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किस्मत का खेल

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जय ने ओह कर के मूह मोड़ लिया और अचानक फिर पलटकर पुछा,’’लेकिन मामा इस से भी तो ये साबित नही होता कि मरनेवाली मेरी मा ही थी. ये भी तो हो सकता है कि मरनेवाली कोई और हो और मेरी मा अभी तक ज़िंदा हो और उस बूढ़े आदमी के साथ या तो कुछ मुसीबत मे हो या सलामत हो.’’

मामा,’’बेटा मैं वहाँ 10 दिन और रुका था. जहाँ जहाँ भी पुछना था, जहाँ जहाँ भी खोजना था मैने सारे प्रयास कर लिए. लेकिन जो भी जानते थे, जो भी उस वक़्त वहाँ मौजूद थे सबने फोटो देखकर कहा कि यही औरत थी जो गंगा मे गिरने से उसकी मृत्यु हुई थी और डूबते वक़्त वो बोल नही पा रही थी. बस उूुउउ उूुउउ कर के इशारे से मदद की पुकार की थी. लेकिन शायद ईश्वर को ये ही मंजूर था. फिर भी तू चाहे तो हम दुबारा वहाँ जाएँगे जय.’’

जय कुछ देर नही बोला लेकिन फिर उसने पुछा,'’मामा क्या आप को लगता है कि मेरी मा सच मे मर चुकी है ?’’

मामा कुछ पल के लिए तो बोल ही नही पाए फिर अंदर बेडरूम मे गये और दो मिनट मे एक न्यूज़ पेपर की कटिंग लेकर आए और जय को दिखाया जिसमे जय की मा की फोटो थी और हरिद्वार मे दुर्घटना के समाचार छपे हुए थे. जय ने पढ़कर, देखकर निराश होकर लंबी आह ली और फिर से बेड पर सिकुड़कर बैठ गया.

अभी 10 मिनिट्स ही हुई होगी कि दरवाजे पर नॉक हुई. मामी ने जाकर दरवाजा खोला तो सामने एक लड़की को पाया और उसने देखा कि ये तो वही रात वाली लड़की है. मामी ने पुछा कि,’’कहिए.’’

वो ग्रीष्मा थी. ग्रीष्मा ने फिर से पुछा,’’क्या जय आया है यहाँ ?’’

मामा ने आवाज़ सुनकर जय को कहा,’’अरे हाँ बेटा कल रात को बारी बारी दो लड़की तुझे पुच्छ रही थी. उसी मे से एक शायद वापस आई हुई लगती है. कौन है ज़रा देखो तो ?’’

वहाँ मामी अभी कुछ जवाब दे इसके पहले जय की सिक्स्त सेन्स की घंटी फिर बजी और वो दौड़ता हुवा बाहर आया और दरवाजे पर खड़ी ग्रीष्मा को देखकर वही उसके पैर जम गये.

क्रमशः……………………….
 


10 ya 15 minutes ke bad Jay ne ankhe bandh ki aur apane chehre par bahut jor dala. Mama aur mami dono ek naujawan ko aaj apani mari huyi ma ki yad me ansu pite huye dekh rahe the. Badi mushkil se Jay ne man hi man khun ke ansu piye aur ye zahar pikar gala saf karte huye svasth hone ki koshsih ki. Fir bolne ki koshish karne laga,’’Ma….ma… aap ne mujhe bataya kyu nahi?’’

Kuch pal ke liye Mama kuch nahi bol sake fir usne bhi apane sukhe gale ko saf kiya aur bole,’’Jay hame kaha pata tha ki tu kaha hai ? aur vaise bhi teri ma ki lash tak hame naseeb nahi huyi.’’

Jay ne achanak sir uthakar ankhe failaye puchha,’’Kyu mama aisa kyu huva ?’’

Mama ne kaha,’’Bete kuch mahine pehle teri ma ke liye ek phone aya tha. Vaise to vo bol hi nahi sakti thi aur sara din yahan puja path kiya karti thi. Bol nahi sakti thi isiliye katha kirtan sab bandh ho chuke the. Lekin us din na jane kya suji ki phone ki ring bajate hi usne uthkar phone apane hath me liya. Teri mami rasoighar me thi. Usne bahar aakar dekha ki phone kisne liya hai to vo bhi soch me pad gayi ki aksar to vo phone uthati hi nahi aaj kyu achanak usne phone uthaya hoga ? Lekin kuch minutes ke bad usne phone rakha aur andar ke uske alag se kamare se kuch apane liye kapade nikale aur ishare se teri mami ko bataya ki Haridwar jana chahti hai.’’

Mama ki sas fuli thi isiliye kuch pal ke liye atake aur fir bole,’’Teri mami ne puchha ki achanak kyu ? to vo boli kisi ne usko Haridwar me milne bulaya hai aur kaha hai ki akele hi aana.’’

Fir mama ruk gaye. Jay ki dhiraj samapt ho rahi thi isiliye usne puchha,’’Fir kya huva ?’’

Mama,’’Bete maine aur teri mami ne use bahut samajaya aur kaha ki aise akele jane me khatara hai. Ek to vo bol nahi sakti thi upar se akeli stri jat. Maine kaha ki jana hi hai to main tere sath aata hu. To usne ishare se mana kiya. Ham bhi nahi mane aur hamne use nahi jane diya. Do din to hamane usko akele padne hi nahi diya. Lekin…..’’

Fir Mama atake to Jay ne hath pakadkar usko hadbada diya aur kaha,’’Lekin aage kya huva mama ?’’

