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Guest
दिव्या 7 बजे फ्लॅट पे पहुँची मगर प्रोफेसर का अभी तक कोई आता-पता नही था.अकेली बैठी बोरियत भगाने के लिए उसने अपनी खरीदारी का समान देखना शुरू किया.उसकी नज़र अपनी खरीदी सारी पे पड़ी तो उसने सोचा क्यू ना इसे पहन के देखा जाए.फ़ौरन सारे कपड़े उतार पहले उसने नयी ब्रा & पॅंटी पहनी & फिर पेटिकोट पहना.बिना ब्लाउस पहने ही उसने सारी बाँधी & उसके बाद ब्लाउस को अपनी बाहो मे डाला.ब्लाउस जैसे उसी के लिए बना था & उसके सीने से बिल्कुल चिपका था.उसे लगा कि उसने कुच्छ ज़्यादा कस्के बाँध लिया है तो उसने गाँठ को ढीला किया & उसी वक़्त कमरे का दरवाज़ा खोल प्रोफेसर अंदर दाखिल हुआ.
"हुन्ह्ह्ह्ह..!",दिव्या चौंक गयी & उसका हाथ पीठ पे से अपने सीने पे चला आया मानो अपने सीने को ढँकना चाह रही हो.
"आइ'एम सॉरी.मुझे लगा था आप अभी लौटी नही.",प्रोफेसर की निगाहे उसे सर से पाँव तक निहार रही थी.वो उसके पीछे आया,दिव्या का दिल ज़ोरो से धड़क रहा था..प्रोफेसर अब क्या करेगा?..उसे बाहो मे भरेगा तो नही?
मगर प्रोफेसर ने उसके ब्लाउस की गाँठ बाँधी,"मैं आपको 1 जगह दिखाने ले जाना चाहता हू & मेरी गुज़ारिश है कि इसी लिबास मे वाहा चलें.जहा हम जा रहे हैं वाहा के लिए ये लिबास बिल्कुल सही है.",प्रोफेसर कमरे से बाहर निकल गया.कुच्छ पलो बाद जब दिव्या ने अपने होश संभाले तब वो बाहर आई तो देखा प्रोफेसर ने स्लेटी रंग का सूट & गुलाबी कमीज़ पहनी थी.बहुत हॅंडसम लग रहा था वो.
"चलें."
"चलिए.
रास्ते भर दोनो खामोश रहे.थोड़ी देर पहले कमरे मे प्रोफेसर के अचानक घुसने से जैसे सब बदल गया था.दिव्या को प्रोफेसर की अगली हरकत का इंतेज़ार था.वो तय नही कर पा रही थी कि क्या वो अपने जज़्बातो की मान उसके साथ हुम्बिस्तर हो जाए या फिर अपने उपर काबू रखे.इसी उधेड़बुन मे वो पंचमहल से बाहर आ गये.वो सुजानगढ़ के महल पे आ पहुँचे थे जिसे आज से 400 साल पहले राजा सुजान सिंग ने बनवाया था.आजकल वो 1 होटेल मे तब्दील हो गया था.
महल के आगे के लॉन को 1 ओपन एर रेस्टोरेंट की शक्ल दी गयी थी.प्रोफेसर & दिव्या वही 1 मेज़ पे बैठ गये.मेज़े इस तरह लगी थी कि सबकी निगाह सामने बने छ्होटे से स्टेज पे बैठे गायको पे पड़े जोकि वाहा की भाषा मे कुच्छ गा रहे थे.दिव्या थोड़े बहुत लफ़ज़ो का मतलब समझ रही थी मगर उसे पूरा गीत समझ नही आ रहा था लेकिन इतना साफ था कि गीत बहुत दर्द भरा था.
"क्या गा रहे हैं ये?",दिव्या ने प्रोफेसर से पुचछा.
"बाद मे बताउन्गा.पहले आप खाना खाइए.",खाने के दौरान भी दोनो मे कोई खास बात-चीत नही हुई बस दोनो चोर निगाहो से 1 दूसरे को देख लेते थे.दिव्या को अब अपनी चूत मे कसक महसूस होने लगी थी.उसे शांत करने के लिए उसने अपनी टांग पे टांग चढ़ा उसे भींच लिया मगर इस से उसकी कसक & बढ़ गयी.
