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काली घटा/ गुलशन नन्दा KALI GHATA by GULSHAN NANDA

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वासुदेव चला गया और जब तक वह आँखों से ओझल न हो गया दोनों उसे देखते रहे । कमरे में मौन छा रहा। फिर माधुरी बोली

"पशुओं का पागल हो जाना भी बड़ा भयानक होता है।"

"हाँ, और मानव का पागल होना इससे भी भयानक है।" । टंडी-ठंडी वायु चल रही थी। वह ड्योढ़ी से बाहर निकलकर झील के किनारे आ पहुंचे और लहरों का नृत्य देखने लगे। अभी तक माधुरी के मस्तिष्क पर वही घटना छाई हुई थी।

___राजेन्द्र चलते-चलते रुक गया और हरी दूब के एक टुकड़े पर माधुरी को बैठ जाने को कहा। वह झील के किनारे पर अपने पाँव पानी में डालकर बैट गई । राजेन्द्र की ओर उसकी पीठ थी। दोनों अपने-अपने विचारों में खोये बैठे थे। अन्त में राजेन्द्र ने मौन भंग किया और कहा

"माधुरी ! कहते हैं कि स्त्री, पुरुष की सब से बड़ी दुर्बलता है।"

'पुरुषों की दृष्टि में 'मैं तो समझती हूँ कि इस पाड़ में वह स्त्री को खिलौना बनाकर अपना मन बहलाते हैं, और जब मन भर जाता है तो उसे तोड़-फोड़कर फेंक देते हैं।" माधुरी ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया। . "किन्तु, तुम से तो कोई ऐसा बरताव नहीं हुमा ? यह खिलौना अभी तो बहुत सुन्दर है।"

"बस, एक दिन यह भी स्वयं ही टूट जायेगा।"

"माधुरी ! ऐसी बात क्यों करती हो' 'मन दुखी होता है।"

"क्यों ?"

"न जाने यह सहानुभूति क्यों !"

"श्राप बनाने लगे क्या ?"

"क्या तुम ऐसा समझती हो' 'मुझे तुमसे यह पाशा न थी।"

'और आप मुझे भुला देंगे मुझे भी आपसे यह पाशा न थी।"

"ब्याह हो जाने के पश्चात् स्त्री पराई हो जाती है और उससे प्यार किया जाना पाप होता है।"

. "आप तो पाप करने से पूर्व ही प्रायश्चित करने लगे।"

"क्यों?"

"मेरा अभिप्राय था ''इनकी याद आई और मिलने चले आये।"

"तुम्हारे पति तो मेरे मित्र हैं।"

"और मैं शत्रु..'यही ना?"

"नही तो मेरा अभिप्राय था, तुम एक स्त्री हो और यह..."

"क्या स्त्री किसी की मित्र नहीं रह सकती!"

'ब्याह के पश्चात् समाज की दृष्टि में ऐसी मित्रता कुछ अनुचित . सी है।"

"यही कि कुछ और भी?"

"और यह कि स्त्री की मित्रता का क्या विश्वास..."

माधुरी झुंझला उठी और पाँव से पानी के छींटे उड़ाती हुई झट उठकर वापस जाने लगी। राजेन्द्र ने लपककर उसका पल्लू पकड़ लिया। माधुरी ने झटके से पल्लू उससे छुड़ा लिया और तीखी दृष्टि से उसकी ओर देखने लगी।
 
"बुरा मान गई क्या ?" राजेन्द्र ने कुछ सोचते हुए नम्र स्वर में पूछा।

"पाप बातें जो ऐसी करने लगे।"

"वह तो मैं हंस रहा था 'माधुरी ! तुम्हें क्या बताऊँ कि इतने समय बाद अकस्मात् तुम्हें यहाँ देखकर मैं कितना प्रसन्न हुआ हूँ !"

"पुरुषों को बनाना खूब प्राता है।"

"क्या करें. स्त्रियां भी तो यही चाहती हैं,"-राजेन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा । माधुरी के गम्भीर मुख पर भी मुस्कान खेलने लगी और वह फिर वहीं बैठ गई।

___ इन छोटे-छोटे चुभते हुए वाक्यों में दोनों को प्रानन्द पा रहा था । कालिज में भी वह ऐसे ही एक-दूसरे को छेड़ा करते थे । एक समय के पश्चात् दोनों के मन में एक साथ सोई हुई आकांक्षायें जाग्रत हुई। ___ वासुदेव को गये हुए बड़ा समय हो चुका था। दोनों सब कुछ भुला कर झील के किनारे अतीत को याद करके बातों में व्यस्त थे। वही पुरानी घनिष्ठता लौटती आ रही थी। माधुरी हरी, कोमल दूब पर पेट के बल लेटी एक हाथ से झील के पानी को चीर रही थी और राजेन्द्र पास ही बैठा उसके मदमाते यौवन को निहार रहा था।

झील की लहरों के समान राजेन्द्र के मस्तिष्क में कई विचार उठ रहे थे। वह सोचने चला, 'वासुदेव को माधुरी से प्रेम नहीं और माधुरी के लिये विवाहित जीवन पहाड़ सा बन रहा है। ऐसे में वह फिर माधरी को पाने का प्रयत्न करे तो इसमें बुरा क्या है...! वह दोनों तो एक दूसरे को अब भी वैसे ही चाहते हैं । वह एक-दूसरे को भली प्रकार समझते हैं, इकट्ठ पढ़े हैं, उनके विचार मिलते हैं।'

फिर सहसा उसे यह विचार प्राता कि वासुदेव उसका प्रिय मित्र है वह मित्र से विश्वासघात करे ? उसकी विवाहिता पत्नी के विषय में । सोचे और उसके अपवित्र विचार इस नई लहर से धुल जाते । परन्तु, फिर माधुरी पर दृष्टि पड़ती, उसका सौन्दर्य... उसका अंग-अंग उसे पुकारता हुआ दिखाई पड़ता और फिर वही पहली लहरें चलने लगती... उन दोनों ने मिलकर प्रेम-निर्वाह का प्रण किया था. कल्पना में अपने भावी जीवन के कितने सुन्दर महल बनाये थे ---- उन्होंने एक ही मन से मिलकर प्राज से कितना समय पहले कल्पना में अपने भविष्य का निर्माण किया था जिसमें वसंत ही वसंत होगी, फूल ही फूल होंगे और होगी भीनी भीनी दो साँसों की सुगंध, दो हृदयों का संगीत-किन्तु, समय-चक्र आया और उसे युद्ध पर जाना पड़ा वह अलग हो गये, कल्पना के महल ढह गये और जब वह युद्ध से लौटा तो उसे पता चला कि माधुरी ने व्याह कर लिया है।

