[color=rgb(85,]खजाने की तलाश [/color]
[color=rgb(85,]Update 11[/color]
"भला किताब से किस तरह टॉस होगा? उछालने पर वह फट नहीं जायेगी?" रामसिंह ने आश्चर्य से कहा.
"किताब उछलकर टॉस नहीं होता उल्लुओं. मैं बीच से इसे खोलूँगा. अगर इसपर लिखा पेज नंबर सम आया तो हम लोग दाएँ ओर जायेंगे और अगर विषम आया तो बाएँ ओर जायेंगे."
फ़िर प्रोफ़ेसर ने किताब खोली, साथ ही उसके मुंह से निकला, "ओह, ये क्या!"
"क्या हुआ?" दोनों उसकी ओर झुक पड़े.
"इसके दायें पेज पर तो विषम नंबर छपा है और बाएं पर सम."
"ऐसा है, तुम हर जगह पर किताब से काम लेने की कोशिश न किया करो." कहते हुए शमशेर सिंह ने झुककर एक चपटा पत्थर का टुकडा उठाया
और उसकी एक सतह पर थूकते हुए कहा, "मैं इस पत्थर को उछाल रहा हूँ. अगर गीला आया तो दाएँ और चलेंगे वरना बाएं ओर."
पत्थर का टुकडा नीचे गिरा और उसपर गीला वाला भाग ऊपर था. अतः उन लोगों ने दायें ओर चलना तय किया. सुरंग में काफ़ी अँधेरा था. इतना कि प्रोफ़ेसर को हर समय टॉर्च जलाए रखनी पड़ रही थी. साथ ही उन लोगों को ज़रा भी आभास न हो सका कि सुरंग सीधी जाने की बजाये गोलाई में घूम रही है.
जब उन लोगों को चलते चलते काफी देर हो गई और सुरंग के उस सिरे का चिन्ह भी न दिखाई दिया जिससे वे लोग चले थे तो वे लोग चौंके.
"यार, यह सुरंग क्या किसी ने खींच कर लम्बी कर दी है? मैंने आते में सामान उठाने में जितनी बार कंधे बदले थे उससे तीन गुनी बार अब तक बदल चुका हूँ. किंतु सुरंग का मुंह तो क्या, अब तक हलक भी नहीं दिखा." रामसिंह ने एक बार फ़िर एक कंधे का सामान दूसरे पर ट्रांसफर किया.
"हाँ, यह तो तुम सही कह रहे हो." प्रोफ़ेसर और शमशेर सिंह चौंक कर ठिठक गए.
, "लगता है हम लोग ग़लत रास्ते पर चले आये हैं."
"लगता नहीं पूरा विश्वास है कि हम लोगों ने ग़लत रास्ता चुना." शमशेर सिंह ने कहा.
"फिर क्या किया जाए? क्या वापस लौट चलें?" रामसिंह ने पूछा.
"लौटने को तो हम बाद में लौट सकते हैं. मेरा विचार हैं कि आगे देख लिया जाए. हो सकता हैं किस्मत हम पर मेहरबान हो जाए और खजाना हमारे
हाथ लग जाए." प्रोफ़ेसर ने कहा.
"तो ऐसा करते हैं कि अब निशान लगाते हुए आगे बढ़ते हैं. वरना इस भूलभुलैया में फंसकर हमारी हड्डियों का भी पता नहीं चलेगा." शमशेर सिंह बोला.
प्रोफ़ेसर ने अपना सूटकेस खोलकर एक चाक निकाली. फिर वे लोग चाक द्वारा दीवार पर निशान लगाते हुए आगे बढ़ने लगे. प्रत्येक व्यक्ति के दिल की धड़कने इस शंका से तेज़ हो गई थीं कि न जाने आगे क्या निकलता हैं. वैसे तो पूरी सुरंग में सीलन, चमगादडों की बीट इत्यादि की हलकी बदबू फैली हुई थी, किंतु यहाँ पहुंचकर यह बू और तेज़ हो गई थी. और जैसे जैसे वे लोग आगे बढ़ रहे थे, इस फैली हुई गंध में कुछ और गंध मिश्रित होकर अजीब प्रकार की गंध फैला रही थी.
"यार, यह गंध कैसी हैं?" रामसिंह ने नाक सिकोड़ते हुए कहा.
"सीलन वगैरह की बदबू हैं. यह कोई साफ़ सुथरा एयर कंडीशंड कमरा तो हैं नहीं कि हर ओर सुगंध फैली रहे. अगर खजाने को पाना हैं तो इतनी बदबू तो बर्दाश्त करनी ही पड़ेगी." प्रोफ़ेसर ने कहा.
अब सुरंग में कई मोड़ एक साथ मिले. और एक मोड़ से जैसे ही वे लोग घूमे, उन्होंने स्वयं को एक विशाल कमरे में पाया.
विचित्र गंध अब कुछ और तेज़ हो गई थी.
"यह कैसी भूलभुलैया हैं? यह पहाडियों को खोदकर कमरे किसने निकाले हैं?" रामसिंह ने आश्चर्य से कहा.
"वह जो भी सभ्यता रही होगी, कोई बहुत विकसित सभ्यता थी. और मेरे विचार से वह सभ्यता पहाड़ों के अन्दर निवास करती थी." प्रोफ़ेसर ने कहा.
"मेरा विचार हैं कि यहाँ खजाना ज़रूर मिलना चाहिए. क्योंकि एक विकसित सभ्यता का धन तो असीम होना चाहिए." शमशेर सिंह बोला.
"ठीक हैं. आओ ढूंढते हैं." प्रोफ़ेसर ने कहा.
फ़िर वे लोग एक एक कोने में अपनी नज़रें गड़ाने लगे.
उन्होंने जमे हुए एक एक पत्थर को हिलाने का प्रयत्न किया. अंत में चार पाँच पत्थरों को इस प्रकार देखने के बाद एक पत्थर वास्तव में हिलने लगा. इस पत्थर को शमशेर सिंह हिला रहा था.
"प्रोफ़ेसर, रामसिंह.." उसने पुकारा, "ज़रा इस पत्थर को अपने स्थान से हटाने में मेरी मदद करो."
फ़िर उन तीनों ने मिलकर ज़ोर लगाया और पत्थर अपने स्थान से हट गया. उसके पीछे वास्तव में एक छोटा सा दरवाजा था. वे लोग उसमें प्रविष्ट हो गए. यह एक और कमरा था. प्रोफ़ेसर ने टॉर्च जलाई और फ़िर वे लोग उन वस्तुओं को आश्चर्य से देखने लगे जो कमरे के बीचोंबीच रखी थीं.
ये लोहे के चार ताबूतनुमा बक्से थे जिनकी लम्बाई कम से कम दस फीट और चौडाई चार फीट थी. ऊँचाई भी अच्छी खासी थी.
कहानी जारी रहेगी
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