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कांता की कामपिपासा

ये सुनकर कांता बरामदे के बाहर की तरफ रखी हुई लकड़ियाँ लाने के लिए बाहर चली गयी. और जब लौटी तो उसके हाथ मे कुछ पतली पतली लकड़ी की टहनियाँ थी. स्वामी जी हवन सामग्री को आपस मे मिला रहे थे. हवन सामग्री मे पंचमेवा, घी, कपूर आदि विभिन्न प्रकार की खुश्बुदार और शीतल वस्तुएँ थी. जिसकी वजह से पूरा कमरा सुगंधित हो रहा था. स्वामी जी ने उन लकड़ियो को हवन कुंड मे रखने के लिए कहा. लड़की रख ने बाद स्वामी जी ने उसमे एक रूई की मोटी बाती को पूरी तरह घी मे डुबोया और उसे हवन मे रखी लकड़ियो के बीच मे रख दिया. फिर उन्होने कांता को वहाँ बिछे रखे हुए कंबल पर बैठने का इशारा किया, जब कांता वहाँ बैठ गयी तो स्वामी जी ने कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी कांता अब हमे इस कमरे के वातावरण को शुद्ध करना है. क्योकि भगवान शुद्ध वस्तु को ही ग्रहण करते है इसलिए मैं पहले इस वातावरण की सुगंधित और स्वच्च्छ बनाउन्गा.

ये कहकर स्वामी जी ने कुंड मे रखी हुई लड़कियो मे रखी हुई बाति को प्रज्वलित कर दिया. कुछ ही देर मे कुंड से हल्की आग की लपटें उठने लगी. अब स्वामी जी ने मंत्रो का उच्चारण करते हुए उसमे हवन सामग्री डाली. हवन सामग्री की आग मे जाते ही पूरा हॉल सुगंधित हो उठा. तत्पश्चात स्वामी जी ने कांता से कहा.

स्वामी जी: बेटी अब हमे भी एक दूसरे के शुद्ध करना होगा. ऐसा करो पहले तुम मुझे शुद्ध करो,

ये कहकर स्वामी जी ने एक गंगाजल की बॉटल निकाली और उसे पानी मे मिला दिया और कांता को देते हुए बोले:

स्वामी जी: बेटी इसे मेरे चारों तरफ घूम कर मेरे शरीर पर छिड़काव कर दो. और ये कह कर स्वामी जी अपने स्थान पर खड़े हो गये. कांता अपने हाथ की अंजुलि मे पानी भर भर कर स्वामी जी के सारे शरीर को गीला करने लगी. ऐसा करने से स्वामी जी लगभग आधे भीग चुके थे. फिर स्वामी जी ने वहाँ रखे हुए अपने अन्गोछे (तौलिया टाइप एक कपड़ा) की तरफ इशारा करते हुए कहा.

स्वामी जी: बेटी अब इस से मेरे बदन को पोछ दो.

कांता ने हामी मे सिर हिलाते हुए अन्गोछा उठा लिया और स्वामी जी के शरीर को अपने कोमल हाथो से पोच्छने लगी. स्वामी जी की पीठ पोन्छते हुए कांता ने एक नज़र विशाल पिच्छवाड़े पर डाली जिसपर धोती गीली होने की वजह से चिपकी हुई थी. कांता ने जब उनकी विशाल गान्ड का जायजा लिया तो पाया कि वैसे तो उनके कूल्हे बहुत बड़े थे मगर काफ़ी पुष्ट थे कुल्हों के दोनो तरफ बाहर की साइड कूल्हे अंदर की तरफ कुछ धन्से हुए थे. (ऐसे कूल्हे वाले लोग जब चुदाई करते है तो काफ़ी ज़ोर लगाकर करते है, ये एक वास्तविक सत्य है)

फिर कांता ने उनके कंधे पोछे. उनके मांसल और मजबूत कंधों को देखकर कांता का दिल उनपर रीझ गया. अब कांता स्वामी जी के ठीक सामने खड़ी होकर उनके सीने को पोंच्छ रही थी. स्वामी जी के सीने पर बहुत घने बाल थे जो कि कांता की उंगलिओ से टकरा रहे थे. जब कांता ने स्वामी जी की मर्दानी छाती पर हाथ फिराया तो स्वामी जी का अपने पे संयम रखना मुश्किल हो गया. लेकिन स्वामी जी भी पहुचे हुए खिलाड़ी थे उन्होने अपने अंदर के रोमाच को चेहरे पर नही आने दिया. अब कांता स्वामी जी का बदन पोंच्छ चुकी थी.

अब स्वामी जी ने कांता को उसके स्थान पर खड़े होने की लिए कहा और स्वयं उसके उपर जल का छिड़काव करने लगे. जब वो कांता के पीछे जल छिड़क रहे थे तब उन्होने एक बार फिर कांता की विशाल गान्ड पर नज़र डाली और हल्के से मुस्करा दिए. उन्होने पानी को अंजुलि भरकर पहले कांता की मे पीठ पर पानी डाला उसके बाद दूसरी अंजुलि भरकर उन्होने ने कांता के विशाल चुतड़ों की दरार पर फेक दिया. इसके बाद उन्होने एक बार और जान बुझ कर एक अंजुलि पानी और उसी जगह दोबारा फेक दिया, जिस से कांता को पूरा पिच्छवाड़ा गीला हो गया और उसका पेटिकोट उसके दोनो नितंबों पर चिपक गया और उसकी गान्ड का क्रॅक उजागर होने लगा

 


स्वामी जी का मन हुआ कि वो उसकी मस्त गान्ड को सहलाएँ. मगर उन्होने अपनी भावनाओ पर काबू रखा. कांता भी तिरछी नज़र से देख रही थी कि स्वामी जी उसकी विशाल हांड़ी को देख रहे थे.

कांता भी स्वामी जी की इस शरारत से बहुत खुश थी.

अब स्वामी जी कांता के आगे आ गये. और उन्होने अपनी अंजुलि मे पानी भरकर उसके सीने पर छिड़का. पानी उसके दोनो बड़े स्तनों के बीचे मे से हल्की बूंदे छोड़ता हुआ नीचे की ओर बह निकला. अब उसके दोनो अधखुले स्तनों पर पानी की बूंदे किसी सबनम की तरह प्रतीत हो रही थी.

स्वामी जी ने दोबारा अंजुलि मे भरकर उसी जगह पानी के छींटे मार दिए. और कांता का अधखुला ब्लाउस लगभग पूरा गीला हो चुका था, और उसका ब्लाउज उसके बदन से बिल्कुल चिपक गया था.

स्वामी जी की लंबाई कांता से लगभग 6"7" लंबी थी जिस के कारण स्वामी जी को कांता की मोटी मोटी चुचियाँ उसके खुले हुए गले और डीप ब्लाउस से लगभग स्पष्ट नज़र आ रही थी. कांता का मंगल सूत्र उसकी दोनो चूचियो की घाटी मे लटका हुआ था जो उसके स्तनों को और मादक बना रहा था.

