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गद्दार देशभक्त complete

“वही, जो तुम समझने के लिए तैयार नहीं हो । इंटेलीजेंस की एक खास विंग से मुझे यह सूचना मिली है । हाफिज लुईस के अॉपरेशन औरंगजेब का अगला निशाना तुम हो और दहशतगर्दों ने तुम्हें पांच तारीख को होने वाली तुम्हारी उसी महारैली में निशाना वनाने का प्लान तैयार किया है । यह रामलीला मेदान में ही खत्म करेगा और वहां जमा लाखों की भीड़ उसके काम को वहुत आसान बना देगी । उस भारी-भरकम भीड के बीच सुरक्षा का हर इंतजाम बहुत बौना साबित होगा, चाहे वह जेड प्लस सुरक्षा हो या वहां मुहैया कराई जाने वाली अतिरिक्त सुरक्षा । और हमारी उस खास खुफिया विंग की दी हुई सूचना कभी गलत साबित नहीं हुई !"

"यह तो अाप बहुत गम्भीर बात बता रहे हैं?” निरंजननाथ के लहजे में व्यंग बढ़ता जा रहा था ।

"इसीलिए मेरी नीद उड़ी हुई है । सोचो । रामलीला मैदान में लाखों लोगों की मौजूदगी में अगर कोई वारदात होती है तो क्या होगा? भीड़ में भगदड मच जाएगी और तब, वहां कितने बेगुनाह लोग मारे जाएंगेें, क्या तुम्हे इसका अंदाजा है? एक बात ओर?"

"वह क्या ?"

"वे सब हिंदू होंगे क्योंकि तुम्हें सुनने वे ही. . .

“आ........आप मुझे खौफजदा करने की कोशिश कर रहे हैं गृहमंत्री महोदया अाप मुझें डराकर मेरे रास्ते से भटकाना चाहते है लेकिन मैं डरने वाला नहीं हूं । पांच तारीख को मेरी महारैली है और होकर रहेगी । अगर आतंक्यादिर्यों द्वारा वहां किसी गड़बड़ी की आपके पास पहले से सूचना है तो मेरी सुरक्षा सुनिश्चित करना आपका फर्ज है । वरना यकीन मानिए, अगर उस महारैली के दरम्यान मुझे कुछ हुआ तो अकेली दिल्ली ही नहीं सारा मुत्क उबल पडे़गा औरे आपकी हुकूमत तिनके की तरह बिखर जाएगी । इस मुल्क की धरती गृहयुद्ध की आग में झुलस जाएगी ।"

"इसीलिए मैं अपना काम कर रहा हूं । इसीलिए मैं उस महारैली को स्थगित कर देने की बार-बार विनती कर रहा हूं ।”

" मुझे आपकी बात पर यकीन नहीं । आप एक राजनैतिक आदमी हैं । अपना और अपनी पार्टी का हित साधने के लिए छल का सहारा ले सकते है । अगर आप मुझे सचमुच यकीन दिलाना चाहते हैं तो मेरे सामने उस रिपोर्ट को पेश कीजिए जो आपके किसी खास खुफिया विंग ने दी है ।"

"यह नहीं हो सकता । मैं चाहकर भी तुम्हें वह रिपोर्ट नहीं दिखा सकता । यह कायदे-कानून के खिलाफ है ।"

" तो फिर मुझें अपने उस खुफिया अधिकारी से मिलाइए जिसने आप को यह खबर दी है?"

"यह भी नियम के खिलाफ़ है !"

"तो मेरा फैसला सुनिए । मुझें आपकी किसी भी बात का रत्ती भर भी यकीन नहीं है । इसलिए, मैं आपकी बातों पर तवज्जो देना जरूरी नहीं समझता । महारैली तयशुदा वक्त पर होगी और जरूर होगी । उसमें कोई भी व्यवधान पैदा होता है तो उसके लिए आपकी सरकार जिम्मेदार होगी, जिसका वहुत गम्भीर खामियाजा आपको भुगतना पडे़गा ।"

"तुम्हारा यह फैसला आत्मधाती है ।"

“उससे ज्यादा वह आप सबके लिए आत्मघाती होगा ।"

"तो तुम अपनी जिद नहीं तोडो़गे?"

"बिल्कुल नहीं । इसके अलावा आपके पास कोई और प्रपोजल हो तो बेहिचक मेरे सामने ऱख सकते हैं !"

"मेरे पास दूसरा कोई प्रस्ताव नहीं है ।"

"तो फिर इजाजत दीजिए!" निरंजन कुर्सी से उठ खड़ा होगया उसने नारंग के सामने अपने हाथ जोड़ दिए !

नारग कसमसाकर रह गया ।

कल्याण होलकर रत्नाकर देशपांडे के घर से बाहर निकला ।

उसका चेहरा लटका हुआ था ।

सड़क पर सुर्ख रंग की आठ सीटर वैन खडी़ थी ।

उसकी ड्राइविंग सीट पर शेखरन बैठा हुआ था । पीछे की सीटों पर प्रताप, भल्ला, गिरीश और अमरीक थे ।

केवल रत्नाकर देशपांडे की कमी थी…वरना वहां मिशन मुस्तफा की मुकम्मल टीम इकट्ठा थी ।

होलकर के वहाँ पहुंचते ही स्लाइडिंग डोर खुला ।

उनमें से एक ने पूछा-----"क्या रहा?"

" चलो ।" वेैन में बैठकर दरवाजा बंद करते हुए उसने शेखरन को हुक्म दिया-----"मेन रोड पर पहुंचो, फिर बताता हू ।"

शेखरन ने वेन स्टार्ट की और आगे बढा़ दी ।

"क्या हुआ बॉस ?” प्रताप ने पूछा । उसके स्वर में उत्सुकता थी----“रत्ऩाकर देशपांडे मिला ?"

"नही ।"

"कहां गायब है?"

"किसी को नहीं मालूम ।"

"घर पर कौन-कौन था?"

"केवल एक नोकर ।"

"बाकी लोग कहाँ गए?" सवाल भल्ला ने किया था ।

"देशपांडे परिवार को यहाँ नहीं रखता था! आने जाने का कोई निर्धारित वक्त नहीं है ! इसलिए, यह कहना भी मुश्किल है कि कब बापस आएगा । मेसेज छोड़ दिया है !"

"वह तो पहले भी छोड़ चुके हो बॉंस ।" गिरीश ने कहा----"मगर कोई फायदा नहीं हुआ । उस नेवी अफ़सर की तरफ से अभी तक कोई रिप्लाई नहीं मिली । आखिर कहां जा सकता है वह? उसकी नेवी की नौकरी से तो उसे भी सस्पेंड किया जा चुका होगा?"

"नहीं मालूम ।"

"गड़बड़ है ।"' गिरीश बड़बड़ाने के-से अंदाज में बोला-----“जरूर कोई गड़बड़ है । देशपांडे को लेकर तुम्हारा शक गलत नहीं है बॉस । इस आदमी का किरदार बहुत संदिग्ध लग रहा है । अब तो मुझे भी ऐसा लग रहा है कि इसी ने हमारे प्लान को लीक किया था और आतंकियों से हमारी मुखबिरी की थी ।"

"इतनी जल्दी नतीजे पर नहीं पहुंचते गिरीश ।" अमरीक गिरीश से मुखातिब होकर बोला-----“देशपांडे नेवी का एक बड़ा अफ़सर है और सरकार का वहुत विश्वासपात्र । इसीलिए तो हमारे मिशन के लिए सरकार की तरफ़ से उसका नाम पेश किया गया था!"

“यह स्पेशलिटी उसकी बेगुनाही का सबूत नहीं हो सकती ।"

"मैं गिरीश से सहमत हूं ।" प्रताप ने गिरीश का समर्थन किया । फिर होलकर से मुखातिब हुआ----"तुम क्या कहते हो बॉस?"

"फिलहाल पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है ।" होलकर ठंडी सांस भरता हुआ बोला-----" आज हम सब अगर इस अंजाम तक पहुंचे है तो उसकी वजह केवल मैं ही हूं । मेरी वजह से ही तुम सब सस्पेंड हुए हो और हमें जांच आयोग का सामना करना पड़ रहा है । जांच अगर हमारे खिलाफ गई तो नौकरी तो जाएगी ही, हमें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है ।"

" यह देशपांडे की वजह से हुआ है ।" ड्राइविंग कर रहा शेखरन नागवारी भरे स्वर में बोला-----'"उसने यकीनन हमसे गद्दारी की है और हमारे प्लान को लीक आउट करके मुस्तफा तक पहुचाया है । वरना.........वरना यह कैसे मुमकिन है कि जो "चिप बम'' मुस्तफा की जेब में प्लांट किया गया था, वह चांदनी मेडम के शरीर में पहुंच गया और जैसे ही बॉस ने रिस्टवॉच में लगा प्लंजर दबाया हैसे ही वह ब्लास्ट हो गया और चांदनी सिंह के परखच्चे उड़ गए! "

""ह. . .हां ।” भल्ला ने झुरझुरी ली…“शुक्र है कि उस वक्त कोई भी चांदनी सिंह के करीब नहीं था । हम सब भी मारे जा सकते थे !"
 
होलकर बोला-------" जो नहीं हुआ, उसके बारे में सोचकर वक्त बरबाद करने का क्या फायदा !"

"बॉस ने ठीक कहा ।" प्रताप का सिर सहमति में हिला------“बैसे 'चिप' के बारे में तुम लोगों का क्या खयाल है? वह चांदनी सिंह है जिस्म में कब और कैसे पहुंची ?"'

“यह काम यकीनन मुस्तफा का है ।" अमरीक ने कहा-----"ओऱ यह उसने तब किया जब चांदनी सिंह का चुम्मा ले रहा था । बेवकूफ वन गए हम । उस वक्त सोच रहे थे कि या तो वह उसकी खूबसूरती पर रीझ गया है या हमे उकसाने के लिए बद्तमजी कर रहा लेकिन नहीं, वह चुम्मा-चुम्मा कुछ नहीं ले रहा था । उस सबकी आड़ में उसने चिप चांदनी सिह की र्जीस की किसी जेब में सरका दी । महौल ऐसा बना दिया था उसने कि हम तो हम, खुद चांदनी सिंह को भी यह एहसास नहीं हुआ होगा कि उसने उसकी जेब में कुछ रखा है !"

“मैं अमरीक से हंड्रेड परसेंट सहमत हूँ ।" गिरीश ने कहा ।

"इसका साफ-साफ़ मतलब ये हुआ कि उस वक्त मुस्तफा को मालूम था कि हम उसकी जान लेना चाहते है और उसकी जेब में मौत का सामान रखा जा चुका है ।"

“इतना ही नहीं ।" प्रताप बोला--"उसे यह भी मालूम था कि मौत का सामान एक चिप के रूप में है और वह उसकी कौन-सी जेब में है । तभी तो यह सब कर सका!"

