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कामाग्नि complete

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दोस्तो, आपने पिछले भाग में पढ़ा कि कैसे विराज ने अपनी सुहागरात पर यह जाना कि उसे कुँवारी लेकिन बहुत ही वासना से भरी चुदक्कड़ और शायद थोड़ी अनुभवी पत्नी मिली है। वो उसे अपने दोस्त के साथ मिल कर चोदना चाहता था लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? ये तो आगे चल कर ही पता चलेगा। अब आगे…

अगले दिन जब विराज ने सारी बात जय को बताई तो जय को बड़ी ख़ुशी हुई। उसने विराज को मुबारकबाद दी और मिलवाने के लिए कहा।

विराज- मिल लेना यार, ये सब मेहमान चले जाएं तो आराम से मिलवा दूंगा और तू कहे तो और भी बहुत कुछ कर सकते हैं साथ मिल कर।

जय- नहीं यार, ऐसे एक तरफ़ा काम नहीं करते। मेरी भी शादी हो जाने दे, फिर अगर दोनों की तरफ से हाँ हुई तो करेंगे साथ में।

विराज- तो फिर जल्दी से शादी कर ले यार … सब मिल के मस्ती करेंगे फिर।

कुछ ही दिन में जय को भी लगने लगा कि वो अब विराज के साथ उतना समय नहीं गुज़ार पा रहा था और जो मस्ती वो पहले किया करते थे वो काफी कम हो गई थी। विराज को भी अपनी पत्नी को समय देना ज़रूरी था और फिर एक विषम-लैंगिक पुरुष को तो स्त्री के साथ ही सम्भोग करने का मन करेगा। जय के साथ तो ये सब इसलिए शुरू हुआ था कि कोई और चारा नहीं था और अब केवल दोस्ती निभाने के लिए चल रहा था।

जय ने भी अपने पिता को शादी के लिए इशारा किया कि हमारे घर में भी बहू होती तो काम आसान हो जाता। उनको भी बात सही लगी तो उन्होंने अपनी बिरादरी की एक पढ़ी-लिखी सुन्दर लड़की ढूँढ निकाली और शादी पक्की कर दी। लड़की का नाम शीतल था। पास के छोटे शहर में शीतल के पिता की रेडियो और घड़ी की दूकान थी। शीतल की माँ बचपन में ही गुज़र गईं थीं और बाप-बेटी अकेले वहीं शहर में रहते थे।

इसी तरह कुछ महीने बीत गए और अब कहीं जा कर जय ठीक तरह से शीतल को चोद पाता था। शीतल को भी मज़ा आने लगा था लेकिन उसके लिए अभी भी चुदाई एक बहुत ही गंभीर काम था जिसका वो आनंद तो लेती थी लेकिन इतनी स्वच्छंदता के साथ नहीं जिसमें कोई होश खो कर बस उड़ने सा लगता है। उसके हाव-भाव से ही जय कभी ऐसा नहीं लगा कि वो कभी विराज और जय की दोस्ती में उस हद तक शामिल हो पाएगी जिसमे शर्म-लिहाज़ की सीमाएं बेमानी हो जाती हैं।

जीवन ठीक ठाक चल ही रहा था कि पता चला, शीतल के पापा बीमार रहने लगे थे। तय हुआ कि कुछ दिन के लिए जय और शीतल शहर जा कर रहेंगे। शीतल अपने पिता की सेवा करेगी और जय दुकान का काम सम्हाल लेगा। कुछ दिन कुछ महीनों में बदल गए। शीतल के पापा की तबीयत तो ठीक नहीं हुई लेकिन जय को शहर की हवा रास आ गई। पढ़े लिखे व्यक्ति को वैसे भी खेती-बाड़ी में मज़ा कम ही आता है। एक साल के अन्दर शीतल के पिता का देहांत हो गया।

लेकिन तब तक जय ने उस रेडियो घड़ी की दूकान को काफी बढ़ा लिया था। अब वो इलेक्ट्रोनिक्स के और भी सामान बेचने लगा था। उसने अपने पिता को भी शहर आने का निमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि उनको गाँव का वातावरण ही पसंद है। सच तो यह था कि उनका चक्कर अभी भी विराज की माँ के साथ बदस्तूर चल रहा था। विराज दोनों परिवारों की खेती सम्हाल ही रहा था और शालू ने भी अच्छे से दोनों घरों को सम्हाल लिया था।

खैर, जीवन में एकरसता आने लगी थी, इसी बीच शालू गर्भवती हो गई। बात ख़ुशी की थी लेकिन कुछ ही दिन में विराज को समझ आ गया कि अब उसका कामजीवन उतना रसीला नहीं रहेगा लेकिन फिर भी शालू इतनी चपल थी कि विराज को किसी ना किसी तरह खुश कर ही देती थी। आखिर जब मामला ज्यादा नाज़ुक हुआ तो शालू ने विराज को उसके पुराने दिनों के बारे में याद दिलाया। शालू अब विराज के साथ बहुत खुल कर बात करने लगी थी।

शालू- अब जब तक मैं कुछ करने लायक नहीं बची हूँ तो अपने पुराने दोस्त को क्यों नहीं बुला लेते; कब तक ऐसे तरसते रहोगे। मुझे आपको ऐसे देख कर अच्छा नहीं लगता।

विराज- बात तो तुम सही कह रही हो लेकिन अब उसको ऐसे बुलाऊंगा तो बड़ा अजीब लगेगा कि मतलब पड़ा तो बुला लिया।

शालू- अरे ऐसे कैसे? वो तो आपका इतना लंगोटिया यार था कि आप उससे मुझे भी चुदवाने को तैयार हो गए थे। अब क्या वो अपने दोस्त के लिए इतना भी नहीं कर सकता।

विराज- चुदवाने को तैयार हुआ था, चुदवाया तो नहीं था ना?

शालू- हाँ तो चुदवा भी देना लेकिन अभी मुझसे नहीं देखा जा रहा कि आप ऐसे मुरझाए हुए फिरते रहो।

विराज- अब यार अपन तो हैं ही चोदू लोग अपने को तो कोई फर्क नहीं पड़ता अगर दोस्ती यारी में एक दूसरे की बीवी चोद लें तो, लेकिन वो भाई भी बीवी की मर्ज़ी बिना कुछ करने को मना करता है और उसकी बीवी सती सावित्री है तो वो तो मानेगी नहीं।

शालू- ठीक है उसकी बीवी नहीं मान रही तो कोई बात नहीं मैं हाँ कह रही हूँ ना… आपको ना कोई एहसान लेने की ज़रूरत है ना को स्वार्थी महसूस करने की। बिंदास मस्ती करो अपने दोस्त के साथ। जब मैं चुदवाने लायक हो जाऊँगी तो मैं भी आप लोगों की मस्ती में शामिल हो जाऊँगी। फिर तो कोई बुरा नहीं लगेगा ना आपको?

 
विराज- हाँ यार, ये तो तूने सही कही। मैं हमेशा उसी के साथ करता था सब अगर तू भी साथ रहेगी तो मज़ा ही आ जाएगा। तू कितना प्यार करती है ना मुझसे।

विराज ने जय को गाँव बुलाया। जय, छुट्टी वाले दिन शीतल को ले कर पहुँच गया। दिन भर तो घर में सबके साथ बातचीत में गुज़र गया लेकिन रात को विराज और जय खेत पर जा कर सोने के बहाने निकल गए। सच तो ये था कि दोनों ने खेत पर प्राइवेट में दारू पार्टी करने का प्लान बनाया था। दारू के बाद एक दूसरे का लंड चूसने का कार्यक्रम तो ज़रूर होना ही था।

रात को शीतल, शालू के साथ ही सोई। शालू बहुत तेज़ दिमाग थी, तो उसने शीतल के मन की टोह लेने के लिए उससे बात करना शुरू किया। वो ना केवल ये पता करना चाहती थी कि शीतल में कामवासना कितनी है, बल्कि उसे सेक्स की ओर आकर्षित भी करना चाहती थी।

शालू- तुमको पता है, ये लोग खेत पर क्यों गए है?

शीतल- सोने के लिए। … नहीं?

शालू- सोएंगे… सोएंगे… लेकिन सोने से पहले और भी बहुत कुछ करेंगे।

शीतल- क्या करेंगे? और आपको कैसे पता ये सब?

