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किस्मत का खेल पार्ट --16
गतान्क से आगे.......
आख़िर किशोरीलाल को नींद आ गयी और लगातार 2 घटे के लिए वो गहरी नींद मे चला गया.
शाम के 4.30 बजे किशोरीलाल की नींद खुल गयी. रूम मे राजेश्वरिदेवी नही थी वो बाहर आया तो देखा की बाहर गार्डेन मे राजेश्वरिदेवी और विक्रम साथ मे बैठे हुए है. छ्होटा सा जय विक्रम के हाथो मे खेल रहा था और दोनो बात कर रहे थे. किशोरीलाल भी उनके साथ जुड़ गया. उनको देखते ही राजेश्वरिदेवी बोली,”आप भी विक्रम भैया को समझाएँ की वो शादी के लिए मान जाए.”
किशोरीलाल ने कहा,”मैं तो इसे सुबह से कह रहा हू, जो होना था वो तो हो चुक्का, यू गम मना ने से पूरी ज़िंदगी नही काटी जाती. आज की सोच मे रहना मानवधर्म है. देख विकी तुझे आज नही तो कल शादी तो करनी ही है. क्यू ना पॉज़िटिव्ली आज से ही सोचना शुरू कर.”
विक्रम बोला,”तू अपनी जगह 100 % सही है लेकिन कभी तू अपने आप को मेरी जगह रख के सोच कि शॉर्ट पीरियड मे ही मेरे पिताजी, अंकल, अंटी और सुनंदा, सब को एकसाथ मे खो चुक्का हू. दूसरा मेरा वादा था कि मे सब को तीर्थयात्रा करवाउन्गा. लेकिन मेरा नसीब देखो तीर्थयात्रा से मैं सब को वापस ला ही नही पाया. तीसरा मृत्यु भी ऐसे हुई की उंगली मेरी तरफ ही सब लगाए जा रहे है. इसके उपर जो किसी को पता नही था कि सुनंदा के साथ मैं मन ही मन शादी कर चुक्का हू. मैं किस मूह से दूसरे शादी के लिए सोच सकता हू,ये बता”
“आप की बातों मे बिल्कुल सच्चाई है, लेकिन हम खुद आप के साथ है. अगर सुनंदा बेहन जिंदा होती तो बात अलग थी, लेकिन सोचिए अगर वो बाबा ने जो भविष्यवाणी की है वो सच नही होनी थी तो सुनंदा बहन ज़िंदा होती ना. अगर इस बच्चे की शादी आप की ही बेटी से होनी है तो निस्चित आप के जीवन मे एक बीवी आनेवाली ही है. क्यूकी अगर ये कुदरत ना चाहती तो सुनंदा बेहन ज़िंदा होती.” राजेश्वरिदेवी ने कहा.
उसके बोलने मे इतनी सच्चाई और प्रेम भरा था कि वाहा बैठे हुए सब ये सोचने पर मजबूर हो गये की बात तो सच्ची है. उस बाबा ने किशोरीलाल को भी कुच्छ सहन करने की बात की थी. अगर सुनंदा ज़िंदा होती तो उनकी और विक्रम की बेटी से तो जय का रिश्ता संभव ही नही था क्यूकी वो दोनो भयीबहन कहलाते. लेकिन अगर जय की शादी विक्रम की बेटी से होनी ही है तो सुनंदा की विदाई निश्चित थी. और ये ही लॉजिक सब के माइंड को वॉश कर गया कि हालत कुच्छ यही इशारा कर रहे थे कि विक्रम की अभी एक और शादी होनी ही है.
कुच्छ देर के बाद विक्रम बोला,”शायद तुम्दोनो सही हो, ये अब मेरा भी मान ना है, लेकिन मुझे कुच्छ वक़्त तो दो इस सदमे से बाहर निकलने के लिए, ता की मैं अपनी ज़िंदगी फिर से सवार सकु.”
‘’ज़िंदगी यही बैठे बैठे नही सवर्ती मेरे दोस्त, हम यहा आए है तो कुच्छ जोधपुर दिखा और खुद फ्रेश हो जा. और यहा से हमारी वापसी से पहले हमे कुच्छ पॉज़िटिव रिज़ल्ट मिले तो हमे भी सुकून मिले मेरे दोस्त’’ किशोरीलाल बोल उठा.
“अरे हा यार तुम लोगो का आज दूसरा दिन है, साला मे तो भूल ही गया की आपलोग यहा घूमने आए हो नही मेरी प्रेमकहानी सुन ने. चलो यार अभी चलते है.” कहकर विक्रम उठ के अंदर चला गया.
