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Guest
विक्रम को ठीक नही लगा अपना गुस्सा और सुनंदा पर थोड़ी दया सी आई कि वो सामने से तो बुला रही थी, लेकिन एक पुरुष का ईगो हर्ट होता है तो जल्दी से कभी मानता ही नही. अपने ईगो की वजह से विक्रम तिर्छि निगाहो से देख रहा था लेकिन अपनी नज़रे हटा लेता था. सुनंदा सीधी नज़रो से सबकुच्छ देख रही थी, उसे पता था की विक्रम का ईगो उसे मौन रहने पर मजबूर कर रहा है. उसने दोनो हाथ जोड़कर माफी का इशारा किया, उसका एक हाथ अभी भी दुख रहा था, वो लाचार नज़ारो से विक्रम से गिड़गिदा रही थी. लेकिन फिर भी विक्रम कुच्छ नही बोला तो वो समझ गयी की विक्रम को सख़्त बुरा लगा है. फिर उसने सोचा कि ये सही था की रात को वो मिलने ना जा सकी, लेकिन उसकी मजबूरी ये थी की थकान से कब उसे नींद आ गयी उसे पता भी नही चला था और इतनी गहरी नींद मे थी की उसे समय का भी एहसास नही रहा था. जब सुबह वो उठी तो अपने मा-बाप की वजह से वो विक्रम को मिल भी नही पाई थी. और जब विक्रम मिला तो तब से वो खफा था और कुच्छ भी बात सुन ने को तैयार नही था.
आज उसे स्त्री सहज अपनी मजबूरी पर बहुत अफ़सोस हुवा की उसकी हालत ना सहन कर सकती थी कि ना तो बता सकती थी. उसका सुन ने वाला दूसरा और तो कोई था नही तो वो किस को अपनी मजबूरी कहती. उसने फिर असहाय नज़रो से विक्रम को मनाने की कोशिश की और फिर हाथ जोड़े की मुहे माफ़ कर दो लेकिन विक्रम का फिर वोही मूड रहा तो उसने हल्के से नज़रे फेर्कर विंडो की ओर बाहर देखने लगी. उसकी आँखो मे अब आँसू बहने लगे. वो सोच रही थी की कल रात अगर उसने भावनाओमे बहकर हद से बाहर विक्रम को सब कुच्छ समर्पण कर दिया था लेकिन अगर किसी वजह से वो उसे दोबारा नही मिल पाई तो उसका ये हाल हो गया. क्या मर्द सिर्फ़ यही चाहता है ओर कुच्छ नही ? उसे आज अपने लड़की होने पर नफ़रत हो गयी कि ऐसी उनसे कौन सी बड़ी भूल हो गयी थी कि जिसे वो अपना सबकुच्छ सोप्नेवाली है वो उस से बात करने तो क्या पलटकर देखने को भी तैयार नही था.
अभी भी उसे हाथ मे थोड़ा सा दर्द हो रहा था. लेकिन अंदर का दर्द और भारी हो गया और उसकी आँखो मे गंगा जमना बहा दी. विक्रम तिर्छि नज़रो से अभी भी उसे अब्ज़र्व कर रहा था, उसका मन किया कि वो उस से बात करे कि वो चेहरा पलटकर क्यू बैठी है, लेकिन उसे ये पता नही था कि वो अपने हाल पर रो रही है.
अचानक एक स्पीडबरकेर मे बस को धक्का लगा तो सुनंदा का सिर फिर से विंडो पर टकराया तो उसके मूह से आहा निकल गया. वो अंजानसो रही थी और अचानक उसका सिर टकराया था और साथ मे विक्रम भी उसी की ओर गिरा और विक्रम का सिर उस से भी जोरो से उसके कंधे पर टकराया. सुनंदा को दोनो ओर से पीड़ा हुई उसने एक हाथ से सिर दबाया और दूसरे हाथ से अपना कंधा. विक्रम तो फिर से आराम से बैठ गया और अपना एक हाथ सुनंदा के कंधो पर च्छू के जैसे सॉरी बोल दिया. उसने देखने की तकलीफ़ भी नही ली कि सुनंदा को कैसे चोट पहुचि है.
सुनंदा को बाहरी तीन चोटे लग चुकी थी, तीनो जगह पे दर्द हो रहा था. लेकिन अंदर ये दूसरी चोट लगी थी अभी भी विक्रम उस से नाराज़ है. वो सर पर हाथ रखकर आराम से रोई और फिर से विंडो की ओर मूह रख के बैठ गयी. ये कैसा महॉल था की पहली बार अकेली ही सीट पे वो अपने भावी पति के साथ बैठी थी और उसे लगातार अंदर और बाहर चोट पे चोट लग रही थी. उसने नज़रे उठाकर फिर लाचार नज़ारो से विक्रम को देखा कि दोनो की आँखे चार हुई क्यूकी तिर्छि नज़रो से विक्रम भी देख रहा था.
