• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

गद्दार देशभक्त complete

S

StoryPublisher

Guest
गद्दार देशभक्त

उस और सुन्दर लड़की के हलक से ऐसी चीखें निकल रही थी उसे किसी धारदार छुरी से हलाल किया जा रहा हो ।

लेकिन ऐसा था नहीं, जो था, असल में वह किसी छूरी से हलाल किए जाने से भी बीभत्स और बदतर था ।

लड़की को लग रहा था कि उसका सिर, बाकी शरीर से अलग होने ही वाला है और सिर को उसके लम्बे, घने और काले बाल अपने साथ उखाड़कर ले जाएंगे ।

वे बाल, जिम्हें बारह बाई बारह के छोटे-से सीलन भरे कमरे के लेंटर के बीचोंबीच लगे कूदे के साथ बंधी रस्सी के निचले सिरे से कसकर बांधा गया था ।

लड़की का बाकी शरीर, हवा में झूल रहा था ।

उसके पेैर फर्श से करीब तीन फुट ऊपर थे । हाथ भी खुले हुए थे, पैर भी । बालों के अलावा जिस्म के किसी हिस्से को नहीं बांधा गया था । जिस्म पर मेंहदी रंग का सलवार-कुर्ता था जो कई जगह से फट चुका था और वहाँ से उसका गोरा जिस्म ही नहीं बल्कि ताजा बने हुए लम्बे-लम्बे जख्म भी झांक रहे थे ।

कांटेदार हटरों से बने जख्म ।

उसके चारों तरफ चार आदमी खड़े थे ।

आदमी की जगह अगर उसे जल्लाद भी कहा जाए तो अनुचित न होगा ।

चारों के हाथ में वे हंटर थे जिनके निशान लड़की के जिस्म पर खून की लकीरों के रूप में नजर आ रहे थे ।

रोशनी के नाम पर कमरे में मनहूसियत-सी फैलाती पीली रोशनी बिखरी हुई थी, जिसे चालीस बॉट का एक बल्ब उगल रहा था ।

"बोल......बोल !" उनमें से एक ने कहा----"कौन है तू ?"

लड़की को चीखने से फुर्सत मिले तो कुछ बोले भी ।

उनमें से एक का हंटर वाला हाथ पुन: चलने ही वाला था कि ऐसी आवाज हुई जैसे भारी-भरकम लोहे का दरवाजा खुला हो ।

चारों ने एक साथ आबाज की दिशा में देखा और तुरंत ही उनके जिस्म सावधान की मुद्रा में अा गए ।

तीनों के मुंह से एकसाथ निकल---------"हाफिज लुइस साहब !"

मोटी-मोटी सलाखों के दरवाजे को पार करके जो शख्स कोठरी नुमा कमरे में दाखिल हुआ उसकी लम्बाई किसी भी तरह साढे़ सात फूट से कम नहीं थी । जिस्म पहाड़ जैसा । चेहरा इतना चौड़ा जितना वह तवा होता है जिस पर रुमाली रोटियां बनाई जाती है ।

रंग भी तवे जैसा ही काला था । आंखें बाहर को उबली हुई-सी । लाल सुर्ख । जैसे धतूरे का नशा किए हुए हो । छोटा-सा माथा । लम्बे-लम्बे कान । पकौड़े जैसी नाक और लटके हुए-से चौडे होंठ ।

कुल मिलाकर, हाफिज लुईस नाम का वह शख्स शक्ल से ही इतना डरावना था कि कमजोर दिल वाले को तो उसे देखते ही हार्ट अटैक पड़ सकता था । उसके जिस्म पर पठानी सूट, पेरों में भारी बूट और सिर पर काबाईली पगड़ी बंधी हुई थी ।

उसने लड़की की हालत का मुआयना किया और बोला…"गुड काफी कंफरटेबल कंडीशन में रखा है तुम लोगों ने इसे ।"

"फिर भी कुछ बता नहीं रही है सर ।" एक बोला ।

"दूं।" हाफिज लुईस ने एक लम्बा हु'कारा भरते हुए जेब में हाथ डाला ।

पाकिस्तानी सिगरेट का पैकिट निकाला । उसमें से एक सिगरेट निकालकर मोटे होंठों पर लटकाई । उसे लाइटर से सुलगाने के बाद कश लिया और नथुनों से धुवां छोड़ता बोला-----“बताएगी, जो पूछा जाएगा वो बताएगी । हाफिज जब अपना रौद्र रूप दिखाता है तो पत्थर भी टर्र-टर्र करने लगते हैं । इस बेचारी अदनी-सी लड़की की तो बिसात क्या है!"

वे चारों पत्थर के बुत से खड़े रहे ।

मोटी-मोटी उंगलियों के बीच उनसे कम मोटी सुलगती हुई सिगरेट लिए हाफिज हवा में झूल रही लड़की के करीब पहुंचा और बोला-------"नाम बताओं?"

"म. . .मरजीना ।" चीखों के बीच लड़की मुश्किल से कह पाई ।

"ऊंहूं । तुम तो यार शुरुआत ही झूठ से कह रही हो । जो भुगत रही हो, निजात चाहती हो तो असली नाम बताओ ।"

लड़की गुर्राई……"मुझे उतार कमीने ।"

"अरे!" हाफिज ने अपनी मोटी-मोटी आंखें मटकाईं....."ये तो बदतमीज भी है । जलील को कमीना कहती है ! फिर भी एक बात बता, अगर में तुझे उतार दूं तो क्या तू मुझे असली नाम बात देगी?"

"मेरा नाम मरजीना ही है ।”

हाफिज ने कहा…“तेरां नाम नीलिमा है ।"
 
एक पल के लिए तो लड़की सन्न रह गई । जैसे जवाब न सूझा हो । अगले पल बोली----" कौन नीलिमा ?"

“बो नीलिमा जिसका घर मुम्बई में है ।" हाफिज ने कान्सिडेंस भरी मुस्कान के साथ कहा था…"वो नीलिमा जिसके बाप का नाम केसरी नाथ है । दो केसरी नाथ जो अरवों-खरबों का मालिक है ।"

हकबकाई हुई लड़की ने कहा…“पता नहीं तुम क्या बक रहे हो । मेरा नाम मरजीना ही है । पाकिस्तानी हूँ । इस्लामाबाद में रहती हूं । पूरा एड्रेस बता चुकी हूं ! तस्दीक कर सकते हो ।"

"मुझे मालूम है, तस्दीक हो जाएगी । क्योंकि तुमने पाकिस्तान में खुद को इसी नाम और एड्रेस के साथ स्थापित कर रखा था । ऐसा करने वाली तुम अकेली नहीं हो, चार साथी और हैं तुम्हारे । वे सब भी पकडे़ जा चुके है और इसी जेल की अलग-अलग कोठरियों में तुम्हारी तरह ऐश काट रहे हैं । उनके नाम अंजली, सुबोध, अनिल और समर हैं । वे भी इस्लामाबाद में अलग-अलग एड्रेसो पर, अलग-अलग मुस्लिम नामों से स्थापित थे । तुममें से किसी को भी 'नकली' साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि तुम्हें इस्लामाबाद में बसाने के लिए प्लानिंग ही इतनी पुख्ता बनाई गई थी लेकिन हम भी, आखिर हम हैं । क्या ये भी बताने की जरूरत है कि जिस काम से तुम पाकिस्तान में अाकर बसे थे, उसका नाम

आँपरेशन दुर्ग

है !"

लड़की की जुबान को जैसे लकवा मार गया था । कुछ बोलना तो दूर, पीड़ा से चीखना भी भूल गई थी वह ।

जेहन में ऐसा शोर गूंज रहा था जैसे एक ही रनवे पर सैकड़ों विमान दौड़ रहे हों । वह समझ नहीं पा रही थी कि इन लोगों को इतना सब कैसे मालूम हो सकता है ।

"हैरान रह गई न !" हाफिज ने वही कह दिया जो नीलिमा के दिमाग में चल रहा था-------" यह सोच-सोचकर होश फाख्ता हुए जा रहे हैं न कि हमें इंडियन सीक्रेट सेल के इतने राज कैसे मालूम हो गए ! जो कुछ मैंने कहा, क्या उसी से तुम्हें यह आभास नहीं हो गया है कि हमें सबकुछ मालूम हो गया है । बस एक बात को छोडकर ।"

"तुम हम पर बेजा इल्जाम लगा रहे हो ।" नीलिमा ने पूरी दृढता से कहा था…“जाने कौंन-से आपरेशन दुर्ग की बात कर रहे हो?"

