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एक और दर्दनाक चीख complete

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वो गाडी तेजी से उस रस्ते से गुज़र रही थी जिसके दोनों ओर घने जंगल थे.....नीम अँधेरे में हेडलाइट की रौशनी ही सिर्फ आगे के रास्ते को उजागर कर रही थी...अचानक सहमे हुए राम ने दूसरा सिगरेट का कश लगा लिया.....वो दहशत में था| और उसके हाथ सर्द रात और अबतक हुए कॉटेज में बिताये पलो को याद करते ही सिहर उठ रहा था | ऐसा लग रहा था जैसे अचानक कोई उसके सामने आ खड़ा होगा|

अचानक गाडी हिचकोले खाने लगी राम सिगरेट को मुंह से निकालते हुए गियर पे गियर मारते रहा...लेकिन गाडी थम चुकी थी |

उसे अहसास हुआ की गाडी अपने आप ठहर गयी थी| उसने उतरते हुए तेजी से गाड़ी का इंजन फाटक खोला तो उसके हाथ जल गए "ससस आआहहह".........उसने जलन होने से अपने हाथो को फूंका

"डैम इट"........उसने गाडी को एक ठोखर मारी.....इंजन गरम हो गया था और उससे धुआँ निकल रहा था|

डेड लेक से बहार निकलना उसका बेहद ज़रूरी था....वो फिर उलटे पाव वापिस कॉटेज नहीं पहुंच सकता था वो काफी दूर निकल आया था| अचानक उसे एक घुटती सी आवाज़ दोहराई अपने कानो में महसूस की...उसका पूरा जिस्म सिहर उठा.....उसने पलटके जब देखा तो खामोशी और वीरान जंगल के सिवाय कुछ नहीं था....

तभी उसने इंजन डोर जैसे वापिस लगायी....अचानक उसके प्राण काँप उठे|

"आअह्ह्ह्ह नहहहहह्ही"...............राम एकदम चीख उठा | उस वक़्त उसने अपने मुंह पे हाथ रख लिया था| उसका पूरा शरीर थर्राये काँप उठ रहा था.....क्यूंकि सामने दिल को दहला देने वाला जैसे वो दृश्य था | क्यूंकि ठीक सामने इंजन दूर के लगते ही उसने देखा की उसकी कार की सीट के भीतर एक कटा हुआ सर उसे देखके ठहाका लगाये हस्स रहा था| खौफनाक मंज़र ऐसा कभी राम ने नहीं देखा था|

उसने फ़ौरन अपनी गन उठायी और कांपते हुए उसकी ओर निशाना साधा...."हाहाहा हाहाहा हाहाहा हाहाहाहाहा हाहाहा"........हस्ती जा रही थी वो उसके खौफनाक चेहरे को ब्यान करना मुश्किल था | उसके पुरे चेहरे पे खरोच के निशाँ थे गर्दन धढ़ से जो अलग हुयी थी वहा से अब भी ताजा खून बह रहा था| उसके बाल उसके चेहरे के दोनों झूल रहे थे और उसकी आँखे सुर्ख सफ़ेद लाल थी| ऐसा लग रहा था जैसे किसी मुर्दे का ज़िंदा सर हो| उसे देखते ही देखते राम चिल्ला उठा.....उसका दिल उसके मुंह को आने लगा उसे मालूम ही नहीं हुआ|

उसने फ़ौरन चीखा "चुप आई सेड गेट डी फ़क ऑफ माय साइट"........कहते कहते उसके कांपते हाथो ने ट्रिगर खींच दिया.....धच्च...एक गोली सीधे गाडी के शीशो को तोड़ते हुए उसके सीट में जा धसी.......लेकिन उसकी हैरत तब हुयी जब उसने पाया की सीट पर कोई सर कटी हुयी मौजूद ही नहीं थी|

धीरे धीरे करके राम गाड़ी के तरफ आने लगा....उसने पास आते हुए अंदर झाका और एक झटके में गाड़ी का दरवाजा खोल दिया....वहा कुछ भी मौजूद नहीं था.........उसने अपने सर को पकड़ लिया..क्यूंकि वो यकीनन उसका भ्रम नहीं था| उसने एक बार गाड़ी के पीछे भी सावधानी से सेहमते हुए झाँका लेकिन वहा कुछ नहीं था| उस वक़्त उसे अपने कानो में हवाओ का शोर सुनाई देने लगा| हो हो करती सर्द हवाएं चल रही थी.....उसका दिल फिर काँप उठ रहा था | उसने एक डिब्बा गाड़ी की डिक्की से निकाला फिर कुछ दिएर सोचते हुए अपनी गन को बाए हाथ में ही लिए वो सड़क से निचे उतरते हुए उन घने जंगलो में प्रवेश करने लगा|

काफी अँधेरा था| झींगुर की किड़ किड़ करती आवाज़ उसे उस नीमअँधेरे और खामोश वीरान जंगलो में हर तरफ से सुनाई दे रही थी....वो एक एक कदम बड़ी सावधानी से रख रहा था| अचानक उसने देखा की वो जितना घने जंगलो के भीतर जा रहा था आस पास उसे सिर्फ जंगल झाड़ के कोई पानी मिलने का विकल्प नहीं मिल रहा था| आखिर में हार मानते हुए वो वही एक पेड़ पे सर टिकाये कुछ देर के लिए आँखे मूंदे खड़ा रहा| एक तो वो भयंकर रात ऊपर से नींद जैसे उसके आँखों में चढ़ रही थी| ऊपर से उसे डेड लेक से बहार निकलना था| अचानक उसे अहसास हुआ जैसे उसके चेहरे पे टप टप करते हुए कुछ पड़ रहा था...उसने आँख खोलते हुए अपने चेहरे पे लगे उन बूंदो को देखा तो हाथ में उसके खून लग गया| वो आँखे बड़ी किये अपनी गर्दन को ऊपर की तरफ जैसे जैसे उठाने लगा खौफ्फ़ उसके दिल में समां उठी|

क्यूंकि पेड़ पर उसे एक सर कटी लाश दिखी| साहिल ने जो बयानात दिया था ये उसी औरत की सर कटी झूलती हवा में तैरती वो लाश उसे जान पड़ी....."नही नहीं नहीं आह्हः"..........भौकलया राम डब्बे को वही फैख आनन् फानन वापिस उलटे पाव जंगल से बाहर की तरफ भागने लगा..."बचाओ मुझे somebudy हेल्प मी".........वो चीखता डरता हुआ वापिस गिरते पड़ते अपनी गाड़ी की तरफ आने लगा...और उसी पल उसने देखा की कोहरा बहुत ज़्यादा छाया हुआ था| एका एक उसे बहुत लोगो की ठहाका लगाती वो हसी सुनाई देने लगी...."हहहह हाहाहा हाहाहा हाहाहा".........."शट अप आई सेड शट अप"..........अंधाधुंध अपने कान को पकडे भौखलाये अवस्था में राम ने उस कोहरे में फायरिंग शुरू कर दी| लेकिन जितनी बार भी उसने गोलिया चलाई उतनी बार उसे सिर्फ ठहाका लगाती गूंजती वो हसी सिर्फ सुनाई दे रही थी| उसने अपने कान पकड़ लिए उसने उसी कोहरे में भागते हुए जैसे तैसे गाड़ी का दरवाजा खोला तो उस हाथ ने कस्सके उसके गर्दन को जकड लिया

"आह्हः स आह्हः उग्गहह"......अपने गले से उस कटे हाथ को छोड़ने की नाकाम कोशिशे राम कर रहा था उसकी आँख खौफ्फ़ से फटी जा रही थी...क्यूंकि उसने देखा की गाड़ी में सैकड़ो मुर्दे जैसे उसे ही देख रहे थे उनका चेहरा इतना भयंकर था की ब्यान करना मुश्किल...."नहीं नहीं छोड़ दो मुझे जाने दो आह्हः आह्हः"...........मुर्दो ने जैसे बारी बारी से उसके मासो को खाना शुरू कर दिया....राम दर्द के अहसास से चीखते हुए उन्हे अपने से दूर धकेलना चाह रहा था लेकिन उस सर कटी लाश ने उसे अपनी गिरफ्त में खींच लिया था| राम को उन सबने मिलके गाड़ी में जैसे खींच लिया...दरवाजा अपने आप गाड़ी का लग गया| खून से लथपथ बस वो हाथ शीशो पे राम के घिस रहे थे| दर्दनाक चीखो का सिलसिला कुछ दिएर तक यु ही चलता रहा| उसके बाद राम की आखरी वो दर्दनाक चीख थी जिसके बाद गाड़ी के निचले हिस्सों से बस खून बहते हुए निकल रहा था|

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धढ़ धढ़.....एका एक साहिल दिप और अरुण ने मिलके उस लकड़ी के बने दिवार के पल्लो को अपनी ताक़त से तोड़ दिया था| जब वो भीतर दाखिल हुए तो अंदर गुप् अँधेरा था| रैना और सौम्य अभी भी जिस कमरे से वो उस कमरे में प्रवेश किये थे उसके ठीक पहले वाले कमरे में ही मौजूद थे| अरुण ने उसी पल टोर्च जलाते हुए चारो तरफ मारा| डीप ने देखा की पुरे दीवारों पे मकड़ी की जालिया थी| और बहुत जर्जर सी उस कमरे की हालत हो गयी थी | वो रूम किसी कबाड़खाने जैसा लग रहा था|

"ये यकीनन मैरी का सिंगल रूम होगा जहा वो वक़्त बिताया करती थी देखो उसकी हर तरफ तस्वीरें लगी हुयी है....वो देखो वहा पे उसका हस्बैंड फर्नांडेस की तस्वीर है ये शादी की तस्वीर लग रही है न?".........अरुण ने सहमति में डीप के कहे को सुना

"ये देखो ग्रामोफ़ोन"..........साहिल ने इस बार टोका....पीछे पीछे रूम में टोर्च मारते हुए रैना और सौम्य भी चारो ओर नज़र फिरा रहे थे| "लेकिन दीप हुम्हे इस कमरे से क्या हासिल होगा ऐसे तो कई और भी रूम्स है जो अबतक हमने खोले नहीं है"..........."नहीं अरुण इस कॉटेज का ये एक मात्रा कमरा है जहाँ मुझे अजीब सा महसूस हो रहा है कुछ न कुछ तो ज़रूर जानने को मिलेगा".........अभी उन दोनों की बात सब सुन ही रहे थे की इतने में सौम्या को अपने पीछे किसी के होने की मौजूदगी सी हुयी|

उसने सेहमते हुए पलटकर जैसे पीछे की ओर देखा...तो उसकी चीख निकल गयी...."फर्नांडेस"........चीखते हुए हर कोई हड़बड़ाए सौम्य की तरफ हुआ.....एका एक रैना भी उस वक़्त चीख उठी....जावेद और साहिल भी काँप उठे.....दीप ने पाया की सच में दिवार के एक कोने पर फर्नांडेस के ही कपड़ो में एक कंकाल पड़ी हुयी थी जो न जाने कबसे वैसे ही उस बंद घर में मजूद थी|

"ये फर्नांडेस की लाश है"........दीप ने आगे बढ़ते हुए उसपे टोर्च मारा....अरुण भी उस लाश के करीब आया...पीछे रैना और सौम्य एकदूसरे को कस्सके पकडे हुए थे....अरुण ने झुककर देखा तो लाश के पास उसे एक छोटी बोतल मिली....."इटस पोइसन".........अरुण ने शीशी की उस बोतल को सबकी तरफ दिखाया

"यानी की फर्नांडेस ने खुदखुशी की थी उसे किसी रूह ने नहीं मारा था लेकिन अगर इसकी लाश यहाँ थी तो फिर इसकी बीवी मैरी उसकी लाश कहा होगी?"

दीप अभी सोच ही रहा था की उसकी नज़र सामने खुले उस कवर्ड की तरफ हुयी....उसमें पुराणी कुछ किताबे थी| जैसे दीप ने उसपर से धूल हटाते हुए उसे बाहर निकाला तो पाया की निचे एक पुराना टेप रिकॉर्डर मशीन था|......कुछ ही देर में वो टेप रिकॉर्डर लिए उस कमरे से अपने कमरे की ओर आये....अरुण ने एक बार लॉक्ड दरवाजे की तरफ ध्यान दिया उसे बाहर किसी की आहट महसूस नहीं हुयी तो वो शांत हुआ|

हर कोई उस टेप रिकॉर्डर को बीच में रखके गोल घेरा बनाये बैठा हुआ था....आस पास मोमबत्तिया जल रही थी|....बाहर की बरसात अब थम चुकी थी| लेकिन बिजलिया अब भी कड़क रही थी| जावेद ने तुरंत हवा से खुलती लगती उसे खिड़की को झट से बंद कर दिया.....और फिर सबके साथ आके बैठ गया|

दीप के कहे अनुसार...अरुण ने उसके प्ले बटन को जैसे ही दबाया उसमें से एक भारी गले की आवाज़ बोलनी शुरू हो गयी...सबको मालुम था की ये आवाज़ फर्नांडेस की थी |

"ये टेप रिकॉर्डर जिसे भी हासिल हुयी हो उसे कॉटेज के राज़ भी मालुम पड़ चुके होंगे|......ये मेरी बदकिस्मती थी जो मैंने ये घर अपनी बिलवेड वाइफ मैरी फर्नांडेस के लिए ख़रीदा था....हमारी शादी को १ महीना ही हुआ था की मैंने उसके लिए शहर से दूर इस वीरान सुनसान डेड लेक में एक सुन्दर सा कॉटेज उसके लिए बनवाया था...ताकि हम अपनी ज़िन्दगी चैन और सुकून से काट सके....लेकिन किसे पता था की हमने अपनी ज़िन्दगियों को मौत के दलदल में उतार दिया....मुझे आज भी याद है उन लोगो की बात जो इस कॉटेज के बनाते वक़्त काम अधूरा छोड़के भाग गए थे| मुझे याद है की मैंने कितनी मुश्किलों से इस जगह को हासिल किया था और कैसे यहाँ अपना घर बनाया था| उस वक़्त मेरे ज़ेहन में मैरी की दीवानगी थी जो मुझे कुछ भी करने को गुज़र देने पे पूरी इख़्तियार रखती थी.उसके बाद !"

