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किस्मत का खेल पार्ट --6
गतान्क से आगे.......
चाय पीने के बाद किशोरीलाल ने बंसी को पुचछा,”विकी कहा है ?”
“बाबा तो अभी सो रहे है” बंसी ने जवाब दिया.
“ठीक है बंसी अब तुम काम पे लग जाओ और जैसे ही विकी फ्रेश हो जाए कैसे भी कर के मुझे खबर कर देना और बाद मे एक घंटे के लिए हमे अकेला छोड़ देना” कहकर किशोरीलाल ने राजेश्वरिदेवी को बोला,”तुम भी वाहा कम से कम एक घंटे के लिए मत आना”
बंसी और राजेश्वरिदेवी ने हा मे सिर हिलाया.
बाद मे किशोरीलाल नीचे आया और पूरी हवेली का चक्कर काटना शुरू किया. ग्राउंड फ्लोर और दो मजले से लेकर पूरा कॉरिडर बाल्कनी, गार्डेन घूमकर करीब 10 बजे जब वो दीवानखाने मे प्रवेश कर रहा था कि बंसी भागता उसके पास आया और बोला, ‘’भैया, बाबा अभी अभी उठे है और आप को ही याद कर रहे है, मैने बोल दिया है की आप अभी उसे मिलने जा रहे हो’’.
‘’ठीक है बंसी अब कम से कम एक घंटे के लिया उस कमरे मे मत आना’’किशोरीलाल ने सूचना दी.
“भैया...“ बंसी की आखे फिर भीगी और गले मे खराश आ गयी.
किशोरीलाल ने उसकी पीठ पे हाथ फिराया और मौन भाषा मे ही सांत्वना दी कि विकी को कुच्छ नही होगा, हम ज़हर पी के भी उसे सुधार पाएँगे. उसकी आँखो की चमक देखकर बंसी ने दो हाथ जोड़े और धीरे धीरे किचन की और कदम बढ़ाए. थोड़ी देर तक किशोरीलाल उस पढ़े लिखे लेकिन वफ़ादार इंसान की चाहत को मान ही मान मे सल्यूट करता रहा और उसने विक्रम की रूम की और कदम उठाए.
विक्रम के रूम को बाहर से नॉक किया, विक्रम ने खुद आके दरवाजा खोला, कुच्छ पल तक वो देखता रहा और फिर बोला,’’अंदर आने के लिए तो कब से नॉक करने लगा.’’
और हाथ पकड़ कर किशोरीलाल को अंदर ले गया, दोनो बेड पर बैठे. कुच्छ देर तक दोनो मे से कोई कुच्छ नही बोला फिर किशोरीलाल ने बात प्रारंभ की,“विकी मे तुझसे कुच्छ पुछना चाहता हू अगर तू बुरा ना माने तो.“
’’क्या बात कर रहा है, एक दोस्त दूसरे दोस्त का बुरा मान सकता है क्या ?’’ विकी ने जवाब दिया.“मैं जानता हू तू सुनंदा और अंकल की मृत्यु के बारे मे पुछनेवाला है, अगर मैं तेरी जगह होता तो कल रात ही सबकुच्छ पुच्छ लेता, तू इतना धीरजवाला है कि कम से कम एक रात तो बिता सकता है. लेकिन अब मेरी बारी है, मैं कल रात कुच्छ बताने के होश मे शायद नही था, लेकिन आज पूरा ओ.के. हू, मेरी इच्छा है तू पुच्छे इसके पहले मुझसे पूरा सुन ले बाद मे तेरा जो जी चाहे सवाल कर, वो पूरी बात, हादसा क्या हुवा, कैसे हुवा, क्यू हुवा और मैने आज तक तुझसे क्यू च्छुपाए रखा वो पूरी बात पहले तू सुन ले“ एक स्वास मे विकी बोल गया और फिर गहरी सांस ली.
किशोरीलाल ने मौन ही रहना उचित समझा और ये मौन भाषा को स्वीकृति समझ कर विकी ने बोलना शुरू किया और करीब 20 मिनिट तक बोलता रहा जो कुच्छ उसने बोला वो हादसा कुच्छ इसी तरह था:
विक्रम, नारायनप्रासाद. उसकी धर्मपत्नी और सुनंदा ने तीर्थयात्रा की शुरुआत सौराष्ट्रा फेमस और बारह ज्योर्ठिलिंग मे प्रमुख सोमनाथ ज्योर्ठिर्लिंग से की थी, बाद मे तुल्सिषयाम, द्वारका, ओखा, शिर्डी, उज्जैन, जगन्नाथ पूरी, कोनर्क, कॅल्कटा (उस टाइम कोलकॅटा का नाम कॅल्कटा था) काली माता टेंपल, गंगासागर तीर्थ, देल्ही, आगरा, बनारस, वाराणसी, त्रिवेणी संगम अल्लहाबाद से होकर फिर अट्मॉस्फियर अच्छा नही होने की वजह से साउत की और मदुरै, तिरुपति, रमेश्वरम और लास्ट मे कन्याकुमारी होकर वे लोग और आगे का प्लान करने वाले थे.
