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"लगता है हमें फ़िर कोठरी में बंद कर दिया जायेगा." चीन्तिलाल बोला.अब पुलिस इंस्पेक्टर इनसे कहरहा था, "इन लुटेरों पर पाँच हज़ार का इनाम था. वह आप लोग ले लीजिये." उसने इन्हें रुपये दे दिए. ये दोनों कुछ देर उन नोटों को आश्चर्य से देखते रहे फ़िर बाहर आ गए.
"उस मनुष्य ने हमें ये क्या दिया है?" चीन्तिलाल अपने हाथमें दबे नोटों को देखता हुआ बोला.
"इसपर कुछ लिखा हुआ है. मेरा विचार है कियह लिखने के लिए आधार है. जिस प्रकार हमारे युग में ताड़पत्र होता था."
"अच्छा छोड़ो इसे. मुझे तो अब बहुत जोरों की भूख लग रही है."
"वह देखो, सामने कोई घर है. वहां अवश्य कुछ न कुछ मिल जायेगा." चोटीराज ने सामने देखते हुए कहा.
फ़िर वह दोनों उस घर की ओर बढ़ गए जो वास्तव में एक सिनेमाहाल था. जिस समय वह लोग वहां पहुंचे, भीड़ का एक रेला अन्दर से आया. शायद कोई शो समाप्त हुआ था. ये लोग उस भीड़ को आश्चर्य से देखने लगे. भीड़ भी उनके कद और डील डौल के कारण उन्हें देखने लगी. अधिकतर लोगों ने इन्हें विदेशी समझा.
ये लोग भीड़ से बचते बचाते एक कोने में पहुंचे और वहां खड़े एक व्यक्ति से प्रश्न किया, "क्या यहाँ खाने को कुछ मिल सकता है?"
सामने वाला ब्लैक में टिकट बेचने वाला था. उसने यही समझा कि ये लोग विदेशी हैं और शायद फ्रेंच बोल रहे हैं. साथ ही इनके हाथों में नोट देखकर उसकी ऑंखें फ़ैल गईं.
"इन लोगों को ठगना चाहिए," उसने अपने मन में कहा और बोला,"आप लोग ब्लैक में टिकट खरीदने के लिए एकदम सही व्यक्ति के पास आये है. मैं आपको बहुत सस्ते में टिकट दूँगा. एक टिकट के केवल पाँच सौ रुपये." उसने दो टिकट इनकी ओर बढ़ा दिए और एक हज़ार रुपये इनके हाथ से झटक लिए. उसके बाद उसने ऊँगली से हाल की ओर संकेत किया और रुपये लेकर चंपत हो गया."
चीन्तिलाल और चोटीराज हाल की ओर बढ़ने लागे.
"अजीब बातें हैं इस युग की.
हमने जब भोजनके बारे में पूछा तो उसने हमें पत्ती पकड़ा दी. इसका हम लोग क्या करें?" चोटीराज ने पूछा.
"हाथ में लिए रहो. शायद इस युग में भोजन पत्तियों के साथ करते हैं. आओ अन्दर चलते हैं."
वे लोग गेट पर पहुँच गए जहाँ गेटकीपर लोगों के टिकट देख देखकर उन्हें उनके स्थान बता रहा था. लोगों की देखा देखी ये भी अपनी कुर्सियों के पास पहुंचे और उनपर बैठ गए. कुछ देर बाद हाल में अँधेरा छा गया.
"कमाल है, अभी तो यहाँ दिन था. अब एकदमसे रात कैसे हो गई?" चीन्तिलाल ने आश्चर्य से कहा.
"रात नही हुई है. बल्कि यह चिराग जल रहे थे जो अब बुझा दिए गए हैं." चोटीराजने स्पष्टीकरण किया.
"तो क्या इस युग के लोग अंधेरे में भोजन करते हैं?"
"वो अवश्य कोई अनोखाभोजन होगा.
लगभग दो तीन मिनट बाद परदे पर बैक्ग्राउन्ड म्यूजिक गूंजा और ये लोग उछल पड़े. उसके बाद उन्हें एक बार फ़िर उछलना पड़ा जब परदे पर चित्र आने लगे.
इतने बड़े बड़े मनुष्य. ऐसे तो हमारे युग में भी नहीं थे.
और ये लोग कितने जोरों से चिल्ला रहे हैं. मेरा तो इतने ज़ोर से बोलने पर गला ही ख़राब हो जायेगा.कुछ देर बाद जब परदेपर भोजन करने का दृश्य आया तो ये लोगएक बार फ़िर बेचैन हो गए.
