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गद्दार देशभक्त complete

“यहां भले ही चीन की समुद्गी सीमा नहीं है, लेकिन तुम शायद नहीं जानते कि चीन ने अपना एक बड़ा नौसैनिक अड्डा ग्वादर ने वना रखा है, जो कि करांची में ही आता है । सामने की तरफ़ से थोड़ा अागे बढ़ते ही ग्वादर के इलाके की सीमा शुरू हो जाती है, जहाँ चीन की सशक्त नेवी पूरी तैयारी के साथ बैठी हुई है और जो पलक झपकते ही हमारे पोत को तबाह करने की ताकत रखती है । तीसरी तरफ़ से फिर करांची की सीमा शुरू हो जाती है, वहां तैनात नापाक की गश्ती बोटे यहां से भी नजर आ सकती हैं ।"

वे बातें मुस्तफा भी सुन रहा था और उसके खून से सने होंठों पर एक कुटिल मुस्कराहट उभर आई थी ।

“हूं !" होलकर ने गम्भीरता से हुंकार भरी-यह तो हमारी सोच से भी ज्यादा सेंसेटिव जोन है । दुश्मनों ने काफी सोच-समझकर जगह चुनी है ।“

"अब मेरे लिए क्या हुक्म है?” कैप्टन ने पूछा ।

“लंगर डाल दो और अगले आदेश का इंतजार करो ।"' ।

"ठीक है ।”

“और जहाँ तक भी देख सकते हो, हर तरफ़ बेहद पैनी निगाह से देखो । हमे एक पल के लिए भी असावधान नहीं होना है ।"

“बेहतर ।"

कैप्टन जाने को मुड़ा ही था कि होलकर का सेटेलाइट फोन ब्लिंक करने लगा । होलकर कैप्टन से कहा------" जरा ठहरो कैप्टन ।"'

कैप्टन ठिठका और उत्सुक निगाहों से होलकर को देखने लगा ।

होलकर ने फोन अॉन किया ।

"उधर क्या चल रहा है आफिसर?” कान से आईबी चीफ़ बलवंत राव का अधिकार भरा स्वर टकराया।

“सब ठीक है चीफ़ ।" होलकर सावधान स्वर में बोल----" हम मंजिल पर पहुच चूके हैं ।"

"हम देख रहे हैं ।" बलवंत राव बोला----"शिप हर पल हमारे रडार पर है । तुम विल्कुल सही वक्त पर मंजिल पर पहुंचे हो । मगर सावधान रहना, वह हमारी समुद्गी सरहद का बहुत सन्वेदनशील इलाका है । तुम्हारे शिप पर पाकिस्तान के साथ…साथ चीन की भी नजरें लगी हैं । कोई गलती मत कर बैठना । सब कुछ वैसे ही होना चाहिए जैसे प्लान किया गया है ।"

“आप चिंता न करें सर । सब कुछ बिल्कुल वैसे ही हो रहा है लेकिन अब अागे क्या करना है?"

"जाहिर है कि इंतजार ही करना होगा । अच्छे मूवमेंट को लेकर दूसरी तरफ़ से अभी कोई मैसेज नहीं मिला है । जैसे ही मिलेगा तुम्हें फारवर्ड कर दिया जाएगा लेकिन एक बात अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लो, जब तक तुम्हें चांदनी मेडम नहीं दिखती, तुम्हें दुश्मन को मुस्तफा का दीदार हरगिज नहीं कराना है । अगर चांदनी हमारी कमजोरी है तो मुस्तफा दुश्मन की कमजोरी है । जैसे हम चांदनी की जान को जोखिम में नहीं डाल सकते बैसे ही दुश्मन मुस्तफा की जान को जोखिम में नहीं डाल सकता । समझे?"

" यस सर ।"

"तुम्हें जरा भी फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं है । अगर तुम्हारा शिप दुश्मन के निशाने पर है, तो हमने भी आंखें बंद नहीं कर रखी हैं । हमारे सेटेलाइट भी हर तरफ़ अपनी गिद्ध---दृष्टि जमाए हुए हैं । मजबूरी वश बात अगर ताकत और मुकाबले पर जाएगी तो दुश्मन मुंह की खाएगा । मजे की बात यह है कि दुश्मन इस सच को जानता है और शायद इसीलिए वो नौबत नहीं आएगी । ओवर ।"

" आलराइट सर ।"

"ओवर एंड आल ।"

फोन डिस्कोक्ट हो गया ।

होलकर ने फोन कान से हटा लिया ।

कैप्टन अपलक उसे ही देख रहा था ।

“हम थोडी देर में डेक पर पहुच रहे है ।" होलकर उससे बोला-----" तुम हमें वहीं मिलो ।"

कैप्टन ने सहमति में सिर हिलाया ।

फिर वह वापस घूमा और वहां से चला गया ।

मुस्तफा जख्मी सांप की तरह अपनी सुर्ख आंखों से होलकर और रत्नाकर को देख रहा था । इधर, होलकर और रत्नाकर की नजरें मिलीं । आंखों ही आंखे में बाते हुईं और फिर वे मुस्तफा से दूर, एक एकांत कोने में चले गए ।

" हम दोनों ही अपने वतन के वफादार सिपाही है अॉफिसर ।" रत्नाकर दबे स्वर में होलकर से बोला----“ओंर यह जरूरी नहीं कि वतन का वफादार हुकूमत का भी वफादार हो ।"

"कहना क्या चाहते हो देशपांडे ?" होलकर ने पूछा ।

“मुस्तफा सिर्फ दहशतगर्द नहीं, एक डायनामाइट है । इसके दिल में हिंदुस्तान के लिए नफ़रत नहीं, जहर भरा है, घृणा भरी है । अगर यह आजाद हो गया, तो देख लेना, मुल्क में दहशतगर्दी का ऐसा भयानक अंधड़ उठेगा, जो बेगुनाहों के खून से हमारे वतन की जमीन को सुर्ख कर देगा ।"

होलकर कसमसाया…""म. . .मैं जानता हूं !”

"जानते हो, फिर भी सरकार के वफादार बनकर दिखा रहे हो ।" रत्नाकर हैरान हुआ था ।

“दूसरे शब्दों से मुझे बगावत की बू नज़र आ रही है देशपांडे ।"

" सूंघा तुमने ?"

"मुझसे क्या चाहते हो?"

“क्या मेरी चाहत पूरी होगी?"

"चाहत जानने के बाद ही बता पाऊंगा ।"

"तो फिर सुनो ।" रत्नाकर निर्णायक स्वर में बोला-----'"यह खूनी दरिंदा यहाँ से जिंदा वापस नहीं जाना चाहिए ।"

"चांदनी मैडम की कीमत पर भी नहीं?" उसने पूछा !

"चांदनी सिंह को बचाने की पूरी कोशिश करेगे ।”

"हम इस वक्त वहुत खतरनाक जगह पर खड़े है ।”

"आईबी के आंफिसर होकर जोखिम से डरते हो!"

"डरना तो हमें सिखाया ही नहीं जाता ।”

"तो फिर तुमने कहाँ से सीख लिया ।"

"मैँ डर नहीं रहा देशपांडे बल्कि सोच रहा हूं कि जो हम करना चाहते हैं उसके बाद दोनों मुल्कों में कितना बडा़ बवंडर उठेगा !"

"उसके बारे में मत सोचो ! अपना फैसला बताओ ।”

“वही, जो तुम चाहते हो?"

"साफ-साफ़ बताओ ।"

"मुस्तफा जिंदा नहीं जाएगा ।"



रत्नाकर का चेहरा हजार बांट के बल्ब की तरह चमक उठा ।

वह खुशी से चहकता हुआ बोला.........…“ये हुई न बात । मगर...........

"मगर ?"

"होग कैसे ये ?"

होलकर बोला…....“मेरे दिमाग में प्लान है ।"

"क्या ?"

"वक्त आएगा तो बता दूगां ।"

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शंकरलाल का पूरा नाम शंकरलाल कौशिक था । वह पचास साल की उम्र का गैंडे जेैसी डील…डौल वाला शख्स था ।

उसकी गिनती मुबई के माफिया डॉन उमर जहांगीर के चुनिंदा विश्वास पात्र लोगों में होती थी । इस वक्त वह फोर्ट के इलाके में स्थित अपने आलीशान आँफिस में था । वह आँफिस भी अंडरवर्ल्ड की ही सम्पत्ति थी मगर प्रत्यक्ष में एक प्रतिष्ठित एक्सपोर्ट इम्पोर्ट कम्पनी की मानी जाती थी ।

शंकरलाल के हाथों में कुछ कागजात थे । वे कागजात जो कुछ ही देर पहले उसकी ई-मेल आई डी पर आए थे ।

उसका अॉपरेटर प्रिंट निकालकर दे गया था ।

उनमें एक रंगीन फोटाग्राफ भी था ।

फोटो राजा चौरसिया का था ।

फोटोग्राफ का मुआयना करने के बाद शंकरलाल कौशिक ने प्रिंट आउट को पढ़ा ।

लिखा था-------

यह तुम्हारा अगला संभावित टार्गेट है कौशिक यह एक कुख्यात देसी कम्पूटर हैकर राजा चौरसिया है ।

पिछले तीन दिनों से नबाब की खुफिया प्रयोगशाला में बैठा उसका काम का रहा है ! राजा चौरसिया हिंदुस्तान कै साइबर क्राइम वर्ल्ड का एक कुख्यात नाम है और इसके हुनर के जितने किस्सें आज तक सुने हैं, उनकी रोशनी में कह सकता हूं कि इसकी नाकामी के चांस बहुत कम हैं !

यह भी सम्भव है कि चौरसिया अपने काम को अंजाम देने में कामयाब हो चुका हो । लिहाजा, हम कह सकते हैं कि हमारी मंजिल बेहद नजदीक है और मुझे पुरा यकीन है यह तुम्हारे लिए मेरा आखिरी काम होगा ।

इस काम की पेशगी रकम तुम्हारे पास पहुचाई जा चुकी है ।

नवाब की मांद से निकलने के बाद मुम्बई की सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए ! यदि मैरी सम्भावना खरी उतरती है यानी चौरसिया सचमुच नवाब का काम करने में सफ़ल हो गया है तो फिर तुम्हें उसे कत्ल नहीं करना है !