- अपने प्रेम का यह अन्त देखकर उसका मन टूट गया. उसका रुपा रुग्राँ पीड़ा से कराहने लगा."उसे संसार से घृणा सी हो गई और उसने कभी ब्याह न करने का प्रण कर लिया बरसों वह इस ज्वाला में जलता रहा । उसने उसे भुला देने का बड़ा प्रयत्न किया, किन्तु, वह उसकी छवि को बिल्कुल मन से न मिटा सका" समय बीतता गया और वह शान्त होता गया 'अतीत और माधुरी का विचार उसके लिये इतना कष्टप्रद न रहा। ___ और अकस्मात् जब वह अपने मित्र के यहाँ आया तो बरसों की दबी ज्वाला धधक पड़ी। उसे इस बात का लेश-मात्र भी विचार न था कि वह अपनी प्रेमिका को देख पायेगा, और वह भी इतना निकट से।

माधरी अब उठ बैठी थी और राजेन्द्र उसे एकटक देखे जा रहा था। भाग्य ने उन दोनों को दूर करके फिर मिला दिया था। न जाने कितनी देर बह उसे ही देखता रहता, यदि माधुरी यह प्रश्न न कर देती---

"यह आप मुझे घूर-पूरकर क्रोध से क्यों देख रहे हैं ?"

"क्रोध से नहीं, प्यार से..." ..

"आपका मुख तो कुछ और ही कह रहा है।"

"किसी अन्यायी पर क्रोध आ रहा है ।" .

"किस पर?"

"तुम्हारे पति पर, जो तुम्हें यूं तड़पाकर अतृप्त मार रहा है, जो तुम्हारे यौवन से इतना विमुख है।"

माधुरी के मन को ठेस सी लगी । वह घुटनों में मुंह देकर कुछ सोचने लगी। राजेन्द्र ने देखा कि उसके माथे पर पसीने की बूंदें एकत्र हो गई थीं। कुछ देर यू ही मौन छाया रहा और फिर राजेन्द्र बोला

"माधुरी ! एक बात पूछता हूँ, चतामोगी ?"

"क्या ?"

"वचन दो कि झूठ न कहोमी ।"

"पाप पूछिये तो !"

"क्या तुम अब भी मुझ से प्यार करती हो?"

राजेन्द्र की यह बात सुनकर वह सहसा कॉप सी गई और झट मुंह मोड़कर खड़ी हो गई । अभी वह अपने प्रश्न को दोहरा भी न पाया था कि झील में चप्पुत्रों की ध्वनि सुनकर दोनों एक साथ मुड़े और सामने फैली हुई झील को देखने लगे । दूर उस पार से एक नाव मा रही थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा और माधुरी बोली

"चलिये ! वह आ गये।" ।

दोनों वहाँ से उठकर चोरों की भांति घर में आये और अपने-अपने कमरे में चले गये, मानो घर से बाहर गये ही न थे।
 
वासुदेव ने गोल कमरे में प्रवेश करते ही ऊंचे स्वर में मंगा को पुकारा । दोनों ने उसका स्वर सुना, किन्तु अपने-अपने कमरे में लेटे रहे। वासुदेव ने राजेन्द्र के कमरे में पांव रखा और उसे यू लेटे देखकर चोला-----

"यह क्या, अभी तक नहाये भी नहीं ?"

"नहीं, तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था।" 'माधुरी कहाँ है ?"

"अपने कमरे में होगी।"

राजेन्द्र की बात सुनकर वासुदेव अपने कमरे में गया । माधुरी कमरे की झाड-पोंछ में लगी हुई थी । द्वार पट आहट हुई और वह संभली । वासुदेव ने पूछा

"क्या हो रहा है ?"

"आपकी प्रतीक्षा ; कहिए ! क्या बना बिचारे कोचबान का ?"

"डाक्टरों को सौंप दिया है, प्राशा है ठीक हो जायेगा।"

माधुरी कुछ और पूछना ही चाहती थी कि उसी समय राजेन्द्र द्वार के भीतर आया । उसे देखकर वह झेप सी गई और अल्मारी में कपड़े रखने लगी। - "राजेन्द्र ! तुम दोनों एक साथ कालेज में पढ़ते रहे हो ना ?" वासुदेव ने माधुरी की भेंप को भांपते हुए मुस्कराकर राजेन्द्र की मोर देखा।

"हाँ तो...?" –

"मुझे विश्वास नहीं पा रहा था।"

"क्यों ?"

"इसलिए कि यह एक दूसरे से झपना---अपरिचितों सा बरताव एक ही घर में दोनों का अलग-अलग कमरे में घुसे रहना..." __

_ "तो क्या करते ?" राजेन्द्र ने प्रश्न किया और एक छिपी दृष्टि से माधुरी की अोर देखने लगा।

"कुछ नहीं तो बातें ही करते ।"

"बाने! आपकी पत्नी से ! कैसे सम्भव था ?"

"क्यों?"

"वह तो पाप से भी अपरिचितों के समान रहती है, भला मुझसे क्या बोलेगी।"

वासुदेव संकेत को भांप गया और चुप हो गया ! माधुरी बाहर जाने लगी।

"माधुरी !" वासुदेव ने उसे जाते देखकर पुकारा। "जी" वह रुक गई किन्तु मुड़कर देखने का साहस न कर सकी।

"कहाँ चलीं ?" वासुदेव ने पूछा।

"आपके लिए नाश्ता लाने ।"

"तुम दोनों क्या खा चुके ?"

"नहीं तो, आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे,"-माधुरी यह कहकर बाहर चली गई और बह राजेन्द्र के पास बैठकर उससे बातें करने लगा। श्राज राजेन्द्र के मुख पर कुछ परिवर्तन सा दिखाई पड़ रहा था। उसने चाहा कि अपने अतिथि-मित्र से इस बात का कारण पूछे पर कुछ सोच कर सुप हो गया ।

कुछ समय पश्चात् वे लोग नाश्ते पर बैठे । माधरी चाय बनाने लगी। तीनों में कुछ विचित्र तनाव सा था, घबराये से, घुटे से थे । सब मौन थे । वासुदेव अधिक समय तक इस वातावरण को सहन न कर सका और बोला, "राजी ! मेरी बात मानो तो अब तुम ब्याहकर डालो।"

"सहसा, यह विचार कैसे पाया तुम्हें ?" राजेन्द्र ने पहले उसकी और फिर माधुरी की ओर देखा । माधुरी चाय में चीनी मिला रही थी। वह बात सुनते ही उसका हाथ रुक गया।

वासुदेव ने चाय का प्याला उठाते कहा, "हाँ, जीवन की सुख-सुविधा के लिए।"

"समय पर खाने को मिल जाये, पहनने को कपड़े मिल जायें। हर समय कोई प्रतीक्षा में दीवार पर खड़ा रहे क्या जीवन की सुख-सुवि धायें यहीं तक सीमित हैं ?"

