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कुदरत का इंसाफ

सीजर के नाम पर डॉली का दिल धक्क से रह गया था।न चाहते हुए भी आंख में आंसू उमड़ आया था।

उसने रोटी को जलता छोड़कर इस तरफ गर्दन मोड़कर देखा। आंख का आंसू मोटा हो गया था और पलक से बहपड़ा। गाल पर रेखा खींचता चला गया।

सीजर के नाम पर सन्नी भी चौंक उठा था। बड़े गौर सेराज की सूरत देखता रहा।

उसे यूं देखता पाकर राज बोला–“अब यूं दीदे फाड़करक्या देख रहे हो–प्यार से देखो, मैं प्यार से देखने की चीज हूँ –।”

“क्या तुम सीजर के लिए सीरियस हो?”

“मैं तो तुम्हारी हूँ । चाहे जिस हाल में रखो, जिसमें तुम्हेंखुशी मिले मगर अभी–।”

“मगर अभी?”

“सीजर के लिए सीरियस नहीं हो सकती–यह समाज, यहदुनिया, ये बहुत बुरी है, कभी दिल चाहता है, इस दुनिया मेंआग लगा दूं –बहुत बुरी है यह दुनिया मेरे राजा–किसी की खुशी बर्दाश्त नहीं करती, मेरा वश चले तो मैं यही कपड़ेपहनकर बाहर निकलूं, सुहागन बनकर, मगर यह दुनिया बर्दाश्तकर लेगी? कभी नहीं–साली इस दुनिया को तो ठोकर मारकरकहीं गर्क में डाल दूं।”

“कोई बात नहीं छम्मो।” वह उसका गाल सहलाता हुआबोला–“दुनिया बुरी नहीं है बल्कि हमारे दिल का डर बुरा होताहै। डरपोकआदमी के लिए दुनिया बुरी होती है–अभी यहकपड़े पहनकर तुम बाहर निकल जाओ तो कौन क्या करसकता है, मगर तुम डरपोक हो कि लोग क्या कहेंगे–अरे लोगोंका तो काम है कहना–हमारा काम है अपनी जिंदगी जीना–मेरीछम्मकछल्लो तुम डरपोक हो–।”

“तो–डरपोक तो इसीलिए हूँ कि यह दुनिया क्या-क्या बातेंकरती है, इसीलिए तो यह बुरी है।”

सन्नी कहकहा लगाकर हंस पड़ा–“तुम डरपोक भी होऔर कायर भी हो–अपने निकम्मेपन को दूसरे के कंधे परडालकर बरी हो जाना चाहती हो।”

“यह सारी बातें छोड़ो सनम हरजाई, प्यार का मौसम है,प्यार की बातें करो–।”

“अभी तो भूख की बातें कर लो।” सन्नी पुनः किचन कीतरफ देखते हुए बोला।

“हां, आज तो मेरा सजना आया है–डॉली ने जरूर कोईबेहतरीन डिश बनाई होगी।” कहकर वह छमछम करता किचनकी तरफ बढ़ा।

किचन में घुस गया।

डॉली निष्क्रिय रूप से व्यस्त थी।

सिर पर चुनरी रखे राज बोला–“क्या बनाया हैडॉली– ?”

डॉली कुछ नहीं बोली।

राज की दृष्टि हॉटपॉट में रखी जली हुई रोटियों पर पड़गयी। वह एक जली हुई रोटी को उठाते हुए बोला–“यह क्या है ?”

उस रोटी को देखकर डॉली पुनः काम में व्यस्त हो गयी।जब तक राज ने दूसरी रोटी उठा ली–“क्या है डॉलीयह–क्यों मेरा जी जला रही है, जानबूझकर रोटी जलाकर रखरही है, तुमसे आज से पहले तो कभी रोटी नहीं जली।”

डॉली अब भी कुछ नहीं बोली। कुछ बोलने को उसकेपास शब्द ही नहीं थे, क्या बोले?

राज बोला–“तेरी हरकतों को मैं खूब समझ रही हूँ, मगर तूने जो दिमाग में पाल रखा है, उसे निकाल दे, तू मेरे साथसही चलेगी तो मैं तेरे साथ सही चलूंगी वरना तू मुझे जानतीनहीं है।”

उसकी गुर्राहट को सुनकर सन्नी किचन में आ गया। उसेवैसे भी डॉली के पास आने का बहाना चाहिए था।

राज से बोला–“क्या हुआ, दोनों पत्नियां किस बात परलड़ रही हो?”

“इसके दिमाग में गलतफहमी बैठ गयी है, बड़े मुगालते मेंहै यह, इसे यह नहीं पता कि मैं कितनी खतरनाक चीज हूँ लेकिन मैं तो प्यार से ही बात कर रही हूँ और बता, तूनेडिश क्या बनाई है–?”राज सब्जी की कड़ाही की तरफगया। ऊपर रखी प्लेट हटाकर देखी तो उसकी त्यौरियां चढ़गयीं।

“क्या बनाया है यह?”

डॉली ने बड़ी असहाय और कंपकंपाती दृष्टि से राजकी तरफ देखा जो उसे आग्नेय नेत्रों से घूर रहा था। डॉलीडरे-सहमे स्वर में बोली –“आलू-मटर की सब्जी बनाई है।”

राज के दांत किटकिटा उठे। क्रोध इतना दिमाग पर हावीहुआ कि मन तो हुआ कड़ाही की सब्जी को उसी के सिर परदे मारे।

मगर कसमसाकर रह गया।

नथुनों से आग निकलती रही।

शब्दों को चबाकर वह फुफकारा–“आलू-मटर की सब्जीऔर जली हुई रोटी–? तुझे कल शाम ही मैंने बता दिया थाकि दोस्त आने वाला है आज और दोस्त भी कितना इम्पोर्टेड,फिर भी तूने यह बनाकर रखा है–मेरा कलेजा जलाने केलिए–।”

“बता जाते क्या बनेगा।” बड़े साहस के साथ उसने इनशब्दों को हलक से बाहर निकाला।

वह किचकिचाते हुए बोला–“क्या करूं तेरा मैंऽऽ?”

सन्नी बोला–“क्यों परेशान हो रही हो तुम–आलू मटर की सब्जी है न–अरे वाह–यह तो मेरी मनपसंद डिश है–तुम क्या भूल गयींजानेमन...मैं आलू मटर कितने शौक से खाता हूँ –स्वीट डिश।” सन्नी ने एक आलू उठाया और मुंह में डाललिया।

डाला तो इस इरादे से था कि खुलकर तारीफ करेगा मगर मुँह में पड़ते ही वह खुद चक्कर खा गया–

और राज से बोला–“क्या तुम्हारे घर में नमक नहींखाया जाता है–?”

“क्या इसमें नमक नहीं है?”राज की बुद्धि नाच उठी।

डॉली दहल गयी।

“है–है–।” वह बात सम्भालने लगा–“मगर कम है–गुड,मैं कम ही खाता हूँ ।”

तब तक राज ने मटर का दाना मुंह में डाल लिया थाऔर गर्जन भरे स्वर में बोला–“इसमें तो कोई स्वाद ही नहींहै–नमक तो डाला ही नहीं है–ओ मेरे भगवान!” वह दांतपीसने लगा।
 
सन्नी उसके कंधों पर हाथ रखकर उसे बाहर लेताचला–“बाहर चलो–जहां दो औरतें खड़ी होती हैं, वहां हाय-हाय,कै-कै ही होने लगती है–कोई नहीं–सब्जी कभी अच्छी बनतीहै, कभी खराब भी बनती है, अच्छी सब्जी हम खाएंगे तो खराबकौन खाएगा?”वह उसे किचन से बाहर ले गया।

राज चलते हुए घाघरा संभालने लगा और बोला–“यहजानबूझकर नाटक दिखा रही है, कल मैं इससे कुछ ज्यादा प्यारसे बोल लिया था इसलिए सिर पर खड़े होकर मूतने लगी–दोमिनट में अक्ल ठिकाने लगा दूंगा, रही हो किसी और केभरोसे।”

“कूल डाउन मंजू, कूल डाउन–इतनी बड़ी बात नहीं है,जितनी बड़ी तुम कर रहे हो–गलतियां इंसान से होती हैं–मूड ठीक नहीं होता है तो गलतियां होती हैं–।”

“मूड ठीक नहीं है तो क्या करेगी यह मेरा?”