तब मैं उसे लेने खुद मुम्बई अाऊंगा । अगर वह कामयाब नहीं हुआ तो तुम जानते ही हो क्या करना है ।

पर याद रहे, इस बार उसकी लाश पुलिस के हाथ नहीं लगनी चाहिए । क्योंकि इससे पहले जिन कम्यूटऱ हेर्क्स को तुमने कत्ल किया था, मेरी सारी उम्मीदों के खिलाफ उनकी शिनाख्त उजागर हो चुकी है और खुफिया विभाग से जुडे़ लोगों के कान खड़े हो चुके हैं ।। ऐसे में इस चौथे कम्पूटर हैकर का कत्ल भारी मुश्किल खड़ी कर सकता है जो मुझे मंजुर नहीं होगा ।

नवाब की मुझे कोई फिक्र नहीं लेकिन खुफिया या पुलिस की तवज्जो इस मामले की तरफ नहीं जानी चाहीए-----जितनी जा चुकी हैं, उससे ज्यादा तो बिल्कुल नहीं, वैसे तो तुम उसे रोकने में सक्ष्म हो, फिर भी अगर कोई मुश्किल आए खबर करना , मैं संभाल लूंगा ! ईधर दिल्ली का कोई काम निकले तो जरूर बताना । और हां जहांगीर भाऊ को मेरा सलाम कहना मत भूलना !

डबल एस !!!!

कौशिक ने एक बार फिर राजा चौरसिया का फोटो देखा, फिर दोनों चीजें मेज पर रख दी ।

दिमाग तेजी से कुछ सोचने लगा था ।

डबल एस के बारे में उसे मालूम था कि दिल्ली के अंडरवर्ल्ड में उसकी वही हैसियत है जो मुम्बई में उमर जहांगीर की है । नवाब खान के खिलाफ उसने जो कुछ भी किया था, डबल एस के लिए ही किया था और यह कोई नई बात नहीं थी । अगर जहांगीर आर्गेनाइजेशन का दिल्ली एनसीआर में ऐसा केई वाम निकलता था तो उसे डबल एस बखूबी अंजाम देता था । साउथ में भी ऐसा ही एक अन्य क्राइम आर्गेनाइजेशन अपने

पांव पसारे हुए था और समुचे देश में आर्गेनाइज्ड क्राइम के सूरमाओं की जमात का वह नेटवर्क ही काम कर रहा था ।

वक्त तथा जरूरत के हिसाब से कारोबारी तौर पर सभी एक-दूसरे पर निर्भर थे और एक-दुसरे के काम अाते थे ।

नवाब खान भी मुम्बई के अंडरवर्ल्ड में जहांगीर जैसी बुलंद हैसियत रखता था और सारा शहर जानता था कि ताकत के मामले में वह जागीर से किसी भी तरह कमजोर नहीं है लेकिन अंडरवर्ल्ड किंग बनने में उसने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी ।

डबल एस ने जो काम सौंपा था, वह उसे कोई वहुत बडा़ काम नहीं लगा था मगर जब से कम्यूटर हैकर्स के कत्ल के सिलसिले में आईबी का दखल हुआ था, कौशिक के कान खडे हो गए थे ।

उसे साधारण मामले में गहरा पेच नजर आने लगा था ।

उबल एस ने उसे कुछ भी खास नहीं बताया था लेकिन जुर्म के दुनिया का तजुबेकार कौशिक समझ गया था कि मामला गहरा है । उसे लग रहा था कि जरूर कोई गहरा पेच है । ऐसा पेच, जिसे डबल एस उससे छुपा रहा है । कौशिक का दिमाग कहता था कि सारे मामले में कहीं न कहीं उसके अपने आर्गेनाइजेशन का भी हित छुपा है क्योकि राजा राजा चौरसिया हैकिंग के जरिए बैंकों का खजाना खाली करने में माहिर था ।

अर्थात् मामले में करोडों रुपयों का दखल सम्भव था ।

उसे बार-बार लग रहा था कि डबल एस शायद किसी मोटी रकम को अकेला हजम कर जाना चाहता है ।

वह जानना चाहता था कि जो उसे लग रहा है उसमें दम है या नहीं । इस बारे में वह चाहता तो डबल एस से सवाल कर सकता था लेकिन डर था कि यह बिगड़ न जाए । केवल नवाब खान ही ऐसा बचता था, जो उस राज से पर्दा हटा सकता था । लिहाजा उसने अपनी सोच का फोकस नवाब की तरफ घुमा दिया ।

कौशिक जैसे लोग अपने समकक्ष प्रतिद्वद्धियों के अंदर से असंतुष्ट आदमियों की लिस्ट हमेशा अपने पास रखते थे । किसी क्राइसिस में फंसे लोंगों का नाम भी उस लिस्ट में शामिल होता था । ऐसे खास लोगों की लिस्ट आर्गेनाइजेशन के बेहद काम आती थी ।

कौशिक ने हाल ही में उस लिस्ट से कुछ नाम छाँटकर अपने एक लेफ्टिनेट राकेश सिंघल को दिए थे और उनमें से किसी को शीशे में उतारने का काम सौपा था, ताकि उससे अपने मतलब की जानकारी हासिल की जा सके और अब, डबल एस द्वारा सौंपे गए, राजा से जुडे़ काम के कारण वह काम और भी जरूरी हो गया था । इसलिए, कौशिक ने राकेश सिंधल के मोबाइल पर फोन लगाया ।

दुसरी तरफ से फोरन जवाब मिला ।

"काम का क्या हुआ सिंघल?" उसने सवाल किया ।

सिंघल की आबाज-“कौन-सा काम सर?"

"नवाब का कोई आदमी काबू मे आया या नहीं?"

"मैं कभी नकामयाब हुआ हूं सर ! ''

"शाबाश । कौन है वो?"

"जगनलाल । नवाब का खास आदमी है । गैंग में व अंदर तक पकड़ रखता है । नवाब के ज्यादातर राज उसे मालूम हैं ।"

"नाम सुना हुआ है । उसकी समस्या क्या है?”

"उसकी इकलौती बेटी !"

"क्या हुआ उसे?"

"कनाडा में सैटल्ड है । वहां बहुत बडी़ डॉक्टर है । उसकी प्रैक्टिस अच्छी जमी हुई है । जगन अपने काले धंधों से जितना यहां कमाता है उससे कई गुना ज्यादा वह अपनी सीधी साफ प्रैक्टिस से कनाडा में कमा लेती है । बाप के अलावा बेटी का दुनिया है दूसरा कोई नहीं है । वह अपने बाप के काम के बारे में भी जानती है इसीलिए चाहती है कि वह काली दुनिया को छोड़कर उसके पास कनाडा आ जाए । खुद जगन भी बेटी के पास जाना चाहता है लेकिन नवाब को यह मंजूर नहीं ।"
 
"होना भी नहीं चाहिए । सिंडीकेट के इतने सारे राज जानने वाले को नवाब भला कैसे खुला छोड़ सकता है!"

"नवाब ने उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया है । इस बात को लेकर जगन अपने बिग बॉस से वहुत ज्यादा खफा है !"

"जगन फर्जी पासपोर्ट का इंतजाम नहीं कर सकता?”

"नवाब के सिंडीकेट के खिलाफ़ जाकर नहीं, सिंडीकेट ही जगन की ताकत है ।"

"हूं !" कौशिक ने हुंकार भरी…"तुमने जगन को यकीन दिलाया होगा कि तुम उसके कनाडा जाने का बंदोबस्त कर सकते हो?"

"वह भी उसकी सारी जमा पूंजी के साथ । इसके अलावा उसे और किसी तरह काबू में नहीं किया जा सकता था !"

"अभी कहाँ है जगन ?"

"मेरे एक फोन पर हाजिर हो जाएगा । कब हाजिर करू ?"

" अभी--------इसी वक्त ।"

"ऐसा? "

"हां ।"

"आधे घंटे मैं उसे लेकर आपके हुजूर में पेश होता हूं ।"

“उससे भी पहले पहुचने की कोशिश करना ।"

"ठीक है ।"

कौशिक ने फोन काट दिया ।

सिंघल बीस मिनट में कौशिक के पास पहुंच गया ।

जगनलाल पचास साल का एक तंदुरुस्त व्यक्ति था ।

वह झिझकता---सकुचाता और आशंकाओं से घिरा हुआ कौशिक के सामने, मेज के इस तरफ, कुर्सी पर बैठ गया ।

"आपको मुझे यहां नहीं बुलाना चाहिए था कौशिक साहब ।'" वह व्यग्र भाव से पहलू बदलता हुआ बोला-----“किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा ।"

" कुछ नहीं होगा ।" कौशिक ने उसे आश्वस्त किया------"कम से कम यहां मोजूद मेरे सभी आदमी विश्वसनीय हैं ।"

“मैं उसूलन नमकहराम नहीं है ।" जगनलाल जैसे अपनी सफाई देने की गर्ज से बोला-------“गद्दारी मेरे खून में नहीं है लेकिन...

"मुझे पता है ।" कौशिक उसकी बात बीच में काटता हुआ बोला था-----------"कोईं नमकहराम और गद्दार नबाब के गिरोह में इतना ऊपर तक पहुच भी नहीं सकता । तुम अगले हफ्ते कनाडा में अपनी लाड़ली बेटी पास होगे ।"

"आपका यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगा कौशिक साहब ।" वह आभार भरे स्वर में बोला-----“शुक्रिया ।"

"एहसान नहीं! यह तो एक डील है------सौदा है, जो मैं करूंगा । उसकी कीमत तो तुमसे पहले ही हासिल कर रहा हूं ।"

"आप ऐसा सोचते हैं, यह आपका बडप्पन है ।”

"आजकल नवाब किस फिराक में है?" कौशिक ने मतलब का सवाल किया-----" मुझे पता है वह साइबर क्राइम के मोड्स आपरेंडी के धंधे में नहीं है, फिर भी दुनिया भर के कुख्यात कम्यूटर हैकर्स को मुम्बई में इकट्ठा कर रहा है । राजा चौरसिया उसका नया बकरा है । आखिर क्या खेल चल रहा है नवाब के खेमे में?”

