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फूलवा ने आभार प्रकट करने वाली नज़रो से कांता को देखा और किचन से बाहर निकल गयी. कांता ने फूलवा के जाने के बाद अपनी नाइटी के आगे का एक बटन खोल दिया जिस से उसकी गोरी गोरी मांसल चूचियों का उपरी भाग नज़र आने लगा. अपने बालो को खोल कर उन्हे
अपने सीने पर आगे एक तरफ कर लिया. और दूध का ग्लास लेकर अपने आप से बोली “ चल कांता आज तो अपने ससुर को दूध पिला ही दे”
इतना कहकर कांता किचन से निकलकर अपने ससुर के बेडरूम की तरफ चल पड़ी. कांता ने बेडरूम के गेट को नॉक किया………. थकककक…….. थकककक……..
जानकी लाल: कौन है???????????
\
कांता: मैं हूँ बाबू जी………… आपके लिए दूध लेकर आई हूँ.
जानकी लाल: अरे बहू तुम………….. आ जाओ बेटी अंदर आ जाऊऊऊऊ दरवाजा खुला है.
(कांता के हाथो मे दूध का ग्लास देख कर) अरे बेटी तुम क्यो परेशान हो रही हो……. फूलवा को भेज दिया होता……….
कांता: इसमे परेशानी की क्या बात है बाबू जी……….. आख़िर सेवा का थोड़ा हक़ तो हमारा भी बनता है.
जानकी लाल (हँसते हुए) क्यो नही बेटी बिल्कुल……………….. थोड़ा क्या पूरा हक़ बनता है.
कांता: तो लीजिए और दूध पी लीजिए……….
कांता ने ग्लास को जानकी लाल की तरफ बढ़ा दिया. जानकी लाल ने ग्लास जब को पकड़ा तो उनकी उंगली कांता की नाज़ुक उंगलियो को छू गयी. कांता की उंगलिया की छुवन मात्र से ही जानकी लाल का पूरा बदन सिहर उठा. जानकी लाल दूध का ग्लास लेकर दूध पीने लगे.
दूध पीने के बाद कांता ने जानकी लाल से कहा:
कांता; बाबू जी अगर आप अभी सो नही रहे है तो मैं कुछ देर आपके पास बैठ जाऊ.. क्योकि मुझे भी नींद नही आ रही है.
जानकी लाल को तो मानो मन माँगी मुराद मिल गयी. लेकिन उन्होने इस बात को कांता पर जाहिर नही होने दिया और बोले……………
जानकी लाल: हाँ. हाँ … बेटी क्यो नही……….. मुझे भी नींद नही आ रही है……… चलो क्यो ना कुछ खेलते है……………………. ऐसे
टाइम पास भी हो जाएगा…….
कांता: ठीक है ……………….. चलिए चेस खेलते है (कांता चेस की अच्छी खिलाड़ी थी, जानकी लाल को भी चेस खेलना आता था) लेकिन
दाँव पर कुछ लगा होना चाहिए.
अपने सीने पर आगे एक तरफ कर लिया. और दूध का ग्लास लेकर अपने आप से बोली “ चल कांता आज तो अपने ससुर को दूध पिला ही दे”
इतना कहकर कांता किचन से निकलकर अपने ससुर के बेडरूम की तरफ चल पड़ी. कांता ने बेडरूम के गेट को नॉक किया………. थकककक…….. थकककक……..
जानकी लाल: कौन है???????????
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कांता: मैं हूँ बाबू जी………… आपके लिए दूध लेकर आई हूँ.
जानकी लाल: अरे बहू तुम………….. आ जाओ बेटी अंदर आ जाऊऊऊऊ दरवाजा खुला है.
(कांता के हाथो मे दूध का ग्लास देख कर) अरे बेटी तुम क्यो परेशान हो रही हो……. फूलवा को भेज दिया होता……….
कांता: इसमे परेशानी की क्या बात है बाबू जी……….. आख़िर सेवा का थोड़ा हक़ तो हमारा भी बनता है.
जानकी लाल (हँसते हुए) क्यो नही बेटी बिल्कुल……………….. थोड़ा क्या पूरा हक़ बनता है.
कांता: तो लीजिए और दूध पी लीजिए……….
कांता ने ग्लास को जानकी लाल की तरफ बढ़ा दिया. जानकी लाल ने ग्लास जब को पकड़ा तो उनकी उंगली कांता की नाज़ुक उंगलियो को छू गयी. कांता की उंगलिया की छुवन मात्र से ही जानकी लाल का पूरा बदन सिहर उठा. जानकी लाल दूध का ग्लास लेकर दूध पीने लगे.
दूध पीने के बाद कांता ने जानकी लाल से कहा:
कांता; बाबू जी अगर आप अभी सो नही रहे है तो मैं कुछ देर आपके पास बैठ जाऊ.. क्योकि मुझे भी नींद नही आ रही है.
जानकी लाल को तो मानो मन माँगी मुराद मिल गयी. लेकिन उन्होने इस बात को कांता पर जाहिर नही होने दिया और बोले……………
जानकी लाल: हाँ. हाँ … बेटी क्यो नही……….. मुझे भी नींद नही आ रही है……… चलो क्यो ना कुछ खेलते है……………………. ऐसे
टाइम पास भी हो जाएगा…….
कांता: ठीक है ……………….. चलिए चेस खेलते है (कांता चेस की अच्छी खिलाड़ी थी, जानकी लाल को भी चेस खेलना आता था) लेकिन
दाँव पर कुछ लगा होना चाहिए.