"सुख-सुविधा में तो बहुत कुछ है, किन्तु थोड़ा सा भी सुख देने वाले साथी में एक गुण होना आवश्यक है,"-वासुदेव ने चाय पीते हुए कहा ।

___ "क्या ?" राजेन्द्र ने पूछा। __

"इस सुख और प्यार में उपकार की भावना न हो, जो कुछ हो मन से हो।"
 
उसी समय दोनों ने एक साथ माधुरी को देखा । वह चुपचाप किसी विचार में डूबी धीरे-धीरे चाय पी रही थी। उसके माथे पर पसीने की बूदें झलक रही थीं।

वासुदेव ने प्यार से माधुरी का हाथ अपनी हथेली में लेकर कहा "क्या मैंने झूठ कहा है, माधुरी ?"

"जी ! आप..," वह चौंक गई और फिर सँभलते बोली, "प्राप कभी झूठ कह सकते हैं !"

यह कहकर वह उठी और चाय का पानी लेने बाहर चली गई। राजेन्द्र ने पहले उसे और फिर वासुदेव को देखा। वह झंप गया। आँगन में गंगा खड़ी थी, उसने माधुरी के हाथ से चायदानी ले ली। माधुरी भीतर लौट आई और उनके पास से होकर दूसरे कमरे में जाने लगी। अभी वह कमरे में ही थी कि राजेन्द्र ने होंटों पर हँसी उत्पन्न करते हुए

कहा

"तो भाई ! एक लड़की ढूढ़ दो ना !"

"कैसी लड़की चाहिये ?"

"जैसी तुम पसन्द करो।"

"मेरी पसन्द ! वह तो माधुरी जैसी ही होगी।"

"तो ऐसी ही ला दीजिये।"

वासुदेव झेप गया और चुप हो गया। राजेन्द्र ने उसके मन में उठते हुए ज्वार-भाटे को भांप लिया था और साथ ही पर्दे के नीचे उन लाल सलीपरों को भी देख लिया था जो संगमरमर के समान कोमल और गोरे-गोरे पैरों को छिपाये हुए थे। माधुरी छिपकर उनकी बातें सुन रही थी। थोड़े समय तक दोनों चुप रहे । गंगा ने आकर चाय का पानी रख दिया और राजेन्द्र प्यालों में चाय उडेलने लगा।

'वासुदेव ! इन पहाड़ियों में क्या तुम्हारा मन नहीं घबराता ?" राजेन्द्र ने पूछा।

"मैं यहाँ अकेला तो नहीं. 'माधुरी है और उसके साथ क्या बुरा लगेगा !"

“मेरा अभिप्राय है-यह वातावरण, यह सूना-सूना घर'"एक-दो बच्चे होते तो यह मौन दीवारें चहकने लगतीं।"

"राजेन्द्र ने ध्यानपूर्वक देखा। यह बात सुनकर वासुदेव का मुख पीला पड़ गया था। चाय का प्याला कठिनता मे उसके हाथ से गिरते गिरते बचा था। उसने उसके और माधुरी के खाली प्याले में चाय उडेली और हिलते हुए पर्दे को देखकर ऊंचे स्वर में पुकारा। _ माधुरी झट दूसरे कमरे से निकल आई। राजेन्द्र ने प्याला उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा

"लो''चाय ठंडी हो रही है।"

"और इच्छा नहीं।"

"अब तो ले लो बना हुआ है साथ के लिए ही सही।"

वह चुप हो गई और प्याला थामकर चाय पीने लगी। तीनों चुप थे. अपने-अपने विचार में, किन्तु तीनों के विषय का केन्द्र एक था।

"माधुरी !"

"मोह ! पाप !"

"वासुदेव कहाँ है ?"

"चले गये।"

"कहाँ ?” राजेन्द्र विस्मय से बोला।

"भील के उस पार''आधीरात को कोई व्यक्ति आया था। कोचवान की दशा कुछ बिगड़ गई है 'शायद उसे शहर ले जाना पड़े।"

"कब लौटेगा?"

"कुछ कह नहीं गये 'यदि शहर चले गये तो सम्भव है रात हो जाये।"

राजेन्द्र उसकी बात सुनकर चुप हो गया। वह अभी-अभी बिस्तर से उठा था और वासुदेव को ढूंढता हुअा माधुरी के कमरे में आया था। वह उस समय ड्रेसिंग टेबल को ठीक लगा रही थी। राजेन्द्र ने मेज पर रखा अखबार उठाया और बालकनी में कुर्सी बिछाकर उसको पढ़ने लगा।
 
सवेरे का सुहाना समय था। झील की ओर से प्राती हुई शीतल पवन शरीर में नवजीवन भर रही थी। प्रारम्भ के दिनों में वासुदेव के चले जाने पर राजेन्द्र को बड़ा विचित्र सा लगता था। उसकी अनुपस्थिति में वह बड़ा एकाकीपन सा अनुभव करता और दिन भर खोया-खोया

सा रहता, किन्तु अब उसे उसकी अनुपस्थिति न अखरती। माधुरी के साथ अकेले में बोलने-चालने और हँसने-खेलने में उसे एक मानसिक तृप्ति मिलती। उसके होते दोनों में कोई भी खुलकर बातें कर सकता। माधुरी ऐसी स्थिति में क्या सोचती होगी, क्या अनुभव करती होगी, इसका वह ठीक अनुमान नै लगा सकता था।

उसकी पीठ पर आहट हुई, किन्तु ; वह मुड़ा नहीं । आने वाले के पैरों की चाप उसकी जानी-पहचानी थी। बालकनी का पर्दा हटा और माधुरी चाय का प्याला लिये हुए उसके सामने आ खड़ी हुई । राजेन्द्र ने सरसरी दृष्टि उस पर डाली और कहा

"गंगा से कह दिया होता।"

"अतिथि का ध्यान जितना हम रख सकते हैं. नौकर नहीं रख सकते।"

"तो क्या तुम अभी तक मुझे अतिथि ही समझ रही हो ?" "जी''आपका अपना व्यवहार ही कुछ अतिथियों सरीखा है।" "क्यों ? मैंने ऐसी क्या बात की है ?"

"जब से मन की बात कही है 'आप अनजान से बन बैठे हैं... अपरिचितों का सा व्यवहार करने लगे हैं. दोष मेरा ही है। मुझे आप से यह सब कुछ न कहना चाहिये था।" ___

"नहीं माधुरी ! ऐसी बात नहीं-सोचता हूँ भावना में प्राकर भूल से कुछ ऐसी बात न कर बैलूं कि मित्र की दृष्टि में मुझे हीन होना पड़े..."