“ये पूछो हमे क्या पता नहीं लगा है?"

"तुम्हें जो पता लगा है, गलत पता लगा है ।"

“तुम नहीं बता रहीं तो चलो, मैं ही बता देता हूं ।” हाफिज ने एक कश लगाने के बाद कहा था…“भरपूर कोशिश के बावजूद हम यह नहीं जान सके हैं कि अर्जुन कहां है मगर ये जानते है कि उसके बारे में सिर्फ तुम बता सकती हो । उसका पता बता दो । ईमान से, न सिर्फ तुम्हें आजाद कर देंगे बल्कि मुम्बई, तुम्हारे घर पहुचा देंगे ।"

"पता नहीं किस अर्जुन की बात कर रहे हो...आह ! आह !" शब्द चीखों में बदलते चले गए क्योंकि ठीक उसी समय हाफिज ने सुलगती हुई सिगरेट उसके नंगे बदन पर रख दी थी ।

और फिर, ये सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रूका ही नहीं ।

हाफिज बार-बार कश लेकर सिगरेट सुलगाता और पुन: उसके जिस्म के किसी हिस्से पर रख देता ।

सवाल एक ही था…“अर्जुन कहां है?"

और जवाब भी एक ही था--"'मैं किसी अर्जुन को नहीं जानती ।”

जव तक सिगरेट खत्म हुई तब तक नीलिमा पर बेहोशी सी छाने लगी थी ।

हाफिज अपनी नाकामी पर भन्ना गया था । सिगरेट के अंतिम दुकड़े को उसने फर्श पर डालकर जूते से कुचला और दांत भींचने के साथ अपना चौड़ा हाथ अपने ही बालो पर लटकी नीलिमा की पतली गर्दन पर जमाता हुआ बोला---“धींगामुश्ती से काम नहीं चलेगा लड़की । पक्के तौर पर समझ ले कि मैं अपने सवाल, एक मात्र सवाल का ज़वाब तुझसे लेकर रहूंगा । दो घंटे देता हूँ । सोच ले, जवाब अपने जिस्म को बगेर कोई कष्ट पहुंचाए देना है या तब देगी जब मैं हॉकी जैसी उम्दा चीज तेरे जिस्म में घुसेड़ दूगा ।"

कहने के बाद भन्ताया हुआ हाफिज लुईस वहां से चला गया ।

नीलिमा न पूरी तरह होश में थी, न ही बेहोश । वह अपने जेहन को अपने अतीत में छलांग लगाने से न रोक सकी थी!

तव, नीलिमा एक ताजी खिली हुई कली थी । वह यूनिर्वसिटी के गेट के बाहर, सड़क पर खड़ी अपनी जगुआर के बोनट से पीठ टिकाए अर्जुन का इंतजार कर रही थी ।

उस वक्त उसने डेनिम की काली र्जींस और सफेद टॉप पहन रखा था ।

उसमें वह बेहद सुन्दर लग रहीं थी ।

अर्जुन फाइनल ईयर का अंतिम पेपर देकर बाहर निकला ।

उन दोनों का बचपन साथ गुजरा था । उनके पिता पुराने दोस्त थे और दोस्ती को रिश्ते में बदलने का फैसला कर चुके थे ।

नीलिमा अर्जुन को पसंद करती थी बल्कि यह कहा जाए तो गलत न होगा कि उससे प्यार करती थी !

प्यार तो अर्जुन भी करता था नीलिमा से लेकिन अभी शादी के लिए तैयार नहीं था ।

नीलिमा को देखते ही वह उसके करीब पहुंचा और सहज भाव से पूछा-"मेरा इंतजार कर रही हो?”

अर्जुन पर एक भरपूर नजर डालने के साथ उसने शिकायती लहजे में कहा था…“तुम्हारा इंतजार करने के अलावा मेरे पास और काम ही क्या है?”

“शिकायत कर रही हो?"

"शिकायत केैसी! मुझे अच्छा लगता है ।"

""क्या? "

"इंतजार करना----इस इंतजार में जो मजा है, तुम मर्द लोग उसे शायद ही कभी समझ सको ।"

" कितना फ़र्क है हम दोनों की बुनियादी आदतों में नीलम ।" वह नीलिमा को हमेशा नीलम ही कहता था…“तुम्हें इंतजार करना पसंद है और मुझे इंतजार करना सख्त नापसंद है । फिर भी हम जीवन-भर के रिश्ते में बंधना चाहते है ।"

"तुम्हारी कार कहां है?” नीलिमा ने बात बदली ।

“आज नहीं लाया । एक दोस्त के साथ चला आया था ।"

"मैं छोड़ दूंगी ।"

"थैक्स ! "

“बैठो ।”

अर्जुन कंडेक्टर सीट पर बैठ गया ।

नीलिमा कार को घुमाकर मेन रोड पर ले आई और एक्सीलेटर पर दबाव बनाती बोली…“तुमने फाइनल पेपर दे लिया है । कोई शक नहीं है कि पास हो ही जाओगे । उसके बाद ?"

अर्जुन गहरी सांस भरकर बोला---“अगर ये सवाल हमारे रिश्ते को लेकर है तो, तुम्हें अभी और इंतजार करना होगा ।"

नीलिमा ने सड़क नजर हटाकर गहरी नजरों से उसे देखा, फिर वापस सड़क को देखने लगी ।

"क्या फर्क पड़ता है ।" अर्जुन ने कहा…“तुम्हें तो इंतजार करना वैसे ही वहुत पसंद है?"

"हां ।"

“फिर भी डर गई?"

"यह डर तुम्हारे लिए है ।"

"मेरे लिए ! क्यों भला ?"

"क्योंकि तुम्हे इंतजार करना सख्त नापसंद है । फर्ज करो कि कभी तुम्हें मेरा इंतजार करना पड़ा तो क्या होगा !"

"तुम कहना क्या चाहती हो नीलम?" अर्जुन एकाएक बेचैन नजर आने लगा था ।

“कहना नहीं, पूछना चाहती है अर्जुन । हमारा यह रिश्ता बहुत पाक है । सबसे बडी बात, इस रिश्ते में कोई बाधा, कोई इम्तहान नहीं है, फिर भी मैं आशंकित हुं, क्योंकि मैंने अाज तक कभी इस रिश्ते को लेकर तुम्हारे अंदर वार्म फीलिंग्स महसूस नहीं की । आखिर क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग में ?"
 
" मेरे जज्जातों पर शक मत करों नीलम । मैं भी तुम्हें उतना ही चाहता हूं जितना तुम मुझे ।” कहने के बाद मन-ही-मन बड़बड़ाया था वह…"या शायद उससे भी ज्यादा ।'

"तो लड़कियों जैसे नखरे की वजह?”

"सच बोलूं ?-"'

"वही सुनना चाहती हूं ।"

"सुन सकोगी ?"

"बचपन से खेलते आए हो मेरे साथ । इसके बावजूद नहीं समझ सके कि तुम्हारी नीलम कड़वे-से-कड़वे सच को बगैर हाजमोला की गोली इस्तेमाल किए हजम कर सकती है ।"

अर्जुन थोडा हंसा । बोला-----"सच कुछ ज्यादा ही कड़वा है ।"

"अजमाजो तो सही अपनी नीलम को!"

"डरता हु----अजमाने के चक्कर में कहीं तुम्हें खो ही न बैठूं ।"

“अजीब चक्करदार आदमी हो यार, खोना भी नहीं चाहते पाना भी नहीं । सारी जिदगी यूं ही त्रिशंकू वने रहोगे?"

"सुना है, कोई भी लड़की अपने ब्वॉय फ्रेंड से यह सुनना पसंद नहीं करती कि लह उससे ज्यादा किसी और से प्यार करता है !"

