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किस्मत का खेल पार्ट --19
गतान्क से आगे.......
दूसरे दिन सुबह भी किशोरीलाल थोड़ी देर से उठा लेकिन राजेश्वरिदेवी तो पहले से ही तैयार थी सुबह का कार्यक्रम निपट के सब दिवानखाने मे आए. अभी विक्रम उठा नही था, सो रहा था. बंसी ने आकर बताया कि कल बाबा ने शराब नही पी है. किशोरीलाल सोचा रहा था कि चलो कुच्छ तो शुरुआत हुई, आगे आगे देखते है क्या होता है. राजेश्वरिदेवी ने बंसी को बोला,’’बंसी भाई आप का क्वॉर्टर कहा है, चलो कृष्णा बहन से मिलते है ?’’
बंसी बोला,’’भाभिजी कृष्णा अगर यहा होती तो कब की बाबा की नज़र मे आ चुकी होती, वो तो यहा से दूर है.’’
‘’कहा है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’मैं आप को ले चलता हू और भैया फिर भाभिजी को वाहा छ्चोड़कर हमे एक दूसरी जगह भी जाना है.’’ बंसी बोला.
‘’लेकिन हम कृष्णा से तो मिल ले पहले.’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’नही, बंसी भैया ठीक कह रहे है वाहा आप लोगो की हाजरी मे कृष्णबहन को बताने मे संकोच होगा, आप मुझे वाहा छ्चोड़कर चले जाइए.’’ राजेश्वरिदेवी ने बताया.
‘’हा, ये ठीक रहेगा.’’ किशोरीलाल ने कहा.
‘’लेकिन बाबा को क्या बोलकर जाएँगे?’’ बंसी ने पुचछा.
’’उसके उठने से पहले ही चले जाते है, वो फ्रेश होगा तब तक शायद हम वापस आ जाएँगे.’’ किशोरीलाल ने कह दिया.
सबलॉग 15 मिनट के बाद निकल पड़े.
जोधपुर डिस्ट्रिक्ट के आसपास 5 डिस्ट्रिक्ट अभी है, नॉर्थ मे बीकानेर, साउत मे पाली और अजमेर, ईस्ट मे नागौर और वेस्ट मे जैसलमेर. लेकिन पुराने जमाने मे जोधपुर एक किला था और अभी जो शेरगढ़ इलाक़ा है वाहा विक्रम की हवेली थी और वाहा से एक बग्गी मे सब बैठ गये (हॉर्स कार्ट) मे बैठकर हवेली की दाई और से जोधपुर के साओथ एंड की ओर चल पड़े. करीब 25 मिनट के बाद वे लोग हाल मे दूरीदरा नाम से जानी जाती प्लेस पर पहुचे वाहा थोड़ा पहाड़ी एरिया था और बहुत छ्होटे छ्होटे झोंपडे जैसे घर थे. वाहा लगता था क़ि ग़रीबो की बस्ती थी. वाहा जाकर एक जगह पे बंसी ने बग्गी को रोक दिया और सब उतर गये और फिर बंसी ने बग्गी को 15 मिनट वाहा रुकने को कहा. सबलॉग एक झोंपडे पर पहुचे वाहा बंसी आवाज़ लगाकर अंदर गया. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी नन्हे से जय को लेकर वाहा खड़े रहे. थोड़ी देर बाद बंसी वापस आया और बोला,’’अरे भैया वाहा क्यू रुक गये आइए ना.’’
दोनो अंदर गये. अंदर एक सुंदर कन्या बैठी हुई थी. कृष्णा विदेश मे रहकर थोड़ी गोरीचित्ति हो चुकी थी. बदन गठरीला, लंबे से घने बाल को खोल रखा था. लगता था कि अभी अभी नहा कर आई हो. झोंपडे के कोने मे चूल्हा, थोड़े बर्तन और पास मे ही छ्होटा सा बिस्तर था और थोड़े नन्हे से मिट्टी से बने हुए खिलोने से एक मासूम छ्होटा सा लड़का खेल रहा था. युरोपियन जैसा गोरा बच्चा, गहरी नीली आँखे, मछलि के आकर सी आँखे और गालो मे खंजन, गंदे कपड़े पहने हुए था.
कृष्णा ने राजस्थानी चोली और कब्जा पहना हुवा था और सिर पे ओढनी रखी हुई थी. कमर सटी हुई और गठरीला बदन था इसीलिए बहुत आकर्षक दिख रही थी कृष्णा. उपर से विदेशी हवा लग चुकी थी तो बड़ी प्यारी दिख रही थी. कृष्णा ने दो हाथ जोड़कर प्रणाम किया और जल्दी ही पानी लेकर सब को पिलाया.