एक घंटे के बाद सबलॉग जोधपुर यात्रा के लिए निकल पड़े.
विक्रम पूरा जोधपुर दिखाता रहा. लगातार तीन घंटो के बाद वे वापस आए और फिर खाना खाया और थोड़ी देर तक बाते करते रहे. अभी विक्रम सुबह से लेकर अभी तक फ्रेश होता जा रहा था. अब शायद उसका मूड वापस आ रहा था. फिर रात को सब सोने के लिए चले गये. रात को किशोरीलाल की आँखो मे नींद गायब थी. वो सोच रहा था अभी बिजली और वो कोठे की बातो पर से परदा नही हटा है और वो तस्वीरे जो कन्याकुमारी के पत्थर की है जिसमे उसके बाबूजी, माताजी दिखाई दे रहे थे, स्पष्ट नही था लेकिन वो कौन है जिसने वो तस्वीरे खींची और कवर मे यहा तक पोस्ट कर दी. तस्वीर खींचनेवाले का मकसद क्या था.
दूसरा ऐसा क्या हुवा था कि उस तस्वीर को पोस्ट करने की ज़रूरत पड़ी और विक्रम ने उसे बताया तक नही. ऐसी कौन सी घटना हुई कि विक्रम उसे च्छूपाता था और क्या तस्वीरखिचानेवाला व्यक्ति विक्रम को ब्लॅकमेल करना चाहता था ?.
किशोरीलाल का सिर भारी हो गया था सबकुच्छ सोचते हुए आख़िर वो अपने रूम के बाहर निकला और यू चक्कर काटने लगा. थोड़ी देर यूँही चक्कर काट ते रहा फिर वो रूम मे वापस आया और उसकी बाल्कनी जो बंगलोव के पिछे का भाग मे थी वाहा आया. आवाज़ ना हो ता की राजेश्वरिदेवी उठ ना जाए इसी तरह से दरवाजा खोलकर वो बाल्कनी मे आया और थोड़ी देर चक्कर काट ता रहा. फिर अचानक उसे एहसास हुवा कि विक्रम के रूम की ओर से कुच्छ आवाज़ आ रही है शायद कोई धीरे स्वर मे बातचीत कर रहा है. विक्रम के रूम की लाइट्स तो ऑफ थी लेकिन नाइटलॅंप की रोशनी मे भी आवाज़े आ रही थी. किशोरीलाल जहा जिस रूम की बाल्कनी मे खड़ा था उस से बाई तरफ तीन रूम छ्चोड़कर विक्रम का रूम था लेकिन वो रूम बड़ा था तो लेंग्थ 15 फीट ज़्यादा थी. यानी किशोरीलाल की नज़र मे विक्रम के रूम की राइट साइड की विंडो नज़र आती थी और विक्रम के रूम की बाल्कनी थोड़ी आगे की ओर थी जो की किशोरीलाल की नज़रो से बाहर थी, क्योकि वाहा से सिर्फ़ विक्रम की रूम का राइट व्यू नज़र मे आता था बॅक व्यू बिल्कुल नही दिखाई देता था.
वो रूम किशोरीलाल जहा खड़ा था उस से करीब 25 कदम दूर था तो बातचीत की आवाज़ तो नही आनी चाहिए थी. लेकिन रात का सन्नाटा और बातचीत शायद नॉर्मल से कुच्छ उची आवाज़ मे आ रही थी. आवाज़ स्पस्त आ रही थी लेकिन शब्द पकड़े नही जाते थे. पहले तो किशोरीलाल का मन किया कि वो विक्रम के रूम मे जाए और देखे की माजरा क्या है, लेकिन फिर उसने अपने कदम वही जमाए रखे और सुन ने की कोशिश करने लगा.
कुच्छ मिनिट्स के लिए किशोरीलाल ने इंतेज़ार किया की कुच्छ उसके कानो मे पड़ जाए लेकिन कुच्छ स्पष्ट सुनाई नही देता था. फिर एक आवाज़ कुच्छ उची हुई लेकिन कुच्छ शब्द सुनाई नही दिया. अब किशोरीलाल की इंतेज़ारी बढ़ गयी थी और वो वापस रूम से होकर विक्रम के रूम मे जाने के लिए जैसे ही कदम वापस उठाए की उसने विक्रम के रूम के पिच्छवाड़े मे जहा उसके रूम की बाल्कनी पड़ती थी वाहा से 25 कदम दूर एक आदमी का साया देखा.