"और यह सब उसे देशपांडे ने बताया ।"

"देशपांडे ही क्यों?"

इस वार बोलने वाला होलकर था--------क्योंकि चिप के बारे में उस वक्त तक केवल दो लोगों को मालूम था-----पहला मैं, दूसरा देशपांडे । तुम तक को कुछ नहीं मालूम था और सच्चाई ये है कि मैं किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहता था । चुपचाप अपना काम करके निकल जाना चाहता था । अब मुझे याद आ रहा है कि वह मुस्तफा के खिलाफ क्यों बार-कर मुझे उकसा रहा था? क्लिीयर है उन सभी हरकतों के पीछे उसका मकसद सच का पता लगाना था?"

" कौन से सच का ?"

"उस सच का जिसे मैंने अपने सीने में दफन कर रखा था । जिसे किसी को नहीं बताने का दृढ़ संकल्प कर रखा था । उसने ऐसा माहोल बना दिया था कि मुझे लगने लगा-अगर मैंने मुस्तफा को नहीं मारा तो वो ये काम कर देगा । मैं यह सोचकर डर गया कि कहीं वह मुस्तफा पर कोई ऐसा हमला करने की बेवकूफी न कर बैठे जिससे मेरे वने बनाए प्लान पर पानी फिर जाए । इसलिए, मुझे उसे अपने प्लान के बारे में बताना पड़ा । मेरी जूबान से सच निकलवाने में गजब की टेक्निक इस्तेमाल की हरामजादे ने । अब तो वस इतना ही कह सकता हूं कि उसने मुझे फुद्दू बनाया और मैं वन गया ।"

"वाकई ।" प्रताप बोला-----'"उसने बडी़ होशियारी से यह पता लगा लिया कि तुम सचमुच मुस्तफा की रिहाई को लेकर ईमानदार नहीं थे और सरकार की सारी बंदिशों के बावजूद उसे नुकसान पहुचाने का इरादा रखते थे ।"

"पर इस बात पर यकीन मानने को दिल जाने क्यों अब भी तैयार नहीं है कि वह मुस्तफा से मिला हो सकता है ।" होलकर बड़बड़ाने के-से अंदाज कहता चला गया था----" नेबी का इतना बड़ा अॉफिसर, पाकिस्तान के इतने खूंखार आतंकवादी से मिला हुआ हो सकता है जिसने जाने कितने बेकसूरों को मारा है ।"

"यही तो इस देश का दुर्भाग्य है बॉंस ।" अमरीक बोला-----" ये देश जयचंदों से भरा न होता तो हमारे जांबाज शहीद क्यों होते!"

भल्ला बोला…“मैं कुछ और ही सोच रहा हूं !"

"क्या?"

" पोत पर जो कुछ हुआ, क्या वह सव जांच आयोग की टीम को ज्यों-का-त्यों मालूम जाएगा ?"

“कैसे मालूम हो पाएगा? उन्हें हममें से कौन बताएगा कि मैं मुस्तफा की मौत का ख्वाहिशमंद था और जो मौत चांदनी के हिस्से आई उसे खुद मैंने मुस्तफा के शरीर में प्लांट किया था । जब हममे से कोई अपना मुंह नहीं खोलेगा तो फिर जांच आयोग की टीम को यह सच कैसे पता लगेगा!"

"मैंने तो सुना है ।" भल्ला ने कहा…“उच्चस्तरीय जांच आयोग वाले वाले बहुत बाध होते है । उनकी पैनी नजरें सच को फौरन ताड़ जाती हैं और फिर, यह बात भूलने बाली नहीं है कि पोत पर हर वक्त सेटेलाइट से निगाह रखी जा रही थी । उसकी वीडियो रिकार्डिंग भी आईबी के पास महफूज होगी । उससे जांच करने वाली टीम को कोई क्लू मिल सकता है?"

"वह रिकार्डिंग केबल पोत के ऊपर के दृश्य ही दिखा सख्ती है । अंदर की कोई रिकार्डिंग आईबी के पास नहीं हो सकती । बैसे भी, सेटेलाइट से हुई रिकार्डिंग केवल इमेजिज दिखाती है । पोत पऱ मौजूद लोगों के बीच हुई बातचीत उसमें रिकार्ड नहीँ होती !"

“फिर भी.......

"फिर भी यह कि इसके बावजूद अगर कुछ साबित होता है तो हमें उसके लिए तैयार रहना होगा । यह सच कि हमने कमांड से मिले आदेशों के पालन में हीलाहवाली की । लेकिन उसके पीछे हमारा मकसद गलत करना नहीं था । हम गद्दार नहीं थे, न ही हमारी नीयत में खोट था । हम सिर्फ और सिर्फ वही करना चाहते थे, जो मुल्क की एक सौ तीस करोड़ आवाम के दिल की आवाज थी । पर अफसोस कि हम कामयाब नहीं हो सके । इस बदकिस्मत मुल्क के इतिहास में फिर से एक गद्दार ने दखल दे दिया----भारत माता की छाती में एक बार फिर अपनों ने ही छुरा भौंक दिया ।"

"ह. . .हम उस गद्दार को नहीं छोडेंगे?" अमरीक मुट्ठियां भीचकर बोला---" हम उसे उसके किए की सजा दिलाकर रहेगे ।"

"अकेले देशपांडे को सजा दिलाने से कुछ नहीं होगा । हमारा जानी दुश्मन और असली गुनाहगार तो मुस्तफा है । वह, जो हमारी पकड़ से वहुत दूर है । अब तो वह पाकिस्तान में होगा ।"

“उसके लिए तो हम पाकिस्तान जाने में भी नहीं हिचकेंगे ।"

“अरे प्रताप!" होलकर प्रताप से बोला--"'अपने इस जोड्रीदार को समझा । चीफ ने हमें इस शहर से भी बाहर न जाने की सख्त हिदायत दी है और यह मुल्क से बाहर जाने की बात कर रहा है !"

" किसी को कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं है बाँस ।"‘ प्रताप ने कहा-------"इसका मतलब केवल इतना है कि हालात चाहे कोई भी हों, हम सब दिलोजान से आपके साथ हैं । हमारा सस्पेंशन और हमारे खिलाफ कोई भी जांच हमारा मनोबल नहीं तोड़ सकती । हम सब आज भी आपकी टीम का हिस्सा है और आप हमारे बॉस है । आपका हर हुक्म हम सबके सिर आंखों पर होगा । अगर आप हमसे थधकते ज्वालामुखी में छलांग लगाने को कहेगे तो हम बगैर कोई सवाल किए उसमें छलांग लगा देगें । वस हमारे दुश्मनों को बचना नहीं चाहिए…उन्हें उनके किये की सजा यकीनन मिलनी चाहिए, फिर वह सजा उन्हें चाहे कानून दे या खुद आप ।"

होलकर गदगद हो गया ।

उसका सीना फख़्र से चौडा़ हो गया ।

"शाबाश मेरे शेरों ।" वह भरे कंठ से बोला…“मुझें तुम सबसे यही उम्मीद थी । मुझे पूरा यकीन हो गया कि मैंने मिशन मुस्तफा के लिए तुम सबको चुनकर गल्ती नहीं की थी । ऐसे जांबाजों के रहते तो मुझे हमारी मंजिल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता । कोई भी नहीं । वो मंजिल भले ही चाहे जहाँ हो ।"

कुछ पल के लिए वेन के अंदर सन्नाटा छा गया ।

"हम रोड पर पहुच गए हैं ।" शेखरन की आवाज ने सन्नाटे को भंग किया-----“किधर चलना है बॉंस ?"'

होलकर ने बता दिया ।

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पोत पर जो कुछ हुआ था, उसकी जांच के लिए दो उच्चस्तरीय जांच दल बनाए गए थे ।

दोनों का काम बिल्कुल अलग-अलग था ।

पहला दल-जिसका नेतृत्व उच्च न्यायालय के एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश कर रहे थे, का काम यह पता लगाना था कि पोत पर जो हुआ…कैसे हुआ? किन खामियों की वजह से हुआ और उस के लिए कौंन-कौन जिम्मेदार थे ।

दूसरे जांच दल का काम यह पता लगाना था कि हैलीकॉप्टर में बैठने बाद मुस्तफा और उसे छुडाने वाले, सैयद, नियाज़, अदील और शफीक नामक चारों आतंकवादी कहां गए थे ?

वे पाकिस्तान चले गए थे या इंडिया में ही थे !

इतना ही नहीं, इस दूसरे जांच दल का काम यह पता लगाना भी था कि मुस्तफा और उसके साथियों का आगामी प्रोग्राम क्या था तथा हाफिज के अॉपरेशन औरंगजेब के टार्गेट कौन लोग थे ?

इस दूसरे जांच दल का नेतृत्व गुलशन राय नाम के एक पुलिस आँफिसर को सौंपा गया था ।

यह गुलशन राय जो मुम्बई पुलिस की एसटीएफ बांच से संबद्ध था और हेहद तेज तर्रार अफ़सर माना जाता था । कुछ ही दिनो में उसे मुजरिमों तथा दहशतगर्दों का 'काल' कहा जाने लगा था।

यह केवल तीन साल की सर्विस में पंद्रह एनकाउंटर कर चुका था । उसमें ग्यारह पाकिस्तानी आतंकी थे । इसीलिए दहशतगर्दों की हिटलिस्ट में उसका नाम प्रमुखता से शामिल था ।
 
गुलशन राय ने अपना काम बडी़ तेजी से किया था और उसने यह वाली जानकारी खोज निकली थी कि पोत से रिहा होने और चांदनी सिह को हलाक करने के वाद मुस्तफा पाकिस्तान नहीं गया था । वह और उसे रिहा कराने वाले दहशतगर्द भी उसके साथ ही हिंदुस्तान में थे ।

उसने यह भी पता लगा लिया था कि मुस्तफा की पाकिस्तान वापसी हाफिज लुईस के अॉपरेशन औरंगजेब का हिसा थी भी नहीं ।

मुस्तफा के रूप में अब हाफिज को एक ऐसा मास्टरमाइंड मिल गया था, जो उसके आंपरेशन के दूसरे चरण को कामयाब बनाने की कूव्वत और हौंसला रखता था ।

गुलशन ने यह भी पता लगा लिया था कि उसके बाद हाफिज के अॉपरेशन औरंगजेब का तीसरा चरण शुरू होने वाला था, जिसकी कामयाबी पर अब उसे जरा भी संदेह नहीं था ।

