिया मुझमें तबसे है जबसे मैंने ये पेशा चुना या यु कह लो कोई अलौकिक ताक़त जो पुरखो से हमारे खानदान के हर इंसान में थी....मैंने भी कई आत्माओ को देखा और उनसे बात किया है कुछ शांत होती है लेकिन बेमौत तड़प में छटपटाती रूह बहुत ही खतरनाक और भयंकर उनके चेहरे को देखते ही जैसे हार्ट फेल हो जायेगा मैंने भी कांटेक्ट किया उस मुसाफिर की लाश मैंने इसलिए देखि क्यूँकि उसने खुद मुझे जो बताया उससे मैं बुरी तरह से डर गया था| वो आया था मैंने उसे बुलाया था उसी दरवाजे से उसी वक़्त उसी हालत में करहाते हुए दर्द में छटपटाती उसकी रूह क्या भयंकर चेहरा था उसका ऐसा लग रहा था जैसे तेज़ाब से किसी ने उसके चेहरे को जला दिया हो"
अरुण वहाँ और ना ठहरता अगर दीप ने उसे जाते वक़्त वो बात न कही होती....उसे पहले तो यकीन न लगा लेकिन उसके दिल ने उसे रोककर उस बात को सुनने पे जैसे मजबूर कर दिया....सुनते ही जैसे उसके रौंगटे खड़े हो गए उसे ये बात बचकानी नहीं बल्कि डरावनी सी लगी....क्यूँकि दीप के आँखों में उसे सच्चाई दिख रही थी....
"मरने से पहले वो यहाँ आया था"........अरुण ने कहा
"मरने से पहले कोई रूह आती है भला मरने के बाद वो यहाँ आया था"........कहते हुए दीप खामोश हो गया फिर उसने एक लम्बी सांस भरते हुए फिर बताना शुरू किया वो वाक़्या
"वो 10 नवंबर की रात थी जब मैंने काफी इनफार्मेशन के बाद भी कोई ख़ास बात उस जगह के बाबत न निकाल पायी तब मैंने ऊपरी ताक़त का सहारा लिया और वो मेरा छठा प्रयास था आत्मा को बुलाने का कमरे में उस वक़्त गुप अँधेरा था और ठीक उसी समय न जाने कैसे लाइट्स अपने आप चली गयी मोमबत्तिया आस पास की भुजने के कगार पे हो गयी जो आत्माओ का बुलाने का मैं अमल कर रहा था मैंने मोमबत्तियों को अभी भुजने से रोकने का प्रयास किया ही था की अचानक"
"वो रात आज भी मैं न भूल सकता हूँ| आत्माओ को बुलाने का मेरा छठा प्रयास जैसे नाकामयाब सा मुझे लग रहा था| डेड लेक की मालूमात जबतक मुझे हुई तब मुझे नहीं मालुम था की हाल ही में वहाँ वो घटना घट जाएगी| खैर मेरे लिए उस राज़ को जानना वाक़ई बेहद ज़रूरी हो सा गया| काफी सोच विचार के राजेश नाम के उस मर्डर विक्टिम को ही मैंने आख़िरकार बुलाने का फैसला कर लिया"
"उसकी आत्मा को!"............अरुण ने अध्यन से बाहर निकालते हुए दीप को टोका
"हाँ मैंने बुलाया था उसकी आत्मा को और वो आयी भी थी| प्रमाण दिखाने के लिए मेरे पास सबूत के तौर पे ये है ये"............एका एक दीप ने अपने जैकेट और शर्ट दोनों को अपने सीने तक उठा लिया
अरुण ने देखा की उसके पेट के निचले भाग पे एक गहरा ज़ख्म उभरा हुआ था ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने किसी धार तेज़ चाक़ू से हमला किया हो|
"य..ये कैसे हुआ?"