"अाप तो बड़ी दूर की सोचने लगे।"

राजेन्द्र ने कोई उत्तर न दिया और चाय पीने लगा। कुछ देर बाद बोला, "अाज दिन क्योंकर कटेगा ?"

"कुछ हँसते और कुछ रोते ।”

"वह कैसे ?"

'यही तो जीवन है ''कुछ हँस के कट जाता है और कुछ रोकर ।"

"जब रोने लगो तो मुझे पहले बता देना''मुझे रोना कठिनता से आता है।"

राजेन्द्र की बात सुनकर माधुरी खिल-खिलाकर हँस पड़ी। अाज उसको मुस्कान में कुछ विशेष मोहनी थी जो इससे पहले उसने कभी अनुभव न की थी । उसका मुख पहले से खिला हुआ था जैसे मलया निल से कोई कली फूट पड़ी हो। . उसी समय चौकीदार वासुदेव का सन्देश लेकर आया, “मालिक

रात तक न आ पायेंगे।"

"क्यों? सब कुशल तो है ?"

"कोचवान के शरीर में विष फैल गया है और वह उसे शहर में बड़े हस्पताल ले गये हैं।"

चौकीदार यह सूचना देकर चला गया। राजेन्द्र ने देखा, उसका मुख क्षण भर के लिए मलिन हुना और फिर खिल उठा । राजेन्द्र से आँखें मिलाते हुए धीरे से कहा

"चलो, यह कष्ट भी दूर हुआ।"

"कैसा कष्ट ?"

"प्रतीक्षा का 'वह रात से पहले न लौटेंगे।"

"तब तो दिन मेरे लिए पहाड़ बन जायेगा।" राजेन्द्र ने बनते हुए कहा।

"क्यों ? क्या मैं आपके पास नहीं हैं ?"

"तुम हो तो क्या ? उनकी और बात है । वह पुरुष, तुम ठहरी स्त्री। स्त्री से तो मन खोलकर बात भी नहीं कर सकते ।"

राजेन्द्र की व्यंगात्मक बात सुनकर वह गम्भीर हो गई और मुंह बनाकर बाहर जाने लगी। राजेन्द्र ने उसे रोककर कहा

"बिगड़ गईं ?" "मैं कोई पुरुष तो नहीं हूँ, जो आप मेरे साथ को साथ समझे । मैं

कौन होती हूँ आपकी ?"

"इसीलिए तो कहता हूँ, स्त्री का मन बहुत छोटा होता है।"

"कहिये तो चौकीदार को भिजवा दू! पुरुष है और शरीर से तगड़ा भी। आपका दिन अच्छा कट जायेगा।" __ माधुरी की बात सुन वह जोर से हंसने लगा। उसने देखा कि वह भी दबे होंटों मुस्करा रही है । राजेन्द्र ने उसे बाँह से थामते हुए कहा

"एक बात कहूँ, मानोगी ?"

"कहिये !"

"चलो, कहीं पिकनिक को चलें !"

उसका प्रश्न सुनकर माधुरी घबरा गई थी कि न जाने वह क्या कहेगा ; किन्तु, पिकनिक का प्रस्ताव सुनकर उसका मुख चमक उठा। क्षण भर के लिये उसने कुछ सोचा और स्वीकृति में सिर हिलाते भीतर भाग गई।
 
कुछ समय पश्चात् दोनों झील के किनारे हाथ में हाथ दिये बढ़ते जा रहे थे । पिकनिक के सामान के झोले उन्होंने कंधों से लटका रखे थे।

उन्होंने पिकनिक के लिये वही स्थान चुना, जहाँ एक दिन वह तीनों पाये थे। उस दिन की अपेक्षा आज वह अति प्रसन्न थे । आज उन्हें कोई भय न था, वह स्वतंत्र थे। उन्हें ऐसा लग रहा था कि विधि ने उन्हें एक ऐसे गोलाकार में रख दिया जो धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा है यहाँ तक कि वह शीघ्र एक दूसरे में मिल जायेगे, एक हो जायेंगे। ____

"आज तैरना न सिखाओगे ?" माधुरी न बैठते हुए धोरे से राजेन्द्र को कहा।

"एक वचन पर।"

"क्या ?" माधुरी सोच में पड़ गई कि वह कौनसा वचन मांगने वाला है । उसका मुख फिर गम्भीर पड़ गया ।

"मेरे साथ मंझधार तक चलना पड़ेगा।"

“यदि डूब गई तो...?"

"नहीं, मैं किसलिये हैं ?"

"आपका क्या विश्वास-कहीं हाथ छोड़ दें तो..."

"तो मैं कहाँ जाऊँगा ?" हँसते हुए राजेन्द्र बोला।"

"धोखा दिया तो?"

"राजेन्द्र ने उसकी बाँह पकड़ ली और अपनी ओर खींचते हुए बोला, "धोखा तो स्त्री देती है, पुरुष नहीं।"

यह कहते हुए वह उसे खींचकर अपने साथ पानी में ले गया । स्थिर पानी में हलचल सी मच गई और दूर-दूर तक लहरें वृत्ताकार से बनाती चली गईं। हाथ-पांव चलाने से पानी उछलने लगा। माधुरी की चीखों से और फिर दोनों की मिली-जुली हंसी से वातावरण गूजने लगा। राजेन्द्र हाथों से उसकी पीठ को सहारा दिये हुए था और वह धीरे-धीरे तैरती हुई गहरे पानी की ओर जा रही थी। कभी कोई मछली धीरे से उसके शरीर को छू जाती तो एक बिजली सी दौड़ जाती और वह एक गुदगुदी सी अनुभव करने लगती।

• तैरते-तैरते वह थक गई। उसके हाथ-पांव शिथिल पड़ गये और राजेन्द्र ने दोनों हाथों में उसके कोमल शरीर को थाम लिया। माधुरी ने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दिया और गठड़ी सी बनी उसकी बाँहों में प्रा गई। इस शीतल जल में भी उसके गोरे शरीर की हल्की सी गर्मी उसे रोमांचित कर रही थी। उसने प्यारभरी दृष्टि से उसको देखा और उसके अतृप्त जीवन पर उसे तरस सा पाने लगा।

पानी से निकालकर उसने धीरे से उसे झील के किनारे की हरी दुब पर खड़ा कर दिया। उसके शरीर से चिपके हुए कपड़ों से पानी निचुड़ रहा था और वह आँखें बन्द किये अपने शरीर का बोझ उस पर डाले खड़ी थी। राजेन्द्र ने हल्के से उसके गालों को थपथपाया । उन्मा दित अखड़ियाँ धीरे से खुली और वह अपने पाँव पर खड़ी हो गई।

राजेन्द्र ने सहारा देकर उसे घास पर बिठा दिया और स्वयं थोड़ी दूर औंधा लेटकर सुस्ताने लगा।