स्वामी जी ने जी भरकर कांता के मदमस्त जोबन का दीदार किया. उसके बाद स्वामी जी ने कांता की नाभि मे एक अंजुलि पानी लेकर फेका. एक छ्ह्ह्ह्हाअप्प्प्प्प्प्प्प की आवाज़ के साथ पानी कांता के पेट से टकराया और उसका पूरा पेट गीला हो गया. अब स्वामी जी ने अपने हाथ मे वहाँ रखा हुआ अपना अंगोछा (तौलिया टाइप कपड़ा) लिया और फिर कांता के बाए हाथ को उस से पौन्छने लगे. उसका हाथ पोन्छते हुए कांता के पीछे आ गये और उन्होने कांता की पीठ पर अंगोछा इस तरफ रखा कि उनकी हथेली कांता की अधखुली पीठ को भी टच कर सके. और फिर वो अन्गोछे से पीठ पोच्छने के साथ साथ ही हल्के हल्के उसे अपने हाथो से स्पर्श भी करने लगे. उनके हाथो को स्पर्श कांता को बड़ा ही मीठा एहसास दिला रहा था. स्वामी जी लगभग 2 मिनिट तक कांता की अधखुली पीठ को अपने हाथो से स्पर्श करते रहे. फिर उन्होने एक नज़र कांता की भीगी हुई गान्ड पे डाली. और कांता से बोले:

स्वामी जी: माफफफफफ्फ़ करना बेटी मैने तो तुम्हारा पिच्छवाड़ा पूरा ही भिगा दिया... लेकिन तुम घबराओ मत बेटी मैं अभी इसे पोछ्कर सूखा देता हूँ.

ये कहकर स्वामी जी ने अपनी दोनो हथेलियो पर अपना अंगोछा रखा और उसे कांता के दोनो मोटे मोटे कुल्हो पर रख दिया. कांता अपनी गान्ड पर स्वामी जी के हाथो का स्पर्श पाकर चिहूक उठी. ये बात स्वामी जी को भी महसूस हो गयी.

स्वामी जी बात ना बिगड़े इस गरज से बोले:

स्वामी जी: बेटी अगर तुम्हे कोई आपत्ति हो तो मैं तुम्हे टच नही करूँगा (स्वामी जी ये जानते थे कि कांता के बस मे ना करना नही था)

कांता: नही स्वामी जी ऐसी कोई बात नही है......... दरअसल आपके हाथ का स्पर्श Mएऱेए उस जगह होने पर मैं थोड़ी असहज हो गई..... लेकिन अब ठीक हूँ आप आपना काम जारी रखिए.

स्वामी जी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खेल गयी. अब वो अपनी दोनो हथेलियो को कांता के विशाल चुतड़ों पर फिराने लगे.

 
स्वामी जी बात ना बिगड़े इस गरज से बोले:

स्वामी जी: बेटी अगर तुम्हे कोई आपत्ति हो तो मैं तुम्हे टच नही करूँगा (स्वामी जी ये जानते थे कि कांता के बस मे ना करना नही था)

कांता: नही स्वामी जी ऐसी कोई बात नही है......... दरअसल आपके हाथ का स्पर्श Mएऱेए उस जगह होने पर मैं थोड़ी असहज हो गई..... लेकिन अब ठीक हूँ आप आपना काम जारी रखिए.

स्वामी जी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खेल गयी. अब वो अपनी दोनो हथेलियो को कांता के विशाल चुतड़ों पर फिराने लगे.

कांता भी बैठे बैठे ही मज़े से अपनी गान्ड को स्वामी जी से दब्वा रही थी. स्वामी जी ने कांता के कुछ और करीब हो गये, और कांता के कान मे फुसफुसाए:

स्वामी जी: बेटी काँताआ आ,. अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ?

कांता: (थोड़ी नशीली आवाज़ मे) हाँ स्वामी जी बोलिए.

स्वामी जी: बेटी तुम्हारे कूल्हे तो बहुत विशाल है. विशाल कूल्हे मर्दो को आकर्षित करते है. तुम्हारे कूल्हे सचमुच बड़े ही मोहक है. इन पर कोई भी फिदा हो सकता है.

ये सुनकर कांता थोड़ी सी झेंप गयी मगर उसने कोई उत्तर नही दिया.

अब स्वामी जी ने कांता की गान्ड पर से अपना हाथ हटाया और अपने दोनो हाथों को कांता के सपाट पेट पर रख दिया और उसके पेट पर लगी पानी की बूँदो को पोन्छ्ने लगे. कुछ देर कांता के पेट पर हाथ फिराने के बाद स्वामी अपना हाथ उपर की ओर सरकाने लगे .

इस क्रिया मे उनका हाथ कांता के स्तनों से टकरा गया, स्वामी जी ने हल्के हाथों से उसके स्तनों का जाएजा लिया और कपड़े से उसके दोनो स्तनों के बीच के हिस्से को पोंच्छने लगे. अब उनके दोनो हाथ कांता की चुचियो के इर्द गिर्द थे,

स्वामी जी: तो अब इस बात को समझ लो कि तुम जो भी मेरे साथ कर रही हो ये सब मैं तुमसे नही करवा रहा हूँ . ये तो सब भगवान करवा रहे रहे. हम लोग तो केवल उनके इशारे पर चलने वाले एक तुच्छ मानव होते है. इसलिए तुम अपने मन से किसी भी प्रकार की शंका हो तो उसे निकाल दो. और पूरे तन मन से भवन की सेवा करो. भगवान तुमसे अवश्य प्रसन्न होंगे.

(अब कांता समझ गयी थी कि स्वामी जी ने अपना इरादा और आगे बढ़ने का बना लिया है. कांता मन ही मन स्वामी जी के दिमाग़ की दाद दे रही थी कि उन्होने कैसे भूमिका बनाकर अपने असली हवन की तरफ बढ़ रहे थे. अब कांता भी जल्दी से जल्दी अपना असली हवन शुरू करवाना चाहती थी. तभी उसने देखा कि स्वामी जी ने वहाँ रखे झोले मे से एक इत्र की शीशी निकाली और उसे कांता की ओर बढ़ाते हुए बोले)

स्वामी जी: लो बेटी इसे मेरे शरीर पर छिड़क दो.

कांता ने वो शीशी लेकर जैसे ही स्वामी जी के उपर छिड़का पूरे हॉल मे से अति सुगंधित खुसबू आने लगी.

इत्र की खुश्बू बड़ी ही मनमोहक थी. उसके बाद स्वामी जी ने कांता से वो शीशी ले ली और उसको कांता के तन पर छिड़कने लगे. उसके बाद स्वामी जी ने दूसरी शीशी निकाली और कांता को देते हुए बोले.

स्वामी जी: ये लो बेटी ये सुगंधित तेल है. इसे तुम अपने हाथों से मेरे पूरे शरीर पर मल दो.

 
कांता ने उस शीशी को अपने हाथों मे ले लिया. तब तक स्वामी जी ने अपनी एक बाँह कांता के आगे कर दी. कांता ने शीशी से कुछ तेल निकाला और अपने दोनो हाथों को स्वामी जी की बाँह पर रख दिया और अपने कोमल हाथों से स्वामी जी की बालिस्ट भुजाओ पर आहिस्ता आहिस्ता तेल लगाने लगी. कांता के मुलायम हाथो का स्पर्श स्वामी जी को बहुत ही आनंदित कर रहा था. कांता भी बड़े ही प्यार से उन्हे तेल लगा रही थी. कुछ देर तक उस हाथ की मालिश करने के बाद कांता स्वामी जी के दूसरे हाथ पर भी मालिश करने लगी.

