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Guest
जब वह दरवाजा बंद करके पलटी तो सन्नी उससे बोला—“आपकी मम्मी कितना काम बोलती हैं—?”
बहुत धीमी मुस्कान डॉली के अधरों पर रेंगी और वह चलती हुई अपने कमरे में घुस गयी और दरवाजा बोल्ट कर लिया।
सन्नी सोफे से उठा। अभी तक उसने स्नान नहीं किया था। दिन के ग्यारह से ज्यादा का समय हो चुका था।
वह अपने कमरे में घुस गया।
☐☐☐
दिन के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
डॉली दरवाजा बोल्ट करके अपने बिस्तर पर लेटी थी, उसका फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी।
नम्बर स्पार्क हो रहा था। उसने नम्बर पहचान लिया, इसी के साथ धड़कन में हल्का-सा इजाफा हुआ।
उसने रिसीव कर लिया—“हैलो।”
दो क्षण फोन पर सन्नाटा रहा। उसके बाद कहा गया—“डॉली कैसी हो?”
नम्बर और आवाज पहचानने के बाद भी वह नाटकीय रूप से बोली—“कौन—?”
फिर उधर से सांस ली गयी। दो क्षण का अंतराल आया। बड़े बुझे हुए स्वर में कहा गया—“अपना नाम बताना पड़ेगा?”
डॉली ने नाटक का पटाक्षेप किया–“ओह... ऋषभ!”
“कैसी हो?”
अब डॉली ने गहरी सांस ली। कुछ कहने से पहले मुंहपर चुप्पी आयी।
फिर अजीब से मदहोश स्वर में बोली–“तुम कैसे हो?”
“जी रहा हूँ मगर अब जीने को मन नहीं करता।”
“क्यों?”
“जो एक गलती कर चुका हूँ उसका पश्चाताप नहीं होता।”
डॉली के अंदर का मौसम पूरी तरह बदल चुका था।हवाश पर रंगीनियां सवार हो गयी थीं।
वह बोली–“क्यों जीने का मन नहीं होता?”
वह रुदन भरे स्वर में बोला–“मैंने जीवन को आसानसमझ लिया थाडॉली–मैं समझ रहा था जैसे चाहे जी सकता हूँ मगर अब मुझे शिद्दत से अहसास हो रहा है कि तुम्हारेबिना मैं नहीं जी सकता–सांसें मेरा दम घोटने लगी हैं।”
“अब क्या हो सकता है, उस वक्त कहां थे तुम?”
“डॉली–मैं तुमसे लिपटकर रो लेना चाहता हूँ, बहुत मनभर गया है मेरा–यह दुनिया की झूठी रस्में मेरे लिए जानलेवासाबित हो रही हैं।”
डॉली नागवारी के स्वर में बोली–“बस बातें करनाआती हैं तुमसे–कुछ और नहीं आता–।”
“मैंने कोशिश बहुत की थी डॉली, अपनी फैमिली कोतैयार कर लिया था मगर मेरी फैमिली का एक ही कहना थाकि रिश्ता अगर घर आएगा तो हम स्वीकार कर लेंगे तुमबताओ, तुम अपनी फैमिली को तैयार कर पाई?”
“मेरी फैमिली तैयार नहीं हो पायी तो इसके लिए मैं उन्हेंमजा चखाने को तैयार थी मगर तुम कायर निकले।”
“नहीं डॉली, ऐसा ठीक नहीं था–दोनों फैमिली की बहुतबदनामी होती, तब भी हमें सुकून नहीं मिल पाता।”
“अब सुकून है तुम्हें–?”
“क्या करूं, जिंदगी ने दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है,न जीते बनता है, न मरते–।”
डॉली ने गहरी सांस ली।
और बोली–“अब क्या हो सकता है?”
“कल शाम ऋचा मिली थी। उससे तुम्हारी कल दिन मेंबात हुई होगी–वह परसों भी मिली थी मुझे तो कल उससेतुम्हारी मुझे लेकर बात हुई होगी–बता रही थी, तुम बहुतपरेशान हो–।”
“उसने बताया तब फोन किया वरना फोन भी नहीं करसकते थे?”