न जाने कितनी देर तक दोनों बेसुध पड़े रहे। राजेन्द्र अभी तक उस गुदगुदाहट का आनन्द ले रहा था, जो माधुरी के शरीर के स्पर्श से अनुभव हुआ था।

बहुत देर के मौन के पश्चात् राजेन्द्र ने धड़ उठाकर माधुरी को कुछ कहने के लिये उसकी ओर देखा । अभी उसका नाम ही उसके होंटों से निकला था कि एकाएक चुप हो गया और भौंचक इधर-उधर देखने लगा। वह अपने स्थान पर न थी।

वह तेजी से उठा और चबूतरे की ओर देखने लगा । सामान ज्यों का त्यों वहाँ रखा था, किन्तु माधुरी वहाँ न थी। उसने झील में दृष्टि दौड़ाई किन्तु, वहाँ भी कुछ दिखाई न दिया। अचानक जहाँ बह लेटी थी वहाँ धरती पर खुदे कुछ शब्द देखकर वह रुक गया। गोली धरती पर अंग्रेजी में खुदा हुआ लिखा था-"Love you."

राजेन्द्र ने फिर एक बार चारों ओर ध्यानपूर्वक देखा। घूमती हुई उसकी दृष्टि सामने झाड़ियों पर जा रुकी, जहाँ माधुरी के कपड़े फैले सूख रहे थे। उसने एक बार फिर धरती पर खुदे हुए शब्दों को पढ़ा और उस और बढ़ने के लिए पाँव उठाये, किन्तु कुछ सोचकर रुक गया और गर्दन मोड़कर दूसरी ओर देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसने फिर मड़कर झाड़ियों की ओर देखा । अब कपड़े वहाँ न थे। अभी वह सोच ही रहा था कि माधुरी झाड़ियों से निकली। राजेन्द्र ने उसे देखा और दूसरी ओर गर्दन मोड़ ली मानो अभी तक उसे देखा ही न हो। __माधुरी ने चोर-दृष्टि से उसे अपनी ओर देखते हुए भांप लिया था

और उस ओर आने के स्थान पर खंडहर की उस गुफा की ओर मुड़ गई जहाँ राजेन्द्र के यहाँ पाने पर एकान्त में उनकी प्रथम भेंट हुई थी, और माधुरी ने अपने दुखी मन का रहस्य उससे कह डाला था। गुफा के भीतर जाने से पूर्व उसने एक बार मुड़कर फिर राजेन्द्र की ओर देखा । वह अभी तक वहीं बैठा हुआ था, जाने किस कल्पना, किस सोच में था। ____ वह गुफा के भीतर ओट में खड़ी होकर उसकी प्रतीक्षा करने लगी। जो बात उसके मुंह से न निकल सकी थी वह उँगली से धरती पर लिख आई थी। उसे विश्वास था कि वह अवश्य आयेगा"इस एकान्त में वह उसके पास अवश्य आयेगा और उसके मन की धड़कन धरती पर लिखे हुए शब्दों को स्वयं दोहरा देगी। वास्तव में राजेन्द्र से वह प्रेम करती थी 'वासुदेव उसके प्रेम को न जीत सका था।
 
उसने गुफा में से झांककर फिर बाहर देखा । वह अभी तक अपने स्थान पर बैठा था। माधुरी के मन को चोट सी लगी। वह अधीर हो रही थी और वह उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ वहीं बैठा था। वह सोचने लगी, 'क्या उसे निराश होना पड़ेगा. पर ऐसे क्योंकर हो सकता है ? वह स्वयं ही तो कई बार बातों-बातों में उस से प्रेम जता चुका है।'

एक बार उसने फिर चोर-दृष्टि से उधर देखा। राजेन्द्र अपने स्थान से उठकर उसकी ओर आ रहा था। उसके मन में गुदगुदी होने लगी और शरीर में सिहरन सी दौड़ गई । वह साँस रोके थोड़ा और आगे बढ़ गई और अंधेरे में छिपकर उसकी प्रतीक्षा करने लगी। उसकी दृष्टि गुफा के प्रवेश द्वार पर लगी हुई थी।

__माधुरी...!'' किसी ने धीरे से पुकारा। वह अंधेरे में दीवार से चिपककर खड़ी हो गई। फिर पुकार सुनाई दी और वह सांस रोककर और सिमट गई । राजेन्द्र अब गुफा में प्रवेश कर चुका था और अंधेरे में उसे टटोलता हुआ उससे आगे बढ़ गया। अब उसने ऊँचे स्वर में उसका नाम लेकर पुकारा । माधुरी छिपी हुई उसे साफ देख रही थी। यह वहीं स्थान था जहाँ कुछ दिन पहले उसने राजेन्द्र से अपने मन की बात कही थी । प्राज फिर वह वहीं इकटु हो गये थे और वह उसे प्रेम का सन्देश देने के लिये व्याकुल हो रही थी। उसके होंट मन की भावनाओं को उगल देने के लिये बेचैन थे''आज वह अपने मन में कुछ गुप्त न रखना चाहती थी।

राजेन्द्र विस्मय में खड़ा अपने सामने देख रहा था। माधुरी धीरे धीरे दबे पाँव उसके पीछे खड़ी हो गई। उसने एक बार फिर जोर से पुकारा, "माधुरी !" आवाज की गूज लौटकर उसके कानों से टकराई। वातावरण में गूज से एक थरथराहट सी हुई। माधुरी ने पीछे से अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया। राजेन्द्र चौंककर मुड़ा और उसने दोनों हाथ उसके गले में डालकर सिर उसके वक्ष से टिका दिया। उसका शरीर अंगारों के समान तप रहा था और वह उखड़े हुए स्वर में धीरे-धीरे बुड़बुड़ाने लगी .

"राजी ! मेरे राजी ! मुझ में और धैर्य नहीं। परीक्षा देने की शक्ति मुझ में नहीं रही 'देखो तो मेरा कलेजा धड़क रहा है. अब और मत तरसायो' मैं कहाँ तक ज्वाला में जलती रहूँ..." . __वह कहे जा रही थी और राजेन्द्र सुने जा रहा था। इसके अपने रोएँ-रोएँ में बिजली सी भर गई । उसने अपनी बांहें उसकी कमर में डालकर उसे भींच लिया और भींच लिया, यहाँ तक कि दोनों हृदयों की घड़कन एक हो गई.."साँसें एक दूसरे से मिल गयीं । इस मिलन में शान्ति थी, सुख था, जिसके लिए वह लगभग तीन वर्ष से तड़प रही थी। राजेन्द्र ने अपने जलते हुए होंट उसके केशों को घनी छाया में रख दिये। ___ माधुरी एक उन्माद में धीरे-धीरे रुककर कहे जा रही थी. वही शब्द जो शायद वर्षों पहले भी उसने राजेन्द्र से कहे हों। परन्तु फिर भी इनमें नवीनता थी."अछूतापन था "प्रेम दोहराने पर पुराना नहीं हो जाता परन्तु, परस्थिति बदल चुकी थी. क्या उसे यह शब्द दोहराने का अधिकार था ? यहाँ अधिकार क्या है, अनधिकार क्या है कोई नहीं जानता है।

जब दोनों ज्योड़ी पार करके आँगन में पहुँचे तो शाम अपने पंख फैला चुकी थी। दोनों चुप थे और अभी ही उन्हें सुध आई थी कि वह दिन भर बाहर रहे हैं। 'डर रहे थे कि वासुदेव क्या सोचेगा।

आहट सुनकर गंगा ने बाहर आकर पिकनिक का सामान पकड़ लिया। माधुरी ने धीरे से डरते-डरते पूछा

"बह आ गये कया?"