किशोरीलाल अंधेरे मे उसे पहेचान ने की कोशिश करता रहा. किशोरीलाल खुद अंधेरे मे था और वो साया धीरे धीरे उसके रूम की तरफ आगे बढ़ता रहा किशोरीलाल की धड़कन तेज़ होती चली गयी. वो एक नज़र से उसे देख रहा था. थोड़ी ही देर मे वो साया उसके बहुत करीब आया लेकिन रात का अंधेरा था अभी भी चेहरा देखना मुश्किल था. फिर अचानक वो साया आधे आकर रुक गया और थोड़ी देर खड़ा रहा. शायद उसे एहसास हो चुक्का था की किशोरीलाल वाहा खड़ा है. और उस साए ने आधी मिनिट्स मे वाहा से भागना शुरू किया और बंग्लॉ के पिछचे के भाग मे कहा गायब हो गया वो किशोरीलाल की समझ मे बिल्कुल नही आया.
किशोरीलाल की समझ मे कुच्छ आए उस के पहले तो वो साया गायब हो गया. उनकी समझ मे कुच्छ नही आया की वो कौन था, क्या चाहता था. विक्रम की रूम मे वो क्यू था और वाहा से निकलकर उसकी रूम की तरफ क्यू आया ? क्या उसने उसको देख लिया था, पहचान लिया था इसीलिए भाग गया. अगर भाग गया है तो निश्चित कुच्छ ग़लत काम के इरादे से आया होगा. लेकिन अब इस रात मे उन सवालो के जवाब मिलना मुश्किल थे इसीलिए 15 मिनट वाहा खड़ा रहकर किशोरीलाल अपने रूम मे वापस आया और फिर बेड पर पड़ा. लेकिन करीब एक घंटे वो सोचता रहा की पूरा माजरा क्या है. उनके साथ क्या हो रहा था. कुच्छ उनकी समझ मे नही आ रहा था. क्या विक्रम कुच्छ बड़ी मुसीबत मे है या वो खुद मुसीबत को दावत दे रहा था. उसने ईश्वर को याद किया और धीरे से नींद की आगोश मे सो गया.
सुबह थोड़ी देर से किशोरीलाल उठा, तब तक राजेश्वरिदेवी पूजा का कार्यक्रम निपटा चुकी थी. किशोरीलाल ने सुबह का कार्यक्रम जल्दी ही निपटा लिया और फिर बंसी चाय ले के आया. किशोरीलाल के पुछनेपर बंसी ने बताया की विक्रम अभी भी सो रहा है. इसीलिए किशोरीलाल ने इशारे से बंसी को वाहा थोड़ी देर रुकने के लिए कहा और फिर कल रात की पूरी कहानी बताई.
“क्या कोई रात को यहा आया था ?” किशोरीलाल ने बंसी को पुचछा.
‘’नही भैया मेरी नज़र मे तो रात को कोई नही आया था’’ बंसी ने बताया.
‘’तुम रात को विक्रम से आख़िर मे कब मिले थे.’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’मैं करीब रत को 10.30 बजे बाबा को मिला था, उसने सिर की दावा मंगाई थी.’’ बंसी ने बताया.
‘’ज़रूर रात को फिर शराब पिया होगा.’’ किशोरीलाल धीरे से बोला.
बंसी चुप रहा और नज़रे झुका दी तो सब समझ गये की कल रात भी विक्रम ने पी रखी थी.
किशोरीलाल फिर धीरे से बोले,’’ इसके शराब की कोई दावा है क्या ?’’
‘’शायद शादी.’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया.
‘’और दूसरा वो नालयक रामेश्वर का आना जाना बंद हो जाए तो…’’ बंसी ने बात अधूरी रख दी.
किशोरीलाल ने बहुत सोचा और फिर बोला,’’यस कल रात वो रामेश्वर ही था. नीचे धोती जैसा कुच्छ पहना था. अंधेरे मे चेहरा तो नही देख सका लेकिन दाल मे कुच्छ काला तो है. वो साला मेरे रूम की तरफ क्यू आ रहा था और विक्रम से क्या बातचीत कर रहा था. लगता है विक्रम से ही कुच्छ पुछना पड़ेगा.''
‘’मैं चलु भैया अगर बाबा उठ जाएँगे और मुझे यहा देख लेंगे तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी.’’ बंसी धीरे से खड़ा हुवा और चल दिया.