 
दीप अरुण रैना और बाकी के क्रू मेंबर जावेद और साहिल चुपचाप उस रिकॉर्डिंग को सुन रहे थे....सबके ज़ेहन आज से ३० साल पहले घटे फर्नांडेस और उसकी बीवी के साथ हुए दास्ताँन से जैसे रूबरू होने लगे....

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३० साल पहले...

"ब्रिलियंट मर्वेलौस ये तस्वीर मेरी वाइफ मैरी की बनायीं हुयी है और मैं चाहता हूँ उसके इस सपनो के कॉटेज को हकीकत में तब्दील किया जाए इसके लिए चाहे जितने भी पैसे लगे मैं देने को तैयार हूँ लेकिन मुझे इसी इलाके में ये घर चाहिए यही मेरी मैरी के लिए शादी का दिया मेरा पहला तोहफा होगा".......एका एक फर्नांडेस बिल्डर के रूबरू हुए बात चीत कर रहा था |

"आप चिंता मत कीजिये सर लेकिन गुस्ताखी के लिए मांफी चाहूंगा पर इस इलाके में आजसे कई बरस पहले ब्रिटिश अमल के टाइम एक हादसा हुआ था एक चलती !"..........बिल्डर की बात पूरी होने से पहले ही बीच में उसे फर्नांडेस ने उसकी बात काट दी थी |

"जानता हूँ | एक चलती पैसेंजर ट्रैन ब्रिज से गिर पड़ी थी सुना था की वो लाल ब्रिज कमज़ोर था और उसके बारे में ज़्यादा कोई कार्यवाही नहीं हो पायी थी क्यूंकि उसके बाद ब्रिटिश राज मुकम्मल तौर से भारत से हट चूका था| खैर ये तो पुराणी बात है इससे क्या फर्क पड़ता है?"

"सर यही वजह से आप तो ठहरे मॉडर्न सोच वाले शहरी लोग लेकिन हमारे धर्म के अनुसार किसी भी जगह को चुनने से पहले उस इलाके की आवो हवा और वह बनाने से उस घर का वास्तु शास्त्र देखना भी उच्चित होता है और सर मेरी मानिये मैं आपके लिए कही और?"

"डॉन'ट से कहीं और....मैंने फैसला कर लिया है यहाँ कॉटेज बनेगा सो बनेगा...उसके लिए तुम्हें गोवेर्मेंट की परमिशन लेनी हो..या फिर कोई लीगल दस्तावेज लेने हो आई डॉन'ट केयर बट काम शुरू जल्द से जल्द इस इलाके में हो जाना चाहिए"..........फर्नांडेस के आदेश अनुसार और ज़िद्द के चलते बिल्डर को खामोश होना ही पड़ा...वैसे भी उसे तो पैसो से ही मतलब था |

फर्नांडेस एक बिजनेसमैन था जिसने शहर को त्यागकर बाहरी इस इलाके की सुनसनीयत और खामोशी में अपने सुख और चैन को ढूंढा था.....उसने मैरी को ये सरप्राइज देना चाहा था.....जल्द ही बिल्डर ने काम शुरू करवा दिया...जंगल झाड़ को साफ़ करवाते हुए उसने उस जगह पे कॉटेज तैयार करवाना शुरू कर डाला....

फर्नांडेस खुद कॉटेज की कंस्ट्रक्शन में वह हरदम मौजूद रहता था....वो उस दिन भी सलाह मश्वरह बिल्डर के साथ कर ही रहा था की इतने में खुदाई का काम जो चल रहा था उसमें खुदाई कर रहे कुछ मजदूर फावड़ा छोड़े चिल्लाते हुए उन दोनों के करीब आये....साथ में उनके ठेकेदार भी था जो सहमा हुआ था |

"क्या हुआ? ये सब यहाँ ऐसे इकट्ठे क्यों हुए है? क्या बात है?"..........फर्नांडेस ने ही सवाल किया ठेकेदार से

"स..साहेब साहेब वो..वो जब हमने खुदाई करनी शुरू की तो हम्हे कई लाश गड़ी हुयी मिली साहब...बहुत बुरी हालत में है कुछ के अंग कटे हुए है| और कुछ कंकाल है"...........अभी बात पूरी ही हुयी थी की खुदाई के दूसरी तरफ से कुछ वैसे ही खबर बाकी मज़दूरों ने आकर फर्नांडेस को दी

"देखा सर मैंने आपसे कहा था| उफ़ जो लाशें ताज़ी लग रही है उन सबको वैसे ही एक गड्ढो में डालके गाड़ दो....और सुनो यहाँ से जाने वाला कोई भी मज़दूर पुलिस को ये सुचना न देगा की यहाँ कई लाशें गड़ी मिली है"..........मज़दूर ठिठक गए.....फर्नांडेस ने सबको दुगने रकम देने की बात कहीं तो लालच उनके आँखों में समां उठा

"इस राज़ को बेहतर होगा की तुम सब यही भूल जाओ और जल्द से जल्द इस तस्वीर की हूबहू खूबसूरत कॉटेज को इस जगह पे खड़ा करो मुझे किसी भी बात का कोई डर नहीं और वैसे भी मुर्दे कभी ज़िंदा नहीं होया करते और कौन जाने किसने कब इन्हें जान से मार्के यहाँ फैक दिया हो? हाहाहा ये सब अंधविश्वासी बातें है कानून को इख़्तिला हुयी तो कार्यवाही होगी और ये जगह मुझसे छीन ली जा सकती है जो मैं कत्तई नहीं बर्दाश्त कर सकता गाड़ दो इन सब मुर्दो को एक ओर और जो कंकाल खुदाई के वक़्त कंस्ट्रक्शन साइट पे मिल रहे है उन सबको भी"

धीरे धीरे राज़ पे फिरसे पर्दा डाल दिया गया....फर्नांडेस ने एक बार खुद उन लाशो का जायज़ा लिया था जो कई बुरी हालत में थे....बिल्डर ने साफ़ बताया की कुछ कंकालों में जो वेश बुशा पायी गयी वो सब विलायत के लग रहे है....यानी की उस ट्रैन हादसा में मरे जो लोग उस दलदल में गिर गए थे उन्ही की वो लाशें आज दलदल के सुखने पे गड़ी हुयी ज़मीन से बरामद हो रही थी....धीरे धीरे वक़्त के साथ कॉटेज आखिर बनवा ही दिया गया....हर मज़दूर को चेतावनी थी की कोई भी हुयी बात शहर में किसी को मालूम न चले....मज़दूरों ने भी कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया वो लोग पहले ही किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे | इसलिए वो सब वह से कॉटेज को बनाये जा चुके थे|

कुछ ही महीनो बाद मैरी अपने पति फर्नांडेस के साथ डेड लेक के अपने कॉटेज के सामने कड़ी थी....."वाक़ई बहुत खूबसूरत कॉटेज है....जैसा मैंने पेंटिंग किया था उफ़ आई कैन'ट describe इन वर्ड्स"..........."ओह मैरी बस अब हम और तुम और ये तन्हाई भरा फ़िज़ा अब हम्हे कोई भी डिस्टर्ब नहीं करेगा चलो आओ".........मैरी और फर्नांडेस ख़ुशी ख़ुशी उस कॉटेज में रहने लगे थे....वो उनका वो पहला दिन था....सलहत से हर कीमती चीज़ें कॉटेज में एहतियात के साथ रखी जा चुकी थी|

"तुम आज ही क्यों ? जा रहे हो? ये हमारा इस घर में पहला दिन है फर्नांडेस"

"हाहाहा मेरी जान मैं कौन सा दूर जा रहा हूँ कल सुबह तक घर लौट आऊंगा तुमहे फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं ये रिवाल्वर"....मैरी के हाथ में वो रिवाल्वर देते हुए जिसे मैरी ने इंकार से वापिस करना चाहा...

"नहीं फर्नांडेस मुझे डर लगता है वैसे भी यहाँ कितनी सुन्सानियत है अकेले में मेरा दम घुटेगा"

"ओह माय डार्लिंग प्लीज डॉन'ट से डेट ये वीरापन खामोशी क्या तुम्हे पसंद नहीं? अब तो हम्हे सारी उम्र यही गुज़ारनी है और मैं कौन सा दूर जा रहा हूँ अच्छा बाबा मैं कोशिश करूँगा की मीटिंग जल्द से जल्द ख़तम करके गए रात को ही घर लौट आउ वैसे भी शहर ही तो जा रहा हूँ कौन सा आउट ऑफ़ इंडिया जा रहा हूँ"

"फिर भी जोसफ मुझे डर लगेगा"

"कोई नहीं आएगा मैं कह रहा हूँ न और अगर ज़्यादा दिक्कत लगे तो टेलीफोन में मैं तुम्हें एक बार कॉल करके पूछ लूंगा अब तो खुश हो न तुम? आई विल बी बैक एट अर्ली ४ ऍम ओके हाहाहा अब यूँ मुझसे दूर न रहो जरा पास आओ".........एका एक फर्नांडेस ने मैरी को अपनी बाहों में खींच लिया

उसी दिन दोपहर को फर्नांडेस बीवी से विदाई लेते हुए अपनी कार में सवार शहर के लिए जा चूका था.....मैरी को अहसास हुआ की ठण्ड वाक़ई बढ़ गयी थी उसने चारो तरफ देखा जैसे जैसे सूरज ढल रहा था..माहौल वीरानेपन का उसे बेहद डरावना होता नज़र आया....वो झट से कॉटेज में दाखिल होते हुए सारे खिड़किया और दरवाजे लगाए सीढ़ियों से ऊपर उस कमरे में आयी....उस वक़्त कोहरा बाहर छाया हुआ था| वो ऊपर के माले का सबसे उच्चा कमरा था जहाँ से कॉटेज के पीछे का इलाका दीखता था....मैरी ने देखा की दूर उसे लाल ब्रिज जो की करीब बीच से टुटा हुआ था घनी जंगलो के बीचो बीच स्थित था....वो आगे से टुटा हुआ था साफ़ जान पड़ रहा था काश उस वक़्त जोसफ उसके साथ होता तो वो दोनों वहां उस ब्रिज को ज़रूर देखने जाते...क्यूंकि ज्यादा जोर देने पे फर्नांडेस ने सिर्फ इतना ही अपनी पत्नी को बताया था की वो ब्रिज कई साल पहले किसी दुर्घटना में टूट चूका था जिसके साथ एक ट्रैन भी गिर पड़ी थी| मरने वालो की लाशें तक न सारी मिल पायी थी क्यूंकि पहले वो इलाका तालाब घने जंगल और दलदल पे था| हो हो करती हवाओ के साये जब उसके चेहरे की ओर पड़ने लगे...तो उसने खिड़की लगायी और वही कुर्सी पर बैठी अपने बाल को सवारने लगी थी मैरी...

रात १० बज चूका था....हव्व हव्व करते जंगली जानवरो की रोने की आवाज़ ने जैसे मैरी को चौंका डाला....वो आज से पहले कभी इतने खामोश वीरानो में न रही थी| वो उस आवाज़ को सुनकर थोड़ा सिहम उठी थी....इसलिए वो फिर अपने कमरे की खुली खिड़की से बाहर अंधेरो में झाँकने लगी....उसे अपने कानो में गूंजती वो हवाओ का शोर साफ़ सुनाई दे रहा था| अचानक मेघ को गरजते देख उसने एक बार आसमान की ओर देखा....और ये सोचा की शायद आज रात तूफ़ान आयेगा...कुछ ही देर में आंधी उठने लगी| मैरी ने झट से खिड़किया लगायी और पर्दो को बराबर किया...

इतने में टेलीफोन की घंटी ने उसे चौका दिया...वो सीढ़ियों से उतारते हुए निचे आयी हॉल में वो टेलीफोन बज उठ रही थी|....मैरी ने झट से रिसीवर को उठाया

"हेलो?"

"हे डिअर कैसी हो? डिनर हो गया तुम्हारा?"

"डिनर तो कबका कर लिया आज पहली बार तुम्हारे बिना खायी हूँ बहुत अकेली महसूस कर रही हूँ मैं जोसफ तुम प्लीज जल्दी आ जाओ न"

"कोशिश तो यही है डिअर बस मैं मीटिंग से फारिग होक गाडी से सीधा घर ही पहुंच रहा हूँ तुम फ़िक्र मत करो"

"हाँ | और यहाँ तूफ़ान शुरू हो गया है तुम्हे मालुम है?"

"हाहाहा आउटर एरिया में अक्सर बिगड़ते मौसम से बरसात हो ही जाती है वैसे भी सर्द रात में बारिश उफ़ तुम्हे कहीं ठण्ड न लग जाए"

"मेरी फ़िक्र अगर इतनी है तो जल्दी घर लौटो ओके"

"अच्छा ओके डिअर बाई"

"बाई गुड नाईट जोसफ जोसफ क्या तुम्हे मेरी आवाज़ आ रही है?".........उसी वक़्त कड़कती बिजली से काँप उठी मैरी उसे अहसास हुआ की फ़ोन कट हो चूका था| मैरी को अहसास हुआ की शायद ख़राब मौसम से कनेक्शन जुड़ नहीं रहा था| उसने मायूसी से रिसीवर वापिस टेलीफोन पे रखा और अपने कमरे की ओर चल पड़ी...