"हैरत में पढ़ गए न उस आत्मा को बुलाने का खामियाज़ा मैंने भुगता है"
"तुम्हारा मतलब ये है की वो राजेंद्र की आत्मा ने तुमपर हमला किया"
"बुलाके गलती ही तो की उस जैसी हिंसक आत्मा मैंने कभी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखी थी"
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अरुण चुपचाप सुन रहा था....और दीप अपने शर्ट और जैकेट को ठीक करते हुए फिर वो दास्तान जैसे सुनाने लगा......"वो रात १० नवंबर की थी करीब २ घंटे से मैंने कोशिश पे कोशिश जारी रखी थी वक़्त की सुई जैसे ही १ से ऊपर हुयी तो अपने आप जैसे हवाओ का शोर मुझे अपने कानो में सुनाई देने लगा....लाइट अपने आप आने जाने लगी और फिर एक पल को पूरी तरीके से चली गयी नियम के अनुसार मैं उस वक़्त उठ नहीं सकता था वरना सारे रस्म भंग हो जाते खामोशी छायी हुयी थी मैं अँधेरे में वैसे ही बैठा हुआ आँखे मूंदें हुए मुझे अच्छे से मालुम है की मैंने दरवाजे की दोनों कुण्डी लगायी हुयी थी"...........अरुण ने दीप के इशारे पे दरवाजे की तरफ देखा जिसमे दो मज़बूत कुंडिया उसे दिखी|
"हवाओ का शोर बढ़ने लगा और उसी पल मुझे अहसास हुआ की कोई तेज रौशनी जैसे घर में पढ़ रही थी और मैंने गौर किया की मोमबत्तिया भुझने के कगार पे हो गयी थी सातो मोम्बत्तीयो में कुल दो मोमबत्तिया ही जैसे तैसे अपनी फड़फड़ाती लौ में जल रही थी| हो हो करती हवाओ की सरद मुझे जैसे काँपने पे मजबूर कर रही थी अचानक मैंने साफ़ देखा की वो तेज़ सरद हवाएं इस खुले दरवाजे से अंदर आ रही थी मैंने तो दरवाजा लगा दिया था तो फिर ये दरवाजा कैसे खुला? यकीनन आत्मा का अहसास मुझे अपने आस पास महसूस हुआ तभी एक साया..... दरवाजा जैसे हो हो करती हवाओ के शोरर के साथ और भी तेजी से पूरा खुल गया बहार से तेज़ रौशनी और साथ साथ सरद हवाएं अंदर घर में दाखिल हो रही थी मैंने आँखे खोले ही हुए पढ़ना जारी रखा वो साया उस मुर्दे की थी एका एक जैसे वो अंदर आके ठीक सामने जहा तुम खड़े हो वही वो खड़ा हो गया|
मैंने उसे देखते हुए बेहोश होने की कगार पे था.....मैंने कई आत्माओ से रूबरू खुद हुआ हूँ| लेकिन उस जैसी दुष्ट आत्मा मैंने आजतक नहीं देखी थी| वो उसी हालत में था ज़ख्मो में लिपटा खून से लथपथ पुरे कमरे में जैसे सिरहन सरद की इतनी बढ़ गयी की मुझे कुछ कहने में भी काफी मुश्किलें हो रही थी"
दीप ने जो उस हुलिया का ब्यान किया अरुण ने राजेंद्र उस मुसाफिर की लाश को वैसा ही पाया था|
"क्यों बुलाया मुझे? मैं तुम्हें किसी को नहीं बख्शुंगा"..........उस आत्मा ने अपनी दोहरी आवाज़ में गरजते हुए जैसे कहा
"क..क क्या हुआ था तुम्हारे साथ? किसने मारा है तुम्हें? किसने की तुम्हारी ये हालत".........दीप ने उस आत्मा से कहा जो उसे हिंसा भरी नज़रो से घुर्र रही थी
"मार डाला गया मुझे मार डाला गया"..............गरजते किसी बदल की तरह उस दोहरी आवाज़ में राजेंद्र की आत्मा ने कहा.....एक पल को दीप डर गया उसने अपने दिल को बेहद मज़बूत किया|
"क..किसने मारा तुम्हें?"............दीप ने फिर सवाल किया कांपते हुए
"उन लोगो ने उन सबने मिलके मुझे मारा मैं उस रात उस कॉटेज के तरफ से गुज़र रहा था रात के उस आलम जब मैं वहाँ पंहुचा तो एक आदमी को कॉटेज में मौजूद पाया और फिर और फिर".........वो बोलते बोलते गले से एक अजीब आवाज़ निकलने लगा जैसे अब दीप का उसपे काबू पाना मुश्किल हो रहा था|
वो दर्द से जैसे करहा उठा दीप ने उसकी उस भयंकर आवाज़ को सुन खुद को सक़्त कर लिया.....दीप ने देखा की उसकी आँखों से खून बह रहा था उसकी दोहरी आवाज़ पुरे कमरे और उसके दोनों कानो में जैसे सुई की तरह चूब रही थी| अब जैसे उसके बस में नहीं था उसे और काबू करना
"मैंने पूछा किसने मारा तुम्हें? कौन लोग थे वो?"
