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किस्मत का खेल

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किस्मत का खेल पार्ट --24

गतान्क से आगे.......

कृष्णा की आँखे अब सुलगने लगी थी. वो आगे बोली,’’विक्रम बाबू शायद आप की पूरी ज़िंदगी की किताब एक अग्रीमेंट ही है जो कभी बनता है तो कभी टूट ता है और वो भी सिर्फ़ आप की मर्ज़ी पर ही. पहले मैं ऐसी नही थी जो उस रात मे दिख रही थी. वरना मैं जानती हू कि ऐसी वैसी लड़की पे आप नज़र नही उठाते.’’ कृष्णा ने फिर वार किया.

‘’थोड़े साल फॉरिन क्या रही तू अपने आप को बहुत सुंदर समझने लगी हो क्या? तेरे जैसी बहुत सारी लड़किया आज कल मेरे साथ शादी के सपने देख रही है. ये ज़रूर उस बंसी के बच्चे की चाल है. साला हराम खोर मेरा ही ख़ाता है और उपर से नमक हरामी करता है.’’ विक्रम ने चिल्लाकर जवाब दिया.

बंसी का नाम सुनते ही कृष्णा वही घुटनो पे बैठ गयी और रो पड़ी,’’नही विक्रम बाबू आप को जो कहना हो मुझे कहिए लेकिन मेरे भैया को कुच्छ मत कहिए, उसे तो आज तक मैने कुच्छ नही बताया. भैया को तो इस बच्चे के बारे मे भी कुच्छ नही बताया मैने.’’

‘’तू झूठ बोल रही है. उसने ही ये चाल चली है कृष्णा. साले सबलॉग मुझे ब्लॅकमेल करने पर तुले हुए हो. लेकिन इतनी आसानी से मैं हार मानता नही. तेरे भैया को तो शायद मैं ज़िंदा नही छ्चोड़ूँगा कृष्णा.’’ कहकर विक्रम ने अपना हाथ दीवार पर लगाया.

विक्रम के हाथ से खून बहने लगा. लेकिन कृष्णा घुटने पर बैठी हुई थी. उसका ध्यान नही था और उपर से किसी को ये अंदाज़ा नही था. खुद विक्रम को भी अपने खून का ख़याल नही था.

कृष्णा खुल्ले मन से रो पड़ी और रो रो कर कहने लगी,’’नही विक्रम बाबू मेरे भैया ने आप की बहुत सेवा की है. उसे तो कुच्छ पता भी नही था कि हमारे बीच क्या हुवा है. मैने इस बच्चे के बाप के बारे मे भी उनको नही बताया तो आप के दोस्त को बुलाना पड़ा. मेरे भैया निर्दोष है. आप जानते नही आप कि खातिर उसने शादी भी नही की है. कोई नही जानता कि उसने प्रतिग्या ली है कि वो कभी शादी नही करेंगे और आप को कभी भी अकेला नही छ्चोड़ेंगे. यही अग्रीमेंट था ना मेरे भैया और आप के पिताजी के बीच. मेरे भैया ने कभी अग्रीमेंट नही तोड़ा और आप ने अपना अग्रीमेंट तोड़ दिया और मुझे बर्बाद करके छ्चोड़ दिया’’

लेकिन विक्रम का गुस्सा सातवे आसमान मे था वो इधर उधर घूमने लगा और जोरो से अपने एक हाथ से दूसरे हाथ की मुठ्ठी को मारता रहा.

“साले दोनो भाई बहानो ने मेरा जीना हराम कर रखा है. मैने साले कौन से पाप किए थे कि ऐसे बाप की औलाद हू जिसने गैरो के हाथो मे मुझे बेच रखा है. साला जीने के लिए भी पुछना पड़ता है कि मैं सांस लू की नही” अब विक्रम की सुलगती आँखो से आग और पानी बरसने शुरू हो चुके थे.

शायद आज विक्रम अपनी सारी ज़िंदगी की भदास निकल रहा था. एक बिन मा के बच्चे की आहे आज उच्छल उच्छालकर बाहर आ रही थी.

फिर विक्रम बड़बड़ाते हुए उची आवाज़ मे बोला,’’साली पूरी दुनिया को गोली मार देनी चाहिए. जहन्नम मे जाए साले सब. एक ने साला जीना हराम कर रखा है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करने पर तुला हुवा है और वाहा तीसरे ने तो साली पूरी ज़िंदगी ही दाव पे लगा रखी है. साली इतनी मुसीबत कम थी कि उपर से साली रांड तू तेरे बच्चे को लेकर यहा आ गयी. वही मर जाती ना कही, मेरे सिर पर वार करने क्यू आई यहा ?’’

अब विक्रम होश खो के यूही अनाप सनाप बके जा रहा था.

लेकिन उसे मालूम नही था कि जो आखरी शब्द उसने बोले उसमे किशोरीलाल ने कुच्छ पकड़ लिया था कि एक जीना हराम करनेवाला बंसी है, दूसरा एमोशनल ब्लॅकमेल करनेवाला वो खुद यानी किशोरीलाल है, लेकिन ये तीसरा कौन है जिसने विक्रम की सारी ज़िंदगी दाव पे लगा दी है ?????

कृष्णा रोए जा रही थी और उधर बंसी और राजेश्वरिदेवी की आँखो मे भी कृष्णा के इस हाल पर रोना आ रहा था. लेकिन एक किशोरीलाल अडिग था और उसने धीरे स्वर मे कहा,’’आज अंदर के शैतान विक्रम को बाहर आ जाने दो तो ही कल एक नये विक्रम का जन्म होगा और सबकुच्छ सही होगा.’’

कृष्णा रोते हुए थोड़ी शांत हुई कि अपने पैरो पर खड़ी हुई और उसने देखा की विक्रम के हाथो से थोड़ा खून बह रहा है वो तुरंत दौड़ कर वाहा गयी और विक्रम की हथेली अपने मूह मे ले ली और चूसने लगी. विक्रम ने एक ही झटके मे उसे दूर धक्का दिया और कृष्णा सोफे पर गिर गयी. अब विक्रम का ध्यान अपने खून पर गया लेकिन उसका गुस्सा अब भी वैसा ही था और उसने सुलगती आँखो से कृष्णा को देखा.

कृष्णा बोली,’’विक्रम बाबू आप को खून निकल आया है.’’

‘’सालो तुम लोगो की वजह से एक दिन मेरा सारा खून निकल आएगा और तभी तुमलोगो को शांति मिलेगी.’’ विक्रम के स्वर मे अब खराश आ चुकी थी.
 
कृष्णा फिर खड़ी हुई और हाथ जोड़ के विक्रम से माफी माँगी,’’विक्रम मुझे कुच्छ नही चाहिए. मैने पहले भी आप को बता दिया था कि मैं आप को बदनाम करने नही आई. मैं मानती हू कि मैने ही भूल की थी उस दिन. इसीलिए मैं अपना बच्चा लेकर यहा से चली जाती हू. आप के दोस्त को भी मैं मना लूँगी. लेकिन मेरे भैया की कोई ग़लती नही है. मेरे भैया देवता है. उसे माफ़ कर दो विक्रम बाबू. वरना इस जिंदगी मे मेरे भैया को आप के सहारे के सिवा और कोई नही है. मैं आप को वचन देती हू कि कभी यहा नही आउन्गी और अपना मूह आप को तो क्या अपने भैया तक को भी कभी नही दिखौँगी. लेकिन मेरे भैया को माफ़ करदो और उसे अपना लो बस यही मेरी बिनति है आप से.’’

विक्रम ने गुस्से से अपना मूह फेर लिया और उसकी आँखो से गुस्से और लाचारी से पानी निकल आया था. कृष्णा ने धीरे से दिवानखने से बाहर जाने की कोशिश की

तभी एक आवाज़ आई,’’ठहरो कृष्णा.’’

उस आवाज़ मे इतना दम था कि कृष्णा के कदम अपने आप ही रुक गये. एक तपस्विनी की तरह दिख रही थी राजेश्वरिदेवी और अपने पति के सामने एक बार देखकर वो नीचे उतर आई और विक्रम के सामने खड़ी रह गयी और विक्रम उसकी नज़रो का सामना नही कर पाया क्यूकी राजेश्वरिदेवी की आँखो से अँगारे बरस रहे थे. चंद मिनट के बाद वो बोली:

“कृष्णा तू कही नही जाएगी लेकिन मेरे पास रहेगी. जूना गढ़ मे, हम साथ मिलकर दोनो बच्चो को बड़े करेंगे. एक बाप अपना फ़र्ज़ ज़रूर भूल सकता है, लेकिन एक मा कभी भी अपने बच्चे के लिए फ़र्ज़ नही भूल सकती. मैं तेरी हिम्मत को सलाम करती हू कि इतना सुन ने के बाद भी तुझ मे ज़िंदा रहने की ताक़त है, वरना इतना सुनते ही तेरी जगह कोई और होती तो कब की मर जाती.’’ राजेश्वरिदेवी की वाणी आग बरस रही थी.

विक्रम, कृष्णा और बंसी तो क्या खुद किशोरीलाल स्तब्ध था क्यूकी राजेश्वरिदेवी का ये स्वरूप उसने भी कभी नही देखा था. जैसे कोई देवी प्रकट हो के गर्जना कर रही हो वैसा दिख रहा था.

