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"क्या सोच रही हो?" मौन भंग करते हुए राजेन्द्र ने कहा ।
• “सोचने को रखा ही क्या है अब?"
"बहुत कुछ- दुनिया इतनी छोटी नहीं जितना कि तुम समझ रही
"दुनिया तो बहुत बड़ी है, किन्तु मानव कितना तुच्छ है-यह मैं आज ही जान पाई हूँ।" यह कहकर वह बिना उसकी ओर देखे झील के किनारे बढ़ चली। अभी वह कुछ दूर ही जा पाई थी कि राजेन्द्र के स्वर ने उसे रोक लिया। वह उसके पास आया और बोला-"कहाँ जा रही हो?"
"जहाँ भाग्य ले जाये।"
"भाग्य अथवा यह उखड़े हुए पांव ?"
"कुछ ही समझ लीजिये । बेबस व्यक्ति की मंजिल कहाँ है, वह स्वयं ही नहीं जानता।"
"तुम्हारे समान और भी तो कोई विवश है । वासुदेव का क्या होगा ?"
"मुझ प्रभागिन के पास अब देने के लिये रखा ही क्या है ?" "प्रेम..."
"प्रेम !' वह व्यंगात्मक स्वर में बोली, "अभी तो आप कह रहे थे कि प्रेम टूटे हुए हृदय का झूठा सहारा है । इस पर निर्भर रहना धोखा खाना है।"
"ठीक ही तो है ।"
"बड़ी विचित्र बात है, एक वह हैं जो मेरे जीवन को नीरस बना कर मेरी परीक्षा ले रहे हैं ; और एक पाप हैं कि मेरे प्रेम का उपहास उड़ा रहे हैं।"
"नहीं, माधुरी ! मुझे समझने में भूल न करो।" ___ "यदि भूल हो भी गई तो क्या अन्तर पड़ता है । जाइये ! नाव तैयार है । अब आपका-मेरा क्या सम्बन्ध है ?" यह कहकर वह चल पड़ी।
राजेन्द्र ने लपककर उसे पकड़ लिया और दोनों कंधों से पकड़कर उसे झंझोड़ते हुए बोला
"मेरी मानो तो अब भी लौट जाप्रो !" .
माधुरी ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया और क्रोध भरी कृष्टि से उसे देखते हुए झटके से अलग हो गई। उसके होट कुछ कहने को थरथरा रहे थे, पर शब्द गले में अटक गये। माधुरी ने बना चाहा। राजेन्द्र ने फिर उसे रोक लिया और बोला, ''माधुरी ! मैं जानता है कि मैं तुम्हें नहीं रोक सकता । मैं यह भी जानता हूँ कि एक विवश और दुखी मानव की अन्तिम मंजिल कहाँ होती है..."
"मेरा सौभाग्य है कि आपने मेरे निश्चय को भोप लिया।"
"देखो' माधुरी ! आकाश पर काली घटा आई हुई हैं। कितनी भयानक हैं यह घटायें, किन्तु; जब बरसकर हल्की हो जायेंगी तो आकाश निखरकर निर्मल हो जायेगा, मानो वहाँ कुछ था ही नहीं। मान-मन भी इसी आकाश की भांति है। इस में भावना के अनेक तूफान आते हैं-दुल की कितनी बदलियाँ छा जाती हैं कितनी ही घनघोर वृष्टि होती है-~-पर जितना भयानक तूफान, उतना ही निखार आता है। तुम्हारे पति तो इतने विशाल-हृदय हैं कि उनके मन में कोई तूफान या घटा अधिक समय तक नहीं टिक सकती। वह तुम्हें कभी दुख नहीं दे सकते । माधुरी ! मैं तुम्हें क्यों कर समझाऊं, जिसे तुम पा समझ कर छोड़े जा रही हो वह व्यक्ति वास्तव में देवता है। इसी झील के किनारे एक रात जानती हो उसने मुझसे क्या कहा था ?'" ।
... "क्या?" - "उसने मुझसे कहा था-...-'म धुरी तुम से प्रेम करती है, इस से मुझे दल नहीं प्रसन्नता ही है । और मेरी यही इच्छा भी है कि जीवन में जो कुछ मैं उसे न दे सका, वह प्रसन्नता तुम उसे दे दो।"
"उन्होंने हमें प्रेम करते कब देखा?"
