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गद्दार देशभक्त
उस और सुन्दर लड़की के हलक से ऐसी चीखें निकल रही थी उसे किसी धारदार छुरी से हलाल किया जा रहा हो ।
लेकिन ऐसा था नहीं, जो था, असल में वह किसी छूरी से हलाल किए जाने से भी बीभत्स और बदतर था ।
लड़की को लग रहा था कि उसका सिर, बाकी शरीर से अलग होने ही वाला है और सिर को उसके लम्बे, घने और काले बाल अपने साथ उखाड़कर ले जाएंगे ।
वे बाल, जिम्हें बारह बाई बारह के छोटे-से सीलन भरे कमरे के लेंटर के बीचोंबीच लगे कूदे के साथ बंधी रस्सी के निचले सिरे से कसकर बांधा गया था ।
लड़की का बाकी शरीर, हवा में झूल रहा था ।
उसके पेैर फर्श से करीब तीन फुट ऊपर थे । हाथ भी खुले हुए थे, पैर भी । बालों के अलावा जिस्म के किसी हिस्से को नहीं बांधा गया था । जिस्म पर मेंहदी रंग का सलवार-कुर्ता था जो कई जगह से फट चुका था और वहाँ से उसका गोरा जिस्म ही नहीं बल्कि ताजा बने हुए लम्बे-लम्बे जख्म भी झांक रहे थे ।
कांटेदार हटरों से बने जख्म ।
उसके चारों तरफ चार आदमी खड़े थे ।
आदमी की जगह अगर उसे जल्लाद भी कहा जाए तो अनुचित न होगा ।
चारों के हाथ में वे हंटर थे जिनके निशान लड़की के जिस्म पर खून की लकीरों के रूप में नजर आ रहे थे ।
रोशनी के नाम पर कमरे में मनहूसियत-सी फैलाती पीली रोशनी बिखरी हुई थी, जिसे चालीस बॉट का एक बल्ब उगल रहा था ।
"बोल......बोल !" उनमें से एक ने कहा----"कौन है तू ?"
लड़की को चीखने से फुर्सत मिले तो कुछ बोले भी ।
उनमें से एक का हंटर वाला हाथ पुन: चलने ही वाला था कि ऐसी आवाज हुई जैसे भारी-भरकम लोहे का दरवाजा खुला हो ।
चारों ने एक साथ आबाज की दिशा में देखा और तुरंत ही उनके जिस्म सावधान की मुद्रा में अा गए ।
तीनों के मुंह से एकसाथ निकल---------"हाफिज लुइस साहब !"
मोटी-मोटी सलाखों के दरवाजे को पार करके जो शख्स कोठरी नुमा कमरे में दाखिल हुआ उसकी लम्बाई किसी भी तरह साढे़ सात फूट से कम नहीं थी । जिस्म पहाड़ जैसा । चेहरा इतना चौड़ा जितना वह तवा होता है जिस पर रुमाली रोटियां बनाई जाती है ।
रंग भी तवे जैसा ही काला था । आंखें बाहर को उबली हुई-सी । लाल सुर्ख । जैसे धतूरे का नशा किए हुए हो । छोटा-सा माथा । लम्बे-लम्बे कान । पकौड़े जैसी नाक और लटके हुए-से चौडे होंठ ।
कुल मिलाकर, हाफिज लुईस नाम का वह शख्स शक्ल से ही इतना डरावना था कि कमजोर दिल वाले को तो उसे देखते ही हार्ट अटैक पड़ सकता था । उसके जिस्म पर पठानी सूट, पेरों में भारी बूट और सिर पर काबाईली पगड़ी बंधी हुई थी ।
उसने लड़की की हालत का मुआयना किया और बोला…"गुड काफी कंफरटेबल कंडीशन में रखा है तुम लोगों ने इसे ।"
"फिर भी कुछ बता नहीं रही है सर ।" एक बोला ।
"दूं।" हाफिज लुईस ने एक लम्बा हु'कारा भरते हुए जेब में हाथ डाला ।
पाकिस्तानी सिगरेट का पैकिट निकाला । उसमें से एक सिगरेट निकालकर मोटे होंठों पर लटकाई । उसे लाइटर से सुलगाने के बाद कश लिया और नथुनों से धुवां छोड़ता बोला-----“बताएगी, जो पूछा जाएगा वो बताएगी । हाफिज जब अपना रौद्र रूप दिखाता है तो पत्थर भी टर्र-टर्र करने लगते हैं । इस बेचारी अदनी-सी लड़की की तो बिसात क्या है!"
वे चारों पत्थर के बुत से खड़े रहे ।
मोटी-मोटी उंगलियों के बीच उनसे कम मोटी सुलगती हुई सिगरेट लिए हाफिज हवा में झूल रही लड़की के करीब पहुंचा और बोला-------"नाम बताओं?"
"म. . .मरजीना ।" चीखों के बीच लड़की मुश्किल से कह पाई ।
"ऊंहूं । तुम तो यार शुरुआत ही झूठ से कह रही हो । जो भुगत रही हो, निजात चाहती हो तो असली नाम बताओ ।"
लड़की गुर्राई……"मुझे उतार कमीने ।"
"अरे!" हाफिज ने अपनी मोटी-मोटी आंखें मटकाईं....."ये तो बदतमीज भी है । जलील को कमीना कहती है ! फिर भी एक बात बता, अगर में तुझे उतार दूं तो क्या तू मुझे असली नाम बात देगी?"