शालू- मुझे इसलिए पता है कि मैंने ही विराज को कहा था। और रही बात ये कि क्या करेंगे तो हुआ ये कि जब से मैं पेट से हुई हूँ तब से हमारी मस्ती ज़रा कम हो गई थी। विराज ने बताया था कि ये दोनों दोस्त बचपन में ये सब मस्ती आपस में किया करते थे तो मैंने कहा एक बार पुरानी यादें ही ताज़ा कर लो।

शीतल- क्या बात कर रही हो दीदी ऐसा भी कोई होता है क्या? और आपके इन्होंने आपको बताया लेकिन मेरे यहाँ तो इन्होंने ऐसा कुछ नहीं बताया।

शालू- अब तुम थोड़ी रिज़र्व टाइप की हो ना इसलिए बताने में झिझक रहे होंगे।

शीतल- नहीं आप झूठ बोल रही हो। मेरे ये ऐसे नहीं हैं।

शालू- ये तो सही कही तुमने जय भाईसाहब हैं तो बड़े सीधे सच्चे आदमी लेकिन मैं झूठ नहीं बोल रही।

शीतल- सीधे सच्चे हैं ये भी बोल रही हो और ऐसे गंदे काम करने गए हैं ये भी बोल रही हो, ऐसा कैसे हो सकता है।

शालू- शीतल… शीतल… ! कितनी भोली है री तू। देख, तू जितना खुल के बात करेगी अपने पति से, वो भी उतना खुल के बताएगा ना तुझे सब। मैंने तो पहली रात को ही सब बातें जान ली थीं।

फिर शालू ने शीतल को विराज-जय की सारी कहानी सुना डाली जो विराज ने उसे बताई थी।

शीतल- सच कहूँ तो मेरी कभी इतनी करीब की कोई सहेली रही ही नहीं। माँ के नहीं रहने के बाद कभी इतना समय ही नहीं मिला कि इन सब बातों में बारे में सोच सकूँ। लेकिन अब मैं कोशिश करुँगी कि इन के साथ खुल कर ये सब बातें कर सकूँ।

शालू- मुझे ही अपनी करीब की सहेली मान लो।

शीतल- वो तो मान ही लिया है तभी तो आपसे इतनी सब बातें कर लीं।

शालू- ऐसा है तो हम भी वो करें जो ये लोग वहां खेत पर करने गए हैं।

शीतल- नहीं दीदी, मेरी इतनी हिम्मत नहीं है। आपने किया है कभी।

शालू- नहीं किया लेकिन सोच रही थी कि तुम हाँ कह देतीं तो एक बार ये भी करके देख लेती।

फिर थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गई। थोड़ी देर बाद जब शीतल ना अपना सर घुमा कर शालू की ओर देखा तो पाया कि शालू बड़ी ही कामुक अदा और नशीली आँखों से एक टक उसी को देख रही थी। कुछ पलों तक वो भी उसकी आँखों में आँखें डाले सम्मोहित सी देखती रही अचानक शालू ने अपने होंठ शीतल के होंठों पर रख दिए। शीतल की आँखें अपने आप बंद हो गईं और उसने अपने आप को उस कोमल चुम्बन की लहरों पर हिचकोले खाते हुआ पाया।

शीतल भी अब तक कम से कम चुम्बन की कला में तो पारंगत हो ही चुकी थी। वो वैसे ही शालू का साथ देने लगी जैसे जय का देती थी। लेकिन ये अनुभव कुछ नया ही था। शालू के पतले मुलायम होंठों के स्पर्श से मंत्रमुग्ध शीतल को पता ही नहीं चला कि कब शालू ने उसके ब्लाउज के सारे हुक खोल दिए। शालू ने ब्रा को नीचे सरकाया और शीतल के एक स्तन का चूचुक चूसने लगी। शीतल कभी जय को कहने की हिम्मत नहीं कर पाई थी कि वो किस तरह से अपने स्तन चुसवाना चाहती है लेकिन शालू को तो जैसे पहले से ही पता था।

शीतल आनंद के सागर में गोते लगा रही थी कि उसका ध्यान गया कि शालू भी एक हाथ से अपना ब्लाउज खोलने की कोशिश कर रही थी। शीतल ने भी उसकी मदद की और जल्दी ही दोनों स्त्रियाँ अर्धनग्न अवस्था में एक दूसरी के स्तनों को चूस रही थीं। शालू शीतल के ऊपर झुक कर उसका दाहिना स्तन चूस रही थी और बायाँ अपने एक हाथ से सहला रही थी। उधर उसका दाहिना स्तन शीतल के चेहरे पर झूल रहा था जिसे शीतल किसी आम की तरह पकड़ का ऐसे चूस रही थी जैसे बछड़ा गाय का दूध पीता है।

इसी बीच वासना से सराबोर शालू ने अपना बायाँ हाथ शीतल के साए के अन्दर सरका दिया और उसकी चूत का दाना खोजने लगी। लेकिन जैसे ही उसकी उंगली शीतल की गीली चूत के दाने को छू पाई, शीतल उठ कर बैठ गई।

शीतल- नहीं दीदी! ये सब सही नहीं है… हमको ये सब नहीं करना चाहिए।

इतना कह कर उसने जल्दी जल्दी अपनी ब्रा और ब्लाउज पहना और साड़ी ठीक करके दूसरी ओर करवट ले कर सो गई।

 
नींद तो दोनों को देर रात तक नहीं आई लेकिन फिर कोई बात भी नहीं हुई। अगली सुबह सब ऐसे रहा जैसे रात को कुछ हुआ ही नहीं। जय और शीतल नाश्ता करके वापस शहर चले गए।

आगे भी कई बार विराज ने जय को बुलाया लेकिन फिर शीतल उसके साथ नहीं गई। जय की वजह से विराज को अपने जीवन में काम-वासना की कोई कमी महसूस नहीं हो पाई। यूँ तो शालू भी विराज का लंड चूस कर झड़ा सकती थी और झड़ाती भी थी लेकिन अभी वो लोट-पोट होकर उत्तेजना वाली मस्ती करने की स्थिति में नहीं थी तो ये सब विराज जय के साथ कर लेता था। यूं ही दिन बीत गए और शालू ने एक स्वस्थ लड़के को जन्म दिया जिसका नाम आगे चल कर राजन रखा गया।

राजन के जन्म पर तो शीतल को जय के साथ गाँव जाना ही था और वैसे भी जिस कारण से तो उसके साथ जाने से कतराती थी वो अब था नहीं। शालू अभी इस अवस्था में नहीं थी कि शीतल के साथ कोई शरारत कर सके। वैसे शीतल को शालू पसंद थी। उसी की सलाह का नतीजा था कि पिछले कई दिनों से जय-शीतल के सम्बन्ध बहुत रंगीन हुए जा रहे थे। लेकिन शीतल के संस्कार उसे अपने पति के अलावा किसी और के साथ कामानंद की अनुभूति करने से रोकते थे और इसीलिए वो शालू से ज्यादा नजदीकी रखने में झिझक रही थी।

जो भी हो, शीतल ने आते ही शालू की मदद करना शुरू कर दिया ताकि वो आराम कर सके और अपने बच्चे का ध्यान रख सके। विराज, जय और जय के बाबा खेती-बाड़ी की बातों में लगे रहे। रात को हमेशा की तरह विराज और जय खेत पर दारू पार्टी और मस्ती करने चले गए। आज विराज बहुत खुश था उसके घर में बेटा जो हुआ था, लेकिन नशे का थोडा सुरूर चढ़ने के बाद विराज ने जय को एक और खुशखबरी सुनाई।

विराज- यार! इतने दिन तूने मेरा बहुत साथ दिया। बहुत मज़े करे अपन ने यहाँ मिल के।

जय- दोस्त ही दोस्त के काम आता है यार।

विराज- हम्म… लेकिन तू मेरा खास दोस्त है… तो तेरे लिए एक और खुशखबरी है।

जय- क्या?