Mama ki ankho me ansu aa gaye aur kaha,’’ek din subah vo apane kamare me nahi thi. Rat ko hame yu hi sota huva chhodkar chali gayi. Maine bahut koshish ki lekin uska pata nahi laga to kuch dino ke bad main khud Haridwar chala gaya. Vahan jakar maine bahut puchhtachh ki to hamare Gujarati Samaj ki dharmshala wale ne mere kahne par se bataya ki ek aisi stri uske yahan kuch din pehle ayi thi. Lekin bad me ek sajjan budhdha aadami use Gujarati Samaj se apane sath le gaya aur usi sham ko ganga nadi ke kinare ke us taraf ek stri dub gayi aur sirf uski lash mili. Jiska antim sanskar vahan ke mandir ke pujari ne kar diya tha. Kyuki vah stri ka koi saga nahi mil paya tha.’’

 


Mama fir ruke to Jay chillaya,’’Lekin mama vo meri mummy hi thi ye aap ne kaise soch liya ?’’

Mama,’’Jay main bhi uska bhai hu. Maine bhi us Gujarati Samaj wale ko puchha tha ki kya sabut hai ki marnewali stri meri bahan hi hai. To vo mujhe us mandir ke pujari ke pas le gaya aur us pujari ne police ko bhi bula liya aur Haridwar ki police ne teri ma ki kuch nishaniya mujhe saupi jisme kapade the, hatho me vo sidhe sade do kangan pahanti thi aur Gita ka ek granth tha jis par teri mummy ne apana nam likha tha. Aur vo thaila jisme ye sab rakhkar teri mummy yahan se gayi thi.’’

Jay ne oh kar ke muh mod liya aur achanak fir palatkar puchha,’’Lekin mama is se bhi to ye sabit nahi hota ki marnewali meri ma hi thi. Ye bhi to ho sakta hai ki marnewali koi aur ho aur meri ma abhi tak zinda ho aur us budhe aadami ke sath ya to kuch musibat me ho ya salamat ho.’’

Mama,’’Beta main vahan 10 din aur ruka tha. Jaha jaha bhi puchhana tha, jaha jaha bhi khojana tha maine sare prayas kar liye. Lekin jo bhi jante the, jo bhi us waqt vahan maujud the sabne photo dekhkar kaha ki yahi aurat thi jo ganga me girane se uski mrityu huyi thi aur dubate waqt vo bol nahi pa rahi thi. Bas uuuuu uuuuu kar ke ishare se madad ki pukar ki thi. Lekin shayad ishvar ko ye hi manjur tha. Fir bhi tu chahe to ham dubara vahan jayenge Jay.’’

Jay kuch der nahi bola lekin fir usne puchha,'’Mama kya aap ko lagata hai ki meri ma sach me mar chuki hai ?’’

Mama kuch pal ke liye to bol hi nahi paye fir andar bedroom me gaye aur do min me ek news paper ki cutting lekar aye aur Jay ko dikhaya jisme Jay ki ma ki photo thi aur Hardwar me durghatana ke samachar chhape huye the. Jay ne padhkar, dekhkar nirash hokar lambi aah li aur fir se bed par sikudkar baith gaya.

Abhi 10 minutes hi huyi hogi ki darwaje par knock huye. Mami ne jakar darwaja khola to samne ek ladki ko paya aur usne dekha ko ye to vahi ratwali ladki hai. Mami ne puchha ki,’’Kahiye.’’

Vo Grishma thi. Grishma ne fir se puchha,’’Kya Jay aya hai yahan ?’’

Mama ne awaz sunkar Jay ko kaha,’’Are ha beta kal rat ko bari bari do ladki tuje puchh rahi thi. Usi me se ek shayad vapas ayi huyi lagti hai. Kaun hai jara dekho to ?’’

Vahan Mami abhi kuch jawab de iske pahle Jay ke sixth sense ki ghanti fir baji aur vo daudata huva bahar aya aur darwaje par khadi Grishma ko dekhkar vahi uske pair jam gaye.

kramashah……………………….

 
किस्मत का खेल पार्ट --107

गतान्क से आगे.......

जय के कदम बिल्कुल ज़मीन पर गढ़ गये थे. कुच्छ पल तो जय बोल ही नही सका और दूसरे छ्चोड़ पर ग्रीष्मा, जिसने बरसो के बाद अपने प्यार को देखा. जय की वो मासूमियत, वो प्यारी सी हरकत, वो टीनेज की नज़ाकत सब गायब था. उसके सामने एक चौड़ी छाती वाला, तेज़ आँखो वाला, एक मजबूत इंसान खड़ा था जो अभी अभी जैल से छूट कर आया था.

लेकिन सामने खड़ा जय ग्रीष्मा को देखकर इसीलिए चौका था कि किसी को पता नही था कि वो आज छूटने है. ग्रीष्मा को कैसे पता चल गया कि वो छूट कर सीधा यहाँ ही आ रहा है? लेकिन फिरहाल तो उसे अपनी मा के मौत का भी ख़याल था. इसीलिए वो कुच्छ नही कह सका. ना तो ग्रीष्मा को अंदर आने को बोल सका और ना तो वो खुद अंदर या बाहर जाने के लिए सोच सका. आख़िर मे मामी ने आगे बढ़कर जय को कहा,’’जय यही लड़की थी जो तेरे लिए आधी रात को पुच्छ रही थी.’’

जय ने हां मे सिर घुमाया और गला थोड़ा साफ किया और बोला,’’ह…आआ मामी ये ग्रीष्मा है. म…एरी द…ओस्ट.’’

मामा आगे आए और कहा,’’अच्छा अच्छा बेटी अंदर आ जाओ.’’

