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ये सुनकर कांता बरामदे के बाहर की तरफ रखी हुई लकड़ियाँ लाने के लिए बाहर चली गयी. और जब लौटी तो उसके हाथ मे कुछ पतली पतली लकड़ी की टहनियाँ थी. स्वामी जी हवन सामग्री को आपस मे मिला रहे थे. हवन सामग्री मे पंचमेवा, घी, कपूर आदि विभिन्न प्रकार की खुश्बुदार और शीतल वस्तुएँ थी. जिसकी वजह से पूरा कमरा सुगंधित हो रहा था. स्वामी जी ने उन लकड़ियो को हवन कुंड मे रखने के लिए कहा. लड़की रख ने बाद स्वामी जी ने उसमे एक रूई की मोटी बाती को पूरी तरह घी मे डुबोया और उसे हवन मे रखी लकड़ियो के बीच मे रख दिया. फिर उन्होने कांता को वहाँ बिछे रखे हुए कंबल पर बैठने का इशारा किया, जब कांता वहाँ बैठ गयी तो स्वामी जी ने कांता से कहा:
स्वामी जी: बेटी कांता अब हमे इस कमरे के वातावरण को शुद्ध करना है. क्योकि भगवान शुद्ध वस्तु को ही ग्रहण करते है इसलिए मैं पहले इस वातावरण की सुगंधित और स्वच्च्छ बनाउन्गा.
ये कहकर स्वामी जी ने कुंड मे रखी हुई लड़कियो मे रखी हुई बाति को प्रज्वलित कर दिया. कुछ ही देर मे कुंड से हल्की आग की लपटें उठने लगी. अब स्वामी जी ने मंत्रो का उच्चारण करते हुए उसमे हवन सामग्री डाली. हवन सामग्री की आग मे जाते ही पूरा हॉल सुगंधित हो उठा. तत्पश्चात स्वामी जी ने कांता से कहा.
स्वामी जी: बेटी अब हमे भी एक दूसरे के शुद्ध करना होगा. ऐसा करो पहले तुम मुझे शुद्ध करो,
ये कहकर स्वामी जी ने एक गंगाजल की बॉटल निकाली और उसे पानी मे मिला दिया और कांता को देते हुए बोले:
स्वामी जी: बेटी इसे मेरे चारों तरफ घूम कर मेरे शरीर पर छिड़काव कर दो. और ये कह कर स्वामी जी अपने स्थान पर खड़े हो गये. कांता अपने हाथ की अंजुलि मे पानी भर भर कर स्वामी जी के सारे शरीर को गीला करने लगी. ऐसा करने से स्वामी जी लगभग आधे भीग चुके थे. फिर स्वामी जी ने वहाँ रखे हुए अपने अन्गोछे (तौलिया टाइप एक कपड़ा) की तरफ इशारा करते हुए कहा.
स्वामी जी: बेटी अब इस से मेरे बदन को पोछ दो.
कांता ने हामी मे सिर हिलाते हुए अन्गोछा उठा लिया और स्वामी जी के शरीर को अपने कोमल हाथो से पोच्छने लगी. स्वामी जी की पीठ पोन्छते हुए कांता ने एक नज़र विशाल पिच्छवाड़े पर डाली जिसपर धोती गीली होने की वजह से चिपकी हुई थी. कांता ने जब उनकी विशाल गान्ड का जायजा लिया तो पाया कि वैसे तो उनके कूल्हे बहुत बड़े थे मगर काफ़ी पुष्ट थे कुल्हों के दोनो तरफ बाहर की साइड कूल्हे अंदर की तरफ कुछ धन्से हुए थे. (ऐसे कूल्हे वाले लोग जब चुदाई करते है तो काफ़ी ज़ोर लगाकर करते है, ये एक वास्तविक सत्य है)
फिर कांता ने उनके कंधे पोछे. उनके मांसल और मजबूत कंधों को देखकर कांता का दिल उनपर रीझ गया. अब कांता स्वामी जी के ठीक सामने खड़ी होकर उनके सीने को पोंच्छ रही थी. स्वामी जी के सीने पर बहुत घने बाल थे जो कि कांता की उंगलिओ से टकरा रहे थे. जब कांता ने स्वामी जी की मर्दानी छाती पर हाथ फिराया तो स्वामी जी का अपने पे संयम रखना मुश्किल हो गया. लेकिन स्वामी जी भी पहुचे हुए खिलाड़ी थे उन्होने अपने अंदर के रोमाच को चेहरे पर नही आने दिया. अब कांता स्वामी जी का बदन पोंच्छ चुकी थी.
