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करिश्मा किस्मत का complete

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अभी आधी सीढ़ियाँ ही चढ़ा था कि प्रिया एकदम से मेरे सामने आ गई।

“लगता है जनाब का मूड ख़राब हो गया है… अब तो आपको बाग़ की जगह बाज़ार जाना पड़ेगा बच्चू! और फिर अब ये बेचारे गुलाबजामुन अकेले ही खाना पड़ेंगे आपको!” प्रिया ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा।

“लगता है आपको बड़ी ख़ुशी हुई है इस बात से?” मैंने उसे ताना मारते हुए कहा।

“हाँ यह तो सही कहा आपने! दरअसल मैं खुद तुमसे यह कहने वाली थी कि आज हम बाग़ नहीं जा पाएँगे क्यूंकि आज शाम को घर पे सुनार और कपड़ों के व्यापारी आने वाले हैं और हम सबको उनसे ढेर सारी चीजें खरीदनी हैं। तो आप बाज़ार होकर आ जाओ और हम अपनी खरीदारी कर लेते हैं।”

बाप रे बाप… एक ही सांस में प्रिया ने सबकुछ बोल दिया और मुझे बोलने या कुछ पूछने का मौका भी नहीं दिया।

मैंने अपने हाथों की प्लेट नीचे सीढ़ियों पे रखी और बिना कुछ कहे प्रिया का हाथ एकदम से पकड़ा और अपने लंड पे रख कर कहा, “इसका क्या करूँ?”

प्रिया के हाथ रखते ही लंड एकदम से खड़ा हो गया जो कि उसकी हथेली में फिट बैठ गया। प्रिया ने इधर उधर देखा और झुक कर मेरे लंड पे एक पप्पी ले ली और फिर उसे सहलाते हुए मुझसे एकदम से चिपक गई।

“चिंता मत करो मेरे पतिदेव, आपसे ज्यादा आपकी ये बीवी तड़प रही है इसे अपने अन्दर लेने के लिए। मैं वादा करती हूँ कि मै पूरी कोशिश करूगी कि रात को सबके सोने के बाद मैं इसका सारा दर्द दूर कर दूँ।” प्रिया ने मेरे कान में धीरे से कहा।

मैंने अपना एक हाथ उसके चूत पे कपड़ों के ऊपर से ही रख दिया और धीरे से सहलाने लगा। प्रिया ने अपने मुँह को मेरे मुँह से सटा कर अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी और मेरी जीभ से खेलने लगी। मेरा एक हाथ उसकी टॉप के अन्दर चला गया और ब्रा के ऊपर से उसकी चूचियों को मसलने लगा।

बड़ा ही कामुक सा दृश्य था, उसके हाथों में मेरा लंड, उसकी चूत पे मेरा एक हाथ और अब उसकी एक चूची ब्रा से आजाद होकर मेरे हाथों में। अगर थोड़ी देर और ऐसे रहते तो शायद वहीं सीढ़ियों पे ही चुदाई शुरू हो जाती। लेकिन किसी के क़दमों की आहट ने हमें चौंका दिया और हम झट से अलग हो गए।

प्रिया जल्दी से मेरे गालों पे एक पप्पी लेकर अपने कमरे में भाग गई और मैंने इधर उधर देखकर अपने कदम तीसरे महले की ओर बढ़ा दिए।
 
नाना जी का घर, आंटी और मैं

दोस्तों, एक बात तो आप सब भी मानेंगे कि जब हम छिप कर चुदाई का खेल खेलते हैं तो किसी के द्वारा पकड़े जाने का डर चुदाई की भावना को और भी उत्तेजतक बना देता है, है न!?!

मैं अपने खड़े लंड के साथ अपने कमरे में पहुँचा और मिठाई को पास की मेज़ पर रख कर लेट गया।

अभी कुछ मिनट ही हुए थे कि अपने दरवाज़े पर दस्तक सुनकर मेरा ध्यान दरवाज़े की तरफ चला गया। अलसाई आँखों से देखा तो पाया कि लाल साड़ी में सजी मेरी प्यारी आंटी अन्दर चली आ रही हैं। तो इसका मतलब यह कि अभी अभी स्मिता आंटी की ही आहट ने मुझे और प्रिया को अलग होने पर मजबूर कर दिया था।

“बच गया बेटा… वरना आज तो सारा भांडा ही फूट जाता!” मैंने मन ही मन खुद को कहा।

सच में अगर उन्होंने हमे देख लिया होता तो सब गड़बड़ हो जाता। भगवन जो करता है अच्छे के लिए ही करता है।

खैर, आंटी मेरे कमरे में झाँकने लगी और जब मुझे बिस्तर पे लेटा हुआ देखा तो अन्दर आकर बिस्तर की तरफ आ गईं। मैंने जानबूझ कर अपनी आँखें फिर से बंद कर लीं। बिस्तर के पास आकर वो थोड़ी देर खड़ी रहीं फिर अचानक से अपना एक हाथ मेरे सर पर रख कर सहलाने लगी जैसा कि वो हमेशा किया करती थीं। वैसे तो उनकी यह छुअन मुझे हमेशा से उत्तेजित किया करती हैलेकिन आज तो बात ही कुछ और थी। हाथ उन्होंने मेरे सर पर रखा था लेकिन असर सीधे मेरे लंड पे हो रहा था। मेरे नवाब साहब धीरे धीरे जागने से लगे थे। आधे तो वो कल रात से ही खड़े थे…

मेरे मन में कल रात की बात घूम गई और मैंने अपनी आँखें धीरे से खोल दी… कहीं न कहीं मुझे ऐसा लग रहा था कि शायद जो काम कल रात को अधूरा रह गया था वो अब पूरा होने वाला था।

यह लंड भी कितना कमीना होता है… लाख समझा लो लेकिन चूत की चाहत सब कुछ भुला देती है। मैंने अपने मन को बहुत समझाया था कि स्मिता आंटी की तरफ कदम न बढ़ाये, लेकिन वो कहाँ मानने वाला था।

मेरी आँखें खुलते ही आंटी ने मुस्कुराते हुए बिना कुछ बोले अपनी कजरारी आँखों से मिठाई की तरफ इशारा किया और मुझसे न खाने की वजह पूछने लगी। उनकी आँखों की वो भाषा बिना किसी शब्द के सब कुछ समझा रही थीं। मैंने भी अपने होंठों को बंद ही रखा और आँखों से अपनी अनिच्छा जाहिर की।

आंटी ने थोड़ा सा गुस्से वाला चेहरा बनाया और मेरा एक हाथ पकड़ कर मुझे बिस्तर पे से आधा उठा दिया। मैं भी एक रोबोट की तरह उनके इशारे पे उठ बैठा और उनकी तरफ ललचाई नज़रों से देखने लगा। आंटी ने मेरी जांघों के पास जो थोड़ी सी बची थी उस जगह पे अपने कूल्हे टिका दिए और बैठ गई। उनकी कमर मेरी जांघों को रगड़ कर मुझे एक सुखद एहसास दे रही थी। आंटी ने बैठे बैठे ही प्लेट उठाई और उसमें से एक गुलाब जामुन अपनी उँगलियों से उठा कर मेरे मुँह की तरफ बढ़ा दिया और बिल्कुल मेरे होंठों से सटा दिया

अब तो मेरे पास कोई चारा नहीं था, मैंने अपने होंठों को थोड़ा सा खोला और मिठाई को काटने लगा, लेकिन यह क्या, आंटी ने तो शरारत से पूरे गुलाब जामुन को मेरे मुँह में ठूंस सा दिया।

इस शरारत का असर यह हुआ कि मिठाई तो मेरे मुँह में समां गई लेकिन उसका रस मेरे सीने पे गिर गया। आंटी ने ऐसी शक्ल बनाईं जैसे उन्होंने यह जानबूझकर नहीं किया.. बस हो गया। मैंने उनकी आँखों में ऐसे देखा जैसे मैं उन्हें डाँट रहा हूँ और उन्हें सजा देने की सोच रहा हूँ।

“जानबूझ कर नहीं किया बाबा…ऐसे क्यूँ देख रहे हो?” आंटी ने अपनी चुप्पी तोड़ी।

“हाँ हाँ, अब तो आप कहोगी ही कि गलती से हो गया… अब इसे साफ़ कौन करेगा?” मैंने भी बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा।

“ओहो, इतना परेशान क्यूँ होता है, अभी साफ़ कर देती हूँ।” इतना कह कर आंटी ने अपनी उँगलियों से मेरे सीने पे गिरा हुआ रस उठा कर मेरी आँखों में देखा और फिर अपनी उँगलियों को मेरे होंठों पे लगा दिया।

कोमल उँगलियों का वो स्पर्श इतना विवश करने वाला था कि मैंने बिना कुछ कहे अपने होंठों को चाट लिया। आंटी ने फिर से बाकी के गिरे हुए रस को अपनी उंगलियों मे लपेटा और मेरे होंठों पे लगाने लगी।

मैंने अचानक से उनकी उंगली को अपने होंठों के बीच दबा लिया और चूसने लगा। एक तो वो मीठा रस, ऊपर से आंटी की वो उँगलियाँ… मानो गुलाब जामुन का रस और भी मीठा हो गया हो।

मैं एक बच्चे की तरह उनकी उंगली को चूस रहा था। चूसते चूसते मैंने आंटी की आँखों में देखा तो उन्होंने एक बार शरमा कर अपनी पलकें नीचे कर लीं।

मुझमे पता नहीं कहाँ से हिम्मत आ गई और मैंने अपना एक हाथ आगे बढ़ा कर उनके चेहरे को ऊपर उठाया। आंटी की आँखों में शर्म और हया साफ़ झलक रही थी। उनकी उंगली अब भी मेरे मुँह में ही थी जिसे मैं बड़े प्यार से चूस रहा था। मेरे हाथ अब आंटी के गालों को सहलाने लगे और आंटी के गाल लाल होने लगे।

बड़ा ही मनोरम दृश्य था, लाल साड़ी में लिपटा लाल लाल गालों से घिरा वो खूबसूरत सा चेहरा… जी कर रहा था आगे बढ़ कर पूरे चेहरे को चूम लूँ। आंटी की साँसें धीरे धीरे गर्म होने लगीं और तेज़ हो गईं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि अब आगे क्या करना चाहिए।

उनकी जगह अगर उनकी बेटियाँ होतीं तो अब तक शायद मैं उन्हें पूरी तरह से नंगी करके अपना लंड ठूंस चुका होता। लेकिन यहाँ बात कुछ और थी, मैं संभल संभल कर कदम उठा रहा था।