धक्क-से रह गया नीलिमा का दिल ।

कई पल के लिए जैसे वह धड़कना ही भूल गया था ।

पलक झपकते ही नीलिमा के दिमाग में दिल को तोड़ देने वाला मकड़जाल सा वन गया था । यह विचार जेहन से तूफानी झोंके की तरह टकराया था किं…"ये कया कह रहा है अर्जुन मुझसे ज्यादा किसी और को चाहता है! कौन है वो? मैंने तो आज तक इसके अास-पास किसी लड़की का साया तक नहीं देखा ।"

"क्या सोचने लगी?" अर्जुन के शब्दों ने मस्तिष्क को झंझोड़ा ।

वह हड़बड़ाकर बोली "क----कुछ नहीं । कुछ भी तो नहीं ।'"

"मैंने तो पहले ही कहा था, सच बहुत कड़वा है ।" अर्जुन फिर थोड़ा-सा हंसा था-“अभी तो कुछ वताया भी नहीं है । सिर्फ भूमिका बांधी है । बता दिया तो क्या हाल होगा!"

“क्या हाल होगा!" नीलिमा अपने अंदर के बंवडर को दबाए रखकर बिंदास अंदाज में बोली-----" मैं भी टाटा, बाय-बाय कर दूंगी तुमसे । मैं कौन सा घंटी बनकर तुम्हारे गले में लटकना चाहती हूं ! पापा से भी कह दूंगी और अंकल से भी-----जब अपना अर्जुन प्यार ही किसी और से करता है तो उसी से शादी कर दो इसकी । मेरी जिन्दगी क्यों बरबाद करते हो! वेसे भी, अब हम कोई बच्चे तो है नहीं कि हाथ पकड़कर चाहे जिसके साथ बांध दे । बालिग हो गए हैं । आखिर हमारी भी कोई मर्जी है ।”

"बिल्कुल ठीक ।"

"क्या ठीक?"

"जो तुमने कहा ।"

"नाम तो बता दो ।" पूछते वक्त नीलिमा का दिल जोर-जोर से उसकी पसलियों पर सिर पटक रहा था ।

अर्जुन ने पूछा-"किसका?”

"उसी का, जिसका जिक्र चल रहा है । जिससे प्यार करते हो ?"

"हिंदुस्तान ।"

नीलिमा चिहुकी----"किसो लड़के से प्यार करते हो क्या?"

" उसका दूसरा नाम भारत है ।"

"ये भी लड़के का नाम है, लड़की का नाम बताओं ना"

"इंडिया ।"

“हां ये हो सकता है लडकी का नाम । कहां रहती है?"

"वो कहीं नहीं रहती । हम सब उसमें रहते हैं ।"

नीलिमा ने सड़क से नजर हटाकर अर्जन को धूरा और धुरती ही रही । अर्जुन को कहना पड़ा-“सड़क देखो, एक्सीडेंट हो जाएगा ।"

"तुमने क्या कहा, मेरे छोटे से दिमाग में फिक्स नहीं हुआ ।" उसने वापस सड़क की तरफ़ देखते हुए कहा था ।

"मैंने ये कहा डार्लिग कि मैं मुल्क को, अपने देश को या अपने वतन को तुमसे ज्यादा प्यार करता हूं !”

"धत्त तेरे की ।" नीलिमा ने दोनों हाथ थोडे ऊपर उठाकर बापस स्टेयरिंग पर पटके…“तुमने तो यार गोबर कर दिया सारी बात का । मैं तो समझी थी कैटरीना से प्यार करने लगे हो, दीपिका पादुकोण को चाहने लगे हो या कंगना रनावत दिल में बस गई है ।"

"तुम जानती हो नीलम, लड़की के नाम पर मेरी जिदगी में तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है !”

या मेरे रब्बा !" सारे डर खत्म होते ही मारे खुशी के नीलिमा की आंखें डबडबा गई थी----"गाड्री न चला रहीं होती तो इस वात पर थोबड़ा चूम लेती तुम्हारा और कई जन्मों तक चूमती ही रहती ।"
 
"डर गई थी ना"

"हां । डर तो गई थी लेकिन...

"लेकिन ?"

"अपने देश से कौन प्यार नहीं करता! मैं भी करती हूं लेकिन मेरे तुम्हारे बीच ये मुत्क से प्यार कहाँ से आ गया? मैंने कब कहा कि अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो वतन से प्यार न करना ।"

“तुमने तो नहीं कहा मगर डरता हूं !"

"किस बात से?"

"कहीं तुम्हारे साथ कोई नाइंसाफी न हो जाए ।"

“मेरे साथ नाइंसाफी हो जाएगी! बो कैसे?"

"नीलम ।" एकाएक गम्भीर हुआ-“तुम तो जानती ही हो कि मेरे पिता देश की बडी इंटेलिजेंस के वहुत बड़े अफ़सर हैं । मुल्क के सच्चे सिपहसलार हैं ।"

" जानती हूं ।"

"मैं भी उन्हें की तरह मुत्क का सिपाही बनना चाहता हूं ।”

"मुझे खुशी होगी । लेकिन...

" लेकिन ?"

"कोई खास वजह?"

"जब मैं अखबारों में अातंकबादियों की करतूत पढ़ता हूँ या जव टीवी पर उनके द्वारा मारे गए के बेगुनाहों की फोटो देखता हूं । उस बरबादी को देखता हूं जो उनके बमों की होती है तो. . . ।" कहता कहता वह रुक गया । जोश की ज्यादती के कारण आवाज कांपने लगी थी !

नीलिमा ने एक वार फिर सड़क से आंखें हटाकर उसकी तरफ़ देखा और दंग रह गई क्योंकि उसे अर्जुन का चेहरा, चेहरा नहीं बल्कि दहकते ज्वालामुखी सा लगा था ! बडी मुश्किल से बस वह इतना ही कह सकी थी…“तो?"

"लोग जिन खबरों को पढ़कर अखबार एक तरफ़ फेंक देते है और चाय-बिस्कुट उड़ाने लगते हैं, उन खबरों को पढ़कर मेरा खून खेलने लगता है ।" ज्वालामुखी के अंदर से शब्द लावा बनकर निकलने लगे थे…“मैं अपनी मां-भारती के लिए तड़पने लगता हूं ! आज इस मुल्क में हर तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ है । चारो तरफ अंधेरे के अलावा और कुछ भी नहीं दिखता । भारत-माता की कराह किसी को भी सुनाई नहीं देती । हर नौजवान बस खुद ही की तरक्की करने के लिए दौड़ा चला जा रहा है । किसी को इस बात की परवाह नहीं है कि हमारा मुल्क रो रहा है-तड़प रहा है-सिसक रहा है । इस मुल्क के आंसू किसी को क्यों नजर नहीं आते और. . और ।" इतना कहकर वह बुरी तरह हांफने लगा था ।

नीलिमा ने एक बार फिर पूछा…"और ?"

"और मेरी समझ में यह नहीं आता कि ऐसा मेरे ही साथ क्यों होता है? किसी और के साथ क्यों नहीं होता ?"

"मैं बताऊं ऐसा तुम्हारे ही साथ क्यों होता है?"

“त. . .तुम ?" उसने आश्चर्य से पूछा--"' तुम बता सकती हो ?"

"क्योंकि तुम्हारी रगों में पुश्तैनी देशभक्तों का खून बह रहा है अर्जुन ।” नीलिमा कहती चली गई…“तुम्हारे दादा जी परमवीर चक्र विजेता थे । दुश्मन के सात टेंक ध्वस्त करने के बाद दम तोड़ा था उन्होंने और तुम्हारे पापा भी इंटेलिजेंस में हैं । वहां वे भी वही काम कर रहे है तुम्हारे दादा जी ने किया था ।"

" श......शायद तुम ठीक कह रही हो । शायद इसीलिए मेरे अंदर से भी बार'-बार एक सिपाही बनने की आवाज अाती है । दिल चाहता है कि देश में धमाके करने वालो के परखच्चे उडा़ दूं !”