अब स्वामी जी ने कांता को उसके स्थान पर खड़े होने की लिए कहा और स्वयं उसके उपर जल का छिड़काव करने लगे. जब वो कांता के पीछे जल छिड़क रहे थे तब उन्होने एक बार फिर कांता की विशाल गान्ड पर नज़र डाली और हल्के से मुस्करा दिए. उन्होने पानी को अंजुलि भरकर पहले कांता की मे पीठ पर पानी डाला उसके बाद दूसरी अंजुलि भरकर उन्होने ने कांता के विशाल चुतड़ों की दरार पर फेक दिया. इसके बाद उन्होने एक बार और जान बुझ कर एक अंजुलि पानी और उसी जगह दोबारा फेक दिया, जिस से कांता को पूरा पिच्छवाड़ा गीला हो गया और उसका पेटिकोट उसके दोनो नितंबों पर चिपक गया और उसकी गान्ड का क्रॅक उजागर होने लगा
स्वामी जी: बेटी कांता अब हमे इस कमरे के वातावरण को शुद्ध करना है. क्योकि भगवान शुद्ध वस्तु को ही ग्रहण करते है इसलिए मैं पहले इस वातावरण की सुगंधित और स्वच्च्छ बनाउन्गा.
ये कहकर स्वामी जी ने कुंड मे रखी हुई लड़कियो मे रखी हुई बाति को प्रज्वलित कर दिया. कुछ ही देर मे कुंड से हल्की आग की लपटें उठने लगी. अब स्वामी जी ने मंत्रो का उच्चारण करते हुए उसमे हवन सामग्री डाली. हवन सामग्री की आग मे जाते ही पूरा हॉल सुगंधित हो उठा. तत्पश्चात स्वामी जी ने कांता से कहा.
स्वामी जी: बेटी अब हमे भी एक दूसरे के शुद्ध करना होगा. ऐसा करो पहले तुम मुझे शुद्ध करो,
ये कहकर स्वामी जी ने एक गंगाजल की बॉटल निकाली और उसे पानी मे मिला दिया और कांता को देते हुए बोले:
स्वामी जी: बेटी इसे मेरे चारों तरफ घूम कर मेरे शरीर पर छिड़काव कर दो. और ये कह कर स्वामी जी अपने स्थान पर खड़े हो गये. कांता अपने हाथ की अंजुलि मे पानी भर भर कर स्वामी जी के सारे शरीर को गीला करने लगी. ऐसा करने से स्वामी जी लगभग आधे भीग चुके थे. फिर स्वामी जी ने वहाँ रखे हुए अपने अन्गोछे (तौलिया टाइप एक कपड़ा) की तरफ इशारा करते हुए कहा.
स्वामी जी: बेटी अब इस से मेरे बदन को पोछ दो.
कांता ने हामी मे सिर हिलाते हुए अन्गोछा उठा लिया और स्वामी जी के शरीर को अपने कोमल हाथो से पोच्छने लगी. स्वामी जी की पीठ पोन्छते हुए कांता ने एक नज़र विशाल पिच्छवाड़े पर डाली जिसपर धोती गीली होने की वजह से चिपकी हुई थी. कांता ने जब उनकी विशाल गान्ड का जायजा लिया तो पाया कि वैसे तो उनके कूल्हे बहुत बड़े थे मगर काफ़ी पुष्ट थे कुल्हों के दोनो तरफ बाहर की साइड कूल्हे अंदर की तरफ कुछ धन्से हुए थे. (ऐसे कूल्हे वाले लोग जब चुदाई करते है तो काफ़ी ज़ोर लगाकर करते है, ये एक वास्तविक सत्य है)
फिर कांता ने उनके कंधे पोछे. उनके मांसल और मजबूत कंधों को देखकर कांता का दिल उनपर रीझ गया. अब कांता स्वामी जी के ठीक सामने खड़ी होकर उनके सीने को पोंच्छ रही थी. स्वामी जी के सीने पर बहुत घने बाल थे जो कि कांता की उंगलिओ से टकरा रहे थे. जब कांता ने स्वामी जी की मर्दानी छाती पर हाथ फिराया तो स्वामी जी का अपने पे संयम रखना मुश्किल हो गया. लेकिन स्वामी जी भी पहुचे हुए खिलाड़ी थे उन्होने अपने अंदर के रोमाच को चेहरे पर नही आने दिया. अब कांता स्वामी जी का बदन पोंच्छ चुकी थी.
अब स्वामी जी ने कांता को उसके स्थान पर खड़े होने की लिए कहा और स्वयं उसके उपर जल का छिड़काव करने लगे. जब वो कांता के पीछे जल छिड़क रहे थे तब उन्होने एक बार फिर कांता की विशाल गान्ड पर नज़र डाली और हल्के से मुस्करा दिए. उन्होने पानी को अंजुलि भरकर पहले कांता की मे पीठ पर पानी डाला उसके बाद दूसरी अंजुलि भरकर उन्होने ने कांता के विशाल चुतड़ों की दरार पर फेक दिया. इसके बाद उन्होने एक बार और जान बुझ कर एक अंजुलि पानी और उसी जगह दोबारा फेक दिया, जिस से कांता को पूरा पिच्छवाड़ा गीला हो गया और उसका पेटिकोट उसके दोनो नितंबों पर चिपक गया और उसकी गान्ड का क्रॅक उजागर होने लगा