विक्रम स्तब्ध हो के राजेश्वरी का ये नया अवतार देख रहा था. राजेश्वरिदेवी आगे बढ़ी और कृष्णा का हाथ पकड़ के अंदर ले आई और फिर विक्रम के सामने

बोली,’’विक्रम भाई एक बात सुन लो अगर आप के दोस्त ही आप के दुश्मन है तो ज़िंदगी मे आप की बर्बादी बहुत जल्दी ही आ रही है. ये बात इसीलिए नही कर रही हू कि वो अग्रीमेंट मे आप के दोस्त और मेरे पति का नाम है, लेकिन परमात्मा कभी भी अत्याचार करने वालो पर रहम नही करता. दूसरा अगर आज आपने अपनी होनेवाली बीवी और बच्चे को गाली देकर और धक्का देकर निकाल दिया तो ये मत समझिए कि आप के पाप पर परदा गिर जाएगा. कल ये ही बच्चा बड़ा होकर आप के सामने अपने मा के साथ हुए अत्याचारो का हिसाब पुच्चने खड़ा हो जाएगा. हा इतना तो हम लोग ज़रूर कोशिश करेंगे कि बच्चे को ऐसे संस्कार देंगे कि वो आप से हक़ माँगने यहा नही आएगा. लेकिन बदले मे आप कभी भी उसका मूह नही देख पाएँगे और ज़िंदगीभर अपने आप को कोसते रहोगे.’’

एक… एक … शब्द जैसे कमान से छूटा हुवा तीर था और वाहा खड़े सब की छाती के आरपार उतरता जा रहा था. विक्रम का गुस्सा तो ठीक लेकिन राजेश्वरिदेवी की आँखे देखकर ही उसकी आँखे फटी जा रही थी. गला बिल्कुल सुख गया था और साँसे बिल्कुल टूट रही थी. पसीने से तरबतर चेहरा और शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था. दो दो देवियो के वार पड़ चुके थे आज उस पर. सिर्फ़ इतना ही सुन ने के बाद वो नज़दीक के सोफे पर धब्ब से बैठ गया और इधर उधर देखने लगा. उसकी आँखे उसके कंट्रोल मे नही थी और लगातार आँसू की धारा बह रही थी.

और कोई आगे बोले उसके पहले दोनो बच्चो के रोने की आवाज़ उपर से आई और राजेश्वरिदेवी और कृष्णा उपर उसको लेने के लिए दौड़ पड़ी.

सब लोग की नज़रे उपर ही थी लेकिन विक्रम की नज़र नीची थी, उसकी समझ मे नही आ रहा था कि इस वक़्त वो क्या करे? वो बिल्कुल अपने आप मे नही था और अचानक राजेश्वरिदेवी के हमले से जैसे एक सैनिक पर वार हुवा था और वो घाव इतना गहरा था कि उस सदमे से बाहर आने मे टाइम ज़रूर लगनेवाला था. लेकिन आख़िर ये सब प्यादे थे किस्मेत के मारे. सब से बड़ी परमात्मा की जादूगरी होती है, जिसने अपनी जादूगरी से विक्रम की गोद मे एक बच्चा तो डाल ही दिया था. लेकिन साथ मे कई मुसीबते भी लिखी थी. एक मनुश्य क्या समझ सकता है विधाता की गहरी चाल को कि आगे क्या लिखा है………………

क्रमशः.........................

 
किस्मत का खेल पार्ट --24

gataank se aage.......

Krishna ki ankhe ab sulagane lagi thi. Vo age bole,’’vikrambabu shayad aap ki puri zindagi ki kitab ek agreement hi hai jo kabhi banta hai to kabhi tut ta hai aur vo bhi sirf aap ki marji par hi. pehle mai aisi nahi thi jo us rat me dikh rahi thi. Varna mai janti hu ki aisi vaisi ladki pe aap najar nahi uthate.’’ Krishna ne fir var kiya.

‘’Thode sal foreign kya rahi tu apne aap ko bahut sundar samajane lagi ho kya? Tere jaisi bahut sari ladakiya aaj kal mere sath shadi ke sapne dekh rahi hai. Ye jarur us Bansi ke bachche ki chal hai. Sala haramkhor mera hi khata hai aur upar se nimakharami karta hai.’’ Vikram ne chillakar jawab diya.

Bansi ka nam sunte hi Krishna vahi ghutano pe baith gayi aur ro padi,’’Nahi Vikrambabu aap ko jo kehna ho muje kahiye lekin mere bhaiya ko kuchh mat kahiye, use to aaj tak maine kuchh nahi bataya. Bhaiya ko to is bachche ke bare me bhi kuchh nahi bataya maine.’’

‘’Tu juth bol rahi hai. Usne hi ye chal chali hai Krishna. Sale sablog muje blackmail karne par tule huye ho. Lekin itani asani se mai har manta nahi. Tere bhaiya ko to shayad mai zinda nahi chhodunga Krishna.’’ Kehkar Vikram ne apna hath diwar par lagaya.

Vikram ke hath se khoon behne laga. Lekin Krishna ghutane par baithi huyi thi. Uska dhyan nahi tha aur upar se kisi ko ye andaza nahi tha. Khud Vikram ko bhi apne khoon ka khayal nahi tha.

Krishna khulle man se ro padi aur ro ro kar kehne lagi,’’Nahi Vikrambabu mere bhaiya ne aap ki bahut seva ki hai. Use to kuchh pata bhi nahi tha ki hamare bich kya huva hai. Maine is bachche ke bap ke bare me bhi unko nahi bataya to aap ke dost ko bulana pada. Mere bhaiya nirdosh hai. Aap jante nahi aap ki khatir usne shadi bhi nahi ki hai. Koi nahi janta ki usne pratigya li hai ki vo kabhi shadi nahi karenge aur aap ko kabhi bhi akela nahi chhodenge. Yehi agreement tha na mere bhaiya aur aap ke pitaji ke bich. Mere bhaiya ne kabhi agreement nahi toda aur aap ne apana agreement tod diya aur muje barbad karke chhod diya’’

Lekin Vikram ka gussa satve aasman me tha vo idhar udhar ghumane laga aur joro se apne ek hath se dusre hath ki muththi ko marta raha.

“Sale dono bhaibahan ne mera jina haram kar rakha hai. Maine sale kaun se pap kiye the ki aise bap ki aulad hu jisne gairo ke hatho me muje bech rakha hai. Sala jine ke liye bhi puchhana padta hai ki mai sans lu ki nahi” Ab Vikramki sulagati ankho se aag aur pani barasne shuru ho chuke the.

Shayad aaj Vikram apni sari zindagi ki bhadash nikal raha tha. Ek bin ma ke bachche ki ahe aaj uchhal uchhalkar bahar aa rahi thi.

Fir Vikram badbadate huye uchi awaz me bola,’’Sali puri duniya ko goli mar deni chahiye. Jahannam me jaye sale sab. Ek ne sala jina haram kar rakha hai, dusra emotional blackmail karne par tula huva hai aur vaha tisre ne to Sali puri zindagi hi dav pe laga rakhi hai. Sali itani musibat kam thi ki upar se Sali rand tu tere bachche ko lekar yaha aa gayi. Vahi mar jati na kahi, mere sir par var karne kyu aayi yaha ?’’

Ab Vikram hosh kho ke yuhi anap sanap bake ja raha tha.

Lekin use malum nahi tha ki jo akhari shabd usne bole usme Kishorilal ne kuchh pakad liya tha ki ek jina haram karnewala Bansi hai, dusra emotional blackmail karnevala vo khud yani Kishorilal hai, lekin ye tisra kaun hai jisne Vikram ki sari zindagi dav pe laga di hai ?????

Krishna roye ja rahi thi aur udhar Bansi aur Rajeshvaridevi ki ankho me bhi Krishna ke is hal par rona aa raha tha. Lekin ek Kishorilal adag tha aur usne dhire svar me kaha,’’Aaj Andar ke shayatan Vikram ko bahar aa jane do to hi kal ek naye Vikram ka janm hoga aur sabkuchh sahi hoga.’’

Krishna rote huye thodi shant huyi ki apne pairo par khadi huyi aur usne dekha ki Vikram ke hatho se thoda khun bah raha hai vo turant daud kar vaha gayi aur Vikram ki hatheli apne muh me le li aur chusne lagi. Vikram ne ek hi zatke me use dur dhakka diya aur Krishna sofe par gir gayi. Ab Vikram ka dhyan apne khun par gaya lekin uska gussa ab bhi vaisa hi tha aur usne sulagati ankho se Krishna ko dekha.

Krishna boli,’’Vikrambabu aap ko khun nikal aya hai.’’

‘’Salo tum logo ki vajah se ek din mera sara khoon nikal ayega aur tabhi tumlogo ko shanti milegi.’’ Vikram ke svar me ab kharash aa chuki thi.

 
Krishna fir khadi huyi aur hath jod ke Vikram se mafi mangi,’’Vikrambabu muje kuchh nahi chahiye. Maine pehle bhi aap ko bata diya tha ki mai aap ko badnam karne nahi ayi. Mai manti hu ki maine hi bhul ki thi us din. Isiliye mai apna bachcha lekar yaha se chali jati hu. Aap ke dost ko bhi mai mana lungi. Lekin mere bhaiya ki koi galati nahi hai. Mere bhaiya devta hai. Use maf kar do Vikram babu. Varna is jindagi me mere bhaiya ko aap ke sahare ke siva aur koi nahi hai. Main aap ko vachan deti hu ki kabhi yaha nahi aaungi aur apna muh aap ko to kya apne bhaiya tak ko bhi kabhi nahi dikhaungi. Lekin mere bhaiya ko maf kardo aur use apna lo bas yehi meri binati hai aap se.’’