 


टन्न टन्न उस ग्रांडफादर क्लॉक की जैसे रात १२ बजते ही सुई पड़ी तो एक भारी गूंज पुरे कॉटेज में हो उठी.....हवाएं काफी तेज चल रही थी और कोहरा काफी ज़्यादा छाया हुआ था| बीच बीच में बिजलियों की कड़कड़ाहट भरे आवाज़ को सुन मैरी का बदन काँप उठा| वो फिर गुनगुनाते हुए नहाने लगी थी| गुनगुने उस पानी भरे हेमम से निकलते हुए जब उसने कदम बाहर रखा तो उसके जिस्म पर सर्द की एक सिरहन दौड़ उठी..."ससस ये क्या? ये कपकपाती ठण्ड मुझे क्यों लग रही है?"........मैरी ने अपने आप से बात करते हुए कहा

उसने अभी बाथरूम के लॉक को खोला ही था की इतने में अचानक लाइटस अपने आप चली गयी....इससे मैरी काँप उठी......वो वैसे ही डरी हुयी थी और अब लाइट के जाने से उसे अकेले इस एकांत कॉटेज में अँधेरे में ही रहना था |.......वो धीरे धीरे अपने बेडरूम में पहुंची मोमबत्ती की रौशनी जलाये उसने अपने पति के दिए उस वाइट गाउन को देखा और मुस्कुराया...कुछ ही दिएर में वो वाइट गाउन की ड्रेस में मोमबत्ती की रौशनी में बिस्तर पे आँखे मूंदें लेटी हुयी थी | अचानक उसे अहसास हुआ की उसके पुरे कमरे में सर्द कुछ ज़्यादा बढ़ रही थी | उसने ठिठुरते हुए जब उठकर पाया तो उसके चेहरे का रंग सफ़ेद सा पड़ गया एका एक उसकी चीख निकल गयी...."आआआआह"....मुंह पे हाथ रखे दहशत में उसने साफ़ पाया एक सर कटी लाश की परछाई जो ठीक उसके खिड़की पे खड़ा था...उसे अहसास हुआ की बैडरूम कॉटेज के सबसे ऊपर ऊचे पे था तो ऐसे में वो साया खिड़की से बहार वहां कैसे मौजूद हो सकता है?

उसी पल वो बिस्तर से उठ भाग खड़ी हुयी....सीडिया उतरते हुए जब उसने टेलीफोन उठाके नंबर डायल करना चाहा तो नंबर न लग सका...उसी पल उसे अहसास हुआ की जो मोमबत्ती वो लिविंग हॉल में छोड़े गयी थी वो अब भुज चुकी थी| और ठीक उसी पल उसने साफ़ पाया दोहरी आवाज़ निकालते हुए वो अजीब सी आवाज़ उसे दरवाजे के बाहर सुनाई दे रही थी| उसने साफ देखा निचले दरवाजे से अपने आप धुँआ अंदर की ओर छा रहा था| आतंकित मैरी खौफ्फ़ से पीछे को होते ही सीढ़ियों पे जा गिरी लेकिन चोट से ज़्यादा उसके दिल की वो दहशत थी जो उस चीज़ के सामने आने पे बढ़ रही थी| उसने साफ़ देखा उस कोहरे से एक धीरे धीरे कई लोग जमा हो रहे थे हर किसी का चेहरा इतना खौफनाक था की उनसे नज़र हटाए बिना रहा नहीं जा रहा था | किसी का सर था तो किसी का हाथ नहीं किसी की एक टांग तो किसी का कोई अंग नहीं........मैरी ये खौफनाक दृश्य देख चीख उठी...वो दौड़ते उलटे पाव अपने कमरे में पहुंची| और दरवाजा लॉक्ड किये जैसे तैसे बाथरूम में घुस्स्कार उस दरवाजे को भी लॉक्ड कर चुकी थी |

अचानक उसे अहसास हुआ की कोई दरवाजो पे दस्तक दिए जा रहा था| कई दस्तक होती रही....लेकिन पसीने पसीने आतंकित मैरी ने दरवाजा नहीं खोला..कुछ देर बाद उसे अहसास हुआ की अब कोई आवाज़ उसे बहार से नहीं आ रही थी | किसी के होने का अहसास भी उसे महसूस नहीं हो रहा था | जो उसकी आँखों ने देखा था वो इंसान तो हो नहीं सकते थे वो क्या थे? यही सवाल को सोचते हुए उसका जिस्म एक बार फिर सिहर उठा...किसी भी तरह बस जोसफ उसे मिल जाए काश वो उसके पास होता......मैरी ने अपने ज़ज़्बातो पे काबू पाते हुए जैसे ही उस बाथरूम के धुंधली आयने की तरफ देखा तो एक पल को वो ठहर सी गयी...उसने झट से आईने से उस धुंध को पोछा तो उसके गले से एक भयानक चीख निकल गयी |

क्यूंकि ठीक उसके पीछे वो औरत का साया खड़ा था...जिसका सर उसके अपने हाथो में था....और वो ठीक मैरी के पीछे खड़ी थी...मैरी ने कांपते हुए उसे पीछे जैसे ही पलटकर देखा उस साये की पांचो हाथ के नाख़ून जैसे मैरी के गले के आर पार हो गए....मैरी के गले से घुटती एक दर्दनाक चीख सी निकली और उसके बाद उसका जिस्म वही बाथरूम के फर्श पे गिर पड़ा...उस रूह के हाथो पे लगे खून अब भी फर्श पर उसके लम्बे धार धार नाखुनो से अब भी टपक रहे थे...

अगले दिन जब ख़ुशी से चेहेकता फर्नांडेस अपने घर पहुंचकर दस्तक देता है...तो उसे कॉटेज से मैरी की कोई मौजूदगी का अहसास नहीं होता...वो एक पल को गंभीर होते हुए दरवाजे को अब पीटने लगता है...."मैरी मैरी दरवाजा खोलो डिअर मैरी मैरी".........जब मैरी दरवाजा नहीं खोलती...तो फर्नांडेस परेशां हो जाता है...उसे अजीब अजीब ख़यालात आने लगते है तो उसी वक़्त अपनी डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोलता है...दरवाजा अपने आप चर चर्राती आवाज़ के साथ खुल जाता है.....धीरे धीरे फर्नांडेस सोच में अंदर दाखिल होता है...लिविंग हॉल में नीम अँधेरा था जो दरवाजे के खुलने से अंदर बाहर की हलकी रौशनी फैक रहा था सब चीज़ें अपनी अपनी जगह सलिहत से रखी हुयी थी |

वो अपनी पत्नी का नाम बार बार पुकारते हुए उसे हर जगह तलाश करता है....."मैरी मैरी कहाँ हो तुम? मैरी?".....वो धीरे धीरे सीढ़ियों से चढ़ते हुए ऊपर के माले पे पहुँचता है...अपने बैडरूम का दरवाजा उसे बंद मिलता है..."मैरी मैरी आर यू ओके?"..........फिकरमंद फर्नांडेस इस बार दरवाजे को फिर पीटने लग जाता है..."मैरी क्या हुआ तुम्हे? मैरी जवाब दो"..........लेकिन उसे उसके किसी भी सवाल का कोई जवाब मैरी नहीं देती....अब उसके दिल की धड़कने बहुत तेज होने लग जाती है|

वो दरवाजे को तोड़ देता है...और जैसे ही दरवाजा टूटता है वो दहशत में काँप उठता है...उसी पल वो मैरी का नाम लिए जोरो से चीख उठता है...."मैरी".....बैडरूम के ठीक पास बाथरूम का दरवाजे से निचे खून बह रहा था| उसने जब बाथरूम का दरवाजा तोडा तो लाश वही फर्श पे उसे मैरी की पड़ी मिली....उसके हालत को देख वो रो पड़ा..उसे ऐसा लगा किसी ने उसकी बीवी की निर्दयता से हत्या कर दी थी |

उसके जिस्मो के हर ओर गहरे दांतो के निशाँ थे और उसका गला किसी जानवर के पंजो से जैसे फाड़ा हुआ था...पुरे फर्श पे खून ही खून फैला हुआ था....ये दृश्य देखके जैसे फर्नांडेस के प्राण काँप उठे थे| वो महसूस नहीं कर पा रहा था की ये सच था | उसे यकीन नहीं हो रहा था की उसकी बीवी मर चुकी थी | उसने एक बार लाश को गौर से देखा मैरी की दोनों आँखों को जैसे किसी ने बेदर्दी से नोचके निकाल लिया था | ये काम उसे हरगिज़ किसी इंसान का नहीं लग रहा था | काश वो अपनी पत्नी की बात मानकर उसे यूँ अकेला कल रात यहाँ न छोड़ता...."

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कमरे में मौजूद हर कोई उस टेप रिकॉर्डर को बड़े ध्यान से सुन रहा था...हर कोई जैसे आतंकित भरे हालातो में था....टेप रिकॉर्डर जैसे फसी वैसे ही अरुण ने रिज्यूमे दोबारा किया...फिर वही भारी गले में फर्नांडेस की आवाज़ सुनाई देने को मिली....हर किसी के चेहरे पे खौफ्फ़ सिमटा हुआ था....सिवाय डीप के जो बड़ी गहरी सोच में डूबा अबतक इस कहानी को सुन रहा था |

"उस दिन मैंने अपने इन्ही हाथो से अपनी पत्नी मैरी की लाश को कॉटेज के ठीक पीछे गाड़ दिया था | क्यूंकि मुझे डर था की पुलिस ना ही सिर्फ मुझे दोषी मानती बल्कि उन्हे मेरी बीवी की मौत का कभी मालूमात न चलता और मैं नहीं चाहता था की मैरी की लाश को वो लोग पोस्टमर्टम करके उसे और दर्द दे....मैरी मेरे नज़रो के पास ही थी उसे वही गाड़े जब मैं वापिस मैं लौटा तो मुझे अहसास नहीं की मेरी जीने की इच्छा ख़तम हो चुकी थी| मैं जान चूका था की जिन्होंने मुझे मना किया था यहाँ रहने से उसके पीछे क्या वजह थी? काश मैं पहले समझ पाता...मैरी के साथ जो दर्दनाक वाक़्या घटा था वो खुद मुझे मैरी ने बताया था...उस रात मैं सो नहीं पा रहा था...जिसकी पत्नी को उसका पति अपने इन्ही हाथो से गाड़ के आया हो उसे भला नींद कैसे आती मेरी जिंदगी मुझसे छीन ली जा चुकी थी| मैंने साफ़ देखा की जैसे जैसे अँधेरा हो रहा था वीराना खामोशियाँ महज़ वीराना और खामोशिया नहीं रह रही थी | अब मैं समझ रहा था की मेरी मैरी ने कैसा महसूस किया था उस वक़्त? उस वक़्त मेरी खिड़की से जब बहार निगाह हुयी तो मैंने साफ़ देखा...ज़मीन से निकलती उन लाशो को...वो महज़ लाशें नहीं थी जैसे कोई रूह जो मरकर भी जैसे इस कायनात में ज़िंदा थी| उनका चेहरा उनके बारे में मैं कुछ नहीं बता सकता की वो कितना भयानक मंज़र था| वो धीरे धीरे मुस्कुराये मेरी ही घर की ओर बढ़ रहे है | हाँ वो कोहरे के साये में अपनी मज़ूदगी का अहसास मुझे कराते हुए मेरी ओर आ रहे है| मैं इस गुप्त कमरे में न जाने कबतक छुपा रह पाउँगा| मैंने साफ़ देखा एक सर कटी उस औरत की लाश को ठहाका लगा रहे उन चीज़ो को....जिनकी आवाज़ें मुझे अपने निचे लिविंग हॉल से ऊपर सुनाई दे रही है| मैरी मुझे सबकुछ बता चुकी है वो लोग मुझे भी ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे वो लोग मुझे भी मार डालेंगे....इससे पहले की वो मुझे मारे मैं अपने आपको ख़तम करने जा रहा हूँ|"

टेप रिकॉर्डर अपने आप बंद हो गया...."बस इतनी ही थी रिकॉर्डिंग".........कहते हुए दीप के सामने ही अरुण ने वो टेप रिकॉर्डर कोने पे रख डाली......उस वक़्त कड़कती बिजलियों की गरगराहट से सब एक बार एकदूसरे की ओर देखने लगे....."हम यहाँ से कभी निकल नहीं पाएंगे न".........सौम्य ने रोते हुए बोलै....अरुण ने उसे शांत किया |

"फर्नांडेस और उसकी पत्नी मैरी के साथ जो कुछ भी हुआ वो यहाँ बसी उन नापाक रूहों की वजहों से हुआ जिनकी चपेट में कोई न कोई यही रात भटकते या फिर अपनी मर्जी से फसकर आ जाता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं की हमारा भी वही हश्र होगा जो बाकियो का हुआ"

"लेकिन दीप भगवान् के सिवाह अब हम्हे इस केहर से कौन बचा सकता है?"

