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किस्मत का खेल

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किस्मत का खेल पार्ट --19

गतान्क से आगे.......

दूसरे दिन सुबह भी किशोरीलाल थोड़ी देर से उठा लेकिन राजेश्वरिदेवी तो पहले से ही तैयार थी सुबह का कार्यक्रम निपट के सब दिवानखाने मे आए. अभी विक्रम उठा नही था, सो रहा था. बंसी ने आकर बताया कि कल बाबा ने शराब नही पी है. किशोरीलाल सोचा रहा था कि चलो कुच्छ तो शुरुआत हुई, आगे आगे देखते है क्या होता है. राजेश्वरिदेवी ने बंसी को बोला,’’बंसी भाई आप का क्वॉर्टर कहा है, चलो कृष्णा बहन से मिलते है ?’’

बंसी बोला,’’भाभिजी कृष्णा अगर यहा होती तो कब की बाबा की नज़र मे आ चुकी होती, वो तो यहा से दूर है.’’

‘’कहा है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.

‘’मैं आप को ले चलता हू और भैया फिर भाभिजी को वाहा छ्चोड़कर हमे एक दूसरी जगह भी जाना है.’’ बंसी बोला.

‘’लेकिन हम कृष्णा से तो मिल ले पहले.’’ किशोरीलाल ने पुचछा.

‘’नही, बंसी भैया ठीक कह रहे है वाहा आप लोगो की हाजरी मे कृष्णबहन को बताने मे संकोच होगा, आप मुझे वाहा छ्चोड़कर चले जाइए.’’ राजेश्वरिदेवी ने बताया.

‘’हा, ये ठीक रहेगा.’’ किशोरीलाल ने कहा.

‘’लेकिन बाबा को क्या बोलकर जाएँगे?’’ बंसी ने पुचछा.

’’उसके उठने से पहले ही चले जाते है, वो फ्रेश होगा तब तक शायद हम वापस आ जाएँगे.’’ किशोरीलाल ने कह दिया.

सबलॉग 15 मिनट के बाद निकल पड़े.

जोधपुर डिस्ट्रिक्ट के आसपास 5 डिस्ट्रिक्ट अभी है, नॉर्थ मे बीकानेर, साउत मे पाली और अजमेर, ईस्ट मे नागौर और वेस्ट मे जैसलमेर. लेकिन पुराने जमाने मे जोधपुर एक किला था और अभी जो शेरगढ़ इलाक़ा है वाहा विक्रम की हवेली थी और वाहा से एक बग्गी मे सब बैठ गये (हॉर्स कार्ट) मे बैठकर हवेली की दाई और से जोधपुर के साओथ एंड की ओर चल पड़े. करीब 25 मिनट के बाद वे लोग हाल मे दूरीदरा नाम से जानी जाती प्लेस पर पहुचे वाहा थोड़ा पहाड़ी एरिया था और बहुत छ्होटे छ्होटे झोंपडे जैसे घर थे. वाहा लगता था क़ि ग़रीबो की बस्ती थी. वाहा जाकर एक जगह पे बंसी ने बग्गी को रोक दिया और सब उतर गये और फिर बंसी ने बग्गी को 15 मिनट वाहा रुकने को कहा. सबलॉग एक झोंपडे पर पहुचे वाहा बंसी आवाज़ लगाकर अंदर गया. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी नन्हे से जय को लेकर वाहा खड़े रहे. थोड़ी देर बाद बंसी वापस आया और बोला,’’अरे भैया वाहा क्यू रुक गये आइए ना.’’

दोनो अंदर गये. अंदर एक सुंदर कन्या बैठी हुई थी. कृष्णा विदेश मे रहकर थोड़ी गोरीचित्ति हो चुकी थी. बदन गठरीला, लंबे से घने बाल को खोल रखा था. लगता था कि अभी अभी नहा कर आई हो. झोंपडे के कोने मे चूल्हा, थोड़े बर्तन और पास मे ही छ्होटा सा बिस्तर था और थोड़े नन्हे से मिट्टी से बने हुए खिलोने से एक मासूम छ्होटा सा लड़का खेल रहा था. युरोपियन जैसा गोरा बच्चा, गहरी नीली आँखे, मछलि के आकर सी आँखे और गालो मे खंजन, गंदे कपड़े पहने हुए था.

कृष्णा ने राजस्थानी चोली और कब्जा पहना हुवा था और सिर पे ओढनी रखी हुई थी. कमर सटी हुई और गठरीला बदन था इसीलिए बहुत आकर्षक दिख रही थी कृष्णा. उपर से विदेशी हवा लग चुकी थी तो बड़ी प्यारी दिख रही थी. कृष्णा ने दो हाथ जोड़कर प्रणाम किया और जल्दी ही पानी लेकर सब को पिलाया.

थोड़ी देर बाद बंसी ने पहचान कराई और रजश्थानि अंदाज़ मे बोला,’’थारो काम अभी बाजू मे रख दे और भाभिषा आई है तो दिल खोल के सब बता दे, हम दोनो कही जावे है बाद मे आव जावेंगे, थारी सारी चिंता इसे बोल दे. थारे से जी हल्का हो जावे, समझी.’’

कृष्णा कुच्छ नही बोली सिर्फ़ देखती रही और हा मे सिर हिलाया. बंसी बोला,’’भैया, हमे चलना चाहिए कही देर हो गयी तो बाबा उठ जाएँगे और फिर गाली खानी पड़ेगी.’’

किशोरीलाल हॅस्कर खड़ा हुवा और कृष्णा के छ्होटे बच्चे को उठाकर प्यार दिया और हाथ मे चवन्नि दे दी (उस टाइम मे चवन्नि मतलब चाराना बहुत बड़ी अमाउंट हुवा करती थी). बंसी ने कितना मना किया लेकिन किशोरीलाल उसका हाथ पकड़कर बाहर चला आया. दोनो बग्गी मे बैठ कर ओसियान की ओर चल दिए. ओसियान अब जोधपुर के मॅढिया स्थित इलाक़ा था जहा अब जोधपुर डिस्ट्रिक्ट का मुख्या कार्यालय, नगरपालिका. कोर्ट एट्सेटरा था. रास्ते मे किशोरीलाल ने पुचछा,’’ बंसी हम कहा जा रहे है ?’’

‘’भैया, हमारे वकील के पास.’’ बंसी ने जवाब दिया.

‘’वकील के पास क्यू जाना है ?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.

‘’वकील ने कहा है कि जब भी आप जोधपुर आओ तब मैं आप को उसके पास ले चलु या तो हवेली मे उसे बुला लू. अब बाबा उठे उसके पहले अगर आप ही वकील से मिल लो तो मुझे लगता है कि कुच्छ बेहतर होगा.अगर कुच्छ गंभीर बात होगी तो ही वकील ने आप को वाहा बुलाया होगा.’’ बंसी ने उत्तर दिया.

फिर दोनो बाते करते हुए वकील के घर की ओर चल दिया.

और इधर राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा के सामने देखकर बोला,’’कितनी सुंदर हो तुम’’

‘’शुक्रिया भाभी, मैं आप को भाभी कह सकती हू ना’’ एक स्वीट आवाज़ कृष्णा के गले से निकली.

‘’ये तुम्हारा हक है कृष्णा बहन.’’ राजेस्वरी देवी ने कहा.

‘’लेकिन आप मुझे बहन नही सिर्फ़ कृष्णा ही कहेगी तो नही चलेगा क्या ?’’ हॅस्कर कृष्णा ने कहा.

‘’ठीक है मैं तुझे कृष्णा ही कहूँगी.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.

‘’मैं चाय बनाती हू.’’ कहकर कृष्णा उठ खड़ी हुई.

‚’अरे नही कृष्णा इतना टाइम नही है मैं यहा तुझसे कुच्छ पुछने आई हू.’’ राजेश्वरिदेवी ने कहा.

’’मुझे पता है आप इस के बाप कौन है ये जान ने के लिए यहा आई है और पूरी कहानी सुन ने यहा आई है.’’ कृष्णा ने नज़र नीचे रख दी.

’’तुझे कैसे पता है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.

‘’मैने ही बंसी भैया को बोला था कि इसका बाप विक्रम बाबू है लेकिन फिर आगे मे कुच्छ नही बता पाई. वो मेरे बड़े भैया है. मैं अपनी इज़्ज़त की बाते कैसे बता सकती हू अपने भैया को. इसीलिए बंसी भैया ने आपलोगो को यही बुलाया है और मुझे यहा च्छुपाकर रखा है.’’ कृष्णा धीरे से बोली.

‘’ठीक है ये सही है कोई भी औरत अपने भाई के सामने ऐसी बातो मे मूह नही खोल सकती. लेकिन क्या मुझे बतओगि ता कि हम तुम्हारी कुच्छ मदद कर सके.’’ राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा का हाथ पकड़कर पुचछा.

‘’एक भाभी को ज़रूर बताउन्गी लेकिन मुझे कोई मदद नही चाहिए, मुझे कभी भी उस हवेली मे नही आना है. बस रहने को जगह मिल जाए और विक्रम मेरे जीवन मे कभी ना आए इतना ही बस है मेरी ज़िंदगी मे.’’ कृष्णा झूठी हँसी हस्कर बोली.

‘’लेकिन हुवा क्या था, ये कैसे हुवा ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.

फिर कृष्णा ने जो बात बताई वो कुच्छ इस तरह थी तब तक दोनो के बच्चे साथ मे मिट्टी के खिलोनो से खेलते रहे:
 
जब विक्रम के पिताजी गंगाधर, बंसी और कृष्णा मुंबई कृष्णा को छ्चोड़ने के लिए पहुचे और कृष्णा जब विदेश पहुच गयी. वाहा गंगाधर के वकील श्री महर्षि सेन के रिलेटिव्स के यहा उसे रखा गया था और वाहा रहकर कृष्णा ने अपनी नयी ज़िंदगी शुरू की. लगातार कृष्णा और बंसी के बीच पत्रव्यवहार चलता रहा. कृष्णा भी धीरे धीरे अपनी पिच्छली ज़िंदगी से उभरने लगी थी. वाहा रहकर कृष्णा ने ज़िंदगी ने नये तौर तरीके सीखे और आज़ाद कैसे रहा जाता है वह जाना. ज़िंदगी की असलियत वाहा सीखी.

लेकिन एक दिन कृष्णा की ज़िंदगी मे फिर ज़लज़ला आया.

एक बार विक्रम और प्रिन्स विदेश मे गये थे और इस यात्रा का किसी को पता नही था. एक चार्टर प्लेन मे वे लोग पहुचे और अपना काम निपटाकर वापस आने के लिए एक बड़े आलीशान कोठी मे रुके हुवे थे. ये काम ख़तरनाक था इसीलिए किसी को खबर नही होनी थी क़ी प्रिन्स और विक्रम वाहा आए है. तभी प्रिन्स ने कृष्णा को याद किया और बोला,’’यार विकी बुला ले ना उसको, काफ़ी दिन हो गये उसे देखे हुए.’’

विक्रम ने लाख कोशिश की लेकिन प्रिन्स टस से मस नही हुवा और आख़िरकार विक्रम ने पता लगाकर जहा कृष्णा काम कर रही थी वाहा जाकर उसके सामने खड़ा हो गया.

कृष्णा उसे देखते ही हैरान रह गयी और खुश हो गयी की शायद उसके शादी के दिन नज़दीक आ चुके है. लेकिन जब विक्रम ने उसे बताया कि वो प्रिन्स के लिए आया है तो कृष्णा की बोलती बंद हो गयी. क्यूकी अगर नही जाती तो प्रिन्स के हाथो मरती और अगर जाती है तो फिर एक बार और हरामी प्रिन्स के आगे अपने जिस्म को नंगा करना पड़ेगा.

कृष्णा ने विक्रम को पुचछा,”आप को शर्म नही आती,आप अपनी होनेवाली बीवी का सौदा उस हरामी से करने आए है. मैं वो ज़िंदगी को भुला चुकी हू और आप ने ही हम से वादा किया था कि जल्दी ही आप मुझे भारत वापस बुला के मेरे साथ शादी करोगे.’’

विक्रम ने हाथ जोड़कर माफी माँगते हुए कहा,’’देखो कृष्णा उस टाइम मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नही था कि मैं कुच्छ बोल सकु. देखो मैं तो अयाश हू ही और क्यू हू वो सिर्फ़ मैं ही जानता हू. बचपन से मेरी मा नही है और मेरे बाप को रजवाड़े के सिवा कभी अपने बेटे की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत नही है. दूसरा मैने तुम्हे यहा इसीलिए भेजा है कि तुम प्रिन्स के हाथो से सुरक्षित रह सको. वरना तुम्हारे बापू की लालच ने कब का तुम्हारी जान को ले लिया होता. मैं जानता हू कि तुम आज भी एक कन्या ही हो. प्रिन्स क्या तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती करेगा वो आदमी ही नही है ये सिर्फ़ हम दोनो जानते है. आज भी वो औषध मैं अपने साथ लाया हू, प्रिन्स कुच्छ नही कर पाएगा प्लीज़ मेरे साथ चलो ता कि मेरी जान बच सके.’’

‘’लेकिन अब मैं आप की हजारी मे उसके सामने अपना जिस्म नही दिखा सकती, कल तक मेरा कोई नही था, आज आप मेरे सामने मेरे होने वाले पति हो, ऐसे कैसे किसी गैर आदमी के सामने अपना जिस्म दिखाउ.’’ कृष्णा ने दलील की.

’’कृष्णा मुझे माफ़ कर देना मैं तुम्हारे साथ शादी नही कर सकता.’’ विक्रम ने नज़र नीची कर के बोला.

