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Guest
जय & कंपनी. मे से किसी को और खुद जय को भी ये पता नही था कि ऐसे क्रांति के मास्टर पीस विचार कैसे और कहा से आते थे. बस जय अपनी सिक्स्त सेन्स के सहारे दूर की सोचकर और परमात्मा की शक्तियो पर द्रढ विश्वास रखकर आगे बढ़ता ही जा रहा था और उसे पहले ही कदम पर सफलता मिली थी.
लेकिन जैसे दिन के बाद रात आती है, उसी तरह अगर ऐसे ही क्रांति शुरू रहेती तो शायद और कुच्छ समय या महीने या वर्ष तक क्रांति यू ही चलती रहेती और किसी को पता नही चलता कि ये कौन कर रहा है. लेकिन जय ने जब फ़ैसला किया था रणवीरसींह से मिलने का उसका अंजाम क्या होगा ये उसे पता नही था. कौन जाने कुदरत अब उसके साथ क्या खेल खेलनेवाली थी क़ि उसका ये कदम उसे एक नयी क्रांति करने पर मजबूर कर देगा जिस क्रांति का दा एंड जैल ही था…………
दूसरे दिन जय और साजन जॅयैपर के लिए रवाना हुए. सब दोस्तो ने इन दोनो को बेस्ट ऑफ लक कहा. जय पहेली बार अपनी कज़िन मिली से मिलने चला था. आज पहेली बार उसके रोंगटे खड़े हुवे थे. केवल एक महीने मे जय ने अपनी लाइफ बदल डाली थी. दूसरे दिन वे लोग जॅयैपर पहुचे. साजन उसे अपने महल जैसे बंग्लॉ पर ले के गया. बंग्लॉ के बाहर रिक्क्षा खड़ी हुई. एक आलीशान गार्डेन को क्रॉस करने के बाद वे लोग बंग्लॉ के अंदर पहुचे.
साजन के डॅड जॅयैपर के मेयर थे और साथ साथ समाधि ट्रस्ट के इंटरनॅशनल लेवेल के ट्रस्टी भी थे. उनका सारा दिन मीटिंग्स मे चला जाता था. बहुत कम समय बाप बेटे को मिलता था. आज भी साजन के डॅड घर पे नही थे. जय ने बंग्लॉ के बाहर नेम प्लेट भी पढ़ी और साजन के पिताजी का नाम भी पहेलिबार जान लिया. लेकिन उस वक़्त एक घटना हो चुकी थी जिस के बारे मे जय बिल्कुल अंजान था.
अगर जय अपनी माताजी राजेश्वरिदेवी को बताता कि वो साजन के घर जॅयैपर जा रहा है और उसके डॅड का नाम बताता तो शायद जय की ज़िंदगी कुच्छ और होती, उल्टा अगर जय क्रांति के बारे मे भी अपनी मा से बात करता तो भी बात कुच्छ और होती, तीसरा अगर साजन के डॅड हाजिर होते और जय को देखते और पहेचान निकलती तो भी बात कुच्छ और होती. लेकिन संजोग ऐसे थे कि कुच्छ भी नही हुवा. साजन और उसके पिताजी की असली पहेचान जय को क्रांति के अंजाम जब जय को अकेले को भोगत्ना पड़ा तब हुई थी.
साजन ने अपनी जेब से ड्यूप्लिकेट चाबियो से मैन गेट का लॉक खोला और गार्डेन से होकर बंग्लॉ के डोर तक पहुचे और उसे भी ड्यूप्लिकेट चाबी से खोला और दोनो अंदर चले आए.
आलीशान दीवानखंड था और उपर के भाग मे कमरे थे. फ्रेश होकर सब से पहले साजन ने रणवीरसींह को कॉंटॅक्ट किया तो उसने शाम का वक़्त दिया. थोड़ी देर मे साजन के डॅड का फोन आया कि वे अचानक लंडन जा रहे है. दोनो अकेले थे पूरी दोपहर आराम किया और शाम को साजन के डॅड की कॉनटेस्सा लेकर निकल पड़े रणवीरसींह से मिलने.