उधर से गहरी सांस ली गयी।
दो क्षण ठहरकर कहा गया–“मैं समझ रहा था तुम खुशहो, सैटल हो रही हो इसलिए मैंने कभी फोन नहीं किया, अबफोन करने से कोई...फायदा नहीं था–पुराने जख्म हरे होजाते इसलिए फोन नहीं करता था–मुझे चलो इस बात कीखुशी थी कि तुम अपनी जिंदगी में खुश हो–हसबैंड भी तोतुम्हें बहुत सुंदर मिला है।”
“वह सुंदरी हसबैंड है।”
“सुंदरी हसबैंड–?” ऋषभ हंसा और बोला–“इसका क्यामतलब हुआ?”
“वह एक सुंदरी है।”
“मतलब?”
डॉली कुछ क्षण को चुप रह गयी।
फिर बोली–“अगर किसी रोज तुम्हें मेरे मरने की खबरमिले तो तुम्हें कैसे लगेगा?”
“कैसी बातें कर रही हो तुम?”
“तुमने तो मुझे मरने के लिए छोड़ ही दिया।”
“कोई चीज जब खो जाती है तब उसकी अहमियत कापता चलता है डॉली–आज तुम्हारे बगैर मैं कैसे जी रहा हूँ,ये मैं जानता हूँ –डॉली...मैंने तुम्हें बहुत प्यार किया था–मेरेआंसू, इस बात के गवाह हैं।”
“फोन कर लिया करो ऋषभ। तुम तो बात ही नहीं करते–तुमने अपनी डॉली को किसके सहारे छोड़ रखा है?”
“राज के साथ खुश हो न तुम?”
डॉली ने आंखें बंद कर लीं।
छोटे से अंतराल के बाद बोली–“हां बहुत खुश हूँ, कभीमेरा चेहरा देखा है तुमने –दो-तीन रोज के बाद मेरे घर आओ,अभी मत आना, दो-तीन रोज बाद आना।”
“तुम तो सहारनपुर में रह रही हो न?”
“हां एड्रेस सेंड कर दूंगी।”
“अभी क्यों नहीं आ सकता?”
“एक गेस्ट आया हुआ है, मैं बता दूंगी कि कब आना है।”
“तुम्हें देखे भी एक जमाना हो गया–कहां वो दिन भी थेजब कुछ घण्टों की जुदाई में बुरा हाल हो जाता था। तुम्हें मेरीयाद आती है–?”
“बिल्कुल नहीं–।”
ऋषभ हल्के से हंसा–“मैंने इसीलिए तुम्हें कभी फोन नहींकिया कि तुम मुझे भूल जाओ तो अच्छा है–।”
“क्या तुमने मुझे भुला दिया?”
“नामुमकिन है यह।”
डॉली ने गहरी सांस ली। उसे शब्दों से ज्यादा ऋषभ कालहजा संतुष्ट कर रहा था। मानो वह लहजा सीधे दिल मेंपैबस्त हो रहा होऔर कहीं जिंदगी के तार झंकृत कर रहाहो–।
ऋषभ ही आगे बोला–“तो कब आने का बुलावा है हमारा?”
“परसों मैं फोन करके बता दूंगी।”
“बेताबी और बढ़ गयी तो क्या होगा?”
“तुम्हारे अंदर बेताबी होती तो आज यह दिन नहीं देखनापड़ता।”
“राज के साथ खुश तो हो न तुम?”
“यह सवाल मत करो, क्या जवाब दूं?”
ऋषभ एकाएक चुप रह गया।
सांसें लेता रहा।
थोड़ा ठहरकर बोला–“लेकिन अब आगे हो क्या सकता है, हमारी कहानी का तो फुल स्टॉप हो गया।”
“क्या तुम्हें मुझे पाने की तमन्ना अब नहीं है?”
ऋषभ ने प्रतिप्रश्न किया–“क्या तुम अब भी मुझे मिलसकती हो?”
“तुम बताओ, तुम तो पहले ही इतने डरपोक थे कि अपनीफैमिली के खिलाफ नहीं जाऊंगा, ऐसा नहीं करूंगा, वैसा नहीं करूंगा...तो अब तुम क्या साथ दे सकते हो?”