’’क्यू ?’’ कृष्णा ने पुच्छ तो लिया और फिर बोली,’’मैं समझ गयी एक गंदी लड़की को कौन अपने घर की रानी बनाएगा. आख़िर हू तो मई एक जिस्म खोलने वाली औरत ही ना.’’

विक्रम ने कृष्णा का हाथ पकड़ के बोला,’’नही कृष्णा तुझे इस स्थिति मे पहुचाने मे मे ही ज़िम्मेदार हू ना, ये तेरी अकेली की थोड़े ही चाल थी. मैं भी शामिल था. लेकिन बात कुच्छ और है.’’

’’क्या बात है ?’’ कृष्णा ने पुचछा.

‘’मैं अपने दोस्त की बहन सुनंदा को चाहता हू.’’ विक्रम ने नज़र नीची रखकर बोला.

‘’ओह,’’ कहकर कृष्णा ने दूसरी तरफ देख लिया.

थोड़ी देर दोनो चुप रहे फिर विक्रम ने पुचछा,’’क्या प्रिंस के पास जाने के लिए तैयार हो ?’’

कृष्णा ने हा मे सिर हिलाया.

विक्रम का ध्यान फिर उस की तरफ गया वो दूसरी तरफ मूह कर के खड़ी थी और उसकी आँखो मे आँसू थे.

‘’क्यू क्या हुवा?’’ विक्रम ने पुचछा.

‘’कुच्छ नही मैं ऐसे ही मन ही मन आप से…मुझे पता नही ताकि आप की ज़िंदगी मे कोई और भी है,लेकिन कोई बात नही, यही काफ़ी है मेरे लिए की मैं यहा सलामत हू. चलिए मैं चलने के लिए तैयार हू.’’

दोनो चुपचाप वे कोठी पे आ गये और विक्रम ने दूसरे रूम मे कृष्णा को आराम करने को कहा और बताया कि जब वो पुकारे तभी आना है, तब तक वो प्रिन्स को कैसे भी कर के वो औषधि खिला देगा.

फिर जा के विक्रम और प्रिन्स ने बहुत शराब पी. विक्रम ने प्रिन्स को कहा था कि थोड़ी देर मे कृष्णा आ जाएगी. बात बात मे वो औषधि भी प्रिन्स पी चुक्का था. लेकिन एक ग़लती और हो चुकी थी और जिस का अंदाज़ा इन दोनो को नही था कि इस का अंजाम क्या होनेवाला है?

रामेश्वर एक औषधि ऐसी बनाता था कि एक जवामर्द, मोस्ट सेक्सी, जिसे हर दिन अपनी हवस पूरी करने के लिए कोई ना कोई चाहिए ही, ऐसे आदमी को चाँद मिनिट मे सेक्षुयली नर्वस बना दे, जो प्रिन्स खा चुक्का था.

लेकिन एक ऐसी भी जादूगरी रामेश्वर के पास थी. जो विर्यवर्धक, कामोत्तेजक का काम करती थी. उस औषधि मे ब्लॅक मुसली, और वाइट मुसली ऐसे नमक आयुर्वेदिक वनस्पति का मिक्स्चर होता है. उस मिक्स्चर को गधे के दूध मे उबालकर ठंडा किया जाता है. जब वो मिक्स्चर गाढ़ा मीन्स राबड़ी जैसा बन जाए और पूरा ठंडा होने से पहले अगर कोई मर्द उसे पी ले और बाद मे एक ऐसी औरत जो पीरियड के बाद के 8 से 18 दिन के बीच मे हो उसके साथ इंटरकोर्स हो जाए. रिज़ल्ट निसचीत एक बच्चा. क्यूकी वो मिक्स्चर मे इतनी ताक़त है कि पुरुष के शुक्राणु मे करोड़ो की मात्रा मे व्रुध्धि करता है. ऐसा मिक्स्चर साप्ताह मे केवल एक बार सेवन करने से निसंतान कपल के

यहा संतान प्राप्ति की सम्बवाना बढ़ जाती है.

आक्च्युयली विक्रम ने रामेश्वर के पास से सिर्फ़ नमर्द होने की औषधि ही ली थी लेकिन उसने तीन चार डोज़ माँगे थे. क्यूकी पता नही कब प्रिन्स क्या कर जाए. रामेश्वर ने भी तीन चार ही दिए थे. लेकिन ग़लती से वो मिक्स्चर दे दिया था. दोनो रंग रूप मे एक जैसे थे. दोनो को दूध के साथ ही लेना था. अब शराब के बाद कोई आदमी दूध पीता नही. लेकिन रामेश्वर की इन्स्ट्रक्षन थी कि शराब लेने से पहले ही इसका इस्तेमाल कर दिया जाए. जब प्रिन्स को दूध दिया गया, उसने साफ इनकार कर दिया कि अभी उसका मूड शराब पीने का है. विक्रम धर्मसंकट मे आ गया. क्यूकी अभी तक प्रिन्स केवल कृष्णा को च्छू पाया था आगे कुच्छ करने से पहले ही वो औषधि काम कर जाती थी और कृष्णा अभी भी एक कुवारि कन्या ही थी.

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क्रमशः................

 
किस्मत का खेल पार्ट --19

gataank se aage.......

Dusre din subah bhi Kishorilal thodi der se utha lekin Rajeshvaridevi to pehle se hi taiyar thi subah ka karyakram nipat ke sab diwankhane me aye. Abhi Vikram utha nahi tha, so raha tha. Bansi ne akar bataya ki kal baba ne sharab nahi pi hai. Kishorilal socha raha tha ki chalo kuchh to shuruat huyi, age age dekhate hai kya hota hai. Rajeshvaridevi ne Bansi ko bola,’’Bansibhaiya aap ka quarter kaha hai, chalo Krishnabahan se milte hai ?’’

Bansi bola,’’Bhabhiji Krishna agar yaha hoti to kab ki baba ki najar me aa chuki hoti, vo to yaha se dur hai.’’

‘’Kaha hai ?’’ Kishorilal ne puchha.

‘’Mai aap ko le chalta hu aur bhaiya fir bhabhiji ko vaha chhodkar hame ek dusri jagah bhi jana hai.’’ Bansi bola.

‘’Lekin ham Krishna se to mil le pehle.’’ Kishorilal ne puchha.

‘’Nahi, Bansi bhaiya thik kah rahe hai vaha aap logo ki hajari me Krishnabahan ko batane me sankoch hoga, aap muje vaha chhodkar chale jaiye.’’ Rajeshvaridevi ne bataya.

‘’Ha, ye thik rahega.’’ Kishorilal ne kaha.

‘’Lekin baba ko kya bolkar jayenge?’’ Bansi ne puchha.

’’Uske uthane se pehle hi chale jate hai, vo fresh hoga tab tak shayad ham vapas aa jayenge.’’ Kishorilal ne kah diya.

Sablog 15 minat ke bad nikal pade.

Jodhpur District ke aaspas 5 district abhi hai, north me Bikaner, South me Pali aur Ajmer, East me Nagaur aur west me Jaisalmer. Lekin purane jamane me Jodhpur ek killa tha aur abhi jo SHERGARH ilaka hai vaha Vikram ki haveli thi aur vaha se ek BAGI me sab baith gaye (Horse Cart) me baithkar haveli ki dayi aur se Jodhpur ke saoth end ki aur chal pade. Karib 25 min ke bad ve log Hal me Duridara nam se jani jati place par pahuche vaha thoda pahadi area tha aur bahut chhote chhote zopde jaise ghar the. Vaha lagta tha ki garibo ki basti thi. Vaha jakar ek jagah pe Bansi ne Bagi ko rok diya aur sab utar gaye aur fir Bansi ne Bagi ko 15 min vaha rukne ko kaha. Sablog ek zopde par pahuche vaha Bansi ne awaz lagakar andar gaya. Kishorilal aur Rajeshvaridevi Nanhe se Jay ko lekar vaha khade rahe. Thodi der bad Bansi vapas aya aur bola,’’Are bhaiya vaha kyu ruk gaye ayiye na.’’

Dono andar gaye. Andar ek sundar kanya baithi huyi thi. Krishna videsh me rehkar thodi gorichitti ho chuki thi. Badan gathrila, lambe se ghane bal ko khulle rakha tha. Lagta tha ki abhi abhi naha kar ayi ho. Zopde ke kone me chulha, thode bartan aur pas me hi chhota sa bistar tha aur thode nanhe se mitti se bane huye khilene se ek masoom chhota sa ladka khel raha tha. European jaisa gora bachcha, gehri nili ankhe, machhali ke akar si ankhe aur galo me khanjan, gande kapde pehne huye tha.

Krishna ne rajasthani choli aur kabja pehna huva tha aur sir pe odhani rakhi huyi thi. Kamar sati huyi aur gatharila badan tha isiliye bahut akarshak dikh rahi thi Krishna. Upar se videshi hava lag chuki thi to badi pyari dikh rahi thi. Krishna ne do hath jodkar pranam kiya aur jaldi hi pani lekar sab ko pilaya.

Thodi der bad Bansi ne pehchan karayi aur rajashthani andaz me bola,’’tharo kam abhi baju me rakh de aur bhabhisha ayi hai to dil khol ke sab bata de, ham dono kahi jave hai bad me aav javenge, thari sari chinta ise bol de. Thare se ji halka ho jave, samji.’’

Krishna kuchh nahi boli sirf dekhati rahi aur ha me sir hilaya. Bansi bola,’’Bhaiya, hame chalna chahiye kahi der ho gayi to baba uth jayenge aur fir gali khani padegi.’’

Kishorilal haskar khada huva aur Krishna ke chhote bachche ko uthakar pyar diya aur hath me chavanni de di (Us time me chavanni matlab charana bahut badi amount huva karti thi). Bansi ne kitna mana kiya lekin Kishorilal uska hath pakadkar bahar chala aya. Dono Bagi me bethkar OSIYAN ki or chal diye. Osiyan ab Jodhpur ke Madhya sthit ilaka tha jaha ab Jodhpur District ka mukhya karyalay, Nagarpalika. Court etc tha. Raste me Kishorilal ne puchha,’’ Bansi ham kaha ja rahe hai ?’’

‘’Bhaiya, hamare vakilbabu ke pas.’’ Bnsi ne javab diya.

‘’Vakilbabu ke pas kyu jana hai ?’’ Kishorilal ne puchha.

‘’Vakilbabu ne kaha hai ki jab bhi aap jodhour avo tab mai aap ko uske pas le chalu ya to haveli me use bula lu. Ab baba uthe uske pehle agar aap hi vakilbabu se mil lo to muje lagta hai ki kuchh behtar hoga.Agar kuchh gambhir bat hogi to hi vakilbabu ne aap ko vaha bulaya hoga.’’ Bansi ne uttar diya.

Fir dono bate karte huye vakilbabu ke ghar ki or chal diya.

Aur idhar Rajeshvaridevi ne Krishna ke samne dekhkar bola,’’Kitni sundar ho tum’’

‘’Shukriya bhabhi, mai aap ko bhabhi keh sakti hu na’’ ek sweet awaz Krishna ke gale se nikali.

‘’Ye tumhara hak hai Krishnabahan.’’ Rajesvari devi ne kaha.

‘’Lekin aap muje bahan nahi sirf Krishna hi kahegi to nahi chalega kya ?’’ Haskar Krishna ne kaha.

‘’Thik hai mai tuje Krishna hi kahungi.’’ Rajeshvaridevi ne kaha.

‘’Mai chay banati hu.’’ Kehkar Krishna uth khadi huyi.

‚’Are nahi Krishna itana time nahi hai mai yaha tuje kuchh puchhane ayi hu.’’ Rajeshvaridevi ne kaha.

’’Muje pata hai aap is ke bap kaun hai ye jan ne ke liye yaha ayi hai aur puri kahani sun ne yaha ayi hai.’’ Krishna ne najar niche rakh di.

’’Tuje kaise pata hai ?’’ Rajeshvaridevi ne puchha.

‘’Maine hi Bansi bhaiya ko bola tha ki iska baap Vikram babu hai lekin fir age me kuchh nahi bata payi. Vo mere bade bhaiya hai. Mai apni izzat ki bate kaise bata sakti hu apne bhaiya ko. Isiliye Bansi bhaiya ne aaplogo ko yehi bulaya hai aur muje yaha chhupakar rakha hai.’’ Krishna dhire se boli.

‘’Thik hai ye sahi hai koi bhi aurat apne bhai ke samne aisi bato me muh nahi khol sakti. Lekin kya muje bataogi ta ki ham tumhari kuchh madad kar sake.’’ Rajeshvaridevi ne Krishna ka hath pakadkar puchha.

 
‘’Ek bhabhi ko jarur bataugi lekin muje koi madad nahi chahiye, Muje kabhi bhi us haveli me nahi ana hai. Bas rehne ko jagah mil jaye aur Vikrambabu mere jivan me kabhi na aye itana hi bas hai meri zindagi me.’’ Krishna jutha haskar boli.

‘’Lekin huva kya tha, ye kaise huva ?’’ Rajeshvaridevi ne puchha.

Fir Krishna ne jo bat batayi vo kuchh is tarah thi tab tak dono ke bachche sath me mitti ke khilono se khelte rahe:

Jab Vikram ke pitaji Gangadhar, Bansi aur Krishna mumbai Krishna ko chhodane ke liye pahuche aur Krishna jab videsh pahuch gayi. Vaha Gangadhar ke vakilbabu Shri Maharshi Sen ke relatives key yaha use rakha gaya tha aur vaha rehkar Krishna ne apni nayi zindagi shuru ki. Lagatar Krishna aur Bansi ke bich patravyavahar chalta raha. Krishna bhi dhire dhire apni pichhali zindagi se ubharane lagi thi. Vaha rehkar Krishna ne zindagi ne naye taur tarike sikhe aur azad kaise raha jata hai vah jana. Zindagi ki asaliyat vaha sikhi.