थोड़ी देर बाद बंसी ने पहचान कराई और रजश्थानि अंदाज़ मे बोला,’’थारो काम अभी बाजू मे रख दे और भाभिषा आई है तो दिल खोल के सब बता दे, हम दोनो कही जावे है बाद मे आव जावेंगे, थारी सारी चिंता इसे बोल दे. थारे से जी हल्का हो जावे, समझी.’’
कृष्णा कुच्छ नही बोली सिर्फ़ देखती रही और हा मे सिर हिलाया. बंसी बोला,’’भैया, हमे चलना चाहिए कही देर हो गयी तो बाबा उठ जाएँगे और फिर गाली खानी पड़ेगी.’’
किशोरीलाल हॅस्कर खड़ा हुवा और कृष्णा के छ्होटे बच्चे को उठाकर प्यार दिया और हाथ मे चवन्नि दे दी (उस टाइम मे चवन्नि मतलब चाराना बहुत बड़ी अमाउंट हुवा करती थी). बंसी ने कितना मना किया लेकिन किशोरीलाल उसका हाथ पकड़कर बाहर चला आया. दोनो बग्गी मे बैठ कर ओसियान की ओर चल दिए. ओसियान अब जोधपुर के मॅढिया स्थित इलाक़ा था जहा अब जोधपुर डिस्ट्रिक्ट का मुख्या कार्यालय, नगरपालिका. कोर्ट एट्सेटरा था. रास्ते मे किशोरीलाल ने पुचछा,’’ बंसी हम कहा जा रहे है ?’’
‘’भैया, हमारे वकील के पास.’’ बंसी ने जवाब दिया.
‘’वकील के पास क्यू जाना है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’वकील ने कहा है कि जब भी आप जोधपुर आओ तब मैं आप को उसके पास ले चलु या तो हवेली मे उसे बुला लू. अब बाबा उठे उसके पहले अगर आप ही वकील से मिल लो तो मुझे लगता है कि कुच्छ बेहतर होगा.अगर कुच्छ गंभीर बात होगी तो ही वकील ने आप को वाहा बुलाया होगा.’’ बंसी ने उत्तर दिया.
फिर दोनो बाते करते हुए वकील के घर की ओर चल दिया.
और इधर राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा के सामने देखकर बोला,’’कितनी सुंदर हो तुम’’
‘’शुक्रिया भाभी, मैं आप को भाभी कह सकती हू ना’’ एक स्वीट आवाज़ कृष्णा के गले से निकली.
‘’ये तुम्हारा हक है कृष्णा बहन.’’ राजेस्वरी देवी ने कहा.
‘’लेकिन आप मुझे बहन नही सिर्फ़ कृष्णा ही कहेगी तो नही चलेगा क्या ?’’ हॅस्कर कृष्णा ने कहा.
‘’ठीक है मैं तुझे कृष्णा ही कहूँगी.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.
‘’मैं चाय बनाती हू.’’ कहकर कृष्णा उठ खड़ी हुई.
‚’अरे नही कृष्णा इतना टाइम नही है मैं यहा तुझसे कुच्छ पुछने आई हू.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.
’’मुझे पता है आप इस के बाप कौन है ये जान ने के लिए यहा आई है और पूरी कहानी सुन ने यहा आई है.’’ कृष्णा ने नज़र नीचे रख दी.
’’तुझे कैसे पता है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.
‘’मैने ही बंसी भैया को बोला था कि इसका बाप विक्रम बाबू है लेकिन फिर आगे मे कुच्छ नही बता पाई. वो मेरे बड़े भैया है. मैं अपनी इज़्ज़त की बाते कैसे बता सकती हू अपने भैया को. इसीलिए बंसी भैया ने आपलोगो को यही बुलाया है और मुझे यहा च्छुपाकर रखा है.’’ कृष्णा धीरे से बोली.
‘’ठीक है ये सही है कोई भी औरत अपने भाई के सामने ऐसी बातो मे मूह नही खोल सकती. लेकिन क्या मुझे बतओगि ता कि हम तुम्हारी कुच्छ मदद कर सके.’’ राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा का हाथ पकड़कर पुचछा.
‘’एक भाभी को ज़रूर बताउन्गी लेकिन मुझे कोई मदद नही चाहिए, मुझे कभी भी उस हवेली मे नही आना है. बस रहने को जगह मिल जाए और विक्रम मेरे जीवन मे कभी ना आए इतना ही बस है मेरी ज़िंदगी मे.’’ कृष्णा झूठी हँसी हस्कर बोली.
‘’लेकिन हुवा क्या था, ये कैसे हुवा ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.
फिर कृष्णा ने जो बात बताई वो कुच्छ इस तरह थी तब तक दोनो के बच्चे साथ मे मिट्टी के खिलोनो से खेलते रहे:
गतान्क से आगे.......