और ग्रीष्मा हल्के से अंदर आई और अपने जूते उतारकर जय के पास आई. जय मूह मॉड्कर सीधा ड्रॉयिंग रूम की ओर चलने लगा और सब पिछे पिछे चले आए. सब वहाँ बैठ गये. कुच्छ पल के लिए कोई कुच्छ नही बोला. ग्रीष्मा समझ रही थी कि अभी अभी जय बरसो के बाद आया ही है तो घर मे ज़रूर खामोशी होगी ही. वो इधर उधर जय की मा को ढूँढने लगी. कुच्छ देर यू ही खामोशी च्छाई रही.

फिर ग्रीष्मा ने ही शुरुआत की,’’आक्च्युयली मुझे थोड़ा सा मन मे हो रहा था कि तुम यही सीधा आओगे. इसीलिए मैं कल सुबह से तुम्हारे पिछे आ रही हू. लेकिन तुम इतने लेट क्यू पहुचे यहाँ ?’’

जय ने अचानक प्रश्न से सिर उठाकर देखा, ग्रीष्मा ने उसकी आँखो मे स्पष्ट शून्यभाव देखे. वो यही समझी कि जैल च्छुटने के बाद कोई भी आदमी की मनोदशा यही होती है. इसीलिए उसने अपना हाथ उठाकर जय के कंधो पर रख दिया.

मामी खड़ी होकर ग्रीष्मा के लिए पानी लेकर आई. ग्रीष्मा ने पानी पिया. वातावरण भारी था. लेकिन ग्रीष्मा को ये जैलयत्रा की वजह ही लग रही थी. असली बात से वो अंजान थी. आख़िर मामा ने भी मौन तोड़ा और बोले,’’तुम कल रात आई थी उसके पहले भी एक लड़की आई थी वो कहाँ गयी ?’’

ग्रीष्मा ने थोड़ा रुककर कहा,’’अंकल मुझे कुच्छ नही पता है. आक्च्युयली मैने भी उसे पहली बार कल रात को जय का पिच्छा करते हुए देखा था. इसीलिए मैं उसके पिछे जूनगरह तक जाकर वापस आई हू. पता नही कौन है और क्यू इसका पिच्छा कर रही है.’’

लेकिन फिर भी जय अभी तक शोक्मग्न था. ग्रीष्मा को थोड़ा अजीब लगा, क्यूकी कोई भी आदमी पिच्छा करनेवाले के बारे मे सुनकर चौक उठता है. और खास कर के किसी बॅंक लूटने के बाद कोई जैल मे गया हो और छूट कर वापस आया तो उसको तो ख़तरा महसूस होना ही चाहिए.

 


लेकिन फिर भी ग्रीष्मा को लगा कि शायद जय ये बात जानता होगा. इसीलिए ग्रीष्मा ने सीधा जय को पुचछा,’’जय कौन है जो तुम्हारा पिच्छा कर रहा है ?’’

दो बार पुछने के बाद जय जैसे तंद्रा से उठा और बोला,’हाँ.. क्या कह रही है तू ? पिच्छा और मेरा ? नही मैं इसके बारे मे कुच्छ नही जानता.’’

अब जय तंद्रा से बाहर आ चुका था. वो इधर उधर देखने लगा. थकान से उसकी आँखे लाल थी. कुच्छ खाया भी नही था. तब तक मामी ग्रीष्मा की चाय लेकर आ गयी और जय के लिए फिर चाय बनाई और नाश्ता फिर से परोसा. मामा ने कहा,’’अब ले लो जय.’’

लेकिन जय ने इशारे से मना किया. ग्रीष्मा ने भी जय के कंधो पर हाथ रखकर कहा,’’नही जय हिम्मत हारने से कुच्छ हासिल नही होता. तुम्हे ये लड़ाई पूरी करनी ही पड़ेगी ना. कब तक कुच्छ नही खाओगे. यू मायूस नही होते.’’

मामी भी उत्साह मे आकर कहने लगी,’’ठीक ही तो कहती है जय कुच्छ तो खा लो. कल सुबह से तुम च्छुटे हो और आज सुबह आए हो तो कल कहाँ थे सारी रात ?’’

जय कुच्छ नही बोलकर अपनी नज़र झुका दी. उसे बोलने का भी मन नही कर रहा था. लेकिन दो बार पुच्छे जाने पर जय ने बताया कि उसे जैलर ख़ान ने कह दिया था कोई उसका पिच्छा करेगा, ईसलिए वो घूमफिरकर आया है. ये बात जानकार ग्रीष्मा के मूह से आह निकल गयी और बोल उठी,’’तभी तुझे यहाँ आने मे इतनी देर हो गयी. वरना कल दोपहर तक तो तुझे यहा आ जाना चाहिए था.’’ फिर चाय की एक घुट पीकर बोली,’’लेकिन फिर वो लड़की कौन हो सकती है जो तुम्हारा पिच्छा कर रही थी.’’

अब जय ने नज़रे उठाकर पुछा,’’कैशी दिख रही थी वो ?’’

‘’पूरी अंधेरी रात थी तो चेहरा या बॉडी तो मैने देखी नही, लेकिन दूर से मैने पहचान लिया था कि है तो कोई लड़की ही.’’

कुच्छ पल के बाद मामा ने पुछा,’’लेकिन तुमने कैसे पहचाना कि कोई लड़की ही है, कोई आदमी भी तो हो सकता था ना.’’

जय ने अपने मामा के सामने देखकर कहा,’’मामा ये मनोविज्ञान पढ़ी है. इसीलिए उसे अनुमान करने की आदत है और उसका अनुमान हमेशा सही होता है. वैसे भी इसके पिताजी CBई अफ़सर है तो कुच्छ तो खानदानी लहू होगा ही ना.’’