"उड़ा दो ।"

"क. . क्या?" अर्जुन सकपकाया ।

“देश के दुश्मनों के परखच्चे उड़ा दो । बन जाओ मुल्क के सच्चे सिपाही । आदमी को वही बनना चाहिए अर्जुन जो बनने की आवाज उसके अंदर से आ रही हो । अपने अंदर की आवाज सुनने के अलावा इंसान को किसी और की आबाज नहीं सुननी चाहिए ।"

“य.. .ये तुम कह रही हो?"

"हां । मैं कह रही हूं ! तुम्हारी नीलम ।"

“उस राह में मैं कुर्बान हो सकता हूं !"

"तो तुम्हारी चिता की राख भर लूंगी अपनी मांग में ।"

अर्जुन के मुंह से चीख-सी निकल गई-----“न..............नीलम ।"

"इसीलिए डरते हो ना इसीलिए टाले जा रहे हो न शादी को कि कहीं किसी दिन तुम्हें तुम्हारा देश न बुला ले और तुम्हारी नीलम विधवा न हो जाए! यहीं डर दुविधा में फंसाए हुए है न तुम्हें!"

इस बार अर्जुन कुछ बोल न सका । नीलिमा की तरफ इस तरह देखता रहा जैसे गाडी़ ड्राइव करती उस लड़की ने सड़क की तरफ़ देखते-देखते उसके दिल में लिखी हर इबारत पढ़ ली हो ।

“वेसे तो यह कोई तर्कपूर्ण बात न हुई अर्जुन कि तुम इस डर से शादी ही मत करों कि एक दिन वतन पर शहीद न हो जाओ ।" नीलिमा कहती चली गई…"सिपाही क्या शादी नहीं करते! शहीद क्या घर नहीं बसाते! बसाते है----तुम्हारे दादा ने बसाया, तुम्हारे पिता ने बसाया । तभी तो देश को तुम्हारे पिता और उसके बाद तुम जैसा देशभक्त मिल सका लेकिन इस तर्क के साथ मैं तुम्हें खुद से शादी करने के लिए विवश नहीं करूंगी । वादा करती हूं-----तब तक तुम्हारे सामने शादी का नाम तक नहीं लूंगी जब तक तुम्हारे दिल से यह खौफ़ नहीं निकल जाएगा कि मैं विधवा हो सकती हूं !"

“थ. . .थेंक्यू।" अर्जुन की आंखें भर आई----“थेंक्यू नीलम ।"

“पर एक बात बताऊं?”

“बोलो ।"

"" मुझसे शादी करके फायदे में रहते ।"

“ कैसे?"

"एक ज्योतिषी ने वताया था कि मेरे हाथ में वो लकीर है जो बताती है कि मैं अंतिम सांस तक सुहागिन रहूंगी । जब चिता पर लिटाई जाऊंगी तो मेरे माथे पर बिंदी होगी, मांग में सिंदूर होगा ।"

"त. . .तुम तो मजाक करने लगीं ।"

"यह मजाक नहीं है गधे, और. ..

"और ?"

"एक फैसला मैंने भी कर लिया है ।"

" क्या ?"

"मैं भी सिपाही बनूंगी ।"

"'क.....क्या?” अर्जुन उछल पड़ा ।

"डंक मार दिया क्या बिच्छु ने?"

""य. . .ये तुम क्या कह रही हो नीलम! पागल हो गई हो क्या? तुम एक ऐसे पिता की इक्लोत्ती वेटी हो जिनका अरबों-खरबों का कारोबार सारे भारत में फैला हुआ है । तुम्हें उनका व्यापार संभालना है । वे क्या तुम्हें नौकरी करने देगें ?"

"इतनी जल्दी भूल गए! मैंने कहा था कि इंसान को अपने दिल की आवाज के अलावा किसी की आवाज नहीं सुननी चाहिए और अब . . .जो मेरे दिल ने कहा, वह मैंने तुम्हें बता दिया ।"
 
"नीलम, जज्वातों में मत बढ़ो ।"

“वो इंसान ही क्या जो जज्वातों की गंगा में न नहाए, और...

" और ?"

"मैं पापा को मना लूंगी ।"

"खुद को सिपाही बनने देने के लिए?"

"हां ।"

"कैसे ?"

"मेरे पास तर्क है ।"

“कैसा तर्क? "

"पापा मुझे अक्सर बताते हैं कि शुरू-शुरू में उनकी और मम्मी की बिल्कुल नहीं बनती थी । अवसर तकरार हो जाया करती थी । तकरार का कारण था-क्रिकेट । पापा को क्रिकेट का वहुत शौक था । जब मैच आता था तो वे सारे काम छोड़कर टीवी से ही चिपके रहते थे और मम्मी को क्रिकेट के वारे में एबीसीडी भी मालूम नहीं थी ! वे पापा के टीवी से चिपकने पर झुंझलाती थी । तब पापा ने कहा था कि-"पति पत्नी का रिश्ता तभी खुशगवार बना रह सकता है

जव दोनों एक दूसरे की रुचियों में रमें, उनमें दिलचस्पी लें तब मम्मी ने कहा था…"जब मुझे क्रिकेट के वारे में कोई जानकारी ही नहीं है तो मेच में केैसे दिलचस्पी लूं ?" तब पापा बोले------" क्रिकेट के बारे में नॉलिज लो ।" और,मम्मी की समझ में बात आ गई । वे क्रिकेट में दिलचस्पी लेने लगीं । पाप के साथ मैच देखने लगी और जल्दी ही पापा के साथ क्रिकेट पर बात करने लगी । तकरार बंद हो गई । दोनों की लाइफ़ खुशगवार हो गई ।"

"ये सब क्या कह रही हो तुम"

"जब मैं पापा को बताऊंगी कि अपनी लाइफ़ को खुशगवार बनाने के लिए मैं इसलिए सिपाही बनना चाहती ३ क्योंकि मेरा अर्जुन सिपाही बनना चाहता है तो कैसे इंकार कर सकेंगें वे ? कौन-से तर्क के साथ मुझे सिपाही बनने से रोकेंगे ?"

अर्जुन का मुंह खुला जरूर लेकिन कहने के लिए कुछ सूझा नहीं ।

वही बोलीं…“तुम्हें तो लकवा मार गया यार !"

"सिपाही बनना इतना आसान भी नहीं है ।" उसने कहा ।

"मुश्किल काम करने का ठेका क्या तुम्हीं ने उठा रखा है?”

"मतलब? "

"मैं क्या पढ़ी लिखी नहीं हूं ? तुमसे एक ही क्लास तो पीछे हूं और नम्बर भी तुमसे कोई खास कम नहीं अाते और फिर मेरे होने वाले ससुर साहब इतने बड़े इंटेलिजेंस अफ़सर हैं । क्या वे मेरे कहने पर डिपार्टमेंट में छोटी-सी नौकरी भी नहीं देगें ?"

“पापा को यह हरगिज मंजूर नहीं होगा ।"

"मेरा सिपाही बनना?"

“हां ।"

"मुझे तुम्हारा चेलेंज कबूल है । तुम्हारे पापा को मेरी जिद पूरी करनी पड़ेगी । और मेरा तुमसे वादा है, तुम्हें भी मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी । मुल्क के लिए अपने हर मिशन पर एक मजबूत चट्टान की तरह मुझे हमेशा अपने साथ खड़ी पाओगे ।"

“य . . .यह नहीं हो सकता नीलम---- कभी नहीं हो सकता ।"

"अब तो यह होकर रहेगा मेरे साजन, समझ तो कि आज से मेरी जीवनधारा बदल चुकी है । अब मैं तुम्हारे लिए जीऊंगी औऱ मुल्क के लिए अपनी जान गंवा दूंगी ।"

नीलिमा के दिमाग में उस वक्त अपने ही शब्द गूंज रहे थे जव एक हॉकी के 'यू-शेप' वाले सिरे ने उसकी ठोडी़ ठकठकाई और कानों में अमजद की आवाज पड़ी…"क्या सोचा?"
 