Vikram ne gusse se apna muh fer liya aur uski ankho se gusse aur lachari se pani nikal aya tha. Krishna ne dhire se diwankhane se bahar jane ki koshish ki

Tabhi ek awaz ayi,’’Thehro Krishna.’’

Us awaz me itana dam tha ki Krishna ke kadam apne aap hi ruk gaye. Ek tapasvini ki tarah dikh rahi thi Rajeshvaridevi aur apne pati ke samne ek bar dekhkar vo niche utar ayi aur Vikram ke samne khadi reh gayi aur Vikram uski najaro ka samna nahi kar paya kyuki Rajeshvaridevi ki ankho se angare baras rahe the. Chand min ke bad vo boli:

“Krishna tu kahi nahi jayegi lekin mere pas rahegi. Junagarh me, ham sath milkar dono bachcho ko bade karenge. Ek baap apna farz jarur bhul sakta hai, lekin ek ma kabhi bhi apne bachche ke liye farz nahi bhul sakti. Mai teri himmat ko salam karti hu ki itana sun ne ke bad bhi tuj me zinda rehne ki taqat hai, varna itana sunte hi teri jagah koi aur hoti to kab ki mar jati.’’ Rajeshvaridevi ki vani aag baras rahi thi.

Vikram, Krishna aur Bansi to kya khud Kishorilal stabdh tha kyuki Rajeshvaridevi ka ye swaroop usne bhi kabhi nahi dekha tha. Jaise koi devi prakat ho ke garjana kar rahi ho vaisa dikh raha tha.

Vikram stabdh ho ke Rajeshvari ka ye naya avtaar dekh raha tha. Rajeshvaridevi age badhi aur Krishna ka hath pakad ke andar le ayi aur fir Vikram ke samne

boli,’’Vikrambhaiya ek bat sun lo agar aap ke dost hi aap ke dushman hai to zindagi me aap ki barbadi bahut jaldi hi aa rahi hai. Ye bat isiliye nahi kar rahi hu ki vo agreement me aap ke dost aur mere pati ka nam hai, lekin parmatma kabhi bhi atyachar karne valo par reham nahi karta. Dusra agar aaj aapne apni honewali biwi aur bachche ko gali dekar aur dhakka dekar nikal diya to ye mat samajiye ki aap ke pap par parda gir jayega. Kal ye hi bachcha bada hokar aap ke samne apne ma ke sath huye atyacharo ka hisab puchchane khada ho jayega. Ha itana to ham log jarur koshish karenge ki bachche ko aise sanskar denge ki vo aap se haq mangane yaha nahi ayega. Lekin badle me aap kabhi bhi uska muh nahi dekh payenge aur zindagibhar apne aap ko koste rahoge.’’

Ek… Ek … shabd jaise kaman se chhuta huva tir tha aur vaha khade sab ki chhati ke aarpar utarata ja raha tha. Vikram ka gussa to thik lekin Rajeshvaridevi ki ankhe dekhkar hi uski ankhe fati ja rahi thi. Gala bilkul sukh gaya tha aur sanse bilkul tut rahi thi. Pasine se tarbatar chehra aur sharir bilkul thanda pad chuka tha. Do do deviyo ke var pad chuke the aaj us par. Sirf itana hi sun ne ke bad vo najdik ke sofe par dhabb se baith gaya aur idhar udhar dekhane laga. Uski ankhe uske control me nahi thi aur lagatar ansu ki dhara bah rahi thi.

Aur koi age bole uske pehle dono bahche ke rone ki awaz upar se ayi aur Rajeshvaridevi aur Krishna upar usko lene ke liye daud padi.

Sab log ki najare upar hi thi lekin Vikram ki nahar nichi thi, uski samaj me nahi aa raha tha ki is waqt vo kya kare? Vo bilkul apne aap me nahi tha aur achanak Rajeshvaridevi ke hamle se jaise ek sainik par var huva tha aur vo ghav itana gehra tha ki us sadme se bahar ane me time jarur lagnewala tha. Lekin akhir ye sab pyade the kismet ke mare. Sab se badi parmatma ki jadugari hoti hai, jisne apni jadugari se Vikram ki god me ek bachcha to dal hi diya tha. Lekin sath me kai musibate bhi likhi thi. Ek pamar manushya kya samaj sakta hai vidhata ki gehri chal ko ki age kya likha hai………………

kramashah.

 
किस्मत का खेल पार्ट --25

गतान्क से आगे.......

थोड़ी देर के बाद राजेश्वरिदेवी और कृष्णा दोनो अपने अपने बच्चे को लेकर नीचे आई. विक्रम का पहली बार ध्यान बच्चे पर गया. वो देखता ही रह गया. मछली (फिश) जैसे आकर की दो छ्होटी छ्होटी नीली नीली आँखे और गालो मे खंजन, विदेसि हवा बच्चे को भी लग चुकी थी. युरोपियन चाइल्ड जैसा एक मासूम चेहरा था. थोड़ी देर दोनो बच्चे को शांत करने मे गयी.

फिर किशोरीलाल आगे आया और उसने विक्रम को कहा,’’ विक्रम इस बच्चे की तरफ देख, मान लो हमारे साथ कृष्णा आई भी और रही भी लेकिन इस बच्चे का क्या दोष, ये तो अपने बाप के प्यार से वंचित रह जाएगा ना. बड़ा होकर पुछेगा की मेरे पिता कौन है, हम लोग क्या जवाब देंगे. कृष्णा क्या कहेगी की उसका जन्म उसके बाप की ज़िद से हुवा है. बड़ा हो के क्या पाएगा जब उसको बाप का प्यार ही नही मिला तो. तू खुद जानता है कि अगर एक पिता के पास टाइम ना हो तो क्या गुजरती है हम पर. तू खुद यही हादसे का शिकार है. तू तो अपने बाप को कम से कम देख तो पाता था, ये बच्चा तो कभी बाप को जान ही नही पाएगा. सोच तेरी मानसिक हालत ऐसी है तो ये बच्चा ना जाने क्या करेगा.’’

इतना कहकर किशोरीलाल ने बच्चे को उठा लिया, बच्चा फिर से अंजान पुरुष का हाथ जान गया और रोने लगा. विक्रम की नज़र उस बच्चे पर ही टिकी हुई थी.

किशोरीलाल ने बच्चे का मूह उसकी तरफ किया. बच्चे की नज़र विक्रम पर पड़ी. वो रोना छ्चोड़कर विक्रम को देखने लगा. दोनो की नज़र एक हुई. किशोरीलाल ने कहा,’’देख ले इस मासूम को और बोल दे कि ये तेरा खून नही है, विकी तेरी कसम हम लोग तेरी ज़िंदगी से चले जाएँगे. मैं वादा करता हू कि अगर आज तूने इसे नही अपनाया तो मैं ज़िंदगीभर तेरे जीवन मे तो क्या तेरा मूह भी नही देखने आउन्गा.’’

फिर भी विक्रम चुप रहा और लगातार उस बच्चे को देख रहा था. आख़िर राजेश्वरिदेवी आगे आई और जय को किशोरीलाल को दिया और कृष्णा के बच्चे को गोद मे उठाकर बोली,’’ठीक है आज से कृष्णा और मैं हम दोनो इसकी मा है और आप इसके बाप है, ये लावारिश नही आज से हमारी संतान है. मैं इसे संस्कार दूँगी और ज़िंदगीभर यहा आने नही दूँगी. चलो कृष्णा मेरे साथ चलो, यहा तुम्हारी और तुम्हारे बच्चे की सुन ने वाला कोई नही है. और बंसी भाई अप भी चलो यहा से. कोई ज़रूरत नही यहा नौकरी करने की.’’

किशोरीलाल भी जय को उठाकर बंसी का हाथ पकड़कर उसे बाहर ले जाते हुए बोला,’’चल बंसी आज विकी को दोस्ती और रिस्तेदारी से हम्दोनो मुक्त कर दे, चलते है विकी, हमे माफ़ कर देना अगर हमने तेरी ज़िंदगी मे कोई दखल दी हो तो, आज से ना ही तो बंसी तेरी रिपोर्ट करेगा और ना ही तो तुझे अपनी दौलत के लिए किसी के पास हाथ फैलाना पड़ेगा. लेकिन एक बात हमेशा याद रखना दोस्त, दौलत कभी भी तुझे संभलने नही देगी. तू इस दौलत सहारे कभी ज़िंदगी पार नही कर पाएगा और अगर उस बाबा की वाणी मे सच्चाई है तो मेरा बेटा ज़रूर तेरी कोई ना कोई बेटी से विवाह ज़रूर करेगा. मुझे परमात्मा की शक्तियो पे अटूट विश्वास है.’’

इतना कहकर सब के कदम बाहर की ओर जाने लगे.

अचानक राजेश्वरिदेवी के हाथो को धक्का लगा और बच्चा विक्रम के हाथ मे था. विक्रम की आँखो से आँसुओ की धारा बहती दिखाई दी और विक्रम लगातार बच्चे को देखता जा रहा था. राजेश्वरिदेवी ने कुच्छ बोलने की कोशिश की, लेकिन किशोरीलाल ने उसका मूह अपने हाथो से बंद किया और दूसरे हाथ से चुप रहने का इशारा किया.