"अब आइए,मैं आपको वो दिखाता हू जिसके लिए मैं आपको यहा लाया हू.",प्रोफेसर खाना ख़त्म होने के बाद उठ खड़ा हुआ.उसने हाथ बढ़ाया तो दिव्या ने अपना दाया हाथ उसके हाथ मे दे दिया.प्रोफेसर के हाथ के एहसास ने उसकी हालत और खराब कर दी.प्रोफेसर उसे ले महल के अंदर दाखिल हुआ & 1 साफा पहने & बंदगले के सूट पहने आदमी को इशारा किया.वो दोनो को महल की सबसे उपरी मंज़िल पे ले गया & फिर महल के पिच्छले हिस्से की ओर जाने लगा.1 दरवाज़े के पास आ वो रुका & दरवाज़ा खोल खड़ा हो गया,"इसके आगे केवल आप जा सकते हैं,सर.",उसने झुक के दोनो को सलाम किया & चला गया.
दिव्या प्रोफेसर के साथ दरवाज़े के अंदर गयी तो देखा कि वो छ्होटा सा गलियारा था जो पुल के अंदाज़ मे बना था जोकि उपर से छत से ढँका था लेकिन दोनो तरफ के दरिचो से बाहर देखा जा सकता था.बाई तरफ से पहाड़िया दिख रही थी चाँद की रोशनी मे नहाई हुई & दाई तरफ आबादी का एहसास दिलाती पंचमहल से आनेवाली सड़क का एहसास महल की दीवारो के उपर से हो रहा था.दोनो गलियारे का आख़िर मे आ गये जहा 1 और खूबसूरत नक्काशियो से भरा दरवाज़ा था.प्रोफेसर ने उसे खोला & जैसे दिव्या दूसरी ही दुनिया मे आ गयी.अंदर 1 बड़ा सा कमरा था जिसे देख यू लगता था जैसे आज से 400 साल पहले जब रानी सावित्री देवी यहा रहती थी,तब से ये रोज़ वैसे ही सजता आया है.
कमरे मे कोनो मे बड़े-2 मिट्टी के तेल के बड़े खूबसूरत लॅंप थे.प्रोफेसर ने उन लॅंप्स को बुझा दिया & कमरे के 1 कोने मे रखे बड़े से हांडे मे कुच्छ फ्लोस्तिंग कॅंडल्स जला दी.अब कमरे मे बस इतनी रोशनी थी को दोनो 1 दूसरे को देख सकें.
"ये देखिए..",प्रोफेसर कमरे मे बनी बड़ी सी खिड़की पे खड़ा था,दिव्या उसके करीब गयी & उसका मुँह मे हैरत से खुला रह गया.कमरे से पंचमहल की पहाड़िया नज़र आ रही थी,पूरे चाँद की रोशनी मे नहाई हुई.उसने सर उठा के पूनम के चाँद को देखा & फिर सारे नज़ारे को निहारा,कुद्रत की ऐसी खूबसूरती उसने पहले कभी नही देखी थी.
"प्रोफेसर..",वो उसके दाई तरफ खड़ी थी & बेसखता उसका बाया हाथ उसकी ओर उठ गया जिसे उसने थाम लिया,"..ऐसा लगता है मानो हम वक़्त मे पीछे चले गये हैं."
"हां,हम सच मे वक़्त मे पीछे चले गये हैं.",प्रोफेसर ने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए उसकी काली,गहरी आँखो मे झाँका,"..अब उस गीत का मतलब समझाता हू.वो गवैय्ये रानी सावित्री देवी & राजा सुजान सिंग के प्रेम की कहानी सुना रहे थे.राजा सुजान सिंग दुश्मनो से लड़ने गये जहा बहुत खून-ख़राबा हुआ.दोनो तरफ के बस चंद ही लोग ज़िंदा बचे.कुच्छ लोग वापस महल लौटे मगर उसमे राजा साहब नही थे..",प्रोफेसर के साथ खड़ी उसके हाथ मे अपना हाथ दिए दिव्या कभी उसके चेहरे को देखती कभी चाँदनी मे नहाई पहाड़ियो को,"..उन पहाड़ियो के बीच 1 रास्ता हुआ करता था जहा से ये रियासत बाकी दुनिया से जुड़ी थी.."
"हम जिस रास्ते से यहा आए वो तो काफ़ी बाद मे बना पहाड़ियो को काट के.सबने यही समझा था कि राजा साहब जंग मे नही बचे मगर रानी को यकीन था कि उसका सुहाग ज़िंदा है.वो यही इसी खिड़की पे बैठी अपने महबूब की राह तकती रहती थी.3 महीने तक रानी यही बैठी रही.बस भगवान का ध्यान करने के लिए हटती.उसकी नौकरानियाँ यही पे उसे खाना खिला देती लेकिन रानी 1 पल को भी ये जगह नही छ्चोड़ना चाहती थी क्यूकी उसका भरोसा था कि वो यहा बैठी रही तो राजा ज़रूर वापस आएँगे.."
"..ऐसी ही 1 पूनम की रात को शायद कुच्छ अभी का ही वक़्त था जब रानी के कानो मे घोड़ो की टाप की आवाज़ आई.भरोसा तो उसे भी नही हुआ पर उसी वक़्त चाँद की सफेद रोशनी मे उसे दूर वाहा..",प्रोफेसर ने उंगली से इशारा किया तो दिव्या उसके और करीब आ पहाड़ियो की ओर देखने लगी,"..उन 2 पहाड़ियो के बीच रानी को कुच्छ चमकता हुआ दिखा.जब भी राजा बाहर जाते थे & इस रास्ते से लौटते थे तो रानी उनके लौटने के वक़्त यही बैठ के उनकी राह देखती थी & वो अपनी प्यारी बीवी को अपनी तलवार चमका के अपने आने की खबर देते थे.."
"..उस रोज़ भी ऐसा ही हुआ & रानी खुशी से चीख पड़ी.3 महीनो बाद राजा सुजान सिंग लौट आए थे,रानी सावित्री देवी का भरोसा जीत गया था.उसके बाद क्या हुआ पता है?",दिव्या अपना बाया हाथ प्रोफेसर के हाथ मे दिए हुए घूम उसके सामने खड़ी हो गयी & इनकार मे सर हिलाया,"..दोनो इसी कमरे मे पूरे 10 दीनो तक बंद रहे,पूरे 10 दीनो तक!1 पल को भी बाहर ना आए बस 1 दूसरे मे डूबते रहे,प्यार के समुंदर मे गोते लगाते रहे."
चाँदनी रात की कशिश ने,कमरे की मद्धम रोशनी ने & प्रोफेसर दीक्षित की सुनाई कहानी ने माहौल को रूमानी बना दिया था.इसी रूमानी माहौल की वजह से या फिर कुच्छ देर से चूत मे उठ रही कसक की वजह से जब प्रोफेसर उसका हाथ थामे दिव्या के उपर झुका तो उसने उसका विरोध नही किया & अपने लबो को उसके तपते लबो से च्छू जाने दिया.
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क्रमशः........
"हुन्ह्ह्ह्ह..!",दिव्या चौंक गयी & उसका हाथ पीठ पे से अपने सीने पे चला आया मानो अपने सीने को ढँकना चाह रही हो.
"आइ'एम सॉरी.मुझे लगा था आप अभी लौटी नही.",प्रोफेसर की निगाहे उसे सर से पाँव तक निहार रही थी.वो उसके पीछे आया,दिव्या का दिल ज़ोरो से धड़क रहा था..प्रोफेसर अब क्या करेगा?..उसे बाहो मे भरेगा तो नही?
मगर प्रोफेसर ने उसके ब्लाउस की गाँठ बाँधी,"मैं आपको 1 जगह दिखाने ले जाना चाहता हू & मेरी गुज़ारिश है कि इसी लिबास मे वाहा चलें.जहा हम जा रहे हैं वाहा के लिए ये लिबास बिल्कुल सही है.",प्रोफेसर कमरे से बाहर निकल गया.कुच्छ पलो बाद जब दिव्या ने अपने होश संभाले तब वो बाहर आई तो देखा प्रोफेसर ने स्लेटी रंग का सूट & गुलाबी कमीज़ पहनी थी.बहुत हॅंडसम लग रहा था वो.
"चलें."
"चलिए.
रास्ते भर दोनो खामोश रहे.थोड़ी देर पहले कमरे मे प्रोफेसर के अचानक घुसने से जैसे सब बदल गया था.दिव्या को प्रोफेसर की अगली हरकत का इंतेज़ार था.वो तय नही कर पा रही थी कि क्या वो अपने जज़्बातो की मान उसके साथ हुम्बिस्तर हो जाए या फिर अपने उपर काबू रखे.इसी उधेड़बुन मे वो पंचमहल से बाहर आ गये.वो सुजानगढ़ के महल पे आ पहुँचे थे जिसे आज से 400 साल पहले राजा सुजान सिंग ने बनवाया था.आजकल वो 1 होटेल मे तब्दील हो गया था.