विराज- मैं शालू के साथ मज़े नहीं कर पा रहा था तब उसी ने मुझे बोला था तुझे बुलाने को। वो ये भी बोली थी कि अगर तू मेरे साथ मस्ती करेगा तो वो भी टाइम आने पर हमारी मस्ती में साथ देगी।

जय- वो साथ तो दे ही रही है ना… पता होते हुए भी हमको यहाँ आने देती है। मेरी बीवी को भी वासना की ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि कुछ महीनों से तो मेरी जिंदगी रंगीन हो गई है।

विराज- अरे नहीं यार… तुझे चढ़ गई है… तू समझ नहीं रहा है।

जय- समझ रहा हूँ यार। पिछली बार शीतल एक रात भाभी के साथ रुकी थी और उन्होंने जाने क्या पट्टी पढ़ाई कि जो औरत पहले ठीक से चुदवाती भी नहीं थी वो अब खुद ही मुझे चोद देती है।

विराज- अरे यार मैं बोल रहा हूँ कि शालू भी अब हम दोनों को एक साथ चोद देगी!

जय- क्या? हम दोनों को? मतलब…

विराज- मतलब ये कि मेरी भाभी तैयार हो ना हो… तेरी भाभी तैयार है अपन दोनों से साथ में चुदवाने के लिए। तो अब अगली बार जब तू आएगा तो अपन साथ मिल उसके साथ मज़े करेंगे।

जय- ऐसा है तो यार, एक खुशखबरी मेरे पास भी है।

विराज- क्या? बता भाई बता… आज तो दिन ही ख़ुशी का है।

जय- देख वो मेरी दूकान पर मैंने जो टीवी कूलर बेचना शुरू किया था ना तो टीवी कंपनी ने टारगेट दिया था। पूरा करने वाले डीलर को यूरोप में दो लोगों के लिए 5 दिन घुमाने का इनाम था। तो मैंने तो टारगेट से ज्यादा टीवी बेच डाले। तो अब जल्दी ही यूरोप जाने का प्रोग्राम है।

विराज- मुबारक हो भाई। लेकिन, इसका मेरी वाली खुशखबरी से क्या वास्ता।

जय- वास्ता ये है कि मैंने अभी तुझे बताया ना कि भाभी की संगती में रह के शीतल ढंग से चुदाई करना सीख गई। इसलिए मुझे उम्मीद है कि वहां विदेशी लोगों का खुलापन देखेगी तो शायद वो भी हमारी मस्ती में शामिल होने को राजी हो जाए। मैंने सुना है वहां किसी किसी बीच पर नंगे घूमना आम बात है।

विराज- ऐसा है क्या? फिर तो घुमा ला। तब तक शालू की चूत भी थोड़ी टाइट हो जाएगी। फिर दोनों भाई मिल के साथ में भाभीचोद बनेंगे।

इस बात पर दोनों बहुत हँसे।

नशे का सुरूर और वासना अब सर चढ़ चुका था। दोनों जल्दी ही नंगे हो गए और एक दूसरे की बीवी को कैसे चोदेंगे ये बातें करते करते मस्ती करने लगे। ऐसे तो दोनों एक दूसरे की पत्नी के बारे इज्ज़त से ही बात करते थे लेकिन आज नशे में उनको शायद लग रहा था कि उनकी कल्पना सच हो ही जाएगी। आगे क्या होने वाला था ये तो समय को ही पता था।

दोस्तो, मेरी वासना भरी कहानी आपको कैसी लग रही है,

 
दोस्तो, आपने इस शौहर बीवी की इस नंगी कहानी के पिछले भाग में पढ़ा कि कैसे जय और विराज ने अपनी बीवियों को अदल-बदल करके चोदने की योजना बनाई थी। इस योजना के तहत जय अपनी देसी बीवी को हनीमून पर ले जाने वाला था ताकि वो थोड़ी खुल के चुदवाने में अभ्यस्त हो जाए।

इस भाग में देखते हैं जय उसे कितना खुल के चुदवाना सिखा पाया…

जय- देख वो मेरी दूकान पर मैंने जो टीवी कूलर बेचना शुरू किया था ना तो टीवी कंपनी ने टारगेट दिया था। पूरा करने वाले डीलर को यूरोप में दो लोगों के लिए 5 दिन घुमाने का इनाम था। तो मैंने तो टारगेट से ज्यादा टीवी बेच डाले। तो अब जल्दी ही यूरोप जाने का प्रोग्राम है।

विराज- मुबारक हो भाई। लेकिन, इसका मेरी वाली खुशखबरी से क्या वास्ता।

जय- वास्ता ये है कि मैंने अभी तुझे बताया ना कि भाभी की संगती में रह के शीतल ढंग से चुदाई करना सीख गई। इसलिए मुझे उम्मीद है कि वहां विदेशी लोगों का खुलापन देखेगी तो शायद वो भी हमारी मस्ती में शामिल होने को राजी हो जाए। मैंने सुना है वहां किसी किसी बीच पर नंगे घूमना आम बात है।

विराज- ऐसा है क्या? फिर तो घुमा ला। तब तक शालू की चूत भी थोड़ी टाइट हो जाएगी। फिर दोनों भाई मिल के साथ में भाभीचोद बनेंगे।

इस बात पर दोनों बहुत हँसे।

नशे का सुरूर और वासना अब सर चढ़ चुका था। दोनों जल्दी ही नंगे हो गए और एक दूसरे की बीवी को कैसे चोदेंगे ये बातें करते करते मस्ती करने लगे। ऐसे तो दोनों एक दूसरे की पत्नी के बारे इज्ज़त से ही बात करते थे लेकिन आज नशे में उनको शायद लग रहा था कि उनकी कल्पना सच हो ही जाएगी। आगे क्या होने वाला था ये तो समय को ही पता था।

अगले दिन जय वापस शहर आ गया। अगले दो महीने तो पासपोर्ट और वीज़ा के जुगाड़ में निकल गए, उसके बाद जय ने ट्रेवल एजेंट के साथ मिल कर काफी विचार विमर्श किया और प्लान में काफी सारे बदलाव करवाए। ट्रेवल एजेंट को कंपनी जो भी पैसे दे रही थी उसके अलावा जय ने भी अपनी तरफ से उसे पैसे दिए ताकि प्लान में कुछ और चीज़ें जोड़ी जा सकें। जो ज़रूरी नहीं लगा उसे हटा कर कुछ पैसे बचा भी लिए। जय अब असली बनिया बनता जा रहा था।

जय ने शीतल को जैसा देस वैसा भेस का हवाला दे कर कुछ मॉडर्न कपड़े खरीदवा दिए थे। शीतल भी शालू की सलाह मान कर कुछ खुल गई थी इसलिए उसने ज्यादा आनाकानी नहीं की।

आखिर वो दिन आ गया जब जय और शीतल को अपने हनीमून पर निकलना था।

एक लम्बी फ्लाइट के बाद सुबह ये लोग पेरिस पहुंचे। शुरुवात हल्के फुल्के घूमने फिरने से ही करने का प्लान था। कुछ उत्तेजना बनाए रखने के लिए जय ने शीतल को स्कर्ट-टॉप के अन्दर कुछ ना पहनने की सलाह दी थी जो कि शीतल ने मान ली थी।

सबसे पहले लूव्र संग्रहालय जाने का कार्यक्रम था। जब कभी शीतल थोड़ी बोर होने लगती तो मौका देख कर जय उसके कसे हुए टॉप के ऊपर से ही उसके उरोजों को छेड़ देता जो कि बिना ब्रा के उस टॉप के ऊपर से भी काफी मुलायम लग रहे थे। यूं तो गर्मी के दिन थे लेकिन पेरिस में थोड़ी ठण्ड तो फिर भी थी ही। जब तक ये लूव्र संग्रहालय में घूम रहे थे तब तक तो महसूस नहीं हुआ था, लेकिन जैस ही वो वहां से बाहर आये, अचानक ठंडी हवा के झोके ने दोनों के रोंगटे खड़े कर दिए।

कुछ देर बाद जय का ध्यान गया कि केवल रोंगटे ही खड़े नहीं हुए थे बल्कि साथ कुछ और भी खड़े हुए थे। नहीं नहीं अभी तक तो जय का लंड सोया हुआ था, लेकिन अब शायद शीतल के खड़े हुए चूचुक देख कर वो भी जागने लगा था। उसके कसे हुए टॉप के अन्दर वो नग्न उरोज जो अपनी गोलाइयों को पूरे प्राकृतिक रूप में उस टॉप के अन्दर से भी प्रदर्शित कर पा रहे थे. अब और भी नग्नता के और भी करीब आ गए थे क्योंकि अब शीतल के दोनों चूचुक साफ़ खड़े हुए दिखाई दे रहे थे। उसे इस रूप में देख कर उसकी नंगी देह की कल्पना करना बहुत मुश्किल काम नहीं रह गया था।