"नहीं, बीबीजी ! अभी तो नहीं लौटे' 'न कोई और खबर ही आई है,"-गंगा ने गम्भीर मुख से कहा और सामान उठाकर भीतर चली गई।

माधुरी ने आँख उठाकर राजेन्द्र की ओर देखा और दोनों मुस्करा दिये। उनका भय अकारण ही था। . गोल कमरे में प्रवेश करते ही राजेन्द्र ने लैम्प जलाने के लिये हाथ बढ़ाया। माधुरी ने उसका हाथ रोक लिया और अपने गालों पर रखते हुए बोली

"रहने दो..."

"क्यों ?"

"न जाने क्यों ? आज अंधेरा भला सा लग रहा है।"

"अभी तो भला लगता है, किन्तु थोड़ी देर बाद यही खाने लगेगा।"

"कैसे?"

"जब रात और बढ़ जायेगी, सन्नाटा छा जायेगा. मैं अपने कमरे में और तुम अपने कमरे में दोनों अकेले "फिर यही अंधेरा नागिन बन जायेगा।"

'यह आपने कैसे कहा कि मैं अकेली रहूँगी ?"

"वासुदेव अब सवेरे से पहले क्या लौटेगा ?" - "पाप जो हैं,"-वह उसके कोट के बटनों को प्यार से उँगलियों में । भरोड़ते बोली।

"मैं ! तुमसे इतनी दूर..."

"दूरी क्या? मन में तो अन्तर नहीं “राजी! सब पूछो, वह पास भी हों तो यू लगता है जैसे कोसों का अन्तर हो और तुम दूर भी हो तो यू अनुभव होता है मानो पास बैठे हो ।" .

सच माधुरी ! न जाने मन का भय क्यों नहीं जाता: “सोचता हूँ यदि हमारे प्रेम का रहस्य वासुदेव जान गया तो मैं तो कहीं का न रहूँगा।"

"प्रेम और कायरता ? साहस से काम लेना पड़ेगा।"

"यदि उसने हमें य इकठे देख लिया तो..."

"घबराओ नहीं ''बह कुछ न कह सकेंगे "उनमें इतना साहस ही नहीं और सम्भव है तुम्हें प्रेम करते देखकर इD से स्वयं भी प्रेम करना सीख जायें।"

"तो क्या वास्तव में उसके हृदय नहीं?"

"ऐसा ही समझ लो...!"

"उस दिन मस्त घोड़े को उसने कैसे चाबुकों से वश में कर लिया .. था वह दृश्य सामने आता है तो मन काँपने लगता है।"

कुछ क्षण चुप रहने के बाद वह खिसियानी हँसी हंसते बोली . "वह केवल घोड़े को वश में करना जानते हैं."स्त्री को नहीं "प्रेम क्या है ? आकांक्षायें क्या हैं ?''यह वह नहीं जानते 1 मुझे तो विश्वास नहीं कि भगवान् ने उन्हें हृदय भी दिया है !"

यह कहते हुए वह अपने कमरे की ओर जाने लगी। राजेन्द्र ने उसका हाथ पकड़ते पूछा--

"कहाँ ?"

"कपड़े बदलकर अभी आई।"

"कॉफ़ी न पिलायोगी क्या ?"

"आप भी कपड़े बदल लें.. मैं अभी गंगा से..."

"गंगा से नहीं. 'तुम्हारे हाथों से..."

"तो थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।"
 
"स्वीकार है।" राजेन्द्र ने उसका हाथ छोड़ दिया और वह तेजी से अपने कमरे में चली गई। ___राजेन्द्र मुह ही मुंह कुछ गुनगुनाता हुअा लैम्प जलाने के लिये मेज की ओर बढ़ा । आज हर्ष में स्वयं ही उसके हृदय से गीत फूट रहे थे। ____ कमरे में प्रकाश हुया और वह भींचक सा रह गया । सामने वाले कोने में कोई दीवार की ओर मुह किये आराम कुर्सी पर लेटा था। राजेन्द्र को समझने में देर न लगी । वासुदेव को देखकर वह सहसा काँप गया और उसका शरीर पसीने में यू भीग गया मानो किसी ने घड़ों पानी में नहला दिया हो।

राजेन्द्र का मुख पीला पड़ गया। आँखें झुक गई और लज्जित होकर वह हाथों की उँगलियाँ तोड़ने लगा। वहीं कुछ हुआ जिसका उसे भय 'था। एक ही क्षण में वह अपने मित्र की दृष्टि से गिर गया था। उसे यू अनुभव हुआ मानो किसी ने उसे ऊँचाई से खड्डे में धकेल दिया हो।

थोड़ी देर के मौन के पश्चात् उसने वासुदेव को अपने स्थान से उठते देखा। वह उठकर उसके सामने आ खड़ा हुआ और बलपूर्वक होंटों पर मुस्कराहट उत्पन्न करते हुए बोला, “घबरानो नहीं मित्र ! माधुरी सच ही कहती है, मैं केवल घोड़े ही को वश में ला सकता हूँ..'मानव को नहीं..'मुझ में यह भावना ही नहीं, मेरा मन पत्थर बन चुका है''मर चुका है. भला मैं तुम लोगों के सामने आने के योग्य हो कहाँ हूँ...? मुझे तो अपनी मित्रता पर गौरव है-जो काम मैं तीन बरसों में न कर सका, मेरे मित्र ने दिनों में कर दिया-विश्वास जानो, मुझे तुम से घृणा नहीं हुई, बल्कि तुम दोनों के प्रति सहानुभूति और बढ़ गई है।"

