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खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

“इतनी भी थकावट नहीं हुई कि होटल जाकर आराम करूं । अभी कुछ घंटे मैं और भाग-दोड़ कर सकता हू।"

"ठीक है हम दोनों इकट्ठे ही अंधेरे से भरी जगहौं कौ चेक करते हैं ।"

राजन ने सिर हिलाया और काफी का आखिरी घुट धरकर उठते हुए बोला ।

"मैं अभी आया ।" कहने के साथ ही राजन बाथरूम की तरफ बढ गया ।

भवतारा सपाट शिकारी की निगाहों से राजन को बाथरूम की तरफ जाते देखता रहा । उसकी आंखों में हल्की-सी लाली उभर आई थी । जो कि उसके भीतर उछल रहे दरिन्दे की निशानी थी ।

उसके देखते-ही-देखते राजन बाथरूम में प्रवेश कर गया । ठीक उसी पल भवतारा कुर्सी से उठ खडा हुआ ।

मोना चौधरी ने उस पर नजर डाली और निगाह फेर ली । अपनी सोची में व्यस्त थी ।

वेहद शांत अंदाज में भवतारा के कदम बाथरुम की तरफ बढने लगे । उसके शरीर में उठने वाली ऐठने अब जोर पकड़ने लगी थी, उसके भीतर क्रा शेतान उसके असली रूप में आने को बेचैन हो रहा था ।

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जब भवतारा ने भीतर प्रवेश किया तो राजन वाशबेसिन पर शीशे के सामने खडा, मुह पर पानी के छींटे मार रहा था । भवतारा के भीतर प्रवेश करते ही वो दरवाजा खुद-ब-खुद बंद होता चला गया । फिर उसने हाथ बढ़ाकर दरवाजे की सिटकनी लगा दी । इसके साथ ही भवतारा घूमा और राजन की पीठ पर नजरे टिका दी ।

उसी पल भवतारा के शरीर में जोरदार ऐठन उठी ।

इस बार उसने उठने वाली ऐठन को दबाने की चेष्टा न की ।

चंद सेकंड बीतते-बीतते ही भवतारा का रूप बदलने लगा । बो दरिन्दे में परिवर्तित होने लगा । उसके सिर के बाल कम्पन से हिलते हुए धीरे-धीरे छत की तरफ सीधे खडे होने लगे । फैली बांहों के हाथों के उंगलियों के नाखून एकाएक ही इंच भर बढ आए थे । वे इतने तीखे थे कि उनसे पूरी तरह चाकुओं जैसा काम लिया जा सकता था । तब तक अपने सामने लगे शीशे के द्वारा राजन की निगाह उस परं पड चुकी थी ।

वो चौंककर पलटा । हैरानी से उसे देखने लगा ।

भवतारा का चेहरा अभी न बदला था ।

"कौन हो तुम?"

"वही ।" भवतारा के होंठों से गुर्राहट निकली------" जिसकी तुम्हें तलाश है ।"

"श. . शेतान का बेटा?" राजन के होंठों से हक्का बक्का स्वर निकला ।

भवतारा के होंठों से गुर्राहट निकल-रहीं थी !

एकाएक उसके चेहरे में बदलाव आने लगा ।

उसका मासूम चेहरा दरिन्दे में बदलने लगा ।

राजन फटी-फ़टी आंखों से ये सब देख रहा ,था ।

देखते-ही-देखते के दरिन्दा---वहशी बन गया । उसका चेहरा . कुरूप हो उठा था । ऊपर के. दो दांत नुकीले होकर इंच-इंच भर बाहर आ गए थे । ऊपर का होंठ कुछ ऊपर उठ गया था । आंखें लाल सुर्ख हो गई थी । उसके चेहरे पर भूरे रंग के असंख्य दाग नजर आने लगे थे । उसकी दोनों बांहें किसी रोबोट की तरह फैल गंईं थी ।

राजन का दिल धड़कना जैसे भूल गया-था ।

खतरनाक-स्थिति का आभास हो चुका था उसे । उसने दरवाजे की तरफ देखा । दरवाजे की लगी सिटकनी भी देखी । मन में सिर्फ एक ही विचार था कि उससे बचना होगा, यहां से निकलना होगा । दरिन्दे के होंठों से तेज गुर्राहट निकली ।

राजन ने हिम्मत इकट्ठी की और तेजी से उस पर छलांग लया दी । मन में विचार था कि इसे दरवाजे के पास से हटाना होगा, वरना बाहर नहीं निकल पाएगा । इससे पहले कि उसका शरीर उससे टकरा पाता, उसने अपना दायां हाथ आगे कर दिया ।

राजन के होंठों से दबी-दबी चीख निकली ।

उसकी उगलियों के नाखून किसी तेज चाकू की तरह उसके शरीर में धंस गए थे ।

राजन नीचे गिरा ।

उसने जोरदार ठोकर उसके कूल्हे पर मारी ।

इस वक्त शैतानी ताकते खुलेआम दरिन्दे के साथ थी, महज एक ठोकर में ही राजन आठ फीट दूर दीवार से जा टकराया था । पीड़ा हुई, परंतु पीड़ा से ज्यादा उसका खौफ सिर पर सवार था । वो जल्दी से उठा और भयभीत नजरों से उसे देखने लगा ।

दरिन्दा अब झूमते हुए उसकी तरफ बढने लगा था ।

"त.. .तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते ।" राजन के होंठों से कांपता-सा स्वर निकला ।