इस बीच स्वामी जी कांता को प्यासी नज़रों से देख रहे थे.

कांता की नज़र कभी कभी स्वामी जी से मिलती तो वो हल्के से शरमा कर अपनी नज़रें झुका लेती. दोनो की ज़ुबान बंद थी लेकिन बात फिर भी हो रही थी. जब कांता स्वामी जी के दूसरे हाथ पर भी तेल से मालिश कर चुकी तो स्वामी जी ने उसे अपनी पीठ पर मालिश करने का इशारा किया.

लेकिन सहसा कुछ सोच कर बोले.

स्वामी जी: बेटी कांता मैं लेट जाता हूँ ताकि तुम्हे तेल लगाने मे ज़्यादा परेशानी का सामना ना करना पड़े.

कांता: जैसा आप उचित समझे

स्वामी जी:अब स्वामी जी उस गद्दे रुपी कंबल पर पेट के बल लेट गये,

अब कांता ने स्वामी जी के पास बैठ कर उनकी पीठ पर तेल डाला और फिर अपने नरम नरम हाथों से हल्के हल्के मसाज करने लगी. धीरे धीरे कांता की झिझक दूर होती जा रही थी. अब वो अपने हाथों को पूरी तल्लिनता के साथ स्वामी जी की चौड़ी पीठ पर घुमा रही थी. और स्वामी जी के बलिशट शरीर को निहार रही थी.

तभी स्वामी जी ने कांता से कहा:

स्वामी जी: तुम मेरे उपर आ जाओ और ज़रा सा दम लगा कर मालिश करो. केवल उपर से ही मत सहलाओ.

स्वाजी जी की बात सुन कर कांता स्वामी जी के पैरो के उपर अपनी दोनो टांगे चौड़ी कर के बैठ गयी, जिससे उसकी विशाल गान्ड का स्पर्श स्वामी जी अपने पैरो पर महसूस कर रहे थे. कांता उनके कंधे तक मालिश करने के लिए आगे की ओर झुकती तो उसके अधनंगे अनार स्वामी जी की पीठ से बस कुछ ही दूर रहते थे.

अब कांता ने अपने हाथों का दबाव बढ़ा दिया. अब उसके हाथ स्वामी जी की कमर से स्वामी जी के विशाल कंधो तक चल रहे थे. कांता रह रह कर स्वामी जी के विशाल कुल्हो को भी निहार रही थी.

स्वामी जी भी बड़े आनद विभोर हो रहे थे.

स्वामी जी -बेटी तुम मेरी सेवा नही बल्कि भगवानी की सेवा कर रही हो. और भगवान की सेवा मे कैसी शरम. अपनी इस झिझक को अपने पर हावी ना होने दो, और मेरी जाँघो के उपरी हिस्से की भी मालिश करो.

 


कांता स्वामी जी के इस कथन को सुनकर दो पल के लिए ठहर गयी. फिर कांता ने सोचा कि अगर वो आगे नही बढ़ेगी तो उसका ये हवन भी आगे नही बढ़ेगा ये सोच कर उसके हाथ एक बार फिर स्वामी जी की धोती को ऊपर की ओर उठाने लगी. जब स्वामी जी की धोती कांता जाँघो से उपर करने की कोशिस कर रही थी तभी स्वामी जी का स्वर उसके कानो मे पड़ा.

स्वामी जी: बेटी,. धोती से थोड़ी उलझन हो रही होगी. इसलिए मैं इसे खोल देता हूँ. और ये कहकर स्वामी जी उठ खड़े हुए और कांता के तरफ अपनी गान्ड कर के उन्होने धोती खोल कर एक तरफ रख दी. धोती के खुलते ही स्वामी जी का विशाल पिछ्वाडा कांता के सामने उजागर हो गया. स्वामी जी ने एक लंगोट बाँधी हुई थी.

स्वामी जी ने लाल रंग के लंगोट पहने हुई थी. जिसमे उनके विशाल कूल्हे बड़ी मुश्किल से आधे ढके हुए थे. उनकी अंदर की जाँघो मे काफ़ी मात्रा मे बाल उगे हुए थे. उनकी जांघे काफ़ी हस्ट पुस्त थी. उनकी जांघे ऐसे लग रही थी जैसे कोई लकड़ी का मोटा तना हो. स्वामी जी अपनी धोती खोलने के बाद बिना कुछ कहे फिर उसी मुद्रा मे लेट गये जिस मुद्रा मे वो पहले लेटे हुए थे.

कांता भी चुपचाप बैठ कर उनकी जाँघो के उपर तेल गिरा कर अपने सुंदर हाथों से उनकी मोटी मोटी जाँघो पर मस्साज़ करने लगी. कांता के हाथ स्वामी जी की अधनंगी गान्ड पर फिरने लगे. अब स्वामी जी का कंट्रोल अपने उपर से हटने लगा था. नीचे दबा हुआ उनका लिंग अब बग़ावत करने पर उतर रहा था.

कांता के हाथ जब स्वामी जी की आंतरिक जाँघो मे जाता था तो स्वामी जी के साथ साथ कांता भी सिहर उठी थी वो दोनो हाथों से स्वामी जी के मोटे मोटे कुल्हों को सहला रही थी. अब कांता के निचले भाग मे भी कुछ हरकत सी होने लगी थी.

अब उसका योनि द्वार भी थोड़ा थोडा मदहोश होने लगा था. कांता और स्वामी जी की मस्ती का आलम अब बढ़ता ही जा रहा था. अब कांता मस्त होकर अपने होंठो को अपने दांतो से काटने लगी थी. अब कांता पूरी तरह से स्वामी जी के साथ हवन करना चाहती थी..

स्वामी जी जानते थे कि कांता अब काफ़ी मस्त हो चुकी है. लेकिन स्वामी जी पहले कांता की सारी झिझक, और शरम को दूर करना चाहते थे. क्योकि वो जानते थे जब कांता खुल कर साथ देगी तभी इस हवन का असली मज़ा आएगा. स्वामी जी ने कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी कांता , अब तुम मेरे शरीर के आगे वाले हिस्से पर मालिश करो. पीछे के हिस्से की तो मालिश हो चुकी है. ये कह कर स्वामी जी अपनी जगह पर लेटे लेटे ही करवट बदल लिए. अब वो पीठ का बल लेटे हुए थे.

उनके सामने लेट ते ही कांता की आँखो के सामने उनका लंगोट वाला हथियार लंगोट के उपर से ही अपने होने का अहसास कराने लगा. उनका लंगोट आगे से बहुत फूला हुआ था जिससे कांता ने देखते ही ये अंदाज़ा लगा लिया की स्वामी जी का केला वास्तव मे बड़ा और मोटा था.

 
स्वामी जी: बेटी कांता , अब तुम मेरे शरीर के आगे वाले हिस्से पर मालिश करो. पीछे के हिस्से की तो मालिश हो चुकी है. ये कह कर स्वामी जी अपनी जगह पर लेटे लेटे ही करवट बदल लिए. अब वो पीठ का बल लेटे हुए थे.

उनके सामने लेट ते ही कांता की आँखो के सामने उनका लंगोट वाला हथियार लंगोट के उपर से ही अपने होने का अहसास कराने लगा. उनका लंगोट आगे से बहुत फूला हुआ था जिससे कांता ने देखते ही ये अंदाज़ा लगा लिया की स्वामी जी का केला वास्तव मे बड़ा और मोटा था.

