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कुदरत का इंसाफ

कुछ दिनों बाद –

सम्बन्धित थाने को सूचना मिली कि नगले की पुलिया में एक लाश पड़ी है ।

लाश की खबर ने पुलिस के कान खड़े कर दिये । समय रहते पुलिस हरकत में आयी ।

जब पुलिस दल-बल के साथ उक्त नगले की पुलिया पर पहुंची तो वहां भीड़ का जमावड़ा था ।

पुलिस को देखकर भीड़ काई की तरह फट गयी ।

पुलिस जीप नगले की पुलिया पर स्थिर हुई । इंस्पेक्टर संदीप नाइक जीप से उतरा ।

काला चश्माधारी और हल्की मूंछे रखने का शौकीन लगभग बत्तीस वर्षीय इंस्पेक्टर संदीप नाइक व्यक्तित्व के तौर पर खासा प्रभावित करता था ।

पुलिस को देखकर भीड़ काई की तरह फट गयी थी। ऊपरसड़क से पुलिया कातल लगभग दस फीट की गहराई में पड़ताथा। रोड के एक साइड से प्राकृतिक स्लोब द्वारा नीचे उतरा जासकता था। वो बरसात के पानी के लिए निर्मित की गयीपुलिया थी जो वर्ष के अधिकांश समय सूखी रहती थी। मात्रकुछ दिनों के लिए बरसात में उससे पानी दर गुजर होता था।

वो नाला अभी भी सूखा था। पुलिया में एक गोल ह्युम पाइप का उपयोग कियागया था जिसके माध्यम से पानीइधर-से-उधर होता था।

इंस्पेक्टर नाइक अपने दल के साथ नीचे उतरा। लाश परदृष्टि पड़ते ही नाइक ही नहीं बल्कि हर एक के बदन में झुरझुरीदौड़ गयी।

हत्यारा कोई हैवान ही रहा होगा।

या फिर मृतक का भयानक दुश्मन जिसे मृतक के चेहरे सेसख्त नफरत थी।

क्योंकि चेहरे की जो दुर्दशा की गयी थी, उसे शब्दों मेंबांधना भी असम्भवसरीखा ही था।

चेहरा रक्त और लोथड़ों में परिवर्तित होकर रह गया था।

आंखें कहां हैं? खासा ढूंढने के बाद भी नहीं मिल सकतीं,नाक कहां है? पतानहीं। मुंह? नहीं ढूंढा जा सकता।

चेहरे को कुचला गया था।

किसी भारी चीज से।

गर्दन आधी कटी हुई थी। कदाचित निर्दयता से गर्दन कोरेता गया था।

कुछ शायद कुत्तों ने अपनी प्रवृति का असर दिखाया था।

कपड़े नोचे गये थे जो सम्भवतः कुत्तों ने ही कृत्य कियाथा। इस बात की पुष्टि इस बात से भी मिलती थी कि ह्यूमपाइप पर कुत्तों के पैरों के निशान मौजूद थे।

साथ में हत्यारे के फुट स्टेप्स भी थे।

रक्त की पर्त काली पड़ चुकी थी। रक्त तो लगता था साराही बाहर आ गया था।जिधर स्लोब था, उधर बहकर ह्यूमपाइप से बाहर आकर मिट्टी पर फैल गया था।

रक्त की ऊपरी पर्त सूख चुकी थी जिसे देखकर अन्दाजा लगाया जा सकता था कि लाश लगभग चौबीस घण्टे पुरानीसकती है।

नाइक ने लाश का प्रथम दृष्टया मुआयना किया, तदुपरांतसर्वप्रथम उसने उच्चाधिकारियों को अवगत करना जरूरी समझा ।

सब-इंस्पेक्टर भीड़ से लाश की बाबत प्राथमिक जानकारीजुटाने की गरज से कुछ प्रश्न करने लगा।

यह एक सिंगल वे रोड था जो सुनसान के शब्द सेपरिभाषित किया जा सकता था। इधर-उधर खेत खलिहान पड़ते थे। यह सड़क शहर की तरफ जाती थी।कहा जा सकताहै कि यह सड़क शहर के बाहर निकलकर आसपास के देहातइलाके को जाती थी।

अमूमन इस सड़क पर चहल-पहल दिन में ही रहा करतीथी। रात्रि आठ बजे के बाद तो मानो सड़क नीरवता औरसन्नाटे के हवाले हो जाती थी। चूंकि विगत वर्षों से चोरी औरलूट की घटनाएं कम होते-होते लगभग शून्य ही हो गयी थींलेकिन चन्द वर्ष पूर्व तक इस सड़क पर लूट की घटनाएं आमथीं। लुटेरे इतनेअधीर थे कि उन्हें रात होने तक का सब्र नहींहो पाता था। कई बार वे दिन-दहाड़े अपनी ऊर्जा को खर्च करलिया करते थे।

चुनांचे अब लूटपाट की घटनाएं लगभग शांत हो चुकीथीं...मगर क्या कीजिएलोगों के दिल में पुरानी दहशत इसकदर काबिज थी कि आज भी वहां से रात मेंगुजरने कीपहलवानी कोई मजबूरीवश ही दिखा पाता था।

यही कारण था कि सड़क रात भर सिर्फ सन्नाटों से दोस्तीगांठती थी या फिर कुत्ते और अन्य जानवर उसके हमजोलीहोते थे।

आधा घण्टा पश्चात वहां उच्चाधिकारियों की गाड़ियां पहुँच गयीं।

इसके अलावा फिंगरप्रिंट दल, डॉग स्कवायड दल औरसर्विलांस की टीम भी वहां आ गयी।

एस.एस.पी. अमित कुमार ने लाश को एक नजर देखने केबाद इंस्पेक्टर नाइक से पूछा–“क्या लाश की शिनाख्त होपाई?”

“अभी नहीं सर।”

“क्या कोई मृतक को नहीं जानता?”

“नो सर–लाश का चेहरा इतनी बुरी तरह से कुचला गयाहै कि चेहरे के तौर पर तो पहचानने का प्रश्न ही पैदा नहीं होतालेकिन कद-काठी और कपड़ों से भी किसी ने नहीं पहचाना।”

“क्या इलाके में कोई गुमशुदगी हुई है?”

“कोई रिपोर्ट नहीं है सर।”

“ओके।” अमित कुमार लाश की तरफ घूम गये।

लाश ह्यूम पाइप के लगभग बीचों-बीच पड़ी थी।

वे ह्यूम पाइप के किनारे पर खड़े होकर लाश का निरीक्षणकरने लगे।

नाइक से मंत्रणा करते हुए बोले–“चेहरा तो किसी भारीचीज से कुचला गयाहै–।”

“और वो भारी चीज यहां आस-पास नहीं मिली है।” नाइकफौरन से पेश्तर बोला–“कोई पत्थर या ईंट या कोई चीज ऐसीनहीं मिली है कि जिससे चेहरे को कुचला गया हो–यानि उसभारी चीज को हत्यारा अपने साथ ले गया है–।”

“इस तरह चेहरा कुचलने के क्या कारण हो सकते हैं?” एसएसपी अमित कुमार ने प्रश्न रखा था।

नाइक अपनी योग्यता प्रदर्शित करते बोला–“मोटे तौर परतो यही कहा जा सकता है कि शिनाख्त मिटाने के लिए हीहत्यारे ने यह काम किया है लेकिन इसके पीछे एक दूसरी वजहभी हो सकती है।”

“वो क्या?”

“हत्यारे को मृतक के चेहरे से बेपनाह नफरत हो, जिसे वहकुचल-कुचलकर अपने मन में शांति लाना चाहता हो।”

“इतनी बड़ी नफरत किस बिना पर हो सकती है?”

“इस नफरत का मुख्य कारण हत्यारे की बीवी, बहन मां याबेटी से आशनाई हो सकता है।”

एसएसपी अमित कुमार ने एक झटके से चेहरा मोड़करइंस्पेक्टर संदीप नाइक को देखा। वह वजनदार तर्क ही नहीं देरहा था बल्कि उसका ठहरा हुआ लहजा भी विश्वास से लबरेजथा जो अमित कुमार को आकर्षित कर गया था।

अमित कुमार ने स्वीकृति में गर्दन हिलायी थी।

संदीप नाइक कहीं हद तक गदगद हुआ था क्योंकि उसनेअमित कुमार के चेहरे पर अपने लिए प्रशंसा के भाव पढ़ लियेथे।

अमित कुमार ने आगे फिर प्रश्न रख दिया–“हत्यारे कितनेहो सकते हैं?”

नाइक तुरंत ही बोला–“जहां तक मैंने फुटस्टेप्स को पढ़ाहै, मुझे हत्यारा एक हीलग रहा है, बाकी अब एक्सपर्ट टीमआ गयी है, वो अपना जजमेंट देगी–।”

“क्या हत्या कहीं और करके यहां लाश डाली गयी है?”

“नो सर, हत्या यहीं की गयी है, क्योंकि ब्लड के निशानयहां के अलावा कहीं नहीं हैं।”

“तो यह काम कोई एक व्यक्ति कैसे कर सकता है?”

नाइक कुछ क्षण को चुप रह गया। तदुपरांत बोला–“यहयक्ष प्रश्न है कि अगर हत्यारा एक ही है तो उसने हट्टे-कट्टेमृतक पर काबू कैसे पाया और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है किमृतक को हत्यारा यहां तक लाने में सफल कैसे हुआ?”

“मेरा अगला प्रश्न यही था।”

“जरूर हत्यारा मृतक को बहला-फुसलाकर यहां लायाहोगा–शायद दोनों गाढ़े दोस्त रहे होंगे या उनमें किसी प्रकारके अच्छे तअल्लुक होंगे।”

“लेकिन फिर भी–।” अमित कुमार ने टोका–“मृतक आखिरकार क्यों इस सुनसान में और वो भी पुलिया के नीचेहत्यारे के साथ आएगा–नार्मली नहीं आना चाहिए–यह कांडरात में अंजाम दिया गया हो सकता है–।”

“जी सर–चांसेज यही हैं कि इस हत्याकाण्ड को रात केसन्नाटे में अंजाम दिया गया है–रात में यह सड़क एकदमसुनसान रहती है–।”

“तभी प्रश्न पैदा होता है कि मृतक किसी भी बहाने से, किसी भी तरह के फुसलाने से रात में इस सुनसान रोड परपुलिया के नीचे क्यों आएगा?”

नाइक चुप ही रह गया। उसे तर्कपूर्ण कोई जवाब नहींसूझा।

अगले ही क्षण अमित कुमार पुनः बोले–“इसीलिए कयासकहता है कि हत्यारा एक नहीं हो सकता–वे अनेक हैं और मृतक को जबरन यहां लाये हैं और इस हत्याकांड को अंजामदिया है।”

“लेकिन सर ह्यूम पाइप में, आप देखिए, जो फुट स्टेप्स हैं,वो एक ही प्रकार के तले के हैं, दूसरे प्रकार के तले केफुटस्टेप्स नहीं हैं और यह चिह्न ह्यूम पाइप से बाहर आकरऊपर सड़क तक चले हैं, फिर मिटते चले गये और सड़क तकबिल्कुल नदारद हो गये हैं–।”

“यानि ह्यूम पाइप में एक ही शख्स घुसा था और उसी नेगर्दन रेती है, उसी ने चेहरे को कुचला है, उसके बाकी साथीबाहर खड़े रहे हैं जिनका काम पोजीशनदेखना था।”

“हो सकता है सर ऐसा ही हो।”

“ऐसा इसलिए होगा क्योंकि एक आदमी हरगिज भी इसवारदात को अंजाम नहीं दे सकता, वो भी इस स्थान परक्योंकि यह मृतक अपनी मर्जी से या किसी प्रकार के फुसलानेसे नहीं आ सकता –यहां सिर्फ मृतक को लाया जा सकता है,वो भी जबरन–।”

“इट्स ओके सर।”

एक्सपर्ट टीमें अपने काम पर लग चुकी थीं।

डॉग स्क्वायड को लाश सुंघायी गयी थी।

और...।

☐☐☐

डॉग स्क्वायड टीम पूरी तरह सक्रिय थी, कदाचित काम परलग चुकी थी।

डॉग को लाश सुंघायी गयी।

जो व्यक्ति कुत्ते की जंजीर पकड़े था, उसने कुत्ते कोविशिष्ट शैली में निर्देशित किया–“रन–।”

कुत्ता वहां से भागा।

जिधर फुट स्टेप्स गये थे, कुत्ता उधर को सूंघता हुआ तेजीके साथ भागा।

ऊपर सड़क पर चढ़ा।

उसकी जंजीर पकड़े कर्मी उसके साथ-साथ था, व दल केअन्य कर्मी तथा एक एसआई तथा कुछ कांस्टेबल भी साथ-साथदौड़े।

कुत्ता सड़क पर चढ़कर दूसरी साइड में कोई दस मीटरचलकर एक स्थान पर रुक गया और रह-रहकर जमीन सूंघताहुआ इधर-उधर भौंकने लगा।

टीम के सदस्यों ने उस विशेष स्थान पर अपनी निगाहें गड़ादीं।

वो लगभग तीन मीटर का क्षेत्र था जिसको कुत्ता रह-रहकरसूंघते हुए भौंक रहा था।

एक्सपर्ट टीम यहां बैठ गयी और उस स्थान का बारीकी सेनिरीक्षण करने लगी।

यकायक वहां टीम को ब्लड के निशान मिले। जो काफीहल्के निशान थे, बहुत गौर से देखने पर मिट्टी के ऊपर लालिमासी नजर आती थी।

कर्मी संतुष्ट हुए कि यहां ब्लड के चिह्न हैं। एक्सपर्ट टीम तथापुलिस उन निशान के इर्द-गिर्द बारीकी से मुआयना करने लगी।

कुत्ता रह-रहकर वहीं चक्कर लगा रहा था।

जब कुत्ते से अगला परिणाम मिलते देर लगी तो कर्मी नेपुनः कुत्ते को एक स्थान पर रोका, थोड़ा उस पर स्नेह से हाथफेरा और रेडी होते हुए पुनः उसे विशिष्ट शैली में निर्देशितकिया–“रन।”

कुत्ता वहां से पूरी शक्ति लगाकर भागा।

इस बार वह खेतों की तरफ भागा।

टीम के सदस्य और पुलिसकर्मी उसके पीछे-पीछे दौड़े।

करीब सौ मीटर दौड़कर एक झाड़ी के पास कुत्ता स्थिरहुआ।

और उसने एक खाली पानी की बोतल वहां से बरामद करली जो बाहरी साइड से सूख चुके खून से रंगी हुई थी।

कुत्ता मुंह में दबाकर झाड़ी के पास पड़ी उस बोतल कोबाहर ले आया।

टीम की आंखों में चमक पैदा हो गयी।

बोतल टीम ने अपने नियंत्रण में ले ली व उस स्थान काबहुत बारीकी से निरीक्षण होने लगा।

वो झाड़ी और आसपास दूर तक के स्थान को खंगाल दियागया मगर अगले क्षणों में ऐसा कुछ भी नहीं मिला जो उल्लेखनीयहोता या जिसे क्लू के तौर पर उपयोग में लाया जाता।

काफी देर की मेहनत के पश्चात् भी जब वे उन्हें निराशा हीहाथ लगी यानि उस स्थान का घटनास्थल से मात्र इतनासम्बन्ध ही स्थापित हो पाया कि वहां एक खून सनी बोतलपड़ी थी। इसके अलावा वहां घटनास्थल सम्बन्धित कुछ भीमिलकर नहीं दिया तो डॉग स्क्वायड टीम ने पुनः एक बार कुत्तेको वहां से रन किया।

इस बार कुत्ता वापसी की दिशा में भागा।

कदाचित उसी स्थान की जानिब जिधर मिट्टी पर हल्के खूनके निशान मिले थे,मिट्टी के ऊपर लालिमा की शक्ल में।

लगभग सौ मीटर की उक्त दूरी कुत्ते ने चंद क्षण में पूरीकर ली थी। टीमसस्पेंसफुल थी कि कुत्ता अब किधर लेकरजाएगा।

यह तो वापसी की दिशा में भाग रहा था।

जरूर ह्यूम पाइप तक जाकर कुत्ता भ्रमित हो जाना है–कुछ ऐसे ही कयास टीम और पुलिस द्वारा लगाये जा रहे थेमगर ये कयास उस समय गलत साबित हुए जब कुत्ता उननिशान वाले स्थान को क्रॉस करके सड़क के साथ-साथ द्रुत गति से भागा।

शहर की तरफ।

कदाचित कुत्ता शहर की तरफ पूरी शक्ति लगाकर दौड़ रहाथा।

टीम के लोग तो कुत्ते के साथ दौड़ रहे थे लेकिन पुलिसकर्मियों को जबअसहनीय लगा तो उन्होंने एक जीप को सेवामें ले लिया।

अब पुलिस जीप कुत्ते के पीछे-पीछे दौड़ रही थी।

कुत्ता करीब एक किलोमीटर निरंतर दौड़ा। एक किलोमीटरआगे एक बड़ा-सा नाला पड़ता था जो हमेशा शहर के गंदे पानीसे भरा रहता था और उस पानी को दूर एक नदी में उड़ेल देताथा।

उस नाले का ब्रिज जहां से शुरू होता था, ब्रिज के एककोने पर एक स्थान को कुत्ता सूंघने लगा और स्थान को देखतेहुए भौंकने लगा।

फिर उस स्थान को छोड़कर जाता था तो ब्रिज के बराबरसे नाले में उतरने का प्रयत्न करने लगता था। चूंकि नाला पानीसे भरा था और नाला अनवरत बहरहा था, कदाचित नाले कीतरफ ढलान जाता था, कुत्ता थोड़ा नीचे उतरकर ठहर जाता थाऔर पानी को देखते हुए लपलपाकर भौंकने लगता था।

यह उपक्रम मिनट-दो मिनट ही कर पाता था कि पुनःवापस होता था और ब्रिज के उसी स्थान को पुनः सूंघने औरभौंकने लगता था, जहां प्रथमतया रुका था।

एक्सपर्ट टीम के लोग ब्रिज के उस कोने पर बैठ गये औरस्थान को देखने लगे और इसी के साथ उनके चेहरों पर प्रसन्नता की लहर उठी।

टीम का एक सदस्य एक एसआई का ध्यान आकर्षितकरता हुआ बोला–“यह देखो इस स्थान पर मोबाइल को तोड़ागया है और अभी भी मोबाइल के कई अवशेष यहां बाकीहैं–मोबाइल तोड़कर जब उठाया गया है, तो सफाई पूरी तरहसे नहीं की गयी है।”

एसआई की आंखों में चमक पैदा हुई। उसकी आंखों ने भीउन किरचों कोपकड़ लिया था, जो मोबाइल के थे, बहुतछोटी-छोटी किरचें वहां अभी भी पड़ीहुए थीं।

टीम का सदस्य आगे बोला–“यह निःसंदेह मृतक के मोबाइलकी किरचे हैं–हत्यारा हत्या करने के बाद मृतक का मोबाइलऔर हो सकता है बाकी सामान भी अपने साथ ले आया था।उसने मोबाइल को यहां रखकर तोड़ा है, उसके बाद पार्टस् कोउठाकर नाले में फेंक दिया लेकिन मोटे तौर पर ही उसने पार्टस्उठाये, छोटी किरचें यहां पड़ी हैं–।”

“रियली –आप ठीक कहते हैं–।”

टीम मेम्बर आगे बोला–“मर्डर वेपन भी यहीं ठिकानेलगाया हो सकता है क्योंकि मर्डर स्पॉट से यहां तक या सिटीतक इससे अच्छा स्थान नहीं है सामान को ठिकाने लगानेका।”

“यस।”

"कुत्ता नाले में उतरने की कोशिश कर रहा है, यानि पानीके भीतर कुछ है–यहां तलाशी लेने पर मर्डर वेपन व मृतक काअन्य सामान मिल सकता है।”

एस आई स्वीकृति में ऊपर नीचे गर्दन हिला रहा था वनाले की तलाशी का मन बना रहा था।

उधर!

☐☐☐
 
घटनास्थल के पास जिन स्थानों को कुत्ते ने चिह्नित कियाथा, पुलिस ने उस पर विवेचना शुरू कर दी थी।

घटनास्थल के ऊपर सड़क के उस पार एक स्थान पर हल्केतौर पर रक्त के छींटे मिले थे।

इंस्पेक्टर संदीप नाइक उन निशान के पास ऐड़ी के बलबैठा था और ध्यानपूर्वक उन चिह्नों का अवलोकन कर रहा था।

पुलिसकर्मी आसपास के क्षेत्र का गहन निरीक्षण कर रहेथे। यही जुगत थी कि कोई ऐसा क्लू मिल जाये जो हत्यारे तकपहुंचा सके। लेकिन बहुत ढूंढने पर भी वहां आसपास कुछ भी संदिग्ध मिलकर नहीं दे रहा था।

इंस्पेकर नाइक उन हल्के निशानों को देखता हुआ एसएसपी अमित कुमार से बोला–“सर, यह निशान तो ऐसा लगता हैकि हत्यारे ने यहां पर अपने हाथ धोये हैं। यह धोने के निशानमालूम पड़ते हैं–।”

“यस–।” अमित कुमार उसे प्रशंसनीय दृष्टि से देखतेबोले–“हत्यारा वहांघटनास्थल से चलकर यहां पर आया–यहांउसका व्हीकल खड़ा था–उसनेसर्वप्रथम पानी की बोतलनिकाली और अपने हाथ धोये, यह उसी के निशान है–।”

नाइक खड़ा होता हुआ बोला–“यानि वो बोतल वही हैजिससे हाथ धोये गये हैं–।”

“हां, क्योंकि उसके अलावा यहां कोई दूसरी बोतल नहींमिली है।”

“लेकिन वो इतनी दूर खेत में क्यों?”

“संभवतः उसे वहां कुत्ते ले गये थे।”

“ओह–!”

“हत्यारा वहां तक नहीं गया है।” अमित कुमार उत्साहपूर्णस्वर में कह रहे थे– “हत्यारे का वहां कोई काम भी नहींथा...।”

“हो सकता है, उसने मर्डर वेपन वहां ठिकाने लगायाहो–?”

“अगर ऐसा होता तो वहां आसपास जरूर कुछ मिलता–काफीखोजबीन के बाद भी वहां कुछ नहीं मिला है–इस तर्क मेंअधिक वजन नजर आता है कि हत्यारे ने इस स्थान पर जहांब्लड के निशान हैं, अपने हाथ पानी से धोये और उस बोतलको यहीं फेंक दिया–सने हुए हाथों के कारण बोतल पर खूनके निशान आ गये–हत्यारा बोतल को यहीं फेंककर अपनी गाड़ी में बैठकर यहां से चला गया, फिर कुत्तों ने इस बोतल कोमुंह में दबाकर वहां दूर खेत में डाल दिया है –।”

एकाएक इंस्पेक्टर नाइक के दिमाग में बिजली कौंधी। एकख्याल ने उसकी बुद्धि में कौंध पैदा की और इसी के साथनाइक की आंखों में चमक बढ़ी–।

वह अमित कुमार को देखता हआ रहस्यपूर्ण स्वर में बोला–“सर...।”

स्वर में इतना रहस्य था कि यकायक अमित कुमार कासम्पूर्ण ध्यान उसी परकेंद्रित हो गया जैसे वे प्रतीक्षा करने लगेकि नाइक कौन-सा रहस्योद्घाटन करने जा रहा है।

नाइक वहां पर विस्फोट करता बोला–“हत्यारा एक ही थासर, दो नहीं थे।”उसके लहजे में विश्वास भरा हुआ था।

अमित कुमार पर सस्पेंस सवार हुआ। वे बोले–“आपइतना विश्वास के साथकैसे कह सकते हैं?”

नाइक बोला–“इसकी दलील यह है कि बोतल के ऊपरखून लगा हुआ है।”

“मतलब?”

“अगर दो लोग होते तो बोतल से पानी दूसरा डालता।”

अमित कुमार की पेशानी पर बल पड़ गये। मुंह सेनिकला–“रियली।”

“उससे साबित होता है–।” नाइक उत्साहपूर्ण स्वर मेंकहता चला गया–“किहत्यारा एक ही था, सिंपल सी बात हैकि एक से अधिक होते तो एक व्यक्ति दूसरे से कहता कि मेरेहाथों पर पानी डाल दे, फिर बोतल पर खून के निशान नहींआते–।”

अमित कुमार बोले–“लेकिन यह क्या जरूरी है कि दूसरेके हाथ खून में न रंगे हों–?”

“क्योंकि ह्यूम पाइप में एक ही व्यक्ति के फुटस्टेप्स हैं औरलाश ह्यूम पाइप केबीच में है–अगर दूसरा होगा तो वो बाहरखड़ा रहा होगा तो वहां तक खूनछिटककर नहीं पहुंच सकताजो उसके हाथों पर लग जाये।”

अमित कुमार ऊपर नीचे गर्दन हिला रहे थे। वे प्रिंटएक्सपर्ट के पास चलते हुएगये और उनसे पूछा–“क्या रिपोर्टहै, ह्यूम पाइप में कितने लोगों के फुटस्टेप्स हैं –।”

उसी समय नाइक का फोन बजा था।

☐☐☐

नाइक ने फोन रिसीव किया–“हैलो अखिलेश।”दूसरीतरफ एस आईअखिलेश था।

उधर से स्वर उभरा–“वो स्थान मिल चुका है सर जहांमर्डर वेपन और मृतक केमोबाइल को ठिकाने लगाया गया है –।”

“ओह गुड–क्या मर्डर वेपन और मोबाइल मिला–?”

“अभी नहीं सर। यह एक नाला है, कुत्ता यहीं तक दौड़ताहुआ आया है औरयहां पानी में उतरने की कोशिश कर रहाहै, यहां मोबाइल की किरचें भी मिलीहैं।”

“मतलब–किरचें–?”

“यस सर–हत्यारे ने हत्या के बाद मृतक का फोन अपनेकब्जे में कर लिया थाजिसे उसने यहां ब्रिज पर रखकर तोड़ाहै और सम्भवतः तोड़कर नाले में फेंक दिया है लेकिन मोबाइलकी छोटी किरचें अभी भी यहां एक स्थान पर पड़ी हैं–।”

“गुड–।” नाइक की आंखों में चमक की वृद्धि हुई–“तबतो वो भारी चीज वहीं कहीं पड़ी होनी चाहिए जिससे मोबाइलको कुचला गया था–।”

“भारी चीज?”अखिलेश असमंजस में पड़ गया–“ऐसा तोयहां कुछ नहींमिला।”

“क्या तुमने ढूंढने का प्रयत्न किया?”

अखिलेश कुछ क्षण को चुप रह गया था। इस बीच नाइकबोल उठा–“क्योंकितुमने इस एंगल से सोचा ही नहीं किमोबाइल अगर कुचला गया है तो वो चीज कहां है जिससेकुचला गया है।”

अखिलेश चुप ही था।

कदाचित मौन रहकर वह अपनी गलती को स्वीकार कररहा था।

नाइक तुरंत ही आगे बोला–“वो भारी चीज इसलिए भीढूंढना जरूरी हो जाता है क्योंकि उस पर कातिल के फिंगरप्रिंट्स मिलेंगे।”

“यस सर–लेकिन हो सकता है कातिल ने उसको भी नालेमें फेंक दिया हो–।”

“फेंकना नहीं चाहिए, अमूमन हत्यारा इतनी फुरसत में नहींहोता कि वो उसभारी चीज को भी ठिकाने लगाये जो उसने मोबाइल तोड़ने के लिए वहीं कहीं सेजुटायी होगी–।”

“इस दिशा में सोचते हुए मेरे दिमाग की पर्ते खुल रही हैंसर–।” अखिलेश केस्वर में भी उत्साह का संचार हो चुकाथा–“मुझे लगता है कि हत्यारे ने यहफैसला पहले ही करलिया होगा कि मर्डर के बाद मुझे मोबाइल को तोड़कर नाले मेंफेंकना है, तब हो सकता है कि वो उस भारी चीज को अपनेसाथ हीलाया हो, तब तो उसने जरूर मर्डर वेपन के साथ उसे भी ठिकाने लगाया होगा–।”

“इस पर हम बाद में सोचेंगे कि हत्यारा वो भारी चीज साथलाया था या यहीं सेजुटायी थी क्योंकि कई प्वाइंट यहांविरोधाभासी हैं लेकिन आप पहले नाले कोखंगलवाओ, वोटूटा हुआ मोबाइल और बाकी सामान, मर्डर वेपन ढूंढना हमारेलिए प्राथमिक है, उसके आधार पर आगे विवेचना होगी।”

“ओके सर–मैंने शहर से नाले की सफाई करने वाले चारलोगों को बुलवाया हैजो थोड़ी ही देर में आने वाले हैं, उसकेबाद हम नाले को खंगालते हैं–।”

“ओके–वहां आसपास भी छानबीन करके देखो, वहां किसीका खेत या कोई कमरा बना हो तो उससे पूछताछ करो किउसने किसी को इस नाले में कुछ फेंकते तो नहीं देखा।”

“ओके सर–।”

“जैसा भी हो मुझे रिपोर्ट दो।”

“यस सर–।”

“दैट्स ऑल ।”

उनका सम्पर्क विच्छेद हुआ।

☐☐☐

प्रिंट एक्सपर्ट अमित कुमार के प्रश्न के उत्तर में बोलो–“सर ह्यूम पाइप में एक हीव्यक्ति के फुट स्टेप्स हैं, वहां दो व्यक्ति से फुटस्टेप नहीं हैं।”

“ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि दोनों ने एक ही कंपनी औरएक मॉडल और एकही नम्बर के जूते पहन रखे हों–आखिरऐसा क्यों नहीं होना चाहिए?”

“तब भी फुटस्टेपस एक ही व्यक्ति के हैं। मैंने केवल तलेमें डिजाइन को ही वाचनहीं किया है बल्कि निरन्तर फुटस को भी पढ़ा है यानि पहले किस फुट कानिशान पड़ा फिर व्यक्तिकिधर घूमा और दो कदम किधर चला और वापस आया फिरकिधर घूमा और फिर अपना काम करके चलता बना, इसकेलिए मैंने एक कार्टून वीडियो भी बना लिया है–।”

“ओवैरी गुड! वो भी देखेंगे लेकिन क्या आप श्योर है किफुटस्टेप्स एक ही व्यक्ति के है।”

“हन्ड्रेड परसेन्ट–सर दूसरा कोई ह्यूम पाइप में घुसा हीनहीं–।”

“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मर्डर बाहर किया गया होऔर लाश को ह्यूम पाइप में डाल दिया हो?”

“बाहर कहीं ब्लड नहीं है, ह्यूम पाइप से ही बहता हुआब्लड आया है।”

“ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि बाहर मृतक को बेहोश करदिया गया हो या गलाघोट के मार दिया हो, फिर यहां ह्यूम पाइप में मरे हुए का चेहरा कुचला गया होऔर गर्दन रेती गयी हो–।”

इंस्पेक्टर नायक भी वहीं खड़ा था तदापि एस एस पी सारेप्रश्न प्रिंट एक्सपर्ट से ही कर रहे थे इसलिए नाइक चुप खड़ासुन रहा था और एक-एक शब्द पर अधिक गौर देकर रहा था।

प्रत्युत्तर में एक्सपर्ट बोला–“सर ह्यूम पाइप में संघर्ष केऔर प्रतिरोध के चिन्ह हैं–खून ह्यूम पाइप के ऊपर तक चढ़गया है जो मृतक के प्रतिरोध में कारण हुआहै। मर्डर बाहरहुआ होता तो ह्यूम पाइप के संघर्ष में निशान नहीं होते, लाशके पैर जिस तरह से मुड़े हुए हैं, यह संघर्ष के कारण ही मुड़े हैं –।”

अमित कुमार ने अपनी पेशानी मसलते हुए सबसे उलझन भरा सवाल रखा– “कोई एक व्यक्ति किसी हट्टे-कट्टे व्यक्तिको यहां ह्यूम पाइप में काबू करके कैसे ला सकता है?”

“बिल्कुल नहीं ला सकता सर।”

“तो फिर एक व्यक्ति ने इस मर्डर को अंजाम कैसे देदिया?”

“मैंने कहा सर ह्यूम पाइप में एक व्यक्ति घुसा है बाकीहत्यारे बाहर खड़े रहे होंगे–।”

अमित कुमार अधीर स्वर में उससे बोले–“एक खून सनीबोतल मिली है जिससे हत्यारे ने हाथ धोये हैं। जिस स्थान परहाथ धोये गये हैं, वहां खून के निशान है अगर हत्यारे एक सेअधिक होते तो स्पष्ट सी बात है कि दूसरा व्यक्ति खून सनेव्यक्ति के हाथों पर पानी डालता। तब बोतल पर खून नहींलगता।”

एक्सपर्ट की बुद्धि घूम गयी। इतनी महत्वपूर्ण बात परउसके दिमाग के कपाट हिल गये।

उसने गोल हो चुके होंठों से शब्द खारिज किये–“आपका मतलब है कि हत्यारा एक ही था क्योंकि दूसरा होता तो बोतलपर खून लगा नहीं होता।”

“यस–।”

एक्सपर्ट ठहरे हुए स्वर में बोला–“एक व्यक्ति तो यहहत्या नहीं कर सकता–प्रश्न पैदा होता है कि वह मृतक कोयहां लाएगा कैसे? इस सुनसान वीराने में कोई और वो भीपुलिया तले क्योंकर आएगा? किसी बहाने से नहीं आएगा।”

नाइक एक्सपर्ट को देखता हआ बोला–“क्या आप श्योर हैकि फुटस्टेप्स जेंट्स शू के ही हैं? क्या वो लेडी शू के नहीं हो सकते–?”

“नो–लेडी शू में तले का डिजाइन चेंज होता है।”

नाइक की पेशानी पर बल पड़े रह गये। वह दो क्षण ठहरकरबोला–“अगरफुटस्टेप्स किसी लेडी शू के होते तो लेडी के लिए एकपुरुष को यहां पुलियातक लाना कोई बड़ी बात नहीं है।”

एक्सपर्ट बोला–“मगर यह स्टेप्स जेंट्स शू के हैं।”

नाइक ने पेशानी को मसला–“वो कार्टून वीडियो की आपबात कर रहे थे।”

“यस सर–।” एक्सपर्ट ने अपने साथियों को बुलाया औरउसने कहा–“वो कार्टून वीडियो सेव हो गया?”

“यस।”

“जरा ओपन करो।”

साथी ने अपना मोबाइल बाहर निकाला और एक वीडियो ऑन करके उन लोगोंके सम्मुख कर दिया।

नाइक और अमित कुमार के उस वीडियो पर अपनी नजरेंगड़ा दीं।

वीडियो में एक व्यक्ति गोल ह्यूम पाइप के बीचो-बीच पड़ाहै। उसकी आधी से अधिक गर्दन कट चुकी है जिससे रक्तभलभलाकर बाहर निकल रहा है, वहव्यक्ति तड़प रहा है,हाथ-पैर हिला रहा है।

हत्यारा वहीं खड़ा है, हत्यारे की पीठ पर एक बैग है जिससेवह अगले क्षणों में एक हथौड़ा निकालता है। हत्यारा कुछ कदमआगे-पीछे हो रहा है।

अभी हत्यारे के हाथ में हथौड़ा है, तभी पाइप के दूसरी तरफ से कुछ आवाजहोती है। हत्यारे की तन्द्रा भंग होती हैऔर वह आवाज की दिशा में देखने लगता है।

तभी वह चलता हुआ दूसरी तरफ जाता है, ह्यूम पाइप केकोने पर खड़ा होकर इधर-उधर देखता है। निश्चित होकरवापस आता है। मृतक के चेहरे के पासखड़ा हो जाता है।

मृतक अभी भी तड़प रहा है, उसके हाथ-पैर हिल रहे हैं।तभी हत्यारा हथौड़े से मृतक के चेहरे पर जबरदस्त प्रहारकरता है। खून के छींटे ह्यूम पाइप की दीवारोंपर पहुंचते हैं।

हत्यारा निरंतर वार-पर-वार करता चला जाता है। इस बीचवह कुछ कदम आगे-पीछे होता है। मृतक का चेहरा लोथड़ों में तब्दील हो जाता है। अगलेक्षणों में मृतक की तड़पन बंद होजाती है, कदाचित उसके प्राण निकल चुके हैं।

अच्छी तरह से निश्चित होने के बाद हत्यारा एक स्थान पर पड़े उस खंजर को उठाता है जिससे उसकी गर्दन रेती थी। मर्डरवेपन अपने साथ लेकर वह ह्यूम पाइप से बाहर आ जाता है।

कार्टून वीडियो समाप्त हो जाता है।

“वैरी गुड!” अमित कुमार के मुंह से निकला। वे एक्सपर्टसे बोले–“क्या आपश्योर हैं कि घटनाक्रम इसी तरह अंजामदिया गया है –?”

“एकोर्डिंग फुट स्टेप्स–फुट स्टेप्स् रीड करके हम बतासकते हैं कि पहले कौन-सा स्टेप है, फिर कौन-सा और उसकेबाद कौन-सा, इसी आधार पर यह वीडियो तैयार किया गया है –।”

नाइक अमित कुमार से बोला–“सर हत्यारे ने यहां से दूरएक नाले के ब्रिज पर एक मोबाइल को तोड़ा।”

नाइक बोला–“क्या आप श्योर हैं कि हत्यारा हैमर साथलाया था?”

एक्सपर्ट दो क्षण ठहरकर बोला–“स्पष्ट सी बात है, हत्याराहत्या के इरादे से ही यहां मृतक को लाया था तो मर्डर वेपनअपने साथ ही लाएगा। चूंकि चेहराकुचलना भी उसकी प्लानिंगका हिस्सा था तो...हैमर वो अपने साथ लाया था।”

नाइक की आंखों में चमक पैदा हुई। वह बोला–“यानिमोबाइल जिस भारी चीज से कुचला गया है, वो इसी हैमर सेकुचला गया है–।”

यह शब्द उसने स्वयं से कहे थे।

अमित कुमार ने एक्सपर्ट से पूछा–“आपने वीडियो में एकआवाज दिखायी है जिसे सुनकर हत्यारा पाइप के दूसरे कोनेतक गया है और फिर वापस आया है, वो आवाज आपने क्योंदिखायी?”

“क्योंकि फुटस्टेप्स उस कोने तक जाते हैं और यह चेहराकुचलने से पहले हुआ है तो मेरे कयास के अनुसार हत्यारे को उस तरफ से कोई आहट या आवाज सुनाई दी है इसलिए वहएक तरफ गया है, उसने इधर-उधर देखा है, फिर वापस आकरचेहरे को कुचला है।”

नाइक बोल पड़ा–“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हत्यारे नेवहां हैमर छुपाकर पहले ही रख रखा हो और उधर हैमर उठानेही वह गया हो, वापस आकर हैमर से चेहरा कुचला हो–।”

एक्सपर्ट ठहरकर नाइक को देखने लगा। तदुपरांत बोला–“हांऐसा भी हो सकता है, हत्यारे ने पहले ही उधर हैमर छिपाकररख दिया हो, जिसे लाने को वह उस तरफ गया हो–।”

नाइक अमित कुमार से बोला–“सर हत्यारे ने यहां से दूर एक नाले के ब्रिज पर एक मोबाइल को तोड़ा है। जिस भारीचीज से मोबाइल को तोड़ा गया है, वो भारी चीज वहां बरामदनहीं हुई है तो इसका मतलब हत्यारे ने उसी हैमर से उसमोबाइल को तोड़ा है और फिर मोबाइल का मलबा नाले मेंफेंक दिया है, सम्भवतः हैमर और खंजर भी वहां नाले में फेंकागया है।”

अमित कुमार एक्सपर्ट से मुखातिब हुए–“आप यह कैसेकह सकते हैं कि चेहरे को हैमर से ही कुचला गया है–किसीईंट या पत्थर वगैरह से क्यों नहीं–?”

“तो उस ईट और पत्थर को यहां होना चाहिए था।” एक्सपर्ट तुरंत ही बोला–“उसे अपने साथ ले जाने की कोई तुक नहीं बनती–दूसरी बात चेहरे पर जिस प्रकार के निशानहैं, वो ईंट या पत्थर के हरगिज नहीं हैं, वो हैमर जैसी ही किसीवस्तु के निशान हैं–।”

“गुड!” अमित कुमार ने नाइक से पूछा–“क्या नाले कीतलाशी हो रही है?”

“यस सर–शहर से नाला साफ करने वाले चार बंदे बुलायेगये हैं जो इस समय नाले की तलाशी ले रहे होंगे–।”

सिचुएशन जानने के लिए नाइक ने मोबाइल की डिस्प्लेऑन की, ठीक उसी समय एसआई अखिलेश की इनकमिंगकॉल उसके मोबाइल पर बजने लगी।

☐☐☐

इंस्पेक्टर नाइक ने काल रिसीव की–“हैलो।”

“हैलो सर, नाले की खोजबीन अभी जारी है, नाला थोड़ागहरा है और हल्का पानी का बहाव निरंतर जारी है इसलिएनाले के तल में किसी चीज को ढूंढना थोड़ा मुश्किल है लेकिनबंदे लगे हैं और सावधानी के साथ तल को खंगाल रहे हैं,उसके साथ मैंने बहाव की दिशा में पेट्रोलिंग भी की–।”

“गुड–।”

“सर कई किलोमीटर आगे जाकर एक थैली मिली जो नालेके किनारे पर उगी एक झाड़ी में फंसी हई थी, उस थैली कोहमने खोलकर देखा तो उसमें खून सने कपड़े निकले हैं–।”

“वैरी गुड।” नाइक तो यूं खुशी में बोल उठा जैसे अभीहत्यारे तक पहुंचने ही जा रहा हो।

“लेकिन सर...।”

“लेकिन –?”

“वो कपड़े लेडीज हैं।”

“व्हाट–?”नाइक के दिमाग के घुर्रे उठे।

“यस सर–यानि हत्या एक लेडी ने की है।”

“ऐसा कैसे हो सकता है?”

“कपड़े लेडीज हैं तो हत्या लेडी ने ही की है सर–अब यहस्पष्ट हो गया है।”

“भाई अखिलेश, यहां हत्यारे के फुटस्टेप्स जेंट्स के हैं तोहत्यारिन लड़की कैसे हो सकती है–?”

उधर अखिलेश कुछ क्षण को चुप रह गया।

इस बीच नाइक तुरंत ही आगे बोला–“क्या उस थैली केअलावा कुछ और सामान अब तक मिला?”

“नो सर–नाले के तल की खोजबीन अभी पूरी नहीं हुई है ।”

“करो–पूरी तन्मयता से करो, कुछ भी छूटना नहींचाहिए–मोबाइल जरूर मिलना चाहिए।”

“मुझे नहीं लगता सर कि मोबाइल मिल जाएगा क्योंकिजिस प्रकार हत्यारे ने उसका मलबा बनाया है, तो उसके टुकड़ेकिसी एक स्थान पर नहीं रह गये होंगे –बहते पानी में इधर-उधर हो गये होंगे।”

फिर भी जो भारी होंगे मसलन बैटरी या कार्ड अगरसलामत बचा हो तो भारी होने के कारण वो तल पर बैठ करहोंगे।”

“हम एग्जामिन कर रहे हैं सर–।”

“ओके–जैसा भी हो तुरंत इन्फार्म करो और पेट्रोलिंग आगेतक करो, नाले के छोर तक करो, हो सकता है कुछ और भीमिले–।”

“यस सर–अभी भी हम लोग आगे बढ़ रहे हैं।”

“गुड–।”

नाइक ने फोन डिसकनेक्ट किया।

और अमित कुमार की तरफ मुड़ता हआ विस्फोटक स्वर मेंबोला–“मिस्ट्री तोऔर उलझ गयी सर, यह मिस्ट्री तो दिमागके कपाट हिला रही है।”

वे नाइक की तरफ रुख करते बोले–“उधर अब तक क्याखोजबीन हुई?”

“यहां से लगभग एक किलोमीटर चलकर एक नाला पड़ताहै–हत्यारे ने अपना सारा सामान वहीं ठिकाने लगाया है। अभीतक मर्डर वेपन या मोबाइल तो नहीं मिला है लेकिन नाले मेंआगे जाकर एक थैली मिली है जिसमें खून सने लेडीकपड़े हैं –।”

अमित कुमार के माथे पर बल पड़ चुके थे।

उनके मुंह से निकला–“यानि यह मर्डर एक लेडी ने किया है ।”

प्रिंट एक्सपर्ट वहीं खड़ा था। वह प्रतिरोध करता बोला–“नोसर, यह मर्डर लेडी ने नहीं किया है, यह जेंट्स ने किया है–।”

अमित कुमार उसे देखते हुए बोले–“क्योंकि फुट स्टेप्स जेंट्स शू के हैं–?”

“यस सर–।”

नाइक बोला–“ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि एक लेडी ने जेंट्स शू पहन लियेहों?”

एक्सपर्ट थोड़ी देर स्थिर दृष्टि से नाइक को देखता रहा,तदुपरांत बोला–“हां ऐसा अवश्य हो सकता है कि किसी लेडीने जेंट्स शू पहन लिये हों, लेकिन यह काम स्वाभाविक रूप सेजरा मुश्किल लगता है–।”

“क्यों ?”

“आखिर जब वह लेडी कपड़े पहनकर आ सकती है तो शू क्यों जेंट्स पहननाचाहेगी?”

“ताकि फुट स्टेप्स पढ़कर पुलिस भ्रमित हो सके, पुलिस कोयह ख्याल ही न आये कि हत्या कोई लेडी भी कर सकती है –।”

“यदि उसे फुट स्टेप्स ही मिटाने थे तो शू को पॉलीथीन से बांध सकती थी, उससे पता ही नहीं चलता कि शू कैसे हैं–।”

“मैं पुलिस को भ्रमित करने वाली बात कर रहा हूँ, मर्डररइतना शातिर है कि उसने जानबूझकर जेंट्स शू पहने ताकिपुलिस की जांच का केंद्र पुरुष बना रहे–।”

“अगर मर्डरर इतना ही शातिर होता तो वह कपड़ों कीथैली क्यों नाले में फेंककर जाता जो कि पुलिस को आसानी सेमिल गयी–उसे तो वो थैली नष्ट कर देनी थी, कपड़ों में अगरआग लगा देता तो पुलिस कभी कपड़ों तक नहीं पहुंच पाती।”

नाइक एक्सपर्ट की आंखों में गहराई तक झांकते हुएबोला–“फिर आप क्या कहते हैं–फुट स्टेप्स जेंट्स के हैं औरखून सने कपड़े लेडी के हैं, खुद बकौल आपके ह्यूम पाइप मेंएक ही व्यक्ति घुसा है तो यह कैसे सम्भव हुआ कि जेंट्स शूऔर लेडी कपड़े–?”उसने प्रश्न एक्सपर्ट की आंखों में ही छोड़दिया।

एक्सपर्ट कुछ क्षण को चुप रह गया।

एकाएक कुछ नहीं बोल पाया ।छोटा-सा विराम लेने केबाद बोला–“यह एक बड़ी मिस्ट्री है कि एक ही व्यक्ति इन दोअलग जेन्डर की चीजें क्यों पहने हुए था, क्या पुलिस कोभ्रमित करने के लिए या फिर यह एक नार्मल मामला है।”

“नार्मल मामला यह कैसे हो सकता है?”

“लेकिन प्वाइंट तो इसके अलावा यह भी उलझाने वाला है...।” एक्सपर्ट बात को जारी रखते हुए बोला –“कि बोतल पर लगा खून इस बात का संकेत कर रहा है कि हत्यारा एक ही है–तब बड़ा प्रश्न यह पैदा हो जाता है कि कोई एक व्यक्ति इस हट्टे-कट्टे नौजवान को पुलिया के नीचे कैसे ले आएगा जो यहां आसानी से मर्डर कर सके–?”

“लेकिन अब तो साफ हो गया–।” नाइक बोला –एक लेडी है तो लेडी के लिए तो यहां सुनसान में किसीको लाना बड़ी बात नहीं है–।”

“बड़ी बात है सर–।” एक्सपर्ट बोला –“यहांजंगल है और जंगल में एक पुलिया के नीचे मृतक क्यों आएगा–लेडी के लिए वह जिस काम के लिए आना चाहेगा, वह काम तो रात के अंधेरे में सड़क के किनारे कहीं किया जा सकता है –।”

एसएसपी अमित कुमार बोले–“सारे प्वाइंट्स उलझाने वाले हैं, हम तब तकउलझे रहेंगे जब तक लाश की शिनाख्त नहींहो जाती–एक बार लाश की शिनाख्त हो जाये फिर इन्वेस्टीगेशनको एक दिशा मिल जाएगी।”

“लेकिन सर शिनाख्त कैसे हो?”

“मृतक के शरीर पर सिविल कपड़े हैं यानि टेलर के सिले हुए–जरूर उस पर टेलर की चिट होगी, इसके अलावा जो खूनसने कपड़े मिले हैं, शायद वो भी हमारे लिए क्लू बन सकें।

“यस सर–हमें लाश के कपड़ों की चिट पढ़नी चाहिए।” कहकर नाइक लाश की तरफ बढ़ा।

उन्हें पता भी नहीं था कि अगले क्षणों में उनकी खोपड़ी भक से उड़ जाने वाली थी।

☐☐☐
 
लाश की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी हो चुकी थी।फिंगरप्रिंट जो उठाने थे, उठा लिए गए थे।

वे लोग चलकर ह्यूम पाइप के मुंहाने पर आए। एसएसपी अमित कुमार ने निर्देश दिये–“लाश की शर्ट का कालर देखो, किसी टेलर की चिट हो सकती है।”

नाइक ने कांस्टेबल की तरफ इशारा किया।

दो कांस्टेबल झुककर ह्यूम पाइप में अंदर बढ़े। लाश कोदेखना बड़ा जिगर का काम था। चेहरा तो था ही नहीं। आंखें,नाक, मुंह नहीं ढूंढा जा सकता था। मात्र लोथड़े शेष थे।

कांस्टेबलस् लाश के पास झुक गये। उन्होंने मुँह पर रूमालबांध रखे थे। कॉलर को ढंग से दृष्टिगोचर करने के लिए थोड़ालाश को हिलाने की आवश्यकता पड़ रही थी। यूं भी जिसप्रकार शर्ट खून में रंग चुकी थी, नहीं लगता था कि कोई चिटआसानी से पढ़ी जा सकती है लेकिन वाशिंग करके जरूर चिटको पढ़ा जा सकता है।

महसूस हुआ लाश को थोड़ा करवट देना पड़ेगा।

बहुत भारी मन से वे कांस्टेबलस् वहां बैठे हुए थे।

उन्हें उबकाई आती थी। आंखें बंद करने को मन करता थालेकिन आंखें बंद कर लेंगे तो क्रियान्वयन कैसे करेंगे?

उन्होंने पीठ पर हाथ डाला।

हाथ को थोड़ा-सा करवट देने के लिए ताकि कॉलर स्पष्टहो सके।

और जब उनका हाथ पीठ से लगा तो वे बुरी तरह चौंकउठे।

कदाचित जिस कांस्टेबल ने पीठ में हाथ डाला था, वहइतनी बुरी तरह से चौंक उठा कि उसकी चीख निकलतेनिकलते बची।

उसने तेजी के साथ हाथ वापस खींचा। मानो वहां उसे तेजवोल्ट का झटका लगा।

उसकी इस क्रिया को देखकर दूसरा कांस्टेबल हैरान स्वरमें बोला–“क्या हुआ?”

“इसकी पीठ पर कुछ है।” कांस्टेबल भयभीत स्वर में बोलरहा था। चूंकि वहां भयग्रस्त होने की तो कोई बात नहीं थी,कदाचित कांस्टेबल पहले से हीखौफनाक लाश को देखकरडरा हुआ था।

वह कांस्टेबल एकदम पीछे को हुआ था।

उसकी इस हरकत को बाहर खड़े अधिकारियों ने भी देखा ।

नाइक सस्पेंसपूर्ण स्वर में बोला–“क्या हुआ जोगेन्द्र,क्यों चौंके तुम–?”

“सर, इसकी पीठ पर कुछ है।” वह रहस्यपूर्ण स्वर में बोलरहा था।

“कुछ है–?–क्या मतलब–क्या है?”

“कुछ भारी सा।”

वहां मौजूद लोगों के मस्तक पर बल पड़ गये।

नाइक ने अमित कुमार की तरफ देखा। स्वयं अमित कुमारकी आंखों में बड़ा-सा प्रश्नचिह्न तैर रहा था।

“क्या हो सकता है शर्ट के भीतर?” अमित कुमार बड़बड़ाये ।

नाइक ने सोचनीय मुद्रा में होंठ भींच लिए जो प्रथम कयास में उसे सूझा उसने अमित कुमार के सम्मुख रखा–“कहीं यहहत्यारे की कोई प्लानिंग तो नहीं है –?”

“कैसी प्लानिंग ?”

“हो सकता है हत्यारे ने मृतक की पीठ पर विस्फोटक बांध रखा हो ताकि जब लाश को खींचकर ह्यूम पाइप से बाहरलाया जाये तो विस्फोटक रगड़ खाकर फट पड़े और लाश केसाथ-साथ इंवेस्टीगेटर्स के भी...।” वह आगे चुप हो गया था।

लेकिन उसकी बात सुनकर कांस्टेबलस् बिना बुलाये बाहरआ गये। फुर्ती के साथ। मानो विस्फोट होने ही वाला हो।

अमित कुमार ने नाइक के इस संशय को सिरे से खारिजनहीं किया था लेकिन चेहरे पर अविश्वास के भाव गर्दिश करतेरहे।

तदुपरांत वे एक्सपर्ट से बोले–“आप देखिए क्या है पीठ पर–?”

एक्सपर्ट ने खुद को कसा। चेहरे पर दृढ़ता इख्तियार की।और साथी से बोला– “कैंची लेकर आओ।”

अगले क्षणों में दो सदस्य कैंची लेकर ह्यूम पाइप में प्रविष्टहुए।

बहुत सावधान मुद्रा में।

निःशब्द कदमों से।

मानो कदमों से जरा भी धमक पैदा हुई तो विस्फोटक फट ही पड़ेगा।

वे पास जाकर बैठ गये।

और लाश को करवट देने लगे।

☐☐☐

नाले में कमर तक पानी था। यानि चार फिट पानी नाले मेंबह रहा था।

चार सफाईकर्मी अपने पैरों से तल को खंगाल रहे थे।उनके पैरों को जो भी चुभता था, वो नाले में घुसकर उस चीजको उठा लेते थे लेकिन कभी कोई ईंटका टुकड़ा निकलता था,कभी पत्थर का टुकड़ा, कभी लकड़ी निकलती थी, कभी कोईबोतल लेकिन इस बार एक सफाई कर्मी के पैरों से जो चुभाथा, वह कोई दुर्लभ ही वस्तु थी।

उस पर पैर रखते ही उसने पैर को उठा लिया था। फिरधीरे-धीरे पुनः पैर से टटोलकर देखा–

कुछ था–

वह झुक गया।

उसने लम्बा करके हाथ नीचे डाल दिया।

उसे इतना झुकना पड़ा कि पानी उसके मुंह में ही घुसनेवाला था और उसके हाथों ने उस वस्तु को पा लिया।

इस बार वह प्रसन्न था। उसे महसूस हो चुका था कि कोईखास चीज ही उसने उठाई है। शायद वही जिसकी उन सबकोतलाश थी।

वह सीधा हुआ।

हाथ में पकड़ा सामान पानी से ऊंचा किया, कदाचितआंखों के सामने किया।

और खुशी के मारे उसकी किलकारी छूट गयी–“सर यहदेखो–।”

एसआई अखिलेश वहीं खड़ा था। उसकी दृष्टि उस थैलीपर पड़ी जो सफाईकर्मी के हाथ में थी।

सफाईकर्मी एक थैली लहरा रहा था।

जिसमें बाहर से ही एक हैमर और एक बड़ा चाकू नजर आ रहा था।

अखिलेश की आंखें चमक उठीं। वह यूं उत्तेजना से भर गया मानो हारती हुई टीम के खिलाड़ी ने छक्का जड़ दिया हो ।

वह खुशी का नारा छोड़ उठा–“वैरी गुड–बाहर लाओ।”

सफाईकर्मी थैली को पानी से ऊपर उठाये नाले से बाहर की तरफ आया।

थैली गंदे पानी और गाद में लिपटी हुई थी।

अखिलेश सफाईकर्मी से बोला–“खोलो इसे–।”

थैली में गांठ बंधी थी। हैमर का हैंडल बाहर झांक रहाथा। खंजर की मूठ भी बाहर दिखाई दे रही थी।

सफाईकर्मी ने गांठ को खोला।

थैली में थोड़ा पानी भरा हुआ था। उसने थैली सड़क पररख दी और उसमें से सामान बाहर निकाला।

कुल जमा–एक हथौड़ा, एक तेजधारदार खंजर और एकरूमाल–।

तीनों पर ही खून लगा था। पानी में डूबा होने के बाद भीखून साफ नहीं हुआ था। अलबत्ता काली गाद के कारणसामान पर कालिमा जरूर आ गयी थी।

अखिलेश उत्साहित स्वर में सफाईकर्मियों से बोला–“औरढूंढो, अभी मोबाइल नहीं मिला है। मोबाइल मिलना जरूरी है,टूटा-फूटा मोबाइल जरूर मिलेगा।”

थोड़ा ठहरकर सफाईकर्मी पुन: नाले की तरफ बढ़े और अखिलेश ने मोबाइल स्क्रीन को ऑन किया।

☐☐☐

चूंकि एक्सपर्ट टीम के दोनों सदस्यों के चेहरे पर नाइक केकयास के प्रति पूर्णतः अविश्वास का भाव व्याप्त था लेकिन तब भी हद दर्जे की सावधानी उनके भीतर से प्रस्फुटित होती थी।

दोनों बॉडी के पास बैठ गये थे और बॉडी को करवट दे दी थी ।

पुलिस अधिकारी ह्यूम पाइप के मुंहाने पर खड़े होकरटकटकी बांधकर देख रहे थे, सभी के अंदर यह जिज्ञासा और उत्सुकता बल खा रही थी कि आखिर पीठ पर क्या चीज है।

वे दोनों कांस्टेबलस् भी अधिकारियों के पीछे से गर्दननिकालकर गोल गोल आंखों से देख रहे थे।

बॉडी को करवट ले लिया गया था। एक ने बॉडी को रोकेरखा और दूसरे ने पहले टटोलकर देखा।

वहां वास्तव में कुछ था जो शर्ट को थोड़ा ऊपर उठाये हुएथा।

कदाचित बाहर से देखने पर ही कुछ नजर आता था।

मेम्बर ने उस स्थान को टटोलकर जानना चाहा कि वो क्याहो सकता है, कॉलर की तरफ से झांककर देखा।

कुछ आभास मिला।

मेम्बर ने कैंची खोली और उस स्थान की शर्ट काटने लगा।

जब शर्ट कट गयी और दृश्य स्पष्ट हुआ तो मेम्बर्स कीआंखें चकित स्वर में फैली रह गयीं।

मुंह से निकला–“खंजर–।”

“क्या है?”इधर से दृश्य साफ नहीं दिख रहा था तो नाइकने ऊंची आवाज में पूछा।

मेम्बर प्रत्युत्तर में बोला–“यह तो खंजर है सर–।”

“खंजर।” विस्फोटक स्वर में हर अधर पर यह शब्दबड़बड़ाया। उन दोनों कांस्टेबलस् के अधरों पर भी यह शब्दमचला जो अधिकारियों के पीछे लम्बी गर्दन किये और गोलआंखों से दृश्य पर दृष्टि जमाये थे। वे भी अचरज भरे स्वर मेंबड़बड़ा उठे–“खंजर –।”

मेम्बर ने शर्ट काट दी थी।

दृश्य पूर्णरूपेण स्पष्ट हो गया था।

अंदर पहनी बनियान से एक खंजर बंधा हुआ था जिसकीमूठ ऊपर को थी। कदाचित इस तरह बंधी थी कि कॉलर मेंहाथ डालकर बाहर खींचा जा सके।

खंजर को देखकर विशेषकर इंस्पेक्टर नाइक की बुद्धि हवामें तैरने लगी थी ।

उसे चक्कर से आने को हुए।

उसके मस्तिष्क का कबाड़ा निकला जा रहा था। जो थ्योरीवह बनाता था, थोड़ी देर बाद वो ध्वस्त हो जाती थी।

वह बड़बड़ाते हुए अमित कुमार से बोला–“सर, इस खंजर का क्या मतलब है?”

खुद अमित कुमार के मस्तक पर बल पड़े थे। वे बोलने कीगुंजाइश के साथ बोले–“यह खंजर तो बहुत कुछ कह रहा है –।”

“क्या कह रहा है सर?”नाइक अधीर स्वर में बोला।

अमित कुमार मन मस्तिष्क को एक बिन्दु पर रखे बोले–“किहत्या करने के इरादे से मृतक आया था। हत्यारा नहीं, लेकिनकामयाब हत्यारा हो गया।”

नाइक की बुद्धि पलट गयी। वह बोला– “आपका मतलबहै कि मृतक हत्यारे को यहां कत्ल करने के इरादे से ही लायाथा लेकिन हत्यारा उल्टा मृतक की हत्या कर गया, जबकिउसका हत्या करने का कोई इरादा नहीं था?”

“बिल्कुल, वरना इस खंजर का और क्या अर्थ हो सकता है? यह आदमी तो पूरी तैयारी के साथ आया था, खंजर साथलाया था।”

“तो फिर वो खंजर कहां से आया जिससे इसकी गर्दन रेतीगयी है?”

“जरूर उसको भी यही साथ लाया होगा–यह दो खंजरलाया होगा। ताकि किसी भी तरह हत्या करने में सफल हो सकेलेकिन हत्यारा ज्यादा फुर्तीला और चालाक निकला, उसने इसका एक खंजर छीन लिया और फिर उसे संभलने का मौकानहीं दिया–।”

“और हैमर? जिससे इसका चेहरा कुचला गया है?”

“उसको भी यही लाया होगा –यह पूरी तैयारी से आया थालेकिन वार उल्टा पड़ गया और यह जान से हाथ धो बैठा।”

नाइक अपनी खोपड़ी धुनता हुआ बोला –“ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जिस खंजर से इसका मर्डर किया गया है, वोखंजर यही हो और हत्यारे ने इसको खूब साफ करके इसकीबनियान से घुरस दिया हो?”

अमित कुमार थोड़ा उलझे हुए स्वर में बोला–“यह इसलिएजरा मुश्किल है कि हत्यारा मर्डर के बाद वेपन को छिपाता है,लाश के ही कपड़ों में नहीं छोड़कर जाता है–।”

“हो सकता है इसमें हत्यारे का कोई उद्देश्य छिपा हो–।”

नाइक आगे कुछ कहता तब तक एक्सपर्ट रूमाल में लिए उसखंजर को लेकर वहां आ गया था।

और उन लोगों के सम्मुख करता बोला–“यह अनयूज्डखंजर है सर, इसे अभी तक इस्तेमाल नहीं किया है, किसी भीतरह से इसे इतना साफ नहीं किया जा सकता था, वो भी मर्डर स्पॉट पर कि यह एकदम फ्रेश हो जाये–।”

अमित कुमार और नाइक गौर से उस खंजर को देखने लगेजो एक्सपर्ट की हथेली पर रखे रूमाल के ऊपर रखा था।

खंजर को देखकर यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती थी कि उसे खून करने में इस्तेमाल किया गया और फिर बाद मेंसाफ कर दिया गया है।

नाइक अपनी बुद्धि को चकराते हुए बोला–“समझ में यहनहीं आ रहा कि फिर वह दूसरा खंजर कहां से आया–हत्या केइरादे से तो मृतक आया था तो हत्यारे को खंजर कहां सेमिला?”

एक्सपर्ट बोला–“समझ में तो सर बहुत सी बातें नहीं आरही हैं। घटनास्थल पर जब–जेंट्स फुट स्टेप्स हैं तो खून में सनेलेडी कपड़े क्यों हैं, बोतल पर लगा खून बताता है कि हत्याराएक ही था तो वह मृतक को पुलिस के नीचे ह्यूम पाइप तकलाने में कैसे सफल हुआ?”

नाइक की बुद्धि घूमती रही। वह बड़बड़ाया–“यह मिस्ट्री तो उलझती जा रही है, जब तक लाश की शिनाख्त नहीं होगी,हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते।”

अमित कुमार बोले–“आपने कॉलर पर लगी टेलर की चिट को देखा ?”

“नो सर, अभी देखते हैं–।”

“देखो।”

उसी समय नाइक का फोन बजा था।

अखिलेश का नाम डिस्प्ले हो रहा था।

☐☐☐

“सर, बड़ी सफलता हमारे हाथ लगी है।”

“वैरी गुड–क्या?”

“वो थैली मिल गयी जिसमें हैमर और खंजर है, साथ मेंएक सफेद रूमाल भी है।”

“वैरी गुड–कहां मिली?”

“नाले के तल में–सफाईकर्मियों ने बहुत देर की खोजबीनके बाद उसे पाया है।”

“मोबाइल–?”

“अभी मोबाइल नहीं मिला है सर, उसके लिए मैं सर्चअभियान चला रहा हूँ,मोबाइल भी अगर हत्यारे ने थैली मेंबांधकर फेंका होता तो जरूर मिल जाता लेकिन मुझे लगता हैकि उसने मोबाइल को तोड़कर यूं ही नाले में फेंक दिया जिससेउसके पार्टस् आगे-पीछे बहते चले गये हैं।”

“लेकिन भारी पार्ट तो नीचे बैठ गये होंगे।”

“उसके लिए सर्च हो रहा है सर–।”

“ये लेडी कपड़ों की थैली और खंजर, हैमर सब इधर भेजो–।”

“ओके सर, अभी भेजता हूँ ।”

“ओके।”

नाइक ने सम्बन्ध विच्छेद किया।

और अमित कुमार से मुखातिब होता हुआ बोला–“खंजरऔर हैमर मिल चुका है।”

“गुड–!”

“लेकिन उससे हमें हासिल क्या होगा, पानी में डूबे होने केफिंगरप्रिंट तो उससे मिल नहीं सकते–साथ में एकसफेद रूमाल भी मिला है–।”

“तब भी मर्डर वेपन का मिलना जरूरी होता है।” अमित कुमार बोले–“खंजर पर शायद कुछ खास लिखा हो या उसकीकोई खास बनावट हो, तो हमें एकदिशा मिल सकती है।”

“मैंने सब सामान यहीं मंगवाया है।”

एक्सपर्ट मेम्बर ह्यूम पाइप में कॉलर को देखते हुए कहरहा था–“यह तो सर रेडीमेट शर्ट है, किसी कंपनी की चिटलगी है–।”

“काट लो।”

मेम्बर काटने लगा।

अमित कुमार धीर-गम्भीर मुद्रा में वहां टहलने लगे।विरोधाभासी बिन्दु उनके सिर में दर्द पैदा कर रहे थे।

कुछ क्षणोपरांत वे पुनः नाइक से बोले–“भीड़ पहले सेज्यादा बढ़ चुकी है, बहुत से नये लोग आये हैं, एक बार इन सबको लाश करीब से दिखा दो, शायद कोई पहचान जाये–उसकेबाद लाश का पंचनामा भर देना।”

“ओके सर –।”

अमित कुमार होंठ भींचकर थोड़ी देर चुप रहे। फिर वेघटनास्थल से रवानगी कर गये।

☐☐☐
 
अगले दिन नियत साढ़े नौ बजे सन्नी यस बैंक के सामने ऑटो से उतरा और भाड़ा पे करके बैंक की तरफ बढ़ा।

ठीक उसी समय ऋषभ ने अपनी बाइक परिसर में पार्क कीऔर सन्नी को गुडमॉर्निंग बोलता हुआ, सन्नी के पीछे-पीछेबैंक में प्रविष्ट हुआ।

तथा साथ ही बोला–“कल की मर्डर मिस्ट्री ने तो सरपुलिस के दिमाग की चूलें हिला दी हैं–बहत इन्ट्रेस्टेड मर्डरमिस्ट्री है...।”

सन्नी ऋषभ को देखता हुआ बोला–“क्या मर्डर मिस्ट्री भी इन्ट्रेस्टेड हो सकतीहै–?”

“हां सर, पुलिस घनचक्कर बनी हुई है, आज का अखबारदेखो, उससे भरा पड़ा है, सबसे हैरान करने वाली बात यह हैकि घटनास्थल पर जेंट्स शू के निशानमिले हैं और दूर एकनाले में लेडी कपड़े खून में रंगे हुए मिले हैं। यह तो दिमाग कोघुमाने वाली बात हो गयी–अगर मर्डर किसी लेडी ने किया हैतो लाश के पास जेंट्स फुट स्टेप्स कहां से आ गये–सबसेचकित करने वाली बात यह है कि हयूम पाइप में एक हीव्यक्ति घुसा है, फिर यह क्या रहस्य है–।”

“गुत्थी सुलझेगी और यह पुलिस का काम है, हमारा कामनहीं है इस मैटर में खोपड़ी धुनने का।” कहते हुए सन्नी नेअपनी कुर्सी ग्रहण की।

एकाउंटेंट बात में दिलचस्पी लेता हआ बोला–“यह अवैधसम्बन्ध का मामला है सर। आप देखना मर्डरर मृतक की पत्नीया गर्लफ्रेंड ही निकलेगी।”

“तो फिर घटनास्थल पर जेंट्स शू के फुट स्टेप्स क्यों हैं?” ऋषभ ने एकाउंटेंट से प्रश्न किया।

एकाउंटेंट जैसे पूर्ण ज्ञाता था, बोला–“यह प्लानिंग के साथमर्डर हुआ है–लड़की जानबूझकर जेंट्स शू पहनकर आई हैताकि पुलिस को भ्रमित कर सके और पुलिस उसके चक्रव्यूह मेंफंस चुकी है–पुलिस उसी एंगल से सोच रही है जिस एंगलसे लड़की सोचवाना चाहती है –क्या लड़की जेंट्स शू नहीं पहनसकती, जरूर पहन सकती है– ।”

एक अन्य एम्प्लाई बोला–“जब तक लाश की शिनाख्त नहीं होगी, यह गुत्थी उलझी रहेगी, एक बार शिनाख्त हो जायेतभी इन्वेस्टीगेशन सही दिशा में हो सकती है, यही बातएसएसपी ने कही है।”

पियोन बोला–“लेकिन सर, शिनाख्त होगी कैसे, चेहरे कोतो बहुत बुरी तरह से कुचला गया है–रात टीवी पर दिखा रहेथे, चेहरे को धुंधला कर दिया था, मगर तब भी देखा नहीं जासकता था, बस लाल-लाल खून ही नजर आ रहा था।”

सन्नी अपने सिस्टम से चिपक चुका था। वह कोई बात नहीं कर रहा था।

चुप था।

कदाचित उसके हलक से इस बाबत कोई शब्द निकलकर नहीं दे रहा था। न जाने क्यों इस टॉपिक पर उसका हलकसूखा पड़ा था।

और जिस तरह उसने ऋषभ के सवाल पर टका से कमेंटकिया था, उससे साफ स्पष्ट होता था कि वह इस विषय पर कोई बात करने का इच्छुक नहीं है और न ही कुछ सुनने काइच्छुक है।

तदापि उसके अनचाहे तौर पर इस मिस्ट्री पर एक चर्चा छिड़ गयी तो जैसे हर एम्प्लाई इसमें अपना योगदान देना जरूरीसमझ रहा था।

चर्चा चलती रही।

एक के बाद एक लोग अपनी जानकारी और ज्ञान शेयरकरते रहे।

जबकि सन्नी अपने सिस्टम से चिपक गया था, वह अपने कार्य में डूबा था।

☐☐☐

दिन के ग्यारह बज रहे थे।

थाना परिसर में डॉली, उसकी मां शन्नो कुमारी, उसकेससुर चन्द्रभान और देवर को साथ लेकर थाना परिसर में एक हॉल में पड़ी एक टेबल की तरफ बढ़े।

डॉली की आंखें सूजी हुई थीं और बाल खुले हुए। वोअपनी सुध-बुध खोई हुई थी। उसके साथ आए लोग भीपरेशान हाल नजर आते थे।

वे लोग उस टेबल की तरफ बढ़े जिस पर चेयर डाले एकएसआई बैठा था।

डॉली उसके पास जाकर उससे मुखातिब हुई–“सर मेरेपति परसों से गायब हैं–उनका फोन भी नहीं लग रहा।”

एसआई ने डॉली को देखा। साथ आए लोगों की भीपरेशान सूरतों को निहारा।

तदुपरांत डॉली से कहा–“बैठो।”

न चाहते हुए भी डॉली चेयर पर बैठ गई।

एसआई ने कहा–“कितनी उम्र है तुम्हारे पति की– ?”

“सर पच्चीस साल।”

“कब से गायब हैं–?”

“परसों सुबह ड्यूटी पर गये थे, एक फैक्ट्री में जॉब करते हैं, रात नौ बजे तक हर हाल में वापस आ जाते हैं लेकिन परसों रात नहीं आये–फोन भी बंद जा रहा है, परसों रात औरदिन भर हम लोगों ने इंतजार किया और हर संभावित जगहतलाशा मगर वह नहीं मिले।” डॉली रो देने को तैयार थी।

एसआई ने अपना मोबाइल खोला। कल शाम ही शहर केएक थाने से उसे व्हाटसएप पर एक लाश की फोटोग्राफ मिलीथी।

फोन खोलते हुए वह डॉली से बोला–“आज का अखबार देखा था तुमने क्या–?”