तभी जय के मामा और मामी को तसल्ली हो गयी. लेकिन अभी सभी को कहाँ पता था कि खुद ग्रीष्मा भी अपने मकसद के लिए जय का पिच्छा ही कर रही थी. ये तो प्यार और नौकरी के बीच मे अभी फसि हुई थी.

फिर थोड़ी चाय की चुस्की लेते हुए ग्रीष्मा ने इधर उधर देखा और पुछा,''जय तुम्हारी मा कहा है ?''

जय ने सॅटटॅक से चेहरा उठाकर ग्रीष्मा की ओर देखा. एक सतर्क CBई एजेंट को जय के आँखो मे से दुख स्पष्ट दिखाई देने लगा था.

लेकिन जय ने नज़रे झुका दी और मामा और मामी एकदुसरे को देखने लगे.

फिर ग्रीष्मा ने ही आगे कहा,''ओह.. शायद मैं कुच्छ जल्दी ही और ग़लत वक़्त पर यहाँ आ चुकी हू. ज़ाहिर है मा अभी तक थोड़ी नाराज़ तो होगी ही. लेकिन मैं समझाने की कोशिश करूँगी जय डॉन'ट वरी. क्या अब तक नाराज़ है वो तुम से ?''

जय ने चेहरा उठाया नही और ऐसे ही सिर हिलाकर 'ना' कहा और भारी आवाज़ मे बोल उठा,''बहुत नाराज़ हो गयी है शायद.''

ग्रीष्मा ने तो यही जाना की सच मे जय की मा नाराज़ होकर अंदर होगी. इसीलिए वो जैसे ही खड़ी हुई तभी जय के मामा बोल उठे जो एक विस्फोट के समान था.......

................................

शक्तिसिंह और उसके साथ चार समाधि ट्रस्ट के वॉलंटियर्स टाटा सूमो लेकर स्पीड से एक ही रात मे काफ़ी अंतर काट चुके थे. लेकिन दोपहर हुई थी और फिर भूख भी लगी थी. इसीलिए एक रेस्टोरेंट मे चाय नाश्ते के लिए रुके. तभी एक साधक ने शक्ति सिंह को पुछा की आप को कैसे पता लगा कि वो लड़का इधर आ रहा है. उस वक़्त दोपहर के तीन बजे हुए थे.

शक्तिसिंह ने कहा,’’मैने उस लड़के के घर के आसपास अपने आदमी भेज दिए थे. उसने बताया कि वो गुजरात से अपने घर से निकलकर रास्ते मे चाय के लिए रुके थे तभी बातचीत मे उसको पता लग गया था कि वे लोग देल्ही आ रहे है. उसके साथ एक CBई एजेंट है. इसका पता भाई ने लगाया था. (भाई याने रणवीरसींह).

दूसरे साधक ने पुच्छा,’’फिर आप के आदमी जो उसका पिच्छा कर रहे है ये बात उस CBई एजेंट से च्छूपी नही रहेगी.’’

शक्तिसिंह ने गर्व से कहा,’’अरे किसी को कानोकान खबर भी नही होगी ना. वो आक्च्युयली बार बार अपना वेहिकल बदलकर उसका पिच्छा कर रहा है.’’

सभी ने हाँ मे अपना सर हिलाया और जाहिर किया कि फिर कोई प्राब्लम नही हो सकती और पाँचो मज़े से चाय और नाश्ते को न्याय देने मे लग गये. उस वक़्त जय और ग्रीष्मा आमेडबॅड से काफ़ी नज़दीक पहुच चुके थे और आयूडैकर वाली लड़की रास्ता भटककर वापस जूनगरह पहुच चुकी थी.

**********
 
आक्च्युयली ग्रीष्मा को शक हो चुका था कि कोई है जो बार बार उसके पिछे लगा हुवा है. इसीलिए उसने भी एक चाल चली थी और उसने तय कर लिया था कि कल सुबह का वो प्लान ही कर ले ता की ज़्यादा तकलीफ़ ना हो और उसने फोन पर से ही टिकेट्स बुक करवा लिया था. बस एक रात कटनी थी तो उसने आमेडबॅड एरपोर्ट औतॉरिटी को कहकर वही दो रूम ओपन करवा लिए.

ग्रीष्मा का प्लान ये था कि अगर कार मे देल्ही तक जाए तो जय से घुल मिलने का पूरा टाइम मिलता और सारी कहानी धीरे धीरे सुनकर आसानी से वो जय को वो माल तक पहुचाती और फिर उसमे से कोई रास्ता निकालती. लेकिन एक अंजान आदमी को बार बार वेहिकल बदल के उसका पिछा करते हुए उसकी सिक्स सेन्स ने पकड़ लिया था. ग्रीष्मा को शक था कि ये ज़रूर राजस्थान का आदमी ही होना चाहिए. इसीलिए फील हाल वो जय को सेफ जगह जल्दी पहुचाना चाहती थी. इसीलिए उसने सुबह का प्लेन बुक करवाकर उस आदमी को बराबर आहमेदबाद के गिच ट्रॅफिक की ओर ले गयी. फिर उसने अपनी कार अचानक उस ट्रॅफिक मे भी 70 के स्पीड से चलाई और नौ दो ग्यारह हो गयी. उस आदमी ने लाचार होकर शक्तिसिंह को शाम को मेस्सेज दिया कि वो लड़की और जय लापता हो चुके है.

