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खेल खिलाड़ी का compleet

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खेल खिलाड़ी का पार्ट--1

सुनसान सड़क पे देर रात वो लड़की तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी। उसके चुस्त सलवार कमीज, हाथ में पकड़े मोबाइल और कंधे पे लटके बैग को देख के साफ जाहिर था की वो पास की किसी बिल्डिंग के दफ़्तर में काम करती थी और आज उसे वहां से निकलने में देर हो गयी थी।

सड़क इतनी सुनसान थी की एक आवारा कुत्ता भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। तभी लड़की के कानों में पीछे से किसी के वहाँ आने की आवाज आई। उसने इस उम्मीद से गर्दन घुमाई की कोई टक्सी या आटो-रिक्शा होगा मगर वो तो कोई वैन थी। लड़की फिर से तेजी से आगे बढ़ने लगी।

“मस्त माल है, बच्चू…” वैन उसके करीब आ गयी थी और बिल्कुल धीमी होके उसके साथ चल रही थी। लड़की ने गर्दन घुमाई तो वैन का पिछला दरवाजा पीछे सरका पाया। अंदर की सीट पे एक लंबा, भारी शरीर का शख्स बैठा था जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और तंबाकू से पीले हो चुके दाँत उसकी छिछोरी मुस्कान के चलते नुमाया थे। उसके साथ पिछली सीट पे एक आदमी बैठा था और आगे दो और लोग थे। चारो शक्ल से ही जरायम पेशा लगते थे।

लड़की ने अपनी चाल और तेज कर दी- “हाय। गाण्ड तो देखो साली की…” उस शख्स ने जो कि सबका सरदार लगता था, फबती कसी तो लड़की और घबरा गयी। उसे पता था की तेज चाल के चलते उसकी 28 इंच की कमर और ज़्यादा बल खाने लगी होगी और उसके नीचे उसकी 36 इंच की गाण्ड भी और मटकने लगी होगी। उसका चेहरा लाल हो रहा था।

“छोड़ो बिल्ला उस्ताद। जाने दो, कहीं इस लौंडिया के चक्कर में निकलने में देर ना हो जाए…”

“अबे, चुप…” बिल्ला की नजरें तो उस लड़की की गाण्ड से चिपकी ही हुई थी, जो कि चलते हुए अपने मोबाइल के बटन्स दबाए जा रही थी- “इसे तो साथ ले चलते हैं। रास्ता काटने में आसानी होगी। गाड़ी लगा सामने, छोटू…” ड्राइवर ने वैन को तिरछी कर उस लड़की के सामने कर उसको रोका और बैठे-बैठे ही बिल्ला ने अपने बाए हाथ से लड़की की दांई बाँह उसकी कलाई के उपर पकड़ी।

उसके बाद जो हुआ उसने सभी गुण्डो को हैरान कर दिया और वो कुछ पलों के लिए मानो जैसे बुत बन गये और यही कुछ पल उनकी मुसीबत का सबब बने। लड़की ने दांए हाथ को जरा सा घुमा के बिल्ला की बाईं कलाई पकड़ी और उसे घुमा दिया। बिजली की फुर्ती से उसने अपना मोबाइल अपने कुते की जेब में डाला और बाएं कंधे से बैग को नीचे गिरा दिया।

बिल्ला ने अपना दायां हाथ बढ़ा के अपना बायां हाथ लड़की की गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश करनी ही चाही थी की लड़की के बाए हाथ का कराटे चाप उसकी गर्दन की दांईं तरफ पड़ा और जैसे उसे लकवा मार गया। लड़की

ने अपनी बाई टांग को बिल्ला की सीट पे टिकाया और फिर उसी के सहारे बिल्ला का हाथ खींचकर उसे गाड़ी से नीचे गिरा दिया।

बिल्ला भी शातिर अपराधी था और अपनी हैरानी से बाहर भी आ चुका था। वो पीठ के बल सड़क पे लेटे ही अपनी बाई टांग को चलाकर लड़की की टाँगो पे मारकर उसे नीचे गिराने की कोशिश की मगर लड़की होशियार थी। वो उसका वार बचाते हुए हवा में उछली और अपना बायां घुटना मोड़कर उसके सीने पे लैंड कराया।

बिल्ला दर्द से छटपटा उठा। उसके बाकी साथी तब तक वैन से उतरकर अपने कपड़ो में छुपे हथियार बाहर निकाल के उसकी ओर आ चुके थे की तभी ना जाने कहाँ से 14-15 पुलिसवाले वहां आ गये और उन्हें घेर लिया। थोड़ी ही देर बाद सभी बदमाश पोलीस वैन में हथकड़ियों से बँधे बैठे थे।

“आह्ह… ये लड़की है कौन यार…” दर्द से कराहते बिल्ला ने वैन के दरवाजे पे ताला लगाते हवलदार से पूछा।

“ए॰सी॰पी॰ दिव्या माथुर…” हवलदार मुस्कुराता हुआ वहां से चला गया।

***** *****

दिव्या माथुर देवालय पोलीस की क्राइम ब्रांच की शायद सबसे तेज-तर्रार अफसर थी। बचपन से ही दिव्या को खेल-कूद में बड़ी दिलचस्पी थी। स्कूल और फिर कालेज की बैडमिंटन, वालीबाल और जिमनास्टिक टीम शायद ही कभी उसके बिना किसी मुकाबले में हिस्सा लेती थी। कालेज पार करते-2 उसने ताईक्वान्डो में भी महारत हासिल कर ली थी और पोलीस ट्रेनिंग के दौरान कराटे के गुर भी उसने बहुत जल्दी सीख लिए थे। खेल ने उसमें खुद्दारी और हौसले का जज़्बा भरा और जब सिविल सर्विस का इम्तिहान पास करने पे उसकी पसंद पूछी गयी तो उसने बेझिझक पोलीस सर्विस को चुना।

माँ-बाप समझाते रह गये की एडमिस्ट्रेटिव सर्विस चुन ले पर दिव्या खुद को एक दफ़्तर में दिन भर बैठे सोच के ही घबरा जाती थी। ट्रेनिंग के बाद जब वो ए॰सी॰पी॰ बनकर देवालय आई तो वहां के आला अफसरों को भी इस नयी अफसर की काबिलियत पता चलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा और उन्होंने फौरन उसे वहां की क्राइम ब्रांच में पोस्ट कर दिया। कल सुबह ही जैसे ही दिव्या को मुखबिरों के हवाले से खबर मिली की बिल्ला जिसने कुछ ही दिन पहले एक सुपारी किलिंग की थी, कल रात शहर से भागने वाला है तो उसने उसे पकड़ने की प्लानिंग शुरू कर दी।

उसके मातहत काम करने वाले इंस्पेक्टर जिनमे से कुछ उससे उमर में काफी बड़े थे और उनका तजुर्बा भी उससे कहीं ज़्यादा था, उसे नाकाबंदी करने की सलाह दी मगर दिव्या ने उनकी बात नहीं मानी। उसका कहना था की बिल्ला तो नाकाबंदी की उम्मीद ही कर रहा होगा। क्यूँ ना कुछ ऐसा किया जाए जिसकी उसे बिल्कुल उम्मीद ना हो और फिर उसे पकड़ने में आसानी हो। तभी दिव्या ने ये प्लान बनाया। इस प्लान में अगर जरा भी गड़बड़ होती या उसकी टीम उसके मोबाइल के मेसेज मिलने के बाद वक़्त पे नहीं पहुँचती तो दिव्या की जान भी जा सकती थी। मगर दिव्या ने इतने दिनों में जो सबसे बड़ा सबक सीखा था वो ये की अगर उसने खतरे के डर से कदम पीछे खींचे तो मुजरिम आगे बढ़ जाएगा और वो उससे मुकाबला हार जाएगी और हार लफ्ज़ से उसे सख़्त नफरत थी।

“मेडम…” एक हवलदार ने उसे सलाम ठोंका।

“हूाँ…” दिव्या ने एक बार फाइल से नजर उठाके उसे आराम से होने का इशारा किया और फिर वापस फाइल निपटाने लगी। पोलीस की नौकरी के बाद दिव्या ने एक और सबक सीखा था की चाहे फौजी बनकर सरहद पे क्यूँ ना तैनात हो जाओ, बिना कागज काले किए काम नहीं चलने वाला।

“आप जब दफ़्तर से बाहर थी तो डी॰सी॰पी॰ साहब का मेसेज आया था इंटरकॉम पे की शाम को 7:00 बजे आप उनके केबिन में रिपोर्ट करें। उन्हें कल के एनकाउंटर के बारे में आपसे रिपोर्ट लेनी है…” हवलदार ने सलाम ठोंका और केबिन से बाहर चला गया। दिव्या हल्के से मुस्कुराई और फाइल पूरी करती रही।

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"“ए॰सी॰पी॰ दिव्या माथुर रिपोर्टिंग, सर…” दिव्या ने डी॰सी॰पी॰ प्रदीप वर्मा को सलाम ठोंका तो उन्होंने अपनी फाइल से सर उठाया और अपना पढ़ने का चश्मा उतारा। दिव्या ने इस वक़्त वर्दी पहनी हुई थी और अगर कोई उसे अभी देखता तो यही कहता की वो असली पोलीस अफसर नहीं है बल्कि कोई अदाकारा है जो पुलिस वाली का रोल अदा कर रही है। दिव्या थी ही इतनी हसीन। खूबसूरत चेहरे पे सजी नाक बहुत हल्की सी उपर उठी थी और ऐसा लगता था मानो वो बहुत गुरूर वाली लड़की है।

सच पूछिए तो उसे थोड़ा गुरूर था भी और होता क्यूँ नहीं, वो केवल खूबसूरत ही नहीं थी बल्कि उसका जिस्म भी बड़ा आकर्दक था। 5'8” कद की दिव्या की वर्दी की ढीली कमीज भी उसकी 38डी साइज की चुचियों के आकार को छुपाने में नाकाम रहती थी। कुदरत ने उसे थोड़ा भारी काठी से नवाजा था मगर रोजाना वर्ज़िश ने उसके जिस्म को बिल्कुल चुस्त रखा था और माँस की एक भी फालतू परत उसके जिस्म पे नहीं दिखती थी। “अट ईज…” डी॰सी॰पी॰ वर्मा ने अपनी फाइल किनारे की और चश्मा डेस्क पे रखकर अपनी कुर्सी पे पीछे हो उसे देखने लगे।

दिव्या ने मुस्कुराते हुए अपनी टोपी उतारकर डेस्क पे रखी और अपने बाँधे बालों को खोल दिया। काले, घने बाल उसकी कमर तक लहराने लगे। उसने अपनी बेल्ट खोली और उसे भी डेस्क पे रखा और आगे बढ़कर सीधा डी॰सी॰पी॰ वर्मा की गोद में जा बैठी।

पढ़नेवालों को लगेगा की जिस लड़की को मैं अभी तक कानून की हिफ़ाजत करने वाली, उसूलों वाली दिखा रहा था वो अपने सीनियर अफसर के साथ ऐसा कैसे कर रही है। क्या वो लड़की असल में भ्रष्ट है या फिर वो अफसर उसे मजबूर कर रहा है। ऐसा कुछ भी नहीं है। जब तक दोनों एक दूसरे की कमीजों के बटन्स से उलझें हैं मैं आपको असलियत बताता हूाँ।

दिव्या एक जिंदादिल लड़की थी। उसे अपने हुश्न और कातिलाना जिस्म का एहसास तब हुआ जब वो 13वीं क्लास में थी और एक लड़के ने उससे प्यार का इजहार किया। दिव्या को भी वो लड़का अच्छा लगा और चंद मुलाकातों के बाद जब उस लड़के ने उसके करीब आना चाहा तो उसने उसे मना नहीं किया। वो लड़का सच में बहुत खुशनसीब था, आख़िर वो पहला शख्स था जिसने उसके भरे-2, गुलाबी और रसीले होंठों का स्वाद चखा था। मगर वो लड़का उतना ही बदनसीब भी था क्यूँकी चूमने के बाद उसने अपनी किस्मत कुछ ज़्यादा ही आजमाने की कोशिश की और दिव्या की चुचियों को दबा दिया जो कि उस वक़्त भी आम लड़कियों की चुचियों से काफी बड़ी थीं। जवाब में दिव्या का घुटना उसकी टाँगों के बीच जा घुसा और वो लड़का दर्द से बिलबिलाता वहीं गिर पड़ा।