वासुदेव की एक-एक बात विष बनकर उसके कानों में उत्तरती रही। राजेन्द्र इसे अधिक सहन न कर सका और तेज-रोज पांव उठाला अपने कमरे में चला गया। रास्ते में माधुरी के कमरे से गुनगुनाहट की ध्वनि सुनाई दी। अपनी तरंग में, उस बिजली से अनभिज्ञ जो अभी-अभी राजेन्द्र पर गिरी थी, वह हृदय की ताल पर कोई मधुर गीत गुनगुना रही थी।

राजेन्द्र के कानों में वह बातें गूज रही थीं, जो कमरे में प्रकाश होने से पूर्व वह माधुरी से कर रहा था। उस समय वासुदेव के हृदय में जो ज्वाला भड़क रही होगी उसकी कल्पना से उसकी धमनियों में क्षण भर के लिए लहू सा जम गया ।।

उसने तुरन्त, वह स्थान छोड़ने का निर्णय कर लिया। अपना सूटकेस निकाला और इधर-उधर बिखरे हुए कपड़े संभालने लगा। उसके चले जाने के बाद इस घर में क्या होने वाला है, इसका विचार माते ही उसका रोमाँ-रोनौं काँप उठा 'यदि वासुदेव ने बल का प्रयोग किया तो उसे सहसा मस्त घोड़े वाली घटना स्मरण हो पाई।

अभी वह पूरे कपड़े समेट न पाया था कि किसी ने बढ़कर पीछे से उसका हाथ थाम लिया । वह घबराकर उछला और भट मुड़कर बासुदेव को देखने लगा, जो जोर से उसकी कलाई अपने हाथ में लिए था। दोनों ने उखड़ी हुई दृष्टि से एक दूसरे को देखा।

"मित्र बन कर आये हो, अब शत्रु बनकर न जाने दूंगा।" जोमल हृदय से पीड़ा भरे स्वर में वासुदेव उससे बोला।

"मित्रता क्या और शत्रुता कैसी."अपनी इच्छा से आया था और अपनी इच्छा से जा रहा हूँ।" झटके से अपना हाथ छुड़ाते हुए उसने बोला।

"आग तो लगा चले हो, उसे बुझायेगा कौन?"

राजेन्द्र ने वासुदेव की बात सुनकर आश्चर्य में उसे देखा । वासुदेव बात को चालू रखते बोला---

"मेरा अभिप्राय माधुरी से था। उसके मन में जो प्रेम की चिंगारी सुलगाई है, उसे क्या यू ही छोड़ जाओगे ?"

"तुम क्या समझते हो, मैं तुम से डर गया हूँ ? लज्जित हूँ और अपना मुंह छिपाकर दूर भाग रहा हूँ "मित्र मुझे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं-सम्भव है मेरे इस व्यवहार ने तुम्हारी सोई हुई भाव नाओं को जाग्रत कर दिया हो और तुम किसी दूसरे के जीवन से खेलना छोड़ दो..."

यह कहते ही राजेन्द्र ने अपना सूटकेस उठाया और बाहर जाने लगा। वासुदेव ने लपककर उसकी बांह पकड़ ली और ऊँचे स्वर में बोला, "यह क्या मूर्खता है ?"

अभी वह दोनों आपस में झगड़ ही रहे थे कि सामने से माधुरी को पाते देखकर भैप गये । माधुरी भी उन्हें अचानक देखकर विस्मित रह गई । 'वासुदेव कब श्रीर कैसे पाया ?' अभी वह यह सोच भी न पाई थी कि वातावरण का रंग बदलने के लिये वासुदेव भट से बोला

"माधुरी ! तुम ही समझानो" यह क्या हठ है ?"

"क्या ?" वह आँखें फाड़ते बोली।

"रूठकर जाने को तैयार हो गया है. कहता है दिन भर मेरे बिना मन नहीं लगा "अब तुम ही कहो, मैं कैसे न जाता?""उसके तो प्राणों 'पर बनी थी।"

"कोचवान का क्या हुमा ?" माधुरी ने झट पूछा।

"बिचारा मर गया,"-उसने धीरे से उत्तर दिया।

यह सनकर दोनों का कलेजा धक सा रह गया । उसी समय ड्योढी में बंधा घोड़ा ज़ोर से हिनहिनाया । उसकी हिनहिनाहट में एक विशेष करता थी। वासुदेव ने दुखी मन से कहा, "आज इस पालतू पशु ने घर के व्यक्ति के ही प्राण ले लिये।"

कॉफ़ी बनी रखी है।" माधरी ने धीमे स्वर में कहा और बाहर चली गई। वासुदेव ने सूटकेस राजेन्द्र के हाथ से लेकर एक ओर रख दिया

और उसके कंधे पर हाथ रखते बोला, "प्रायो' काफ़ी पियेंगे।"

राजेन्द्र अनमना सा विवश वासुदेव के साथ बालकनी में आ गया। माधुरी पहले ही वहां कॉफ़ी बना रही थी। दोनों कुर्सियों पर बैठ गये। वासुदेव ने बलपूर्वक हंसते हुए कहा---

"थूक दो अब इस क्रोध को राजी ! वचन देता है, अब तुम्हें अकेले छोड़कर नहीं जाऊँगा।"

राजेन्द्र चुप रहा और कॉफ़ी का प्याला उठाकर पीने लगा । माधुरी ने दूसरा प्याला पति की ओर बढ़ाते हुए पूछा---
 
"आप कब आये ?"

"अभी तो चला आ रहा है।"

फिर सब चुप हो गये । माधुरी सोच रही थी शायद राजेन्द्र जान बूझकर बन रहा है, इसलिए उसके मौन पर उसने कोई ध्यान न दिया ।

एक ही साँस में कॉफ़ी का प्याला समाप्त करके राजेन्द्र उठ खड़ा हुना और बाहर जाने लगा । वासुदेव ने उसे रोकने का बड़ा प्रयत्न किया किन्तु; बिना कोई बात कहे वह लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ नीचे उतर गया और ड्योढ़ी में गंगा से कुछ कहकर बाहर निकल गया।

जब गंगा कॉफ़ी के बर्तन उठाने आई तो वासुदेव ने पूछा, "क्या कहता था राजेन्द्र ?"

रात के खाने को मनाही कर गये हैं,"-गंगा ने उत्तर दिया।

... वासदेव दुप हो गया और जब गंगा बर्तन उठाकर चली गई तो

उसने माधुरी से पूछा

"आज दिन भर कैसे कटा ?"

जी!"वह सिर से पाँव तक काँप गई।

"मेरा अभिप्राय है, कहीं वह दिन-भर अकेला तो नहीं बैठा रहा ?"

"नहीं तो 'खाना एक साथ खाया था "अब कॉफ़ी भी ला रही

"बस, एक साथ लाना ही खाया 'कहीं घूमने को ले गई होती।"

"दोपहर को तो वह सोये रहे.."और मैं..."

"और तुम ?"

"मैं मला उन्हें क्यों कर ले जाती ?"