Lekin ek din Krishna ki zindagi me fir zalzala aya.

Ek bar Vikram aur Prince videsh me gaye the aur is yatra ka kisi ko pata nahi tha. Ek charter plane me ve log pahuche aur apna kam nipatakar vapas ane ke liye ek bade alishan kothi me ruke huve the. Ye kam khatarnak tha isiliye kisi ko khabar nahi honi thi ki Prince aur Vikram vaha aye hai. Tabhi Prince ne Krishna ko yad kiya aur bola,’’Yar Vicky bula le na usko, kafi din ho gaye use dekhe huye.’’

Vikram ne lakh koshish ki lekin Prince tas se mas nahi huva aur akhirkar Vikram ne pata lagakar jaha Krishna kam kar rahi thi vaha jakar uske samne khada ho gaya.

Krishna use dekhate hi hairan rah gayi aur khush ho gayi ki shayad uske shadi ke din najdik aa chuke hai. Lekin jab Vikram ne use bataya ki vo Prince ke liye aya hai to Krishna ki bolti bandh ho gayi. Kyuki agar nahi jati to Prince ke hatho marti aur agar jati hai to fir ek bar aur harami Prince ke age apne jism ko nanga karma padega.

Krishna ne Vikram ko puchha,”Aap ko sharm nahi aati,aap apni honewali biwi ka sauda us harami se karne aye hai. Mai vo zindagi ko bhula chuki hu aur aap ne hi ham se vada kiya tha ki jaldi hi aap muje bharat vapas bula ke mere sath shadi karoge.’’

Vikram ne hath jodkar mafi magate huye kaha,’’Dekho Krishna us time mere pas koi dusra rasta nahi tha ki mai kuchh bol saku. Dekho me to aiyash hu hi aur kyu hu vo sirf mai hi janta hu. Bachpan se meri ma nahi hai aur mere bap ko rajvade ke siva kabhi apne bete ki or dhyan dene ki fursad nahi hai. Dusra maine tumhe yaha isiliye bheja hai ki tum Prince ke hatho se surakshit rah sako. Varna tumhare bapu ki lalach ne kab ke tumhare jan ko le liya hota. Mai janta hu ki tum aaj bhi ek kanya hi ho. Prince kya tumhare sath jabardasti karega vo aadami hi nahi hai ye sirf ham dono jante hai. Aaj bhi vo aushadh mai apne sath laya hu, Prince kuchh nahi kar payega pelase mere sath chalo ta ki meri jan bach sake.’’

‘’Lekin ab mai aap ki hajari me uske samne apna jism nahi dikha sakti, kal tak mera koi nahi tha, aaj aap mere samne mere hone wale pati ho, aise kaise kisi gair aadami ke samne apna jism dikhau.’’ Krishna ne dalil ki.

’’Krishna muje maf kar dena mai tumhare sath shadi nahi kar sakta.’’ Vikram ne najar nichi kar ke bola.

’’Kyu ?’’ Krishna ne puchh to liya aur fir boli,’’Mai samaj gayi ek gandi ladki ko kaun apne ghar ki rani banayega. Akhir hu to mai ek jism kholne wali aurat hi na.’’

Vikram ne Krishna ka hath pakad ke bola,’’Nahi Krishna tuje is sthiti me pahuchane me mai hi jimmedar hu na, ye teri akeli ki thode hi chal thi. Mai bhi shamil tha. Lekin bat kuchh aur hai.’’

’’Kya bat hai ?’’ Krishna ne puchha.

‘’Main apne dost ki bahan Sunanda ko chahta hu.’’ Vikram ne najar nichi rakhkar bola.

‘’Oh,’’ kehkar Krishna ne dusari taraf dekh liya.

Thodi der dono chup rahe fir Vikram ne puchha,’’Kya Prine ke pas jane ke liye taiyar ho ?’’

Krishna ne ha me sir hilaya.

Vikram ka dhyan fir us ki taraf gaya vo dusri taraf muh kar ke khadi thi aur uski ankho me ansu the.

‘’Kyu kya huva?’’ Vikram ne puchha.

‘’Kuchh nahi mai aise hi man hi man aap se…muje pata nahi thaki aap ki zindagi me koi aur bhi hai,lekin koi bat nahi, yehi kafi hai mere liye ki main yaha salamat hu. Chaliye mai chalne ke liye taiyar hu.’’

Dono chupchap ve khothi pe aa gaye aur Vikram ne dusre room me Krishna ko aaram karne ko kaha aur bataya ki jab vo pukare tabhi aana hai, tab tak vo Prince ko kaise bhi kar ke vo aushadhi khila dega.

Fir ja ke Vikram aur Prince ne bahut sharab pi. Vikram ne Prince ko kaha tha ki thodi der me Krishna aa jayegi. Bat bat me vo aushadhi bhi Prince pi chukka tha. Lekin ek galati aur ho chuki thi aur jis ka andaza in dono ko nahi tha ki is ka anjam kya honewala hai?

Rameshvar ek aushadhi aise banata tha ki ek javamard, most sexy, jise har din apni havas puri karne ke liye koi na koi chahiye hi, aise aadmi ko chand minitues me sexually nervous bana de, jo Prince kha chukka tha.

Lekin ek aisi bhi jadugari Rameshvar ke pas thi. Jo viryavardhak, kamottejak ka kam karti thi. Us aushadhi me Black Musali, aur White Musali aise namak ayurvedik vanaspati ka mixture hota hai. Us mixture ko gadhe dudh me ubalkar thanda kiya jata hai. Jab vo mixture gadha means RABADI jaisa ban jaye aur pura thanda hone se pehle agar koi mard use pi le aur bad me ek aisi aurat jo period ke bad ke 8 se 18 din ke bich me ho uske sath intercourse ho jaye. Result nischit ek bachcha. Kyuki vo mixture me itani takat hai ki purush ke shukranu me karodo ki matra me vrudhdhi karta hai. Aisa mixture saptah me keval ek bar sevan karne se nisantan couple ke

yaha santan prapti ki sambavana badh jati hai.

Actually Vikram ne Rameshvar ke pas se sirf namard hone ki aushadhi hi li thi lekin usne tin char doz mange the. Kyuki pata nahi kab Prince kya kar jaye. Rameshvar ne bhi tin char hi diye the. Lekin galati se vo Mixture de diya tha. Dono rang rup me ek jaise the. Dono ko dudh ke sath hi lena tha. Ab sharab ke bad koi aadami dudh pita nahi. Lekin Rameshvar ki instruction thi ki sharab lene se pehle hi iska istemal kar diya jaye. Jab Prince ko dudh diya gaya, usne saf inkar kar diya ki abhi uska mood sharab pine ka hai. Vikram dharmsankat me aa gaya. Kyuki abhi tak Prince keval Krishna ko chhu paya tha age kuchh karne se pehle hi vo aushadhi kam kar jati thi aur Krishna abhi bhi ek kuvari kanya hi thi.

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kramashah................

 
किस्मत का खेल पार्ट --20

गतान्क से आगे.......

आज अगर प्रिन्स दूध नही पीता है तो कृष्णा मर जाएगी, ये पता चलते ही विक्रम ने दो दूध के ग्लास बनवाए थे. जहा वो ठहरे थे उस कोठी मे इंग्लीश नौकर की बेटी को सर्व करने के लिए बोला गया और इन्स्ट्रक्षन दिए गये कि एक ग्लास मे नमार्द करने की औषधि का डबल डोज़्ज़ दिया जाए. लेकिन वो इंग्लीश लड़की हिन्दी कम और इंग्लीश ज़्यादा समझती थी. कुच्छ कम्यूनिकेशन गेप हो गया और उसने दोनो ग्लास मे एक एक पॅकेट डाल दिया. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि प्रिन्स का दूध मे दूध ही रहा और विक्रम के ग्लास मे राबड़ी जैसा गढ़ा दूध बन गया.

जब इंग्लीश लड़की सर्व करने आई, प्रिन्स उसको देखता ही रह गया. जब विक्रम ने देखा कि एक नॉर्मल दूध है और दूसरा राबड़ी जैसा है तो उसने हर बार दूध ही मे औषधि को देखा था तो वो दूध का ग्लास प्रिन्स को दे दिया और खुद ने वो राबड़ी जैसा दूध का पान किया. फिर दोनो ने शराब पी. प्रिन्स ईज़ नाउ आउट ऑफ कोर्स आंड विक्रम बिकम ए स्ट्रॉंग स्ट्राइकर.

जब कृष्णा को बुलाया गया और उसने प्रिन्स के सामने एक के बाद एक कपड़े खोलने शुरू किए. ऐसा नज़ारा विक्रम कई बार देख चुका था कि प्रिन्स के आउट हो जाने के बाद कृष्णा को छुप छुप के कई बार उसने देखा था, लेकिन कभी भी उसे टच नही किया था क्यूकी ये उन दोनो के बीच एक मौखिक अग्रीमेंट था कि दोनो की चल थी सिर्फ़ प्रिन्स के लिए, उसमे कभी भी विक्रम को कृष्णा का फ़ायदा नही उठाना था. इसीलिए कई बार जब कृष्णा को शराब पिला के प्रिन्स आउट कर देता था तो विक्रम उसे कपड़े पहनाकर वापस लाता था, लेकिन कभी भी उसने अपनी मर्यादा तोड़ी नही थी. वैसे भी पहले कृष्णा इतनी अट्रॅक्टिव नही थी.

लेकिन आज कृष्णा को विदेश का गोरापन लग चुका था. विदेशी ठंडी के मौसम मे आप के जिस्म की चरबी बढ़ जाती है. पतली कृष्णा आज गठरीली बन चुकी थी. जब प्रिन्स टोटली आउट हो गया तो कृष्णा ने वापस अपने सारे कपड़े पहने और बाहर निकली. बाहर के रूम मे विक्रम बैठा था, उसके सामने जाकर वो बैठ गयी.

अगर चुपचाप वाहा से चली जाती तो शायद इतिहास नही बनता, लेकिन आज उसे भी दर्द महसूस हुवा था, क्यूकी वादे के अनुसार विक्रम उसका होनेवाला पति था लेकिन विक्रम ने आज ही बताया था कि वो किसी और से प्रेम करता है. यहा विदेश मे कृष्णा के टूटे हुए दिल का सहारा भी विक्रम ही था. लाख कोशिश के बाद भी कृष्णा की आँखो ने आँसू बहा ही दिए. विक्रम फुल नशे मे था लेकिन आँसू देखकर कृष्णा को सिर पर हाथ लगाने लगा. लेकिन अभी अभी 10 मिनट पहले कृष्णा का जिस्म देख चुका था. आज तो उसकी हालत उस दिन से भी ज्याद खराब थी जिस दिन कृष्णा की इंडिया की आखरी रात थी.

कृष्णा को विक्रम का हाथ सिर पर महसूस होते ही रो पड़ी क्यूकी आज वो सचमुच बेसहारा हो चुकी थी. एक लड़की ही जानती है जब उसका दिल टूट जाता है. वो झट से विक्रम से लिपट गयी और रोने लगी, लेकिन कृष्णा के जिस्म का पहला एहसास विक्रम को हो रहा था. औषधि और जिस्म दोनो ने अपना जलवा शुरू कर दिया और विक्रम पे मदहोशी च्छा गयी.

विक्रम पर कृष्णा के जिस्म ने जादू कर दिया. उसके हाथ अपने आप ही कृष्णा के कंधो पे चलने लगे. धीरे धीरे हाथ कंधो से नीचे उतरकर पीठ पे चले गये और बाद मे सरककर बॅक तक पहुच गये. कृष्णा अपने गम मे इतनी डूबी हुई थी की विक्रम से लिपटकर अपना पूरा मन खुला कर के रो रही थी. विक्रम का बुखार बढ़ता ही चला गया . हलकी वो औषधि से कभी मदहोशी नही छाती थी, लेकिन विक्रम के माइंड पर शराब और शबाब का नशा था उपर से विदेश की मौसम और शाम का महॉल था. वो औषधि तो सिर्फ़ पुरुष के शुक्राणु बढ़ाती थी, लेकिन शबाब का नशा इस से बढ़कर होता है.

विक्रम की सहन से बाहर हो गया तो उसने लपक कर कृष्णा को बेड पर डाल के उसके उपर सटकार दबोचकर कृष्णा के होंठो को काटना चालू कर दिया. अचानक हमले से कृष्णा पहले तो कुच्छ समझ ही नही पाई कि उसके साथ क्या हो रहा है लेकिन फिर समझ मे आया कि उसके जिस्म का नशा विक्रम के सिर पर सवार हो चुका है. पहले तो उसके बॉडी ने रिक्ट ऐसा किया कि अचानक विक्रम के बॉडी का पूरा हिस्सा उस पर आ गया .