महल के आगे के लॉन को 1 ओपन एर रेस्टोरेंट की शक्ल दी गयी थी.प्रोफेसर & दिव्या वही 1 मेज़ पे बैठ गये.मेज़े इस तरह लगी थी कि सबकी निगाह सामने बने छ्होटे से स्टेज पे बैठे गायको पे पड़े जोकि वाहा की भाषा मे कुच्छ गा रहे थे.दिव्या थोड़े बहुत लफ़ज़ो का मतलब समझ रही थी मगर उसे पूरा गीत समझ नही आ रहा था लेकिन इतना साफ था कि गीत बहुत दर्द भरा था.
"क्या गा रहे हैं ये?",दिव्या ने प्रोफेसर से पुचछा.
"बाद मे बताउन्गा.पहले आप खाना खाइए.",खाने के दौरान भी दोनो मे कोई खास बात-चीत नही हुई बस दोनो चोर निगाहो से 1 दूसरे को देख लेते थे.दिव्या को अब अपनी चूत मे कसक महसूस होने लगी थी.उसे शांत करने के लिए उसने अपनी टांग पे टांग चढ़ा उसे भींच लिया मगर इस से उसकी कसक & बढ़ गयी.
"अब आइए,मैं आपको वो दिखाता हू जिसके लिए मैं आपको यहा लाया हू.",प्रोफेसर खाना ख़त्म होने के बाद उठ खड़ा हुआ.उसने हाथ बढ़ाया तो दिव्या ने अपना दाया हाथ उसके हाथ मे दे दिया.प्रोफेसर के हाथ के एहसास ने उसकी हालत और खराब कर दी.प्रोफेसर उसे ले महल के अंदर दाखिल हुआ & 1 साफा पहने & बंदगले के सूट पहने आदमी को इशारा किया.वो दोनो को महल की सबसे उपरी मंज़िल पे ले गया & फिर महल के पिच्छले हिस्से की ओर जाने लगा.1 दरवाज़े के पास आ वो रुका & दरवाज़ा खोल खड़ा हो गया,"इसके आगे केवल आप जा सकते हैं,सर.",उसने झुक के दोनो को सलाम किया & चला गया.
दिव्या प्रोफेसर के साथ दरवाज़े के अंदर गयी तो देखा कि वो छ्होटा सा गलियारा था जो पुल के अंदाज़ मे बना था जोकि उपर से छत से ढँका था लेकिन दोनो तरफ के दरिचो से बाहर देखा जा सकता था.बाई तरफ से पहाड़िया दिख रही थी चाँद की रोशनी मे नहाई हुई & दाई तरफ आबादी का एहसास दिलाती पंचमहल से आनेवाली सड़क का एहसास महल की दीवारो के उपर से हो रहा था.दोनो गलियारे का आख़िर मे आ गये जहा 1 और खूबसूरत नक्काशियो से भरा दरवाज़ा था.प्रोफेसर ने उसे खोला & जैसे दिव्या दूसरी ही दुनिया मे आ गयी.अंदर 1 बड़ा सा कमरा था जिसे देख यू लगता था जैसे आज से 400 साल पहले जब रानी सावित्री देवी यहा रहती थी,तब से ये रोज़ वैसे ही सजता आया है.
कमरे मे कोनो मे बड़े-2 मिट्टी के तेल के बड़े खूबसूरत लॅंप थे.प्रोफेसर ने उन लॅंप्स को बुझा दिया & कमरे के 1 कोने मे रखे बड़े से हांडे मे कुच्छ फ्लोस्तिंग कॅंडल्स जला दी.अब कमरे मे बस इतनी रोशनी थी को दोनो 1 दूसरे को देख सकें.
"ये देखिए..",प्रोफेसर कमरे मे बनी बड़ी सी खिड़की पे खड़ा था,दिव्या उसके करीब गयी & उसका मुँह मे हैरत से खुला रह गया.कमरे से पंचमहल की पहाड़िया नज़र आ रही थी,पूरे चाँद की रोशनी मे नहाई हुई.उसने सर उठा के पूनम के चाँद को देखा & फिर सारे नज़ारे को निहारा,कुद्रत की ऐसी खूबसूरती उसने पहले कभी नही देखी थी.