शक्तिसिंह ने फोन पर भरपूर गालिया दी. क्यूकी आहमेदबाद से आगे जानेवाले रास्ते पर वे लोग आधे घंटे से इंतेज़ार कर रहे थे. अब आगे जय कहाँ गया है वो कैसे पता चले ? क्यूकी वो ट्रेन से भी जा सकता है और प्लेन से भी. और रूट चेंज कर के दूसरे रास्ते से भी निकल सकता है.

लेकिन वो चारो साधक थे ना, सब से वरिष्ठ साधक ने सुझाव दिया कि एक वही खड़ा रहे, दूसरा एरपोर्ट पर जाए, तीसरा रेलवे स्टेशन पर और चौथा दूसरे रास्ते की ओर जाए. शक्तिसिंह को खुद को एक के साथ यही बैठना चाहिए. और सब सहमत हो गये. पाँचो ने अपने अपने रास्ते पकड़ लिए.

ये तब की बात है जिसके दो घंटे बाद ग्रीष्मा ने अपने बॉस को रात को 9 बजे समाचार दिए थे कि वो लोग देल्ही आ रहे है. बाद मे CBई की मीटिंग हुई थी.

**********

रात को 10 बजे एरपोर्ट अतॉरिटी के रूम मे खाना खाकर जय और ग्रीष्मा साथ मे पहुच चुके थे. बस कुच्छ ही पल मे जय और ग्रीष्मा दोनो अपने अपने रूम मे चले जानेवाले थे. तब तक सबकुच्छ ठीक था. लेकिन यहा रुकना और प्लेन से जाना यही ग्रीष्मा की सब से बड़ी ग़लती हो गयी थी. अभी तक तो ग्रीष्मा ने पूरे दिन मे एक बार भी जय के सामने फोन का इस्तेमाल नही किया था. क्यूकी वो CBई एजेंट थी और वो जब तक हो सके जय से अपनी आइडेंटिटी च्छुपाने के लिए फोन पर बात करना भी नही चाहती थी.

लेकिन उसी वक़्त एरपोर्ट अतॉरिटी का एक ऑफीसर उसके पास आया और कहने लगा,’’मेडम आप का कॉल है ?’’

ग्रीष्मा ने चौक्कर पुछा,’’मेरा और यहाँ फोन ?’’

उस ऑफीसर ने कहा,’’जी हाँ मेडम मुझे यही मेस्सेज दिया गया है कि ऑफीसर ग्रीष्मा कौल को फोन पर बुलाए प्लीज़.’’

जय ने आशराइया से पुछा,’’ऑफीसर ?’’

ग्रीष्णा ने तुरंत बाजी संभाल ली और कहा,’’मुझे जब भी फोन आते है यही नाम से आते है.’’

जय ने पुछा,’’क्यू ?’’

ग्रीष्मा,’’तुम तो जानते हो डॅडी को, हमेशा इसी तरह वो मुझे बुलाते है. उन्हे पता है मैं कहा हू, इसीलिए मुझे ऐसे ही बुलाते है, ता की हमारी हिफ़ाज़त आराम से हो.’’

जय,’’लेकिन तुम्हारे डॅडी तो तुम्हे मोबाइल पर भी कॉल कर सकते थे ना.’’
 


ग्रीष्णा की सिक्स सेन्स ने तुरंत उत्तर दे दिया और उसने हॅस्कर कहा,’’देखो यहाँ कवरेज कहाँ है ?’’ (आहमेदबाद एरपोर्ट पर कुच्छ कवरेज की प्राब्लम रहती ही है).

जय ने हॅस्कर कहा,’’ओह, तो ये बात है. ठीक है जाओ जल्दी फोन तो रिसीव कर लो.’’

वो ऑफीसर वही खड़ा था और मजबूरन ग्रीष्मा को उठना पड़ा.

आक्च्युयली वो बूढ़े साधक ने ही ऐसा आइडिया दिया था कि पता लगाने के लिए ग्रीष्मा के नाम से एरपोर्ट पर फोन करो. अगर किसी ने जवाब दिया कि होल्ड रखो हम बुलाते है तो समझ लेना कि वे लोग वही है. और उसका ये पत्ता काम कर गया. ग्रीष्मा को जय के सामने मजबूरन फोन रिसीव करने के लिए उठना ही पड़ा. वरना वो भी जानती थी कि यह किसी की ट्रिक है. लेकिन अपनी आइडेंटिटी च्छुपाने के लिए उसे उठना ही पड़ा और यही उसकी ग़लती साबित हुई.

जैसे ही ग्रीष्मा वहाः से उठी और एक आदमी दौड़कर जय के पास आया और सीधा जय को कहने लगा,’’जय साहब आप मुझे नही पहेचानते लेकिन मैं आप से यह कहेने आया हू कि आप के साथ जो मेडम है वो CBई ऑफीसर है और आप का फ़ायदा उठा रही है. आप को भागना है तो अभी भी वक़्त है.’’ और वो जल्दी से चला गया.

लेकिन उसके एक वाक्य ने जय को चौका दिया था और आधी मिनिट्स तो वो कुच्छ सोच ही नही पाया. गुस्से, धृिणा और मजबूरी के भाव उसके चेहरे पर जल्दी से पड़ने लगे. लेकिन जैसे ही उसने ग्रीष्मा को सिर्फ़ एक मिनट मे वापस आते हुए देखा उसने अपने चेहरे पर स्वस्थता वापस ले ली. आख़िर वो भी इस खेल मे माहिर था. उसने मन ही मन सोच लिया था कि ग्रीष्मा के बारे मे पूरी आइडेंटिटी बाहर निकाल ही लेगा वो.