“कुछ नहीं–मैं हूँ ना–तुम्हारे साथ जो करूंगा, मैं करूंगा –चलो अपना कमरा तो दिखा दो–हम कहां ऐश करेंगे–अभी मुझे फ्रेश भी होना है–।”

“आओ–।” राज मूड चेंज करना चाहता था। ज्यादा ही गुस्सा आ गया था उसे। वह खुद गुस्से से उबरना चाहता था।

राज ने उसका बैग पकड़ा और सरकाते हुए एक कमरे मेंले गया।

पीछे-पीछे सन्नी भी घुसा।

☐☐☐
 
सन्नी जब तक फ्रेश होता रहा, राज बेड पर लेटा रहाऔर गम्भीर चिंतन में डूबा रहा।

वह डॉली को लेकर गम्भीर था।

समझने की कोशिश कर रहा था कि वह डॉली को कैसेकंट्रोल करे कि वह सीधे रास्ते पर चलने लगे।

राज की खुशी में खुश होने लगे।

आखिर उसे राज की खुशी में खुश होने में परेशानी क्याहै? उसे क्या चाहिए? उसे छत दे दी, खान-पान, राशन सब देदिया...और क्या चाहिए, प्यार से बात होती है, और भी कुछचाहिए क्या?

मगर यह नाजायज फायदा उठा रही है, शराफत का।

फिर कैसे इसके साथ व्यवहार किया जाए? डरा-धमका भीरहा है, प्यार से भी बात कर रहा है, अब अगर वह यह चाहतीहो कि सन्नी इस घर में न रहे या राज अपने अरमान पूरे नकरे तो यह तो नामुमकिन है। यह अब नहीं हो सकता। चाहेदुनिया से लड़ना पड़ जाए। चाहे मरना पड़ जाए। वह मौत गंवारा कर सकता है मगर वैसी प्यासी और तड़पती जिंदगीनहीं जी सकता जैसे सन्नी के आने से पहले तक जी रहा था।

अब तो जिंदगी में बहार आई है। उसका पोर-पोर खुश हुआ हैऔर इस करमजली को उसकी खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही।

जल रही है, इसी जलन में रोटियां जला रही है, सब्जीखराब बना रही है ताकि मैं तंग आ जाऊं और सन्नी को वापसभेज दूं।

मगर मूर्ख–

वह नहीं जानती कि सन्नी की मुझे कितनी जरूरत है, जैसेतपती धरती को बरखा की जरूरत होती है। ऐसे ही मुझे सन्नी की जरूरत है।

सीधे रास्ते पर तो उसे आना पड़ेगा, चाहे जैसे आये।

सन्नी ने बाथरूम का दरवाजा खोला और कमरे में आया।

राज को देखते हुए बोला–“मंजू माई वाइफ, तुम डॉलीके साथ गलत व्यवहार कर रहे हो।”

“मैं गलत व्यवहार कर रही हूँ, तुम अभी उसे जानते नहींहो–जानबूझकर ड्रामा दिखा रही है वह मगर अभी वह मुझेसमझ नहीं पा रहीहै।”

“ऐसी कोई बात नहीं है–अभी हमें उसे समझना होगा–हमजो कुछ भी कर रहे हैं, यह उसके लिए बहुत बड़ा शॉक है, वहफिर भी चुप है, कुछ नहीं कर रही है–कोई दूसरी औरत होतीतो बड़ा बखेड़ा खड़ा कर देती।”

“यह कुछ नहीं कर सकती–बखेड़ा खड़ा करना यह भीचाह रही है मगर मेरे डर के मारे चुप है–मैंने इसे बड़ा काबू मेंकरके रखा है, इसे खुली छूट मिल जाए तो यह तुम्हें एक मिनटघर में न रहने दे।”

“फिर भी मुझे लगता है कि वह काफी सीधे स्वभाव कीहै–तुमने तेज-तर्रार महिलायें नहीं देखी हैं, उन्हें किसी तरहकाबू में नहीं लाया जा सकता–यह हमारा गुडलक है किडॉली का स्वभाव खराब नहीं है, थोड़ा प्रेम से बोलो, वह कोईसमस्या खड़ी नहीं करेगी, यहहमारे लिए बड़ा प्लस प्वाइंट है।तुम इस बात को समझो।”

“तुमने देखा नहीं कि क्या खाना बनाया है इसने?”

“कोई बात नहीं, माफ करना बड़े दिल वालों का काम होता है –खाना ही तो खराब बनाया है, मुंह से तो कुछ खराब नहींबोल रही है, यह बड़ी गनीमत है, प्यार से समझाओ तो खुद शर्मिन्दा हो जाएगी–।”

“पता नहीं–।” राज ने बुरा-सा मुंह बनाया।

“चलो खाना खाते हैं, मुझे भूख लग रही है।”

राज घाघरा सम्भालते हुए उठा।

सन्नी कमरे से बाहर की तरफ चला। राज बाहर जाने सेपहले कुछ क्षण को ड्रेसिंग टेबिल के समक्ष खड़ा हो गया औरअपना रूप लावण्य चेक करने लगा।

थोड़ा नकली बालों की लट को संवारा और छमछम करताकमरे से बाहर आ गया।

वे लोग डायनिंग टेबल पर आकर बैठ गये।

डॉली किचन में ही थी, उन्हें बैठा देखकर वह तेजी सेउनके पास आई और सहमे स्वर में बोली–“मैं सब्जी दोबाराबना रही हूँ, बसबन चुकी, थोड़ी-सी देर है–।”

राज अपनी बिगड़ी सूरत लिये बैठा रहा।

जबकि सन्नी ने मुस्कुराकर कहा–“कोई बात नहीं डॉलीजी, आप आराम से बनाइये और सब्जी वो भी ठीक थी, खराबनहीं थी, मुझे तो अच्छी लगी–मैं उसी को खाऊंगा।”

डॉली पुनः तेजी के साथ किचन में घुस गयी थी।

इस बार वह सब्जी पर पूरा ध्यान रखे थी, कहीं बिगड़ नजाये।

राज बिगड़ा हुआ चेहरा लिये बैठा रहा।

☐☐☐

आधा घण्टा पश्चात् वे लोग खा-पीकर फ्री हुए।

इस घर का दस्तूर थोड़ा बदल गया था। अभी तक डॉलीऔर राज एक साथ बैठकर खाना खाया करते थे मगर अबसन्नी और राज एक दंपत्ति की हैसियत से खाना खा रहे थेऔर डॉली एक वेटर की हैसियत से अपने कर्त्तव्य की इतिश्रीकर रही थी।

डॉली के लिए यही काफी सुकून की बात थी कि वहअपनी गलती सुधार चुकी थी और राज की त्यौरियां नहीं चढ़रही थीं। वह आराम से खाना खा रहा था।

सुकून से खाना खाकर राज निवृत्त हो जाये, डॉली केलिए फिलहाल यही बड़ी बात थी।

अलबत्ता सन्नी जरूर खाने की भरपूर प्रशंसा करता जा रहाथा। मानो उससे अच्छा खाना उसने कभी खाया ही न हो।

डॉली इतना तो बखूबी जान रही थी कि सन्नी झूठीप्रशंसा कर रहा है लेकिन तब भी उसे इस हमदर्दी की सख्तजरूरत थी। उसकारोल डॉली को बहुत सुकून दे रहा था।राज जब डॉली के ऊपर आग-बबूला होता है तो डॉलीनहीं समझ पाती कि वह राज को कैसे ट्रीट करे? किस तरहशांत करे? वह जितना शांत करने का प्रयत्न करती है, पट्ठाउतना बिगड़ता चला जाता है और डॉली के ओसान खताहोते चले जाते हैं।

लेकिन अब सन्नी की भूमिका डॉली को रास आ रहीथी। वह कम-से-कम उसकी हिमायत कर रहा था, यह काफीकाबिले सुकून था।

मगर उसकी तारीफ को वह खुले दिल से स्वीकार नहीं करपा रही थी, इसके स्थान पर वह गुमसुम सी थी।

वे लोग खा पीकर निवृत्त हुए।

डॉली ने यूं सुकून की सांस ली जैसे बेटी वाले ने बारातको खाना खिलाकर सुकून की सांस छोड़ी हो।

खाना खाकर वे लोग सोफे पर बैठ गये।

सन्नी डॉली से बोला–“डॉली अब तुम भी खाना खालो और आज तो पहली बार था, आईन्दा साथ में बैठकर हीखाना खाना।”

प्रत्युत्तर में डॉली कुछ नहीं बोली। इस पर थोड़ी हैरानजरूर हुई कि सन्नी ने किस अधिकार से उसे डॉली कहकरपुकारा था।

मगर इस पर उसने कोई रियेक्ट नहीं किया। न कोई भावदिया।

राज सन्नी से बोला–“कब ज्वाइनिंग है तुम्हारी?”