दूसरे दिन सुबह भी किशोरीलाल थोड़ी देर से उठा लेकिन राजेश्वरिदेवी तो पहले से ही तैयार थी सुबह का कार्यक्रम निपट के सब दिवानखाने मे आए. अभी विक्रम उठा नही था, सो रहा था. बंसी ने आकर बताया कि कल बाबा ने शराब नही पी है. किशोरीलाल सोचा रहा था कि चलो कुच्छ तो शुरुआत हुई, आगे आगे देखते है क्या होता है. राजेश्वरिदेवी ने बंसी को बोला,’’बंसी भाई आप का क्वॉर्टर कहा है, चलो कृष्णा बहन से मिलते है ?’’
बंसी बोला,’’भाभिजी कृष्णा अगर यहा होती तो कब की बाबा की नज़र मे आ चुकी होती, वो तो यहा से दूर है.’’
‘’कहा है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’मैं आप को ले चलता हू और भैया फिर भाभिजी को वाहा छ्चोड़कर हमे एक दूसरी जगह भी जाना है.’’ बंसी बोला.
‘’लेकिन हम कृष्णा से तो मिल ले पहले.’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’नही, बंसी भैया ठीक कह रहे है वाहा आप लोगो की हाजरी मे कृष्णबहन को बताने मे संकोच होगा, आप मुझे वाहा छ्चोड़कर चले जाइए.’’ राजेश्वरिदेवी ने बताया.
‘’हा, ये ठीक रहेगा.’’ किशोरीलाल ने कहा.
‘’लेकिन बाबा को क्या बोलकर जाएँगे?’’ बंसी ने पुचछा.
’’उसके उठने से पहले ही चले जाते है, वो फ्रेश होगा तब तक शायद हम वापस आ जाएँगे.’’ किशोरीलाल ने कह दिया.
सबलॉग 15 मिनट के बाद निकल पड़े.
जोधपुर डिस्ट्रिक्ट के आसपास 5 डिस्ट्रिक्ट अभी है, नॉर्थ मे बीकानेर, साउत मे पाली और अजमेर, ईस्ट मे नागौर और वेस्ट मे जैसलमेर. लेकिन पुराने जमाने मे जोधपुर एक किला था और अभी जो शेरगढ़ इलाक़ा है वाहा विक्रम की हवेली थी और वाहा से एक बग्गी मे सब बैठ गये (हॉर्स कार्ट) मे बैठकर हवेली की दाई और से जोधपुर के साओथ एंड की ओर चल पड़े. करीब 25 मिनट के बाद वे लोग हाल मे दूरीदरा नाम से जानी जाती प्लेस पर पहुचे वाहा थोड़ा पहाड़ी एरिया था और बहुत छ्होटे छ्होटे झोंपडे जैसे घर थे. वाहा लगता था क़ि ग़रीबो की बस्ती थी. वाहा जाकर एक जगह पे बंसी ने बग्गी को रोक दिया और सब उतर गये और फिर बंसी ने बग्गी को 15 मिनट वाहा रुकने को कहा. सबलॉग एक झोंपडे पर पहुचे वाहा बंसी आवाज़ लगाकर अंदर गया. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी नन्हे से जय को लेकर वाहा खड़े रहे. थोड़ी देर बाद बंसी वापस आया और बोला,’’अरे भैया वाहा क्यू रुक गये आइए ना.’’
दोनो अंदर गये. अंदर एक सुंदर कन्या बैठी हुई थी. कृष्णा विदेश मे रहकर थोड़ी गोरीचित्ति हो चुकी थी. बदन गठरीला, लंबे से घने बाल को खोल रखा था. लगता था कि अभी अभी नहा कर आई हो. झोंपडे के कोने मे चूल्हा, थोड़े बर्तन और पास मे ही छ्होटा सा बिस्तर था और थोड़े नन्हे से मिट्टी से बने हुए खिलोने से एक मासूम छ्होटा सा लड़का खेल रहा था. युरोपियन जैसा गोरा बच्चा, गहरी नीली आँखे, मछलि के आकर सी आँखे और गालो मे खंजन, गंदे कपड़े पहने हुए था.
कृष्णा ने राजस्थानी चोली और कब्जा पहना हुवा था और सिर पे ओढनी रखी हुई थी. कमर सटी हुई और गठरीला बदन था इसीलिए बहुत आकर्षक दिख रही थी कृष्णा. उपर से विदेशी हवा लग चुकी थी तो बड़ी प्यारी दिख रही थी. कृष्णा ने दो हाथ जोड़कर प्रणाम किया और जल्दी ही पानी लेकर सब को पिलाया.