मैंने आंटी की उंगली को अपने मुँह से बाहर निकाला और उनके हाथ को धीरे से अपनी ओर खींचने लगा जिसकी वजह से आंटी मेरे ऊपर झुक सी गईं। आंटी के झुकते ही उनके सर पर टिका पल्लू उनके कन्धों से सरक कर नीचे गिर गया। मेरे नजदीक आते ही आंटी ने अपनी आँखों को एक बार फिर से बंद कर लिया। उनकी तेज़ साँसों ने मेरे चेहरे को उनकी गर्मी का एहसास करवाया और मेरी आँखें उनके सरके हुए पल्लू पे जा ठहरी जो कि उनके उन्नत और विशाल उभारों को आधा अनावृत कर चुकी थीं। लाल रंग के ब्लाउज में कसे हुए उनके 36 इन्च के उभारों ने मेरी साँसों को अनियंत्रित कर दिया और मेरी आँखें वहीं अटक गईं। उनके उभार तेज़ चल रही सांसों के साथ ऊपर नीचे होकर मुझे आमंत्रण दे रहे थे।

मैंने थोड़ी सी और हिम्मत कर के आंटी को थोड़ा सा और पास में खींचा और उन्हें अपने गले से लगा लिया। यह एहसास बिल्कुल अलग था। सच कहूँ तो जितना मज़ा प्रिया को अपनी बाहों में भर कर होता था बिल्कुल वैसा ही एहसास हो रहा था मुझे। आंटी का हाथ अब भी मेरे हाथों में ही था और वो मेरे सीने पे अपना सर रख कर तेज़ तेज़ आहें भर रही थीं। मैंने धीरे से उनके कानों तक अपने होंठ ले जा कर उनके कान को हल्के से चूमा और अपने मन में चल रहे अंतर्द्वंद को सुलझाने के लिए एक सवाल कर बैठा, “एक बात पूछूँ?”

“ह्म्म्म…” आंटी के मुँह से बस इतना ही निकल सका।

“कल रात को भी आपने जानबूझ कर किया था या गलती से हो गया था?” मैंने एक मादक और कामुक आवाज़ में उनसे पूछ लिया।

“इस्सस…” आंटी ने सवाल सुनते ही बिजली की फुर्ती के साथ अपना सर मेरे सीने से हटा लिया और एक पल के लिए मेरी आँखों में देख कर अपना चेहरा घुमा लिया।

उनके गाल तो क्या अब तो पूरा का पूरा चेहरा ही शर्म से सिन्दूरी हो गया था और उनके हाथ थरथराने लगे थे। मैंने उनकी मनोदशा भांप ली थी, मैंने आगे बढ़कर उनके चेहरे को एक बार फ़िर अपने हाथों में लेकर अपनी तरफ घुमाया और एकटक देखते हुए उनके जवाब का इंतज़ार करने लगा। उनका चेहरा अब भी उसी तरह लाल था और उनके होंठ थरथरा रहे थे। आँखें अब भी नीचे थीं और एक अजीब सा भाव था उनके चेहरे पर जैसे चोरी पकड़ी गई हो।

“बोलो न आंटी….क्या जानबूझ कर किया था या गलती से हो गया था….? अगर जानबूझकर किया था तो अधूरा क्यूँ छोड़ दिया और अगर गलती से हो गया था तो गलती की सजा भी मिलने चाहिए ना !!” मैंने उनके चेहरे से बिल्कुल सटकर कहा।

“वो…वो..बस…. मुझे नहीं पता।” आंटी ने अपनी आँखें नीचे करके ही अपने कांपते होंठों से कहा।

“तो फिर पता करो… मैं कल रात से परेशान हूँ…” मैंने उनके गालों पर एक चुम्बन देकर धीरे से उनके कानों में कहा।

“शायद गलती से ही हुआ होगा…” आंटी ने इस बार अपनी आँखें उठाकर मेरी आँखों में देखते हुए कहा।

“फिर तो गलती की सजा मिलनी चाहिए।” मैंने शरारत से भर कर उन्हें अपनी ओर खींच कर अपनी बाहों में भर लिया और उनकी चूचियों को अपने सीने से मसल दिया।

“आह…ये क्या कर रहा है? मुझे जाने दे, ढेर सारा काम है घर में!” आंटी ने कसमसाते हुए मेरे बाहों से निकलने का प्रयास किया।

पर मैंने तो उन्हें कस कर जकड़ रखा था, मैंने सोच लिया था कि अब जो होगा देखा जायेगा लेकिन कल रात के अधूरे काम को अभी पूरा करके ही दम लूँगा।

इस कसमसाहट में उनकी चूचियाँ बार बार मेरे सीने से रगड़ कर मेरे अन्दर के शैतान को और भी जगा रही थीं। हम दोनों एक दूसरे पर अपना जोर आजमा रहे थे। मैंने उन्हें और जोर से जकड़ा और उन्हें लेकर बगल में बिस्तर पे गिरा दिया।अब मैं आधा उनके ऊपर था, उनकी चूचियों को अपने सीने से दबाकर मैंने उनके चेहरे पे अपने होंठों को इधर उधर फिरा कर कई चुम्मियाँ दे दी।

“उफ्फ… सोनू, जाने दे मुझे… कोई ढूंढता हुआ आ जायेगा।” आंटी ने अपने चेहरे को मेरे होंठों से रगड़ते हुए कामुक सी आवाज़ में कहा।

“आ जाने दो… मैं नहीं डरता, लेकिन पहले कल रात से तड़पते हुए अपने ज़ज्बातों को थोड़ी सी शांति तो दे दूँ।” मैंने उन्हें चूमते हुए कहा।

“उफ… समझा कर न, पूरा घर मेहमानों से भरा पड़ा है। प्लीज मुझे जाने दे…फिर कभी…” आंटी ने अपनी अनियंत्रित साँसों को इकठ्ठा करके इतना कहा और अपने हाथों से मेरे चेहरे को पकड़ लिया और अपनी नशीली आँखों से मुझसे विनती करने लगी।

मैंने उनकी आँखों में आँखें डालीं और शरारत भरे अंदाज़ में बोला, “एक शर्त पर… पहले यह बताओ कि कल रात ऐसा क्यूँ किया आपने और मुझे बीच में ही क्यूँ छोड़ कर चली गईं?”

