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खेल खिलाड़ी का पार्ट--1
सुनसान सड़क पे देर रात वो लड़की तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी। उसके चुस्त सलवार कमीज, हाथ में पकड़े मोबाइल और कंधे पे लटके बैग को देख के साफ जाहिर था की वो पास की किसी बिल्डिंग के दफ़्तर में काम करती थी और आज उसे वहां से निकलने में देर हो गयी थी।
सड़क इतनी सुनसान थी की एक आवारा कुत्ता भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। तभी लड़की के कानों में पीछे से किसी के वहाँ आने की आवाज आई। उसने इस उम्मीद से गर्दन घुमाई की कोई टक्सी या आटो-रिक्शा होगा मगर वो तो कोई वैन थी। लड़की फिर से तेजी से आगे बढ़ने लगी।
“मस्त माल है, बच्चू…” वैन उसके करीब आ गयी थी और बिल्कुल धीमी होके उसके साथ चल रही थी। लड़की ने गर्दन घुमाई तो वैन का पिछला दरवाजा पीछे सरका पाया। अंदर की सीट पे एक लंबा, भारी शरीर का शख्स बैठा था जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और तंबाकू से पीले हो चुके दाँत उसकी छिछोरी मुस्कान के चलते नुमाया थे। उसके साथ पिछली सीट पे एक आदमी बैठा था और आगे दो और लोग थे। चारो शक्ल से ही जरायम पेशा लगते थे।
लड़की ने अपनी चाल और तेज कर दी- “हाय। गाण्ड तो देखो साली की…” उस शख्स ने जो कि सबका सरदार लगता था, फबती कसी तो लड़की और घबरा गयी। उसे पता था की तेज चाल के चलते उसकी 28 इंच की कमर और ज़्यादा बल खाने लगी होगी और उसके नीचे उसकी 36 इंच की गाण्ड भी और मटकने लगी होगी। उसका चेहरा लाल हो रहा था।
“छोड़ो बिल्ला उस्ताद। जाने दो, कहीं इस लौंडिया के चक्कर में निकलने में देर ना हो जाए…”
“अबे, चुप…” बिल्ला की नजरें तो उस लड़की की गाण्ड से चिपकी ही हुई थी, जो कि चलते हुए अपने मोबाइल के बटन्स दबाए जा रही थी- “इसे तो साथ ले चलते हैं। रास्ता काटने में आसानी होगी। गाड़ी लगा सामने, छोटू…” ड्राइवर ने वैन को तिरछी कर उस लड़की के सामने कर उसको रोका और बैठे-बैठे ही बिल्ला ने अपने बाए हाथ से लड़की की दांई बाँह उसकी कलाई के उपर पकड़ी।
उसके बाद जो हुआ उसने सभी गुण्डो को हैरान कर दिया और वो कुछ पलों के लिए मानो जैसे बुत बन गये और यही कुछ पल उनकी मुसीबत का सबब बने। लड़की ने दांए हाथ को जरा सा घुमा के बिल्ला की बाईं कलाई पकड़ी और उसे घुमा दिया। बिजली की फुर्ती से उसने अपना मोबाइल अपने कुते की जेब में डाला और बाएं कंधे से बैग को नीचे गिरा दिया।
बिल्ला ने अपना दायां हाथ बढ़ा के अपना बायां हाथ लड़की की गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश करनी ही चाही थी की लड़की के बाए हाथ का कराटे चाप उसकी गर्दन की दांईं तरफ पड़ा और जैसे उसे लकवा मार गया। लड़की
ने अपनी बाई टांग को बिल्ला की सीट पे टिकाया और फिर उसी के सहारे बिल्ला का हाथ खींचकर उसे गाड़ी से नीचे गिरा दिया।
बिल्ला भी शातिर अपराधी था और अपनी हैरानी से बाहर भी आ चुका था। वो पीठ के बल सड़क पे लेटे ही अपनी बाई टांग को चलाकर लड़की की टाँगो पे मारकर उसे नीचे गिराने की कोशिश की मगर लड़की होशियार थी। वो उसका वार बचाते हुए हवा में उछली और अपना बायां घुटना मोड़कर उसके सीने पे लैंड कराया।