"प्रोफेसर..",वो उसके दाई तरफ खड़ी थी & बेसखता उसका बाया हाथ उसकी ओर उठ गया जिसे उसने थाम लिया,"..ऐसा लगता है मानो हम वक़्त मे पीछे चले गये हैं."
"हां,हम सच मे वक़्त मे पीछे चले गये हैं.",प्रोफेसर ने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए उसकी काली,गहरी आँखो मे झाँका,"..अब उस गीत का मतलब समझाता हू.वो गवैय्ये रानी सावित्री देवी & राजा सुजान सिंग के प्रेम की कहानी सुना रहे थे.राजा सुजान सिंग दुश्मनो से लड़ने गये जहा बहुत खून-ख़राबा हुआ.दोनो तरफ के बस चंद ही लोग ज़िंदा बचे.कुच्छ लोग वापस महल लौटे मगर उसमे राजा साहब नही थे..",प्रोफेसर के साथ खड़ी उसके हाथ मे अपना हाथ दिए दिव्या कभी उसके चेहरे को देखती कभी चाँदनी मे नहाई पहाड़ियो को,"..उन पहाड़ियो के बीच 1 रास्ता हुआ करता था जहा से ये रियासत बाकी दुनिया से जुड़ी थी.."
"हम जिस रास्ते से यहा आए वो तो काफ़ी बाद मे बना पहाड़ियो को काट के.सबने यही समझा था कि राजा साहब जंग मे नही बचे मगर रानी को यकीन था कि उसका सुहाग ज़िंदा है.वो यही इसी खिड़की पे बैठी अपने महबूब की राह तकती रहती थी.3 महीने तक रानी यही बैठी रही.बस भगवान का ध्यान करने के लिए हटती.उसकी नौकरानियाँ यही पे उसे खाना खिला देती लेकिन रानी 1 पल को भी ये जगह नही छ्चोड़ना चाहती थी क्यूकी उसका भरोसा था कि वो यहा बैठी रही तो राजा ज़रूर वापस आएँगे.."
"..ऐसी ही 1 पूनम की रात को शायद कुच्छ अभी का ही वक़्त था जब रानी के कानो मे घोड़ो की टाप की आवाज़ आई.भरोसा तो उसे भी नही हुआ पर उसी वक़्त चाँद की सफेद रोशनी मे उसे दूर वाहा..",प्रोफेसर ने उंगली से इशारा किया तो दिव्या उसके और करीब आ पहाड़ियो की ओर देखने लगी,"..उन 2 पहाड़ियो के बीच रानी को कुच्छ चमकता हुआ दिखा.जब भी राजा बाहर जाते थे & इस रास्ते से लौटते थे तो रानी उनके लौटने के वक़्त यही बैठ के उनकी राह देखती थी & वो अपनी प्यारी बीवी को अपनी तलवार चमका के अपने आने की खबर देते थे.."
"..उस रोज़ भी ऐसा ही हुआ & रानी खुशी से चीख पड़ी.3 महीनो बाद राजा सुजान सिंग लौट आए थे,रानी सावित्री देवी का भरोसा जीत गया था.उसके बाद क्या हुआ पता है?",दिव्या अपना बाया हाथ प्रोफेसर के हाथ मे दिए हुए घूम उसके सामने खड़ी हो गयी & इनकार मे सर हिलाया,"..दोनो इसी कमरे मे पूरे 10 दीनो तक बंद रहे,पूरे 10 दीनो तक!1 पल को भी बाहर ना आए बस 1 दूसरे मे डूबते रहे,प्यार के समुंदर मे गोते लगाते रहे."
चाँदनी रात की कशिश ने,कमरे की मद्धम रोशनी ने & प्रोफेसर दीक्षित की सुनाई कहानी ने माहौल को रूमानी बना दिया था.इसी रूमानी माहौल की वजह से या फिर कुच्छ देर से चूत मे उठ रही कसक की वजह से जब प्रोफेसर उसका हाथ थामे दिव्या के उपर झुका तो उसने उसका विरोध नही किया & अपने लबो को उसके तपते लबो से च्छू जाने दिया.
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क्रमशः........