"क्या आप केवल यही जानना चाहते हैं?”

"हां ।"

आपका इस मामले में क्या दखल है? मेरा मतलब है कि. . . . . . .

“वगेर सवाल किए जवाब दो तो बेहतर होगा ।"

जगनलाल का चेहरा गम्भीर हो गया बोला------"नवाब का उस काम में कोई दखल नहीं हे ।"

"फिर? "

"किसी और का दखल है, जिसके बारे में नवाब के अलावा और कोई नहीं जानता । वह उसी शख्स के लिए यह सब कर रहा हैं?”

"माजरा क्या है?"

"आप चौंक पड़ेगे ।"

"चौंकाओ ।"

"माजरा बीस हजार करोड़ का है ?"

"क . . .क्या?" कौशिक के हलक से चीख निकल गई-----"ब--बीस हजार करोड ! बीस हज्जार करोड !"

सिंघल का दिमाग तो अंतरिक्ष में तैरने लगा था ।

वह जगनलाल की तरफ ऐसी नजरों से देख रहा था जैसे उसे संसार का सबसे बड़ा गप्पी समझ रहा हो जबकि उसने अहिस्ता से कहा था------“हां, बीस हजार करोड !"

"पूरा किस्सा बताओ ?"' कौशिक संभलकर बैठ गया-----"कहां चौपट पड़ा है यह बीस हजार करोड़ रुपया मुम्बई मे?"

"वह सारा का सारा रुपया एक स्विस एकाउंटिंग सिस्टम जैसे किसी विदेशी बैक में पड़ा है और जिसका वह एकाउंट है, वह इंसान अब इस दुनिया में नहीं है ।”

" कौन था वह?" कौशिक ने उंत्सुकतापूर्वक पूछा----“इतनी वड़ी रकम उसके पास कहां से अाई !"

"इस बारे में मुझे कुछ नहीं पता । मेरे खयाल से यह बात है नवाब को भी नहीं मालूम होगी । दुनिया जानती है कि स्विस बैकिंग सिस्टम जैसे दुनिया भर के सारे बैक एकाउंट, उनके एकाउंट होल्डर से नहीं बल्कि उसके यूजर नेम और पासवर्ड से आपरेट किए जाते हैं है यानी एकाउंट होल्डर दुनिया में रहे या न रहे, उसका यूजर-----नेम और पासवर्ड जिसके पास होगा, वह उस एकाउंट को अॉपरेट कर सकता है, एक तरह से वही उस एकाउंट का मालिक है ।"

"क्या मरने से पहले उस अादमी ने अपने एकाउंट का पासवर्ड किसी को बता दिया था ?"

“बता दिया होता तो फिर यह सारा बखेड़ा ही क्यों होता! मेरा मतलब है तब इस मामले में कम्यूटर हैकर्स का दखल क्यों होता?"

"नवाब वह पासवर्ड कैसे हासिल करना चाहता है? क्या दुनिया का कोई कम्यूटर हैकर स्विस बैंकिंग जैसे सिस्टम वाले किसी बैंक एकाउंट का पासवर्ड हैक कर सकता है?”

"नामुमकिन ।"

“नवाब क्या नामुमकिन को मुमकिन करने निकला है?"

“बात दरअसल यह है सर कि उस स्विस एकाउंट का यूजर नेम और पासवर्ड इंटरनेट के किसी खास प्रोग्राम में छुपा दिए गए हैं ।"

"कौन-से खास प्रोग्राम में?"

" यह पता लगाना ही वह काम है जो नवाब उन कम्यूटर हैकर्स से करवाना चाहता है और यह काम नामुमकिन नहीं है ।"

"मुझे तो मुमकिन भी नहीं दिखता ।" कौशिक बोला----“इंटरनेट पर हजारों नहीं लाखों प्रोग्राम होते हैं । फिर यह कैसे मालूम होगा कि कौन से प्रोग्राम में पासवर्ड छुपाया गया है?"
 
"माफ करें कौशिक साहब, ये काम कठिन तो है पर नामुमकिन नहीं है, किसी एकाउंट को हैक करने वाले काम जैसा नामुमकिन नहीं है । इसीलिए नवाब ने यह काम अपने हाथ में लिया और उसे करने की कोशिश कर रहा है ।"

कोशिक के दिलोदिमाग में हलचल मच गई थी-----" तो यह बात है । नवाब इतनी बड्री रकम अकेले ही डकार जाना चाहता है ।"'

"नहीं कौशिक साहब । मैं बता चुका हूं , नवाब यह काम किसी और के लिए कर रहा है ।"

"क्या तुम्हें यकीन है कि अगर नवाब ने पासवर्ड हासिल कर लिया तो वह हजार-दो हजार करोड़ लेकर तसल्ली कर लेगा? वकोह, पूरा बीस हजार करोड़ रुपया हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा ?"

"नवाब अपने क्लाइंट के साथ कभी धोखा नहीं करता । वह जो भी कान्ट्रेक्ट अपने हाथ में लेता है, उसे ईमानदारी से पुरा करता है ।"

" यानी वह अपने क्लाइंट से धोखा नहीं करेगा और कामयाब होने के बाद उससे तयशुदा रकम लेकर पूरा बीस हजार करोड़ रुपया अपने क्लाइंट के हवाले कर देगा?"

"ठीक कहा आपने !"

"बीस हजार करोड़ की रकम ऐसी है तो नहीं कि ईमानदार आदमी ईमानदार ही बना रहे । फिर भी, यकीन कर लेता हूं !"

जगनलाल खामोशी से उसे देखता रहा ।

"तो तुम उस आदमी के बारे में नहीं जानते जिसके लिए नवाब ये काम कर रहा है?"

“वो तो मैं आपको बता ही चुका हूं ।”

"कोई अंदाजा ?"

"अंदाजा ?"

"जो कि नवाब के वफादार को हो जाना कोई बड़ी बात नही है । जिस माहौंल में और जिसके साथ हम हर समय रहते हो, उसके बारे में कुछ भी न जानने के बावजूद वहुत कुछ जान जाते हैं ।"

"यह तो अंधेरे में तीर चलाने जैसा होगा ।”

"चलाओ ।"

"मेरे खयाल से नवाब का वह क्लाइंट जरूर किसी टेरेरिस्ट ग्रुप का अादमी होना चाहिए ।"

"इस खयाल की वजह?"

"मैं यह तो नहीं कह सकता कि जो मुझें लग रहा है वो सच ही है मगर मैंने कुछ चीजो को जोड़कर नतीजा निकाला है ।”

" क्या ?"

"आज की तारीख में जो दुनिया का सबसे खूंखार व खतरनाक आतंकी संगठन है, उसका नाम तो आपको मालूम होगा ही!"

"अलकायदा ।"

"नहीँ । लादेन की मौत और अमरीका की लगातार बमबारी ने अलकायदा की कमर तोड़ दी है । आज दुनिया के सबसे खतरनाक और ताकतवर आतंकी संगठन का नाम अाईएसअाईएस है ।"

"ओह हां, याद आया । यह संगठन हाल ही में उभरा है । उसका पूरा नाम इस्लामिक स्टेट आंफ़ ईराक एँड सीरिया है ।"

“आज़ यह संगठन अाधे सीरिया के बाद आधे से ज्यादा ईराक पर काबिज हो चुका है ।”

"तो क्या वह आतंकी संगठन आईएसआईएस है जो. . .

“इतनी जल्दी नतीजे पर न पहुंचें सर, मुझें नहीं लगता कि नवाब का क्लाइंट अाईएसआईएस है ।"

" तो? "

"दरअसल अाईसआईएस ने ईराक के अंदर भारी मात्रा में मौजूद युद्धक हथियारों की बड़ीं व्यापक लूटपाट की है ।"

"तुम्हारा मतलब किसी खास हथियार से है?”

"बहुत ही खास ।”

“क्या नाम है उसका?"

"नहीं मालूम । लेकिन इतना जरूर मालूम है कि वह हथियार वहुत ही खास और दुर्लभ है । यह सारी दुनिया में केवल अमरीका और रूस के बाद किसी भी तीसरे मुल्क में नहीं है, यहां तक कि चाइना के पास भी नहीं ।"

"तो ईराक के पास कहां से आया?"

“न भूंले सर कि कई सालों से ईराक की जमीन पर अमरीका का कब्जा रहा है । वहां के तानाशाह शासक को पकड़कर फांसी पर चढ़ाने के काफी बाद तक भी अमरीकी फौजें ईराक में ही डेरा डाले रही हैं और उसका युद्ध से जुड़ा तमाम साजो सामान भी ईराक में ही चारों तरफ फैल रहा है । कहा जाता है कि ईराक के ही एक आंतकी गुट ने कुछ अमरीकी सैनिकों को मारकर वह हथियार हासिल किया था, मगर वह उसका इस्तेमाल करना नहीं जानता था । इस वक्त वह आईएसआईएस के पास है और वह उसका सौदा करना चाहता है ।"

"किससे सौदा करना चाहता है?”

"जो भी माकूल कीमत देगा, चाहे यह किसी की सरकार हो या कोई आतंकी । वैसे इस मामले में आईएसआईएस की पहली चायस किसी इस्लामिक टेरेरिस्ट गुप है ।"

“इस्लामिक टेरेरिस्ट ग्रुप ही क्यों?"

" --क्योंकि आईएसआईएस खुद को एक जेहादी संगठन मानता है और दुनिया के तमाम आतंकी ग्रुप उसके लिए जेहादी संगठन हैं, जिनके रास्ते भले ही अलग हों लेकिन मंजिल एक ही है ।"

" आईएसअाईएस ने उस वेपन की कितनी कीमत लगाई है?"

"सुना है------बाइस हजार करोड़ ।"

"बाइस हजार करोड़!" एक बार फिर कौशिक के हलक से चीख निकल गई थी------“क्या कह रहे हो यार, आज क्या मेरा सिर इस कक्ष के लेंटर से ही टकराकर मानोगे!"

“में क्या कर सकता हूं सर !"

"काफी दुर्लभ हथियार होगा वह?"
 
"उसकी खासियत के बारे में मुझे कुछ नहीं पता ।"

" अगर वह सचमुच कोई ऐसा ही दुर्लभ हथियार है तो खुद आईएसआईएस उसका इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा? वह उसका सौदा क्यों कर रहा है?"