आंटी ने एक लम्बी सी सांस ली और मेरे गालों को सहला कर कहा, “एक औरत की प्यास को समझना इतना आसान नहीं है। ये क्यूँ हुआ और कैसे हुआ, मैं तुझे नहीं समझा सकती… शायद कई दिनों की तड़प ने मुझे विवश कर दिया था और मैं बहक गई।” आंटी की आवाज़ में अचानक से एक दर्द का एहसास हुआ मुझे और मैं समझ गया कि यह शायद सिन्हा अंकल से दूरियों की वजह से था।

“मैं सब समझता हूँ, आप मुझे नासमझ मत जानो… चिंता मत करो, मैं आपसे कुछ नहीं पूछूँगा।” मैंने उन्हें प्यार से देखते हुए कहा और अपने होंठों को उनके होंठों पे रख दिया।
 
उन्होंने भी मेरे इस प्रयास का स्वागत किया और अपने होंठ खोलकर मेरे होंठों को उनमे समां लिया। अब तो कुछ कहने को रह नहीं गया था। आंटी को अपनी बाँहों में जकड़ कर मैंने उनके होंठों को अपने होंठों से जकड़े हुए ही बिस्तर पे पलट गया। अब आंटी मेरे ऊपर आधी लेटी हुई थीं और उनकी चूचियाँ मेरे सीने पे ऊपर से अपना दबाव बना रही थीं। मैंने अपनी जीभ को उनके मुँह का रास्ता दिखाया और आंटी ने भी उसे अपने मुँह में भर कर अपनी जीभ से मिलन करवा दिया।

हम बड़े ही सुकून से एक दूसरे को चूमने का आनन्द ले रहे थे। मेरे हाथ अब आंटी की पीठ पर थे और साड़ी तथा ब्लाउज के बीच के खाली जगह को अपनी उँगलियों से गुदगुदा रहे थे। जैसे जैसे मेरी उँगलियाँ उनकी कमर पे घूमती, वैसे–वैसे उनका बदन थिरकने लगता।

धीरे धीरे मेरे हाथ साड़ी के ऊपर से ही उनके विशाल नितम्बों पे पहुँच गए और मैंने अपनी हथेलियों को उनके पिछवाड़े पर जमा दिया और हल्के हल्के सहलाने लगा। वो नर्म और गुदाज़ गोलाकार नितम्ब जिन्हें देख देख कर मैं अपने लंड को सहला दिया करता था, आज वो मेरे हाथों में थे। मैं अपनी किस्मत पे फूला नहीं समां रहा था।

मेरे हाथ उनके पिछवाड़े को सहलाते सहलाते नीचे की ओर बढ़ चले और उनकी साड़ी के छोर तक पहुँच गए। अब मेरे हाथ उनके नंगे पैरों पे घूम रहे थे जो कि अपनी चिकनाहट के कारण मेरी हथेलियों में गुदगुदी का एहसास करवा रहे थे। अपनी हथेलियों को साड़ी के अन्दर धीरे से डालकर मैं उनकी साड़ी को पैरों से ऊपर करने लगा। उनकी पिंडलियों पर पहुँच कर मेरे हाथ रुक से गए। बड़ा ही मोहक एहसास हो रहा था, जी कर रहा था कि बस ऐसे ही सहलाता रहूँ।

इधर हमारे होंठ अभी भी कुश्ती लड़ रहे थे, ना तो उन्होंने मेरे होंठों को आज़ाद किया न ही मैंने। आंटी का एक हाथ मेरे सर के बालों को सहला रहता तो दूसरा हाथ मेरे सीने के बालों को छेड़ रहा था। हम दोनों को ही होश नहीं रह गया था। उनकी तड़प उनके चुम्बनो मे झलक रही थी। कल रात की घटना का घटित होना अब मेरे लिए कोई व्याकुलता वाली बात नहीं रह गई थी। वो सचमुच मजबूर हो गई होंगी…

ईश्वर ने चुदाई की तड़प हम मर्दों से कहीं ज्यादा औरतों में दी है लेकिन साथ ही साथ उन्हें शर्म और हया भी सौगात में बक्शी है जिसकी वजह से अपने ज़ज्बातों को दबा देना औरतों के लिए आम बात हो जाती है। हम मर्द तो कभी भी शुरू हो जाते हैं अपना लंड अपने हाथों में लेकर और मुठ मार मार कर अपनी काम पिपासा शांत कर लेते हैं। लेकिन औरतें मजबूर होती हैं।

अब मेरे हाथ साड़ी के अन्दर घुटनों से ऊपर उनकी नर्म मुलायम जांघों तक पहुँच गए थे और जल्दी ही उनके विशाल मनमोहक नितम्बों तक पहुँचने वाले थे।

जैसे ही मैंने अपनी हथेली को उनके नंगे नितम्बों के ऊपर रखा, उन्होंने मेरे होंठों को जोर से दांतों से पकड़ लिया और अपनी आँखें खोल दीं ।

अपने होंठों के जकड़े जाते ही मैंने भी अपनी आँखें खोलीं और उनकी आँखों में देखा। एक पल के लिए हम वैसे ही थम गए, बिल्कुल स्थिर।

मैंने धीरे से अपने होंठ छुड़ाये और उनकी ओर देख कर प्रश्नवाचक नज़रों से यह जानने की कोशिश करने लगा कि आखिर हुआ क्या।