कालेज में भी उसके हुश्न के दीवानों की कमी नहीं थी मगर दिव्या की तेजी और हिम्मत से ज़्यादातर लड़के थोड़ा घबरा जाते थे लेकिन दिव्या के दिल में भी अरमान थे और उसे भी ये जानना था की आख़िर दो लोग अपने जिस्मों से कैसे वो मजा पाते हैं। कालेज के दौरान ही उसने एक लड़के के साथ चुदाई की और 4-5 बार के बाद ही वो समझ गयी की उसे ये खेल बहुत पसंद था। मगर परेशानी ये थी की उसका प्रेमी बिस्तर में उसका मुकाबला नहीं कर पाता था। हर बार दिव्या को मजा तो आता मगर साथ ही ऐसा भी लगता मानो कुछ कमी रह गयी हो और जैसे अभी उसे उसका प्रेमी थोड़ी और खुशी पहुँचा सकता था। उसे ये खुशी हासिल हुई पोलीस अकडमी के अपने एक साथी के साथ।

अजीत चौहान ने उसे चुदाई की उन बुलंदियों से वाकिफ कराया जिनके बारे में दिव्या ने बस सोचा ही था। उस के 7½ इंच के लण्ड की तो दिव्या दीवानी हो गयी थी। वो दिन शायद उसकी जिंदगी के सबसे हसीन दिन थे। अजीत एक बहुत भला इंसान था और दिव्या को बहुत खुश रखता था मगर फिर उसने भी एक गलती कर दी, उसने दिव्या से शादी की बात छेड़ दी।

दिव्या को आज तक शादी करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आया था। वो एक सफल लड़की थी जो अपने पैरों पे खड़ी थी। उसका मानना था की वो अजीत के साथ ऐसे ही खुश है, शादी करके वो ये सब बिगाड़ना नहीं चाहती थी। अजीत उसे समझाता रह गया की शादी के बाद दोनों हरदम साथ रहेंगे, मगर दिव्या नहीं मानी। उसका कहना था की अभी भी तो साथ हैं। दिव्या के माँ-बाप ने भी दिव्या को समझाया की अजीत जैसा भला लड़का दोबारा नहीं मिलेगा मगर उन्हें पता था की उनकी बेटी कितनी जिद्दी है और अगर उसने एक बार ना कर दी है तो वो अपने फैसले से हिलने वाली नहीं।

क्रमशः...........

 
KHEL KHILADI KA paart--1

Sunsan sadak pe der raat vo ladki tez kadmo se badhi chali ja rahi thi.uske chust salwar kamiz,hath me pakde mobile & kandhe pe latke bag ko dekh ke saaf zahir tha ki vo paas ki kisi building ke daftar me kaam karti thi & aaj use vaha se nikalne me der ho gayi thi.

sadak itni sunsan thi ki 1 awara kutta bhi kahi dikhayi nahi de raha tha.tabhi ladki ke kano me peechhe se kisi vahan ke aane ki aavaz aayi.usne is umeed se gardan ghumayi ki koi taxi ya auto-rickshaw hoga magar vo to koi van thi.ladki fir se tezi se aage badhne lagi.

"mast maal hai,bachchu!",van uske karib aa gayi thi & bilkul dhimi ho uske sath chal rahi thi.ladki ne gardan ghumayi to van ka pichhla darwaza peechhe sarka paya.andar ki seat pe 1 lamba,bhari sharir ka shakhs baitha tha jiski dadhi badhi hui thi & tambaku se peele ho chuke dant uski chhichhori muskan ke chalte numaya the.uske sath pichhli seat pe 1 aadmi baitha tha & aage 2 aur log the.charo shakl se hi zarayam pesha lagte the.

ladki ne apni chal & tez kar di,"hai!gand to dekho sali ki!",us shakhs ne joki sabka sardar lagta tha fabti kasi to ladki aur ghabra gayi.use pata tha ki tez chal ke chalte uski 28 inch ki kamar & zyada bal khane lagi hogi & uske neeche uski 36 inch ki gand bhi aur matakne lagi hogi.uska chehra laal ho raha tha.

"chhodo Billa ustad.jane do.kahi is laundiya ke chakkar me nikalne me der na ho jaye."

"abe,chup!",billa ki nazre to us ladki ki gand se chipki hi hui thi joki chalte hue apne mobile ke buttons dabaye ja rahi thi,"..ise to sath le chalte hain.rasta kaatne me aasani hogi.gadi laga samne,chhotu.",driver ne van ko tirchhi kar us ladki ke samne kar uska roka & baithe-2 hi billa ne apne baye hath se ladki ki dayi banh uski kalayi ke upar pakdi.

uske baad jo hua usne sabhi gundo ko hairan kar diya & vo kuchh palo ke liye mano jaise but ban gaye & yehi kuchh pal unki musibat ka sabab bane.ladki ne daye hath ko zara sa ghuma ke billa ki bayi kalayi pakdi & use ghuma diya.bijli ki furti se usne apna mobile apne kurte ki jeb me dala & baye kandhe se bag ko neeche gira diya.

billa ne apna daya hath badha ke apna baya hath ladki ki giraft se chhudane ki koshish karni hi chahi thi ki ladki ke baye hath ka karate chop uski gardan ki dayi taraf pada & jaise use lakwa mar gaya.ladki ne apni bayi tang ko billa ki seat pe tikaya & fir usi ke sahare billa ka hath khinch use gadi se neeche gira diya.

billa bhi shatir apradhi tha & apni hairani se bahar bhi aa chuka tha.vo pith ke bal sadak pe lete hi apni bayi tang ko chala ladki ki tango pe maar use neeche girane ki koshish ki magar ladki hoshiyar thi,vo uska vaar bachate hue hawa me uchhli & apna baya ghutna mod uske seene pe land karaya.

billa dard se chhatpata utha.uske baki sathi tab tak van se utar apne kapdo me chhupe hathyar bahar nikal ke uski or aa chuke the ki tabhi na jane kaha se 14-15 policewale waha aa gaye & unhe gher liya.thodi hi der baad sabhi badmash police van me hathkadiyo se bandhe baithe the.

"aahhhh....ye ladki hai kaun yaar?",dard se karahte billa ne van ke darwaze pe tala lagate hawaldar se puchha.

"ACP Divya Mathur.",hawaldar muskurata hua vaha se chala gaya.

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divya mathur Devalay Police ki crime branch ki shayad sabse tez-tarrar afsar thi.bachpan se hi divya ko khel-kud me badi dilchaspi thi.school & fir college ki badminton,volleyball & gymnastics team shayad hi kabhi uske bina kisi mukable me hissa leti thi.college paar karte-2 usne tae kwan do me bhi maharat hasil kar li thi & police training ke dauran karate ke gur bhi usne bahut jaldi sikh liye the.

khel ne usme khuddari & hausle ka jazba bhara & jab civil service ka imtihan paas karne pe uski pasand puchhi gayi to usne bejhijhak poluice service ko chuna.maa-baap samajhate reh gaye ki administrative service chun le par divya khud ko 1 daftar me din bhar baithe soch ke hi ghabra jati thi.

training ke baad jab vo ACP bvan devalay aayi to vaha ke ala afsaro ko bhi is nayi afsar ki kabiliyat pata chalne me zyada waqt nahi laga & unhone fauran use vaha ki crime branch me post kar diya.kal subah hi jaise hi divya ko mukhbiro ke hawale se khabar mili ki billa jisne kuchh hi din pehle 1 supari killing ki thi,kal raat shahar se bhagne wala hai to usne use pakadne ki planning shuru kar di.uske mathat kaam karne vale inspectors jinme se kuchh us se umra me kafi bade the & unka tajurba bhi us se kahi zyada tha,use nakabandi karne ki salah di magar divya ne unki baat nahi mani.

uska kehna tha ki billa to nakabandi ki umeed hi kar raha hoga.kyu na kuchh aisa kiya jaye jiski use bilkul umeed na ho & fir use pakadne me asani ho.tabhi divya ne ye plan banaya.is plan me agar zara bhi gadbad hoti ya uski team uske mobile ke message milne ke baad waqt pe anhi pahunchti to divya ki jaan bhi ja sakti thi magar divya ne itne dino me jo sabse bada sabak seekha tha vo ye ki agar usne khatre ke daar se kadam peechhe khinche to mujrim aage badh jayega & vo us se muqabla haar jayegi & haar lafz se use sakht nafrat thi.

"madam.",1 hawaldar ne use salam thonka.

"hun.",divya ne 1 baar file se nazar uthake use aaram se hone ka ishara kiya & fir vapas file niptane lagi.police ki naukri ke baad divya ne 1 aur sabak seekha tha ki chahe fauji ban sarhad pe kyu na tainat ho jao,bina kagaz kale kiye kaam nahi chalne wala!

"aap jab daftar se bahar thi to DCP sahab ka message aaya tha intercom pe ki sham ko 7 baje aap unke cabin me report karen,unhe kal ke encounter ke bare me aapse report leni hai.",hawaldar ne salam thonka & cabin se bahar chala gaya.

divya halke se muskurayi & file puri karti rahi.

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"ACP Divya Mathur reporting,sir.",divya ne DCP Pradip Verma ko salam thonka to unhone apni file se sar uthaya & apna padhne ka chashma utara.divya ne is waqt vardi pehni hui thi & agar koi use abhi dekhta to yehi kehta ki vo asli police afsar nahi hai balki koi adakara hai jo policewali ka role ada kar rahi hai.divya thi hi itni hasin.khubsurat chehre pe saji naak bahut halki si upar uthi thi & aisa lagta tha mano vo bahut gurur wali ladki hai.sach puchhiye to use thoda gurur tha bhi & hota kyu nahi!vo kewal khubsurat hi nahi thi balki uska jism bhi bada purkashish tha.

5'8" kad ki divya ki vardi ki dhili kamiz bhi uski 38D size ki chhatiyo ka aakar ko chhupane me nakam rehti thi.kudrat ne use thoda bhari kathi se navaza tha magar rozana varjiosh ne uske jism ko bilkul chust rakha tha & mans ki 1 bhi faltu parat uske jism pe nahi dikhti thi.

"at ease.",DCP verma ne apni file kinare ki & chashma desk pe rakh apni kursi pe peechhe ho use dekhne lage.divya ne muskurate hue apni topi utar kar desk pe rakhi & apne bandhe balo ko khol diya.kale,ghane baal uski kamar tak lehrane lage.usne apni belt kholi & use bhi desk pe rakha & aage badh seedha DCP verma ki god me ja baithi.

padnevalo ko lagega ki jis ladki ko main abhi tak kanoon ki hifazat karne vali,usoolo valo dikha raha tha vo apne senior afsar ke sath aisa kaise kar rahi hai?kya vo ladki asal me bhrasht hai ya fir vo afsar use majboor kar raha hai?aisa kuchh bhi nahi hai.jab tak dono 1 dusre ki kamizo ke buttons se uljhe hain main aapko asliyat batata hu.

divya 1 zindadil ladki thi.use apne husn & qatilana jism ka ehsas tab hua jab vo 12vi class me thi & 1 ladke ne us se pyar ka izhar kiya.divya ko bhi vo ladka achha laga & chand mulakato baad jab us ladke ne uske karib aana chaha to usne use mana nahi kiya.vo ladka sach me bahut khushnasib tha-aakhir vo pehla shakhs tha jisne uske bhare-2,gulabi & rasile hotho ka swad chakha tha magar vo ladka utna hi badnasib bhi tha kyuki chumne ke baad usne apni kismat kuchh zyada hi aazmane ki koshish ki & divya ki chhatiyo ko daba diya joki us waqt bhi aam ladkiyo ki choochiyo se kafi badi thi.jawab me divya ka ghutna uski tango ke beech ja ghusa & vo ladka dard se bilbilata vahi gir pada.

college me bhi uske husn ke deewano ki kami nahi thi magar divya ki tezi & himmat se zyadatar ladke thoda ghabra jate the lekin divya ke dil me bhi arman the & use bhi ye jaanana tha ki aakhir do log apne jismo se kaise vo maza pate hain.college ke dauran hi usne 1 ladke ke sath chudai ki & 4-5 baar ke bad hi vo samajh gayi ki use ye khel bahut pasand tha magar pareshani ye thi ki uska premi bistar me uska muqabla nahi kar pata tha.har baar divya ko maza to aata magar sath hi aisa bhi lagta mano kuchh kami reh gayi ho & jaise abhi use uska premi thodi aur khushi pahuncha sakta tha.

use ye khushi hasil hui police academy ke apne 1 sathi ke sath.Ajit Chauhan ne use chudai ki un bulandiyo se wakif karaya jinke bare me divya ne bas socha hi tha.uska 7.5 inch ke lund ki to divya deewani ho gayi thi.vo din shayad uski zindagi ke sabse haseen din the.ajit 1 bahut bhala insan tha & divya ko bahut khush rakhta tha magar fir usne bhi 1 galti kar di-usne divya se shadi ki baat chhed di.

divya ko aaj tak shadi karne ka koi thos karan nazar nahi aya tha.vo 1 safal ladki thi jo apne pairo pe khadi thi,uska maanana tha ki vo ajit ke sath aise hi khush hai,shadi karke vo ye sab bigadna nahi chahti thi.ajit use asmjhata reh gaya ki shadi ke baad dono hardam sath rahenge magar divya nahi maani.uska kehna tha ki abhi bhi to sath hain.divya ke maa-baap ne bhi divya ko samjhaya ki ajit jaisa bhala ladka dobara nahi milega magar unhe pata tha ki unki beti kitni ziddi hai & agar usne 1 bar na kar di hai to vo apne faisle se hilne vali nahi.

kramashah...........

 
गतान्क से आगे..............

अजीत निराश हो चला गया। दिव्या को थोड़ा अफसोस तो हुआ मगर इतना भी नहीं की वो परेशान हो जाए। दरअसल उसे अजीत से इतना प्यार नहीं था की उसके बिना जिंदगी उसे अधूरी लगे। उन्हीं दिनों दिव्या की पोस्टिंग देवालय के साउथ डिस्ट्रिक्ट में हुई जहा डी॰सी॰पी॰ वर्मा उसके सीनियर अफसर थे। डी॰सी॰पी॰ साहब ने किसी मंत्री की कोई नाजायज बात नहीं मानी और उसने एक ऐसी गंदी चाल चली की सभी लोग वर्मा साहब पे उंगली उठाने लगे। डिपार्टमेंट ने उन्हें सस्पेंड कर दिया। बात इतनी खराब हुई की वर्मा साहब की बीवी भी उन झूठी अफवाहो को मानने लगी।

एक दिव्या ही थी जिसे वर्मा साहब की ईमानदारी पे पूरा भरोसा था। उसने वर्मा साहब के साथ मिलके एक प्लान बनाया और उस मंत्री की चाल उसी पे उलट दी। उन्हीं दिनों जब वर्मा साहब को सभी ने तन्हा छोड़ दिया था और केवल दिव्या ही उनपे भरोसा करती थी, एक दिन वो उससे बात करते हुए जज़्बाती हो गये और दिव्या उनका हौसला बढ़ाने लगी और ना जाने कब दोनों एक दूसरे की बाहों में समा गये। मर्द के लिए चुदाई कई बार तनाव भगाने का ज़रिया भी होती है और वर्मा साहब के लिए भी वो चुदाई कुछ ऐसी ही थी। जब खुमारी टूटी तो उन्हें थोड़ा पछतावा हुआ मगर दिव्या को बहुत मजा आया था। होटल के कमरे में बिस्तर पे नंगी पड़ी वो यही सोच रही थी की अगर परेशान वर्मा साहब उसे इतनी खुशी पहुँचा सकते हैं तो खुश वर्मा साहब तो उसे जन्नत दिखा देंगे।

वर्मा साहब को ये डर सता रहा था की कहीं दिव्या इस बात का कोई गलत फायदा नहीं उठाए लेकिन उनका ये डर दिव्या ने गलत साबित किया और दोनों का रिश्ता और मजबूत हो गया। दोनों को एक दूसरे से कुछ नहीं चाहिए था सिवाय मस्ती के। दिव्या ने गोद में बैठे हुए ही वर्मा साहब की कमीज निकाल दी और उनके सीने के बालों में हाथ फिराते हुए हँसी। वर्मा साहब भी उसकी शर्ट निकाल चुके थे और उसके नीचे पर्पल कलर के ट्रान्स्परेंट ब्रा को देखकर वो चौंक पड़े थे। उनकी हैरत पे ही दिव्या को हँसी आ गयी थी। दिव्या कितने जोश में थी उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था की ब्रा में से साफ दिख रहे उसके गुलाबी निपल्स बिल्कुल कड़े थे और ऐसा लग रहा था की ब्रा के पतले कपड़े को फाड़ डालना चाहते हों।

वर्मा साहब ने अपने दांएं हाथ की उंगलियों से उसके बांएं निपल को मसला तो दिव्या ने आह्ह भरी। नीचे गाण्ड पे वो वर्मा साहब के कुलबुलाते लण्ड को महसूस कर रही थी और उसकी मस्ती और बढ़ रही थी। वर्मा साहब ने उसकी बाईं छाती को अपने दांएं हाथ में भर लिया और झुक के उसकी दांईं छाती को ब्रा के उपर से ही चूसने लगे। दिव्या अब खुल के आहें भरने लगी। केबिन साउंड प्रूफ था और इस वक़्त उन्हें डिस्टर्ब करने वाला भी कोई नहीं था।

दिव्या झुकी और वर्मा साहब के सर को चूमते हुए उनकी पीठ पे अपने नाखूनों से खरोंचने लगी। वर्मा साहब को उसकी यही अदा बहुत पसंद थी, वो बिस्तर में बिल्कुल शेरनी की तरह पेश आती थी। वर्मा साहब की बाहें उसकी कमर के गिर्द थी और उसकी मखमली पीठ पे उनके हाथ फिसल रहे थे। जब उनके हाथों ने उसके ब्रा के हुक्स को खोला तो दिव्या ने खुद अपने कंधो से ब्रा को सरका दिया। उसकी मस्त चुचियाँ नंगी होते ही वर्मा साहब एक बार फिर उन्हें पीने में जुट गये। इस बार दिव्या ने उसके जिस्म को सहलाते हुए अपना बायां हाथ उनकी गोद में घुसाया और उनकी पैंट खोलने लगी।

दोनों के पास वक़्त तो था मगर इतना भी नहीं की आराम से एक दूसरे के जिस्मों का लुफ्त उठाएाँ। वर्मा साहब ने दिव्या को गोद से उतारा तो झट से घुटनों पे बैठ गयी और उनकी पैंट खोलने लगी। वर्मा साहब ने कुर्सी से बिना उठे बस अपनी गाण्ड उचकाई और दिव्या ने उनकी पतलून निकालकर उन्हें पूरा नंगा कर दिया।

48 बरस के वर्मा साहब का 7½ इंच लंबा लण्ड पूरा तना हुआ अब उसकी आाँखो के सामने था। बिना एक पल भी गँवाए दिव्या ने उसे अपने मुँह के हवाले किया और दांएं हाथ से लण्ड को पकड़कर उसे चूसने लगी।

“आह्ह…” वर्मा साहब कुर्सी से उचकते हुए कराहे।

जिस बेबाकी से दिव्या उनके लण्ड के साथ खेलती थी, वो उनका जोश और बढ़ा देती थी। लण्ड के सुपाड़े को अपनी जीभ से चाटते हुए दिव्या ने उनके अंडे दबाए तो वर्मा साहब का जिस्म मस्ती से भर उठा। उन्होंने हाथ नीचे कर दिव्या की चुचियों को दबोच लिया और उन्हें दबाने लगे। कितनी नमद थी उसकी चूचचयााँ। छुते ही सनसनी सीधा हाथों से दिल और उससे भी पहले लण्ड तक पहुँचती थी। कैसे रखती है ये इतनी बड़ी चुचियों को इतना चुस्त। एक बार फिर वर्मा साहब हैरान हुए बिना नहीं रह सके। दिव्या की भारी-भरकम चुचियाँ जरा भी झूली नहीं थी। जब वो जोश में नहीं होती तब भी चुचियाँ सीधी तनी होती थी और उनके निपल सामने देख रहे होते।

दिव्या की लपलपाती जीभ वर्मा साहब के लण्ड की लंबाईं पे चल रही थी और वो उनके अंडे लगातार दबाए जा रही थी। वर्मा साहब का आहें भरते-2 बुरा हाल था। जब दिव्या ने उनके लण्ड को अपनी एक उंगली और अंगूठे के घेरे में पकड़ हिलाते हुए उसके सुपाड़े को मुँह में भर के कोई दो मिनट तक चूसा तो उनका खुद पे काबू रखना बिल्कुल नामुमकिन सा हो गया। कुर्सी पे छटपटाते हुए उन्होंने उसके बाल पकड़ के उसकी जुबान को अपने लण्ड से अलग किया। ऐसा करते ही दिव्या उठी और खड़ी होकर आगे झुक के उन्हें चूमने लगी। वर्मा साहब के हाथ एक बार फिर उसकी चुचियों से जा लगे। काफी देर तक वो वैसे ही उसकी चुचियाँ भींचते हुए

उसे चूमते रहे फिर उन्होंने उसे सीधा खड़ा किया और उसकी नाजुक कमर को अपनी बाहों में भींच उसके सपाट, चिकने पेट से अपना मुँह सटा दिया।

“आह्ह…” दिव्या ने मस्ती में सर पीछे करके आाँखे बंद कर आह्ह भरी। उसके बॉस की जुबान उसके पेट पे फिसल रही थी और धीरे-2 उसकी नाभि की ओर बढ़ रही थी। दिव्या को भी उसी का इंतेजार था। वर्मा साहब की लपलपाती जीभ जैसे ही उसकी नाभि में दाखिल हुई उसकी चूत और ज़्यादा गीली हो गयी। वर्मा साहब उसकी नाभि चाट रहे थे और उनके हाथ उसकी पतलून उतार रहे थे। दिव्या ने उनके कंधे थामकर अपने एक पैर से दूसरे पैर का जूता उतारा और फिर दूसरे से पहले का। जूते उतरते ही पैंट भी उसके जिस्म से अलग हो गयी और डी॰सी॰पी॰ साहब की आाँखो के सामने पर्पल कलर की पतली, ट्रान्स्परेंट पैंटी से नजर आती दिव्या की गीली चूत थी। हौले से उन्होंने पैंटी को नीचे किया।

दिव्या की चूत पे एक भी बाल नहीं था, गोरी, मस्त, भारी जांघों के बीच गुलाबी चूत की दरार इतनी कसी थी मानो दिव्या अभी भी कुँवारी हो। डी॰सी॰पी॰ वर्मा ने चूत के उपर पेट के नीचे के हिस्से पे एक किस ठोंकी और एक बार फिर अपनी बाहों में उसकी कमर को जकड़ लिया और उसकी नाभि चाटने लगे। उनके हाथ उसकी चौड़ी गाण्ड की पुष्ट फांको को तौल रहे थे। दिव्या मस्ती में बेहाल हो उनके सर को झुक के चूमते हुए नीचे धकेल रही थी।

वर्मा साहब उसकी हसरत समझ गये और उन्होंने उसकी नाभि से जुबान निकाली और एक ही झटके में उसे लट्टू की तरह घुमाकर उसकी गाण्ड अपने चेहरे की ओर कर ली। दिव्या थोड़ा लड़खड़ाई और संभलने के लिए उसने अपने हाथ सामने डेस्क पे टिका दिए। वर्मा साहब ने उसकी फांको को फैलाया और अपना मुँह उसकी गाण्ड की दरार में दफना दिया।

“हाईईइ…” उनकी जीभ के उसकी चूत को छूते ही दिव्या कराही। वर्मा साहब उसकी गाण्ड की फांको को रगड़ते हुए उसकी चूत चाट रहे थे और वो बेचैनी से अपनी कमर हिला रही थी। कमर पीछे की ओर धकेलके वो अपनी चूत को अपने बॉस के मुँह पे और दबा रही थी। डी॰सी॰पी॰ वर्मा के हाथ उसकी केले के तने जैसी जांघों को कमर से लेके घुटनों तक सहलाते हुए उसकी चूत चाट रहे थे। दिव्या के मुँह से बस आहें निकल रही थी, कभी तेज, कभी धीमी मगर सभी बेताबी से भरी हुई।

“ओह… आह्ह…” डेस्क पे हाथ टिकाए अपना सर पीछे फेंकते हुए दिव्या चीखी और अपनी गाण्ड से अपने बॉस का चेहरा मसल सा दिया। वो पहली बार झड रही थी।