"आईएसआईएस के उस हथियार के इस्तेमाल की भला अब क्या जरुरत है! वह ईराक पर करीब-करीब काबिज हो चुका है और एक नए राष्ट्र की घोषणा भी कर दी है, जिसका कि 'खलीफा' (राष्ट्र प्रमुख) भी घोषित किया जा चुका है । अब ईराक के बाकी बचे हिस्से पर कब्जा करना अाईएसआईएस के लिए कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं है । ऐसे में उस खास हथियार के इस्तेमाल का उसे कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा होगा ।"

"इसीलिए अाईएसआईएस उसे बेचना चाहता है?”

"मेरे खयाल से वे उसे इसलिए वेचना चाहते है क्योकि बेशूमार रुपया ईराक में उनकी वित्तीय हालत को वहुत मजबूत कर देगा ! देश चलाने के लिए हथियारों से ज्यादा पैसे जरूरत पड़ती हैं।"

"तो अभी तक वह बिका क्यों नहीं ?"

"आप खुद स्वीकार कर चुके है सर कि बाईस हजार करोड़ कोई मामूली रकम नहीं होती । भले ही कोई कितना बडा़ आतंकी संगठन क्यों न हो लेकिन इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कर पाना उसके लिए सम्भव नहीं है । अगर है भी तो इतनी जल्दी सम्भव नहीं है । मगर फिर भी आज दुनिया के सभी आतंकी संगठन उस दुर्लभ वेपन को खरीदने के लिए लालायित है और अपने जरिए से हर टेरेरिस्ट ग्रुप उसे खरीदने लायक रकम जुटाने की होड़ लगाए हुए हैं ! जिसमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी हमारे पड़ोसी पाकिस्तान की देखी जा रही है । अलकायदा, हिजबुल और लश्कर से लेकर जमात उल फिजा जैसे ताकतवर चरमपंथी संगठन इस दौड में शामिल हैं, जो हर कीमत पर उस वेपन को खरीदना चाहते हैं ।"

"यह तो बहुत बुरी खबर है । अगर किसी पाकिस्तानी टेरेरिस्ट ग्रुप के हाथ वह वेपन लगता है तो वह उस विनाशकारी वेपन का इस्तेमाल इंडिया के खिलाफ़ ही करेंगे ।"

"यह अलग मुद्दा है, जो सारे मुल्क से जुड़ा है ।"

"ठीक कह हो तुम ।" कौशिक ने गहरी सांस ली-------“यह सचमुच अलग मुद्दा है । इधर, नवाब को जिस बैंक एकाउंट का कांट्रेक्ट दिया गया हैं, उसमें दो हजार करोड़ का इजाफा और हो जाए तो वह बाइस हजार करोड़ हो जाएगा और यूं उस वेपन की कीमत मुकम्मल हो जाएगी । ठीक?"

"हां । जिसके हाथ उस एकाउंट का बीस हजार करोड़ रुपया लग जाएगा, उस आतंकी संगठन के लिए बाकी का दो हजार करोड़ रुपए जुटाना जरा भी मुश्किल नहीं होगा ।"

"एक तरफ़ तुम्हारे पास यह जानकारी थी कि कोई नवाब से किसी ऐसे एकाउंट की यूजर आईडी और पासवर्ड दूंढ़ने की डील किए हुए है जिससे बीस हजार करोड़ रुपए हैं दूसरी तरफ़ तुम्हें यह जानकारी थी की आईएसआईएस बाइस हजार करोड में कोई वेपन बेचने की फिराक में है और लगभग सभी आतंकी गुट उसे खरीदना चाहते हैं । दोनों को जोड़कर तुम इस नतीजे पर पहुचे कि नवाब से डील करने वाला कोई टेरेरिस्ट ही होगा ।"

"आप ऐसा कह सकते हैं ।"

कौशिक खामोश हो गया और गहराई से कुछ सोचने लगा ।

"मेरे खयाल से अपके सभी सवाल मुकम्मल हो गए है ।" जगनलाल बोला------“एतराज न हो तो मेरे एक सवाल का जवाब दे दे । और सर, जवाब सच ही दे तो ज्यादा बेहतर होगा ।"

"क्या सवाल है तुम्हारा?"

"अपने काम के लिए नवाब ने जितने भी कम्यूटर हैकर को हायर किया, उनकी नाकामी की सूरत में उसने किसी को भी जान से नहीं मारा, मगर फिर भी उन सबको चुन-चुनकर कत्ल कर दिया गया । नवाब का तो पता नहीं, लेकिन अब मुझें पता है कि यह काम किसी और का नहीं बल्कि अापका ही है । बोलिए, क्या मैं गलत कह रहा हूं?"

"तुम्हें इतने सवाल करने की इजाजत किसने दी?”

"इतने कहां, मैंने तो बस यही इकलौता सवाल किया है । अगर आप इसका भी जवाब नहीं देना चाहते तो कोई बात नहीं ।"

“हूं !"

जगनलाल ने ठंडी सांस भरी-------“नवाब का तो पता नहीं, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि अब नवाब की राह जरा भी आसान नहीं है क्योंकि उस बीस हजार करोड़ की रकम पर मुम्बई अंडरवर्ल्ड के सरगना जहांगीर की आंखे गड़ चुकी हैं । पर मुझे क्या? मैंने तो इस दुनिया से ही अपनी राह अलग कर ली है । फिर भी एक सवाल मुझे हैरान कर रहा है ।"

"कौन-सा सवाल?"

"पूछने का क्या फायदा? ज़वाब तो आप देगे नहीं!"

"फिर भी पूछो ।"

“में इस बात पर सख्त हैरान हूं कि बीस हजार करोड़ के खेल का राज अपको मेरी जुबानी मालूम हुआ है, जबकि इस राज से जुड़े एक नहीं दो नहीं पूरे तीन-तीन हैकर्स का आप फातिहा पढ़ चुके । उनकी लाशें बता रही थी कि मौत से पहले उन्हें वहुत बेरहमी से टार्चर किया गया । जाहिर है कि वह टार्चर उनसे बीस हजार करोड का राज उगलवाने के लिए ही किया गया होगा । इसके बावजूद क्या आप उनमें से किसी की भी जुबान नहीं खुलवा पाए थे?"

"अगर वे जुबान खोल देते तो मारे ही क्यों जाते?"
 
" ओह !"

"या शायद तब भी मारे जाते ।"

"आप क्या कहना चाहते हैं?"

"में उन्हें जिंदा छोड़ने की गलती नहीं कर सकता था । उस सूरत में वे हमारे द्वारा टार्चर किए जाने की सूचना नवाब को दे सकते थे और नवाब को यह सच मालुम हो सकता था कि हम उसका रास्ता काटने की कोशिश कर रहे हैं । नतीजे में हम दोनों में खून-खराबे की नौबत आ सकती थी, जो मैं नहीं चाहता था । इसमें हम दोनों का ही नुकसान होता और हासिल किसी को भी कुछ नहीं होता ।"

“राजा चौरसिया को लेकर आपका क्या खयाल हेै ?”

"उसे तुम्हें बताना जरूरी नहीं समझता ।"

"जैसा आप चाहें ।"

शंकरलाल खामोश रहा ।

पर वो बाहर से ही खामोश नजर अा रहा था ।

असल में जगनलाल ने जो बताया, उसने उसके दिलोदिमाग में जबरदस्त हलचल मचा दी थी ।

जगनलाल ने खंखारकर गला साफ़ किया फिर शंकरलाल से मुखातिब होकर बोला----" क्या अपके पास कोई और सवाल है?"

"नहीं ।" शंकरलाल धीरे से बोला-----"तुम जा सकते हो ।"

जगनलाल ने जाने का उपक्रम न किया ।

“बेफिक्र रहो ।"' शंकरलाल ने उसे आश्वस्त किया-----“जो वादा किया गया है, वह पूरा किया जाएगा । तुम्हें इस मुल्क से बाहर निकालने का इंतजाम हो जाएगा-वह भी तुम्हारी उम्मीद से पहले ।"

“शुक्रिया सर । एक बात और?"

" बोलो ?"

"यह मुलाकात राज ही रहनी चाहिए । नवाब को गलती से भी मालूम हो गया कि मैं बेईमान हो गया हूं तो अाप जानते हैं कि वह मेरा क्या हश्र करेगा! शायद मेरी लाश समंदर में तैर रही होगी ।"

शंकरलाल ने सहमति में सिर हिलाया------" मेरी तरफ़ से मैं गारंटी लेता हूं । अपनी तरफ़ का खयाल तुम्हें रखना होगा । चाय पीयोगे? "

“जी नहीं, शुक्रिया । इजाजत दीजिए ।"

कीशिक ने आहिस्ता से सिर हिला दिया ।

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होलकर, रत्नाकर, प्रताप, अमरीक तथा शेखरन डेक पर थे । उन सभी के गलों में शक्तिशाली दूरबीन लटके हुए थे । उनसे वे कई-कई बार चारों तरफ दूर-दूर तक का जायजा ले चूके थे !

अचानक कानों में गड़गड़ाहट की हल्की-----सी आवाज आई ।

शुरू में तो किसी की समझ में ही नहीं आया कि आवाज किस दिशा आ रही है लेकिन आवाज प्रतिपल तेज होती चली गई ।

फिर, यह एहसास हुआ कि आवाज आसमान से आ रही थी ।

नजरें स्वत: ऊपर उठ गई ।

दिशा का अनुमान क्योंकि तब भी नहीं हुआ था इसलिए आंखें सारे आकाश को खंगालने लगी । आवाज़ निरंतर तेज होती जा रही है थी और फिर एक हैलीकॉप्टर पोत की तरफ़ आता नजर आया ।

वह एक दू सीटर था ।

देखते ही देखते वह उनके सिरों पर पहुंच गया !