बच्चा बिल्कुल चुप था और विक्रम की ओर लगातार देख रहा था. दो साल के बच्चे ने अपने गोरे गोरे हाथो से विक्रम की आँखो से बहते हुए पानी को च्छुआ और मुस्कुराया. मुस्कुराने से उसके गालो के खंजन और गहरे हुए और स्माइलिंग फेस देखकर विक्रम ने उसे गले लगा लिया और आँखे बंद हुई और आँखो से आसुओ की धारा बहने लगी. बच्चा भी विक्रम से लिपट गया, मानो के जैसे बेसहारा को सहारा मिल गया. विक्रम का हाथ अपने आप ही बच्चे की पीठ पर फिराने लगा और बच्चा लिपट चुका था. कृष्णा और बंसी देखते ही रह गये. राजेश्वरिदेवी ने किशोरीलाल को देखा और किशोरीलाल ने राजेश्वरिदेवी को, दोनो की आँखो मे पानी उतर आया था लेकिन चेहरे पे मुस्कुराहट थी और बंसी की आँखो ने भी बहना शुरू कर दिया.

लेकिन कृष्णा पहले तो देखती रह गयी. लेकिन कुच्छ वक़्त के बाद वो खुल्ले मन से रो पड़ी. राजेश्वरिदेवी ने उसे सहारा देना चाहा. लेकिन आज बहुत सालो की तपस्या पूरी हो रही थी.
 
और दोस्तो एक बात को आप भी मानते ही होंगे की जिस चाह को आप ने ज़िंदगीभर अपना सपना बनाया है और इस सपने को पूरा करने मे आप ने अपनी ज़िंदगी दाव पे लगाई होती है और वो आप को अचानक आसानी से या मुश्किल से मिल जाता है उसी वक़्त आप की ज़िंदगी की सारी हिम्मत एकसाथ टूट जाती है. हमारे बॉडी का रिक्षन ऐसा हो जाता है जैसे एक लाश पड़ी हो. हम थोड़ी देर के लिए बेजान से हो जाते है.

ऐसा इसीलिए होता है कि ज़िंदगी मे कुच्छ और चाह ही बाकी नही रहती. अगर कोई साधु संत या ऋषि होते तो उसको इस स्थिति का एहसास होता है और वो निर्मोही होके इस स्थिति को सहन कर जाते है, लेकिन एक सामान्य मनुष्या कभी भी अपनी अचानक मिलती मंज़िल को सहन नही कर पता और या तो वो टूट जाता है, या पागलो जैसी हरकत करने लगता है.

कृष्णा टूट चुकी थी. इतनी भयानक और दर्दनाक ज़िंदगी के बाद उसके बच्चे को विक्रम ने सिर्फ़ गले लगाया था लेकिन फिर भी मानो उसे अपनी मंज़िल मिल गयी थी. शायद वो ज़िंदा ही उसके बच्चे के लिए थी. उसे अब ज़िंदगी का कोई मोह नही था. उसकी कोई चाह बाकी नही रह गयी थी.

राजेश्वरिदेवी ने उसको सहारा देने की कोशिश की लेकिन कृष्णा नीचे अपने घुटनो के सहारे बैठ गयी और गहरी आहे उसके गले से निकल रही थी और मूह से आवाज़ नही निकल रही थी. उसे याद आ रहा था उसका दर्द, जो विक्रम ने उसे फर्स्ट इंटरकोर्स के वक़्त दिया था. 3 दिन तो दर्द ही नही गया था. उसकी योनि की अंदर की दीवारो के चिथड़े उड़ा रखे थे विक्रम ने, दर्द तो ऐसा था की कब विक्रम ने अपना कार्य पूरा किया उसके पहले वो बेहोश हो चुकी थी. विक्रम ने उसकी बेहोशी मे भी उसको नही छ्चोड़ा था. वो तो बाद मे उस नौकर की बेटी जब हॉस्पिटल मे उसे मिलने आई, उसने बात बताई थी की विक्रम को तो बेहोशी की हालत मे वाहा से निकाला गया था और कृष्णा को वाहा से नंगी हालत मे रूम से दूसरे रूम मे ले जाया जा रहा था, उस वक़्त खून टपकता था. शायद कोई नस टूट चुकी थी. क्यूकी बच्चे के जन्म के टाइम भी बहुत मुस्किल से डेलिवरी हुई थी. लेकिन दोनो टाइम कृष्णा को शायद भगवान ने बचा लिया था. उपर से बच्चे को कहा ले जाया जाए ये सोच सोच के दो साल मुश्किल से बिताए थे उसने.

आज ये सब सोचकर वो निहाल हो चुकी थी. बड़ी मुश्किल से राजेश्वरिदेवी ने उसे उठाया और अपने गले लगाया. करीब 10 मिनट से कोई कुच्छ नही बोला था. सिर्फ़ कृष्णा के गले से आहे निकली जा रही थी जिस पर उनका कोई कंट्रोल नही था. उसकी आँखे लाल हो चुकी थी, इतना आँसू वो पिच्छाले 10 मिनट मे बहा चुकी थी.

आख़िर राजेश्वरिदेवी बोली, ”बस कर कृष्णा देख तेरे बच्चे को बाप मिल गया है. अब क्यू रो रही है.”

“ई..से बे…हा…ने द..ओ भा……..भी, बा…..हूट सा….हा है मा….इने. तक……. छू…की हू मा….ई. अब …………… मु...जे कू….छ्च नही………… छा…..हिए.’’ कृष्णा अभी भी बोल नही पा रही थी.

राजेश्वरिदेवी ने बंसी को इशारा किया और बंसी ने अपनी बेहन को बाँहो मे भर लिया. विक्रम के सामने वो कुच्छ नही बोल पाया. लेकिन कृष्णा अब बंसी से लिपटकर आहे ले रही थी.

विक्रम अब बच्चे को हाथ मे उठाए कृष्णा की हालत देख रहा था और वो धीरे धीरे कृष्णा के पास आया और अपना हाथ कृष्णा के कंधो पर रखा. कृष्णा ने वही पड़े आँखे उठाकर विक्रम के सामने देखा और आहे भरते हुए नज़रे मिलाई. बड़ी बड़ी आँखे शराबी की तरह लाल हो चुकी थी. विक्रम ने कृष्णा को खिचना चाहा. लेकिन कृष्णा का शरीर बंसी की छाती से हटा नही पाया तो विक्रम ने एक हाथ उसके कंधे को मजबूती से पकड़ कर अपनी ओर किया और कृष्णा को ज़बरदस्ती अपनी छाती से लगा दिया. अब कृष्णा का रहा सहा भी बाँध टूट पड़ा और वो खुल्ले मन से रोने लगी. लगातार कुच्छ वक़्त तक उसकी बड़ी बड़ी रोने की आवाज़ उस दिवानखाने मे गूँजती रही. अब राजेश्वरिदेवी की आँखो से भी आँसू निकल आए थे. एक स्थीतप्रज्ञा अवस्था मे किशोरीलाल ही खड़ा था. कृष्णा ने अपना मूह विक्रम की छाती मे छुपाकर उसे मजबूती से लिपटकर रोना शुरू कर दिया था. विक्रम उसकी पीठ को सहलाता रहा और उसकी आँखो से भी लगातार आँसू निकल रहे थे. बंसी भी रोने लगा था और बच्चा ये सब देखकर रोने लगा और साथ मे जय ने भी आवाज़ निकालनी शुरू कर दी.

पूरे महॉल मे खुशी और गम बहने लगे थे. ये कुदरत की ऐसी लीला थी जिसका कोई मोल नही. शायद कुदरत ने यही सोचा था कि बाप बेटे का संगम 2 साल के बाद हो. किशोरीलाल सोच रहा था कि विक्रम की ज़िंदगी का एक नया अध्याय आज शुरू हो रहा है. अब कौन से अध्याय को अच्छा करना बाकी रह गया है. शायद अब विक्रम और कृष्णा की शादी को कोई नही रोक सकता और अगर कृष्णा विक्रम की पत्नी बनकर आती है तो विक्रम का सुधारना निश्चित है. इसीलिए किशोरीलाल ने मन ही मन मे परमात्मा का आभार प्रकट किया और शायद उसका जोधपुर मे आना सफल हो चुका था और कम भी संपूर्णा हो चुका था. वो सोच रहा था कि जल्द ही जल्द विक्रम की शादी करा के वो यहा से निकल जाए और जल्द ही जल्द विक्रम को उस अग्रीमेंट से मुक्त कर दे और आगे की ज़िंदगी मे कोई तूफान ना आए और नेक्स्ट जेनरेशन के लिए तैयार हो जाए. शायद वाहा खड़े हुए बंसी और राजेश्वरिदेवी भी सुकून की साँसे ले रहे थे कि अब कोई ख़तरा, कोई मुश्किले बाकी नही रह गयी.

स्वस्थ होने के बाद सब वाहा बैठ गये. विक्रम को मूह से माफी माँगने की कोई ज़रूरत नही थी. हा उसने कृष्णा को चूमा और सिर्फ़ इतना बोला,”कृष्णा आज से तू और मेरा बच्चा इस हवेली पे राज करोगे और मेरे बेटे के बंसी मामा यही हमारे साथ हमारी जीवन की रोनक बने रहेंगे. मैं सुनंदा को चाहता था इसीलिए तेरे प्यार को ठुकराया था. लेकिन आज सुनंदा भी नही है और मेरे हाथो तेरी और बर्बादी मैं होने नही दूँगा. मैं तेरे प्यार को स्वीकार करता हू, क्या तू मेरे खाली दिल को अपने प्यार से भरेगी?’’