"उन लोगो ने सबने मिलके मुझे मारा है वो सब इंसान नहीं थे|"
"क्या वो जोसफ और उसकी पत्नी मैरी थे?".................उस आत्मा ने जैसे इस सवाल से अपने दांतो को जैसे पीसा जैसे अब वो घात लगाके बस दीप पे हमला ही करने वाला था| उसने सिर्फ अपनी गर्दन को हिलाया दीप को अपना जवाब मिल चूका था उसका शक यकीन में तब्दील हो चूका था|
"वहाँ और भी थे और भी और भी"............जैसे दहाड़ उठी वो आत्मा
दीप को महसूस हो चूका था की वो एक एक कदम आगे बढ़ाता हुआ जैसे दीप की ओर बढ़ रहा था| "ठहर जाओ वही पे ठ....ठहर जाओ वही ये मेरा हुकम है".............उस आत्मा ने गुर्राते हुए उसके करीब बस बढ़ रहा था.....दीप को उठना ही पड़ा क्यूंकि अब उसके स्पेल उस आत्मा पे काम नहीं कर रहे थे.....उसे समझ आ चूका था की ये बेशक बहुत शक्तिशाली आत्मा थी| जो मरकर अब जान से मारने पे उतारू हो चूका था| दीप ने उठते हुए वहाँ से भागना चाहा उसने पास की दराज़ जैसे तैसे खोली ओर उसमें से एक ताबीज़ निकाली ओर उसकी तरफ देखा
जो करीब १ हाथ दूर खड़ा था उसके दोनों ज़ख्म भरे खून से लथपथ हाथ जैसे उसके गले को बस दबोचने वाले थे....दीप ने ताबीज़ तुरंत उसके माथे पे लगाने की कोशिश की....उसकी इस कोशिश में उस आत्मा ने उसपे अपनी पकड़ बिठानी चाही ओर उसी पल उसके एक हमले से दर्द में दीप तड़प उठा आत्मा की उस ऊँगली ने उसके तलपेट पे जैसे मांस को नाख़ून से खरोच दिया था| अगर वो उसके सामने से न हटता तो पक्का वो पांचो ऊँगली के नाखुनो से उसके पेट को फाड़ डालता|
दर्द में तड़पते हुए गिरकर दीप ने पाया की ज़ख्म पे हाथ रखते ही उसे अपने हाथो पे खून का अहसास हुआ| वो आत्मा उसी की तरफ बढ़ती हुयी जैसे आ रही थी.......दीप समझ चूका था की अब वो उसे बिना मारे जाने नहीं वाली....वो खून करने पे आमादा हो चुकी थी....दीप ने तेजी से घायल हुए हालत में भी उठते हुए उस ताबीज़ को ठीक उसके माथे पे जैसे दोबारा लगा दिया.......इतना करना ही था की वो आत्मा दूर होने लगी कमरे में हवाएं जैसे बाहर से तुफानो की तरह घुसते हुए घर के सभी सामानो को गिरा दे रही थी| ऐसा लगा जैसे कोई तेज तूफ़ान आ गया हो|
"आअह्ह्ह ससस आह्ह्हह्ह्ह्ह छोड़ दो मुझे आआअह्ह्ह".........दोहरी आवाज़ निकालता हुआ दर्द में छटपटाते हुए वो आत्मा जैसे पीछे होती जा रही थी ओर दीप उसके माथे पे ताबीज़ वैसे ही लगाए उसके और बढ़ रहा था......माथे पे ताबीज़ के लगते ही जैसे वो तड़प उठा चीखने चिल्लाने लगा ऐसा लगा जैसे कान के परदे फट जायेंगे उसके माथा जैसे अपने आप जलने लगा था