अब वह पोत के ठीक ऊपर, मुश्किल तीस फुट की ऊंचाई पर उड़ान भर रहा था और पोत के चारों तरफ चक्कर काट रहा था । प्रताप, शेखरन तथा अमरीक की पकड़ अपने हथियारों पर सख्त हो गई, जबकि होलकर के जबड़े भींच गए थे ।

"आ गए हरामजादे।” देशपांडे के दांत भींच गए ।

"हां ।” होलकर अपने सिर पर मंडराते हैलीकॉप्टर पर आखें गडा़ए बोला-----“हैलीकॉप्टर लेकर आए हैं ।"

“बहुत छोटा है । उसमें पायलट के अलावा मुश्कि्ल से दो लोग सवार हो सकते हैं । क्या चांदनी मैडम उसमें होगी?"

" देखते हैं ।"

देशपांडे ने तत्काल दूरबीन आंखों पर लगाई और उसका फोकस सैट करके हैलीकॉप्टर के शीशों से अंदर देखने की कोशिश की ।

व्यर्थ ।

शीशे स्मोक कलर के थे, यानी अंदर देख पाना मुमकिन न था ।

देशपांडे ने गहरी सांस ली और दूरबीन आंखों से हटा ली । होलकर की तरफ़ देखता बोला-------" कोई खतरे वाली बात तो नहीं ?"

"खतरा!” होलकर हंसा था-----"यहां तो हर तरफ़ खतरा-ही-खतरा बिखरा पड़ा है । बात अगर हैलीकॉप्टर की है तो उसे हवा में ही मार गिराना हमारे लिए मामूली बात होगी पर हम ऐसा नहीं कर सकते । उसमें चांदनी सिंह हो सकती हैं और हमारी सबसे बडी़ जिम्मेदारी उन्हें बचाना है ।"

तभी हैलीकॉप्टर ने लेंड होने की परमीशन चाही ।

"वे डेक पर लेंड होने की इजाजत मांग रहा हे?” प्रताप के स्वर में उत्तेजना उभर अाई थी ।
 
" हरामियों का हौसला तो देखो ।" शेखरन बोला-----“यूं बेधड़क आ रहे है जैसे शिप पर उनका बाप हेलीपैड बनाकर छोड़ गया हो ।'"

"क्या कहते हो अॉफिसर ?" देशपांडे ने होलकर से पूछा ।

" ग्रीन सिग्नल देना हमारी मजबूरी है ।"

डेक पर हेलीकॉप्टर के लेंड होने लायक जगह बना दी गई ।

हेलीकॉप्टर लेंड हुआ ।

प्रताप, शेखरन अमरीक ने उसे चारों तरफ से घेर लिया ।

उनकी एके सैंतालीस गने हैलीकॉप्टर की ओर तन गई थी ।

हैलीकॉप्टर के पंखों की रफ्तार कम हुई ।

दोनों दरवाजे एक साथ खुले और दो आदमी बाहर निकले ।

उन्हीं में से एक पायलट था ।

दोनों ने काले लिबास पहन रखे थे ।

उनके सिर तथा चेहरे भी काले गमछों से ढके थे ।

गमछे के पीछे से झांकती सुर्ख आंखें नजर आ रही थी ।

उनके हाथों में कोई हथियार नहीं था परंतु ढीले लिबास के अंदर धातक हथियारों के छिपे होने से इंकार नहीं किया जा सकता था ।

प्रताप, शेखरन और अमरीक की गनें अब उन दोनों की ओर घूम गई थी लेकिन गमछाधारी टेरेरिस्ट पूरी निडरता के साथ आगे बढ़े !

होलकर ने प्रताप को इशारा किया ।

प्रताप लपककर हेलीकॉप्टर के करीब पहुंचा । सावधानीपूर्वक उसका दरवाजा खोलकर अंदर का निरीक्षण किया ।

हैलीकॉप्टर खाली था ।

उसने होलकर की तरफ देखकर इंकार में सिर हिलाया ।

"चांदनी मेडम कहां हैं?" होलकर ने टेरेरिस्टों से सवाल किया।

गमछाधारियों ने एक….....दूसरे को देखा, फिर वे हैंस पडे़ ।

उनमें से एक ने खिल्ली उडा़ने वाले अंदाज में कहा------"क्या वह हमारे हैलीकॉप्टर में नहीं मिली!"'

"शटअप ।" होलकर ने डपटकर पूछा.......…"चांदनी सिह कहां हैं?”

"कमांडर कहां है?” पहला गमछाधारी उसी टोन में बोला ।

“मेरी जेब में ।” इस बार देशपांडे ने कहा ।

"साफ़-साफ कहो अॉफिसर कि तुम चांदनी मेडम को देखे बगैर कमांडर को हमारे सामने नहीं लाओगे !" दूसरे गमछाधारी ने कहा ।

"इसमें कहने की क्या बात है, इतनी समझ तो तुममें भी होनी चाहिए ।” होलकर धैर्य से बोला…“तुम हमें सही सलामत चांदनी मैडम के दीदार कराओ, हम तुम्हें मुस्तफा का दीदार करा देंगे ।"

"ठीक है ।"

होलकर खामोश रहा ।

दूसरे गमछाधारी के इशारे पर पहले ने अपनी जेब से एक छोटा सा मगर शक्तिशाली वाकी टाकी निकाला और उस पर कुछ कहा ।

कुछ देर बाद फिजां में किसी हैलीकॉप्टर की तेज गड़गड़ाहट गूंजी । सभी की निगाहें पुन: आसमान की तरफ उठ गई ।

वह नीले तथा सफेद रंग का एक अन्य हैलीकॉप्टर था, जो पहले हैलीकॉप्टर की तुलना में काफी बड़ा था ।

उसमें पांच छः आदमी आराम से सवार हो सकते थे और उसके शीशे भी पारदर्शी थे । वह बेहद नीचे उड़ान भरता हुआ वहां पहुचा था और पोत के चारों तरफ दायरे में चक्कर लगाने लगा था ।

उसने पोत पर लेंड होने का सिग्नल नहीं मांगा जबकि पोत के डेक पर इतनी जगह अभी भी बाकी थी कि वहाँ दूसरा हैलीकॉप्टर बड़ीं सरलता से लेड किया जा सकता था ।

"अपने गले में पड़ी दूरबीन आँखों पर लगा लो आफिसर ।" पहला गमछाधारी होलकर से बोला------------"और हेलीकॉप्टर में पायलट की तरफ़ वाली पिछली विंडो को देखो । मेरे खयाल से तुम्हारी तसल्ली हो जाएगी ।"

होलकर ने दूरबीन आंखों पर लगाई और अपने सिर पर मंडराते हेलीकॉप्टर पर बताए गए स्थान पर दूरबीन का फोक्स सेट किया !

देशपांडे ने भी अपने गले में झूलती दूरबीन संभाल ली । निर्दिष्ट जगह पर खिड़की से सटी हुई सहमी-सिकुड्री चांदनी सिंह बैठी थी !

जिंदा ।

सही सलामत ।

होलकर के चेहरे पर राहत के भाव जाए ।

उसने गोल…गोल घूमते हेलीकॉप्टर पर नजरे जमाए हुए चांदनी सिंह से जरा हटकर नज़र फिराई ।

उसकी बगल में दो एके सैंतालीसधारी मौजूद थे, उन्होंने भी अपने चेहरों पर काला गमछा ढक रखा था ।

होलकर ने एक ही पल में सारे हैलीकॉप्टर का मुआयना कर डाला । उसमें चांदनी तथा पायलट सहित कुल चार लोग थे ।

“काफी है ।" तभी डेक पर मौजूद पहले गमछाधारी का व्यंगात्मक स्वर होलकर के कानों से टकराया। वह होलकर से ही मुखातिब था…“फिलहाल इतना दीदार काफी है ।"

होलकर ने दूरबीन हटा ली ।

देशपांडे ने भी वेसा ही किया ।

"अगर तुम्हारी तसल्ली हो गई हो तो अब मुझे कमांडर के दीदार कराओ ।" दूसरा गमछाधारी होलकर से बोला ।

जवाब में होलकर तथा देशपांडे की निगाहें मिली ।

दोनो के चेहरों पर खास तरह की उत्तेजना फैली हुई थी ।

हैलीकॉप्टर जिधर से आया था, उधर ही बापस लौटने लगा ।

"अरे!" होलकर आंदोलित स्वर में बोला------'"वह वापस. . . . . . .

“घबराओ मत ओंफिसर ।” गमछाधारी इत्मिनान से बोला था-------" वह हमारा इशारा मिलते ही फिर वापस आ जाएगा ।"

"अब तुम्हारी बारी है ।" दूसरा गमछाधारी बोला ।
 
होलकर की समझते देर न लगी कि वे लोग भी पूरी प्लानिंग बनाकर आए हैं । उसने जो सोचा था, वह करना आसान न होगा ।

देशपांडे की व्यग्रता में इजाफा हो गया था ।

होलकर ने अपना सेटेलाइट निकलकर आँन किया ।

देशपांडे को लगा कि वह नीचे, शिप में मौजूद गिरीश तथा भल्ला को मुस्तफा के बारे में हुक्म देने वाला है लेकिन होलकर ने ऐसा नहीं किया । वह फोन हाथ में लिए गमछाधारियों से विपरीत दिशा वाली रेलिंग के पास पहुचा ।

देशपांडे भी लपककर उसके करीब पहुंच गया ।

"होलकर बोल रहा हूँ सर ।" उसने फोन कान से सटाकर कहा !

बलवंत राव का स्वर उभरा…................“ बोलो ।"

"चांदनी मेडम सुरक्षित हैं ।"

"मैं देख चुका हूं ।" बलवंत राव ने कहा......." उनकी तादाद भी ज्यादा नहीं लेकिन दो-दो हेलीकॉप्टर का होना उनकी पुख्ता तैयारियों की तरफ इशारा कर रहा है ।"

"वे मुस्तफा को दिखाए जाने की मांग कर रहे हैं?”

“पूरी कर दो, फोरन ।"

"अदला-बदली कैसे होगी, अभी यह निर्धारित नहीं हुआ है ।"

"पहले पहला काम करो, फिर अगला भी हो जाएगा । तुम्हारी सतर्कता में कमी नहीं होनी चाहिए ।"

"उसका तो सवाल ही नहीं उठता सर लेकिन चांदनी को लेकर हैलीकॉप्टर जा चुका है । मुझे नहीं पता कि इस वक्त वह कहाँ है? "

"फिक्र मत करों। उस पर हमारी नजर है और यह वक्त इन बातों का नहीं है । फोन डिस्कनेक्ट करके अागे की कार्यवाई करों । याद रहे, चांदनी सिंह का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए ।"

होलकर ने ठंडी सांस भरकर फोन कान से हटा लिया !