जवाब में उसके होंठों से गुर्राहट निकली ।
 
उसी पल राजन उससे बचते हुए दरवाजे की तरफ़ दौड़ा ।

पर दरिन्दे ने झपट्टा मारा उसे जकड़ लिया, साथ ही उसे का धक्का दिया । राजन लड़रव्रड़ाकर फ़र्श पर गिरता चला गया ।

दरिन्दा पास आया । राजन खौफ के मारे अब कांपने लगा था । दरिन्दा उसके पास ही नीचे फर्श पर बैठ गया । टांगे फैलाकर राजन को टागों में समेटने की चेष्टा की । राजन समझ गया कि उसका अंत पास आता जा रहा है । उसने उठकर भागना चाहा, परंतु दरिन्दे ने उसे दबोच लिया । ।

राजन तड़फडाया ।

दरिन्दे ने उसे अपनी टार्गों में कसकर जकड़ लिया । राजन ने आजाद होना चाहा, तव तक दरिन्दा पूरी तरह अपनी पोजीशन ले चूका था उसके हाथ उसके सिर गाल पर जम चुके थे ।

अगले ही पल दरिन्दे ने उसको सिर टेढा किया । आगे बढे दोनों दात उसकी गर्दन में घुसेड़ दिए ।

राजन की आंखें फ़टी हुई थी । वो सब कुछ समझ रहा था, परंतु अपने को दरिन्दे से बचा न पाया था ।

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काफी देर हो गई राजन को बाथरूम गए । अब तक तो आ जाना चाहिए, मोना चौधरी ये बात बार-वार सोच रही थी । बगल की टेबल पर बैठा व्यक्ति भी बाथरूम गया था, परंतु वो भी अभी तक लौटा नहीं, बात क्या हे?

बारम्बार सोचने के बाद मोना चौधरी उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई ।

तभी वहां से निकलते एक वेटर ने रोका ।

" मैडम! लेडीज़ बाथरूम उधर है ।"

"मेरे साथी को गए दस मिनट हो चुके है, मैं उसे देखने जा रही हूं।"

वेटर ने बाथरूम का दरवाजा खोलना चाहा , परंतु वो बंद मिला ।

ये देखकर मोना चौधरी फोरन पास आ गई ।

"दरवाजा भीतर से बंद है?” मोना चौधरी के माथे पर बल उभरे ।

"यस मेडम !! ”

"लेकिन क्यों?"

" ये बात तो मुझें भी समझ नहीं आई ।" कहकर वेटर ने दरवाजा भिड़भिड़ाया, परंतु अंदर से कोई जवाब नहीं मिला ।

“आपका साथी अकेला है भीतर?” वेटर ने पुन: दरवाजा जोरों … से थपथपाया ।

“मेरे ख्याल में एक आदमी और है भीतर ।" मोना चौधरी ने कहा ।

दो वेटर और भी पास जा गए ।

उन्हें मामला पता चला ।।

"दरवाजा तोड़ देना चाहिए । भीतर जाने क्या वात है, दरवाजा क्यों बंद हैं?” दूसरे वेटर ने कहा ।

"मैंने तो पहले भी कई बार कहा है कि बाथरूम के दरवाजे के भीतर की सिटकनी हटा देनी चाहिए ।" दूसरा वेटर कह उठा ।

"उस मुंशी से पूछ लो ।" वेटर ने कैशियर की तरफ़ इशारा किया-" नहीं तो वो साला कहेगा कि दरवाजा क्यों तोड़ा ।"
 
मुंशी नामक व्यक्ति भी पास आ पहुचा था ।

"क्या बात है? तुम सव बाथरूम के दरवाजे के बाहर क्यों इक्ट्ठे हो रहे हो?" उसने पूछा।

"दरवाजा भीतर से बंद है ।"

" क्यों ? "

"भीतर दो आदमी हैं ।"

"औह! वो गडबड कर रहे होंगे । सोचते क्या हो । दरवाजा खोलो । सिटकनी तोडो।"

वो जल्दी से बोला।

उसके बाद वे दरवाजे को घक्के मारने लगे । काॅफी शॉप में बैठे पांच छः लोगों का ध्यान भी इस तरफ़ हो गया था ।

तभी दरवाजा खुला ।

वे सब ठिठक गए।

भवतारा बाहर निकला ।

उसने हाथ मुंह धो रखा था ।

सामान्य लग रहा था वो ।

"तम-----तुमने बाथरुम का दरवाजा भीतर से क्यों की किया?" मुंशी ने पूछा ।।

मोना चौधरी की निगाह उस पर जा टिकी ।

भवतारा खामोश-सा उनके बीच में से निकलता, बाहर दरवाजे के तरफ वढ़ गया ।

मोना चौधरी फौरन भीतर की तरफ झपटी । अगले ही पल उसके कदम जड़ हो गए ।।

बाथरूम के ठीक बीचोबीच राजन की लाश पडी थी । वो सिकुड़ा सा पडा था । खून की दो बूंदें फर्श पर पडी थीं । गर्दन पर दांतों के धंसने के निशान भी स्पष्ट मोना चौधरी ने देखे ।

ठगी-सी रह गई मोना चौधरी, कुछ पलों के लिए । तभी उसके पीछे खडा वेटर गला फाड़कर चिल्ला उठा ।

"खून-खून-मर्डर हो गया…पुलिस को फोन करो ।"

मोना चौधरी की आंखों के सामने भवतारा का चेहरा चमका । फौरन पलटी और बाहर की तरफ़ दोडी । कैफे शाप में वो नहीं था । मोना चौधरी बाहंर निकली, परंतु वो बाहर भी कहीं न दिखा । मोना चौधरी के होंठ र्भिच गए ।