“बाईस तारीख को यानि अतरसो।”

“बैंक भी पास है लेकिन तब भी एक किलोमीटर बैठेगा, आना-जाना कैसे रखोगे?”

“हो जाएगा–रिक्शे से हो जाएगा।”

“हूँ –फैक्टी से लेट आती हूँ और इधर सुबह में भीसाढ़े नौ तक निकल जाती हूँ –।”

“हूँ –।” सन्नी ने हुंकारा भरा।

डॉली डायनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाने लगी थी।

राज बोला–“चलो सन्नी, अब लेटते हैं।”

सन्नी डॉली को देखते हुए बोला–“हां चलो, टाइम भीकाफी हो गया।”

“चलो।”

राज उठकर खड़ा हो गया और कमरे की तरफ बढ़ा ।

डॉली टेबल पर बैठी शून्य पर नजरें टिकाये खाना खातीरही।
 
वे दोनों कमरे में समा गये। राज ने दरवाजा बोल्ट कर दिया और बेड पर बैठता हुआ बोला–“बहुत हरामजादी है, इसकी तो सूरत से मुझे चिढ़ हो गयी है–थूथनी लिये बैठीरहेगी–कितना अच्छा मैंने साज शृंगार किया था, एक बार भीइसने तारीफ नहीं की कि मैं बहुतअच्छी लग रही हूँ ।”

सन्नी मुस्कुराता हुआ बोला–“तुम मेरे लिए सजी-संवरीहो, तो तारीफ करना तो मुझे बनता है।”

“इसके मुंह से बोल क्यों नहीं फूट सकते–फूटेंगे कैसे–सीनेपर तो सांप लोट गया होगा मेरा रूप-रंग देखकर–सोच रही होगीकि मंजू तो मुझसे भी अच्छी दिख रही है–तो तारीफ कैसे करेगी,मैं काली होती तो तब देखो कितना बोलती–घमण्डी है न–।”

“कोई बात नहीं मेरी जान–तुम्हारी तारीफ के लिए भगवानने मुझे बनाया है।” कहकर उसने उसकी चुनरी उतारी औरफर्श पर फेंक दी।

राज बेड के बीचों-बीच बैठ गया था। किसी नई नवेलीकी तरह।

राज बोला–“यह कहीं सुसाइड तो नहीं कर लेगी–?”

“सुसाइड–?”सन्नी के हाथ जहां के तहां स्थिर होगये–“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

“बस इसी बात का मुझे डर लगता है, इसीलिए मैं चुप रहती हूँ वरना इसकी अक्ल तो एक दिन में ठिकाने लगा दूं, मगरयही डर लगा रहता है कि कहीं यह मर-वर न जाये–।”

“इतनी आसानी से कोई नहीं मरता यार और क्योंमरेगी–अपनी जान देना कौन चाहता है–मरने से पहले कुछतो कहेगी, कुछ तो बातें रखेगी, ऐसे थोड़े कि एकाएक मर जाये–नहीं-नहीं ऐसा नहीं होता–।”

“मैं तो इससे शादी करके फंस गयी यार–कोई सही दिमागकी लड़की होती तो आज कितनी खुश होती। फैमिली में दो केबजाय तीन लोग हो गये–कोई दूसरी होती तो खुद मुझेसजाती-संवारती और उस खुशी के मौके को हंस-हंसकर सेलिब्रेटकरती। मगर इसकी तोथूथनी ही नहीं संवरना चाह रही है।”

“कोई बात नहीं है, हमें उसकी मेंटिलिटी पढ़नी होगी। उसीतरह उससे व्यवहार करना होगा, मुझे उम्मीद है धीरे-धीरे वहरास्ते पर आ जाएगी और तुम भी अपना गुस्सा कम करो–उससेज्यादा मुझे तुम्हारा व्यवहार गलत लग रहा है।”

कहते हुए सन्नी ने राज का टॉप उतारकर फर्श पर फेंकदिया।

राज के शरीर पर काली ब्रा थी जिसमें उसने न जानेक्या-क्या भर रखा था, बड़ी बेढब नजर आ रही थी।

काफी शेप देने के बावजूद भी ब्रा में सुडौलपन बिल्कुलनहीं था।

काली असुडौल ब्रा में वह बड़ा अजीब नजर आ रहा था।

सन्नी ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसका घाघराखोलने लगा।

राज आंखें बंद करके इस आनंद को अनुभव करने काप्रयत्न कर रहा था।

☐☐☐

डॉली की आंखों से नींद कोसों दूर थीं। वह बिस्तर पर करवटें बदल रही थी।

ऐसा तो उसने कहीं नहीं सुना था कि किसी का भाग्य इतना काला भी हो सकता है, जितना डॉली का साबित हुआ था। बहुत-सीत्रासदियां जीवन में घटित होती हैं, लेकिन ऐसी त्रासदी जिसका सामना डॉली कर रही थी, सर्वथा डॉली की जानकारी में पहला मामला था।

वह निर्णायक हो रही थी।

अपने जीवन में नये सिरे से दृष्टिपात कर रही थी।

भूमिका तलाश रही थी कि उसे क्या करना चाहिए?

बड़ा प्रश्न था कि वह कर क्या सकती है?

उसे राज से तो हर हाल में स्वतंत्रता चाहिए थी। राज के साथ तो अब उसका दम घुटने लगा था। राज केअब जीवनयापन सम्भव ही नहीं था।

तदापि पहले भी राज उसी प्रकार की उस पर ज्यादतियाँ करता आया है। कदाचित सब्जी में नमक बढ़ गया तो मानोयह अक्षम्य गुनाह हो गया। ऐसे किसी भी मौके पर पर डॉली को खा जाने को आतुर हो जाता था मगर तब डॉलीधैर्य से काम लेती थी और सब्र करती थी। क्योंकि वह मानतीथी कि एक औरत की नियति ही यही है।

इस त्रासदी को दुनिया में अधिकांश औरतें झेल रही हैं औरसब्र के साथ जी रही हैं तो वह कोई अन्य फैसला क्यों ले–?

लेकिन अब इस हालिया त्रासदी, जो इतनी हौलनाक थीकि उसका अस्तित्व निगलने को आतुर थी, ने उसे नये सिरे सेसोचने पर विवश कर दिया था।

अब तो कुछ सोचना ही पड़ेगा। नियति मानकर अब वहचुप नहीं रह सकती।

मगर क्या स्टेप लें, यह उसकी समझ से परे हो रहा था।

उसे पता था कि मैं अपनी मम्मी को विश्वास में कभी नहींले सकती। भगवान को तो विश्वास में ले सकती है लेकिन मम्मी उसकी बात सुन ले और गम्भीरता का प्रदर्शन कर ले,यह असंभव है।

इसीलिए उसका सिर दर्द करने लगता था। राज के खिलाफ तो जैसे वह कोई शब्द सुनने को तैयार ही नहीं रहती थी। कभी डॉली ने कोई शिकायत की भी तो शन्नो कुमारी का दिमाग सीधे ऋषभ के करेक्टर की तरफ घूम जाता था और उसे लगने लगता था कि डॉली जानबूझकर ड्रामा क्रिएट कर रही है।

जो कि शन्नो कुमारी के लिए अश्रुत था।

वह बस मामले की लीपापोती शुरू कर देती थी और उल्टा डॉली को ही समझाने लगती थी कि सारे पति ऐसे ही होते हैं। ऐसे ही दिमाग खराब करते हैं, स्त्री का दायित्व है कि वह इन सबको झेले और बर्दाश्त करे क्योंकि स्त्री के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

डॉली हताश हो जाती थी। दुनिया में कोई दूसरा नहीं था जिससे वह अपनी विपदा सुना सके।

हार कर वह अपने नसीब को कोसते हुए वक्त के साथ निबाह करती चली जाती थी।

मगर अब क्या करे ?