अरे वे लोग तो भोजन करने लगे. हम लोग इतनी देर से बैठे हैं हमें कुछ मिल हीनहीं रहा है."
"शायद वे लोग स्वयेंखाने के बाद हमारे लिए ले आयें." चोटीराज ने दिलासा दिया.
फ़िर उसके बाद परदे पर विभिन्न प्रकार के सीन आते रहे और उसके उत्तर में इनकी विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं होती रहीं. उनके आसपास बैठने वाले काफ़ी शरीफ मालुम हो रहे थे वरना अब तकइनका गरेबान पकड़ा जा चुका होता. दो तीनलोगों ने इन्हें घूरकर देखा किंतु कोई कुछ बोला नहीं.
उसके बाद वह दृश्य भी आया जहाँ कई गुंडे मिलकर हीरो से फाइटिंग कर रहे थे.
"अरे चोटीराज, देखो कैसा अत्याचार हो रहा है. उस बेचारे कोकई लोग मिलकर मार रहे हैं और कोई बोल भी नहीं रहा है." चीन्तिलाल ने दांत पीसकर कहा.
चोटीराज कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और चीखकर बोला, "उसे छोड़ दो वरना यदि मैं आ गया तो मार मारकर उल्टा लटका दूँगा." "अबे ओये, बैठजा अपनी कुर्सी पर. क्या चिल्ला रहा है."चारों ओर से आवाजें आने लगीं. चोटीराज पर लोगों की बोलियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह उसी प्रकार परदे के बदमाशों को वार्निंग देता रहा. अब चीन्तिलाल भी अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया था.भीड़ का शोर अब और अधिक हो गया था. फ़िरजब हीरो को कई बदमाशों ने गिराकर पीटना शुरू कर दिया तो चोटीराज ने आव देखा न ताव और बगल में रखी किन्हीं सज्जन की गठरी उठाकर परदे की ओर उछाल दी. किंतु परदा काफ़ी दूर था अतः वह गठरी हवा में तैरती हुई एक सज्जन की पत्नी के सर पर जाकर ठहर गई.
"अरे मर गई." उनकी पत्नी की जब सुरीली चीख गूंजी तो वह बौखला कर खड़े हो गए.उन्होंने देख लिया था की वह गठरी किधर से आई है.
उन्होंने बदला लेनेके लिए किसी हथियार की तलाश शुरू कर दी और जल्द ही उनका स्वयें का त्फिन बॉक्स उनके हाथ में आ गया और वह उन्होंने चोटीराज की ओर उछाल दिया. किंतु उन्होंने शायद क्रिकेट कभी नहीं खेला था अतः वह टिफिन बॉक्स अपनी मंजिल पर पहुँचने की बजाये बीच ही में बर्स्ट होकर एक पहलवान नुमा सज्जन की तोंद पर जाकर ठहर गया.
"ये कौन बदतमीज़ है." फ़िर पहलवान जी को वह बदतमीज़ दिखाई पड़ गया और वे गिरते पड़ते वहां पहुँच गए और फ़िर वहां पूरा हंगामा खड़ा हो गया. अब लोग दो दो फाइटिंग एक साथ देख रहे थे. जिसमें से एकअसली थी और दूसरी नकली.
फ़िर कोई चीखा,"भागो यहाँ बम ब्लास्ट होने वाला है." और फ़िर वहां भगदड़ मच गई. लोग एक दूसरे पर गिरते पड़ते गेटों की ओर भाग रहे थे. फ़िर हालखाली होने में एक मिनट भी पूरा नहीं लगा. चोटीराज और चीन्तिलाल भी सबके साथ हाल से बाहर आ गए.
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फ़िर मारभट की दृष्टि फलों के एक ठेले पर पड़ी और उसकी ऑंखें चमक उठीं.
"वह देखो, फल मिल गए. आओ खाते हैं." उसने कहा और दोनों ठेले की ओर बढ़ गए.
'क्या हम फल खा सकते हैं?" मारभट ने फलवाले से पूछा.
"अवश्य खाइए." फलवाले ने कहा और मन ही मन कहने लगा, "ये लोग अवश्य कहीं बाहर से आए हैं. दाम भी नहीं पूछे. आज लगता है काफ़ी अच्छी आमदनी होगी.मारभट और सियाकरण ने ठेले पर से सेब उठा उठाकर खाना शुरू कर दिए थे. उनके मुंह और हाथ काफ़ी तेज़ी से चल रहे थे और यह सिलसिला तभी रुका जब उनके पेट पूरी तरह भर गए.