वो ही था शैतान का बेटा । कितनी पास से वो, फिर दूर निकल गया । राजन की लाश मोना चौधरी के आंखों के सामने नाच रही थी, उसने फोन निकाला और सतपाल को फोन करने लगी । गुस्से से उसका शरीर कांप रहा था । कैफे वालों ने पुलिस को फोन का दिया था ।

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सतपाल पैंतालीस मिनट में वहां आ पहुंचा था ।

राजन की मौत उसके लिए किसी वज्रपात से कम न थी । राजन की लाश देखते ही वो रो पड़ा था । सोना चौधरी के चेहरे पर क्रोध भरा गुस्सा छाया हुआ था ।

पुलिस आ चुकी थी और अपना काम कर रहीं थी ।

मोना चौधरी चूंकि मेकअप में बी, इसलिए पुलिस के द्वारा पहचानने का सवाल ही पैदा न होता था । अगर पुलिस उसे पपहचान लेती तो नई मुसीबत खडी हो जानी थी ।

कुछ देर वाद सतपाल ने खुद को संभाला । रोने के पश्चात उसकी आंखों में लाली आ ठहरी थी । गालों पर पीलापन अभी भी चमक रहा था । राजन की ऐसी मौत की उसने कल्पना तक न की थी । मोना चौधरी सतपाल के पास पहुची । दोनों की आंखें मिली ।

"ये. ..ये काम शैतान के बेटे ने किया है ।" सतपाल भर्राए स्वर में कह उठा ।

"हां, मैंने राजन के गले के निशानों को देखते ही पहचान लिया था कि वो शैतान का बेटा ही था।" मोना चौधरी ने अफसोस-भरे स्वर में कहा…“वो मेरे पास वाली टेबल पर बैठा हुआ था । मैंने उसे देखा भी था, परंतु पहचान न सकी । बाथरूम से जब वो बाहर निकला तो मेरे पास से ही निकला, अगर मुझे उसकी हकीकत पता होती तो वो वच नहीं पाता ।"

“ये अच्छा ही रहा कि तुम उसे पहचान नहीं पाईं ।” सतपाल ने भारी स्वर में कहा ।

" क्यों ?"

"अंधेरा होते ही उसकी शैतानी शक्तियां जाग जाती है, तब उसका मुकाबला नहीं किया जा सकता । अगर तुम उसका रास्ता रोकने की चेष्टा करतीं तो बो तुम्हें.... तुम्हें भी खत्म कर देता । तुम क्या _समझती हो कि राजन आसानी उसके काबू में आ गया होगा?"

मोना चौधरी उसे देखती रही ।

"राजन ने उससे बचने की भरपूर केशिश की होगी, परंतु उसकी ताकतों के सामने राजन की एक न चली होगी ।"

"फिर भी अगर मैं उसे पहचान लेती तो उसे पकड़ने की चेष्टा अवश्य करती ।" मोना चौधरी ने दांत भिंचकर कहा ।

"रात के वक्त ऐसी भूल मत करना । शैतान के बेटे पर हाथ डालना हो तो दिन में ही डालना ।'"

मोना चौधरी के होंठ भिचकर रह गए।

" पुलिस को क्या बताया?" सतपाल ने पूछा ।

" शैतान के बेटे का हुलिया बताया ।"

"इसके अलावा कुछ बताना भी नहीं । सच पर कोई यकीनं नहीं करेगा और हम हंसी के पात्र वन जाएंगे ।"

" मुझे राजन की मौत का दुख इसलिए ज्यादा है कि अपने जीवन के अंतिम वक्त में मेरे साथ था. और उसकी जान लेने वाला भी पास ही में बैठा था । तब शायद वो हमारी बाते भी सुन रहा होगा । मैने सपने में भी न सोचा कि क्या होने जा रहा है !"

सतपाल ने ज़वाब में कुछ नहीं कहा ।

" तांत्रिक मोहम्मद तो कहता था कि वो हर मुसीबत के, वक्त में हमारे पास आ जाएगा ।"

सतपाल ने मोना चौधरी को देखा ।

" परंतु वो नही आया !"

तभी पुलिस बाले उनके पास आ पहुँचे ।

पुलिस अपना काम निबटाकर लाश का पंचनामा करने लगी । वायरलेस पर भवतारा का हुलिया उन्होंने प्रसारित कर दिया था कि ऐसा आदमी कहीं मिले तो फौरन उसे पकडा जाए । वो हत्यारा है ।

लाश पोस्टमार्टम के बाद कल मिलेगी, ये कहकर पुलिस चली गई।

मोना चौधरी और सतपाल कैफे से बाहर निकले ।

मोना चौधरी का भारी मन था कि अब राजन साथ में नहीं है ।

"मिथलेश को राजन के बारे में बताने की हिम्मत नहीं हो रही है ।" सतपाल ने भर्राए स्वर में कहा ।

"मैं बता देती हूं।"

उसके बाद मोना चौधरी ने फोन पर मिथलेश कों राज़न के बारे में बताया कि वह शैतान के बेटे का शिकार हो गया । सुनकर वहुत दुखी हो गया मिथलेश । फोन पर ही रोने लगा ।

मोना चौधरी ने फोन बंदकर दिया ।

"वापस होटल चलते हैं ।" सतपाल ने कहा ।

रात के दस से ऊपर का वक्त हो रहा था, वो थका-टूटा सा लग रहा था । राजन की लाश रह-रहकर उसकी आंखों के सामने नाच रही थ्री । कभी-कभार आंसु भी निकल जाते थे ।

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा । वो भी होटल जाकर आराम करना चाहती थी।

दोनों पास ही टैक्सी स्टैंड की तरफ़ बढ गए ।

" शैतान का बेटा हर रात एक शिकार कर रहा है राजन उसका चौथा शिकार वना ।" सतपाल ने भारी स्वर में कहा ।

“मैंने उसे पहचान लिया है ।" मोना चौधरी दांत भिंचकर बोली-----"जैसे भी हो, मैं उसे दूंढ निकालूगी !"