जब यह सारी रिपोर्ट गुलशन ने अपने उच्चाधिकारियों को दी तो उससे खुश होकर अगले मिशन की जिम्मेदारी भी उसे ही सौंपी गई और वह मिशन यानी----मुस्तफा और उसके साथियों को तलाश करके उन्हें जिंदा या मुर्दा गिरफ्तार करना ।

यह काम गुलशन को अॉपरेशन औरंगजेब का चरण आरम्भ होने से पहले ही करना था क्योंकि अॉपरेशन औरंगजेब के दूसरे चरण में हाफिज लुईस ने मुल्क की जिन कद्दावर शाख्सीयतों के कत्ल का खाका तैयार किया था, उनका कत्ल देश के अंदर भूचाल ला सकता था--------------देश में अस्थिरता और अराजकता का ऐसा भयावह वातावरण क्रिएट कर सकता था जो किसी के भी हित में नहीं था ।

इतने बडे मुल्क में उन पांच लोगों को दू'ढ़ना आसान काम नहीं था लेकिन गुलशन न सिर्फ उस चुनौती को स्बीकार कर चुका था बल्कि यह पता लगाने में भी कामयाब हो गया था कि चांदनी सिंह को अगवा करने वाले चारों दहशतगर्द चांदनी को किडनैप करने से पहले तीन महीने तक दिल्ली के वेलकम इलाके की एक मुस्लिम बाहुल्य बस्ती में ठहरे थे ।

वहाँ उन्होंने दो कमरों का एक सेट किराये पर लिया था ।

उस घर की मालकिन अजरा बेगम थी, जो कि बत्तीस साल की उम्र की एक जवान तथा अविवाहित महिला थी । वह वहां अपने दूर के रिश्ते के एक भाई आसिफ के साथ रहती थी ।

गुलशन ने अपनी टीम के साथ दिल्ली में कदम रखा ।

अजरा बेगम और आसिफ पर नजर रखी जाने लगी ।

पूछताछ में दोनों की शख्तीयत काफी संदिग्ध पाई गई और फिर, उनके घर पर छापा भी मार दिया गया । ऐसा काकी सामान बरामद हुआ जिससे सिद्ध होता था कि चांदनी के किडनैप से पहले सैयद, नियाज़, अदील और शफीक यहीं रहे थे ।

और. . अपुष्ट से सबूत तो इस बात के भी मिल गए कि पोत से गायब हुए मुस्तफा, सैयद, नियाज़, अदील और शफीक भी उन्हीं दो कमरों में रहे थे यानी वे दिल्ली में ही थे !

गुलशन की तफ्त्तीश में इस बात की भी पुष्टि हुई थी कि चांदनी सिह अपहरण की वारदात को अंजाम देने से पहले उसकी 'रेकी' में आसिफ ने चारों दहशतगर्दों की भरपूर मदद की थी ।

लिहाजा, गुलशन ने दोनों संदिग्ध चरित्र वाले भाई-बहनों को फौरन गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उसने अपने महकमे के रिकार्ड में उनकी गिरफ्तारी दर्ज नहीं कराई, न ही उन्हें एसटीएफ दिल्ली स्थित मुख्यालय में ले गया ।

उस अभियान में उसकी टीम के केवल तीन सदस्य अतुल, केसरी और शशांक ही मौजूद थे ।

टीम के बाकी सदस्यों को वह जानबूझकर वहाँ नहीं ले गया था ! यह गुलशन के काम करने का अपना तरीका था ।

अजरा बेगम तथा उसके कथित भाई को उसने एक पेड़ के साथ उलटा लटका दिया और उनके सिरों के नीचे आग सुलगा दी।

आग से उनका जिस्म इतनी ऊंचाई पर था कि जले नहीं मगर धीरे--धीरे चमड़ी को सुलगाना शुरू कर दे ।

महज इतने भर से, थोडी़-सी देर में दोनों त्राहि-त्राहि कर उठे ।

"मैं केवल एक ही सवाल पूछूंगा और एक ही बार पूछूंगा।" गुलशन आसिफ के बालों को मुट्ठी में भीचकर बेरहमी से उमेठता हुआ हिंसक स्वर में बोला था-----"अपने सवाल को रिपीट करना मेरी आदत नहीं है । और मुझे न सुनने की आदत भी नहीं है। इसलिए चेतावनी दे रहा हुं,, न मत कहना, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा । तुम्हारी हर उम्मीद से ज्यादा बुरा ।"

आसिफ भयानक बीजा तथा जलन से बुरी तरह छटपटाता हुआ बोला------"प. . . . .पूछो ।"

"आपरेशन औरंगजेब के दूसरे चरण में जिन पांच वीवीआईपी के कत्ल का हाफिज ने प्लान तैयार किया है, वे कौन हैं?"

“म. . .मुझें नहीं पता ।" आसिफ तड़पकर बोला-----“मुझें कुछ नहीं पता । त. . . तुम लोग यह ठीक नहीं कर रहे । इसका अंजाम...........

गुलशन का चेहरा भट्टी की तरह दहकने लगा । दांत भीचकर गुर्राया वह--------" लगता है इसने मेरी बात ठीक से नहीं सुनी । कोई बात नहीं । अभी समझ में आ जाएगा ।"

उसने करीब खड़े अपने तीनों आदमियों की तरफ़ देखा और आंखों से उन्हें कुछ इशारा किया, जिसे उन तीनों ने तुरंत समझा।

आसिफ ने भी गुलशन के इशारे को देख लिया था और उसकी आंखो में नाचती शैतानियत और वहशीपन के भावों को पढ़कर मन-ही-मन कांप गया था ।

उसके इशारे पर अतुल, कैसरी और शशांक ने अजरा को पेड़ से उतारना आरम्भ कर दिया था ।

"क.......क्या कर रहे हो?" आसिफ किसी अंजाने खौफ़ से घिरा बोला-------''क्या करना चाहते हो तुम लोग मेरी बहन के साथ?"

''वही, जो तुम लोग इस मुल्क की बहन, बेटियों के साथ करते आए हो ।" गुलशन अपने होंठ चबाता हुआ बोला----" मगर क्योंकि हम तुम जितने वहशी नहीं हैं, इसलिए उससे थोड़ा कम करेगे । मतलब इसके साथ रेप नहीं करेंगे । न ही कोई और जिस्मानी बर्बरता करेगे । सीधा मुक्ति का मार्ग दिखा देंगे ।"

" क...क्या मतलब?"

अजरा बेगम भी प्रतिरोध में जोर से मचली और उन्हें गालियों की बौछार से नवाजती हुई जोर से चिल्लाई । अतुल, केसरी और शशांक ने उसकी चीख-चिल्लाहट पर जरा भी ध्यान नहीं दिया । वे अपना काम पूर्ववत: करते रहे ।

"अभी समझ में आ जाएगा, गुलशन बोला । फिर अर्थपूर्ण नजरों से अपने आदमियों को देखा । तीनों का सिर सहमति में हिला । अजरा बेगम के दोनों हाथ पहले ही पीठ पर बंधे हुए थे । अतुल ने उससे लिपटी रस्सी का फंदा बनाकर अजरा के गले में डाल दिया और उसका दूसरा सिरा पुन: उसी पेड़ की शाख पर उछाल दिया, जिससे अभी तक अजरा उलटी लटकी हुई थी ।

तब, दोनो को गुलशन के भयानक इरादों का एहसास हुआ और उनकी रूह तक कांप गई ।

“न. . .नहीँ ।" अजरा दहलकर जोर से चिल्लाई-----" नहीं । तुम मुझे नहीं मार सकते । तुम ऐसा नहीं कर सकते ।"

लेकिन तव तक ऐसा हो चुका था । अतुल, शशांक और केसरी ने मिलकर रस्सी के दूसरे सिरे को खींच दिया और अजरा का जिस्म हवा में उठता चला गया । अजरा कुछ देर तक गर्म रेत पर पड़ी मछली की तरह छटपटाई ।

फिर उसकी गर्दन टूटने की आवाज़ सभी को साफ…साफ सुनाई दी ।

जिस्म निष्चेष्ट हो गया ।

प्राण पखेरू उड़ चुके थे ।
 
आसिफ के तिरपन कांप गए ।

सब कुछ पलक झपकते ही हो गया था ।

कितनी आसानी से उन लोगों ने अजरा को मार डाला था! बर्बरता का ऐसा नजारा तो केवल आईएसआईएस के दहशतगर्द ही दिखाते अाए थे ।

वह जानता था कि सामने खड़े लोग आईएसआईएस से जुड़े लोग नहीं थे, मगर दरिंदगी में उनसे दो कदम आगे नजर आए !

आसिफ का रोम-रोम कराह उठा ।

"तेरी मौत के बाद भी मेरे पास विकल्प बचा है गुलशन दरिंदगी भरे स्वर में उससे बोला------"अगर अब भी तेरा इरादा न बदला हो तो झूठ बोला । मैं तुझे भी मारकर इसकी बगल पे लटकाता हूं ।"

"ब. . .बताता हूं । म. . .मैं बताता हूं ।" आसिफ तड़पकर बोला ! उसका साहस जवाब दे गया था------------“त.. .तुम क्या जानना चाहते हो? "

"शाबाश ।" गुलशन के होंठो पर जहरीली मुस्कराहट उभरी थी । गुर्राया--------"तू वाकई समझदार है । फौरन उन पांचों के नाम बता!"

"म------मुस्तफा का पहला टार्गेट ।" अपनी बेबसी पर आसिफ जार---जार आंसू बहाता हुआ बोला--------“एमपी निरंजननाथ है ।"

"गुड ।" गुलशन की आखों में चमक आ गई-----“ ठीक कहा । मुस्तफा का पहला टार्गेट निरंजननाथ है । यह जानकारी हमारे पास पहले से है । उसका दूसरा टार्गेट?”

"व. . .वह मुम्बई पुलिस का कोई अधिकारी है ।"

"नाम?"

" नहीं पता । कसम से नहीं पता ।"

"झूठ बोल रहा है?"

" य----यकीन करो, सच कह रहा हूं।"

" तीसरा?"

" वह भी एक ऐसा पोलीटीशियन है, जिसने हाल ही में अपनी पार्टी बनाई है और जिसने राजनीति के क्षेत्र में करिश्माई कामयाबी हासिल की है ! उसका नाम ओमकार चौधरी है !"

"ओमकार चौधरी! ” गुलशन चौंक पड़ा । उसने पूछा-----मुस्तफा अोमंकार चौधरी को क्यों मारना चाहता है?"