जय ने इस दृश्य को हमेशा के लिए संजो लेने के लिए अपने कोडॅक कैमरा से उसकी एक तस्वीर ले ली। फिर वो एफिल टावर जैसे और भी कई जगहों पर गए। दोनों ने बहुत मज़ा किया। शाम को अपने अगले गंतव्य पर जाने के लिए एअरपोर्ट पर चेक-इन करने के बाद जब दोनों वहीँ एअरपोर्ट के शौपिंग एरिया में घूम रहे थे तब अचानक जय की नज़र में कुछ आया और चलते चलते जय ऊपर वाली मंज़िल पर शीतल को कुछ दिखाने लगा।

 
जय- वो देखो! उस दूकान पर पहिये वाले जूते मिलते हैं।

शीतल- तो उसमें क्या बड़ी बात है? वो तो अपने यहाँ भी मिलते हैं।

जय- और वहां पर खेलकूद का सामान मिलता है।

शीतल- क्या, हो क्या गया है आपको? मुझे वहां ये सब फालतू चीज़ें क्यों दिखा रहे हो?

जय- ताकि तुम यहाँ नीचे ना देख पाओ। हा हा हा…

जैसे ही शीतल ने नीचे देखा तो वो चौंक गई। वो एक कांच के फर्श पर खड़ी थी और उसके नीचे निचली मंजिल पर लोग आ-जा रहे थे। पहले तो उसे बड़ा मज़ा आया कि वो जैसे हवा में उड़ रही है लेकिन जैसे ही उसे याद आया कि अपनी स्कर्ट के अन्दर वो बिलकुल नंगी है और उसकी चूत अब सब लोगों के सामने खुली हुई है, वो शर्म से पानी पानी हो गई। उसने जल्दी से अपने पाँव सिकोड़ लिए।

शीतल- आप भी ना, बड़े बेशर्म हैं। पहले बता देते तो मैं सम्हाल के आती ना।

जय- फिर ये मज़ा कहाँ से आता?

शीतल- आपको अपनी पत्नी की उस की नुमाइश करने में मज़ा आता है?

जय- ‘उस की’?

शीतल- हाँ, मतलब मेरी वो… समझ जाओ ना!

जय- अरे यार, यहाँ हिंदी कोई नहीं समझता। चूत बोलो चूत!

शीतल- आप दिन पे दिन बहुत बेशर्म होते जा रहे हैं। तो मेरी चूत दुनिया को दिखा के क्या मज़ा मिला आपको?

जय- तुम भी तो दिन पे दिन बिंदास होती जा रही हो। रही बात तुम्हारी चूत की तो मज़ा तो दुनिया को आया होगा मुझे तो तुमको और बिंदास बनाना है इसलिए ऐसा किया।

शीतल- इतनी बिंदास तो हो गई हूँ। आगे हो के आपको चोद डालती हूँ। ऐसे गंदे गंदे शब्द बोलने लगी हूँ। और कितना बिंदास बनाओगे?

जय- इतना कि सारी दुनिया के सामने मुझे चोद सको।

शीतल- मजाक मत करो। कोई सारी दुनिया के सामने नंगा होता है क्या? पागल कहेगी सारी दुनिया।

इस बात पर जय बस मुस्कुरा दिया। मन ही मन वो ये सोच कर हंस रहा था कि शीतल को अभी पता नहीं था कि वो जहाँ जा रहे हैं वो किस बात के लिए प्रसिद्ध है। केप ड’अग्ड, फ्रांस में उस समय एक छोटा सा गाँव था तो अपने प्रकृतिवादी रिसॉर्ट्स के लिए उन दिनों काफी प्रसिद्ध हो रहा था। रात का खाना प्लेन में ही हो गया और सोने के समय से पहले दोनों रिसोर्ट में पहुँच गए थे। थकान काफी थी इसलिए सीधा सोने चले गए। अगली सुबह शीतल फ्रेश हो कर आई और तैयार होने के लिए अपने कपड़े निकालने लगी।

शीतल- आज कहाँ चलना है और उस हिसाब से क्या कपड़े पहनूं?

जय- वो बिकिनी ली थी ना, फूलों के प्रिंट वाली वो पहन लो और उसके ऊपर ये कुरता डाल लो।

शीतल- क्या बात कर रहे हो आप भी। ये इतना झीना कुरता वो भी ये चिंदी जैसे कपड़ों के ऊपर। नहीं नहीं… ये पहन के मैं बाहर नहीं जा सकती। मुझे तो लगा था आपने ये इसलिए दिलवाया है कि अगर ज़्यादा गर्मी पड़ी तो रात को पहन के सोने के काम आएगा।

जय- एक काम करो। ये पहन लो… साथ में हम ये बड़ी वाली शाल ले चलते हैं, अगर तुमको लगे कि कोई तुमको गलत नज़र से देख रहा है तो ये ओढ़ लेना।

शीतल- ठीक है। और आप क्या पहनोगे?

जय- बस ये एक चड्डी काफी है।

शीतल- हाँ, आप तो हो ही बेशरम।

फिर दोनों तैयार हो कर निकल पड़े। एक बास्केट में वही बड़ी सी शाल कुछ बियर की कैन और कुछ नमकीन रख लिया था। बीच ज्यादा दूर नहीं था, बल्कि यूँ कहें कि सामने ही दिख रहा था बस वहां तक पहुंचना था। दूर से लोग बीच पर धूप सेंकते दिख रहे थे लेकिन ठीक से नहीं। तभी थोड़ी दूरी पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बीच की तरफ जाता हुआ दिखाई दिया। उसके पास भी वैसा ही बास्केट था जैसा होटल वालों ने जय और शीतल को दिया था लेकिन वो पूरा नंगा था।

शीतल- हे भगवान! सुबह सुबह ये पागल ही दिखाना था? अब देखो, मैं कल ही कह रही थी ना… इस इंसान को आप पागल ही कहोगे ना। चलो अपन थोड़ा दूसरी तरफ चल देते हैं।

जय- तुम्हारा मतलब उस तरफ?

जय ने इशारा करके बताया और जब शीतल ने उस दिशा में देखा तो दंग रह गई। वहां एक खूबसूरत जोड़ा जो लगभग उनकी ही उम्र के थे और वो भी पूरे नंग-धड़ंग बीच की ओर जा रहे थे। वो आपस में बात करते हुए बड़ी फुर्ती से बीच की ओर बढ़ रहे थे और उनकी हरकतों को देख कर कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो पागल थे। शीतल कुछ समझ पाती इस से पहले जय ने एक और दिशा में इशारा किया।

 
वहां तो एक पूरा परिवार नंगा बैठा था। पति-पत्नी और एक करीब दस साल की लड़की और लगभग छह साल का लड़का जो वहां रेत में किले बना रहे थे। ये लोग अब बीच पर आ गए थे और हर जगह जो भी स्त्री-पुरुष और बच्चे धूप सेंक रहे थे वो सब नंगे ही थे। शीतल तो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।

शीतल- ये सब क्या हो रहा है। कहाँ ले आए हो आप हमको?

जय- ये एक प्रकृतिवादी लोगों का गाँव है। इन लोगों का मानना है कि प्रकृति ने जैसा हमें बनाया है, हमको वैसे ही रहना चाहिए। इनका खानपान रहन सहन सब प्राकृतिक होता है।

इतना कहते कहते जय ने बास्केट में रखी शाल रेत पर बिछा दी और अपनी चड्डी निकाल कर उस पर लेट गया।

शीतल- अरे ये लोग जो हैं वो हैं लेकिन आप तो शर्म थोड़ी करो। ऐसे सबके सामने नंगे हो रहे हो!