"रात के अंधेरे में उसे तलाश करने की कोशिश मत करना, उसे सिर्फ दिन के उजाले में तलाश करै । अंधेरे में उसका मुकाबला नहीं किया जा सकता । ये बात हमेशा याद रखना ।" सतपाल ने धीमे स्वर में कहा ।

"सतपाल . . . ।"

इस आवाज के साथ ही वे दोनों ठिठके ।

पलटकर पीछे देखा तो तांत्रिक मोहम्मद को खडे पाया ।

“आप ?" सतपाल के होंठों से निकला !

"राजन को मैंने बचाने की चेष्टा की, पर....! "

"बचाने की चेष्टा?" मोना चौधरी के होंठों निकला-“कैसे की ? "

"उसे बचाने के लिए मैं शैतान के बेटे के पास पहुंचना चाहता था , परंतु उसने अपने आस-पास शैतानी शक्तियां फैला रखी थी । यही वजह रही कि मैं उसके पास पहुचने में सफल न हो पाया । वो कामयाब हो गया ।"

"तो आप उससे कमजोर हैं ।" मोना चौधरी बोली ।

"अंधेरे के वक्त तो में उसके सामने कमजोर ही हूं। शैतान का बेटा है वो । शैतानी ताकतों पर राज कायम है उसका ।" वो गंभीर स्वर से कह रहा था-------" फिर जरूरी तो नहीं कि कामयाबी हर बार मिले । हार और कामयाबी जिन्दगी के दो पहलू है !"

"आपने तो एक लाइन में अपनी बात कह दी, लेकिन यहां राजन की जान चली गई ।” मोना चौधरी का लहजा शिकायत से भरा था ।

मोहम्मद कुछ कहने लगा कि सतपाल बोल पड़ा ।

"मैं पहले से ही जानता हूं कि ये मौत का खेल है ।" इससे किसी की भी जान जा सकती है । तुम शायद अभी तक शैतान के बेटे को समझ नहीं पाईं ।"

"जितना समझना चाहिए था, उतना तो समझ चुकी हूं।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर था ।
 
"अभी भी वक्त है । तुम चाहो तो इस मामले से अलग हो सकती, हो।"

"मोना चौधरी पीछे हटने वालों में से नहीं है ।"

‘ये तुम जानो, परंतु इस मौके पर मेरा सलाह देना जरूरी था ।"

" तमने तो कहा था कि केई 'खबरी' मिलेगा हमे, जो शैतान के बेटे के बारे में हमें बताएगा ।"

“हां ।”

" वो कब मिलेगा"

"समय हो चुका है, अव तक उसे मिल जाना चलिए था ।" तांत्रिक मोहम्मद ने कहा-----" जो आज हुआ है , वो ना हो , इसी कारण तुमसे कहा था कि होटल मे ही रहो । शैतान के बेटे को ढूँढने की मनाही नही है , लेकिन ये काम दिन मे करो !"

मोना चौधरी कुछ ना बोली ।।

तात्रिक मोहम्मद ने, सतपाल को देखकर कहा ।

"शैतान के बेटे पर एक ही हथियार असर कर सकता है सतपाल! "

"और वो है उसका अपना चाकू....!"

"तुम्हें कैसे पता?"

"मिथलेश पुरानी किताबों को पढ़ रहा है, उसने ही ये बात मुझे बताई थी ।"

“ठीक र्कहा है उसने, क्या तुम उसने चाकू को हासिल कर पाओगे?”

" शायद नहीं, क्योंकि वो चाकू तो स्वयं शैतान कै बेटे के ही पास है । उसी के दम पर तो उसने पुन: जीवन पाया है ।"

"उस चाकू के विना शैतान के बेटे का अंत नहीं होगा वो ही चाकू उसे वापस शैतानी दुनिया में पहुंचा सकता है ।"

“क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं है शैतान के बेटे को खत्म करने है का?" सतपाल ने पूछा ।

" नहीं, अभी तक तो मुझे कोई दूसरा रास्ता नजर-आया नहीं।"

" उसकी गर्दन काट दे तो.....!" मोना चौधरी ने कहना चाहा ।

"वो फिर जुड़ जाएगी ।" तांत्रिक मोहम्मद ने कहा---"वो असीम शैतानी ताकत का मालिक है ।"

"ओह....!"

" रात में बाहर निकलना बंद कर दो तो बेहतर होगा क्योंकि शैतान का बेटा तुम दोनों को पहचानता है । वो तुम दोनों को मारकर अपना बदला लेगा चाहता है । उसे मौका मिला तो वो चुकैगा नहीं !"

दोनों खामोश रहे ।

"जाओ-मुझे भी जाना है ।"

वे दोनों और आगे चल पडे ।

चंद कदमो के पश्चात मोना चौधरी ने चलते-चलते गर्दन घुमाकर पीछे देखा ।

तांत्रिक मोहम्मद उसे कहीं नजर नहीं आया ।

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भवतारा जब वापस पहुंचा तो मंगलू कौ जागते पाया ।।

मंगलू गोल कमरे में कुर्सी पर धंसा अथलेटा सा मौजूद था ।।

मंगलू उसे देखते ही बोला----" आज शिकार नहीं मिला क्या?"
 