वर्मा साहब ने उसकी चूत से बहती पानी की धार को अपनी जुबान से साफ किया और उसकी कमर पकड़कर उसे बिठाया तो दिव्या ने भी कुर्सी के हत्थे थाम लिए और धीरे-2 उनके लण्ड पे अपनी चूत को झुकाने लगी।

“ऊओववव…” जैसे-2 चूत लण्ड को अंदर ले रही थी दिव्या की आह्ह तेज हो रही थी। थोड़ी ही देर में उसकी चूत उसके बॉस के लण्ड से भरी थी। वर्मा साहब के लण्ड की मोटाई कुछ ज़्यादा थी और जब भी दिव्या उन्हें अपने अंदर लेती तो उसकी चूत कुछ ज़्यादा फैलने लगती। उसे हल्की तकलीफ होती मगर जो मजा मिलता था, वो उस तकलीफ के मुकाबले कहीं ज़्यादा था।

वर्मा साहब कुर्सी पे पीछे अड़ के बैठ गये और दिव्या एक बार फिर आगे झुक गयी और डेस्क को थाम लिया और कमर उचकाने लगी। दोनों की चुदाई शुरू हो गयी। वर्मा साहब उसकी कमर थामे उसकी हरकतों का लुफ्त उठा रहे थे। दिव्या ने धीरे-2 अपनी कमर की रफ़्तार बढ़ाई और साथ ही साथ अपने बॉस की मदहोशी भी। वो

भी धीरे-2 कमर उचकाकर उसे चोद रहे थे। उनके हाथ अपनी मातहत अफसर की नंगी पीठ पे चल रहे थे और जैसे ही वो उसकी कमर के पास पहुँचते उसकी मक्खनी गाण्ड को भी दबा देते।

दिव्या के बदन में बिजलियों की मानो में अनगिनत धाराएं फूट पड़ी थी। आहें भरते हुए वो पीछे झुकी और अपने बॉस के सीने से लग गयी। जमीन पे अपने पैर लगाकर उन्हें चलाकर उसने कुर्सी को पीछे किया और पीछे की दीवार से लगा दिया फिर अपने बॉस के दांएं कंधे पे सर रख गर्दन को बायें घुमाया और उन्हें गर्मजोशी से चूमने लगी। डी॰सी॰पी॰ वर्मा ने उसकी कसी जाँघों के नीचे हाथ लगाकर उन्हें उठाया और नीचे से कमर उचका के धक्के लगाने लगे।

“उन्न… उनन्…” उनके होंठों से सिले उसके होंठों से अभी भी हल्की से आवाज बाहर आ रही थी। उसके बॉस के धक्के उसे फिर से मदहोशी की उसी बुलंदी पे ले जा रहे थे जहां उसे वो लाजवाब सुकून हासिल होता था। वर्मा साहब अपनी इस अफसर की कसी चूत के कायल थे और इस पोजीशन में वो वैसे शदीद धक्के नहीं लगा पा रहे थे जैसे उनका दिल चाह रहा था।

 
"“जरा खड़ी हो जाओ, दिव्या…” दोनों उसी तरह एक दूसरे से जुड़े खड़े हो गये। वर्मा साहब दिव्या से कद में बस दो इंच ही बड़े थे और इस तरह से दोनों एक ही कद के लगते थे। चुदाई में उन्हें इस बात से बड़ी सहूलियत मिलती थी। खड़े होकर उन्होंने बाईं बाँह दिव्या के सीने पे बाँधी और दांईं को उसकी कमर पे और फिर थोड़े धक्के लगाए। दिव्या की चूत भी अब उनके लण्ड की रगड़ से छलनी होना चाहती थी।

“उनन्… सर…” वर्मा साहब उसकी गर्दन की दांईं तरफ चूम रहे थे। दिव्या ने उनके बायें कंधे पे सर पीछे झुकाकर उनके बालों को अपने दांएं हाथ से पकड़ लिया- “ऐसे नहीं जोर से करिये ना…”

उसकी बेबाकी ने एक बार फिर वर्मा साहब की गर्मी में इजाफा किया और उन्होंने फौरन उसे डेस्क पे झुकाया और उसकी दांईं जाँघ को उठाकर डेस्क पे चढ़ा दिया। उसके बाद जो धक्के उन्होंने लगाए तो दिव्या की आहों का कोई हिसाब ही ना रहा। वर्मा साहब का लण्ड इस पोजीशन में उसकी चूत में गहरे उतरा था और उसकी दीवारो से रगड़ खाकर वो भी झडने को मचल उठा था।

वो आगे झुके और दिव्या की पीठ पे लेट गये। बायें हाथ को उन्होंने उसकी चुचियों से सटाया और दांएं को उसकी चूत के दाने पे। इस सब के दौरान उनकी चुदाई उसी रफ़्तार से जारी थी। दिव्या भी मदहोशी की उस मंजिल पे पहुँच रही थी जहां ये सफर अपने अंजाम पे पहुँचता था। उसकी चूत और सिकुड गयी और वर्मा साहब के लण्ड को और कस लिया। एक बार एक मुजरिम से हाथापाई के दौरान उस मुजरिम ने उनका गला अपने हाथों से घोंटना शुरू कर दिया था। दिव्या की चूत की पकड़ उन्हें उस मुजरिम के हाथों की मजबूत गिरफ़्त जैसी ही लगती थी। फ़र्क ये था की मुजरिम की गिरफ़्त उनकी जिंदगी खत्फम करने को थी और ये गिरफ़्त मानो उन्हें हर बार एक नया जीवन देती थी।

“ऊवंन्न… आआह्ह… आअह्ह… आआआहहा”

दिव्या की चूत की दीवारें मानो एक दूसरे से बिल्कुल चिपक जाना चाहती थी और उनकी इस हरकत से उनके बीच फँसे डी॰सी॰पी॰ वर्मा का लण्ड बिल्कुल पीसा महसूस कर रहा था। वर्मा साहब के मजे की तो कोई इंतेहा नहीं थी। चीखती दिव्या झड रही थी और उसके जिस्म से चिपके वो भी झटके खा रहे थे। उनका लण्ड उनके गाढ़े, गर्म वीर्य से दिव्या की चूत को भर रहा था। थोड़ी देर बाद उन्होंने लण्ड को बाहर खींचा और डेस्क पे औंधी पड़ी हाँफती दिव्या को उठा के बाहों में भरा और चूम लिया।

“ये कल के कामयाब एनकाउंटर का इनाम है…”

दिव्या मुस्कुराई और उनकी बाहों से निकलकर दोनों के कपड़े समेटने लगी।

“आज मुझे तुम्हें एक खबर देनी है और एक इंसान से मिलवाना है…” वर्मा साहब ने दिव्या के हाथ से अपना अंडरवेर लिया और अपने पैर उसने उसमें डाले।

“कैसी खबर…” दिव्या पैंटी पहन चुकी थी और ब्रा डालकर उसके हुक्स लगाने की कोशिश कर रही थी।

“एक नया अफसर तबादला होके यहां हमारे डिपार्टमेंट में आया है…” वर्मा साहब ने आगे बढ़कर उसके हुक्स लगाए और फिर अपनी पैंट पहनने लगे।

“अजीत चौहान…” उन्होंने अपनी शर्ट की बाँह में हाथ डाला।

दिव्या की पीठ उनकी ओर थी इसलिए वो उसके चेहरे के भाव नहीं देख पाए। दिव्या को अजीब लगा। क्यूँ आ रहा था वो यहां… ऐसा नहीं था की अजीत का सामना करने से उसे डर लग रहा था, मगर उन दोनों के बीच जो हुआ था उसके बाद साथ काम करने में कहीं कोई परेशानी ना हो, उसे इसी बात का डर था। लेकिन अब किया क्या जा सकता था। चलो, देखा जाएगा। उसने वर्दी पहनकर अपने जूते पैरों में डाले।

“और मिलवा किससे रहे हैं…” अपनी बेल्ट बाँध डेस्क के दूसरी तरफ रखी कुर्सियों में से एक पे बैठ गयी।

“बस थोड़ा इंतेजार करो। थोड़ी ही देर में वो शख्स यहां होगा…” डी॰सी॰पी॰ वर्मा मुस्कुराए और अपनी कुर्सी पे बैठ गये। डी॰सी॰पी॰ साहब तो किसी से फोन पे बातों में लग गये और दिव्या बैठी अपनी उलझन के बारे में सोचने लगी, उसे अपने काम में किसी तरह की रुकावट पसंद नहीं थी। अपने छोटे से केरियर में ये उसकी खुशनसीबी थी की अभी तक उसके किसी भी सीनियर अफसर ने उसके काम करने के तरीके पे कोई ऐतराज नहीं जताया था। लेकिन वो अच्छे से जानती थी की जिस दिन भी उससे कोई गलती हुई तो उसे अपने तरीके बदलने पड़ेंगे। अब अजीत आ रहा था और शायद रोज ही दोनों का सामना होगा। कहीं उसने फिर से रिश्ता जोड़ने की कोशिश की तो… उसे अजीत की भलमंसाहत पे कोई शुबहा नहीं था, मगर उसके इश्क पे भरोसा नहीं था उसे। बहुत मुमकिन था की पुरानी प्रेमिका को सामने देखकर वो फिर से उसे अपनी ओर खींचना चाहे लेकिन अब वो उस रिश्ते को दोबारा जोड़ने को तैय्यार नहीं थी।

“हाँ, उन्हें अंदर भेजो…” डी॰सी॰पी॰ प्रदीप वर्मा ने इंटरकॉम नीचे रखा- “वो आ गया है…”

तभी दरवाजा खुला और लंबा, चौड़ा, सांवला शख्स अंदर दाखिल हुआ- “हेलो, डी॰सी॰पी॰…” उसकी भारी आवाज कमरे में गूँजी।

“हेलो, प्रोफेसर…” दिव्या ने देखा वर्मा साहब उस इंसान को देखकर अपनी कुर्सी से उठ आगे बढ़ आए- “कैसे हो दोस्त…” दोनों दोस्त गले लग गये।

.दिव्या की पुलिसिया निगाहो ने उस शख्स का मुआयना करना शुरू कर दिया.उम्र मे वो डीसीपी साहब के बराबर ही लग रहा था मगर कद उनसे ऊँचा था....लगभग 6'3" तो होगा ही....& कंधे कितने चौड़े थे!....उसने पूरे बाज़ू की सफेद कमीज़ पहनी थी जिसकी आस्तीने मूड के कोहनी तक की हुई थी.सीने की चौड़ाई से शर्ट खींच सी रही थी & आस्तीनो से निकले बाज़ू पेड़ की मोटी शाख जैसे मज़बूत थे.रंग सांवला था & सूरत भी कोई खास नही थी मगर उसका डील-डौल & बातो का अंदाज़ उसे खास बना रहा था.

"हेलो,ऑफीसर!",वेर्मा साहब से गले मिलने के बाद उसकी नज़र दिव्या पे पड़ी,"प्रदीप,आजकल तुमलोग समझदार हो गये हो."

"क्यू भाई?",कॅबिन मे कोने मे लगे सोफा सेट की ओर बढ़ उन्होने अपने दोस्त & दिव्या को भी वाहा बैठने का इशारा किया.

"भाई,मैने अब तक जितनी पोलिसेवालिया देखी हैं उनसे खूबसूरत तो मुझे पोलिसेवाले लगते हैं पर इनकी बात कुच्छ और है.",वो दिव्या के बिल्कुल सामने आया & अपना दाया हाथ आगे कर दिया,अपनी निगाहे उसकी निगाहो से मिला दी,"हेलो.",दिव्या ने हाथ मिलाके जवाब दिया.वो 1 तक उसकी आँखो मे देखे जा रहा था मगर दिव्या ने अपनी पलके नही झपकाई.उसके लिए नज़रे मिलाना भी 1 मुक़ाबला था & किसी मुक़ाबले मे वो दूसरे नंबर पे आए ये उसे मंज़ूर नही था.

क्रमशः...........