ऐसी सूरत में —?

अब तो शायद मम्मी भी राज के इस रूप को जान ले तो निसंदेह डॉली को धैर्य रखने का सबक न दे पाये बल्कि राज की जबरदस्त क्लास ले लें।

कौन सास होगी जो दामाद के इस रूप को बर्दाश्त कर ले ?
 
डॉली यही सोच रही थी कि यह सब वह अपनी मम्मी की जानककारी में किस प्रकार लाये?

सीधे-सीधे बताने से डॉली घबरा रही थी। राज बहुत जालिम है, उसे पता चले तो पता नहीं कैसा तूफान खड़ा कर दे — ।

मगर अब तो हर तूफान झेलने के लिए डॉली को तैयार रहना चाहिए।

मगर —

इस क्लैश का अंतिम पड़ाव डॉली और राज का अलगाव था —

फिर डॉली क्या करेगी?

कहां जाएगी?

यह सवालिया निशान उसका वजूद निगलने को तैयार था। ऋषभ तो उसे स्वीकार नहीं सकता। ऋषभ में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपनी फैमिली से हटकर कोई फैसला ले सके। वह पहले ही स्थिर नहीं रह पाया तो अब उससे ऐसी आशा करना हद दर्जे की मूर्खता के सिवा कुछ नहीं था।

फिर वह क्या करेगी और कहां जायेगी? उसके घर में तो उसकी भाभी का राज था। जहां अधिक दिन तक उसका गुजारा नहीं था। मुहल्ले पड़ोस वाले भी क्या-क्या बातें बनाएंगे जो उसके लिए असहनीय हो जाएगा।

ऐसी तानों भरी और ठोकरों भरी जिंदगी से तो हजार गुना बेहतर है कि वह उसी जलालत को झेले जिस जलालत को यहां झेल रही है।

अंदर से भले ही वह कितनी दुःखी सही लेकिन दुनिया की नजर में तो सुहागन है और अपनी फैमिली की स्वामिनी है। यह भरम दुनिया में सम्मान के लिए काफी था।

हकीकतों में एक सर्वोपरि हकीकत यह थी कि दुनिया भले झूठी जिंदगी को सम्मान दे मगर वह सम्मान जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। काटों भरे बिस्तर पर मखमल की चादर बिछी हो और दुनिया उस चादर को सम्मान दे रही हो तो भले सम्मान झूठा हो मगर जीवन के लिए ऑक्सीजन की मानिंद साबित होता है। उसके बिनस्पत सच्ची जिंदगी जिसको दुनिया का तिरस्कार प्राप्त होता है, वो जिंदगी गले की फांस बनकर हल्क में अटकी रहती है।

डॉली बहुत बारीकी से अपने जीवन का निरीक्षण कर रही थी।

क्या करे?

क्या न करे?

एक बार अगर उसने राज की असलियत अपनी मम्मी को या बाहरी किसी भी व्यक्ति को बता दी तो देर-सवेर घर में तूफान खड़ा होनाही है। राज चुप रह जाने वाला आदमी नहीं है। वह न जाने क्या-क्या क्लेश पैदा कर देगा फिर उसका सामना डॉली कैसे कर पाएगी?

तो क्या इसी तरह जीती रहे?

क्यों न फिर इससे बेहतर है वह इस इहलीला को ही समाप्त कर ले जिसको ढो पाना उसके वश से बाहर हो चुका है।

उसने जाने कैसा निर्णय लिया कि वह उठकर दरवाजे तक गयी और दरवाजे को भीतर से बोल्ट कर दिया।

उसके चेहरे पर दृढ़ता स्थापित थी।

☐☐☐

सुबह छः बजे तक डॉली हर हाल में बिस्तर छोड़ देती थी और किचन में चाय तैयार करके स्वयं भी पीती थी और राज को भी पिलाती थी।

उसके बाद से ही वह दैनिक कार्य में मशगूल हो जाती थी। राज साढ़े नौ बजे ड्यूटी के लिए निकलता था और लंच साथ में लेकर जाता था, तो स्पष्ट सी बात थी सुबह-सुबह किचन में ढेर सारा काम रहता था।

किचन में काम ही सुबह और शाम को रहता था। दिन में डॉली तो कभी कुछ बनाती नहीं थी। अपने एक पेट के लिए क्या खाना बनाये? सुबह का ही तैयार खाना वह दिन में लेती थी।

राज की आदत थी सुबह छः बजे चाय की।

इस फ्लैट में दो बेडरूम थे और दोनों के गेट आमने-सामने थे।

राज की आंख नियत समय पर खुल गयी थी। वह अपने कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आ गया मगर बड़ी अजीब हालत में था, कोई देखे तो चौंक ही पड़े।

शरीर पर मात्र काली ब्रा और पैंटी थी, होंठों की लाली धुल गयी थी। लम्बे नकली बाल पीठ पर लहरा रहे थे।कमरा खोलकर बाहर आया तो डॉली को किचिन, हाल में न पाकर क्रोधित हुआ।

कदाचित जानबूझकर ड्रामा कर रही है। जो रोज सवेरे उठती थी तो आज क्यों नहीं उठी?

उसकी दृष्टि उठी डॉली के रूम की तरफ। वह दोबारा क्रोधित हुआ यह जानकर कि दरवाजा अंदर से बोल्ट है।

दरवाजा तो कभी बोल्ट नहीं रखती है। बस भिड़ा देती है, तो आज क्यों बोल्ट कर लिया?

राज गुस्से में तेज कदमों से उस रूम के दरवाजे पर गया और उसे ठकठकाया।

एक बार हथेली से ठकठकाया, जब कोई प्रतिक्रिया नहीं पाई तो आवाज के साथ ठकठकाया—“क्या ज़्यादा नींद आ रही है—उठ।”

अब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

राज ने ज्यादा जोर से भड़बड़ाया—“खोलती क्यों नहीं—बहुत परेशान कर रही है तू मुझे।”

अब भी प्रतिक्रिया नहीं मिली।

अलबत्ता सन्नी की आंख जरूर खुल गयी। वह घबराया हुआ अपने कमरे से बाहर आ गया। उसके शरीर पर वीशेष अण्डर वियर था।

बाहर आते ही बोला—“क्या हुआ, क्या हुआ?”

“देखो तुम, कितना नाटक कर रही है और तुम कहते हो कि प्यार से बोलो—जानबूझकर नहीं खोल रही है—रोज सुबह उठती है मगर आज नाटक दिखा रही है।”

सन्नी के चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव थे। उसने गेट थपथपाया—“डॉली दरवाज़ा खोलो—डॉलीSS।”

अब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

राज के चेहरे पर जहां क्रोध की मात्रा बढ़ी, वही सन्नी के चेहरे पर घबराहट की मात्रा बढ़ी।

सन्नी बोला—“क्या यह इतनी लेट तक यूं ही बेसुध सोती है?”

“कभी नहीं, आज नाटक दिखा रही है, सुबह छः बजे फिक्र से उठने वाली औरत है, मगर अब मेरी नाक में दम करने का ड्रामा रच रही है।”

“डॉलीSS।” सन्नी मीठे स्वर में पुकार लगा रहा था।

मगर अंदर हलचल पैदा होने का नाम ले रही थी।

सन्नी ने राज से पूछा—“क्या इस कमरे की कोई विण्डो नहीं है?”

“बाहर की तरफ है।”

“कैसे पहुंचा जाएगा?”

“कैसे भी नहीं—ग्राउण्ड से सीढ़ी लगानी पड़ेगी। तब पहुंचा जा सकता है मगर उस सबकी जरुरत क्या है—जब यहां से नहीं जाग रही है तो विण्डो से आवाज लगाने से कैसे जाग जाएगी?”