कृष्णा ने विदेशी ड्रेस की आदत मुश्किल से डाली थी और विक्रम के कहने पर ही उसने फॉरिन लेडी की तरह घुटनो तक का लंबा स्कर्ट पहना था. स्कर्ट ब्राउन कलर का था और बार्बी डॉल जैसा घूमता था. उपर से गर्डल मे गाँठ पड़ी हुई थी और स्कर्ट की ज़िप पिछे थी जो पीठ से लेकर कमर तक लंबी थी. विक्रम के उपर आने से कृष्णा जो रो रही थी, उसके मूह से आ निकल गयी क्यूकी अचानक वजन बढ़ गया उसके उपर तो कृष्णा के स्तन जोरो से दब गये. स्कर्ट और स्कर्ट के अंदर फुल स्टीप की ब्रा और उसके अंदर पड़े हुए स्तन युग्म बेरहमी से विक्रम की छाती के अंदर दब गये और कृष्णा के होंठो को लॉक कर दिया गया था. रेड कलर की लिपस्टिक का रंग बिखरने लगा. कृष्णा के हाथो ने इनकार मे रिक्ट किया लेकिन खुद कृष्णा की मानसिक स्थिति अच्छी नही थी और कृष्णा ने विक्रम मे अपना तारन हार नज़र आ रहा था. पिछछले कई महीनो से वो बिल्कुल अकेली थी, उसका कोई सहारा नही था. वो खुद तो रो रो कर बहाल हो चुकी थी, उसके जिस्म की गरमी तो कब की ठंडी हो चुकी थी. लेकिन जब विक्रम ने जोरो सोरो से उसको काटना शुरू कर दिया तो कृष्णा के माइंड पे कोई सहारा महसूस हुवा और वो खुला मन करके रो कर विक्रम से सॅट गयी. लेकिन उसके रोने का कोई असर विक्रम की मदहोशी पे नही हुवा. विक्रम मदहोशी मे होंठो से शुरू कर के धीरे धीरे कृष्णा को आँखो पर, गालो पर, गले पर और गले से नीचे उतरकर स्तन की गहराइयो मे और दोनो स्तन पर से लेकर छाती, पेट तक बेतराशा काटने लगा. कृष्णा की आँखो से आँसू की धारा बहे जा रही थी लेकिन आज मानो उसे कोई अंजाना साथी मिल गया हो और जैसे एक नयी दुल्हन अपनी सुहागरात मे अपने पति के समर्पण को तैयार रहती है तब उसे दर्द नही रोमांच होता है वैसा ही कुच्छ कृष्णा महसूस कर रही थी.

एक न्यू मॅरीड दुल्हन जब बिदाई के वक़्त रो रो के अपना हाल बहाल कर देती है और फिर अभी ससुराल पहुचने से पहले ही अगर सुहागरात का मौका आ जाए तो उसकी हालत क्या होती है. एक तरफ अपने बाबुल का घर छ्चोड़ने का दर्द और दूसरी तरफ अपने पति का परम सुख का पहला एहसास. दोनो स्थिति के बीच की स्थिति यही होती है कि वो दुल्हन सिर्फ़ समर्पण करती है. उसका माइंड अपने मैके और पति के साथ के जिस्म के सुख के बीच भटकता रहता है और फिर जब मदहोशी च्छा जाती है तो सिर्फ़ समर्पण ही नही लेकिन जोरो से अपने पति का साथ देती है.

कुच्छ वैसी ही हालत कृष्णा की थी, उसके हाथ ने अपने आप ही विक्रम की बाँहे थाम कर साथ देना शुरू कर दिया. क्यूकी प्रिन्स सिर्फ़ उपयोग करना जानता था लेकिन विक्रम को तो वो प्यार करती थी और आज उसका प्यार ही प्यासा बन कर उसके जिस्म के उपर चढ़कर अपनी प्यास बुझाना चाहता था. कृष्णा की आँखो से अब सहारा मिलने की खुशी के आँसू बहने लगे और विक्रम को पूरी आज़ादी मिल गयी. विक्रम ने कृष्णा के होंठो को फिर अपने होंठो से लॉक किया और चूसने, चूमने और काटने लगा. लिपस्टिक तो कब का वो खा चुका था. सिर्फ़ निशान बचे थे. लिपस्टिक के निशान गाल, नेक, चिन और कृष्णा के ब्राउन ड्रेस पर लग चुके थे. विक्रम को कमर के नीचे बड़ा भौचाल आया हुवा था जिसकी गरमी कृष्णा ज़िंदगी मे पहलिबार महसूस कर रही थी. 15 मिनट के खेल के बाद विक्रम थोड़ा खड़ा हुवा तो कृष्णा की स्कर्ट जाँघ तक पहुच चुकी थी. कृष्णा सॅंडल पहने आई थी और पैरो मे सॉक्स पहने हुए थे. वाइट कलर के ट्रॅन्स्परेंट सॉक्स के अंदर विदेशी चमड़ी दिखाई देती थी. विक्रम ने वाहा से चूमना शुरू किया और धीरे धीरे नी और उपर तक पहुच गया . अब रोने की आहट मीठी आहे मे परिवर्तित होती चली गयी थी. कृष्णा आँखे मिचे जिस्म का आनंद ले रही थी. इसके पहले भी प्रिन्स कई बार उसके जिस्म को नोच चुका था इसीलिए ये पहला मौका नही था और कृष्णा की योनि से भी कई बार यौवानरस बह चुक्का था लेकिन हर बार कुच्छ अधूरापन महसूस किया था क्यूकी वो हालत सिर्फ़ मजबूरी और प्लान के अनुसार हुवा करता था. लेकिन आज उसका प्रेमी उसको नौच रहा था. वो पागल होकर आँखे मिचे सोई हुई थी.

लेकिन जब विक्रम के होठ योनि के पास पहुच गये तो कृष्णा से सहन नही हुवा और उसका पाव मुड़ा और दोनो पैरो को जोड़ के विक्रम को हटाने की कोशिश कर रही थी. अब उसे प्रिन्स की हरकत याद आ रही थी. क्यूकी प्रिन्स जब कुच्छ नही कर पाता था तो अपने होंठो से कृष्णा का यौवन रस चूसने लगता था. कृष्णा की मर्ज़ी नही होती थी फिर भी प्रिन्स उसको नीचे चूस्ता रहता था और कृष्णा को कई बार अधूरा छ्चोड़ के चला जाता था फिर कृष्णा कुच्छ कर नही पाती थी. लेकिन आज विक्रम के होंठो ने जादू कर दिया था और कृष्णा पर मदहोशी पहली बार छाने लगी. कृष्णा के मूह से आआहह, उआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह आहे निकलने लगी. कृष्णा की योनि ने यौवन रस की धारा बहानी शुरू कर दी. विक्रम को मदहोशी मे अपने होंठो पर भीगी खुश्बू महसूस हुई. कृष्णा के यौवन रस की खुसबू से विक्रम की मदहोशी चार गुणी बढ़ गयी और वो अपने होंठो को योनि द्वार पर ले गया और वाहा चूसने लगा उसके हाथोसे स्कर्ट को उठा उठा कर कमर तक ले गया और कृष्णा की नंगी कमर, नेवेल और योनि को बार बार चूमने, काटने लगा.

जब बर्दाश्त से बाहर हुवा तो कृष्णा का पाव अपने आप ही विक्रम की छाती पर पड़ा और विक्रम बेड से नीचे गिर गया. कृष्णा की छाती तेज़ी से धड़क रही थी क्यूकी उसे पता था कि आज वो कुँवारी नही रहने वाली. और बेड पे वो पैरो के सहारे खड़ी हो के उल्टी बैठ गयी और मुड़कर बैठ गयी. विक्रम खड़ा हुवा और अपना पेंट, शर्ट सबकुच्छ जल्दी ही निकल कर कूद के बेड पर चढ़ गया . कृष्णा को पता नही था कि अब विक्रम उसके बेड पर कैसे चढ़ा है. लेकिन विक्रम ने उसको पिछे से ही पकड़ लिया और उसकी पीठ, कंधे को चूमने और काटने लगा. रेशम का स्कर्ट की चटनी हो रही थी. विक्रम ने एक ही झटके मे पूरी ज़िप खोल दी. उसकी सुंदर पीठ और उस पर काली ब्रा की स्ट्रीप नज़र आई और विक्रम पागल हो गया उसने एक ही झटके मे ब्रा की स्ट्रीप तोड़ दी. ब्रा टूटने से कृष्णा की पीठ पर निशान पड़ गये और मूह से चीख. उसने पलट कर विक्रम को देखा और उसे बर्थड्रेस मे देखकर चौक उठी. आज तक कृष्णा ने प्रिन्स का देखा था और हिला हिला कर थक जाती तब एक या दो बूंदे गिरती थी, लेकिन यहा विक्रम का शिश्न की लंबाई और चौड़ाई देखकर उसे विश्वास नही हो रहा था कि एक मर्द की शिश्न की लंबाई इतनी मोटी भी हो सकती है. वो जब विक्रम का शिश्न देख रही थी तब विक्रम ने कब उसकी स्कर्ट कंधो से उतारकर कमर तक रख दी उसे पता ही नही चला. ब्रा तो पहले से ही छाती से दूर की गयी थी तो पिंक कलर के बड़े निपल के साथ खुली छाती पर विक्रम ने जैसे हल्ला ही कर दिया और जब बाया निपल विक्रम के दांतो के बीच काटा गया तब कृष्णा होश मे आई और बड़ी चीख उसके मूह से निकल गयी आआआआआआअहह. कृष्णा ने दोनो हाथो से फिर विक्रम को हटाया और विक्रम फिर संतुलन खो के नीचे गिर गया . कृष्णा खड़ी हुई तो स्कर्ट पूरी उतर गयी. अभी तो वो स्कर्ट संभालती उसके पहले तो विक्रम खड़ा हो के उसे ज़बर्दाश्ती से बेड पे सुला कर उसके दोनो पैरो को फैलाया और और उसके उपर सो गया. ओओओओओओओओओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मा कर के कृष्णा फिर विक्रम का वेट सहन नही कर पाई क्यूकी अब उसके पैर खुले थे लेकिन कमर, स्तन, छाती पर विक्रम ने अपनी पूरी बॉडी डाल दी थी. हाथो से कृष्णा के दोनो हाथो पकड़कर उपर कर दिया और ब्लॅक निक्कर को झटके से उतारकर रख दिया और पैरो के पंजे से कृष्णा के दोनो पैरो के पंजो को दबाए रखा था. मानो के एक निसाहाय युवती पर बलात्कार की तैयारी हो चुकी थी. दो बार गिरने से विक्रम को थोड़ा गुस्सा आया था और उसने एक हाथ खोलकर अपना शिश्न सीधा कृष्णा के योनि द्वार पे रख दिया और कमर से ज़ोर से धक्का दिया. गीली होने के वजह से कृष्णा की यौवन पट्टी एक ही धक्के मे टूट गयी.
 
खल्लास, कृष्णा के मूह से बड़ी चीख निकल गयी आआआआआहह, ऊऊऊऊऊहह करके कृष्णा अपनी रही सही ताक़त से पूरे जिस्म को समेटकर उच्छली और विक्रम का शिश्ण् बाहर निकल आया और खून का फव्वारा कृष्णा के दोनो पैरो के बीच जा के गिरा और खून बहने लगा. कृष्णा को योनि मे आग लगी हो ऐसा अनुभव हुवा और वो छट-पटाने लगी. उसने खड़े होने के लिए ताक़त लगाकर उपर उठने की कोशिश की लेकिन योनि के दर्द ने उसके पाव खुले ही रह जाते थे और विक्रम के पैर को हटाने मे असमर्थ साबित हुए. लेकिन विक्रम की हाथो की सख़्टाई के आगे वो सिर्फ़ अपनी कमर उच्छाल सकती थी क्यूकी हाथ तो लॉक हो चुके थे. और विक्रम ने अपने पैरो से फिर से कृष्णा की कमर को दबोच लिया और फिर उसके उपर सो गया और एक हाथ से फिर शिश्न को अंदर घुसा दिया. और फिर एक झटके के साथ ही कृष्णा दर्द के मारे छट-पटाई और कमर उच्छाली, लेकिन उल्टा शिश्न अंदर घुस गया और सीधा बच्चेदानी से टकराया. कृष्णा ने जोरो से होठ और आँखे मिच ली, ये दर्द उसके सहन के बाहर था क्यूकी ये आनंद नही बलात्कार जैसा था. विक्रम की मदहोशी इतनी बढ़ गयी थी और शराब और शबाब के नशे मे उसको गुस्सा भी आया था कि उसकी कमर जोरो से हिलने लगी और कृष्णा का क़त्ल चालू हो गया . लेकिन 7 मिनिट्स के बाद कृष्णा का दर्द कम हो गया और यौवन रस के बहाव से वो शांत हो गयी और आराम से विक्रम के धक्के सहन करने लगी. अब कृष्णा पूरे होश मे थी. एक लड़की सेक्स के वक़्त नशे मे खो जाती है.

लेकिन ये कृष्णा थी. पूरे सेक्स का नही लेकिन आधे का तो वो कई बार एक्सपीरियेन्स कर चुकी थी. अब उसकी विचारधारा शुरू हो चुकी थी कि उसका यौवन खंडन हो चुक्का है. अब कोई फ़ायदा नही विरोध करने का. वैसे भी वो विक्रम को चाहती थी लेकिन उसे पता नही था कि अचानक विक्रम यू हमला करेगा और उसे कली से कमल बना देगा. थोड़ी देर तक उसकी आँखो मे फिर आँसू आ गये क्यूकी फिर एक बार वो लाचार हो चुकी थी. वो सहारा चाहती थी और विक्रम सहारे के बदले मे उसका सबकुच्छ यहा छीन रहा था. फिर उसने सोचा कि अच्छा ही हुवा कि कोई पराया मर्द उसे छुये इसके बदले विक्रम के हाथो से ही उसका यौवन खंडन हो गया. अब बाकी की ज़िंदगी सिर्फ़ इसी सहारे तो कटनी थी.