"वही खुदा ही अब हम्हे बचा सकता है अरुण.....क्यूंकि तुम ही सोचो एक के बाद एक इतने राज़ जब हमारे आगे खुलते जा रहे है तो इसका तो यही मतलब हुआ न की हम्हे दिशा वही दिखा रहा है...शैतान का राज सिर्फ दुनियावी ज़िन्दगी पे है....आखिर में तो जहन्नुम की आग उसे उतरना ही होगा...और इस जहन्नुम से निकलने के लिए मेरे पास एक तरकीब मुझे अब समझ आ रही है"

"कैसी तरकीब?"............इस बार साहिल ने ही पूछा

"टेप रिकॉर्डर में फर्नांडेस ने जिस दलदल का ज़िकर किया हम्हे वही से कोई रास्ता मिलेगा ये सारी फसाद शुरू उन नापाक मरी लाशो से हुयी है जो इस कॉटेज के सरज़मीं पे भी गड़ी हुयी है....हम्हे फ़ौरन उन सब लाशो को और उस दलदल को ढूँढना होगा....मैं उस दलदल को बाँध दूंगा अपने अमल से जिससे वो नापाक रूहें वही कैद होक रह जाएँगी"

"ये तो बहुत खतरनाक रास्ता है और ऐसे में बाहर जाना मुनासिब नहीं"..........जावेद ने कहा

"अगर हम ये न कर पाए तो सच में फिर कोई नयी आफत हम्हे नुकसान पहुचायेगी जबतक सुबह नहीं होगा ये रात हमसब पर भारी है.....जैसे तैसे बस ये रात हम्हे इस कॉटेज में काटनी है और उससे भी ज़्यादा हिफाज़त अपनी जान की करनी है"

ख़ामोशी से हर कोई चुपचाप खड़ा था | उसी पल सौम्य की निगाह रैना पे हुयी जो एकटक खुली खिड़की से बहार की ओर देख रही थी| हवाएं इतनी तेज चल रही थी की एक्पाल को सब सिहर उठे...."रैना खिड़की लगा दो रैना"............रैना ने कोई जवाब नहीं दिया....वो बहुत पहले ही टेप रिकॉर्डिंग सुनते सुनते खिड़की के पास जा खड़ी हुयी थी|

"रैना रैना?"..........दीप ध्यान से रैना की ओर देखने लगा जो किसी के पुकारने का कोई जवाब नहीं दे रही थी

"तुम्हे समझ नहीं आता रैना खिड़की बंद करो हवा आ रही है मैं तुमसे कह रही हूँ रैना"..........सौम्य ने रैना को अपनी ओर पलटा.....

और तभी........

 


सौम्य ने जैसे रैना को अपनी ओर पलटा....तो वो चीख उठी...हर कोई फिरसे एक बार उस चीख को सुन सीधा रैना की तरफ देख उठा....रैना के पलटते ही ऐसा महसूस हुआ जैसे वो रैना न हो कोई और हो? उसके चहेरा इतना भयंकर लग रहा था मानो जैसे प्राण निकल जाए....उसके चेहरे पे किसी और का चेहरा झलक रहा था...चेहरे के मॉस के बजाये चमड़ी दिख रही थी जो काली पड़ सी गयी थी....आँखे एकदम सुर्ख काली थी.....वो दोहरी आवाज़ गले से निकालते हुए अपने दांतो को पीस रही थी। अरुण खौफ्फ़ से सौम्या के बाज़ू को खींचते हुए रैना के करीब से दूर करने ही वाला था । की इतने में रैना जोर से दहाड़ी और सीधे उसने कस्सके अपने दोनों हाथो को सौम्य के गले पे जकड लिया....सौम्या की गले से घुटती आवाज़ निकलने लगी।

"आह्ह्ह्ह आआह्ह उग्घ उगह".......सौम्या का दम घुटने लगा था ।

अरुण ने आगे बढ़ते हुए रैना के हाथो को सौम्य के गले की गिरफ्त से निकालना चाहा..लेकिन रैना ने बड़े मज़बूती से सौम्य को थाम रखा था । इस बीच जावेद और साहिल भी सेहमते हुए सौम्य को रैना के गिरफ्त से छुड़ाने की नाकाम कोशिशे करने लगे । "आई सेड लीव हर".......अरुण ने पूरी ताक़त लगते हुए सौम्य के गले पे जकड़े उन रैना के हाथो को चुराते वक़्त जैसे रैना से कहा....लेकिन रैना बस एकटक सौम्य को देखते हुए अपनी पकड़ और मज़बूत उसके गले में कर रही थी । अब सौम्य को सांस लेने में बेहद तकलीफ होने लगी उसके हाथ जो मज़बूती से रैना के दोनों कलाइयों को खरोच रहे थे अब वो धीरे धीरे ढीले पड़ रहे थे ।

"अरुण ये रैना नहीं है इस्पे रूह सवार हो चुकी है तुम्हारे पास ॐ का लॉकेट है इसके माथे पे तुरंत रखो".........सुनते ही अरुण ने अपनी ॐ को अपने गले से उतारते हुए सीधे जैसे रैना के माथे पे देना चाहा...रैना ने झटकते हुए अरुण को एक और फैख दिया...इस बार जावेद ने पास रखके उस रोड को उठा लिया...."मैं कहता हूँ सौम्य को छोड़ दे रैना".........."नहीं जावेद नो".......साहिल ने उसे रोकना चाहा...लेकिन जावेद को लगा यही तरीक़ा ठीक रहेगा उसने जैसे ही रोड उसपे मारना चाहा ही था । अचानक रैना ने अपने दूसरे हाथ से उसकी भी गले को जैसे कस्सके दबोच लिया था दीप पढ़ने लगा था ।

रैना ने इस बार सौम्या के गले को छोड़ते हुए उसे दूर धकेल दिया...सौम्य बदहवास ज़मीन पे जा गिरी...साहिल ने उसे उसी पल संभाल लिया....इस बार रैना दोहरी आवाज़ निकालते हुए जावेद को अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी....वो कस्सके उसके गले को दोनों हाथो से दबोचते हुए हवा में जैसे उठा रही थी....मज़बूती से रैना के कलाई को पकड़े जावेद नाकाम कोशिशे कर रहा था छूटने की उसकी आँखे बड़ी बड़ी हो रही थी । अरुण फिर उठ खड़ा हुआ उसने पाया की मोमबत्ती की फीकी रौशनी में उसके ॐ का लॉकेट उसके पास मौजूद नहीं था । उसने फर्श पे उसे जल्दी जल्दी तआलाशना शरू कर दिया ।

दीप ने तुरंत रैना पे फुका तो रैना एकदम काँप उठी...उसी पल एक तेज हवा कमरे में जैसे दाखिल हो उठी । "मैं तुम सबको मार डालूंगा मार डालूंगा".....रैना दोहरी आवाज़ में फिर जैसे और मज़बूती से जावेद के गले को दबोच रही थी । जावेद की अब सास घुटने लगी थी वो कबूतर की तरह जैसे फड़फड़ा रहा था ।

"मैंने कहा छोड़ दो जावेद को तुम"......डीप ने इस बार कस्सके रैना के गले को अपने बाज़ुओ से जकड लिया....वो उसके कान में दुआ फुक रहा था ।.........रैना उस वक़्त ऐसी तड़प उठी मानो जैसे उसके कान में किसी ने खौलता तेल दाल दिया हो....उसके सुर्ख काले निगाहो से खून निकलने लगा था ।

उसने कस्सके चीखते हुए दीप को दिवार पे दे पटका....लेकिन फिर भी दीप ने कस्सके रैना को थामे रखा....उसी वक़्त अरुण की नज़र पास पड़े उस लॉकेट पे हुयी....अरुण ने झट से वो ॐ का लॉकेट उठाया....और फिर उठ खड़ा हुआ....रैना की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी...उसके गिरफ्त से आज़ाद होते ही जावेद बेहोश होके वही फर्श पे जा गिरा.....दीप रैना के पीछे उसके गर्दन को मज़बूती से थामे हुए था और रैना उसे बार बार दिवार पे दे मार रही थी । दीप अब घायल हो चूका था....रैना ने उसे अपने तरफ जैसे पटक दिया..

दीप फिर भी उठने की कोशिश कर रहा था । उसे समझ आया की ये रूह बेहद शक्तिशाली थी जो उसे कुछ करने देना नहीं चाह रही थी । जैसे ही उसने उठने की कोशिश की रैना ने रोड सीधे दीप के कंधे पे दे मारा...."आआआह आआआआअह्ह"..........दीप जैसे दर्द में दहाड़ उठा....उसके कंधे के मांसो में रोड करीब एक ऊँगली अंदर धस्स चूका था । और रैना घुसे रोड को और भी सकती से अंदर जैसे घुमा रही थी । ठहाका लगाती रैना की दोहरी आवाज़ और दीप के दर्द भरे चीखो को सुन साहिल वैसे ही सहमे दिवार से लगा हुआ था ।

अरुण ने उसी पल ॐ का लॉकेट सीधे रैना के माथे पे जा लगाया...."आआअह्ह आह्ह्ह्ह".......एक पल को रैना की दोहरी आवाज़ जो ठहाको में थी वो एक दर्दनाक चीख में जैसे तब्दील हो गयी....वो रोड को छोड़े ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए अपने कांपते हाथो से अरुण को पकड़ने की कोशिश करने लगी । लेकिन अरुण ने कस्सके ॐ लॉकेट उसके माथे से दे लगाया हुआ था। उसी पल रैना के माथे से धुआँ उठने लगा....जैसे कोई गरम भट्टी से निकला लोहा से उसके मॉस को जला दिया हो । रैना बहुत ज़्यादा तड़प उठी थी । और ठीक उसी पल एक ज़ोर दार चीख के साथ उसने पूरी ताक़त से अरुण को अपने से दूर करते हुए उसे दूर धकेल फैखा...अरुण सीधे दरवाजे से लगकर फर्श औंधे मुंह गिर पड़ा...रैना के माथे पे ॐ का निशाँ बन चूका था जिससे धुँआ छूट रहा था....धीरे धीरे उसका चेहरा जलने की कगार पे हो गया...और वो माथे को थामे खिड़की की और देखते हुए दौड़ते हुए सीधे खिड़कीयो से टकराये बहार छलांग लगा चुकी थी ।

"आआआअह्ह्ह आआअह्ह्ह आअह्ह्ह्हह"..........एक आखरी चीख रैना की सुनाई दी...उसके बाद जब साहिल और अरुण ने उठकर पाया तो निचे ज़मीन पे रैना की गिरी मरी पड़ी लाश उन्हे मिली.....उसका पूरा शरीर जैसे आग में जल उठा था । जावेद अपना गला पकडे सबके साथ रैना को खोने का अफ़सोस जाहिर करने लगा ।

"दीप दीप ठीक हो तुम?".......अरुण ने दीप को उठाया जो घायल पड़ा हुआ था । उस वक़्त सौम्य भी होश में आ चुकी थी पर वो बहुत कमज़ोर पड़ सी गयी थी । उसके गले पे खरोच के थोड़े गहरे निशाँ पड़े हुए थे ।

"आह्हः आआअह्ह्ह ससससस म...मैं ठीक ह..हूँ अरुण ।"..........घायल अवस्था में दीप ने सांस भरते हुए कहा

"ओह नो"........एक एक अरुण ने उसके कंधे में घुसे रोड के घाव की और देखा जो बहुत गहरे था उससे अब भी खून बह रहा था ।

"अगर ज़्यादा ब्लीडिंग हुयी तो इसकी जान भी जा सकती है इसे हॉस्पिटल लेके जाना ज़रूरी है "...........इस बार साहिल ने कहा.....सौम्या भी दीप के पास बैठी हुयी थी।

"हाहाहा न...नहीं हम यहाँ से निकल नहीं पाएंगे हम तो ये भी जानते क..की आ.आगे आ...और कितने मुसीबते हमारी बाहें बिछाई इंतज़ार में है। अरुण मुझे अपनी परवाह नहीं बस तुम सब सलामत से यहाँ से निकल जाओ यही दुआ है प्लीज मुझे उस दलदल के पास ले चलो ताकि मैं उसे बाँध सकू मैंने जितनी विद्या सीखी है वो उन शैतान आत्माओ को रोकने के लिए काफी है प्लीज अरुण"

"लेकिन ऐसी हालत में मैं किसी को भी बहार ले जाने का रिस्क नहीं ले सकता अगर कुछ हो गया तो"

"देख..देखो आ..अरुण हम आलरेडी ससस पहले ही कईओ को खो चुके....रैना भी मारी जा चुकी है मैं नहीं चाहता की फिर कोई अनहोनी हो वो एक रूह नहीं है अरुण मैं उन्हे हर किसी को रोक नहीं सकता प्लीज बात को समझो".........दर्द को अपने दबाते हुए दीप ने कहा

अरुन ने कुछ दिएर तक विचार किया....फिर इस नतीजे पे पंहुचा की दीप के साथ वो अकेले उस दलदल को तलाशने जाएगा.....बाकी साहिल और जावेद सौम्य के साथ इसी कमरे में तबतक छुपे रहेंगे....सौम्या को ये गवारा न हुआ....लेकिन अरुण ने उसे कहा की बस एक यही रास्ता उनके पास बचता है....आखिर में सबने दीप के प्लान पे सहमति दी....