भवतारा ने होंठ सिकोड़कर मंगलू को देखा, फिर हंस पड़ा ।।

" आज तो बहुत शानदार शिकार मिला ।"

""शानदार?"

"हां, वो ही सतपाल जिसे तुम जानते हो उसका छोटा भाई नजर आ गया !"

“तुमने उसका खून पी लिया?"

भवतारा उसे देखकर मुस्कराया और ऊपर जाने के लिए सीढियों की तरफ वढ़ गया ।।

"तुम्हारीं कमीज पर खून नहीं लगा आज ।”

"आज मैंने उसके खून की एक बूंद भी नहीं गिरने दी । तसल्ली से उस दुश्मन के खून का मजा लिया ।"

मंगलू वही बैठा अवतारा को देखता रहा ।।

उसके देखते ही देखते वह ऊपरी मंजिल के अपने कमरे में चला गया ।।

मंगलू वैसे ही बैठा रहा । सोचतां रहा । चेहरे पर गभीरता नजर आ रहीं थी ।

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अगले दिन सुबह मंगलू दस बजे ही पुलिया पर जा बैठा था । कामिनी का इंतजार था उसे ।

भवतारा की कल की कही बाते उसके मस्तिष्क मे फेरे लगा रही थी और उसे पूरा यकीन था कि भवतारा ने कामिनी के बारे में उससे गलत कहा है कि बो उससे प्यार करती है । उसके साथ बाजार गई और उससे व्याह करने को भी राजी है ।।

सब झूठ हे ।

मंगलू को भवतारा का भरोसा ही नहीं रह गया था । वो जानता था कि भवतारा की बुरी निगाह कामिनी पर है और वो कामिनी को उससे छीन लेना चाहता है । बात इतनी ही होती तो मंगलू को कम पोशानी होती ।

भवतरा इंसानों का खून पीने वाला शैतान था । ऐसे इंसान के साथ, कामिनी तो क्या, कोई भी नहीं रह सकता था ।

कामिनी भवतारा की हकीकत से अनजान थी ।

मंगलू ने अपने सिरे को झटककर आने वाले विचारों को हल्का करने की कोशिश कि ऐसी कोई बात नहीं है, कामिनी और भवतारा का आपसी कोई रिश्ता नहीं है, उसे इस बारे में सोचना ही नहीं चाहिए । कामिनी को भवतारा अच्छा नहीं लगता । कितनी ही बार तो ये बात कामिनी कह चुकी है । कल भी उसने यही बात कही थी ।

मंगलू की सोचो की धारा, कामिनी की सुन्दरता की तरफ़ चली गई।

कितनी सुन्दर और मासूम है कामिनी। तभी उसके विचार कामिनी की तरफ़ मुड गए ।

भवतारा ने ब्रीफकेस भरके नोटों की गड्डियां कामिनी के मां-बाप को दी थी । बो शादी करना चाहता था कामिनी से । उसके मां-बाप तो पैसे के लालच में कामिनी से कह रहे होंगे कि वो भवतारा से शादी कर ले ।

कामिनी कब तक इंतजार करेगी, कभी तो उसकी बातों में फंसेगी ।

मंगलू फिर परेशान हो उठा । एकाएक उसने फैसला कर लिया । कल कामिनी ने कहा था कि वो भाग चलते हैं, परंतु उसने मना कर दिया था, लेकिन आज मंगलू को ये बात ठीक लग रही थी । उन्हें भाग चलना चाहिए । भवतारा से जान छूटेगी और कामिनी भी मिल जाएगी । बाद में वो वापस आ जाएंगे और कामिनी के मां बाप उन्हें स्वीकार कर ही लेगें । ये ठीक रहेगा ।

परंतु अवतारा से जो पैसे लेने हैं?

पता नहीं वो पैसे देगा, भी या नहीं । जब भी बात करो, बात टाल देता है । इस विचार के साथ मंगलू ने भवतारा से पैसे लेने का मोह छोड़ दिया । अब कामिनी उसकी पंहली जरूरत बन गई थी । कामिनी को लेकर वो मां के पास चला जाएगा । मेहनत-मजदूरी जो भी काम मिलेगा कर लेगा या कामिनी के बाप की तरह कपडों पर प्रेस करने लगेगा ।
 
मंगलू की सोचो की उड़ान थमने का नाम नहीं ले रही थी ।

कामिनी ही कामिनी थी उसकी सोचो की हर सांस में । उसके अलावा अब उसे कुछ नजर न आ रहा था । भवतारा से वो दूर हो जाना चाहता था । खून पीने वाला गंदा इंसान था ।

उसे ध्यान आया कि वक्त वहुत हो गया है कामिनी नहीं आई ।

इन्हीं विचारों में मगंलू फंसा था कि उसे कामिनी आती दिखी ।

मंगलू का चेहरा खिल उठा ।

कामिनी ने गुलाबी रंग का सूट पहन रखा था । पावों में सफेद सैंडिल, कलाइयों में कांच की चुडिया । बालैं को आज पीछे करके बांध रखा था । ठुमक-ठुमककर वो शोख अदा के साथ बढती जा रही थी । चेहरे पर मुस्कान थी।

तभी मंगलू के चेहरे पर छाई मुस्कान को धकेलकर वहां व्याकुलता आ बैठी ।

ये क्या? कामिनी के गले में सोने का भारी हार पड़ा चमक रहा था ।

भवतारा ने कहा तो था कि कामिनी को सोने का हार लेकर दिया है । तो क्या भवतारा की बातें सच हैं?