इंटेलीजेंस ब्यूरो का जोनल चीफ बीरेश गोतम दिल्ली स्थित गृहमंत्रालय पहुंचा और गृहमंत्री बादल नारंग के भव्य आफिस में पहुंचकर उनसे मिला ।

वह गोपनीय मीटिंग पूर्व निर्धारित और निहायत ही अहम थी ।

एजेंडा था…हाफिस लुईस ।

हाफिस लुईस पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का एक आतंकी चेहरा था । वह जमात उल फिजा नामक एक आतंकी संगठन का प्रमुख था । उसके आतंक का साम्राज्य ईराक, अफगानिस्तान, भारत और अमेरिका तक फैला हुआ था !

भारत में उन्नीस सौ तिरानवे के मुम्बई बम कांड सहित मुम्बई हमले का वह मास्टर माइंड था ।

पाकिस्तानी हुकूमत का हाफिज लुईस को खुला और निर्लज्जता भरा समर्थन व संरक्षण प्राप्त था । इसी वजह से हाफिज पाकिस्तान की जमीन पर आजाद घूम रहा था !

----

“कैसे हैं गोतम साहब !" प्रभावशाली चेहरे तथा आवाज़ वाले गृहमंत्री बादल नारंग ने बीरेश गोतम से औपचारिक सवाल किया ।

“अगर आपका सवाल मेरे फील्ड को लेकर है तो गुस्ताखी माफ होम मिनिस्टर साहब ।" गोतम अदब से बोला था…“इस फ्रंट पर हालात जरा भी अच्छे नहीं हैं ।"

“बो तो इसी से जाहिर है कि आईबी का जोनल चीफ खुद मुम्बई से दिल्ली आया है ।" नारंग बोला----"लेकिन बात क्या है ? क्या आईबी को कोई अहम सुराग हाथ लगे हैं?"

"ऐसा ही है जनाब । वे सुराग बेहद अहम और फिक में डालने वाले हैं ।उुन्हें आपकी जानकारी में लाया जाना बेहद जरूरी है ।"

" लाओ !"

"आप जानते ही हैं कि मेरे अाने की वजह हाफिज लुइस है ।"

"अब क्या किया उसने? "

"अभी किया नहीं है । करने वाला है ।"

“क . . .क्या?"

"आईबी ने जो जानकारियां जुटाई है, उसके मुताबिक हाफिज लुईस ने एक निहायत ही खतरनाक मास्टर प्लान तेयार किया है ।”

"कैसा मास्टर प्लान? मुम्बई हमले जैसा?"

"उससे कई-कई गुना ज्यादा खतरनाक ।"

“अरे ?"

“हमें मिली इन्फारमेशन के मुताबिक इस बार हाफिज ने अपने ओंपरेशन को औरंगजेब का नाम दिया हैं--------आंपरेशन औरंगजेब ।"

''आपरेशन औरंगजेब ।" नारंग ने व्यग्र भाव से दोहराया । फिर पूछा…"उसकै इस आंपरेशन का मकसद क्या हैं?”

"वैसे तो सर, हर पाकिस्तानी दहशतगर्द का केवल एक है मकसद हे…-हमारे मुत्क की जमीन पर तबाही फैलाना-बेगुनाहों के खून की नदियां बहाना, ताकि यह हमारी हुकूमत पर अपनी मांगों को मानने का दबाव वना सके । वह अपने इन शैतानी मंसूबों में कितना कामयाब हुआ है, यह अलग मसला है । मगर आंपरेशन औरंगजेब आज तक के सभी बड़े आतंकी मिशनों से इस मामले में अलग है, क्योंकि शायद पहली वार ऐसा हुआ है कि जबकि अपनी दहशतगर्दी के लिए पाकिस्तान ने इस मुल्क में एक साथ तीन…तीन मोर्चे खोलने का मिशन प्लान किया है ।"'

"एक साथ तीन-तीन मोर्चे? वह कैसे?"

"हाफिज का पहला और अहम मिशन भारत की जेलों में बंद अपने उन आंतकी साथियों को रिहा कराना है, जिन्हें कोर्ट द्वारा फांसी की सजा दी जा चुकी है ।"

"इसमे नया क्या ? यह तो दशहतगर्दों का वहुत पुराना मिशन है । अपने साथियों को जेल से रिहा कराने के तो वे हमेशा से ख्वाहिशमंद रहे है और कितनी ही बार उसमें कामयाब भी हुए हैं । लेकिन फांसी की सजा पाए अब ऐसे दहशतगर्द बचे ही कितने हैं! उनमें से कुछ तो फांसी पर लटक चुके हैं । जो बचे हैं, उनकी सजा टाइम लिमिट की वजह से सुप्रीम कोर्ट माफ कर चुकी है ।"'

"अभी ऐसा एक खूंखार दहशतगर्द वाकी है, जो सुप्रीम कोर्ट की टाइम लिमिट में नहीं आता और जिसे अगले हफ्ते फांसी देना निश्चित हुआ है । यह दिल्ली हाईकोर्ट के सीरियल ब्लास्ट का आरोपी है, जिसमें बीस से ज्यादा लोग मारे गए थे । यह सीरियल ब्लास्ट भी हाफिज ने कराया था और उसके इशारे पर उसे हाफिज के ही एक कमांडर ने अंजाम दिया वा, जो बाद में पकड़ा गया था ।"

“तुम शायद मुस्तफा की बात कर रहे हो, जो पिछले तीन साल से तिहाड़ जेल में बंद है?”

"आप ठीक समझे । मैं उसी की बात कर रहा हूं । अॉर्परेशन औरंगजेब का पहला मोर्चा मुस्तफा की रिहाई को लेकर है । सूचना के मुताबिक हाफिज का प्लान मुकम्मल हो चुका है ।"
 
"प्लान मुकम्मल भी हो चुका है?" नारंग चौंककर बोला----“यह तुम क्या कह रहे हो गोतम?"

" यह सच है सर ।"

"क्या कोई प्लेन हाईजैक या वेसा ही कुछ और?”

“अभी इस बारे में सुराग नहीं मिला । हाफिज वहुत शातिर दहशतगर्द है । वह अपना हर कदम फूक--फूंककर रख रहा है ।"

“ओहो! और उसका दूसरा मोर्चा क्या ?"

"दूसरे मोर्चे पर भी वह काफी कामयाबी हासिल कर चुका है । मुझे यह पवकी इंफारमेशन मिली है कि हाफिज की प्लानिंग के मुताबिक जमात उल फिजा के पांच तालिबानी दहशतगर्द कमांडर भारत की सरहद में दाखिल हो चुके हैं और अपना नाम तथा पहचान बदलकर उन्होंने एक लम्बे अरसे से इस मुल्क में पनाह हासिल कर रखी है----मजबूत पनाह ।"

"कितने लम्बे अरसे से?"

"कुछ भी कहना मुश्कि्ल है । वह टाइम एक साल भी हो सकता है, दो साल भी हो सकता है…उससे ज्यादा भी ।”

"क्या आईबी ने उन पांचों के नाम पता कर लिए हैं?”

"अखलाक, मोहसिन, शमशाद, इस्माइल और..

"और क्या?”

"उनके साथ एक लेडी कमांडर भी है, जिसका नाम सुरजाना है । कहते है कि वह वेहद जवान है और ऐसी गजब की खूबसूरत है, जो अपने ऊपर किसी को भी लटूटू कर सकती है । लेकिन साथ ही वह ऐसी पत्थरदिल महिला है जिसके कारनामे जल्लाद को भी मात दे सकते हैं ।"

“उन्हें भारत में भेजने का क्या मकसद हे?”

"सबसे पहला मकसद तो सरकार और खुफिया एजेसियों की तबज्जो आपरेशन औरंगजेब के पहले मोर्चे से हटाना है, ताकि मुस्तफा को जेल से आजाद कराने के लिए हाफिज की एक विंग जो कर रही है, उसमें ज्यादा अड़चने न आएं । वेसे उन पांचों दहशतगर्द कमांडरों ने अलग-अलग कामों का प्रशिक्षण ले रखा है, और उनमें से हर कोई अपने-अपने फील्ड का महारथी है, या फिर युं कह लीजिए कि सोशलिस्ट है ।"

"पहले दहशतगर्द कमांडर का तुमने क्या नाम बताया था?"