उसने कुच्छ देर तक ऐसे ही बाते करनी शुरू की और फिर कहा,’’अच्छा ग्रीष्मा तुम्हारा फोन दो तो मैं ज़रा अपने मामा से बात कर लू.’’

एक्सपीरियेन्स्ड ग्रीष्मा की सिक्स सेन्स ने तुरंत ख़तरे की घंटी बजाई और पहली बार ग्रीष्मा को अहसास हुवा कि जय शायद उसके हाथो मे ज़्यादा नही होगा.

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जैसे ही उन साधको ने अपने मास्क हटाए जय ने चौक्कर हस पड़ा और बोल उठा,’’अच्छा तो आप हो ?’’

‘’जी हाँ जय हम है’’ तेज़ आँखो से संजयभाई ने जवाब दिया और दूसरी और से अमरभाई ने कहा,’’सालो पूरी तैयारी हमने की थी क्रांति की और सारा हलवा अकेले अकेले ही खा गये.’’

जय ने कहा,’’मुझे पहले से ही शक था और मालूम ही था कि आप लोग कोई साधक नही महा हरामी आदमी हो.’’

शक्तिसिंह उनकी बातचीत सुनकर बड़े आश्चर्या से जय को पिछे मुड़कर देखने लगा. उसे यह बात समझ मे नही आ रही थी कि यह आदमी इतनी स्वस्थता से कैसे बात कर सकता है ?

संजयभाई ने कहा,’’तुम लोगो ने हमे ड्रॉप कर लिया तो क्या यह समझते हो कि हम लोग आसानी से चले जाएँगे क्या ?’’

जय ने कहा,’’हमने कहाँ तुम्हे ड्रॉप किया था, तुम लोग खुद भाग गये थे.’’ फिर अचानक चेहरा तंग हुवा और संजाभाई के सामने देखा और कहा,’’हरमियो तुम दोनो तो आसानी से बॅंक लूट से फरार हो गये और पोलीस की हिरासत मे भी नही आए और सज़ा हम दोस्तो ने काटी है. कोई मर गया तो कोई पागल हो गया. कोई बचकर भाग निकाला तो मैने अकेले ही सज़ा काटी है. लेकिन तुम लोग तो कही दिखाई ही नही दिए थे. कहाँ थे इतने साल ? यहाँ तक की पोलीस केस मे कही भी तुम्हारा नामोनिशान तक नही था.’’
 
अमरभाई ने अट्टहास करे हुए कहा,’’भाई जिस के सर पर भगवान का साया हो उसे कौन च्छू सकता है भला ?’’

जय समझ गया कि किस भगवान की बात कर रहा था. स्वामी रामानंद ने ही बचा लिया होगा दोनो को.

फिर कुच्छ देर तक वे लोग बोलते रहे और जय कुच्छ सोचता रहा फिर अचानक उसने सवाल पुच्छा,’’लेकिन अब मुझे किडनॅप कर के कहाँ ले जा रहे हो ?’’

‘’रणवीरसींह के पास.’’ शक्तिसीह ने कहा.

‘’क्यू अब भाई को मुझ से क्या काम पड़ गया ?’’ जय ने पुच्छ लिया.

अमरभाई ने कहा,’’ये चिठ्ठी देखो.’’

एक काग़ज़ का टुकड़ा अमरभाई ने जय को दिखाया जो एक आइयीरॉक्स कॉपी थी और उसमे वोही क्रिकेट का एक सेंटेन्स लिखा था. अमरभाई ने कहा,’’तुझे क्रिकेट का बड़ा शौक है ना. ये चिठ्ठी तूने ही बनाई है ना अब बता कि वो माल कहाँ च्छुपाया है ?’’

जय को चिठ्ठी देखकर याद आया कि ठीक वैसी ही चिठ्ठी जैलर ख़ान ने उसे जैल से च्छुटने के बाद दी थी. लेकिन वो तो जूनगरह मे रह गयी थी. फिर जय सोचने लगा इस चिठ्ठी मे क्या राज़ हो सकता है ? फिर उसने कहा,’’देखो यह चिठ्ठी मैने नही बनाई है और इसका क्या मतलब होता है यह भी मैं नही जानता. आप लोग सिर्फ़ अपना टाइम वेस्ट कर रहे हो.’’

शक्तिसिंह और साथ मे चारो साधक हस्ने लगे कुच्छ पल के बाद संजयभाई ने कहा,’’हर खिलाड़ी ऐसा ही बोलता है जय, लेकिन हमे मालूम है कि सिर्फ़ तू ही मास्टरमाइंड था सारे खेल का. इसीलिए माल कहा च्छुपाया है यह भी तू ही जानता है.’’

जय बोला,’’अरे भाई कौन सा माल ? किस माल की बात कर रहे हो भाई ? सारा माल तो हमने आप के सामने ही रणवीरसींह के आदमियो को दे दिया था.’’

शक्तिसिंह बीच मे बोला,’’अरे पैसो की नही वो दो लोक्सेर्स के माल की बात कर रहे है जो आख़िर मे तोडा गया था और उसके बारे मे पोलीस को भी धोखा दे दिया था तुम लोगो ने और बाकी के दो करोड़ रुपये भी तो हाथ नही लगे है.’’

तब जय को अदालत की बात याद आई कि कुच्छ ऐसा हुवा था कि दो लॉकर्स का माल गायब था और दो करोड़ भी तो नही मिले थे इसीलिए तो उसको टॉर्चर किया गया था. वो कई बार बोला होगा कि यह बात वो नही जानता लेकिन किसी ने नही सुनी थी.
 