"मेरा नाम मरजीना ही है ।”
हाफिज ने कहा…“तेरां नाम नीलिमा है ।"
उस और सुन्दर लड़की के हलक से ऐसी चीखें निकल रही थी उसे किसी धारदार छुरी से हलाल किया जा रहा हो ।
लेकिन ऐसा था नहीं, जो था, असल में वह किसी छूरी से हलाल किए जाने से भी बीभत्स और बदतर था ।
लड़की को लग रहा था कि उसका सिर, बाकी शरीर से अलग होने ही वाला है और सिर को उसके लम्बे, घने और काले बाल अपने साथ उखाड़कर ले जाएंगे ।
वे बाल, जिम्हें बारह बाई बारह के छोटे-से सीलन भरे कमरे के लेंटर के बीचोंबीच लगे कूदे के साथ बंधी रस्सी के निचले सिरे से कसकर बांधा गया था ।
लड़की का बाकी शरीर, हवा में झूल रहा था ।
उसके पेैर फर्श से करीब तीन फुट ऊपर थे । हाथ भी खुले हुए थे, पैर भी । बालों के अलावा जिस्म के किसी हिस्से को नहीं बांधा गया था । जिस्म पर मेंहदी रंग का सलवार-कुर्ता था जो कई जगह से फट चुका था और वहाँ से उसका गोरा जिस्म ही नहीं बल्कि ताजा बने हुए लम्बे-लम्बे जख्म भी झांक रहे थे ।
कांटेदार हटरों से बने जख्म ।
उसके चारों तरफ चार आदमी खड़े थे ।
आदमी की जगह अगर उसे जल्लाद भी कहा जाए तो अनुचित न होगा ।
चारों के हाथ में वे हंटर थे जिनके निशान लड़की के जिस्म पर खून की लकीरों के रूप में नजर आ रहे थे ।
रोशनी के नाम पर कमरे में मनहूसियत-सी फैलाती पीली रोशनी बिखरी हुई थी, जिसे चालीस बॉट का एक बल्ब उगल रहा था ।
"बोल......बोल !" उनमें से एक ने कहा----"कौन है तू ?"
लड़की को चीखने से फुर्सत मिले तो कुछ बोले भी ।
उनमें से एक का हंटर वाला हाथ पुन: चलने ही वाला था कि ऐसी आवाज हुई जैसे भारी-भरकम लोहे का दरवाजा खुला हो ।
चारों ने एक साथ आबाज की दिशा में देखा और तुरंत ही उनके जिस्म सावधान की मुद्रा में अा गए ।
तीनों के मुंह से एकसाथ निकल---------"हाफिज लुइस साहब !"
मोटी-मोटी सलाखों के दरवाजे को पार करके जो शख्स कोठरी नुमा कमरे में दाखिल हुआ उसकी लम्बाई किसी भी तरह साढे़ सात फूट से कम नहीं थी । जिस्म पहाड़ जैसा । चेहरा इतना चौड़ा जितना वह तवा होता है जिस पर रुमाली रोटियां बनाई जाती है ।
रंग भी तवे जैसा ही काला था । आंखें बाहर को उबली हुई-सी । लाल सुर्ख । जैसे धतूरे का नशा किए हुए हो । छोटा-सा माथा । लम्बे-लम्बे कान । पकौड़े जैसी नाक और लटके हुए-से चौडे होंठ ।
कुल मिलाकर, हाफिज लुईस नाम का वह शख्स शक्ल से ही इतना डरावना था कि कमजोर दिल वाले को तो उसे देखते ही हार्ट अटैक पड़ सकता था । उसके जिस्म पर पठानी सूट, पेरों में भारी बूट और सिर पर काबाईली पगड़ी बंधी हुई थी ।
उसने लड़की की हालत का मुआयना किया और बोला…"गुड काफी कंफरटेबल कंडीशन में रखा है तुम लोगों ने इसे ।"
"फिर भी कुछ बता नहीं रही है सर ।" एक बोला ।
"दूं।" हाफिज लुईस ने एक लम्बा हु'कारा भरते हुए जेब में हाथ डाला ।
पाकिस्तानी सिगरेट का पैकिट निकाला । उसमें से एक सिगरेट निकालकर मोटे होंठों पर लटकाई । उसे लाइटर से सुलगाने के बाद कश लिया और नथुनों से धुवां छोड़ता बोला-----“बताएगी, जो पूछा जाएगा वो बताएगी । हाफिज जब अपना रौद्र रूप दिखाता है तो पत्थर भी टर्र-टर्र करने लगते हैं । इस बेचारी अदनी-सी लड़की की तो बिसात क्या है!"
वे चारों पत्थर के बुत से खड़े रहे ।
मोटी-मोटी उंगलियों के बीच उनसे कम मोटी सुलगती हुई सिगरेट लिए हाफिज हवा में झूल रही लड़की के करीब पहुंचा और बोला-------"नाम बताओं?"
"म. . .मरजीना ।" चीखों के बीच लड़की मुश्किल से कह पाई ।
"ऊंहूं । तुम तो यार शुरुआत ही झूठ से कह रही हो । जो भुगत रही हो, निजात चाहती हो तो असली नाम बताओ ।"
लड़की गुर्राई……"मुझे उतार कमीने ।"
"अरे!" हाफिज ने अपनी मोटी-मोटी आंखें मटकाईं....."ये तो बदतमीज भी है । जलील को कमीना कहती है ! फिर भी एक बात बता, अगर में तुझे उतार दूं तो क्या तू मुझे असली नाम बात देगी?"
"मेरा नाम मरजीना ही है ।”
हाफिज ने कहा…“तेरां नाम नीलिमा है ।"