स्वामी जी ने जब देखा कि कांता उनके लंगोट को बड़े ही ध्यानपूर्वक देख रही है तो वो मन ही मन बहुत खुस हुए.

अब दोनो के दूसरे के आमने सामने थे. इतना सब कुछ होने के बाद भी कांता स्वामी जी से नज़रें मिला कर बात नही कर पा रही थी. इस बात से स्वामी जी ने सही अंदाज़ा लगा लिया कि अभी कांता की शरम पूरी तरह से दूर नही हुई है. उन्होने कांता की झिझक को और दूर करने के लिहाज़ से कांता से कहा:

स्वामी जी: बेटी कांता,. अब टाँगो की तो मालिश हो चुकी है. अब तुम ऐसा करो मेरे पेट और सीने पर भी तेल लगा दो. तुम मेरे कमर के ऊपर बैठ जाओ इस पोज़िशन मे तुम तेल अच्छी तरह से लगा सकोगी.

कांता समझ गयी कि स्वामी जी कि कमर पर बैठने का मतलब है कि उनके लंड पे बैठना. कांता ने थोड़ा सा झिझकते हुए अपनी टाँगो को स्वामी जी की कमर के दोनो तरफ फैलाया और स्वामी जी के केले की जगह से थोड़ा नीचे की ओर बैठी. लेकिन कांता पेटिकोट पहने हुई थी इसलिया उसके घुटने ठीक से नही मूड पा रहे थे जिसके कारण वो ठीक पोज़िशन मे नही बैठ पा रही थी.

ये देख स्वामी जी ने कहा.

स्वामी जी: अरे बेटी,. तुम अपने पेटिकोट को घुटनों से उपर तक सरका के थोड़ा सा उपर होकर बैठ जाओ

कांता स्वामी जी के थोड़ा उपर होने का मतलब समझ रही थी. स्वामी जी का इशारा लंड पर बैठने से था. कांता ने स्वामी जी की बात को समझते हुए खड़े होकर अपने पेटिकोट को अपने घुटनो से उपर तक उठा दिया. नीचे लेटे होने के कारण स्वामी जी को उसकी जाँघ का आंतरिक हिस्सा भी नज़र आ रहा था. कांता की जांघे काफ़ी मांसल और बिल्कुल सफेद रंग की थी.

उसके बाद कांता ने स्वामी जीके उभरे हुए लंड पर अपनी मदमस्त करने वाली बड़ी गान्ड को बड़े ही प्यार से टिका दिया, अब कांता अपने दोनो घुटनो को मोड़ कर स्वामी जी ऊपर आराम से बैठ गयी. स्वांजी जी कांता की गान्ड का स्पर्श अपने लंड पर महसूस कर रहे थे. कांता को भी ये अहसास होने लगा कि उसके पीछे के द्वार कोई नया मेहमान आ गया है. कांता बिना स्वामी जी से नज़रें मिलाए चुप चाप अपना काम करने लगी. उसने तेल की शीशी मे से कुछ तेल निकाला और उसे स्वामी जी की चौड़ी छाती पर मलने लगी. स्वामी जी की छाती बालो से पूरी भरी हुई थी जो कांता को एक शक्तिशाली और मर्दाना छाती होने का अहसास करा रही थी. कांता जब स्वामी जी के कंधे तक मालिश करने के लिए आगे की ओर झुकती थी तब उसकी दोनो चुचिया हिलते हुए क़ैद से बाहर आने के लिया बेताब हो जाती थी. स्वामी जी कांता के बड़े बड़े संतरे बड़े गौर से देख रहे थे. उसके बड़े बड़े जोबन देख कर स्वामी जी का कंट्रोल अपने आप पर से खो रहा था.

उसके कसे हुए ब्लाउज मे कांता की चूचिया किसी का भी लंड खड़ा करने के लिए काफ़ी थी. स्वामी जी उसके दोनो अनारों को देखते हुए कांता की शरम को दूर करने के गरज से अपनी बात मे कुछ और खुला पन लाते हुए बोले.

स्वामी जी: बेटी कांता तुम्हारे संतरे तो बहुत बड़े बड़े और मस्त है. ऐसे संतरों का रस पीने वाले की तो ज़िंदगी सवर जाती होगी.

कांता स्वामी जी की बाते सुनकर ज़रा झेप सी गयी. स्वामी जी कांता को बिल्कुल बेशरम बनाना चाहते थे इसलिए उन्होने फिर कहा

स्वामी जी: कांता तुमने कभी घोड़े की सवारी की है.

कांता स्वामी जी के इस स्वाल को समझ नही पाई. और उसने एक प्रश्न भरी निगाहो से स्वामी जी की ओर देखा.

स्वामी जी उसकी आँखो के भावों को समझकर बोले:

स्वामी जी: अभी तुम मेरे घोड़े की ही तो सवारी कर रही हो.

कांता अब स्वामी जी का मतलब समझ गयी कि वो घोड़ा किसे कह रहे है. अब कांता भी धीरे धीरे स्वामी जी के रंग मे रंगने लगी थी.

कांता: अरे स्वामी जी मैने तो कई (मेनी) घोड़ो की सवारी की है

स्वामी जी: तो कांता बेटी, कभी मेरे भी घोड़े पर सवारी कर के देखो. मज़ा आ जाएगा.

कांता उनकी बात सुनकर मन ही मन अपने आप से बोली तेरे घोड़े पर क्या तेरे लौडे पर भी सवारी करूँगी.

लेकिन अपने मनोभाव को दबाती हुई बोली.

कांता: अरे स्वामी जे आपका घोड़ा बड़ा ज़रूर है मगर अब बूढ़ा हो चुका है. अगर मैं आपके घोड़े पर बैठ गयी तो आपका घोड़ा तो थक कर मुँह से झाग फेक देगा..

स्वामी जी: अभी मैने अपने घोड़े के लगाम खीच रखी है इसलिए ये खड़ा नही हो रहा है.

दोनो डबल मीनिंग बातों का पूरा मज़ा ले रहे थे. कांता के हाथ अब स्वामी जी की छाती से लेकर उनके मोटे पेट पर बड़ी ही सहजता से चल रहे थे. कुच्छ देर बाद स्वामी जी ने कांता से कहा.

स्वामी जी: बेटी अब रहने दो, मालिश हो गयी है. अब मैं तुम्हारी मालिश करूँगा.

कांता भी अपने जिस्म पर स्वामी जी के हाथों के स्पर्श को महसूस करने की लिए बेताब थी.

स्वामी जी उठ कर खड़े हो गये और कांता को लेटने का इशारा किया. कांता उसी गद्दे पर पेट के बल लेट गयी. स्वामी जी ने देखा कि कांता अपने पैर को थोड़ा चौड़ा कर के लेटी हुई थी जिस से उसकी गान्ड की दरार पेटिकोट के उपर से सॉफ झलक रही थी. कांता के कूल्हे ऐसे लग रहे थे जैसे दो बड़ी हांड़ी एक साथ रखी हुई हो. कांता की गान्ड पर ज़रा सा नीचे होकर बैठे स्वामी जी का बड़ा लंड दस्तक देने लगा.