"अखलाक ।"

"हां । वह किस चीज का स्पेशलिस्ट है?”

"अखलाक विस्फोट करने का स्पेशलिस्ट है । आम इस्तेमाल में अाने वाली साधारण चीजों से भी विस्फोटक बनाने में उसे महारत हासिल है । अॉपरेशन औरंगजेब के तहत उसे असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के रेल मार्ग और हाइवे पर वने फ्लाई ओवर्स को सीरियल विस्फोट करके उडा़ना है ।"

"मोहसिन को क्या करना है?"

“मजहब के नाम पर सारे हिंदुस्तान के मुस्लिम बाहुल्य इलाके के मुसलमानों में नफरत का जहर भरना, कश्मीर से कन्याकुमारी तक मुल्क के हर मुस्लिम बाहुल्य इलाके में के भी दंगे भड़काना ।"

"हुम्म. . . ! तीसरे का क्या नाम बताया था तुमने, हां......शमशाद । उसका क्या काम है?"

"शमशाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के एक मदरसे में काम करता था और यहीं पढ़ने वाले बच्चे के कच्चे दिमाग में मजहब के नाम पर नफरत का बीज बोता था । हमारे मुल्क में भी बेशुमार मदरसे संचालित हैं, जिनमें कच्ची उम्र के हजारों-लाखों मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं । शमशाद का मिशन उन बच्चों का ब्रेनवाश करके उन्हें बागी बनाना है और भविष्य के पाकिस्तान एजेंट तैयार करना है । झारखंड और छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के बगावती तेवरों को उकसाने और उन्हें ठंडा न पड़ने देने की जिम्मेदारी भी शमशाद की है । जरूरत पड़ने पर उन्हें हथियार तथा आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी शमशाद पर ही डाली गई है । बताने की जरूरत नहीं है सर कि आज पाकिस्तान हमारे ही घर में बैठे नक्सलियों और माओवादियों को वहुत उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है । ये ऐसे लोग हैं जिनका वह हमारे खिलाफ भरपूर उपयोग करना चाहता है ।"

“मैं जानता हू । इस्माइल के वारे में कुछ बताओ ।”

“इस्माइल अाई.एस.आई की आईटी ब्रांच में काम करता था । सुना है कि उसने इंटरनेट और सोशल साइटस के जरिए मजहबी नफरत फैलाने की पुख्ता ट्रेनिंग हासिल की हैं । तीन-साल पहले सोशल मीडिया के जरिए असम में जो मजहबी हिंसा फैलाई गई थी,

उसके पीछे इसी आदमी का दिमाग था । तब उसने पाकिस्तान में बैठकर वह सब किया था । वाद में किसी वजह से उसे आईएसआई ने बाहर का रास्ता दिखा दिया तो यह हाफिस की "जमात उल फिजा' का सदस्य वन गया ।"

"तो उसका काम सोशल साइट्स के जरिए भारत में मजहबी नफरत फैलाना और पाकिस्तान के पक्ष में माहोल तैयार करना है?"

" यस सर । और दवे चले कुचले तथा भुखमरी की कगार पर खड़े विद्रोही मुस्लिम अपराधियों दूंढ़कर उन्हें सरपरस्ती मुहैया कराना है । साफ कहू तो हिंंदुस्तान के अंदर ही कट्टर मजहबी सोच वाले पाकिस्तानी एजेंट्स तैयार करना उसका काम है । इसके अलावा एक अन्य अहम जिम्मेदारी भी उसके उपर डाली गई है ।"

"वह क्या?"

"उन लोगों का चुन…चुनकर खात्मा करना, जो चरमपंथियों के जेहाद के रास्ते का रोड़ा हैं-उनके रास्ते की दीवार हैं ।"

"वे कौन लोग हैं?”

“वे सभी बुद्धिजीवी, जो प्रेस मीडिया के जरिए पाकिस्तानी आतंकवाद को लेकर अपनी निष्पक्ष तथा सशक्त बात देश के सामने रखते हैं और दहशतगर्दी के खिलाफ़ मुल्क में माहोल तैयार करते हैं । दहशतगर्दों के खिलाफ़ सरकार का क्या रुख होना चाहिए, इसका उसे एहसास कराते हैं । यह गौरतलब बात है सर कि हाफिज ने कलम की ताकत को अनदेखा नहीं किया है । उसे इस बात का बखूबी एहसास है कि कलम की धार तोपों का रुख भी मोड़ सकती है । इसीलिए यह कलम के धनी ऐसे बुद्धिजीवियों से खौफ खाता है और उन्हें नेस्तनाबूद कर देना चाहता है ।"

" ऐसा नहीं होना चाहिए गोतम----ऐसा नहीं होना चाहिए ।" नारंग तीव्र स्वर में बोला । वह काफी व्यग्र हो उठा था-""हमारे मुल्क के ऐसे कलम के क्रांतिकारियों पर हमें नाज है । फिर ऐसे कलम सिपाही आज बचे ही कितने हैं, जो निस्वार्थ भावना से अपने दूरदर्शी विचार मुल्क के आवाम के सामने रखते है । वह जितने भी हैं, इस मुत्क के रत्न हैं । उन्हें कुछ नहीं होना चाहिए ।"

“मैं आपके जज्बार्तों को समझता हूं जनाब, लेकिन यह तभी सम्भव है जब ऐसे बुद्धिजीवियों को पिनप्याइंट किया जा सके । उनकी पहचान की जा सके ।"
 
"इस काम को विशेष प्रायरटीं पर अंजाम दो । अपने तंत्र को और मजबूत करों । ऐसे बुद्धीजीवी और वतनपरस्त बडी़ मुश्किल से पैदा होते हैं, जो दुश्मनों का हौंसला तोड़ते हैं । इसीलिए वह हर दोर में अतिवादियों निशाने पर रहते हैं । मैं उनमें से किसी की भी मोत नहीं देख सकता । तुम्हें जो भी मदद चाहिए, मुझे बताओ ।"

"वक्त जाने पर बता दूंगा सर ।"

“और वह पांचवी आतंकी कमांडर जो एक लेडी है, उसे क्या काम सौंपा गया है?"

"सुरजाना । उसका अहम काम पाकिस्तानी युवा आतंकियों की मुल्क में आमद को आसान बनाना है, उन्हें मुल्क के हर शहर, कस्बे और गांवों में नई पहचान के साथ घुसपैठ कराना है । यहां रहने वाली मुस्लिम तथा हिंदू लड़कियों से उनका विवाह कराकर उन्हें भारत की नागरिकता दिलाना है, ताकि उनके उच्च सरकारी अथवा गेर सरकारी पदों पर पहुंचने का रास्ता आसान हो सके ।"

"तुम किसी तीसरे फ्रंट की भी बात कर रहे थे ना"

“उसका तीसरा मोर्चा वेहद विस्फोटक है…हद से ज्यादा और वहुत अविश्वसनीय । वह उसमें कामयाब हो गया तो मेरी रिपोर्ट कहती है कि यह आजादी के बाद से पाकिस्तान द्वारा हम पर किया गया अब तक का सबसे बड़ा हमला होगा-कारगिल से भी कहीं ज्यादा बड़ा हमला । जो शायद हमारे मुल्क की कमर तोड़ देगा ।"

" ऐसा यह क्या करने वाला है?"

"मुझे अफसोस है कि इस मामले में हम अभी तक कोई पुख्ता जानकारी नहीं निकाल पाए हैं ।”

“फिर ऐसा कैसे कह सकते हो कि वह अब तक का सबसे बड़ा हमला करने की तैयारी कर रहा है? आखिर कुछ तो ऐसा होगा जिसके कारण तुम्हें ऐसा एहसास हुआ !"

"जी सर । कुछ तो है ऐसा ! मुझे मिली इंफारमेशन के मुताबिक आपरेशन औरंगजेब के उस और आखिरी फ्रंट को अंजाम देने के लिए हाफिज को एक निहायत ही गैरमामूली रकम की जरूरत है ! जब तक वह गैेरमामूली रकम हाफिज के हाथ नहीं लग जाती, वह हमारे खिलाफ़ यह आखिरी मोर्चा नहीं खोल सकता ।"

"कितनी रकम की जरूरत है हाफिज को?”