"निरंजननाथ की तरह ओमकार चौधरी की राजनीति का एजेंडा भी पूरी तरह से ध्रुवीकरण वाला है । वह हिंदू कौम को जगाने की कोशिश कर रहा है और उनमें वहीं मजहबी कट्टरता भरना चाहता है, जिसके लिए केवल हमारी कौम को जाना जाता है । ऐसा इंसान यदि ज्यादा दिनों तक जिंदा रहा तो हाफिज के मकसद और उसके जेहाद की कमर तोड़कर रख देगा ।"

"चौथा टार्गेट?"

"उसका नाम प्रबल है-प्रबल कुमार चोपड़ा ।"

"क्या वह भी कोई पोलीटीशियन है ?”

"वह एक राषट्रीय अखबार का संपादक है । उसके अखबार का नाम "कश्मीर केसरी' है ।"

"चोपड़ा से दहशतगर्दों की क्या दुश्मनी है?"

"हर वह इंसान हाफिज का दुश्मन है, जो जेहाद को कमजोर बनाता है और इस मुत्क का भला सोचता है । चोपडा एक ऐसा बुद्धिजीवी है, जिसकी कलम अल्फाज नहीं लिखती, आग उगलती । वह अपने अखबार में मुल्क के हालात पर संपादकीय लिखता है, उसका संपादकीय हमेशा-हमेशा चर्चा का विषय होता है और उस लेख में वह जो भी लिखता है, दहशतगर्दों के खिलाफ़ लिखता है ।”

“हूं !"

पेड़ से लटका आसिफ अपना बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करता हंफता-कांपता बोला-----“हाफिज का कहना है कि जितना इस मुल्क की आर्मी और इंटेलीजेंस के हथियारों ने हमेँ नहीं सताया, उससे कई गुना ज्यादा घोपड़ा की कलम ने सताया है । वो हमारे खिलाफ ऐसा वैचारिक माहौल तैयार कर रहा है जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है । यदि ये अभी और ज्यादा जीवित रहा तो उसकी कलम का दावानल हिंदुसान के कोने-कोने में निरंजन नाथ और ओमकार चौधरी जैसे लोगो पैदा कर देगा और इस मुल्क में ऐसे लोगों की पैदाइश रोकना ही हाफिज और मुस्ताक का मिशन है ।"

"अगला टार्गेट?"

"मुझे नहीं लगता कि कोई अगला टार्गेट भी है। अगर है भी तो खुदा कसम, मुझे उसके बारे में नहीं पता ।"

"सच कह रहा है न?"

"जितना मालूम था बता दिया । इससे ज्यादा मुझें कुछ है नहीं मालूम ! मुस्तफा इस वक्त कहां है, मुझे नहीं पता । सैयद, नियाज़, अदील, शफीक कहां हैं, मुझे नहीं मालूम ।"

"तूने उन्हें पनाह दी थी ?"

“द…दी थी ।"

"क्या अजरा सचमुच तेरी बहन थी?”

आसिफ ने एक आतंक भरी निगाह अजरा की झूलती लाश पर डाली, फिर कंपकंपाते स्वर में बोला------" बता दूगा । पहले मुझे नीचे उतारो । या फिर इस आग को बुझा दो ।"

"जवाब दे ।"

"भ. .भाई-बहन का रिश्ता दुनिया को दिखाने के लिए था। असल में हम पति-पत्नी थे । अब मुझे नीचे उतारो । प्लीज ।"

"हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं ।" गुलशन रिस्टबॉंच देखता हुआ अपने आदमियों से बोला-----" इसे भी इसकी बीबी के पास पहुंचा दो । दोनों को अगल-बगल लटका देना !"

तीनों के सिर मशीनी अंदाज में हिले ।

"नहीं-नहीं अॉफिसर ।” नीचे जलती आग की गर्मी के कारण पसीने-पसीने हुआ आसिफ दहलकर चीखा--"त......तुम ऐसा नहीं कर सकते । ज......जब मैंने सब कुछ बता दिया तो तुम ऐसा क्यों करोगे? मुझे गिरफ्तार कर तो । जेल में डाल दो । मगर मारो मत ।"

"ध्यान रहे?" गुलशन आसिफ के पुरजोर विरोध तथा प्रलाप पर ध्यान दिए बगैर आगे बोला…“देखने वालों को यह सुसाइड या अॉनर कीलिंग का केस लगना चाहिए ।"

तीनों मशीनी अंदाज से अपने काम में जुट गए ।
 
आसिफ ने फिर पुरजोर विरोध किया, मदद के लिए जोर-से चीखा लेकिन उस बियाबान में उसकी पुकार सुनने वाला दुर---दूर तक कोई नहीं था । गुलशन थोड़ी दूर खड़ी अपनी कार में जाकर बैठ गया ।

पांच मिनट बाद उसके तीनों आदमी अपना काम खत्म करके उसके पास आ गए ।

शशांक ने कार की ड्राइविंग सीट संभाली और बाकी दोनों गुलशन के साथ उसके दाएं…बाएं बैठ गए । सभी ने एक अंतिम हिकारत भरी निगाह पेड़ पर झूलती दोनों लाशों पर डाली, फिर शशांक ने कार को मोड़कर कच्चे रास्ते पर दौड़ा दिया ।

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“धांय.......... !"

सभी उछल पड़े ।

इससे पहले कि किसी की समझ में कुछ आता, सनसनाती बुलेट कार की विंडस्क्रीन तोड़ती हुई ड्राइविंग सीट पर मौजूद शशांक की छाती में जाकर धंस गई ।

शशांक के हलक से पीड़ा भरी तेज हिचकी निकली और कार अनियंत्रित होकर बड़े भयानक ढंग से सड़क पर लहरा उठी ।

दूसरे ही पल शशांक औंधे मुंह स्टेयरिंग पर जा गिरा ।

तेज रफ्तार कार एक धमाके से सड़क पर उलट गई और वहुत दूर तक सड़क पर छत के बल घिसटती चली गई ।

गुलशन, अतुल तथा केसरी में हड़कम्प मच गया ।

तीनों की मिली-जुली चीखें कार के घिसटने की आवाज में दबकर रह गई । वे ही आपस में एक-दूसरे से गडमड होकर लहुलुहान हो गए थे ।

फिर, जब कार स्थिर तो उसकी टूटी विंडस्कीन तथा बैक स्कीन के रास्ते से तीनों कांपते----कराहते किसी तरह से बाहर निकले ।

तीनों के सिर से खून बह रहा था ।

केसरी की नाक टूट गई थी और अतुल के नाक व होंठ भी खून से तर-बतर थे ! पलक झपकते ही हालात एकदम से बदल गए थे ।

बाहर निकलकर अभी वे ठीक से खड़े भी नहीं हो पाए थे कि विपरीत दिशा से आती एक तेज रफ्तार सफेद स्कार्पियो ब्रेकों की तेज चिंघाड़ के साथ उनके सिरों पर पहुंचकर झटके से रुकी ।

स्कार्पियो से जो सबसे पहला शख्स नीचे उतरा, उसे तीनों ने तत्काल पहचाना और.......और उसे पहचानते ही तीनों के दिलोदिमाग है विस्फोट------सा हुआ ।

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वह मुस्तफा था ।

उस वक्त वह उन्हें इंसान नहीं बल्कि साक्षात यमदूत प्रतीत् हुआ था । फिर उसके दोनों तरफ़ चार आदमी प्रकट हुए ।

सैयद, नियाज़, अदील और शफीक ।

मुस्तफा की आंखों में ज्वालामुखी धधक रहा था ।

चेहरे पर भूचाल उमड़ा हुआ था ।

“बस थोडी-सी देर हो गई मुझे यहां पहुंचने में?” मुस्तफा के होंठों से सर्द गुर्राहट निकली----" बहुत थोड़ी-सी । और उतनी ही देर में तूने मेरे दो अदमियों को बेरहमी से हलाक कर दिया ।"

जख्मी गुलशन का हाथ अपनी जेब की तरफ रेंगा, मगर उसका रिवॉल्वर वहां से नदारद था ।

वह जरूर कार एक्सीडेंट के वक्त निकलकर कहीं गिर गया था । अतुल तथा केसरी के रिवॉल्वर उनकी जेब में ही मौजूद थे ,

लेकिन उनके जिस्म तथा हौंसले दोनों ही पस्त हो चुके थे । दोनों मे से किसी को भी अपने हथियारों का खयाल तक न अाया ।

“क्या सोचा था तूने!" मुस्तफा ने फिर आग उगली-----" तूं अपनी बर्बरता को अंजाम देकर यहाँ से साबुत निकल जाएगा और मैं अपने आदमियों को केवल दफनाकर संतोष कर लूंगा ! नहीं जलील इंसान, नहीं । यह नियति तो केवल तुम हिंदुस्तानियों की है । हम अपना हिसाब उधार नहीं रखते । काफिरों को हम उनके घर में घूसकर मारते हैं और उनकी गर्दन काटकर अपने मुल्क ले जाते हैं, जैसे अभी तुम तीनों की काटकर ले जाएंगे ।"

तीनों जिस्मों में मौत की सिहरन दौड़ गई ।

अपने अंजाम की कल्पना ने ही उनका खून सुखा दिया था । उस शैतान दहशतगर्द का जुनून सारी दुनिया जानती थी ।

"न-----नहीं ।" गुलशन बड़ी कठिनाई से कह सका----" नहीं ! तुम ऐसी नहीं करोगे मुस्तफा ।"

"मुस्तफा जो चाहता है, उसे करने से तो उसे खुदा भी नहीं रोक सकता ।" वह दहाढ़कर बोला------" और फिर तेरा नाम तो हाफिज की हिटलिस्ट में सबसे उपर है । बहुत खून बहाया है तूने मेरी कौम का । बहुत दिनों से तू हमारी आंखों में चुभ रहा था । अगर आसिफ ने नहीं बताया तो अब जान ले कि हाफिज के अॉपेरेशन औरंगजेब में मुम्बई पुलिस के जिस अफसर का जिक्र किया जा रहा है, उसका नाम गुलशन है, यानी वह तू हे-तू। सुना तूने! अपना सिर कलम करवाने के लिए तैयार हो जा । किसी हिंदुस्तानी खोपड़ी से फुटबाल खेले वहुत काफी अरसा हो गया है ।"

गुलशन काटों तो खून नहीं ।

उसके देवता कूच कर गए थे ।

सामने अत्याधुनिक हथियारों से लेैस शैतानों की पूरी जमात खड़ी थी और वे तीनों उनका प्रतिरोध करने की हालत में भी नहीं थे । उनका एक साथी शशांक पहले ही मौत की नीद सो चुका था ।

गुलशन को अपनी ही नहीं, अपने बाकी बचे दोनों साथियों की मौत भी साफ नजर आने लगी थी ।

उन तीनों का खेल सचमुच खत्म हो चुका था ।
 
इसके विपरीत वह उन्हें फरीदाबाद के बाहरी इलाके से सटे जंगल में ले गया । वहां, जहाँ दूर-दूर तक सन्नाटा था ।

................................