मैं दुआ पड़ता गया और उस आत्मा पे अपना काबू पूरा करता गया....."छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे"........वो गुर्राता हुआ दर्द भरी चीख में दहाड़ते हुए जैसे तिलमिला रहा था अगर मेरा उसपर से काबू हट जाता तो यकीनन वो उसी पल मेरे गर्दन को अपने दोनों हाथो से पकड़ लेता मेरी मौत तय थी| और खुदा ने साथ दिया और उसी पल वो मुझे धुएं में तब्दील होता दिखा उसकी दहाड़ और भी भयंकर होती चली गयी|
और ठीक उसी पल पुरे कमरे में चमड़े जलने के भाति एक अजीब सी बदबू गूंज उठी....जैसे उसका नापाक रूह जल रहा था| "आअह्ह्ह आआआह आआआआअह्ह"..........दहाड़ते छटपटाते हुए वो मेरे नज़रो के सामने एका एक ओझल होने लगा और कुछ ही श्रण भर में एक जलता धुआँ खिड़की के शीशो को तोड़ता हुआ जैसे घर से निकल गया|
कुछ देर तक ख़ामोशी छायी रही अरुण अपने बाज़ुओं को एकदूसरे से बांधे चुपचाप बड़े देर से दीप की बातें सुन रहा था| दीप ने स्वयं ही अपनी चुप्पी को तोडा...
"अब कहो ये टूटे शीशे ये मेरे ज़ख्म और इतना कुछ उस आत्मा का ब्यान करना क्या ये सब अब भी तुम्हारे लिए महज़ काल्पनिक बातें है जो मैं गढ़ रहा हूँ मेरी जान जाते जाते बची इतनी आत्माओ में कभी भी मुझपर ऐसा जानलेवा हमला ना हुआ है | फिर भी अगर ये बातें तुम्हारी समझ से बाहर है तो फिर मैं एक ही बात कहना चाहूंगा अगर ऐसा है तो अब तुम जा सकते हो जो सच्चाई तुम यहाँ जानने आये थे वो मैं बता चूका".........दीप खामोशी से चुपचाप अरुण के आगे पीठ किये खड़ा था|
"दीप आई ऍम सॉरी पर मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ भी ऊपरी चीज़ एक्सपीरियंस नहीं किया जिस बिनाह पे मेरा यकीन करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन अगर इन बातो में सच्चाई है तो फिर राजेंद्र की आत्मा के कहने के मुताबिक़ वो सब दुष्ट आत्माओ का किया धरा है"
"वही तो मैं जानना चाहता था की आखिर कौन कौन है? राजेंद्र के मुताबिक़ वो सिर्फ मिया बीवी नहीं है वह नापाक रूहों का जैसे एक पूरा डेरा है और वो सब उस खामोश वीराने में हर घडी किसी के इंतज़ार में जैसे सोये रहते है और जब किसी ज़िन्दगी की दस्तक उन्हे मिलती है तो वीरानो में कई ऐसी असीम ताक़त जीवित हो जाती है लेकिन इसका सम्बन्ध उस ट्रैन हादसे से जुड़ा भी हो सकता है जबतक हम वह नहीं जाएंगे तबतलक कुछ भी कहना फ़िज़ूल ही होगा"
"जान जाने का जोखिम है हाँ ये बात मैं कह रहा हूँ जान जाने का जोखिम है अगर ऐसा कोई चीज़ वह मौजूद है तो".......दीप जैसे अरुण की बातों से सकती से उसकी तरफ देख रहा था मानो जैसे अब भी उसका यकीन ना ही था
"तुम समझते क्यों नहीं? कोई जानवर कोई इंसानी साज़िश नहीं वहां पर आत्माओ का बसेरा है"