"आप यकीन नहीं करेंगे ।"

"बताओ ।"

"अगर भारतीय करेंसी में बात करे तो वह रकम लगभग बीस हजार करोड़ रुपए बैठती है ।"

"क्या?” मारे आश्चर्य के नारंग का बुरा हाल हो गया । उसकी आंखें अविश्वास से फैल गई थीं…"बीस हजार करोड़!"

“इसीलिए कहा सर कि यकीन नहीं करेगे । इतनी गेरमामूली रकम तो बंटवारे के बाद से पाकिस्तान ने आज तक हमारे मुल्क के खिलाफ अपनी जेहाद पर भी खर्च नहीं की होगी ।"

“फिर तो हाफिज के दिमाग में कोई शैतानी इरादा धधक रहा है । आखिर क्या करना चाहता है वह? इतनी गेैरमामूली रकम का क्या इस्तेमाल है उस हैवान के दिलोदिमाग में ?”

"इस रकम के कारण ही मैंने यह अंदाजा लगाया है कि शायद वह अब तक का सबसे बड़ा हमला करने वाला है ।"

"यह रकम उसे कहाँ से हासिल होने वाली है?”

"हमारे अपने मुल्क से?”

""क्या?" नारंग उछल पड़ा----'"यह तुम क्या कह रहे हो गौतम? हमारे मुल्क से उसे यह रकम कौन मुहैया करा सकता है?"

"यही तो वह रहस्य है जिस तक हम पहुचने की कोशिश कर रहे हैं मगर अभी तक कामयाबी नहीं सिली है ।"

"उसे रोको गोतम…उसे रोको । यह कभी नहीं होना चाहिए । हमारे मुल्क के दुश्मनों के हाथ यह रकम किसी भी हाल में नहीं लगनी चाहिए । इस सिलसिले में मैं फिर कहता हुं ! तुम्हें सरकार से जिस किस्म की भी मदद चाहिए-फौरन उपलब्ध होगी ।"

"मैं पूरी कोशिश करूंगा सर, बल्कि कर रहा हूं ।"

"और कुछ?"

“है तो सही सर ।"

“कहो ।"

" दुश्मन का अॉपरेशन औरंगजेब बहुत ही व्यापक व भयावह मिशन है इस महामिशन को कामयाबी से अंजाम देने के लिए उसे एक मास्टर माइंड की जरूरत होगी-एक ऐसे मास्टर माइंड की, जो इस मुत्क में पहले से मौजूद हो । मेरी इन्फारमेशन कहती है कि इस ने वह मास्टर माइंड दूंढ़ लिया है ।"

“ कौन है वो?"

“शायद मुस्तफा ।"

"म....मुस्तफा !” नारंग एक बार फिर चिहुंका------"जिसे जेल से छुड़ाने का प्लान तुम कहते हो कि हाफिस तैयार कर चुका है!"

“आपने ठीक समझा सर । मुस्तफा एक दरिया है । वह आजाद हो गया तो मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि उसमें हाफिस के मास्टर प्लान को कामयाबी से अंजाम देने की सारी क्षमताएं हैं !"

"और कुछ?”

"नो सर । मेरी रिपोर्ट मुकम्मल हुई ।"

"शुक्रिया गोतम । सरकार को अलर्ट करने के लिए शुक्रिया ।"

"वेलकम सर ।" गोतम एकाएक उठकर खड़ा हो गया-'"अब मुझे इजाजत दीजिए ।"

"एक मिनट अॉफिसर---एक मिनट । "

गौतम ने ठिठककर सवालिया नजरों से नारंग को देखा ।
 
"पिछले दो महीने के दरम्यान, मुम्बई शहर में तीन-तीन विदेशियों की रहस्यमय मौत हुई है, अभी तक मरने वालों की शिनाख्त तक नहीं हो सकी है । इस मामले में तुम्हारी आईबी का दखल है । तुमसे मेरा सवाल यह है क्या इन विदेशियों की रहस्यमय मौत का कोई सम्बंध हाफिज के ओंपरेशन औरंगजेब से हो सकता है ?"

"फिलहाल इस बारे में कुछ भी कहना मुषिक्ल है । अगर मैं अपने निजी खयाल की बात करूं तो मुझे नहीं लगता कि इन दोनों मामलों का आपस में कोई सम्बंध है । उस केस को हमारा एक होनहार आफिसर कल्याण होलकर देख रहा है ।"

“आलराइट ।"

बीरेश गौतम ने सिर झुकाकर नारंग का अभिवादन किया, फिर वह वहाँ से चला गया । तभी मेज पर रखे कई फोनों में से एक की बेल बजी ।

नारंग ने देखा---एक हाटलाइन का नम्बर था, जिस पर केवल कुछ चुनिदा मंत्रालय से जुडे़ लोग ही बात कर सकते थे, वह भी तभी जबकि क्रोई निहायत ही महत्वपूर्ण बात होती थी ।

उसके माथे पर बल पड़ गए ।

रिसीवर उठाकर कान से लगाया और माउथपीस में बोला…'"हैलो ! ।"

"आई एम सॉरी सर !" दूसरी तरफ से उभरती अपने होम सेकेटरी की आवाज उसने पहचानी, आवाज वाकी घबराई हुई थी-----"एक बुरी खबर है ।"

“क्या हुआ?" नारंग का स्वर आशंका से भर गया ।

“चांदनी सिह को किडनैप कर लिया गया है ।"

"कौन चांदनी सिंह?"

दूसरी तरफ़ से जो बताया गया, उसे सुनकर नारंग का चेहरा ही नहीं, सारा जिस्म पसीने से नहा गया । लगा…उस सिलसिले की शुरूआत हो गई है, जिसके बारे में आईबी का जोनल चीफ़ अभी-अभी उसे आगाह करके गया था । नारंग ने रिसीवर क्रेडिल पर पटका और एक झटके से उछलकर खड़ा हो गया ।

आईबी के सुप्रीम चीफ का नाम बलवंत राव था ।

अट्ठावन साल का एक गोरा, थुलथुल व्यक्ति ।

पूरी तरह गंजा !

इस वक्त वह काफी बेचैन तथा कशमकश से भरा था ।

उसकी उस हालत की वजह मुल्क के हालात थे ।

पिछले दो महीने से देश के दुश्मनों की कारगुजारियों से सम्बंध रखने वाली जो सूचनाएं मिल रही थी, देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी का प्रमुख होने के नाते उसकी नींद उड़ा रखी थी ।

कुछ देर पहले चांदनी सिंह के किडनैप की जो वारदात पेश अाई थी, उस संदर्भ में पिछले एक घंटे के अंदर ही उसे केद्रीय गृहमंत्री से लेकर पीएमओ आफिस तक से फोन आ चुके थे ।

महाराष्ट्र के गृह-राज्य मंत्री ने तो सीधे तलब ही कर लिया था और इस बात को लेकर अच्छी खासी झाड़ पिलाई थी कि इतनी बड्री वारदात की खबर समय रहते आईबी को क्यों नहीं लग सकी थी? उसने समय रहते शासन को सतर्क क्यों नहीं किया था, ताकि वारदात को रोका जा सकता !

उस वारदात को, जिसके बारे में अब पूरी तरह से स्थापित हो चुका था कि वह एक आतंकी वारदात थी ।

चांदनी सिंह के किडनैप में पाकिस्तानी आतंकी गुट का हाथ था । यानी इस वक्त चान्दनी सिंह आतंकियों के कब्जे में थी ।

वह अपने इंटेलीजेंस ब्यूरो के मुम्बई स्थित मुख्यालय में पहुंचा तो वहां एक और मुसीबत पहले से अपना इंतजार करती मिली ।

वह मुसीबत एक स्याह ओवरकोटधारी शख्स था, जिसने अपने सिर पर स्याह रंग का गोल फेल्ट हैट लगा रखा था । उसे उसने चेहरे पर इस तरह झुका रखा था कि चेहरा न पहचाना जा सके ।

आखों पर काला गोगत्स ।

पैरों में काले लेदर के फोजियों जैसे भारी तथा लम्बे जूते ।

जितना आधा…अघूरा चेहरा नजर आ रहा था, उस पर चट्टानी कठोरता स्थाई रूप से विद्यमान थी । कुल मिलाकर उसकी शख्सीयत बेहद रहस्यमय थी । उसे देखते ही बलवंत राव चिंहुक उठा ।

"तुम !" मुंह से चौंका हुआ स्वर निकला---" तुम यहां ?"