कमल आर्या पैंतालीस साल की उम्र का अधगंजे सिर वाला एक घुटा हुआ पुलिसिया था ।

वह दिल्ली पुलिस के एक स्पेशल स्क्वायड दस्ते से संबद्ध था ।

फरीदाबाद इलाके में पेश अाई अजरा बेगम और आसिफ तथा गुलशन राय एवं उसकी टीम के कत्ल की खबर पाते ही वहां सबसे पहले जो पुलिस टीम पहुंची थी, यह इंस्पेक्टर कमल आर्या की ही पुलिस टीम थी ।

फिलहाल, कमल आर्या ने जैसे ही हेडक्वार्टर में स्थित अपने आफिस में कदम रखा-मोबाइल वजा ।

उसने फोन रिसीव किया------"इंस्पेक्टर कमल आर्या ।”

दूसरी तरफ से एक अजनबी स्वर कान में पडा-----"इनाम का तलबगार बोल रहा हूं ।"

आर्या चकराया----" कौन ?"

“काम की बात सुनो इंस्पेक्टर ।" अधिकीरपूर्ण स्वर में कहा गया--""मेरे पास वहुत अहम खबर है, जिसमें तुम्हारी, मेरा मतलब, दिल्ली पुलिस की दिलचस्पी हो सकती है । जानना चाहते हो तो फौरन आकर मुझसे मिलो ।"

“खबर क्या है?"

"यूं बता सकता तो तुम्हें बुलाने की क्या जरूरत थी?"

“खबर किस बारे में ?"

"निरंजननाथ के बारे में?"

"क. . .क्या?" आर्या के कान रव्रड़े हो गए…"निरंजननाथ के बारे में क्या खबर है?”

"मुझे मालूम है कि तुम्हे मालूम है कि रामलीला ग्राउंड में निरंजन नाथ की होने वाली महारैली में दहशतगर्दों ने उसे खत्म करने का प्लान तैयार किया हुआ है ।"

"इस बारे में तुम्हें कैसे मालूम?" उसने सतर्क स्वर में पूछा ।

"प्लान को अंजाम देने के लिए दहशतगर्दों की तीन अलग अलग टीमें दिल्ली में पहुंच चुकी हैं । यह खुफिया इन्फॉरमेशन तुम्हें मिल चुकी होगी ! मैं तुम्हें उनमें से दो दहशतगर्दों के बारे में बता सकता हूं कि वे इस वक्त दिल्ली में कहां है ?"

"अपना नाम बताओ ।"

"वक्त बरबाद मत करों इंस्पेक्टर । अगर उन दहशतगर्दों का पता जानना है तो फौरन आकर मुझसे मिलो !"

"कहां? "

उसने आर्या को शाहदरा का एक पता बताया ।

आर्या ने पता दिमाग में बैठा लिया ।

फिर पूछा------"' तुम इस वक्त उसी फ्लैट में हो ?"

"और क्या ! तभी तो तुम्हें बुला रहा हूं । मगर ध्यान रहे इंस्पेक्टर, तुम्हें अकेले आना होगा, पुलिस टीम के साथ नहीं?"

"टीम साथ क्यों नहीं?" आर्या की आंखें सिकुड़ी ।

"क्योंकि मैं ऐसा चलता हूं ! यह मत समझना कि मैं तुम्हारा कोई दुश्मन हूं जो तुम्हें नुकसान पहुंचाने का इरादा रखता हूं !”

"क्यों न समझूं ?"

"जिस फ्लैट में हूं उसके ठीक सामने तुम्हारे महकमे के डीसीपी का आँफिस है । समझ में अाया?"

" ह . . . . हां ।"

"नुकसान पहुंचाने का इरादा रखता तो ऐसी जगह कभी नहीं बुलाता । किसी जंगल-वंगल में बुला लेता ।"

" बुला ही क्यों रहे हो! उनका पता फोन पर बता सकते हो ।"

"नहीं बता सकता। मैं पुलिस और काले नाग की नस्ल पर कभी भरोसा नहीं करता ।" दूसरी तरफ से बोलने वाला धारा प्रवाह अंदाज में कहता चला गया----" उन दोनों दहशतगर्दों को जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी पर बहुत मोटा इनाम है, जो तुम लोग हजम कर जाओगे । ऐसा न हो इसलिए मेरे पास एक पेपर तैयार है । उस पर अपने आटोग्राफ देने होंगे ! दहशतगर्दों की गिरफ्तारी के बाद वही मेरे दावे का पक्का सबूत होगा । अब मैं फोन रख रहा हूँ और केवल आधा घंटे तक तुम्हारे पहुचने का इंतजार करूंगा । इस दरम्यान नहीं पहुचे तो फिर किसी दूसरे पुलिस अफसर को फोन लगाऊंगा और उसे किसी और जगह बुलाकर पेपर पर आटोग्राफ कराऊंगा ! वह सामने बैठने वाला डीसीपी भी हो सकता है और कोई दूसरा पुलिस अॉफिसर भी !"

" उ..........उसकी जरूरत नहीं है !" आर्या जल्दी से बोला-----" मैं आधे घंटे से पहले ही पहुंच रहा हूं !"

दूसरी तरफ से फोन डिस्कनेक्ट कर दिया गया ।

आर्य ने मोबाइल कान से हटाया ।

उसके दिलो दिमाग में तेज हलचल मच गई थी ।

अपनी कुर्सी पर बैठने का भी होश नहीं रहा था ।

कई पल तक शून्य में देखता रहा फिर, जैसे मन-ही-मन कोई फैसला किया ।

अपने हाथ में मौजूद मोबाइल मेज पर रखा और अपनी जेब से एक अन्य मोबाइल निकालकर उस पर तेजी से कोई नम्बर पंच किया । वह नम्बर उसकी कांटेक्ट लिस्ट में नहीं था ।

दूसरी ओर से कॉल रिसीव हुई ।

“एक बुरी खबर है ।" बह राजदाराना लहजे में बोला ।

" क्या? "

"तुम्हारे दो अदमियों की खबर मुखबिर ने सूंघ ली है ।"

दूसरी तरफ घुप्प सन्नाटा छा गया ।

" हैलो !" आर्या व्यग्र भाव से बोला ।

कहा गया…“यह नहीं हो सकता ।"

“ठीक है । फोन रख रहा हूं ।"

"अरे रुको इंस्पेक्टर ।"

"अब क्या है?” आर्या ने अक्खड़ स्वर में पूछा ।

"उन दोनों के नाम ।"

"आधे घंटे में मालूम हो जाएंगे । उनके नाम भी और उस जगह का पता भी, जहाँ उन्होंने पनाह ले रखी है ।"
 
"पूरी बात बताओ इंस्पेक्टर ।"

आर्या ने उसे पूरी बात बता दी ।

दूसरी तरफ मौजूद शख्स जैसे कुछ पलों तक मनन करने के बाद बोला था-----"खबर सच मालूम पड़ती है । फाल्स खबर देने वाला डीसीपी आँफिस के साये में कभी नहीं बुलाता । फौरन से भी पहले उसके पास पहुचों वरना अगर उसने किसी और पुलिसिये को फोन लगा दिया तो भारी मुश्किल खडी़ हो जाएगी ।"

"ठीक है । लेकिन तुम्हारे लिए यह बहुत अहम खबर है !" उसका लहजा एकाएक अर्थपूर्ण हो गया था-------"बहुत जादा अहम खबर की कीमत भी वहुत अहम होती है ।"

“मिल जाएगी ।"

"अभी परसों वाले काम की कीमत भी उधार है ।"

"परसों वाला काम?"

“अजरा बेगम और आरिफ । भूल गए क्या?"

“दोनों कामों की कीमत एक साथ पहुच जाएगी !"

"ठीक है । फोन रखता हूं और काम शुरु करता हूं ! "

"गुड लक ।"

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नवाब ड्राइंग हॉल मेँ, होलकर के सामने पहुंचा ।

दोनों ने शिकार तथा शिकारी के अंदाज में एक-दूसरे को सिर से पांव और पांव से सिर तक देखा--------------एक-दूसरे की आंखों में छुपी चट्टानी कठोरता को परखा ।

नवाब ने एक सोफा चेयर पर बैठते हुए सिगरेट सुलगाई और सेंट्रल टेबल पर रखी कांच की ऐशट्रे को इसलिए उठाकर अपनी चेयर के चौड़े हत्थे पर रख ली ताकि उसे इस्तेमाल करने के लिए बार-बार आगे की तरफ न झुकना पड़े ।

एक कश लगाने के बाद उसने कहा-------"मैं आज काळी व्यस्त हूं अॉफिसर, इसके बावजूद तुम्हें निराश नहीं किया और तुमसे मिलने यहां चला आया । इसलिए, जो कहना है जल्दी कहो ।"

"शुक्रिया नवाब ।" होलकर के स्वर में व्यंग उभरा------“तुम्हारा यह एहसान मुझ पर उधार रहा ।"

“खेर ।" नबाब गहरी सांस भरकर बोला------“हमारे मुल्क में घर आए मेहमान की खातिरदारी पूछने का बुरा रिवाज है इसलिए पूछ रहा हूं ? क्या पियोगे-ठडा या गरम?"

"में यहां ठंडा-गरम पीने नहीं आया ।"

"यही तो मैं भी सोच रहा हूं कि आईबी का एक सस्पेंडिड आंफिसर यहां क्यों आया है?"

"अपने मुल्क की खातिर-----अपनी भारत माता की खातिर । जिसका दर्द मुझसे देखा नहीं जाता-------जिसके दर्द से मैं तड़पता हूं । हर तरफ घना कोहरा छाया है इस मुल्क में । यहां चारों तरफ़ सिवाय अंधेरे के मुझे और*कुछ भी नजर नहीं अाता । यह मुल्क रो रहा है, मगर इसके आंसू किसी को भी नजर नहीं आते ।"

''ये अल्फाज तो काफी जाने-पहचाने से लगते हैं ।" नवाब के माथे पर बल पड़ गया-------"' याद नहीं आ रहा कि मैंने इन्हें कब और कहां सुना था...........कहां सुना था?"