बस कृष्णा को हा कहने की कोई ज़रूरत नही थी. वो सिर्फ़ रोती रही और विक्रम हाथ फिराता रहा. फिर सभी ने मिलकर दोनो बच्चो को शांत किया. एक लड़की को पति और एक बच्चे को अपना बाप मिल चुका था.

लेकिन किसी को ये पता नही था कि विक्रम और कृष्णा को एक होने से पहले कौन सी आँधी आनेवाली है जो विक्रम-कृष्णा और किशोरीलाल-राजेश्वरिदेवी ये दोनो जोडियो के जीवन मे आँधी-तूफान की तरह लपेट मे लेनेवाली है.

थोड़ी ही देर मे अट्मॉस्फियर शांत हो चुका था. सब ने साथ मिलकर दोपहर का खाना 4 बजे खाया, कृष्णा की हालत खाने जैसी भी नही रही थी. वो खड़ी भी नही हो पा रही थी. एक ही दिन मे शायद उसके पैर डगमगाने लगे थे. वो बच्चे को गोद मे लिए बैठी थी. दोनो बच्चे फिर से थक के सो चुके थे. किशोरीलाल ने खाने के बाद दिवानखाने मे सब बैठे हुए थे वाहा बात छेड़ी:

किशोरीलाल,”विकी यहा आए हुए हमे 5 दिन हो चुके है. अब हमे यहा से जाना होगा. अगर तू जल्द ही शादी करेगा तो हमे यहा वापस भी तो ज़रूर आना होगा. तो कल सुबह की ट्रेन से हम वापस जा रहे है.”

विक्रम,’’क्प यार अभी अभी तो मेरी ज़िंदगी सवार रही है, यार मेरी खुशी मे सरीक नही होंगे क्या ?’’

राजेश्वरिदेवी,’’विक्रम भाई, हमारी जूनागढ़ मे भी कुच्छ ज़िम्मेदारिया है, बस मेहमान बन के आए थे और मेहमानो को कुच्छ समय के बाद ज़रूर वापस जाना चाहिए. वैसे भी थोड़ा वक़्त अगर कृष्णा के साथ आप गुजारो, उसे आप की सख़्त ज़रूरत है और फिर हम लोग शादी मे ज़रूर वापस आएँगे.’’

विक्रम,’’क्या भाभी अभी तो ठीक से मैने अपने दामाद को देखा तक नही.’’

राजेश्वरिदेवी और किशोरीलाल एकदुसरे के सामने देखने लगे और फिर किशोरीलाल खड़ा हुवा,’’विकी सच मे क्या ये रिश्ता तुझे मंजूर है?’’

विक्रम कुच्छ नही बोला और चुप चाप बैठा रहा. किशोरीलाल थोड़ी देर सब के चेहरे को देखता रहा और फिर पुछा,’’विकी क्या तू मज़ाक कर रहा है या फिर अभी अभी जो तूने कहा वो सच था?’’

‘’अरे सच है भाई केपी मुझे ये रिश्ता मंजूर है आ गले लग जा मेरे दोस्त. तू ही तो है जो मेरी ज़िंदगी बना रहा है दोस्त.’’विक्रम ने खड़ा होकर हाथ फैलाया.

दोनो दोस्तो गले मिल गये सब ने ताली बजकर इस नये रिश्ते का स्वागत किया. एक कृष्णा सिर्फ़ ऐसे ही बैठी रही. उसे कुच्छ पल्ले नही पड़ रहा था कि कौन सा नया रिश्ता बन रहा है और क्यू ये लोग गले मिल रहे है?

इसकी एक वजह थी कि अभी कुच्छ ही घंटे पहले जो गिर्नरवाले बाबा की कहानी उसे बताई गयी थी वो कहानी वो भूल चुकी थी. एक तो आज ही उसे नयी ज़िंदगी मिल रही थी तो वो सबकुच्छ भूल चुकी थी. इसीलिए उसके पल्ले कुच्छ नही पड़ रहा था. उसका ये चेहरा देखकर विक्रम ने उस की ओर देखा और वो समझ गया की कृष्णा के पल्ले कुच्छ नही पड़ रहा है तो उसने सब से पहले बहाना बताकर बंसी को किचन मे रवाना किया और फिर किशोरीलाल के कान मे पुचछा,”यार तूने कृष्णा को वो गिर्नरवाले बाबा की कहानी बताई है क्या?”

किशोरीलाल ने हा बोला तो विक्रम खुश हो गया और फिर बोला,”हा तो फिर आज से जय मेरा दामाद लेकिन एक प्राब्लम है?’’

राजेश्वरिदेवी ने पुचछा,”अब क्या प्राब्लम है विक्रम भाई?’’

विक्रम ने कहा पहले कृष्णा को याद तो दिलाओ वो गिर्नरवाले बाबा की कहानी.

राजेश्वरिदेवी ने कृष्णा को याद दिलाया तो तुरंत उसको याद आ गया और वो आकाश की ओर देखते हुए बोले,’’शायद भगवान का चमत्कार है भाभी.’’

क्रमशः..............
 
किस्मत का खेल पार्ट --25

गतान्क से आगे.......

Thodi der ke bad Rajeshwaridevi aur Krishna dono apne apne bachche ko lekar niche ayi. Vikram ka pehli bar dhyan bachche par gaya. Vo dekhata hi rah gaya. Machhali (Fish) jaise aakar ki do chhoti chhoti nili nili ankhe aur galo me khanjan, videsi hava bachche ko bhi lag chuki thi. European child jaisa ek masum chehra tha. Thodi der dono bachche ko shant karne me gayi.

Fir Kishorilal age aya aur usne Vikram ko kaha,’’ Vikram is bachche ki taraf dekh, man lo hamare sath Krishna ayi bhi aur rahi bhi lekin is bachche ka kya dosh, ye to apne bap ke pyar se vanchit rah jayega na. Bada hokar puchhega ki mere pita kaun hai, ham log kya jawab denge. Krishna kya kahegi ki uska janm uske bap ki jid se huva hai. Bada ho ke kya payega jab usko bap ka pyar hi nahi mila to. Tu khud janta hai ki agar ek pita ke pas time na ho to kya gujarati hai ham par. Tu khud yehi hadse ka shikar hai. Tu to apne bap ko kam se kam dekh to pata tha, ye bachcha to kabhi bap ko jan hi nahi payega. Soch teri mansik halat aisi hai to ye bachcha na jane kya karega.’’

Itana kehkar Kishorilal ne bachche ko utha liya, bachcha fir se anjan purush ka hath jan gaya aur rone laga. Vikram ki najar us bahche par hi tiki huyi thi.

Kishorilal ne bachche ka muh uski taraf kiya. Bachche ki najar Vikram par padi. Vo rona chhodkar Vikram ko dekhane laga. Dono ki najar ek huyi. Kishorilal ne kaha,’’Dekh le is masum ko aur bol de ki ye tera khoon nahi hai, Vicky teri kasam ham log teri zindagi se chale jayenge. Mai vada karta hu ki agar aaj tune ise nahi apanaya to mai zindagibhar tere jivan me to kya tera muh bhi nahi dekhane aunga.’’

Fir bhi Vikram chup raha aur lagatar us bachche ko dekh raha tha. Akhir Rajeshvaridevi age ayi aur Jay ko Kishorilal ko diya aur Krishna ke bachche ko god me uthakar boli,’’Thik hai aaj se Krishna aur mai ham dono iski ma hai aur aap iske bap hai, ye lavarish nahi aaj se hamara santan hai. Mai ise sanskar dungi aur zindagibhar yaha ane nahi dungi. Chalo Krishna mere sath chalo, yaha tumhari aur tumhare bachche ki sun ne wala koi nahi hai. Aur Bansibhaiya app bhi chalo yaha se. Koi jarurat nahi yaha naukari karne ki.’’

Kishorilal bhi Jay ko uthakar Bansi ka hath pakadkar use bahar le jate huye bola,’’Chal Bansi aaj Vicky ko dosti aur ristedari se hamdono mukt kar de, chalte hai Vicky, hame maf kar dena agar hamne teri zindagi me koi dakhal di ho to, aaj se na hi to Bansi teri report karega aur na hi to tuje apani daulat ke liye kisi ke pas hath failana padega. Lekin ek bat hamesha yad rakhana dost, daulat kabhi bhi tuje sambhalane nahi degi. Tu is daulat sahare kabhi zindagi par nahi kar payega aur agar us baba ki vani me sachchai hai to mera beta jarur teri koi na koi beti se vivah jarur karega. Muje parmatma ki shaktiyo pe atut vishvas hai.’’

Itana kehkar sab ke kadam bahar ki aur jane lage.

Achanak Rajeshvaridevi ke hatho ko dhakka laga aur bachcha Vikram ke hath me tha. Vikram ki ankho se ansuo ki dhara behti dikhai di aur Vikram lagatar bachche ko dekhata ja raha tha. Rajeshvaridevi ne kuchh bolne ki koshish ki, lekin Kishorilal ne uska muh apne hatho se bandh kiya aur dusre hath se chup rehne ka ishara kiya.