"उस दिन जब वह कोचवान की मत्यु के पश्चात् शहर से लौटा था, और गोल कमरे में बैठा अंधेरे में हमारी बातचीत सुन रहा था। तुम तो काफ़ी बनाने चल दी-तुम उसे देख न पाई पर मैंने उसे देख
लिया।"
"पाप ने मुझ से यह कहा क्यों नहीं ?" "कसे कहता? कुछ समझ नहीं पा रहा था-वह भी बेबस था और
..माधुरी मौन थी, और एक गहरी सोच में डूब गई । राजेन्द्र ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-~
"माधुरी ! जीवन में कई रहस्य ऐसे भी होते है, जो व्यक्ति अपनी पत्नी से कहने से कतराता है और मित्र से कह डालता है..."
"क्या ?" उसने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
"मैंने वासुदेव को वचन दिया था कि उसका रहस्य किसी पर प्रगट न करूँगा । किन्तु, आज वह वचन तोड़कर तुम से कहे देता हूँ।" .
"कहिये !" वह उसका रहस्य जानने को आतुर हो रही थी। "एक स्त्री नहीं, मित्र समझकर..." "कहिये ना पाप रुक क्यूं गये ?" "माधुरी' 'माधुरी''तुम्हारा पति नपुंसक है..."
राजेन्द्र के मुख से यह शब्द सुनते ही उस पर एकाएक एक बिजली सी गिरी''अटैची उसके हाथ से छूटकर धरती पर गिर गई, और वह धम से नीचे बैठ गई, मुख घुटनों में दबा लिया। राजेन्द्र खड़ा उसे देखता रहा।
राजेन्द्र ने उससे कुछ भी न छिपाया, उसने उसे वासुदेव के बन्दी हो जाने-कैद से भागने-गोली लगने और ऑपरेशन होने की सब घटनाएँ, जो उसने इसी झील के किनारे सुनी थीं-एक एक करके सब माधुरी को सुना दीं। माधुरी सुनती रही, और अपने आप में खो गई। उसे यूं लग रहा था मानों सैकड़ों विषले नाग उसके शरीर से लिपट कर उसका लहू चूस रहे हों । उसका मन चाहा कि वह जी-भरकर रोये; किन्तु, उसके आंसू भी उसका साथ न देना चाह रहे थे । उसे समझ न.
आ रहा था कि मन का बोझ कैसे हल्का करे । ___ अतीत का एक-एक चित्र उसकी आँखों में घूमने लगा--'उसके पत्ति कितने बेबस थे---कितने दुखी और वह स्वयं कितनी निर्दयी--- उसने कभी उनके मन में झांककर उनकी पीड़ा को चटाने का प्रयल नहीं किया, बल्कि उसने उल्टे अपनी भावनाओं को उभारा और उनको मान मर्यादा से खेलने को तैयार हो गई । कितना बड़ा पाप था जिसका कोई प्रायश्चित नहीं।'
सहसा वह राजेन्द्र का स्वर सुनकर चौंक उठी। उसने सिर ऊपर उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु; उसमें अब उस दर्पण को देखने का साहस न था, जिसमें उसे अपने पाप का प्रतिबिम्ब दिखाई दे । वह जा रहा था
और उसे घर लौट जाने को कह रहा था । जब माधुरी ने घुटनों से अपना सिर उठाया तो वह चुप हो गया। दोनों ने एक दूसरे को देखा, उसने बिदा कही और वह चला गया।
माधरी खोई-खोई सी उसे जाते हुए देखती रही। उसने एक बार भी उसे रुक जाने को न कहा । राजेन्द्र नाव में बैठा और चल दिया।
एकाएक माधुरी के हृदय में छिपा तूफान उचल पड़ा । वह फूट-फूट कर रो पड़ी । जाने वह कितनी देर तक बैठी रोती रही-ग्राकाश पर जमी घटाएँ छैट रही थीं-दूर क्षितिज में प्रभात का तारा सुबह का संदेश दे रहा था । रोने से उसका मन हल्का हो गया था, किन्तु ; शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा थी-थकान थी।