"ये भारत माता के एक ऐसे सच्चे सपूत के अल्फाज हैं, जो मुल्क के लिए वफादारी और जांनिसारी का जज्बा अपने साथ लेकर पैदा हुआ था । वह मुल्क को अपना खुदा मानता था और जुनून की हद तक उसकी इबादत करता था । एक परियों की उसके नाम का सिंदूर अपनी मांग में सजाना चाहती थी मगर उस इंसान का जनून तो केवल उसकी भारत माता थी, जिसके आंसुओं का कर्ज के लिए वह दुनिया में आया था । उसने शहजादी से कहा कि मुल्क के एक सिपाही की बीबी बनने के लिए एक सच्चे सिपाही के जज्वातों की जरूरत होती है, तो जानते हो शहजादी ने क्या किया?"

“क्या किया?" नवाब ने दिलचस्पी से पूछा ।

"कुछ कहा नहीं बल्कि वह खुद भी एक सिपाही बन गई । वह उसी जुनूनी सिपाही के महकमे में भर्ती हो गई और एक निहायत ही जोखिम भरे खतरनाक मिशन का हिस्सा बनकर हमारे दुश्मन मुल्क की जमीन पर छलांग लगा दी ।"

"भारत माता के उस सच्चे सपुत का नाम?"

" अर्जुन.............अर्जुन राणावत । उसकी नाजों से पली प्रेयसी का नाम नीलिमा है !"

"हां याद अाया । ऐसा ही कुछ नाम था उसका । लेकिन तुम उसे कैसे जानते हो? क्या यह तुम्हारी आईबी में ही काम करता है ?'"

" नहीँ ।"

" तो ?"

"अर्जुन राणावत इस मुल्क के खुफिया निजाम का गौरव है । इस मुल्क की खुफिया एजेंसियों से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा, जो अर्जुन राणावत की शख्सीयत का कायल न हो । मगर बहुत कम ऐसे खुशकिस्मत हैं, जिन्होंने अर्जुन से रूबरू होने का सौभाग्य हासिल किया है । ऐसा तो मुल्क में शायद ही कोई होगा, जिसने अर्जुन के दुस्साहसिक कारनामों के किस्से न सुने हो । वह देश के दुश्मनों का काल है । अर्जुन उन्हें मारता नहीं, कुचल देता है, फिर वह चाहे उसे पैदा करने वाला उसका बाप ही क्यों न हो ।"

नवाब ने चौंककर पूछा-------" क्या अर्जुन का बाप. . .

" तुमने ठीक समझा, उसके बाप का नाम दिनेश राणावत था । वह अर्जुन से कई दर्जे ऊंचा खुफिया अधिकारी था । दिनेश राणावत की जांबाजी के किस्से भी कम मशहूर नहीं थे । लेकिन फिर पता नहीँ कैसे वह गद्दार हो गया । उसकी गद्दारी उसके बेटे अर्जुन ने पकड़ी थी फिर उसने एक पल भी गंवाए बगैर बडी बेदर्दी से उसे छलनी कर दिया था ।"

" अभी अर्जुन राणावत का जिक्र यहां किसलिए?''

"अभी समझ में आ जाएगा, लेकिन पहले यह जान लो कि मैं यहां क्यों आया हूं ?"

“बताओ ।"

“मैं यहाँ अपने ऊपर लगे दाग को धोने आया हूं ! चांदनी सिंह के कत्ल के तौर पर मेरे दुश्मनों ने मुझे जो शिकस्त दी है, उस शिकस्त को उसे वापस लौटाने आया हूं !”

"मैं तुम्हारा दुश्मन कैसे हुआ"'

" मिशन मुस्तफा के लिए दहशतगर्दों को अपने एक नहीं, दो--दो हैलीकाप्टर मुहैया कराने वाला बंदा मेरा दुश्मन नहीं तो क्या हुअा ?"

नवाब चेहरे पर बेहद अजीब से भाव आए और गए । होलकर के लिए यह फैसला करना मुश्किल हो गया कि वे असली भाव थे या बनावटी !

"यह एक निहायत ही गम्भीर इल्जाम है अॉफिसर ।" नवाब ने सिगरेट में एक गहरा कश लगाने के बाद कहा था-----"जिसका वहुत टेढा़ मतलब निकलता है । तुम जानते हो न?"

“जानता हूं । इसका सीधा और साफ मतलब यह निकलता है कि तुम दहशतगर्दों के साथ मिले हुए हो । कल तक तुम केवल एक मुजरिम थे, मगर आज़ देशद्रोही । इसलिए, मैंने अपनी टीम के किसी एजेंट को नहीं भेजा । खुद तुम्हारे पास आया हूं ।"

"किस हैसियत से?”

'"क्या?"

"तुमने कहा-----तुम खुद यहां आए हो । मेरा सवाल यह है कि किस हैसियत से आए हो? तुम तो सस्पेंड हो चुके हो ।"

"मुझे पता है ।"

"यहां उन्हें आना चाहिए था, जो सस्पेंडिड नहीं हैं और इस मामले की अॉथराइज इंक्वायरी कर रहे हैं । जो इंक्वायरी कमीशन से जुड़े लोग है और जो मुझसे यह सवाल करने का हक रखते है ।"

" वे भी आएंगे । लेकिन मैं क्योंकि यह सवाल करने का हक नहीं रखता, इसीलिए जल्दी आ गया । तो क्या मैं यह समझू तुम मेरे सवाल का जवाब देने से इंकार कर रहे हो?"

"ठीक समझे । तुम मुझे मजबूर नहीं कर सकते । नवाब जो नहीं चाहता, उसे करने लिए उसे कोई मजबूर नहीं कर सकता ।"

"अहंकार तुम्हारे सिर पर चढ़कर बोल रहा है नवाब और अहंकारी का अंजाम वहुत बुरा होता है ।"

" अब तुम मुझें धमकाने की कोशिश कर रहे हो ।"

“मेरे पास सवाल और भी है ।"

“मुझे परवाह नहीं ।"

“जब मैं सस्पेंड नहीं हुआ था तो उस ट्रिपल मर्डर वाले फारेनर के कत्ल की तफ्त्तीश मेरे ही पास थी । मिशन मुस्तफा को हाथ में लेने की वजह से उसमें बाधा आ गई थी । पर उस मामले को लेकर भी अब मेरी तफ्तीश मुकम्मल हो गई है और मेरी तफ्तींश यह कहती है कि ।" उसने गहरी निगाहों से नवाब को देखा----------"तीनों के कत्ल के पीछे भी तुम्हारा ही हाथ है ।"

"बकवास !" नवाब ने बुरा-सा मुंह बनाया ।

" वे तीनों कम्यूटर की दुनिया के ऐसे हैकर्स थे, जो कई मुल्कों में साइबर से जुड़े गम्भीर आर्थिक अपराधों को अंजाम दे चुके थे ।
 
राजा चौरसिया भी वैसा ही एक कुख्यात साइबर क्रिमनल है, जो इस वक्त तुम्हारे रहमोकरम पर है और यकीनन उन तीनो हैकर्स के अधूरे काम को पुरा करने की केशिश में मशगूल होगा । मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वह जरूर इसी इमारत में ही कहीं होगा और तुम्हारे गेंग में काम करने वाली वह फाख्ता भी बाकी तीनों हैकर्स की तरह चौरसिया को भी अपने हुस्न के जाल में फंसाकर यहाँ लाई है । क्या तुम्हारी उस फाख्ता का नाम बताऊं?"

“ज़रूरत नहीं है । मुझें पता है कि तुम एक काबिल खुफिया अधिकारी हो और ईमानदार भी !"

"यानी कबूल कर रहे हो कि मैंने जो कहा, सच कहा है?"

"इतनी जल्दी नतीजे पर नहीं पहुचा करते आफिसर । मैं ऐसा कुछ भी कबूल नहीं कर रहा । यह केवल तुम्हारा अंदाजा है कि राजा जैसा कुख्यात कम्यूटर हैकर मेरे पास है । इसलिए पहले मारे गए तीनों कम्यूटर हैकर्स का नाम तुमने मुझसे जोड़ दिया । और नगमा के बारे में अंडरवर्ल्ड से जुंड़े लगभग सभी लोग जानते है कि वह नवाब के लिए काम करती है । इसलिए पब में राजा को उसके साथ देखकर तुमने नतीजा निकल लिया । तुम्हारे पास किसी भी बात का सबूत नहीं हो सकता । बोलो, क्या मैं गलत कह रहा हूं ?"

“नहीं । लेकिन अंतत: तुम्हें कबूल करना ही पड़ेगा नवाब ।" होलकर दृढ़ता से बोला--"क्योंफि तुम्हें बताने के लिए अभी भी मेरे पास बहुत कुछ है ।"

"मैं समझ रहा था कि तुम्हारा तरकश खाली हो गया है ।"

"मेरा तरकश कभी खाली नहीं होता । उसमें कम-से-कम एक तीर मैं हमेशा बचाकर रखता हूँ । मुझे मालूम है कि तुम्हारा टार्गेट बीस हजार करोड़ रुपए की भारी-भरकम धनराशि है । मैं यह भी जानता हूं नवाब कि यह काम तुम अपने लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए कर रहे हो ।"

"वह कौन है?”

“यह कहना जल्दबाजी होगी । मगर वह जो भी है, यकीनन कहीं न कहीं किसी टेरेरिस्ट नेटवर्क से जुड़ा है, क्योंकि अाज की तारीख में उस रकम की अगर किसी को सबसे ज्यादा जरूरत है

“यह कहना जल्दबाजी होगी । मगर वह जो भी है, यकीनन कहीं न कहीं किसी टेरेरिस्ट नेटवर्क से जुड़ा है, क्योंकि अाज की तारीख में उस रकम की अगर किसी को सबसे ज्यादा जरूरत है------------------

------------------------ तो वह यकीनी तैर पर हमारे मुल्क को तबाह करने का ख्वाब देखने बाले दहशतगर्द ही है । वह दहशतगर्द हाफिज लुईस भी हो सकता है-------मुस्तफा भी हो सकता है और लश्कर भी हो सकता है ।"

"और तुम्हारा खयाल है कि मैं इन दहशतगर्दों के लिए काम कर रहा हुं,, जिनके अभी तुमने नाम लिए । मैं उन्हीं लोगों के इशारे पर उस रकम को हासिल करना चाहता हूं!”

"किसी भी बैक एकाउंट को हवा में हैक नहीं किया जा सकता । यह कोशिश भी केवल वही कर सकता है, जिसके पास उस एकाउंट के सीक्रेटस मौजूद हो और तुम वह शख्स नहीं हो सकते । वे टेरेरिस्ट ग्रुप हो सकते है, जिनके नाम मैंने बताए । क्योंकि तुम जी जान से इस प्रयास में जुटे हो, इसका मतलब, उन्हें टेरेरिस्टों के जरिए तुम्हें वे सीक्रेटस हासिल हो चुके हैं ।"

" तुम्हारी बातों से लग रहा है कि तुम्हें उन बीस हजार करोड़ रुपयों बारे में वहुत कुछ पता है ।" नवाब ने सवाल किया------"क्या तुम उसके एकाउंट होल्डर के बारे में जानते हो?”