Bachcha bilkul chup tha aur Vikram ki or lagatar dekh raha tha. Do sal ke bachche ne apne gore gore hatho se Vikram ki ankho se behte huye pani ko chhua aur muskuraya. Muskurane se uske galo ke khanjan aur gehre huye aur smiling face dekhkar Vikram ne use gale laga liya aur ankhe bandh huyi aur ankho se aasuo ki dhara behne lagi. Bachcha bhi Vikram se lipat gaya, mano ke jaise besahara ko sahara mil gaya. Vikram ka hath apne aap hi bachche ki pith par firne laga aur bachcha lipat chuka tha. Krishna aur Bansi dekhate hi rah gaye. Rajeshvaridevi ne Kishorilal ko dekha aur Kishorilal ne Rajeshvaridevi ko, dono ki ankho me pani utar aya tha lekin chehre pe muskurahat thi aur Bansi ki ankho ne bhi behna shuru kar diya.

Lekin Krishna pehle to dekhati rah gayi. Lekin kuchh waqt ke bad vo khulle man se ro padi. Rajeshvaridevi ne use sahara dena chaha. Lekin aaj bahut salo ki tapasya puri ho rahi thi.

Aur dosto ek bat ko aap bhi mante hi honge ki jis chah ko aap ne zindagibhar apana sapana banaya hai aur is sapane ko pura karne me aap ne apani zindagi dav pe lagayi hoti hai aur vo aap ko achanak asani se ya mushkil se mil jata hai usi waqt aap ki zindagi ki sari himmat eksath tut jati hai. Hamare body ka reaction aisa ho jata hai jaise ek lash padi ho. Ham thodi der ke liye bejan se ho jate hai.

Aisa isiliye hota hai ki zindagi me kuchh aur chah hi baki nahi rahati. Agar koi sadhu sant ya rushimuni hote to usko is sthiti ka ehasas hota hai aur vo nirmohi hoke is sthiti ko sahan kar jate hai, lekin ek samanya manushya kabhi bhi apani achanak milti manzil ko sahan nahi kar pata aur ya to vo tut jata hai, ya pagalo jaisi harkat karne lagta hai.

Krishna tut chuki thi. Itani bhayanak aur dardnak zindagi ke bad uske bachche ko Vikram ne sirf gele lagaya tha lekin fir bhi mano use apani manzil mil gayi thi. Shayad vo zinda hi uske bahche ke liye thi. Use ab zindagi ka koi moh nahi tha. Uski koi chah baki nahi rah gayi thi.

Rajeshvaridevi ne usko sahara dene ki koshish ki lekin Krishna niche apne knee ke sahare baith gayi aur gehri ahe uske gale se nikal rahi thi aur muh se awaz nahi nikal rahi thi. Use yad aa raha tha uska dard, jo Vikram ne use first intercourse ke waqt diya tha. 3 din to dard hi nahi gaya tha. Uski yoni ki andar ki diwaro ke chithade uda rakhe the Vikram ne, dard to aisa tha ki kab Vikram ne apana karya pura kiya uske pehle vo behosh ho chuki thi. Vikram ne uski behoshi me bhi usko nahi chhoda tha. Vo to bad me us naukar ki beti jab hospital me use milne ayi, usne bat batayi thi ki Vikram ko to behoshi ki halat me vaha se nikala gaya tha aur Krishna ko vaha se nangi halat me room se dusre room me le jaya ja raha tha, us waqt khoon tapakata tha. Shayad koi vain tut chuki thi. Kyuki bachche ke janm ke time bhi bahut muskhil se delivery huyi thi. Lekin dono time Krishna ko shayad bhagwan ne bacha liya tha. Upar se bachche ko kaha le jaya jaye ye soch soch ke do saal mushkil se bitaye the usne.

Aaj ye sab sochkar vo nihal ho chuki thi. Badi mushkil se Rajeshvaridevi ne use uthaya aur apne gale lagaya. Karib 10 min se koi kuchh nahi bola tha. Sirf Krishna ke gale se ahe nikali ja rahi thi jis par unka koi control nahi tha. Uski ankhe lal ho chuki thi, itana ansu vo pichhale 10 min me baha chuki thi.

Akhir Rajeshvaridevi boli, ”Bas kar Krishna dekh tere bachche ko bap mil gaya hai. Ab kyu ro rahi hai.”

“I..se be…ha…ne d..o bha……..bhi, ba…..hut sa….ha hai ma….ine. Thak……. Chu…ki hu ma….i. Ab …………… mu...je ku….chh nahi………… cha…..hiye.’’ Krishna abhi bhi bol nahi pa rahi thi.

Rajeshvaridevi ne Bansi ko ishara kiya aur Bansi ne apani behan ko baho me bhar liya. Vikram ke samne vo kuchh nahi bol paya. Lekin Krishna ab Bansi ko lipatkar ahe le rahi thi.
 
Vikram ab bachche ko hath me uthaye Krishna ki halat dekh raha tha aur vo dhire dhire Krishna ke pas aya aur apana hath Krishna ke kandho par rakha. Krishna ne vahi pade ankhe uthakar Virkam ke samne dekha aur ahe bharate huye najare milayi. Badi badi ankhe sharabi ki tarah lal ho chuki thi. Vikram ne Krishna ko khichana chaha. Lekin Krishna ka sharir Bansi ki chhati se hata nahi paya to Vikram ne ek hath uske kandhe ko majbuti se pakad kar apani or kiya aur Krishna ko jabardasti apani chhati se laga diya. Ab Krishna ka raha saha bhi bandh tut pada aur vo khulle man se rone lagi. Lagatar kuchh waqt tak uski badi badi rone ki awaz us diwankhand me gunjati rahi. Ab Rajeshvaridevi ki ankho se bhi ansu nikal aye the. Ek sthitpragnya avastha me Kishorilal hi khada tha. Krishna ne apana muh Vikram ki chhati me chupakar use majbooti se lipatkar rona shuru kar diya tha. Vikram uski pith ko sahlata raha aur uski ankho se bhi lagatar ansu nikal rahe the. Bansi bhi rone laga tha aur bachcha ye sab dekhkar rone laga aur sath me Jay ne bhi awaz nikalani shuru kar di.

Pure mahol me khushi aur gam behne lage the. Ye kudarat ki aisi lila thi jiska koi mol nahi. Shayad kudarat ne yehi socha tha ki bap bete ka sangam 2 sal ke bad ho. Kishorilal soch raha tha ki Vikram ki zindagi ka ek naya adhyay aaj shuru ho raha hai. Ab kaun se adhyay ko achcha karna baki rah gaya hai. Shayad ab Virkam aur Krishna ki shadi ko koi nahi rok sakta aur agar Krishna Vikram ki patni bankar aati hai to Vikram ka sudharana nishchit hai. Isiliye Kishorilal ne man hi man me parmatma ka abhar prakat kiya aur shayad uska Jodhpur me ana safal ho chuka tha aur kam bhi sampurna ho chuka tha. Vo soch raha tha ki jald hi jald Vikram ki shadi kara ke vo yaha se nikal jaye aur jald hi jald Vikram ko us agreement se mukt kar de aur age ki zindagi me koi toofan na aye aur next generation ke liye taiyar ho jaye. Shayad vaha khade huye Bansi aur Rajeshvaridevi bhi sukun ki sanse le rahe the ki ab koi khatara, koi mushkile baki nahi rah gayi.

Swasth hone ke bad sab vaha baith Gaye. Vikram ko muh se mafi mangane ki koi jarurat nahi thi. Ha usne Krishna ko chuma aur sirf itana bola,”Krishna aaj se tu aur mera bachcha is haveli pe raj karoge aur mere bete ke Bansimama yahi hamare sath hamari jivan ki ronak bane rahenge. Main sunanda ko chahta tha isiliye tere pyar ko thukaraya tha. Lekin aaj Sunanda bhi nahi hai aur mere hatho teri aur barbadi mai hone nahi dunga. Mai tere pyar ko svikar karta hu, kya tu mere khali dil ko apane pyar se bharegi?’’

Bas Krishna ko ha kehne ki koi jarurat nahi thi. Vo sirf roti rahi aur Vikram hath firata raha. Fir sabhi ne milkar dono bachche ko shant kiya. Ek ladki ko pati aur ek bachche ko apana bap mil chuka tha.

Lekin kisi ko ye pata nahi tha ki Vikram aur Krishna ko ek hone se pehle kaun si andhi anewali hai jo Vikram-Krishna aur Kishorilal-Rajeshvaridevi ye dono jodiyo ke jivan me andhi-toofan ki tarah lapet me lenewali hai.

Thodi hi der me atmosphere shant ho chuka tha. Sab ne sath milkar dopahar ka khana 4 baje khaya, Krishna ki halat khane jaisi bhi nahi rahi thi. Vo khadi bhi nahi ho pa rahi thi. Ek hi din me shayad uske pair dagmagane lage the. Vo bachche ko god me liye baithi thi. Dono bachche fir se thak ke so chuke the. Kishorilal ne khane ke bad diwankhane me sab baithe huye the vaha bat chhedi:

Kishorilal,”Vicky yaha aye huye hame 5 din ho chuke hai. Ab hame yaha se jana hoga. Agar tu jald hi shadi karega to hame yaha vapas bhi to jarur ana hoga. To kal subah ki train se ham vapas ja rahe hai.”