"अगर ऐसा है तो फिर हमारे इस केस में होने का क्या फायदा? हम किसके पीछे जाए जो ज़िंदा ही नहीं जो तमाम रूहें है जो कई सालों से वहा भटक रही है"
"हाँ अरुण हम्हें कॉटेज के तमामो रहस्यों से पर्दा हटाना है तो हम्हें उन्ही चीज़ों के पीछे लगना होगा और वह तुम मेरे बगैर अकेले भी नहीं जा सकते एक दिन भी तो क्या एक रात भी गुज़ारना वहा मुश्किल है अरुण"
"तो फिर कैसे इन घटनाओ को रोका जाएगा कैसे उस डेड लेक पे बढ़ रहे उन वारदातों को हम रोक पाएंगे"
"मुझे वह जाके मालूमात करना होगा"
"लेकिन इसमें खतरा है दीप"
"जानता हूँ | पर यही एक जरिया है अरुण बस एक यही"
"ठीक है | तो फिर एक काम करते है हम दोनों ही उस कॉटेज उस डेड लेक में जाएंगे मैं भी जानना चाहता हूँ की आखिर ऐसी ये क्या ताक़त है जिसका मरकर भी वजूद है"............एका एक जैसे गंभीरता से अरुण ने कहा |.
अरुण ने दीप पे यकीन तो कर लिया था लेकिन उसके दिल में ये बात पूरी तरीको से हजम नहीं हो रही थी| अब वो खुद चाहता था की अगर ऐसी कोई चीज़ थी भी तो वो उसे बिना देखे विश्वास नहीं करने वाला था| दीप ने उसे कहा की वो तैयार रहे जब भी वो इख़्तिला उसे करेगा...अरुण ने सहमति लेते हुए एक बार दीप से मांफी मांगी और वह से रुक्सत हो गया पीछे जैसे छोड़ गया सोच में फसे खड़े ही दीप को....
उस दिन जब अरुण घर लौटा था....तो एक एक बात उसके दिमाग में घूम रही थी....राजेंद्र की लाश दीप के हिसाब से बुलावे पे आयी उसकी आत्मा उसपे किये वो वार जिसका ज़ख्म उसने दीप के तलपेट पे देखा वो टूटी खिड़की का हिस्सा.....सब कुछ जैसे उसके दिमाग में दृश्य की तरह घूम रहा था |
एजेंसी से मुहैया करवाई उसके पास रखीं वो गन जो उसने केवल एक ही बार जान जाने में इस्तेमाल किया था बेहिचक उस क्रिमिनल पे शूट किया था| उसने कागज़ बानी पुड़िया में कुछ बुलेट्स को टेबल पे डाले उसे गिना और फिर पुड़िया बनाते हुए अपनी जीन्स की पॉकेट के हवाले किया..फिर उसने गन से मैगज़ीन निकाली उसे परखी फिर उसमें पांचो की पांच गोलियों को देखा....गन लोडेड थी...वो जानता था डेड लेक में बिना उस गन के उसका जाना मतलब निहत्ता हुए जाना था....वो जानता था की अगर साज़िश की उसे बू मिली तो यकीनन उसे भी मारने की कोशिश की जायेगी जिस पल उसे ट्रिगर दबाना ही पड़ेगा...एक पल को उसने दीप पे भी शक किया था| कोई भी झूटी कहानी वो गढ़ ही सकता था| लेकिन अगर वो सच में आत्माये थी तो क्या गन से निकली गोली उसके काम आती क्यूंकि ये सब तो ज़िंदा इंसानो पे काम आते है मृत पे थोड़ी.....सोच की कश्मकश में घिरा खिड़की के पास खड़ा था | तभी अरुण ने देखा की सर्दी से चाँद बादलो में ढका सा हुआ था....