जय- जैसा देस वैसा भेस। बल्कि अगर तुम ऐसे घूमोगी तो सब तुमको ही देखेंगे। मैं तो कहता हूँ कम से कम ये कुरता तो निकाल ही दो।

जय अपनी बीवी को नंगी करना चाहता था कि उसकी शर्म पूरी खुल जाए और वो अपनी नंगी बीवी की नंगी कहानी अपने दोस्त और भाभी को सुनाये.

शीतल को जय की बात सही लगी। अब तक काफी लोग उसे अजीब नज़र से देख चुके थे। उसने भी कुरता निकाल दिया और शाल के ऊपर लेट गई। दोनों एक दूसरे की तरफ करवट ले कर लेटे थे और अपने एक हाथ पर सर को टिका कर दूसरे हाथ से बियर पी रहे थे। जय ने शीतल को हज़ार बार नंगी देखा था लेकिन आज ऐसे खुले बीच पर बिकिनी में उसे देख कर जय का लंड खड़ा हो गया। उधर शीतल ने पहली बार बियर पी थी तो उसे थोड़ी चढ़ने लगी थी।

शीतल- अरे तुम्हारा तो लंड खड़ा हो गया। चूस दूं क्या?

जय- अरे नहीं! यहाँ लोग प्राकृतिक रहने के लिए नंगे रहते हैं सेक्स के लिए नहीं। लेकिन अब ये खड़ा हो गया है तो इसको लेकर तो कहीं जा भी नहीं सकते… अच्छा नहीं लगेगा। तुम्हारे कुरते से ढक लेता हूँ तुम हाथ से हिला के झड़ा दो।

शीतल ने थोड़ी देर कोशिश की लेकिन जब जय नहीं झड़ा तो शीतल नशे में बोलने लगी- चोद लो यार, यहाँ सब वैसे भी नंगे ही तो घूम रहे हैं।

शीतल नशे में समझ नहीं पा रही थी कि वहां बच्चों वाले परिवार भी थे।

लेकिन जय को एक नया उपाय सूझा, उसने शीतल को समुद्र में चलने को कहा। दोनों भाग कर पानी में चले गए और इतने गहरे पानी में जा कर खड़े हो गये कि पानी उनकी छाती तक था। कभी लहर भी आती तो गले तक ही आ रहा था।

ऐसे में जय ने शीतल की बिकिनी बॉटम (पेंटी) को नीचे सरका के पीछे से अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। समंदर की लहरों में दोनों की चुदाई के झटके कहीं खो गए और देखने वालों को यही लग रहा है कि कोई अपनी बीवी के साथ लहरों का आनंद ले रहा है। शीतल पर नशे की खुमारी थी और ऊपर से समंदर की लहरों में झूलते हुए ऐसी चुदाई उसने पहली बार अनुभव की थी।

आखिर में जब वो झड़ी तो कुछ देर के लिए तो आनंद के अतिरेक से वो बिल्कुल निढाल पड़ गई। अगर जय तब उसे पकड़ ना लेता तो शायद वो डूब ही जाती।

थोड़ी देर बाद जब उसे थोड़ा होश आया तो नशा पूरी तरह से उतर चुका था।

जैसे ही वो सम्हालने लायक हुई उसे एक और झटका लगा।

उसकी बिकिनी बॉटम गायब थी। जब जय ने चोदने के लिए उसे नीचे सरकाया था तब तो शीतल ने उसे अपने पैर चौड़े करके घुटनों से ऊपर अटका रखा था लेकिन चुदाई के मज़े में जब उसका बदन ढीला पड़ा तो वो नीचे सरक कर लहरों में कहीं बह गई। दोनों ने मिल कर काफी ढूँढा लेकिन आसपास कहीं नज़र नहीं आई।

शीतल- मैं ऐसे बाहर नहीं निकल सकती; आप मुझे आपका बरमूडा ला कर दो ना, मैं वही पहन कर बाहर आ जाऊँगी।

जय- ऐसे घबराओ मत यार, दिमाग से काम लो। यहाँ सब औरतें नंगी ही घूम रही हैं ऐसे में तुमने बिकिनी पहनी थी वही लोगों को अजीब लग रहा था। अब तुम मेरे साइज़ का बरमुडा पहनोगी और उसे हाथ से पकड़ कर चलोगी तो सब हँसेंगे तुम पर। ऐसे ही चल दोगी तो शायद कोई देखेगा भी नहीं।

ठन्डे दिमाग से सोचा तो बात शीतल को भी सही लगी; थोड़ी हिम्मत करके वो बाहर आ गई। थोड़ी ही देर में उसे समझ आ गया कि अगर वो इस बीच पर नंगी भी घूमे तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

दोनों ने तौलिये से अपने अपने बदन को सुखाया और वहीं थोड़ा घूमने का सोचा।

जय- अब ये ऊपर की ब्रा भी निकाल ही दो। बड़ा अजीब लग रहा है, चूत दिखा रही हो और बोबे छुपा रही हो।

शीतल- हे हे… बात तो आपकी सही है, और वैसे भी यहाँ किसी को फर्क नहीं पद रहा कि मैं यहाँ नंगी खड़ी हूँ।

इतना कहकर शीतल ने बिकिनी टॉप भी निकाल दिया और खुले आसमान के नीचे पूरी नंगी हो गई। काफी देर तक दोनों वहीं बीच पर घूमते रहे। शीतल को आज़ादी का एक नया ही अहसास हो रहा था। वो नंगी ही बीच पर दौड़ लगा रही थी समंदर की आती जाती लहरों में छई-छप्पा-छई कर रही थी। जय बहुत खुश था शीतल का ये रूप देख कर।

देसी बीवी की नंगी कहानी जारी रहेगी.

 
मेरी सेक्स कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे जय ने सफलतापूर्वक अपनी देसी बीवी को पेरिस के एक बीच पर पूरी नंगी कर लिया और समुद्र के पानी में छिप पर खुलेआम चुदाई भी कर डाली.

अब आगे:

उसे समझ आ गया कि अगर वो इस बीच पर नंगी भी घूमे तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

दोनों ने तौलिये से अपने अपने बदन को सुखाया और वहीं थोड़ा घूमने का सोचा।

जय- अब ये ऊपर की ब्रा भी निकाल ही दो। बड़ा अजीब लग रहा है, चूत दिखा रही हो और बोबे छुपा रही हो।

शीतल- हे हे… बात तो आपकी सही है, और वैसे भी यहाँ किसी को फर्क नहीं पद रहा कि मैं यहाँ नंगी खड़ी हूँ।

इतना कहकर शीतल ने बिकिनी टॉप भी निकाल दिया और खुले आसमान के नीचे पूरी नंगी हो गई। काफी देर तक दोनों वहीं बीच पर घूमते रहे। शीतल को आज़ादी का एक नया ही अहसास हो रहा था। वो नंगी ही बीच पर दौड़ लगा रही थी समंदर की आती जाती लहरों में छई-छप्पा-छई कर रही थी। जय बहुत खुश था शीतल का ये रूप देख कर।

अब तो शीतल रिसोर्ट में भी नंगी घूमने से नहीं शर्मा रही थी। उस रात ठण्ड ज़रूर थी लेकिन फिर भी चाँद की हल्की रोशनी में दोनों फिर नंगे अकेले बीच पर गए। वहां एक जगह काफी सारे जुगनू दिखाई दिए। उन जुगनुओं की झिलमिल रोशनी में शीतल का नंगा बदन जब अंगड़ाई लेते हुए जय ने देखा तो उसका लंड तुरंत पत्थर का हो गया। फिर उन जुगनुओं के बीच खुले आसमान के नीचे जो चुदाई हुई वो शायद जीवन में एक ही बार होती है।

मानो चुदाई का दंगल हो जहाँ ना किसी को चित करना है ना खुद को बचाने कोशिश लेकिन फिर भी कुश्ती जारी है। ये तो बस अन्दर की उत्तेजना है जो इस रूप में बाहर आ रही है। इसमें प्यार भी है; रोमांच भी और वासना भी है। चुदाई कम हो रही थी और गुत्थम-गुत्थी ज्यादा। जब थोड़े थक जाते तो चुदाई कर लेते और फिर जोश आ जाता तो एक बार फिर दंगल शुरू हो जाता। आखिर दोनों झड़े तो दोनों ने ये माना कि इतनी अच्छी चुदाई उन्होंने कभी नहीं की थी। मज़ा आ गया!