“कोई सीढ़ी का प्रबंध है?”

“उसका क्या करना है।”

“यह दरवाजा टूट सकता है?”

“दरवाजा क्यों तोड़ने लगे तुम? पागल होगये हो क्या?”

“फिर इसका कैसे पता चले?”

“मत उठने दो—चाय मैं खुद बना लूंगी। खाना बाहर ले लूंगी, मगर आज इसे उठने दो, इससे हिसाब-किताब ही करना है।”

राज तो निश्चिंत था या उसका क्रोध उसे वो नहीं सोचने दे रहा था जो सन्नी सोच रहा था और सोच-सोचकर इतना ज्यादा परेशान हुआ जा रहा था कि उसे एक पल चैन ही नहीं मिल रहा था।

राज मात्र ब्रा और पैन्टी में अपने कूल्हे मटकाता हुआ किचन की तरफ बढ़ गया।

सन्नी ने इस बार ज्यादा कोशिश के साथ देर तक थपथपाया—“उठो डॉलीSS—।”

इस बार भीतर कुछ हुआ।

भड़ाक से दरवाजा खुल गया।

डॉली ने जब दरवाजे पर सन्नी को मात्र वी शेप अण्डर वियर में पाया तो उसने अपना चेहरा हथेलियों से छिपा लिया और पुनः वापस पलट गयी।

उसे देखकर सन्नी को बड़ी शांति मिली। पिछले क्षणों में घबराहट के जो चिन्ह चेहरे पर प्रकट हो गये थे उनकी सम्पूर्ण विदाई हुई।

उसने अपनी अवस्था को देखा और वह तुरंत अपने रूम में चला गया तथा लोअर और टी शर्ट पहनने लगा।
 
इधर जब राज को आभास मिला कि दरवाजा खुल चुका है तो वह किचन में जाते-जाते वापस आ गया और तेज कदमों से डॉली वाले कक्ष में घुस गया।

डॉली हैरान-परेशान सी बेड पर टिकी खड़ी थी।

उसकी अवस्था से एकदम अनभिज्ञ राज उस पर बरसते हुए बोला—“क्या है यह सब, कौन सा टाइम है यह उठने का—देख तू मेरा ज्यादा खून मत पी—तू मुझे बहुत परेशान कर रही है, बता दे रही हूं मैं तुझे—।”

डॉली ने जब राज को देखा तो वह पहले से अधिक हक्की-बक्की रह गयी।

राज ब्रा और पेन्टी में अजीब ही लग रहा था।

डरावना सा।

जबकि राज दांत किटकिटा रहा था—“कब तक नाटक दिखाएगी तू—?”

“मेरी तबियत सही नहीं है, मुझे सुबह जाकर नींद आयी थी इसलिए आंख नहीं खुली।”

राज फिर शोले बरसाता उससे पहले फुल कपड़े पहने सन्नी उस कक्ष में आ गया और बीच में टपकते हुए बोला—“हां हां, ऐसा हो जाता है कभी, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है—कभी आंख नहीं खुलती है, इसमें नाराज होने वाली क्या बात है और डॉली तबियत ठीक न हो तो तुम आराम करो—आज मेरे हाथ का खाना खाकर देखना—हम भी क्या गजब का खाना बनाते हैं।”

“इसे तुम अपने ज्यादा सिर पर मत चढ़ाओ।”

“मंजू देखो, आप बाहर निकलिये, आपसे बस बरसना आता है, प्यार करना नहीं आता—अरे कभी किसी तबियत भी खराब हो सकती है, इंसान तो इंसान ही है कोई लोहे का थोड़े बना है—तुम भी आराम करो, आज किचन मैं सम्भालता हूं।”

राज नथुने फुलाते हुए बाहर निकल गया।

सन्नी डॉली से हमदर्दी भरे स्वर में बोला—“तुम आराम करो डॉली, मुझे लगता है तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है।”कहते हुए उसने बेतकल्लुफ होकर अपनी हथेली उसके गाल पर रख दी, जैसे बुखार चेक कर रहा हो।

“हां तबियत ढीली है तुम्हारी—घर में कोई टेबलेट है या नहीं—?”

वह बुत बानी बैठी थी। न तो प्रतिरोधी अवस्था में थी, न कुछ कह पा रही थी। बेड के किनारे से टेक लगाये बैठी थी।

वह लगातार चुप रही तो सन्नी आगे बोला—“कोई नहीं, तुम आराम करो, तुम्हें आज कोई काम करने की जरूरत नहीं है—मेडिकल तोरे खुल जाएंगे तो मैं दवा ला दूंगा।”

कहता हुआ वह कमरे से बाहर निकल गया।

राज मेन गेट के पास पड़े अखबार को उठाकर सोफे पर बैठकर पढ़ने लगा था। उसके काम कमरे से उठने वाली आवाज पर ही लगे थे।

बाद में उसने सन्नी को किचन में जाते हुए तिरछी नजरों से देखा।

सन्नी किचन में घुस चुका था और इधर-उधर चाय का सामान तलाश रहा था।

☐☐☐

हस्बे मामूल साढ़े नौ तक राज अपनी ड्यूटी पर निकल गया था।

घर में रह गए थे सन्नी और डॉली।

बाद में डॉली किचन में आ गयी थी। सन्नी ने कहा भी था कि तुम आराम कर सकती हो, मुझे खाना बनाना आता है। मगर चुप अवस्था में डॉली किचन के कार्य में जुट गयी थी।

राज को यह वातावरण रास नहीं आ रहा था। सन्नी का डॉली पर ज्यादा प्यार उड़ेलना राज को नागवार गुजर रहा था। उसका आशय था कि डॉली और सन्नी दूर-दूर रहें। मध्यस्थ के तौर पर राज की भूमिका बनी रहे।

हालांकि डॉली सन्नी से जरा भी बात नहीं कर रही थी। सन्नी कुछ कहता भी था तो डॉली निरुत्तर मूक बनी रहती थी।

राज साढ़े नौ तक ड्यूटी के लिए निकल गया। उसके दिमाग में कुछ सनसना रहा था।

सन्नी दो दिन तक पूरी तरह खाली था। उसकी इस शहर में एक बैंक में ज्वाइनिंग हुई थी। दो दिन बाद उसे ड्यूटी लेनी थी।

दो दिन तक फ्री था।

डॉली किचन के काम से फ्री होकर अपने रूम में जाकर लेट गयी।

सन्नी तो उसके शब्दों को तरस रहा था। उससे बात करना चाह रहा था मगर जैसे उसने कसम ही खा रखी थी, बात ना करने की।

फ्री होते ही उसने सीधे बिस्तर की राह ली और दरवाजा भी भीतर से बोल्ट कर लिया।

चला तो सन्नी मोबाइल रहा था मगर स्क्रीन में उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। पूर्णरूपेण ध्यान डॉली पर ही स्थिर था।

दरवाजा बंद होने पर उसे बड़ी मायूसी का अहसास हुआ। कोई एक मिनट तक वह उदास दिल लिये बैठा रहा। उसके बाद उठा और डॉली के दरवाजे पर गया।

दरवाजा थपथपाया।

थोड़ी ही देर में दरवाजा खुल गया। डॉली प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखने लगी।

वह शीघ्र ही बोला—“डॉली हम दो मिनट बात कर सकते हैं—?”