बिल्ला दर्द से छटपटा उठा। उसके बाकी साथी तब तक वैन से उतरकर अपने कपड़ो में छुपे हथियार बाहर निकाल के उसकी ओर आ चुके थे की तभी ना जाने कहाँ से 14-15 पुलिसवाले वहां आ गये और उन्हें घेर लिया। थोड़ी ही देर बाद सभी बदमाश पोलीस वैन में हथकड़ियों से बँधे बैठे थे।
“आह्ह… ये लड़की है कौन यार…” दर्द से कराहते बिल्ला ने वैन के दरवाजे पे ताला लगाते हवलदार से पूछा।
“ए॰सी॰पी॰ दिव्या माथुर…” हवलदार मुस्कुराता हुआ वहां से चला गया।
***** *****
दिव्या माथुर देवालय पोलीस की क्राइम ब्रांच की शायद सबसे तेज-तर्रार अफसर थी। बचपन से ही दिव्या को खेल-कूद में बड़ी दिलचस्पी थी। स्कूल और फिर कालेज की बैडमिंटन, वालीबाल और जिमनास्टिक टीम शायद ही कभी उसके बिना किसी मुकाबले में हिस्सा लेती थी। कालेज पार करते-2 उसने ताईक्वान्डो में भी महारत हासिल कर ली थी और पोलीस ट्रेनिंग के दौरान कराटे के गुर भी उसने बहुत जल्दी सीख लिए थे। खेल ने उसमें खुद्दारी और हौसले का जज़्बा भरा और जब सिविल सर्विस का इम्तिहान पास करने पे उसकी पसंद पूछी गयी तो उसने बेझिझक पोलीस सर्विस को चुना।
माँ-बाप समझाते रह गये की एडमिस्ट्रेटिव सर्विस चुन ले पर दिव्या खुद को एक दफ़्तर में दिन भर बैठे सोच के ही घबरा जाती थी। ट्रेनिंग के बाद जब वो ए॰सी॰पी॰ बनकर देवालय आई तो वहां के आला अफसरों को भी इस नयी अफसर की काबिलियत पता चलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा और उन्होंने फौरन उसे वहां की क्राइम ब्रांच में पोस्ट कर दिया। कल सुबह ही जैसे ही दिव्या को मुखबिरों के हवाले से खबर मिली की बिल्ला जिसने कुछ ही दिन पहले एक सुपारी किलिंग की थी, कल रात शहर से भागने वाला है तो उसने उसे पकड़ने की प्लानिंग शुरू कर दी।
उसके मातहत काम करने वाले इंस्पेक्टर जिनमे से कुछ उससे उमर में काफी बड़े थे और उनका तजुर्बा भी उससे कहीं ज़्यादा था, उसे नाकाबंदी करने की सलाह दी मगर दिव्या ने उनकी बात नहीं मानी। उसका कहना था की बिल्ला तो नाकाबंदी की उम्मीद ही कर रहा होगा। क्यूँ ना कुछ ऐसा किया जाए जिसकी उसे बिल्कुल उम्मीद ना हो और फिर उसे पकड़ने में आसानी हो। तभी दिव्या ने ये प्लान बनाया। इस प्लान में अगर जरा भी गड़बड़ होती या उसकी टीम उसके मोबाइल के मेसेज मिलने के बाद वक़्त पे नहीं पहुँचती तो दिव्या की जान भी जा सकती थी। मगर दिव्या ने इतने दिनों में जो सबसे बड़ा सबक सीखा था वो ये की अगर उसने खतरे के डर से कदम पीछे खींचे तो मुजरिम आगे बढ़ जाएगा और वो उससे मुकाबला हार जाएगी और हार लफ्ज़ से उसे सख़्त नफरत थी।
“मेडम…” एक हवलदार ने उसे सलाम ठोंका।
“हूाँ…” दिव्या ने एक बार फाइल से नजर उठाके उसे आराम से होने का इशारा किया और फिर वापस फाइल निपटाने लगी। पोलीस की नौकरी के बाद दिव्या ने एक और सबक सीखा था की चाहे फौजी बनकर सरहद पे क्यूँ ना तैनात हो जाओ, बिना कागज काले किए काम नहीं चलने वाला।
“आप जब दफ़्तर से बाहर थी तो डी॰सी॰पी॰ साहब का मेसेज आया था इंटरकॉम पे की शाम को 7:00 बजे आप उनके केबिन में रिपोर्ट करें। उन्हें कल के एनकाउंटर के बारे में आपसे रिपोर्ट लेनी है…” हवलदार ने सलाम ठोंका और केबिन से बाहर चला गया। दिव्या हल्के से मुस्कुराई और फाइल पूरी करती रही।