रो देने को बिल्कुल तैयार डॉली बोली–“देखा था सर–।”

“एक लाश मिली है नगले की पुलिया के तले–अखबार में लाश की तस्वीरें छपी हैं–।”

“वो तस्वीरें मेरे पहचानने में नहीं आईं।”

“अखबार में चेहरा धुंधला दिया गया है क्योंकि तस्वीरबड़ी भयंकर है लेकिन उस लाश की असली तस्वीर यह है–।”

कहते हुए एसआई ने एक पिक को ऑन स्क्रीन करकेडॉली के सम्मुख कर दिया।

तस्वीर देखकर तो उनके रोंगटे ही खड़े हो गये।

चेहरा तो था ही नहीं, बस लोथड़े और रक्त था।

मगर फिर भी दृष्टि गहराकर डॉली पिक को देखती रहा।

सम्पूर्ण बॉडी को।

बोली–“यह वो नहीं है–।”

एसआई बोला–“फिर भी एक बार थाना बारादरी होआओ, शायद कपड़ेपहचान सको, वे लोग पीएम हाउस भी ले आएँगे –एक बार हो आओ, उसके बाद गुमशुदगी दर्ज करादेना।”

डॉली खाली नेत्रों से एसआई को देखती रही।

शन्नो कुमारी बोली–“हमें अपने आदमी की पहचान नहीं है क्या, अपना आदमी तो एक नजर में पहचान में आ जाता है –इस लाश से हमारा कोई वास्तानहीं है–।”

“फिर भी एक बार हो आओ।” एसआई प्रेशर दे रहा था –“क्या फर्क पड़ता हैघूमकर आ जाने में–? तुम कहो तोमैं गाड़ी में छुड़वा देता हूँ ।”

“नहीं, हम खुद चले जाएंगे।” शन्नो कुमारी हाथ हवा मेंलहराती बोली– “भगवान बचाये पुलिस की गाड़ी से–हम खुदचले जाते हैं–।” वह टेबल से परे हटी।

वे लोग थाने से बाहर की तरफ चले।

मम्मी के साथ चलते-चलते डॉली उसके कंधों से लगकरफफक-फफकर रोने लगी।

“अरे तू रो क्यों रही है?”चलते हुए शन्नो कुमारी ने उसेअपने अंक में भरा– “इसमें रोने वाली क्या बात है–राजकहीं गये हैं, आ जाएंगे–तुममें कोई झगड़ा हो गया होगा वो दोदिन को चला गया घर छोड़कर, बस इतनी सी बात है–आजाएगा, इसमें परेशान होने वाली कौन-सी बात हो गयी?”

मगर डॉली की रुलाई थम नहीं रही थी।

वह बुरी तरह फफक रही थी।

☐☐☐

एसआई अखिलेश ने मृतक के कपड़े उन लोगों के समक्षरखे।

वे लोग थाना बारादरी आ गये थे।

डॉली के पपोटे सूजे हुए थे।

खून में रंगे हुए कपड़े अखिलेश ने उन लोगों के सामने रखदिये।

डॉली उन कपड़ों को गौर से देखने लगी।

बोली–“यह कपड़े तो उनके नहीं है।”

“आपके पति कब से गायब हैं?”अखिलेश ने संवादस्थापित किया।

“परसों से–वे नौ बजे तक फैक्ट्री से वापस आ जाते थे, वहां वे जॉब करते हैं, लेकिन नहीं आये, हमने उन्हें हर जगह तलाशा...।”

“आपने गुमशुदगी दर्ज करायी?”

“आज गये थे अपने क्षेत्र के थाने में–दरोगा जी ने पहलेयहां भेज दिया। वे बोले कि पहले एक बार बारादरी थाना होआओ–।” डॉली का कंठ भर्रा रहा था।

अखिलेश बोला–“मृतक के तो यही कपड़े हैं, बाकी उसकाफोटो है हमारे पास–।”

शन्नो कुमारी बोली–“उसे मत दिखाओ, वो हम देख चुके हैं –।”

“बॉडी पर किसी निशान को पहचान सकती हैं क्या आप?”

अखिलेश ने पूछा।

डॉली बोली –“हां उनके पेट पर जले हुए का निशानथा–।”

अखिलेश दिमाग पर जोर देते हुए बोला–“शव के पेट परतो जले हुए का कोई निशान नहीं पाया गया है।” उसने स्मृतिपर पुनः ध्यान दिया फिर बोला– “उसकी जांघ पर एक बड़ासा तिल है, सीने पर दो-चार बाल हैं।”

डॉली इंकार में गर्दन हिलाती रही।

शन्नो कुमारी बोली–“अरे वह कोई और है–हमारा वोकोई नहीं है, राज देखना तीन दिन के भीतर-भीतर आजाएंगे, मैंने मन्नत मांगी है, चलो यहां से।”

“एक मिनट।” अखिलेश ने टोका–“एक जोड़ी कपड़े औरमिले हैं, शायद उन्हें आप पहचान सको –जोगेन्द्र– SS!” अखिलेश ने कांस्टेबल को पुकारा औरउससे वो खून से सनालेडीज सूट मंगाया।

एक चादर में लिपटा हुआ वो सूट उन लोगों के समक्ष खोलदिया।

वे सब गौर से उस सूट को देखने लगे।

और अखिलेश उन सबके चेहरों का बारीकी से निरीक्षणकरने लगा।

अखिलेश गौर से उन चेहरों को पढ़ने लगा।

उस सूट पर नजर पड़ते ही डॉली चौंक उठी थी। लेकिनउसका भरसक प्रयास था कि उसके भाव जाहिर न हो पायें।

वो अपने भाव को पूर्णरूपेण नियंत्रित किये थे। इस सूटको वह कैसे भूल सकती थी, यह वही तो था जो राज नेअपनी मनपसंद का सिलवाया था और टेलर को नाप देनेडॉली गयी थी।

यही एक सूट तो राज ने अपने लिए सिलवाया था वरनातो वह सारे कपड़े डॉली के ही पहनता था।

वो सूट खून में रंगा हुआ था। खून की पपड़ी जम गयीथी।

उसे देखते हुए डॉली बोली–“यह तो लेडी सूट है–।”

“हां, क्या तुम इसे पहचानती हो?”

“नहीं–मैं तो नहीं पहचानती–।”

“और आप में से कोई–?”

शन्नो कुमारी अपने बड़बोलेपन के साथ बोली–“हम यहांपुरुष की गुमशुदगी लेकर आए हैं, किसी महिला की नहीं, यहतो लेडीज सूट है–।”

“आपमें से कोई पहचानता हो तो हां या न बोलो, भाषणमत झाड़ो।”

“नहीं, हम नहीं पहचानते।” शन्नो कुमारी बुरा सा मुंहबनाती हुई बोली।

“कोई बात नहीं।” अखिलेश ने चादर समेटी और उनसेबोला–“आप लोग एक बार मेरे साथ मोर्चरी चलना चाहेंगे, बॉडी देखने के लिए?”

“नहीं, हम नहीं जाएंगे–।” शन्नो कुमारी झट सेबोली–“उस बॉडी से हमाराकोई सम्बन्ध नहीं है। भगवान नकरे...।” वह अपने साथ आये लोगों से बोली–“चलो।”

“एक मिनट–।” पुनः अखिलेश ने उसे टोका था ।

इस बार शन्नो कुमारी ने आग्नेय नेत्रों से उसे घूरकर देखा था, लेकिन बोलीकुछ नहीं।

अखिलेश ही अगले क्षण बोला–“आप सब लोग अपना एड्रेस नोट कराइए–।”

“क्यों–?”

यह शब्द जैसे शन्नो कुमारी ने बोला नहीं था बल्किफिजा में घोला था।

अखिलेश उसकी सूरत देखने लगा।

और अपेक्षाकृत सख्त स्वर में बोला–“आप थाने में खड़ीहैं और पुलिस ऑफिसर से बात कर रही हैं–जितना बोला जारहा है, उतना करो–अपना एड्रेस नोट कराओ–।”

अगले ही क्षण तुरंत अखिलेश आगे बोला–“तुम्हारा क्या नाम है– ?”

“अ–डॉली–।”

अखिलेश ने कागज पर घसीटा मारा और कहा–“एड्रेस?”

डॉली बताने लगी।

“फोन नम्बर?”

बताया।

“तुम अपना एड्रेस बताओ, नाम क्या है?”

“शन्नो कुमारी।”

“एड्रेस और फोन नम्बर?”

बताया गया।

“गुमशुदा से रिश्ता?”

“सास।”

“गुड –तुम अपना नाम बताओ।”

“चन्द्रभान सिंह।”

“एड्रेस?”

बताया।

“गुमशुदा से रिश्ता?”

“पिता।”

“तुम बताओ?”

अखिलेश ने सबके एड्रेस नोट करके ही उन्हें छोड़ा।

वहां से वे लोग छूटे।
 
उन लोगों ने सम्बन्धित थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी।

वापस घर पर आकर अकिता ने पुनः फफक-फफकर रोनाशुरू कर दिया।

मां शीतली कुमारी और अड़ोस-पड़ोस के कई लोग उसेसांत्वना देने लगे और भरोसा दिलाने लगे कि राज जरूर लौटआएगा।

झगड़े के नाम पर वह एक किस्सा सुनाने लगी कि कोईपन्द्रह दिन पहले तक राज का एक दोस्त सन्नी इस घर में रहा करता था जो यस बैंक में नौकरी करता है और डॉलीउसे बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। जब तक वह घर में रहाराज और डॉली के बीच खटपट ही होती रही। फिर अंततःपन्द्रह दिन पहले वह घर से निकल गया, तब से राज डॉलीसे सख्त नाराज ही रहता था और कई बार कहता था कि मैंतुझे छोड़कर चला जाऊंगा, कई बार डिवोर्स की बातें करताथा।

उस समय डॉली पड़ोस के लोगों और अपनी मां तथाससुराल के लोगों के बीच बता रही थी–“वो उसके साथ(सन्नी के साथ) होमोसेक्सुअल थे।”

“क्या ?”

लोगों के मुंह खुले के खुले रह गये।

“इस बात की मेरी उनकी लड़ाई रहती थी–मैं सन्नी कोएक मिनट घर में बर्दाश्त नहीं करती थी और वो कहते थे कियह यहीं रहेगा–कुछ दिन तो मैंने बर्दाश्तकिया–मैंने उनकीइज्जत की खातिर किसी को बताया नहीं, हमारे बीच तकरारबढ़ती चली गयी–मैंने सन्नी को भी धमकी दे दी थी कि मैंपुलिस में चली जाऊंगी –सन्नी डर गया था। फिर करीब पन्द्रहदिन पहले सन्नी इस मकान को छोड़कर चला गया–उसकेजाने से वो मुझसे बहुत नाराज हुए, बहुत लड़े, मुझे धमकियां देते थे कि मैं तुझे छोड़ दूंगा–मैं चुप रहती थी, मुझे पता था कि धीरे-धीरे सब सही हो जाएगा लेकिन...।”

उसकी आंखों से फिर आंसू छलके।

“अब न जाने वो कहां चले गये, आज तीसरा दिन है, फोनभी बंद जा रहा है।”

शन्नो कुमारी बिगड़ी हुई नजरों के साथ बोली–“यह सबबातें तूने मुझे पहले क्यों नहीं बतायीं–।”

“मैंने किसी को नहीं बताया–यह बड़ी खराब बात थी किमेरे पति होमोसेक्सुअल हैं–बड़ी बेइज्जती की बात है इसलिएमैंने किसी को नहीं बताया–पहले सन्नी को निकालकर बाहर किया, फिर मैंने सोचा कि धीरे-धीरे सब सही हो जाएगालेकिन...।”

“यह सन्नी कहां रहता है?”

“यह तो मुझे नहीं मालूम, मगर यस बैंक में नौकरी करता है –।”

“कहां है यस बैंक–?”

“शायद प्रेमनगर–प्रेमनगर का कभी-कभी नाम इन दोनोंकी चर्चा में आता था–।”

एक पड़ोसन बोली– “प्रेमनगर में यस बैंक है, मंदिर से आगे गली के नुक्कड़ पर ही है–।”

“तो यह बात तुमने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते वक्त क्योंनहीं लिखाई–?”चन्द्रभान सिंह ने कहा।

डॉली बोली–“पापा...मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि क्याकरूं, क्या न करूं–मैं अब भी नहीं बताना चाहती...इसमें कितनी बदनामी है...मुझे लगता है वो सन्नी के ही पास चलेगये हैं–यह बात पुलिस को बताना सही नहीं है वरना कल कोअखबार में आ जाएगा। आप लोग सन्नी के पास जाओ औरउससे पूछो कि वो कहां हैं–?”

सब लोग बात को और डॉली की मनोदशा को समझनेकी कोशिश कर रहे थे।

“चलो मेरे साथ चलो।” शन्नो कुमारी तैश में थी। वह चन्द्रभान और उसके बेटे को लेकर बाहर की तरफ चली और बड़बड़ाई–“हमें क्या पता था कि क्या मामला है, कोई बात थीतो कम-से-कम मुझे तो बताना चाहिए था मगर यह भी अपनीजगह ठीक है, इसमें बदनामी तो है, किसी को पता चलेगा तोकोई क्या कहेगा–यह बिचारी अपनी लाज लिये पड़ी थी, यहीसोच रही थी कि वो सुधर जाएंगे–बताओ राम-राम–।”

चन्द्रभान बड़े शर्मिन्दा थे। उनकी आंखें नीचे हुई जा रहीथीं।

वे लोग यस बैंक जाने के लिए घर से बाहर निकल गये।डॉली घर पर ही रह गयी थी।

☐☐☐
 
इंस्पेक्टर संदीप नाइक थक हारकर अपनी कुर्सी पर आकरबैठ गया।

और एसआई अखिलेश से सम्बोधित होता हुआ बोला –“मुझेलगता है कि यह केस कभी नहीं खुल पाएगा, इसकी फाइल पर भी गर्द चढ़ जानी है, कोई पक्कासबूत नहीं, क्लू नहीं–किसदिशा में इन्वेस्टीगेशन करेंगे?”

“पोस्टमार्टम का क्या हुआ।”

“शाम को पोस्टमार्टम होगा।” नाइक ने सांस ली औरआगे बोला–“अगर लाश की शिनाख्त हो गयी होती तो एकदिशा मिलती इन्वेस्टीगेशन के लिए अब तो क्लू ही नहीं है,किधर हाथ-पैर मारे जाएंगे–कल को लवारिश लाश का अंतिमसंस्कार हो जाएगा–फाइल बंद हो जाएगी।”

नाइक ने टेबल पर रखी बोतल का ढक्कन खोला औरगटागट पानी चढ़ाकर आगे बोला–“तस्वीर अखबारों में भीछपवायी, टीवी पर भी दिखाया जा रहा है मगर कोई सामनेनहीं आया शिनाख्त के लिए–आसपास के किसी थाने में भीकोई गुमशुदगी नहीं दर्ज हुई है।”

“अभी एक घण्टे पहले एक गुमशुदगी दर्ज हुई है प्रेमनगरथाने में–।”

“अच्छा –।”

“प्रेमनगर थाने से उन्हें पहले यहां भेज दिया गया था कि एक बार कपड़े औरचाहे तो डेडबॉडी भी देख ले ।”

“फिर क्या हुआ?”

“वो परिवार यहां आया था–गुमशुदा की पत्नी थी ,सास थी, पिता और छोटा भाई था।”

“पत्नी कैसी थी? देखने भालने में और हाव भाव में ?”

"”वैरी स्मार्ट–देखने भालने में तो बहुत सुंदर थी–हाव-भाव में काफी रूआसूं थी, रो रही थी।”

“क्या जरूरत से ज्यादा रो रही थी?”

“नहीं, अभी तो जरूरत के दायरे में ही रो रही थी।”

“उम्र–?”

“गुमशुदा की?”

“अभी पत्नी की बातें करो, हमें हत्याकाण्ड का क्लू चाहिए।”

“उसकी उम्र तो होनी चाहिए ज्यादा-से-ज्यादा...बाईससाल–।”

“तो यह उम्र ज्यादा कहां हुई?”

“हां इतनी ही उम्र बैठेगी उसकी।”

“वैरी गुड! शादी को कितना टाइम हो गया उसकी?”

“यह तो मैंने नहीं पता किया।”

“तो क्या पता किया?”

“उसका एड्रेस।”

“लिखा?”

“यस सर –।”

“वैरी गुड।”

“गुमशुदा कब से गायब है?”

“परसों शाम से–।”

नाइक की आंखों में चमक पैदा हुई ।

वह बोला–“इस लेडी को स्कैन करो, यहां मुझे सस्पेक्ट की गुंजाइश नजर आ रही है।”

“लेकिन सर–।”

“बोलो–।”

“अफसोस की बात यह है कि उसने शव को पहचानने सेइंकार कर दिया।”

“बिल्कुल कर सकती है, तभी तो हमारी दृष्टि में वो ज्यादासंदिग्ध हो जाती है–।”

“लेकिन अगर शव पहचाना जा सकता होता तो गुमशुदाका पिता और भाई भी पहचान सकते थे। उन्होंने भी तो पहचानने से इंकार किया।”

“भाई की उम्र कितनी थी?”

“भरपूर जवान था–कोई बीस-बाईस साल का।”

“क्या लड़की से ज्यादा सटकर खड़ा हुआ था–आई मीनलड़की से सटने में बेझिझक था?”

“नहीं, दूर खड़ा था, उसके पास उसकी मां खड़ी थी।”

नाइक ने दोबारा बोतल का ढक्कन खोला और गटागटपानी चढ़ाया तथा पुनः ढक्कन को चढ़ाते हुए बोला–“हमारे पास कोई क्लू नहीं है, इसलिए हमें इसीलड़की को अपना केंद्रबनाना पड़ेगा।”

“हां एक बार गहन पूछताछ करते हैं।”

“मुखबिर जाग्रत करो और उस घर की, गुमशुदा की,लड़की की, उनकी केमिस्ट्री, पूरी बायोग्राफी निकलवाओ–बाकीमैं उस लड़की को देखता हूँ –।”

“मैं मुखबिर लगाता हूँ सर।”

“क्विक।”

☐☐☐

शन्नो कुमारी यस बैंक में घुसी, उसके साथ चन्द्रभान सिंहऔर देवेन्द्र था।

बैंक में ग्राहकों की हल्की-फुल्की भीड़ थी। भीतर घुसते हीशन्नो कुमारी एम्पलाइज पर गहन दृष्टि रखते हुए सन्नी कोदेखने लगी।

उसे विश्वास था कि वह सन्नी को देखते ही झट से पहचानजाएगी।

कई सारे काउंटर पर आगे बढ़ते हुए अंततः शन्नो ने सन्नी को पहचान लिया।

और इसी के साथ शन्नो के चेहरे पर दृढ़ता उपज आई, नथुने फूलने-पिचकने लगे। मानो शेरनी को अपना शिकार मिल गया हो।

वो उस काउंटर पर स्थिर हो गयी। सन्नी अपने सिस्टम मेंइस तरह डूबा था कि आहट होने के बावजूद उसने गर्दन उठाना मुनासिब नहीं समझा।

शन्नो गुर्रायी–“सन्नी...।”

इस बार सन्नी चौंक उठा। उसने झटके से गर्दन उठाकर देखा।

शन्नो उसे घूर रही थी।

मोटी-मोटी आंखों से–

आंखों में चिंगारियां थीं।

शन्नो को देखकर क्षणभर को सन्नी ने स्मृति पर बलदिया, त्वरित वह पहचान गया।

“म...मम्मी...कैसी हो?” उसने मुस्कुराने की कोशिश कीथी।

शन्नो गुर्राई–“राज कहां है?”