जय हस पड़ा और कहा,’’एक बात बताओ, तुम लोग बॅंक लूट के बाद हमे सज़ा मिली तब तक की सारी घटना जानते हो क्या ?’’

संजयभाई और अमरभाई ने हाँ कहा तो जय ने कहना शुरू किया,’’साजन, मैं, नीशी हम सब पकड़े गये थे. घूमने गये थे उदयन और मुनीश. तो आप लोग यह तो सोचो कि मैने कैसे माल च्छुपाया होता और कैसे यह काग़ज़ का टुकड़ा बनाया होगा ?’’

संजयभाई ने तुरंत कहा,’’देखो ड्रॉयिंग तो उदयन की ही है. और माल भी शायद उन दोनो ने ही छिपाया होगा. लेकिन डाइरेक्षन तुम्हारा होगा ना. इसीलिए तो तुमने जैसे कहा वैसा ड्रॉयिंग उदयन ने बना डाला. अब उदयन तो पागल हो चुका है और मुनीश मर चुका है. बाकी बचा तू तो तुझे ही सबकुच्छ पता होगा ना.’’

उदयन और मुनीश के बारे मे सुनकर जय बोल पड़ा,’’क्या अभी तक उदयन पागल है ? और मुनीश मर गया है ?’’

तुरंत शक्तिसिंह ने एक दो फोटोग्रॅफ्स दिखाए. एक मे उदयन हॉस्पिटल के बॅड पर था. बाल बिल्कुल सफेद और बिल्कुल शुन्य चेहरा और दूसरे फोटो मे मुनीश की खून से लथपथ लाश थी. फोटो देखकर ही जय के कलेजे मे एक कपकपि च्छा गयी.

संजयभाई हॅस्कर बोले,’’हमने झक नही मारी है इतने साल. जहाँ जहाँ ये दोनो गये थे सारी जगह ढूँढ डाली है इतने सालो मे. लेकिन आज तक कोई सुराग भी नही मिल पाया है. साले इस लिए तो तुझे इतने साल ज़िंदा रखा है कि तू छूटे और हमारा छुटकारा हो.’’

‘’छुटकारा ? और आप का ? किस से और वो कैसे भला ?’’ जय को कुच्छ समझ मे नही आ रहा था.

फिर एक जगह गाड़ी रौक्कर सब चाय पीने उतरे और वहाँ संजयभाई, अमरभाई और शक्तिसिंह ने धीरे धीरे पूरी बात बताई.

बॅंक लूट ने के बाद उस दो लॉकर मे जो कुच्छ भी माल होगा वो किसी को पता नही था. लेकिन उस माल से रणवीरसींह, खेंगरसिंह और स्वामी रामानंद को पिछले 5 सालो मे ब्लॅकमेल किया गया था और करोड़ो रुपये लूट लिए गये थे उसके पास से.

पूरी बात सुनकर जय को बड़ा आश्चर्या हुवा और उसने कहा,’’शायद मुनीश या साजन को लालच आ गया हो. क्यूकी सिर्फ़ वे दोनो ही बाहर हुवे थे इस स्कॅंडल से.’’

संजयभाई ने गंभीरता से कहा,’’ऐसा होता तो आपस का ही मामला होता और सुलझ भी जाता. लेकिन सब से हालत खराब तो साजन और उसके बाप विक्रम के है.’’

जय ने झटका खाकर कहा,’’क्यू क्या हुवा उसके साथ ?’’

शक्तिसिंह ने कहा,’’उनका तो सिर्फ़ नाम ही रहा है दुनिया मे. उसकी तो सारी दौलत लूट ली गयी है. कैसे रुआब हुवा करता था उसका. आज भिखारी जैसी हालत कर दी गयी है.’’

जय ने कहा,’’लेकिन यह कौन है ? किसने किया यह सब और कैसे लूटा आप लोगो को ?’’

शक्तिसिंह ने आँखे फाड़ कर जवाब दिया,’’साले तू नाटक मत कर. हमे पता होता सो साले को अब तक स्वर्ग लोक नही पहुचा देते. लेकिन जो भी है साला तेरे नाम से डरा रहा है और कुच्छ कुच्छ झलक दिखाता है. जैसे कभी कुच्छ फोटोग्रॅफ्स और कभी कुच्छ ऐसे दस्तावेज़ जिस से ये सारे लोग उसकी मुठ्ठी मे है. और साला खुद तो सामने आता नही और तेरे नाम से बोलता है कि ये तो सिर्फ़ ट्रेलर है अगर पैसे नही दिए गये तो सारी पिक्चर तेरे छूटने के बाद सारी दुनिया को बता दी जाएगी.’’
 
संजयभाई फिर हॅस्कर बोला,’’शांत हो जाओ शक्तिसिंह यह सब किया कराया इस मास्टर माइंड का है. जय ही है सारा सूत्रधार. क्यूकी वो आदमी सिर्फ़ जय के लिए ही काम करता है और वो बोल तो रहा है कि जब जय जैल से छूटे तो इतनी दौलत उसके पास होनी चाहिए कि किसी के पास ना तो काम माँगना पड़े और ना तो पैसा.’’

जय सोचता ही रह गया कि ऐसा कौन होगा जो उसके नाम पर स्वामी रामानंद, विक्रम, साजन, रणवीरसींह, खेंगरसिंह सब को लूटता रहा हो और उसे तो पता भी नही चला इतने साल तक. फिर कुच्छ देर वो मौन रहा और फिर बोला,’’देखो शायद आप लोगो ने जो बात की है वो सच हो सकती है. लेकिन वो आदमी जो इतने सालो तक आप को मेरे नाम से लूटता आ रहा है उसके बारे मे मैं तो आज तक कुच्छ जानता तक नही. और आप सब की यह हालत हो चुकी है यह भी तो मैं नही जानता यारो.’’