 
KHEL KHILADI KA paart--2

gataank se aage..............

ajit nirash ho chala gaya.divya ko thoda afsos to hua magar itna bhi nahi ki vo pareshan ho jaye.darasal use ajit se itna pyar nahi tha ki uske bina zindagi use adhuri lage.unhi dino divya ki posting devalay ke south district me hui jaha DCP Verma uske senior afsar the.DCP sahab ne kisi mantri ki koi najayaz baat nahi mani & usne 1 aisi gandi chal chali ki sabhi log verma sahab pe ungli uthane lage.department ne unhe suspend kar diya.baat itni kharab hui ki verma sahab ki biwi bhi un jhuthi ahwaho ko maanane lagi.1 divya hi thi jise verma sahab ki imandari pe pura bharosa tha.usne verma sahab ke sath milke 1 plan banaya & us mantri ki chal usi pe ulat di.

unhi dino jab verma sahab ko sabhi ne tanha chhod diya tha & keval divya hi unpe bharosa karti thi,1 din vo us se baat karte hue jazbati ho gaye & divya unka hausla badhane lagi & na jane kab dono 1 dusre ki baaho me sama gaye.mard ke liye chudai kayi baar tanav bhagane ka zariya bhi hoti hai & verma sahab ke liye bhi vo chudai kuchh aisi hi thi.jab khumari tuti to unhe thoda pachhtawa hua magar divya ko bahut maza aaya tha.

hotel ke kamre me bistar pe nangi padi vo yehi soch rahi thi ki agar pareshan verma sahab use itni khushi pahuncha sakte hain to khush verma sahab to use jannat dikha denge!verma sahab ko ye darr sata raha tha ki kahi divya is baat ka koi galat fayda nahi uthaye lekin unka ye darr divya ne galat sabit kiya & dono ka rishta & mazbut ho gaya.dono ko 1 dusre se kuchh nahi chahiye tha siway masti ke.

divya ne god me baithe hue hi verma sahab ki kamiz nikal di & unke seene ke balo me hath firate hue hansi.verma sahab bhi uski shirt nikal chuke the & uske neeche purple color ke transparent bar ko dekh vo chaunk pade the.unki hairat pe hi divya ko hansi aa gayi thi.divya kitne josh me thi uska andaza isi baat se lagaya ja sakta tha ki bra me se saaf dikh rahe uske gulabi nipples bilkul kade the & aisa lag raha tha ki bra ke patle kapde ko phad dalna chahte hon.

verma sahab ne apne daye hath ki ungliyo se uske baye nipple ko masla to divya ne aah bhari.neeche gand pe vo verma sahab ke kulbulate lund ko mehsus kar rahi thi & uski masti aur badh rahi thi.verma sahab ne uski bayi chhati ko apne daye hath me bhar liya & jhuk ke uski dayi chhati ko bra ke upar se hi chusne lage.divya ab khul ke aahe bharne lagi.cabin sound proof tha & is waqt unhe disturb karne vala bhi koi nahi tha.

divya jhuki & verma sahab ke sar ko chumte hue unki pith pe apne nakhuno se khaorchne lagi.verma sahab ko uski yehi ada bahut pasand thi,vo bistar me bilkul sherni ki tarah pesh aati thi.verma sahaba ki baahe uski kamar ke gird thi & uski makhmali pith pe unke hath fisal rahe the.jab unke hatho ne uske bar ke hooks ko khola to divya ne khud apne kandho se bra ko sarka diya.uski mast chhatiya nangi hote hi verma sahab 1 baar fir unhe pine me jut gaye.is baar divya ne uske jism ko sehlate hue apna baya hath unki god me ghusaya & unki pant khone lagi.

dono ke paas waqt to tha magar itna bhi nahi ki aaram se 1 dusre ke jismo ka lutf uthayen.verma sahab ne divya ko god se utara to jhat se ghutno pe baith gayi & unki pant kholne lagi.verma sahab ne kursi se bina uthe bas apni gand uchkayi & divya ne unki patlun nikal unhe pura nanga kar diya.48 baras ke verma sahab ka 7.5 inch lumba lund pura tana ab uski aankho ke samne tha.bina 1 pal bhi gavayen divya ne use apne munh ke hawale kiya & daye hath se lund ko pakad use chusne lagi.

"aahhhh....!",verma sahab kursi se uchakte hue karahe.jis bebaki se divya unke lund ke sath khelti thi,vo unka josh aur badha deti thi.lund ke supade ko apni jibh se chatate hue divya ne unke ande dabaye to verma sahab ka jism masti se bhar utha.unhone hath neeche kar divya ki chhatiyo ko daboch liya & unhe dabane lage....kitni narm thi uski choochiyaan!chhute hi sansani seedha hatho se dil & us se bhi pehle lund tak pahunchti thi....kaise rakhti hai ye itni badi chhatiyo ko itna chust?..1 baar fir verma sahab hairan hue bina nahi reh sake.divya ki bhari-bharkam chhatiya zara bhi jhuli nahi thi.jab vo josh me nahi hoti tab bhi chhatiya seedhi tani hoti thi & unke nipple samne dekh rahe hote.

Divya ki laplapati jibh Verma Sahab ke lund ki lambai pe chal rahi thi & vo unke ande lagatar dabaye ja rahi thi.verma sahab ke aahe bharte-2 bura haal tha.jab divya ne unke lund ko apni 1 ungli & anguthe ke ghere me pakad hilate hue uske supade ko munh me bhar ke koi 2 minute tak chusa to unka khud pe kabu rakhna bilkul namumkin sa ho gaya.kursi pe chhatpatate hue unhone uske baal pakad ke uski zuban ko apne lund se alag kiya.

aisa karte hi divya uthi & khadi ho aage jhuk ke unhe chumne lagi.verma sahab ke hath 1 baar fir uski chhatiyo se ja lage.kafi der tak vo vaise hi uski chhatiya bhinchte hue use chumte rahe fir unhone use seedha khada kiya & uski nazuk kamar ko apni baaho me bhinch uske sapat,chikne pet se apna munh sata diya.

"aahhh....!",divya ne masti me sar peechhe kar aankhe band kar aah bhari.uske boss ki zuban uske pet pe fisal rahi thi & dhire-2 uski nabhi ki or badh rahi thi.divya ko bhi usi ka intezar tha.verma sahab ki laplapati jibh jaise hi uski nabhi me dakhil hui uski chut aur zyada gili ho gayi.verma sahab uski nabhi chat rahe the & unke hath uski patloon utar rahe the.

divya ne unke kandhe tham apne 1 pair se dusre pair ka juta utara & fir dusre se pehle ka.jute utarte hi pant bhi uske jism se alag ho gayi & DCP sahab ki aankho ke samne purple color ki patli,transparent panty se nazar aati divya ki gili chut thi.haule se unhone panty ko neeche kiya.divya ki chut pe 1 bhi baal nahi tha,gori,mast,bhari jangho ke beech gulabi chut ki darar itni kasi thi mano divya abhi bhi kunwari ho.

DCP verma ne chut ke upar pet ke neeche ke hisse pe 1 kiss thonki & 1 baar fir apni baaho me uski kamar ko jakad liya & uski nabhi chatne lage.unke hath uski chaudi gand ki pusht fanko ko taul rahe the.divya masti me behal ho unke sar ko jhuk ke chumte hue neeche dhakel rahi thi.verma sahab uski hasrat samajh gaye & unhone uski nabhi se zuban nikali & 1 hi jhatke me use lattu ki tarah ghuma uski gand apne chehre ki or kar li.

divya thoda ladkhadayi & sambhalne ke liye usne apne hath samne desk pe tika diye.verma sahab ne uski fanko ko failaya & apna munh uski gand ki darar me dafna diya,"haiiii....!",unki jibh ke uski chut ko chhute hi divya karahi.verma sahab uski gand ki fanko ragadte hue uski chut chat rahe the & vo bechaini se apni kamar hila rahi thi.kamar peechhe ki or dhakel vo apni chut ko apne boss ke munh pe aur daba rahi thi.DCP verma ke hath uski kele ke tane jaisi jangho ko kamar se leke ghutno tak sehlate hue uski chut chaat rahe the.divya ke munh se bas aahe nikal rahi thi-kabhi tez,kabhi dhimi magar sabhi betabi se bhari hui.

"OHHHHHHH....AAHHHHHH.....!",desk pe hath tikaye apna sar peechhe fenkte hue divya chikhi & apni gand se apne boss ka chehra masal sa diya-vo pehli baar jhad rahi thi.verma sahab ne uski chut se behti pani ki dhar ko apni zuban se saaf kiya & uski kamar pakad use bithaya to divya ne bhi kursi ke hatthe tham liye & dhire-2 unke lund pe apni chut ko jhukane lagi.

"ooowwwww.....!",jaise-2 chut lund ko andar le rahi thi divya ki aah tez ho rahi thi.thodi hi der me uski chut uske boss ke lund se bhari thi.verma sahab ke lund ki motai kuchh zyada thi & jab bhi divya unhe apne andar leti uski chut kuchh zyada failne lagti .use halki taklif hoti magar jo maza milta tha,vo us taklif ke mukable kahi zyada tha.

verma sahab kursi pe peechhe ad ke baith gaye & divya 1 baar fir aage jhuk gayi & desk ko tham liya & kamar uchkane lagi.dono ki chudai shuru ho gayi.verma sahab uski kamar thame uski harkato ka lutf utha rahe the.divya ne dhire-2 apni kamar ki rafatar badhayi & sath hi sath apne boss ki madhoshi bhi.vo bhi dhire-2 kamar uchka use chod rahe the.unke hath apni maathat afsar ki nangi pith pe chal rahe the & jaise hi vo uski kamar ke paas pahunchte uski makkhani gand ko bhi daba dete.

divya ke badan me bijliyo ki mano me anginat dharaye fut padi thi.aahe bharte hue vo peechhe jhuki & apne boss ke seene se lag gayi.zamin pe apne pair laga unhe chala usne kursi ko peechhe kiya & peechhe ki deewar se laga diya fir apne boss ke daye kandhe pe sar rakh gardan ko baye ghumaya & unhe garmjoshi se chumne lagi.DCP verma ne uski kasi jangho ke neeche hath laga unhe uthaya & neeche se kamar uchka ke dhakke lagane lage.

"unn...unnn..!",unke hotho se sile uske hotho se abhi bhi halki se aavaz bahar aa rahi thi.uske boss ke dhakke use fir se madhoshi ki usi bulandi pe le ja rahe the jaha use vo lajawab sukun hasil hota tha.verma sahab apni is afsar ki kasi chut ke kayal the & is position me vo vaise shadid dhakke lanhi laga pa rahe the jaise unka dil chaha raha tha.

"zara khadi ho jao,divya.",dono usi tarah 1 dusre se jude khade ho gaye.verma sahab divya se kad me bas 2 inch hi bade the & is tarah se dono 1 hi kad ke lagte the.chudai me unhe is baat se badi sahuliyat milti thi.khade ho unhone bayi banh divya ke seene pe bandhi & dayi ko uski kamar pe & fir thode dhakke lagaye.divya ki chut bhi ab unke lund ki ragad se chhalni hona chahti thi.

"unnn....sir..",verma sahab uski gardan ki dayi taraf chum rahe the.divya ne unke baye kandhe pe sar peechhe jhuka unke balo ko apne daye hath se pakad liya,"....aise nahi zor se kariye na!",uski bebaki ne 1 baar fir verma sahab ki garmi me izafa kiya & unhone fauran use desk pe jhukaya & uski dayi jangh ko utha desk pe chadha diya.uske baad jo dhakke unhone lagaye to divya ki aaho ka koi hisab hi na raha.verma sahab ka lund is position me uski chut me gehre utra tha & uski deewaro se ragad kha vo bhi jhadne ko machal utha tha.

vo aage jhuke & divya ki pith pe let gaye.baye hath ko unhone uski choochiyo se sataya & daye ko uski chut ke dane pe.is sab ke dauran unki chudai usi raftar se jari thi.divya bhi madhoshi ki us manzil pe pahunch rahi thi jaha ye safar apne anjam pe pahunchta tha.uski chut aur sikud gayi & verma sahab ke lund ko aur kas liya.1 baar 1 mujrim se hathapai ke dauran us mujrim ne unka gala apne hatho se ghotna shuru kar diya tha.divya ki chut ki pakad unhe us mujrim ke hatho ki mazbut giraft jaisi hi lagti thi.fark ye tha ki mujrim ki giraft unki zindagi khatm karne ko thi & ye giraft mano unhe har baar 1 naya jiwan deti thi.

"ooonnn...aaaahhhh....AAAHHHHHH....AAAAAAAAAAHHHHHHHHH......!",divya ki chut ki deewaren mano 1 dusre se bilkul chipak jana chahti thi & unki is harkat se unke beech fanse DCP verma ka lund bilkul pisa mehsus kar raha tha.verma sahab ke maze ki to koi inteha nahi thi.chikhti divya jhad rahi thi & uske jism se chipke vo bhi jhatke kha rahe the,unka lund unke gadhe,garm virya se divya ki chut ko bhar raha tha.thodi der baad unhone lund ko bahar khincha & desk pe aundhi padi haanfti diovya ko utha ke baaho me bhara & chum liya.