उसने इस कटु वास्तविकता को स्वीकार कर के आँखे मिच ली. विक्रम उसे कई जगह पर काट रहा था और उसकी स्पीड बढ़ चुकी थी. लेकिन दर्द गायब था और मीठा स्पंदन भी गायब था. अब कृष्णा शुन्य हो गयी. कृष्णा का जिस्म बिल्कुल ठंडा हो चुका था. मानो कोई मर्द एक लाश के साथ सेक्स एंजाय कर रहा हो ऐसा महसूस हो रहा था. विक्रम को नशे मे भी एक तरफ़ा सेक्स मे मज़ा नही आ रहा था और वो कृष्णा के बदन पर से खड़ा हुवा अभी भी कमर पे बैठा रहा और शिश्न को योनि के अंदर ही रखा और हाथो मे सख्ती से कृष्णा के हाथ पकड़े रखे थे और कृष्णा को देखने लगा. बिखरी बिखरी कृष्णा को देखकर उसे फिर ताव आया और उसने कृष्णा के दोनो पैरो को मिक्स करके बैठे बैठे ही धक्के देने चालू किए, अब कृष्णा की योनि ने जोरो से बहाव शुरू कर दिया और कृष्णा के स्तन हर एक धक्के से गोल गोल घूमे लगे थे, गुलाबी निपल्स तन के खड़े हो चुके थे और कृष्णा खुली आँखो से अपने आप को लूटते हुए देख रही थी. कड़वी वास्तविकता से उसे हसी आ गयी और उसने फिर आँखे मिच ली. विक्रम के हाथो मे ढीलापन देखकर कृष्णा ने अपने दोनो हाथ खोलकर विक्रम को अपने बॉडी के उपर खिच लिया और विक्रम के होंठो को चूसने, काटने लगी आज वो सबकुच्छ समर्पित कर देना चाहती थी.

कृष्णा और विक्रम एक दूसरे मे जैसे समा जाने को तैयार थे. ये नज़ारा ऐसा था जैसे दो स्नेक का समागम हो रहा हो. दोनो एक दूसरे मे खो चुके थे. विक्रम की रफ़्तार बढ़ चुकी थी. यौवानरस के बहाव से कृष्णा का योनिद्वार इतना खुल चुका था अब उसे कोई दर्द महसूस नही हो रहा था. कृष्णा ने पूरी तरह से विक्रम को सुख देना चालू कर दिया और विक्रम का नशा ज़्यादा तेज़ कर दिया. नॉनस्टॉप 10 मिनट के बाद, क्यूकी कृष्णा के लिए पहला इंटरकोर्स था, योनि को संभाल नही पाई और उसको लगा कि कुच्छ बाहर उगलनेवाला है. विक्रम पूरा दबोच के कृष्णा पे जैसे बलात्कार कर रहा था और कृष्णा बिल्कुल ख़तम होने को आई तो उसका जिस्म धनुष की तरह खिछा और तंग हो गया. पैरो के पंजो ने अंगड़ाई लेकर सख्ती मे सब उंगलिया एक हो गयी. स्तन उठकर कड़क हो गये और आँखे और होठ मस्ती और दर्द दोनो मे मिच गये. अचानक कृष्णा अपने मूह के बाल पर छटपटाई और विक्रम का लिपलोक्क खुल गया.

कृष्णा छाती के बाल पर अपना पूरा ज़ोर कर के उठी और विक्रम अभी भी पूरे नशे मे ही था, लेकिन कृष्णा की ताक़त के आगे पहली बार विक्रम का बॉडी खड़ा हुवा और विक्रम को अपने हाथ का सहारा लेना पड़ा. अब कृष्णा के हाथ भी खुले हुए और उसके बॉडी का आधा हिस्सा बीच मे से खड़ा हुवा. स्तन बिल्कुल खुलकर उठ गये और कृष्णा की योनि से यौवानरस की धारा का सैलाब बाहर आने लगा. कृष्णा फिर चीख उठी, लेकिन ये चीख सेक्स की चरमसिमा के एहसास की थी.

विक्रम के धक्के लगातार चालू ही थे. विक्रम अपने हाथ के सहारे कृष्णा की बॉडी के उपर ही था कृष्णा की जाँघ से लेकर पैरो के पंजे तक अभी भी विक्रम ने कृष्णा को दबोच के रखा था. लेकिन खाली हो जाने के बाद कृष्णा की बॉडी धदाम से बेड पर गिरी और वो हाँफने लगी. अब उसे योनि मे फिर दर्द शुरू हो गया और होंठो मे, स्तन पे, गले पर, चिन पर जलन शुरू हुई. कृष्णा के होंठो की लिपस्टिक का रंग उसके सारे चेहरे पे बिखर चुका था. बेड लाहुलुहन हो चुका था. कृष्णा खल्लास हो चुकी थी. उसकी छाती उच्छल उच्छल कर धड़क रही थी. हाथ और पैरो पे वेट और खल्लास होने से ख़ालीपन महसूस होने लगा और आँखो के सामने अंधेरा छाने लगा और उसके मूह से धीरे धीरे चीखे चालू हुई और विक्रम को रोकने के लिए हाथ उठाने गयी. लेकिन ताक़त कम पड़ गयी और विक्रम ने फिर उसे दबोच लिया. कृष्णा की योनि ढीली होने से फिर विक्रम को तकलीफ़ होने लगी और वो 10 सेकेंड्स के लिए रुका. कृष्णा ने इशारे से समझाने की कोशिश करी कि अब वो धक्के खाने मे असमर्थ हो चुकी है. लेकिन विक्रम का तना शिश्न अभी भी उसके योनि के अंदर था. विक्रम ने बाहर निकाला और फिर अंदर जोरदार धक्के से डाल दिया और कृष्णा के आँखो के सामने बिल्कुल अंधेरा च्छा गया और बाद मे उसे कुच्छ पता नही था कि उसके साथ क्या हुवा.

इतना कहकर कृष्णा थोड़ी रुकी, नीची नज़र रखते हुए थोड़ी देर चुप बैठी रही फिर खड़ी हो के पानी पी के वापस आ गयी, मिट्टी के खिलोने से खेलते हुए दोनो बच्चो को देखने लगी और फिर अचानक मुस्कुराइ और नज़र उठाके राजेश्वरिदेवी के सामने देखा और फिर बोल उठी,’’मेरी किस्मत मे घर ग्रहस्थी बसाना नही लिखा है भाभी, शायद हम दोनो भाई बहन अपने पिताजी का किया भोगत रहे है. लेकिन हम उसे भी दोष नही दे सकते क्यूकी उसने जो भी किया हमारे खातिर किया. मेरा भाई उसके घर मे नौकरो की ज़िंदगी इसीलिए बिता रहा है क्यूकी हमारा सौदा हुवा था कि मैं फॉरिन मे सेफ रहू. लेकिन मेरे भाई की कुर्बानी की कीमत कोडियो के दाम बिक गयी और मेरी जवानी आख़िर बलि चढ़ गयी. ’’

इतना कहकर फिर उसने नज़र नीची डाल दी. राजेश्वरी देवी ने हाथो से उसके कंधे को फुसलाया और पुचछा,’’लेकिन बाद मे क्या हुवा कृष्णा ? तूने कभी विक्रम भैया को क्यू नही बताया कि ये बच्चा उस शाम की देन है जिस दिन उन्होने तुम पर ये कदम उठाया था.’’

’’मैं विक्रम बाबू को आप से ज़्यादा जानती हू भाभी, अगर कहती तो वो क्या मानते की ये बच्चा उसका है. उल्टा शायद मेरे बच्चे की जान ख़तरे मे होती.’’ कृष्णा ने राजेश्वरिदेवी की आँखो मे आँखे डालकर जवाब दिया.

राजेश्वरी देवी उसकी आँखो की चमक देखकर अपनी आँखे मिचकर उसकी बातो की पुष्टि की और फिर पुचछा,’’लेकिन तू कम से कम उसे याद तो दिला की ये बच्चा कैसे इतना बड़ा हुवा.’’

’’भाभी मेरा जवाब भी इसी सवाल मे है कि कैसे बताउ कि ये उसका बच्चा है, मेरे पास क्या सबूत है कि उसने वो शाम मेरे साथ गुज़री है.’’ कृष्णा ने बोला.

’’ठीक है हम याद दिलाएँगे विक्रम को की आप की निशानी यही जोधपुर मे साँसे ले रही है.’’ राजेश्वरिदेवी बोली.

’’भाभी उसे कुच्छ याद नही है, क्यूकी भैया ने उसे याद दिलाने की एक बार कोशिश की थी इन सात दीनो मे, लेकिन उस दिन वो नशे मे थे और उसने मेरे साथ जो कुच्छ भी किया वो कुच्छ उसे याद नही है, वरना भैया को सब पता लग जाता ना और आप लोगो को यहा बुलाने किजरूरत ही नही होती.’’ कृष्णा की आँखो की चमक और तेज हो गयी.

’’लेकिन तू तो याद दिला सकती थी ना कि तुझे डर है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.

’’कैसे बताती, मुझे भी तो होश मे होना चाहिए था ना उस वक़्त.’’ कृष्णा बोल उठी.

‘’क्या मतलब ?’’ राजेश्वरिदेवी ने फिर पुचछा.

‘’भाभी, उस रात मुझे करीब 8 बजे होश आया था और मैं यू ही बिना कपड़ो के प्रिन्स के कमरे मे थी और वाहा का नौकर मेरे बदन को चूम रहा था. ये तो अच्छा हुवा उसकी बेटी का कि उसने लात मार के अपने बाप को मेरे शरीर उपर से दूर किया वरना मैं बलात्कार से नही बचती.’’ कृष्णा बोल उठी.

‘’क्या, विक्रम भाई और प्रिन्स दोनो वाहा नही थे ?’’ राजेश्वरिदेवी ने पुचछा.

‘’नही, भाभी, उन दोनो को नशे की हालत मे वाहा से ले जाया गया था और ले जाने वाला वो नौकर ही था और जब मैं लड़खड़ाती अपने कपड़े पहन कर उसी रूम मे गयी जहा विक्रम के साथ थी तो मैने देखा कि पूरा बिस्तर लाहुलुहान था और मेरे पैरो के बीच खून के दाग गढ़े हुए थे. बाद मे कोठी से बाहर निकली तो उन दोनो को मुझे मिलने नही दिया गया और मुझे रोड पर अकेला छ्चोड़ दिया गया. जब तक मैं अपने आप को होश मे लाती और मेरी स्फूर्ति वापस आती तब तक मैं अपने घर के पास पहुच चुकी थी. इसके बाद कभी विक्रम से ना ही मुलाकात हो पाई और ना ही किसी से बात.’’ कृष्णा ने जवाब दिया.

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क्रमशः................

 
किस्मत का खेल पार्ट --20

gataank se aage.......

Aaj agar Prince dudh nahi pita hai to Krishna mar jayegi, ye pata chalte hi Vikram ne do dudh ke glass banvaye the. Jaha vo thehre the us kothi me english naukar ki beti ko serve karne ke liye bola gaya aur instruction diye gaye ki ek glass me namard karne ki aushadhi ka double dozz diya jaye. Lekin vo english ladki hindi kam aur english jyada samajati thi. Kuchh communication gape ho gaya aur usne dono glass me ek ek packet dal diya. Fark sirf itana tha ki Prince ka dudh me dudh hi raha aur Vikram ke glass me RABADI jaisa gadha dudh ban gaya.

Jab english ladki serve karne ayi, prince usko dekhata hi rah gaya. Jab Vikram ne dekha ki ek normal dudh hai aur dusra rabadi jaisa hai to usne har bar dudh hi me aushadhi ko dekha tha to vo dudh ka glass Prince ko de diya aur khud ne vo Rabadi jaisa dudh ka pan kiya. Fir dono ne sharab pi. Prince is now out of course and Vikram become a strong striker.

Jab Krishna ko bulaya gaya aur usne Prince ke samne ek ke bad ek kapade kholne shuru kiye. Aisa najara Vikram kai bar dekh chuka tha ki Prince ke out ho jane ke bad Krishna ko chhup chhup ke kai bar usne dekha tha, lekin kabhi bhi use touch nahi kiya tha kyuki ye un dono ke bich ek maukhik agreement tha ki dono ki chal thi sirf Prince ke liye, usme kabhi bhi Vikram ko Krishna ka fayada nahi uthana tha. Isiliye kai bar jab Krishna ko sharab pila ke Prince out kar deta tha to Vikram use kapade pehnakar vapas lata tha, lekin kabhi bhi usne apni maryada todi nahi thi. Vaise bhi pehle Krishna itani attractive nahi thi.

Lekin aaj Krishna ko videsh ka gorapan lag chuka tha. Videshi thandi ke mausam me aap ke jism ki charabi badh jati hai. Patali Krishna aaj gathrili ban chuki thi. Jab Prince totally out ho gaya to Krishna ne vapas apne sare kapade pehne aur bahar nikali. Bahar ke room me Vikram baitha tha, uske samne jakar vo baith gayi.

Agar chupchap vaha se chali jati to shayad itihas nahi banta, lekin aaj use bhi dard mehsoos huva tha, kyuki vade ke anusar Vikram uska honewala pati tha lekin Virkam ne aaj hi bataya tha ki vo kisi aur se prem karta hai. Yaha videsh me Krishna ke tute huye dil ka sahara bhi Virkam hi tha. Lakh koshish ke bad bhi Krishna ki ankho ne ansu baha hi diye. Virkam ful nashe me tha lekin ansu dekhkar Krishna ko sir par hath lagane laga. Lekin abhi abhi 10 min pehle Krishna ka jism dekh chuka tha. Aaj to uski halat us din se bhi jyad kharab thi jis din Krishna ki India ki akhari rat thi.

Krishna ko Vikram ka hath sir par mehsoos hote hi ro padi kyuki aaj vo sachmuch besahara ho chuki thi. Ek ladki hi janti hai jab uska dil tut jata hai. Vo jat se Vikram se lipat gayi aur rone lagi, lekin Krishna ka jism ka pehla ehsaas Vikram ko ho raha tha. Aushadhi aur jism dono ne apna jalva shuru kar diya aur Vikram pe madhoshi chha gayi.