"मैं तो यह भी जानता हुं, कि टैरेरिस्ट उस रकम को क्यों हासिल करना चाहते हैं? इसीलिए मैं तुम्हें वार्न कर रहा हूं नवाब, यह गलती मत करना । वह रुपया किसी भी हालत में टेरेरिंस्टों तक नहीं पहुंचना चाहिए । अगर यह रुपया उन तक पहुंच गया तो तुम सोच भी नहीं सकते कि इस मुल्क पर केैसी कयामत बरपा हो सकती है । बहरहाल, तुम भी इसी मुल्क में रहते हो और मुम्बई तो खास तौर पर दुश्मन मुल्क के निशाने पर है । यहां कयामत आई तो उसकी आंच_से तुम भी नहीं बचोगे, न ही सारे शहर में फैला तुम्हारा निजाम ।"

“अच्छा!” नवाब अंजान बनता हुआ बोला । उसके स्वर में व्यंग उभर आया था------“बताने का शुक्रिया । पर यह सब मुझे बताकर तुम बेवजह अपना वक्त बरबाद कर रहे हो । मैं खुद न तो कोई विदेशी टेरेरिस्ट हुं-------न ही किन्हीं दहशतगर्दों का मददगार हूं,, न ही उनके लिए बीस हजार करोड़ रुपया हासिल करना चाहता हूं ।"

"तुम्हारी यह ढिठाई मुझ पर तो चल सकती है, क्योंकि एक सस्पेडिड अफसर हूं मगर उन पर नहीं चलेगी, जो आन डूयूटी है !"

"इंटेलीजेंस तो वहुत छोटी चीज है आफिसर, बगैर सबूत के तो खुद तुम्हारी सरकार भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती । और मेरे खिलाफ़ कोई सबूत न तो तुम्हारे पास है, न तुम्हारी इंटेलीजेंस के पास और न ही तुम्हारी सरकार के पास । होता, तो तुम इतने बेबस नजर नहीं आ रहे होते ।"

होलकर कसमसाया ।

नवाब के अल्फाजों में बेहद तीखी सच्चाई छुपी थी ।

"तुमने मुझे वाकई वहुत निराश किया है नवाब ।" होलकर अाह-सी-भरकर बोला-----" मेरा यहां आने का मकसद कुछ और था । मेरा मकसद मुस्तफा था जो निर्देष इंसानों के खुन की होली खेल रहा है और आने वाले कल में, जो इस मुल्क में बहुत बड़ा गुल खिलाने वाला है और जिसने मेरे बेदाग दामन पर कलंक लगा दिया । मैं तुम्हारी मदद से उस तक पहुंचना चाहता था-------उसके और हाफिज के खतरनाक मंसूबों पर पानी फेरना चाहता था। मगर तुम भी वहीं कर रहे हो जो तुम्हारे जैसे मुजरिम से अपेक्षित था । मैं कबूल करता हूँ कि कानून जद में रहकर मैं तुम्हें मजबूर नहीं कर सकता। न आईबी कर सकती है, न ही कोई और, लेकिन...

"लेकिन ?"

''एक इंसान ऐसा है जो यह कर सकता है । भले ही वह भी मेरी तरह कानून का मुहाफिज़ है लेकिन आज तक कानून की कभी कोई बंदिश उसके कदमों को रोक नहीं पाईं । जो कानून तुम जैसे मगरमच्छों की शैतानी ताकत के आगे बेबस हो सकता है,, उस कानून को जरूरत पड़ने पर वह तोड़ता भी है और फिर अपना काम करके उसे इस तरह से जोड़ सकता है कि उसकी दरार को किसे मैग्नीफांइग ग्लास से भी देखा नहीं जा सकता। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि वह इंसान नहीं जीता-जागता प्रेत है । कानून और मुल्क की हुकूमत की सीमाएं जहाँ खत्म होती हैं, बहां से उसकी सीमाएं शुरू होती हैं । तुम मुझे मजबूर कर सकते हो----इस मुल्क के कानून को मजबूर कर सकते हो लेकिन उसे मजबूर नहीं कर सकते ! बो जव आएगा तो तुम्हारे सारे पित्ते ढीले कर देगा ।"

" किसकी बात कर रहे हो ?"

"में अर्जुन राणावत की बात कर रहा हूं ! कुछ देर पहले तुमने पूछा था कि अर्जुन रणावत का जिक्र किसलिए? तुम्हारे उस सवाल का ज़वाब अब तुम्हें मिल गया होगा ।"

नवाब एकाएक काफी व्यग्र हो उठा था------“राणावत का इस मामले में क्या दखल है?"
 
“अर्जुन राणावत का हर उस मामले में दखल होता है, जो इस मुल्क की हिफाजत से जुड़ा होता है----------इस मुल्क की अस्मिता से जुड़ा होता है-------इस मुल्क की जान से जुड़ा होता है । और इस मामले में तो उसका खास ही दखल है------बहुत ज्यादा खास ।"

"मैं समझा नहीं?"

"मैं तुम्हें एक राज की बात बताता हूं नवाब । जिस बीस हजार करोड़ रुपए के लिए तुम मुल्क की हुकूमत और उसकी इंटेलीजेंस से भिढ़ना चाहते हो, यह रुपया न तो इस मुल्क की हुकूमत का है, न ही उसकी इंटेलीजेंस का है, यह सारा का सारा रुपया तो असल में अर्जुन राणावत का है ।"

"क्या?” नवाब चौंका था--------" यह कैसे हो सकता है । इतनी बड़ी रकम राणावत के पास कहां से अाई ?"

" यह तुम्हारे जानने का विषय नहीं है । यह मुल्क की किसी इंटेलीजेंस का एक दफन हो चुका पुराना राज है, जिसके बारे में केवल इंटेलीजेंस से जुडे लोग ही जानते है । खुशकिस्मती से मैं उन्हीं कुछ लोगों में से एक हूं ।"

"मुझे विश्वास नहीं होता ।"

“मुझे तुम्हें विश्वास दिलाने की जरूरत भी नहीं है ।"

"अगर तुम सच कह रहे हो तो राणावत अपने एकाउंट को आपरेट क्यों नहीं कर पा रहा है ? उसके पास उसका सीक्रेट पासवर्ड क्यों नहीं है? वह लावारिस हालत में क्यों पड़ा है?"

"उसकी भी कोई पुख्ता वजह है, लेकिन अफसोस, मैं तुम्हें उसके बारे में नहीं बता सकता ।"

"क्या राणावत यह नहीं जानता कि उसके एकाउंट के कुछ सीक्रेट लीक हो चुके है और दुनिया भर के कम्यूटर हैकर्स उसमे जमा अकूत दौलत को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं?"

"यह भी एक ऐसा सीक्रेट था, जो हुकूमत के बहुत ऊंचे ओहदे पर बैठे कुछ चुनिंदा लोगों को ही मालूम था । इसके बावजूद अगर वह सीक्रेट लीक हुआ है तो जाहिर-सी बात है कि इसमें किसी अंदर के आदमी का हाथ है, यानी गद्दार हमारे घर में छुपा है और किसी वहुत बड़े ओहदे पर बैठा है ।"

नवाब के जेहन में जयदेव का नाम उभरा जो केंदीय रक्षामंत्री हंसराज ठकराल का पर्सनल सेकेटरी था ।

तो क्या उस मामले में सीधे डिफेंस मिनिस्टर का हाथ है?

क्या मुल्क का रक्षामंत्री गद्दार है?

जेहन में बड़ी तेजी से सवाल उभरा ।

"क्या सोचने लगे नवाब ?" उसे 'डूबा' देख होलकर ने पूछा ।

"कुछ नहीं ।" नवाब ने अपने विचारों को झटका-----"मेरे बारे में राणावत को कौन बताएगा । क्या तुम ?"

होलकर ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा था-----“क्या तुम्हें शक है कि राणावत तक मेरी पहुच नहीं हो सकती?"

नवाब फिर सोच में पड़ गया ।

होलकर अपलक उसे ही देख रहा था ।

"ठीक है आंफिसर ।" निर्णायक स्वर में कहने के साथ नवाब ने सिगरेट का अंतिम सिरा ऐशट्रे में कुचला और सोफे से खडा़ होता हुआ बोला------------"तुम अपना काम करो, मैं अपना काम करता हूं ।"

होलकर ने सकपकाकर पूछा--------------" क्या मैं तुम्हारी इस हरकत को अपने लिए यहाँ से जाने का इशारा समझूं ?"

"इस मुल्क में घर आए मेहमान से जाने के लिए कहना बेअदबी होती है और मैं और भले ही चाहे जो होऊं, बेअदब नहीं हो सकता । मुझे जरुरी काम है इसलिए जाना पड़ रहा है । तुम बैठो । नाश्ता वेंगैरह भिजवा देता हूं ।" कहने के बाद नवाब वहां रुका नहीं बल्कि तेज कदमों से बाहर निकल गया ।

होलकर के होंठो पर बड़ी ही रहस्यमय मुस्कान उभरी ।

कमल आर्या सिविल ड्रेस में शाहदरा के उस एमआईजी फ्लेैट पर पंहुचा जहां उसे बुलाया गया था ।

वह हाउसिंग सोसाइटी मेन रोड पर ही स्थित थी । सड़क के पार डीसीपी आँफिस साफ नजर आ रहा था ।

सोसायटी में आम दिनों की तरह ही लोगों की आवा-जाहीं जारी थी । आर्या को कहीं कोई असामान्य बात नजर नहीं आई थी ।

बताए गए फ्लैट का प्रवेश द्वार बंद था ।

संतुष्ट होने के बाद वह आगे बढ़ा । पतलून की जेब में मौजूद सर्विस रिवॉल्वर को होले से थपथपाया, फिर कालबेल के पुश बटन पर अंगूठा रख दिया ।

दरवाजा तुरंत खुला और चौखट के बीचोंबीच हट्टा-कट्टा नौजवान नजर आया ।

वह आर्या के लिए नितांत अजनबी था लेकिन नौजवान के लिए शायद आर्या अजनबी नहीं था । इसीलिए, आर्या को देखते ही उसके होंठों पर चिरपरिचित मुस्कान उभरी थी ।

"वेलकम इंस्पेक्टर साहब ।" नौजवान, जो कि प्रताप था, हाथ जोड़ता हुआ अर्थपूर्ण भाव से बोला-----“अदर तशरीफ लाइए । मैं आप ही का इंतजार कर रहा था ।"

“तू कौन है?” आर्या ने पुलिसिया अंदाज में पूछा ।

"वही हूं जिसने आपको फोन करके बुलाया । क्या आपने मेरी आवाज़ को नहीं पहचाना?”