धीरे धीरे दरवाजा खोलते हुए दीप के पीछे पीछे अरुण सौम्य जावेद और साहिल बाहर निकले....चारो तरफ गुप् अँधेरा था....और खामोशी छायी हुयी थी.....धीरे धीरे दीप के पीछे लाइन बनाते हुए एक एक कर वो सब लिविंग हॉल में उतरे....वहा सब कुछ उन्हें बिखरा पड़ा मिला....अरुन ने गौर किया की जो मुर्दो को उसने खिड़कियों से अंदर दाखिल होते देखा था उन खिड़की दरवाजो के जगह टूटे शीशे थे......वो लोग दरवाजे के पास आये...अरुण ने दरवाजे की कुण्डी को खोलना चाहा लेकिन वो बाहर से लॉक्ड था...उसे याद आया की भागते वक़्त राम ने दरवाजा लॉक्ड करते हुए भागा था ।

"डेम इट".........एका एक अरुण ने अपनी नाराज़गी को झाड़ते हुए दरवाजे पे एक कस्कर मुक्का मारा

"हम तो भूल ही गए थे की राम ने दरवाजा लगा दिया था भागते वक़्त".........साहिल ने जल्दी से कहा

"भागकर आखिर कहाँ तक जाएगा? अबतक तो उन रूहो ने उसे भी नहीं बक्शा होगा"......जावेद ने कहा

"मर चूका मुझे अहसास है की वो अबतक ज़िंदा नहीं होगा डेड लेक से बाहर आजतक कोई नहीं जा पाया है? और उसकी मौत तो तय ही थी".............दीप की बात सुन हर कोई खामोश चुपचाप खड़ा था ।

तभी अरुण की बगल वाली उस बड़ी खिड़की पे निगाह हुयी जो किचन के सिंक के ऊपर था..."रास्ता मिल गया है चलो आओ"..........कहते हुए अरुण ने जैसे ही उस खिड़की को खोला बाहर की सर्द हवा उसे अपने चेहरे से टकराती महसूस हुयी । बाहर तेज हवाएं चल रही थी......ऐसा लग ही नहीं रहा था की वहा कोई मौजूद हो।

अरुण पीछे की ओर पलटा....."ठीक है जावेद और साहिल तुम दोनों अपना और सौम्य का ख्याल रखना...चाहे कुछ भी हो ऊपर के कमरे से बाहर मत निकलना वो लाल धागा तुम्हारी हिफाज़त के लिए है सारे दरवाजे खिड़किया गलती से भी खोलना मत अगर हम वापिस न लौटे तो गलती से भी हुम्हे तलाश करने कोई बाहर नहीं आएगा अंडरस्टैंड गाइस".............एका एक सबने सहमति में अपना सर हिलाया

अरुण ने देखा की सौम्य के आँखों में आंसू घुल रहे थे । अरुण जज्बात में पिघलना नहीं चाहता था...लेकिन फिर भी सौम्य के पास गया और उसके गले लग गया...सौम्या ने उसे अलग होते हुए उसे गुडलक कहा...कुछ ही देर में अरुण घायल दीप को संभाले जैसे तैसे उस खुली खिड़की से बाहर निकल गया.....दोनों को जैसे हर कोई आखरी बार जाते देखता महसूस कर रहा था.....सौम्य को साहिल और जावेद ने ऊपर चल देने का इशारा किया.....अरुण और दीप के कॉटेज से १० कदम महज़ आते ही उन्होने पाया....की साहिल और जावेद ने खिड़किया लगा दी थी....अंदर तीनो जल्दी से वापिस कमरे में पहुंच चुके थे । उन्होने कस्सके दरवाजा लगाया और एक बार उस कुण्डी में बंधे लाल धागा को देखा ।

जावेद ने पलटकर खिड़की से जब बाहर झाका तो रैना की गिरी पड़ी लाश वैसे ही वहा मौजूद थी....उसने अपने दुःख को प्रकट करते हुए झट से खिड़की लगा दी थी । वो तीनो बस मोमबत्ती की अधबुझी लौ में अरुण और दीप के आने की जैसे इंतजार में ख़ामोशी से बैठे हुए थे । उन सबसे ज़्यादा सौम्य को चिंता सत्ता रही थी ।

हो हो करती हवाओ के शोर में दीप अरुण का हाथ थामे संभल संभलके आगे बढ़ रहा था....उस पल रात की उस खामोशी में चारो ओर बस नीमअँधेरा और व्यवाण जंगल था.....अरुण ने देखा की ठीक सामने ज़मीन सब उसे ठोस सी महसूस हो रही थी......"यहाँ मुझे नहीं लगता की दलदल!".........."वहा मौजूद है"........एका एक जैसे दीप बोल उठा....अरुन ने उसकी तरफ अपलक दृष्टि से देखा और जब उसने उसकी निगाहो का पीछा करते हुए सामने की ओर देखा तो सच में उसे खदकती वो दलदल दिखाई दी जो कॉटेज से सैकड़ो दुरी पे था....लेकिन वो शोर इतना नज़दीक उसे सुनाई दे रहा था की उसे महसूस हो रहा था की वो दलदल जो सुबह में सुखी ज़मीन होती थी वो रात के इस पैमाने में कोई और असलियत से रूबरू कराती थी...

एका एक दीप जैसे आगे बढ़ रहा था....अचानक उसे कई कदमो का अपने पीछे पीछे होने का अहसास होने लगा....अरुण ने उसे ठिठकते देख जैसे ही पीछे पलटना चाहा....दीप ने उसे मना कर दिया...."मुड़कर भी मत देखना चलते रहो"..........दीप बोलते हुए कस्सके अरुण के बांह को पकडे उसके साथ साथ चल रहा था.....अरुण को अहसास हुआ की उसके कानो में जैसे कई दोहरी आवाज़े आ रही हो । अचानक वो दोनों ठिठक गए....क्यूंकि वो जिस ओर से गुज़र रहे थे वहा उन्होने सुनील की लाश को दफनाया था....जैसे जैसे वो उस ओर से आगे बढ़ रहे थे इतने में उसे अहसास हुआ की क़ब्र से एक हाथ बाहर निकल आ रहा था...देखते ही देखते अरुण का गला सूखने लगा....

"य..ये नहीं हो सकता ये...ये तो सुनील है"

"सुनील की लाश जो अब एक ज़िंदा मुर्दा बन चुकी है....जब रूह वापिस जिस्म में प्रवेश करती है तो वो रूह एक ज़िंदा मुर्दा बन जाती है बेमौत मरा सुनील भी अब उनमें शामिल हो चूका भागो अरुण भागो मैं कहता हूँ भागो"..........दीप की बात सुन अरुण उसे अपने साथ भाग उठता है

 
कॉटेज से कई फासले दूर वो दोनों पहुंच जाते है..एका एक हाँफते हुए दोनों पेड की आड़ में छिप जाते है....अरुण उसी पल सिहम उठता है क्यूंकि उसे अहसास होता है की उसके चारो तरफ वो रूहें मौजूद होती है.....दीप ने उसी पल झुकते हुए अपने चारो ओर पर जेब से निकाली एक चाक से एक घेरा बना लिया था। पलभर में अरुण ने गन निकालते हुए जब उनपे चलाया तो जैसे गोली उन्हें लगी ही नहीं। वो वैसे ही खड़े अपने खौफनाक निगाहो से उन दोनों की तरड़ बढ़ रहे थे ।

"गलती से भी इस घेरे से न निकलना वरना बेमौत मारे जाओगे अरुण ये घेरा ही हुम्हे कुछ दिएर तक इन नापाक रूहों से हिफाज़त करेगा"

अचानक अरुण को अहसास हुआ की जैसे जैसे वो एक एक कदम आगे बढ़ा रहे थे तो उनके गले से एक दर्दनाक चीख निकल उठती और वो लोग पीछे हो जाते....धीरे धीरे अरुण को अहसास हुआ की वो लोग जैसे जैसे पीछे हो रहे थे उनकी तादाद उतनी ही कई ज़्यादा बढ़ रही थी ।

"अब हम क्या करे?"............अरुण ने सेहमते हुए गन ताने उन रूहो की ओर दीप से पूछा

"जबतक घेरे में है सुरक्षित है एक तरीक़ा है हुम्हे किसी भी हाल में दलदल तक पहुंचना होगा जो यहाँ से बस कुछ फासले और है ठहरो"...........दीप ने अरुण से जलाने वाली कोई चीज़ मांगी

उस वक़्त अरुण के जेब में एक लाइटर था....जो उसने दीप को दिया.....अरुण को अहसास हुआ की वो जिस घेरे में खड़े थे उसके पीछे एक पेड़ था....अरुण ने दीप की मदद करते हुए एक मोटी लकड़ी सी उस छोटी डाल को तोड़ डाला....दीप ने तुरंत अपनी जैकेट उतारी और फिर उसे उस लकड़ी में एक काले धागे के साथ बांध दिया.....जल्द ही लाइटर की आग पकड़ते हुए दीप के हाथो में धाव धाव करती एक मशाल जल चुकी थी ।

"इसे थामो अरुण इस आग से इन रूहो पे वार करो ये खुद पे खुद पीछे हटते चले जायेंगे जल्दी"............अरुण ने सुनते हुए उस मशाल को अपने हाथो में ले थामा...फिर उसने पलटते हुए उस मशाल से उन रूहो पे जैसे हमला करना चाहा...सब एक ओर होने लगे....वो जैसे ही करीब आते ही मशाल की धाव उठती आग से और भी पीछे को होने लगजाते...धीरे धीरे अरुण दीप के साथ उस घेरे से निकल चूका था.....उन दोनों के दोनों तरफ जैसे रूहें खड़े थे....अरुण की जलती मशाल की रौशनी और उसके हमलो से वो रूहे चीखते हुए पीछे को हटती जा रही थी ।

धीरे धीरे करते हुए अरुण और दीप उनके बीचो से निकलते हुए दलदल तक पहुंच चुके थे । अरुण ने साफ़ तौर पे देखा.....दलदल से निकलते वो हाथ जो खून से लथपथ थे....अरुण ने मशाल लिए दूसरे हाथ में गन पीछे की ओर ताने हुए उन रूहों को देखा जो उन्हें घेरे उनके बेहद करीब आने की कोशिश कर रहे थे । धीरे धीरे अरुण ने साफ़ तौर पे पाया की वो कितने भयंकर थे? किसी का हाथ था तो किसी का कोई अंग नहीं किसी ज़ख़्मी हालत में जैसे करहाते हुए एक अजीब सी ठहाका लगती उनकी हसी अरुण को सेहमा रही थी ।

"जल्दी करो दीप मुझे नहीं लगता की हम बच पाएंगे"

दीप उस वक़्त घायल हालत में भी झुककर उस दलदल का जायज़ा लिए खड़ा अपनी जेब से निकालती उन कीलो को घूरते हुए जैसे मुस्कुराया...उसने एक एक कर जैसे ही उन किनारो पर दलदल के उन किलो को गाड़ना शुरू किया....एका एक रूहों की गलो से अरुण को दर्दनाक चीखे सुनाई देने लगी । वो मशाल लिए बार बार उनके आचमके हमलो से बचते हुए उनपर आग का वार कर रहा था....आग की धाव लगते ही जैसे वो लोग सिहर उठते और पीछे को हट जाते...

"जल्दी दीप"...........दीप वैसे ही आगे आगे बढ़ते जा रहा था झुककर....और अरुण उसे घेरे हुए खड़ा उन रूहो की तरफ देख रहा था । धीरे धीरे दीप ने दलदल के चारो तरफ उन किलो को ठोक दिया....ऐसा करते ही धीरे धीरे अरुण ने साफ़ तौर पे देखा की वो रूहे अपने आप एक एक करके उन दलदलों में जा समां रही थी ।

"ये तिलस्म कीले इनकी बंदिशे बन जायेगी अरुण फर्नांडेस ने जो लाशो को खुदाई के वक़्त पाया था उन्हें यही इसी जगह पे इकट्ठे गाड़ दिया था...यही वजह थी ये सब रूहे हुम्हे रोकने की कोशिशें कर रही थी तुम एक काम करना अरुण तुम यहाँ दिन में लोगो की मदद से खुदाई करना तुम्हे वो तमाम उस ट्रैन हादसे में शिकार मुसाफिरो की तमाम वो लाशें मिल जायेगी जो यहाँ गाड़ी है यही वजह थीइनके बेमौत मरने के बाद भटकने का .......फर्नांडेस ने इन्हें यहाँ खुदवाई के वक़्त इकट्ठे गाड़ दिया था । न जाने ऐसी ही कितनी और लाशें यहाँ मौजूद होंगी वैसे अब ज़्यादा कोई खतरा नहीं चलो वापिस"

कहते हुए अरुण और दीप की निगाह जैसे ऊपर की और हुयी तो उन्हें मालूम चला की वो लोग ठीक उस ट्रैन दुर्घटना वाले हादसे के महज वही मौजूद खड़े थे ऊपर वो लाल ब्रिज थी जो टूटी हुयी जर्जर सी अब भी मौजूद थी...अरुण को अब सब राज़ो से परदे हटते महसूस हो रहे थे.....वो दोनों वापिस कॉटेज की तरफ आने लगे.....बीच बीच में दिप ठहरते हुए बची किलो को वैसे ही ज़मीनो पे ठोक रहा था......वो दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे.....की इतने में उन्हे महसूस हुआ की कोई अक्स उनके सामने मौजूद था....अरुण ने मशाल की रौशनी में देखा की वो सुनील खड़ा था । "अरुण फ़ौरन इसकी लाश को जला डालो फ़ौरन"...........दीप इतनी जोर से चीखा की अचानक ही अरुण को अहसास हुआ की सुनील चलते हुए उन दोनों की तरफ आ रहा था......"आआआआ"...........उसकी दोहरी आवाज़ भरी चीख को सुन अरु न मशाल से सीधे उसके जिस्म पे एक वार किया....सुनील दहाड़ उठा और देखते ही देखते उसका बदन आग की लपटों में जलने लगा.....एक मरी हुयी अजीब सी मॉस जलती महक अरुण और दीप को लगी.....इसी के साथ सुनील की जलती लाश वही ढेर हुयी पड़ी थी ।

"चलो हम्हें फ़ौरन कॉटेज जल्द से जल्द पहुंचना होगा दीप".............दीप बदहवास गिर पड़ा था...अरुण को अहसास हुआ की दीप के बाजु से लेके जो कंधे पे पट्टी थी अब वह से तब भी खून बह रहा था ।

"कुछ नहीं होगा तुम्हें दीप"

"हाहाहा अरुण लगता है म..मैं और ज़्यादा देर तक बच नहीं पाउँगा म..मेरी सांसें थम जाएगी अरुण".....दीप ने बदहवासी में जैसे कहा ।