Vikram par Krishna ke jism ne jadu kar diya. Uske hath apane aap hi Krishna ke kandho pe chalne lage. Dhire dhire hath kandho se niche utarkar pith pe chale gaye aur bad me sarakkar back tak pahuch gaye. Krishna apne gam me itani dubi huyi thi ki Vikram se lipatkar apna pura man khula kar ke ro rahi thi. Vikram ka bukhar badhata hi chala gaya . Halaki Vo aushadhi se kabhi madhoshi nahi chhati thi, lekin Vikram ke mind par sharab aur shabab ka nasha tha upar se videsh ki mausam aur sham ka mahol tha. Vo aushadhi to sirf purush ke shukranu badhata tha, lekin shabab ka nasha is se badhkar hota hai.

Vikram ki sahan se bahar ho gaya to usne lapak kar Krishna ko bed par dal ke uske upar satkar dabochkar Krishna ke hotho ko katana chalu kar diya. Achanak hamle se Krishna pehle to kuchh samaj hi nahi payi ki uske sath kya ho raha hai lekin fir samaj me aya ki uske jism ka nasha Vikram ke sir par savar ho chuka hai. Pehle to uske body ne react aisa kiya ki achanak Vikram ke body ka pura hissa us par aa gaya .

Krishna ne videshi dress ki aadat mushkil se dali thi aur Vikram ke kehne par hi usne foreign lady ki tarah ghutano tak ka lamba skirt pehna tha. Skirt brown colour ka tha aur barby doll jaisa ghumta tha. Upar se girdle me ganth padi huyi thi aur skirt ki zip pichhe thi jo pith se lekar kamar tak lambi thi. Vikram ke upar ane se Krishna jo ro rahi thi, uske muh se aah nikal gayi kyuki achanak vajan badh gaya uske upar to Krishna ke stan joro se dab gaye. Skirt aur skirt ke andar full stip ki bra aur uske andar pade huye stanyugma berahami se Vikram ki chhati ke andar dab gaye aur Krishna ke hotho ko lock kar diya gaya tha. Red colour ki lipstick ka rang bikharne laga. Krishna ke hatho ne inkar me react kiya lekin khud Krishna ki mansik sthiti achchi nahi thi aur Krishna ne Vikram me apna taranhar najar aa raha tha. Pichchale kai mahino se vo bilkul akeli thi, uska koi sahara nahi tha. Vo khud to ro ro kar behal ho chuki thi, uske jism ki garami to kab ki thandi ho chuki thi. Lekin jab Vikram ne joro soro se usko katna shuru kar diya to Krishna ke mind pe koi sahara mehsoos huva aur vo khula man karke ro kar Vikram se sat gayi. Lekin uske rone ka koi asar Vikram ki madhoshi pe nahi huva. Vikram madhoshi me hotho se shuru kar ke dhire dhire Krishna ko ankho par, galo par, gale par aur gale se niche utarkar stan ki gehraiyo me aur dono stan par se lekar chhati, pet tak betarasha katne laga. Krishna ki ankho se ansu ki dhara beh ja rahi thi lekin aaj mano use koi anjana sathi mil gaya ho aur jaise ek nayi dulhan apni suhagrat me apne pati ke samarpan ko taiyar rehti hai tab use dard nahi romanch hota hai vaisa hi kuchh Krishna mehsoos kar rahi thi.

Ek new married dulhan jab bidai ke waqt ro ro ke apna hal behal kar deti hai aur fir abhi sasural pahuchane se pehle hi agar suhagrat ka mauka aa jaye to uski halat kya hoti hai. Ek taraf apne babul ka ghar chhodane ka dard aur dusari taraf apne pati ka param sukh ka pehla ehsaas. Dono sthiti ke bich ki sthiti yehi hoti hai ki vo dulhan sirf samarpan karti hai. Uska mind apne maike aur pati ke sath ke jism ke sukh ke bich bhatakata rehta hai aur fir jab madhoshi chha jati hai to sirf samarpan hi nahi lekin joro se apne pati ka sath deti hai.

Kuchh vaisi hi halat Krishna ki thi, uske hath ne apne aap hi Vikram ki bahe tham kar sath dena shuru kar diya. Kyuki Prince sirf upyog karna janta tha lekin Vikram ko to vo pyar karti thi aur aaj uska pyar hi pyasa banker uske jism ke upar chadhkar apni pyas bujana chahta tha. Krishna ki ankho se ab sahara milne ki khushi ke ansu behne lage aur Vikram ko puri azadi mil gayi. Vikram ne Krishna ke hotho ko fir apne hotho se lock kiya aur chusne, chumne aur katane laga. Lipstick to kab ka vo kha chuka tha. Sirf nishan bache the. Lipstick ke nishan gal, neck, chin aur Krishna ke brown dress par lag chuke the. Vikram ko kamar ke niche bada bhauchal aya huva tha jiski garami Krishna zindagi me pehlibar mehsoos kar rahi thi. 15 min ke khel ke bad Vikram thoda khada huva to Krishna ki skirt jangh tak pahuch chuki thi. Krishna sandal pehne ayi thi aur pairo me socks pehne huye the. White colour ke transparent socks ke andar videshi chamadi dikhai deti thi. Vikram ne vaha se chumna shuru kiya aur dhire dhire knee aur upar tak pahuch gaya . Ab rone ki ahat mithi ahe me parivartit hoti chali gayi thi. Krishna ankhe miche jism ka anand le rahi thi. Iske pehle bhi Prince kai bar uske jism ko noch chuka tha isiliye ye pehla mauka nahi tha aur Krishna ki yoni se bhi kai bar youvanras beh chukka tha lekin har bar kuchh adhurapan mehsoos kiya tha kyuki vo halat sirf majburi aur plan ke anusar huva karta tha. Lekin aaj uska premi usko nauch raha tha. Vo pagal hokar ankhe miche soi huyi thi.

 
Lekin jab Vikram ke hoth yoni ke pas pahuch gaye to Krishna se sahan nahi huva aur uska pav muda aur dono pairo ko jod ke Vikram ko hatane ki koshish kar rahi thi. Ab use Prince ki harkat yad aa rahi thi. Kyuki Prince jab kuchh nahi kar pata tha to apne hotho se Krishna ka youvan ras chusne lagata tha. Krishna ki marji nahi hoti thi fir bhi Prince usko niche chusta rehta tha aur Krishna ko kai bar adhura chhod ke chala jata tha fir Krishna kuchh kar nahi pati thi. Lekin aaj Vikram ne hotho ne jadu kar diya tha aur Krishna par madhoshi pehli bar chhane lagi. Krishna ke muh se aaaahhhhh, uaaaahhhhhhh ahe nikalne lagi. Krishna ki yoni ne youvan ras ki dhara bahani shuru kar di. Vikram ko madhoshi me apne hotho par bhigi khushboo mehsoos huyi. Krishna ke youvan ras ki khusboo se Vikram ki madhoshi charguni badh gayi aur vo jat se apne hotho ko yoni dwar par le gaya aur vaha chusne laga uske hatho ne skirt ko utha utha kar kamar tak le gaya aur Krishna ki nangi kamar, navel aur yoni ko bar bar chumne, katne laga.

Jab bardasht se bahar huva to Krishna ka pav apne aap hi Vikram ki chhati par pada aur Vikram bed se niche gir gaya. Krishna ki chhati tezi se dhadak rahi thi kyuki use pata tha ki aaj vo kavari nahi rehne vali. Aur bed pe vo pairo ke sahare khadi ho ke ulti baith gayi aur mudkar baith gayi. Vikram khada huva aur apna pent, shirt sabkuchh jaldi hi nikal kar kud ke bed par chadh gaya . Krishna ko pata nahi tha ki ab Vikram uske bed par kaise chadha hai. Lekin Vikram ne usko pichhe se hi pakad liya aur uski pith, kandhe ko chumne aur katne laga. Resham ka skirt ki chatani ho rahi thi. Vikram ne ek hi zatke me puri zip khol di. Uski sundar pith aur us par kali bra ki strip najar ayi aur Vikram pagal ho gaya usne ek hi zatke me bra ki strip tod di. Bra tutne se Krishna ki pith par nishan pad gaye aur muh se chikh. Usne palat kar Vikram ko dekha aur use birthdress me dekhkar chauk uthi. Aaj tak Krishna ne Prince ka dekha tha aur hila hila kar thak jati tab ek ya do bunde girti thi, lekin yaha Vikram ka shishn ki lambai aur chaudai dekhkar use vishvas nahi ho raha tha ki ek mard ki shishn ki lambai itnani moti bhi ho sakti hai. Vo jab Vikram ka shishn dekh rahi thi tab Vikram ne kab uski skirt kandho se utarkar kamar tak rakh di use pata hi nahi chala. Bra to pehle se hi chhati se dur ki gayi thi to pink colour ke bade nipple ke sath khuli chhati par Vikram ne jaise halla hi kar diya aur jab baya nipple Vikram ke dato ke bich kata gaya tab Krishna hosh me ayi aur badi chikh uske muh se nikal gayi aaaaaaaaaaaaahhhhh. Krishna ne dono hatho se fir Vikram ko hataya aur Vikram fir santulan kho ke niche gir gaya . Krishna khadi huyi to skirt puri utar gayi. Abhi to vo skirt samalati uske pehle to Vikram khada ho ke use jabardashti se bed pe sulakar uske do pairo ko failaya aur uake upar so gaya. OOOOOOOOOhhhhhhhhhhh ma kar ke Krishna fir Vikram ka weight sahan nahi kar payi kyuki ab uske pair khule the lekin kamar, stan, chhati par Vikram ne apni puri body dal di thi. Hatho se Krishna ke dono hato pakadkar upar kar diya aur black nikar ko jatke se utarkar rakh diya aur pairo ke panje se Krishna ke dono pairo ke panjo ko dabaye rakha tha. Mano ke ek nisahay yuvati par balatkar ki taiyari ho chuki thi. Do bar girne se Vikram ko thoda gussa aya tha aur Usne ek hath kholkar apna shishn sidha ksirhna ke yoni dwar pe rakh diya aur Kamar se jor se dhakka diya. Gili hone ke vajah se Krishna ki youvan patti ek hi dhakke me tut gayi.

Khallas, Krishna ke muh se badi chikh nikal gayi aaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh, oooooooooohhhhhhh karke Krishna ne apni rahi sahi taqat se pure jism ko sametkar uchhali aur Vikram ka shishn bahar nikal aya aur khoon ka chhinta Krishna ke dono pairo ke bich ja ke gira aur khoon behne laga. Krishna ko yoni me aag lagi ho aisa anubhav huva aur vo chhatpatane lagi. Usne khade hone ke liye taqat lagakar upar uthane ki koshish ki lekin yoni ke dard ne uske pav khulle hi rah jate the aur Vikram ke pair ko hatane me asamarth sabit huye. Lekin Vikram ki hatho ki sakhtai ke age vo sirf apni kamar uchhal sakti thi kyuki hath to lock ho chuke the. Aur Vikram ne apne pairo se fir se Krishna ki kamar ko daboch liya aur fir uske upar so gaya aur ek hath se fir Shishn ko andar ghusa diya. Aur fir ek zatke ke sath hi Krishna dard ke mare chhatpatai aur kamar uchhali, lekin ulta shishn andar ghus gaya aur sidha bachchedani se takraya. Krishna ne joro se hoth aur ankhe mich li, ye dard uske sahan ke bahar tha kyuki ye anand nahi balatkar jaisa tha. Vikram ki madhoshi itani badh gayi thi aur sharab aur shabab ke nashe me usko gussa bhi aya tha ki uski kamar joro se hilne lagi aur Krishna ka qatl chalu ho gaya . Lekin 7 minutes ke bad Krishna ka dard kam ho gaya aur youvan ras ke bahav se vo shant ho gayi aur aram se Vikram ke dhakke sahan karne lagi. Ab Krishna pure hosh me thi. Ek ladki sex ke waqt nashe me kho jati hai.

Lekin ye Krishna thi. Pure sex ka nahi lekin adhe ka to vo kai bar experience kar chuki thi. Ab uski vichardhara shuru ho chuki thi ki uska youvan khandan ho chukka hai. Ab koi fayda nahi virodh karne ka. Vaise bhi vo Vikram ko chahti thi lekin use pata nahi tha ki achanak Virkam yu hamla karega aur use kali se kamal bana dega. Thodi der tak uski ankho me fir ansu aa gaye kyuki fir ek bar vo lachar ho chuki thi. Vo sahara chahti thi aur Vikram sahare ke badle me uska sabkuchh yaha chhin raha tha. Fir usne socha ki achcha hi huva ki koi paraya mard use chhuye iske badle Vikram ke hatho se hi uska youvan khandan ho gaya. Ab baki ki zindagi sirf isi sahare to katni thi.

Usne is katu vastvikata ko svikar kar ke ankhe mich li. Vikram use kai jagah par kat raha tha aur uski speed badh chuki thi. Lekin dard gayab tha aur mitha spandan bhi gayab tha. Ab Krishna shunya ho gayi. Krishna ka jism bilkul thanda ho chuka tha. Mano koi mard ek lash ke sath sex enjoy kar raha ho aisa mehsoos ho raha tha. Vikram ko nashe me bhi ek tarafa sex me maja nahi aa raha tha aur vo Krishna ke badan par se khada huva abhi bhi kamar pe baitha raha aur shishn ko yoni ke andar hi rakha aur hatho me sakhti se Krishna ke hath pakade rakhe the aur Krishna ko dekhane laga. Bikhari bikhari Krishna ko dekhkar use fir tav aya aur usne Krishna ke dono pairo ko mix karke baithe baithe hi dhakke dene chalu kiye, ab Krishna ki yoni ne joro se bahav shuru kar diya aur Krishna ke stan har ek dhakke se gol gol ghume lage the, gulabi nipples tan ke khade ho chuke the aur Krishna khuli ankho se apne aap ko lutate huye dekh rahi thi. Kadvi vastvikata se use hasi aa gayi aur usne fir ankhe mich li. Vikram ke hatho me dhilapan dekhkar Krishna ne apne dono hath kholkar Vikram ko apne body ke upar khich liya aur Vikram ke hotho ko chosne, katne lagi aaj vo sabkuchh samarpit kar dena chahti thi.