जब आँखे चार हुई तो विक्रम ने सुनंदा की बड़ी बड़ी आँखो मे आँसू की धारा देखी और उसकी सुंदर आँखे लाल हो चुकी थी. अब रोती सूरत को देख कर वो पिघल गया और अचानक उसने देखा की सुनंदा लगातार अपने हाथ, कंधे और सिर को बारी बारी दबा रही है. उसने सुनंदा के बाए कंधे पर अपना हाथ लेजाकार उसे अपने बाँहो मे ले लिया. अभी भी अंकल अंटी सोए हुवे थे ये उसने चेक कर लिया था. सुनंदा विक्रम की बाँहो मे तो आ गयी थी लेकिन बाहर और अंदर के डबल दर्द से अभी भी वो लाचार नज़रो से इधर उधर देख रही थी. वो अपने आप को बिल्कुल अकेला महसूस कर रही थी. विक्रम ने हल्के से उसका सिर और कंधा फुसलाया ता की दर्द कम हो जाए. थोड़ी देर बाद जब उसका हाथ कंधो से फिसलकर बाए हाथ की कोहनी पर जा गिरा तो सुनंदा के मूह से हल्की सी आहा निकल गयी. सुनंदा को भी पता नही था लेकिन जब विक्रम का ध्यान गया तो देखा की जिस झटके से उसने सुनंदा का हाथ हटाया था और विंडो पे जा गिरा था वो कोहनी पे इतना ज़ोर से टकराया होगा की वाहा सूजन आ चुकी थी और कोहनी की सूजन ज़्यादा दर्द देती है. अब उसे पता चला की सुनंदा बाहर और अंदर कितना दर्द महसूस करती होगी. अब उसे अपने रूड बिहेवियर पर पछतावा हुवा लेकिन अब तो तीर निकल चुका था. उसे एहसास हुवा कि उसने तो सुनंदा को मौका ही नही दिया था की कल रात वो क्यू नही आ सकी.
विक्रम का क्रोआध गायब हुवा और क्रोआध की जगह रहम ने ले ली और वो आहिस्ता आहिस्ता बारी बारी सुनंदा की कोहनी, सिर और कंधे पर मालिश करने लगा. सुनंदा हल्की हल्की आहा भरते हुवे चुप चाप बैठी रही और लाचार नज़रो से इधर उधर देख रही थी. उसे अब ये भी डर था की उनके मा बाप कही उठ ना जाए. उसने आँखो से हल्के इशारे से वो बात विक्रम को समझाने की कोशिश की और धीरे से विक्रम का हाथ अपने शरीर से हटाया और सारी पूरे बदन पर ढककर अपना दर्द सहन कर के आँखे बंद कर के बैठ गयी. विक्रम ने भी उसका इशारा समझ कर अपने हाथ वापस लेकर आराम से बैठ गया लेकिन उसकी नज़र अब कॉन्स्टेंट
सुनंदा को देख रही थी. सुनंदा की आँखो से थोड़ी ही देर मे फिर से आँसू निकल आए. अब विक्रम से नही रहा गया उसने अपने हाथो से आँसू पोछ दिए. सुनंदा ने आँखे खोली और फिर लाचार नज़रो से विक्रम को देखा, उसमे बोलने की बिल्कुल ताक़त नही थी की उसकी कोई ग़लती नही थी क्यूकी वो विक्रम के बिहेवियर की वजह से टूट चुकी थी. उसने लाचारी से आँखे फिर इधर उधर फिराई. विक्रम अब सबकुच्छ समझता था, उसने सुनंदा का चेहरा उठाकर उसके सामने किया और दो हाथ जोड़कर सॉरी बोला. सुनंदा को कुच्छ नही सूझ रहा था लेकिन अनायास उसने अपने हाथ विक्रम के हाथ मे रखकर धीरे से पलाके बंद करके खोली और मौन भाषा मे बोल दिया की सॉरी की कोई ज़रूरत नही है और फिर नज़रे उठाकर विक्रम के सामने देखने लगी. दोनो चोट की वजह से उसे आराम नही मिल रहा था. और विक्रम अब उसे ज़्यादा चोट पहुचाना नही चाहता था.