"नहीं दीप तुम्हें कुछ नहीं होगा दीप दीप"...........धीरे धीरे दीप की आँखे बंद होने लगी थी ।

"ओह नहीं इसकी हालत तो बिलकुल ख़राब होती जा रही है.....अगर इसकी ब्लीडिंग ऐसे ही होती रही तो नहीं दीप मैं तुम्हे कुछ होने नहीं दूंगा हम यहाँ से ज़रूर निकल पाएंगे"..........अरुण ने दीप को अपने कंधे में उठाये कॉटेज की तरफ ले जाने लगा।

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अचानक सौम्य की नींद टूटी तो उसे गाडी की आवाज़ सुनाई दी....उसने खिड़की से झाँका तो पाया की ये राम की गाडी थी । गाडी वैसे ही आके खड़ी थी। इतने दिएर से अबतक सौम्या अरुण और दीप के इंतजार में कब नींद की आगोश में चली गयी थी उसे अहसास भी न हो सका....उसने तुरंत जावेद को जगा हुआ पाया साथ में साहिल भी उठ चूका था।

"ये तो डायरेक्टर राम की गाडी है लेकिन ये यहाँ वापिस?"...........साहिल और जावेद ने सौम्य की तरफ देखते हुए फिर खिड़की से सामने की और झाँका

"हो न हो डर के मारें ये वापिस आ गया होगा"...............जावेद ने कहा

"नहीं जावेद उसके पास गन है तुम मत जाओ क्या पता की वो राम हो ही न? कोई और हो?"................साहिल ने जाते जावेद को रोकते हुए कहा

"वो राम ही है मैं देखता हूँ उसे तुम लोग बाहर मत जाना"

"पर जावेद नहीं जावेद सुनो तुम".............लेकिन जावेद तबतलक दरवाजा खोले निकल चूका था ।

हवाएं तेजी से चल रही थी। जावेद जब गुप् अंधेरो में टोर्च जलाये निचे सीढ़ियों से पंहुचा....तो उसे अहसास हुआ की दरवाजे पे कोई दस्तक दे रहा था । ठक ठक ठक ठक........दरवाजे पे भारी दस्तक वो दे रहा था । "कौन है?"..........राम ने आगे बढ़ते हुए उस vase को थामे दरवाजे की करीब बढ़ रहा था । ठक ठक ठक.....दरवाजे पे फिर दस्तक शुरू होने लगी थी....सिहरते हुए जावेद ने दरवाजे की और अपलक दृष्टि से देखा......"मैंने पूछा कौन है?"............इस बार थोड़ा जोर से जावेद ने कहा...और जैसे ही उसने कहा ठीक उसी पल दरवाजा अपने आप चर्चारती आवाज़ के साथ खुलता चल गया....

जावेद ठिठक गया....और ठीक उसी पल उसने देखा की ये सच में राम नहीं उसी के रूप में जैसे कोई भयंकर साया खड़ा था...."नही नहीं"..........जावेद उलटे पाव सीढ़ियों की तरफ दौड़ा....वो जैसे ही सीढ़ी पे चढ़ा था उस हाथ ने उसे कस्सके थम लिया..."नहीं छोड़ दो mujhe".........गोंगियाती दोहरी आवाज़ में राम ने उसके गर्दन को अपने दोनों हाथो से पकड़ लिया था...."आह्ह आअह्ह्ह आह आआआहहह आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"...............वो दर्दनाक चीख गूंज उठी सौम्य और साहिल ने भी उस चीख को सुनते ही अपने दिल में दहशत महसूस की....

"वो जो कोई भी चीज़ है उसने जावेद को भी मार दिया"...........एक पल को साहिल की बात सुन सौम्या सिहम उठी उसे अहसास हुआ की वो चीख में जो दर्द था वो शायद ऐसा था जब किसी इंसान के प्राण निकाल दिए जा रहे हो । जावेद की उस दर्दनाक चीख के बाद खामोशी छायी हुयी थी फिर......."ssshh सौम्या कोई भारी कदमो से ऊपर सीढ़ियों से आ रहा है"............सौम्य ने भी साहिल की बात सुनके जैसे कान लगाए जैसे सुना तो सच में कोई भरी कदम उसे अपने कमरों के करीब आती सुनाई दे रही थी । सौम्य ने कुछ ही दिएर में उन आवाज़ों को अपने कमरे के पास आते थमते महसूस किया....और उसी पल साहिल और सौम्य एक साथ सिहम उठे क्यूंकि कोई दरवाजे पे दस्तक नहीं उसे पीट रहा था जैसे वो दरवाजा तोड़ रहा हो और अंदर आने की कोशिशे कर रहा हो ।

सौम्य और साहिल एक पल को सहमे खड़े हुए दरवाजे की और देखने लगे.....साहिल जैसे जैसे दरवाजे के करीब जा रहा था उसकी दिल की धड़कने और भी तेज हो रही थी वो दिवार के आड़े होके जैसे ही सर टिकाये उस आवाज़ों के थमने के इंतजार में था ठीक उसी पल दिवार को तोड़ती वो हाथ उसके गर्दन पे गिरफ्त हो चुकी थी अचमका साहिल चिल्ला उठा लेकिन उस हाथ ने बड़े ही कस्सके उसकी गर्दन को जकड लिया था.......सौम्य चीखे जा रही थी वो अपने मुंह पे हाथ रखके खौफ्फ़ से वो दृश्य देख रही थी। और ठीक उसी पल उसने दम तोड़ती साहिल की लाश उसके सामने जा गिरी उसकी गर्दन बुरी तरीके से पीछे की और मुड़ी हुयी थी उसकी आँखे वैसी ही खुली थी ।

तब सौम्य को अहसास हुआ की धीरे धीरे राम की वो खून से लथपथ ठहाका लगाती लाश ठीक उसके सामने दिवार फाड़े खड़ी थी। सौम्य को अहसास हुआ की वो धागा उन आत्माओ को अब और नहीं रोक सकता था । सौम्य को अहसास हुआ की अब उसकी भी हालत कुछ ही पलो में बाकियो की तरह होगी जो बेमौत इस कॉटेज में मारे गए थे ।

tbc............
 
"आ..आगे म..मत बढ़...बढ़ना म..मैं कहती हूँ आगे मत बढ़ना | somebudy हेल्प".........सौम्य चीख उठी क्यूंकि धीरे धीरे राम की वो ज़िंदा लाश खून से लथपथ बुरी हालत में उसकी तरफ बढ़ रही थी....सौम्य उसके चहेरे को देख नहीं पायी और उसने अपनी नज़रो को फेर लिया...

ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ की वो ज़िंदा लाश उसके बेहद करीब खड़ी थी....धीरे धीरे वो अपने ज़ख्म भरे हाथो को सौम्य के तरफ बढ़ा रहा था | सौम्य आँखे कस्सके दबाये हुए थर थर काँप उठ रही थी| और ठीक उसी पल वो जोर से चीखी और उसने राम की लाश को जैसे धक्का दिया...वो आगे बढ़ी तो राम ने उसके कलाई को मजबूती से थाम लिया....सौम्या चीखते हुए अपनी कलाई को उसके मज़बूत हाथो के गिरफ्त से छुड़ाने की नाकाम कोशिश कर रही थी | उस वक़्त उसने महसूस किया की वो किन खौफनाक निगाहो से उसे घूर रहा था |

"याआआ"......वो दहाड़ते हुए सौम्य को अपनी तरफ खींचते हुए उसपे जैसे झपटने वाला ही था | की सौम्य ने कस्सके अपनी कलाई छुड़वाते हुए वह से भाग उठी| वो कमरे से निकलते हुए सीढ़ियों से निचे उतर ही रही थी की इतने में उस साये से जा टकराई अरुण को जब उसने पहचाना तो सीहमते हुए उसके गले लग गयी....

"अरुण मुझे बचा लो अरुण वो मुझे मुझे मार डालेगा उसने साहिल को भी मार दिया जावेद को भी मार दिया"

"ssshh शांत हो जाओ जस्ट कॉम डाउन ओके जावेद की लाश अब भी सीढ़ियों पे मौजूद है |"

अचानक उसी पल अरुन ने देखा की राम ठीक सीढ़ियों के ऊपर खड़ा उन दोनों को देख रहा था | अरुन ने पाया की वो राम नहीं था उसकी ज़िंदा लाश में जैसे कोई शैतानी रूह थी | उसकी मौत का बयानात उसका जिस्म अपने ज़ख्मो और बेदर्दी सी हुयी मौत की जैसे गवाही दे रहा था |

"म..मैं तुम सब को मार डालूंगा....मार डालूंगा' मैं तुम्हे"...............दोहरी आवाज़ में जैसे ठहाका लगते हुए वो गुस्से भरी निगाहो से राम ने वो शब्द दोहराये उसके गले से निकलती वो आवाज़ इतनी भारी और इतनी भयंकर थी की जैसे पूरा कॉटेज काँप उठा |

"नं..नहीं अ...अरुण नहीं अरुण प्लीज रुक जाओ उसके पास मत जाओ अरुण प्लीज".......उसी पल अरुण ने सौम्य को अपने पीछे किया....सीढ़ियों से एक एक कदम रखते हुए वो वो ज़िंदा लाश अरुण की तरफ बढ़ रही थी |

सौम्य ने देखा की अरुण ने झुककर सीढ़ियों पे रखके हुए उस जलती धाव धाव करती मशाल को उठा लिया था | अरुण ने खामोशी से देखा की राम के हिंसक चेहरे पे दहशत के बदलाव आ रहे थे | पलभर का मौका भी न मिला अरुण को की राम उसपर जैसे झपट पड़ा....वो किसी भाग की तरह उसपे झपटा था....वो तो गनीमत थी की अरुण किनारे की और जा कूदा था वरना अबतक वो राम के गिरफ्त में होता....अरुण ने फुरती से अपनी जलती मशाल के ऊपरी सीढ़ी को उसके जिस्म के आर पार एक ही झटके में कर डाला था|

और उसी पल ऐसी दर्दनाक चीख राम के गले से निकली की सौम्य भी सिहम उठी | "आआह्ह्ह आआह्ह्ह्हह्ह आह्ह्ह्ह"............अरुण ने देखा की उसके गले से वो दोहरी आवाज़ कितने सारे निकल रहे थे....ऐसा लग रहा था जैसे कई रूह का कब्ज़ा राम की लाश पर हो...और धीरे ही धीरे उसके मुंह से निकलती उस काले धुएं में चेहरे के अक्सों को देख अरुण को अहसास हुआ की वो रूहें अब मुक्त हो रही थी | जलती मशाल की आग राम की लाश को लपटों में ले चुकी थी |

उसी पल सौम्य और अरुण सीढ़ियों से निचे उतर गए.....राम की बेजान लाश आग में दहकते हुए सीढ़ियों पे जैसे टूटकर बिखर गयी | "उफ़".........खामोशी से कुछ सेकण्ड्स के लिए अरुण ने चैन की जैसे सांसें ली....सौम्या भी जैसे राहत महसूस कर रही थी | उस वक़्त वो दोनों जैसे लिविंग हॉल में अकेले मौजूद थे | जलती वो मशाल अब भी अरुण के हाथो में थी |

"यही मशाल हमारी हिफाज़त में है ये जबतक जल रही है हम मेहफ़ूज़ है वरना न जाने कौन सी नयी आफत हमारे गले पड़ जाए"

"तुम लोग बचे कैसे?"..........सौम्या के सवाल पूछते ही अरुण ने उसे सबकुछ तफ्सील से ब्यान किया....उसने बताया की उन्होने उस दलदल को बाँध दिया जहाँ से वो रूहें अपना आतंक फैलाती थी|

"लेकिन हमारा खतरा अभीतक टला नहीं है है न?"

"नहीं सौम्या टला तो अभी हमारा खतरा अब भी नहीं है क्यूंकि कुछ लाशें खुदवाई के वक़्त फर्नांडेस ने यहाँ इस कॉटेज की सरज़मीं में गाडी थी"

सुनते ही जैसे सौम्या को दहशत महसूस हुयी....."तो फिर हम यहाँ से अब निकल क्यों नहीं जाते?"....

"हम भाग नहीं सकते सौम्या तुमने देखा नहीं राम का क्या हश्र हुआ वो वो कोई आखरी ही शैतानी ताक़त है जिसे हुम्हे रोकना है उसके थमते ही इस कॉटेज से इस इलाके से दहशत का प्रकोप हमेशा हमेशा के लिए दफा हो जायेगा जावेद और साहिल की लाश कहाँ मौजूद है?"