“क्यों ?" ओवरकोट वाले के होंठ मुस्कराने मुद्रा में फैल गए----"क्या मैं यहां नहीं आ साकता !"

"सवाल ये है कि हुम यहां क्यों आए हो ?"

"' तुमने मजबूर कर दिया ।"

" मैंने क्या किया?”

"आराम से बैठ जाओ और दिमाग पर जोर डालकर याद करने की कोशिश करो कि तुमने क्या किया है ।"

"देखों !" बलवंत राव के मस्तक पर वल पढ़ गए----"मैं इस वक्त बहुत परेशान हूं और परेशान मत करो ! फिलहाल यहां है जाओ ।"

"मुझे हुक्म दे रहे हो?”

"आईबी ने कभी तुम्हारे काम में दखल नहीं दिया, फिर भी पूछ रहा हूं, मैंने तुम्हें यहां आने के लिए कैसे मजबूर किया ?''

" मेरा एक लेटर आया था ।" उसने सपाट स्वर में कहा----"मेरा पर्सनल लेटर, सीकेट सेल के पते पर !"

“कहां से ?"

"पाकिस्तान से----लाहौंर के कोट लखपत जेल से !"

"ओह !" उसके मस्तक पर पडे़ बल हट गए । वह अपनी रिबाल्विंग चेयर पर ढेर होता हुआ बोला-----" हां ! आया था ।"

"फिर !"

" सीक्रेट सेल भंग की जा चुकी है ।" बलवंत का लहजा शुष्क हो गया था-------"उसका नाम लेने वाला भी अब कोई नहीं बचा ।"

“यह बात लेटर लिखने वाले को नहीं पता । बहरहाल, हालात कोई भी हों, तुम्हें उस लेटर को मुझ तक पहुंचाना चाहिए था ।"

"केसे पहुंचाता? तुम थोड़ी देर बाद कहां होगे, क्या इस बारे में खुद तुम्हें भी कुछ मालूम होता है?"

" तुम्हें पता करना चाहिए था, बहरहाल आईबी के प्रमुख हो ।"

" मैं करता । लेकिन आजकल हालात कुछ ऐसे हैं कि वक्त नहीं मिल पाया । मुल्क के हालात बहुत गम्भीर है !"

" लेटर निकालकर मेरे हवाले करों ।"

बलवंत राव ने कोई निहायत ही सखा प्रतिक्रिया देने के लिए अपना मुंह खोला, लेकिन फिर होठ भींच लिए । मेज की दराज से एक लिफाफा निकालकर उसकी तरफ सरका दिया ।

ओवरकोटधारी ने देखा----लिफाफा सीलबंद नहीं था ।

"इसे तुमने खोला ?" उसने तमककर बलवंत राव को देखा ।

"हां ।" बलवंत राव पूरी ढिठाई से बोला------"अब यह सवाल मत करना मैंने क्यों खोला ।"

ओवरकोट वाले ने वह सवाल नहीं किया ।
 
उसने लिफाफा वापस मेज पर गिरा दिया ।

" क्या हुआ? पढ़ोगे नहीं?"

"नहीं ।"

" क्यों ?"

"मेरा दिल वहुत कमजोर है । हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं !”

बलवंत राव के होंठों पर वहुत ही जबरदस्त व्यंगभरी मुस्कान उभरी । बोला-----"जल्लाद कह रहा है कि उसका दिल बहुत कमजोर है । हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है । क्या तुम्हें याद है कि आज तक तुम कितनी लाशें गिरा चुके हो?”

" बको मत ।" ओंवरकोटधारी गुर्राया-“और अपनी जुबानी बताओ कि इस लेटर में क्या लिखा है?”

"मुझें हुक्म दे रहे हो?"

"दे सकता हूं मगर दे नहीं रहा ।"

'" तुम्हारा जवाब मुझे पसंद अाया ।"

“ फिर बताओ, लेटर में क्या लिखा है?”

"आंपरेशन दुर्ग पर पाकिस्तान में गिरफ्तार हुए पांचों सीक्रेट एजेंटों की फांसी की तारीख निश्चित हो चुकी है । पांर्चों को एक साथ, एक ही दिन, एक ही जेल में फांसी देना निश्चित हुआ है ।"

"हूं !" ओवरकोटधारी के चेहरे पर एक लहर-सी आकर चली गई । उसने सूसंयत स्वर में पूछा------“वह तारीख कब है?"

"ठीक एक महीने बाद-----आज ही की तारीख को । मुल्तान की कोट लखपत जेल में उन्हें...

“बहुत बुरा किया । उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था । वे पांचों मेरे जिगर के टुकडे़ है । उन्हें मैंने ही आपरेशन दुर्ग पर पाकिस्तान भेजा था । मैं उस जेल को डायनामाइट से उड़ा दूंगा, जहां वह उन्हे फांसी देने वाले हैं ।"

"कोशिश भी मत करना, मारे जाओगे ।"

" मौत से किसे डरा रहे हो चीफ !" ओवरकोट धारी का लहजा सुलगने लगा-----“ज़ल्ताद को ? मौत के फरिश्ते को ?"

" जनून और पागलपन में फ़र्क होता है । उन पांचों के साथ मेरा भी रिश्ता है------सारे मुल्क का रिश्ता है । होम मिनिस्टर साहव को भी तुम्हारे इसी पागलपन से डर लगता है ।"

" इसीलिए जान बूझकर मुझसे यह लेटर छुपाया गया? इसीलिए लेटर तक पहुंचाने में आनाकानी हो रही थी ?”

“ऐसी बात नहीं है । मैं पिछले दिनों सचमुच बहुत व्यस्त था । आज़ तो और भी ज्यादा हूं । चांदनी सिंह क बारेे में तुम्हें मालुम हो ही चुका होगा ?"

"बात मत बदलो चीफ, कबूल करो कि मैं सच कह रहा हूं !"

बलवंत राव ने कबूल नहीं किया । लेकिन इंकार भी न किया !

ओवरकोटधारी एकाएक उठकर खड़ा हो गया ।

“ स......सुनो ।" बलवंत राव उतावलेपन से बोला…"सुनो !"

ओवरकोटधारी ठिठका ।

पलटकर बलवंत राव की तरफ़ देखा ।

"तुम्हारे इरादे मुझें ठीक नहीं लग रहे । मैं जानता हूं तुम चुप नहीं बैठोगे ! तुम जरूर कुछ करोगे ।"

"क्या मुझे नहीं करना चहिए ?"

" मुझे नहीं पता । लेकिन मैं तुम्हारे बाप की उम्र का हूँ और उसी नाते सलाह दे रहा हूं----कोई हिमाकत मत करना । यह ज्वालामुखी के दहाने में छलांग लगाने जैसा होगा, जबकि इस मुत्क को तुम्हारी जरूरत है । इस मुल्क को-----हर उस हिंदुस्तानी की जरूरत है, जिसकी रर्गों खून नहीं हिंदुस्तान बहता है ।"

"सलाह का शुक्रिया चीफ । लेकिन...... . .

“लेकिन? "

ओवरकोट धारी ने जैसे कुछ सोचा, फिर फैसला करता हुआ बोला-------"मैं-शुरू कर चुका हूँ ।"

"क्या शुरू कर चुके हो?"

"वह मिशन जिसे न करने की सलाह दे रहे हो ।"

बलवंत की आंखें हैरत से फट पड़ी----“क्या कह रहे हो तुम?"

"वही, जो तुमने सुना ।"
 
Back
Top