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किस्मत का खेल पार्ट --24
गतान्क से आगे.......
कृष्णा की आँखे अब सुलगने लगी थी. वो आगे बोली,’’विक्रम बाबू शायद आप की पूरी ज़िंदगी की किताब एक अग्रीमेंट ही है जो कभी बनता है तो कभी टूट ता है और वो भी सिर्फ़ आप की मर्ज़ी पर ही. पहले मैं ऐसी नही थी जो उस रात मे दिख रही थी. वरना मैं जानती हू कि ऐसी वैसी लड़की पे आप नज़र नही उठाते.’’ कृष्णा ने फिर वार किया.
‘’थोड़े साल फॉरिन क्या रही तू अपने आप को बहुत सुंदर समझने लगी हो क्या? तेरे जैसी बहुत सारी लड़किया आज कल मेरे साथ शादी के सपने देख रही है. ये ज़रूर उस बंसी के बच्चे की चाल है. साला हराम खोर मेरा ही ख़ाता है और उपर से नमक हरामी करता है.’’ विक्रम ने चिल्लाकर जवाब दिया.
बंसी का नाम सुनते ही कृष्णा वही घुटनो पे बैठ गयी और रो पड़ी,’’नही विक्रम बाबू आप को जो कहना हो मुझे कहिए लेकिन मेरे भैया को कुच्छ मत कहिए, उसे तो आज तक मैने कुच्छ नही बताया. भैया को तो इस बच्चे के बारे मे भी कुच्छ नही बताया मैने.’’
‘’तू झूठ बोल रही है. उसने ही ये चाल चली है कृष्णा. साले सबलॉग मुझे ब्लॅकमेल करने पर तुले हुए हो. लेकिन इतनी आसानी से मैं हार मानता नही. तेरे भैया को तो शायद मैं ज़िंदा नही छ्चोड़ूँगा कृष्णा.’’ कहकर विक्रम ने अपना हाथ दीवार पर लगाया.
विक्रम के हाथ से खून बहने लगा. लेकिन कृष्णा घुटने पर बैठी हुई थी. उसका ध्यान नही था और उपर से किसी को ये अंदाज़ा नही था. खुद विक्रम को भी अपने खून का ख़याल नही था.
कृष्णा खुल्ले मन से रो पड़ी और रो रो कर कहने लगी,’’नही विक्रम बाबू मेरे भैया ने आप की बहुत सेवा की है. उसे तो कुच्छ पता भी नही था कि हमारे बीच क्या हुवा है. मैने इस बच्चे के बाप के बारे मे भी उनको नही बताया तो आप के दोस्त को बुलाना पड़ा. मेरे भैया निर्दोष है. आप जानते नही आप कि खातिर उसने शादी भी नही की है. कोई नही जानता कि उसने प्रतिग्या ली है कि वो कभी शादी नही करेंगे और आप को कभी भी अकेला नही छ्चोड़ेंगे. यही अग्रीमेंट था ना मेरे भैया और आप के पिताजी के बीच. मेरे भैया ने कभी अग्रीमेंट नही तोड़ा और आप ने अपना अग्रीमेंट तोड़ दिया और मुझे बर्बाद करके छ्चोड़ दिया’’
लेकिन विक्रम का गुस्सा सातवे आसमान मे था वो इधर उधर घूमने लगा और जोरो से अपने एक हाथ से दूसरे हाथ की मुठ्ठी को मारता रहा.
“साले दोनो भाई बहानो ने मेरा जीना हराम कर रखा है. मैने साले कौन से पाप किए थे कि ऐसे बाप की औलाद हू जिसने गैरो के हाथो मे मुझे बेच रखा है. साला जीने के लिए भी पुछना पड़ता है कि मैं सांस लू की नही” अब विक्रम की सुलगती आँखो से आग और पानी बरसने शुरू हो चुके थे.
शायद आज विक्रम अपनी सारी ज़िंदगी की भदास निकल रहा था. एक बिन मा के बच्चे की आहे आज उच्छल उच्छालकर बाहर आ रही थी.