साजन के डॅड का बंग्लॉ रिवर के पास संगानेर टाउनशिप से आधा कि.मी.दूर था और रणवीरसींह का कॉटेज मालविका नगर इंडस्ट्रियल एरिया के पिछे जो रिज़र्व्ड फोरेस्ट था जिसका नाम बींदायका फोरेस्ट रखा गया था उसके बराबर पास था. बस वो जंगल ही रणवीरसींह और उसके बाप खेंगरसिंह को काम आता था. एक और फार्महाउस भी जंगल मे थोड़े दूर दूसरे एंड पर राजविलास होटेल से 2 कि.मी. दूर बनाया गया था. अपने बंग्लॉ से फार्महाउस तक जाने के लिए करीब एक घंटे का तो जंगल मे सफ़र करना पड़ता था. फील हाल तो साजन और जय उसके कोठी जैसे कॉटेज आरके विला पर पहुचे.
एक बड़ा सा गार्डेन पार करके वे दोनो ड्रॉयिंग रूम मे पहुचे. आलीशान दीवानखंड, कई प्राणियो की खाल, दीवारो पर शश्त्र टाँगे हुए थे कोई रजवाड़ा जैसा भव्या महॉल था. फर्निचर ऐश ब्राउन कलर्स का था. एक बड़े सोफा चेर्स पर दोनो बैठे. नौकर उसे पानी दे गया और वेट करने को कहा.
15 मिनट के बाद रणवीरसींह उपर से सीढ़िया उतरकर आ रहा था दोनो ने देखा. दीवानखंड से ही सीढ़िया उपर के फ्लोर पर जा रही थी. ब्लॅक शाइनिंग स्ट्रिप्स वाला शर्ट जिसके दो बोट्टोन्स खुल्ले थे और छाती पर एक बड़ी सोने की चैन पर टाइगर के दो नाख़ून वाला पॅंडल था और हाथो मे सोने की लकी झूल रही थी. दोनो हाथ मे से चार उंगलियो पर सोने और हीरे की रिंग्स पहेनी हुई थी. नीचे लाइटिश ब्राउन कॉटन जीन्स पहना था. कमर पर बड़ा बेल्ट पड़ा था. ब्लॅक जंगल मे काम आनेवाले शूस पहन रखे थे. राजपूताई मुच्छे और आँखे शराबी, नशीली थी. पूरा च्छेः फीट हाइट थी और चौड़ी छाती, स्नायूबधढ शरीर और खुखार चेहरा. आते ही सोफा चेर पर बैठते हुए साजन की ओर बोला,’’तुम तो मयोरसाब के बेटे हो ना?’’
साजन,’’यस रणवीर्भाई हम तो मिल चुके है तीन चार बार.’’
रणवीरसींह,’’हा याद आया हम कई बार मिल चुके है, ये आजकल कुच्छ याद भी नही रहेता ना इसीलिए.’’
साजन,’’यस रणवीरभी मुझे थोड़ा बहुत पता है न्यूज़ पेपर्स के मध्यम से. साले कौन है जो सब पॉलिटिशियन्स के पिछे पड़े है?’’
इतना कहकर साजन ने जय के सामने देखा और रणवीरसींह का ध्यान नही था तो आँखे मिचकर मुछ मे ही हस दिया.
रणवीरसींह,’’पता नही साले कौन है, साली पोलीस भी हरामजादो को पकड़ नही पा रही है. खैर छ्चोड़ो ना, बात क्या थी वो बताओ, मुझे मिलने क्यू आए हो?’’
साजन ने जय का इंट्रोडक्षन करवा के बोला,’’ये जय है, गुजराती है और अच्छा क्रिकेटर भी है. आप तो जानते है कि आज के समय मे क्रिकेट मे आगे बढ़ना कितना मुश्किल है तो सोचा कि आप के पास ले आऊ. आप अगर कुच्छ हेल्प कर देते तो इसका नाम बन सकता है. बहुत अच्छी बॅटिंग कर लेता है.’’
जय खड़ा होकर रणवीरसींह के साथ मुस्कुर्राकार शाकहन्ड किया. बड़ा फौलादी हाथ था रणवीरसींह का. जय मन ही मन मे सोच रहा था कि इसके पंजे से नीशी की इज़्ज़त बची यही काफ़ी है. लेकिन साथ मे ये भी सोचता रहा था कि इसने फिर भी नीशी की क्या हालत की होगी.’’
रणवीरसींह ने थोड़ी देर जय को देखा और फिर बोला,’’देखो यार बात तो थोड़ी मुश्किल है. आप लोग जानते ही होंगे कि क्रिकेट मे आगे बढ़ना कितना मुश्किल है.’’