"ye kal ke kamyab encounter ka inam hai.",divya muskurayi & unki baaho se nikal dono ke kapde sametne lagi.

"aaj mujhe tumhe 1 khabar deni hai & 1 insan se milwana hai.",verma sahab ne divya ke hath se apna underwear liya & apne pair usne usme dale.

"kaisi khabar?",divya panty pahan chuki thi & bra daal kar uske hooks lagane ki koshish kar rahi thi.

"1 naya afsar tabadla hoke yaha humare department me aya hai.",verma sahab ne aage badh uske hooks lagaye & fir apni pant pehanane lage.

"Ajit Chauhan.",unhone apni shirt ki banh me hath dala.divya ki pith unki or thi isliye vo uske chehre ke bhav nahi dekh paye.divya ko ajib laga....kyu aa raha tha vo yaha?..aisa nahi tah ki ajit ka samna karne se use darr lag raha tha magar un dono ke beech jo hua tha uske baad sath kaam karne me kahi koi pareshani na ho,use isi baat ka darr tha....lekin ab kiya kya ja sakta tha!..chalo,dekha jayega.usne vardi pehan pane jute pairo me dale.

"aur milwa kis se rahe hain?",apni belt bandh desk ke dusri taraf rakhi kursiyo me se 1 pe baith gayi.

"bas thoda intezar karo.thodi hi der me vo shakhs yaha hoga.",DCP verma muskuraye & apni kursi pe baith gaye.

DCP Sahab to kisi se fone pe baato me lag gaye & Divya baithi apni uljhan ke bare me sochne lagi,use apne kaam me kisi tarah ki rukavat pasand nahi thi.apne chhote se career me ye uski khushnasibi thi ki abhi tak uske kisi bhi senior afsar ne uske kaam karne ke tarike pe koi aitraz nahi jataya tha lekin vo achhe se janti thi ki jis din bhi us se koi galti hui to use apne tarike badalne padenge....ab Ajit aa raha tha & shayad roz hi dono ka samna hoga..kahi usne fir se rishta jodne ki koshish ki to?..use ajit ki bhalmansahat pe koi shubaha nahi tha magar uske ishq pe bharosa nahi tha use.bahut mumkin tha ki purani premika ko samne dekh vo fir se use apni or khinchna chahe lekin ab vo us rishte ko dobara jodne ko taiyyar nahi thi.

"haan,unhe andar bhejo.",DCP Pradip Verma ne intercom neeche rakha,"..vo aa gaya hai.",tabhi darwaza khula & lamba,chauda,sanvla shakhs andar dakhil hua,"hello,DCP!",uski bhari aavaz kamre me gunji.

"hello,Professor.",divya ne dekha verma sahab us insan ko dekh apni kursi se uth aage badh aaye,"kaise ho dost?",dono dost gale lag gaye.divya ki pulisiya nigaho ne us shakhs ka muayana karna shuru kar diya.umra me vo DCP sahab ke barabar hi lag raha tha magar kad unse ooncha tha....lagbhag 6'3" to hoga hi....& kandhe kitne chaude the!....usne pure bazu ki safed kamiz pehni thi jiski aasteene mud ke kohni tak ki hui thi.seene ki chaudai se shirt khinch si rahi thi & aasteeno se nikle bazu ped ki moti shakh jaise mazbut the.rang sanvla tha & surat bhi koi khas nahi thi magar uska deel-daul & baato ka andaz use khas bana raha tha.

"hello,officer!",verma sahab se gale milne ke baad uski nazar divya pe padi,"Pradip,aajkal tumlog samajhdar ho gaye ho."

"kyu bhai?",cabin me kone me lage sofa set ki or badh unhone apne dost & divya ko bhi vaha baithne ka ishara kiya.

"bhai,maine ab tak jitni policevaliya dekhi hain unse khubsurat to mujhe policevale lagte hain par inki baat kuchh aur hai.",vo divya ke bilkul samne aaya & apna daya hath aage kar diya,apni nigahe uski nigaho se mila di,"hello.",divya ne hath milake jawab diya.vo 1 tak uski aankho em dekhe ja raha tha magar divya ne apni palke nahi jhapkayi.uske liye nazre milana bhi 1 muqabla tha & kisi muqable me vo dusre number pe aaye ye use manzur nahi tha.

kramashah...........

 
गतान्क से आगे..............

शख्स की मुस्कुराहट हल्की हो गयी थी मगर निगाहो का पैनापन वैसा ही था.दिव्या उनमे अपनी खूबसूरती की तारीफ सॉफ देख रही थी मगर कुच्छ और भी था उसके अलावा जिसे वो समझ नही पा रही थी.तभी उस इंसान ने इशारा किया कि वो पहले बैठे तो दोनो की नज़रो की डोर टूटी & दिव्या 1 सोफे पे बैठ गयी.

"प्रोफेसर,ये एसीपी दिव्या माथुर है."

"ओह..तो आप ही हैं जिनकी तारीफो के पुल मेरे दोस्त ने फोन पे बाँधे थे."

"हां..अरे 8 से उपर हो गया.दोस्त,पहले ज़रा ये देख लें फिर काम की बाते करेंगे?"

"ओके."

"दिव्या,तुम्हे जाने की जल्दी तो नही?"

"नो,सर.",जल्दी तो उसे थी,अजीत के आने की खबर सुनके वो थोड़ा परेशान हो गई थी & उस परेशानी को मिटाने के लिए उसने सोचा था कि घर जाके अपने बाथटब के गुनगुने पानी मे बैठेगी मगर अपने सीनियर अफ़सर की बात वो टाल नही सकती थी & फिर उसे इस शख्स के बारे मे जानने की उत्सुकता भी हो गयी थी.

"गुड.",वेर्मा साहब ने रिमोट उठा के टीवी ऑन किया,"..आज जसजीत प्रधान आने वाले चुनाव के लिए अपना कॅंपेन शुरू करने वाला है.",वो नाम सुनते ही दिव्या & प्रोफेसर की आँखे भी टीवी स्क्रीन से चिपक गयी.

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डेवाले राज्य की राजधानी थी & वाहा की सियासत का केन्द्र.4 महीनो मे राज्य की असेंब्ली के चुनाव होने वाले थे & उसके लिए सभी सियासी पार्टियो मे गहमा-गहमी शुरू हो गयी थी.वॉरेन रोड का इलाक़ा जहा कि लगभग सभी पार्टियो के दफ़्तर थे चुनाव के टिकेट की आस मे बैठे लोगो से भरने लगा था मगर कुच्छ ऐसे भी खुशनसीब थे जिन्हे उन लोगो की तरह वॉरेन रोड के दफ़्तरो के चक्कर नही लगाने पड़ते थे.ये वो लोग थे जिनकी जीत लगभग पक्की मानी जाती थी.

उन्ही मे से 1 इंसान था जसजीत प्रधान,जनहित पार्टी का डेवाले की डेवाले सेंट्रल सीट का एमएलए.पिच्छली 2 बार से उसने इस सीट से चुनाव जीता था.प्रधान 1 ईमानदार आदमी था.सियासत मे ऐसे लोगो की शायद कोई जगह नही मगर जसजीत इस नियम का अपवाद था.उसकी पार्टी अभी सत्ता मे थी & पिच्छले 3 सालो से वो मंत्री भी था मगर अभी तक उसका नाम किसी भी घोटाले या स्कॅंडल मे नही आया था.ज़्यादातर लोग उसकी बड़ी इज़्ज़त करते थे & उनका मानना था कि अब वक़्त आ गया है कि जसजीत प्रधान को बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी जाए जैसे कि राज्य के मुख्यमंत्री की.

मौजूदा मुख्यमंत्री को ये बात बिल्कुल भी अच्छी नही लगी थी लेकिन 1 तो जनता की पसंद उपर से जनहित पार्टी के हाइ कमॅंड का भी यही मानना था की ऐसे लोकप्रिया नेता को आगे लाना ही चाहिए.तो आज दुस्सेहरा मैदान,जहा डेवाले की लगभग हर बड़ी रॅली या फिर जलसा होता था,खचाखच भरा था,उन लोगो की भीड़ से जो अपने मनपसंद नेता को सुनना,देखना चाहते थे.हन,उस भीड़ मे ऐसे लोगो की तादाद ज़्यादा थी जो की खाने के पॅकेट,1 सारी या कमीज़ & 200 रुपयो के लालच मे आए थे मगर वो भी प्रधान को 1 अच्छा आदमी मानते थे.सभी को बस अब बेसब्री से प्रधान के बोलने का इंतेज़ार था.

"बहनो & भाइयो..",6 फिट लंबा 1 इंसान स्टेज पे आया & लाउडस्पिकर्स पे उसकी आवाज़ गूँजी.तालियो की गड़गड़ाहट से लोगो ने उसका इस्तेक़्बाल किया & उसने अपना भाषण शुरू किया.

"भाई,मानना पड़ेगा ये आदमी बोलता बहुत बढ़िया है.",वेर्मा साहब ने अपने दोस्त से कहा.

"हूँ.",प्रोफेसर गौर से प्रधान को सुन रहा था.

"क्या कहते हो प्रोफेसर?अगर इस बार जनहित जीते तो इसे मुख्यमंत्री बनाना चाहिए?"

"बिल्कुल पर्फेक्ट है ना CM की कुर्सी के लिए.",प्रोफेसर अपने सोफे पे अड़ के बैठ गया & मुस्कुराया,"..ये देखो.",उसने टीवी की ओर इशारा किया,"..42 साल का आदमी,6 फिट का कद,देखने मे हॅंडसम & वाहा देखो..",सन टीवी पे दिख रहे प्रधान के पीछे स्टेज पे बैठे बाकी लोगो की ओर इशारा किया,"..वाहा."

"कौन..अंजलि प्रधान?",दिव्या ने पुचछा.

"हां,उसकी बीवी.दोनो की अरेंज्ड मॅरेज हुई थी.अंजलि भी बड़े माने हुए परिवार से है & दोनो के परिवार वालो ने जब दोनो का रिश्ता तय किया तो दोनो ने उनकी मर्ज़ी पे कोई ऐतराज़ नही जताया.अब दोनो के 2 बच्चे हैं-1 आदर्श हिन्दुस्तानी परिवार.अब ऐसे आदमी को कौन अपना लीडर नही बनाना चाहेगा?"

"प्रोफेसर,माफ़ कीजिएगा..",दिव्या बोली,"..मगर आपकी बातो मे तारीफ नही मज़ाक की महक है."

"अच्छा!",प्रोफेसर ने हैरान होने का नाटक किया,"..आप भी प्रधान की फॅन लगती हैं?..& हो भी क्यू ना!प्रधान इतना हंडसॅम जो है,भाई!",उसने ठहाका लगाया.

"मैं फॅन नही हू..",दिव्या को बहुत ज़ोर का गुस्सा आया,"..लेकिन 1 अच्छे आदमी का मज़ाक क्यू उड़ाएँ भला?"

"दिव्या जी,वो 1 नेता है,पॉलिटीशियन..",प्रोफेसर अब संजीदा था,"..& मेरा मानना है कि नेताओ से बड़ी मतलबी क़ौम दुनिया मे दूसरी नही.तो अगर इस इंसान मे अच्छाइयाँ नज़र आती है तो वो केवल इसलिए क्यूकी ये उसका सत्ता पाने का रास्ता है."

"तो इसमे क्या बुराई है?अगर वो अच्छाई कर रहा है & इसमे उसका फयडा हो तो कौन सा पाप किया उसने?!!आख़िर इसमे आम आदमी का भी तो भला हो रहा है."

"मैं बस 1 बात कहूँगा,दिव्या जी..",प्रोफेसर अब बिल्कुल संजीदा था & दिव्या ने गौर किया की जब वो संजीदा होकर बोलता था तो उसकी भारी आवाज़ बड़ी दिलकश हो जाती थी..इतनी कि..उसने दिमाग़ से उस गुस्ताख ख़याल को निकाला,"..कि अच्छा होना & अच्छा होने का नाटक करना 2 बहुत अलग बाते हैं.कोई इंसान नाटक कितने दिन कर सकता है?आख़िर कभी ना कभी तो वो अपना असली रंग दिखाएगा.आपकी तरह मेरी भी यही ख्वाहिश है कि ये इंसान सचमुच दिल का अच्छा हो & हम सब का भला हो लेकिन क्या करू?ये कम्बख़्त नेता....इन्होने अपनी हर्कतो से हम सबका भरोसा खो दिया है."