“अब मैं ज्यादा मजबूत हो चुका हूँ ।” ऋषभ बोला–“खोखली रस्मों की हकीकत मेरे सामने आ गयी। तुम्हें खोकरमैंने जितना कुछ खोया है तुम्हें पाकर उसका लेशमात्र भी नहीं खोया होता।”
“क्या अब भी मैं तुम्हारे पास आ जाऊं?”
“अब...अपने हंसते...।”
“निकल गयी जान?”
“नहीं, ऐसी बात नहीं है, मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत है–।”
“एक बच्चा भी फ्री में मिल जाएगा, बगैर मेहनत किये।” डॉली ने चुटीले स्वर में कहा।
“अच्छा–कांग्रेचुलेशन!”
“अब बताओ पापा बनना चाहते हो या मामा?”
स्वर इतना चुटीला था कि ऋषभ हंसे बगैर न रह सका।
डॉली भी मन-ही-न गुदगुदा रही थी। कई दिन बादउसके चेहरे पर आज बहाली आई थी।
ऋषभ हंसने के बाद बोला–“किस्मत ने पापा बनने कामौका ही कब दिया?”
“तो मामा बनने के इच्छुक हो?”
ऋषभ पुनः हंसा और बोला–“किस्मत का यह सितम भीसहेंगे।”
“किस्मत की ओट में अपनी बुजदिली को छिपाते रहो।”
ऋषभ ने एक लम्बी सांस खींची और आह के साथबोला–“जो भी इल्जाम लगाओ, तुम्हारा गुनाहगार हूँ ।”
“ऋषभ–।”
“हां–।”
“मेरा यहां बिल्कुल दिल नहीं लग रहा–क्या करूं मैं?”
“मुझे लगता है राज तुम्हें परेशान रख रहा है?”
“क्या बताऊँ –आओ फिर किसी दिन, मुझे देख जाओ।शायद फिर कभी देखने न मिलूं।”
“कैसी बातें कर रही हो तुम, ऐसी बातें कभी मत करना।”
“मैं बहुत परेशान हूँ ऋषभ, मेरी कोख अगर सूनी होती तोशायद मैं यह कदम उठा चुकी होती–।”
“प्लीज डॉली...ऐसा मत सोचो, तुम्हें क्या समस्या है–तुममेरी हो जाना चाहती हो न?”
“हां–।”
“मैं कोई रास्ता निकालता हूँ लेकिन तुम कुछ उल्टा-पुल्टामत सोचो–।”
“क्या रास्ता निकालोगे, तुम भी बहला रहे हो मुझे, बच्चेकी तरह–एक बच्चे वाली को बहला रहे हो–।” उसने फिरस्वर में विनोद भाव पैदा किया।
ऋषभ बोला–“मैंने एक खुशखबरी तो तुम्हें सुनाई नहीं।”
“क्या?”
“मेरी नौकरी लग गयी है एक बैंक में, जल्दी ही ज्वाइनिंगहोने वाली है।”
“कौन से बैंक में?”
“यस बैंक में–।”
“यस बैंक में? मेरे यहां जो गेस्ट ठहरा है, उसकी भी किसीबैंक में नौकरी लगी है–परसों ज्वाइनिंग है।”
“मेरी भी परसों ज्वाइनिंग है, उसकी किस बैंक में लगी है ।”
“यह तो मैंने नहीं पूछा।”
“यह कौन गेस्ट है?”
“राज का कोई पुराना दोस्त है।”
“ओह–!”