थोड़ी देर मे सुनंदा का दर्द कुच्छ कम हुवा तो उसने विंडो मे बाहर देखते देखते ही विक्रम को सॉरी बोला. विक्रम ने उसका हाथ फिर उसके बाए कंधे की ओर से ले जाकर उसे बाँहो मे भरना चाहा जैसे वो कह रहा हो की अब उसे कुच्छ भी कहने की ज़रूरत नही है लेकिन उसका हाथ सीधा सुनंदा की कोहनी से जाकर टकराया और सुनंदा से फिर आह निकल गयी. और सुनंदा ने फिर नज़रे उठाकर विक्रम को देखा. वो उसे मना भी नही कर पाई. विक्रम धीरे धीरे से उस सूजन पर मालिश करने लगा. अभी सुनंदा को उसकी ये मालिश चुभ रही थी, लेकिन आखिर लाचार औरत थी ना सबकुच्छ सहकर भी चुप रही. उसके मूह से दर्द सहन नही होने की वजह से आहे निकलती रही.
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क्रमशः................
आज उसे स्त्री सहज अपनी मजबूरी पर बहुत अफ़सोस हुवा की उसकी हालत ना सहन कर सकती थी कि ना तो बता सकती थी. उसका सुन ने वाला दूसरा और तो कोई था नही तो वो किस को अपनी मजबूरी कहती. उसने फिर असहाय नज़रो से विक्रम को मनाने की कोशिश की और फिर हाथ जोड़े की मुहे माफ़ कर दो लेकिन विक्रम का फिर वोही मूड रहा तो उसने हल्के से नज़रे फेर्कर विंडो की ओर बाहर देखने लगी. उसकी आँखो मे अब आँसू बहने लगे. वो सोच रही थी की कल रात अगर उसने भावनाओमे बहकर हद से बाहर विक्रम को सब कुच्छ समर्पण कर दिया था लेकिन अगर किसी वजह से वो उसे दोबारा नही मिल पाई तो उसका ये हाल हो गया. क्या मर्द सिर्फ़ यही चाहता है ओर कुच्छ नही ? उसे आज अपने लड़की होने पर नफ़रत हो गयी कि ऐसी उनसे कौन सी बड़ी भूल हो गयी थी कि जिसे वो अपना सबकुच्छ सोप्नेवाली है वो उस से बात करने तो क्या पलटकर देखने को भी तैयार नही था.
अभी भी उसे हाथ मे थोड़ा सा दर्द हो रहा था. लेकिन अंदर का दर्द और भारी हो गया और उसकी आँखो मे गंगा जमना बहा दी. विक्रम तिर्छि नज़रो से अभी भी उसे अब्ज़र्व कर रहा था, उसका मन किया कि वो उस से बात करे कि वो चेहरा पलटकर क्यू बैठी है, लेकिन उसे ये पता नही था कि वो अपने हाल पर रो रही है.
अचानक एक स्पीडबरकेर मे बस को धक्का लगा तो सुनंदा का सिर फिर से विंडो पर टकराया तो उसके मूह से आहा निकल गया. वो अंजानसो रही थी और अचानक उसका सिर टकराया था और साथ मे विक्रम भी उसी की ओर गिरा और विक्रम का सिर उस से भी जोरो से उसके कंधे पर टकराया. सुनंदा को दोनो ओर से पीड़ा हुई उसने एक हाथ से सिर दबाया और दूसरे हाथ से अपना कंधा. विक्रम तो फिर से आराम से बैठ गया और अपना एक हाथ सुनंदा के कंधो पर च्छू के जैसे सॉरी बोल दिया. उसने देखने की तकलीफ़ भी नही ली कि सुनंदा को कैसे चोट पहुचि है.
सुनंदा को बाहरी तीन चोटे लग चुकी थी, तीनो जगह पे दर्द हो रहा था. लेकिन अंदर ये दूसरी चोट लगी थी अभी भी विक्रम उस से नाराज़ है. वो सर पर हाथ रखकर आराम से रोई और फिर से विंडो की ओर मूह रख के बैठ गयी. ये कैसा महॉल था की पहली बार अकेली ही सीट पे वो अपने भावी पति के साथ बैठी थी और उसे लगातार अंदर और बाहर चोट पे चोट लग रही थी. उसने नज़रे उठाकर फिर लाचार नज़ारो से विक्रम को देखा कि दोनो की आँखे चार हुई क्यूकी तिर्छि नज़रो से विक्रम भी देख रहा था.