साजन,’’अरे क्या बात है रणवीर्भाई, आप के होते हुए कोई काम मुश्किल हो ही नही सकता, मैं तो जानता हू ना आप को. अगर आप की नज़र हुई तो इसे आसानी से आगे जाने का मौका मिल ही जाएगा ये मुझे पक्का विश्वास है.’’ साजन ने मस्का लगाया.
क्रमशः.................
लेकिन जैसे दिन के बाद रात आती है, उसी तरह अगर ऐसे ही क्रांति शुरू रहेती तो शायद और कुच्छ समय या महीने या वर्ष तक क्रांति यू ही चलती रहेती और किसी को पता नही चलता कि ये कौन कर रहा है. लेकिन जय ने जब फ़ैसला किया था रणवीरसींह से मिलने का उसका अंजाम क्या होगा ये उसे पता नही था. कौन जाने कुदरत अब उसके साथ क्या खेल खेलनेवाली थी क़ि उसका ये कदम उसे एक नयी क्रांति करने पर मजबूर कर देगा जिस क्रांति का दा एंड जैल ही था…………
दूसरे दिन जय और साजन जॅयैपर के लिए रवाना हुए. सब दोस्तो ने इन दोनो को बेस्ट ऑफ लक कहा. जय पहेली बार अपनी कज़िन मिली से मिलने चला था. आज पहेली बार उसके रोंगटे खड़े हुवे थे. केवल एक महीने मे जय ने अपनी लाइफ बदल डाली थी. दूसरे दिन वे लोग जॅयैपर पहुचे. साजन उसे अपने महल जैसे बंग्लॉ पर ले के गया. बंग्लॉ के बाहर रिक्क्षा खड़ी हुई. एक आलीशान गार्डेन को क्रॉस करने के बाद वे लोग बंग्लॉ के अंदर पहुचे.
साजन के डॅड जॅयैपर के मेयर थे और साथ साथ समाधि ट्रस्ट के इंटरनॅशनल लेवेल के ट्रस्टी भी थे. उनका सारा दिन मीटिंग्स मे चला जाता था. बहुत कम समय बाप बेटे को मिलता था. आज भी साजन के डॅड घर पे नही थे. जय ने बंग्लॉ के बाहर नेम प्लेट भी पढ़ी और साजन के पिताजी का नाम भी पहेलिबार जान लिया. लेकिन उस वक़्त एक घटना हो चुकी थी जिस के बारे मे जय बिल्कुल अंजान था.
अगर जय अपनी माताजी राजेश्वरिदेवी को बताता कि वो साजन के घर जॅयैपर जा रहा है और उसके डॅड का नाम बताता तो शायद जय की ज़िंदगी कुच्छ और होती, उल्टा अगर जय क्रांति के बारे मे भी अपनी मा से बात करता तो भी बात कुच्छ और होती, तीसरा अगर साजन के डॅड हाजिर होते और जय को देखते और पहेचान निकलती तो भी बात कुच्छ और होती. लेकिन संजोग ऐसे थे कि कुच्छ भी नही हुवा. साजन और उसके पिताजी की असली पहेचान जय को क्रांति के अंजाम जब जय को अकेले को भोगत्ना पड़ा तब हुई थी.
साजन ने अपनी जेब से ड्यूप्लिकेट चाबियो से मैन गेट का लॉक खोला और गार्डेन से होकर बंग्लॉ के डोर तक पहुचे और उसे भी ड्यूप्लिकेट चाबी से खोला और दोनो अंदर चले आए.
आलीशान दीवानखंड था और उपर के भाग मे कमरे थे. फ्रेश होकर सब से पहले साजन ने रणवीरसींह को कॉंटॅक्ट किया तो उसने शाम का वक़्त दिया. थोड़ी देर मे साजन के डॅड का फोन आया कि वे अचानक लंडन जा रहे है. दोनो अकेले थे पूरी दोपहर आराम किया और शाम को साजन के डॅड की कॉनटेस्सा लेकर निकल पड़े रणवीरसींह से मिलने.
साजन के डॅड का बंग्लॉ रिवर के पास संगानेर टाउनशिप से आधा कि.मी.दूर था और रणवीरसींह का कॉटेज मालविका नगर इंडस्ट्रियल एरिया के पिछे जो रिज़र्व्ड फोरेस्ट था जिसका नाम बींदायका फोरेस्ट रखा गया था उसके बराबर पास था. बस वो जंगल ही रणवीरसींह और उसके बाप खेंगरसिंह को काम आता था. एक और फार्महाउस भी जंगल मे थोड़े दूर दूसरे एंड पर राजविलास होटेल से 2 कि.मी. दूर बनाया गया था. अपने बंग्लॉ से फार्महाउस तक जाने के लिए करीब एक घंटे का तो जंगल मे सफ़र करना पड़ता था. फील हाल तो साजन और जय उसके कोठी जैसे कॉटेज आरके विला पर पहुचे.