उसने देशपांडे की तरफ़ देखा, वह अपलक उसे ही देख रहा था और उसकी निगाहों में असंख्य सवाल छुपे थे ।

"सब ठीक है ।" होलकर दबे स्वर से बोला......." चांदनी सिंह को महफूज वापस पाने के लिए चीफ काफी उतावले हैं ।"

"चीफ पर हुकूमत का दबाव है और हुकूमत चांदनी सिंह को हर कीमत पर सही सलामत पाना चाहती है ।" देशपांडे फुसफुसाया था…...“निदोंष चांदनी सिंह से हमारी भी कोई अदावत है मगर हम भी आखिर इंसान हैं, जिसके अंदर जज्बात उमड़ते हैं और जिसे चोट लगने पर दर्द होता है ।"

"तुम्हारे जज्वार्तों की मुझे कद्र है देशपांडे और अपने जज्बातों की भी । जो कहना चाहते हो, वह मैं समझ रहा हूं । यकीन करो, मुस्तफा पिशाच को यहां से जिंदा जाने देने की गलती मैं कभी नहीं कर सकता । एक बार वह निकल गया तो फिर पता नहीं हमारे मुल्क को कितना नुकसान पहुंचाएगा ।"

"शुक्रिया अॉफिसर ।"' देशपांडे चैन की सांस लेता हुआ बोला । फिर अचानक ठिठका और राजदाराना स्वर में बोला---तुम्हारा प्लान आखिर है क्या? इस बारे में अभी तक तुमने मुझे कुछ नहीं बताया है । दुश्मन पूरी तरह चौकन्ना है । तुम आखिर अपने प्लान को कैसे अंजाम देने बाले हो? मुझे भी तो कुछ बताओ ।"

“अभी?"

"फिर कब बताओगे! हाईकमान ने तुम्हें मुस्तफा को बाहर निकलने का हुक्म दे दिया है ।"

होलकर एक नजर बाई कलाई पर बंधी विशिष्ट रिस्टवाच पर डाली और बोला------" तुम शायद ठीक कह रहे हो लेकिन मैं भी क्या करूं, मजबूर हूं । इन हालात में हमारा इस तरह खड़े होकर बात करना दुश्मन के दिल में संदेह पैदा कर सकता है । गोर से देखो, वे दोनों टकटकी लगाए हमारी तरफ़ ही देख रहे हैं ।"

देशपांडे ने देखा-होलकर बिल्कुल सहीं कह रहा था ।

"फिर भी आंफिसर ।" देशपांडे व्यग्र भाव से बोला----" मुझे जरा सा तो हिंट करों । कोई मामूली-सा क्लू तो बताओ ।"

" आज तक इन जालिमों ने हमारे मुल्क के साथ जो किया, आज वही मैं इस हरामजादे के साथ दोहराने जा रहा हूं । मुस्तफा को जरा भी इल्म नहीं है कि मैंने उसकी जेब में एक छोटी सी डिवाइस सरका दी है, जिसे हम चिप लेवल डिवाइस कह सकते हैं । वह डिवाइस सचमुच किसी चिप जैसी ही है-------किसी मोबाइल के सिमकार्ड से जरा से बड़े आकार की चिप । असल में वह चिप डिवाइस एक बेहद घातक विस्फोटक मैटीरियल है, उसका इस्तेमाल ये दहशतगर्द फिदायीन (मानव बम) बनने के लिए करते हैं ।"

"तुम्हारे जज्वार्तों की मुझे कद्र है देशपांडे और अपने जज्बातों की भी । जो कहना चाहते हो, वह मैं समझ रहा हूं । यकीन करो, मुस्तफा पिशाच को यहां से जिंदा जाने देने की गलती मैं कभी नहीं कर सकता । एक बार वह निकल गया तो फिर पता नहीं हमारे मुल्क को कितना नुकसान पहुंचाएगा ।"

"शुक्रिया अॉफिसर ।"' देशपांडे चैन की सांस लेता हुआ बोला । फिर अचानक ठिठका और राजदाराना स्वर में बोला---तुम्हारा प्लान आखिर है क्या? इस बारे में अभी तक तुमने मुझे कुछ नहीं बताया है । दुश्मन पूरी तरह चौकन्ना है । तुम आखिर अपने प्लान को कैसे अंजाम देने बाले हो? मुझे भी तो कुछ बताओ ।"

“अभी?"

"फिर कब बताओगे! हाईकमान ने तुम्हें मुस्तफा को बाहर निकलने का हुक्म दे दिया है ।"

होलकर एक नजर बाई कलाई पर बंधी विशिष्ट रिस्टवाच पर डाली और बोला------" तुम शायद ठीक कह रहे हो लेकिन मैं भी क्या करूं, मजबूर हूं । इन हालात में हमारा इस तरह खड़े होकर बात करना दुश्मन के दिल में संदेह पैदा कर सकता है । गोर से देखो, वे दोनों टकटकी लगाए हमारी तरफ़ ही देख रहे हैं ।"

देशपांडे ने देखा-होलकर बिल्कुल सहीं कह रहा था ।

"फिर भी आंफिसर ।" देशपांडे व्यग्र भाव से बोला----" मुझे जरा सा तो हिंट करों । कोई मामूली-सा क्लू तो बताओ ।"

" आज तक इन जालिमों ने हमारे मुल्क के साथ जो किया, आज वही मैं इस हरामजादे के साथ दोहराने जा रहा हूं । मुस्तफा को जरा भी इल्म नहीं है कि मैंने उसकी जेब में एक छोटी सी डिवाइस सरका दी है, जिसे हम चिप लेवल डिवाइस कह सकते हैं । वह डिवाइस सचमुच किसी चिप जैसी ही है-------किसी मोबाइल के सिमकार्ड से जरा से बड़े आकार की चिप । असल में वह चिप डिवाइस एक बेहद घातक विस्फोटक मैटीरियल है, उसका इस्तेमाल ये दहशतगर्द फिदायीन (मानव बम) बनने के लिए करते हैं ।"

" गुड ! वेैऱीगुड ।" देशपांडे का सारा चेहरा यूं जगमगाने लगा था जैसे संसार की रोशनियां उस पर और सिर्फ उसी पर सिमट अाई हों-----“अब कहीं जाकर मेरे दिलो दिमाग को चेन मिला लेकिन यह फिदायीन वाला घातक विस्फोट तुम्हारे पास आया कहाँ से?"

" यह सवाल किससे कर रहे हो देशपांडे । इस मुल्क में घुसे ज्यादातर फिदायीनों को जिंदा दबोचने वाले आईबी के ही जांबाज हैं और आईबी के मालखाने में ऐसे बेशुमार हथियार भरे पड़े है। उसे वहां से हासिल कर लेना मेरे जैसे आईबी अधिकारी के लिए कौन सा मुश्किल काम था?"

"चिप ब्लास्ट कैसे होगा?"

"रिमोट कंट्रोल से ।"

“कहां है रिमोट? "

"मेरी इस खास किम की रिस्टवॉच में, दरअसल यह एक सेटेलाइट रिस्टवॉच है । इसमें लगा एक खास बटन दबाते ही चिप ब्लास्टर ब्लास्ट हो जाएगा और उस मरदूद के चीथड़े उड़ जाएंगे ।"’

"रिमोट की रेंज क्या है?"

"बीच में कोई अड़चन न हो तो चार किलोमीटर ।"

" ओह ! "

"अब तुम समझ गए होगे कि मेरे केवल एक बटन दबाने की देर है, मुस्तफा का जिस्म डायनामाइट वन जाएगा । मुस्तफा का खेल खत्म होना महज वक्त की बात है और उसकी मौत के लिए हमें कोई भी जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता ।”

" अब मुझे यकीन हो गया अॉफिसर ।" देशपांडे के होठों से निश्वास निकल गई--------“अब मुझे पूरा यकीन हो गया कि आज रावण का मरना तय है । क्या मैं यह और जान सकता हूं कि तीर उसकी नाभि में कब लगेगा?"

"सारे सवालों के जवाब अभी लेने की कोशिश मत करो, नीचे जाओं और जल्दी से उस राक्षस को उपर लाओ ।"
 
होलकर की समझते देर न लगी कि वे लोग भी पूरी प्लानिंग बनाकर आए हैं । उसने जो सोचा था, वह करना आसान न होगा ।

देशपांडे की व्यग्रता में इजाफा हो गया था ।

होलकर ने अपना सेटेलाइट निकलकर आँन किया ।

देशपांडे को लगा कि वह नीचे, शिप में मौजूद गिरीश तथा भल्ला को मुस्तफा के बारे में हुक्म देने वाला है लेकिन होलकर ने ऐसा नहीं किया । वह फोन हाथ में लिए गमछाधारियों से विपरीत दिशा वाली रेलिंग के पास पहुचा ।

देशपांडे भी लपककर उसके करीब पहुंच गया ।

"होलकर बोल रहा हूँ सर ।" उसने फोन कान से सटाकर कहा !

बलवंत राव का स्वर उभरा…................“ बोलो ।"

"चांदनी मेडम सुरक्षित हैं ।"

"मैं देख चुका हूं ।" बलवंत राव ने कहा......." उनकी तादाद भी ज्यादा नहीं लेकिन दो-दो हेलीकॉप्टर का होना उनकी पुख्ता तैयारियों की तरफ इशारा कर रहा है ।"

"वे मुस्तफा को दिखाए जाने की मांग कर रहे हैं?”

“पूरी कर दो, फोरन ।"

"अदला-बदली कैसे होगी, अभी यह निर्धारित नहीं हुआ है ।"

"पहले पहला काम करो, फिर अगला भी हो जाएगा । तुम्हारी सतर्कता में कमी नहीं होनी चाहिए ।"

"उसका तो सवाल ही नहीं उठता सर लेकिन चांदनी को लेकर हैलीकॉप्टर जा चुका है । मुझे नहीं पता कि इस वक्त वह कहाँ है? "

"फिक्र मत करों। उस पर हमारी नजर है और यह वक्त इन बातों का नहीं है । फोन डिस्कनेक्ट करके अागे की कार्यवाई करों । याद रहे, चांदनी सिंह का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए ।"

होलकर ने ठंडी सांस भरकर फोन कान से हटा लिया !