मंगलू का दिल धडक उठा ।

कामिनी पास आ पहुंची थी ।

"क्यों रे.. .!" पास आते ही कामिनी ने इठलाते हुए कहा…"मैं केसी लग रही हुं ?"

“बहुत अच्छी ।" मंगलू ने कामिनी की सुन्दरता को निहारते हुए कहा।

"ये हार देखा है । सोने का है । पूरे पचास हजार का । कल ही खरीदा है ।" कामिनी ने हार को छूकर कहा ।

मगंलू का दिल धड़का ।

"मां साथ गई थी बाजार?"

"नहीं, तेरे मालिक के साथ गई थी ।”

"भवतारा के साथ?" उसके होंठों से निकला ।

" हां, ये हार उसी ने तो मुझे लेकर दिया है । कई सूट भी लेकर दिए । मां के लिए दो साडियां भी !"

" तू उसके साथ बाजार गई थी !" मगलू की परेशानी चेहरे पर आ गई थी ।

"हां वो.... .!"

"ये तेरे को क्या हो गया है कामिनी…वो अच्छा इंसान नहीं है !"

"तू मुझसे झूठ बोलता रहा मंगलू! " कामिनी ने शिकायती स्वर में कहा-----" वो तो बहुत अच्छा इंसान हे ।”

मंगलू ने कामिनी को घूरा ।

" तेरे को एक ही दिन में पता चल गया कि बो अच्छा इंसान है?" मंगलू बोला ।

" और नहीं तो क्या, उसने मेरे को सोने का हार दिया । सूट दिए , मां को साडी… "

"और वोअच्छा होगया ।”

"उसमे बुराई ही क्या है?”

"पहले तो तेरे को वो अच्छा नहीं लगता था ।"

"पहले की बात और थी , तब मैंने उससे बात नहीं की थी, ठीक से जाना नहीं था उसे ।"

"मतलब कि अब जान लिया?" मगलू का स्वर कडवा हो गया ।

" हां, कल दिनभर उसके साथ रही , बो मेरे को बंगला लेकर देगा ।" कामिनी ने कहा ।

"बंगला!"

" हां, हम सब बगले में रहेगे । अव हम अमीर हो जाएंगे।"

“और मै ?"

“तू...!" कामिनी की निगाह मगंलू पर टिक गई---" वो कहता है, शादी के बाद मगलू को छुटूटी दे देगे।”

“और तू उससे शादी कर रही है?"

"हा मेरे तो भाग्य खुल गए जो इतने अच्छे लड़के नै मुझे पसंद किया ।"

"अब तो तेरे को मैं अच्छा नाहीं लगता होऊंगा ।"

"ये क्या कहता है, तू मुझे अच्छा लगता है ।"

"उतना ही अच्छा, जितना कि कल लगता था ।"

" हां-हां! ”

" कल तू भाग चलने को कह रही थी, लेकिन मैंने मना कर दिया अब बोल भागेगी क्या?”

" क्यों?"

" हम दोनों शादी कर लेंगे ।"

"शादी तो मैं भवतारा के साथ कर रही हूं।"

"तू उसे नहीं जानती । वो तेरे को सिर्फ दुख देगा । बर्बाद कर देगा बो तुझे ।"

" तू कैसी बातें कर रहा मंगलू अंपनी पत्नी को भी कोई भला बर्बाद करेगा ।"

" करेगा , तू भवतारा को नहीँ जानती । वो......!"
 
"मैं समझ गई ।" कामिनी सिर हिलाकर कह उठी…"तू जलता है । तु नहीं चाहता कि मैं भवतारा से व्याह करूं । तू चाहता है कि तेरे से व्याह करू, तभी तू मुझें भवतारा के खिलाफ भड़का रहा ना ।"

मंगलू उसके भोले-भाले चेहरे कौ देखने लेगा ।

"सच बता, मैंने ठीक कहा न?"

मंगलू जानता था कि कामिनी को सच कहने का कोई फायदा नहीं । भवतारा का प्यार इसके सिर चढ़कर बोल रहा है । ऐसे में इसे उसकी कही हर बात झूठी लगेगी ।

" अब चुप क्यों है ?"

"हा ? मै तेरे शादी करना चाहता हू और तू भवतारा जैसे अमीर आदमी से शादी कर रही है तो मुझे जलन क्यों न होगी।" मंगलू मुस्करा पड़ा ।

"मैं तेरा दिल नहीं तोडना चाहती थी मंगलू !” कामिनी अफसोस-भरे स्वर में कह उठी…"लेकिन क्या करू । मां-बापू भवतारा से ही शादी करने को जोर दे रहे हैं. । मैं मना भी नहीं कर सकती । माननी तो पड़ेगी ही उनकी बात !"

पुनः मुस्कराया मंगलू।

" कल तो तू मेरे साथ भागने कौ तैयार थी । तूने ही तो कहा था ये ।"

कामिनी ने सिर सुका लिया।

"तू सच में वहुत खूबसूरत है कामिनी, मैं ही तेरे लायक नहीं । भवतारा ही तेरे लायक है ।"

“तू मुझे हमेशा याद रहेगा ।"

" मुझे याद रखने का शुक्रिया ।" मंगलू ने कहा, जबिक उसके दिल मे आग लगी हुई थी ।

" मेरे व्याह में आएगा मंगलू?"