Krishna aur Vikram ekdono me jaise sama jane ko taiyar the. Ye najara aisa tha jaise do snake ka savanan ho raha ho. Dono ek dusre me kho chuke the. Vikram ki raftar badh chuki thi. Youvanras ke bahav se Krishna ki yonidwar itana khul chuka tha ab use koi dard mehsoos nahi ho raha tha. Krishna ne puri tarah se Vikram ko sukh dena chalu kar diya aur Vikram ka nasha jyada tez kar diya. Nonstop 10 min ke bad, kyuki Krishna ke liye pehla intercourse tha, yoni ko sambhal nahi payi aur usko laga ki kuchh bahar ugalnewala hai. Vikram pura daboch ke Krishna pe jaise balatkar kar raha tha aur Krishna bilkul khatam hone ko ayi to uska jism dhanushya ki tarah khicha aur tang ho gaya. Pairo ke panjo ne angadai lekar sakhti me sab ungaliya ek ho gayi. Stan uthkar kadak ho gaye aur ankhe aur hoth masti aur dard dono me mich gaye. Achanak Krishna apne muh ke bal par chhatpatayi aur Vikram ka liplock khul gaya.

Krishna chhati ke bal par apna pura jor kar ke uthi aur Vikram abhi bhi pure nashe me hi tha, lekin Krishna ki taqat ke age pehlibar Vikram ka body khada huva aur Vikram ko apne hath ka sahara lena pada. Ab krishna ke hath bhi khule huye aur Uske body ka adha hissa bich me se khada huva. Stan bilkul khulkar uth gaye aur Krishna ki yoni se youvanras ki dhara ka sailab bahar ane laga. Krishna fir chikh uthi, lekin ye chikh sex ki charamsima ke ehsaas ki thi.

Vikram ke dhakke lagatar chalu hi the. Vikram apne hath ke sahare Krishna ki body ke upar hi tha Krishna ki jangh se lekar pairo ke panje tak abhi bhi Vikram ne Krishna ko daboch ke rakha tha. Lekin Khali ho jane ke bad Krishna ki body dhadam se bed par giri aur vo hafne lagi. Ab use yoni me fir dard shuru ho gaya aur hotho me, stan pe, gale par, chin par jalan shuru huyi. Krishna ke hotho ki lipstick ka rang uske sare chehre pe bikhar chuka tha. Bed lahuluhan ho chuka tha. Krishna khallas ho chuki thi. Uski chhati uchhal uchhal kar dhadak rahi thi. Hath aur pairo pe weight aur khallas hone se khalipan mehsoos hone laga aur ankho ke samne andhera chhane laga aur uske muh se dhire dhire chikhe chalu huyi aur Vikram ko rokne ke liye hath uthane gayi. Lekin taqat kam pad gayi aur Vikram ne fir use daboch liya. Krishna ki yoni dhili hone se fir Virkam ko takleef hone lagi aur vo 10 seconds ke liye ruka. Krishna ne ishare se samajane ki koshish kari ki ab vo dhakke khane me asamarth ho chuki hai. Lekin Vikram ka tana shishn abhi bhi uske yoni ke andar tha. Vikram ne bahar nikala aur fir andar jordar dhakke se dal diya aur Krishna ke ankho ke samne bilkul andhera chha gaya aur bad me use kuchh pata nahi tha ki uske sath kya huva.

Itana kehkar Krishna thodi ruki, nichi najar rakhate huye thodi der chup baithi rahi fir khadi ho ke pani pi ke vapas aa gayi, Mitti ke khilone se khelte huye dono bachcho ko dekhane lagi aur fir achanak muskurayi aur najar uthake Rajeshvaridevi ke samne dekha aur fir bol uthi,’’Meri kismat me ghar grahasthi basana nahi likha hai bhabhi, shayad ham dono bhai bahan apne pitaji ka kiya bhogat rahe hai. Lekin ham use bhi dosh nahi de sakte kyuki usne jo bhi kiya hamare khatir kiya. Mera bhai uske ghar me naukaro ki zindagi isiliye bita raha hai kyuki hamara sauda huva tha ki mai foreign me safe rahu. Lekin mere bhai ki kurbani ki kimat kodiyo ke dam bik gayi aur meri jawani akhir bali chadh gayi. ’’

Itana kehkar fir usne najar nichi dal di. Rajeshvari devi ne hatho se uske kandhe ko fuslaya aur puchha,’’Lekin bad me kya huva Krishna ? tune kabhi Vikram bhaiya ko kyu nahi bataya ki ye bachcha us sham ki den hai jis din unhone tum par ye kadam uthaya tha.’’

’’Mai Vikrambabu ko aap se jyada janti hu bhabhi, agar kehti to vo kya mante ki ye bachcha uska hai. Ulta shayad mere bachche ki jan khatare me hoti.’’ Krishna ne Rajeshvaridevi ki ankho me ankhe dalkar jawab diya.

Rajeshvari devi uski ankho ki chamak dekhkar apni ankhe michkar uski bato ki pushti ki aur fir puchha,’’Lekin tu kam se kam use yad to dila ki ye bachcha kaise itana bada huva.’’

’’Bhabhi mera jawab bhi isi sawal me hai ki kaise batau ki ye uska bachcha hai, mere pas kya saboot hai ki usne vo sham mere sath gujari hai.’’ Krishna ne bola.

’’Thik hai ham yad dilayenge Vikrambhaiya ko ki aap ki nishani yehi Jodhpur me sanse le rahi hai.’’ Rajeshvaridevi boli.

’’Bhabhi use kuchh yad nahi hai, kyuki bhaiya ne use yad dilane ki ek bar koshish ki thi in sat dino me, lekin us din vo nashe me the aur usne mere sath jo kuchh bhi kiya vo kuchh use yad nahi hai, varana bhaiya ko sab pata lag jata na aur aap logo ko yaha bulane kijarurat hi nahi hoti.’’ Krishna ki ankho ki chamak aur tej ho gayi.

’’Lekin tu to yad dila sakti thi na ki tuje dar hai ?’’ Rajeshvaridevi ne puchha.

’’Kaise batati, muje bhi to hosh me hona chahiye tha na us waqt.’’ Krishna bol uthi.

‘’Kya matlab ?’’ Rajeshvaridevi ne fir puchha.

‘’Bhabhi, us rat muje karib 8 baje hosh aya tha aur main yu hi bina kapado ke Prince ke kamare me thi aur vaha ka naukar mere badan ko chum raha tha. Ye to achcha huva uski beti ka ki usne lat mar ke apne bap ko mere sharir upar se dur kiya varna mai balatkar se nahi bachati.’’ Krishna bol uthi.

‘’Kya, Vikrambhaiya aur Prince dono vaha nahi the ?’’ Rajeshvaridevi ne puchha.

‘’Nahi, bhabhi, un dono ko nashe ki halat me vaha se le jaya gaya tha aur le jane vala vo naukar hi tha aur jab mai ladkhadati apne kapade pehan kar usi room me gayi jaha Vikrambabu ke sath thi to maine dekha ki pura bistar lahuluhan tha aur mere pairo ke bich khoon ke dag gade huye the. Bad me kothi se bahar nikali to un dono ko muje milne nahi diya gaya aur muje road par akela chhod diya gaya. Jab tak mai apne aap ko hosh me lati aur meri sfurti vapas aati tab tak mai apne ghar ke pas pahuch chuki thi. Iske bad kabhi Vikrambabu se na hi mulakat ho payi aur na hi kisi se bat.’’ Krishna ne jawab diya.

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kramashah................

 
किस्मत का खेल पार्ट --21

गतान्क से आगे.......

बाद मे कृष्णा ने बताया वो कुच्छ ऐसा था :

जब वो अपने घर पहुचि तब तक वो होश मे आ चुकी थी उसने स्वस्थ होकर ही घर मे कदम रखा था. एक महीने के बाद उसे पता चला कि वो मा बन ने वाली है. फॉरिन मे कोई इस बात को ज़्यादा आहेमियत नही देता था और वैसे भी उस घर मे वो इनडिपेंडेंट थी तो उसे वैसे तो कोई परवा नही थी लेकिन बच्चे के जन्म के बाद 1 साल तो उसने ऐसे तैसे कर के काट लिया लेकिन बाद मे उसे एहसास हुवा कि एक बच्चे को बाप की ज़रूरत तो है ही. वैसे भी जब उसे बंसी की चिठ्ठी से पता चला कि सुनंदा की मृत्यु हो चुकी है (हाला कि बंसी ने ये खबर करीब एक साल के बाद लिखी थी) तो उसने सोचा की शायद विक्रम फिर उस से घर संसार बसाने के मूड मे आ जाए और उसके बच्चे को बाप मिल जाए. इसी सोच मे बच्चा भी डेढ़ साल का हो चुका था और उसने वापस आने का फ़ैसला लिया और किसिको बताए बिना अकेली वापस आ गयी. लेकिन यहा आने के बाद बंसी के मूह से कुच्छ कहानी सुनकर उसे लगा की विक्रम का कुच्छ ठिकाना नही, अभी भी वो वैसा ही है जैसा पहले था और शायद वो फिर हवस पूरी करने का कोई और मार्ग खोलेगा तो कृष्णा ने तय कर लिया कि अब वो आजीवन अकेली रहेगी, ना ही तो विदेश जाएगी और यही रहकर बच्चे की देखभाल करेगी.

राजेश्वरिदेवी ने इस हिम्मतवाली लड़की को अपने गले से लगा लिया, कृष्णा की आँखो मे वैसी ही चमक थी जो बता रही थी की किसी भी मुश्किल का सामना करने से अब वो डरती नही है. लेकिन किस्मत मे क्या लिखा है वो कौन जाने और जाने कहा.

इधर राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा का दिल खोल दिया था और उधर किशोरीलाल और बंसी वकील के पास पहुचे और वाहा वकील महर्षि सेन ने दोनो को बिताया. महर्षि सेन उचे कद के करीब 60 साल के अनुभवी वकील थे. रजवाड़े के टाइम से वो जोधपुर के महाराजा के वकील थे लेकिन विक्रम के पिताजी गंगाधर की सूझ बुझ पॉलिटिक्स मे अच्छी थी इसीलिए मिस्टर. सेन गंगाधर का कार्य भी किया करता था. फिर तो मिस्टर. सेन गंगाधर के वकील ही बन चुके थे.

विक्रम के करतूत देखकर गंगाधर ने ही उसके खर्चे के लिए नारायनप्रासाद (किशोरीलाल के पिताजी) को ट्रस्टी जैसा बना दिया था. लेकिन अब जब नारायनप्रासाद ही नही रहे तो विक्रम के खर्चे का क्या, यही बातचीत करने के लिए मिस्टर. सेन ने किशोरीलाल को मिलने बुलाया था.

बंसी और किशोरीलाल दोनो वाहा पहुचे और जो बातचीत मिस्टर. सेन से हुई उस बात मे कुच्छ ऐसी बात थी:

गंगाधर ने जो शर्त रखी थी कि विक्रम के बारे मे बंसी जो भी रिपोर्ट करे उसके आधार पर ही नारायनप्रासाद की स्वीकृति के बाद ही विक्रम को खर्चे के लिए निश्चित अमाउंट मिलेगी. लेकिन अगर किसी वजह से नारायनप्रासाद भी ज़िंदा ना हो तो क्या किया जाए?

यही इसी बात पर तो गंगाधर की दीर्घदृष्टि काम कर गयी थी. इसी अग्रीमेंट, करार मे एक ऐसा क्लॉज़ भी था की अगर किसी वजह से नारायनप्रासाद की नॅचुरली मृत्यु हो गयी तो विक्रम के खर्चे की पूरी ज़िम्मेवारी आड्वोकेट मिस्टर. सेन की हो जाएगी और अगर नारायनप्रासाद की मृत्यु आक्सिडेंट या नॅचुरली नही हुई तो फिर वो अग्रीमेंट मे जहा भी नारायनप्रासाद का नाम होगा वाहा अपने आप ही किशोरीलाल का नाम हो जाएगा.

गंगाधर की वसीयत इतनी अच्छी थी की विक्रम कही भी कुच्छ नही कर पाता था. गंगाधर को अपने बेटे पर सुई जितना भी ट्रस्ट नही था. शायद दौलत के लिए विक्रम कल कुच्छ भी कर जाए और नारायनप्रासाद का खून कर बैठे तो क्या होगा, यही एक वजह थी कि नारायनप्रासाद के बाद पूरी ज़िम्मेवारी या तो मिस्टर. सेन के पास या तो किशोरीलाल के पास चली जाती है.

अब सवाल ये उठता था कि नारायनप्रासाद का अग्निसंस्कार हो चुका था. उसकी मृत्यु नॅचुरली है या नही, ये कोई नही जानता था. क्यूकी मिस्टर. सेन भी नारायनप्रासाद के मृत्यु के बारे मे इतना ही जानते थे जितना किशोरीलाल. तो विक्रम की दौलत का नेक्स्ट ट्रस्टी कौन ? मिस्टर. सेन या किशोरीलाल.