फिर विक्रम बड़बड़ाते हुए उची आवाज़ मे बोला,’’साली पूरी दुनिया को गोली मार देनी चाहिए. जहन्नम मे जाए साले सब. एक ने साला जीना हराम कर रखा है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करने पर तुला हुवा है और वाहा तीसरे ने तो साली पूरी ज़िंदगी ही दाव पे लगा रखी है. साली इतनी मुसीबत कम थी कि उपर से साली रांड तू तेरे बच्चे को लेकर यहा आ गयी. वही मर जाती ना कही, मेरे सिर पर वार करने क्यू आई यहा ?’’
अब विक्रम होश खो के यूही अनाप सनाप बके जा रहा था.
लेकिन उसे मालूम नही था कि जो आखरी शब्द उसने बोले उसमे किशोरीलाल ने कुच्छ पकड़ लिया था कि एक जीना हराम करनेवाला बंसी है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करनेवाला वो खुद यानी किशोरीलाल है, लेकिन ये तीसरा कौन है जिसने विक्रम की सारी ज़िंदगी दाव पे लगा दी है ?????
कृष्णा रोए जा रही थी और उधर बंसी और राजेश्वरिदेवी की आँखो मे भी कृष्णा के इस हाल पर रोना आ रहा था. लेकिन एक किशोरीलाल अडिग था और उसने धीरे स्वर मे कहा,’’आज अंदर के शैतान विक्रम को बाहर आ जाने दो तो ही कल एक नये विक्रम का जन्म होगा और सबकुच्छ सही होगा.’’
कृष्णा रोते हुए थोड़ी शांत हुई कि अपने पैरो पर खड़ी हुई और उसने देखा की विक्रम के हाथो से थोड़ा खून बह रहा है वो तुरंत दौड़ कर वाहा गयी और विक्रम की हथेली अपने मूह मे ले ली और चूसने लगी. विक्रम ने एक ही झटके मे उसे दूर धक्का दिया और कृष्णा सोफे पर गिर गयी. अब विक्रम का ध्यान अपने खून पर गया लेकिन उसका गुस्सा अब भी वैसा ही था और उसने सुलगती आँखो से कृष्णा को देखा.
कृष्णा बोली,’’विक्रम बाबू आप को खून निकल आया है.’’
‘’सालो तुम लोगो की वजह से एक दिन मेरा सारा खून निकल आएगा और तभी तुमलोगो को शांति मिलेगी.’’ विक्रम के स्वर मे अब खराश आ चुकी थी.
गतान्क से आगे.......
कृष्णा की आँखे अब सुलगने लगी थी. वो आगे बोली,’’विक्रम बाबू शायद आप की पूरी ज़िंदगी की किताब एक अग्रीमेंट ही है जो कभी बनता है तो कभी टूट ता है और वो भी सिर्फ़ आप की मर्ज़ी पर ही. पहले मैं ऐसी नही थी जो उस रात मे दिख रही थी. वरना मैं जानती हू कि ऐसी वैसी लड़की पे आप नज़र नही उठाते.’’ कृष्णा ने फिर वार किया.
‘’थोड़े साल फॉरिन क्या रही तू अपने आप को बहुत सुंदर समझने लगी हो क्या? तेरे जैसी बहुत सारी लड़किया आज कल मेरे साथ शादी के सपने देख रही है. ये ज़रूर उस बंसी के बच्चे की चाल है. साला हराम खोर मेरा ही ख़ाता है और उपर से नमक हरामी करता है.’’ विक्रम ने चिल्लाकर जवाब दिया.
बंसी का नाम सुनते ही कृष्णा वही घुटनो पे बैठ गयी और रो पड़ी,’’नही विक्रम बाबू आप को जो कहना हो मुझे कहिए लेकिन मेरे भैया को कुच्छ मत कहिए, उसे तो आज तक मैने कुच्छ नही बताया. भैया को तो इस बच्चे के बारे मे भी कुच्छ नही बताया मैने.’’
‘’तू झूठ बोल रही है. उसने ही ये चाल चली है कृष्णा. साले सबलॉग मुझे ब्लॅकमेल करने पर तुले हुए हो. लेकिन इतनी आसानी से मैं हार मानता नही. तेरे भैया को तो शायद मैं ज़िंदा नही छ्चोड़ूँगा कृष्णा.’’ कहकर विक्रम ने अपना हाथ दीवार पर लगाया.
विक्रम के हाथ से खून बहने लगा. लेकिन कृष्णा घुटने पर बैठी हुई थी. उसका ध्यान नही था और उपर से किसी को ये अंदाज़ा नही था. खुद विक्रम को भी अपने खून का ख़याल नही था.