"वो..वही ऊपर"

"उन्हे जलाना बेहद ज़रूरी है मैं उन्हे जलाने जा रहा हूँ तुम तबतलक दिप के पास ठहरो"......उसी श्रण अरुण को अहसास हुआ की दीप घायल था | जिसे वो लिविंग हॉल में ही लेटाके आया था जब उसने सौम्या की चीख सुनी थी | सौम्या ने देखा की दीप वैसे ही बेसूद सोफे पे लेटा हुआ था | सौम्या जब उसके पास आयी तो उसे जगाने लगी लेकिन वो उठ नहीं रहा था |

"अरुण".......सौम्या ने सीढिया चढ़ते अरुण को आवाज़ दी....जो पलटते हुए सौम्या के पास आया |

सौम्या ने उसे दीप की बिगड़ती हालत बताई...अरुण ने भी जाँचा वो होश में अब नहीं आ रहा था...उसके कंधे से खून अब भी बह रहा था | "ओह नहीं दीप दीप होश में आओ दीप"..........लेकिन दीप को झिंझोड़ने के बावजूद वो होश में नहीं आ रहा था |

अरुन ने पास रखी बोतल से पानी निकालते हुए कुछ बूंदों की छींटे उसके चेहरे पे मारी | "दीप होश में आओ दोस्त तुम्हे जागना होगा तुम्ही हमारा सहारा हो दीप प्लीज फॉर गॉड सेक"..........तभी दो-तीन बार झिंझोड़ने के बाद दीप ने होश में आते हुए एक गहरी सास ली |

उसने कस्सके अरुण की कालर को कांपते हाथो से थाम लिया "अरुण प्लीज अरुण मेरी बात ध...ध्यान से सु..सुनो अरुण मैं ये कहना चाहता हूँ की अब तुम ही इस मनहूसियत का अंत कर सकते हो...लगता है अब मेरा शरीर म..मेरा और साथ नहीं दे रहा तुम ये लो....ये व..वो कील है जिससे तुम उस प्रेत को ख़तम कर सकते हो"............अरुण के हाथ में दीप ने अपनी जेब से एक मोटी कील निकाली जिसपर कई अल्फाज़ो में अरबी में शब्द लिखे हुए थे |

"वो एक हवा है अरुण और रूहो को तुम छू भी नहीं पाओगे.....अबतक वो किसी न किसी पे सवार होती आयी है | और मैं जानता हूँ अरुण की ये ज़मीन ही में वो लाशें अब भी गड़ी हुयी है तुम्हे ना सिर्फ उन नापाक लाशो को खुदवाई के बाद जलाना होगा बल्कि इस पुरे कॉटेज को भी जला देना होगा....अगर तुमने ऐसा नहीं किया....तो ये मौत का सिलसिला यु ही चलता रहेगा अरुण यु ही चलता रहेगा | अ.अरुण मेरी लाश का तुम ही अंतिम संस्कार करोगे अरुण तुम्हे अब अपनी और सौम्या की खुद हिफाज़त करनी है आह्हः हो सके तो मुझे माँफ कर देना आआह ससस अरुण अरुण"..............दीप अपनी आँखे बंद कर चूका था |

"दीप दीप तुम्हे कुछ नहीं होगा दीप"..........दीप ने अरुण का कोई जवाब नहीं दिया |

"अरुण प्लीज अरुण होश से काम लो खुद को सम्भालो तुम वो हुम्हे छोड़ के जा चूका"...........अरुण ने अपनी नम आँखों से सौम्या की बात सुनते हुए उसकी और देखा.....सौम्या भी सुबकते हुए उसके कंधे को सेहला रही थी |

अरुण उठ खड़ा हुआ....उसने अपने गले से ॐ का वो लॉकेट उतारा...और सौम्या के गले में डाल दिया...."अब कोई भी रूह तुम्हारे शरीर में नहीं समाएगी चलो आओ"..........अरुण सौम्या का हाथ पकडे धीरे धीरे सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए ऊपर के मंज़िल पे पंहुचा...उस वक़्त एक ठंडी हवा अँधेरे उस हॉल में गूंज रही थी | अरुण और सौम्या सहमे हुए धीरे धीरे उस कमरे की तरफ आये......अरुण की दृष्टि में खौफ्फ़ समां उठा क्यूंकि वह साहिल की लाश मौजूद नहीं थी |

दोनों अभी कुछ समझ पाते..इतने में दरवाजा अपने आप खुलने लगा...चर चराती उस तीखी आवाज़ में वो गुप्त कमरा अपने आप खुल रहा था | अरुण ने मशाल को हवा में ही फिराते हुए उस कमरे में की तरफ अपना कदम बढ़ाया....और ठीक उसी पल उसे फर्नांडेस की लाश दिखी....उसे कमरे में सर्द सी महसूस हुयी एक अजीब सी दोहरी आवाज़ घुटती सी महसूस हुयी | और ठीक उसी पल सौम्या चिल्ला उठी |

"आआआह्ह्ह्ह"........सौम्या पे दिवार पे चढ़ा वो साया उसपर जैसे झपट पड़ा था.....लेकिन तभी उसके बदन को छूते ही वो ३ कदम दूर जा गिरा....घुर्राता हिंसक साहिल उनके सामने खड़ा था | "साहिल मैं कहता हूँ दूर रहो सौम्या से साहिल साहिल".........अरुण की बात को अनसुना किये वो दोनों पे जैसे झपटने को हुआ....की तभी अरुण ने उसके गर्दन पे मशाल दे मारी..."आआआआह".........दोहरी आवाज़ में छटपटाता साहिल किसी तेज जानवर की तरह उस कमरे में दाखिल हो रहा था | वो अरुण से भाग रहा था | "मैं कहता हूँ रुक जाओ"

अरुण उसके पीछे पीछे जैसे ही उस कमरे में दाखिल हुआ उसने पाया की वो अँधेरे कोने में छुपा हुआ था | उसने फिर अरुण पे हमला करना चाहा...अरुण उसके झपटने से सीधे आईने से जा टकराया....और घायल होते हुए फर्श पे जा गिरा...उसके पास वो आखरी अवसर था...और ठीक उसी अवसर का फायदा उठाते हुए...उसने वो मशाल साहिल के चहेरे पे दे मारा..साहिल का चेहरा गलने लगा..वो दहाड़ते चीखते हुए वही बिस्तर पे जा गिरा....अरुण ने देखते ही देखते उस बिस्तर को अपनी जलती मशाल से आग के हवाले कर दिया |

धीरे धीरे साहिल चीख उठा....उसकी दोहरी आवाज़ में वो दर्दनाक चीख गूंज उठी | और ठीक उसी पल बिस्तर की आग के लपटों में उसकी ज़िंदा लाश भी जल उठी....जिसमें अरुण ने साफ़ देखा निकलती उसकी लाश से ूँ रूहों को | वो दर्दनाक चीख अब थम चुकी थी |

अरुण ने पाया की सौम्या दरवाजे पे ही मौजूद थी | वो दोनों सहमे हुए पीछे आग में जल रहे उस बिस्तर को देख वहां से निकल गए | जब वो सीढ़ियों के करीब आये तो एकदम से अरुण ने साफ़ देखा वो सर कटी उस औरत की लाश को........सौम्या चीख उठी अरुन ने उसे अपने पीछे कर लिया | "हाहाहा हाहाहाहा हहहह हाहाहा"............ठहाका लगाती वो अजीब सी भयंकर हसी जैसे पुरे कॉटेज को हिला डाल रही थी | अरुण को अहसास हुआ की ये वो प्रेत था जिसका ज़िकर दीप ने उससे किया था | ये वही शैतानी रूह थी जो उस दर्दनाक हादसे की शिकार हुयी थी | अरुण ने साफ़ देखा वही मैली सी वाइट गाउन और सारे शरीरो पे ताजे ज़ख्मो से निकलता खून लेकिन धढ़ के सिवाह उस अँधेरे में उसने साफ़ पाया की उसकी गर्दन नहीं थी |

वो ठहाका लगाती ही जा रही थी | अरुण ने अपनी मशाल ठीक उसके ऊपर फैक डाली....वो हवा के भाति जैसे गायब हो उठी | "अरुण बचो"........सौम्या चीखी क्यूंकि उसी पल उसे वो रूह अपनी और बढ़ती महसूस हुयी जिसने उसे इस क़दर पीछे की और फैका था की अरुण सीधे दीवारों से लगते हुए फर्श पे जा गिरा....उसका सर चक्र उठा था उसे अहसास हुआ उसके माथे और होंठ से खून निकल रहा था |

सौम्या आतंकित भाव से उस प्रेतनी को देख रही थी | वो एक कदम और आगे बढ़ाती उसी श्रण सौम्या ने अपनी ॐ की लॉकेट उसकी और की........."आआअह्ह्ह"........वो दहशत में जैसे वो सर कटी लाश पीछे को होने लगी...धीरे धीरे सौम्या उसे वो लॉकेट दिखाते हुए उसके करीब हो रही थी....वो काँप भी रही थी | धीरे धीरे सौम्या उसके पीछे जाने लगी.....अरुण ने अपनी पूरी ताक़त लगते हुए खुद को अपने पाव पे खड़ा कर लिया था |

हवाएं तेज चल रही थी....ऐसा लग रहा था जैसे आज की रात किसी क़यामत की रात जैसी हो | जंगली जानवर चाँद की और देखते हुए जैसे रो रहे थे | लिविंग हॉल में पहुंचते ही खिड़किया दरवाजे अपने आप बंद हो रहे थे खुल रहे थे | बीच बीच में बिजली की चमकती रौशनी में सौम्या ने देखा की वो जैसे जैसे लॉकेट उसके करीब ले जा रही थी वो साया और पीछे होता जा रहा था....लेकिन सौम्या को मालुम नहीं था की ठीक उसके पीछे जावेद की लाश लहूलुहान खड़ी उस तेज धार धार चाक़ू उसके ओर ला रही थी सौम्या की पीठ उसकी तरफ थी | इसलिए सौम्या को अहसास नहीं था | सौम्या को लगा की जरा सा भी अगर उसका ध्यान उस सर कटी लाश से हटा तो शायद वो बच न सके |

ठीक उसी पल जावेद की घुर्राती उस आवाज़ को सुन सौम्या पीछे को जैसे हुयी ठीक उसी पल अरुण ने छलांग लगते हुए जलती उस मशाल को सीधे जावेद के शरीर के आर पार कर दिया....जावेद का शरीर दहाड़ उठा...वो आतंकित चीखो से आग में जलता हुआ खिड़की को जैसे तोड़ते हुए बाहर जा गिरा.....उसी के साथ अरुण ने देखा की उसके पुरे जिस्म का गलती हुए वजूद मिट रहा था |

हो हो करती हवा तेज हो गयी और ठीक उसी पल सौम्या को जैसे एक तेज धक्का लगा सौम्या हवा में उड़ते हुए सीधे उस शीशे के मेज से जा टकराई....अरुण चीख उठा....क्यूंकि उसी पल सौम्या की वो आखरी चीख उसके कानो में गूंज उठी थी | शीशे उसके पीठ में जा घुसे थे | अरुण का ध्यान से मशाल से हटते हुए सौम्या की तरफ हुआ...वो भाउकलाये सौम्या को उठाने लगा | वो कांपते हुए जैसे मुस्कुरा रही थी |

"सौम्या तुम्हे कुछ नहीं होगा सौम्या सौम्या".........सौम्या के खून से स्ने हाथ उसके हाथो पे जैसे गिर पड़े.....अरुण अपने जज्बातो पे काबू न पाते हुए उसकी लाश से लिपटकर रोने लगा |

और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ की उसकी गर्दन को किसी ने कास्कर जकड लिया....."आआआआअह्ह आह्हः छोड़ दो मुझे आअह्ह्ह्ह"..........उसे उसके नाख़ून अपने मांसो में दाखिल होते हुए ेमहसुस हो रहे थे | और ठीक उसी पल उस चीज ने उसे दूसरी ओर दे फैका....सोफे पे गिरते हुए अरुण बदहवास हो गया |

उसने देखा की वो सर कटी रूह उसकी तरफ बढ़ रही थी | और और उसके दोनों हाथ जैसे उसने अरुण के गले की तरफ बढ़ाने को किये | उसी पल अरुण उठ खड़ा हुआ था उसे अहसास हुआ की अब बचने का उसके पास मौका सिर्फ एक ही था जो अगर नाकाम होता तो उसकी मौत के साथ ही उस कॉटेज का राज वैसा ही अधूरा रह जाता |

अरुण ने उस कील को निकाला उसे अहसास हुआ की वो कटा हुआ सर ठीक उसे पीछे घेरे हुए ठहाका लगाए हस्स रहा था | और दूसरी तरफ वो सर कटा लाश अपने दोनों हाथो को उसके ओर लाते हुए बढ़ रहा था | अरुण को दीप की बात जैसे फिर याद आयी....और उसने ठीक उसी पल उस नुकीली सुनहरी रंग की वो पीतल की मोटी कील सीधा कॉटेज के ज़मीन पे दे मारी धढ़ धढ़ अरुण ने मज़बूती से अपने उसे अपने मुट्ठी से इस क़दर जमीन में जा धसा दिया की लकड़ी की उस ज़मीन में वो मोटी कील धस गयी | और ठीक उसी पल सर कटी वो लाश उससे दूर होने लगी.........पीछे ठहाका लगाती वो हस्सी अपने आप दर्दनाक चीख में तब्दील हो गई...."आआआआहहह आअह्ह्ह्ह आआआआह आअह्हह्ह्ह्ह"..........धीरे ही धीरे अरुण ने देखा की वो रूह उसके आँखों से ओझल होती जा रही थी | पूरा कॉटेज कांपने लगा....सारी चीज़ें अपने आप बिखरकर गिरने लगी फर्नांडेस और मैरी की तस्वीर अपने आप गिरके चकनाचूर हो गयी | अरुण को समझ आया की उसने जहाँ कील को धसाया था उस फर्श के निचे ही वो लाशो का ढेर गड़ा हुआ था |

वो छूट पड़ा दरवाजे की तरफ उसने दीप को अपने कंधो में उठा लिया और उसे अपने संग बहार ले आया.....उसने उसकी लाश को गाडी के भीतर रखा और उलटे पाव जैसे ही कॉटेज की तरफ रुख किया उसे अहसास हुआ की वो भूकंप अब थम चूका था | अरुण को उसी पल अहसास हुआ की रात का वो अँधेरा अब छट्ट रहा था | आसमान अब साफ़ हो रहा था | उसने जब कॉटेज में कदम रखा तो उसे वह सब चीज़े वैसे ही बिखरी मिली | उसने एक बार सौम्या की लाश की ओर देखा और फिर उस कील की ओर जो अब भी वही गड़ी हुयी थी | धीरे धीरे कॉटेज में बाहरी रौशनी पड़ने लगी थी | अरुण को अहसास हुआ की अब उसे और घबराने की ज़रूरत नहीं थी | वो सुबह उसकी जीत की उसके नए सवेरे की जैसे निशानी थी | एक नया सवेरा जिसने रात की उस गहराइयो से उसे हिफाज़त से बचा लिया था |

लेकिन अरुण थमा नहीं ओसाका आक्रोश जैसे पूरा नहीं हुआ था | वो जानता था अब उसे क्या करना है? उसने अपनी गाडी का पेट्रोल निकाला फिर राम की गाडी का मुआना करते हुए उससे भी पेट्रोल निकाला....फिर उस भरे डिब्बे से उसने पुरे कॉटेज को जैसे पेट्रोल से गीला कर दिया...हर वो जगह हर वो कमरा हर वो लाशो पे जो अब भी अंदर मौजूद थी | उसे मालूम था सौम्या की लाश को उसे जलाना था वरना वो भी रात होते ही उस नापाक रूह का एक हिंसा बनकर ज़िंदा होने वाली थी | उसने एक बार पलटकर सौम्या की ओर देखा और रट हुए बहार निकल आया....