जब वे लोग शिर्डी मे पहुचे और दर्शन के लिए लाइन मे खड़े थे, करीब एक घंटा लाइन मे वे लोग खड़े रहे तो विक्रम ने थके हुवे नारायनप्रासाद और अंटी को एक बेंच पे बिठाया और बोला की जब हमारी बारी आएगी तो वो खुद आके ले जाएगा और खुद फिर लाइन मे जाकर सुनंदा के साथ खड़ा हो गया. बस अब थोड़ी ही देर मे श्र्डी के साईबाबा के दर्शन होनेवाले थे, दूर से साईबाबा की मूरत दिखाई दे रही थी और विक्रम का मन भाव विभोर हो गया और पहले उसने मन ही मन प्रार्थना की और फिर हिम्मत कर के अपने प्यार का इज़हार सुनंदा के कानो मे किया कि वो उसे चाहता है और अगर सुनंदा भी वोही चाहती है तो वो आगे नारायनप्रासाद को बताने की हिम्मत करे वरना वो बात वोही ख़तम करेगा और फिर आगे कभी वो इसके बारे मे ना तो सोचेगा और ना तो कोई फ़र्क पड़ेगा उसके मन मे.
उसके असचर्या के बीच मे सुनंदा ने करीब 10 मिनट बाद साईबाबा की मूरत के पैर लगने के बाद स्वीकृति दे दी. विक्रम एकदम खुशी से पागल हो गया और दौड़ के उसने सब से पहले नारायनप्रासाद और आंटी के पैर छुवे. दोनो ने आशीर्वाद देकर पुचछा भी की आज क्या हुवा कि वो पैर पड़कर आशीर्वाद लेना चाहता है. विक्रम ने उसे पहले दर्शन के बोला और फिर वो सबकुच्छ बताएगा ऐसा कहकर दोनो को पहले दर्शन करवाया और फिर जब खाना ख़ाके शिर्डी से उज्जैन की ओर यात्रा शुरू हुई और दोनो बुजुर्ग ने बस मे ही नींद लेकर थकान दूर कर दी तभी विक्रम ने सबकुच्छ बताना उचित समझा था.
जब विक्रम ने सबकुच्छ बताया कि वो और सुनंदा एकदुसरे को चाहते है, और सुनंदा को जब नारायनप्रासाद ने पुचछा तो उसकी नज़रे भी ज़मीन देखने लगी तो दोनो पति पत्नी समझ गये और ज़ोर से हॅस्कर दोनो के प्यार को स्वीकृति दे दी. नारायनप्रासाद ने बताया की आज उसका जी हलका हो गया. आज उसका जिगरी दोस्त गंगाधर होता तो कितना खुश होता कि अब उसकी दोस्ती रिस्त्ेदारी मे बदलने जा रही है. ये सुनकर विक्रम की तो आनंद की कोई सीमा ना रही. फिर तो उज्जैन और पूरी मे दोनो ने महादेव और कृष्णा के आशीर्वाद भी ले लिया. नारायनप्रासाद ने उसे वचन दिया की तीर्थयात्रा समाप्त होते ही वो सगाई का शुभ मुहूर्त निकालेगे और अगले जाड़े मे दोनो की शादी भी करवा देंगे. ये सुनकर सुनंदा की आँखे शर्म से झुकी और विक्रम भी तिर्छि नज़रो से उसे देखता रहता था.