Vikram,’’KP yar abhi abhi to meri zindagi savar rahi hai, yar meri khushi me sarik nahi honge kya ?’’

Rajeshvaridevi,’’Vikrambhai, hamari Junagadh me bhi kuchh jimmedariya hai, Bas mehman ban ke aye the aur mehmano ko kuchh samay ke bad jarur vapas jana chahiye. Vaise bhi thoda waqt agar Krishna ke sath aap gujaro, use aap ki sakht jarurat hai aur fir ham log shadi me jarur vapas ayenge.’’

Vikram,’’Kya bhabhi abhi to thik se maine apane damad ko dekha tak nahi.’’

Rajeshvaridevi aur Kishorilal ekdusare ke samne dekhane lage aur fir Kishorilal khada huva,’’Vicky sach me kya ye rishta tuje manjur hai?’’

Vikram kuchh nahi bola aur chup chap baitha raha. Kishorilal thodi der sab ke chehre ko dekhata raha aur fir puchha,’’Vicky kya tu majak kar raha hai ya fir abhi abhi jo tune kaha vo sach tha?’’

‘’Are sach hai bhai KP muje ye rishta manjur hai aa gale lag ja mere dost. Tu hi to hai jo meri zindagi bana raha hai dost.’’Vikram ne khada hokar hath failaya.

Dono dosto gale mil gaye sab ne tali bajakar is naye rishte ka swagat kiya. Ek Krishna sirf aise hi baithi rahi. Use kuchh palle nahi pad raha tha ki kaun sa naya rishta ban raha hai aur kyu ye log gale mil rahe hai?

Iski ek vajah thi ki abhi kuchh hi ghantge pehle jo Girnarwale baba ki kahani use batayi gayi thi vo kahani vo bhul chuki thi. Ek to aaj hi use nayi zindagi mil rahi thi to vo sabkuchh bhul chuki thi. Isiliye uske palle kuchh nahi pad raha tha. Uska ye chehra dekhkar Vikram ne us ki or dekha aur vo samaj gaya ki Krishna ke palle kuchh nahi pad raha hai to usne sab se pehle bahana batakar Bansi ko kitchen me ravana kiya aur fir Kishorilal ke kan me puchha,”Yar Tune Krishna ko vo Girnarwale baba ki kahani batayi hai kya?”

Kishorilal ne ha bola to Vikram khush ho gaya aur fir bola,”Ha to fir aaj se Jay mera damad lekin ek problem hai?’’

Rajeshvaridevi ne puchha,”Ab kya problem hai Vikrambhai?’’

Vikram ne kaha pehle Krishna ko yad to dilao vo Girnarvale baba ki kahani.

Rajeshvaridevi ne Krishna ko yad dilaya to turant usko yad aa gaya aur vo akash ki aur dekhate huye bole,’’Shayad bhagwan ka chamatkar hai bhabhi.’’

kramashah..............

 
किस्मत का खेल पार्ट --26

गतान्क से आगे.......

विक्रम तुरंत उसके पास जा के खड़ा हुवा और बोला,”इसका मतलब तू बेटी पैदा करेगी क्या?’’

अचानक ऐसे मीठे हमले से कृष्णा चौक पड़ी और उसको खुदके बच्चे के जन्म के वक़्त जो परेशानी हो रही थी वो याद आ गया और विक्रम के साथ पहला इंटरकोर्स याद आ गया और आँखे मिच गयी. फिर आँखे खोलकर बोली,”क्या?’’

विक्रम उसकी बड़ी बड़ी आँखो मे डर देखकर थोड़ी देर देखता ही रहा और फिर शरारतभरे स्वर मे बोला,”अरे उस गिर्नरवाले कहानी से ये केपी का बेटा जय हमारा दामाद हुवा ना, तो इस नन्हे जय के लिए एक नन्ही सी कन्या तो होनी चाहिए ना तो वो तू देगी या मुझे कही ओर….” इतना कहके उसने बड़े ज़ोर से हसना शुरू किया .

कृष्णा को अब बात समझ मे आई और वो शर्मा के नीचे देखने लगी. लेकिन विक्रम हस्ता ही जा रहा था और आख़िर कृष्णा ने धीमे स्वर मे कहा,”आप के दोस्त का ख़याल तो रखिए वो यहा खड़े है और आप….”

“अरे केपी से क्या शरमाना वो तो सीधी बात है ना जय के लिए एक कन्या तो होनी ही चाहिए ना?’’

अब राजेश्वरिदेवी भी हॅस्कर बीच मे बोली,’’वो देगी विक्रम भाई ज़रूर देगी लेकिन पहले शादी फिर लड़की, क्यू ठीक है कृष्णा?’’

कृष्णा ने इस बार हॅस्कर हा कहा.

“ठीक है” कह कर उसने बंसी को पुकारा और बाद मे गंभीर होकर किशोरीलाल को बोला,’’यार तू रुकता तो अच्छा होता, ठीक है तेरी टिकेट्स कहा है? किस तारीख को ट्रेन है तेरी?’’

किशोरीलाल ने टिकेट निकालकर उसे दी और कहा,”कल सुबह की है. देख.”

विक्रम ने टिकेट्स देखी और बंसी के पास गया और बोला,’’आप मेरे लिए एक काम करोगे?’’

बंसी ने कहा,’’बोलो बाबा ज़रूर करूँगा.’’

‘’ये टिकेट्स कॅन्सल करवा दो प्लीज़.’’ विक्रम ने उसे टिकेट्स दे दी. बंसी वही खड़ा होकर सब को देखने लगा.

किशोरीलाल आर्ग्युमेंट करने लगा लेकिन विक्रम चिल्लाकर बंसी को बोला,”आबे साले जा ना”

इस ग़ाली से फिर सब स्तब्ध हो गये और फिर खामोशी च्छा गयी. सब विक्रम के गुस्से को देखने लगे लेकिन विक्रम बोला,’’अरे मेरी तरफ सब्लोग क्या देख रहे हो मैं परसो कृष्णा से शादी कर रहा हू, कल सगाई कर रहा हू तो ये मेरा साला हुवा ना और अभी अभी आप लोगो ने बताया था कि मेरी शादी मे आपलोग ज़रूर आओगे तो परसो ही शादी है तो रुकना तो होगा ही ना. इसीलिए टिकेट्स कॅन्सल करवा रहा हू अब मेरेबाप बंसी जल्दी जा और इसके पहले ये केपी कुच्छ बोले टिकेट्स कॅन्सल करवा दे जा.’’

बंसी एक युवा आदमी की रफ़्तार से रफूचक्कर हो गया और कृष्णा के आँखो ने फिर पानी बरसाना शुरू किया और किशोरीलाल धब्ब कर के सोफे पे बैठ गया और मस्ती के स्वर मे बोला,’’साले आख़िर तूने हमे रोक ही लिया ना. लेकिन मे जानता हू शादी की जल्दी क्यू तुझ को पड़ी है.’’ इतना कहकर उसने कृष्णा की ओर इशारा किया और बोला,’’इसे थोड़ा आराम करने दे मेरे बाप.’’

‘’आराम हराम है दोस्त, यहा तो चट मँगनी, पट ब्याह और नर्सो ही हनीमून.’’ विक्रम ने फिर कृष्णा को छेड़ा.

सब की हसी छूट गयी.

टिकेट्स कॅन्सल हो गया और शाम को सब लोग सगाई की तैयारी मे लग गये और विक्रम ने खुद फोन मे ही सब को दूसरे दिन इन्वाइट कर लिया और रात के 1 बजे तक तो हवेली का रूप ही बदल दिया गया. केवल चंद घंटो की मेहनत ने पूरी हवेली की रोनक ही पलट दी. कृष्णा को सुला दिया गया था. सब खुश थे. लेकिन विक्रम की मँगनी और शादी को लेकर कल ना जाने क्या होनेवाला था ये शायद कोई नही जानता था ?

दूसरे दिन सुबह से विक्रम की हवेली पर धूम मची हुई थी जो शाम तक चली. बंसी, किशोरीलाल, राजेश्वरिदेवी ने मिलकर सब तैयारी कर डाली और शाम को विक्रम ने जोधपुरी ब्राउन कलर का सूट पहना था और कृष्णा ने आसमानी रंग की बेंगाली सारी पहनी हुई थी. दोनो बच्चे को राजेश्वरिदेवी ने समहाला हुवा था. जोधपुर के खास मेहमआनो की हजारी मे सगाई की विधि संपन्न हुई और सब लोग दावत मे खाना खा रहे थे. विक्रम ने खाने के वक़्त किशोरीलाल का परिचय जोधपुर के खास बड़े लोगो जैसे बड़े बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट, मेयर, कलेक्टर, कमिशनर, हाइयर पोलीस औतॉरिटी, आर्मी के बड़े ऑफिसर्स और उसके साथ नौकरी करनेवाले जवानो से कराया. बाद मे सब खाबे मे पड़ गये.

फिर किशोरीलाल राजेश्वरिदेवी के पास आया और दोनो बच्चे को खाना खिलाया. विक्रम ने बंसी को पहलिबार नौकर नही आदमी समझ कर अच्छे कपड़े पहनकर मेहमानो के स्वागत के लिए सूचित किया था. लेकिन बंसी ने खुद ही सभी व्यवस्था संभाली हुई थी. दोनो बच्चो ने जब खाना खा लिया तो किशोरीलाल फिर विक्रम के पास जाने लगा. लेकिन देखा की कृष्णा अकेली थी तो वो वाहा पास जा के बोला,”विकी कहा गया?’’