शक्तिसिंह ने अब गाड़ी स्टार्ट कर दी थी और पिछे मुड़कर कहा,’’ओ….भाई अब बस कर तेरा नाटक. हम सब जानते है और समझते भी है. वो तुम्हारा बाप ही है. हम सब ने तुझे जैल पहुचाया और तुम बाप बेटे ने मिलकर आज तक हम सब को लूटा. तू क्या यह नही जानता कि तेरे बाप और इन सब की नही बनती थी.’’

तभी जय को विक्रम और किशोरीलाल की सारे बाते याद आई. फिर उसने सोचा कि ऐसा शायद हो सकता है कि उसके पिताजी ज़िंदा हो और शायद ऐसा कर भी रहे हो. इसीलिए तो शायद उसकी मा को भी उसके पास ज़िंदा होना चाहिए. इतना सोचकर एक तरह से वो खुश हुवा कि इसका मतलब उसके मातपिता ज़िंदा है, सलामत है और उसका बदला ले रहे है.

लेकिन दूसरी तरफ उसे लग रहा था कि अगर ऐसा होता और इतने पवरफुल उसके पिताजी होते तो आज तक वो जैल मे नही होता और शायद छूटने के बाद तो इन चार पाँच दिनो मे उसके पास होना चाहिए था. फिर उसको याद आया कि जो कहानी उसने वो लेटर्स मे पढ़ी है उसमे कही भी रणवीरसींह, खेंगरसिंह या स्वामी रामानंद का तो नाम ही नही आया था. सिर्फ़ दुश्मनी विक्रम से ही थी. फिर ऐसा क्यू ?

जय ने तुरंत कहा,’’देखो भाई लोग मेरे पिताजी ज़िंदा है कि नही यह तक मैं नही जानता. और मान लो कि वो ज़िंदा है तो आज तक मैं जैल मे नही होता और अगर होता तो छूटने के बाद मैं आज आप के पास नही उसके पास होना चाहिए था. अगर वो इतने पवरफुल होते तो मुझे इस तरह आप किडनॅप कर जाओगे इस बात मे कुच्छ दम नही है. दूसरा मैने मेरे पिताजी और विक्रम यानी कि साजन के बाप की दुश्मनी के बारे मे पिच्छाले एक साल मे ही जाना है. क्यूकी कोई मुझे भी लेटर भेज के सब कहानी बता रहा है. और उस कहानी मे कही भी स्वामी, रणवीरसींह या खेंगरसिंह का नाम नही है. तो फिर अगर मेरे पिताजी ज़िंदा भी है और अगर इतने पवरफुल है तो मैं आज आप के साथ क्यू हू ? और उसकी क्या दुश्मनी बाकी सब के साथ है इस पर थोड़ा सोच लो.’’

अमरभाई ने खुल के हॅस्कर कहा,’’बेटे यह तो तेरी खुद की कहानी है. और इसके पहले कि तेरा बाप तेरे तक पहुच जाए उसके पहले हम लोग पहुच चुके है.’’

जय ने हॅस्कर उसके सामने देखा और कहा,’’नही भाई आप ग़लत हो. अगर थोड़ी देर होती या तो यह भाई साब मुझे नही बताते तो मैं उस CBई एजेंट के साथ देल्ही होता और वहाँ सेफ होता.’’

संजयभाई ने तुरंत कहा,’’तभी सोचकर तो तेरा बाप आराम से संचालन कर रहा होगा ना कि मेरा बेटा तो आसानी से देल्ही तक पहुच जाएगा और किसी के हाथ कुच्छ नही आएगा और जब कुच्छ समय के बाद सब शांत हो जाता तो आसानी से तुम लोग कही और बस जाते और हम से आसानी से पिछा छुड़वा लेते.’’

जय ने तुरंत हॅस्कर कहा,’’लॉजिकली तो आप भी सही हो. लेकिन यह सब मुझे तो मालूम होना चाहिए ना. मैं तो इन मे से कुच्छ नही जानता. यहाँ तक कि दो लॉकर्स किसने तोड़े, क्यू तोड़े ? उसमे ऐसा क्या था कि स्वामी, साजन का बाप और रणवीरसींह और उसके बाप का जीना भी हराम हो सकता है. और सब से बड़ी बात मेरे पिताजी अगर ज़िंदा है तो उसकी स्वामी या रणवीरसींह और उसके बाप से क्या दुश्मनी थी भाई? और स्वामी ने ऐसा क्या किया है जो मेरे पिताजी से डरना पड़े ?’’

अमरभाई ने फिर से कहा,’’तेरा बाप खेंगरसिंह को पहचानता है और उसकी वजह से ही आखरी बार जोधपुर से उसको भागना पड़ा था. इतना तो तू जानता ही होगा.’’

यह नयी बात सुनकर जय चौक पड़ा और उसने कहा,’’अरे मेरे भाई यह सब कुच्छ मैं नही जानता. जीतने भी लेटर्स मुझे मिले है उसमे लास्टवाले लेटर मे यही लिखा है कि आखरी बार जोधपुर के लिए मेरे पिताजी निकले थे बाद मे उसका कोई नामोनिशान नही है.’’

‘’तू झूठ बोल रहा है जय, लेकिन हम आसानी से तेरा और तेरे बाप का पिच्छा नही छ्चोड़ेंगे याद रखना.’’ संजयभाई ने चिल्लाकर कहा.

क्रमशः……………………….
 
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