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गद्दार देशभक्त complete

"यह जानबूझकर सीधी-साधी बात में पेंच पैदा कर रहा है सर ।" प्रताप उतिजित्तिसा होकर बोला…“मामले को उलझा रहा है । दोनों खाते पूरी तरह विरोधाभासी हैं ।"

" ऐसा कुछ नहीं है ।” आर्या बोला-“मेरा यकीन करो ।"

"वो बाद में ।" नेगी बोला-----"पहले ये बता, अगर यहाँ तुझे हम न मिले होते । सचमुच कोई ऐसा अादमी मिला होता, जो तुझे ऐसे लोगों का ठिकाना बताता, जिनका मकसद निरंजननाथ का मर्डर करना होता तो उससे मिलने वाली खबर को किसके पास ट्रांसफ़र करता? सीधे दहशतगर्दों को या किसी और को?"

"म…म…मैं ।"

"मिमियाये बगैर बोल…बिना किसी हुज्जत के बोल । फौरन उसका नाम बता? कौन है वह?"

"म..........मैं किसी दहशतगर्द को नहीं जानता ।"

"जिसे जानता है, उसके बारे में बता?"

आर्या ने थूक गटका !

उसने बोलने का उपक्रम न किया ।

"मेरे पास जरा भी वक्त नहीं है आर्या ।" नेगी खूंखार स्वर मै बोला--------------अगर तू यह समझता है कि तेरे बच निकलने का कोई रास्ता वाकी बचा तो बाज आ जा । अगर तूं बाज़ नहीं आया ! अपना ही नुकसान करेगा । मेरे पास खडे ये आईबी के जल्लाद । ये तेरी चमडी को रेशा-रेशा करके उघेड़ेगे और इस तरह उधेड़ेगे कि तू अकेला नहीं बल्कि तेरी सात पुश्ते त्राहि-त्राहि कर उठेगी !"

"ब. . .बताता हूं ।” आर्या थूक निगलकर जल्दी से बोला----मैं बताता हूँ । उसका नाम. . .जसवंत है ।”

नेगी की आंखें सिकुड़ी-------“कौंन जसवंत?"

“अ......औमकार चौधरी का पर्सनल असिस्टेंट ।"

"क . . .क्या?" अकेला नेगी ही नहीं, प्रताप भी बूरी तरह चौंक पड़ा था-------“ओमकार चौधरी से तेरा मतलब-बह पोलीटीशियन है ?"

"ह . . .हां ।"

"चौधरी का पीए टेरेरिस्टों से मिला हुआ है?"

"यह सच है ।”

"बगैर किसी सबूत के तेरी लफ्फाजी पर कोई यकीन नहीं करेगा । जसवंत ओमकार चौधरी का खासमखास है, ऐसे में अगर जसवंत पर उंगली उठती है तो वह उंगली सीधे ओंमकार चौधरी पर उठी मानी जाएगी और यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ओमकार चौधरी जैसा नेता कभी दहशतगर्दों से मिला नहीं हो सकता । उसने तो दहशतगर्दों और उनके मुल्क के हुक्मरानों की नीद हराम कर रखी है । इसीलिए हर दहशतगर्द उसके खून का प्यासा है ! तूं सुन रहा है न आर्या?"

"मैं चौधरी की नहीं जसवंत की बात कर रहा हूं । मेरा ओमकार चौधरी से कोई बास्ता नहीं है । मेरा वास्ता केवल जसवंत से है ।"

" अगर जसवंत दहशतगर्दों से मिला हुआ है तो. . . ।" प्रताप बहुत ज्यादा फिक्रमंद हो उठा था-------" यह और भी ज्यादा चिंता की बात है । इन हालात में तो दहशतगर्दों के लिए चौधरी को निशाना बनाना बहुत आसान होगा । हैरानी की बात है कि उन लोगों ने अभी तक चौधरी को कोई नुकसान नहीं पहुचाया ।"

............................

"दहशतगर्दों का सारा ध्यान फिलहाल निरंजननाथ पर है !" नेगी सोच में डूबा हुआ बोला । उसका लहजा भी व्यग्रता से भरा था------" ओंर जसवंत की असली ताकत चौधरी ही है, इसलिए पहले वे ओमकार चौधरी को खत्म करने की बेवकूफी नहीं कर सकते । ईश्वर न करे, कल अगर वे निरंजननाथ को खत्म करने में कामयाब हो गए तो अगला टार्गेट ओमकार चौधरी ही होगा ।"

" ऐसा नहीं होना चाहिए एसीपी साहब ।" प्रताप उत्तेजित होकर बोला------" हमें उसे हर हाल में रोकना होगा ।"

नेगी ने प्रताप से ध्यान हटाकर आर्या पर नजरें केंदित की और सवाल किया…“क्या जसवंत को तेरे यहाँ आने की खबर है !"