“म-राज–राज तो यहां नहीं आया है–।”

“वो है कहां?”शब्द नहीं कोड़े की फटकार मुँह से खारिज हुई ।

“क-कहां है?”वो वॉलक्लॉक देखते हुए बोला–“अभी तोड्यूटी पर होगा, फैक्ट्री होगा।”

“तीन दिन से गायब है वो।”

“तीन दिन से गायब है?”जैसे यह सन्नी के लिए शॉक्डहोने वाली बात थी – “कहां गायब है–?”

शन्नो कुमारी ने धमकी दी–“उसके बारे में बता दे किउसे कहां रखा है वरना यहीं से तुझे मारती हुई ले जाऊंगी।”

अपेक्षाकृत ऊंचे लहजे के कारण सभी का ध्यान उनकीतरफ आकृष्ट हो गया था।

ग्राहकों के साथ-साथ एम्प्लाइज भी अपने काउंटर से खड़े होकर इधर देखने लगे।

उसके आक्रमक अंदाज को देखकर सन्नी बुरी तरह घबरागया।

ऐसे चिह्न उसके चेहरे पर नमूदार हुए। साथ ही उसने खुदभी क्रोधित होने का भाव पैदा किया ।

बोला–“क्या कह रही हैं आप? बद्तमीजी क्यों दिखा रहीहैं–?”

“बकवास मत कर।” शन्नो आंखें बाहर निकालकर जोरसे चीखी–“राज का पता बता दे, वो कहां है... वरना अभीतुझे पुलिस स्टेशन ले जाऊंगी।”

सन्नी अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया और बोला –“मुझे क्यापता राज का...कि वह कहां है–मुझे क्या मालूम–?”

शन्नो कुमारी घूरती हुई बोली–“बताऊं सबके सामने कितुम दोनों के बीच क्या सम्बन्ध थे–?”

“क...क्या...क्या बताओगी–स-संबंध क्या थे–?”

“इसीलिए मैं तुझसे आराम से बात करना चाह रही हूँ –ज्यादा इनोसेंट बनने की कोशिश मत कर, मुझे राज के बारे में बता दे ।”

एम्प्लाई सभी इधर ही देखने लगे थे, कुछ चलकर आ भीगये थे। भीड़ ने भी उनके पास दायरा बना लिया था।

ऋषभ भी वहां मौजूद था लेकिन वह खुद को छिपाये खड़ाथा–

क्योंकि शन्नो उसे पहचानती थी।

एक एम्प्लाई हस्तक्षेप करते हुए बोला–“आप शांति केसाथ बात कीजिए-यूं लाउड मत होइये। यह बैंक है–कोई भीबात शांति के साथ भी हो सकती है–।”

“मेरा दामाद राज गायब है। आज तीन दिन हो गये औरइसने गायब किया है।”

एम्प्लाई अवाक् रह गया।

यह तो अजीब ही मामला था।

भीड़ के अंदर भी हैरानी पैदा हुई और साथ में हद दर्जे की दिलचस्पी भी।

लोग उत्सुक दृष्टि से उन दोनों को देखने लगे।

एम्प्लाई पुनः बोला–“देखिए आपको कोई गलतफहमी हुईहै या जो भी है आपबैठकर आराम से बात कीजिए–आइये आप लोग मेरे केबिन में आइये और सुकून के साथ जो बातकरनी हो कीजिए और अगर चीखना-दहाड़ना हो तो अभीबाहर निकल जाइए–।” वह शन्नो पर फायर होता हुआबोला।

“चलो कहां बैठकर बात करनी है?”

शन्नो और सन्नी एक केबिन की तरफ बढ़े।

☐☐☐

इंस्पेक्टर संदीप नाइक और सब-इंस्पेक्टर अखिलेश नेडॉली की डोरबेल बजायी।

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला।

दरवाजा खोलने वाली एक पड़ोसन थी।

नाइक ने पूछा–“राज-डॉली का घर यही है?”

उस महिला ने हामी में गर्दन हिला दी।

“डॉली है?”

उसने पुनः हामी में गर्दन हिलायी।

“और राज?”

महिला ने सशंकित दृष्टि से पुलिस को देखती हुई इंकार मेंगर्दन हिला दी।

नाइक भीतर प्रविष्ट हुआ। पीछे-पीछे अखिलेश।

नाइक ने भीतर आकर घर का मुआयना किया।

डॉली हाल में ही तीन औरतों से घिरी बैठी थी। उसकाचेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था जिससे पता चलता था कि वहताजा-ताजा रोकर थमी है।

अखिलेश तो डॉली को पहचान ही गया था लेकिन नाइक ने भी उसे चिन्हित कर लिया।

नाइक पड़ोसी औरतों से बोला–“आप लोग रिश्तेदार हैं – ?”

एक औरत बोली–“नहीं हम पड़ोसी हैं–।”

“एक को छोड़कर बाकी चली जाओ, कोई भी एक रुकजाओ–।”

वह तीन औरतें थीं, तीनों बाहर चल पड़ीं।

“मैंने कहां कि कोई एक रुक जाओ।”

मगर जैसे तीनों ने ही अनसुना कर दिया। जब तक उनके जवाब की बारी आती,वे दरवाजे से बाहर जा चुकी थीं।

नाइक डॉली की तरफ मुड़ा।

डॉली के भीगे चेहरे को देखा।

पूछा–“आपने कल के दिन में क्या कार्रवाही की?”

“कल–।” डॉली ने झटके से नजर उठाकर नाइक को देखा–“कल मैंनेउनका दिनभर इंतजार किया, अपने ससुरालके घर पता किया, दूसरे रिश्तेदारों से पता किया–वो जब कलदिन भर और रात भर भी नहीं आये तो अपने रिश्तेदारों केसाथ गुमशुदगी दर्ज करायी।”

“कुछ सवालों के आप सच-सच जवाब देंगी–अगर झूठबोलेंगी तो इसका मतलब आप खुद को बचा रही हैं यानि आपदोषी हैं और सच बोलेंगी तो साबित हो जाएगा कि आप निर्दोष हैं –।” नाइक ने सांस ली और डॉली के चेहरे को पढ़ा।

डॉली थोड़ी ठहरकर बोली–“क्या पूछना चाहते हो?”

नाइक ने वो प्रश्न रखा जो सबसे पहले पूछना चाहता थालेकिन कहते-कहते सवाल बदल डाला था उसने, पूछा–“शादीसे पहले की आपकी क्या बायोग्राफी है?”

इस प्रश्न ने डॉली को काफी उलझन में डाला।

वह अचकचाकर बोली–“कोई बायोग्राफी नही है–बस मैंपढ़ाई करती थी, फिर शादी हो गयी।”

“कोई अफेयर?”

“कोई अफेयर नहीं।”

“गुड–अगर तुम्हारा यह झूठ पकड़ा जाता है तो अपने आप साबित हो जाएगा कि राज के गायब होने में तुम्हाराहाथ है–।”

“मेरा हाथ–?” उसे शॉक लगा– “मैं अपने पति को गायबकरूंगी– ?”

“क्योंकि तुम झूठ बोली– !”

“म–मैं झूठ कहां बोली–?”

“क्या तुम्हारा किसी से अफेयर नहीं था?”

“अ–अफेयर...तो ऐसा तो चलता ही है–अफेयर क्यादोस्ती थी–अगर अफेयर होता तो उसी से शादी नहीं करती–?”

“क्या नाम है उसका?”

“...ऐसे तो कई दोस्त थे–।”

“जो बड़ा दोस्त था उसका नाम बताओ–हम पुलिस हैं, हमपाताल तक खोज निकालते हैं, अगर हमने पता कर लिया तोसीधे तुम्हें अरेस्ट करेंगे आकरक्योंकि पुलिस से झूठ बोलने केइल्जाम में भी अरेस्ट किया जा सकता है और दस साल कीसजा करायी जा सकती है।”

“लेकिन सर ऐसे तो मेरे कई दोस्त थे, किसका नामबताऊँ?”

“सबसे पहले बड़े वाले का, फिर उससे छोटे का, फिर उससेछोटे का–।”

“आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं, मेरे पति को क्यों नहीं ढूंढतेकि वे कहां हैं–।”

“अगर सवालों के जवाब नहीं दोगी तो अभी तुम्हें राजको गायब करने के इल्जाम में मैं अरेस्ट करके ले जाऊंगा।”

डॉली कांप उठी।

“नाम बताओ।”

“एक ऋचा थी...।”

“था बताओ–था कौन था?”

“मैं लड़कों से दोस्ती नहीं रखती थी–बस खाली बातचीतहोती थी –।”

“राइट –अब हम तुम्हारी बायोग्राफी खंगालते है–अगरउसमें अफेयर मिल जाता है तो हमें बेस मिल जाएगा तुम्हेंअरेस्ट करने का–क्योंकि पुलिस से झूठ बोला–इसका मतलब यह हुआ कि तुमने और तुम्हारे पूर्व प्रेमी ने राज कोगायबकिया है।”

डॉली के होंठ खुश्क हो गये।

थूक सटकना भारी पड़ गया।

दिल धाड़-धाड़ बजने लगा।

चेहरा आतंकित होने लगा।

“अभी भी समय है, प्रेमी का नाम बता दो–।”

वह दृढ़ता के साथ इंकार में गर्दन हिलाती हुई बोली–“मेराकोई प्रेमी नहीं था–।” यह कहते हुए उसके होंठ कांप रहे थे।

“ऋचा का एड्रेस बताओ।”

“ऋचा...लिखो–।”

नाइक ने पेन और पॉकेट डायरी निकाल ली।

डॉली ने बताया और नाइक ने लिख लिया।

डॉली का कंठ उसे परेशान कर रहा था। शब्द बमुश्किल बाहर निकल रहे थे।

नोट करके नाइक ने पेन और डायरी जेब के हवाले कीतथा बोला–“राज क्यों गायब हुआ?”

“अब इस बारे में मैं क्या बताऊं?”

“कहां जा सकता है वो?”

डॉली नाइक को अजीब सी दृष्टि से देखती हुईबोली–“उसके जाने का मुझे पता होता तो मैं खुद वहां नहीं चली जाती –।”

“राइट! यानि तुम्हें नहीं पता कि राज एकाएक कहांगायब हो गया जबकि यह नाकाबिले यकीन बात है–आजतक दुनिया में कोई ऐसा पति नहीं हुआ जो अपनी पत्नी से लड़ेबगैर घर से भागा हो, लेकिन तम्हारा पति भागा है और तुमसेलड़ा भी नहीं।”

“नहीं, हमारी कोई लड़ाई नहीं हुई।”

“अद्भुत मामला है–तुम्हारा किसी पर शक? किसी ने रंजिश के चलते उसे गायब करहो। किडनैप कर लिया हो – ?”

“मेरा तो किसी पर शक भी नहीं है–वह अपनी फैक्टी या दोस्तों की बातें कभी मुझसे शेयर नहीं करते थे।”

“गुड–यानि तुम बिल्कुल अंजान हो–?”

डॉली चुप रही।

“तुम जरूर जेल जाओगी क्योंकि हमारी पारखी नजर कह रही है कि दोषी तुम्हीं हो। पुलिस को गुमराह कर रही हो मगरपुलिस कभी गुमराह नहीं होती है, अभी मैं लाई डिटेक्टर केआगे तुम्हें बैठा दूं तो एक-एक सच तुम्हारे मुंह से निकलनाशुरू जाएगा–पुलिस कभी गुमराह नहीं होती है बल्कि गुमराहहोने का ड्रामा रचती है–जानती हो क्यों–?”

डॉली घबराये स्वर में चुप थी।

नाइक अंगूठे और अंगुली से रुपया का संकेत करता हुआबोला–“लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की खातिर पुलिस गुमराह होनेका ड्रामा रचती है, हम भी गुमराह होसकते हैं, इसीलिए हमदो आये हैं, दल-बल के साथ नहीं आये ताकि हिस्सेदारी नबढ़े–गिरफ्तार तो तुम्हें हम अभी कर सकते हैं और सच बोलनेका एक इंजेक्शन ठोककर तुमसे सच उगलवा भी सकते हैंमगर हमें उस सब में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमें तो बसलक्ष्मीकांत प्यारेलाल में दिलचस्पी है।” नाइक ने पुनः रुपयाका संकेत बनाया।

डॉली थूक सटकती रही। चुप ही रही।

“यह मेरा नम्बर है–।” वह एक कार्ड बढ़ाता हुआबोला–“अच्छी तरह सोच लेना–पुलिस अपराधी की सबसेसच्ची दोस्त होती है, अगर अपराधी कुछ खर्च करना चाहे–कोई बड़ी डिमांड नहीं होती हमारी–बहुत कम पर मान जाते हैं, यहतो रोज का धंधा है हमारा–फोन कर लेना हमें–तुम्हें बचाने का जिम्मा हमारा है मगर बगैर खर्च किये नहीं, चाहे थोड़ा-हीखर्च करो क्योंकि यह हमारा धंधा है और अगर हठ दिखाई तोहमसे बुरा कोई नहीं होता–जब तक जेल न भेज दें, हमें चैन नहीं मिलता–।”

डॉली पीला चेहरा लिए चुप रही।

जब कार्ड उसने नहीं थामा तो नाइक ने उसे मेज पर रखदिया और बाहर चलता हुआ बोला–“आज शाम तक का तुम्हें सुनहरा अवसर है, फिर कल से हमअपनी कार्यवाही शुरू करदेंगे।”

कहता हुआ वह बाहर निकल गया।

डॉली की टांगें कांप रही थीं।

चेहरा हल्दी की मानिंद पीला हो चुका था। वो दरवाजा बंदकरने को चली तो उसे लगा कि वह लड़खड़ाकर गिर पड़ेगी।

उसका पूरा बदन कांप रहा था, मानो कोई जूड़ो की मरीजहो।

☐☐☐
 
वे लोग एक केबिन में आ गये थे।

बैंक कर्मी ने सबको बैठाया और फिर बड़े मिश्री घुलितस्वर में शन्नो से कहा– “अब बताओ दीदी, क्या मामला है?”

उसका स्वर इतना नर्म और अपनत्वपूर्ण था कि आग-बबूलाशन्नो को भी उसने संयमित होने को विवश कर दिया।

शन्नो अपेक्षाकृत शांत स्वर में ही बोली–“इससे पूछोराज कहां है– ?”

“आंटी मुझे नहीं पता राज के बारे में, मैं जब से उस घरसे निकलकर आया हूँ,बाय गॉड राज से मेरी कभी बात हीनहीं हुई–वह पहले से बदल गया था,मुझसे रूखा-रूखा रहताथा–उसके रूखे व्यवहार के कारण ही मैं वहां सेनिकला–उसनेकभी फिर मुझसे सम्पर्क नहीं किया, मैंने भी नहीं किया–।”

“क्या तुम्हें पता है राज तीन दिन से गायब है?”

“बाय गॉड मुझे नहीं पता–मुझे कोई जानकारी नहीं है–वोमेरे सम्पर्क में ही नहींहै–।”

“वो कहां हो सकता है?”

सन्नी शून्य को देखते हुए थोड़ी देर सोचता रहा, फिरबोला–“वो कहां गायब हो सकता है, मेरी समझ में नहीं आरहा–कहां चला गया–?”

“क्या तुम उसे ढूंढकर ला सकते हो?”

“डॉली को बताया होगा न जाने से पहले।”

“डॉली को बताया होता तो हम यहां क्यों भटकते?”

शन्नो आगे दो टूक बोलती चली गयी–“मैं कुछ नहीं जानती,मुझे आज राज चाहिए, तू कहां से लाकर देगा यह तू जान–नहीं तो थाने में तेरे नाम की रिपोर्ट दर्ज होगी, और तुमदोनों के बीच कैसे सम्बन्ध थे, यह भी सब भांडा फूटेगा।”

सन्नी की तो हालत खराब हो गयी।

रो देने को तैयार।

किस मुसीबत में फंस गया था?

बड़े अधीर स्वर में बोला–“आंटी मैं उसे कहां से ढूंढकरलाऊंगा, जब उसके बारे में कुछ जानता ही नहीं–पन्द्रह दिन सेअधिक हो गये होंगे, मेरी तो उसकी कोई बात ही नहीं हुई है।”

शन्नो ने ठहरी हुई सांस छोड़ी।

जैसे वह उसकी ढीठता से तंग आ गयी हो। अपना क्रोधमानो उसे अब काबू से बाहर नजर आता हो।

आंखों में उसकी चिंगारियां पनपने लगीं।

वह घूरने लगी।

उसका जी चाहने लगा कि अभी चप्पल निकाले और मारतेहुए इसे थाने लेकर जाए।

लेकिन बैंक में होने के कारण यह सब उसे उचित नहींलगा। उचित यही लगा कि इसके खिलाफ पुलिस में कंपलेंटदर्ज होनी चाहिए, फिर पुलिस खुद उससे निपटेगी।

इधर यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि उधर ऋषभ का फोन बज उठा।

ऋषभ बेचैन होकर इधर की बातें सुनना चाह रहा था किकेबिन में क्या बातें हो रही हैं लेकिन वह इसलिए दूर-दूर रहनेको विवश था कि शन्नो उसे पहचानती थी।

अभी भी दृष्टि उसकी केबिन की तरफ ही उठी थी औरशीशे के पार के दृश्य को वो आंखें गड़ाकर देख रहा था कितभी उसका मोबाइल बज उठा।

जाने कौन-सा नम्बर था कि उसने बैंक में रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा।बैंक से बाहर निकलते हुए फोन रिसीवकिया था।

इधर केबिन में–

शन्नो ठहरी हुई सांस खारिज करती हुई बोली–“मैं कुछमानना नहीं चाह रही हूँ । मुझे शाम तक राज चाहिए। तू कहाँ से लाएगा, यह तू जान वरना कल को तेरे खिलाफकंपलेंट दर्ज होगी–।”

कहने के साथ ही शन्नो उठ खड़ी हुई और साथ आएलोगों से बोली– “चलो।”

☐☐☐

इंस्पेक्टर संदीप नाइक को वाट्सएप पर एक मैसेज औरएक ऑडियो रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई।

मैसेज में लिखा था–“इस नम्बर से इस नम्बर पर बत्तीस सेकेंड बात हुई।”

दोनों नंबर अंकित थे।

नाइक ने ऑडियोटेप को डाउनलोड किया।

अभी वह और अखिलेश जीप में ही थे। डॉली के घर सेनिकले उन्हें बमुश्किल दो मिनट हुए थे।

उस मैसेज को देखते ही नाइक के बांछे खिल गयीं। जैसेवो उस मैसेज की ही बाट जोह रहा था।

प्रसन्नचित्त मुद्रा में वह अखिलेश से बोला–

“चिड़िया जाल में फंस गयी।”

अखिलेश भी खुश हो गया था।

बोला–“आपने गेम ही ऐसा खेला सर, इसका रिएक्शन तोतुरंत होना ही था।”

ऑडियो टेप डाउनलोड हो चुका था।

नाइक ने सुना।

घंटी जाने की आवाज हो रही थी।

थोड़ा ठहरकर रिसीव हुआ –“हैलो–।”

“कहां हो?”