“अरे क्या टाइम हो गया–?” उसने मोबाइल कान सेहटाकर आंखों के आगे लिया–“माई गॉड –बारह बज गये, बातों में पता ही नहीं चला, उस गेस्ट को खाना भी खिलानाहै–चलो ऋषभ फिर बात करते हैं–।”
“डॉली...।”
“हां...।”
“खुद को सम्भालकर रखना...मैं...।”
“चलो घर आकर बात करते हैं।”
“ओके...।”
“बाय।”
“बाय।”
डॉली ने फोन काट दिया और तेजी से दरवाजे की तरफबढ़ी।
☐☐☐
बहुत धीमी मुस्कान डॉली के अधरों पर रेंगी और वह चलती हुई अपने कमरे में घुस गयी और दरवाजा बोल्ट कर लिया।
सन्नी सोफे से उठा। अभी तक उसने स्नान नहीं किया था। दिन के ग्यारह से ज्यादा का समय हो चुका था।
वह अपने कमरे में घुस गया।
☐☐☐
दिन के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
डॉली दरवाजा बोल्ट करके अपने बिस्तर पर लेटी थी, उसका फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी।
नम्बर स्पार्क हो रहा था। उसने नम्बर पहचान लिया, इसी के साथ धड़कन में हल्का-सा इजाफा हुआ।
उसने रिसीव कर लिया—“हैलो।”
दो क्षण फोन पर सन्नाटा रहा। उसके बाद कहा गया—“डॉली कैसी हो?”
नम्बर और आवाज पहचानने के बाद भी वह नाटकीय रूप से बोली—“कौन—?”
फिर उधर से सांस ली गयी। दो क्षण का अंतराल आया। बड़े बुझे हुए स्वर में कहा गया—“अपना नाम बताना पड़ेगा?”
डॉली ने नाटक का पटाक्षेप किया–“ओह... ऋषभ!”
“कैसी हो?”
अब डॉली ने गहरी सांस ली। कुछ कहने से पहले मुंहपर चुप्पी आयी।
फिर अजीब से मदहोश स्वर में बोली–“तुम कैसे हो?”
“जी रहा हूँ मगर अब जीने को मन नहीं करता।”
“क्यों?”
“जो एक गलती कर चुका हूँ उसका पश्चाताप नहीं होता।”
डॉली के अंदर का मौसम पूरी तरह बदल चुका था।हवाश पर रंगीनियां सवार हो गयी थीं।
वह बोली–“क्यों जीने का मन नहीं होता?”
वह रुदन भरे स्वर में बोला–“मैंने जीवन को आसानसमझ लिया थाडॉली–मैं समझ रहा था जैसे चाहे जी सकता हूँ मगर अब मुझे शिद्दत से अहसास हो रहा है कि तुम्हारेबिना मैं नहीं जी सकता–सांसें मेरा दम घोटने लगी हैं।”
“अब क्या हो सकता है, उस वक्त कहां थे तुम?”
“डॉली–मैं तुमसे लिपटकर रो लेना चाहता हूँ, बहुत मनभर गया है मेरा–यह दुनिया की झूठी रस्में मेरे लिए जानलेवासाबित हो रही हैं।”
डॉली नागवारी के स्वर में बोली–“बस बातें करनाआती हैं तुमसे–कुछ और नहीं आता–।”
“मैंने कोशिश बहुत की थी डॉली, अपनी फैमिली कोतैयार कर लिया था मगर मेरी फैमिली का एक ही कहना थाकि रिश्ता अगर घर आएगा तो हम स्वीकार कर लेंगे तुमबताओ, तुम अपनी फैमिली को तैयार कर पाई?”
“मेरी फैमिली तैयार नहीं हो पायी तो इसके लिए मैं उन्हेंमजा चखाने को तैयार थी मगर तुम कायर निकले।”
“नहीं डॉली, ऐसा ठीक नहीं था–दोनों फैमिली की बहुतबदनामी होती, तब भी हमें सुकून नहीं मिल पाता।”
“अब सुकून है तुम्हें–?”
“क्या करूं, जिंदगी ने दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है,न जीते बनता है, न मरते–।”
डॉली ने गहरी सांस ली।
और बोली–“अब क्या हो सकता है?”
“कल शाम ऋचा मिली थी। उससे तुम्हारी कल दिन मेंबात हुई होगी–वह परसों भी मिली थी मुझे तो कल उससेतुम्हारी मुझे लेकर बात हुई होगी–बता रही थी, तुम बहुतपरेशान हो–।”
“उसने बताया तब फोन किया वरना फोन भी नहीं करसकते थे?”