उसने देशपांडे की तरफ़ देखा, वह अपलक उसे ही देख रहा था और उसकी निगाहों में असंख्य सवाल छुपे थे ।

"सब ठीक है ।" होलकर दबे स्वर से बोला......." चांदनी सिंह को महफूज वापस पाने के लिए चीफ काफी उतावले हैं ।"

"चीफ पर हुकूमत का दबाव है और हुकूमत चांदनी सिंह को हर कीमत पर सही सलामत पाना चाहती है ।" देशपांडे फुसफुसाया था…...“निदोंष चांदनी सिंह से हमारी भी कोई अदावत है मगर हम भी आखिर इंसान हैं, जिसके अंदर जज्बात उमड़ते हैं और जिसे चोट लगने पर दर्द होता है ।"

"तुम्हारे जज्वार्तों की मुझे कद्र है देशपांडे और अपने जज्बातों की भी । जो कहना चाहते हो, वह मैं समझ रहा हूं । यकीन करो, मुस्तफा पिशाच को यहां से जिंदा जाने देने की गलती मैं कभी नहीं कर सकता । एक बार वह निकल गया तो फिर पता नहीं हमारे मुल्क को कितना नुकसान पहुंचाएगा ।"

"शुक्रिया अॉफिसर ।"' देशपांडे चैन की सांस लेता हुआ बोला । फिर अचानक ठिठका और राजदाराना स्वर में बोला---तुम्हारा प्लान आखिर है क्या? इस बारे में अभी तक तुमने मुझे कुछ नहीं बताया है । दुश्मन पूरी तरह चौकन्ना है । तुम आखिर अपने प्लान को कैसे अंजाम देने बाले हो? मुझे भी तो कुछ बताओ ।"

“अभी?"

"फिर कब बताओगे! हाईकमान ने तुम्हें मुस्तफा को बाहर निकलने का हुक्म दे दिया है ।"

होलकर एक नजर बाई कलाई पर बंधी विशिष्ट रिस्टवाच पर डाली और बोला------" तुम शायद ठीक कह रहे हो लेकिन मैं भी क्या करूं, मजबूर हूं । इन हालात में हमारा इस तरह खड़े होकर बात करना दुश्मन के दिल में संदेह पैदा कर सकता है । गोर से देखो, वे दोनों टकटकी लगाए हमारी तरफ़ ही देख रहे हैं ।"

देशपांडे ने देखा-होलकर बिल्कुल सहीं कह रहा था ।

"फिर भी आंफिसर ।" देशपांडे व्यग्र भाव से बोला----" मुझे जरा सा तो हिंट करों । कोई मामूली-सा क्लू तो बताओ ।"

" आज तक इन जालिमों ने हमारे मुल्क के साथ जो किया, आज वही मैं इस हरामजादे के साथ दोहराने जा रहा हूं । मुस्तफा को जरा भी इल्म नहीं है कि मैंने उसकी जेब में एक छोटी सी डिवाइस सरका दी है, जिसे हम चिप लेवल डिवाइस कह सकते हैं । वह डिवाइस सचमुच किसी चिप जैसी ही है-------किसी मोबाइल के सिमकार्ड से जरा से बड़े आकार की चिप । असल में वह चिप डिवाइस एक बेहद घातक विस्फोटक मैटीरियल है, उसका इस्तेमाल ये दहशतगर्द फिदायीन (मानव बम) बनने के लिए करते हैं ।"

"तुम्हारे जज्वार्तों की मुझे कद्र है देशपांडे और अपने जज्बातों की भी । जो कहना चाहते हो, वह मैं समझ रहा हूं । यकीन करो, मुस्तफा पिशाच को यहां से जिंदा जाने देने की गलती मैं कभी नहीं कर सकता । एक बार वह निकल गया तो फिर पता नहीं हमारे मुल्क को कितना नुकसान पहुंचाएगा ।"

"शुक्रिया अॉफिसर ।"' देशपांडे चैन की सांस लेता हुआ बोला । फिर अचानक ठिठका और राजदाराना स्वर में बोला---तुम्हारा प्लान आखिर है क्या? इस बारे में अभी तक तुमने मुझे कुछ नहीं बताया है । दुश्मन पूरी तरह चौकन्ना है । तुम आखिर अपने प्लान को कैसे अंजाम देने बाले हो? मुझे भी तो कुछ बताओ ।"

“अभी?"

"फिर कब बताओगे! हाईकमान ने तुम्हें मुस्तफा को बाहर निकलने का हुक्म दे दिया है ।"

होलकर एक नजर बाई कलाई पर बंधी विशिष्ट रिस्टवाच पर डाली और बोला------" तुम शायद ठीक कह रहे हो लेकिन मैं भी क्या करूं, मजबूर हूं । इन हालात में हमारा इस तरह खड़े होकर बात करना दुश्मन के दिल में संदेह पैदा कर सकता है । गोर से देखो, वे दोनों टकटकी लगाए हमारी तरफ़ ही देख रहे हैं ।"

देशपांडे ने देखा-होलकर बिल्कुल सहीं कह रहा था ।

"फिर भी आंफिसर ।" देशपांडे व्यग्र भाव से बोला----" मुझे जरा सा तो हिंट करों । कोई मामूली-सा क्लू तो बताओ ।"

" आज तक इन जालिमों ने हमारे मुल्क के साथ जो किया, आज वही मैं इस हरामजादे के साथ दोहराने जा रहा हूं । मुस्तफा को जरा भी इल्म नहीं है कि मैंने उसकी जेब में एक छोटी सी डिवाइस सरका दी है, जिसे हम चिप लेवल डिवाइस कह सकते हैं । वह डिवाइस सचमुच किसी चिप जैसी ही है-------किसी मोबाइल के सिमकार्ड से जरा से बड़े आकार की चिप । असल में वह चिप डिवाइस एक बेहद घातक विस्फोटक मैटीरियल है, उसका इस्तेमाल ये दहशतगर्द फिदायीन (मानव बम) बनने के लिए करते हैं ।"

" गुड ! वेैऱीगुड ।" देशपांडे का सारा चेहरा यूं जगमगाने लगा था जैसे संसार की रोशनियां उस पर और सिर्फ उसी पर सिमट अाई हों-----“अब कहीं जाकर मेरे दिलो दिमाग को चेन मिला लेकिन यह फिदायीन वाला घातक विस्फोट तुम्हारे पास आया कहाँ से?"

" यह सवाल किससे कर रहे हो देशपांडे । इस मुल्क में घुसे ज्यादातर फिदायीनों को जिंदा दबोचने वाले आईबी के ही जांबाज हैं और आईबी के मालखाने में ऐसे बेशुमार हथियार भरे पड़े है। उसे वहां से हासिल कर लेना मेरे जैसे आईबी अधिकारी के लिए कौन सा मुश्किल काम था?"

"चिप ब्लास्ट कैसे होगा?"

"रिमोट कंट्रोल से ।"

“कहां है रिमोट? "

"मेरी इस खास किम की रिस्टवॉच में, दरअसल यह एक सेटेलाइट रिस्टवॉच है । इसमें लगा एक खास बटन दबाते ही चिप ब्लास्टर ब्लास्ट हो जाएगा और उस मरदूद के चीथड़े उड़ जाएंगे ।"’

"रिमोट की रेंज क्या है?"

"बीच में कोई अड़चन न हो तो चार किलोमीटर ।"

" ओह ! "

"अब तुम समझ गए होगे कि मेरे केवल एक बटन दबाने की देर है, मुस्तफा का जिस्म डायनामाइट वन जाएगा । मुस्तफा का खेल खत्म होना महज वक्त की बात है और उसकी मौत के लिए हमें कोई भी जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता ।”

" अब मुझे यकीन हो गया अॉफिसर ।" देशपांडे के होठों से निश्वास निकल गई--------“अब मुझे पूरा यकीन हो गया कि आज रावण का मरना तय है । क्या मैं यह और जान सकता हूं कि तीर उसकी नाभि में कब लगेगा?"

"सारे सवालों के जवाब अभी लेने की कोशिश मत करो, नीचे जाओं और जल्दी से उस राक्षस को उपर लाओ ।"
 
"जो हुक्म मेरे आका ।" कहने के साथ वह तहखाने के रास्ते की तरफ बढ़ गया । उसकी चाल और अंदाज बता रहे थे कि उसे बो मिल चुका है जिसकी ख्वाहिश लिए इस मिशन पर आया था ।

करीब बीस मिनट बाद देशपांडे डेक पर आया ।

मुस्तफा उसके पीछे था । इस वक्त उसके चेहरे पर न कहीं खून नजर आ रहा था, न ही जख्म !