डॉली कुछ नहीं बोली।

“बाहर आ जाओ प्लीज, दो मिनट बात कर लो, फिर तुम कमरा बंद करके लेट जाना।”

बड़े मनुहार वाले स्वर में कहकर वह सोफे की तरफ चला।

इस बार डॉली ने बड़ी कृपा कर दी और उसने उसकी बात मान ली।

वह बाहर आ गयी।

सन्नी सोफे ग्रहण कर चुका था। डॉली थोड़ा दूर खड़ी हो गयी।

“कुर्सी लेलो प्लीज।” सन्नी को यह तो बखूबी पता था कि अगर मैं पास में सोफे पर बैठाऊंगा तो यह हरगिज बैठने वाली नहीं है।

इस बार भी डॉली ने बड़ी कृपा कर दी और डायनिंग चेयर थोड़ा सा इधर खींचकर बैठ गयी।

सन्नी बड़े नपे-तुले शब्दों में भूमिका बनाते हुए बोला—“देखो डॉली,मैं तुम्हारी मनोदशा समझ रहा हूं और तुम्हारे खिलाफ जो राज का व्यवहार है, वह भी बहुत गलत है—सबसे पहले तो मैं अपनी पोजीशन साफ कर दूं कि तुम्हें मुझसे कोई खतरा नहीं है, कभी कोई खतरा नहीं रहेगा—मैं एक बहुत जिम्मेदार परसन हूं, मेरी नई-नई नौकरी लगी है, मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहता कि मुझे नौकरी से हाथ धोना पड़े और समाज में बदनाम होना पड़े।” सन्नी बेहद संतुलित स्वर में बोल रहा था। लहजे में हद दर्जे की मिठास थी।

सांस लेकर आगे बोला—“अब रहा सवाल राज के और मेरे रिश्ते का, तो यह रिश्ता आज का नया नहीं है, हमारी सोलह साल की उम्र से है जबकि हम साथ पढ़ा करते थे—राज के अंदर एक सम्पूर्ण औरत परवरिश पा रही है—वह खुद को जैन्ट मानता ही नहीं है, लेडी जैसा व्यव्हार करने में और लेडी जैसे कपडे पहनने में उसे बहुत आनंद मिलता है और वह जैसेपरम संतोष से भर जाता है—मुझे इस रिश्ते की कोई जरुरत नहीं है और न मैं इस घर में रहने का तमन्नाई हूं, एक फैमिली के बीच रहते हुए मुझे बड़ी शर्मिन्दगी लग रही है मगर तुम्हारा पति राज जो सिर्फ मेरी पत्नी मंजू बना रहना चाहता है, उसे यह कतई बर्दाश्त नहीं होगा की मैं यहां न रहूं—वह उस जिंदगी के बगैर नहीं जी सकता,जो जिंदगी वह कल से मेरे साथ जी रहा है। इसी में उसका सुकून और जिंदगी छिपी है।” वह सांस लेकर आगे बोला—“अब बताओ, तुम क्या कहती हो—तुम क्या चाहती हो? जो तुम कहोगी, मैं वहीं करने की कोशिश करूंगा।”
 
डॉली काफी देर चुप रही।

सन्नी लगातार उसके बोलने की प्रतीक्षा करता रहा।

फिर वह बोली—“अगर यह ऐसे थे तो इन्होनें शादी क्यों की—?”

“हां यह इसकी गलती है, जब यह खुद एक लेडी था तो इसे शादी नहीं करना चाहिए थी।”

फिर थोड़ा-सा ठहरकर डॉली बोली—“अब मैं क्या करूं—मुझे यह माहौल घर में बिलकुल पसंद नहीं है, मेरे सामने मेरा पति एक औरत बन रहा है, मैं यह सबकुछ कैसे बर्दाश्त करूं?”

“तो इसका हल भी क्या है—मैं तो खुद यह सबकुछ नहीं चाहता—मगर यह जबर्दस्ती यह सबकुछ करवा रहा है—एक पुरुष को इसमें कोई आनंद नहीं मिलता है, एक दिन मेरी शादी हो जाएगी, मैं सैटल हो जाऊंगा।”

डॉली फर्श को घूरती रही।

“अच्छा तुम बताओ, इसका कोई हल हो तो—तुम्हें खुद पता है कि वह मानेगा नहीं, उसकी आदत तुम जानती हो—बेवजह तुम्हारे ऊपर चिल्लाता है, मुझे बुरा लगता है—मुझे तुमसे बहुत हमदर्दी हो गयी है—जो भी तुम्हारी मदद मुझसे बन पड़ेगी, आज नहीं, कभी भी जिंदगी में, मुझे बहुत ख़ुशी होगी तुम्हारी मदद करते हुए।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी।

“फिलहाल बताओ तुम्हारी नजर में क्या हल है—तुम खुद क्या पसंद करती हो—?”

डॉली की आंखों से आंसू बहने लगे।

वह सजल नेत्रों से बोली—“मेरा नसीब ही खराब है, मैं किससे क्या शिकायत करूं—पति भी मिला तो हिजड़ा मिला—।”

“रोओ मत प्लीज—थोड़ा सब्र रखो बस—जो हो रहा है, अभी होने दो—क्योंकि राज मानेगा नहीं इसलिए हम तुम कुछ नहीं कर सकते, मेरी संवेदनाएं तुम्हारे साथ हैं—मैं वादा करता हूं, बहुत जल्दी उसे जलील कर करके मैं रास्ते पर ले आऊंगा—मैं उसे तुम्हारा सम्मान करना सिखाऊंगा—अब मुझे एक मिशन मिल गया है कि मैं उसे एक अच्छा पति बनाऊं—दिमाग का वह थोड़ा सिरफिरा है लेकिन इतना जान लो कि वह मेरी मुट्ठी मैं कैद है—एकदम तो वह मेरी बात नहीं मानेगा, लेकि धीरे-धीरे मैं उसे रस्ते पर ले आऊंगा और उसके बाद मैं भी इस घर से चला जाऊंगा, तुम थोड़ा विश्वास रखो।”

डॉली की अश्रुधारा बहती रही।

“मुझे पता है तुम्हें बहुत टेंशन है, टेंशन वाली बात भी है—मैं तो कहता हूं कहता तुम बड़ी शरीफ हो, मैं तो हैरान हूं तुम्हारी शराफत को देखकर। इसीलिए मैंने मिशन बनाया है तुम्हारी मदद करने का—अब तुम आंसू पोंछो—कोई भी बिगड़ी बात एक दिन में नहीं बन जाती है, समय लगता है किसी भी काम में—थोड़ा इंतजार करो।”

वह अफसोसजदा हालत में बैठी रही।

“इसके अलावा तुम्हारी हर खुशी के लिए मैं तैयार हूं—तुम्हें बस मैं खुश देखना चाहता हूं—तुम्हारे दुःखों को देखकर मेरा बहुत बुरा हाल है—मैंने अगर तुम्हें ख़ुशी दे दी तो यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा अचीवमेंट होगा।”

डॉली शुन्य को ताकती रही।

वह बड़े अपनत्व भरे स्वर में आगे बोला—“अब तुम्हारीतबियत कैसी है, सुबह बुखार सा लग रहा था।”

वह किसी शिला में तब्दील अविचलित रही मगर उसके भीतर बहुत कुछ चल रहा था जिसके फलस्वरुप अश्रुधारा निरन्तर फूट रही थी।

“तबियत सही न हो तो दवा ले आता हूं।”

“सही है तबियत।” जैसे किसी अन्धकूप से शब्द निकले।

“तुम प्लीज बिलकुल परेशान मत होओ। बस थोड़ा धीरज रखो—एक दिन में सब ठीक नहीं हो जाता, मैं राज को बिलकुल बदल दूंगा—वह खालिस मर्द बनकर रह जायेगा मगर यह काम आज के आज नहीं हो सकता—तुम्हें थोड़ा वक्त तो देना पड़ेगा—मैं एक काम करूंगा, तुम अगर कहो तो।” उसने रहस्यपूर्ण रूप में कहा।

डॉली नजरें उठाकर सन्नी को देखने लगी।

सन्नी उत्साहित स्वर में बोला—“पहले मैं उसे समाज में जलील करवाऊंगा—जैसी जिंदगी वह जी रहा है और जीना चाहता है, समाज इसको कतई बर्दाश्त नहीं करता—जब वह जलील होगा तो अक्ल ठिकाने लगेगी और इस तरह वो अपनी हरकतों से बाज आ जाएगा।”

डॉली सुनती और सोचती रही।

“मैं तुम्हारी खातिर कुछ भी कर सकता हूं, मुझे तुमसे हमदर्दी हो गयी है—मुझे उससे कोई हमदर्दी नहीं है—मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं, मैं तुम्हें बहुत खुशी दूंगा, तुम्हारे सारे आंसुओं को मिटा दूंगा, तुम मुझे पर भरोसा करो।”