उधर से गहरी सांस ली गयी।
दो क्षण ठहरकर कहा गया–“मैं समझ रहा था तुम खुशहो, सैटल हो रही हो इसलिए मैंने कभी फोन नहीं किया, अबफोन करने से कोई...फायदा नहीं था–पुराने जख्म हरे होजाते इसलिए फोन नहीं करता था–मुझे चलो इस बात कीखुशी थी कि तुम अपनी जिंदगी में खुश हो–हसबैंड भी तोतुम्हें बहुत सुंदर मिला है।”
“वह सुंदरी हसबैंड है।”
“सुंदरी हसबैंड–?” ऋषभ हंसा और बोला–“इसका क्यामतलब हुआ?”
“वह एक सुंदरी है।”
“मतलब?”
डॉली कुछ क्षण को चुप रह गयी।
फिर बोली–“अगर किसी रोज तुम्हें मेरे मरने की खबरमिले तो तुम्हें कैसे लगेगा?”
“कैसी बातें कर रही हो तुम?”
“तुमने तो मुझे मरने के लिए छोड़ ही दिया।”
“कोई चीज जब खो जाती है तब उसकी अहमियत कापता चलता है डॉली–आज तुम्हारे बगैर मैं कैसे जी रहा हूँ,ये मैं जानता हूँ –डॉली...मैंने तुम्हें बहुत प्यार किया था–मेरेआंसू, इस बात के गवाह हैं।”
“फोन कर लिया करो ऋषभ। तुम तो बात ही नहीं करते–तुमने अपनी डॉली को किसके सहारे छोड़ रखा है?”
“राज के साथ खुश हो न तुम?”
डॉली ने आंखें बंद कर लीं।
छोटे से अंतराल के बाद बोली–“हां बहुत खुश हूँ, कभीमेरा चेहरा देखा है तुमने –दो-तीन रोज के बाद मेरे घर आओ,अभी मत आना, दो-तीन रोज बाद आना।”
“तुम तो सहारनपुर में रह रही हो न?”
“हां एड्रेस सेंड कर दूंगी।”
“अभी क्यों नहीं आ सकता?”
“एक गेस्ट आया हुआ है, मैं बता दूंगी कि कब आना है।”
“तुम्हें देखे भी एक जमाना हो गया–कहां वो दिन भी थेजब कुछ घण्टों की जुदाई में बुरा हाल हो जाता था। तुम्हें मेरीयाद आती है–?”
“बिल्कुल नहीं–।”
ऋषभ हल्के से हंसा–“मैंने इसीलिए तुम्हें कभी फोन नहींकिया कि तुम मुझे भूल जाओ तो अच्छा है–।”
“क्या तुमने मुझे भुला दिया?”
“नामुमकिन है यह।”
डॉली ने गहरी सांस ली। उसे शब्दों से ज्यादा ऋषभ कालहजा संतुष्ट कर रहा था। मानो वह लहजा सीधे दिल मेंपैबस्त हो रहा होऔर कहीं जिंदगी के तार झंकृत कर रहाहो–।
ऋषभ ही आगे बोला–“तो कब आने का बुलावा है हमारा?”
“परसों मैं फोन करके बता दूंगी।”
“बेताबी और बढ़ गयी तो क्या होगा?”
“तुम्हारे अंदर बेताबी होती तो आज यह दिन नहीं देखनापड़ता।”
“राज के साथ खुश तो हो न तुम?”
“यह सवाल मत करो, क्या जवाब दूं?”
ऋषभ एकाएक चुप रह गया।
सांसें लेता रहा।
थोड़ा ठहरकर बोला–“लेकिन अब आगे हो क्या सकता है, हमारी कहानी का तो फुल स्टॉप हो गया।”
“क्या तुम्हें मुझे पाने की तमन्ना अब नहीं है?”
ऋषभ ने प्रतिप्रश्न किया–“क्या तुम अब भी मुझे मिलसकती हो?”
“तुम बताओ, तुम तो पहले ही इतने डरपोक थे कि अपनीफैमिली के खिलाफ नहीं जाऊंगा, ऐसा नहीं करूंगा, वैसा नहीं करूंगा...तो अब तुम क्या साथ दे सकते हो?”