लोहे की मजबूत जंजीरों ने उसके दोनों हाथ तथा पैरों को जकड़ रखा था । पेरों के बीच केवल उतना ही फासला था कि चलने में असुविधा न हो । हाथों की जंजीरों की लम्बाई हथकड्री से किसी भी तरह ज्यादा नहीं थी ।

हथकड़ी से बंधी मोटी रस्सी का दूसरा सिरा देशपांडे ने पकड़ रखा था । मुस्तफा के पीछे हाथों में एके सैंतालिस लिए भल्ला और गिरीश चल रहे थे । उन्होंने अपनी-अपनी गनों की नाल मुस्तफा की पीठ से सटा रखी थी । इस सबके बावजूद मुस्तफा की छाती गर्व से फूली हुई थी और फौलादी बंधनों तथा पहरे में जकड़ा होने के बावजूद शेर की तरह चल रहा था ।

“क.. .कमांडर ।" मुस्तफा को देखते ही दोनों दहशतगर्दों के हलक से जैसे आश्चर्य तथा हर्ष भरी चीख निकल गई । अपनी आखों पर उन्हें जैसे विश्वास नहीं हुआ था------आप! आप ठीक तो हैं न? "

“इंशाअल्ला ! हम बिल्कुल ठीक हैं ।" मुस्तफा शेर जैसी गर्जना के साथ बोला-----"ओर अब आइंदा तो हमारी सलामती पर कोई शक ही नहीं है । वो शमा कभी नहीं बुझ सकती जिसे रोशन खुदा करता है । अगर खुदा के बाद हम किसी के शुक्रगुजार हैं तो वो यकीनन तुम हो हमें यह आजादी तुम्हीं लोगों की जांबाजी से हासिल हो रही है । शाबाश हमारे शेरों, तुमने को अपना कर्जदार बना लिया । नाज है हमें हमारे मुल्क के जांनिसारों पर । हम तुम्हारा यह कर्ज जरूर अदा करेंगे ।" वह एक क्षण को ठिठका । खूंखार चेहरे पर सहसा ज्वाला-सी धधकी । करीब खड़े देशपांडे तथा होलकर को आग्नेय नेत्रों से देखकर बोला-------" इन काफिरों के मुल्क की ईंट से ईंट बजाकर । यहाँ खून के दरिया बहाकर ।"

"आमीन ।" गमछाधारियों ने समवेत स्वर कहा ।

होलकर और देशपांडे की निगाहें एक-दूसरे से मिली ।

हालांकि उनकी समझ के मुताबिक मुस्तफा की जिंदगी अब ज्यादा लम्बी नहीं थी और उसे किसी किस्म की आतंकवादी कार्यवाई का कोई मौका मिलने वाला नहीं था मगर फिर भी उसके शब्द सुनकर दोनों ने बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं को जब्त किया।

"आपकी गिरफ्तारी ने हमें अनाथ कर दिया था कमांडर !" दूसरे गमछाधारी ने जैसे अपने जज्बात उड़ेले-----आप नहीं जानते बीते तीन सालों में हम सबने आपकी कमी को कितनी शिद्दत से महसूस किया है । बिल्कुल बेसहारा हो गए थे हम । मगर अब...

" शांत रहो मेरे बच्चो-------शांत रहो ।" मुस्तफा उसकी बात काटकर बोला------'" इन बातों का वत्त नहीं है । हमें यहां से निकलना होगा । मत भूलो कि अभी हम इन काफिरों के पहरे में है ।"

" आपने शायद इस जगह पर गोर नहीं किया कमांडर ।" पहले ने कहा.........…“हम अपने घर में हैं । यहां हम पर काफिरों का जोर नहीं चलने वाला । अगर हमसे जोर-जबरदस्ती की जरा-सी भी कोशिश की तो कसम खुदा की, यहाँ का समुन्दर इन हिंदुस्तानियों के खून लाल हो जाएगा ।"

“बकबास बंद करो ।" मुस्तफा उसे डांटकर बोला-------" अपने दुश्मन को कमजोर समझने का सबक मैंने तुम्हें कभी नहीं दिया ।"

"अब अगर तुम हरामजादों में से किसी ने एक लफ्ज भी मुंह से निकाला तो यह डेक तुम सबके गंदे खून से सुर्ख हो जाएगा ।" बड़े ही भयंकर अंदाज में ये लफ्ज अमरीक ने कहे थे-साले गीदडों । अपनी जुवानों पर लगाम रखो । तुम्हारा बाप तुम्हारे सामने है । मुझे अच्छी तरह दीदे फाड़कर देख लो । चीरकर यहीं फेंक दूगा ।"

मुस्तफा ने अमरीक को घूरा और बोला-------" अचानक बड़ी गर्मी आ गई तेरे खून में! दिमाग में कोई खराबी चल रही है क्या?"

"मेर खयाल से अब इस किस्म की बातों से कोई फायदा होने बाला नहीं है ।" होलकर दखलअंदाज हुआ-------'"वो वक्त अा गया है जब आप लोगों को चांदनी सिंह को हमारे हवाले कर देना चाहिए !"

" आफिसर समझदार है ।" एक गमछाथारी ने कहा------"हम तुम्हारी खातून को वापस बुलाते हैं ।"

उसने बॉकी टॉकी पर बात करने के बाद कहा----" हैलीकॉप्टर आ रहा है ।"'

"गुड ।" होलकर मन-ही-मन चौकन्ना होता मगर प्रत्यक्ष सामान्य भाव से बोला-------" अदला बदली कैसे होगी?"

"उसमे क्या समस्या है!" पहला गमछाधारी बोला------" हम तुम्हारी खातून को तुम्हारे हवाले कर रहे हैं-------तुम कमांडर को हमारे हवाले करो । तुम अपने रास्ते, हम अपने रास्ते ।"

"मुझे पहले मोहतरमा चांदनी चाहिए ।" होलकर सख्ती से बोला----“वे जब तक हमारे हाथ नहीं आती, हम मुस्तफा को तुम्हारे हवाले नहीं करेगे ।"

"यही शर्त हम भी रख सकते हैं ।" दूसरा गमछाधारी बोला----" लेकिन ऐसा नहीं करेंगें ।"

"फिर ?"

"हमें तुम्हारी शर्त मंजूर है ।”

मुस्तफा ने उस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन वह वहां के माहौल और वहाँ की हर चीज को बारीकी से रीड कर रहा था । शायद उसके जेहन में कोई भयानक विचार रेग रहा था ।

कुछ देर बाद हैलीकॉप्टर पुन: वहां पहुच गया और पोत के ऊपर मंडराने लगा । होलकर तथा देशपांडे ने दूरबीन अपनी आंखों से सटा ली और हेलीकॉप्टर की तरफ़ देखा ।

चांदनी सिंह पहली वाली स्थिति में हेलीकॉप्टर की पायलट साइड वाली पीछे की विंडो से सटी बैठी थी ।

हैलीकॉप्टर में पहले जितने ही लोग तथा हथियार मौजूद थे, उसमें कोई इजाफा या कटौती नहीं हुई थी ।

दोनों ने दूरबीन आंखों से हटा ली, फिर उनकी नजरें मिली ।

होंठों पर नमालूम-सी मुस्कान थी ।

हैलीकॉप्टर पोत के चारों ओर घूम रहा था । उसकी ऊचाई वेहद कम थी । इंजन की तेज गड़गड़ाहट कानों के परदों को हिला रही थी और पंखों से उड़ती तेज हवा समुद्र के पानी को उडा़ रही थी ।

"मैडम को डेक पर बुलाओ ।" होलकर दहशतगर्दों से बोला ।

"बुलाता हूं ।” किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसका सिर सहमति में हिला------“अभी बुलाता है हुजूर ।"

"तब तक तुम भी एक काम करो ।" दूसरा बोला------“कमांडऱ के हाथ------पैरों में बंधी लोहे की जंजीरे खोल दो ।"

होलकर ने देशपांडे की तरफ़ देखा ।

“मैं इसके हाथों को आजाद करने का रिस्क नहीं ले सकता हूँ होलकर सख्ती से बोला------“फिलहाल पेरों को आजाद कर रहा हूं ।”

"हाथ कब खोलोगे?"

“चांदनी मेडम के सुरक्षित डेक पर पहुंचने के बाद ।" दोनों दहशतगर्दों की निगाहें मुस्तफा से मिली । उनके बीच आखों ही आखों इशारा हुआ।

फिर पहला दहशतगर्द निर्णायक भाव बोला-----"ठीक है। मुझे मंजूर है । तुम कमांडर के पैरों की बेडि़यां खोल दो !"

होलकर ने इशारा किया ।

मुस्तफा के पेरों को आजाद कर दिया गया ।

होलकर दहशतगर्दों से बोला-----"हेलीकॉप्टर को लेंड कराओ ।"

"वो लेंड नहीं होगा ।" दहशतगर्द कठोरता से बोला ।

होलकर की आंखें सुकड़ गई-----“मतलब?"

"देखते रहो ।” सभी धड़कते दिल से इंतजार करने लगे ।

असमंजस में फंसी निगाहें उपर मंडराते हैलीकॉप्टर पर ही चिपकी हुई थी ।

फिर, ,देखते ही देखते हैलीकॉप्टर ने पोत के चारों अोर मंडराना बंद कर दिया और डेक के ऊपर बीचों--बीच पहुंचकर स्थिर हो गया । पंखे पूरी रफ्तार से घूम रहे थे । हेलीकॉप्टर के नीचे एक रस्सी लटकती नजर आई । रस्सी बेहद मजबूत तथा मोटी थी ।

उसके निचले सिरे पर एक जाल लटका हुआ था । जाल के अंदर एक इंसानी शरीर था । जाहिर है कि वह चांदनी सिंह थी ।

सभी की धड़कनें अनियंत्रित हो गई ।

हवा में झूलता जाल डेक पर बीचों-----बीच जाकर रूक गया । उपर से रस्सी छोड़ दी गई और जाल का मुंह खुल गया । चांदनी सिंह जल्दी से उठकर खड़ी हो गई । वह अभी-भी उन्हीं कपड़ों में थी जिनमें किडनैप की गई थी ।

लम्बी टांर्गो से चिपकी वाली जींस और सुर्ख रंग का टाप । यह अलग बात थी कि उसके कपड़े अब पूरी तरह मैले हो चुके थे ।

सुन्दर चेहरा भय तथा आशंका से पीला पड़ा हुआ था ।

"अ...आप ठीक तो हैं न मेडम!" होलकर सशंक भाव से चांदनी सिंह से बोला, साथ ही तेजी से उसकी तरफ लपका ।

लेकिन वह चांदनी सिंह तक पहुंच न सका । उससे पहले ही उसके तथा चांदनी सिंह के बीच में मुस्तफा आ गया और दीवार की तरह खडा हो गया ।

"यह क्या हरकत है ?” होलकर ने पूछा ।

"जरूरत से ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत कर आईबी के पिट्ठू ।" मुस्तफा व्यंगात्मक भाव से बोला------"यहां इस हाथ दे और उस हाथ ले वाला खेल चल रहा है । तेरा माल तुझे मिल चुका है लेकिन मेरा बैलेंस अभी बराबर नहीं हुआ ।"

"क्या मतलब? "

"हाथों को आजाद कर । फोरन ।"

होलकर ने दातं किटकिटाए मगर कुछ बोला नहीं ।

उसके इशारे पर मुस्तफा की हथकड़ी खोल दी गई ।

अब वह सारे बंधनों से पूरी तरह आजाद था ।
 
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