डीसीपी वेर्मा मुस्कुराए & प्रधान को सुनने लगे.उस वक़्त प्रधान को सभी सुन रहे थे,वेर्मा साहब,प्रोफेसर & दिव्या जैसे लोग जोकि बस किनारे से ये खेल देख रहे थे & वो भी जिन्होने इस खेल मे दाँव लगाया हुआ था जिसमे से कुच्छ प्रधान के दुश्मन थे,कुच्छ दोस्त & कुच्छ....पता नही.

वॉरेन रोड के 1 छ्होर पे था लोक विकास पार्टी का दफ़्तर,वो पार्टी जिस से जनहित की सीधी टक्कर रहती थी.पार्टी ऑफीस इस वक़्त खाली था & बस उपरी मंज़िल के 1 कमरे मे कुच्छ लोग बैठे टीवी देख रहे थे.

 
"बात तो माननी पड़ेगी,भैया जी..",1 खड़ी के कुर्ते पाजामे मे बैठे बुज़ुर्ग नेता ने सामने के दीवान पे मसनद से टेक लगाके बैठे टीवी देखते शख्स से कहा,"..प्रधान लफ़ज़ो का जादूगर है & लोगो को बातो के जाल मे फँसा लेता है."

"हूँ.",कमरे मे उन दोनो के अलावा3 लोग और थे 2 मर्द & 1 औरत,"..लेकिन इसे हराना तो होगा ही इस बार नेता जी नही तो आगे जाके ये आदमी केवल राज्य के स्तर पे नही राष्ट्रिया स्तर पे भी हमे तकलीफ़ देगा."

"तो यहा से किस से खड़ा करेंगे इस बार,भैया जी?",इस सवाल से कमरे मे मौजूद सभी लोगो का ध्यान टीवी से हट गया.सभी जानते थे कि प्रधान के खिलाफ खड़ा होना & हारना 1 ही बात है & जिसे भी टिकेट मिला समझो उसका सियासी करियर चौपट हुआ & इस बात का फ़ैसला लेना था केवल भैया जी को.बाकी सभी सीट्स के लिए कमिटी बनी थी जो उमीदवारो का चुनाव करती मगर कुच्छ खास सीट्स जिनमे डेवाले की डेवाले सेंट्रल सीट के बारे मे सारा फ़ैसला बस भाय्या जी के हाथो मे था.और होता भी क्यू ना?भैया जी ही लोक विकास के सब कुच्छ थे,पार्टी की पहचान उन्ही से थी & पिच्छले चुनाव मे पार्टी की हार से वो खार भी खाए बैठे थे.

भैया जी यानी की एमएलए बलदेव काबरा,इस वक़्त असेंब्ली मे ऑपोसिशन का लीडर & राज्य का 1 कद्दावर नेता.कयि साल पहले की बात है जब वो 24 बरस के थे & दुनिया उन्हे केवल बलदेव के नाम से ही जानती थी.राज्य की प्राइवेट मिल्स के वर्कर्स & सरकारी कॉलेजस के टीचर्स को 3 महीने से तनख़्वाह नही मिली थी.बलदेव ने उन सबके लिए आवाज़ उठाई & उन लोगो ने उसे अपना भाई बना लिया.किसी मिल वर्कर ने उसे भैया जी कह के पुकारा था & उस दिन से उसका यही नाम पड़ गया.उस आंदोलन ने सरकार को झुकाया & बलदेव का नाम सियासत के गलियारो मे लिया जाने लगा.उसके बाद वो बलदेव ना रहा भाय्या जी बन गया.इंसानो के कंधो को सीढ़िया बनाके आज वो इस मुक़ाम पे पहुँचा था.

भैया जी अब काफ़ी बदल चुके थे.अब उनकी उम्र 54 बरस थी,सर के बाल सफेद हो चुके थे & जिन लोगो के लिए उन्होने ने उनके मालिको से लड़ाई की थी अब वो उन्ही मालिको के दोस्त बन चुके थे.हर महीने वो दोस्त उन्हे तोहफे देते जिन्हे भाय्या जी विदेश मे महफूज़ रख देते.अब भाय्या जी का मक़सद बस सत्ता,उस से मिलनी वाली ताक़त & दौलत थे & उनकी राह मे जनहित रोड़ा बनी हुई थी & उस रोड़े के पीछे खड़ा था जसजीत प्रधान.

"अभी कुच्छ तय नही किया है.अब इतने नाज़ुक मसले पे थोडा सोच-विचार तो करना ही होगा.",भैया जी मुस्कुराए & टीवी देखने लगे.ये इस आदमी की सबसे बड़ी ख़ासियत थी,ये बहुत कम बोलता था & जो बोलता था उसमे बहुत वज़न होता था.अभी भी उसने बड़ी सफाई से बात टाल दी थी.

"मैं अब चलती हू,भैया जी.नमस्कार!",कमरे की वो अकेली औरत उठ खड़ी हुई.

"ठीक है,राम्या जी.नमस्कार!",भैया जी मुस्कुआराए & फिर से टीवी देखने लगे.कमरे मे बैठे बाकी मर्द थोड़े मायूस हो गये.मायूसी की वजह भी थी,राम्या सेन थी ही इतनी खूबसूरत.38 साल की होने के बावजूद उसका बदन अभी भी बड़ा पूर्कशिष था.5'5" कद की राम्या का बदन वक़्त के साथ थोडा और भर गया था मगर 38 इंच की चूचियाँ & उतनी ही चौड़ी गंद अभी भी कसी-2 लगती थी & चलते वक़्त जब उसकी 32 इंच की कमर लचकति तो उसके बगल के माँस के हिस्से की थरथराहट देख शायद ही किसी मर्द का दिल उसे बाहो मे कसने का ना करता हो.

दिल ही दिल मे आह भर सभी 1 बार फिर जसजीत प्रधान की तक़रीर सुनने लगे.

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क्रमशः...........

 
KHEL KHILADI KA paart--3

gataank se aage..............

shakhs ki muskurahat halki ho gayi thi magar nigaho ka painapan vaisa hi tha.divya unme apni khubsurti ki tarif saaf dekh rahi thi magar kuchh aur bhi tha uske alawa jise vo samajh nahi pa rahi thi.tabhi us insan ne ishara kiya ki vo pehle baithe to dono ki nazro ki dor tuti & divya 1 sofe pe baith gayi.

"professor,ye ACP Divya Mathur hai."

"oh..to aap hi hain jinki tarifo ke pul mere dost ne fone pe bandhe the."

"haan..are 8 se upar ho gaya.dost,pehle zara ye dekh len fir kaam ki baate karenge?"

"ok."

"divya,tumhe jane ki jaldi to nahi?"

"no,sir.",jaldi to use thi,ajit ke aane ki khabar sunke vo thoda pareshan ho agyi thi & us pareshani ko mitane ke liye usne socha tha ki ghar jake apne bathtub ke gungune pani me baithegi magar apne senior afsar ki baat vo taal nahi sakti thi & fir use is shakhs ke bare me jaanane ki utsukta bhi ho gayi thi.

"good.",verma sahab ne remote utha ke tv on kiya,"..aaj Jasjit Pradhan aaane vale chunav ke liye apna campaign shuru karne vala hai.",vo naam sunte hi divya & professor ki aankhe bhi tv screen se chipak gayi.

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Devalay rajya ki rajdhani thi & vaha ki siyasat ka kendra.4 mahino me rajya ki assembly ke chunav hone vale the & uske liye sabhi siyasi partiyo me gehma-gehmi shuru ho gayi thi.Warren Road ka ilaka jaha ki lagbhag sabhi partiyo ke daftar the chunav ke ticket ki aas me baithe logo se bharne laga tha magar kuchh aise bhi khushnasib the jinhe un logo ki tarah warren road ke daftaro ke chakkar nahi lagane padte the.ye vo log the jinki jeet lagbhag pakki mani jati thi.

unhi me se 1 insan tha jasjit pradhan,Janhit Party ka devalay ki devalay central seat ka MLA.pichhli 2 baar se usne is seat se chunav jita tha.pradhan 1 imandar aadmi tha.siyasat me aise logo ki shayad koi jagah nahi magar jasjit is niyam ka apvad tha.uski party abhi satta me thi & pichhle 3 salo se vo mantri bhi tha magar abhi tak uska naam kisi bhi ghotale ya scandal me nahi aya tha.zyadatar log uski badi izzat karte the & unka maanana tha ki ab waqt aa gaya hai ki jasjit pradhan ko badi zimmedari saunpi jaye jaise ki rajya ke mukhyamantri ki.

maujooda mukhyamantri ko ye baat bilkul bhi achhi nahi lagi thi lekin 1 to janta ki pasand upar se janhit party ke high command ka bhi yehi maanana tha ki aise lokpriya neta ko aage lana hi chahiye.to aaj Dussehra maidan,jaha devalay ki lagbhag har badi rally ya fir jalsa hota tha,khachakhach bhara tha,un logo ki bheed se jo apne manpasand neta ko sunana,dekhna chahte the.haan,us bheed me aise logo ki taadad zyada thi jo ki khane ke packet,1 sari ya kamiz & 200 rupayo ke lalach me aye the magar vo bhi pradhan ko 1 achha aadmi mante the.sabhi ko bas ab besabri se pradhan ke bolne ka intezar tha.

"behno & bhaiyo..",6 ft lamba 1 insan stage pe aya & loudspeakers pe uski aavaz gunji.taliyo ki gadgadahat se logo ne uska isteqbal kiya & usne apna bhashan shuru kiya.

"bhai,maanana padega ye aadmi bolta bahut badhiya hai.",verma sahab ne apne dost se kaha.

"hun.",professor gaur se pradhan ko sun raha tha.

"kya kehte ho professor?agar is baar janhit jeete to ise mukhyamantri banana chahiye?"

"bilkul perfect hai na CM ki kursi ke liye.",professor apne sofe pe ad ke baith gaya & muskuraya,"..ye dekho.",usne tv ki or ishara kiya,"..42 saal ka aadmi,6 ft ka kad,dekhne me handsome & vaha dekho..",sune tv pe dikh rahe pradhan ke peechhe stage pe baithe baki logo ki or ishara kiya,"..vaha."

"kaun..Anjali Pradhan?",divya ne puchha.

"haan,uski biwi.dono ki arranged marriage hui thi.anjali bhi bade mane hue parivar se hai & dono ke parivar valo ne jab dono ka rishta tay kiya to dono ne unki marzi pe koi aitraz nahi jataya.ab dono ke 2 bachche hain-1 adarsh hindustani parivar.ab aise aadmi ko kaun apna leader nahi banana chahega?"

"professor,maaf kijiyega..",divya boli,"..magar aapki baato me tarif nahi mazak ki mahak hai."

"achha!",professor ne hairan hone ka natak kiya,"..aap bhi pradhan ki fan lagti hain?..& ho bhi kyu na!pradhan itna handsoome jo hai,bhai!",usne thahaka lagaya.

"main fan nahi hu..",divya ko bahut zor ka gussa aya,"..lekin 1 achhe aadmi ka mazak kyu udayen bhala?"

"divya ji,vo 1 neta hai,politician..",professor ab sanjida tha,"..& mera maanana hai ki netao se badi matlabi qaum duniya me dusri nahi.to agar is insan me achhaiyan nazar aati hai to vo kewal isliye kyuki ye uska satta pane ka rasta hai."

"to isme kya burai hai?agar vo achhai kar raha hai & isme uska fayda ho to kaun sa paap kiya usne?!!aakhir isme aam aadmi ka bhi to bhala ho raha hai."

"main bas 1 baat kahunga,divya ji..",professor ab bilkul sanjida tha & divya ne gaur kiya ki jab vo sanjida hokar bolta tha to uski bhari aavaz badi dilkash ho jati thi..itni ki..usne dimagh se us gustakh khayal ko nikala,"..ki achha hona & achha hone ka natak karna 2 bahut alag baate hain.koi insan natak kitne din kar sakta hai?aakhir kabhi na kabhi to vo apna asli rang dikhayega.aapki tarah meri bhi yahi khwahish hai ki ye insan sachmuch dil ka achha ho & hum sab ka bhala ho lekin kya karu?ye kambakht neta....inhone apni harkato se hum sabka bharosa kho diya hai."