“अब मैं ज्यादा मजबूत हो चुका हूँ ।” ऋषभ बोला–“खोखली रस्मों की हकीकत मेरे सामने आ गयी। तुम्हें खोकरमैंने जितना कुछ खोया है तुम्हें पाकर उसका लेशमात्र भी नहीं खोया होता।”
“क्या अब भी मैं तुम्हारे पास आ जाऊं?”
“अब...अपने हंसते...।”
“निकल गयी जान?”
“नहीं, ऐसी बात नहीं है, मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत है–।”
“एक बच्चा भी फ्री में मिल जाएगा, बगैर मेहनत किये।” डॉली ने चुटीले स्वर में कहा।
“अच्छा–कांग्रेचुलेशन!”
“अब बताओ पापा बनना चाहते हो या मामा?”
स्वर इतना चुटीला था कि ऋषभ हंसे बगैर न रह सका।
डॉली भी मन-ही-न गुदगुदा रही थी। कई दिन बादउसके चेहरे पर आज बहाली आई थी।
ऋषभ हंसने के बाद बोला–“किस्मत ने पापा बनने कामौका ही कब दिया?”
“तो मामा बनने के इच्छुक हो?”
ऋषभ पुनः हंसा और बोला–“किस्मत का यह सितम भीसहेंगे।”
“किस्मत की ओट में अपनी बुजदिली को छिपाते रहो।”
ऋषभ ने एक लम्बी सांस खींची और आह के साथबोला–“जो भी इल्जाम लगाओ, तुम्हारा गुनाहगार हूँ ।”
“ऋषभ–।”
“हां–।”
“मेरा यहां बिल्कुल दिल नहीं लग रहा–क्या करूं मैं?”
“मुझे लगता है राज तुम्हें परेशान रख रहा है?”
“क्या बताऊँ –आओ फिर किसी दिन, मुझे देख जाओ।शायद फिर कभी देखने न मिलूं।”
“कैसी बातें कर रही हो तुम, ऐसी बातें कभी मत करना।”
“मैं बहुत परेशान हूँ ऋषभ, मेरी कोख अगर सूनी होती तोशायद मैं यह कदम उठा चुकी होती–।”
“प्लीज डॉली...ऐसा मत सोचो, तुम्हें क्या समस्या है–तुममेरी हो जाना चाहती हो न?”
“हां–।”
“मैं कोई रास्ता निकालता हूँ लेकिन तुम कुछ उल्टा-पुल्टामत सोचो–।”
“क्या रास्ता निकालोगे, तुम भी बहला रहे हो मुझे, बच्चेकी तरह–एक बच्चे वाली को बहला रहे हो–।” उसने फिरस्वर में विनोद भाव पैदा किया।
ऋषभ बोला–“मैंने एक खुशखबरी तो तुम्हें सुनाई नहीं।”
“क्या?”
“मेरी नौकरी लग गयी है एक बैंक में, जल्दी ही ज्वाइनिंगहोने वाली है।”
“कौन से बैंक में?”
“यस बैंक में–।”
“यस बैंक में? मेरे यहां जो गेस्ट ठहरा है, उसकी भी किसीबैंक में नौकरी लगी है–परसों ज्वाइनिंग है।”
“मेरी भी परसों ज्वाइनिंग है, उसकी किस बैंक में लगी है ।”
“यह तो मैंने नहीं पूछा।”
“यह कौन गेस्ट है?”
“राज का कोई पुराना दोस्त है।”
“ओह–!”
“अरे क्या टाइम हो गया–?” उसने मोबाइल कान सेहटाकर आंखों के आगे लिया–“माई गॉड –बारह बज गये, बातों में पता ही नहीं चला, उस गेस्ट को खाना भी खिलानाहै–चलो ऋषभ फिर बात करते हैं–।”
“डॉली...।”
“हां...।”
“खुद को सम्भालकर रखना...मैं...।”
“चलो घर आकर बात करते हैं।”
“ओके...।”
“बाय।”
“बाय।”
डॉली ने फोन काट दिया और तेजी से दरवाजे की तरफबढ़ी।
☐☐☐