‘’जी अभी आता हू कह के 15 मिनट से गायब है, मैं भी पहली बार सब से मिल रही हू और मैं अकेली पड़ रही हू. मैं भी कब का इंतेज़ार कर रही हू, लेकिन ना जाने ये कहा चले गये.’’ कृष्णा ने जवाब दिया.

‘’मैं देखता हू’’ कहकर किशोरीलाल विक्रम को यहा वाहा देखने लगा. पूरा फंक्षन हवेली के बाहर गार्डेन मे रखा गया था. सब लोग मिलकर टोटल 69 लोगो के बीच ये सगाई की विधि संपन्न की गयी थी.

ढूंढते हुए किशोरीलाल हवेली के अंदर गया और दिवानखाने मे आ गया, लेकिन उस वक़्त तो वाहा कोई नही था, लेकिन किशोरीलाल के कानो पर उपर विक्रम के रूम के पिच्छावाड़े से कुच्छ आवाज़ आती सुनाई दी. वो धीरे धीरे विक्रम के रूम तक पहुचा और अंदर झाँका, लेकिन कोई नही था. आवाज़े अब स्पष्ट रूप मे आ रही थी, जिसमे एक आवाज़ तो विक्रम की ही थी और कहा से आ रही थी वो कॉन्सेंट्रेट कर के वो विक्रम के रूम मे आ गया और वाहा से पीछे की बाल्कनी मे आ गया और बाल्कनी का डोर बंद था, लेकिन आवाज़ क्लियर आने लगी तो उसने सोचा कि पहले सुन लू की माजरा क्या है और वो सुन ने लगा.

विक्रम,”देख अभी तू चला जा मैं तुझे ज़रूर मिलूँगा लेकिन पहले ये सब ख़तम होने तो दे.’’

आवाज़,”हम का उल्लू समझ के रखा है का विक्रम बाबू, आज हम चुप रहा तो फिर का मतलब.’’

‘’अरे भाई मेरे पर भरोसा तो रख मुझे कम से कम अपने दोस्त की लाज तो रखने दे भाई.’’ विक्रम.

‘’तो हम आप के दुश्मन है का, देखो विक्रम बाबू दोस्ती का हाथ हमरी ओर से नही उठा था, आप को हमरी ज़रूरत थी, हम का नही.’’ आवाज़,

विक्रम,’’हा वो तो मैं भी जानता हू लेकिन केपी भी तो मेरा दोस्त है.’’

आवास,’’विक्रम बाबू आप के दोस्त को बता दू सब तो दोस्ती एक ही मिनट मे ख़तम बोलो.’’

विक्रम,’’तू मुझे ब्लॅकमेल कर रहा है क्या?’’

आवाज़,’’इसे ब्लॅकमेल समझना है तो यही सही लेकिन आप ने हमरे साथ वादा किया था और हमरी बहिन का, का करे बोलो? उसे कुवे मे फैक दे का.’’

विक्रम,”देख भैया अभी मेरी पोज़िशन ख़तरनाक हो चुकी है. तू मुझे दो दिन दे दे मैं तुझे सबकुच्छ समझा दूँगा. अभी तू यहा से खाना खा और चुपचाप चला जा मैं तुझे मिलने या तो आज रात या परसो रात ज़रूर आउन्गा.’’

आवाज़,’’आज रात अगर नही आए तो ?’’

विक्रम,”अरे तो परसो रात तो आता हू ना.”

आवाज़,’’अपनी सुहाग रात के बाद का?’’

विक्रम,’’अरे तो क्या तुझ से हर बात पूछके किया करू क्या?’’

आवाज़,”हर बात मे हम का टांग आदाते है विक्रमबाबू, लेकिन ए तो हमरी बहिन का सवाल है. आप के इहा का ऐसा होता है कि शादी किसी औउउर से और सुहागरात किसी औउर से का? हमे गंगकिनारे वाला समझ के रखा है का? देखो विक्रमबाबू अगर आज हमरी जीभ खुल गयी तो कही के ना रहोगे. अभी का अभी ये शादी कॅन्सल कराई दो वरना आप जानते है हम का कि हमरी बहिन की इज़्ज़त का कैसा बदला हम ले सकत है.’’
 
विक्रम,”देखो भैया आज तो मेरे बाप को भी कृष्णा से शादी करनी पड़ेगी. तू तो बदला लेने शायद कल आएगा लेकिन आज मैने शादी नही की तो आज ही मरूँगा और साथ मे तू भी मरेगा और ठेंगा रह जाएगा. बात को समझा कर अगर मैं कृष्णा से शादी करता हू तो तेरा या तेरी बहन का क्या नुकसान होगा? ये तो सोच कि अगर मेरी शादी कृष्णा से हो गयी तो कितने लोगो के चेहरे पर खुशी आएगी. और बाद मे तेरा काम तो हो ही जाएगा ना. तू क्यू टेन्षन ले के फिरता है. मैं तुझे धोखा दे रहा हू क्या? क्या मैने तुझे दावत नही दी मेरी शादी की ? अगर मुझे विश्वासघात ही करना होता तो मैं तुझे सामने से इस पार्टी मे बुलाता क्या ? मैं जानता हू कि इस शादी को लेकर तू हंगामा ज़रूर करेगा, फिर भी मैने तुझे दावत दी, क्यू ? जानता है ? अरे बात को समझा कर ये सब मैं हम सब की भलाई के लिए कर रहा हू.’’

आवाज़,’’ठीक है विक्रमबाबू लेकिन हमरी बहिन का क्या बोलो तो ?’’

विक्रम,’’अरे मे शादी कर रहा हू, तेरी बहन को कहा बर्बाद कर रहा हू ? मैने कब कहा कि तेरी बहन से मेरे रिश्ते की छुट्टी. भाई वो भी मेरा ही फ़ैसला था और ये भी मेरा फ़ैसला है.’’

अवज़,’’हमरी समझ मे कच्चू नही आत है बाबू, हम का एक ही बात समझ मे आए हेत की आप हमरी बहिन के साथ विश्वासघात करेत हो और अगर ई बात सच्ची निकली तो हम से बुरा कोई ना होगा का.’’

विक्रम, ‘’मेरे बाप, मैं जानता हू की अगर मैने तेरी बहन को धोखा दिया तो तू क्या क्या कर सकता है ? लेकिन आज तो मेरी हालत तेरे डर से भी ज़्यादा खराब है. अभी तो तू सिर्फ़ तमाशा देख मैं तुझे परसो समझाने आता हू ना. अगर तुझे सही ना लगे तो मुझे बर्बाद कर लेना बस अब खुश.’’

आवाज़,’’लेकिन ईई बात आप अपने दोस्त को करो ना ता की सारा झंझट ही ख़तम.’’

विक्रम,’’मुझे मरवाना है क्या ? अगर मैने मेरे दोस्त को सब बताया तो क्या होगा? और वैसे भी कृष्णा के पास मेरा दो साल का बच्चा है. मेरे शैतान को भी शादी करनी पड़ेगी मेरे बाप.’’

आवाज़,’’वाहा आप का बच्चा है और इहा कच्चू हो गया तो का होगा बाबू?’’

विक्रम,’’एक बात बताओ अगर मैने तेरी बहन को कही भी च्छुआ होता तो क्या तू मुझे ज़िंदा छ्चोड़ता? इतना तो समझ जब मैं कह रहा हू कि तुझे या तेरी बहन को कोई नुकसान नही करूँगा फिर भी इतनी नाराज़गी. अरे ये बच्चा मेरा है ये मुझे भी कल ही मालूम हुवा तो क्या मैं कृष्णा को छ्चोड़ दू?, और बोल दू कि जो करना है वो कर ले जा मेरा कोई रिश्ता नही तुझ से. तू जानता है ऐसा कहने से मेरे कितने रिश्ते टूट जाएँगे. भाई जैसा दोस्त खो जाएगा. ये दौलत, ये शौरत सब मिट्टी मे मिल जाएगा. उपर से वो लड़की भी मुझे प्यार करती है. उसे बीच रास्ते मे छ्चोड़ दू क्या ? दुनिया मे तेरी बहन से बढ़कर किसी और की कोई इज़्ज़त नही है क्या ? तुझे सिर्फ़ अपनी बहन की पड़ी है, कृष्णा की नही क्या ?’’

आवाज़,’’ विक्रम बाबू हम अपनो के सिवा किसी और के बारे मे नही सोचा करते का. तभी तो हम आज तक ज़िंदा हू वरना कब का मर चुका होता, का ? और अगर आज भी हमरी बहिन के बारे मे नही सोचु तो आप का का भरोसा बोलो ?’’

विक्रम,’’अरे मेरे बाप इतना कह रहा हू फिर भी तेरी खोपड़ी मे कुच्छ नही आता क्या ?’’

आवाज़,’’हमरी खोपड़ी मे ई बात नही अवत है कि आप शादी के बाद का करोगे बोलो तो ?’’

विक्रम,’’ये बात बताने के लिए मैं परसो आ रहा हू ना और वैसे भी तेरे हाथ मे मे हू, तू मेरे हाथ मे नही. अगर तुझे सही ना लगे तो जो तेरी मर्ज़ी मेरे साथ कर लेना बस.’’

क्रमशः..............
 
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