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सुनसान सड़क पे देर रात वो लड़की तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी। उसके चुस्त सलवार कमीज, हाथ में पकड़े मोबाइल और कंधे पे लटके बैग को देख के साफ जाहिर था की वो पास की किसी बिल्डिंग के दफ़्तर में काम करती थी और आज उसे वहां से निकलने में देर हो गयी थी।
सड़क इतनी सुनसान थी की एक आवारा कुत्ता भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। तभी लड़की के कानों में पीछे से किसी के वहाँ आने की आवाज आई। उसने इस उम्मीद से गर्दन घुमाई की कोई टक्सी या आटो-रिक्शा होगा मगर वो तो कोई वैन थी। लड़की फिर से तेजी से आगे बढ़ने लगी।
“मस्त माल है, बच्चू…” वैन उसके करीब आ गयी थी और बिल्कुल धीमी होके उसके साथ चल रही थी। लड़की ने गर्दन घुमाई तो वैन का पिछला दरवाजा पीछे सरका पाया। अंदर की सीट पे एक लंबा, भारी शरीर का शख्स बैठा था जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और तंबाकू से पीले हो चुके दाँत उसकी छिछोरी मुस्कान के चलते नुमाया थे। उसके साथ पिछली सीट पे एक आदमी बैठा था और आगे दो और लोग थे। चारो शक्ल से ही जरायम पेशा लगते थे।
लड़की ने अपनी चाल और तेज कर दी- “हाय। गाण्ड तो देखो साली की…” उस शख्स ने जो कि सबका सरदार लगता था, फबती कसी तो लड़की और घबरा गयी। उसे पता था की तेज चाल के चलते उसकी 28 इंच की कमर और ज़्यादा बल खाने लगी होगी और उसके नीचे उसकी 36 इंच की गाण्ड भी और मटकने लगी होगी। उसका चेहरा लाल हो रहा था।
“छोड़ो बिल्ला उस्ताद। जाने दो, कहीं इस लौंडिया के चक्कर में निकलने में देर ना हो जाए…”
“अबे, चुप…” बिल्ला की नजरें तो उस लड़की की गाण्ड से चिपकी ही हुई थी, जो कि चलते हुए अपने मोबाइल के बटन्स दबाए जा रही थी- “इसे तो साथ ले चलते हैं। रास्ता काटने में आसानी होगी। गाड़ी लगा सामने, छोटू…” ड्राइवर ने वैन को तिरछी कर उस लड़की के सामने कर उसको रोका और बैठे-बैठे ही बिल्ला ने अपने बाए हाथ से लड़की की दांई बाँह उसकी कलाई के उपर पकड़ी।
उसके बाद जो हुआ उसने सभी गुण्डो को हैरान कर दिया और वो कुछ पलों के लिए मानो जैसे बुत बन गये और यही कुछ पल उनकी मुसीबत का सबब बने। लड़की ने दांए हाथ को जरा सा घुमा के बिल्ला की बाईं कलाई पकड़ी और उसे घुमा दिया। बिजली की फुर्ती से उसने अपना मोबाइल अपने कुते की जेब में डाला और बाएं कंधे से बैग को नीचे गिरा दिया।
बिल्ला ने अपना दायां हाथ बढ़ा के अपना बायां हाथ लड़की की गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश करनी ही चाही थी की लड़की के बाए हाथ का कराटे चाप उसकी गर्दन की दांईं तरफ पड़ा और जैसे उसे लकवा मार गया। लड़की
ने अपनी बाई टांग को बिल्ला की सीट पे टिकाया और फिर उसी के सहारे बिल्ला का हाथ खींचकर उसे गाड़ी से नीचे गिरा दिया।
बिल्ला भी शातिर अपराधी था और अपनी हैरानी से बाहर भी आ चुका था। वो पीठ के बल सड़क पे लेटे ही अपनी बाई टांग को चलाकर लड़की की टाँगो पे मारकर उसे नीचे गिराने की कोशिश की मगर लड़की होशियार थी। वो उसका वार बचाते हुए हवा में उछली और अपना बायां घुटना मोड़कर उसके सीने पे लैंड कराया।