“क्या हुआ…?” मैंने भर्राई आवाज़ में पूछा।

“यह सही नहीं है… मुझे जाने दे… बहुत देर हो चुकी है… सब ढूंढ रहे होंगे…” एक साथ आंटी ने इतनी सारी स्थितियों को सामने रख दिया कि मैं थोड़ी देर के लिए असमंजस में पड़ गया।

एक बात थी कि अब भी स्मिता आंटी के हाथ मेरे बालों को सहला रहे थे और वो अब भी मेरी बाहों में जकड़ी थीं। अजीब सी स्थिति थी, हालत ऐसी थी कि बस मेरा उन्हें नंगा करके अपना लंड उनकी रसभरी चूत में डालना ही बाकी रह गया था। मैं क्या चाहता था यह मुझे पता था लेकिन मैं क्या करूँ, यह समझ नहीं पा रहा था। आंटी सच में क्या चाहती थी यह भी नहीं पता था। “मुझे जाने दे” शायद ये वो आखिरी शब्द है जो हर औरत पहली बार किसी पराये मर्द से चुदते वक़्त कहती है। चूत तो लंड के लिए टेसुए बहा रही होती है लेकिन फिर भी एक आखिरी बार अपनी शर्म, और हया को दर्शाने के लिए ऐसा बोलना हर स्त्री की आदत होती है।

मैं जानता था कि अगर मैंने थोड़ी सी जबरदस्ती की तो आंटी प्यार से मेरा लंड अपनी चूत में अन्दर तक घुसेड़ लेंगी… लेकिन मैंने तभी यह फैसला किया कि देखा जाए आखिर ये चाहती क्या हैं। यह सोच कर मैंने उन्हें अपने ऊपर से धीरे से उतार दिया और बिस्तर से उठ कर खड़ा हो गया। आंटी ने बिना कोई देरी किये बिस्तर से उठ कर अपनी साड़ी ठीक करी और मेरी तरफ बिना देखे ही कमरे से बाहर निकल गई।

मैं पलंग के बगल की खिड़की की तरफ मुड़ कर अपनी साँसों को समेटने लगा और अजीब से सवालों को अपने मन में लिए उनका जवाब ढूँढने लगा। मेरा मन कर रहा था कि मैं कमरे से बाहर निकल कर उन्हें अपने पास खींच लाऊँ और अपनी बाहों में भर लूँ लेकिन मुड़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

तभी तड़ाक से कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई और मेरे मुड़ने से पहले ही कोई मेरे पीछे से आकर मुझसे लिपट गया।

“जो भी करना है जल्दी से कर ले… मुझसे भी रहा नहीं जा रहा।” यह आंटी ही थीं जो कि दरवाज़े से निकल कर शायद ये देखकर आई थीं कि कोई उन्हें ढूंढ तो नहीं रहा..

मैं एकदम से चहक उठा और घूम कर उन्हें अपनी बाहों में उठा लिया। मेरे चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई थी। मैं उन्हें उठा कर वैसे ही उसी जगह पे गोल गोल घुमने लगा।

“पागल… मैं तुझे कभी उदास नहीं देख सकती…” इतना कह कर उन्होंने झुक कर मेरे होंठों को चूम लिया।

मैं पागलों की तरह उन्हें नीचे उतार कर चूमने लगा, उन्होंने भी मुझे अपनी बाहों में भर कर चूमना शुरू कर दिया।

“उम्म… ओह्ह.. जल्दी कर सोनू… इससे पहले कि कोई आ जाये मुझे कल रात की गलती की सजा दे दे!” आंटी मदहोशी में बोले जा रही थी और मेरे सीने पे अपने होंठों की छाप छोड़े जा रही थी।

मैंने उन्हें खुद से थोड़ा अलग किया और उनकी साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। एक बार फिर मेरे सामने उनकी बड़ी बड़ी सुडौल चूचियाँ लाल ब्लाउज में ऊपर नीचे हो रही थीं। मैंने देर न करते हुए उन्हें थाम लिया और उन्हें जोर से दबा दिया।

“उह्ह… इतनी जोर से तो ना दबा… कहीं ब्लाउज फट गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे!” उन्होंने मेरे हाथों पे अपने हाथ रख दिए और धीरे से दबाने का इशारा किया।

मैंने भी धीरे धीरे उनकी चूचियों को मसलना शुरू किया और आंटी अपनी आँखें बंद करके सिसकारियाँ भर रही थीं। समय की नजाकत को देखते हुए मैंने भी प्रोग्राम को लम्बा खींचना नहीं चाहा और सीधे उनके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। पहला हुक खुलते ही आंटी ने अपनी आँखें खोली और मेरी तरफ मुस्कुराते हुए अपने ही हाथों से अपने ब्लाउज के सारे हुक खोल दिए और अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे ले जा कर ब्रा का हुक भी खोल दिया। लाल ब्लाउज के अन्दर काली ब्रा में कैद उनकी चूचियों ने जैसे एक छलांग लगाई हो और ब्रा को ऊपर की तरफ उछाल दिया।

उनकी भूरे रंग की घुन्डियों ने मुझे निमंत्रण दिया और मैंने झुक कर सीधे अपने होंठ लगा दिए।

“उम्म्…पी ले… जाने कब से तेरे मुँह में जाने को तड़प रहीं हैं।” इतना बोलकर उन्होंने अपने एक हाथ से अपनी एक चूची को मेरे होंठों में डाल दिया।

ये सब इतनी जल्दी जल्दी हो रहा था कि कुछ सोचने और समझने का मौका ही नहीं मिल रहा था। पता नहीं यह उनकी बरसों की तड़प की वजह से था या समय कम होने की वजह से। पर जो भी था मैं पूरे जोश में भर कर उनकी चूचियों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा।