फिर दोनों ने वहीं समंदर में अपनी रेत साफ़ की और रिसोर्ट में वापस आ कर सो गए।

अगली सुबह शीतल ने नहीं पूछा कि क्या पहनना है। आज वो फ्रेश होने के बाद नंगी ही बाथरूम से बाहर आई।

शीतल- चलो मैं तो तैयार हूँ।

जय- मैं भी तैयार हूँ। देखा नंगे रहने के कितने फायदे हैं।

उस पूरे दिन उन्होंने बीच पर मस्ती की। शीतल भी अब पूरी बेशरम हो गई थी। बीच के एक किनारे पर बड़ी सी चट्टान की ओट में चुदाई भी कर ली। बहरहाल अगले दिन यहाँ से विदा लेना था और फिर से कपड़े वालों की दुनिया में जाना था। शीतल ने वेल-बॉटम वाला पेंट और डिज़ाइनर शर्ट पहना था। शाम तक दोनों एम्स्टर्डम पहुँच गए थे। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं था तो थकान उतनी नहीं थी। जय ने उसे कुछ ख़ास दिखने के लिए साथ चलने को कहा। शीतल ने एक मैक्सी पहन ली जिसके अन्दर वो अभी भी नंगी थी। उसे अब नंगेपन का अहसास भाने लगा था।

जय उसे एम्स्टर्डम के रेड-लाइट डिस्ट्रिक्ट ले गया जहाँ जो उनकी होटल से पैदल जाने लायक दूरी पर ही था। पूरी सड़क पर जितने भी घर थे सबके सामने लड़कियां बहुत ही छोटे कपड़े पहन कर खड़ी हुई थीं। जय ने शीतल को बताया के ये सब पैसे ले कर सेक्स करने के लिए खड़ी हुई हैं।

शीतल- आप भी ना! अब मैं बिंदास हो गई हूँ तो इसका मतलब ये नहीं कि आप मुझे ऐसी जगह ले आओ। मुझसे आपका मन नहीं भर रहा क्या?

जय- अरे नहीं यार! यहाँ इस सब को गलत नहीं मानते ये सब इसको एक बिज़नस की तरह करती हैं और सरकार को टैक्स भी देती हैं।

शीतल- चलो ठीक है लेकिन फिर भी आपको क्या ज़रूरत पड़ गई यहाँ आने की? मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि आप मेरे अलावा किसी और की तरफ नज़र उठा कर भी देखो।

जय- अरे नहीं यार, तू फिकर ना कर। मैं तो तुझे दिखाने के लिए लाया था क्योंकि अपने उधर तो तुझे ले कर गया तो लोग तेरे पीछे ही पड़ जाएंगे इसलिए सोचा ये जगह सही है जहाँ तू बिना किसी फिकर के देख सकती है कि ये सब देह व्यापार कैसा होता है।

शीतल- चलो ठीक है देख लिया अब वापस चलो।

जय- हाँ अभी तो चलो लेकिन कल वापस आएँगे। यहाँ एक क्लब है वहां कल के शो की बुकिंग करवाई है।

उस रात जय ने शीतल को नहीं चोदा। थकान का बहाना करके सो गया लेकिन सच तो ये था कि उसे पता था कि शीतल को अब रोज़ चुदाई की आदत हो गई है और आज चुदाई नहीं मिली तो कल वो बहुत चुदासी रहेगी। अगली रात के सपने देखते देखते वो सो गया।

अगले दिन दोनों दिन भर ट्यूलिप गार्डन और एम्स्टर्डम की नहरों में घूमते रहे, और भी कई जगह गए लेकिन शाम से पहले होटल वापस आ गए। शाम को फ्रेश होकर तैयार होने के लिए जय ने शीतल को एक मिनी स्कर्ट और नूडल स्ट्रिंग वाला टॉप पहनने को कहा। अब तक शीतल की शर्म तो ख़त्म हो ही चुकी थी इसलिए उसने कोई नखरा तो किया ही नहीं बल्कि बिना कहे अन्दर भी कुछ नहीं पहना।

तैयार होकर डिनर के समय से पहले ही दोनों एक क्लब के सामने जा पहुंचे जिसके ऊपर लिखा था ‘बार नाईटक्लब – कासा रोज़ा’

अन्दर पहले से रिज़र्व जगह तक पहुँचाने के लिए एक लड़की साथ आई जिसने एक बड़ी चमकीली बिकिनी पहनी हुई थी। उसने उन्हें एक कमरे में ले जा कर एक सोफे पर बैठने को कहा और चली गई। ये बहुत ही आरामदायक सोफे था जिस पर दो लोग आराम से बैठ सकते थे। सोफे के सामने एक टेबल था जिस पर कुछ ग्लास और सजावटी सामान था।

 
कमरे के दूसरे कोने में ठीक वैसा ही सोफे और टेबल लगा हुआ था और इस कमरे की सामने की दीवार नहीं थी बल्कि कुछ ही दूरी पर एक स्टेज था जो दरअसल एक बड़े हॉल में थे और ये कमरा केवल इसलिए बनाया गया था कि हॉल के लोग इस कमरे के अन्दर ना देख सकें और यहाँ बैठे लोग स्टेज का शो प्राइवेट में देख सकें।

थोड़ी ही देर में एक और जोड़ा इस कमरे में आया और दूसरे सोफे पर बैठ गया।

इस दूसरे जोड़े में जो लड़की थी उसने बहुत ही छोटी मिनी स्कर्ट पहनी थी और अन्दर आ कर उसने अपना जैकेट उतार दिया जिसके अन्दर उसने एक लगभग ब्रा जैसी ही डिज़ाइनर टॉप पहनी थी। दोनों आते ही चिपक कर बैठ गए और चोंच से चोंच लड़ाने लगे।

जय ने अपना खाने-पीने का आर्डर पहले ही कर दिया था तो कुछ ही देर में वही वेट्रेस एक शैम्पेन की बोतल लेकर आई और दोनों के ग्लास भर के बोतल बर्फ की बाल्टी में रख कर दूसरे जोड़े से आर्डर लेने चली गई।

शीतल- यहाँ क्या खाने के साथ डांस का शो होता है या कोई नाटक होता है?

जय- देखते जाओ। यहाँ वो होगा जो तुमने कभी नहीं देखा होगा। अभी तो तुम अपना ड्रिंक लो। चियर्स!!!

दोनों पीने लगे… कुछ ही देर में म्यूजिक भी बजने लगा। तभी वेट्रेस उस दूसरे वाले जोड़े का आर्डर ले कर आई। उन्होंने टकीला शॉट्स आर्डर किये थे। एक ट्रे में काफी सारे छोटे छोटे ग्लास रखे हुए थे और साथ में कुछ नींबू और कुछ और भी चीज़ें थीं। उस आदमी ने कुछ कहा तो वेट्रेस ने अपनी बिकिनी ब्रा खोल दी फिर एक टॉवल से अपने स्तनों को साफ़ किया फिर एक चुचुक पर नींबू का रस और दूसरे पर नमक लगाया फिर एक टकीला ग्लास अपने दोनों स्तनों के बीच दबा कर उस आदमी के पास गई, उसने ग्लास से टकीला पी और फिर उसके दोनों चुचुकों को चूस कर नमक और नींबू चाटा।

शीतल ने जब ये देखा तो दंग रह गई। वो कुछ कहती कि तभी स्टेज पर शो शुरू हो गया।

एक लड़का और एक लड़की म्यूजिक पर डांस कर रहे थे। धीरे धीरे वो अपने कपड़े निकालने लगे और बड़ा ही मादक नृत्य करने लगे। इधर जय ने शीतल के पीछे से अपना एक हाथ उसके टॉप में डाल दिया और उसके एक स्तन को सहलाने लगा। शीतल को अब थोड़ी शर्म आने लगी।

शीतल- क्या कर रहे हो यार?

जय- उधर देखो!