गतान्क से आगे.......
आख़िर किशोरीलाल को नींद आ गयी और लगातार 2 घटे के लिए वो गहरी नींद मे चला गया.
शाम के 4.30 बजे किशोरीलाल की नींद खुल गयी. रूम मे राजेश्वरिदेवी नही थी वो बाहर आया तो देखा की बाहर गार्डेन मे राजेश्वरिदेवी और विक्रम साथ मे बैठे हुए है. छ्होटा सा जय विक्रम के हाथो मे खेल रहा था और दोनो बात कर रहे थे. किशोरीलाल भी उनके साथ जुड़ गया. उनको देखते ही राजेश्वरिदेवी बोली,”आप भी विक्रम भैया को समझाएँ की वो शादी के लिए मान जाए.”
किशोरीलाल ने कहा,”मैं तो इसे सुबह से कह रहा हू, जो होना था वो तो हो चुक्का, यू गम मना ने से पूरी ज़िंदगी नही काटी जाती. आज की सोच मे रहना मानवधर्म है. देख विकी तुझे आज नही तो कल शादी तो करनी ही है. क्यू ना पॉज़िटिव्ली आज से ही सोचना शुरू कर.”
विक्रम बोला,”तू अपनी जगह 100 % सही है लेकिन कभी तू अपने आप को मेरी जगह रख के सोच कि शॉर्ट पीरियड मे ही मेरे पिताजी, अंकल, अंटी और सुनंदा, सब को एकसाथ मे खो चुक्का हू. दूसरा मेरा वादा था कि मे सब को तीर्थयात्रा करवाउन्गा. लेकिन मेरा नसीब देखो तीर्थयात्रा से मैं सब को वापस ला ही नही पाया. तीसरा मृत्यु भी ऐसे हुई की उंगली मेरी तरफ ही सब लगाए जा रहे है. इसके उपर जो किसी को पता नही था कि सुनंदा के साथ मैं मन ही मन शादी कर चुक्का हू. मैं किस मूह से दूसरे शादी के लिए सोच सकता हू,ये बता”
“आप की बातों मे बिल्कुल सच्चाई है, लेकिन हम खुद आप के साथ है. अगर सुनंदा बेहन जिंदा होती तो बात अलग थी, लेकिन सोचिए अगर वो बाबा ने जो भविष्यवाणी की है वो सच नही होनी थी तो सुनंदा बहन ज़िंदा होती ना. अगर इस बच्चे की शादी आप की ही बेटी से होनी है तो निस्चित आप के जीवन मे एक बीवी आनेवाली ही है. क्यूकी अगर ये कुदरत ना चाहती तो सुनंदा बेहन ज़िंदा होती.” राजेश्वरिदेवी ने कहा.
उसके बोलने मे इतनी सच्चाई और प्रेम भरा था कि वाहा बैठे हुए सब ये सोचने पर मजबूर हो गये की बात तो सच्ची है. उस बाबा ने किशोरीलाल को भी कुच्छ सहन करने की बात की थी. अगर सुनंदा ज़िंदा होती तो उनकी और विक्रम की बेटी से तो जय का रिश्ता संभव ही नही था क्यूकी वो दोनो भयीबहन कहलाते. लेकिन अगर जय की शादी विक्रम की बेटी से होनी ही है तो सुनंदा की विदाई निश्चित थी. और ये ही लॉजिक सब के माइंड को वॉश कर गया कि हालत कुच्छ यही इशारा कर रहे थे कि विक्रम की अभी एक और शादी होनी ही है.
कुच्छ देर के बाद विक्रम बोला,”शायद तुम्दोनो सही हो, ये अब मेरा भी मान ना है, लेकिन मुझे कुच्छ वक़्त तो दो इस सदमे से बाहर निकलने के लिए, ता की मैं अपनी ज़िंदगी फिर से सवार सकु.”
‘’ज़िंदगी यही बैठे बैठे नही सवर्ती मेरे दोस्त, हम यहा आए है तो कुच्छ जोधपुर दिखा और खुद फ्रेश हो जा. और यहा से हमारी वापसी से पहले हमे कुच्छ पॉज़िटिव रिज़ल्ट मिले तो हमे भी सुकून मिले मेरे दोस्त’’ किशोरीलाल बोल उठा.
“अरे हा यार तुम लोगो का आज दूसरा दिन है, साला मे तो भूल ही गया की आपलोग यहा घूमने आए हो नही मेरी प्रेमकहानी सुन ने. चलो यार अभी चलते है.” कहकर विक्रम उठ के अंदर चला गया.