"आप लोगों ने मिलकर पूरे एक सौ पच्चीस सेब खाए हैं. इस प्रकार कुल तीन सौ पचहत्तर रुपये हुए." फलवाला उनकी खुराक देखकर हैरान था.
"यह रुपये क्या होता है?" सियाकरण ने यह शब्द पहली बार सुना था.
"रुपये अर्थात मनी अर्थात मुद्रा. रुपया यहाँ की मुद्रा है जिस प्रकार आपके देश में शायद डालर है." फलवाले ने इन्हें समझाया.
"अच्छा अच्छा मुद्रा. क्यों सियाकरण तुम्हारे पास कुछ मुद्राएँ पड़ी हैं?"
"नहीं. अब तो मेरे पास एक मुद्रा भी नहीं है." सियाकरण ने कहा फ़िर फलवाले से बोला, "अभी तो हमारे पास मुद्रा नहीं है. बाद में दे दूँगा."कहते हुए वे आगे बढ़ने लगे.
"अरे इन चोरों को पकडो. मेरे तीन सौ पचहत्तर रुपये के फल खा गए और अब पैसे नहीं दे रहे हैं." फलवाला चिल्लाया. कई लोग उनकी ओर दौडे और दोनों को पकड़ लिया.
"अरे दुष्टों मेरे पैसे दे दो वरना जेल भिजवा दूँगा." फलवाला उनकी और चीखते हुए बढ़ा.
"यहाँ क्या हो रहा है." तभी पीछे से कड़कदार आवाज़ गूंजी और लोग मुड़कर पीछे देखने लगे. पीछे थानेदार शेरखान खड़ा था.
वह इन्हें देखकर चौंका, "ये तो वही हैं जो मेरी मोटरसाइकिल लेकर भागे हैं." वह बोला, "क्यों बे मेरी मोटरसाइकिल कहाँ है?"
"मारभट, ये तो वही है, जिसने हमें कोठरी में बंद कर दिया था और अब किसी मोटरसाइकिल की बात कर रहा है."
हम लोग यहाँ से भाग लेते हैं. वरना ये हमें फ़िर कोठरी में बंद कर देगा." फ़िर दोनों ने अपने अपने हाथों को झटका दिया और इन्हें पकड़े व्यक्ति छिटक कर दूर जा गिरे. फ़िर ये लोग.भाग निकले.....
फलवाला और थानेदार इनके पीछे थे. सियाकरण और मारभट काफ़ी तेज़ दौड़ रहे थे. जल्दी ही इन्होंने दोनों को काफी पीछे छोड़ दिया.
अब दोनों एक नाले के किनारे किनारे भाग रहे थे. एकाएक सियाकरण ने एक ठोकर खाई और संभलने के लिए मारभट को थाम लिया. दोनों का बैलेंस बिगडा और दोनों लुढ़खनियाँ खाते हुए एक साथ नाले में जा गिरे.
"ओह! यह हम लोग कहाँ गिर गए. जल्दी बाहर निकलो." दोनों बाहर निकले किंतु अब वे कीचड में बुरी तरह लथपथ हो चुके थे.
और शाम के धुंधलके में पूरी तरह काले भूत मालुम हो रहे थे.
"हम लोगों का तो हुलिया ही बिगड़ गया है. चलो चलकर कहीं मुंह धोते हैं." मारभट ने कहा.
"अच्छा हुआ कि उस खतरनाक मनुष्य से पीछा छूट गया जिसे लोग दानेदार (थानेदार) कह रहे थे." सियाकरण ने इत्मीनान कि साँस ली फ़िर वे लोग हाथ मुंह धोने के लिए पानी की तलाश में निकल पड़े.
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जींस, रंगीन दुपट्टों और सफ़ेद शर्ट्स की चकाचौंध ये बता रही थी की यह किसी यूनिवर्सिटी का हॉस्टल है. थोडी ही दूर पर पार्क था जहाँ कुछ लोग अकेले टहल रहे थे और कुछ जोडों के रूप में. ऐसा ही एक जोड़ा इस कोने में बैठा था. जहाँ अपेक्षाकृत सन्नाटा था. पेड़ों के झुंड के कारण यह स्थान कुछ छुपा हुआ था.
"डार्लिंग, कल मैंने यहाँ दो घंटे लगातार तुम्हारा इन्तिज़ार किया किंतु तुम आईं नहीं. क्या बात हो गई?" लड़के ने पूछा.