डॉली फिर शुन्य को देखने लगी थी।

“अब तुम जाओ, आराम करो और इन आंसुओं को मत बहाओ।” वह उठा और निकट आया। उसका इरादा था कि अपने हाथ से आंसुओं को साफ करे मगर उसकी हिम्मत नहीं पड़ी।

उसने शीशे में उतारने की कोशिश तो भरसक की थी मगर डॉली की प्रतिक्रिया से नहीं लगता कि उस पर ज्यादा प्रभाव पड़ा हो।

“वह निकट जाते-जाते फ्रिज की तरफ मुड़ गया। वहां से पानी की बोतल निकाली और डायनिंग टेबिल पर रखे गिलास में पानी उड़ेलकर डॉली की तरफ बढ़ाया और बोला—"ठण्डा पानी पियो प्लीज—ठण्डा पानी दिमाग को शान्त रखता है।”

“मैं ले लूंगी पानी।”

“लो, यह है तो।”

कसमसाकर उसने गिलास हाथ में ले लिया। उसके हाथों से नहीं लेना चाहती थी और उससे कहना चाहती थी कि तुम मुझसे मत बोला करो। तुमसे बात करने को मेरा दिल नहीं करता।

मगर वह कुछ भी नहीं कह पायी। न चाहते हुए भी गिलास पकड़ लिया।

उसी सममय कालबेल घनघनाई।

डॉली चौंकी, इस सममय कौन हो सकता है? वह कुर्सी से उठी और किचन में सिंक में जाकर उसने मुंह धोया। वहीं उसने पानी से भरा गिलास रख दिया था।

मुंह धोकर अपनी चुनरी से चेहरा पोंछते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ी।

सन्नी बोतल से पानी मुंह में डालते हुए पुनः सोफे की तरफ बढ़ा।

☐☐☐
 
दरवाजा खोला तो सामने उसकी मम्मी शन्नो कुमारी खड़ी थी।

हाथ में थैला था।

मम्मी को देखकर अनायास डॉली के चेहरे पर चमक आई।

उसने मम्मी को नमस्ते की। वह ‘जीती रहे’ का उद्घोष करते हुए भीतर प्रविष्ट हुई।

शन्नो कुमारी मोटे शरीर की थी। गोल मुखड़ा डॉली की ही तरह सुंदर था।

श्रृंगार की काफी शौकीन थी। करीने से चेहरे को सजा रखा था।

वह हाँथ में थैला लिए यह पूछते हुए भीतर प्रविष्ट हुई—“अब कैसी तबियत है बेटी?”

“ठीक हूं।”

“अब तो उल्टी नहीं आ रही है?”

“कभी-कभी आ जाती है।”

“डॉक्टर के पास... गये?” उसकी दृष्टि सन्नी पर पड़ गयी थी।

वह गोल आंखें करके सन्नी को देखने लगी।

उसने थैला डायनिंग टेबिल पर रखा और बोली—“इसमें कुछ फ्रूट हैं—।”

कहकर वह सन्नी की तरफ मुड़ी—“हाय बेटा।”

“हाय आंटी...नमस्ते।”

“हू आर यू?”

“म...मैं—मैं एक परसन हूं।”

शन्नो कुमारी ने मुस्कुराने का कृत्रिम भाव पैदा किया—और बोली—“परसन से ही डायलाग किया जाता है, मैंने तुम्हें कुछ और समझकर डायलाग नहीं किया है।”

सन्नी सिकुड़ी आंखों से शन्नो कुमारी की केटेगिरी भांपने की कोशिश के साथ बोला—

“क्या जानना चाहती हो मेरे बारे में?”

“मैंने पहली बार देखा है तुम्हें—शायद दोस्त हो?”

“सही पहचाना।”

“डॉली के?”
 
“राज...?—नहीं—नहीं, इनके हसबैण्ड राज के।”

“राज है घर में?”

“नहीं, वो तो ड्यूटी गया है।”

“फिर बेटे तुम यहां कैसे हो, कितनी बुरी बात है यह।”

“नहीं आंटी, आप गलत समझीं—मैं अतिथि हूं।”

“कब आये, कहां से आये?”

“कल रात आया हूं, दिल्ली से।”

“कब तक रहोगे?”

“अब तो बस यहीं रहना है, मेरी नौकरी लग गई है, इस शहर में, परसों ज्वाइनिंग है—तुम भी मिठाई खाकर ही जाना।”

“मतलब इसी घर में रहोगे?”

“हां-हां... इसमें क्या बुराई है, दो कमरे हैं घर में —।”

“पेरेन्ट्स से संस्कार तो मिले होंगे?”

“हां-हां क्यों नहीं, बहुत संस्कार मिले हैं, बचपन में रामायण सीरियल भी देखा था।”

“बेटे यह एक फैमिली है, यहां पति-पत्नी रहते हैं। तुम दाल-भात में मूसल की तरह यहां पड़े-पड़े क्या करोगे?”

“आंटी जी—कुर्सी ले लो, आप तो मुझे देखकर इतनी शॉक्ड हो गयीं कि बैठना ही भूल गयीं।”

“हां-हां कुर्सी तो लूंगी...और डॉली जरा ठण्डा पानी लाइये, हल्क सूख रहा है।”

मोटे शरीर वाली शन्नो कुमारी चेयर पर बैठ गयी और बोली—“बेटा, मेरे कहने का बुरा मत मानना, मेरी आदत ही साफ-साफ बात करने की है—तुम्हें यहां देखकर मुझे बड़ा बुरा लगा—किसी की फैमिली के बीच कभी नहीं रहना चाहिए, यह बहुत बुरी बात है।”

“आंटी जी, दरअसल बात यह है कि राज और हम अनन्य मित्र हैं, बचपन से जब हम दोनों इत्ते से थे, कच्छा पहनकर दौड़ा करते थे, तब से हमारी मित्रता गाढ़ी होती चली जा रही है और अब ठोस हो गयी है।”

“मगर बेटे अब तुम्हारा अभिन्न मित्र शादीशुदा हो गया है—बात का बुरा तो नहीं मान रहे हो?”

“वो तो ठीक है आंटी...।”

“तो फिर कल तक चले जाओगे?”

“राज तो नहीं जाने दे रहा।”

“तुम बड़े भोले हो बेटे—अतिथि को कोई दिल से रोकना नहीं चाहता है, एक दिन के बाद ही दिल कहता है यह भागे यहां से—अब राज तुमसे अपनी जुबान से थोड़े न कहेंगे—है ना—?”

“मैं तो तब तक नहीं हिलता जब तक वह अपनी जुबान से न कहे, यह मेरे बचपन की आदत है।”

शन्नो कुमारी ने उसे घूरकर देखा।

डॉली तब तक नींबू पानी बना लाई थी। उसे इस वाक-प्रतिवाक में बहुत आनंदआया। अपनी मम्मी को तो वह जानती ही थी, उसकी मम्मी इसी तरह बाल में से खाली निकालने की आदी थी लेकिन सन्नी ने भी जिस तरह अविचलित प्रतिवाक किया था, टनाटन जवाब दिया था, वह संवादीय स्तर पर डॉली को मनोरंजक लगा। दिल में गुदगुदी हुई।

शन्नो कुमारी की बात पास नहीं हुई थी, इसका उसे नींबू पानी पीते हुए मलाल रहा। पानी जैसे हलक से नीचे उतर ही नहीं रहा था।

पानी पीते ही वह तुरंत बोली—“शायद तुम्हें मेरी बात का बुरा लगा, मगर मुझे बहुत बुरा लगा तुम्हारी हठ जानकर—शायद मुझसे मजाक कर रहे थे—दो-एक दिन में चले जाओगे यहां से—?”

“न—कोई इरादा तो नहीं है जाने का, बना बनाया खाना मिल रहा है, इससे अच्छा घर यहां सहारनपुर में कहां मिलेगा।”

“लेकिन बेटे शर्म भी कोई चीज होती है।”

“हां-हां, होती तो है—नाम तो सुना भाला है।”

“शायद मजाकिया हो तुम—दो-एक दिन में चले जाओगे?”