शीतल ने जब देखा तो दूसरे कोने में जो आदमी था वो अपनी साथी की टॉप ऊपर सरका चुका था और उसके चूचुकों को बारी बारी चूस रहा था। कभी दोनों चुम्बन करने लगते तो वो उसके स्तनों को मसलने लगता। शीतल पर शैम्पेन का नशा असर करने लगा था। सामने वो नाचते युगल पूर्ण नग्नावस्था में बहुत मादक रूप में आलिंगन और चुम्बन करते हुए थिरक रहे थे। शीतल भी कल से चुदासी बैठी थी। उसने भी जोश में आ कर अपना टॉप निकाल दिया और जय के सर को अपने स्तनों के बीच दबा कर मसलने लगी।

स्टेज पर चुदाई शुरू हो गई थी और कमरे के दूसरे कोने में बैठा युगल भी पीछे नहीं था। वो अपनी महिला साथी को टेबल पर झुका कर पीछे से चोद रहा था। म्यूजिक की धुन भी ऐसी थी कि लग रहा था चुदाई के लिए ही बनी थी। कुछ ही देर में शीतल और जय पूरे नंगे थे और चुदाई कर रहे थे। शीतल पलटी और सोफे के बाजू पर अपनी कोहनियाँ टेक कर घोड़ी बन गई ताकि जय उसे पीछे से चोद सके लेकिन देखा कि सामने वाला जोड़ा भी ठीक उसी आसन में चुदाई कर रहा था।

सामने वाला युगल शीतल और जय को देख कर मुस्कुराया और दोनों तरफ से इशारे में ही हेल्लो-हाय हुई।

अनजान युवक- वुड यू लाइक टु स्वैप? (क्या आप अदला बदली करना पसंद करोगे)

जय- शी वोंट एप्रूव (वो मंज़ूरी नहीं देगी)

अनजान युवक- नो प्रॉब्लम (कोई बात नहीं)

शीतल और जय दोनों के लिए ही यह पहली बार था कि वो किसी के सामने ऐसे चुदाई कर रहे थे। उस पर बातें भी होने लगीं तो उत्तेजना कुछ और ही बढ़ गई और उधर स्टेज पर लड़के ने लड़की के मुख में अपना वीर्य छोड़ दिया ये देख कर शीतल झड़ने लगी और उसने भी नशे में यही करने की ठान ली और उठ कर बैठ गई अपना मुख खोल कर। इतना देख कर ही जय की उत्तेजना चरम पर पहुँच गई और उसने शीतल के मुँह में अपना वीर्य छोड़ दिया।

इतना ड्रिंक करने के बाद वैसे ही शीतल का मन कुछ नमकीन खाने का हो रहा था। उसे वीर्य का स्वाद पसंद आ गया और वो पूरा निगल गई बाक़ी जो इधर उधर लग गया था उसे भी उंगली से निकाल कर चाट गई और बाकी लंड को कोल्ड्रिंक की स्ट्रॉ जैसे चूस के उसके अन्दर से जो मिला वो भी खा गई। आखिर दोनों ने कपड़े पहने और नशे में लड़खड़ाते हुए गाने एक दूसरे को अनाप-शनाप बकते हुए होटल वापस आ गए।

यूरोप के पांच दिन पूरे हो चुके थे, अगले दिन शीतल ने जय से नहीं पूछा कि उसे क्या पहनना है। वो अपना सलवार-सूट पहन कर अपने देश वापस आने के लिए तैयार थी।

देसी बीवी की सेक्स कहानी जारी रहेगी.

 
प्रिय पाठको, मेरी कामुक कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे जय ने हनीमून के लिए यूरोप जा कर अपनी बीवी को नग्न बीच पर सबके सामने नंगी होने के लिए प्रोत्साहित किया और बाद में एक क्लब में दूसरे जोड़े के सामने उसकी चुदाई भी कर दी। जय को लगा कि इतना सब होने के बाद शायद वो विराज से चुदवाने के लिए तैयार हो जाएगी और फिर दोनों दोस्त आपस में मिल कर एक दूसरे की बीवियों को चोदेंगे। अब आगे …

यूरोप से वापस आने के बाद एक अलग ही जोश आ गया था जय और शीतल के जीवन में। अब शीतल पहले जैसी नहीं रह गई थी; उसे अब चोदा-चादी के इस खेल में मज़ा आने लगा था। दरअसल मज़ा कभी चुदाई में नहीं होता। मज़ा तो उन खेलों में होता है जो चुदाई के साथ साथ खेले जाते हैं। मज़ा समाज के उन नियमों को चकमा देने में होता है जिनको आप बचपन से बिना सोचे समझे निभाए जा रहे हो।

देर रात सुनसान सड़क पर चुदाई करने में ज्यादा मज़ा इसलिए नहीं आता कि सड़क कोई बहुत आरामदायक जगह होती है। चलती ट्रेन में सबके सोने के बाद चुदाई में ज्यादा मज़ा इसलिए नहीं आता कि वो कोई आसान काम है। दिन दिहाड़े किसी और के खेत में घुस के चोदने में ज्यादा मज़ा आता है पर इसलिए नहीं कि खेतों में कोई सौंधी खुशबू होती है।

इन सब जोखिम भरे तरीकों से चोदने-चुदाने में ज्यादा मज़ा इसलिए आता है क्योंकि एक तो जोखिम भरे काम उत्तेजना बढ़ाते हैं और ऊपर से हमारे अन्दर का जो जानवर है जिसको प्रकृति ने नंगा पैदा किया था वो वापस आज़ादी का अनुभव करता है। आज़ादी उन नियमों से जो समाज ने हम पर थोपे हैं जिनका शायद कोई फायदा भी होगा लेकिन फिर भी वो हमें अपने सर पर रखा वज़न ही लगते हैं।

शीतल इस वज़न से मुक्त हो गई थी इसलिए अब वो जय के साथ ये सारे काम करने में पूरी तरह से उसका साथ देने लगी थी। घर पर अब वो अक्सर नंगी ही रहती थी; जब भी गाँव जाते तो कभी किसी के खेत में तो कभी नदी के किनारे किसी टेकरी के पीछे चुदाई कर लेते। बस में, ट्रेन में, कभी मोहल्ले की पीछे वाली गली में तो कभी अपने ही घर की छत पर। शायद ही कोई जगह बची हो जहाँ जय ने शीतल को चोदा ना हो।

इस सब में कई महीने निकल गए। अब तो बस एक ही ख्वाहिश बाकी थी कि वो अपने दोस्त विराज के साथ मिल कर शीतल और शालू की सामूहिक चुदाई कर पाए। समय निकलते देर नहीं लगती, जल्दी ही राजन एक साल का हो गया और विराज ने उसके जन्मदिन पर जय और शीतल को बुलाया।

जन्मदिन मनाने के बाद विराज और राजन अकेले में बैठ कर बातें कर रहे थे।

जय- और सुना! शालू भाभी की टाइट हुई कि नहीं?

विराज- अरे तू भी क्या शर्मा रहा है सीधे सीधे बोल ना कि भाभी की चूत टाइट हुई या नहीं?

जय- हाँ यार वही, तूने कहा था ना कि भाभी की चूत वापस टाइट हो जाए फिर प्रोग्राम करेंगे।

विराज- इसीलिए तो तुम लोगों को बुलाया है। तेरी शीतल तैयार हो तो अभी कर लेते हैं।

जय- अरे तैयार तो हो ही जाएगी। यूरोप में जो जो करके हम आये हैं उसके बाद मुझे नहीं लगता कि मना करेगी, लेकिन फिर भी मुझे एक बार बात कर लेने दे। अगर सब सही रहा तो न्यू इयर की पार्टी मनाने तुम हमारे यहाँ आ जाना फिर वहीं करेंगे जो करना है।

विराज- ठीक है फिर। जहाँ इतना इंतज़ार किया वहां थोड़ा और सही। लेकिन अपनी यूरोप की कहानी ज़रा विस्तार में तो सुना।

फिर देर रात तक जय ने विराज को यूरोप की पूरी कहानी एक एक बारीकी के साथ सुना दी।

अगले दिन शीतल और जय शहर वापस आ गए। उस रात जय ने वो विडियो कैसेट निकाले जो वो एम्स्टर्डम से ले कर आया था। इनमें उस समय की 8-10 मानी हुई पोर्न फ़िल्में थीं। उसने उनमें से वो फिल्म निकाली जिसमें दो जोड़े आपस में एक दूसरे के पति-पत्नी के साथ मिल कर सामूहिक सेक्स करते हैं।

फिल्म को देखते देखते शीतल उत्तेजित हो कर जय का लंड और अपनी चूत सहलाने लगी।

जय- याद है, हमने भी एम्स्टर्डम में ऐसे ही किसी अनजान कपल के साथ सेक्स किया था।

शीतल- हाँ! बड़ा मज़ा आया था। लेकिन ये लोग तो अदला बदली कर रहे हैं मैंने तो आपके ही साथ किया था बस।

जय- तो अदला बदली भी कर लेती, मैंने कब मना किया था।

शीतल- अरे नहीं, ये कभी नहीं हो सकता। आपके अलावा कोई मुझे छू नहीं सकता।

जय- लेकिन मेरी इजाज़त तो तब तो कर सकती हो ना?