नारायनप्रासाद की मृत्यु के दो महीने बाद जब विक्रम इस केस के बारे मे मिस्टर. सेन के पास आया तो मिस्टर. सेन ने उसे बताया था कि प्राब्लम ये है की अब ट्रस्टी वो रहेंगे या किशोरीलाल इसका फ़ैसला किशोरीलाल के जोधपुर आने से पहले नही हो सकता था. विक्रम ने जब बताया कि अब तो नारायनप्रासाद रहे ही नही तो बंसी मेरे बारे मे किसको बताएगा और बंसी का इस हवेली मे क्या काम है? लेकिन यहा भी गंगाधर की दूरंदेशी काम कर गयी थी. उसी अग्रीमेंट मे एक ऐसा भी क्लॉज़ था कि अगर बंसी की अक्कड़ेंट या नॅचुरली ना हो वैसे तरीके से मृत्यु हो जाए या फिर लापता हो जाए या खुद विक्रम से नाराज़ होकर चला जाए तो सारी जयदाद किसी अनाथ आश्रम, स्कूल या कही भी डोनेट कर दी जाएगी. डोनेट किस को करनी है उसका फ़ैसला मिस्टर. सेन और नारायनप्रासाद/किशोरीलाल, दोनो मिलकर करेंगे. इसका मतलब बंसी को आजीवन जीवतदान मिल चुका था. बंसी की आजीवन उसका कार्य करते रहना ही था.

मिस्टर. सेन ने और भी बताया की इस चर्चा के बाद 2 साल तक विक्रम ने कुच्छ नही किया, ना ही तो इसके बारे मे किशोरीलाल को खबर की और ना ही मिस्टर. सेन के पास दूसरी बार आया. वो खर्चा कैसे कर रहा है ये भी किसी को मालूम नही था.

इतनी बात कहकर मिस्टर. सेन रुके और सब ने साथ मिलकर चाय पी. फिर मिस्टर. सेन ने बंसी को कहा,’’बंसी एक और बात है जो मुझे तुझे कहनी होगी.’’

बंसी ने कहा,’’जी वकील बाबू, कहिए.’’

मिस्टर. सेन,’’आइ आम सॉरी बंसी लेकिन फॉरिन मे तुम्हारी बेहन जो मेरे रिलेटिव के यहा रहती थी. वो कही चली गयी है. हमने बहुत कोशिश की लेकिन 10 दिन से उसका कोई पता नही है. मैं तुम्हारे पास आनेवाला ही था. लेकिन तुम किशोरिबाबू को लेकर यहा आ गये.’’ इतना कहकर मिस्टर. सेन ने लाचर नज़ारो से नीचे देख लिया.

किशोरीलाल बोल उठा,’’मिस्टर. सेन कृष्णा यही पर है और मैं आनेवाला था इसीलिए बंसी ने 7 दीनो से किसी को नही बताया था. वो यहा क्यू भाग आई है ये हम नही जानते लेकिन मेरी वाइफ अभी उसके पास है और हमे अभी पता लग जाएगा. और हा उसकी गोद मे विक्रम का बच्चा भी है ऐसा कृष्णा कहती है. शायद इसीलिए वो वाहा से भागी है.’’

‘’और ये बात आप अब मुझे बता रहे हो मिस्टर. किशोरिबाबू. मैं तो उसे ढूंढते परेशान हो गया.’’ वकील ने अपनी चेर पर आराम से सास लेते हुए कहा और फिर आगे बोले,’’चलो जो हुवा अच्छा ही हुवा. कृष्णा यहा है और सेफ है आगे हमे क्या चाहिए वरना इसमे एक और भी क्लॉज़ है.’’

किशोरीलाल और बंसी दोनो एकदुसरे की तरफ देखने लगे और सुन ने के लिए बेताब हुवे.

वकील मिस्टर. सेन ने बताया,’’अगर फॉरिन मे कृष्णा की मृत्यु हो जाती है और अगर इसमे विक्रम का नाम आता है या कोई ऐसा व्यक्ति जिसका कृष्णा के मौत मे हाथ रहा हो और दूर दूर तक विक्रम का कनेक्षन उस आदमी का साथ हो तो अपने आप ही बंसी आधी संपाति का मालिक हो जाएगा.’’

बंसी देखता ही रह गया और बोला,’’वकील बाबू ये क्या वसीयत है या कोई फिल्मी कहानी है ?’’

मिस्टर. सेन,’’बंसी ये गंगाधर बाबू और नारायनप्रासाद दोनो की हाजरी मे अग्रीमेंट हुई है. इसे गंगाधरबाबू की वसीयत कहो या अंतिम इच्च्छा. लेकिन इसी अग्रीमेंट के आधार पर हम अभी तक शायद ज़िंदा है. क्यूकी इसमे ये भी लिखा है कि अगर मेरी या मेरे परिवार मे से किसी एक का भी क़त्ल या मर्डर या जो नॅचुरली ना हो ऐसी मौत हो जाए तो ये अग्रीमेंट की एक कॉपी कही और भी रखी गयी है जो ऑटोमॅटिकली दूसरे ही दिन इंडिया के सारे न्यूसपेपर मे एकसाथ पब्लिश हो जाएगी. ये सबकुच्छ विक्रमसाहब जानते है इसीलिए खामोश है और जो भी आप बोलॉगे वैसा उसको करना ही पड़ेगा.’’
 
किशोरीलाल ने पुचछा,’’वकिल्बाबू इस अग्रीमेंट से ईश्वर ना करे लेकिन अगर हम मे से कोई भी फयडा उठा सकता था या है. मान लो मेरे पिताजी की नियत खराब हो गयी, या फिर आप की, या बंसी की तो क्या होगा इसका कोई क्लॉज़ है इसमे?’’

मिस्टर. सेन ने हॅस्कर जवाब दिया,’’जी गुड पॉइंट किशोरीलाल, जी हा इसका भी इलाज गंगाधरबाबू ने इसमे रखा है, आप ने पुच्छ लिया वरना मुझे बताने से इनकार किया गया था और ये क्लॉज़ भी आप के फादर नारायनप्रासाद के जोधपुर से जाने के बाद इंक्लूड किया गया था.’’

थोड़ा रुककर फिर मिस्टर. सेन ने बताया कि,’’अगर आप मे से कोई एक ने भी इस अग्रीमेंट की वजह से ब्लॅकमेल या फयडा उठाने की कोशिश की तो लिखा है की विक्रम बाबू की पूरी संपत्ति का ट्रस्टी अपने आप ही मैं बन जाता हू, लेकिन मुझे आप की बदनीयत को साबित करनी होती. और अगर मैने भी यहा हाथ साफ करने की कोशिश की तो सब से पहले आप सब को रास्ते मे से हटाना होगा और वो भी नॅचुरल डेत हो ऐसा साबित करना होता. मान लो वैसा भी मैने कर लिया तो भी गंगाधरबाबू ने लिखा है की कोई भी नॅचुरल मौत या दुर्घटना की पक्की तलासी ली जाए और केस सीबीआई को दिया जाए और इस अग्रीमेंट की एक कॉपी कोई ऐसे व्यक्ति के पास भी है जिसका मुझे भी कोई पता नही और वो व्यक्ति डाइरेक्ट प्राइम मिनिस्टर या प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया को लिखकर केस बना सकता है. हो सकता है कि ऐसा कोई आदमी ही ना हो सिर्फ़ हम सब को डराने के लिए लिखा गया हो और ये भी हो सकता है कि सच मे ऐसा कोई आदमी है कि कोई भी आक्सिडेंट के बाद सीबीआई सर्च हो सकता है. गंगाधरबाबू की बात साफ है कि कोई भी इस अग्रीमेंट मे बचना नही चाहिए. दूसरा ऐसा करने के लिए मैने ही उसे अड्वाइस दिया था. तो मेरा तो कोई सवाल ही नही उठता की अपना मन मैला करू. वरना मैं आप को यहा बुलाता भी नही, डाइरेक्ट विक्रम से सेटल्मेंट कर के कुच्छ भी हिस्सा ले जाता. और ऐसे ही आप लोगो मे से भी कोई दौलत के भूखे नही है जो कुच्छ ग़लत कर सके. इन शॉर्ट ये गंगाधरबाबू ने विक्रम को हमे सौप दिया था की इसको किसी भी तरह से संभालना है.’’

इतना कहकर मिस्टर. सेन ने बातचीत ख़तम की. तीनो थोड़ी देर चुप रहे. मिस्टर. सेन ने पुचछा,’’बोलिए किशोरिबबू आगे क्या करना है, नारायनप्रासाद की डेत नॅचुरली है या आक्सिडेंट या मर्डर ये हम मे से कोई नही जानता और जानता है तो सिर्फ़ विक्रम जो हमे अगर सच बताए तो भी कितना ट्रस्ट करना ये सोचने की बात है.’’

10 मिनट के बाद किशोरीलाल ने कहा,’’वकिलबाबू ये गंभीर मामला है, मुझे भी आज पता चला है की ऐसा कोई अग्रीमेंट है, मेरे पिताजी ने मुझे कभी ऐसा कुच्छ नही बताया. अब सब से पहले तो पिताजी की मौत के बारे मे थोड़ी जानकारी लेनी ही होगी बाद मे ही फ़ैसला किया जा सकता है और अग्रीमेंट के मुताबिक आप ही अभी तो ट्रस्टी हो सकते हो. अगर मेरे पिताजी की डेत नॅचुरल है तो फिर मेरा नाम आएगा तो मैं ज़रूर वापस आप के पास आ जाउन्गा. लेकिन फिलहाल तो इस अग्रीमेंट को ऐसे ही रखिए.’’

मिस्टर. सेन रिप्लाइड,’’जैसे मैने सोचा था वैसा ही आन्सर आप ने दिया है. तो तय रहा किशोरी जी जब तक आप की तरफ से कोई जवाब नही आएगा तब तक अग्रीमेंट ऐसे ही रहेगा और बंसी तुझे विक्रम की खबर अब हम दोनो को देनी होगी ठीक है किशोरी बाबू?’’

‘’बिल्कुल सही ये ज़िम्मेवारी अब हम तीनो को निभानी ही होगी, क्यूकी अब तो मेरे पिताजी की भी ये आखरी इच्च्छा हो गयी और मैं मरते दम तक इसे निभाना चाहूँगा.’’ किशोरीलाल ने जवाब दिया.

फिर तीनो हाथ मिलकर वाहा से निकल पड़े. बंसी और किशोरीलाल वापस कृष्णा और राजेश्वरिदेवी के पास आए, उसी वक़्त कृष्णा ने अपनी बात ख़तम की थी और लिपट के अपनी भाभी के कंधो पे थी. जब किशोरीलाल और बंसी अंदर आए तो सब साथ मे बैठ गये. राजेश्वरिदेवी ने मुस्कुरकर इशारो से समझाया कि काम हो गया है और फिर कृष्णा के सामने मुस्कुरकर देखा और बोली,’’कृष्णा तुझे हवेली पे वापस आना ही होगा.’’

कोई कुच्छ बोले इसके पहले किशोरीलाल बोल उठा,’’इसका मतलब विकी विदेश गया था ना?’’

बंसी की हाजरी मे कृष्णा ने नज़र नीचे डाल दी और राजेश्वरिदेवी ने मौन से हा कहा. बंसी खड़ा हुवा और अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा और पुचछा,’’कृष्णा हम को काहे नही बताया ? क्या बाबा (विक्रम) ने थारे साथ ज़बरदस्ती की थी ?’’

राजेश्वरिदेवी ने बीच मे बंसी को कहा,’’बंसी भाई इसका कोई जवाब नही है. ना ही कृष्णा की कोई भूल है और ना ही आप विक्रम को दोषी कह सकते हो. ये सब संजोग का खेल है जिस का सब से बड़ा शिकार सिर्फ़ कृष्णा हुई है. ये मासूम बच्चे की तरफ देखकर कोई और सवाल मत कीजिएगा वरना कृष्णा एक बड़े भाई के सामने कुच्छ नही बोल पाएगी.’’

कृष्णा नीची नज़र कर के रोने लगी. बंसी ने उसके सिर पर हाथ फिराया और उसका गला भी भर आया. मुश्किल से आवाज़ निकली,’’गंगाधरबाबू का सपना टूट गया भैया, इसको विदेश भेजा तो बाबा वाहा भी पहुच गये. इसकी किस्मत ही शायद खराब है कि अच्च्छा बाप नही मिला, मेरे जैसा भाई मिला जो बड़ा होकर भी इसकी इज़्ज़त नही बचा पाया और ये किस्मत की मारी मारी फिर रही है.’’

किशोरीलाल खड़ा हुवा और बंसी को आलिंगन मे ले लिया और बोला,’’नही बंसी तेरी नमक हलाली का ज़रूर कुच्छ अच्च्छा फल इस बच्चे को मिलेगा, जो तपस्या तू और कृष्णा कर रहे हो इसका अंजाम ज़रूर कुच्छ अच्च्छा होगा, ईश्वर पे श्रद्धा रखो, वो ज़रूर कुच्छ अच्च्छा करेगा और अब तो ईश्वर से प्रार्थना करो की कृष्णा की गोद मे विक्रम की एक और औलाद लड़की पैदा हो.’’

इतना सुनते ही कृष्णा ने नज़ारे उठाकर सब के सामने देखना शुरू किया. लेकिन उसे आश्चर्या इस बात का हुवा की बंसी के चेहरे पर भी खुशी की झलक थी. वो कुच्छ समझ नही पाई कि ये लोग फिर उसे विक्रम के हवाले क्यू कर रहे है ?

जब राजेश्वरिदेवी समझ गयी की कृष्णा को कौन सी परेशानी है तो वो मुस्कुरकर बोली,’’अरे पहले कृष्णा को तो सबकुच्छ बताओ, वो तो विक्रम से दुबारा मिलना ही नही चाहती.’’

फिर राजेश्वरिदेवी ने गिर्नरवाले बाबा की भविष्यवाणी की बाते बताई और जब कृष्णा को पता चला कि अगर विक्रम उसे अपना लेता है और उसकी नेक्स्ट औलाद लड़की है तो ज़रूर कुच्छ ईश्वर का खेल है कि वो फॉरिन से अकेली यहा तक भाग आई है. कृष्णा ने भगवान को याद कर के अपनी आँखे मिच ली.

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क्रमशः................

 
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