“आंटी अपनी बचपन की आदत है, जिस घर में भी अतिथि बनकर गये, जब तक धक्के मारकर नहीं निकले गये, बाहर ही नहीं निकले।”

“यह ड्यूटी मुझे मिल जाए तो दो मिनट लगेंगे।”

“नहीं, आपका वहम है—मैंने पैर जमाने की ट्रेनिंग ली हुई है।”

डॉली की हंसी छूटते-छूटे बची। वह बजाहिर गम्भीर रहना चाह रही थी।

शन्नो कुमारी मुस्कुरा दी और बोली—“मजाक कर रही थी, तुम बुरा तो नहीं माने?”

“स्थापित अतिथि कहां किसी बात का बुरा मानता है।”

फिर शन्नो कुमारी उसे घूरकर देखने लगी। इतना ढीटआदमी तो उसने वास्तव में नहीं देखा था।

उसका माथा ठनक चुका था। वह जितना कुछ कहना चाहती थी, सबकुछ कह चुकी थी। उसकी समझ नहीं आ रहा था की अब किन शब्दों का इस्तेमाल करे।

तभी उसे कोई शक पैदा हुआ। वह बोली—“डॉली को कब से जानते हो?”

“जानता तो अभी भी नहीं हूं, कोई बात ही नहीं हुई है, जानूंगा कैसे? बस यही मालूम है कि यह राज की वाइफ है।”

उससे बात करना शन्नो कुमारी को दीवार में सिर फोड़ना लगा। वह कुर्सी से उठकर डॉली के कमरे में चली गयी।

पीछे-पीछे डॉली भी चली गयी।

शन्नो कुमारी डॉली से बोली—“दरवाजा बंद कर ले।”

डॉली ने दरवाजा बंद किया।
 
शन्नो कुमारी बिस्तर पर बैठे हुए बोली—“कौन है यह?”

“राज का दोस्त है।”

“क्या यह यहीं रहेगा?”

“हां। राज ने बुलाया है, सामने वाला कमरा दे दिया है।”

“अक्ल पर पत्थर गये हैं राज के, कोई सुनेगा क्या कहेगा, घर में जवान बीवी है—तूने तो नहीं इससे दोस्ती नहीं गांठ ली—?”

“मम्मी—तुम्हारी इसी बात से मेरा खून खौलता है। तुम्हें आज तक मुझ पर विश्वास नहीं हुआ।”

“यह जवानी बहुत बुरी चीज होती है—मैं सब जानती हूं। देख... राज भोला-भाला है, बचपन का दोस्त समझकर उसने रख लिया मगर तुम दोनों को इस बात की लाज रखनी चाहिए कि राज का भरम न टूटे, कभी विश्वासघात न होने पाये।”

“तुम बस अपना मुंह बंद कर लो—तुम शुरू से आज तक मेरी दुश्मन हो—जब तुम्हें लड़की पर भरोसा नहीं है तो लड़की पैदा क्यों की थी?”

“हो-हो-हो—तू तो सीरियस हो जाती है, मेरी बच्ची—मगर यह मैंने तुझे सीरियस हो जाने के लिए ही कहा—हमेशा सीधा रास्ता चलना—।”

“अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगी—बचपन से तुमने मेरा बहुत शोषण किया है—अब तुम्हारा मुझ पर कोई जोर नहीं है, जिसका जोर है वह खुद मुझे देखेगा।”

“हो-हो-हो...मेरी बच्ची अपसैट हो गयी।” शन्नो कुमारी ने उसे पकड़कर अपने सीने से लगा लिया—“बहुत प्यारी बच्ची है मेरी, सब तारीफ करते हैं, लोग कहते नहीं अघाते कि इतनी सीढ़ी लड़की उन्होंने नहीं देखी, रास्ता चलती थी तो नाक की सीध में—किसी से कोई मतलब नहीं...न किसी से बोलना, बस पढाई करना और घर रहना—देख कितनी तारीफ होती है तेरी आज भी मुहल्ले में।”

“क्या करुं इस तारीफ का, जिंदगी तो तुमने मेरी नर्क बना दी, क्या मिला मुझे शराफत के बदले?”

“देख तो कैसे फफोले फोड़ रही है—अरे मैंने तेरी जिंदगी जन्नत बना दी—क्या कमी तेरे पास है, एक कमाऊ पति है, कस्बे में घर है, जमीन है—तू राज कर रही है नादान।”

“बड़ा राज कर रही हूं—हुं—।”

“चल अब मेरे लिए चाय-वाय नहीं बनाएगी, मेरे तो पैरों में दर्द होने लगा—कल ही से सोच रही थी मैं आने की, मगर टाइम ही नहीं मिला, वह महारानी ऐसी है की उनसे कोई काम ही नहीं होता, नखरे ऐसे हैं जैसे कि महाराजा की बेटी हो, मानो घर पर कोई काम ही नहीं किया हो, सब नौकर-चाकर करते हों—छोटे-मोटे काम के लिए...मम्मी यह कैसे होगा...मम्मी यह कैसे होगा...अरे तू क्या परीलोक से आई है—और कुछ कह दो तो हमसे बुरा कोई नहीं है—एक की दो लगाकर कहती है देवेन से—अब मैंने कहना ही छोड़ दिया—।”

“सही हो रहा है तुम्हारे साथ—जितनी मेरे साथ ज्यादतियां की हैं, भगवान एक-एक का बदला लेगा—।”

“और सुन—तू...।”

“कहो, क्या कह रही हो—मैं समझ गयी तुम क्या कहने वाली थी।”

“हो-हो-हो-हो—क्या समझी, अच्छा क्या समझी तू—?”

“बस...मैं तुम्हें जानती हूं, तुम पैदाइशी मेरी दुश्मन हो—इससे तो पैदा होते ही मेरा गला घोंट देती तो अच्छा रहती...न मैं होती और न तुम्हें यह फिक्र सताती कि मैं कहां क्या कर रही हूं—।”

“अब ज्यादा दिमाग खराब मत कर अपना। जा चाय बना ला, फिर मुझे अपनी तबियत के बारे में बता।”

डॉली बाहर निकल गयी।

☐☐☐

एक घण्टे पश्चात शन्नो कुमारी चली गयी थी।

एक घण्टे तक वह कमरे में ही लेटी, बैठी रही थी और दो लोगों के सामने कभी न आराम करने वाली उसकी जुबान ने इस एक घण्टे में भी आराम नहीं किया था।

उसे बात करने का शायद कोई रोग था। खटाखट-खटाखट उसके मुंह से शब्द निकलते ही रहते थे। उसने सन्नी का मैटर तो बंद कर दिया था लेकिन अपनी बहू नलिनी के मैटर से मानो उसे बहुत लगाव था।

लगातार बहु नलिनी की कमियां यानि उसकी बुराई वह सर्राटा मारकर करती रही थी।

शन्नो कुमारी के बिल्कुल विपरीत डॉली को तो जैसे भगवान ने जुबान ही नहीं दी थी। बहुत कम बोलती थी।

लेकिन शन्नो कुमारी से जब भी बोलती थी, कटी-जली ही बोलती थी।

बहरहाल एक घण्टा पश्चात वह चली गयी थी। उसने जाते हुए तिरछी नजर से सन्नी को देखा था। सन्नी अभी तक उसी तरह सोफे पर बैठा था और मोबाइल चला रहा था।

अब उसने उससे संवाद करना भी जरुरी नहीं समझा। कमरे से निकलते ही उसने सीधे मुख्य द्वार की तरफ चाल बांधी।

उसे जाता देखकर सन्नी बोल उठा—“क्या आंटी जा रही हो?”

शन्नो कुमारी को यह टोकना नागवार तो गुजरा मगर तब भी वह कृत्रिम मुस्कान चेहरे पर लाती हुई बोली—“हां बेटा जा रही हूं, आशा है तुम भी चले जाओगे।”

प्रत्युत्तर में सन्नी मुस्कुराकर रह गया।

उसकी मुस्कान देखने के लिए शन्नो कुमारी वहां ठहरी नहीं रह गयी थी, उसने दरवाजा खोला और निकल गयी।

पीछे-पीछे डॉली आई थी दरवाजा बंद करने।
 

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