एक घंटे के बाद सबलॉग जोधपुर यात्रा के लिए निकल पड़े.
विक्रम पूरा जोधपुर दिखाता रहा. लगातार तीन घंटो के बाद वे वापस आए और फिर खाना खाया और थोड़ी देर तक बाते करते रहे. अभी विक्रम सुबह से लेकर अभी तक फ्रेश होता जा रहा था. अब शायद उसका मूड वापस आ रहा था. फिर रात को सब सोने के लिए चले गये. रात को किशोरीलाल की आँखो मे नींद गायब थी. वो सोच रहा था अभी बिजली और वो कोठे की बातो पर से परदा नही हटा है और वो तस्वीरे जो कन्याकुमारी के पत्थर की है जिसमे उसके बाबूजी, माताजी दिखाई दे रहे थे, स्पष्ट नही था लेकिन वो कौन है जिसने वो तस्वीरे खींची और कवर मे यहा तक पोस्ट कर दी. तस्वीर खींचनेवाले का मकसद क्या था.
दूसरा ऐसा क्या हुवा था कि उस तस्वीर को पोस्ट करने की ज़रूरत पड़ी और विक्रम ने उसे बताया तक नही. ऐसी कौन सी घटना हुई कि विक्रम उसे च्छूपाता था और क्या तस्वीरखिचानेवाला व्यक्ति विक्रम को ब्लॅकमेल करना चाहता था ?.
किशोरीलाल का सिर भारी हो गया था सबकुच्छ सोचते हुए आख़िर वो अपने रूम के बाहर निकला और यू चक्कर काटने लगा. थोड़ी देर यूँही चक्कर काट ते रहा फिर वो रूम मे वापस आया और उसकी बाल्कनी जो बंगलोव के पिछे का भाग मे थी वाहा आया. आवाज़ ना हो ता की राजेश्वरिदेवी उठ ना जाए इसी तरह से दरवाजा खोलकर वो बाल्कनी मे आया और थोड़ी देर चक्कर काट ता रहा. फिर अचानक उसे एहसास हुवा कि विक्रम के रूम की ओर से कुच्छ आवाज़ आ रही है शायद कोई धीरे स्वर मे बातचीत कर रहा है. विक्रम के रूम की लाइट्स तो ऑफ थी लेकिन नाइटलॅंप की रोशनी मे भी आवाज़े आ रही थी. किशोरीलाल जहा जिस रूम की बाल्कनी मे खड़ा था उस से बाई तरफ तीन रूम छ्चोड़कर विक्रम का रूम था लेकिन वो रूम बड़ा था तो लेंग्थ 15 फीट ज़्यादा थी. यानी किशोरीलाल की नज़र मे विक्रम के रूम की राइट साइड की विंडो नज़र आती थी और विक्रम के रूम की बाल्कनी थोड़ी आगे की ओर थी जो की किशोरीलाल की नज़रो से बाहर थी, क्योकि वाहा से सिर्फ़ विक्रम की रूम का राइट व्यू नज़र मे आता था बॅक व्यू बिल्कुल नही दिखाई देता था.
वो रूम किशोरीलाल जहा खड़ा था उस से करीब 25 कदम दूर था तो बातचीत की आवाज़ तो नही आनी चाहिए थी. लेकिन रात का सन्नाटा और बातचीत शायद नॉर्मल से कुच्छ उची आवाज़ मे आ रही थी. आवाज़ स्पस्त आ रही थी लेकिन शब्द पकड़े नही जाते थे. पहले तो किशोरीलाल का मन किया कि वो विक्रम के रूम मे जाए और देखे की माजरा क्या है, लेकिन फिर उसने अपने कदम वही जमाए रखे और सुन ने की कोशिश करने लगा.
कुच्छ मिनिट्स के लिए किशोरीलाल ने इंतेज़ार किया की कुच्छ उसके कानो मे पड़ जाए लेकिन कुच्छ स्पष्ट सुनाई नही देता था. फिर एक आवाज़ कुच्छ उची हुई लेकिन कुच्छ शब्द सुनाई नही दिया. अब किशोरीलाल की इंतेज़ारी बढ़ गयी थी और वो वापस रूम से होकर विक्रम के रूम मे जाने के लिए जैसे ही कदम वापस उठाए की उसने विक्रम के रूम के पिच्छवाड़े मे जहा उसके रूम की बाल्कनी पड़ती थी वाहा से 25 कदम दूर एक आदमी का साया देखा.