एक बड़ा सा गार्डेन पार करके वे दोनो ड्रॉयिंग रूम मे पहुचे. आलीशान दीवानखंड, कई प्राणियो की खाल, दीवारो पर शश्त्र टाँगे हुए थे कोई रजवाड़ा जैसा भव्या महॉल था. फर्निचर ऐश ब्राउन कलर्स का था. एक बड़े सोफा चेर्स पर दोनो बैठे. नौकर उसे पानी दे गया और वेट करने को कहा.
15 मिनट के बाद रणवीरसींह उपर से सीढ़िया उतरकर आ रहा था दोनो ने देखा. दीवानखंड से ही सीढ़िया उपर के फ्लोर पर जा रही थी. ब्लॅक शाइनिंग स्ट्रिप्स वाला शर्ट जिसके दो बोट्टोन्स खुल्ले थे और छाती पर एक बड़ी सोने की चैन पर टाइगर के दो नाख़ून वाला पॅंडल था और हाथो मे सोने की लकी झूल रही थी. दोनो हाथ मे से चार उंगलियो पर सोने और हीरे की रिंग्स पहेनी हुई थी. नीचे लाइटिश ब्राउन कॉटन जीन्स पहना था. कमर पर बड़ा बेल्ट पड़ा था. ब्लॅक जंगल मे काम आनेवाले शूस पहन रखे थे. राजपूताई मुच्छे और आँखे शराबी, नशीली थी. पूरा च्छेः फीट हाइट थी और चौड़ी छाती, स्नायूबधढ शरीर और खुखार चेहरा. आते ही सोफा चेर पर बैठते हुए साजन की ओर बोला,’’तुम तो मयोरसाब के बेटे हो ना?’’
साजन,’’यस रणवीर्भाई हम तो मिल चुके है तीन चार बार.’’
रणवीरसींह,’’हा याद आया हम कई बार मिल चुके है, ये आजकल कुच्छ याद भी नही रहेता ना इसीलिए.’’
साजन,’’यस रणवीरभी मुझे थोड़ा बहुत पता है न्यूज़ पेपर्स के मध्यम से. साले कौन है जो सब पॉलिटिशियन्स के पिछे पड़े है?’’
इतना कहकर साजन ने जय के सामने देखा और रणवीरसींह का ध्यान नही था तो आँखे मिचकर मुछ मे ही हस दिया.
रणवीरसींह,’’पता नही साले कौन है, साली पोलीस भी हरामजादो को पकड़ नही पा रही है. खैर छ्चोड़ो ना, बात क्या थी वो बताओ, मुझे मिलने क्यू आए हो?’’
साजन ने जय का इंट्रोडक्षन करवा के बोला,’’ये जय है, गुजराती है और अच्छा क्रिकेटर भी है. आप तो जानते है कि आज के समय मे क्रिकेट मे आगे बढ़ना कितना मुश्किल है तो सोचा कि आप के पास ले आऊ. आप अगर कुच्छ हेल्प कर देते तो इसका नाम बन सकता है. बहुत अच्छी बॅटिंग कर लेता है.’’
जय खड़ा होकर रणवीरसींह के साथ मुस्कुर्राकार शाकहन्ड किया. बड़ा फौलादी हाथ था रणवीरसींह का. जय मन ही मन मे सोच रहा था कि इसके पंजे से नीशी की इज़्ज़त बची यही काफ़ी है. लेकिन साथ मे ये भी सोचता रहा था कि इसने फिर भी नीशी की क्या हालत की होगी.’’
रणवीरसींह ने थोड़ी देर जय को देखा और फिर बोला,’’देखो यार बात तो थोड़ी मुश्किल है. आप लोग जानते ही होंगे कि क्रिकेट मे आगे बढ़ना कितना मुश्किल है.’’
साजन,’’अरे क्या बात है रणवीर्भाई, आप के होते हुए कोई काम मुश्किल हो ही नही सकता, मैं तो जानता हू ना आप को. अगर आप की नज़र हुई तो इसे आसानी से आगे जाने का मौका मिल ही जाएगा ये मुझे पक्का विश्वास है.’’ साजन ने मस्का लगाया.
क्रमशः.................