वह उठी, अटैची को थामा और झील को देखने लगी, जहाँ दूर-दूर तक केवल जल ही जल था। राजेन्द्र जा चुका था, दूर" बहुत दुर". उसके जीवन से दूर "वह अब कभी लौटकर न पायेगा । उसने आँचल से अपने प्रभु पोंछे और बिना किसी निश्चय के झील के किनारे-किनारे चल पड़ी। उसे कुछ सूझ न पड़ता था, वह क्या करे ? कहाँ जाये ? वह एक भटके हुए यात्री के समान अनजानी राह पर खो गई थी। उसी
समय झील की लहरों ने जैसे उसके कानों में गुनगुनाहट सी भरी ___ 'माधुरी ! मैं जानता हूँ, मैं तुम्हें नहीं रोक सकता-मैं यह भी जानता हूँ कि एक दुखी और बेबस व्यक्ति की अन्तिम मंजिल क्या है, पर मेरी तुम से यही प्रार्थना है कि तुम लौट जाओ ! तुम्हारे पति अब भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।'
उसके बढ़ते हुए पाँव एकाएक रुक गये। वह पीछे मुड़ी और घर की ओर तेज-तेज पाव उठाकर चलने लगी।
घर वैसे ही मौन था, जैसे वह छोड़कर गई थी । किसी ने उसे पाते हुए न देखा । अँधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था।
दबे पाँव वह अपने कमरे की ओर जाने लगी । वासुदेव का कमरा खुला था। उसने भीतर झांककर देखा वह अपने बिस्तर पर न था। किसी विचार से वह एकाएक कांप गई और द्वार के भीतर खड़े होकर फिर उसने भली प्रकार देखा । वह बाल्कनी में कुर्सी पर बैठा, झुटपुटे में झील को देख रहा था।
वह भीतर आ गई और धीरे-धीरे पांव रखती उसके पीछे जा खड़ी हुई । वह स्थिर बैठा मूर्तिवत् कुछ सोच रहा था। __माधुरी बड़ी देर तक खड़ी उसे देखती रही । वह उससे क्षमा मांगने के लिये आई थी, परन्तु उसके सामने आने का साहस उसमें न था। वासुदेव एकटक दूर क्षितिज में देखे जा रहा था । ___माधुरी में और धैर्य न रहा । उसने रोते हुए, बाँहें वासुदेव के गले
में डाल दीं। रोती जाती थी और कहती जाती थी---
"मेरे देवता ! मुझे क्षमा कर दो। मैंने घोर पाप किया है, मैंने विश्वासघात किया है...''मुझे इसका दण्ड दीजिये । मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे स्वीकार करूंगी, किन्तु ; आप मुझसे यू रूठिये मत । यू मौन न रहिये-मैं पागल हो जाऊँगी मैं आपके पाँव पड़ती हूँ, कुछ बोलिये ! आप ने इतने दिन मन की बात क्यू न कही ? यदि आप जीवन में इतना
शान्त रह सकते हैं, तो क्या मैं अपने देवता की देवसी पर क्षणिक सुख न्योछावर न कर सकती थी। मैं आपको उपहास का पान बनाऊँगी.. यह पाप ने क्यू सोचा ? मैंने आप को अब तक न पाहिलाना था, अब तक न समझा था-" एक ही साँस में रोते-रोते जाने वह क्या-क्या कहती चली गई । जब साँस लेने को रुकी तो उसने वासुदेव को देखा । यह अभी तक किसी गहरे सोच में खोया सा था, उसकी आँखों से बहे हुए आंसू अभी तक उसके गालों पर जमे थे।
• “सोचने को रखा ही क्या है अब?"