"सॉरी, बात यह हुई की कल हमारे ग्रुप के स्टूडेंट्स ने जूनिअर्स की रैगिंग लेने का प्लान बनाया था. वहां मालूम हुआ की उनकी पहले ही कुछ ग्रुपों द्वारा चार बार रैगिंग ली जा चुकी है. सो उन्होंने इस बार इनकार कर दिया. नतीजे में मार पीट की नौबत आ गई. इसी चक्कर में किसी का पेन पता नहीं किस स्पीड से मेरी खोपडी से टकराया की मैं चकरा गई. रियली डिअर मेरा सर अभी तक पेन दे रहा है."
"ओह! ये तो बहुत बुरा हुआ. सच पूछो तो तुम्हारी ज़रा सी तकलीफ से मेरा दिल धड़कने लगता है. यह बताओ, तुम ने अपनी मम्मी से तो नहीं बताया की तुम मुझसे प्यार करती हो?"
"सवाल ही नहीं पैदा होता. बता के मरना है क्या. वे तो मेरे लिए कोई आई.ए.एस ढूंढ रही हैं और तुम तो अभी बी.एस.सी. कर रहे हो. तुम जल्दी से आई.ए.एस, पी.सी.एस. बन जाओ फ़िर मैं बात करूंगी. वैसे डार्लिंग क्या तुमने अपने पापा से बात की?"
"एक बार मैंने घर में कहा था की मैं शादी करना चाहता हूँ. वह डांट पड़ी की बस. पापा कहने लगे की पहले ग्रेजुएट होकर सर्विस करने लगो फ़िर शादी की बात मुंह से निकालना. यार, यह पैरेंट्स रास्ते की दीवार क्यों बन जाते हैं?"
"हाँ. मैंने तो मोस्टली फिल्मों में यही देखा है. किंतु हमारा प्यार सदेव अमर रहेगा. चाहे जितना बड़ा तूफ़ान आ जाए, हम अपने इरादों पर अटल रहेंगे.
"डार्लिंग, हम अपनी यूनिवर्सिटी की इन मुलाकातों को हमेशा याद रखेंगे. ये रंगीन माहोल, और उसमें तुम मेरे पास हो.पता नहीं क्यों मेरा यूनिवर्सिटी छोड़ने का मन नहीं करता." लड़के ने कहा.
"इसीलिए तुम बी.एस.सी. में लगातार तीन साल से फेल हो रहे हो."
"वह तो और बात है. मैं तो हर बार पूरी तय्यारी कर के गया, किंतु हर बार गड़बड़ हो गई."
"कैसी गड़बड़?"
"जब पहली बार मैंने इक्जाम दिया तो मैं जो पर्चियां ले गया उसे देखकर दूसरे लड़के ने कहा ये इस पेपर की पर्चियां नहीं हैं. इसका पेपर तो पहले ही हो गया. बात यह हुई की मैं जो पैंट पहनकर पहले दिन पेपर देने गया था भूल से वही पैंट उस दिन भी पहन ली थी."
"और दूसरी बार क्या हुआ था?"
"जब दूसरी बार मेरा इक्जाम हुआ तो उसी समय तुनसे पहली बार मुलाकात हुई थी. हर समय तुम्हारे सपने में खोया रहता था. इसी चक्कर में एक दिन केमिस्ट्री के पेपर में लिख आया, "डार्लिंग सोडियम क्लोराइड, तुम्हारी इस समय बहुत याद आ रही है. तुम्हारो मोहब्बत के तुल्यांकी भार ने मेरे दिल के नाभिक के टुकड़े टुकड़े कर दिए है. और मैं अपने आपको पूरी तरह रेडियो एक्टिव पा रहा हूँ. तुम्हारी याद में मैं इतना एसिडिक हो गया हूँ की लगता है वातावरण कैल्शियम ऑक्साइड जैसा शुष्क हो गया है. इस तरह मैं दूसरी बार भी नाकाम हो गया."
"ओह! मुझे अफ़सोस है की मैं तुम्हारे फेल होने का कारण बनी. किंतु तीसरी बार क्या हुआ था?""तीसरी बार तो मैंने पूरा इन्तिजाम कर लिया था. मैंने अपनी कापी बाहर लिखवाने के लिए भेज दी थी. किंतु ऐन मौके पर चूक हो गई. जिस लड़के को मैंने कापी लिखने के लिए दी थी उसने तो अपना काम कर दिया किंतु जिस लड़के को कापी यूनिवर्सिटी के अन्दर पहुंचानी थी वह लेट हो गया. और उस समय पहुँचा जब कापियां जमा हो चुकी थीं."