"यही बात तो तुम स्त्रियों की बुद्धि में नहीं समाती-प्रच्छा, तुम खाना तैयार करो, मैं उसे मनाकर लाता है।" ___

वह न माने तो ?"

"कैसे न मानेगा ! मैं अपने मित्र को भली प्रकार समझता हूँ।" बासुदेव ने असावधानी से उत्तर दिया और उसके पीछे-पीछे घर से बाहर चला पाया।

झील के किनारे बहुत दूर तक जाने पर भी राजेन्द्र उसे कहीं दिखाई न दिया। अचानक झील के तल पर उसे पानी के उछलने की आवाज सुनाई दी जैसे किसी ने मौन जल में पत्थर गिराकर हलचल मचा दी हो। उसने भट मुड़कर देखा। राजेन्द्र नाव से पीठ लगाये बैठा कुछ सोच रहा था।

"तुम यहाँ ? मैं तो डर रहा था।" वासुदेव ने उसकी ओर देखते पूछा। .."क्यों ? यह सोचकर कि कहीं मैं झील में डूवकर आत्महत्या न कर

"छी-छी "यह आज तुम्हें हो क्या गया है ?" वासुदेव राजेन्द्र के समीप बैठ गया । राजेन्द ने गर्दन दूसरी ओर मोड़ ली और किनारे पर पड़े हुए कंकर उठाकर झील में फेंकने लगा। ___कुछ देर दोनों चुपचाप बैठे रहे । राजेन्द्र थोड़े-थोड़े अन्तर के बाद पानी में एक पत्थर फेंकता, हल्का सा धमाका होता और फिर मौन छा जाता । बैठे-बैठे राजेन्द्र स्वयं ही कहने लगा, 'मैं कल जा रहा है।

"मुझे मझधार में छोड़कर''क्या इसी दिन के लिए यहाँ पाये थे ?" - "वासुदेव ! मैं विवश हूँ.. मैं न जानता था कि मेरा यहाँ पाना हम दोनों के लिए इतनी बड़ी समस्या उत्पन्न कर देगा कि जीना दूभर हो । जाये।"
 
"यह तुम क्या सोच रहे हो...? तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारा कितना आभारी हूँ"तुमने तो मेरी सोई हुई आकांक्षाओं को झंझोड़ दिया है"तुमने मेरे नीरस जीवन में रस भर दिया कुछ दिनों से माधुरी को बदला हुआ पा रहा था. मैं तो, धन्यवाद भी नहीं कर पाया।

राजेन्द्र में ध्यानपूर्वक वासुदेव की आँखों में भाँका । एक-एक शब्द विश्वास बनकर निकल रहा था "उसमें तनिक भी बनावट की मालक न थी, हर बात मन से निकली प्रतीत होती थी। वह यह सोच भी न सकता था कि कोई पति अपनी पत्नी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कर सकता है। उसकी समझ में कुछ न पा रहा था।

वासुदेव की आँखों में आँसू झलक रहे थे। राजेन्द्र ने शोध और सहानुभति के मिश्रित भावों से उसे देखा और बोला

"उन पतियों का यही अन्त होता है जो अपनी पत्तियों की ओर ध्यान नहीं देते ''जो उनकी भावनाओं को उभरने से पहले ही दबा देते हैं. उन्हें अंगारों को सेज पर लिटा देते हैं और फिर पछताते हैं, लज्जित होते हैं, आँसू बहाते हैं, उन्हें चरित्रहीन और बेवफा ठहराते हैं, जब.. जब..." वह कुछ क्षण के लिए एक गया और फिर धीरे से बोला, "जब वह किसी जान-पहचान के व्यक्ति अथवा किसी नौकर के साथ भाग जाती हैं ।"

अन्तिम शब्द उसने कुछ इस दृढ़ता से कहे कि वह वासुदेव के मन में साँप के समान रेंग गये । पलकों पर आये आँतुओं को पोते हुए दुखी मन से उसने उत्तर दिया.......

तुम सच कहते हो, राजेन्द्र ! किन्तु मैं विवश हैं।" ___

"विवश, विवश' विवश क्यों ? मैं यह शब्द बड़ी देर से सुन रहा

"राजेन्द्र ! मेरा आज तक विचार था कि स्त्री पुरुष को एक कर देने वाली सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है ; कोमल भावनायें हैं. 'किन्तु, आज मैं समझ गया यह सब ढोंग है, मिथ्या है

''यह मन का सौदा नहीं तन का लेन-देन है।

"यौवन और शारीरिक सौन्दर्य का आकर्षण है।''वासना पूर्ति है. भावनायें उभरती हैं, उनकी पूर्ति होती है और फिर शीत पड़ जाती हैं। यही चक फिर चलता है कोई प्रेम नहीं, कोई चिरस्थायी बंधन नहीं।"

"यह तो प्रकृति का नियम है हर भावना की तृप्ति प्रावश्यक है इसी में शान्ति का रहस्य है। इसी के आधार पर जीवन चलता है यदि इच्छाओं की पूर्ति न होती रहे तो मानव उन्नति भी न कर सके कामनाओं और अभिलाषाओं के बने रहने का नाम ही जीवन है ..

"यह नहीं तो कुछ नहीं "जीवन से लगाव हो तो प्रेम है।"

"परन्तु ; उसका जीवन भी क्या जिसमें कामनायें हों किन्तु, अपूर्ण "पंख हों पर उड़ने की शक्ति न हो"उसके चारों ओर जीवन का सुख हो और उसके पाँव जकड़े हों, हाथ जकड़े हों..

"तुम ही कहो मैं क्या करूं?" ..., राजेन्द्र ने अनुभव किया मानो उसके मित्र के जीवन के सब रहस्य उभर कर उसके होंटों तक आ गये थे। वह कुछ कहना चाहता था, किन्तु उसकी जबान सूख गई थी और शब्द गले में ही दबकर रह गये। उसके रहस्य आँसू बनकर उसकी आँखों में चमके और ढलक गये। वह इससे अधिक और कह भी क्या सकता था ?

राजेन्द्र ने उसके कंधे पर हाथ रखा और सहानुभूति से उसकी ओर देखते बोला, "क्या मुझसे मन की बात न कहोगे ?"

"किस ज़बान से कहूँ ?"

"जीवन के कई ऐसे भेद भी हैं जो पत्नियों से छिपाये जाते हैं पर मित्रों से नहीं.. यदि मित्र नहीं तो शत्रु समझकर ही कह डालो।"

"सुन सकोगे ?" ,

"मित्र का दुख न सुन सकूगा यह कैसे सम्भव हो सकता है ?"

"तो एक वचन देना होगा । मुझे मझधार में छोड़कर न जाना।"

राजेन्द्र ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसके और समीप हो बैठा।

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