उसने लाइटर जलाई और उस जलते लाइटर को कॉटेज के ठीक खुले दरवाजे से अंदर फैख डाला....धाव धाव करती हुयी वो कॉटेज आग के लपटों में हो उठी | और कुछ ही दिएर में आग की लपटे इतनी सुलग गयी की उसने उस विशाल लकड़ी के बने कॉटेज को कुछ ही पालो में भस्म कर दिया |

जलती लकड़ी का मलवा गिरने लगा.....अब वहां कॉटेज के बजाय आग में जल रही लकड़ियों का बडा बड़ा मलवा था | अरुण ने खुद खड़े कॉटेज को जलते देख रहा था | जबतक वो आग की लपटों में ढह न गयी | बहुत देर खड़े रहने के बाद धीरे धीरे अरुण ने पाया की सुबह हो चुकी थी सूरज निकल रहा था...और उसकी तेज रौशनी पुरे डेड लेक पे पड़ रही थी |

अरुण वैसे ही पैदल उस वीरानो में चलता हुआ निकल गया....सड़क पे कॉटेज से कोसो दूर निकलने के बाद....उसने वही ठहरे सोचा की शायद कोई गाडी उसे ज़रूर मिलेगी..वो उसी इंतजार में था....जब वो सड़को पे चल रहा था तो उसे अहसास हुआ की उसके बदन में अब और चलने की जैसे जान नहीं थी | वो कुछ कदम और सड़क पे चला था और उसके बाद वही ढेर होक गिर पड़ा | धीरे धीरे उसके आँखों के आगे धुंधलाहट छा गयी थी |

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१ साल बाद

वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी की उस सुबह...मास्टर चीफ प्रकाश वर्मा के केबिन में उस शख्स ने दस्तक दी जो रंगत से गोरा ३० साल का युवक था| और जिसके चेहरे पे खुशनुमा मुस्कराहट थी....वो अपनी वर्दी में था | उसी पल "मे आई कम इन".....की आवाज़ सुन प्रकाश जो उस वक़्त सिगरेट का काश ले रहा था उसकी निगाह उस असीपी से रूबरू हुयी...."आइये आइये ऐसीपी आशिफ आपने आने की ज़ेहमत क्यों की? हुम्हे ही याद कर लिया होता? वैसे भी सेक्रेटरी ने जब बताया की आप सुबह ७ बजे ही आने वाले है तो वक़्त से पहले आपसे मुलाक़ात करने यहाँ हाज़िर हो गया"..........आशिफ चेयर पे विराजमान हुआ और मुस्कुरा पड़ा |

"नहीं सर ये तो मेरी खुशकिस्मती की मैं आपके पास आया असल में आपके फर्म एजेंसी के कई किस्से साल्व्ड केसेस के मैंने सुने है....तो सोचा आपसे खुद आके मिलु मैं जिस केस पे करीब १ महीने से काम कर रहा हूँ वो भी सोल्वे हो जायेगा"

"तो फिर आप ही बताइये आखिर वो कौन सा केस है? जिससे हमारे एजेंसी का नाम जुड़ा है?"........ऐशट्रे में अपने अधबुझी सिगरेट को मसलते हुए प्रकाश ने कहा

"जी बिलकुल सर दरअसल ये केस "डेड लेक" के ऊपर है वही जहाँ कई वारदातें घटी मेरी इस केस में उठी तवज्जोह सिर्फ इस बात से हुयी क्यूंकि ये इस शहर का पहला और ऐसा unsolved केस है जिसे आजतक पुलिस डिपार्मेंट ने सॉल्व न कर पाया....आखिर में ये केस हम क्राइम ब्रांच वालो को सौप दिया गया है | खैर १ साल पहले एक डायरेक्टर और उसका क्रू मेंबर उस कॉटेज गया था और ठीक उससे कई दिन पहले एक मर्डर भी हुआ था वही से ये केस मैंने सुना है की आपके डिपार्मेंट को पुलिस ने हैंडल करने दिया था"

प्रकाश वर्मा ने सहमति में अपना सर हिलाया...वो उस वक़्त चुपचाप सुबक रहे थे....आशिफ ने गौर किया की उनके आँखों में घुलते आंसू थे | "आर यू ओके सर?".........आशीफ ने हैरानगी से सवालात किया....

"हाहाहा बस अरुण बक्शी की याद आ गयी मेरा सीनियर डिटेक्टिव अरुण बक्शी जिसे मैंने ये केस सौंपा था मैं भी कितना खुदगर्ज़ हूँ की अपने फायदे के लिए अपने भाई जैसे उस काबिल एजेंट को मैंने इस केस के पीछे लगाया अगर मैं न भी करता तो इस केस के ज़िकर करने के बाद भी वो इंकार नहीं करने वाला था| हाँ अरुण बक्शी और उसके साथ उसका एक परनोर्मलिस्ट शायद उसका नाम मोहद डीप था | अब वो मर चूका है और उसके मर्डर का विटनेस खुद अरुण बक्शी था | दरअसल उस हादसे के बाद जब अरुण वापिस मुझतक पंहुचा तो मैंने उसे बहुत डरा हुआ सेहमा हुआ पाया था |

उसका इलाज हुआ करीब २ महीनो तक वो अस्पताल में भर्ती था | डॉक्टर ने बताया की उसके दिमाग में किसी का चीज़ का बहुत गहरा असर पड़ा था | वो जिस हालत में उस राह चलते मुसाफिर को मिला था उसने बताया की वो बेहोश हालत में था | उसे शहर लाके हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और फिर जब मुझे सुचना मिली तो मैं खुद उससे मिलने गया |

आखिर २ महीनो के इलाज के बाद उसमें काफी सुधार आया....वो एक एक वाक़्या जो उसके साथ बीता था उसने मुझे सुनाया | उसकी एक एक बयानात को हमने एक किताब में नोट किया है पहले तो मुझे यकीन न हुआ की वो रूहों से लड़ा था उसने अपनी जान जोखिम में डाली और उसकी मदद करने वाला वो दीप उसकी लाश भी पुलिस को मिली थी वही पे....कॉटेज को उसने अपने हाथो से ही जलाया था | काफी लम्बा केस चला लेकिन आप तो जानते है केस का पहलु भूत प्रेतों पे कभी कानून नहीं मानेगा....वो उसे साज़िश मानते रहे....आखिर में जब पुलिस ने काफी छानबीन की तो उन्हें वहां कुछ हासिल नहीं हुआ | और यही १ साल से बस एक unsolved केस के रूप में आपके सामने शामिल है"

आशिफ चुपचाप उस वक़्त चीफ की बातों को सुन रहा था | "फिर क्या हुआ था?"...........आशिफ ने सवाल किया....

"जब हार पछताके पुलिस को कोई सुराग न मिला वह किसी प्रेत आत्मा जैसी साज़िश के बाबत कुछ मालूम न चला तो बस ढील दे दी.....अरुण को कसूरवार तो पुलिस ठहरा न पायी लेकिन उसकी बात पे भी किसी ने यकीन नहीं किया | लेकिन जो हादसा उसके हाथ घटा था उसपे लोग आँखे मुंडके यकीन करने लगे थे | उसकी रिहाई के बाद अरुण ने दीप की बॉडी को क्लेम किया क्यूंकि उसकी डेडबॉडी कोई लेने आया नहीं था | उसको दफ़नाने के बाद न जाने अरुण कहाँ चला गया? तभी तो कहा मैंने की मैंने उसे खो दिया"..........प्रकाश अपने आँखों को पोछते हुए भरी गले से बोल उठा

"तो वो कहाँ गया?"

"कुछ बताया नहीं कोई इक्तिला करके नहीं गया बस अपने पीछे एक किताब छोड़े गया....उसके आखरी पन्नो में उसने लिखा था की यकीन करने वाले कर लेंगे लेकिन वो अब बहुत दूर जा रहा है उसे दुःख है की वो सौम्या और दीप को बचा न सका वो किसी की जान को न बचा सका सिवाय अपने लेकिन उसे ख़ुशी है की अब कोई भी मासूम उस जगह की भेट नहीं चढ़ेगा उस डेड लेक का राज़ का पर्दा जो बरसो से ढका हुआ था उसे उसने लोगो के सामने से उठा दिया है मानना और न मानना लोगो के हाथ में है | बाकी उसने जो कुछ लिखा है उसे आप उसके उस किताब में पढ़ सकते है जो छोड़े हुए वो चला गया अपनी नौकरी अपना घर सब छोड़े"...........प्रकाश ने गंभीरता से आशिफ की तरफ देखा

कुछ ही दिएर में उसके सामने एक किताब थी...उसे हाथ में लिए जब ऐसीपी आशिफ ने पढ़ना शुरू किया....तो वहां अरुण बक्शी के साथ बीते वो हर घटना को वो अपनी आँखों से जैसे देख रहा था.....आखरी पन्ने को पढ़ते हुए उसने वो किताब बंद किये अपने हाथो में थाम ली....

"थैंक यू सो मच सर आपकी मदद का वैसे मुझे बेहद अफ़सोस है की अरुण बक्शी की बातो पे पुलिस ने यकीन न किया"

आशिफ केबिन से वो किताब लिए बाहर निकल गया....पीछे प्रकाश वर्मा कश्मकश में घेरे चुपचाप वैसे ही खड़ा रह गया |

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"अच्छे से खुदाई करो उस जगह को भी हाँ जल्दी जल्दी शाम होने से पहले का'मौन"................इंस्पेक्टर जीप के पास खड़े ऐसीपी के पास आया...."सर आपके ऑर्डर्स के बाद खुदाई शुरू कर दी है अब देखते है कितनी बाते अरुण बक्शी की सच है? पहले यहाँ डेड लेक पे पुलिस को इस जगह पे कॉटेज के बजाय मलवे का ढेर मिला था....और दीप की लाश अरुण बक्शी के गाडी में मिली थी | और कोई साबुत नहीं मिला था"............आशिफ सुनकर जैसे बड़े ध्यान से मालवो में ढेर उस लकड़ी के मालवो को घुर्र रहा था जो कभी कॉटेज में तब्दील था | जिसे अरुन बक्शी ने जला डाला था |

आशिफ ने पाया की कॉटेज के मलवो को हटाते ही एक सुनहरे रंग का मोटा कील उसे मिला उसे देखते ही आशिफ को आवाज़ सुनाई दी.....वो उस ओर भागा जहा सुखी ज़मीन थी और उसके ठीक ऊपर लाल ब्रिज

"सर सर जैसे जैसे खुदाई कर रहे है लाशो पे लाशें कंकाल मिल रही है"........इंस्पेक्टर ने आशिफ को इशारा करते हुए दिखाया

आशिफ ने खुद देखा की वो ज़मीन वही दलदल थी......और ठीक उनके किनारो पे उसे वही खूटा गड़ा मिला था....धीरे धीरे समय बीत गया और फिर साड़ी लाशो का ढेर न ही सिर्फ उस ज़मीन से बल्कि कॉटेज की ज़मीन से भी बरामद होने लगा |

"लाश काफी पुराणी है और बहुत तो गल गयी है"

"यानी की अरुण की बात सच हुयी | अब इन सब को जला डालो"

"पर सर "

"इट'स माय आर्डर डू इट"...............इंस्पेक्टर अवाक निगाहो से जाते आशिफ को देख रहा था |

सभी लाशो को इकट्ठा किये उन्हें जला दिया गया....उनमें कुछ कंकाल थे और बाकी लाशें......आशिफ चुपचाप खड़ा इस दृश्य को देख रहा था | उसने मुस्कुराते हुए उस किताब को घुरा और वक़्त की तरफ देखा शाम ६ बज चूका था |

ऐसीपी आशिफ और इंस्पेक्टर वह से निकल चुके थे धीरे धीरे हर कोई वह से निकलता चला गया|........पुलिस ने उस जगह के सामने एक बड़ा बोर्ड गाड़ दिया था ठीक सड़क के बीचो बीच..और उसमें लिखा था......"नो एंट्री डेड लेक"....

उस दिन के बाद से कोई हादसा नहीं घटा न कभी कोई वारदात सुनाई देने को मिली......लेकिन आज भी लोगो के दिलो में उस जगह को लेके कई किस्से थे जो वो ब्यान किया करते थे की वहा क्या घटा था क्या हुआ था? उस घटना के विषय ने अपनी जगह किताब के उन पन्नो में ले ली थी....जिसका नाम था "आई विटनेसेड डी डेड लेकस पेनफुल स्क्रीम".....

समाप्त........

 
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