"पहचान लिया है ।" आर्या हड़बड़ाकर जल्दी से बोला । जबकि सच तो यह था कि प्रताप के याद दिलाने पर भी उसे सूझा था कि फोन पर बोलने बाला प्रताप ही था--------"तेरां नाम क्या है?”

"क्या सब कुछ यहीं खड़े होकर पूछ लेंगे इंस्पेक्टर साहब और फिर अाप मुझसे इस तरह क्यो पेश आ रहे हैं जैसे मैं कोई मुजरिम हूं । मैं तो आपकी मदद कर रहा हूं !"

आर्या के जेहन को झटका-सा लगा ।

"ए. . .ऐसी बात नहीं है ।" वह नरम पड़ता हुआ बोला ।

"तो फिर तशरीफ़ लाएं ।"

"अंदर और कौन है?”

"कोई नहीं ।”

आर्या झिझकता हुआ अंदर दाखिल हुआ । आदतन उसकी चौकन्नी नजरें तेजी से चारों तरफ़ पेन हुई ।

प्रताप ने दरवाजा बंद करके चिटकनी चड़ा दी ।

आर्या चटकनी बंद करने के बारे में पूछने ही वाली था है अटैच्ड रूम की तरफ़ से कदमों की आहट उभरी ।
 
आर्या के हाथ में फौरन उसका सर्विस रिवॉत्वर चमक उठा। उसने रिवॉल्वर अटैच्ड दरवाजे की तरफ़ तान दिया था ।

तभी गिरीश और भल्ला ने वहां कदम रखा । फिर उन दोनों के पीछे जो शख्स नजर आया, उसे देखते ही आर्या यू चौंका जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो ।

वह शख्स उसका एसीपी था ।

आर्या का आला अफसर एसीपी अभिजीत नेगी ।

वह अपनी सख्ती, ईमानदारी और निष्ठा के लिए सारे महकमे में जाना-जाता था और उस वक्त उसकी वहां मौजूदगी कई सवाल खड़े कर रही थी । आर्या जहा-का-जहाँ ठिठककर खडा हो गया ।

"स......सर ।" अक्षर स्वत: जुबान से फिसले-----“अ...आप यहां?"

नेगी के इशारे पर गिरीश आगे बढ़ा और आर्या का सर्विस रिवॉल्वर अपने कब्जे में ले लिया ।

"य. . .यह सब क्या है सर ।" मुजरिमों जैसी उस कार्यवाही ने आर्या की सिट्टी पिट्टीं गुम कर दी । वह हकलाता हुआ सा बोला------" अ.........आपकी मौजूदगी में मेरे साथ यह कैसा सलूक किया जा रहा है? य. . .ये तीनों कौन हैं और वो फोन कॉल. . .

आर्या ने फौरन अपने होंठ भींच लिए ।

" कौन-सी फोन काल आर्या?" नेगी के होंठों पर 'मेद भरी मुस्कान उभरी थी--------" बताऔ मुझे । चुप क्यों हो गए?"

लयों कसमसाया ।

होंठों से बोल न फूट सका ।

वह गलती कर चुका था ।

"कितनी महत्त्वपूर्ण फोन कॉल थी वह?” प्रताप आगे बढ़कर उसके सामने पहुंचता हुआ बोला-------" जो उन दहशतगर्दों से सम्बंध रखती थी, जो निरंजन को खत्म करना चाहते हैं । ऐसी सन्देदनशील खबर के बारे में तो तुम्हें फोरन अपने उच्चाधिकारियों को बताना चाहिए था, मगर तुमने तो लगता है, उस बारे में किसी को भी कुछ नहीं बताया । अब भी बताना नहीं चाहते थे, मगर जुबान फिसल गई । मैंने कुछ गलत कहा क्या?"

प्रताप के चुप होते ही गिरीश बोला------" बैसे यहाँ अाने से पहले अपने अॉफिशियल रिकार्ड में तो तुमने अपनी रवानगी जरूर ही दर्ज की होगी! रोज़नामचे में लिखा होगा कि तुम कहां जा रहे हो------क्यों जा रहे हो! लिखा है न इंस्पेक्टर साहब या. . .उसमें भी नहीं लिखा?"

"नहीं लिखा ।" एसीपी लेगी उसे घूरता हुआ बोला----“मैंने थाने में फोन करके तस्दीक कर ली है । यह किसी को कुछ भी बताए बगैर चुपचाप यहाँ आया है और बिल्कुल अकेला आया है ।" नेगी ने बेहद कड़ी नजरों से आर्या को देखा-----" बातें तो अभी और भी बहुत है इंस्पेक्टर लेकिन अगर महज इतने की ही बात की जाए तो जानते हो इन सारी बातों का क्या मतलब निकलता है!"

आर्या ने सूखे होंठों पर जुबान फिराई ।

उसे अपना खेल खत्म नजर आने लगा था ।

"यह कि तुम कमीने हो ।" लेगी बिफरकर बोला------“गद्दार हो------देश के दुश्मनों से मिले हुए हो । मुल्क की जान और उसकी सुरक्षा से ही जो सनसनीखेज खबर तुम्हें सबसे पहले अपने महकमे को देनी चाहिए थी, वह तुम देश के दुश्मनों को दे रहे हो ।"

आर्या ने तमककर चेहरा उठाया ।

"सिर नीचे रख जलील इंसान ।" नेगी धिक्कारत्ते हुए नफरत से बोला----------गद्दार और देशद्रोहियों का उठा हुआ सिर अच्छा नहीं लगता । * अजरा बेगम और आसिफ * के घर सबसे पहले तू ही अपनी टीम के साथ पहुंचा था और तूने उनके घर से वे सारे साक्ष्य मिटाने का भरसक प्रयास किया था, जो उन्हें टेरेरिस्ट साबित करते थे । बाद में फरीदाबाद की उस सुनसान जगह पर भी सबसे पहले तेरे ही कदम पड़े थे और तूने वहां भी गुल खिलाया था । तुझे लगा कि तू कामयाब हो गया है------तू जो गुल खिला रहा हैं उस पर किसी को भी शक नहीं हुआ है । बोल यही सोचा था न तू ?

"सिर नीचे रख जलील इंसान ।" नेगी धिक्कारत्ते हुए नफरत से बोला----------गद्दार और देशद्रोहियों का उठा हुआ सिर अच्छा नहीं लगता । * अजरा बेगम और आसिफ * के घर सबसे पहले तू ही अपनी टीम के साथ पहुंचा था और तूने उनके घर से वे सारे साक्ष्य मिटाने का भरसक प्रयास किया था, जो उन्हें टेरेरिस्ट साबित करते थे । बाद में फरीदाबाद की उस सुनसान जगह पर भी सबसे पहले तेरे ही कदम पड़े थे और तूने वहां भी गुल खिलाया था । तुझे लगा कि तू कामयाब हो गया है------तू जो गुल खिला रहा हैं उस पर किसी को भी शक नहीं हुआ है । बोल यही सोचा था न तू ?

"न. . . . .नही सर ।" आर्या थूक गटककर सूखे होंठों पर जुबान फिराता हुआ बोला-----एेसी कोई बात नहीं है । म......मैं . .

"मिमिया मत आर्या और सच बता ।" नेगी कहर भरे स्वर में गुर्राया था…“केवल सच ।"

'"म.......मैं क्यूल करता हू कि मैंने आसिफ और अजरा बेगम के यहां मौजूद साक्ष्यों से छेड़छाड़ की । वहां फ़र्जी सबूत प्लांट किए ।"

नेगी और प्रताप की निगाहें एक--दूसरे से मिलीं ।

"लेकिन ।" तभी आर्या आगे बोला…“आप उल्टा बोल रहे है । वे सारे साक्ष्य उन दोनों के आतंकी न होने के लिए नहीं, बल्कि आतंकी साबित करने को थे ।"

पहले तो उनमें से किसी की समझ में ही न आया कि आर्या ने क्या कहा था । जब आया तो सभी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे ।

नेगी चिहुंककर आर्या से बोला-----" यह तू क्या बक रहा है? तूने वहां अजरा और आसिफ को आतंकी साबित करने वाले सबूत प्लांट किए थे, उसे आतंकी न साबित करने वाले नहीं?”

"हां । गुलशन राय और उसकी टीम को उन दोनों के आतंकी होने के जो साक्ष्य वहां से बरामद हुए थे, वे सारे के सारे फ़र्जी थे और मेरे द्वारा प्लांट किए हुए थे ।"

"ओह नो !" नेगी एकाएक काफी उत्तेजित हो उठा था । प्रताप, गिरीश और भल्ला का भी वैसा ही हाल था----“तू जानता है इसका क्या मतलब हुआ ?"

" क्या ?"

"इसका सीधा और साफ मतलब यह हुआ कि आसिफ और अजरा बेगम आतंकी नहीं थे और जब वे दोनों आतंकी ही नहीं थे तो फिर उन लोगों के द्वारा मुस्तफा और उसके साथियों को पनाह देने का भी सवाल नहीं उठता?"

"व…वे आतंकी थे या नहीं, मुझे नहीं पता । लेकिन मुस्तफा और उसके चारों साथियों को उन दोनों ने यकीनन अपने यहां पनाह दी थी और उनकी हर मुमकिन मदद भी की थी ।"

"य. . .यह भला कैसे हो सकता है?" प्रताप तीखे स्वर में बोला ।

“मुझें नहीं पता, लेकिन यह सच है---------मुस्तफा और उसके चारों साथियों ने वहां पनाह हासिल की थी । इस वात के साक्ष्य वाकई वहां पर मैजूद थे और उन साक्ष्यों से मैंने कोई छेड़खानी नहीं की थी ।"

" कैसे करता तू उन साक्ष्यों से छेड़खानी? गिरीश बोला-------" वे तो तेरा ही काम आसान वना रहे थे!"

आर्या ने जवाब न दिया ।

"क्या तू सच कह रहा है आर्या ?" नेगी बोला-----'' क्या तेरी बातों पर भरोसा किया जा सकता है?”

" हां ।" आर्या ने मजबूती के साथ सहमति में सिर हिलाया-----"सच कह रहा हूं सर ।"

"यह नामुमकिन है ।" भल्ला प्रतिरोध भरे स्वर में बोला…“अगर अजरा और आसिफ आतंकी नहीं थे, तो उन्होंने मुस्तफा की मदद क्यों की----उसे और उसके साथियों को अपने यहाँ पनाह क्यों दी?"
 
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