“बैंक।”

“फुरसत में मुझसे तुरन्त मिलो।”

“क्या हुआ?”

“एक बार मिलो।” ठहर-ठहरकर बोला जा रहा था।

“ठीक है, यहां तुम्हारी मम्मी आई हुई है, उसने तो बखेड़ाखड़ा कर दिया है।”

“हां वो सन्नी के पास गयी हैं–बहुत जरूरी काम है, मुझेमिलो–।”

कहते ही कॉलर की तरफ से फोन काट दिया गया।

कॉल समाप्त।

“कहो प्यारे।” आगे बैठा नाइक गर्दन मोड़कर अखिलेशको देखता हआ बोला–“हमारा शक सही निकला न, वो लाशराज की ही है और इसे डॉली और इसके प्रेमी ने ठिकानेलगाया है–यह बहुत पुराना हथकंडा है कि अगर कोई मर्डरहुआ है तो सबसे पहले शक उसकी पत्नी पर करो–जरूर वहअपने प्रेमी के साथ इस मर्डर में लिप्त पाई जाएगी और देखोइस केस में भी यही हुआ।

“इस लड़के को दबोचो।”

“अभी दबोचते हैं–।”

नाइक ने उस नम्बर को डायल किया जिस पर डॉली नेबात की थी।

अखिलेश बोला–“यह डॉली की मम्मी कहीं बैंक मेंबखेड़ा कर रही है, कैसा बखेड़ा है, इसका पता लगाना जरूरी है –।”

“यस।” नाइक ने कहा। मोबाइल उसके कान से लगा था। दूसरी तरफ से घंटी जा रही थी।

कुछ क्षणोपरांत रिसीव हुआ–“हैलो।”

नाइक का खुर्राट स्वर–“कहां हो?”

“बैंक–कौन...?”

“कौन-से बैंक–?”

“यस बैंक–कौन?”

“यह कहां पड़ता हैं?”

“आप कौन बोल रहे हैं?”

“जब मिलेंगे तो बता देंगे।”

“क्या नाम है आपका?”

“यह यस बैंक कहां पड़ता है?”

“प्रेमनगर में–।”

“ओके–बस दो मिनट में आये।”

नाइक ने सम्पर्क विच्छेद किया।

और ड्राइवर से बोला–“प्रेम नगर में यस बैंक देखा है–।”

“यह तो यहीं है।” वह जीप धीमे करते बोला–“यहप्रेमनगर चौराहा ही है, इस रोड पर बैंक है–।” वो एक तरफ इशारा करते बोला।

“बहुत जल्दी चलो।”

नाइक के स्वर ने ड्राइवर के अंदर फुर्ती भर दी।

☐☐☐
 
जिस समय इंस्पेक्टर नाइक और अखिलेश यस बैंक मेंभीतर प्रविष्ट हुए, ठीक उसी समय शन्नो एक केबिन से बाहरनिकल रही थी।

और तमाम भीड़ तथा स्टाफ शन्नो को ही देख रहा था।

इस अजीब से माहौल ने नाइक को चौंकाया। सब लोगशन्नो को देख रहे थे तो नाइक और अखिलेश की दृष्टि भीउधर ही उठ गयी।

अखिलेश ने तुरंत पहचान लिया।

अखिलेश नाइक के कान में फुसफुसाया–“यही डॉलीकी मां है।”

पुलिस को देखकर वहां माहौल में सन्नाटा हो गया था। सभी लोग यही समझ रहे थे कि पुलिस को बुलाया गया है।

शन्नो की भी दृष्टि जब पुलिस पर पड़ी तो क्षणभर को उसके कदम स्थिर हुए लेकिन अगले क्षण वह गेट की तरफबढ़ी।

नाइक ने उसे टोक दिया–“क्या बात है, कैसा बखेड़ा खड़ाकिया है तुमने–?”

शन्नो समझी कि बैंक ने पुलिस को बुलाया है।

शन्नो दिमाग पर जोर दे रही थी कि उसे क्या करनाचाहिए। वह अभी पुलिस के सामने मामला लाने की इच्छुकनहीं थी, उसे इस बात का खतरा था कि कहीं अखबार में यहन छप जाए कि उसका दामाद राज एक समलैंगिक है।

शन्नो दरकिनार करती हुई बोली–“कोई बखेड़ा नहीं है,यह सन्नी पहले मेरे दामाद के घर में रहता था, मेरा दामादपरसों से गायब है तो मैं पूछताछ करनेआई थी।”

“कौन है सन्नी? सामने आओ।”

एक युवक सामने आ गया–“जी सर।”

“तुम्हीं हो सन्नी?”

“जी सर।”

“अभी मेरी तुमसे ही फोन पर बात हुई थी?”

“नहीं तो।”

“अभी थोड़ी देर पहले तुम्हारे पास एक कॉल आई थी जिसमें तुमसे पूछा गया था कि तुम कहां हो?”

“मेरे पास तो कोई कॉल नहीं आई है सर।” वह फोनदिखाता हुआ बोला– “आप चेक कर लीजिए।”

नाइक अपना मोबाइल देखने लगा। उसने उस नम्बर परपुनः रिंग छोड़ी।

घंटी गयी।

और वहीं एक नम्बर पर बजी थी।

मगर वो मोबाइल सन्नी का नहीं था। नाइक की गर्दन उसमोबाइल की तरफ उठ गयी थी जिधर घण्टी बज रही थी।

ऋषभ सहमी दृष्टि से पुलिस की तरफ देख रहा था, नाइकके पास ही शन्नो खड़ी थी।

नाइक ऋषभ से बोला–“मिस्टर इधर आओ तुम–।”

ऋषभ के पैर भारी पड़ गये। विवशतावश उसे उठकरआना पड़ा।

नाइक शन्नो से बोला–“राज के घर में कौन रहता था?ये या ये–?”

सन्नी और ऋषभ की तरफ इशारा करता बोला था ।

पहली बार शन्नो की दृष्टि ऋषभ पर पड़ी थी और बस वह देखती ही रह गयी थी।

ऋषभ को झट से उसने पहचान लिया था ।वह डॉली का पूर्व प्रेमी था। उसे लेकर तो घर में किसी टाइम बड़ा बवाल हुआ था, डॉली अड़ी हुई थी कि मैं इसी से शादी करूंगी औरशन्नो अड़ गयी थी कि तेरी इससे शादी किसी हाल में नहीं होसकती तो भला वह ऋषभ को पहचानने में भूल कैसे करसकती थी।

शन्नो हतप्रभ दृष्टि से ऋषभ को देखती रह गयी। उसकेमुंह से निकला–“तुम यहां क्या कर रहे हो?”

“म–मैं–मैं यहां एम्प्लाई हूँ –। नमस्ते आंटी–।” वह मुस्कराने की कोशिश कररहा था मगर उसकी टांगों में हल्काकंपन शुरू हो चुका था।

उसे लेकर शन्नो की नजर टेढ़ी थी। उसने नमस्ते का कोईजवाब नहीं दिया, शन्नो ने उसे नजर अंदाज किया और नाइक से बोली–“मेरे दामाद के घर में यह रहा था।” उसने सन्नी कीतरफ उंगली उठाई।

नाइक ने सन्नी को तीक्ष्ण दृष्टि से घूरा।

सन्नी की अवस्था हलाल होते बकरे जैसी थी। वह घबरायाहुआ खड़ा था और अपने चेहरे पर निर्दोष होने के भाव सजानेकी चेष्टा में लगा था।

यहाँ का वातावरण देखकर खुद नाइक की बुद्धि चकरानेलगी थी। वह तो डॉली के सम्पर्ककर्ता के लिए यहाँ आयाथा, मगर यहां तो चक्कर ही दूसराथा।

नाइक शन्नो से बोला–“उसके बारे में क्या जानती हो?” उसने ऋषभ की तरफ संकेत किया।

“उसके बारे में कुछ नहीं जानती।” शन्नो के चेहरे पर नागवारी उपजी।

अपनी चकराती बद्धि को थामता हुआ नाइक बोला –“सब लोग थाने चलो–मिस्टर तुम भी ।” उसने ऋषभ से कहा ।

शन्नो ने ऋषभ को घूरकर देखा।

शन्नो की समझ कह रही थी कि ऋषभ ने ही फोन करपुलिस को बुलाया है।

“चलो बाहर चलो।” अखिलेश उनसे बोला और उसकेऋषभ का हाथ पकड़ लिया।

सन्नी से भी कहा–“बाहर चलो।”

सन्नी बाहर की तरफ चला। अखिलेश ऋषभ का हाथपकड़ उसे बाहर ले जाने लगा।

नाइक शन्नो से बोला–“थाने चलो, फिर मैं तुम्हें छुड़वा दूंगा।”

वे लोग बाहर निकले।

उन सबको जीप में बैठाया गया।

☐☐☐

डॉली बहुत व्यथित थी।

उसके होश उड़े हुए थे। पुलिस ने उसके होश उड़ा दिये थे।वह तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि उसे एकाएक इनहालात से दर-गुजर होना पड़ेगा।

उसकी घबराहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी, जब सेनाइक उसे धमकाकर गया था, बहुत बड़ी बात थी जो उसे हार्टअटैक नहीं हुआ था।

खून तो जैसे सारा निचुड़ चुका था, रंगत हल्दी की तरहजर्द पड़ती जा रही थी। उसने ऋचा का नम्बर लगाया।

घंटी जाती रही।

उधर से रिसीव हुआ–“कह मेरी जान।”

“कहाँ है तू?”

“जहाँ नहीं होना चाहिए।”

“कहाँ?”

“होना तो साजन की बांहों में चाहिए था लेकिन अफसोसअकेले-अकेले बिस्तर पर पड़े हैं–।”

“देख मेरी बात ध्यान से सुन।”

“सुना–।”

“तुझे पता है कि मेरे पति गायब हो गये हैं ।”

“क्या ?” ऋचा की सारी मस्ती काफूर हो गयी। भौंचक्कीहोती हुई बोली– “क्या कह रही है तू?”

“मैं सच बोल रही हूँ ऋचा, मैं बहुत परेशान हूँ लेकिनउससे भी ज्यादा परेशानी वाली बात यह है कि पुलिस मेरे हीऊपर शक कर रही है?”

“किस बात का शक?”

“अपने पति को गायब करने का।”

“क्या–तू अपने पति को गायब करेगी, क्यों?”

“ऐसा आरोप पुलिस लगा रही है मेरे ऊपर–।”

“लेकिन तेरे पति गायब क्यों हो गये, कहाँ चले गये?गायब से क्या मतलब है?”

“परसों वे ड्यूटी से वापस नहीं आये, आज तक उनकाकोई पता नही है और फोन भी बंद है–।”

“क्या तू लड़ पड़ी थी?”

“नहीं, मैं तो कभी लड़ती ही नहीं।”

“तो उनके साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गयी?”

“भगवान बेहतर जाने–मैंने आज ही गुमशुदगी दर्ज करायीहै और जैसे मैंनेअपनी जान मुसीबत में ले ली।”

“मतलब?”

“पुलिस साली मुझी पर शक कर रही है कि मैंने ही राजको गायब किया है–।”

“हे साली –यह पुलिस पागल है–तुम एसएसपी के पासजाओ, तब पुलिस एक्शन में आएगी।”

“वो बाद की बात है, लेकिन अभी तेरे पास पुलिस काफोन आ सकता है।”

“मेरे पास?”

“हाँ–खुराफाती पुलिस मानकर चल रही है कि मैंने अपनेपुराने अफेयर के चलते अपने पति को गायब कर दिया है –पुलिस मुझसे पूछ रही थी कि मेरा किससे अफेयर था तो मैंने मना कर दिया कि मेरा किसी से अफेयर नहीं था–तोपुलिस मुझसे पुराने दोस्तों के बारे में पूछने लगी तो मैंने लेनाम बता दिया है–वो तेरा एड्रेस और नम्बर नोट करके ले गयेहैं–तुझसे पूछताछ करेंगे।”

“ओह–!”

“तू साफ कह देना कि डॉली का तो किसी से अफेयर हीनहीं रहा है, वो तो बहुत सीधी-सादी थी, और अपनी अरेन्जमैरिज से खुश थी–कहना कि राज और उसके बीच कभीखटपट नहीं सुनी और कहना कि वह तो अपने पति से बहुत प्यार करती थी, कहना कि मुझसे तो हमेशा अपने पति कीतारीफ ही करती थी–।”

“ठीक है–ठीक है–मैं समझ गयी। तू चिंता मत कर–।”

“यार यह किस मुसीबत में फंस गयी मैं–एक तो मेरा हीपति गायब हुआ और पुलिस मुझी को सस्पेक्ट मान रही है।”

“वो पुलिस का काम है लेकिन हम जब गलत नहीं हैं तोडरने की भी कोई जरूरत नहीं है–पूछताछ करना पुलिस काकाम है–।”

“ठीक है यार, मैं फिर बात करूंगी तुझसे–।”

“ठीक है, ठीक है, मैं शाम को तेरे घर आऊंगी, मुझे तोपता ही नहीं था–न तूने बताया, आंटी ने भी नहीं बताया–मुझेतो अब पता चल रहा है कि ऐसा हो गया।–

“ठीक है, शाम को मिल ।”

कहते ही डॉली ने कॉल ऑफ कर दी।

थोड़ा सुकून उसे मिला था।

न जाने क्यों लेकिन सुकून का संचार हुआ था।

चेहरे से पीलापन छंटा था।

मगर पूर्ण रूपेण विश्वस्त अब भी नहीं थी।

☐☐☐
 
थाने के प्रांगण में आकर जीप रुकी।

आगे से इंस्पेक्टर नाइक उतरा। उसके पीछे अखिलेश,शन्नो, सन्नी, ऋषभ, चन्द्रभान और देवेन्द्र उतरे।

लम्बे कदमों से थाना परिसर की तरफ बढ़ा नाइक अखिलेशके कान में फुसफुसाया–“इन्हें सबको डॉलरएक-एक करके अंदर भेजना–समझे?

“यस सर।”

लम्बे डग भरता हुआ नाइक अपने ऑफिस में घुसा औरअपनी कुर्सी पर धम्म से गिरा।

अखिलेश बाहर हॉल में एक स्थान पर पड़ी बेंचों पर उन्हेंबैठाकर और दो कांस्टेबल को उनका निगहबान बनाकर नाइकके ऑफिस में आया।

नाइक के व्हाटसएप पर एक ऑडियो टेप अभी-अभी पुनःआ गया था, साथ मेंवो नम्बर भी मेंशन था जिस पर डॉलीने बात की थी।

नाइक उसको डाउनलोड करने लगा।

अखिलेश मेज के पास खड़े होकर पूछ रहा था।

“पहले किसको लाना है सर?”

“जरा इस ऑडियो को भी सुन ले–डॉली ने फिर किसी से बात की है–इस बार दूसरा नम्बर है।”

तब तक डाउनलोड वाली हरी लाइनिंग घूम गयी थी।

ऑडियो सुनने के लिए वह रेडी हो गया।

अखिलेश भी वहाँ बैठ गया।

नाइक ने स्पीकर ऑन करके मोबइल को मेज पर रखदिया।

घण्टी बज रही थी।

फिर रिसीव हुआ–

और वही वाली वार्ता वहाँ प्रस्फुटित हुई जो अभी डॉलीऔर ऋचा के बीच हुई थी।

बहुत ध्यान लगाकर दोनों उस कॉल रिकार्डिंग को सुन रहेथे।

वार्ता थोड़ी लम्बी थी।

तदुपरान्त कॉल रिकार्डिंग समाप्त हुई।

उसमें उनके मतलब की कोई खास बात नहीं थी।

इसलिए उनके चेहरों पर अतिरिक्त चमक भी नहीं आई।

अखिलेश ने कहा–“इसका मतलब उसका अफेयर तोकिसी से रहा है लेकिन फोन पर उसने खुलासा नहीं किया–लड़कीको प्रेशराइज कर रही थी कि वोपुलिस को असलियत न बता दे –।”

“इनमें कौन-सा हो सकता है इसका प्रेमी?”

“वही होगा जिससे डॉली ने सम्पर्क जोड़ा था और हमलोग उसके सहारे बैंक तक पहुंचे।”

“गुड–दूसरा लड़का राज के यहां किराये पर रहा था, होसकता है वो भी डॉली के साथ आंखमिचौली कर बैठा हो, इसलिए उसने डॉली के साथ राज को रास्ते से हटाया होऔर इस बात का शक डॉली की मम्मी को हो,इसीलिएमम्मी बैंक गयी उसके पास–।”

“तो पहले किसे लाना चाहिए पूछताछ के लिए?”

“पहले उसी को लाओ जिसे डॉली ने फोन किया था।”

“ओके सर।” अखिलेश बाहर निकल गया और बमुश्किलदस सेकेंड बादवापस आ गया–

उसके पीछे-पीछे ऋषभ था।

साइड में पड़ी एक चेयर पर अखिलेश बैठ गया और इसतरफ पड़ी कुर्सी पर ऋषभ को बैठाया।

“बैठो–।”

संकुचित-सा ऋषभ संशयपूर्ण भाव में बैठ गया।

नाइक ने मेज पर कोहनियां रखते हुआ अपेक्षाकृत नर्म स्वरमें पूछा–“क्या नाम है तुम्हारा?”

“ऋषभ–ऋषभ कुमार।”

“क्या अड़चन आई थी डॉली से शादी होने में?”

“अ–अ डॉली–?”

“हाँ–तुम्हें प्रॉब्लम क्या थी कोर्ट मैरिज करने को, कोर्ट केदरवाजे तो हमेशा खुले हैं।”

“व–वो उसकी मां तैयार नहीं थी–बस इसलिए मैं पीछेहट गया–।”

“अब मर्डर कैसे किया–?”

“मर्डर–?”

“हाँ –।”

“साब, मैंने मर्डर कहां किया है?”

“रो मत–पचास हजार रुपये हैं तेरे पास खर्च करने को–मैंबचा लूंगा–।”

“पचास हजार–हाँ हाँ हैं–।”

“कब दे देगा?”

“कल दे दूंगा–।”

“तो तुझे बचा लूँ?”

“हाँ साब मुझे बचा लो।” वो हाथ जोड़ने लगा। रोने कोतैयार।

“गुड–।” नाइक अखिलेश से बोला–“इसे बचा दो दरोगाजी, पैसा दे रहा है।”

“वो तो ठीक है लेकिन बचायेंगे तो तभी कि जब यहअपनी पूरी कहानी बताये–सबूतों के साथ कैसे बदलाव कियाजाएगा, सारे सबूत तो इसके खिलाफ हैं।”

“वो बताएगा यह–अब तो हमें फीस भर रहा है तो दोस्तहुआ न हमारा–सारीकहानी बताएगा।” नाइक ऋषभ सेबोला–“तुझे यार चेहरा कुचलने की क्याजरूरत थी–छी।”

“म–मुझसे गलती हो गई साहब–मुझसे गलती हो गयी–मैंबहुत पछता रहा हूँ।” वह मेज में मुँह देकर रोने लगा।

नाइक बोला–“पचास हजार खर्च कर रहा है न तू?”

“हाँ–हाँ कर दूंगा–।”

“तो रो क्यों रहा है–अरे भाई यह पुलिस स्टेशन नहीं हैअपराध स्टेशन हैं–अपराधियों का मंदिर है यह। जितना चढ़ावाचढ़ाओगे उतनी मेवा पाओगे–तुम तो सरे आम मर्डर करकेहमारे पास आ जाओ, बस हमारी फीस भर दो, फिर तुम्हाराकौन बाल-बांका करने बैठा है।”

“मैं कर दूंगा साहब पचास हजार खर्च।” उसने अपनीआस्तीन से आंसू पोंछ लिये। अपना मोबाइल निकालते हुएबोला–“आप एकाउन्ट नम्बर दें, अभी ट्रांसफर करता हूँ।”

“अभी नहीं, ले लेंगे–पैसे कहां जाएंगे–जब सबूत हमारे पास हैं तो समझो पैसेहमारी जेब में हैं–अब तू जल्दी से फटाफट कहानी सुना दे ताकि हम तेरे बचाव का रास्तानिकालें।”

वह कुछ क्षण को चुप रहा।

उसने गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया।

☐☐☐
 
“मैं और डॉली एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। मुझसेज्यादा डॉली मुझसे प्यार करती थी। हम अदरकास्ट थे।डॉली की मम्मी जो यहां बाहर बैठी है,यह बड़ी चांडाल है, इसने अडंगा डाल दिया। यह अड़ गयी कि शादी नहीं होगी।

डॉली बहुत रोती थी। मुझसे फोन पर कहती रहती थीकि मैं जहर खाकर जान दे दूंगी–बहुत प्यार करती थी मुझसे।वह मेरे बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

यानि हम दोनों बहुत प्यार करते थे। हम बिछड़कर नहीं जीसकते थे, ऐसा हमारा मानना था। डॉली ने अपने घर परबहुत प्रेशर डाला–मरने तक कीबातें करीं मगर इस चांडालपर एक बात का असर नहीं हुआ–यह टस से मस नहींहुई–इसने साफ कह दिया कि मरना है तो मर जाओ मगरऋषभ से शादी नहीं होने दूंगी–डॉली तो मर ही जाती लेकिनमैंने अपनी कसम देकर डॉली को संभाले रखा और उसेबताया कि किस्मत से बाहर कुछ नहीं होता–हम एक नहीं होसके तो क्या हुआ, हम अच्छे दोस्त तो बनकर रह सकते हैं।

साहब मैंने उसे बहुत समझाया–उसे ढांढस बंधाया। प्यारमैं भी उससे बहुत करता था लेकिन मैं खुद को संभाल सकताथा लेकिन वह खुद को संभालने मेंनाकाम थी।

साहब–इसका रिजल्ट यह हुआ कि डॉली की शादीराज से हो गयी और वह ब्याह कर अपनी ससुराल चलीगयी–

“मैंने चैन की सांस ली–चैन की सांस इसलिए ली कि जोखटका था कि कहीं यह दीवानी लड़की कोई उल्टा-सीधा कदमन उठा ले, कहीं मर-मरा ना जाये, सुकून की बात थी कि ऐसाकुछ नहीं हुआ था। वह अपनी ससुराल चली गयी थी और मैंचैनो-सुकून से आ गया था।

खैर, उसके बाद उसके जीवन में तो नया अध्याय जुड़ चुकाथा–वह अपनी नई दुनिया में पहुंच गयी थी, मेरी मनोकामनाऔर चाहत यही थी कि वह खुश रहे, बहुत खुश रहे–इतनी खुश रहे कि उसे मेरी कभी याद न आये–यही मेरी कामयाबीथी कि वह अपने जीवन में खुशहाल रहे–मैं खुद को कंट्रोलकर सकता हूँ और कर रहा था–मुझे कभी इश्क ने इतनामजबूर नहीं किया कि मैं मर जाऊँ, हाँ बहुत प्यार करता था मैंउसे–लगता तो था कि उसके बगैर जिंदगी नहीं गुजर सकेगीलेकिन जीने का हौसला बरकरार था–उससे मुहब्बत के सिवामुझे दुनिया में कुछ बनकर दिखाने का भी जुनून सवार था,शायद उसी जुनून ने मुझे संभाले रखा और मैं सिर्फ इतना हीकरता रहा कि उसके हक में दुआ करता रहा।

खैर–मुझे खुशी मिली कि वह सेट हो गयी थी। इससे भीज्यादा खुशी इस बात की हुई कि उसने मुझे कभी फोन नहींकिया यानि वो अपनी जिंदगी में खुश है,यही मैं चाहता थाऔर यही मेरा ऐम था।

मैं तो यही समझता था कि वह अपनी जिंदगी में बहुत खुशहै–मेरा मानना था और यह मैंने कहीं पढ़ भी रखा था कि दोप्रेमी भले ही एक दूसरे से कितने प्यार करते रहे हों, जीने-मरनेकी कसमें खाते रहे हों लेकिन जब उनकी अलग शादी हो जातीहै तो नये साथी की खुशबू, उसके मिलन के हसीन क्षण पुरानेजख्मों को बहुत तेजी के साथ भर देते हैं, शादी के बाद जोजीवन में नई खुशियों की बहार आई होती है, इसकी जद मेंहजारों पतझड़ गर्क हो जाते हैं, उन पतझड़ की कसक याचुभन साथी की बांहों में महसूस नहीं होती–हमेशा ऐसा हीहोता है क्योंकि साथी की बांहों में जो आनंद की बयार है, उसके जेरे साया कितने गम दम तोड़ते रहते हैं–

मैं उसी खुशफहमी का शिकार था कि डॉली नये साथीकी बांहों में अपनीपुरानी दुनिया गंवा बैठी है। नया मीठा दर्द पुराने जख्म से बेमुरव्वती सिखा बैठा है, अब याद नहीं आती–गमपरेशान नहीं करते–

लेकिन साहब ऐसा नहीं था–

यह मेरी खाम ख्याली थी–मैं अकारण ही खुश हो रहाथा।

उसकी शादी को तीन महीने गुजर गये, मैंने कभी फोननहीं किया–उसका भी कभी फोन नहीं आया–उस वृतांत कोमैं अपनी बड़ी जीत के रूप में देख रहा था क्योंकि वह सैटलहो गयी तो अब मेरे आगे खुला आसमान था–पूरी जिंदगी पड़ीथी–मैं भरपूर एन्जॉय कर सकता था, यही अगर उल्टा होजाता यानि वह अगर मर मरा जाती तो मेरी जिंदगी नासूर बनजाती, उसकी मौत मेरे सिर लिखी जाती जो मेरी जिंदगी कोबोझल कर देती और मैं जिंदगी के सिर्फ स्याह पक्ष का हीपैरोकार बनकर रह जाता लेकिन मैं खुशनसीब था कि वहसैटल हो गयी और मुझे कभी फोन नहीं किया तो इसकामतलब अपने जीवन में बहत खुश थी–

...लेकिन साहब ऐसा नहीं था–मैं धोखे का शिकार था, खुशफहमी की जिंदगी गुजार रहा था–मुझ बदनसीब को भलासुकून के पल कैसे नसीब हो सकते थे,कभी हुए ही नहीं है तोअब ऐसा कैसे हो सकता था कि मैं खुश रह सकता होता–

इसकी एक सहेली ऋचा है, जो हम लोगों से बहुत क्लोजथी–एक दिन मुझे वह मिली, ढेर सारी बाते हुईं–ऋचा मिलेऔर डॉली का जिक्र न आये, ऐसा भला कैसे हो सकताथा–हालांकि मैंने खुद को बहुत थाम रखा था कि डॉली कीकोई चर्चा नहीं छेडूंगा लेकिन हमेशा की तरह मैं इस बार भीनाकाम सिद्ध हुआ–

मेरे होंठों पर डॉली का नाम मचल गया।

मैंने ऋचा से उसका हालचाल लिया।

मगर उस दिन उसने मुझे यही बताया कि डॉली खुश हैऔर पति के साथ एक शानदार जिंदगी गुजार रही है। मैं खुशही हुआ मगर सही बताऊं साहब जी, उस दिन मैं वास्तव में खुश नहीं हुआ था बल्कि खुश होने की कोशिश कर रहा थाऔर अपने अंदर खुशी तलाश रहा था कि आखिर मुझे खुशीक्यों नहीं उमड़ रही–उसके स्थान पर एक खालीपन, एक शून्यमेरे वजूद में व्याप्त हो गया था–अब मुझे डॉली का खुशहालजीवन रास नहीं आ रहा था–अब शायद मैं यह सुनने काआकांक्षी था कि डॉली बहुत बदहाल है, उसका जीवनबदहाल है। उसका जीवन तहस-नहस हो चुका है, वो बरबादीकी कगार पर खड़ी है और जिंदगी को तरस रही है–

साहब, जीवन कभी भी पूर्व नियोजित ढंग से नहीं चलताहै–हम इंसान इस धरती के सबसे बड़े मूर्ख हैं कि जिंदगी कोयोजनाओं के हवाले कर देते है–मैंने भी जीवन की सबसे बड़ीमूर्खता दिखाई थी कि समझ लिया था कि अगर डॉली खुशरहेगी तो मेरे जीवन में कोई कमी नहीं रह जाएगी और मैंअपनी शानदार जिंदगी को उपलब्ध हो सकूँगा लेकिन नहीं, यहख्याल एक सत्य नहीं बल्कि एक क्षुधा सबित हुआ जो मात्रतीन महीने में शांत पड़ गया–अब मेरा जीवन फिर से करवटबदलना चाह रहा था, पीछे जो मैं खो आया था उसका अभावमेरे जीवन के लिए ब्लैकहोल साबित होने लगा था–मुझे लगनेलगा कि मेरे अभाव मुझे निगल जाएंगे, मेरी जिंदगी मुझे कोढ़नजर आने लगी–शायद वो जुनूने इश्क जिसको मैंने कभीअपने ऊपर हावी नहीं होने दिया था, मेरा वो दमन अब उछालमार रहा था और मेरा जीवन तिनका-तिनका बिखरा जा रहाथा–मैं रो पड़ना चाहता था–दीवारों से लिपटकर दिल भरकररो लेना चाहता था, इतना कि वो दीवारें डूब जायें–मुझे अपनेजीवन में अब कुछ भी नजर नहीं आता था–यह अचानक मुझेहो क्या गया था, यह ऋचा से मिलने के बाद ही मेरे अन्दरबदलाव हुआ था वरना उससे पहले तक तो भले ही खोखलेस्तर पर सही, मैं अपना जीवन ढोने में सफल था, लेकिन अबजैसे पहिया जाम हो गया था।

मैं पस्त हो गया। अपने ही उसूलों का बागी हो गया। मुझेअब यह जिंदगी ढोते नहीं बन रही थी–अब मैं अपनी वास्तविक जिंदगी जी लेना चाहता था, मैंजिंदगी को जी लेने की उत्कंठा से भर उठा और–

मैंने डॉली को फोन किया।

अपनी डॉली को–

जो कुछ दिनों को पराई हो गयी थी लेकिन अब न जाने क्यों मुझे ऐसी फीलिंग हो रही थी कि मैं अपनी ही डॉली फोन कर रहा हूँ–मेरी अपनी डॉली को –साहब उसमेरी उंगलियां कांप रही थीं।

उसकी मेरी फोन पर बात हुई।

मुझे कितनी तसल्ली मिली।

आत्मा तक तृप्त हो गयी थी लेकिन मुझे यह नहीं पता थाकि वो फोन मेरी जिंदगी में भूचाल ला देगा, मैंने तो अपनेजीवन को सपाट मान लिया था लेकिन उस दिन के बाद से मेरेजीवन में ऐसी हलचल हुई कि सबकुछ बदल गया–दिशाओंके अर्थ चेंज हो गये–

उस दिन तो बस खाली जुदाई की तड़प वाली बातें हुई।तमाम गिले-शिकवे बुझाये गये।

लेकिन दो मुलाकातों के बाद जो मेरे सामने रहस्योद्घाटनहुआ उसने मेरे अंदर लरजातारी कर दिया। मेरी दुनिया हिलगयी।

यह तो डॉली ने मुझे पहली बार में ही बता दिया था किवह अपने जीवन से दुखी है, वह बहुत परेशान है और सुसाइडके बारे में सोचती रहती है–

लेकिन इस चीज को मैंने यही समझा कि नाकाम हसरतें से परेशान कर रही हैं। हर पति-पत्नी में खटपट होती ही हैइसीलिए उसे मेरी याद आ रही है।

लेकिन जब उसके क्लेश की वास्तविकता मुझे पता चलीतो मेरे पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी।

उसका पति राज गे था।

और वह किसी के साथ समलैंगिक सम्बंधों में था और वहसन्नी नाम का युवक उसी के घर में रहता था। वह यही सन्नीहै जो बाहर बैठा है–।

राज रोज शाम ड्यूटी से आने के बाद सजने-संवरनेलगता था। बाकायदालेडीज कपड़े पहनता था, ब्रा लगाता था,लम्बे बाल लगाता था, हाथों में चूड़ियां और होंठों परलिपस्टिक–वो शरीर से बहुत भूखा था, इतना ज्यादा भूखा किशायद कोई औरत भी इतनी भूखी न रही हो–

वो रोज रात को सन्नी के साथ कमरे में सोता था।

यह डॉली से बर्दाश्त नहीं होता था।

डॉली के लिए वो पहले रोज से ही अच्छा नहीं रहा थालेकिन डॉली एक भारतीय नारी के फ्रेम में पूरी तरह फिट होगयी थी। यानि पति चाहे कैसा भी हो लेकिन परमेश्वर है, वहउसके साथ निबाह करती चली जा रही थी और करते ही चलेजाने का उसका इरादा था–

लेकिन अब उसके कदम ठिठक गये।

वह ठगी-सी रह गयी।

ऐसी तो भारतीय नारी की नियति नहीं थी।

भारतीय नारी इस दंश से तो निबाह नहीं करती है–

इसी घटना ने उसे मेरी तरफ मुड़ने को विवश किया। मैं तोशून्य लिए बैठा था, मुझे तो रंगीनियों की जरूरत आन पड़ रहीथी, उसके बगैर मेरे जीवन में कुछ भी बाकी नहीं था–

बहरहाल–

लब्बोलुआब यह कि उसकी ट्रेजडी देखकर मेरा दिल रोपड़ा। वह एकदम सुसाइड के मुहाने पर खड़ी थी। वह अपनीजिंदगी से, दुनिया से और अपनी मां से तंग आ गयी थी। अबउसकी जीने की इच्छा मर चुकी थी।

राज उसे बहुत प्रताड़ित करता था, डॉली अपने ही घरमें नौकरानी बनकर रह गयी थी। हार्ड टॉर्चर । रोज शाम कोपति को साज-शृंगार करते देखती थी–एक नारी के रूप मेंढलते देखती थी–सन्नी राज की नाकाबिले बर्दाश्त अश्लील हरकतें देखती थी। इस कहानी का जो सबसे स्याह पक्ष था, वोयह था कि सन्नी डॉली को भोगना चाहता था–

इस वातावरण में डॉली का दम घुटता था। इसीलिएमेरी तरफ लौटी। मुझसे मदद की गुहार की कि मैं उसके लिए क्या कर सकता हूँ । वह अब मेरी हो जाना चाहती थी। इसके लिए वह दुनिया से किसी भी कीमत पर लड़ने के तैयार थी ।

मैं पसोपेश में फंसा था कि क्या करूं?

मुझे भी उसकी जरूरत थी। इस जुदाई ने और उसके पराये हो जाने के भाव ने मुझे यह शदीद अहसास करा दिया था कि उसके बगैर मेरा जीवन कटी पतंग की तरह है–

लेकिन वह मुझे अब मिल कैसे सकती थी?

वह तो किसी के साथ परिणय में बंधी थी। किसी के होते भला मेरी कैसे हो सकती थी–

और मैं ज़्यादा पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था क्योंकि मेरीनई-नई यस बैंक में नौकरी लगी थी और एक हसीन इत्तेफाकदेखिए कि सन्नी भी उसी बैंक में मेरासीनियर ऑफिसर था–

कैसा संयोग था यह मगर इस संयोग को हम पॉजिटिव मेंबदल सकते थे और यह काम किया डॉली ने–

सर, एक बात है–औरत एक अजीब चीज है, जब निबाहकरने पर आती है तो बड़ी विषम परिस्थितियां उसके लिए कोईअर्थ नहीं रखतीं, यूँ समझो कि कांटों को निगल जाने की कलाभी प्रकृति ने औरत को दी है और जख्मों को नुमाया भी नहींकरेगी लेकिन जब वह अपने तेवर बदल ले तो ईश्वर भी उसकोनहीं थाम सकता–

इस मामले में ऐसा ही हुआ।

कहां तो उसने मुझे बिल्कुल भुला दिया था। तीन महीनेतक एक बार भी कॉल नहीं की, राज के साथ सैटल होने मेंअपनी हस्ती मिटा दी लेकिन जब राज से मन खिन्न हुआ तो उसे बरबाद और फना करने में भी उसने इंतेहा को छू लिया–

साहब यह सच है कि भले मैं डॉली से बहुत प्यार करताथा, भले उसके बगैर मेरे जीवन में शून्य के सिवा कुछ नहीं था लेकिन तब भी मैं उसे पाने के लिएकोई गलत हथकण्डे नहींअपना सकता था–ऐसा नहीं था कि मैं उसे पाने के लिए कुछभी कर गुजरूं–मुझे अपना फ्यूचर भी अजीज था। इस तरहआप कह सकते हैं कि मैं डुअलपर्सनल्टी का शिकार था–डॉलीके बिना भी नहीं जिया जाता था और उसे पाने के लिए कोईगलत राह भी अपनाने को तैयार नहीं था–

मगर डॉली चूंकि एक औरत थी–

वह दुनिया से प्रतिशोध लेने उतर आई थी, वह अपनाखोया प्यार पाने चली थी और एक औरत जब इस पथ पर चलपड़े तो दुनिया की ताकतों की तो क्या बिसात है, स्वयं भगवानभी उसके आगे पानी भरता नजर आये–

और ऐसा ही हुआ इस मामले में।
 

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