दिसंबर २० तारिक के उस दिन ही डायरेक्टर राम अपने क्रू जिसमें उसकी अस्सिटेंट डायरेक्टर सौम्या,राइटर साहिल,हीरोइन रैना,कैमरामैन जावेद,और मेक अप-आर्टिस्ट सुनील के साथ उसने कॉटेज जाने का रुख किया था....सर्दी का कोहरा इस हदतक बढ़ गया था की भरी सुबह अँधेरी शाम जैसी लगने लगी थी...राम अपनी सिगरेट का कश लेते हुए अपने क्रू मेंबर्स को हसी मज़ाक करते हुए देख रहा था | उसने पाया की सौम्य चुपचाप बैठी हुयी थी वो जानता था क्यों? वो हरगिज़ कॉटेज आने के लिए तैयार नहीं हो रही थी ये पहली बार था की उसने अपने डायरेक्टर को साफ़ इंकार किया जाने के लिए....लेकिन राम के धमकी भरी बातों ने जैसे उसे मजबूर कर दिया....वजह अगर वो उसके साथ शामिल नहीं हुयी तो नौकरी से तो हाथ धोएगी ही कोई भी डायरेक्टर उसे काम नहीं देगा....सौम्य का मूड इसी लिए ऑफ था डायरेक्टर राम ने उसपे चांस मारने के भी कई कोशिश किये थे लेकिन वो उसके हाथ न आयी थी| इसी लिए अब उसका पूरा फोकस अपनी नयी फिल्म "हॉन्टेड" को शूट करने में था|
गाड़ी तेज़ रफ़्तार में नेशनल हाईवे से गुज़रते हुए तुरंत पहाड़ी इलाको से होते हुए घने जंगलो में भीड़ भाड़ भरी आवादी को पीछे कई कोस दूर छोड़ उस सुनसान इलाके में आगे बढ़ रही थी| इसी बीच सौम्या ने देखा की सड़क के ठीक बगल में एक पुराण सा बोर्ड लगा हुआ था जिसमें लिखा था "डेड लेक" और एक एरो सीधा उस रास्ते की और जैसे डायरेक्शन दे रहा था|
सौम्य का ना जाने दिल इतना बेचैन उसे क्यों लग रहा था? वो उस मर्डर केस को सुनी थी जिसमें उस मुसाफिर की ब्रुटली मर्डर हुयी थी और वही डेड लेक पे उसकी बॉडी पायी गयी थी...कोहरा इतना ज़्यादा छाया हुआ था की गाडी के शीशो पे ओस से पानी बह रहा था.....राम ने कार वाइपर्स से शीशो को साफ़ करवाते हुए आगे रोड पे ध्यान दिया|
उसने गाडी तुरंत बायीं ओर मोड़ी....किसी कच्ची सड़क पे जैसे गाडी उतर गयी थी इसलिए बार बार गाडी जैसे हिचकोले खा सी रही थी...जब राम ने एकदम से गाडी को रोका तो वो चेहेक्ते हुए बोल उठा
"गाइस वि हेव रिचड टू आर डेस्टिनेशन"..........एका एक सबने उतरते हुए सामने की ओर पाया की...पुराना सा लकड़ी का बना वो कॉटेज उनके ठीक सामने था.....वो इतना वीरान लग रहा था जिसे देखके हर कोई एक पल को सिहर गया
"मैंन डिस प्लेस इस रेली स्केरी एंड होर्रिबल".........साहिल ने कॉटेज की ओर देखते हुए राम से कहा....जो मुस्कुरा उठा
"जब जगह इतनी डरावनी हो सकती है तो सोचो फिल्म कितनी होगी हाहाहा".........रैना और बाकी क्रू मेमेबर्स भी हस पड़े
