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वासुदेव चला गया और जब तक वह आँखों से ओझल न हो गया दोनों उसे देखते रहे । कमरे में मौन छा रहा। फिर माधुरी बोली
"पशुओं का पागल हो जाना भी बड़ा भयानक होता है।"
"हाँ, और मानव का पागल होना इससे भी भयानक है।" । टंडी-ठंडी वायु चल रही थी। वह ड्योढ़ी से बाहर निकलकर झील के किनारे आ पहुंचे और लहरों का नृत्य देखने लगे। अभी तक माधुरी के मस्तिष्क पर वही घटना छाई हुई थी।
___राजेन्द्र चलते-चलते रुक गया और हरी दूब के एक टुकड़े पर माधुरी को बैठ जाने को कहा। वह झील के किनारे पर अपने पाँव पानी में डालकर बैट गई । राजेन्द्र की ओर उसकी पीठ थी। दोनों अपने-अपने विचारों में खोये बैठे थे। अन्त में राजेन्द्र ने मौन भंग किया और कहा
"माधुरी ! कहते हैं कि स्त्री, पुरुष की सब से बड़ी दुर्बलता है।"
'पुरुषों की दृष्टि में 'मैं तो समझती हूँ कि इस पाड़ में वह स्त्री को खिलौना बनाकर अपना मन बहलाते हैं, और जब मन भर जाता है तो उसे तोड़-फोड़कर फेंक देते हैं।" माधुरी ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया। . "किन्तु, तुम से तो कोई ऐसा बरताव नहीं हुमा ? यह खिलौना अभी तो बहुत सुन्दर है।"
"बस, एक दिन यह भी स्वयं ही टूट जायेगा।"
"माधुरी ! ऐसी बात क्यों करती हो' 'मन दुखी होता है।"
"क्यों ?"
"न जाने यह सहानुभूति क्यों !"
"श्राप बनाने लगे क्या ?"
"क्या तुम ऐसा समझती हो' 'मुझे तुमसे यह पाशा न थी।"
'और आप मुझे भुला देंगे मुझे भी आपसे यह पाशा न थी।"
"ब्याह हो जाने के पश्चात् स्त्री पराई हो जाती है और उससे प्यार किया जाना पाप होता है।"
. "आप तो पाप करने से पूर्व ही प्रायश्चित करने लगे।"
"क्यों?"
"मेरा अभिप्राय था ''इनकी याद आई और मिलने चले आये।"
"तुम्हारे पति तो मेरे मित्र हैं।"
"और मैं शत्रु..'यही ना?"
"नही तो मेरा अभिप्राय था, तुम एक स्त्री हो और यह..."
"क्या स्त्री किसी की मित्र नहीं रह सकती!"
'ब्याह के पश्चात् समाज की दृष्टि में ऐसी मित्रता कुछ अनुचित . सी है।"
"यही कि कुछ और भी?"
"और यह कि स्त्री की मित्रता का क्या विश्वास..."
माधुरी झुंझला उठी और पाँव से पानी के छींटे उड़ाती हुई झट उठकर वापस जाने लगी। राजेन्द्र ने लपककर उसका पल्लू पकड़ लिया। माधुरी ने झटके से पल्लू उससे छुड़ा लिया और तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखने लगी।
"पशुओं का पागल हो जाना भी बड़ा भयानक होता है।"
"हाँ, और मानव का पागल होना इससे भी भयानक है।" । टंडी-ठंडी वायु चल रही थी। वह ड्योढ़ी से बाहर निकलकर झील के किनारे आ पहुंचे और लहरों का नृत्य देखने लगे। अभी तक माधुरी के मस्तिष्क पर वही घटना छाई हुई थी।
___राजेन्द्र चलते-चलते रुक गया और हरी दूब के एक टुकड़े पर माधुरी को बैठ जाने को कहा। वह झील के किनारे पर अपने पाँव पानी में डालकर बैट गई । राजेन्द्र की ओर उसकी पीठ थी। दोनों अपने-अपने विचारों में खोये बैठे थे। अन्त में राजेन्द्र ने मौन भंग किया और कहा
"माधुरी ! कहते हैं कि स्त्री, पुरुष की सब से बड़ी दुर्बलता है।"
'पुरुषों की दृष्टि में 'मैं तो समझती हूँ कि इस पाड़ में वह स्त्री को खिलौना बनाकर अपना मन बहलाते हैं, और जब मन भर जाता है तो उसे तोड़-फोड़कर फेंक देते हैं।" माधुरी ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया। . "किन्तु, तुम से तो कोई ऐसा बरताव नहीं हुमा ? यह खिलौना अभी तो बहुत सुन्दर है।"
"बस, एक दिन यह भी स्वयं ही टूट जायेगा।"
"माधुरी ! ऐसी बात क्यों करती हो' 'मन दुखी होता है।"
"क्यों ?"
"न जाने यह सहानुभूति क्यों !"
"श्राप बनाने लगे क्या ?"
"क्या तुम ऐसा समझती हो' 'मुझे तुमसे यह पाशा न थी।"
'और आप मुझे भुला देंगे मुझे भी आपसे यह पाशा न थी।"
"ब्याह हो जाने के पश्चात् स्त्री पराई हो जाती है और उससे प्यार किया जाना पाप होता है।"
. "आप तो पाप करने से पूर्व ही प्रायश्चित करने लगे।"
"क्यों?"
"मेरा अभिप्राय था ''इनकी याद आई और मिलने चले आये।"
"तुम्हारे पति तो मेरे मित्र हैं।"
"और मैं शत्रु..'यही ना?"
"नही तो मेरा अभिप्राय था, तुम एक स्त्री हो और यह..."
"क्या स्त्री किसी की मित्र नहीं रह सकती!"
'ब्याह के पश्चात् समाज की दृष्टि में ऐसी मित्रता कुछ अनुचित . सी है।"
"यही कि कुछ और भी?"
"और यह कि स्त्री की मित्रता का क्या विश्वास..."
माधुरी झुंझला उठी और पाँव से पानी के छींटे उड़ाती हुई झट उठकर वापस जाने लगी। राजेन्द्र ने लपककर उसका पल्लू पकड़ लिया। माधुरी ने झटके से पल्लू उससे छुड़ा लिया और तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखने लगी।