जब आँखे चार हुई तो विक्रम ने सुनंदा की बड़ी बड़ी आँखो मे आँसू की धारा देखी और उसकी सुंदर आँखे लाल हो चुकी थी. अब रोती सूरत को देख कर वो पिघल गया और अचानक उसने देखा की सुनंदा लगातार अपने हाथ, कंधे और सिर को बारी बारी दबा रही है. उसने सुनंदा के बाए कंधे पर अपना हाथ लेजाकार उसे अपने बाँहो मे ले लिया. अभी भी अंकल अंटी सोए हुवे थे ये उसने चेक कर लिया था. सुनंदा विक्रम की बाँहो मे तो आ गयी थी लेकिन बाहर और अंदर के डबल दर्द से अभी भी वो लाचार नज़रो से इधर उधर देख रही थी. वो अपने आप को बिल्कुल अकेला महसूस कर रही थी. विक्रम ने हल्के से उसका सिर और कंधा फुसलाया ता की दर्द कम हो जाए. थोड़ी देर बाद जब उसका हाथ कंधो से फिसलकर बाए हाथ की कोहनी पर जा गिरा तो सुनंदा के मूह से हल्की सी आहा निकल गयी. सुनंदा को भी पता नही था लेकिन जब विक्रम का ध्यान गया तो देखा की जिस झटके से उसने सुनंदा का हाथ हटाया था और विंडो पे जा गिरा था वो कोहनी पे इतना ज़ोर से टकराया होगा की वाहा सूजन आ चुकी थी और कोहनी की सूजन ज़्यादा दर्द देती है. अब उसे पता चला की सुनंदा बाहर और अंदर कितना दर्द महसूस करती होगी. अब उसे अपने रूड बिहेवियर पर पछतावा हुवा लेकिन अब तो तीर निकल चुका था. उसे एहसास हुवा कि उसने तो सुनंदा को मौका ही नही दिया था की कल रात वो क्यू नही आ सकी.
विक्रम का क्रोआध गायब हुवा और क्रोआध की जगह रहम ने ले ली और वो आहिस्ता आहिस्ता बारी बारी सुनंदा की कोहनी, सिर और कंधे पर मालिश करने लगा. सुनंदा हल्की हल्की आहा भरते हुवे चुप चाप बैठी रही और लाचार नज़रो से इधर उधर देख रही थी. उसे अब ये भी डर था की उनके मा बाप कही उठ ना जाए. उसने आँखो से हल्के इशारे से वो बात विक्रम को समझाने की कोशिश की और धीरे से विक्रम का हाथ अपने शरीर से हटाया और सारी पूरे बदन पर ढककर अपना दर्द सहन कर के आँखे बंद कर के बैठ गयी. विक्रम ने भी उसका इशारा समझ कर अपने हाथ वापस लेकर आराम से बैठ गया लेकिन उसकी नज़र अब कॉन्स्टेंट
सुनंदा को देख रही थी. सुनंदा की आँखो से थोड़ी ही देर मे फिर से आँसू निकल आए. अब विक्रम से नही रहा गया उसने अपने हाथो से आँसू पोछ दिए. सुनंदा ने आँखे खोली और फिर लाचार नज़रो से विक्रम को देखा, उसमे बोलने की बिल्कुल ताक़त नही थी की उसकी कोई ग़लती नही थी क्यूकी वो विक्रम के बिहेवियर की वजह से टूट चुकी थी. उसने लाचारी से आँखे फिर इधर उधर फिराई. विक्रम अब सबकुच्छ समझता था, उसने सुनंदा का चेहरा उठाकर उसके सामने किया और दो हाथ जोड़कर सॉरी बोला. सुनंदा को कुच्छ नही सूझ रहा था लेकिन अनायास उसने अपने हाथ विक्रम के हाथ मे रखकर धीरे से पलाके बंद करके खोली और मौन भाषा मे बोल दिया की सॉरी की कोई ज़रूरत नही है और फिर नज़रे उठाकर विक्रम के सामने देखने लगी. दोनो चोट की वजह से उसे आराम नही मिल रहा था. और विक्रम अब उसे ज़्यादा चोट पहुचाना नही चाहता था.
थोड़ी देर मे सुनंदा का दर्द कुच्छ कम हुवा तो उसने विंडो मे बाहर देखते देखते ही विक्रम को सॉरी बोला. विक्रम ने उसका हाथ फिर उसके बाए कंधे की ओर से ले जाकर उसे बाँहो मे भरना चाहा जैसे वो कह रहा हो की अब उसे कुच्छ भी कहने की ज़रूरत नही है लेकिन उसका हाथ सीधा सुनंदा की कोहनी से जाकर टकराया और सुनंदा से फिर आह निकल गयी. और सुनंदा ने फिर नज़रे उठाकर विक्रम को देखा. वो उसे मना भी नही कर पाई. विक्रम धीरे धीरे से उस सूजन पर मालिश करने लगा. अभी सुनंदा को उसकी ये मालिश चुभ रही थी, लेकिन आखिर लाचार औरत थी ना सबकुच्छ सहकर भी चुप रही. उसके मूह से दर्द सहन नही होने की वजह से आहे निकलती रही.
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क्रमशः................