 


स्वामी जी उठ कर खड़े हो गये और कांता को लेटने का इशारा किया. कांता उसी गद्दे पर पेट के बल लेट गयी. स्वामी जी ने देखा कि कांता अपने पैर को थोड़ा चौड़ा कर के लेटी हुई थी जिस से उसकी गान्ड की दरार पेटिकोट के उपर से सॉफ झलक रही थी. कांता के कूल्हे ऐसे लग रहे थे जैसे दो बड़ी हांड़ी एक साथ रखी हुई हो. कांता की गान्ड पर ज़रा सा नीचे होकर बैठे स्वामी जी का बड़ा लंड दस्तक देने लगा.

अब स्वामी जी ने अपने हाथों मे तेल लिया और कांता का दाया हाथ मसलने लगे. कांता को अपनी गान्ड पे स्वामी जी के लंड का स्पर्श बड़ा ही मज़ा दे रहा था. स्वामी जी ने जब हाथ पर मालिश कर दिया तो उसके बाद कांता की अधनगी पीठ पर तेल की बूंदे गिराने लगे. तेल गिराने के बाद स्वामी जी ने उसकी पीठ पर अपनी दोनो हथेलिया रखी और बड़े ही सेक्सी स्टाइल मे मालिश करने लगे. जब स्वामी जी मालिश करते हुए अपने हाथ आगे पीछे करते तो उनका हाथ कांता के ब्लाउज से बार बार उलझ जाता. इस से स्वामी जी के मालिश करने का रिदम टूट जाता था. इसलिए स्वामी जी ने कांता से कहा.

स्वामी जी: अरे बेटी मालिश करने पर तुम्हारा ब्लाउज मेरे हाथों मे उलझ जा रहे हैं और मालिश ठीक से नही हो पा रही है अगर तुम कहो तो,.

तभी कांता स्वामी जी की बात को बीच मे से काट कर बोली कांता: अर्र्र्र्र्रररी ईई तूऊऊऊऊऊऊओ, खूऊऊल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल,. दीजिए ना मेरे ब्लाओजस्स्स्स्सस्स को,. और खुल्ल्ल्ल ल्ल्ल्ल्ल नही पा रहा है तो इसे फाड़ दीजिए मगर मालिश ढंग से कीजिए.

स्वामी जी कांता की बात सुनकर ये समझ गये कि अब धीरे धीरे आग बढ़ रही है) स्वामी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए कांता के ब्लाउज की डोरी को खोलने लगे.

अब उनका लंड भी नींद से जाग चुका था और वो भी बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहा था. स्वामी जी के हाथ कांता के ब्लाउज की डोरी पर रेंग रहे थे.

स्वामी जी: मेरे ज़ोर लगाने से तुम्हारी गान्ड मे दर्द तो नही हो रहा है ना कांता?

कांता ने बेशरामी की हद को पार करते हुए कहा.

कांता: मेरी गान्ड को दर्द सहने का काफ़ी एक्सपीरियेन्स है आप तो जितने ज़ोर से रगड़ सकते है उतने ज़ोर से रगड़िए. मेरी गान्ड के नही अपने लंड के बारे मे सोचिए

.स्वामी जी: लगता है तुम्हरी गान्ड को काफ़ी एक्सपीरियेन्स है वजन झेलने का.

कांता: वजन झेल झेल कर ही तो ये गान्ड इतनी चौड़ी और मोटी हुई है स्वामी जी.

कांता की बात सुनकर स्वामी जी समझ गये कि कांता के शरीर मे काम जवाला लग चुकी थी. अब स्वामी जी ने अपने हाथों को सरका कर धीरे धीरे कांता के स्तन तक ले गये और साइड से ही उसके दोनो स्तनों को अपने दोनो हाथों से सहलाने लगे और सोचने लगे कि कांता अब क्या करेगी?

कांता ने देखा कि स्वामी जी केवल साइड से ही उसकी चूचियो को सहला रहे है तो वो स्वामी जी से बोली

कांता: स्वामी जी,. ज़रा मेरे जोबन का भी तो ख़याल कीजिए. इनकी भी तो मालिश कर दीजिए और इतना कहकर कांता ने स्वामी जी को उठने का इशारा किया.

स्वामी जी के उठते ही कांता उठ कर बैठ गयी और अपने शरीर से अपने खुले हुए ब्लाउज को अलग करने लगी. कपड़े उतारते हुए वो जिस तरह से मुस्करा रही थी उसको देखकर स्वामी जी समझ गये कि कांता आज बेशरामी की हद को पार कर एक नया रेकॉर्ड बनाने वाली है.

जैसे ही कांता ने अपना ब्लाउज अलग किया उसमे क़ैद दोनो बड़े बड़े संतरे अपना चूचक रूपी सिर उठाकर खुली हवा का आनंद लेने लगे.

स्वामी जी ने कांता की बड़ी बड़े सफेद रंग की मुलायम चूचियो को बड़े गौर से देखा. कांता की चूचियो के निप्पल 1 इंच से भी बड़े थे भूरे रंग के थे. इतनी बड़े चुचे और चूचक उन्होने पहले कभी नही देखे थे.

स्वामी जी को अपनी नंगी चूचियों को घुरते हुए देख कांता ने बड़ी ही बेशरामी से कहा:

कांता: क्या सोच रहे है स्वामी जी?

स्वामी जी: लगता है तुम्हारी चूचियो को भी काफ़ी एक्सपीरियेन्स है दबने का.

कांता: तो आप को किसने रोका है आप भी खुल कर दबाइए इन्हे.

कांता की बात सुनकर स्वामी जी ने अपने हाथ मे तेल लगाते हुए कांता के पीछे से ही अपना हाथ बढ़ाकर उसके विशाल जोबन पर रख दिया. कांता ने भी चिहुक कर अपनी गान्ड को स्वामी जी के लंड पर रगड़ दिया.

अब स्वामी जी अपने दोनो हाथों से कांता के दोनो जोबन को मसल रहे थे. तभी कांता ने मदभरी आवाज़ मे कहा:

कांता: स्वामी जी,. ज़रा ठीक से पकड़ कर ज़ोर से दबाइए ना इनको, ये प्यार से सहलाने वाली नही ज़ोर से दबाने वाली चीज़ है स्वामी जी.

कांता की बात सुनकर एक बार तो स्वामी जी भी हतप्रभ रह गये. लेकिन अगले ही पल अपने आपको संभालते हुए अपने दोनो हाथों मे और तेल लगाकर कांता की चूचियो को ज़ोर से मसल्ने लगे. स्वामी जी कांता की चूचियो को इतनी तेज़ रगड़ने लगे कि कांता के मूह से सिसकारी निकलने लगी. कांता पर अब हवस हावी हो चुकी थी. वो अपने इस खेल को और उत्तेजक बनाने के इरादे से बोली.

कांता: स्वामी जी,. आपको संतरे चूसने का शौक है ना,. ज़रा मेरे भी सन्तरो का रस पी कर देखिए और बताइए कि इसका रस कैसा है? ये कहकर स्वामी जी को बैठने का इशारा किया. जब स्वामी जी गद्दे पर बैठ गये. अब कांता अपनी दोनो टाँगो को चौड़ा करते हुए अपने पेटिकोट को इतना उपर उठाया कि इसकी लाल रंग की पैंटी भी नज़र आने लगी.