"हां जरूर आऊंगा । पेट-भर कर खाऊंगा ।" कहते हुए मंगलू ने पेट पर हाथ फेरा ।

उसके अंदाज पर कामिनी मुस्करा पडी ।

"मैं जाऊं मंगलु तेरे से ही मिलने आई थी, मिल लिया?" मंगलू ने सिर हिला दिया ।

"कल नहीं आऊंगी मैं ।" वो बोली ।

मगलु ने पुन: सिर हिला दिया ।

कामिनी पलटी और वापस चल पडी । मंगलू शांत-सा उसे जाता देखता रहा । आखों में आंसु भर आए थे, फिर जब कामिनी नजर आनी बंद हो गई तो उसने सिर घूमाकर मंदिर के गेट की तरफ देखा । भवतारा ने कामिनी को छीन लिया था। ये ही विचार बार-बार उसके मन में आ रहा था ।

कामिनी नहीं तो भवतारा भी नहीं । देख ली दुनिया....अब वो वापस अपनी मां के पास चला जाना चाहता था ।

मंगलू के कदम सड़क पर आगे को बढते चले गए ।

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भवतारा तैयार हुआ । शीशे में खुद को निहारा और मुस्करा पड़ा ।

आज वो बहुत ही खुश था, क्योंकि बीती रात अपने दुश्मन को खत्म कर दिया था । अब दो ही बचे थे, सतपाल और मोना चौधरी । वो दोनों इसी शहर में थे, इस वात पर भी भवतारा मन ही मन खुश था कि वो कभी भी उसे नजर आ सकते थे ।

मंगलू आज भी यहां मोजूद नहीं था । भवतारा ने सोचा कि वो बाहर पुलिया पर बैठा होगा, शायद साथ में कामिनी भी हो । कामिनी का ख्याल आते ही उसके होंठों के बीच मधुर मुस्कान आ फंसी । अब वो कामिनी को हमेशा ही अपने पास रखना चाहता था । आज इस बारे में उसके मा-बाप से बात करने का विचार बनाया ।। भवतारा वहां से निकलने ही वाला था कि जंगला की आवाज गूंजी ।

" जंगला, आपकी सेवा में हाजिर है ।"

" अब क्या है? तुम बार-वार मेरे पास क्यों आते हो?"

"मंगलू के बारे मैं कुछ कहना चाहता हू।"

""क्या?" भवतारा बोला ।

"बो कामिनी को चाहता है और आप कामिनी से व्याह करने की सोच रहे हैं ।

"इसमे खास बात क्या है?” '

"मंगलू आपके साथ जुड़ा हुआ है और जलन में के आपके खिलाफ़ काम कर सकता है ।"

"कामिनी तो मंगलू को नहीं चाहती?"

"नहीं ।"

"तो कोई फर्क नहीं पड़ता । जब कामिनी से मेरा व्याह होगा तो वो ठीक हो जाएगा । बैसे भी उसे साथ रखने का मेरा इरादा नहीं है शादी के बाद मंगल कौ बेलीराम के पास भेज दूगा, वहीँ वो शिक्षा लेगा ।"

"जैसा आप उचित्त समझे ।"

" -मोहम्मद के बारे में कोई खबर ?"

"नहीं, उसके बाद उसने बेलीराम को तंग नहीं किया ।"
 
"मेरे ख्याल में अब करेगा भी नहीं ।" भवतारा बोला-…"'वो जान चूका है कि हमसे टक्कर नहीं ले सकता ।"

"परंतु वो बेलीराम को तो नुकसान पहुंचा सकता है ।"

""ऐसा होगा तो बेलीराम स्वयं ही मुझसे बात कर लेगा । तुम जाओ, मुझे काम है ।"

इसके साथ ही जंगला की आवाज सुनाई देनी बंद हो गई ।

भवतारा, मंदिर से बाहर निकला और सड़क पर आगे बढ़ गया ।

पुलिया खाली पडी थी । कल की तरह आज भी वहां मंगलू और कामिनी बैठे न दिखे । भवतारा दीनू के झोंपड़े की तरफ चल पड़ा ।

पांच-सात मिनट में ही झोंपड़े पर था ।

दीनू की निगाह भवतारा पर पडी तो वो खिल उठा ।

“आइए.. आइए.. .जंवाई बाबू......!" फिर वो ऊंचे स्वर में बोला-" ओ कामिनी कुर्सी ला, जंवाई वावू आए हैं ।"

"लाई बापू !" झोंपडी में से आवाज आई ।

भवतारा मधुर मुस्कान के साथ दीनू को देख रहा था ।

" कल तो आपने वहुत खर्चा क़र दिया ।" दीनू बोला ।

"खर्चा ?"

"और नहीं तो क्या, कामिनी को सूट, उसकी मां क्रो साडिया और कामिनी को सोने का हार लेकर दिया ।"

"ये खर्चा नहीं, अपनापन है । कामिनी अब मेरी ही तो है ।"

" हां-हां , सो तो है।" दीनू ने सिर हिलाया।

तभी कामिनी कुर्सी लिए से बाहर निकली । भवतारा से नजरे निजी तो मुस्करा पडी । पास आकर उसने कुर्सी खोली, रखी तो भवतारा उस पर बैठ गया ।

"मैं चाय बनाकर लाती हूं।"

"नहीं ।" भवतारा ने टोका-" नहीं, नाश्ता करके आया हूं।”

" तो कुछ नहीं लोगे?” कामिनी ने पूछा।

"नहीं ।"

" ये क्या बात हुई।" बोली कामिनी-"कुछ तो.. .!"