“उफफ्फ… सोनू, … जल्दी जल्दी चूस ले… आराम से चूसने का वक़्त नहीं है तेरे पास!” आंटी ने एक बार फिर से एक कामुक सिसकारी भरते हुए मेरा ध्यान समय की तरफ खींचा।
 
अब मुझे भी समझ आ गया था कि जल्दी से कल रात की तड़प को शांत कर लिया जाए, फिर एक बार लंड चूत में जाने के बाद आराम से इस काम की देवी का रसपान करेंगे वो भी इत्मिनान से अपने घर जाकर जहाँ हमें किसी का कोई डर नहीं होगा।

ऐसा सोच कर मैंने उनकी एक चूची को चूस चूस कर फिर दूसरी चूची को मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा। मैं अपना पूरा दमख़म लगा कर उनकी चूचियों को पी रहा था मानो बस कुछ पल में ही उन्हें खाली करना हो। आंटी हल्की-हल्की सिसकारियों के साथ मेरे सर को अपनी चूचियों पे दबा रही थी। तभी उन्होंने अपना एक हाथ नीचे ले जा कर मेरे लोअर के ऊपर से मेरा लंड पकड़ लिया। लंड को पकड़ते ही उन्होंने एकदम से छोड़ दिया और एक लम्बी सी आह भरी। उनकी इस हरकत ने मेरा ध्यान खींच लिया और मैंने उनकी चूची को मुँह से निकाल दिया और यह समझने की कोशिश करने लगा कि उन्होंने लंड पकड़ कर अचानक छोड़ क्यूँ दिया। उनकी आँखों में देखा तो एक अजीब सा आतंक देखा मानो उन्होंने लंड नहीं कोई बांस पकड़ लिया था।

“ये… नहीं नहीं… इतना मोटा… हाय राम…” टूटे फूटे शब्दों में स्मिता आंटी ने लंड को छोड़ने का कारण समझाया।

मैं हंस पड़ा और उनका हाथ पकड़ कर अपने लोअर में डाल दिया। मेरे नंगे खड़े लंड पे हाथ पड़ते ही उन्होंने एक जोर की सांस ली और इस बार कस कर पकड़ लिया और मरोड़ने लगी। उनकी आँखें मेरी आँखों में ही झांक रही थीं और एक अजीब सी चमक दिखला रही थीं मानो उन्हें कारू का खजाना मिल गया हो।

मैंने उनके होंठों को चूमा और उनकी साड़ी का एक छोर पकड़कर खोलने लगा।

“नहीं… इसे मत खोल… देर हो जाएगी… हम्म्…” आंटी ने मुझे रोक दिया।

“फिर कैसे होगा?” मैंने भी एक अनजान अनाड़ी की तरह सवाल किया और उनकी तरफ देखने लगा।

आंटी मुस्कुराने लगी और मेरे लोअर के अन्दर से अपना हाथ निकल कर अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी धीरे धीरे ऊपर उठाने लगी और उठाकर बिल्कुल ऊपर करके पकड़ लिया। साड़ी इतनी ऊपर हो गई थी कि उनकी चूत नंगी हो चुकी थी लेकिन खड़े होने की वजह से ऊपर से दिखाई नहीं दे रही थी।

“ऐसे ही काम चला ले अभी…” आंटी ने थोड़ा शर्माते हुए अपनी नजरे झुका लीं और मुस्काने लगी।

मैं उनका इशारा समझ गया और झट से नीचे बैठ गया। खिड़की से आ रही रोशनी ने उनकी गद्देदार और हलके हलके झांटों से भरी चूत के दर्शन करवा दिए। वैसे तो मैं बिल्कुल रोम विहीन चूत का दीवाना हूँ लेकिन आंटी की छोटी छोटी झांटों के बीच फूली हुई चूत मुझे बड़ी ही मनमोहक लग रही थी। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और अपने होंठों को चूत पर रख दिया।

“उम्म… आह्ह… जल्दी कर न…” होंठ रखते ही उनकी चूत ने एक छोटी सी पिचकारी मारी और पहले से ही गीली चूत के होंठों को और भी गीला कर दिया।

क्या खुशबू थी उस रस भरी चूत से निकलते हुए रस में… रिंकी और प्रिया की चूत से भी मस्त कर देने वाली खुशबू आती थी लेकिन यह खुशबू एकदम अलग थी। शायद कुँवारी और शादीशुदा चूतों की खुशबू अलग अलग होती होगी, यह सोचकर मैंने अपने होंठों से चूत के हर हिस्से को चूमा और फिर अपनी जीभ निकल कर उनकी चूत को अपनी उंगलियों से फैला कर सीधा अंदर डाल दिया।

“उफ्फ… हाय सोनू… ये क्या कर दिया तूने…” आंटी ने एक ज़ोरदार आह भरी और अपने हाथों से मेरा सर अपनी चूत पे दबा दिया मानो मुझे अंदर ही डाल लेंगी।

मैंने अपना सर थोड़ा सा ढीला किया और अपनी जीभ को चूत के ऊपर से नीचे तक चाटने लगा और बीच बीच में उनके दाने को अपने होंठों से दबा कर चूसने लगा। दानों को जैसे ही अपने होंठों में दबाता था तो आंटी अपने पैरों को फैलाकर चूत को रगड़ देती थी।

करीब 5 मिनट ही हुए होंगे कि आंटी ने मेरा सर चूत से हटा दिया और मेरा कन्धा पकड़ कर मुझे उठा दिया और झट से नीचे बैठ गई। आंटी की तड़प देखते ही बनती थी। सच में जब औरत गरम हो जाती है तो उसे रोकना मुश्किल हो जाता है।