थोड़ी देर बाद बंसी ने पहचान कराई और रजश्थानि अंदाज़ मे बोला,’’थारो काम अभी बाजू मे रख दे और भाभिषा आई है तो दिल खोल के सब बता दे, हम दोनो कही जावे है बाद मे आव जावेंगे, थारी सारी चिंता इसे बोल दे. थारे से जी हल्का हो जावे, समझी.’’
कृष्णा कुच्छ नही बोली सिर्फ़ देखती रही और हा मे सिर हिलाया. बंसी बोला,’’भैया, हमे चलना चाहिए कही देर हो गयी तो बाबा उठ जाएँगे और फिर गाली खानी पड़ेगी.’’
किशोरीलाल हॅस्कर खड़ा हुवा और कृष्णा के छ्होटे बच्चे को उठाकर प्यार दिया और हाथ मे चवन्नि दे दी (उस टाइम मे चवन्नि मतलब चाराना बहुत बड़ी अमाउंट हुवा करती थी). बंसी ने कितना मना किया लेकिन किशोरीलाल उसका हाथ पकड़कर बाहर चला आया. दोनो बग्गी मे बैठ कर ओसियान की ओर चल दिए. ओसियान अब जोधपुर के मॅढिया स्थित इलाक़ा था जहा अब जोधपुर डिस्ट्रिक्ट का मुख्या कार्यालय, नगरपालिका. कोर्ट एट्सेटरा था. रास्ते मे किशोरीलाल ने पुचछा,’’ बंसी हम कहा जा रहे है ?’’
‘’भैया, हमारे वकील के पास.’’ बंसी ने जवाब दिया.
‘’वकील के पास क्यू जाना है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’वकील ने कहा है कि जब भी आप जोधपुर आओ तब मैं आप को उसके पास ले चलु या तो हवेली मे उसे बुला लू. अब बाबा उठे उसके पहले अगर आप ही वकील से मिल लो तो मुझे लगता है कि कुच्छ बेहतर होगा.अगर कुच्छ गंभीर बात होगी तो ही वकील ने आप को वाहा बुलाया होगा.’’ बंसी ने उत्तर दिया.
फिर दोनो बाते करते हुए वकील के घर की ओर चल दिया.
और इधर राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा के सामने देखकर बोला,’’कितनी सुंदर हो तुम’’
‘’शुक्रिया भाभी, मैं आप को भाभी कह सकती हू ना’’ एक स्वीट आवाज़ कृष्णा के गले से निकली.
‘’ये तुम्हारा हक है कृष्णा बहन.’’ राजेस्वरी देवी ने कहा.
‘’लेकिन आप मुझे बहन नही सिर्फ़ कृष्णा ही कहेगी तो नही चलेगा क्या ?’’ हॅस्कर कृष्णा ने कहा.
‘’ठीक है मैं तुझे कृष्णा ही कहूँगी.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.
‘’मैं चाय बनाती हू.’’ कहकर कृष्णा उठ खड़ी हुई.
‚’अरे नही कृष्णा इतना टाइम नही है मैं यहा तुझसे कुच्छ पुछने आई हू.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.
’’मुझे पता है आप इस के बाप कौन है ये जान ने के लिए यहा आई है और पूरी कहानी सुन ने यहा आई है.’’ कृष्णा ने नज़र नीचे रख दी.
’’तुझे कैसे पता है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.
‘’मैने ही बंसी भैया को बोला था कि इसका बाप विक्रम बाबू है लेकिन फिर आगे मे कुच्छ नही बता पाई. वो मेरे बड़े भैया है. मैं अपनी इज़्ज़त की बाते कैसे बता सकती हू अपने भैया को. इसीलिए बंसी भैया ने आपलोगो को यही बुलाया है और मुझे यहा च्छुपाकर रखा है.’’ कृष्णा धीरे से बोली.
‘’ठीक है ये सही है कोई भी औरत अपने भाई के सामने ऐसी बातो मे मूह नही खोल सकती. लेकिन क्या मुझे बतओगि ता कि हम तुम्हारी कुच्छ मदद कर सके.’’ राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा का हाथ पकड़कर पुचछा.
‘’एक भाभी को ज़रूर बताउन्गी लेकिन मुझे कोई मदद नही चाहिए, मुझे कभी भी उस हवेली मे नही आना है. बस रहने को जगह मिल जाए और विक्रम मेरे जीवन मे कभी ना आए इतना ही बस है मेरी ज़िंदगी मे.’’ कृष्णा झूठी हँसी हस्कर बोली.
‘’लेकिन हुवा क्या था, ये कैसे हुवा ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.
फिर कृष्णा ने जो बात बताई वो कुच्छ इस तरह थी तब तक दोनो के बच्चे साथ मे मिट्टी के खिलोनो से खेलते रहे: