• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

खजाने-की-तलाश (Khazane ki Talash) compleet

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
खजाने-की-तलाश (Khazane ki Talash)



उन तीनों के बीच उस वक्त से गहरी दोस्ती थी जब वे लंगोटी भी नही पहनते थे.उनमें से शमशेर सिंह अपने नाम के अनुरूप भारी भरकम था. लेकिन दिल का उतना ही कमज़ोर था. कुत्ता भी भौंकता था तो उसके दिल की धड़कनें बढ़ जाया करती थीं. हालांकि दूसरों पर यही ज़ाहिर करता था जैसे वह दुनिया का सबसे बहादुर आदमी है. बाप मर चुके थे और ख़ुद बेरोजगार था. यानि तंगहाल था.

दूसरा दुबला पतला लम्बी कद काठी का रामसिंह था. इनके भी बाप मर चुके थे. और मरने से पहले अपने पीछे काफी पैसा छोड़ गए थे. जिन्हें जल्दी ही नालाएक बेटे ने दोस्तों में उड़ा दिया था. यानी इस वक्त रामसिंह भी फटीचर था.

और तीसरा दोस्त देवीसिंह, जिसके पास इतना पैसा रहता था कि वह आराम से अपना काम चला सकता था. लेकिन वह भी अपनेशौक के कारण हमेशा फक्कड़ रहता था. उसे वैज्ञानिक बनने का शौक था. अतः वह अपना सारा पैसा लाइब्रेरी में पुराणी और नई साइंस की किताबें पढने में और तरह तरह के एक्सपेरिमेंट पढने में लगा देता था. वह अपने को प्रोफ़ेसर देव कहलाना पसंद करता था. यह दूसरी बात है कि उसके एक्सपेरिमेंट्स को अधिकतर नाकामी का मुंह देखना पड़ता था. मिसाल के तौर पर एक बार इन्होंने सोचा कि गोबर कि खाद से अनाज पैदा होता है जिसे खाकर लोग तगडे हो जाते हैं. क्यों नडायरेक्ट गोबर खिलाकर लोगों को तगड़ा किया जाए. एक्सपेरिमेंट के लिए इन्होंने मुहल्ले के एक लड़के को चुना और उसे ज़बरदस्ती ढेर साराभैंस का गोबर खिला दिया. बच्चा तो बीमार होकर अस्पतालपहुँचा और उसके पहलवान बाप ने प्रोफ़ेसर को पीट पीट कर उसी अस्पताल में पहुँचा दिया.

प्रोफ़ेसर देव उर्फ़देवीसिंह को एक शौक और था. लाइब्रेरी में ऐसी पुरानी किताबों की खोज करना जिससे किसी प्राचीन छुपे हुए खजाने का पता चलता हो. इस काम में उनके दोनों दोस्त भी गहरी दिलचस्पी लेतेथे. कई बार इन्हें घरके कबाड़खाने से ऐसे नक्शे मिले जिन्हें उनहोंने किसी पुराने गडे हुए खजाने का नक्शा समझा. बाद में पता चला कि वह घर में बिजली की वायेरिंग का नक्शा था.

एक दिन शमशेर सिंह और रामसिंह बैठे किसी गंभीर मसले पर विचार विमर्श कर रहे थे. मामले की गंभीरता इसी से समझी जा सकती थी की दोनों चाये के साथ रखे सारे बिस्किट खा चुके थे लेकिन प्यालियों में चायेज्यों की त्यों थी. उसी वक्त वहां देवीसिंह ने प्रवेशकिया. उसके चेहरे से गहरी प्रसन्नता झलकरही थी."क्या बात है प्रोफ़ेसर देव, आज काफी खुश दिखाई दे रहे हो. क्या कोई एक्सपेरिमेंट कामयाब हो गया है?" रामसिंह ने पूछा."शायेद वो वाला हुआ है जिसमें तुम बत्तख के अंडे से चूहे का बच्चा निकालने की कोशिश कर रहे हो." शमशेर सिंह ने अपनी राय ज़ाहिर की."ये बात नहीहै. वो तो नाकाम हो गया. क्योंकि जिस चुहिया को अंडा सेने के लिए दिया था उसने उसको दांतों से कुतर डाला. अब मैंने उस नालायेक को उल्टा लटकाकर उसके नीचे पानी से भरी बाल्टी रख दी है. क्योंकि मैं ने सुना है कि ऐसा करने पर चूहे एक ख़ास एसिड उगल देते हैं जिसको चांदी में मिलाने पर सोना बन जाता है."

"फिर तुम दांत निकालनिकाल कर इतना खुश क्यों हो रहे हो?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"बात ये है कि इस बारमैं ने छुपा खजाना ढूंढ लिया है."

"क्या?" दोनों ने उछालने की कोशिश में प्यालियों कि चाए अपने ऊपर उँडेल ली. अच्छा ये हुआ कि चाए अब तक ठंडी हो चुकी थी.

"हाँ. मैं ने एक ऐसा खजाना ढूँढ लिया है जो आठ सौ सालों से दुनिया की नज़रों से ओझल था. अब मैं उसको ढूँढने का गौरव हासिल करूंगा." प्रोफ़ेसर अपनी धुन में पूरे जोश के साथ बोल रहा था.

"करूंगा? यानी तुमनेअभी उसे प्राप्त नही किया है." शमसेर सिंह ने बुरा सा मुंह बनाया.

"समझो प्राप्त कर हीलिया है. क्योंकि मैं ने उसके बारे में पूरी जानकारी नक्शे समेत हासिल कर ली है."

"कहीं वह शहर के पुराने सीवर सिस्टमका नक्शा तो नही है?"रामसिंह ने कटाक्ष किया.

"ऐसे नक्शे तुम ही को मिलते होंगे." प्रोफ़ेसर ने बुरा मानकर कहा, "यह नक्शा मुझे एक ऐसी लाइब्रेरी से मिला है जहाँ बहुत पुरानी किताबें रखीहैं. पहले तुम ये किताब देख लो, फिर आगे मैं कुछ कहूँगा."कहते हुए देवीसिंह ने एक किताब उसकी तरफ़ बढ़ा दी. किताब बहुत पुरानी थी. उसके पन्ने पीले होकर गलने की हालत में पहुँच गए थे.

"यह किताब तो किसी अनजान भाषा में लिखी है."

"हाँ. मैंने ये किताबभाषा विशेषज्ञों कोदिखाई थी. उनका कहना है कि यह भाषा असमिया से मिलती जुलती है. और यह देखो." कहते हुए प्रोफ़ेसर ने पन्ने पलटकर एक नक्शा दिखाया."यह कहाँ का नक्शा है?"

"ये तो भारत के पूर्वी छोर का नक्शा लग रहा है." रामसिंह ने कहा.

"हाँ. ये भारत के पूर्वी छोर का नक्शा है. इसमें असम साफ़ दिखाई पड़ रहा है.इसका मतलब ये हुआ कि ये किताब असम से सम्बंधित है. और यह एक और नक्शा देखो. क्या तुम्हें यह मिकिर पहाडियों का नक्शा नही लग रहा है?"

"लग तो रहा है." दोनोंने एक साथ कहा.

"मुझे पूरा विश्वास है कि यह खजाने का नक्शा है. जो मिकिर पहाडियों में कहीं छुपा हुआ है. क्योंकि मैं ने पढ़ा है कि वहां पहले एक सभ्यता आबाद थी. जो बाहरी आक्रमण के कारण नष्ट हो गई थी. उसके अवशेष अब भी वहां मिलते हैं. वह सभ्यता बहुत धनवान थी. मैं ने यह भी सुना है कि वहां का राजा बाहरी आक्रमण से पहले ही आशंकित था. इसलिए उसने अपने फरार का पूरा इन्तिजाम कर लिया था. और इसी इन्तिजाम में उसने अपना खजाना एक गुफा में छुपा दिया था. हालाँकि वह फरार नही हो पाया क्योंकि महल के एक निवासी ने गद्दारी कर दी थी. शत्रु राजाने उस राजा को मरवा दिया किंतु उसे राजा का खजाना नही मिल सका. उसके बाद खजाने का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई,किंतु कोई सफलता नही मिली."

"तुम्हारे अनुसार उसी खजाने का यह नक्शा है?" रामसिंह ने पूछा.

खजाने का यह नक्शा है?" रामसिंह ने पूछा.

________"हाँ. क्योंकि यह किताब भी उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी वह सभ्यता थी. अतः मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें बना नक्शा उसी खजाने का नक्शा है."

"तो अब क्या विचार है?" राम सिंह ने पूछा.

"यह तो तुम ही लोग बताओगे." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"मेरा ख्याल है कि हमें खजाना खोजने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है किवह हमारे ही भाग्य में लिखा हो." रामसिंह ने कहा.

"तो फिर ठीक है. तुम लोग असम चलने की तैयारी करो. मैं भी घर जाकर तैयारी करता हूँ. फिर कल परसों तक हम लोग प्रस्थान करेंगे." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"ओ.के. प्रोफ़ेसर. हम लोग कल रात की ट्रेन से निकल चलेंगे. क्योंकि अब खजाना मेरी नज़रों के सामने नाचने लगा है. अतः अब हमें बिल्कुल देर नही करनी चाहिए." शमशेर सिंह बोला.

"ठीक है. लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि ये बात हमारे अलावा और किसी के कान में नहीं पहुंचनी चाहिए. वरनावह हमारे पीछे लग जाएगा. और जैसे ही हमखजाना खोजकर निकलेंगे वह हमारी गर्दन दबाकर खजाना समेटकर रफूचक्कर होजाएगा."

"तुम फिक्र मत करो प्रोफ़ेसर. यह बात हमारे कानों को भी न मालुम होगी." दोनों ने एक साथ उसे भरोसा दिलाया

.....................

इसके दो दिन बाद वे लोग गौहाटी के रेलवे प्लेटफोर्म पर खड़े थे. इस समय रात के बारह बज रहे थे.

"क्या ख्याल है? मिकिर पहाडियों तक बस से चलें या किसी और सवारी से?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"यार अभी सुबह तक तो यहीं रहो. इस समय तो रास्ता काफी सुनसानहोगा." शमशेर सिंह नेराय दी.

"वह जगह तो दिन में भी सुनसान रहती है. जहाँ हम लोग जा रहे हैं. क्योंकि वहां केवल खंडहर और जंगल हैं." रामसिंह ने फ़ौरन उसकी बात काटी.

"फिर तो वहां भूतों का भी डेरा हो सकता है." शमशेर सिंह ने आशंका प्रकट की.

"बकवास. मैं भूतों परविश्वास नही करता. मेरा विचार है कि हम लोगों को इसी समय प्रस्थान कर देना चाहिए. क्योंकि खजाना ढूँढने में बहुत दिन लग सकते हैं. अतः बेकार में समय नष्ट नही करना चाहिए." देवीसिंह उर्फ़ प्रोफ़ेसर देवने कहा.

फिर यही तै पाया गया कि वे लोग उसी समय बसद्वारा मिकिर पहाडियों के लिए प्रस्थान कर जाएँ. कुछ ही देर में उन्हें बस मिल गई और वे उसमें बैठ गए. इस समय बस में लगभग तीस पैंतीस लोग बैठे थे. अधिकतर तो ऊंघ रहे थे. ये लोग भी बैठकर ऊंघने का कार्य करने लगे. बस अपनी रफ़्तार से यात्रा पूरी करने लगी.अचानक बस एक झटके केसाथ रूक गई. ऊंघने वाले इस झटके से चौंक पड़े और आँखें फाड़ फाड़ कर बस के ड्राईवर की तरफ़ देखने लगे, मानो वह किसी दूसरी दुनिया का व्यक्ति हो. हो सकता है यह बात कुछ लोगों के लिए सत्य रही हो. क्योंकि वे लोग शायद सपना देख रहे हों कि उनकी यात्रा किसी रॉकेट पर दूसरे ग्रह के लिए हो रही है. वैसे इस बारे में सपने देखने वाले ही बता सकते थे.

जब कुछ देर बीत गई और बस नही चली तो वे लोग बेचैन होने लगे. फिर किसी ने ड्राईवर से कारण जानना चाहा.

"बस के इंजन में लगता है कुछ खराबी आ गई है. मैं देखता हूँ." उसने खटारा बस का टूटा फूटा बोनट उठाया और कुछ देर इधर उधर इंजन में हाथ चलाया.

फिर इंजन स्टार्ट करने की कोशिश की. लेकिन इंजन ने साँस लेने से साफ इंकार कर दिया.

"क्या हुआ? खराबी समझ में आई?" कंडक्टर ने पूछा.

"कुछ समझ में नही आ रहा है. हमारा क्लीनर भी छुट्टी पर गया है. वरना वही कुछ करता."

उधर यात्री बेचैन होकर बार बार कंडक्टर और ड्राईवरसे गाड़ी के बारे में पूछ रहे थे. कुछ यात्री बस से उतर कर इधर उधर टहलने लगे. अंत में कंडक्टर ने कहा,

"अब यह बस सुबह से पहले नही चल सकती. वैसे यहाँ से मिकिर पहाडियां ज़्यादा दूर नही हैं. जिन लोगों को वहां जाना है वे पैदल जा सकते हैं।"

लोगों में यह सुनकर घबराहट फ़ैल गई. वे लोग जिन्हें केवल मिकिर पहाडियों तक जाना था, अपना सामान उठाकर चलने का निश्चय करने लगे.

"क्या विचार है? इन लोगों के साथ निकल लिया जाए या सुबह तक रुका जाए?" रामसिंह ने पूछा.

"मेरा ख्याल है कि सुबह तक देख लिया जाए. हो सकता है बस तब तक ठीक हो जाए. वैसे भी इस समय अंधेरे में हम लोग रास्ता भटक सकते हैं." शमशेर सिंह ने कहा.

"बस का ठीक होना तो मुश्किल है. एक काम करते हैं. सामने दो व्यक्ति जा रहे हैं. वे लोग ज़रूर पहाड़ियों की ओर जा रहे हैं. उनके साथ होलेते हैं." प्रोफ़ेसर ने अपनी राए दी.

"तो फिर जल्दी आओ. वे बहुत दूर निकल गए हैं."रामसिंह ने कहा.फिर वे लोग उन व्यक्तियों के पीछेचल पड़े.
 
लगभग आधा घंटा चलने के बाद एक आबादी दिखाई पड़ी. जिसमें केवल सात आठ घर थे. शायद ये कोई छोटा मोटा गाँव था. वे व्यक्ति चलते हुए एक मकान में घुस गए.

"क्या यही हैं मिकिरपहाडियाँ?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"अबे बेवकूफ यहाँ तोमैदान है. पहाडियाँ किधर हैं?" रामसिंह ने शमशेर सिंह को ठहोका दिया......

"किसी से पूछ कर देखते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"तुम ही पूछो. हमें तो यहाँ की भाषा आतीनहीं."

फिर प्रोफ़ेसर ने एक मकान का दरवाज़ा खटखटा कर वहां के निवासी से इसके बारे में पूछा तो पता चला कि मिकिर पहाडियाँ अभी तीन किलोमीटर दूर हैं.

"क्या यहाँ ठहरने किकोई व्यवस्था है?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"हाँ. पास ही में एक छोटा सा ढाबा है. वहां दो तीन लोगों के ठहरने की व्यवस्था हो सकती है." उस व्यक्ति ने ढाबे का पता बता दिया. ये लोग वहां पहुँच गए.

इस समय ढाबे में पूरी तरह सन्नाटा छाया था. ढाबे का मालिक सामने चारपाईडालकर सोया पड़ा था.किंतु जगह के बारे में पूछने पर इन लोगों को निराशा हुई. क्योंकि वहां बिल्कुल जगह नही थी.

"अब क्या किया जाए?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"अब तो यही एक चारा है कि अपना सफर जारी रखें. अब मिकिर पहाड़ियों में पहुंचकर खजाने की खोज शुरू कर देनी है." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"तुमने हम लोगों को मरवा दिया. यह समय तोआराम करने का था. अब वहां तक फिर तीन किलोमीटर पैदल चलनापड़ेगा." रामसिंह रूहांसी आवाज़ में बोला प्रोफ़ेसर से.

"आराम तो वैसे भी नही मिलना था. क्योंकि पहाड़ियों पर कोई हमारा घर नही है. अब अपना अभियान चाहे हम इस समय शुरू करें या सुबह से, कोईफर्क नही पड़ता." प्रोफ़ेसर ने इत्मीनान से कहा.

फिर वे तीनों आगे बढ़ते रहे. लगभग डेढ़ घंटा चलने के पश्चात् उन्हें पहाडियां दिखाई देने लगीं.

"लो यहाँ तक तो पहुँच गए, अब किधर चलना होगा?" रामसिंहने पूछा.

"ज़रा ठहरो. मैं नक्शा निकाल कर देखता हूँ." प्रोफ़ेसर ने जवाब दिया. फिर तीनों ने अपने सामान वहीँ रख दिए और हांफने लगे. प्रोफ़ेसर ने अपनी जेब से वही किताब निकली और पलट कर नक्शा देखने लगा.

"प्रोफ़ेसर, तुमने इतनी कीमती किताब जेब में रखी थी. अगर किसी ने पार कर ली होती तो?" रामसिंह ने झुरझुरी लेकर कहा.

"तो इसे बेकार की चीज़ समझकर फेंक गया होता. क्योंकि मैं ने इसका कवर उतरकर दूसरा कवर चढा दिया है. जिसपर लिखा है मरने का तर्कशास्त्र. अब तर्कशास्त्र से भलाकिसी को क्या दिलचस्पी हो सकती है."

"तुम्हारी अक्ल की दाद देनी पड़ेगी प्रोफ़ेसर. अब बताओ कि नक्शा क्या कहता है?" शमशेर सिंह ने तारीफी नज़रों से उसे देखा.

"नक्शे के अनुसार हमइस जगह पर हैं." प्रोफ़ेसर ने एक जगह पर ऊँगली रखते हुए कहा. "अब हमें बाईं ओर बढ़ना होगा."

"क्या ये सामान भी ले चलना होगा. मेरे कंधे में तो दर्द होने लगा यह बैग लादे हुए." रामसिंह कराहकर बोला.

"सामान यहाँ क्या उचक्कों के लिए छोड़ जाओगे. मैं ने पहले ही कहा था कि हल्का सामान लो. अब तुम्हें तो हर चीज़ कि ज़रूरत थी. चाए बनने के लिए स्टोव, पानी कि बोतल, एक सेरनाश्ता, लोटा, तीन तीन कम्बल और पता नही क्या क्या. मैं कहता हूँ कि इन चीज़ों कि क्या ज़रूरत थी." शमशेर सिंह पूरी तरह झल्लाया हुआ था.

"मुझे क्या पता था कि यहाँ पर ठण्ड नही होती. वरना मैं तीन कम्बल न ले आता. मैं ने तो समझा कि चूंकि यहाँ पहाड़ हैं इस लिए ठण्ड भी होती होगी."इस जगह पर घुप्प अँधेरा था. क्योंकि आज अमावस्या थी और यह जंगली इलाका था. प्रोफ़ेसर ने नक्शा देखने के बाद टॉर्च बुझा दी थी.

"यार, कहीं कोई जंगली जानवर न आकर हमें दबोच ले." शमशेरसिंह ने कांपते हुए कहा. अभी उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि धप्प की आवाज़ आई और सबसे आगे चलते हुए रामसिंह की चीख सुनाई पड़ी.

"भ...भागो." शमशेर सिंहने प्रोफ़ेसर का हाथ पकड़कर खींचा, "हम पर जंगली जानवरों ने हमला कर दिया है."

"र..रुको!" प्रोफ़ेसर ने कांपते हुए कहा,"मैं अभी सूटकेस से अपनी राइफल निकलता हूँ."

इससे पहले कि वह सूटकेस खोलकर राइफलनिकलता, शमशेर सिंह ने उसे खींच लिया. औरफिर प्रोफ़ेसर का भी साहस टूट गया और दोनों पीछे मुड़कर भाग खड़े हुए. किंतु डर के कारण उनके पैर मानो एक एक क्विंटल के हो गए थे. क्योंकिलाख चाहने पर भी वे पाँच छह कदम से आगे नही बढ़ पाए. फिर वहांगालियों का तूफ़ान आ गया. ये गालियाँ रामसिंह के गले से निकल रही थीं.

"ल--लगता है रामसिंह पर जानवरों का हमला नही हुआ है, बल्कि कोई और मुसीबत आई है.आओ देखते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा. फिर दोनों साहस करके आगे बढे. अचानक उन्होंने काली रात की चादर में दो चमकती हुई ऑंखें देखीं, और दोनों के होश फिर उड़ गए."भ--भूत." दोनों के मुंह से घिघियाती चीख निकली और उन्होंने फिर भागनेका इरादा किया.

तभी रामसिंह की आवाज़ सुनाई पड़ी,"कमबख्तों, तुम लोग भाग कहाँ रहे हो. यह मैं हूँ. अब जल्दी सेटॉर्च जलाओ."

दोनों की यह सुनकर जान में जान आई. फिर प्रोफ़ेसर ने कांपतेहाथों से टॉर्च जलाकर उसकी रौशनी रामसिंह पर डाली. वह ऊपर से नीचे तक कीचड़ में लथपथ खड़ा था.

"यह क्या हुआ?" दोनोंके मुंह से निकला.

"यह तुम लोगों की बेवकूफी का फल है. जबइतना अँधेरा छाया है तो टॉर्च जला लेनी चाहिए थी. अब इसअंधेरे में सामने का तालाब भला कैसे दिखाई पड़ता. उसी के कीचड़ में मैं फिसल गया और यह गत बन गई."

"टॉर्च तो तुम्हारे पास भी थी. तुम ने क्यों नहीं जला ली?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"टॉर्च तो है, लेकिन यहाँ पहुंचकर याद आया कि उसका सेल डाउन है. अब उस टॉर्चकी रौशनी मैं केवल खजाना देखने के लिए डालूँगा."

"तुम्हें घर पर ही यह सब बातें अच्छी तरह देख लेनी चाहिए थीं." शमशेर सिंह ने डपटा.

"कोई बात नहीं." प्रोफ़ेसर ने ढाढस बंधाई,"हम लोग पेशेवर खजाना खोजनेवाले तो हैं नहीं कि हर बात याद रहे. अब मैं नक्शा निकालकर यह देखता हूँ कि कहीं हम लोग ग़लत जगह तो नही आ गए. क्योंकि आगे तालाब है. जिसके कारण रास्ता बंद है.".

मैं नक्शा निकालकर यह देखता हूँ कि कहीं हम लोग ग़लत जगह तो नही आ गए. क्योंकि आगे तालाब है. जिसके कारण रास्ता बंद है."....................अब आगे"नक्शा बाद में देखना. पहले यह बताओकि मेरा क्या होगा. क्या मैं ऐसे ही कीचड़ में लथपथ रहूँ? मेरा सामान भी कीचड़ में सन गयाहै." रामसिंह ने कहा.

"तुम अपना मुंह तो तालाब के पानी से धो लो. और कपड़े ऐसे ही पहने रहो. जब सूख जाएँ तो सूखी मिटटी झाड़ लेना." कहते हुएप्रोफ़ेसर ने नक्शा निकाला. कुछ देर टॉर्च के प्रकाश में उसे देखता रहा फिर बोला, "नक्शे में यह तालाब मौजूद है. यानि हम सही रास्ते पर हैं. अब नक्शे के अनुसार हमें दाएँ ओर मुड जाना चाहिए."

फिर वे दाएँ ओर मुड गए. प्रोफ़ेसर ने फिर टॉर्च बुझा दी थी. ताकि बैट्री कम से कम खर्च हो. अभी उस टॉर्च से बहुत काम लेना था. हालाँकि बाकि दोनों इससे सहमत नही थे, लेकिन जब प्रोफ़ेसर ने आगे रहना स्वीकार कर लिया तो वे भी चुप होगए. और इस तरह अब तीनों की टोली में सबसे आगे प्रोफ़ेसर था.

अचानक प्रोफ़ेसर ने शमशेर सिंह के हाथ में कोई चमकती हुई वस्तु देखी, "यह क्या है?" कहते हुए प्रोफ़ेसर ने शमशेर सिंह के हाथ पर टॉर्च का प्रकाश डाला. यह एक छोटा सा खंजर था.

"यह मैं ने जंगली जानवरों से बचाव के लिए पकड़ लिया है. अगरकोई जानवर अचानक हमला कर देगा तो उसका पेट इस तरह से चीर कर रख दूँगा." कहते हुए उसने खंजर हवा में लहराया. प्रोफ़ेसर ने जल्दी से अपना सर पीछे खींच लिया वरना खंजर की नोक ने उसकी नाक की नोक उड़ा दी थी.

"क्या तुम इसका इस्तेमाल कर पाओगे? क्योंकि तुम्हारा हाथ तो कांप रहा है. कहीं हडबडाहट में अपने ही न मार लेना." रामसिंह ने कहा.

"चुप रहो. मैं तुम्हारी तरह अनाड़ीनही हूँ." शमशेर सिंहने क्रोधित होकर कहा.

फिर प्रोफ़ेसर ने दोनों को शांत किया. और वे आगे बढ़ने लगे.अब तक सुबह का उजाला फैलने लगा था. और चिड़ियों के चहचहानेकी आवाजें सुनाई पड़ने लगी थीं. इस समयवे ऐसे रास्ते पर चल रहे थे जिसके एक किनारे पर कोई पहाड़ी नदी बह रही थी और दूसरे किनारे पर छोटी मोटी पहाडियोंकी एक श्रृंखला थी. अचानक प्रोफ़ेसर चलते चलते रूक गया.

"क्या हुआ प्रोफ़ेसर?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"मेरा ख्याल है, यह जगह आराम करने के लिए अच्छी है. हम लोगकुछ देर ठहर कर इस नदी में स्नान करेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे."

फिर तीनों ने अपने अपने सामान नीचे रखे और नदी की और बढ़ गए. इस समय नदी के ठंडे पानी ने तीनों को एक नई स्फूर्ति दी और उनकी अब तक की यात्रा की साड़ी थकान उतर गई. जब वे लोग पानी से बाहर निकले तो पूरी तरह ताज़ादम हो रहे थे. उन्होंने अपने सूटकेस से कुछ सैंडविच निकले और नाश्ता करने लगे. रामसिंह ने झोले से स्टोव निकला और उसपर काफी बनाने लगा.कुछ देर बाद वे लोग गरमागरम काफी पी रहे थे.

"इस वक्त रामसिंह केस्टोव ने काफी काम किया है. हम लोग बेकार में उसके स्टोव लाने की बुराई कर रहे थे." शमशेर सिंह ने कहा.

"मुझसे कभी कोई काम ग़लत नही होता." रामसिंह ने अकड़ कर कहा.

"तुमने सिर्फ़ एक काम ग़लत किया है कि इस दुनिया में पैदा हो गए हो." शमशेर सिंह ने टुकड़ा लगाया.

"और दूसरा ग़लत काम मैंने यह किया है कि तुम्हारे जैसे गधे को अपना दोस्त बना लिया है." रामसिंह नेदांत पीसते हुए कहा.

"ठीक है. अब तुम लोग आपस में लड़ते रहो. खजाने की खोज तो हो चुकी." प्रोफ़ेसर ने दोनों को घूरते हुए कहा.

"सोरी प्रोफ़ेसर, बातयह है कि हम लोग कसरतकर रहे थे."

"यह कैसी कसरत? मैंने तो आज तक ऐसी कसरत नही देखी जिसमें लोग झगड़ा करते हैं." प्रोफ़ेसर ने आश्चर्य से कहा.

"यह ऐसी ही कसरत है. इसमें दिमाग मज़बूतहोता है और अगर हाथ पैर चलाने की नौबत आ जाए तो हाथ पैरों की भी कसरत हो जाती है."

"अच्छा अच्छा ठीक है.अब अपने अपने सामान उठाओ. हम लोगों ने बहुत देर आराम कर लिया." प्रोफ़ेसर ने उठते हुए कहा.तीनों ने फिर अपनी यात्रा शुरू की.

अचानक प्रोफ़ेसर देवने रूककर किसी वस्तु को गौर से देखना शुरू कर दिया."क्या देख रहे हो प्रोफ़ेसर?" शमशेरसिंह ने प्रोफ़ेसर की दृष्टि की दिशा में अपनी दृष्टि दौड़ाई. यह कोई घास थी.

"मैं उस घास को देख रहा हूँ."

"क्यों? उस घास में ऐसी क्या बात है?" रामसिंह ने हैरत से पूछा.

"अगर मेरा विचार सहीहै तो यह एक महत्वपूर्ण बूटी हैजिसके बारे में मैंने किताबों में काफी कुछ पढ़ा है."

"फिर तो कबाड़ा हो गया. क्योंकि अब तुम यहीं अपनी रिसर्च शुरू कर दोगे और खजाना हमारी याद में पड़ा पड़ा सूख कर कांटा हो जाएगा." रामसिंह ने अपने सर पर हाथ मारते हुए कहा.

"अभी जब मैं इस बूटी का नाम बताऊंगा तो तुम लोग खजाने के बाप को भी भूल जाओगे.यह संजीवनी बूटी है जो मुर्दों में भी जान डाल देती है." प्रोफ़ेसर ने रहस्योदघाटन किया.

"क्या?" दोनों उछल पड़े, "तुम्हें कैसे पता?"

"मैंने इसकी पहचान किताबों में पढ़ी है. ऊपर का भाग सफ़ेद होता है, बीच का हरा और नीचे का कत्थई. यहबिल्कुल वैसी ही घास है."

"हाँ. है तो वैसी. फिरतो हम लोगों ने एक नईखोज कर डाली. प्रोफ़ेसर, इसके कुछ नमूने तोड़कर रख लो. घर पर इसका अच्छी तरह टेस्ट कर लेना." शमशेर सिंह ने कहा.

"मैं यहीं इसका टेस्ट किए लेता हूँ."कहते हुए प्रोफ़ेसर ने एक मुठ्ठी घास तोड़कर अपने मुंह में रख ली. "अभी थोड़ी देर में इसका असर पता लग जाएगा. तुम लोग थैलों में इसे भर लो."

वे लोग थैलों में घास भरने लगे. कुछ देर में दो थैले घास से पूरी तरह भर गए. अब उन्होंने आगे का सफर शुरू किया...

वे लोग थैलों में घास भरने लगे. कुछ देर में दो थैले घास से पूरी तरह भर गए. अब उन्होंने आगे का सफर शुरू किया.............,

अब आगे.....,कुछ दूर जाने के बादएकाएक प्रोफ़ेसर ने अपना पेट पकड़ लिया और कराहने लगा.

"तुम्हें क्या हुआ?"शमशेर सिंह ने पूछा.प्रोफ़ेसर ने कुछ कहने की बजाए झाड़ियों की तरफ़ छलांग लगा दी. फिर झाड़ियों से इस तरह की आवाजें आने लगीं मानो वह उल्टियाँ कर रहा हो. और साथ ही 'धड़ाक' की दो तीन आवाजें भी सुनाई दीं.

"इसे क्या हुआ? अभी तो अच्छा खासा था." रामसिंह ने हैरत से कहा.

"लगता है इसने घास खाकर अपना पेट ख़राब कर लिया है." शमशेर सिंह ने अनुमान व्यक्त किया.फिर कुछ देर बाद प्रोफ़ेसर की ज़ोर ज़ोर से कराहने की आवाजें आने लगीं.

"क्या हम लोग तुम्हारी मदद को आयें?" रामसिंह ने चीख कर पूछा.

"आ जाओ. मुझसे तो अब उठा भी नही जा रहा है." प्रोफ़ेसर की कमज़ोर आवाज़ सुनाई दी. वे लोग झाड़ियों के पास पहुंचे और वहां पहुंचकर उन्हें अपने मुंह पर रूमाल रख लेना पड़ा. क्योंकि वहां उल्टियों के कारण अच्छी खासी बदबू फैली थी और प्रोफ़ेसर औंधे मुंहपड़ा कराह रहा था. उसका पैंट भी पीछे से भीगा था.
 


"मैंने मना किया था की यहाँ अपनी रिसर्च से बाज़ आ जाओ, लेकिन तुम नही माने. अब थोडी हिम्मत करो ताकि हम लोग तुम्हें यहाँ से ले चलें." रामसिंहने कहा. फिर दोनों नेमिलकर उसे उठाया और झाड़ियों से बाहर ले आए. उसे एक पेड़ के सहारे लिटा दिया गया. फिर उसे पानी पिलाया गया.

"खजाने की खोज तो पाँच छह घंटों के लिए कैंसिल हुई. क्योंकि जब तक प्रोफ़ेसर ठीक नही हो जाता हम आगे नही बढ़ सकते." शमशेर सिंहने चिंताजनक लहजे में कहा.

"हाँ. इसे तो अपनी मूर्खता से ही छुट्टी नही मिलती." रामसिंह ने प्रोफ़ेसर को घूरा.

"अब कुछ भी कह लो. अब तो मूर्खता हो ही गई.हाय .... अब तक पेट में मरोड़ हो रही है. पतानही वह कैसी घास थी. ये कमबख्त किताबों में भी झूटी बातें लिखी रहती हैं." प्रोफ़ेसर ने कराहतेहुए कहा.

फिर तीनों ने वहीँ डेरा जमा लिया. चूंकि वे रात भर के जागे हुए थे, अतः शमशेर सिंह और रामसिंह की आँख लग गई. जबकि प्रोफ़ेसर काफ़ी देर परेशान रहा.शाम तक प्रोफ़ेसरकी हालत काफी सुधर चुकी थी, अतः उनहोंने आगे बढ़ने का निश्चय किया. प्रोफ़ेसर ने अपने कपड़े बदल लिए थे.

धीरे धीरे अँधेरा छाने लगा था., और जंगली जानवरों की आवाजें आने लगी थीं. इन आवाजों को सुनकर तीनों की हालत ख़राब हो रही थी, किंतु ज़ाहिर यही कर रहे थे कि उन्हें इसकी कोई परवाह नही है. सबसे ख़राब हालत शमशेर सिंह की थी. उसका दिल इस समय दूनी रफ़्तार से धड़क रहा था और हाथ में पकड़ा खंजर लगभग चालीस दोलन प्रति सेकंड की रफ़्तार से काँप रहा था. इसी कम्पन में उसका खंजर एक बार रामसिंह के हाथ से छू गया.

"अरे बाप रे, ये किसने मेरे ऊपर दांत गड़ा दिए." रामसिंह ने घबरा कर प्रोफ़ेसर की दी हुई टॉर्च जलाई, फ़िर खंजर देखकर उसका पारा फ़िर चढ़ गया,"अबे यह खंजर जहाँ से निकाला है वहीँ रख दे वरना जंगली जानवरों का तो कुछ नही होगा, हम लोगों की जान ज़रूर चली जाएगी."

मजबूर होकर शमशेर सिंह ने दोबारा खंजर अपनी जेब में रख लिया. उसने तेज़ तेज़ चलना शुरू कर दिया. क्योंकि उसका मूड ख़राब हो गया था.

"अरे इतनी तेज़ क्यों चल रहे हो. मैंकमजोरी के कारण चल नही पा रहा हूँ." देवीसिंह ने कराहतेहुए कहा.

"तो तुम आराम से आओ. मैं तो अब खजाने के पास ही रुकूंगा." शमशेर सिंह ने पीछे मुडे बिना कहाधीरे धीरे शमशेर सिंह का मूड ठीक होता गया. वह सोचने लगा कि रामसिंह ने ठीक ही तो कहा था कि खंजर रख ले. उस बेचारे को तो पता हीनही कि मैं कितना बहादुर हूँ. खैर वक्त आने पर मालूम हो जाएगा. उसे किसी का हाथ अपने कंधे परमहसूस हुआ.

"ओह, तो रामसिंह मुझे मनाने आया है."उसने कहा, "अरे यार, मैं तुमसे ज़रा भी नाराज़ नही हूँ. मुझे पता है कि तुम मुझे नही जानते कि मैं कितना बहादुर हूँ. मैं इसीलिए तेज़ चल रहा हूँ कि कोई जंगली जानवर पहले मेरे ऊपर हमला करे और मैं उसे परलोक पहुंचाकर अपनी बहादुरी सिद्धकर दूँ."

अब उसे रामसिंह का हाथ कंधे की बजाए सर पर महसूस होने लगा था."अरे यार क्या कर रहे हो. मुझे गुदगुदी हो रही है. अच्छा तो चुपचाप अपना काम किया करोगे, कुछ बोलोगे नहीं." शमशेर सिंह नेएक झटके से अपना सर पीछे किया और उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई. क्योंकि पीछे रामसिंह की बजाए एक खूंखार गोरिल्ला खड़ा था.

"अरे बाप रे!" शमशेर सिंह चीखा और आगे की तरफ़ दौड़ लगा दी. गोरिल्ले ने पीछा किया, किंतु उसी समय शमशेर सिंह को एक पेड़ ऐसा दिख गया जिस पर वह आसानी से चढ़ सकता था. फिर वह बिना देर किए उस पेड़ पर चढ़ गया. गोरिल्ले ने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की किंतु फिसल कर गिर गया और फिर खड़ा होकर पेड़ को हिलाने लगा.

"द..देखो, अगर मैं नीचे आ गया तो बहुत बुरा हाल करूंगा." शमशेर सिंह ने कांपते हुए कहा. फिर उसे अपने खंजर की याद आई और उसे जेब सेनिकाल कर गोरिल्ले को दिखाने लगा, "इसे पहचानते हो, यह खंजर है. अगर तुम नहीं भागे तो तुम्हारा पेट चीर दूँगा." उसनेपेड़ पर बैठे बैठे कहा.

गोरिल्ला भला शमशेरसिंह की भाषा क्या समझता. वह क्रोधित दृष्टि से उसकी ओर देख रहा था और शायद आश्चर्यचकित भी था.क्योंकि इस जंगल में उसने पहली बार मनुष्य देखे थे.

उधर रामसिंह और देवीसिंह काफ़ी पीछे रह गए थे. रामसिंह देवीसिंह से कह रहा था,"प्रोफ़ेसर यह शमशेर सिंह भी अजीब है. कहाँ तो वह हम लोगों के पीछे चल रहा था औरकहाँ इतनी दूर निकल गया कि हम लोग उसे देख भी नही पा रहे हैं."

"मूडी आदमी है. अभी जब जंगली जानवरों की तरफ़ ध्यान जाएगा तो ख़ुद ही पलट आयेगा."

तभी उन्हें शमशेर सिंह की चीख सुनाई दी..

अभी जब जंगली जानवरों की तरफ़ ध्यान जाएगा तो ख़ुद ही पलट आयेगा."

तभी उन्हें शमशेर सिंह की चीख सुनाई दी.....अब आगे........"ओह, लगता है वह खतरेमें है. आओ रामसिंह." प्रोफ़ेसर ने कहा और वे आवाज़ की दिशा में दौड़ पड़े. फ़िर जब उन्हें शमशेर सिंह दिखाई पड़ा तो वह इस दशा में था कि गोरिल्ला उसकी टांगपकड़े खींच रहा था और शमशेर सिंह दोनों हाथों से पेड़ की एक डाल पकड़े चीख रहा था. खंजर उसके हाथ से छूट कर नीचे गिरा पड़ा था.

प्रोफ़ेसर ने अपनी राइफल निकाल कर हवा में दो फायर किए. गोरिल्ला चौंक कर उनकी और देखने लगा. फ़िर उसने एक साथ तीन मनुष्यों से मुकाबला करना उचित नही समझा और झाड़ियों की तरफ़ भाग गया.

"प्रोफ़ेसर, वह भाग रहा है. गोली चलाओ वरना यदि वह जिंदा रहा तो तो फिर हमें परेशान करेगा." रामसिंह ने कहा.

"गोली कैसे चलाऊं. यहतो नकली राइफल है और केवल पटाखे की आवाज़ करती है. इससे तो एक चिडिया भी नही मारी जा सकती." प्रोफ़ेसर ने अपनी विवशता प्रकट की.

"तो इसको लाने की क्या ज़रूरत थी. असली राइफल क्यों नही लाये?" रामसिंह ने झल्लाकर कहा.

"उसका लाइसेंस कहाँ मिलता. और फ़िर यह भी तो काम आ गई. वरना गोरिल्ला शमशेर सिंह का काम कर डालता." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"ठीक है प्रोफ़ेसर. वास्तव में तुम बहुत अक्लमंद हो." रामसिंह ने कहा. फिर उनहोंने पेड़ की तरफ़ ध्यान दिया जहाँ शमशेर सिंह डाल से चिपटा हुआ आँखें बंद किए थर थर काँप रहा था.

"शमशेर सिंह, अब नीचे उतर आओ. हम लोग आ गए हैं. अब डरने की कोई बात नहीं." प्रोफ़ेसर ने उसे पुकारा.

"क..क्या वह गोरिल्लाभाग गया?" शमशेर सिंह ने आँखें खोलते हुए पूछा.

"हाँ. अब ऊपर से उतर आडरपोक कहीं का. तू जिससे डर गया था वह तो ख़ुद इतना डरपोक निकला कि हम लोगों की शक्ल देखकर भाग गया." रामसिंह ने कहा.

"वह तुम लोगों की शक्ल देखकर नही भागा था बल्कि राइफल देखकर भागा था. इसलिए ज़्यादा अपनी बहादुरी मत दर्शाओ." शमशेर सिंह ने उतरते हुए कहा.

"अब तुम हमारे साथ ही रहना. वरना फिर किसी खतरे का सामना करोगे." प्रोफ़ेसर ने कहा.

वे लोग उसके बाद चुपचाप आगे बढ़ते रहे. कुछ दूर जाने केबाद रामसिंह ने कहा,"प्रोफ़ेसर, क्या हम सही रास्ते पर जा रहे हैं?"

"अभी तक तो मेरे ख्याल में सही जा रहे हैं. फिर भी मैं नक्शा देख लेता हूँ."कहते हुए प्रोफ़ेसर वहीँ बैठ गया और जेब से किताब निकालकर नक्शा देखना शुरू कर दिया, "हूँ. अभी तकतो ठीक ही है. लेकिन अब हमें दाएँ ओर मुड़ना पड़ेगा."

उसके बाद प्रोफ़ेसर ने फिर नक्शा जेब में रख लिया और वे लोग दाएँ ओर मुड़कर आगे बढ़ने लगे.कुछ दूर चलने के बाद एकदम से जंगल समाप्त हो गया और सामने पहाडियाँ दिखाई देने लगीं. पहाड़ियों से पहले एक बड़ा सा मैदान था.

"यह आगे तो रास्ता ही बंद है. तुमसे नक्शा देखने में कोई भूल तो नही हो गई?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"नक्शा तो मैंने ठीकदेखा था. फिर भी एक बार और देख लेता हूँ." प्रोफ़ेसर ने दोबारा जेब से नक्शा निकाला और देखने लगा.नक्शा देखने के बाद प्रोफ़ेसर बोला,"नक्शे के हिसाब से तो रास्ता इन पहाड़ियों में होना चाहिए.

"फिर उन्होंने काफ़ी देर पहाडियोंमें कोई रास्ता, कोईदरार इत्यादि ढूँढने की कोशिश की, किंतु कहीं कोई रास्ता नही मिला.

"मेरा ख्याल है कि यह स्थान आराम करने के लिए काफी अच्छा है. इस समय आराम कियाजाए, सुबह दिन की रौशनी में रास्ता ढूँढा जाएगा."सभी प्रोफ़ेसर की बात से सहमत हो गए और आराम करने के लिए वहीँ लेट गए. जल्द ही सबकोनींद ने आ घेरा.

.................

अगले दिन सुबह उठकर वे लोग फिर पहाड़ियों के पास पहुंचे और ध्यान से उनका निरीक्षण करनाशुरू कर दिया, कि शायद कहीं से कोई दर्रा इत्यादि दिख जाए जो उन्हें पहाड़ियों के दूसरी ओर पहुँचा दे. किंतु लगभग दो घंटे की माथापच्ची के बाद उन्हें दर्रा तो क्या दरार भी न दिखी.

"मेरा ख्याल है कि हमें पहाड़ियों पर चढ़कर इन्हें पार करना चाहिए." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"लेकिन यह पहाडियाँ तो एकदम सीधी हैं. इनके ऊपर कैसे चढा जाए?" रामसिंह ने विवशता के साथ कहा.

"यदि अक्ल हो तो हर काम हो सकता है. वह पेडों कि लताएँ देख रहे हो," प्रोफ़ेसर ने पेडों की ओर संकेत किया, "उसे बट कर हम लोग रस्सी की सीढ़ी बनाते हैं फिर उसके द्वारा इन पहाड़ियों पर चढा जाएगा."

"गुड आईडिया प्रोफ़ेसर. हमें इस कार्य में देर नही करनी चाहिए." शमशेर सिंह ने कहा. फिर वे लोग पेडों की तरफ़ चल पड़े. शमशेर सिंह ने कुल्हाड़ी उठाकर लताओं को काटना शुरू कर दिया और बाकी दोनों उसे बटकर रस्सी बनाने लगे. लगभग तीन घंटे के परिश्रम के बाद उन्होंने काफ़ी लम्बी रस्सी तैयार कर ली थी. प्रोफ़ेसर ने उसके ऊपर एक हुक लगा दिया.

"अब हम लोग पहाडी पर चढ़ सकते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"लेकिन इस रस्सी को पहाडी के ऊपर कैसे फंसाएंगे?" रामसिंह ने पूछा.

"इसकी चिंता मत करो. मेरे पास इसका भी इलाज मौजूद है." कहतेहुए प्रोफ़ेसर ने अपना सूटकेस खोलकर एक पटाखे वाला रॉकेट निकाला और कहा, "यह रॉकेट इस हुक को लेकर पहाड़ियों पर जाएगा. यह है तो छोटा, किंतुबहुत शक्तिशाली है. और इसको मैंने ख़ुद बनाया है."

प्रोफ़ेसर ने हुक को रॉकेट के साथ बाँध दिया और रॉकेट की दिशा पहाड़ियों की ओर करके उसके पलीते में आग लगा दी. रॉकेटसर्र सर्र की आवाज़ करते हुए उड़ गया और पहाड़ियों के ऊपर जाकर गिरा.. इसके साथही रस्सी में लगा हुक भी पहाड़ियों के ऊपर पहुँच गया. प्रोफ़ेसर ने रस्सी को दो तीन झटके दिए किंतु हुक नीचे नहीं आया.

"हुक पहाड़ियों पर अच्छी तरह फँस गया है. अब हम रस्सी के सहारे ऊपर पहुँच सकते हैं." उसने कहा. फिर उन्होंने रस्सीके सहारे ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया. सूटकेस उन्होंने अपने कन्धों पर डाल लिए थे. प्रोफ़ेसर उन तीनों में सबसे आगे था...

 


फिर उन्होंने रस्सीके सहारे ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया. सूटकेस उन्होंने अपने कन्धों पर डाल लिए थे. प्रोफ़ेसर उन तीनों में सबसे आगे था -----------अब आगे......,कुछ ऊपर चढ़ने के बाद अचानक प्रोफ़ेसरको कुछ ख्याल आया और उसने चौंककर चिल्लाते हुए कहा,"तुम दोनों मेरे साथ क्यों आ रहे हो? तीन लोगों के बोझ से यह रस्सी टूट नही जाएगी?" प्रोफ़ेसर कीबात पूरी होते ही उसकी आशंका भी सत्य सिद्ध हो गई और रस्सी टूट गई. फिर वेएक के ऊपर एक गिरते चले गएकुछ देर तक तो उनके होश ही न सही हुए और जब उनका दिमाग कुछ सोचने के अनुकूल हुआ तो सबसे ऊपर पड़ेहुए प्रोफ़ेसर ने भर्राई आवाज़ में कहा, "हम लोग जिंदा हैं या मर गए?"

"फिलहाल तो जिंदा हैं." बीच में पड़े हुए शमशेर सिंह ने कहा.

"तो फ़िर इस वीराने में मुझे इतना नर्म बिस्तर कहाँ से मिल गया?"

"तुम्हें केवल बिस्तर मिला है और मुझे बिस्तर और रजाई दोनों मिल गए हैं. लेकिन रजाई बहुत भारी है."

अगर तुम लोग कुछ देर और मेरे ऊपर से नही हटे तो मेरी हड्डियाँ सुरमा बन जाएंगी. फ़िर बिना हड्डियों का और अच्छा बिस्तर बनेगा." सबसे नीचे पड़े हुए रामसिंह ने चीखकर फरियाद की. वे दोनों जल्दी से उठ बैठे.

सबसे बाद में रामसिंह हाय हाय करते उठा.

"क्या हुआ रामसिंह? क्या ज़्यादा चोट लग गई है?" शमशेर सिंह ने हमदर्दी से पूछा.

"अरे मुझे तो लगता है कि ज़रूर दो तीन जगह से फ्रेक्चर हो गया है." रामसिंह ने कराहते हुए कहा.

"दो मिनट रुको मैं देखता हूँ. यहाँ ज़रूर आयोडेक्स वाली घास मिल जायेगी." प्रोफ़ेसर ने जंगल की ओर रुख किया.

"रहने दो प्रोफ़ेसर, तुम्हारे इलाज से अच्छा है कि मैं बिना इलाज के रहूँ. वरना तुम मेरा भी वही हाल कर दोगे जो अपना किया था.

"ठीक है. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी."

कुछ देर मौनता छाई रही फ़िर शमशेर सिंह बोला, "हमारा पहाड़ियों पर जाने का प्लान तो चौपट हो गया. अब क्या किया जाए?"

"हाँ. यह सब तुम लोगों की गलती से हुआ है. न एक साथ तीनों चढ़ते न रस्सी टूटती." फ़िर प्रोफ़ेसर ने रामसिंह से कहा,"ऐसा है तुम यहाँ कुछ देर आराम से रहो, हम लोग एक बार फ़िर पहाड़ियों में कोई रास्ता ढूँढ़ते हैं."

फ़िर वह दोनों रास्ता ढूँढने निकलगए और रामसिंह वहीँ बैठकर सूखी डबलरोटीचबाने लगा जो वह घर से अपने साथ लाया था.फ़िर उसने स्टोव जलाकर काफी चढा दी. कुछ देर बाद जब काफी तैयार हो गई उसी समय प्रोफ़ेसर और शमशेर सिंह वापस आ गए. उनकेचेहरों से प्रसन्नता छलक रही थी.

"अरे वाह, तुमने तो काफी बनाकर हमारी खुशी दूनी कर दी." शमशेर सिंह ने खुश होकर कहा.

"क्यों क्या हुआ? किस बात की खुशी?"

"बात यह है कि हमें पहाड़ियों में एक रास्ता मिल गया है." प्रोफ़ेसर ने बताया."वाकई? किस जगह पर मिला?"

"उधर पश्चिम की ओर." शमशेर सिंह ने संकेत करते हुए कहा,"एक छोटा सा दर्रा है, जो पत्थर से बंद था. इस कारण हमारी दृष्टि उस पर नही पड़ी थी. बाद में गौर से देखने पर मालूम हुआ कि वह पत्थर पहाडी का हिस्सा नही है. बल्कि अलग सेजमा हुआ है. हम लोगोंने थोड़ी कोशिश की और पत्थर को उसके स्थान से हटा दिया. अन्दर वह दर्रा एक सुरंग की तरह था जो काफ़ी लम्बी चली गई थी."

"क्या उस सुरंग का दूसरा सिरा पहाडी के दूसरी तरफ़ निकलता है?" रामसिंहने पूछा.

"हम लोग उसके सिरे तक नही पहुँच सके. किंतु उस सुरंग की बनावट से मैंने यही अनुमान लगाया है कि वह पहाडी को पार करती है. हम लोग काफीपीकर उसी रास्ते से चलेंगे."

वे लोग काफी पीने लगे. काफी पीने के बाद प्रोफ़ेसर ने भूरे रंग की एक टहनी निकली और उसे अपने सूटकेस में रखने लगा.

"यह क्या है प्रोफ़ेसर?" रामसिंह ने पूछा.

"यह मुझे सुरंग के पास मिली थी. और इसकेबारे में मेरा ख्याल है कि इसका सुरमा बनाकर आँखों में लगाने से मोतियाबिंद और रतौंधी का रोग दूर हो जाता है."

"प्रोफ़ेसर, तुम तो साइंस के एक्सपर्ट हो. एक बात बताओगे?" रामसिंह अपना सर खुजलाते हुए बोला.

"एक क्या हज़ार बातें पूछो." प्रोफ़ेसर ने खुश होकर कहा.

"मैंने सुना है कि मनुष्य पहले बन्दर था. क्या ये बात सच है?"

"बिल्कुल सच है. यह बात तो विश्व के महान वैज्ञानिक डार्विन ने बताई थी. उसने अपना पूरा जीवन बंदरों के बीच बिताने के बाद यह महान सिद्धांत दिया."

"तो फिर वह बन्दर से मनुष्य कैसे बना?" रामसिंह ने पूछा.

"मैंने एक किताब मेंपढ़ा है कि परमाणु युद्ध के बाद जातियों में परिवर्तन हो जाता है. इसलिए मेरा ख्याल है कि जब बन्दर बहुत विकसित हो गए तो उन्हें अपना बंदरों वाला चेहरा ख़राब लगने लगा. इसलिए उन्होंनेअपनी जाति बदलने के लिए परमाणु युद्ध छेड़ दिया. उसके बाद उनकी जाति में परिवर्तन हो गया और वे बन्दर से मनुष्य बन गए."

"तुमने सही कहा प्रोफ़ेसर. मेरा ख्याल है कि आजकल भी इसी कारण परमाणु युद्ध की तैयारियांहो रही हैं. क्योंकि मनुष्य को अपनी शक्ल ख़राब लगने लगी है और वह इंसान से कुछ और बनना चाहता है." शमशेर सिंह ने अपनी राय ज़ाहिर की.

"तुमने बिल्कुल सही कहा शमशेर सिंह. मेरा विचार भी यही है. तुम ज़रूर मेरे शिष्य बनने के काबिल हो." प्रोफ़ेसर ने शमशेर सिंह की पीठ थपथपाई.

"एक बात और बताओ, " रामसिंह ने कहा,"क्या मनुष्य वास्तवमें चाँद पर पहुँच गया है?"

एक बात और बताओ," रामसिंह ने कहा,"क्या मनुष्य वास्तवमें चाँदपर पहुँच गया है?-----अब आगे--"अमरीका का तो यही कहना है. लेकिन मेरेख्याल में वे लोग असली चाँद तक नही पहुँच पाए. बल्कि किसी नकली चाँद पर धोखे से उतर गए. क्योंकि मैंने किताबों में पढ़ा है कि चाँद बहुत सुंदर होता है.

जबकि अमरीका वाले कहते हैं कि वह बहुत ऊबड़ खाबड़ और बदसूरत है. जहाँ न तोहवा है और न पानी. तो बताओ फिर वह असली चाँद कैसे हो सकता है?"

"वैसे चाँद पर जाने से फायेदा क्या हो सकता है?" रामसिंह ने दोबारा पूछा.

"बहुत फाएदे हैं. उदाहरण के लिए तुम यहाँ खड़े हो तब तुम्हें अधिक दूर दिखेगा या पहाडी पर चढ़ जाओगे तब ज़्यादा दूर देख पाओगे?"

"जब पहाडी पर चढूँगातब ज़्यादा दूर दिखेगा."

"तो इसी तरह चूंकि चाँद बहुत अधिक दूर है अतः उससे पूरी पृथ्वी दिखेगी. इस तरह अगर तुम्हें किसी को ढूँढना है तो कोई समस्या नही. चाँद पर चढ़ जाओ तो पृथ्वी पर जो कुछ है सब दिखेगा. यदि पुलिस को अपराधियोंको ढूँढना होगा तो चाँद पर चढ़कर आराम से ढूँढ लेगी और जाकर हथकडी पहना देगी. कहीं पर कोई खजाना छुपा होगा तो चाँद पर चढ़ने के बाद दिख जाएगा. इसके अलावा आगरा का ताजमहल, पेरिस का एफिल टावर, इंग्लैंड का लन्दन टावर और न्यूयार्क की स्वतंत्रता की मूर्ति के एक साथ दर्शन चाँद पर बैठे बैठे हो जाएंगे."

"तो इस तरह तो हमें चाँद की हर वस्तु पृथ्वी से दिखनी चाहिए. ऐसा क्यों नहीं होता?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"चाँद पर कुछ है ही नही तो दिखेगा क्या. उसपर केवल चरखा कातती हुई बुढ़िया है और वही हमें दिखती है." प्रोफ़ेसर ने स्पष्टीकरण किया.

"और क्या क्या हैं चाँद पर जाने के फायदे?"

"एक ये भी फायेदा है कि यदि कोई व्यक्ति प्रेम में निराश होकर अपनी प्रेमिकाको संसार छोड़ने की धमकी देता है तो वह चाँद पर जा सकता है. इस तरह वह बिना आत्महत्या किए अपनीधमकी पूरी कर देगा. और सबसे बड़ा फायेदा तो यह है कि चाँद पर न तो हवा है न पानी. अतः चाँद पर रहने वाले लोगों का शरीर धीरे धीरे इन चीज़ों के बगैर रहने के अनुकूल हो जाएगा. अतः वे पृथ्वी पर भी बिना हवा पानी के रह सकेंगे. इस प्रकार न तो जल प्रदूषण कि समस्या रह जाएगी और न वायु प्रदूषण की.

अरे चाँद पर रहने के तो बीसियों फायेदे हैं. कहाँ तक गिनाऊं.मैं तो सोच रहा हूँ कि चाँद पर जाने के लाभ टाइटिल से एक किताब लिख डालूँ."

"तो तुम अपनी यह सोच पूरी कर डालो. अगर यहकिताब मार्केट में आ गई तो ज़रूर बेस्ट सेलर होगी, और उसके बाद चाँद पर जाने के लिए इतनी भीड़ लग जायेगी कि रॉकेट मिलने मुश्किल हो जायेंगे." शमशेर सिंह ने कहा."और रॉकेट बनाने वालों के वारे न्यारे हो जायेंगे. हो सकता है कि वे तुम्हें अपनी बिक्री बढ़ने के लिए इनाम विनाम दे डालें." रामसिंह ने प्रोफ़ेसर के हौसलोंको और पानी पर चढाया.

"वैसे मेरा यार है काबिल आदमी." शमशेर सिंह ने कहा, "अगर यह कोशिश करे तो नोबुल प्राइज़ ज़रूर प्राप्त कर लेगा."

"मैं नोबिल प्राइज़ क्यों प्राप्त करुँ.देख लेना एक दिन आएगा जब मेरे नाम से पुरूस्कार बटेंगे." प्रोफ़ेसर ने अकड़ कर कहा.

अब तक वे लोग सुरंग के मुंह तक पहुँच चुके थे.

"यार, यह तो काफी लम्बी सुरंग लग रही है. अन्दर एकदम अँधेरा है." रामसिंह ने कहा.

"लम्बी तो होगी ही. आख़िर यह हमें पहाड़ियों के दूसरी ओर ले जायेगी." शमशेरसिंह ने कहा.वे लोग सुरंग के अन्दर घुसते चले गए. उनके घुसने के साथ ही कुछ छुपे चमगादड़ इधर उधर भागने लगे. कुछ इनसे भी आकर टकराए.

"यार प्रोफ़ेसर, टॉर्च जला लो. वरना ये चमगादड़ हमें अपना शिकार समझकर खा जायेंगे." रामसिंह ने कहा. प्रोफ़ेसर ने टॉर्च जला ली. टॉर्च की रौशनी में मकड़ियों के काफी बड़े बड़े जाले चमक रहे थे. यह प्राकृतिक सुरंग मकड़ियों और चमगादडों का निवास थी.

वे लोग जाले साफ करते हुए आगे बढ़ने लगे. चमगादड़ रौशनी देखकर फिर अपने अपने बिलों में छुप गए थे.

"यार प्रोफ़ेसर, ये चमगादड़ रौशनी में क्यों नही निकलते? अंधेरे में ही क्यों निकलते हैं?" रामसिंह ने मिचमिचीदृष्टि से इधर उधर देखते हुए पूछा.

"बात यह है कि चमगादड़ को नई नई चीज़ें खाने का बहुत शौक था. इसी शौक में एक दिन वह अफीम की पत्ती खा गया. फिर क्या था, उसको दिन हीमें रंगीन सपने दिखाई देने लगे. उसके बाद वह रोजाना अफीम की पत्ती खाने लगा. और खाकर किसी अंधेरे कोने में पड़ा रहता था. धीरे धीरे उसकी आँखों को सूर्य की रौशनी असहनीय लगने लगी और वह पूरी तरह अंधेरे में रहने लगा."

"यह तुमने कहाँ पढ़ाहै?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"यह एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक लैमार्क का सिद्धांत है कि प्राणियों में जिन अंगों का इस्तेमाल नही होता वे धीरे धीरे समाप्त होते जाते हैं और जिनका अधिक इस्तेमाल होताहै वे बलिष्ट होते जाते हैं."

"यह बात तो शत प्रतिशत सत्य है." शमशेर सिंह ने कहा,"मेरे पड़ोस में एक पहलवान जी रहते हैं,जिनकी खोपडी एकदम सफाचट है, क्योंकि वे खोपडी का इस्तेमाल बिल्कुल नही करते. बल्कि जहाँ अक्ल के इस्तेमाल की बात आती है, वहां भी वे जूतेलात को काम में लाते हैं. जब वो अपनी लड़की की शादी एक जगह कर रहे थे तो उसी समय लड़के ने मोटरसाइकिल की मांगकर दी. वे बहुत परेशान हुए. लोगों ने राए दी कि थोड़ा अक्ल से काम लेते हुए लड़के को बहला दीजिये वरना बारात लौट जायेगी तो बहुत बदनामी होगी.

उन्होंने झपट कर लड़के का गिरेबान पकड़ा और उठाकर पटक दिया. बोले कमबख्त,तेरे तो होने वाले बच्चों ने भी कभी मोटरसाइकिल कि शकल नही देखी होगी. आइन्दा अगर तूने मोटरसाइकिल कि मांगकि तो वो पटखनियाँ दूँगा कि तुझे पंक्चर साइकिल कि याद आने लगेगी. वो लड़का इतना घबराया कि बोलना ही भूल गया.और तब तक नही बोला जबतक सही सलामत दुल्हन को लेकर घर नही पहुँच गया."

"बाद में तो ससुराल वालों ने पहलवान कि लड़की को बहुत सताया होगा." प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"ऐसा कुछ नही हुआ. ससुराल वालों के सारे अरमान धरे रह गए. क्योंकि पहलवान की बेटी भी अखाड़े में दंड बैठक लगाये हुए थी. कोई घूर कर भी देखता था तो वह पटखनी देती थी कि घूरने वाला चारों खाने चित हो जाता था."

 


"खैर यह ख्याल अच्छाहै कि दहेज़ समस्या के हल के लिए लड़कियों को पहलवानबनाया जाए. ताकि वह अपनी रक्षा ख़ुद कर सकें." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"यार, यह सुरंग कितनी लम्बी है कि ख़त्म होने में ही नही आ रही है." रामसिंह ने कहा.

"अभी कैसे ख़त्म होगी. अभी अभी तो हम लोग चले हैं. मेरा ख्याल है कि अभी हम पहाडी के बीचोंबीच हैं." प्रोफ़ेसर ने ख्याल ज़ाहिर किया.

वे लोग आगे बढ़ते रहे, फिर अचानक यह सुरंग कमरे की तरह चौड़ी हो गई. यहाँ पर मालूम हो रहा था जैसे इस कमरे में आमने सामने दो दरवाज़े हैं. एक वो जिससे ये लोग दाखिल हुए और दूसरा सामने नज़र आ रहा था.

"यह जगह ठहरने के लिए अच्छी है. अब यहाँ रूककर कुछ खा पी लिया जाए. मेरे तोभूख लगने लगी है." शमशेर सिंह ने कहा.

फिर वे लोग वहीँ बैठ गए. प्रोफ़ेसर ने इधर उधर देखते हुए कहा,"प्रकृति भी कैसे कैसे करिश्में दिखाती है. अब यही देखो, पहाड़ियों के बीच सुरंग खोदकर एक कमरा तैयार कर दिया. मानो इंसानी हाथों ने संवारा है."

"क्या ऐसा नही हो सकता कि वास्तव में किसी ने सुरंग खोदकर यह कमरा बना दिया हो?" रामसिंह ने अनुमान लगाया."भला इस सुनसान जगह पर कोई ऐसा क्यों करने लगा? वैसे लगता तो कुछ ऐसा ही है."

"रामसिंह, अगर तुम्हें खजाना मिल जाए तो तुम उसका क्या करोगे?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"मेरे दिमाग में तो खजाने को लेकर कई योजनायें हैं."

"कुछ हम लोगों को भी तो बताओ."

"एक तो मैं ऐसा सामान बनाने की फैक्ट्री लगाने की सोच रहा हूँ जिसमें फायदा ही फायदा है. क्योंकि उस सामान की मांग तो बहुत है लेकिन मैंने आजतक ऐसी कोई कंपनी नहीं देखी जो उसका उत्पादन करती हो. इसलिए इसमें कोई कम्पटीशन नहीं होगाऔर फायदा ही फायदा होगा."

"ऐसा कौन सा सामान है जिसकी डिमांड बहुत है लेकिन बनाता कोई नहीं." प्रोफ़ेसर ने चकराकरपूछा.

"मैं फैशन बनाने की फैक्ट्री खोलूँगा. क्योंकि मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि मैं इस फैशन का दीवाना हूँ, मैं उस फैशन का दीवाना हूँ. लेकिन मैंने आजतक किसी को नही सुना कि उसने फैशन बनाने की फैक्ट्री खोली है."

"विचार तो बहुत अच्छा है तुम्हारा. लेकिन क्या तुमने कभी फैशन को देखा है?"

"देखा तो नही, किंतु मेरा विचार है कि वह कोई चलने वाली वस्तु है. क्योंकि मैंने अक्सर सुना है कि आजकल बड़े बालों का फैशन चल रहा है, आजकल लुंगी पहनने का फैशन चल रहा है. मेरा ख्याल है कि फैशन कपड़े भी पहनता है, बाल भी रखता है. और साल दो साल में समान वेश में चक्कर भी लगाता है."

"तुमने अनुमान तो सही लगाए हैं. किंतु माई डियर, फैशन कोई फैक्ट्री में बनने वाली चीज़ नही है. बल्कि यह दिमाग का फितूर होता है. और अक्सर इसे वे लोग बनाते हैं जो अपने नौसिखियापन में कोईगलती कर बैठते हैं. यानी ये जो तुम कपड़े पहने हो इसको बनाने में अगर कोई दर्जी गलती से कमीज़ की बजाये पैंट सिल देता तो वह एक फैशन कहलाता." शमशेर सिंह ने बताया.

"ओह, फ़िर तो मुझे किसी और बिजनेस के बारे में सोचना पड़ेगा. वैसे मेरा ख्याल है कि तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो."

"खैर बने हुए को बनाने की कोई ज़रूरत नही होती. यह बताओ, और क्या क्या तुम्हारे विचार हैं?" शमशेर सिंह ने फ़िर पूछा.

"मुझे एकता बहुत पसंद है. इसलिए मैं एक ऐसा घर बनाऊंगा, जिसका नक्शा मस्जिदजैसा होगा. उसमें भगवान् की मूर्तियाँ भी होंगी.ईसाइयों का क्रास भी होगा और गुरुग्रंथसाहब भी होंगे. यह घर विभिन्न धर्मों की एकता का अनोखा उदाहरण होगा."

"गुड गुड, क्या विचार है." प्रोफ़ेसर ने ताली बजाकर कहा,"फ़िर सौ दो सौ सालों बाद जब तुम्हारी हड्डियाँ भी सड़ गल जाएँगी, उस समय तुम्हारे उस एकता के केन्द्र को हिंदू मन्दिर कहेंगे, मुसलमान मस्जिद का दावा करेंगे, सिख अपने गुरूद्वारे से चिपटजायेंगे और इसाई अपने चर्च की मांग करेंगे. उस समय धर्मों तो क्या अधर्मों के भी हाथों से एकता के तोते उड़ जायेंगे."

"यार, तुम लोग तो ऐसीदलीलें देते हो कि मैं अपने आपको किसी गधे का भतीजा समझने लगता हूँ जो अपने मामा की सिफारिश पर सरकारी नौकरी में भरती हो गया हूँ."

"ठीक है, ठीक है। अब शमशेर सिंह तुम बताओ कि अपने खजाने का क्या करोगे?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"सबसे पहले तो मैं किसी स्विस बैंक में अपना खाता खुलवाऊंगा और उसमेंअपना खजाना जमा कर दूँगा।"

"और उसके बाद?""मुझे एडवेंचर का बहुत शौक है। इसलिए उसके बाद मैं दुनिया के खतरनाक स्थानों जैसे अफ्रीका के जंगलों, अमेज़न के बेसिन, अमेरिका के रेड इंडियन प्रदेशों में रोमांचपूर्ण यात्राएं करूंगा औरऐसे ऐसे साहसपूर्ण कारनामे करूंगा कि मेरा नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों द्वारा लिखा जाएगा."

"इन साहसपूर्ण कारनामों से पहले यदि एक साहसी कार्य कर जाओ तो मैं तुम्हारा नाम उसी समय इतिहास की किसी किताब में लिखवा दूँगा." रामसिंह ने कहा.

"एक क्या, चाहे जितने कारनामे कहो मैं कर के दिखला दूँ."

"बस तुम केवल अपना पलंग अपने कमरे की दीवार से मिलाकर उसपर सो जाओ."

"इसमें साहस दिखाने की क्या बात है? मैं समझा नहीं." प्रोफ़ेसर ने आश्चर्य से कहा.

"बात यह है कि विश्व के सबसे साहसी व्यक्ति को छिपकलियों से बहुत डर लगता है. अतः ये अपना पलंग दीवार से लगाकर नही सोते. क्योंकि इससे दीवारपर चढी छिपकलियों के पलंग पर गिरने का डर रहता है."

"अरे यार, तुम कहाँ की बात ले बैठे. छिपकलियों से तो खैर दुनिया का हर व्यक्ति डरता है. मैं भले ही छिपकलियों से डरूं, लेकिन शेर के मुंह में हाथ डालकर उसका जबडा चीर सकता हूँ, हाथी की सूंड मोड़कर उसे पटक सकता हूँ और बड़े से बड़े सूरमा से कुश्ती लड़कर उसे पछाड़ सकता हूँ."

"ठीक है, तुम ज़रूर यह सब काम कर सकते हो. लेकिन मैं यह तभीमानूंगा जब तुम वह सामने जा रहा चूहा पकड़ लोगे. " रामसिंह ने एक कोने में संकेत किया जहाँ एक चूहा बैठा हुआ टुकुर टुकुर इन लोगों की तरफ़ देख रहा था. वह शायद खानेकी बू सूंघकर कहीं से निकल आया था.

"इसमें कौन सी बड़ी बात है. मैं अभी उसे पकड़ लेता हूँ." कहते हुए शमशेर सिंह उस तरफ़ धीरे धीरे बढ़ने लगा. उधर चूहा भी बड़े गौर से उसकी तरफ़ देखने लगा लगा था. वह ज़रा भी इधर उधर नहीं हिला था. शायद उसका मूड भी लड़ने का था.

शमशेर सिंह एकदम उसके पास पहुँच गया. अब चूहे के कान खड़े हो गए थे. और उसने अपनी ऑंखें शमशेर सिंह की आँखों में गडा दी थीं. शमशेर सिंह धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा. अचानक चूहे ने किसी कुशल कुंगफू मास्टरकी तरह छलांग लगाई और शमशेर सिंह की दाईं हथेली चूमता हुआ पीछे फांदकर किसी पत्थर के पीछे गायब हो गया."उई मार डाला." शमशेरसिंह ज़ोर से चीखा और धप्प से पीछे की ओर गिरा. प्रोफ़ेसर और रामसिंह दौड़ कर उसके पास आये.

"क्या हुआ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

शमशेर सिंह अब उठ बैठा था. उसने कांपते हुए कहा, "वह चूहा ज़रूर पिछले जन्म में कोई बदमाश था. मैं तो सोच भी नही सकता था कि वह मेरे ऊपर हमला कर देगा. मेरा खंजर कहाँ गया, मैं अभी जाकर उसे सबक सिखाता हूँ."

फ़िर प्रोफ़ेसर और रामसिंह ने बड़ी मुश्किल से उसकी मोटी कमर थामकर उसे रोका. वे लोग फिर आकरअपने स्थान पर बैठ गए. फिर रामसिंह ने कहा, "प्रोफ़ेसर, हम लोगों ने तो तुम्हें बता दिया कि खजाने का अपने हिस्सों का क्या क्या करेंगे. किंतु तुमने नहीं बताया. अब तुम बताओ."

"भाई मुझे तो एक ही शौक है. नए नए वैज्ञानिक प्रयोग करने का. उदाहरण के लिए मेरी दाढी बहुत तेज़ी से बढती है और मैं शेव बनाते बनाते परेशान रहता हूँ. इसलिए खजाना मिलने पर मैं एक ऐसी शेविंग क्रीम बनानेकी सोच रहा हूँ जो चेहरे पर लगाने पर वहां के बाल पूरी तरह साफ कर देगी. और उस जगह पर फिर कभी बाल नहीं निकलेगा."

"और अगर वह शेविंग क्रीम गलती से सर में लग गई तो?" शमशेरसिंह ने पूछा.

"ओह, ये तो मैंने सोचा ही नही था. आइडिया," प्रोफ़ेसर ने उछल कर कहा,"क्यों न ऐसा तेल बनाया जाए जो गंजों के बाल उगा दे. क्योंकि गंजे इस कारण काफ़ी चिंतित रहते हैं."

"विचार अच्छा है. उस तेल की बहुत बिक्री होगी. " रामसिंह ने कहा, "जब तुम उस तेल का आविष्कार कर लोगे तो मैं उसे बनाने की फैक्ट्री खोल लूँगा. हम तुम मिलकर काफी तरक्की करेंगे."

"उस फैक्ट्री में मैं क्या करूंगा?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"तुम्हें तेल भरी हुई शीशियों पर 'बालदार कोयला तेल' का लेबल लगाने का काम दे दिया जाएगा. मेरा ख्याल है तुम यह काम बहुत अच्छी तरह कर लोगे." रामसिंह बोला.

"इससे अच्छी तरह मैंयह काम करूंगा कि एक हौज़ में सारी शीशियाँ खाली करके तुम्हें उसमें डुबोदूँगा. और जब तुम वनमानुष बनकर बाहर निकलोगे तो बहुत अच्छे लगोगे." शमशेर सिंह ने क्रोधित होकर कहा.

"नाराज़ क्यों होने लगे मेरे प्यारे दोस्त." रामसिंह ने प्रेम से उसका सर हिलाया, "टी.वी. पर हमारे तेल का जो विज्ञापन दिया जाएगा, उसकी माडलिंग तो तुम्हेंही करनी है."

"क्या वास्तव में तुम मुझे इतना सुंदर समझते हो कि मैं विज्ञापन में मॉडल का रोल कर सकता हूँ?" शमशेर सिंह ने खुश होकर कहा.

"अरे तुम तो एलिजाबेथ टेलर से भी अधिक सुंदर हो." रामसिंह ने शमशेर सिंह की ठोडी में हाथ लगाकर उसे ऊंचा कर दिया.

"एलिजाबेथ टेलर नाम तो औरतों का मालूम हो रहा है. क्या तुमने किसी औरत से मेरी तुलना की है?" शमशेर सिंह ने शंकाग्रस्त होकर रामसिंह को देखा.

"अरे नहीं. टेलर का मतलब तो दर्जी होता है. और कोई औरत दर्जीकैसे हो सकती है? वह तो दर्जाइन होगी."

"अब तुम लोग अपनी अपनी बकवासें बंद करो और आगे बढ़ने का इरादा करो."

प्रोफ़ेसर ने उठते हुए कहा.

शमशेर सिंह और रामसिंह भी उठ खड़े हुए. अचानक उस कमरे में हलकी रौशनी फैल गई.

"अरे वह सामने देखो, वह क्या है?" शमशेर सिंह ने एक कोने की ओर संकेत किया वे लोग उधर देखने लगे. वहां पर रौशनी के दो गोले पास पास चमक रहे थे."ये अंधेरे में रोशनी के गोले कहाँ से आ गए?" रामसिंह ने हैरत से कहा.

"मुझे लगता है जैसे यह किसी जानवर की ऑंखें हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"किस जानवर की ऑंखेंइतनी बड़ी होती हैं? उन दोनों रोशनी के गोलों का व्यास मेरे विचार से एक एक फिट होगा." रामसिंह ने कहा.

"चलो पास चल कर देखते हैं, अभी पता चल जायेगा." शमशेर सिंह ने सुझाव दिया.

"मेरा ख्याल है वहांचलना खतरे से खाली नहीं होगा. क्योंकि मेरा अब भी विचार है कि वह कोई जानवर है. मैंने किताबों में पढ़ा है कि प्राचीन समय में ऐसे जानवर पाये जाते थे जो हाथी से भी बीसियों गुना विशाल होते थे. उन्हें डाइनासोर कहते थे. मेरा विचार है कि वह कोई डाइनासोर है."

"आख़िर वह हिल डुल क्यों नहीं रहा है?" रामसिंह ने पूछा.

"मेरा ख्याल है उसनेहम लोगों को देख लिया है. और हमारा शिकार करना चाहता है. इसलिए पोजीशन लेने के कारण वह हिल डुल नहीं रहा."

इस तरह वे लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन रोशनियोंके लिए अटकलें लगाते रहे किंतु किसी की हिम्मत वहां जाने की नहीं हुई.

अचानक वह रोशनी गायब हो गई. और इसके साथ ही कमरे में घुप्प अँधेरा छा गया.

"यह क्या हुआ? प्रोफ़ेसर, जल्दी टॉर्च जलाओ वरना अंधेरे में वह जानवर हम पर हमला कर देगा तो हम लोग कुछ नहीं कर सकेंगे." रामसिंह ने कहा.

प्रोफ़ेसर ने जल्दी से टॉर्च जलाकर उसकी रोशनी वहां पर डाली. किंतु अब वहां पर पत्थर की दीवारें दिख रही थीं. उस काल्पनिक जानवर का कहीं पता नहीं था.

"मेरा विचार हैं वह जानवर नहीं था बल्कि कुछ और था. आओ चलकर वहीँ देखते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा. फ़िर तीनों डरते डरते वहां पहुंचे. निरीक्षण करते हुए अचानक शमशेर सिंह की दृष्टि पीछे की ओर गई और उसने कहा,"ये देखो, यह क्या है?"

उनहोंने घूमकर पीछेदेखा, तो उन्हें दो गोल रोशनदान दिखाई दिए. ये दोनों रोशनदान पास पास थे. वे उसके पास पहुंचे. दोनों रोशनदानों सेआसमान साफ़ दिखाई पड़ रहा था.

"अब मेरी समझ में सारी बात आ गई है." प्रोफ़ेसर ने सर हिलाते हुए कहा.

"क्या समझ में आया?" रामसिंह ने पूछा.

"वह रोशनी जो हमें दिखी थी, वास्तव में सूर्य की रोशनी थी. जो इन रोशनदानों द्बारा सामने की दीवार पर पहुँची थी. फ़िर जब कुछ देर के बाद सूर्य की दिशा बदल गई तो वह रोशनी भी गायब हो गई."

"धत तेरे की. इतनी सी बात थी. और हम लोग पता नहीं क्या क्या सोच बैठे." रामसिंह ने अपने सर पर हाथ मारा.

"लेकिन अगर हम यह सारी बातें न सोचते तो शायद सही बात भी पता न कर पाते. मैंनेएक किताब में पढ़ा है की कई ग़लत बातों पर अध्ययन के बाद ही मनुष्य सही निष्कर्ष पर पहुँचता है." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"अब कौन से सही निष्कर्ष पर पहुंचेहो तुम?" रामसिंह ने पूछा."सुनो, यह रोशनदान इस तरह बने हैं कि मानो किसी मनुष्य का हाथ लगा हो. पत्थरों को एकदम गोलाई से काटकर यह रोशनदान बनाए गए हैं."

"इसी कारण इस प्राकृतिक कमरे मेंघुटन भी नहीं है." रामसिंह बोला.

"इसीलिये मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि यह कमरा प्रकृतिक नहीं है, बल्कि यह किन्हीं मनुष्यों द्बारा बनाया गया है. और यह सुरंग भी प्राकृतिकनहीं है. इस कमरे और सुरंग के चारों ओर के पत्थर एकदम बराबर से कटे हैं. औरयह कार्य प्राकृतिकनहीं हो सकता." प्रोफ़ेसर ने चारों ओर देखते हुए कहा.

"यह तो तुम सही कह रहे हो. किंतु इस सुनसान स्थान पर पहाड़ियों को काटकर यह सुरंग किसने बनाई होगी?" शमशेर सिंह ने पूछा.

"यही बात मेरे विचारों की पुष्टि कर रही है. अर्थात यहाँ पर प्राचीन समय में कोई सभ्यता ज़रूर आबाद थी.

जिसने अपना खजाना छुपाने के लिए इस सुरंग का निर्माण किया. वह खजाना ज़रूर यहीं इसी प्रकार की किसी सुरंग या किसी कमरे में होगा."

"इसका मतलब नक्शे नेहम लोगों का सही मार्गदर्शन किया है." रामसिंह ने कहा.

"मेरा तो यही विचार है. इसलिए सबसे पहले हम लोग इसी कमरे की अच्छी तरह तलाशी लेंगे फिर आगे बढ़ेंगे." प्रोफ़ेसर ने दोबारा अपना सामान नीचे रखते हुए कहा. फिर उन लोगों ने उस कमरे का एक एक कोना देखना शुरू कर दिया मानो गिरी हुई सुई ढूँढ रहे हों. हालाँकि उस कमरे में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहाँ खजाना छुपाया जा सकता था. किंतु फिर भी चोर दरवाज़े की आशा में उन्होंने अपनी जगह पर जमे कई पत्थरों को हिलाने का प्रयत्न किया जो असफल रहा.

"मेरा ख्याल है प्रोफ़ेसर, यहाँ पर कोई खजाना नहीं छुपा है. इसलिए हम लोगों को आगे बढ़ना चाहिए." शमशेर सिंह ने अपना पसीना पोंछते हुए कहा.

"ठीक कहते हो चलो आगे बढ़ते हैं."

एक बार फिर सुरंग शुरू हो गई थी. सुरंगमें इतना अँधेरा था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था. अतः प्रोफ़ेसर ने टॉर्च जला रखी थी.

"मुझे इस समय पता नहीं क्यों मिस्र के पिरामिडों की याद आ रही है." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"यहाँ पर भला मिस्र के पिरामिडों को याद करने की क्या तुक है?" रामसिंह बोला.

"तुक तो है. अब देखो पहाडियाँ भी नीचे से चौडी होती हैं और ऊपर जाते जाते पतली होती जाती हैं. इसी तरह मिस्र के पिरामिड भी नीचे से चौडे हैं और ऊपर जाते जाते पतले होते गए हैं. मिस्र के पिरामिडों के अन्दर कई कक्ष बने हैं. और वे आपस में सुरंगों द्बारा जुड़े हैं. यहाँ भी हम लोगों ने एक कक्ष देखा था और वहां जाने का रास्ता भी सुरंग है. हो सकता हैइस पहाड़ी में और भी इस प्रकार के कक्ष हों और वे आपस में इसी प्रकार की सुरंगों द्बारा जुड़े हों." प्रोफ़ेसर ने खड़े होकर पूरा लेक्चर दे डाला

 


"तुम्हारा मतलब ये पहाडियाँ नहीं बल्कि पिरामिड हैं."शमशेर सिंह ने उसकी ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा.

"यस्."

"फ़िर तो यहाँ ममियांभी मौजूद होनी चाहिए."

"किसकी मम्मियां? हमलोगों की मम्मियां तो स्वर्गवासी हो चुकी हैं. क्या स्वर्ग जाने वाला व्यक्ति यहीं आता है?" रामसिंह ने हैरत से पूछा.

"मम्मियां नहीं उल्लू की दम, ममियां.पुराने समय में लोग मरने वालों के मसाला लगाकर उन्हेंताबूत में सुरक्षितकर देते थे. वे लाशेंही ममियां कहलाती हैं." शमशेर सिंह ने स्पष्टीकरण किया.

"मैं भी यही समझता हूँ कि यहाँ ममियां ज़रूर होंगी." प्रोफ़ेसर ने कहा,"और उनके साथ खजाना भी होगा. क्योंकि मिस्र के पिरामिडोंमें जहाँ जहाँ ममियां मिली थीं वहां वहां उनके साथ विशाल खजाने भी मिले थे." खजाने के ख्याल ने एक बार फिर उन्हें रोमांचित करदिया.

आगे सुरंग पर एक मोड़ था. जैसे ही वे लोग मोड़ पर पहुंचे, उन्हें सुरंग का मुंह दिखाई पड़ने लगा. वहां से हलकी रोशनी अन्दर आ रही थी जिससे पता चल रहा था कि शाम होने वाली है.

"लो हम लोग सुरंग के मुंह तक तो पहुँच गए,यानी पहाडियों को पार कर गए." रामसिंह ने प्रसन्नता से कहा.

"इसमें दांत निकालने कि क्या बात है. हम लोग पहाडियां पार करने नहीं बल्कि खजाने की तलाश में आये है." शमशेर सिंह ने रामसिंह को घूरा.

"वह भी मिल जाएगा. वह ज़रूर सुरंग के मुंह पर नीचे बिखरा होगा. क्योंकि मुझे नीचे काफी गहराई मालूम हो रही है." रामसिंह ने कहा.

वे लोग सुरंग के मुंह तक पहुँच गए. औरवहां से नीचे देख उनकी आशा निराशा में बदल गई. क्योंकि एक तो सुरंग का मुंह भूमि से काफ़ी ऊँचाई पर था और दूसरे वहां भूमि होने की बजाये एक बड़ा सा तालाब था, औरयह तालाब पहाडी से एकदम लगा हुआ था. अतःनीचे उतरने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता था.

वे लोग कुछ देर तक एकदूसरे की शक्लें देखते रहे, फिर प्रोफ़ेसर ने नीचे पैर लटकाकर बैठते हुए कहा, "क्या ख्याल है, नीचे तालाब में उतरा जाए?"

"अरे नहीं. ऐसा विचारभी अपने मन में मत लाना. अगर तुम तालाब में उतर गए तो कहीं सहारा भी नहीं ले पाओगे. क्योंकि तालाब के चारों ओर चिकनी पहाडियाँ हैं.और उनपर हाथ जम ही नहीं सकता." शमशेर सिंह ने प्रोफ़ेसर के बाजू पूरे जकड़ लिए.

"मुझे तो अब झल्लाहटहोने लगी है. अगर अब भी खजाना नहीं मिला तो मैं वापस लौट जाऊंगा. तुम लोग आराम से फिर खजाना खोजते रहना." रामसिंह बोला.

"वापस तो अब लौटना ही पड़ेगा. क्योंकि आगे का रास्ता पूरी तरह बंद है." शमशेर सिंह बोला."खैर छोड़ो इन बातों को. यह देखो, सामने का दृश्य कितना सुंदर है." प्रोफ़ेसरने सामने देखते हुए कहा.

"तुम्हें यह ऊबड़ खाबड़ पहाडियां सुंदर दिखाई पड़ रही हैं और यहाँ हम लोगों को इतना क्रोध आ रहा है कि यदि ताजमहल भी सामने आ जाए तो हम लोगों को कुरूप महल दिखाई देगा." रामसिंह पूरी तरह झल्लाया हुआ था.

"खैर झल्लाहट तो मुझे भी महसूस हो रही है. लेकिन मैंने किताबों में पढ़ा था कि यदि पहाडियों के नीचे कोई नदी तालाब इत्यादि दिखाई दे रहा हो और उसमें डूबते सूरज का प्रतिबिम्ब दिख रहा हो , आकाश अपनी लालिमा बिखेर रहा हो तो वह दृश्य बहुत सुंदर माना जाता है."

"मुझे तो सबसे अच्छादृश्य वह लगेगा जब खजाना मेरे सामने होगा." रामसिंह ने कहा.

"मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि या तो हम रास्ता भूल गए हैं या प्रोफ़ेसर ने कहीं से ग़लत नक्शा निकाल लिया है." शमशेर सिंह बोला.

"नक्शा तो ग़लत होनेका सवाल ही नहीं. हाँयह हो सकता है कि हम लोग रास्ता भूल गए हों. मैं एक बार फिर नक्शा देखे लेता हूँ." प्रोफ़ेसर ने जेब से नक्शा निकाला और देखने लगा.

"मेरी तो अब इसमें कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है. यह नक्शा तो लग रहा है कि यहाँका है ही नहीं."

"मरवा दिया प्रोफ़ेसर तूने हमें.मुझे पहले ही डर था कि यह नक्शा खजाने का नहीं है. अब इन पहाडियों से सर टकरायें या तालाब में कूद पड़ें." रामसिंह ने परेशान होकर कहा.

"अरे तो हिम्मत क्यों हार रहे हो." प्रोफ़ेसर ने ढाढस बंधाई, "अभी खजाना मिलने कि हमारी आशाएं जीवित हैं. मैंने थोडी देर पहले कहा था कि ये पहाडियां मिस्र के पिरामिडों से मिलतीहैं. अतः उन पिरामिडों की तरह यहाँ भी हमें प्राचीन सभ्यता द्बारा छुपाया गया खजाना मिलना चाहिए."

"तो फिर यहाँ बैठकर अपनी किस्मत को रोने से क्या फायेदा. हमें दोबाराअन्दर चलकर कोशिश करनी चाहिए." शमशेर सिंह ने कहा.

वे तीनों उठ खड़े हुए और दोबारा सुरंग में घुसने लगे. जल्दी ही वे लोग फिर उसी कमरे में पहुँच गए. इस बार वहां रुकने की बजाये वे और आगे बढ़ने लगे. उनका विचार था कि पहाडियों से निकलकरफिर से कोई और रास्ता ढूँढा जाएगा.हो सकता है उस रास्ते से जाने पर खजाना मिल जाए.

कुछ दूर जाने के बाद अचानक उनके सामने एक दोराहा आ गया.

"यह दोराहा कहाँ से आ गया? जब हम लोग आ रहे थे तब तो यह था नहीं." रामसिंह ने कहा.

"यह कैसे हो सकता है कि आने में दोराहा न रहा हो. दोराहा तब भीथा लेकिन हम लोग केवल आगे देखते हुए चल रहे थे अतः यह हमें दिखाई न दिया." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"किंतु समस्या ये हैकि यह कैसे पता चले कि हम लोग किस रास्ते से आये थे?" शमशेर सिंह ने असमंजस के भाव में कहा.

"हाँ. यह तो वास्तव में समस्या है. अगर हम लोगों ने ग़लत रास्ता पकड़ लिया तो शायद यहीं पहाडियोंकी सुरंगों में भटकते रह जायेंगे." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"फ़िर क्या किया जाए? कैसे पता लगाया जाए कि कौन सा सही रास्ता है?" रामसिंहने परेशान होकर कहा.

"ऐसा करते हैं. टॉस कर लेते हैं. यदि हेडआया तो दाएँ ओर और यदि टेल आया तो बाएँ ओर चलेंगे. तुममें से किसी के पास रूपया होगा?" प्रोफ़ेसर ने पूछा."मेरे पास है. यह लो." कहते हुए रामसिंह ने रूपया दिया.

"यह तो कागज़ का रूपया है उल्लू. टॉस करने के लिए सिक्का चाहिए."

"फ़िर तो सॉरी. हममें से किसी के पास रूपया नहीं है." दोनों ने एक साथ कहा.

"कोई तो सिक्का होगातुम्हारे पास?"

"वास्तव में हम लोगों के पास कुछ नहीं है. हम लोग यह सोचकर खली हाथ आये थे कि खजाना मिलने पर अपने आप हाथ भर जायेंगे." शमशेर सिंह बोला.

"मेरी जेब में एक चवन्नी पड़ी थी. देखते हैं." कहते हुएरामसिंह ने अपनी जेब टटोली फिर निराशा से सर हिलाया, "लगता है यह वहां पर गिर गई जहाँ मैं कीचड़ में गिरा था."

"तुम लोगों के पास कुछ अक्ल नहीं है." प्रोफ़ेसर ने दोनों को घूरा, "ऐसा करते हैं कि मेरे पास जो किताब है, उससे टॉस कर लेते हैं.""भला किताब से किस तरह टॉस होगा? उछालने पर वह फट नहीं जायेगी?" रामसिंह ने आश्चर्यसे कहा.

"किताब उछलकर टॉस नहीं होता उल्लुओं. मैं बीच से इसे खोलूँगा. अगर इसपर लिखा पेज नंबर सम आया तो हम लोग दाएँ ओर जायेंगे और अगर विषम आया तो बाएँ ओर जायेंगे."

फ़िर प्रोफ़ेसर ने किताब खोली, साथ ही उसके मुंह से निकला,"ओह, ये क्या!"

"क्या हुआ?" दोनों उसकी ओर झुक पड़े.

"इसके दायें पेज पर तो विषम नंबर छपा है और बाएं पर सम."

"ऐसा है, तुम हर जगह पर किताब से काम लेने की कोशिश न किया करो." कहते हुए शमशेर सिंह ने झुककर एक चपटा पत्थर का टुकडा उठाया और उसकी एक सतह पर थूकते हुए कहा, "मैं इस पत्थर को उछाल रहा हूँ. अगरगीला आया तो दाएँ और चलेंगे वरना बाएं ओर."

पत्थर का टुकडा नीचे गिरा और उसपर गीला वाला भाग ऊपर था. अतः उन लोगों ने दायें ओर चलना तय किया. सुरंग में काफ़ी अँधेरा था. इतना कि प्रोफ़ेसर को हर समय टॉर्च जलाए रखनी पड़ रही थी.साथ ही उन लोगों को ज़रा भी आभास न हो सका कि सुरंग सीधी जाने की बजाये गोलाई में घूम रही है.

जब उन लोगों को चलते चलते काफी देर हो गई और सुरंग के उस सिरे का चिन्ह भी न दिखाई दिया जिससे वे लोग चले थे तो वे लोग चौंके.

"यार, यह सुरंग क्या किसी ने खींच कर लम्बी कर दी है? मैंने आते में सामान उठाने में जितनी बार कंधे बदले थे उससे तीन गुनी बार अब तक बदल चुका हूँ. किंतु सुरंग का मुंह तो क्या, अब तक हलक भी नहीं दिखा." रामसिंह ने एक बार फ़िर एक कंधे का सामान दूसरे पर ट्रांसफर किया.

"हाँ, यह तो तुम सही कह रहे हो." प्रोफ़ेसरऔर शमशेर सिंह चौंक कर ठिठक गए.

, "लगता है हम लोग ग़लत रास्ते पर चले आये हैं."

"लगता नहीं पूरा विश्वास है कि हम लोगों ने ग़लत रास्ता चुना." शमशेर सिंह ने कहा.

"फिर क्या किया जाए? क्या वापस लौट चलें?" रामसिंह ने पूछा.

"लौटने को तो हम बाद में लौट सकते हैं. मेरा विचार हैं कि आगे देख लिया जाए. होसकता हैं किस्मत हम पर मेहरबान हो जाए और खजाना हमारे हाथ लग जाए." प्रोफ़ेसर नेकहा.

"तो ऐसा करते हैं कि अब निशान लगाते हुए आगे बढ़ते हैं. वरना इस भूलभुलैया में फंसकर हमारी हड्डियों का भी पता नहीं चलेगा." शमशेर सिंह बोला.

प्रोफ़ेसर ने अपना सूटकेस खोलकर एक चाक निकाली. फिर वे लोग चाक द्वारा दीवार पर निशान लगाते हुए आगे बढ़ने लगे. प्रत्येकव्यक्ति के दिल की धड़कने इस शंका से तेज़ हो गई थीं कि न जाने आगे क्या निकलता हैं. वैसे तो पूरी सुरंग में सीलन, चमगादडों की बीट इत्यादि की हलकी बदबू फैली हुई थी, किंतु यहाँ पहुंचकर यह बू और तेज़ हो गई थी. और जैसे जैसे वे लोग आगे बढ़ रहे थे, इस फैली हुई गंध में कुछ और गंध मिश्रित होकर अजीब प्रकार की गंध फैला रही थी.

"यार, यह गंध कैसी हैं?" रामसिंह ने नाक सिकोड़ते हुए कहा.

"सीलन वगैरह की बदबूहैं. यह कोई साफ़ सुथरा एयर कंडीशंड कमरा तो हैं नहीं कि हर ओर सुगंध फैली रहे. अगर खजाने को पाना हैं तो इतनी बदबू तो बर्दाश्त करनी ही पड़ेगी." प्रोफ़ेसर ने कहा.

अब सुरंग में कई मोड़ एक साथ मिले. औरएक मोड़ से जैसे ही वे लोग घूमे, उन्होंने स्वयं को एक विशाल कमरे में पाया.

विचित्र गंध अब कुछ और तेज़ हो गई थी.

"यह कैसी भूलभुलैया हैं? यह पहाडियों कोखोदकर कमरे किसने निकाले हैं?" रामसिंह ने आश्चर्यसे कहा.

"वह जो भी सभ्यता रही होगी, कोई बहुत विकसित सभ्यता थी. और मेरे विचार से वह सभ्यता पहाड़ों के अन्दर निवास करती थी." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"मेरा विचार हैं कि यहाँ खजाना ज़रूर मिलना चाहिए. क्योंकि एक विकसित सभ्यता का धन तो असीम होना चाहिए." शमशेर सिंह बोला.

"ठीक हैं. आओ ढूंढते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

फ़िर वे लोग एक एक कोने में अपनी नज़रें गड़ाने लगे.

उन्होंने जमे हुए एक एक पत्थर को हिलाने का प्रयत्न किया. अंत में चार पाँच पत्थरों को इस प्रकार देखने के बाद एक पत्थर वास्तव में हिलने लगा. इस पत्थर को शमशेर सिंह हिला रहा था.

"प्रोफ़ेसर, रामसिंह.." उसने पुकारा, "ज़रा इस पत्थर को अपने स्थान से हटाने में मेरी मदद करो."

फ़िर उन तीनों ने मिलकर ज़ोर लगाया और पत्थर अपने स्थान से हट गया. उसके पीछे वास्तव में एक छोटा सा दरवाजा था. वे लोग उसमें प्रविष्ट हो गए. यह एक और कमरा था. प्रोफ़ेसर ने टॉर्च जलाई और फ़िर वे लोग उन वस्तुओं को आश्चर्य से देखने लगे जो कमरे के बीचोंबीच रखी थीं.

ये लोहे के चार ताबूतनुमा बक्से थेजिनकी लम्बाई कम से कम दस फीट और चौडाई चार फीट थी. ऊँचाई भीअच्छी खासी थी.

"आखिरकार हम लोग खजाने तक पहुँच ही गए." शमशेर सिंह ने एक गहरी साँस ली.

"इतने खजाने में तो हम लोग पूरी दुनिया खरीद सकते हैं." रामसिंह ने कहा.

"मैं तो सबसे पहले ताजमहल खरीदूंगा. मुझे वह बहुत पसंद है." शमशेर सिंह ने अपनी भारी भरकम तोंद के साथ उछलने की कोशिश की.

"अब हमें देर न करते हुए इन बक्सों को खोलना चाहिए. पता तो चले कि इनमें हीरे भरे हैं या मोती."

फ़िर तीनों ने बक्सों को खोलने की तरकीबें करनी शुरू कर दीं. अजीब प्रकार के बक्से थे, जिनमें कोई कुंडा नहीं दिखाई दे रहा था. काफ़ी देर की कोशिशों के बाद भी तीनों उन्हें खोलनेमें नाकाम रहे और पसीना पोंछते हुए दूर खड़े हो गए.

"यार प्रोफ़ेसर, क्याहम लोगों को खजाने की झलक देखने को नहीं मिलेगी?" शमशेरसिंह ने मायूसी से पूछा.

"मैं तो कब से अपने डाउन सेल वाली टॉर्च लिए खड़ा हूँ कि कब बक्सा खुले और मैं अपनी टॉर्च की रौशनी में उसका दीदार करुँ." रामसिंह ने हाथ में पकड़ी टॉर्च झुलाते हुए कहा.

"अब तो मुझे भी गुस्सा आने लगा है. जी चाहता है कि पत्थर मार मार कर इन बक्सों का हुलिया बिगाड़ दूँ." कहते हुए प्रोफ़ेसर ने एक बड़ा पत्थर उठाया और निशाना लगाकर जोरों से एक बक्से के ऊपर फेंका. पत्थर बक्से से टकराकर वहीँ ज़मीन में गडे एक कीलनुमा पत्थर से टकरा गया.

दूसरे ही पल कीलनुमा पत्थर ज़मीन में धँसने लगा. फ़िर प्रोफ़ेसर वगैरा ने हैरत से उन बक्सों को देखना शुरू कर दिया जो आटोमैटिक ढंग से अपने आप खुलने लगे थे.

"शानदार. यानी यह पत्थर उन बक्सों को खोलने का स्विच था. " प्रोफ़ेसर ने प्रशंसात्मक भाव सेउस कीलनुमा पत्थर को देखा.

 


"चलो रामसिंह. अब हम भगवान् का नाम लेकर अपने खजाने का दीदार करते है." शमशेर सिंह आगे बढ़ा और उसके पीछे पीछे दोनों दोस्त भी बक्से के करीब पहुँच गए. और बेताबी के साथ अन्दर मौजूद सामान के दीदार को झुक गए.

लेकिन वहां खजाने जैसी कोई चीज़ नहीं थी.

चारों बक्सों में चार आदमकद लाशें मौजूद थीं. जिनके चेहरे बर्फ की तरह सफ़ेद पड़ चुके थे. उनके शरीर पूरी तरह सही सलामत थे और उनपर गर्दन से पैर तक सफ़ेद लिबास मौजूद था."ल..लाश!" रामसिंह ने घबरा कर कहा.

"प..प्रोफ़ेसर, किसी ने इन्हें कत्ल करके यहाँ डाल दिया है." शमशेर सिंह कांपते हुए बोला,"यहाँ से जल्दी निकल चलो वरना पुलिस इनके कत्ल के इल्जाम में हमें ही गिरफ्तार कर लेगी."

"रुको बेवकूफों." प्रोफ़ेसर ने दोनों को भागने से रोका,"मेरा ख्याल हंड्रेडपरसेंट सही निकला. मैंने तुम लोगों से कहा था कि ये पहाड़ी मिस्र के पिरामिड जैसी है. ये वाकई मेंपिरामिड निकला. और ये चारों इस पिरामिड की ममियां हैं."

"ओह!" दोनों ने गहरी साँस ली. और ताबूतों में रखी लाशों को देखने लगे जो टॉर्च की रौशनी में चमकती हुई कुछ अजीब सी लग रही थीं.

"कितना खूबसूरत मौका मिला है मुझे." प्रोफ़ेसर ने खुश होकर कहा, "अब मैं इन ममियों पर अपनी साइंटिफिक रिसर्च करूंगा. और यह साबित कर दूँगा कि ये ममियां मिस्र के बादशाहों की नहीं थीं बल्कि उनकी बेगमों के आशिकों की थीं. जिन्हें उन बादशाहों ने जिंदा ताबूत में गड़वा दिया था."

"और खजाने की तलाश का क्या होगा?" रामसिंह ने मरी हुई आवाज़ में पूछा.

"खजाने को कुछ देर के लिए चूल्हे भाड़ में झोंको और मेरी रिसर्च में मदद करो."प्रोफ़ेसर एक ताबूत पर झुककर पास से उसका निरीक्षण करनेलगा. इसी बीच उसके शरीर के दबाव से अन्दर मैजूद कोई खटका दब गया. दूसरे ही पल चारों ताबूतों से ऐसी आवाजें आने लगीं मानो किसी ने वहां ए.सी. चालू कर दिया हो. साथ ही ताबूत की दीवारों से निकलने वाली रंग बिरंगी किरणों ने चारों लाशों को अपने घेरे में ले लिया. प्रोफ़ेसर झिझक कर सीधा हो गया. फ़िर उन लोगों ने हैरत से देखा कि किरणों के प्रभाव से चारों लाशों के चेहरे पर धीरे धीरे सुर्खी लौट रही थी. मालूम होता था जैसे वे लोग जिंदा हो रहे हों.

और फ़िर वाकई चारों ने एक साथ ऑंखें खोल दीं. एक अंगड़ाई ली औरउठकर बैठ गए.

"भ..भूत!" शमशेर सिंह की घिघियाती आवाज़ निकली.

"म..मेरा ख्याल है कि हमें यहाँ से भाग निकलना चाहिए." इस हालत में भी प्रोफ़ेसर अपना ख्याल जताने से बाज़ नहीं आया था.

"ल..लेकिन भागने का रास्ता किधर है?" रामसिंह लगभग रो देने वाली आवाज़ में बोला.

"इन भूतों ने भागने का रास्ता भी गायब कर दिया." शमशेर सिंहके चेहरे की हवाइयां दूर से देखी जा सकती थीं.

जबकि हकीकत ये थी कि भागने का रास्ता उनके ठीक पीछे मौजूद था. घबराहट और दहशत ने उनके दिमाग को ऐसा जड़ कर दिया था कि वे पीछे घूमने की सोच भी नही पा रहेथे.उधर ताबूतों में मौजूद चारों मनुष्यों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा.फ़िर उनमें से एक ने अपना मुंह खोला, "आह!आज पता नहीं कितने बरसों के बाद हम जागे हैं............

." पाटदार आवाज़ में वह व्यक्ति कोई अनजान भाषा बोल रहा था.

"हाँ सियाकरण. और इसके लिए हमें इन मनुष्यों का कृतज्ञहोना चाहिए." दूसरे व्यक्ति ने तीनों दोस्तों की तरफ़ देखा, जो अपनी जगह परखड़े वाइब्रेटर पर लगे मोबाइल की तरह काँप रहे थे.

"तुम ठीक कहते हो मारभट, चलो हम उनके पास चलकर उन्हें धन्यवाद देते हैं." सियाकरण ने कहा और चारों अपने अपने ताबूतों से निकलकर बाहर आ गए. चारों का कद किसी भी प्रकार सात फिट से कम नहीं था.

"प...प्रोफ़ेसर, वो लोग हमारी तरफ़ आ रहे हैं." रामसिंह ने शमशेर सिंह को प्रोफ़ेसर समझकर उसका बाजू थाम लिया. जबकि शमशेर सिंह ऑंखें बंद करके जल्दी जल्दी आरती को ह****न चा**सा की तरह पढने लगा. ह****न चा**सा तो इस समय लाख कोशिश करने के बाद भी याद नहीं आ रही थी.

चारों उनके सामने पहुंचकर रुक गए.

"हम तुम्हारा शुक्रिया अदा करते हैं कि तुमने बरसों बाद हमें इन ताबूतों से बाहर निकाला." वह व्यक्ति बोला जिसे दूसरों ने सियाकरण कह कर संबोधित किया था.

"प...प्रोफ़ेसर, यह क्या कह रहा है?" रामसिंह ने पूछा.

"शायद यह हमें खाने की बात कर रहा है." प्रोफ़ेसर की बात सुनकर दोनों की हालत और ख़राब हो गई.

उसी समय तीन ताबूतवाले आगे बढे और तीनों को गले से लगा लिया. जबकि चौथा व्यक्ति बारी बारी से तीनों के सर सहलाने लगा.

"य..ये लोग क्या कर रहे हैं?" बड़ी मुश्किल से शमशेर सिंह के मुंह से आवाज़ निकली.

"ये लोग हमें पकाने से पहले हमारी हड्डियों का कचूमर बनाना चाहते हैं." प्रोफ़ेसर कराहकर बोला. ताबूतवाले ने उसे कुछ ज़्यादा ज़ोर से भींच लिया था.

फ़िर वे लोग उनके हाथ चूमने लगे.

"मेरा ख्याल है ये लोग हमसे दोस्ती करना चाहते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.

"भ..भूतों की न दोस्ती अच्छी होती है न दुश्मनी. प्रोफ़ेसर जल्दी से यहाँ से भाग चलो." रामसिंह ने प्रोफ़ेसर का हाथ पकड़कर खींचा.

लेकिन चारों ने उन्हें ऐसा जकड़ रखा था कि भागने का सवाल ही नहीं पैदा होता था.फ़िर काफी मुश्किलोंके बाद प्रोफ़ेसर वगैरह की समझ में आया की चारों ताबूतवासी इनके दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त हैं. अब सात लोगों का ये काफिला उस पहाडीनुमा पिरामिड से बाहर आकर जंगल में धमाचौकडी मचा रहा था. धीरे धीरे प्रोफ़ेसर वगैरह को उन चारों के नाम भी मालूम हो गए. सबसे ज़्यादा तेज़ तर्रार लीडर टाइप का सियाकरण था. उसकेसाथ सहयोगी रूप में लगा रहने वाला मारभट था. बाकी दोनों जो थोड़ा कम सक्रिय दिखाई देते थे क्रमशः चोटीराज और चिन्तिलाल थे. अबतीनों का डर उन ताबूतवासियों के प्रति काफी कम हो गया था. ख़ास तौर से प्रोफ़ेसर तो पूरी तरह निश्चिंत हो गया था, और उनकी भाषा समझने की कोशिश का रहा था. जबकि रामसिंह और शमशेर सिंह अब भी उनताबूतवासियों से दूर दूर और कटे कटे रहते थे.

यह ताबूतवासी कौन थे और कहाँ से आये थे, यह अभी भी एक रहस्य था.

..................

और इस रहस्य से परदा उठा एक महीने बाद. जबप्रोफ़ेसर और सियाकरण लगभग पूरी तरह एक दूसरे की भाषा समझने लगे थे. उस वक्त सियाकरण ने जो बताया वह प्रोफ़ेसर और उनके दोस्तों को भौंचक्का करने के लिए काफी था.

"आज से हजारों वर्ष पहले यहाँ एक बहुत बड़ी सभ्यता आबाद थी. विज्ञान की दृष्टि से भी बहुत उन्नत थी.सैंकडों वैज्ञानिक उस समय अनेक विकास कार्यों पर जुटे हुए थे. उनमें महर्षि प्रयोगाचार्य का नाम सबसे ऊपर था."

"एक मिनट!" प्रोफ़ेसर ने उसे टोका, "जब आपके प्रयोगाचार्य वैज्ञानिक थे तो वह ऋषि कहाँ से हो गए?"

"हमारे समय में वैज्ञानिकों को ऋषिकहा जाता था. और उच्चकोटि के वैज्ञानिक महर्षि कहलाते थे. और प्रयोगाचार्य जीतो महानतम ऋषि थे. जिनका आदर रजा भी करता था. हम चारों महर्षि के शिष्यों में शामिल थे. हमारे अलावा उनके सैंकडोंशिष्य और थे. एक दिन प्रयोगाचार्य जी नेहम चारों को अलग बुलाया, शायद वह कोई खास बात करना चाहते थे.

"क्या बात है गुरूजी? आपने हम लोगों को क्यों बुलाया है?" मैंने पूछा.

"आज मैंने एक बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है." महर्षि के चेहरे के रोम रोम से इस समय खुशी फूट रही थी. सदेव विद्यमान रहनेवाली गंभीरता उनके मस्तक से गायब थी."क्या कोई नया सूत्रहाथ लगा है?" मारभट ने पूछा.

"मैंने ऐसा आविष्कार किया है कि हजारों साल बाद भी लोग मुझे याद रखेंगे

. मैंने मनुष्यों को हजारोंसाल जीवित रहने का सूत्र खोज निकाला है." महान वैज्ञानिक महर्षि प्रयोगाचार्य जी नेरहस्योदघाटन किया.

"क्या? यह कैसे सम्भव है?" मैंने आश्चर्य से कहा.

"मैं विस्तार से समझाता हूँ." प्रयोगाचार्य जी नेकहना शुरू किया,"मानव को मृत्यु प्राप्ति कैसे होतीहै? पहले मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो."

"गुरूजी, आप ही ने हमें बताया है कि मानव शरीर छोटी छोटी कोशिकाओं से मिलकर बना होता है जो लगातार कार्यरत रहती हैं. कार्य करते करते इनकी क्षमता धीरे धीरे कम होती जाती है. और अंततः ये नष्ट हो जाती हैं. इनका स्थान नई कोशिकाएं लेती हैं और उनके साथ भी यही प्रक्रिया होती है. धीरे धीरे नष्ट होने वाली कोशिकाओंकी संख्या बढ़ने लगती है और नई कोशिकाओं की उत्पत्ति कम होने लगती है. यही बुढापे की शुरुआत होती है जिसका अंत मनुष्य की मृत्यु पर होता है." मैंने बताया.

"बिल्कुल ठीक. इसी परमैंने विचार किया कि यदि मानव शरीर में होने वाली समस्त क्रियाओं को रोक दिया जाए तो उसकी कोशिकाओं की क्षमता सदेव बनी रहेगी और वे कभी नष्ट न होंगी."

"किंतु मानव शरीर कीक्रियाएँ रोक देने पर वह जीवित कहाँ रहेगा?" मारभट ने पूछा.

"क्रियाएँ रोक देने पर वह मृत ज़रूर होगा, किंतु उसकी यह मृत्यु अस्थाई होगी.क्योंकि उसकी कोशिकाएं पहले की तरह शक्तिशाली बनी रहेंगी. मेरी एक विशेष प्रक्रिया उनकोशिकाओं को दोबारासक्रिय कर देगी. मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें दिखाता हूँकि यह सब कैसे होगा."

'महर्षि प्रयोगाचार्य ने हमचारों को साथ लिया और एक यटिकम पर बैठकर जंगल की तरफ़ बढ़ने लगे.' सियाकरण हजारों साल पुरानी दास्तान सुना रहा था जिसे प्रोफ़ेसर मुंह खोलकर ऑंखें फाड़े हुए सुन रहा था.

"एक मिनट!" प्रोफ़ेसर ने टोका, "यह यटिकम क्या बला है? "

"यटिकम एक विशेष डिब्बानुमा रचना थीजिसके नीचे गोल गोल चक्के लगे होते थे. इसे दो यल मिलकर खींचते थे. उसपर बैठकर हम एक जगह से दूसरी जगह प्रस्थानकरते थे."

"समझा!" प्रोफ़ेसर ने गहरी साँस लेकर सर हिलाया, "हमारी भाषामें तुम्हारे यटिकमको बैलगाडी कहते है. और यल को बैल कहते हैं."

"हो सकता है." सियाकरण ने आगे कहना शुरू किया,"महर्षि प्रयोगाचार्य जी हमचारों को लेकर जंगल पहुंचे और एक पहाडी में बनी सुरंग में प्रवेश कर गए. हमने देखा, गुरूजी ने पहाडी के अन्दर बहुत बड़ी प्रयोगशाला बना रखीथी, जिसमें बहुत सारे कमरे थे. यह सभीकमरे एक दूसरे से सुरंगों द्वारा जुड़े थे. वो हमें लेकर एक कमरे में पहुंचे जहाँ लोहे के चार दैत्याकार संदूक रखे थे.""ये संदूक, जो तुम लोग देख रहे हो, यही मेरा आविष्कार है." कहते हुए महर्षि ने दूर ज़मीन में गडा एक कीलनुमा पत्थर दबाया और चारों संदूक अपने आप खुलते चले गए.

 


महर्षि ने आगे बताना शुरू किया,"इन संदूकों में जब मानव को लिटाकर बंद किया जाएगा तो इनमें उपस्थित यंत्र एक विशेष प्रक्रिया द्वारा उस मानव को ताप प्रशीतन की अवस्था में पहुँचा देंगे, और वह अत्यधिक निम्न ताप पर शीत निद्रा की अवस्था में पहुँच जाएगा. इस अवस्था में उसके शरीर की समस्त क्रियायें रूक जाएँगी. उसका मस्तिष्क असंवेदनशील हो जाएगा और वहीँ से उसकी आयु स्थिर हो जायेगी. जब तक वह संदूक में बंद रहेगा, वाहय दुनिया से और स्वयं उसके भौतिक शरीर से उसका संपर्क पूरी तरह टूट जाएगा."

"और उसकी यह अवस्था कब तक रहेगी गुरूजी?" मारभट ने पूछा.

"जब तक कोई बहरी मनुष्य आकर उन संदूकों को खोलता नहीं. इसके लिए वह यहआलम्ब दबाएगा." महर्षि ने कीलनुमा पत्थर की ओर संकेत किया, "जब उस मनुष्य के शरीर का ताप किसी संदूक के अन्दर पहुंचेगा तो संदूक में उपस्थित ताप प्रशीतन की अवस्था समाप्त करने का यंत्र क्रियाशील होजाएगा. फ़िर चारों संदूकों के यंत्र एक विशेष प्रकार की ताप किरणें छोड़कर उन मानवों को पुनर्जीवित कर देंगे."

हम चारों आश्चर्य के साथ उनके इस अदभुत आविष्कार को देख रहे थे.

"अब तुम लोग सोच रहे होगे कि वह लोग कौन हैं जिन्हें इन संदूकों में लिटायाजाएगा. जो कई बरसों या शायद सैंकडों बरसों तक अस्थाई मृत्यु की अवस्था में इस कमरे में पड़े रहेंगे.......इन संदूकों की संख्या से शायद तुम कुछ अनुमान लगा सकते हो."महर्षि ने हमारी आँखों में झाँका.

संदूकों की संख्या चार थी और हम भी कुल चार थे. मामले को समझते ही हमारे शरीरों में एक सिहरन सी दौड़ गई. महर्षि का इरादा स्पष्ट था.

"तुम चारों मेरे सबसे होनहार शिष्यों में से हो. इसलिए यह अनुभव तुम्हारे ही शरीरोंको प्राप्त होगा. यह अनुभव बहुत बड़ा जोखिम भी है. हो सकताहै सैंकडों वर्षों में लोग यहाँ का रास्ता भूल जायें. यहाँ ये चारों संदूक हमेशा के लिए दुनिया की दृष्टि से दूर हो जायें. इसके बाद भी मुझे आशा है कि तुम लोग इसके लिए तैयार हो जाओगे." महर्षि ने आशा भरी दृष्टि से हमारी ओर देखा.

गुरूजी की आज्ञा हमारे लिए ईश्वर का आदेश थी. हम तैयार होगए. जिस दिन हम जीवितही अपने ताबूतों में जा रहे थे, स्वयंमहाराजा हमें विदाईदेने के लिए वहां तक आये. और उसके बाद हम एक लम्बी निद्रा में लीन हो गए

और जब दोबारा हमारी आंख खुली तो तुम लोग हमारे सामने थे. और शायद हजारों वर्ष बीत चुके हैं अबतक." सियाकरण ने अपनी दास्तान ख़त्म करकेजब प्रोफ़ेसर की तरफ़ देखा तो उसे सकते की हालत में पाया. ठहोका देकर जब उसे सामान्य हालत में लाया गया तो उसने सिर्फ़ इतना कहा, "मुझे मालूम न था कि पुराने समय में भी इतने महान वैज्ञानिक होते थे. हम लोग बेकार में आजकल के वैज्ञानिकों की बदाई किया करते हैं. मैं तो योगाचार्य जी के सामने धूल का फूल भी नहीं हूँ."जब प्रोफ़ेसर ने यह कहानी रामसिंह और शमशेर सिंह को सुनाई तो छूटते ही रामसिंह कहने लगा,"मैं तो पहले ही कह रहा था कि ये लोग भूतप्रेत हैं. भला कोई मनुष्य हजारों साल कैसे जिंदा रह सकता है. अब अच्छा यही होगा कि इन्हें यहीं छोड़कर किसी तरह भाग चलो. भाड़ में गया खजाना. घर चलकर आलू बेचने का धंधा कर लेंगे. थोड़ा बहुत पैसा तो मिल ही जायेगा."

"तुम लोग हमेशा गिराहुआ ही सोचोगे." प्रोफ़ेसर ने उन्हें घूरा,"किस्मत ने कितना अच्छा मौका दिया है हमें. ये प्राचीन युगवासी अब हमारे दोस्त बन चुके हैं. हम अब इन्हें थोड़ा मक्खन और लगाते हैं तो ये हमें प्राचीन खजाने का पता ज़रूर बता देंगे."

एक बार फिर तीनों लालच में आकर प्राचीन युगवासियों के साथ रहने पर तैयार हो गए.

एक दिन बातों ही बातों में प्रोफ़ेसर ने सियाकरण से पूछा,"तुम लोगों के पास खजाना तो अवश्य होगा."

"खजाना किसको कहते हैं?" सियाकरण ने पूछा.

"खजाना मतलब ऐसी चीज़ें जिससे लोग अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं."

"ओह! खजाना तो है मेरे पास." कहते हुए सियाकरण ने अपने सफ़ेद लबादे के अन्दर हाथ डाला. प्रोफ़ेसर के साथ मौजूद रामसिंह और शमशेर सिंह उत्सुकता के साथ उसके करीब आ गए.

सियाकरण ने जेब से कुछ सिक्के निकालकरप्रोफ़ेसर के हाथ पर रख दिए.

"ये सिक्के तो तांबेके हैं." प्रोफ़ेसर ने उलट पलट कर देखते हुए कहा.

"हमारे पास तो यही खजाना है." सियाकरण ने कहा.

"ओह!" तीनों ने मायूसी से सर हिलाया.

-----------------

"ये लोग तो हमारी तरह फक्कड़ निकले. भला तांबे के सिक्कों में आजकल क्या मिलेगा." रामसिंह ने मायूसी से कहा. इस समय वे एक पगडण्डी पर चल रहे थे. प्राचीन युगवासीउनके पीछे काफी फासले पर चले आ रहे थे.

"अब तो अच्छा यही होगा कि हम लोग इन्हें यहीं छोड़करनिकल लें." शमशेर सिंह ने राय दी.

"अरे वो देखो!" प्रोफ़ेसर ने सामनेइशारा किया. दोनों ने चौंक कर देखा, सामने एक रेलवे लाइन दिखाई दे रही थी.

"इसका मतलब कि हम लोग जंगल से बाहर आ चुके हैं." शमशेर सिंह ने कहा.

"यह क्या है?" पीछे मौजूद सियाकरण ने पूछा. अब तक प्राचीन युगवासी भी उनके पास आ चुके थे.

"यह पटरी है. जिसपर रेलगाडी चलती है." प्रोफ़ेसर ने बताया.

"रेलगाडी क्या होती है?" मारभट ने पूछा.

"रेलगाडी...यानी तुम्हारे ज़माने कीयटिकम." प्रोफ़ेसर ने समझाया. चारों युगवासियों ने इस प्रकार अपना सर हिलाया मानो प्रोफ़ेसर की बात समझ गए हों.

"अगर हम लोग इस लाइन के साथ चलें तो किसी छोटे मोटे स्टेशन तक पहुँच सकते हैं." प्रोफ़ेसर ने राय दी और फ़िर सभी उसके पीछे पीछे रेलवे लाइन की बराबर में चलने लगे.

जब ये लोग करीबी स्टेशन पर पहुंचे तो अच्छी खासी रात हो चुकी थी. कोई छोटा सा स्टेशन था ये जहाँ इक्का दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे. स्टेशन मास्टर से पूछने पर मालूम हुआ कि यहाँ दो रेलगाडियाँ रूकती हैं. उनमें से एक आधे घंटे के बाद आएगी और दूसरी सुबह चार बजे आती है. ये लोग प्लेटफार्म पर आ गए.

"हम लोग यहाँ क्यों आए हैं?" सियाकरण ने पूछा.

"अभी यहाँ यटिकम आकररुकेगी. जिसमें सवारहोकर हम लोग शहर जायेंगे." प्रोफ़ेसर ने बताया.

"अच्छा." सियाकरण ने सर हिलाया.

"जब तक यटिकम नहीं आती, हम लोग सो जाते है. बड़ी जोरों की नींद आ रही है." मारभट ने जम्हाई लेकर कहा. प्राचीन युगवासी होने के कारण उन्हें जल्दी सोने की आदत थी.

"ठीक है. तुम लोग सो जाओ. जब यटिकम आएगी तो हम तुम्हें जगा देंगे." जल्दी ही चारों प्राचीन युगवासियों के खर्राटे वहां गूंजने लगे.

"हमें एक बहुत सुनहरा मौका हाथ लगा है." रामसिंह ने कहा.

"कैसा मौका?" प्रोफ़ेसर ने पूछा.

"इनसे पीछा छुड़ाने का मौका. जैसे ही ट्रेन आएगी, हम इन्हें यहीं सोता छोड़कर निकल लेंगे."

"लेकिन!" प्रोफ़ेसर ने कुछ कहना चाहा लेकिन शमशेर सिंह ने फ़ौरन उसका मुंह दबा दिया, "बस, अब हम तुम्हारी कुछ न सुनेंगे. इन फक्कडोंके पास खजाना होता, तब भी कुछ सोचा जा सकता था. लेकिन ये तोज़बरदस्ती के पुछ्लग्गे चिपक गए हैं."

"ठीक है. जैसी तुम लोगों की मर्ज़ी." प्रोफ़ेसर ने ठंडी साँस ली और रेलवे लाइन पर लगे सिग्नल को देखने लगा जो फिलहाल लाल था.

------------

लगभग आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद गाड़ी आ गई और तीनों दोस्त उसमें सवार हो गए. दो मिनट स्टेशन पर रूकने के बाद गाड़ी चल दी और ये लोग प्राचीन युगवासियों से दूर होने लगे.

"खुश रहो ताबूत के जिन्नों, हम तो सफर करते हैं." रामसिंह ने किसी पुराने शेर की टांग खींची. प्लेटफोर्म पर चारों प्राचीन युगवासी नींद में डूबे पड़े थे इस बात से बेखबर की उनके कलयुगी दोस्त उनका साथ छोड़ रहे हैं"आज से हम कसम खाते हैं कि फ़िर कभी प्रोफ़ेसर देव के साथ खजाना खोजने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे." शमशेर सिंह और रामसिंह ने एक आवाज़ होकर कहा.

"मैं ख़ुद ही अब कभी खजाना खोजने नहीं निकलूंगा. ये काम तो मैं तुम दोनों की भलाई के लिए कर रहा था. ये दूसरी बात है की खजाने के नाम पर कुछ तांबे के सिक्के मिले जो उन ताबूत वासियों ने दिए. वैसे अब भी मेरा विचार है.". की यदि हम उन ताबूतों की ठीक तरह से तलाशी लेते तो कुछ न कुछ अवश्य मिलता."

शमशेर सिंह ने झपट कर प्रोफ़ेसर का गरेबान पकड़ लिया और गुर्राते हुए बोला, "अब अगर तुमने खजाने का नाम भी लिया तो मैं तुमको इसी चलती गाड़ी से बाहर फेंक दूँगा."

"अच्छा नही लूँगा. मैं तो अब अपने नए एक्सपेरिमेंट के बारे में सोचने जा रहा हूँ."

"कैसा एक्सपेरिमेंट?"मैं सोच रहा हूँ की क्यों न मैं भी ऐसी मशीन बनाऊं जैसी उस युग के वैज्ञानिक महर्षि प्रयोगाचार्य ने बनाई थी. और इस प्रकार हम अपने भविष्य में पहुंचकरवहां की दुनिया देखेंगे. ऐसी दुनिया जहाँ हर व्यक्ति के पास एक कंप्यूटर होगा जो उसका सारा कार्य करेगा. लोग अपनी छोटी यात्राएँ भी वायुयान से करेंगे. रेलगाडियां ध्वनि से भी तेज़ चलेंगी. हर लड़का टी.वी. द्वारा अपने स्कूल के संपर्क में रहेगा. और इस तरह घर बैठे शिक्षा प्राप्त करेगा. लोगों के घर आसमान से बातें करेंगे और उन घरों के ऊपर लगा एंटीना पूरे विश्व के प्रोग्राम रिकॉर्ड करके उन्हें दिखायेगा."

प्रोफ़ेसर पूरी तरहभविष्य की कल्पना में खो गया था.

"और अगर इसका उल्टा हो गया?" रामसिंह बोला, "यानी हर कंप्यूटर के पास एक नौकर व्यक्ति होगा, वायुयान छोटी यात्रायें करने के काबिल भी न रहेंगे - पेट्रोल की कमी के कारण. रेलगाडियां ध्वनि से तेज़ चलकर प्रकाश की गति से एक्सीडेंट करेंगी. हर लड़का टी. वी. द्वारा शहर के समस्त सिनेमाघरों के संपर्क में रहेगा और इस तरह घर बैठे फिल्मी हीरो बन सकेगा. आबादी इतनी ज़्यादा होगी की आसमान से बातें करते घर ज़मीन में भी मीलों धंसे रहेंगे लेकिन फ़िर भी लोग घरों की कमी के कारण बेकार पड़े हवाई जहाजों में निवास करेंगे." रामसिंह ने उतनी ही तेज़ी से प्रोफ़ेसरकी बातों की काट की जिस तरह छुरी मक्खन को काटती है.

"कुछ भी हो. मैं तो वहमशीन अवश्य बनाऊंगा.और उसमें तुम लोगों को बिठाकर भविष्य में भेजूंगा."

"बाप रे. तुम्हारे तोबहुत खतरनाक विचार हैं. हमें तो बख्श हीदो. वरना हम तो तुम्हारी मशीन में बैठकर भविष्य में जाने की बजाये भूत बनकर भविष्य से भी आगे भटकते फिरेंगे." शमशेर सिंह बोला.

"ठीक है. न जाओ तुम लोग भविष्य में. मैं स्वयं अपनी मशीन में बैठकर भविष्य की यात्रा करूंगा."

तो चले जाना. क्या हमलोग रोक रहे हैं. लेकिन पहले अपनी मशीन बनाओ तो." रामसिंह ने प्रोफ़ेसर को याद दिलाया की अभी उसकी मशीन केवल कल्पना के हवामहल पर है.

उसके बाद बाकी रास्ता खामोशी से तय हुआ. लगभग पाँच घंटे के बाद गाड़ी गौहाटी के प्लेटफार्म पर रुक चुकी थी. यहाँ ये लोगउतर पड़े. यहाँ से उनहोंने अपने शहर का टिकट लिया और शहर जाने वाली गाड़ी पर सवार हो गए. आधे घंटेके बाद वे लोग अपने शहर की ओर अग्रसर थे.उन लोगों ने तय तो करलिया था की अब कभी खजाने की खोज में नहीं निकलेंगे किंतु कब उनके दिमाग पलट जाते इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता था.

--------------

गाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनकर सबसे पहले चोटीराज की आँख खुली. यह सुबह चार बजे वाली गाड़ी थी. चोटीराज अपने बाकी साथियों को जगाने लगा. कुछ ही देर में सब ऑंखें मलते हुए उठ बैठे.

"वह देखो यटिकम. इस युग का हमारा मित्र कह रहा था कि इसी मेंहम लोगों को बैठना है." चोटीराज ने उन्हें याद दिलाया.

"हाँ कहा तो था. किंतु वे लोग गए कहाँ?" मारभट ने चौंक कर कहा.

"मेरा विचार है कि वे लोग यटिकम में होंगे. चलो हम भी उसके अन्दर चलते हैं. किंतु यह यटिकम बड़ी विचित्र है. कितनी बड़ी है. कितने सारे लोग इसमें बैठे हैं. इसे कितने यल मिलकर खींचते होंगे." चीन्तिलाल ने आश्चर्य से कहा.गाड़ी अब तक खड़ी थी. वे लोग उसकी तरफ़ बढ़ने लगे. फ़िर एक डिब्बे में जाकर बैठ गए. यह कोई धीमी पैसेंजर गाड़ीथी. क्योंकि इसमें यात्री बहुत कम थे और जिस डिब्बे में ये लोग बैठे थे वह पूरी तरह सुनसान पड़ा था. वैसे अगर इस डिब्बे में कोई अन्य यात्री होता तो वह एक बार अवश्य इन लोगों को आश्चर्य से देखता. और इसका कारण होता इनका लबादा और सात फुट की ऊँचाई.

गाड़ी अब रेंगने लगी थी. फ़िर उसने धीरे धीरे स्पीड पकड़नी शुरू कर दी. इस चक्कर में उसके डिब्बे कुछ हिलने लगे.

"अरे यहाँ तो भूकंप आ रहा है. जल्दी से बाहर निकलो." चीन्तिलाल ने घबरा कर कहा.

"यह भूकंप नहीं है, बल्कि यटिकम चलने लगी है. क्या तुम्हें याद नहीं की हमारे युग की यटिकम जब चलती थी तो हिलती थी." मारभट ने समझाया.

"सही कह रहे हो. वास्तव में यटिकम ही चल रही है. बात यह है की हमारे युग के मकान इसी प्रकार बने थे अतः मैं समझा की अपने मकान में बैठा हूँ." चीन्तिलाल ने कहा.

इनकी इन्हीं बातों के बीच आधा घंटा बीत गया. फ़िर ट्रेन धीमी होने लगी. शायद कोई स्टेशन आ रहा था.फ़िर वह रूक गई. इस स्टेशन से कुछ यात्री इनके डिब्बेमें भी चढ़े और साथ में टी.टी. भी.

"आप लोग अपना टिकट दिखाइये." टी.टी. ने इन लोगों से कहा. टी.टी. की पूरी बात ये लोग समझ ही नहीं पाये. क्योंकि प्रोफ़ेसर इत्यादि जब इनसे बोलते थे तो आधी अपनी भाषा और आधी इनकी भाषा मिलकर बोलते थे. जबकि टी.टी. ने शुद्धहिन्दी में इनसे टिकट माँगा थाये क्या कह रहा है?" सियाकरण ने मारभट की ओर देखकर पूछा.

"शायद यह कुछ मांग रहा है.

 


शायद यह कुछ मांग रहा है." मारभट ने टी.टी. का फैला हाथ देखकर अनुमान लगाया.टी.टी. ने एक बार फ़िर इनसे टिकट माँगा.

"ये टिकट क्या होता है?" मारभट ने टूटी फूटी हिन्दी में उससे पूछा.

टी.टी. को शायद इनसे ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी. अतः वह इनकामुंह देखने लगा. फ़िर बोला, "गाड़ी में बैठ गए और यही नहीं पता की टिकट क्या होता है. क्या दूसरी दुनिया में रहते हो? मैं कहता हूँ चुपचाप टिकट निकालो वरना अन्दर करवा दूँगा." इसी के साथ ही उसने संकेत किया और दो रेलवे कांस्टेबिल उनके पास आकर खड़े हो गए.

"ये तो क्रोध में मालुम हो रहा है. आख़िर ये क्या मांग रहा है?" चोटीराज ने कहा.

"मेरा विचार है की यह याटिकम का मालिक है, और हमसे मुद्राएँ मांग रहा है. अपने यल को चारा खिलाने के लिए."

सियाकरण ने अपना थैला उठाया और उसे खोलने लगा. टी.टी. ने यह समझ कर कि वह टिकटनिकाल रहा है बोला,"जब पुलिस देखी तो होश ठिकाने आ गए. आगेसे किसी सरकारी आदमी के साथ मज़ाक मत करना." उसे क्या पता था कि इन प्राचीन युग्वासियों को मज़ाक का अर्थ भी नहीं मालूम. सियाकरणने अपने थैले से दो तीन मुद्राएँ निकालीं और टी.टी. कीओर बढ़ा दीं.

तांबें की मुद्राएँदेखकर टी.टी. का पाराफ़िर चढ़ गया. वह बोला, "बहुत हो चुका. अब अगर तुम लोगों को सबक न सिखाया तो मेरा नाम भी राम खिलावन नहीं. सिपाहियों, इन पर निगरानी रखो. अगले स्टेशन पर इन्हें उतार कर जेल भिजवा देना." वह सिपाहियों से बोला. "यह तो क्रोध में मालूम हो रहा है. क्या बात हो गई?" सियाकरण टी.टी. की ज्वालामय मुख मुद्रा देखकर मारभटसे चुपके से बोला.

"मेरा विचार है कि तुमने उसे मुद्राएँकम दी हैं. थोडी और दे दो." मारभट ने सुझाया.

"ठीक है. मैं और दे देता हूँ." सियाकरण थैले से और मुद्राएँ निकलने लगा किंतु इतनी देर में टी.टी. इन लोगों को सिपाहियों की निगरानी में देकर दूसरी तरफ़ चला गया था.

अतः सियाकरण को दुबारा मुद्राएँ थैले में रख देनी पड़ीं.

उधर एक सिपाही उनके लबादे को देखकर बोला, "क्यों बे, कपड़े तो सन्यासियों वाले पहन रखे हैं और यात्रा बिना टिकट करता है!"

इन लोगों की समझ में उसका एक भी शब्द नहीं आया और ये उसका मुंह देखने लगे.

"क्यों बे, ये भोले लोगों की तरह मुंह क्या देख रहा है. क्या किसी दूसरी दुनिया से आया है!" दूसरे सिपाही ने डपट कर कहा.

ये लोग अब भी उसकी बात नहीं समझे. अंत में मारभट ने टूटी फूटी हिन्दी में कहा, "हम लोग प्राचीन युग से आये हैं अतः आपकी बात नहीं समझ पा रहे है."

"क्या? कौन से शहर से? यह चीनुग कौन सा शहर है? इस रूट पर तोनहीं है."

"कहीं ये चीन तो नहीं कह रहे हैं?" दूसरे ने अनुमान लगाया.

"हे ईश्वर! तुम लोग चीन से बिना टिकट यात्रा करते हुए यहाँ आ रहे हो. तब तो बहुत खतरनाक मुजरिमहो तुम लोग." वह एकदम सीधा सावधान होकर बैठ गया. हाथ अपने होलेस्टर पर रख लिया मानो उन चारों के हिलते ही उनपर गोली चला देगा.

गाड़ी एक बार फ़िर रूक गई. क्योंकि फ़िर से कोई स्टेशन आ गया था. सिपाहियों ने इनसे कहा, "उतरो तुम लोग."

सिपाहियों का हुक्मइनकी समझ में आ गया. वे लोग वहीँ ट्रेन से उतर गए. दोनों सिपाही इनकी बगल में चल रहे थे और साथही उन्हें रास्ता भी बताते जा रहे थे.

"इस युग के लोग कितने अच्छे हैं. हम लोगों को रास्ता बता रहे हैं ताकि कहीं हम लोग रास्ता न भूल जाएँ." चीन्तिलाल ने खुश होकर कहा.

"सही कहा तुमने. हम लोग घूमने फिरने के बाद इन्हें अवश्य धन्यवाद देंगे." मारभट ने कहा.

कुछ देर बाद ये लोग पुलिस स्टेशन में थे. यहाँ के लोगों कोएक ही प्रकार की वर्दियां पहने देखकर इन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ.

"ये लोग एक ही प्रकार के कपड़े क्यों पहने हुए हैं?" चीन्तिलाल ने आश्चर्य से पूछा.

"हाँ यह बात तो है. होसकता है इस युग में रास्ता बताने वाले इसी प्रकार के कपड़े पहनते हों. हमारे युग में भी तो बच्चे खिलाने वाले एक ही प्रकार के कपड़े पहनते थे." चोटीराज ने कहा.

उधर सिपाहियों ने जब थानेदार को बताया की ये लोग बिना टिकट यात्रा कर रहे थे तो उसने इनको हवालात में बंद करने का हुक्म दिया. फ़िर ये लोग लाकअप में पहुँचा दिए गए जहाँ पहले से एक मोटा तगड़ा व्यक्ति बैठा हुआ था.

"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अभी तक तो ये हमें घुमा रहे थे और अब कोठरी में बंद कर दिया." चोटीराज बोला.

"इस कोठरी को शायद हवालात कहते है." मारभट ने कहा. उधर जब थानेदार को पता चला कि ये लोग चीन की सीमा पार करके आ रहे हैं तो वह एकदम से हडबडा करउठ खड़ा हुआ और बोला, "ये तो बहुत खतरनाक हैं. इन्हें तो फ़ौरन जेल में शिफ्ट कर दो. मुकदमाबाद में चलता रहेगा."

एक बार फ़िर कुछ सिपाही हवालात पहुंचे और उन्हें निकालने के लिए ताला खोलने लगे. अभी वे ताला खोल ही रहे थे कि बाहर गोलियां चलने कि आवाज़ सुनाई दी. वे सिपाही बाहर भागे. जैसे ही वे थानेदार के कमरे में पहुंचे

, पाँच छः नकाबधारी व्यक्तियों के हाथों में दिख रही पिस्तौलों ने उन्हें हाथ ऊपर करने पर मजबूर कर दिया. उन व्यक्तियोंने थाने के सभी लोगों को अपनी पिस्तौलों से कवर कर लिया था.

"क्या बात है? तुम लोग हमसे क्या चाहते हो?" थानेदार ने उनसे पूछा.

"तुम्हारे लाकअप में हमारा साथी बंद है. हम उसे छुड़ाने आए हैं." उनमें से के व्यक्ति बोला.

"ओह! तो तुम लोग बैंक डकैती वाले गिरोह के आदमी हो."

"तुमने सही पहचाना." फ़िर उस व्यक्ति ने अपने साथी को लाकअप खोलकर बंद साथी को लाने के लिए कहा. उसने सिपाहियों से कुंजी ली और लाकअप की ओर चला गया. फ़िर जब कुछ देर के बाद वहवापस आया तो उसके साथ उसके साथी के साथ चारों प्राचीन युगवासी भी थे.

"ये किन कार्टूनों को पकड़ लाये?" वह व्यक्ति जो थानेदारसे बात कर रहा था और शायद उनका सरदार भी था, बोला.

"बॉस, ये हमें लाकअप में बंद मिले थे." उस व्यक्ति ने जवाब दिया.

"ठीक है. फ़िर आज हम भी थोड़ा पुण्य कम लेते हैं." कहते हुए वह व्यक्ति चारों प्राचीन युगवासियों से बोला, "तुम लोग यहाँ से भाग जाओ."

मारभट इत्यादि उसकीबात सुनकर बाहर जाने लगे.

"ये तुम लोग क्या कर रहे हो? ये बहुत खतरनाक मुजरिम हैं." थानेदार ने अपनी कुर्सी से उठने की कोशिश की.

"चुपचाप बैठे रहो. वरना गोली अन्दर और भेजा बाहर होगा." सरदार ने फ़िर थानेदार को बिठा दिया. कुछ देर बाद जबमारभट इत्यादि उनकीनज़रों से गायब हो गए तो वे लोग भी अपनेसाथी को लेकर बाहर निकल गए.

"अगर मैंने उस बैंक डकैत और चारों मुजरिमों को दुबारान बंद कराया तो मेरा नाम भी थानेदार शेरखान नहीं. तुम लोग मेरा मुंह क्या देख रहे हो. जाओ ढूँढो उन लोगों को." वह अपने सिपाहियों पर दहाड़ा और सिपाही जल्दी जल्दीबाहर निकल गए. उसके बाद थानेदार स्वयं अपनी कैप उठाकर बाहर निकल गया.

---------------

"अरे मेरा पर्स." एक महिला चिल्लाई क्योंकि उसका पर्स एक उचक्का लपककर भागने लगा था. फ़िर कई लोग उस उचक्के के पीछे दौड़ पड़े. इन लोगों में एक व्यक्ति भी था जिसने अपनी कार अभी अभी वहां खड़ी की थी.और इस हड़बड़ी में वह कार की कुंजी इग्निशन में ही लगी छोड़ गया था.

चारों प्राचीन युगवासी अब थाने से काफी दूर सड़क पर निकल आए थे. फ़िर उनकी दृष्टि बिना छत की एक स्पोर्ट्स कार पर पड़ी जो वहीँखड़ी थी. यह वही कार थी जिसको उचक्के के पीछे भागने वाले व्यक्ति ने छोड़ा था.

"यह क्या है?" चोतिराज ने आश्चर्यसे पूछा.

"मैं बताता हूँ. यह यटिकम है." सियाकरण ने कहा.

"यह तुम कैसे कह सकते हो? क्योंकि इसमें यल तो हैं नहीं." मारभट ने अपनीशंका प्रकट की.

"क्या तुमने सामने नहीं देखा. वहां कई लोग यटिकम में बैठकर यात्रा कर रहे हैं. सियाकरण ने सड़क की और संकेत किया. जहाँ समय समय पर कोई कार निकल जाती थी.

"तुम सही कह रहे हो. किंतु यह चलेगी कैसे?" मारभट एक बार फ़िर दुविधा में फंस गया.

"आओ हम लोग इसमें बैठते हैं. तभी कुछ पता चल पायेगा." सियाकरण ने कहा. फ़िर वे कार के अन्दर बैठ गए और उसका तियापांचा करने लगे. कभी वे लोगस्टीयरिंग घुमा रहेथे तो कभी डैश बोर्ड के साथ छेड़खानी कर रहे थे. काफ़ी देर प्रयत्न करने के बाद जब ये लोग थक हारकर उतरने की सोच रहे थे तभी चीन्तिलाल बोल उठा,

"तुम लोग अपनी बुद्धि मत गंवाओ . मुझे यटिकम चलाने की तरकीब समझ में आ गई है."

"तो फ़िर जल्दी बताओ." सियाकरण ने कहा.

"वो सामने देखो. वे लोग किस प्रकार यटिकम चला रहे हैं." चीन्तिलाल ने एक ओर संकेत किया और वे सभी उस दिशा में देखने लगे.

-----------------

"कमबख्त स्टार्ट ही नहीं हो रही है. कितनी बार मैंने मालिक से बैट्री चार्ज करवाने के लिए कहा. किंतु वे ध्यान ही नहीं देते."कार में बैठा व्यक्ति जो की उसका ड्राइवर था बडबडाया.एक बार फ़िर उसने कार स्टार्ट करने की कोशिश की किंतु कोई फायदा नहीं हुआ. आख़िर में उसने खिड़की से सर निकाल कर पुकारा, "भाइयों, ज़रा इसमें धक्का लगा दो, बड़ी मेहरबानी होगी."

फ़िर चार पाँच लोकसेवक वहां आ गए ओर कार में धक्का लगाने लगे. धक्का लगाते लगाते वे लोग दूसरी सड़क पर पहुंचकर उन प्राचीनयुगवासियों की नज़रों से ओझल हो गए.

और फ़िर दूर कहीं जाकर कार स्टार्ट हो गई.

----------------

"ओह! तो यह तरकीब थी यटिकम चलाने की. चीन्तिलाल तुम और चोटीराज पीछे से इसे धक्का दो. मैं पहले ही कह रहा था कीयदि इस यटिकम को यल नहीं खींचते तो इसी विधि से यह चलनी चाहिए." सियाकरण ने कहा.

फ़िर सियाकरण और मारभट कार की अगली सीट पर बैठ गए और चीन्तिलाल और चोटीराज उसे धक्का लगाने लगे.

"बहुत अच्छी यटिकम है. कितने आराम से चलरही है." मारभट ने सीट से पीठ टिकाते हुए कहा.

"किंतु इसमें एक कमीहै की यह मनुष्य द्बारा चलाई जाती है. यदि इसे यल चलातेतो बहुत अच्छा होता."सियाकरण ने कहा. तभी कार का स्टार्टिंग लीवर दब गया और वह स्टार्ट हो गई.

"यह तो बोल रही है." सियाकरण ने आश्चर्यसे कहा. चोटीराज और चीन्तिलाल अभी तक कार को धक्का दिए जा रहे थे. मारभट जो कि स्टीयरिंग पर बैठा था अचानक उसका पैर एक्सीलरेटर पर पड़ गया और कर एक झटके केसाथ आगे बढ़ गई.

चोटीराज और चीन्तिलाल धडाम से मुंह के बल आगे की ओरगिरे.

"क्या हम लोगों ने ज्यादा ज़ोर से धक्का लगा दिया?" चोटीराज उठकर अपना सर सहलाते हुए बोला.

"ऐसी कोई बात नहीं है. बल्कि वह अपने आपचलने लगी लगी." चीन्तिलाल इत्मीनान से बोला.

"अरे तो उसे पकडो. वरना हम बिछड़ जायेंगे." चोटीराज कार के पीछे दौड़ा. चीन्तिलाल ने उसका अनुसरण किया. किंतु वे कार का मुकाबला कहा कर पाते. कुछ ही देर मेंकार उनकी नज़रों से ओझल हो गई..

कुछ ही देर में कार उनकी नज़रों से ओझल हो गई और वे हाथ मलते रह गए."ओ चीन्तिलाल, तुम लोग तो इस यातिकम कोबहुत तेज़ चलाने लगे. कहीं यह किसी से टकरा न जाए." मारभट ने पीछे देखे बिना कहा. जब पीछे से कोई जवाब न आया तो उसने मुड़कर देखा, "अरे वे लोग कहाँ चले गए?"

सियाकरण ने भी पीछे मुड़कर देखा. फ़िर किसी को न पाकर उनके मुंह खुले रह गए.

"वे लोग कहाँ गए? और यह यटिकम कैसे चल रही है?" सियाकरण ने हैरत से कहा.

"यह तो बाद में सोचना कि यह कैसे चल रही है. पहले इसे रोको वरना सामने जो बड़ी यटिकम है उससे यह टकरा जायेगी." सामने से आ रही एक मिनी बस को देखकर मारभट ने कहा.

"किंतु जब तक यह न मालुम हो जाए कि यह कैसे चल रही है, हम इसको कैसे रोक सकते हैं?"

---------------

"कंडक्टर जी, ज़रा माचिस देना बीड़ी सुलगानी है." बस के ड्राइवर ने पीछे सर घुमाकर कहा.

"दे रहा हूँ. किंतु तुम सामने देखो वरना कोई एक्सीडेंटकर बैठोगे." कंडक्टर ने जेब से माचिस निकालते हुए कहा.

"अरे मैं पिछले बीस सालों से बस चला रहा हूँ. अब तो आँख बंद करके भी बस चला दूँ तो यह सरपट अपने रास्ते पर दौड़ पड़ेगी...........!" ड्राइवर अकड़ कर बोला. उसी समय उसकी दृष्टि सामने पड़ी.

"अरे बाप रे. .....यह कौनपागल कार चला रहा है." उसने जल्दी से बस किनारे की और प्राचीन युगवासियों की कार बस से रगड़ खाती हुई निकल गई.

बचते बचते भी बस एक पेड़ से हलकी सी टकरा गई थी. और अब पेड़ पर निवास करने वाले कौवे चीख चीख कर बस के ड्राइवर को कोस रहे थे.

--------------

ये लोग जितना कार को रोकने का प्रयत्न कर रहे थे उतनी ही कार की गति बढती जा रही थी. क्योंकि मारभट का पैर एक्सीलरेटर पर से हट ही नहीं रहा था.

"जब तक हमें यह न मालूम हो जाए की इस यटिकम के यल कहाँ हैं, हम इसको नहीं रोक सकते." सियाकरण ने कहा.

"इसके यल लगता है आगे अन्दर छुपे बैठे हैं." मारभट ने कार के बोनट की ओर संकेत किया.

फ़िर इन्होंने बोनटके अन्दर छुपे बैलों को पुचकारना शुरू कर दिया, किंतु वे उसी तरह अड़ियल रूख अपनाए रहे और कार अपनी गति से भागती रही. इस सड़क पर अधिकतर सन्नाटा रहता था वरना अब तक कई एक्सीडेंट हो चुके होते.

 


--------------

इंसपेक्टर शेरखान अपनी मोटरसाइकिल पर'चीनी भगोड़ों' को ढूंढते ढूंढते बहुतदूर निकल आया था. फ़िर अचानक उसकी मोटरसाइकिल बंद हो गई. उसने पेट्रोल बताने वाली सुई पर नज़र डाली तो वह शून्य पर रुकी थी.

"ओह, न जाने मेरी भूलने वाली आदत कब जायेगी. मुझे आज पेट्रोल डलवाना था. अब क्या करुँ." तभी उसे सामने से एक कार तेज़ गति से आती दिखाई दी.

"ओह! वह कार तो बहुत तेज़ आ रही है. मैं अपनी मोटरसाइकिल किनारे कर लूँ." वह नीचे उतर कर मोटरसाइकिल किनारे करने लगा. लेकिन उससे पहले ही कार पूरी स्पीड के साथ मोटरसाइकिल से आकर टकरा गई. वह तो छिटक कर दूर जा गिरा और मोटरसाइकिल हवा मेंकलाबाजियां खाती हुई कार की पिछली सीट पर जाकर विराजमान हो गई.

"अरे मेरी मोटरसाइकिल लेकर चोर भाग रहे हैं. कोईपकडो उन्हें." वह चीखता हुआ कार के पीछे भागा. फ़िर चौंक पड़ा, "मैंने शायद इन लोगों को कहीं देखा है. याद आया, ये तो वही चीनी भगोडे हैं. उन्हें तो तुंरत पकड़ना चाहिए. मेरी मोटरसाइकिल कहाँ गई." वह इधर उधर अपनी मोटरसाइकिल देखने लगा और जब उसे याद आया की मोटरसाइकिल भी उन लोगों के साथ चली गई तो वह अपना सरपकड़कर वहीँ बैठ गया.

-------------

"मारभट, अभी हमारे पीछे कोई आवाज़ आई थी."

"पीछे देखो, क्या है?" मारभट ने कहा. सियाकरण ने घूमकर देखा तो वहां एक मोटरसाइकिल खड़ी थी.

"अरे यह क्या है? और कहाँ से आ गया?" उसनेआश्चर्य से कहा.

मारभट ने भी पीछे मुड़कर देखा और बोला, "यह कैसा युग है? अभी वहां कुछ नहीं था अब कुछ आ गया. क्या यहाँ वस्तुएं आसमान से टपकती हैं? सियाकरण तुम पीछे जाकर देखो की वह क्या चीज़ है."

सियाकरण कूदकर पीछेचला गया. कुछ देर तक ध्यान से उसको देखता रहा फ़िर बोला, "मेरा विचार है की यह इस यटिकम कायल है.

इसके सर पर दो सींगें भी हैं. किंतु यह तो बिल्कुल हिलडुल नहीं रहा है."

"बेचारे ने इतनी तेज़ यटिकम चलाई कि थक कर मर गया." मारभट ने दुःख प्रकट किया.

"किंतु यटिकम तो अभीभी चल रही है."

"हो सकता है कोई और भी यल हो. हमारे युग में भी तो दो यल एक यटिकम को खींचते थे."

कार की गति अब धीमी होने लगी थी क्योंकि मारभट का पैर एक्सीलरेटर पर से हट गया था.

----------------

"वे लोग तो पता नहीं कहाँ निकल गए. अब हम लोग क्या करें?" चोटीराज ने कहा. वे लोग बहुत देर से अपने दोनों साथियोंको ढूंढ रहे थे जो कार में बैठकर निकल गए थे.

"आओ फ़िर हम दोनों अकेले ही यह युग घूमते हैं. हम लोगों को यटिकम में जो मनुष्य मिले थे वह बहुत दुष्ट थे. हमें कोठरी में बंद कर दिया था. अब हम उनके सामने नही जायेंगे." चीन्तिलाल बोला.

फ़िर वे आगे बढे. यह कोई बाज़ार था और वहां काफ़ी चहल पहल थी. फ़िर वे चलते चलते एक दूकान के सामने रूक गए जहाँ एक रेडियो रखा हुआ पूरे वोल्यूम में गला फाड़ रहा था.

"घोर आश्चर्य." चीन्तिलाल बोला,"इतने छोटे डिब्बे में एक मनुष्य बंद हो गया."

"इतना छोटा मनुष्य तो न हमने अपने युग में देखा न इस युग में." चोटीराज ने हैरत से कहा.

"किंतु उसे डिब्बे में क्यों बंद कर दिया गया? वह तो चिल्ला रहा है."

"आओ, उन लोगों से पूछते हैं जो वहां बैठे हैं." फ़िर वे लोग दुकान में पहुंचे. चीन्तिलाल ने पूछा, "तुम लोगों ने उसे बंद क्यों कर दिया?" यह शब्द उसने अपनी भाषा में कहे थे.

"ये कोई अजीब भाषा बोल रहे हैं. अभी हमने जिस चोर को दुकान के अन्दर बंद किया है वह भी अजीब भाषा बोल रहा था. लगता है ये लोग उसके साथी हैं." दूकानदार बोला, फ़िर अपने साथियों को संबोधितकिया, "इन्हें पकड़कर खूब मारो और फ़िर इन्हें भी उस चोर के साथ बंद कर दो."

दूकानदार के साथी आगे बढे और इनपर पिल पड़े.

"अच्छा, एक तो बेचारे को डिब्बे में बंद कर दिया, फ़िर कुछ बोलने पर मारते हो. अभी बताता हूँ." चोटीराज और चीन्तिलाल भी हाथ पैर चलाने लगे. फ़िर इन लोगों के सामने कलयुगी मानवों की एक न चली और कुछ ही देर में वे सब लंबे लेटे नज़र आए. चोटीराज ने रेडियो उठाया और दोनों दूकान के बाहर आ गए.

"अरे मेरा रेडियो!" दूकानदार चिल्लाते हुए उनके पीछे दौड़ा किंतु दूकान से बाहर निकलने की उसकी हिम्मत नहीं हुई. और बडबडाते हुए वापस लौट गया.

उधर चीन्तिलाल चोटीराज से बोला,"डिब्बा खोलकर उस व्यक्ति को जल्दी से आजाद करो. वह बहुतदेर से चिल्ला रहा है."

"किंतु यह खुलेगा किस प्रकार? यह तो हर ओर से बंद है." चोटीराज ने डिब्बे को उलट पलट कर देखते हुए कहा.

"मैं बताता हूँ की किस प्रकार खुलेगा." चीन्तिलाल ने रेडियो पर एक हाथ जमाया और वह दो टुकडों में बँट गया

"इसमें तो कोई भी नहीं है." चोटीराज नेअन्दर का अंजर पंजर देखते हुए कहा.

"हाँ, वह मनुष्य कहाँ गया?"

"शायद वह स्वर्गवासी हो गया. तुम्हें डब्बा धीरेसे खोलना चाहिए था." चोटीराज ने चीन्तिलाल को घूरा.

"बेचारा." दोनों ने एक ठंडी साँस ली और रेडियो का कबाड़ वहीँ छोड़कर आगे बढ़ गए.

------------------

कार अब पूरी तरह रूकगई थी.

"यटिकम तो रूक गई. क्या कारण है?" मारभट ने पूछा.

"शायद दूसरा यल भी थक गया है." सियाकरण ने कहा. फ़िर वे कार से उतर गए और इधर उधर देखने लगे. यह एकसुनसान स्थान था, किंतु पूरी तरह नहीं. क्योंकि यहाँ एक बड़ी इमारत दिख रही थी. जो शायद कोई फैक्ट्री थी. उसकी बाहरी बनावट से ऐसा ही लग रहा था.

"वो देखो, सामने कोई मकान है. आओ हम लोग वहां चलते हैं." सियाकरण ने कहा. फ़िर वे दोनों फैक्ट्री की ओर जाने लगे.

"मेरे तो अब भूख लग रही है. वहां भोजन तोमिलना ही चाहिए." मारभट ने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा.

"आओ चल कर देखते हैं."

फ़िर जैसे ही वे फैक्ट्री के पास पहुंचे, दो पहरेदारों ने उन्हें रोक लिया. तभी अन्दर से दो व्यक्ति निकले और उनमें से एक कहने लगा, "आइये सर, आपका यहाँ स्वागत है. मैं यहाँ का प्रबंधक गुप्ता हूँ. और ये मेरा सहायक रामप्रकाश है." वह इनदोनों को अन्दर ले जाने लगा और उसके सहायक ने पहरेदारोंसे कहा, "मी.गुप्ता को आज एक फोन काल से मालुम हुआ था की आज कुछ सरकारी अफसर इस फैक्ट्री का निरीक्षण करने आ रहे हैं. उनका विचार है कि ये वही अफसर हैं."

उधर गुप्ता दोनों से कह रहा था, "आइये सर, आपको हमारी फैक्ट्री में कोई अनिमियतता नहीं दिखेगी. यहाँ हम साबुन के अलावा डिटर्जेंट पाउडर औरशेविंग क्रीम भी बनाते हैं. हमारी फैक्ट्री अच्छी चल रही है. बस केवल आप अच्छी सी रिपोर्ट तैयार कर दीजिये. आपके मालपानी की हमारी पूरी ज़िम्मेदारी है." अन्तिम वाक्य गुप्ता ने धीरे से कहा था.

"क्या यहाँ कुछ खानेको मिल सकता है?" सियाकरण को बहुत जोरों की भूख लग रही थी.

"अरे क्यों नहीं, क्यों नहीं. सब कुछ आप ही का तो है. बस आपहमारे फेवर में एक अच्छी सी रिपोर्ट तैयार कर दीजिये. फ़िर आप जो कुछ कहेंगे, हम हाज़िर कर देंगे." गुप्ता सियाकरण की बात का कुछ और ही मतलब समझा.

वे तीनों कुछ देर मौन खड़े रहे फ़िर मैनेजर ही दुबारा बोला, "आइये सर, पहले आप फैक्ट्री का निरीक्षण कर लीजिये." उसने उनको अपने पीछे आने का इशारा किया और वे बिना कुछ समझे उसके पीछे चल पड़े.

फ़िर वह फैक्ट्री दिखाने लगा जहाँ विभिन्न प्रकार के कार्य हो रहे थे. कहीं साबुन बनाया जा रहा था, कहीं मशीनसे ठोस साबुन की टिकियाँ काटी जा रही थीं तो कहीं डिटर्जेंट पाउडर बनरहा था. वे लोग घुमतेहुए वहां भी पहुंचे जहाँ साबुन की पैकिंग हो रही थी.

"आप स्वयें देख लीजिये, की यहाँ केवल साबुन पैक हो रहा है. हम लोग अफीम इत्यादि का व्यापारबिल्कुल नहीं करते." उसने इन्हें पैकिंगदिखाई.

सियाकरण और मारभट ने एक दूसरे की तरफ़ देखा. उनकी समझ में मैनेजर की बात बिल्कुल नहीं आई.

"देख क्या रहे हो, एक तुम लो और एक मैं लेता हूँ." सियाकरण ने कहा. और एक टिकियामुंह में उठाकर रख ली. मारभट ने भी उसकीदेखा देखी एक टिकिया मुंह में रख ली.

"यह कैसा भोजन है. इस युग में तो लोग अजीब भोजन करते हैं." सियाकरण ने बुरा सा मुंह बनाया."हाँ, यह तो बहुत बेकार है. किंतु पेटतो भरना ही पड़ेगा. यह टुकड़ा तो पूरा खा ही जाओ." फ़िर दोनों ने मुंह बना बना कर साबुन की टिकियाँ गटक लीं. गुप्ता हवन्नक होकरदोनों की शक्लें देख रहा था.

"अजीब अधिकारी हैं ये लोग. आज तक किसी ने मेरी फैक्ट्री का इस तरह निरीक्षण नहीं किया." वह सर खुजलाते हुए बडबडाया.

"आओ, हम लोग यहाँ से चलते हैं. यहाँ के भोजन से तो अच्छा है की हम पेड़ों के फल तोड़कर खा लें." मारभट ने कहा और दोनों वापस मुड़ लिए. "अरे सर, आप लोग कहाँ जा रहे हैं? ये तो बताते जाइए की आप अपनी रिपोर्ट कैसी बनायेंगे? मैं आपकी हर प्रकार की सेवा करने के लिए तैयार हूँ. अरे सुनिए तो." मैनेजर पुकारते हुएइनके पीछे भागा किंतु इन्होने उसकीएक न सुनी और फैक्ट्री से बाहर आ गए.

"मूड ख़राब कर दिया कमबख्तों ने." उन लोगों के जाने के बाद गुप्ता बडबडायाफ़िर पहरेदारों से बोला, "अब कोई भी आए उसे फैक्ट्री के अन्दर मत घुसने देना." कहकर वह तेज़ क़दमों से चलता हुआ अन्दर चला गया.

कुछ देर बाद दो व्यक्ति वहां पहुंचे और अन्दर जाने लगे.

"आप अन्दर नहीं जा सकते." पहरेदारों ने उन्हें रोका.

"क्यों? हमारे पास इस बात का आज्ञापत्र है कि हमें फैक्ट्री के अन्दर जाने दिया जायेगा. हम लोग इसका निरीक्षण करने आए हैं."

"हमारे मैनेजर कि सख्त आज्ञा है कि किसी को अन्दर न आने दे.

आप लोग बिल्कुल अन्दर नहीं जा सकते." पहरेदार अपनी बात पर अडे रहे.

फ़िर उनमें बहस होने लगी. और यह बहस तब तक चली जब तक उन अफसरों का पारा सौ डिग्री सेंटीग्रेड तक न पहुँच गया. उसी समय गुप्ता किसी काम से बाहर आया और उन लोगों को लड़ता देखकर उसने मामला समझना चाहा. फ़िर जब उसे यह मालूम हुआ कि ये लोग सरकारी अफसर हैं और फैक्ट्री का निरीक्षण करने आए हैं तो वह एक बार फ़िर चकरा कर रह गया.

उसने अपने को संभाला और बोला,"आइये सर! इन पहरेदारों से भूल हो गई है. आप लोग फैक्ट्री का निरीक्षण करिए."

"हम लोग फैक्ट्री.कानिरीक्षण कर चुके. और अब जो रिपोर्ट हम सरकार को देंगे उसे तुम लोग सदेव याद रखोगे." उन अफसरों नेक्रोधित होकर कहा और वापस मुड़ गए.

"अरे सर सुनिए तो..." मैनेजर उनके पीछे दौड़ा किंतु उन अफसरों ने सुनी अनसुनी कर दी. फ़िर गुप्ता सर पकड़कर वहीँ बैठ गया.

----------

इस समय चीन्तिलाल और चोटीराज एक भरे बाज़ार से गुज़र रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज़ हुई और एक शोर सुनाई दिया. तीन चार लुटेरे एक बैंक लूटकर भाग रहे थे जिनके चेहरे नकाबोंमें छुपे हुए थे. उनमें से एक के हाथ में रिवाल्वर था.

"ये लोग कहाँ जा रहे हैं?" चोटीराज ने पूछा.

"लगता है इतने दिन सोये रहने से तुम्हारी स्मृति चौपट हो गई है. तुम्हें अपने युग के बारे में कुछ भी याद नहीं रह गया है. अरे ये लोग विवाह करने जा रहे हैं. देखनहीं रहे हो, इन्होंने अपने चेहरे कपड़े द्बाराछुपा रखे हैं." चीन्तिलाल बोला.

"किंतु ये लोग इस प्रकार भाग क्यों रहे हैं?"

"आओ उन्हीं से पूछ लेते हैं." चीन्तिलाल और चोटीराज लुटेरों कीओर बढ़ने लगे जो एक वैन के पास पहुँच चुके थे."आप लोग विवाह के लिए दौड़ क्यों रहे हैं? क्या कोई स्वयेंवर होगा?" चीन्तिलाल ने पूछा. ये शब्द उसने अपनी भाषा में कहे थे. यहाँ ये बता देना आवश्यक है की इस युग की भाषा केवल केवल मारभट और सियाकरण ही थोडी बहुत सीख पाये थे. चीन्तिलाल और चोटीराज इस युग की भाषा बिल्कुल नहीं बोलते समझते थे. किंतु वे यही समझते थे कि इस युग के लोग उनकी भाषा समझ रहे हैं. और इसका कारण था कि रामसिंह इत्यादि उनसे उन्हीं कि भाषा में बात कर लेते थे. लुटेरे अपनी वैन में बैठ चुके थे.

"ये स्पीड ब्रेकर बीच में कहाँ से टपक पड़े." लुटेरों ने कहा और उनसे बोले,"तुम लोग सामने से हट जाओ वरना गोली से उड़ा दिए जाओगे." कहते हुए रिवाल्वर वाले ने उनपर रिवाल्वर तान दिया.

"चीन्तिलाल, ये हमेंकुछ दे रहे हैं." चोटीराज ने रिवाल्वर लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया. लुटेरे ने ट्रेगर दबा दिया. पिट की आवाज़ हुई और कोई गोली नहीं चली.

"ओह! मैंने अपना रिवाल्वर तो बैंक में ही खाली कर दिया था." लुटेरा बोला.

"तो फिर देखते क्या हो. चाकू से इनका कामतमाम कर दो." दूसरे लुटेरे ने कहा.

पहला लुटेरा चाकू निकालकर उनकी ओर बढ़ने लगा. पास पहुंचकर उसने चोटीराज पर वार किया. चोटीराज उसकी मंशा भाँपकर किनारेहो गया और लुटेरे का वार खाली हो गया.

"ये तो हमें मार रहा है. अर्थात ये हमारा दुश्मन है." चोटीराज ने कहा.

"फिर देख क्या रहे हो. इसे बता दो की हम दुश्मनों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं." चीन्तिलाल बोला और चोटीराज ने लुटेरे के गाल पर एक थप्पड़ जमा दिया. लुटेरा भला उन सातफुटे प्राचीन युग्वासियों का थप्पड़ कहाँ झेल पाता. उसे वहीँ तारों के साथ साथ ब्लैक होलों के भी दर्शन हो गए ओर वह सपनों की दुनिया में पहुँच गया.

फ़िर चोटीराज कार के आगे पहुँचा ओर चीन्तिलाल पीछे, ओर उन्होंने उसे अपने हाथों पर उठा लिया. कार में बैठे लुटेरों का शायद इस तरह की परिस्थिति से पहली बार पाला पड़ा था. वे हवा में तंगी कार में बैठे बैठे चिल्लाने लगे. उनकी चीख सुनकर काफ़ी लोग अपने घरों से निकल आए और उनकी हालत देखकर हंसने लगे. कुछ ही देर में पुलिस भी आ गई ओर उसने उन लुटेरों को गिरफ्तार कर लिया. फ़िर जब उसे मालूम हुआ की लुटेरों को पकड़ने वाले चोटीराज और चीन्तिलाल हैं तो वह इनको भी अपने साथ लेती गई. पुलिस स्टेशन देखकर ये दोनों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे.

 
Back
Top