"क'मौन गाइस आओ रैना लेट'स गेट इनसाइड"...........शूटिंग का सामन निकालते हुए डिक्की से वो छोटी सी क्रू अपने डायरेक्टर के साथ दरवाजे की ओर बढ़ चली|
"अरे इसपे ताला झूल रहा है".........पीछे खड़े जावेद ने टोका
"रिलैक्स गाइस चाबी मेरे पास है अथॉरिटी वालो को काफी परसुएड करना पड़ा कुछ टेबल सरकाना पड़ा तब जाके ही उन लोगो ने हामी भरी".........कहते हुए डायरेक्टर राम ने चाबी से ताला खोलते हुए कहा|
ताला खट की आवाज़ के साथ खुल गया.....राम ने मुस्कुराते हुए जैसे कुण्डी खोलके दरवाजे को धक्का देना चाहा तो ऐसा लगा जैसे दरवाजा अंदर से लॉक्ड था....राम ने २-३ बार दरवाजे को सकती से धकेला...लेकिन दरवाजा खुला नहीं.....सबके चेहरों पर अजीब सी हैरानी दिखने लगी|
"गेट पे ताला लगा था वो तो खोल दिया हमने फिर ये अंदर से बंद कैसे? क्या कोई अंदर मौजूद है?".......सौम्या ने ही सवाल किया
"ओह क'मौन सौम्या सेंस लगाने वाली बात है....ये एक वीरान abadoned कॉटेज है जहा कई सालो से कोई नहीं रह रहा शायद अंदर से लॉक्ड होने का कारण कोई और बात हो सकती है वेट".......डायरेक्टर राम ने थोड़ा सोचा फिर उसने कॉटेज का मुआना चारो ओर से किया...
"हे गाइस एक खिड़की है सुनील तू आ".......सुनील उसके पास आया हर कोई दरवाजे पे ही खड़ा दोनों की बातो को सुन रहा था
"न..नहीं मैं अकेला अंदर"..........सुनील ने प्लान सुनते हुए हिचकिचाए लहज़े से कहा
"अबे डरपोक कोई चोरी नहीं करने कह रहा हूँ| बस अंदर जाके दरवाजे पे देखना कोई कुण्डी लगी है क्या?"........राम की बात सुन सुनील ने हामी भरी
जैसे तैसे सुनील ने खिड़की खोली तो वो आधी खुल गयी थी पर इतनी जगह थी की कोई भी अंदर घुस सकता था.....उसने एक बार पलटके सबकी ओर देखा फिर चढ़कर अंदर चला गया....."यस शाबाश जा अंदर"......सुनील अंदर घुस चूका था घर में....
दरवाजे पे राम वापिस लौटा.....हर कोई चुपचाप था..."सुनील सुनील अबे गेट खोल क्या हुआ? मर गया क्या? अबे क्या बाहर ही खड़ा रखेगा हम्हें"......खिजलाते हुए राम ने कर्कश स्वर में कहा
लेकिन जब कोई सुनील की तरफ से जवाब न मिला तो एका एक सबके चेहरे पे परेशानी के भाव आने लगे.....रैना ने ही कहा "वो कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा?"..........राम ने जैसे उसकी बात सुनी ही ना हो...उसने आगे बढ़ते हुए दरवाजे पे दस्तक दी..."सुनील सुनील दरवाजा खोल".......पर कोई जवाब न मिला राम को अंदर से.....