बिल्ला दर्द से छटपटा उठा। उसके बाकी साथी तब तक वैन से उतरकर अपने कपड़ो में छुपे हथियार बाहर निकाल के उसकी ओर आ चुके थे की तभी ना जाने कहाँ से 14-15 पुलिसवाले वहां आ गये और उन्हें घेर लिया। थोड़ी ही देर बाद सभी बदमाश पोलीस वैन में हथकड़ियों से बँधे बैठे थे।
“आह्ह… ये लड़की है कौन यार…” दर्द से कराहते बिल्ला ने वैन के दरवाजे पे ताला लगाते हवलदार से पूछा।
“ए॰सी॰पी॰ दिव्या माथुर…” हवलदार मुस्कुराता हुआ वहां से चला गया।
***** *****
दिव्या माथुर देवालय पोलीस की क्राइम ब्रांच की शायद सबसे तेज-तर्रार अफसर थी। बचपन से ही दिव्या को खेल-कूद में बड़ी दिलचस्पी थी। स्कूल और फिर कालेज की बैडमिंटन, वालीबाल और जिमनास्टिक टीम शायद ही कभी उसके बिना किसी मुकाबले में हिस्सा लेती थी। कालेज पार करते-2 उसने ताईक्वान्डो में भी महारत हासिल कर ली थी और पोलीस ट्रेनिंग के दौरान कराटे के गुर भी उसने बहुत जल्दी सीख लिए थे। खेल ने उसमें खुद्दारी और हौसले का जज़्बा भरा और जब सिविल सर्विस का इम्तिहान पास करने पे उसकी पसंद पूछी गयी तो उसने बेझिझक पोलीस सर्विस को चुना।
माँ-बाप समझाते रह गये की एडमिस्ट्रेटिव सर्विस चुन ले पर दिव्या खुद को एक दफ़्तर में दिन भर बैठे सोच के ही घबरा जाती थी। ट्रेनिंग के बाद जब वो ए॰सी॰पी॰ बनकर देवालय आई तो वहां के आला अफसरों को भी इस नयी अफसर की काबिलियत पता चलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा और उन्होंने फौरन उसे वहां की क्राइम ब्रांच में पोस्ट कर दिया। कल सुबह ही जैसे ही दिव्या को मुखबिरों के हवाले से खबर मिली की बिल्ला जिसने कुछ ही दिन पहले एक सुपारी किलिंग की थी, कल रात शहर से भागने वाला है तो उसने उसे पकड़ने की प्लानिंग शुरू कर दी।
उसके मातहत काम करने वाले इंस्पेक्टर जिनमे से कुछ उससे उमर में काफी बड़े थे और उनका तजुर्बा भी उससे कहीं ज़्यादा था, उसे नाकाबंदी करने की सलाह दी मगर दिव्या ने उनकी बात नहीं मानी। उसका कहना था की बिल्ला तो नाकाबंदी की उम्मीद ही कर रहा होगा। क्यूँ ना कुछ ऐसा किया जाए जिसकी उसे बिल्कुल उम्मीद ना हो और फिर उसे पकड़ने में आसानी हो। तभी दिव्या ने ये प्लान बनाया। इस प्लान में अगर जरा भी गड़बड़ होती या उसकी टीम उसके मोबाइल के मेसेज मिलने के बाद वक़्त पे नहीं पहुँचती तो दिव्या की जान भी जा सकती थी। मगर दिव्या ने इतने दिनों में जो सबसे बड़ा सबक सीखा था वो ये की अगर उसने खतरे के डर से कदम पीछे खींचे तो मुजरिम आगे बढ़ जाएगा और वो उससे मुकाबला हार जाएगी और हार लफ्ज़ से उसे सख़्त नफरत थी।
“मेडम…” एक हवलदार ने उसे सलाम ठोंका।
“हूाँ…” दिव्या ने एक बार फाइल से नजर उठाके उसे आराम से होने का इशारा किया और फिर वापस फाइल निपटाने लगी। पोलीस की नौकरी के बाद दिव्या ने एक और सबक सीखा था की चाहे फौजी बनकर सरहद पे क्यूँ ना तैनात हो जाओ, बिना कागज काले किए काम नहीं चलने वाला।
“आप जब दफ़्तर से बाहर थी तो डी॰सी॰पी॰ साहब का मेसेज आया था इंटरकॉम पे की शाम को 7:00 बजे आप उनके केबिन में रिपोर्ट करें। उन्हें कल के एनकाउंटर के बारे में आपसे रिपोर्ट लेनी है…” हवलदार ने सलाम ठोंका और केबिन से बाहर चला गया। दिव्या हल्के से मुस्कुराई और फाइल पूरी करती रही।
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