DCP verma muskuraye & pradhan ko sunane lage.us waqt pradhan ko sabhi sun rahe the,verma sahab,professor & divya jaise log joki bas kinare se ye khel dekh rahe the & vo bhi jinhone is khel me danv lagaya hua tha jisme se kuchh pradhan ke dushman the,kuchh dost & kuchh....pata nahi.

warren road ke 1 chhor pe tha Lok Vikas Party ka daftar,vo party jis se janhit ki seedhi takkar rehti thi.party office is waqt khali tha & bas upri manzil ke 1 kamre me kuchh log baithe tv dekh rahe the.

"baat to maanani padegi,Bhaiya Ji..",1 khadi ke kurte pajame me baithe buzurg neta ne samne ke divan pe masnad se tek lagake baithe tv dekhte shakhs se kaha,"..pradhan lafzo ka jadugar hai & logo ko baato ke jaal me fansa leta hai."

"hun.",kamre me un dono ke alawa3 log aur the 2 mard & 1 aurat,"..lekin ise harana to hoga hi is baar neta ji nahi to aage jake ye admi keval rajya ke star pe nahi rashtriya star pe bhi hume taklif dega."

"to yaha se kis se khada karenge is baar,bhaiya ji?",is saval se kamre me maujood sabhi logo ka dhyan tv se hat gaya.sabhi jante the ki pradhan ke khilaf khada hona & haarna 1 hi baat hai & jise bhi ticket mila samjho uska siyasi career chaupat hua & is baat ka faisla lena tha keval bhaiya ji ko.baki sabhi seats ke liye committe bani thi jo umeedvaro ka chunav karti magar kuchh khas seats jinme devalay ki devalay central seat ke bare me sara faisla bas bhaiyya ji ke hatho me tha.aur hota bhi kyu na?bhaiya ji hi lok vikas ke sab kuchh the,party ki pehchan unhi se thi & pichhle chunav me party ki haar se vo khar bhi khaye baithe the.

bhaiya ji yani ki MLA Baldev kabra,is waqt assembly me opposition ka leader & rajya ka 1 kaddavar neta.kayi saal pehle ki baat hai jab vo 24 baras ke the & duniya unhe keval baldev ke naam se hi janti thi.rajya ki private mills ke workers & sarkari colleges ke teachers ko 3 mahine se tankhwah nahi mili thi.baldev ne un sabke liye aavaz uthayi & un logo ne sue apna bhai bana liya.kisi mill worker ne sue bhaiya ji keh ke pukara tha & us din se uska yehi naam pad gaya.us andolan ne sarkar ko jhukaya & baldev ka naam siyasat ke galiyaro me liya jane laga.uske baad vo baldev na raha bhaiyya ji ban gaya.insano ke kandho ko seedhiya banake aaj vo is muqam pe pahuncha tha.

bhaiya ji ab kafi badal chuke the.ab unki umra 54 baras thi,sar ke baal safed ho chuke the & jin logo ke liye unhone ne unke maliko se ladayi ki thi ab vo unhi maliko ke dost ban chuke the.har mahine vo dost unhe tohfe dete jinhe bhaiyya ji videsh me mehfuz rakh dete.ab bhaiyya ji ka maqsad bas satta,us se milni vali taqat & daulat the & unki raah me janhit roda bani hui thi & us rode ke peechhe khada tha jasjit pradhan.

"Abhi kuchh tay nahi kiya hai.ab itne nazuk masle pe thoda soch-vichar to karna hi hoga.",Bhaiya Ji muskuraye & tv dekhne lage.ye is aadmi ki sabse badi khasiyat thi,ye bahuty kam bolta tha & jo bolta tha usme bahut vazan hota tha.abhi bhi usne badi safai se baat taal di thi.

"main ab chalti hu,bhaiya ji.namaskar!",kamre ki vo akeli aurat uth khadi hui.

"thik hai,Ramya ji.namaskar!",bhaiya ji muskuaraye & fir se tv dekhne lage.kamre me baithe baki mard thode mayus ho gaye.mayusi ki vajah bhi thi,Ramya Sen thi hi itni khubsurat.38 saal ki hone ke bavjood uska badan abhi bhi bada purkashish tha.5'5" kad ki ramya ka badan waqt ke sath thoda aur bhar gaya tha magar 38 inch ki chhatiya & utni hi chaudi gand abhi bhi kasi-2 lagti thin & chalte waqt jab uski 32 inch ki kamar lachakti to uske bagal ke mans ke hisse ki thartharahat dekh shayad hi kisi mard ka dil use baaho me kasne ka na karta ho.

dil hi dil me aah bhar sabhi 1 baar fir Jasjit Pradhan ki taqrir sunane lage.

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kramashah...........

 
गतान्क से आगे..............

"..सभी को बराबरी का मौका & सभी को इंसाफ़-चाहे वो कोई भी हो अमीर,ग़रीब,ऊँची जात का या नीची जात का या फिर किसी भी मज़हब का..अगर ये 2 बाते हम पक्की कर लें तो शायद हमारे समाज की शायद सभी बुराइयो का अंत हो जाए!..",तालियो की गड़गड़ाहट टीवी के स्पीकर से निकल के उसके छ्होटे से होटेल के कमरे मे भर गयी & बिस्तर पे अढ़लेता वो शख्स गुस्से से भर उठा.उसने चॅनेल बदल दिया & कोई फिल्मी चॅनेल लगा आँखे बंद कर अपने गुस्से को पीने लगा.

डेवाले रेलवे स्टेशन के पास दरगाह पीर का इलाक़ा सस्ते होटेल्स से आता पड़ा था.उन्ही होटेल्स मे से 1 के कमरे मे वो शख्स लेटा था.उसका कद 6'1" था & जिस्म बिल्कुल चुस्त.चेहरे पे दाढ़ी थी & बाल भी गर्दन तक लंबे.शख्सियत ऐसी कि आप 1 बार नज़र भर के ज़रूर देखें.

थोड़ी देर बाद उसने आँखे खोली & वाहा बस दर्द नज़र आया.पिच्छले 2 साल से वो आँखे ऐसी ही थी.उस से पहले उसकी ज़िंदगी कितनी हसीन,कितनी खुशनुमा थी..लेकिन इस शख्स ने जिसे दुनिया देवता समझती थी उसकी ज़िंदगी उजाड़ दी थी & अब जब जसजीत प्रधान अपनी ज़िंदगी के 1 अभूत अहम मोड़ पे था,वक़्त आ गया था कि उसे भी वही दर्द महसूस कराया जाए जो उसने उसे महसूस कराया था.

उसने फिर चॅनेल बदला & इस बार 1 स्पोर्ट्स चॅनेल लग गया जिसपे कोई क्रिकेट मॅच आ रहा था.उसके दिल मे फिर से टीस उठी & उसने टीवी बंद कर दिया & कमरे से निकल गया.

"नमस्ते,सहाब!",होटेल का वेटर था.

"नमस्ते.",उसने कमरा लॉक कर चाभी जेब मे डाली.

"सहाब..",वेटर कुच्छ कहना चाह रहा था.

"हां.",वो सीढ़ियो की ओर बढ़ा.

"साहब,मैं कह रहा था कि आपको कुच्छ ज़रूरत हो तो बस मुझे बोलना सीधा कमरे मे डेलिवरी होगी.आपको कोई परेशानी नही & दाम भी बिल्कुल सही लूँगा.",उस शख्स ने वेटर को घूरा,वो क्या कह रहा था उसकी समझ मे आ गया था.होटेल के कमरे मे अकेला मर्द शराब या फिर शबाब तो चाह सकता है ना.

उसकी घुरती निगाहो से वेटर को घबराहट होने लगी की कही उसने ग़लत आदमी से तो बात नही कह दी.

"ठीक है.ज़रूरत पड़ी तो तुझे ही बोलूँगा.",वो आदमी हंसा & वेटर की पीठ पे धौल मारी & सीढ़िया उतरने लगा.

"ज़रूर साहब.आपको बिल्कुल मस्त समान दूँगा.बस बोल के देखना.",वेटर ने जाते-2 उस से कहा.

वो तेज़ कदमो से होटेल से बाहर आया & बाज़ार मे चलने लगा....वो यहा उस फ़र्ज़ी आइडी के बूते ठहरा था जो उसे मूसा के दोस्त ने दिलवाई थी.मूसा जैल का उसका इकलौता दोस्त था & अब जैल से बाहर आने पे उसके दोस्त उसकी मदद कर रहे थे.वो चलता हुआ दरगाह तक आ पहुँचा था जिसके गिर्द ये पूरा इलाक़ा बसा था.कयि लोग दरगाह के अंदर जा रहे थे & जिनके पास वक़्त नही था वो बस बाहरी दीवार से सर टीका के दुआ माँगते & आगे बढ़ जाते.

मूसा की हर ख्वाहिश पूरी हो & वो हमेशा खुश रहे....दीवार से सर लगा उसने दुआ माँगी & सामने से गुज़रती बस को दौड़ के पकड़ लिया.

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उस बंगल के ड्रॉयिंग हॉल मे तीन लोग बैठे टीवी देख रहे थे-2 मर्द & 1 औरत.मर्दो के हाथो मे विस्की के ग्लास थे & उनमे से 1 को देख के सॉफ ज़ाहिर था की उसे बहुत नशा हो चुका है.1 बार फिर प्रधान की किसी बात पे दुस्सेहारा मैदान मे जमा भीड़ ने तालिया बजाई तो वो औरत उठ खड़ी हुई,"मैं अपने कमरे मे जा रही हू.मुझे अब और नही सुनना इस आदमी को!",उसकी आवाज़ मे घुली नफ़रत छिप ना सकी ना ही उस औरत ने च्छुपाने की कोशिश की थी.

"नीना..",वो नशे मे धुत इंसान बोला,"..भाई..सा..हब.के..बारे..मे...आड़..अदब से बोलो!",तब तक नीना सीढ़िया चढ़ अपने कमरे मे जा चुकी थी.

"जाने दीजिए,मुकुल जी.",उस दूसरे शख्स ने पहले को रोका & दोनो टीवी देखने लगे.थोड़ी देर बाद उसने खामोशी तोड़ी,"मुकुल जी,आपने मेरी बात पे सोचा या नही?"

"सोचा,महेश जी लेकिन मुझे समझ नही आ रहा..",उसने ग्लास खाली कर फिर बॉटल उठा ली.

"क्या?"

"कि..ये क्या..हिक....सॉरी..ठीक होगा..मेरा मतलब है भाई साहब ..",उसने पेग बनाया,"..के साथ धोखा तो नही होगा ये.",उसने सोडा डाला & फिर बर्फ & फिर से ग्लास को अपने होंठो से लगा लिया.

"धोखा कैसा मुकुल जी?माना कि आप जसजीत जी के सगे भाई हैं लेकिन उन्होने तो आपको टिकेट दिलवाने से मना कर दिया.अब आप तो इनडिपेंडेंट खड़े हो रहे हैं किसी और पार्टी से नही,तो धोखे का तो सवाल ही नही पैदा होता."

"और आप पूरा पैसा लगाएँगे मेरे एलेक्षन कॅंपेन मे..हिक?"

"हां."

"मैं जान सकता हू..हिक क्यू?"

"आप भी बिज़्नेसमॅन हैं & मैं भी मुकुल जी.आप 1 बार बॅडल के एमएलए बन गये तो उस इलाक़े मे जो हम दोनो की फॅक्टरीस हैं वो तो सोना उग्लेंगी."

"हूँ..मैं 1 बार हिक..आइ मीन ज़रा सोचना चाहता हू."

"सोच लीजिए,मुकुल जी मगर जल्दी अब समय कम है हमारे पास."

हूँ.",उसने शराब का 1 बड़ा घूँट भरा.मुकुल प्रधान जसजीत का छ्होटा भाई था.जितना बड़ा भाई मेहनती था उतना ही छ्होटा काम से जी चुराने वाला.जसजीत ने भाई को 1 प्लास्टिक फॅक्टरी खुलवा दी थी डेवाले से 40 किमी दूर बद्डल गाँव मे लेकिन मुकुल का उसे चलाने मे कुच्छ खास मन नही लगता था.बात दरअसल ये थी कि आलसी मुकुल बस पकई-पकाई खीर खाना चाहता था & 1 दिन उसके दिमाग़ मे ख़याल आया कि वो भी भाई की तरह सियासत मे आ जाए.जसजीत अपने भाई को बहुत अच्छे से जानता था & उसने उसे सॉफ मना कर दिया.
 
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