"बहुत कुछ- दुनिया इतनी छोटी नहीं जितना कि तुम समझ रही
"दुनिया तो बहुत बड़ी है, किन्तु मानव कितना तुच्छ है-यह मैं आज ही जान पाई हूँ।" यह कहकर वह बिना उसकी ओर देखे झील के किनारे बढ़ चली। अभी वह कुछ दूर ही जा पाई थी कि राजेन्द्र के स्वर ने उसे रोक लिया। वह उसके पास आया और बोला-"कहाँ जा रही हो?"
"जहाँ भाग्य ले जाये।"
"भाग्य अथवा यह उखड़े हुए पांव ?"
"कुछ ही समझ लीजिये । बेबस व्यक्ति की मंजिल कहाँ है, वह स्वयं ही नहीं जानता।"
"तुम्हारे समान और भी तो कोई विवश है । वासुदेव का क्या होगा ?"
"मुझ प्रभागिन के पास अब देने के लिये रखा ही क्या है ?" "प्रेम..."
"प्रेम !' वह व्यंगात्मक स्वर में बोली, "अभी तो आप कह रहे थे कि प्रेम टूटे हुए हृदय का झूठा सहारा है । इस पर निर्भर रहना धोखा खाना है।"
"ठीक ही तो है ।"
"बड़ी विचित्र बात है, एक वह हैं जो मेरे जीवन को नीरस बना कर मेरी परीक्षा ले रहे हैं ; और एक पाप हैं कि मेरे प्रेम का उपहास उड़ा रहे हैं।"
"नहीं, माधुरी ! मुझे समझने में भूल न करो।" ___ "यदि भूल हो भी गई तो क्या अन्तर पड़ता है । जाइये ! नाव तैयार है । अब आपका-मेरा क्या सम्बन्ध है ?" यह कहकर वह चल पड़ी।
राजेन्द्र ने लपककर उसे पकड़ लिया और दोनों कंधों से पकड़कर उसे झंझोड़ते हुए बोला
"मेरी मानो तो अब भी लौट जाप्रो !" .
माधुरी ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया और क्रोध भरी कृष्टि से उसे देखते हुए झटके से अलग हो गई। उसके होट कुछ कहने को थरथरा रहे थे, पर शब्द गले में अटक गये। माधुरी ने बना चाहा। राजेन्द्र ने फिर उसे रोक लिया और बोला, ''माधुरी ! मैं जानता है कि मैं तुम्हें नहीं रोक सकता । मैं यह भी जानता हूँ कि एक विवश और दुखी मानव की अन्तिम मंजिल कहाँ होती है..."
"मेरा सौभाग्य है कि आपने मेरे निश्चय को भोप लिया।"
"देखो' माधुरी ! आकाश पर काली घटा आई हुई हैं। कितनी भयानक हैं यह घटायें, किन्तु; जब बरसकर हल्की हो जायेंगी तो आकाश निखरकर निर्मल हो जायेगा, मानो वहाँ कुछ था ही नहीं। मान-मन भी इसी आकाश की भांति है। इस में भावना के अनेक तूफान आते हैं-दुल की कितनी बदलियाँ छा जाती हैं कितनी ही घनघोर वृष्टि होती है-~-पर जितना भयानक तूफान, उतना ही निखार आता है। तुम्हारे पति तो इतने विशाल-हृदय हैं कि उनके मन में कोई तूफान या घटा अधिक समय तक नहीं टिक सकती। वह तुम्हें कभी दुख नहीं दे सकते । माधुरी ! मैं तुम्हें क्यों कर समझाऊं, जिसे तुम पा समझ कर छोड़े जा रही हो वह व्यक्ति वास्तव में देवता है। इसी झील के किनारे एक रात जानती हो उसने मुझसे क्या कहा था ?'" ।
... "क्या?" - "उसने मुझसे कहा था-...-'म धुरी तुम से प्रेम करती है, इस से मुझे दल नहीं प्रसन्नता ही है । और मेरी यही इच्छा भी है कि जीवन में जो कुछ मैं उसे न दे सका, वह प्रसन्नता तुम उसे दे दो।"
"उन्होंने हमें प्रेम करते कब देखा?"