नीचे बैठते ही उन्होंने मेरा लोअर नीचे खींचा और मेरे लंड को आज़ाद करके अपने हाथों में भर कर ऊपर नीचे सब तरफ से देखने लगी मानो पहली बार देख रही हो। मुझे लगा कि वो अब मेरा लंड अपने नर्म होंठों के रास्ते अपने मुँह में भरेगी और मुझे लंड चुसाई का असीम सुख देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मैंने अपना लंड उनके होंठों से लगाया तो उन्होंने मेरी तरफ देखकर ऐसा किया मानो पूछ रही हो कि क्या करूँ।

मैंने लंड को उनके होंठों पे रगड़ा तो उन्होंने लंड के चमड़े को खोलकर सुपारे पे एक चुम्मी दे दी और उठ गई। मैं उदास हो गया लेकिन फिर यह सोचा कि शायद उन्होंने कभी लंड चूसा नहीं होगा इसलिए ऐसा किया। कोई बात नहीं, मैं उन्हें भी उनकी बेटियों की तरह लंड का दीवानी बना दूँगा। फिर तो वो 24 घंटे लंड अपने मुँह में ही रखेंगी।

आंटी उठ कर सीधे बिस्तर पर लेट गई। उनका आधा शरीर बिस्तर पर था और आधा बाहर। यानि उनकी कमर तक का हिस्सा बिस्तर पर और कमर से नीचे पैर तक बिस्तर के नीचे। मैंने समय न गंवाते हुए उनकी साड़ी को पैरों से ऊपर उनकी कमर तक उठा दिया और एक बार फिर से झुक कर चूत को चूम लिया, फिर उनके पैरों को अपने कन्धों पर रख कर अपने लंड को सीधे उनकी हसीन चूत के मुँह पर रख दिया। लंड का सुपारा उनकी चूत के मुँह पर रगड़ कर मैंने सुपारे को बिल्कुल सही जगह फिट कर दिया अब बस धक्का मारने की देरी थी और मेरा लंड उनकी चूत को चीरता हुआ अन्दर चला जाता।

आंटी ने बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपनी चूत को उठाकर पेलने का इशारा किया। उनकी आँखें बंद थी और दांतों को कस लिया था मानो वो आने वाले तूफ़ान के लिए पूरी तरह से तैयार हों।

उनकी यह दशा देखकर मैंने उन्हें तड़पाना सही नहीँ समझा और अपने सुपारे को हल्का हल्का रगड़ते हुए धीरे धीरे अन्दर की तरफ ठेलना शुरू किया। हल्के से दबाव के साथ लंड का अगला हिस्सा उनकी चूत के अन्दर आधा जा चुका था। अब मैंने उनकी जांघों को अपने हाथों से मजबूती से पकड़ा और एक जोर का झटका दिया और आधा लंड अन्दर घुस गया।

“ग्गुऊंन… इस्स स्स्स… धीरे…. ह्म्म्म…” आंटी ने अपने दांत पीसते हुए लंड का प्रहार झेला और धीरे से बोलीं।

मैंने बिना रुके एक और झटका मारा और जड़ तक पूरे लंड को उनकी चूत में ठोक दिया।

“आआअह्ह्ह्ह… ज़ालिम… धीरे कर ना… आज ही सारे क्रिया-कर्म कर देगा क्या?” आंटी ने एक लम्बी चीख के साथ प्यार से गालियाँ देते हुए कहा।

ज़ालिम तो मुझे मेरी प्रिया कहती है… उसकी माँ के मुँह से अपने लिए वही शब्द सुनकर मैं खुश हो गया और धीरे धीरे धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ आंटी सिसकारियाँ भरती जा रही थीं और उनकी चूत गीली होती जा रही थी।
 
“हाँ… बस ऐसे ही करता जा… बहुत तड़पी हूँ इसके लिए…” आंटी ने प्यार से मेरी तरफ देखते हुए कहा।

“जितनी तड़प आपने कल रात से मेरे अन्दर भरी है उतनी तड़प तो मैंने कभी आज तक महसूस ही नहीं की थी… अब तो बस आप देखती जाओ मैं क्या क्या करता हूँ।” मैंने अपने धक्कों का आवेग बढ़ाते हुए कहा।

“तो कर ले ना, रोका किसने है… लेकिन अभी तो जल्दी जल्दी कर ले… आह्ह्हह्ह… कोई आ न जाये… उफफ्फ… कर… और कर…” आंटी मुझे जोश भी दिला रही थीं और जल्दी भी करने को कह रही थीं ताकि कोई देख न ले और गड़बड़ न हो जाए।

एक बात थी कि उनके मुँह से कोई अभद्र शब्द नहीं निकल रहे थे… या तो वो बोलती नहीं थीं या फिर मेरे साथ पहली बार चुदाई करने की वजह से खुल नहीं पा रही थीं।

खैर मैंने अब अपनी स्पीड को और भी बढ़ा दिया और ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा। पलंग के पाए चरमराने लगे थे और लंड और चूत के मिलन की मधुर ध्वनि पूरे कमरे में गूंजने लगी थी। मैं अपनी मस्त गति से उन्हें चोदे जा रहा था और अब आंटी ने भी अपनी कमर को ऊपर उठाकर लंड को पूरी तरह से निगलना शुरू कर दिया था।

घप्प्प… घप्प्प्प… घप्प्प… घप्प्प… बस यही आवाजें निकल रही थीं हमारे हिलने से….