"बाजार नहीं जाना क्या?"

""बाजार?" कामिनी के होंठो से निकला ।

“हां, सोने का एक और हार खरीदेंगे । शादी की तैयारियां भी तो होती रहनी चाहिए ।" भवतारा मुस्कराया ।

कामिनी मुस्कराई और वापस झोपड़ी में चली गई ।

"बच्ची है ।" दीनू ने दात दिखाकर कहा । तभी बसन्ती झोंपडी से बाहर निकलती कह उठी ।

"बूढे! मेरी जव शादी हुई थी तो मैं *** साल की थी । कामिनी तो अट्ठारह साल की है । बच्ची नही है ।"

दीनू बसन्ती को आया पाकर सकपका-सा उठा ।

“सुनाइए जंवाई बाबू !" वसन्ती पास ही नीचे बैठती बोली--"कैसे हैं आप, कल जो साड्रिया आपने मेरे लिए ली, वो सच में वहुत खूबसूरत हैं, आपकी पसंद की मैं कायल हो गई !"

"कामिनी ने पसंद की थी वो साड्रियां ।" भवतारा मुस्कराकर बोला ।

"एक ही बात है, आप भी तो साथ ही थे । आपकी पंसद सच में वहुत अच्छी है ।"

“तभी तो कामिनी को पसंद कर लिया ।" दीनू बोला ।

बसन्ती ने दीनू को घूरा तो उसने मुह फेर लिया ।
 
"अब आगे क्या करना हे बाबू?" बसन्ती बोली ।

“आगे ?"

"हां, कामिनी तो शादि के लिए तैयार है, मै तो चाहती दूंगी कि आप आज ही कामिनी को विदा कर ले जाएं ।"

"आज ही ।" भवतारा मुस्कराया ।

"ये कैसे हो सकता है?" दीनू कह उठा ।

" चुप कर बूढे, बात करने का ये ही ढंग होता है ।" वसन्ती ने कहा-फिर भवतारा से बोली----"कब करना है ब्याह?"

"जब भी आप कहे ।"

"एक-दो दिन में निबटा दो । जिस मंदिर में आप ठहरे हैं, वहीँ पर ही शादी..... !"

“ मैं सब इंतजाम कर लूगा । इस बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं ।"

"वो तो मैं जानती हूं कि आपके होते किस बात की चिंता, तो कल का व्याह रखें या परसों का?”

" दो-चार दिन में कामिनी के साथ ब्याह कर लूंगा ।"

"जेसा तुम ठीक समझो।"

" कामिनी को मैं अपने साथ बाजार ले जाना......!"

! हां-हां, क्यों नहीं, ये भी कोई पूछने की बात है । कामिनी अब तुम्हारी है ।" बसन्ती ने मीठे स्वर में कहा…“बाजार में आज नजर दौडाना कि पीले रंग की बनारसी साडी मेरे लिऐ मिल जाए.. .मैं.. . ।"

"तूने क्या करनी है साडी?" दीनू ने हड़बड़ाकर टोका ।

"क्या करते हैं साडी का बूढ़े ?! बसन्ती उसे खाने को दौडी-“पहनते हैं, समझ में आई बात । दो-चार दिन बाद कामिनी का ब्याह होगा तो मुझे बढिया कपड़ा पहनना नहीं है क्या, आखिर जवाई बाबू की इज्जत का सवाल है । तुम्हारी क्या है, तुम तो धोती बांधकर मूंछो को ऊपर चढा लोगे, हो गए शादी को तैयार! औरतों को सजावट की जरूरत पड़ती है ।”

दीनू गहरि सांस लेकर रह गया । भवतारा मुस्कराता हुआ बसन्ती को देखता रहा । एकाएक बसन्ती मुस्कराकर भवतारा से बोली ।

" वो क्या है कि पीला रंग मुझ पर जंचता बहुत है । आप भी देखोगे तो दंग रह जाएंगे ।"

"मैं तो कभी दंग नहीं हुआ ।" दीनू सकपकाकर बोला…“ तू जंवाई वावू को दंग कर.....!"

" चुप कर बुढे ! तेरी नज़रे कमजोर हो चुकी है । अक्सर तेरो मुंछ छोटीं-बड्री जाती है ।"

तभी कामिनी झोंपड़े से बाहर आई । वो अब बाजार जाने क्रो सज-धजकर आई थी । भवतारा कामिनी को देखते ही बोला ।

"चलें !"

"हां ।"

भवतारा उठा तो वसन्ती कह उठी ।

" पीले रंग की बनारसी साड्री भूल मत जाना । तुम दोनों की शादी मेँ पहननी है ।"

"मुझे याद रहेगा ।" भवतारा ने कहा ।

फिर अवतारा और कामिनी आगे बढ़ गए ।

इधर उनके जाते ही बसन्ती तीखे स्वर में दीनू से कह उठी ।

"हां बूढे, अब बोल, क्या कह रहा था तू कि मैं साडी का क्या करूंगी । अब बताऊ क्या करूगी ?"

दीनू ने मुंह बनाया ।

"अभी ज़वान हू मैं, तू तो तभी बूढा था जब तेरी शादी हुई।"

"बूढा था कामिनी कहाँ से आ गई ?" दीनु उखड़े स्वर में कह उठा । "

"भगवान ने तेरे को पकी-पकाई औलाद देकर, तेरी इज्जत रख ली।"

"पकी-पकाई?” दीनू सकपकाया । "

"बेटी के ब्याह की सोच, फालतू की बाते मत सोच, वरना अपना सिर नॉचने लगेगा ।"

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