"उस दिन जब वह कोचवान की मत्यु के पश्चात् शहर से लौटा था, और गोल कमरे में बैठा अंधेरे में हमारी बातचीत सुन रहा था। तुम तो काफ़ी बनाने चल दी-तुम उसे देख न पाई पर मैंने उसे देख
लिया।"
"पाप ने मुझ से यह कहा क्यों नहीं ?" "कसे कहता? कुछ समझ नहीं पा रहा था-वह भी बेबस था और
..माधुरी मौन थी, और एक गहरी सोच में डूब गई । राजेन्द्र ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-~
"माधुरी ! जीवन में कई रहस्य ऐसे भी होते है, जो व्यक्ति अपनी पत्नी से कहने से कतराता है और मित्र से कह डालता है..."
"क्या ?" उसने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
"मैंने वासुदेव को वचन दिया था कि उसका रहस्य किसी पर प्रगट न करूँगा । किन्तु, आज वह वचन तोड़कर तुम से कहे देता हूँ।" .
"कहिये !" वह उसका रहस्य जानने को आतुर हो रही थी। "एक स्त्री नहीं, मित्र समझकर..." "कहिये ना पाप रुक क्यूं गये ?" "माधुरी' 'माधुरी''तुम्हारा पति नपुंसक है..."
राजेन्द्र के मुख से यह शब्द सुनते ही उस पर एकाएक एक बिजली सी गिरी''अटैची उसके हाथ से छूटकर धरती पर गिर गई, और वह धम से नीचे बैठ गई, मुख घुटनों में दबा लिया। राजेन्द्र खड़ा उसे देखता रहा।
राजेन्द्र ने उससे कुछ भी न छिपाया, उसने उसे वासुदेव के बन्दी हो जाने-कैद से भागने-गोली लगने और ऑपरेशन होने की सब घटनाएँ, जो उसने इसी झील के किनारे सुनी थीं-एक एक करके सब माधुरी को सुना दीं। माधुरी सुनती रही, और अपने आप में खो गई। उसे यूं लग रहा था मानों सैकड़ों विषले नाग उसके शरीर से लिपट कर उसका लहू चूस रहे हों । उसका मन चाहा कि वह जी-भरकर रोये; किन्तु, उसके आंसू भी उसका साथ न देना चाह रहे थे । उसे समझ न.
आ रहा था कि मन का बोझ कैसे हल्का करे । ___ अतीत का एक-एक चित्र उसकी आँखों में घूमने लगा--'उसके पत्ति कितने बेबस थे---कितने दुखी और वह स्वयं कितनी निर्दयी--- उसने कभी उनके मन में झांककर उनकी पीड़ा को चटाने का प्रयल नहीं किया, बल्कि उसने उल्टे अपनी भावनाओं को उभारा और उनको मान मर्यादा से खेलने को तैयार हो गई । कितना बड़ा पाप था जिसका कोई प्रायश्चित नहीं।'
सहसा वह राजेन्द्र का स्वर सुनकर चौंक उठी। उसने सिर ऊपर उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु; उसमें अब उस दर्पण को देखने का साहस न था, जिसमें उसे अपने पाप का प्रतिबिम्ब दिखाई दे । वह जा रहा था
और उसे घर लौट जाने को कह रहा था । जब माधुरी ने घुटनों से अपना सिर उठाया तो वह चुप हो गया। दोनों ने एक दूसरे को देखा, उसने बिदा कही और वह चला गया।
माधरी खोई-खोई सी उसे जाते हुए देखती रही। उसने एक बार भी उसे रुक जाने को न कहा । राजेन्द्र नाव में बैठा और चल दिया।