फिर कांता अपने जोबन को स्वामी जी के सामने करते हुए उनके लंड पर अपनी चौड़ी गान्ड टिका कर उनकी गोद मे बैठ गयी और बोली

कांता: लीजिए स्वामी जी, मैं अपने दोनो संतरे मैं आपको अर्पित करती हूँ. आप इन्हे चूस चूस इसका रस्पान करे और इसे पवित्र करे.

स्वामी जी: आज मैं तुम्हारे इस जोबन का सारा रस पी लूँगा कांता,.ये कहकर स्वामी जी ने कांता के बड़े चूचक को अपने मूह मे ले लिया और उसे चूसने लगे.

स्वामी जी: अरे बेटी ज़रा अपने विशाल कुल्हो को तो उठाओ ताकि मैं इस पेटिकोट को निकाल सकूँ.

 
स्वामी जी की बात सुनकर कांता ने लेटे लेटे ही अपनी गान्ड को उचका लिया जिस से कि नीचे दबा हुआ पेटिकोट आराम से निकल सके. जैसे ही कांता ने अपनी गान्ड उचकाई स्वामी जी ने तुरंत उसके कुल्हो के नीचे से पेटिकोट निकाल लिया और उसको उसकी दोनो टाँगो से निकालकर एक साइड रख दिया. अब स्वामी जी के सामने कांता केवल एक मात्र पैंटी मे थे. कांता की पैंटी इतनी टाइट थी कि वो उसकी कमर और जाँघो मे धँस सी गयी थी. पैंटी के अग्र भाग फूल कर आगे उभर गये थे, जो इस बात के सूचक थे कि पैंटी के अंदर की चीज़ कितनी मजबूत और मांसल है. स्वामी जी की नज़र जब कांता की गीली हुई जगह पर पड़ी तो स्वामी जी ने उसको छेड़ते हुए कहा:

स्वामी जी: अरे बेटी तुम्हारे नीचे के भाग मे तो अभी से पसीने आ गये है . लगता है कि तुम्हारी नीचे की गली अभी से लार टपका रही है.

कांता ने उनकी इस बात का कुछ जवाब नही दिया और उसने लेटे लेटे ही करवट बदल ली . अब स्वामी जी के सामने कांता की भारी भरकम गान्ड पेंटी के अंदर रहने का असफल प्रयास कर रही थी. स्वामी जी कांता की इस हरकत से समझ गये कि कांता अपने पिछवाड़े पर मालिश कराना चाहती थी.

स्वामी जी ने अपने हाथों ने तेल लगाया और कांता की दोनो मासल जाँघो पर अपने हाथ से मालिश करने लगे. कांता की जांघे इतनी सुडोल और मोटी थी कि स्वामी जी के हाथ से एक जगह पर ढंग से मालिश नही हो पा रही थी. स्वामी जी कांता की भारी भरकम गान्ड को देख कर ये सोच रहे थे कि क्या इसका प्रवेश द्वार भी इसकी गान्ड के आकार के ही अनूरूप होगा. और इस बात की शनाख्त को डोर करने के लिए स्वामी जी कांता से बोले:

स्वामी जी: कांता मैं सोच रहा हूँ कि जब तुम्हारे कूल्हे इतने बड़े है तो इसका प्रवेश द्वार भी बड़ा ही होगा?

कांता स्वामी जी का मतलब समझ गयी कि स्वामी जी के कहने का मतलब उसकी गान्ड की भीतरी चौड़ाइ से है कि ये भी चौड़ी हो गयी होगी. इस प्रश्न पर कांता चुप नही रह सकी और स्वामी जी से बोली:

कांता: अरे स्वामी जी घर चाहे कितना भी बड़ा क्यूँ ना हो दरवाजे छोटे ही होते है,

स्वामी जी: हाा आ, तुम बात तो बिल्कुल ठीक कह रही हो. और अपने हाथों को नीचे सरकाते हुए कांता की रानों तक हाथ लेजा कर उसकी रानों की मालिश करने लगे.

जैसे ही स्वामी जी के हाथ ने कांता की रानों को स्पर्श किया तो उसने मारे उत्तेजना के अपने दांतो से अपने होंठो को काट लिया स्वामी जी को भी कांता की उत्तेजना महसूस हो रही थी. स्वामी जी ने अपने हाथों का दबाव कांता की चिकनी रानों पर बढ़ाने लगे. अपनी रानों पर स्वामी जी के हाथो के स्पर्श की अभिव्यक्ति कांता के चेहरे पर सॉफ सॉफ झलक रही थी. अब स्वामी जी धीरे धीरे अपनी उंगलिओ को कांता की पेंटी मे घुसाने का कोशिश करने लगे. लेकिन पेंटी आधी टाइट होने के कारण स्वामी जी की उंगली अंदर की तरफ नही सरक पा रही थी. तभी स्वामी जी ने अपना हाथ कांता की गान्ड पर रख दिया और उसे पेंटी के ऊपर से ही मसल्ने लगे. कांता समझ गयी कि स्वामी जी अपना हाथ उसकी टाइट पेंटी मे नही घुसा पा रहे थे. इसलिए वो समझ गयी कि मालिश को और आगे बढ़ाने के लिए उसे स्वामी जी को इशारा देना होगा,

कांता: अरे स्वामी जी आप कहाँ घुसने का प्रयास कर रहे है?

स्वामी जी: अरे बेटी जब मैने तुम्हारे सारे अंगो को इस पवित्र तेल से मालिश कर के पवित्र कर दिया है तो मैं ये सोच रहा था कि तुम्हारे इस भाग को भी पवित्र कर दूं.

कांता: हाँ स्वामी जी ये बात तो आप ठीक कह रहे है अगर कोई भी अंग अपवित्र रह गया तो हवन कैसे पूरा हो सकेगा.

स्वामी जी: हाँ बेटी यही तो बात है. तभी तो मैं अपना हाथ अंदर डालने की कोशिश कर रहा था मगर ये पेंटी बहुत टाइट है. अगर तुम ये पेंटी उतार दो तो मैं तुम्हारे इस भाग को भी इस शुद्ध तेल से मालिश कर के पवित्र कर दूँगा. तुम तो जानती हो कि भगवान शिव को पवित्रता कितनीं पसंद है.स्वामी जी ने अपनी बातों को घूमाते हुए कहा

कांता जो कि समझ गयी थी कि स्वामी जी उसके उस भाग को कैसे पवित्र करेंगे, लेकिन मन ही मन वो खुद भी यही चाहती थी. इसलिए उसने स्वामी जी की हाँ मे हां मिलाते हुए कहा

कांता: तो ठीक है स्वामी जी आप मेरी पेंटी उतार कर अच्छी तरह से मालिश कर मेरे इस अंग को पवित्र कर दे.

इतना सुनकर स्वामी जी अपने दोनो हाथों से कांता की कमर मे कैसी हुई पेंटी मे उंगली डाल दी और उसे नीचे सरकाने का प्रयास करने लगे. लेकिन कांता के चूतड़ बहुत विशाल होने के कारण पेंटी कुछ ही इंच सरक पाई.

जब कांता ने ये देखा कि स्वामी जी पेंटी नही उतार पा रहे है तो उसने स्वामी जी को रुकने का इशारा किया और अपने घुटने को आगे की तरफ मोड़ कर अपनी गान्ड को हवा मे उठा दिया, और स्वामी जी से बोली

कांता: अब मेरी पेंटी को सर्काइए.