शीतल- अरे ऐसे कैसे … मेरा शरीर है तो आपकी इजाज़त से क्या होगा। अग्नि के सात फेरे ले कर ये शरीर आपको सौंपा है तो आपके अलावा किसी और को छूने भी नहीं दूँगी मैं।

जय- ठीक है ठीक है बाबा … लेकिन जो एम्स्टर्डम के उस क्लब में किया था वैसा कुछ तो कर सकती हो ना?

शीतल मुस्कुराती हुई- क्यों? फिर से एम्स्टर्डम चलने का मन है क्या?

जय- नहीं लेकिन वो काम तो यहाँ भी हो सकता है ना!

शीतल- यहाँ भी वैसे क्लब हैं क्या?

जय- क्लब तो नहीं हैं लेकिन तुम हाँ तो करो हम घर में ही क्लब बना लेंगे।

 
शीतल- देखना कहीं कोई गड़बड़ ना हो जाए। किसे बुलाओगे; रंडियों को?

जय- नहीं यार, वो विराज को मैंने बताया था कि हमने क्या क्या किया वहां तो उसका भी मन था। अब परदेस जाना वो चाहता नहीं है तो मैंने सोचा आगर तुम हाँ करो तो उसको और शालू भाभी को यहीं पर वो सब मज़े करवा दें।

शीतल कुछ सोचते हुए- हम्म … शालू भाभी तो शायद मान भी जाएंगी। लेकिन मुझे आपके अलावा कोई छुएगा नहीं; ये वादा करो तो मुझे मंज़ूर है।

जय- एम्स्टर्डम में भी तो किसी ने कुछ नहीं किया था ना तुमको। बस वैसे ही करेंगे। चिंता ना करो विराज नहीं चोदेगा तुमको। मैं ही चोदूँगा बस … ऐसे …

फिर जय ने इसी ख़ुशी में शीतल को जम के चोदा। शीतल भी उन यादों से काफी उत्तेजित हो गई थी। साथ साथ वो अदला-बदली करके चुदाई करने वाली फिल्म का वीडियो भी देखती जा रही थी। उसे भी चुदाई में बड़ा मज़ा आया। अगले ही दिन जय ने विराज को सन्देश भिजवा दिया कि न्यू इयर मनाने शहर आ जाए। यह तो बस एक कोडवर्ड था जिससे विराज समझ जाए कि शीतल तैयार है।

31 दिसंबर 1987 की शाम के पहले ही विराज और शालू, राजन को अपनी दादी के भरोसे छोड़ कर एक रात के लिए जय के घर आ गए। यहाँ कोई बड़ा बूढ़ा तो था नहीं, सब हमउम्र थे और ना केवल विराज-जय बल्कि शालू-शीतल के भी काफी हद तक अन्तरंग समबन्ध रह चुके थे। यह अलग बात है कि शीतल को किसी और के साथ ऐसे समबन्ध रखना सही नहीं लगता था इसलिए उसने शालू से दूरी बनाई हुई थी लेकिन आज तो उनके संबंधों में एक नया मोड़ आने वाला था।

शालू अन्दर रसोई में शीतल का हाथ बंटाने चली गई।

शालू- क्या बना रही है?

शीतल- मसाला पापड़ के लिए मसाला बना रही हूँ। खाना तो ये बोले खाने की शायद ज़रूरत ना पड़े नाश्ते से ही पेट भरने का प्रोग्राम है।

शालू- हाँ, वैसे भी ऐसे में थोड़ा पेट हल्का ही रहे तो सही है।

शीतल- तुमको पता है ना ये दोनों क्या क्या सोच कर बैठे हुए हैं?

शालू- मुझे इनके प्लान का तुझसे तो ज्यादा ही पता रहता है।

शीतल- हाँ, जब इन्होंने कहा तो मुझे यही लगा था कि तुम तो तैयार हो ही जाओगी।

शालू- देख शीतल! मेरा तो सीधा हिसाब है पति बोले तो मैं तो किसी और से भी चुदवा लूँ।

शीतल- हाय दैया! दीदी, आप भी ना … कैसी बातें करती हो।

इधर शालू और शीतल की बातें शुरू हो रहीं थीं जिसमें यूरोप की यात्रा की यादें थीं तो शालू की टिप्पणियां भी थीं कि अगर वो होती तो क्या क्या हो सकता था। शालू शीतल को और भी बिंदास बनाने की कोशिश कर रही थी। उधर विराज और जय योजना बना रहे थे कि कैसे इन महिलाओं की स्वाभाविक शर्म के पर्दे को गिराया जाए और अपने लक्ष्य तक पहुंचा जाए।

जय- बाकी सब तो ठीक है यार लेकिन शीतल ने साफ़ कह दिया है कि वो मेरे अलावा किसी और से नहीं चुदवाएगी। मैंने सोचा एक बार साथ मिल के चुदाई तो कर लें फिर हो सकता है उसकी हिम्मत बढ़ जाए और हम अदला-बदली भी कर पाएं।

विराज- तू फिकर मत कर, मैं शालू को ही चोदूँगा। लेकिन शालू ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी है, तो अगर तुम दोनों का जुगाड़ जम जाए तो मुझे आपत्ति नहीं है, तू शालू को चोद सकता है।

रात 9 बजे तक तो ऐसे ही बातें चलती रहीं और उधर रसोई का काम ख़त्म करके शीतल और शालू भी तैयार हो गईं थीं। फिर दारु पीते हुए गप्पें लड़ाने का दौर शुरू हुआ। विराज और जय स्कॉच पी रहे थे और महिलाओं के लिए व्हाइट वाइन लाई गई थी।

कुछ देर तक इधर उधर की बातों के बाद यूरोप की बातें शुरू हुईं। शीतल शर्म से पानी पानी हुए जा रही थी लेकिन शालू आगे होकर शीतल की बताई हुई बातें चटखारे लेकर सुना रही थी।

विराज- फिर वो नंगे बीच पर बस नंगे होकर घूमे ही … या कुछ किया भी?

जय- दिन में तो नहीं, लेकिन रात को किया था … जुगनुओं के साथ।

शालू- क्या बात कर रहे हो जय भाईसाहब। बस जुगनुओं के साथ? शीतल तो बता रही थी किसी क्लब में किसी और जोड़े के साथ भी किया था?

शीतल (धीरे से)- क्या दीदी आप भी … सबके सामने!

आखिर सबने मिल कर एक सेक्सी फिल्म देखने का फैसला किया। जय ने जो ब्लू फिल्मों की कैस्सेट्स लेकर आया था उनमें से सबसे कम सेक्स वाली फिल्म लगा दी। इसमें चुदाई को बहुत ज्यादा गहराई से नहीं दिखाया था। बस नंगे होकर चुम्बन-आलिंगन तक ही दिखाया था लेकिन बहुत ही उत्तेजक तरीके से जैसे कि स्तनों को लड़के की छाती से चिपक कर दबना या उनकी जीभों का आपस में खेल करना जो कि काफी करीब से फिल्माया गया था। इसको देख कर सब काफी उत्तेजित हो गए थे।

शालू विराज के साथ ही बैठ गई थी और विराज मैक्सी के ऊपर से ही उसके स्तनों को दबा रहा था। एक बार तो उस से रहा नहीं गया और उसने उंदर हाथ डाल कर शालू का एक स्तन मसल डाला। उधर वाइन का असर शीतल पर भी होने लगा था और इस फिल्म के दृश्यों ने उसकी वासना भड़का दी थी वो भी जय के साथ जीभ से जीभ लड़ा कर चुम्बन करने लगी।

कहानी जारी रहेगी

 
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