एकाएक माधुरी के हृदय में छिपा तूफान उचल पड़ा । वह फूट-फूट कर रो पड़ी । जाने वह कितनी देर तक बैठी रोती रही-ग्राकाश पर जमी घटाएँ छैट रही थीं-दूर क्षितिज में प्रभात का तारा सुबह का संदेश दे रहा था । रोने से उसका मन हल्का हो गया था, किन्तु ; शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा थी-थकान थी।
वह उठी, अटैची को थामा और झील को देखने लगी, जहाँ दूर-दूर तक केवल जल ही जल था। राजेन्द्र जा चुका था, दूर" बहुत दुर". उसके जीवन से दूर "वह अब कभी लौटकर न पायेगा । उसने आँचल से अपने प्रभु पोंछे और बिना किसी निश्चय के झील के किनारे-किनारे चल पड़ी। उसे कुछ सूझ न पड़ता था, वह क्या करे ? कहाँ जाये ? वह एक भटके हुए यात्री के समान अनजानी राह पर खो गई थी। उसी
समय झील की लहरों ने जैसे उसके कानों में गुनगुनाहट सी भरी ___ 'माधुरी ! मैं जानता हूँ, मैं तुम्हें नहीं रोक सकता-मैं यह भी जानता हूँ कि एक दुखी और बेबस व्यक्ति की अन्तिम मंजिल क्या है, पर मेरी तुम से यही प्रार्थना है कि तुम लौट जाओ ! तुम्हारे पति अब भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।'
उसके बढ़ते हुए पाँव एकाएक रुक गये। वह पीछे मुड़ी और घर की ओर तेज-तेज पाव उठाकर चलने लगी।
घर वैसे ही मौन था, जैसे वह छोड़कर गई थी । किसी ने उसे पाते हुए न देखा । अँधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था।
दबे पाँव वह अपने कमरे की ओर जाने लगी । वासुदेव का कमरा खुला था। उसने भीतर झांककर देखा वह अपने बिस्तर पर न था। किसी विचार से वह एकाएक कांप गई और द्वार के भीतर खड़े होकर फिर उसने भली प्रकार देखा । वह बाल्कनी में कुर्सी पर बैठा, झुटपुटे में झील को देख रहा था।
वह भीतर आ गई और धीरे-धीरे पांव रखती उसके पीछे जा खड़ी हुई । वह स्थिर बैठा मूर्तिवत् कुछ सोच रहा था। __माधुरी बड़ी देर तक खड़ी उसे देखती रही । वह उससे क्षमा मांगने के लिये आई थी, परन्तु उसके सामने आने का साहस उसमें न था। वासुदेव एकटक दूर क्षितिज में देखे जा रहा था । ___माधुरी में और धैर्य न रहा । उसने रोते हुए, बाँहें वासुदेव के गले
में डाल दीं। रोती जाती थी और कहती जाती थी---
"मेरे देवता ! मुझे क्षमा कर दो। मैंने घोर पाप किया है, मैंने विश्वासघात किया है...''मुझे इसका दण्ड दीजिये । मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे स्वीकार करूंगी, किन्तु ; आप मुझसे यू रूठिये मत । यू मौन न रहिये-मैं पागल हो जाऊँगी मैं आपके पाँव पड़ती हूँ, कुछ बोलिये ! आप ने इतने दिन मन की बात क्यू न कही ? यदि आप जीवन में इतना
शान्त रह सकते हैं, तो क्या मैं अपने देवता की देवसी पर क्षणिक सुख न्योछावर न कर सकती थी। मैं आपको उपहास का पान बनाऊँगी.. यह पाप ने क्यू सोचा ? मैंने आप को अब तक न पाहिलाना था, अब तक न समझा था-" एक ही साँस में रोते-रोते जाने वह क्या-क्या कहती चली गई । जब साँस लेने को रुकी तो उसने वासुदेव को देखा । यह अभी तक किसी गहरे सोच में खोया सा था, उसकी आँखों से बहे हुए आंसू अभी तक उसके गालों पर जमे थे।