करीब 10 मिनट तक ऐसे ही लंड पेलते पेलते मैंने उनकी टाँगे छोड़ दी और हाथों को आगे बढाकर उनकी चूचियों को थाम लिया। चूचियाँ मसलकर मसलकर चुदाई करने का मज़ा ही कुछ और है और औरतों को भी इसमें चुदाई का दुगना मज़ा आता है।

लंड और चूत दोनों हो कल रात से तड़प रहे थे इसलिए अब चरम पे पहुँचने का वक़्त हो चला था। लगभग 20 मिनट के बाद मैंने एक बार फिर से उनके टांगों को अपने कंधे पे रख कर ताबड़तोड़ धक्कम पेल शुरू कर दी और उनके चूत की नसों को ढीला कर दिया।

“हाँ… हाँ… ऐसे ही कर… और जल्दी… और जल्दी… कर मेरे सोनू… और तेज़… आऐईईई…” आंटी मस्त होकर सिसकारियाँ भरने लगीं और मुझे और तेज़ चुदाई के लिए उकसाने लगीं।

“उफफ्फ… मैं आई… मैं आईई… ओह्ह्ह… ओह्ह्हह… आआऐ ईईइ।” आंटी के पैर अकड़ गए और वो एकदम से ढीली पड़ गईं।

अचानक हुई तेज़ चुदाई से आंटी अपने चरम पे पहुँच गईं और अकड़ कर अपने चूत से कामरस की बरसात करने लगी जो सीधा मेरे लंड के सुपारे को भिगो रही थी। चूत के अन्दर लंड पे हो रही गरम गरम रस की बरसात ने मेरे सब्र का बाँध भी तोड़ दिया और मैंने भी एक जोर के झटके के साथ अपने लंड की पिचकारी उनके चूत के अन्दर छोड़ दी…

“अआह्ह… आह्ह्ह्ह… अआह्ह… उम्म्मम्म।” मेरे मुँह से बस ये तीन चार शब्द निकले और मैंने ढेर सारी पिचकारियों से उनकी चूत को सराबोर कर दिया।

हम दोनों पसीने से लथपथ हो चुके थे और एक दूसरे से चिपक कर लम्बी लम्बी साँसें ले रहे थे।

एक घमासान चुदाई के बाद हम शिथिल पड़ गए और करीब 10 मिनट तक ऐसे ही लेटे रहे। फिर आंटी ने मेरे सर पे हाथ फेरा और मेरे कानों में धीरे से कहा, “अब उठ भी जा….बहुत देर हो गई है।”

मुझे भी होश आया, मैं उनके ऊपर से उठा और अपने लंड को उनकी चूत से बाहर खींचा।

‘पक्क !’ की आवाज़ के साथ मेरा लंड उनकी चूत से बाहर आ गया और उनकी चूत से हम दोनों का मिश्रित रस टपक कर नीचे फर्श पर बिखर गया। आंटी ने अपने साड़ी के नीचे के साए से अपनी चूत को पौंछा और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दी।

आंटी ने जैसे ही अपनी चूत पोछ कर साफ़ की मैंने झुक कर एक पप्पी ले ली और उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उठा दिया। आंटी उठ कर अपनी साड़ी ब्लाउज और ब्रा को ठीक करने लगी और सब ठीक करके मेरे सीने से लग कर मेरे चेहरे पे कई सारे चुम्बन दे कर मेरे लंड को अपने हाथों से पकड़ कर झुक कर फिर अन्त में उस पर भी एक चुम्बन ले लिया।

“आज से तुम मेरे हुए… मेरे शेर…” आंटी ने मेरे लंड को चूमते हुए कहा और फिर मुस्कुरा कर मुझे देखकर दरवाज़े की तरफ बढ़ गईं।

मैंने अपना लोअर ऊपर किया और उन्हें जाते हुए देखता रहा। उनके जाते ही मैं बाथरूम में गया और अपने लंड को साफ़ कर लिया क्यूंकि प्रिया कभी भी आकर मेरे लंड को अपने हाथों में ले सकती थी और अगर लंड को इस हालत में देखती तो सवालों की झड़ी लग जाती और शायद मैं उसे कुछ भी समझा नहीं पाता।

मै बाथरूम से निकल कर कमरे में आकर बिस्तर पे गिर पड़ा। चुदाई की थकान जरूर थी। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। समझ नहीं पा रहा था कि जो कुछ हो रहा था उसे अपनी जीत समझू या हार? । जो कुछ घट रहा था वह मेरे लिये अभिमान का विषय था या फिर आने वाले कल के लिये गले का फन्दा? प्रिया से मैं बेहद प्यार करता था, रिंकी स्वर्ग का सुख देनें वाली अप्सरा थी और आंटी मेरे दिल की रानी। मैं प्रिया के लिये जरूरत पड़नें पर कुछ भी और सब कुछ छोड़ सकता था लेकिन बाकी दोनों को भी मैं छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन यह सारा खेल ऐसे ही ढ़के छुपे कितने दिनों तक चल सकता था इसका मेरे पास आज कोई जवाब नहीं था।

इन सब मे न मेरी कोई पहल नहीं थी और न ही मेरी कोई गलती। पेड़ से आम टपकता है इस तरह अचानक से तीन दिन के भीतर ही तीनों एक के बाद एक खुद ब खुद मेरी झोली में आ गिरी थीं। तीनों ही पतिंगे की तरह दीपक की लौ में झुलस जाने को बेताब थीं। लेकिन कल को सारा भेद खुल जानें पर जिम्मेदार सिर्फ मैं ही ठहराया जाऊगा। यह सब सोच कर मुझे पसीना आने लगा था।

end
 
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