किशोरीलाल अंधेरे मे उसे पहेचान ने की कोशिश करता रहा. किशोरीलाल खुद अंधेरे मे था और वो साया धीरे धीरे उसके रूम की तरफ आगे बढ़ता रहा किशोरीलाल की धड़कन तेज़ होती चली गयी. वो एक नज़र से उसे देख रहा था. थोड़ी ही देर मे वो साया उसके बहुत करीब आया लेकिन रात का अंधेरा था अभी भी चेहरा देखना मुश्किल था. फिर अचानक वो साया आधे आकर रुक गया और थोड़ी देर खड़ा रहा. शायद उसे एहसास हो चुक्का था की किशोरीलाल वाहा खड़ा है. और उस साए ने आधी मिनिट्स मे वाहा से भागना शुरू किया और बंग्लॉ के पिछचे के भाग मे कहा गायब हो गया वो किशोरीलाल की समझ मे बिल्कुल नही आया.
किशोरीलाल की समझ मे कुच्छ आए उस के पहले तो वो साया गायब हो गया. उनकी समझ मे कुच्छ नही आया की वो कौन था, क्या चाहता था. विक्रम की रूम मे वो क्यू था और वाहा से निकलकर उसकी रूम की तरफ क्यू आया ? क्या उसने उसको देख लिया था, पहचान लिया था इसीलिए भाग गया. अगर भाग गया है तो निश्चित कुच्छ ग़लत काम के इरादे से आया होगा. लेकिन अब इस रात मे उन सवालो के जवाब मिलना मुश्किल थे इसीलिए 15 मिनट वाहा खड़ा रहकर किशोरीलाल अपने रूम मे वापस आया और फिर बेड पर पड़ा. लेकिन करीब एक घंटे वो सोचता रहा की पूरा माजरा क्या है. उनके साथ क्या हो रहा था. कुच्छ उनकी समझ मे नही आ रहा था. क्या विक्रम कुच्छ बड़ी मुसीबत मे है या वो खुद मुसीबत को दावत दे रहा था. उसने ईश्वर को याद किया और धीरे से नींद की आगोश मे सो गया.
सुबह थोड़ी देर से किशोरीलाल उठा, तब तक राजेश्वरिदेवी पूजा का कार्यक्रम निपटा चुकी थी. किशोरीलाल ने सुबह का कार्यक्रम जल्दी ही निपटा लिया और फिर बंसी चाय ले के आया. किशोरीलाल के पुछनेपर बंसी ने बताया की विक्रम अभी भी सो रहा है. इसीलिए किशोरीलाल ने इशारे से बंसी को वाहा थोड़ी देर रुकने के लिए कहा और फिर कल रात की पूरी कहानी बताई.
“क्या कोई रात को यहा आया था ?” किशोरीलाल ने बंसी को पुचछा.
‘’नही भैया मेरी नज़र मे तो रात को कोई नही आया था’’ बंसी ने बताया.
‘’तुम रात को विक्रम से आख़िर मे कब मिले थे.’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
‘’मैं करीब रत को 10.30 बजे बाबा को मिला था, उसने सिर की दावा मंगाई थी.’’ बंसी ने बताया.
‘’ज़रूर रात को फिर शराब पिया होगा.’’ किशोरीलाल धीरे से बोला.
बंसी चुप रहा और नज़रे झुका दी तो सब समझ गये की कल रात भी विक्रम ने पी रखी थी.
किशोरीलाल फिर धीरे से बोले,’’ इसके शराब की कोई दावा है क्या ?’’
‘’शायद शादी.’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया.
‘’और दूसरा वो नालयक रामेश्वर का आना जाना बंद हो जाए तो…’’ बंसी ने बात अधूरी रख दी.
किशोरीलाल ने बहुत सोचा और फिर बोला,’’यस कल रात वो रामेश्वर ही था. नीचे धोती जैसा कुच्छ पहना था. अंधेरे मे चेहरा तो नही देख सका लेकिन दाल मे कुच्छ काला तो है. वो साला मेरे रूम की तरफ क्यू आ रहा था और विक्रम से क्या बातचीत कर रहा था. लगता है विक्रम से ही कुच्छ पुछना पड़ेगा.''
‘’मैं चलु भैया अगर बाबा उठ जाएँगे और मुझे यहा देख लेंगे तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी.’’ बंसी धीरे से खड़ा हुवा और चल दिया.