वो अभी कुछ सोच ही रहा था....की इतने में दरवाजे की खट से कुण्डी किसी ने अंदर से खोली....पलभर न लगा और चर्चारती उस तीखी आवाज़ के साथ दरवाजा खुलने लगा...एका एक सबकी नज़र दरवाजे के खुलते ही भीतर के गुप् अंधेरो में पड़ी.....जावेद और राम पहले कमरे में दाखिल हुए पीछे साहिल भी सौम्य के साथ अंदर आया रैना ने अपने मुंह पे कपड़ा रख रखा था मानो कई दिनों से बंद घर से कोई अजीब सी महक आ रही हो|
तभी अचानक सुनील सबके सामने प्रस्तुत हुआ| राम ने उसे डांटा....सुनील खुद खासते हुए बोल उठा
"लगता है बरसो से यहाँ कोई नहीं आया सब चीज़ें अपनी अपनी जगह मौजूद है| दरअसल मैं जब अंदर आया तो मैं घर का ही मुआना करने लगा था सॉरी फॉर डेट लेकिन कमाल है की गेट अंदर से लॉक्ड था"....सुनील ने अपने आश्चर्य को प्रकट करते हुए कहा |
"तो क्या अंदर कोई मौजूद था?"...........जावेद ने सवाल किया
सुनील ने इंकार में सर हिलाया.....एक बार हर किसी ने चारो तरफ का मुआना किया....पुराणी सब चीज़ें वह मौजूद थी.....सामने एक डेस्क और टेबल था जिसपे धुल मिटटी लगी हुयी थी...."स्ट्रेंज एनीवे गाइस पहले थोड़ा कमरों का मुआना कर लेते है उसके बाद ही शूट का प्लानिंग करेंगे"
"वैसे हम यहाँ कबतक रुकेंगे"
"फॉर २ डेज".........सौम्य के सवाल का तुरंत राम ने जवाब दिया...सौम्य खामोश हो गयी....
सभी क्रू मेंबर्स ने कॉटेज के हर कमरे,किचन बाथरूम को पाया की वो सही हालातो में थे और वह धुल की ऐसी परत जमी हुयी थी जैसे कई बरसो से वह कोई भी ना आया था यानी पुलिस के तफ्तीश के बाद ही वो बंद कॉटेज का दरवाजा इतने दिनों बाद उन लोगो ने खोला था और इस्तेमाल करने लायक थे.....कमरे की साफ़ सफाई का जिम्मा सौम्या को सौंप दिया गया जिसके के लिए ये बेहद मुश्किल हुआ फिर भी उसे काम तो करना ही पड़ा हलकी फुल्की साफ़ सफाई और ठहरने के बंदोबस्त में कुछ घंटे खर्च हुए इस बीच क्रू मेंबर्स ने पाया कॉटेज में नीचे के साथ साथ ऊपर भी कुछ कमरे मौजूद थे जिनमें ताला लगा हुआ था उन लोगो ने खुद ही ताला तोड़ दिया जिनकी चाबी वैसे भी उन्हे नहीं मिल पायी थी सामन बहुत से कमरों में मौजूद थे और कुछ दीमक चट कर गए थे ग्रांडफादर क्लॉक टूटी हुयी थी जिसकी सुई करीब डेढ़ पे अटकी हुयी थी शीशे उसके धुल से मैले हुए थे छतो पे लगा फानूश काम नहीं कर रहा था और कुछ टुटा हुआ सा था कई तस्वीरें धुल में जमी थी जिनमें कुछ देख पाना मुश्किल ही था क्यूंकि तस्वीर फट हो चुकी थी बस एक फ्रेम में मैरी और जोसफ जो उस घर के मालिक थे उनकी एक तस्वीर बारे बैडरूम में मौजूद थी क्रू मेंबर्स ने पाया की बेड सही हालातो में थे इसलिए उसपे आराम किया जा सकता था और डाइनिंग टेबल सोफे भी गुड कंडीशन में थे उन्हें हैरत हुयी की सब जैसे का तैसा वह उस कॉटेज में छोड़ा रखा हुआ था |......दोपहर होते होते बादल घने हो गए और फिर काले बादलो से आसमान ढक गया.....बारिश मूसलाधार होनी शुरू हो गयी.....अपने कमरे में बैठी सौम्या ने झाँका तो घने जंगलो में बारिश बरस रहा था....जैसे जैसे वक़्त बढ़ रहा था उसका मन न जाने क्यों बेचैन सा होता जा रहा था?