कृष्णा खुल्ले मन से रो पड़ी और रो रो कर कहने लगी,’’नही विक्रम बाबू मेरे भैया ने आप की बहुत सेवा की है. उसे तो कुच्छ पता भी नही था कि हमारे बीच क्या हुवा है. मैने इस बच्चे के बाप के बारे मे भी उनको नही बताया तो आप के दोस्त को बुलाना पड़ा. मेरे भैया निर्दोष है. आप जानते नही आप कि खातिर उसने शादी भी नही की है. कोई नही जानता कि उसने प्रतिग्या ली है कि वो कभी शादी नही करेंगे और आप को कभी भी अकेला नही छ्चोड़ेंगे. यही अग्रीमेंट था ना मेरे भैया और आप के पिताजी के बीच. मेरे भैया ने कभी अग्रीमेंट नही तोड़ा और आप ने अपना अग्रीमेंट तोड़ दिया और मुझे बर्बाद करके छ्चोड़ दिया’’
लेकिन विक्रम का गुस्सा सातवे आसमान मे था वो इधर उधर घूमने लगा और जोरो से अपने एक हाथ से दूसरे हाथ की मुठ्ठी को मारता रहा.
“साले दोनो भाई बहानो ने मेरा जीना हराम कर रखा है. मैने साले कौन से पाप किए थे कि ऐसे बाप की औलाद हू जिसने गैरो के हाथो मे मुझे बेच रखा है. साला जीने के लिए भी पुछना पड़ता है कि मैं सांस लू की नही” अब विक्रम की सुलगती आँखो से आग और पानी बरसने शुरू हो चुके थे.
शायद आज विक्रम अपनी सारी ज़िंदगी की भदास निकल रहा था. एक बिन मा के बच्चे की आहे आज उच्छल उच्छालकर बाहर आ रही थी.
फिर विक्रम बड़बड़ाते हुए उची आवाज़ मे बोला,’’साली पूरी दुनिया को गोली मार देनी चाहिए. जहन्नम मे जाए साले सब. एक ने साला जीना हराम कर रखा है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करने पर तुला हुवा है और वाहा तीसरे ने तो साली पूरी ज़िंदगी ही दाव पे लगा रखी है. साली इतनी मुसीबत कम थी कि उपर से साली रांड तू तेरे बच्चे को लेकर यहा आ गयी. वही मर जाती ना कही, मेरे सिर पर वार करने क्यू आई यहा ?’’
अब विक्रम होश खो के यूही अनाप सनाप बके जा रहा था.
लेकिन उसे मालूम नही था कि जो आखरी शब्द उसने बोले उसमे किशोरीलाल ने कुच्छ पकड़ लिया था कि एक जीना हराम करनेवाला बंसी है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करनेवाला वो खुद यानी किशोरीलाल है, लेकिन ये तीसरा कौन है जिसने विक्रम की सारी ज़िंदगी दाव पे लगा दी है ?????
कृष्णा रोए जा रही थी और उधर बंसी और राजेश्वरिदेवी की आँखो मे भी कृष्णा के इस हाल पर रोना आ रहा था. लेकिन एक किशोरीलाल अडिग था और उसने धीरे स्वर मे कहा,’’आज अंदर के शैतान विक्रम को बाहर आ जाने दो तो ही कल एक नये विक्रम का जन्म होगा और सबकुच्छ सही होगा.’’
कृष्णा रोते हुए थोड़ी शांत हुई कि अपने पैरो पर खड़ी हुई और उसने देखा की विक्रम के हाथो से थोड़ा खून बह रहा है वो तुरंत दौड़ कर वाहा गयी और विक्रम की हथेली अपने मूह मे ले ली और चूसने लगी. विक्रम ने एक ही झटके मे उसे दूर धक्का दिया और कृष्णा सोफे पर गिर गयी. अब विक्रम का ध्यान अपने खून पर गया लेकिन उसका गुस्सा अब भी वैसा ही था और उसने सुलगती आँखो से कृष्णा को देखा.
कृष्णा बोली,’’विक्रम बाबू आप को खून निकल आया है.’’
‘’सालो तुम लोगो की वजह से एक दिन मेरा सारा खून निकल आएगा और तभी तुमलोगो को शांति मिलेगी.’’ विक्रम के स्वर मे अब खराश आ चुकी थी.