स्वामी जी: (उसके पेंटी को सरकाते हुए) अरे बेटी तुम्हरी गान्ड इतनी सुन्दर है कि तुम्हारी पेंटी भी इसे नही छोड़ाना चाहती है. अब स्वामी जी ने थोड़ी सी कॉसिश मे ही कांता की पेंटी को निकाल दिया. पेंटी निकलते ही कांता के दोनो बड़े तरबूज स्वामी जी के सामने निवस्त्र हो उठे. पेंटी खुलने के बाद उसके गान्ड की चौड़ाई और बड़ी लगने लगी थी. उसकी गान्ड इतनी गुदाज थी कि घुटनो के मुड़े हुए होने के बावजूद कांता का गुदा द्वार नही दिख रहा था. कांता की गान्ड बिल्कुल चिकनी और लाल रंग की नज़र आ रही थी. स्वामी जी कांता की गान्ड की सुडौलता देखकर बिल्कुल दंग रह गये.

 
स्वामी जी: (उसके पेंटी को सरकाते हुए) अरे बेटी तुम्हरी गान्ड इतनी सुन्दर है कि तुम्हारी पेंटी भी इसे नही छोड़ाना चाहती है. अब स्वामी जी ने थोड़ी सी कॉसिश मे ही कांता की पेंटी को निकाल दिया. पेंटी निकलते ही कांता के दोनो बड़े तरबूज स्वामी जी के सामने निवस्त्र हो उठे. पेंटी खुलने के बाद उसके गान्ड की चौड़ाई और बड़ी लगने लगी थी. उसकी गान्ड इतनी गुदाज थी कि घुटनो के मुड़े हुए होने के बावजूद कांता का गुदा द्वार नही दिख रहा था. कांता की गान्ड बिल्कुल चिकनी और लाल रंग की नज़र आ रही थी. स्वामी जी कांता की गान्ड की सुडौलता देखकर बिल्कुल दंग रह गये.

वैसे स्वामी जी क्या जिसने भी कांता की नंगी गान्ड को देखा था उसमे खो ही जाता था. आँखिर कांता की गान्ड थी इतनी पुश्ट और स्वामी जी आपने हाथ मे तेल लगाकर कांता की मोटी गान्ड की दरार मे लगाते और उसकी गान्ड मे उपर से नीचे की ओर रगड़ते.

कांता को स्वामी जी की इस गान्ड मालिश ने इतना उत्तेजित कर दिया था कि उसकी चूत के दोनो होठ गीले होने लगे थे. तभी स्वामी जी कांता कांता की गान्ड की दरार मे हाथ फेरते हुए बोले.

स्वामी जी: कांता बेटी गद्दे पर लेट जाओ,. और अपनी टाँगो को और चौड़ी कर लो.. स्वामी जी अपनी हथेलियो मे तेल लगाकर कांता की चूत की फाको मे हल्के हल्के मालिश करने लगे. स्वामी जी की हथेलियो का स्पर्श अपनी चूत पर पड़ते ही कांता की सिसकारी निकल गयी. अब स्वामी जी धीरे धीरे अपनी हाथों का दबाव कांता की चूत पर बढ़ाते ही जा रहे थे. कांता का उत्तेजना के कारण बुरा हाल था. उसकी टांगे अपने आप कुछ और खुल गयी थी. अब स्वामी जी कांता की चूत के भीतरी भाग को भी अपने हाथ से रगड़ने लगे थे.

जब स्वामी जी अपनी तेल मे डूबी उंगलियो को कांता की चिकनी चूत पर मलते तो कांता की चूत का क्लिट्र्स स्वामी जी की उंगलियो से स्पर्श हो जाता और कांता को अपने शरीर मे एक करेंट का झटका सा प्रतीत होता था. स्वामी जी की इस तेल मालिश के कारण कांता की चूत फूल कर पाव रोटी बन गयी थी. और उसकी चूत ने भी अपना मुँह खोल कर बड़ा कर लिया था जिसके कारण चूत चौड़ी हो गयी थी और उसके अंदर की मांसपेशिया सॉफ नज़र आने लगी थी. स्वामी जी अपनी उंगलिओ से कांता की चूत को चौड़ी करके उसकी चूत की गहराई को नाप रहे थे

कुछ देर बाद कांता ने अपने चेहरे के सामने एक गरम सी चीज़ को महसूस किया. उसमे से एक अजीब से गंध आ रही थी. ये गंध कांता के लिए नयी नही थी. इसलिए वो समझ गयी कि उसके चेहरे के सामने स्वामी जी का लंड है.

तभी स्वामी जी ने कांता से उसकी आँखे खोलने के लिए कहा .

कांता ने आँखे खोली और उसने ऐसा कुछ भी नही देखा जैसा कि उसने सोचा था. स्वामी जी अभी भी लंगोट मे ही थे. लेकिन उनके लंगोट की स्तिथि देखकर ये सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि अंदर का विशाल नाग बाहर आने के लिए कैसा तड़प रहा है.

स्वामी जी कांता से बोले

स्वामी जी: बेटी लो इसको अपनी हाथ से आज़ाद कराओ और इसको बहुत ही अकड़न हो रही है ज़रा अपने मुलायम और नरम हाथों से इसकी उपर से नीचे तक अच्छी तरफ मालिश कर दो.

कांता घुटने के बल बैठे बैठे ही अपने नाज़ुक हाथों से स्वामी जी का लंगोट खोलने लगी. जैसे ही लंगोट खुली स्वामी जी का खड़ा हुआ लंड एक झटके से छत की तरफ मुँह उठाकर खड़ा हो गया. कांता ने जब स्वामी जी का बालिश्ट लंड देखा तो वो देखती ही रह गयी. जितना उसने सोचा था उस से भी बड़ा और मोटा था स्वामी जी का लंड. कांता ने वैसे तो कई लंड देखे थे मगर इतना बड़ा लंड उसने पहले कभी नही देखा था. स्वामी जी ने अपनी झान्टे सफाचट कर रखी थी. स्वामी जी का फूला हुआ सुपाड़ा किसी बड़े टमाटर की तरह लाल हो रहा था. जड़ की तरफ लंड की मोटाई बहुत ज़यादा थी. कांता स्वामी जी का लंड देखकर सब कुछ भूल गयी.

ये देख स्वामी जी बोले

स्वामी जी: अरे बेटी, कहाँ खो गयी तुम अब जल्दी से इस पर मालिश कर दो.

स्वामी जी की बात सुनकर कांता ने अपने हाथों मे तेल लगाया और स्वामी जी के मुस्टंड लंड पर हाथ रख दिया. कांता ने जैसे ही स्वामी जी के लंड पर हाथ रखा उनका लंड एक झटके के साथ और ज़्यादा टाइट हो गया.

स्वामी जी: देखा बेटी, कैसे अकड़ रहा है तुम्हे देखकर मेरा लंड.

कांता: स्वामी जी घबरआईए मत आज इसकी सारी अकड़ निकाल कर इसे बिल्कुल ढीला कर दूँगी.ये कहकर कांता नीचे से उपर तक स्वामी जी के लंड पर तेल लगाने लगी. स्वामी जी का लंड इतना मोटा था क़ि कांता के हाथ मे पूरा नही आ पा रहा था. कांता कभी स्वामी जी के टोपे को सहलाती और कभी उनके लंड को अपनी मुठ्ठी मे लेकर आगे पीछे करती. स्वामी जी के लंड की नस नस फूल कर एकदम स्पष्ट दिखाई देने लगी थी

कांता के हाथों की मालिश से स्वामी जी उत्तेजित होकर सिसकारने लगे थे. उन्होने कांता से कहा.