फिर वे लोग कोनर्क पहुचे. वैसे तो ये तीर्थयात्रा मे समाविष्ट नही था लेकिन टूरिस्ट बस हमेशा यंग कपल्स के लिए कोनर्क ज़रूर ले जाते है. कोनर्क का फेमस सन टेंपल उस जमाने की कामकला को मूर्ति के स्वरूप मे प्रदर्शित करता है. खास करके यंग कपल के लिए कामोत्तेजक मूरत मंदिर की चारो और लगाए हुवे है. पूरा टेंपल को एक रात का स्वरूप दिया गया है. रात के पहिए मे घड़ी का नाकषिकं किया गया है. गाइड बोल रहा था की जब सूरज की किर्ने इस रात पे गिरती है और सूरज की किर्ने और जहा किर्ने नही गिरती वो अंधेरे के सपोर्ट से उस जमाने मे समय का अंदाज़ा निकाला जाता था कि आक्चुयल टाइम क्या हुवा है. जैसे जैसे सूर्य आगे बढ़ता जाएगा वैसे वैसे उसकी किर्ने और अंधेरा बदलता जाता है उसी के आधार पर एग्ज़ॅक्ट टाइम समजज़ मे आता है. इसीलिए ये टेंपल सूर्य मंदिर के नाम से फेमस है.
इतना समझा कर गाइड बोला अब सिर्फ़ यंग्स्टर्स मेरे साथ आए और बाकी लोग पिछे पिछे अपनी अपनी तरह से बढ़ते रहे.
कोनर्क टेंपल की शुरुआत मे ही रात के पहिए आते है, बाद मे शुरू होती है कामलीला की इंट्रेस्टिंग नक्काशी से, पत्थरो से बनाए हुवे बड़े बड़े मूरत. टेंपल की चारो ओर ऐसी कई मूर्तिया है. एक के बाद एक सेक्स के आसनो के बारे मे वो गाइड बताए जा रहा था और विक्रम एकदम रस्विभोर होकर देखता भी जा रहा था और सुनता भी जा रहा था. सुनंदा चुपचाप नीची नज़ारे झुकाए दो कदम पिछे चल रही थी. कभी कभी तिर्छि नज़ारो से वो भी देख लेती थी. लेकिन पुरुष और स्त्री के आंतरिक अंगो को भी बड़ा करके पत्थरो के मध्यम से सेक्स के हर आसान को बखूबी से वाहा तराशा गया था. तो सब के सामने सुनंदा उसे देखने मे संकोच महसूस कर रही थी. लेकिन विक्रम तो बड़ी जिग्यासा से सबकुच्छ देख रहा था. वो तो सबकुच्छ देखा के पागल हो गया था. कोई कोई आसान तो देखकर वो सोच रहा था की ऐसे आसान तो उसने कभी नही आज़माए.
गतान्क से आगे.......
चाय पीने के बाद किशोरीलाल ने बंसी को पुचछा,”विकी कहा है ?”
“बाबा तो अभी सो रहे है” बंसी ने जवाब दिया.
“ठीक है बंसी अब तुम काम पे लग जाओ और जैसे ही विकी फ्रेश हो जाए कैसे भी कर के मुझे खबर कर देना और बाद मे एक घंटे के लिए हमे अकेला छोड़ देना” कहकर किशोरीलाल ने राजेश्वरिदेवी को बोला,”तुम भी वाहा कम से कम एक घंटे के लिए मत आना”
बंसी और राजेश्वरिदेवी ने हा मे सिर हिलाया.
बाद मे किशोरीलाल नीचे आया और पूरी हवेली का चक्कर काटना शुरू किया. ग्राउंड फ्लोर और दो मजले से लेकर पूरा कॉरिडर बाल्कनी, गार्डेन घूमकर करीब 10 बजे जब वो दीवानखाने मे प्रवेश कर रहा था कि बंसी भागता उसके पास आया और बोला, ‘’भैया, बाबा अभी अभी उठे है और आप को ही याद कर रहे है, मैने बोल दिया है की आप अभी उसे मिलने जा रहे हो’’.
‘’ठीक है बंसी अब कम से कम एक घंटे के लिया उस कमरे मे मत आना’’किशोरीलाल ने सूचना दी.
“भैया...“ बंसी की आखे फिर भीगी और गले मे खराश आ गयी.
किशोरीलाल ने उसकी पीठ पे हाथ फिराया और मौन भाषा मे ही सांत्वना दी कि विकी को कुच्छ नही होगा, हम ज़हर पी के भी उसे सुधार पाएँगे. उसकी आँखो की चमक देखकर बंसी ने दो हाथ जोड़े और धीरे धीरे किचन की और कदम बढ़ाए. थोड़ी देर तक किशोरीलाल उस पढ़े लिखे लेकिन वफ़ादार इंसान की चाहत को मान ही मान मे सल्यूट करता रहा और उसने विक्रम की रूम की और कदम उठाए.
विक्रम के रूम को बाहर से नॉक किया, विक्रम ने खुद आके दरवाजा खोला, कुच्छ पल तक वो देखता रहा और फिर बोला,’’अंदर आने के लिए तो कब से नॉक करने लगा.’’
और हाथ पकड़ कर किशोरीलाल को अंदर ले गया, दोनो बेड पर बैठे. कुच्छ देर तक दोनो मे से कोई कुच्छ नही बोला फिर किशोरीलाल ने बात प्रारंभ की,“विकी मे तुझसे कुच्छ पुछना चाहता हू अगर तू बुरा ना माने तो.“
’’क्या बात कर रहा है, एक दोस्त दूसरे दोस्त का बुरा मान सकता है क्या ?’’ विकी ने जवाब दिया.“मैं जानता हू तू सुनंदा और अंकल की मृत्यु के बारे मे पुछनेवाला है, अगर मैं तेरी जगह होता तो कल रात ही सबकुच्छ पुच्छ लेता, तू इतना धीरजवाला है कि कम से कम एक रात तो बिता सकता है. लेकिन अब मेरी बारी है, मैं कल रात कुच्छ बताने के होश मे शायद नही था, लेकिन आज पूरा ओ.के. हू, मेरी इच्छा है तू पुच्छे इसके पहले मुझसे पूरा सुन ले बाद मे तेरा जो जी चाहे सवाल कर, वो पूरी बात, हादसा क्या हुवा, कैसे हुवा, क्यू हुवा और मैने आज तक तुझसे क्यू च्छुपाए रखा वो पूरी बात पहले तू सुन ले“ एक स्वास मे विकी बोल गया और फिर गहरी सांस ली.
किशोरीलाल ने मौन ही रहना उचित समझा और ये मौन भाषा को स्वीकृति समझ कर विकी ने बोलना शुरू किया और करीब 20 मिनिट तक बोलता रहा जो कुच्छ उसने बोला वो हादसा कुच्छ इसी तरह था:
विक्रम, नारायनप्रासाद. उसकी धर्मपत्नी और सुनंदा ने तीर्थयात्रा की शुरुआत सौराष्ट्रा फेमस और बारह ज्योर्ठिलिंग मे प्रमुख सोमनाथ ज्योर्ठिर्लिंग से की थी, बाद मे तुल्सिषयाम, द्वारका, ओखा, शिर्डी, उज्जैन, जगन्नाथ पूरी, कोनर्क, कॅल्कटा (उस टाइम कोलकॅटा का नाम कॅल्कटा था) काली माता टेंपल, गंगासागर तीर्थ, देल्ही, आगरा, बनारस, वाराणसी, त्रिवेणी संगम अल्लहाबाद से होकर फिर अट्मॉस्फियर अच्छा नही होने की वजह से साउत की और मदुरै, तिरुपति, रमेश्वरम और लास्ट मे कन्याकुमारी होकर वे लोग और आगे का प्लान करने वाले थे.
जब वे लोग शिर्डी मे पहुचे और दर्शन के लिए लाइन मे खड़े थे, करीब एक घंटा लाइन मे वे लोग खड़े रहे तो विक्रम ने थके हुवे नारायनप्रासाद और अंटी को एक बेंच पे बिठाया और बोला की जब हमारी बारी आएगी तो वो खुद आके ले जाएगा और खुद फिर लाइन मे जाकर सुनंदा के साथ खड़ा हो गया. बस अब थोड़ी ही देर मे श्र्डी के साईबाबा के दर्शन होनेवाले थे, दूर से साईबाबा की मूरत दिखाई दे रही थी और विक्रम का मन भाव विभोर हो गया और पहले उसने मन ही मन प्रार्थना की और फिर हिम्मत कर के अपने प्यार का इज़हार सुनंदा के कानो मे किया कि वो उसे चाहता है और अगर सुनंदा भी वोही चाहती है तो वो आगे नारायनप्रासाद को बताने की हिम्मत करे वरना वो बात वोही ख़तम करेगा और फिर आगे कभी वो इसके बारे मे ना तो सोचेगा और ना तो कोई फ़र्क पड़ेगा उसके मन मे.