स्वामी जी: एक बात है कांता,. तुम ने मेरे साथ बेईमानी की है.

कांता: (स्वामी जी की इस बात का मतलब नही समझ पाई, और बोली) कैसी बेईमानी स्वामी जी?

स्वामी जी: तुमने मुझसे अपने संतरे तो चूस्वा लिए लेकिन मेरे केले को तो चूसा ही नही. लगता है केला ज़्यादा ही मोटा है इसलिए तुम इस नही चूस रही हो.

अब कांता स्वामी जी के कहने का मतलब समझ गयी थी.

कांता: आपका केला इतना मोटा भी नही है कि इस मैं ना चूस पाउउउ!

स्वामी जी: अच्छा ये बात है तो ज़रा चूस कर दिखाओ. ये कहकर स्वामी जी उंगली कांता के होंठो पर फिराने लगे.

कांता स्वामी जी के इशारे को समझ कर अपने मदमस्त कामुक होंठो को स्वामी जी के लौडे के सुपाडे पर रख दिया. और अपनी जीभ को स्वामी जी के लिंग मुण्ड पर रगड़ते हुए उनके टोपे को चाटने लगी. अब स्वामी जी के लंड से एक लिसलिसा सा पदार्थ निकलने लगा था. कांता के कामुक होठ स्वामी जी के लंड के सुपाडे को धीरे धीरे अपने अंदर लेने की कोशिश कर रहे थे. स्वामी जी का लंड मोटा होने के कारण कांता को उस मुँह के अंदर घुसाने पे परेशानी हो रही थी.

ये देख स्वामी जी बोले स्वामी जी: रहने दो कांता मेरा केला चूसना तुम्हारे बस की बात नही है. ये बात स्वामी जी ने कुछ इस अंदाज़ मे कही जैसे वो कांता को अपने मुँह के अंदर अपना लंड लेने की चुनौती दे रहे हो.

कांता ने इस बात पर स्वामी जी को देखा मानो वो कह रही हो कि मुझे तुम्हारी चुनौती स्वीकार है मैं इसे अभी अपने मुँह के अंदर लेकर दिखाती हूँ. और फिर कांता अपने मूह से खूब सारा थूक निकाल कर स्वामी जी के लंड पर लगाने लगी. जब स्वामी जी का लंड पूरी तरह कांता के थूक से बिल्कुल गीला हो गया तब कांता ने अपने मुँह को पूरी तरह खोला और स्वामी जी के लंड के सुपाडे को पूरा का पूरा अपनी मुँह मे ले लिया. कांता के मुँह मे स्वामी जी का लंड किसी बाज़ की तरह लग रहा था.

 


स्वामी जी को लगा कि कांता उनका पूरा लंड अपने मुँह मे नही ले पाएगी. लेकिन ये स्वामी जी की भूल थी.

कांता स्वामी जी के लंड को अपने मूँह मे लेकर आगे पीछे करने लगी. इस से स्वामी जी का लंड धीरे धीरे कांता के मूह मे समाने लगा. अब कांता ने एक बार फिर स्वामी जी का लंड अपने मूह से बाहर निकाल दिया और उपर से लेकर नीचे लंड की जड़ को अपनी जीभ से चाटने लगी. और अपने एक हाथ से स्वामी जी के अंडकोषो को मसल्ने लगी.

कांता की इस हरकत से स्वामी जी को अपने शरीर मे करेंट का झटका महसूस हुआ. अब स्वामी जी का लंड एक दम चिकना हो गया था. कांता ने अपने मुँह को खोला और स्वामी जी के लंड को अपने मुँह के अंदर लेने लगी. इस बार कांता के मुँह की चिकनाई, स्वामी जी के लंड की चिकनाई और अपने एक्सपिरिन्स से कांता ने स्वामी जी का लंड पूरा का पूरा अपने मुँह मे ले लिया और मुँह मे ही लिए लिए आगे पीछे करने लगी. स्वामी जी की आँखे ये देखकर फटी की फटी रह गयी. कांता बड़े आराम से स्वामी जी का पूरा लंड अपने मुँह मे लेकर बड़े ही मज़े से चूस रही थी.

कांता स्वामी जी के स्टेमना को देखकर चकित रह गयी थी कि स्वामी जी का इस उमर मे ये हाल है तो जवानी मे तो पता नही क्या करते होंगे.

स्वामी जी ने भी कांता का सिर ऐसे पकड़ रखा था जैसे वो उसके मूह को चोद रहे हो. कोई 10 मिनट की लंड चुसाइ के बाद स्वामी जी ने कांता को रुकने के लिया कहा.

स्वामी जी का इशारा पाकर कांता ने ना चाहते हुए भी स्वामी जी का मस्त लंड अपने मूह से निकाल दिया. स्वामी जी ने कांता से पुछा

स्वामी जी: कांता केला कैसा लगा तुम्हे.

कांता: स्वामी जी आपका केला वाक़ई बहुत बड़ा और मोटा है. इसको चूसने मे मुझे एक नये आनद की अनुभूति हुई है. सचमुच आपका केला चूस कर मैं तो धन्य हो गयी.

स्वामी जी: बेटी तुम्हारी इस हवन प्रक्रिया से भगवान तुमसे अवश्य खुश होंगे और तुम्हे अपना आशीर्वाद देंगे.

कांता: ये सब मैं भगवान को खुश करने के लिए ही तो कर रही हूँ.

स्वामी जी: कांता मैं अब तुम्हे अंदर से पवित्र करूँगा, अब तुम ये बताओ कि पहले अपना मुख्य द्वार शुद्ध करवाओगी या पीछे का द्वार.

कांता स्वामी जी की बात से समझ गयी थी कि अब हवन का अंतिम भाग शुरू होने वाला है. उसने स्वामी जी से कहा.

कांता: स्वामी जी आप हवन के बारे मे ज़्यादा समझते है इसलिए आप जहाँ से उचित समझे वही से शुरू कर दे.

स्वामी जी कांता के मूह से यही सुनना चाहते थे. स्वामी जी कांता की विशाल गान्ड को मारना चाहते थे. इसलिए स्वामी जी कांता से बोले

स्वामी जी: बेटी मैं तो पहले इस पिच्छवाड़े को ही शुद्ध करना चाहता हूँ. तो अब तुम तैयार हो ना?

कांता ने सहमती मे अपना सिर हिलाया.

तब स्वामी जी ने कांता को गद्दे पर घुटनो और पंजो के बल खड़े होने के लिए कहा.

कांता ने तुरंत स्वामी जी की आग्या का पालन किया.

अब स्वामी जी ने कांता को सिर नीचे गद्दे पर रखने को कहा. जब कांता ने अपना सिर गद्दे पर टिकाया तो उसकी गान्ड हवा मे और उपर उठ गयी. अब स्वामी जी कांता के पीछे खड़े होकर कांता से बोले

स्वामी जी: बेटी कांता,. अपनी टांगे थोड़ी चौड़ी कर लो.

कांता ने अपनी टांगे थोड़ी और खोल दी.

 
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