उसके असचर्या के बीच मे सुनंदा ने करीब 10 मिनट बाद साईबाबा की मूरत के पैर लगने के बाद स्वीकृति दे दी. विक्रम एकदम खुशी से पागल हो गया और दौड़ के उसने सब से पहले नारायनप्रासाद और आंटी के पैर छुवे. दोनो ने आशीर्वाद देकर पुचछा भी की आज क्या हुवा कि वो पैर पड़कर आशीर्वाद लेना चाहता है. विक्रम ने उसे पहले दर्शन के बोला और फिर वो सबकुच्छ बताएगा ऐसा कहकर दोनो को पहले दर्शन करवाया और फिर जब खाना ख़ाके शिर्डी से उज्जैन की ओर यात्रा शुरू हुई और दोनो बुजुर्ग ने बस मे ही नींद लेकर थकान दूर कर दी तभी विक्रम ने सबकुच्छ बताना उचित समझा था.
जब विक्रम ने सबकुच्छ बताया कि वो और सुनंदा एकदुसरे को चाहते है, और सुनंदा को जब नारायनप्रासाद ने पुचछा तो उसकी नज़रे भी ज़मीन देखने लगी तो दोनो पति पत्नी समझ गये और ज़ोर से हॅस्कर दोनो के प्यार को स्वीकृति दे दी. नारायनप्रासाद ने बताया की आज उसका जी हलका हो गया. आज उसका जिगरी दोस्त गंगाधर होता तो कितना खुश होता कि अब उसकी दोस्ती रिस्त्ेदारी मे बदलने जा रही है. ये सुनकर विक्रम की तो आनंद की कोई सीमा ना रही. फिर तो उज्जैन और पूरी मे दोनो ने महादेव और कृष्णा के आशीर्वाद भी ले लिया. नारायनप्रासाद ने उसे वचन दिया की तीर्थयात्रा समाप्त होते ही वो सगाई का शुभ मुहूर्त निकालेगे और अगले जाड़े मे दोनो की शादी भी करवा देंगे. ये सुनकर सुनंदा की आँखे शर्म से झुकी और विक्रम भी तिर्छि नज़रो से उसे देखता रहता था.
फिर वे लोग कोनर्क पहुचे. वैसे तो ये तीर्थयात्रा मे समाविष्ट नही था लेकिन टूरिस्ट बस हमेशा यंग कपल्स के लिए कोनर्क ज़रूर ले जाते है. कोनर्क का फेमस सन टेंपल उस जमाने की कामकला को मूर्ति के स्वरूप मे प्रदर्शित करता है. खास करके यंग कपल के लिए कामोत्तेजक मूरत मंदिर की चारो और लगाए हुवे है. पूरा टेंपल को एक रात का स्वरूप दिया गया है. रात के पहिए मे घड़ी का नाकषिकं किया गया है. गाइड बोल रहा था की जब सूरज की किर्ने इस रात पे गिरती है और सूरज की किर्ने और जहा किर्ने नही गिरती वो अंधेरे के सपोर्ट से उस जमाने मे समय का अंदाज़ा निकाला जाता था कि आक्चुयल टाइम क्या हुवा है. जैसे जैसे सूर्य आगे बढ़ता जाएगा वैसे वैसे उसकी किर्ने और अंधेरा बदलता जाता है उसी के आधार पर एग्ज़ॅक्ट टाइम समजज़ मे आता है. इसीलिए ये टेंपल सूर्य मंदिर के नाम से फेमस है.
इतना समझा कर गाइड बोला अब सिर्फ़ यंग्स्टर्स मेरे साथ आए और बाकी लोग पिछे पिछे अपनी अपनी तरह से बढ़ते रहे.
कोनर्क टेंपल की शुरुआत मे ही रात के पहिए आते है, बाद मे शुरू होती है कामलीला की इंट्रेस्टिंग नक्काशी से, पत्थरो से बनाए हुवे बड़े बड़े मूरत. टेंपल की चारो ओर ऐसी कई मूर्तिया है. एक के बाद एक सेक्स के आसनो के बारे मे वो गाइड बताए जा रहा था और विक्रम एकदम रस्विभोर होकर देखता भी जा रहा था और सुनता भी जा रहा था. सुनंदा चुपचाप नीची नज़ारे झुकाए दो कदम पिछे चल रही थी. कभी कभी तिर्छि नज़ारो से वो भी देख लेती थी. लेकिन पुरुष और स्त्री के आंतरिक अंगो को भी बड़ा करके पत्थरो के मध्यम से सेक्स के हर आसान को बखूबी से वाहा तराशा गया था. तो सब के सामने सुनंदा उसे देखने मे संकोच महसूस कर रही थी. लेकिन विक्रम तो बड़ी जिग्यासा से सबकुच्छ देख रहा था. वो तो सबकुच्छ देखा के पागल हो गया था. कोई कोई आसान तो देखकर वो सोच रहा था की ऐसे आसान तो उसने कभी नही आज़माए.