“ह. . .हां ! " वह फिर हकबकाया ।

"कैसे?"

"मैंने ही उसे फोन करके, यहाँ से आई कॉल के बारे में बताया था । उसी ने कहा कि मैं फौरन बताए गए पते पर पहुचूं और वहां जो भी बाते हों, उनके बारे में उसे बताऊं ।"

" शाबाश ।" नेगी कड़वे स्वर में बोला । फिर, उसकी आखों में चमक उभरी------" चल तू फौरन जसवंत को फोन कर ।"

"क.. किसलिए?" आर्या ने थूक निगला ।

"उससे मीटिंग फिक्स करा उसे फौरन इमरजेंसी मीटिंग के लिए कहीं बुला ।"

"व. . .वह मेरे बुलाने से आ जाएगा?"

"जरूर आएगा । तू उससे कहेगा कि जिस इंफार्मर से मिलने गया था, उसने कुछ ऐसी सनसनीखेज बाते बताई हैं, जिन्हें तूं फोन पर नहीं बता सकता । उनके लिए तेरा उससे मिलना जरूरी है । वैसी कंडीशन में वह इंकार नहीं कर सकेगा ।"

"अ........आप करना क्या चाहते है सर?"

"तुझे बता दूं! एक बिके हुए करप्ट पुलिसिये को बता दूं-----एक नमकहराम इंसान को बता दूं?"

उसका सिर एक बार फिर झुक गया ।

"फोन निकालकर जसवंत को लगा । और याद रखना जलील इंसान ।" उसके लहजे में चेतावनी का पुट उभर आया था-----''अगर बातों के दरम्यान जसवंत को किसी गुप्त इशारे से सावधान करने का प्रयास किया, या उसने तेरी बातों से सच को भांप लिया तो तेरी लाश यहीं, इसी फ्लेट में गिरेगी ।"

आर्या की हालत मरता क्या न करता वाली थी ।

'कश्मीर केसरी' के ताजा संपादकीय का शीर्षक था------

कहाँ सो रहा है हिंदुस्तानी ?

हमेशा की तरह इस संपादकीय को भी, अखबार के मालिक और प्रधान संपादक प्रबल कुमार चोपड़ा ने लिखा था ।

प्रबल कुमार चोपडा का 'संपादकीय' देश में बहुत लोकप्रिय था और ऐसा बेवजह नहीं था । लोकप्रियता का कारण यह था कि प्रबल कुमार चोपडा के हर लेख में तथ्यपूर्ण बातें लिखी होती थी ।

खोजपूर्ण बाते लिखी जाती थी । ऐसी-ऐसी सूचनाएं उजागर की जाती थी जो पाठकों को अन्य किसी अखबार या टीबी चैनल से नहीं मिलती थी । अगर यह भी कहा जाए तो गलत न होगा कि वह अपने एक ही लेख में सत्ता पर भी बरसता था और आतंकवादियों पर भी, और ऐसा वह इतने तर्कपूर्ण तरीके से करता था कि पाठको को उसकी हर बात सच लगती थी ।

लोगों को उसके संपादकीय पढ़कर जोश आ जाता था ।

आज का लेख "कहां सो रहा है हिंदुस्तानी' भी ऐसा ही एक तथ्यात्मक तथा खोजपूर्ण लेख था, जो देश के मौजूदा हालात की सजीव तस्वीर खींचता था । उसमें आज़ वहुत कुछ ऐसा लिखा था, जिसने आम जनों के साथ ही कुछ खास जनों का ध्यान भी खींच लिया था । चोपडा ने लिखा था---------

'कश्मीर केसरी' के हाथ लगे सूत्रों के मुताबिक हाफिस लुईस का अॉपेरेशन औंरगजेब अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है और जिस बर्बर तरीके से उसने जांबाज पुलिस अॉफिसर गुलशन राय तथा उसके साथियों का सिर कलम किया , वह मुल्क के हुक्मरानों की लंगोटी खोलने के लिए काफी है !

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इससे पहले चींदनी सिंह के साथ हुई क्रूरता का जख्स अभी सूखा भी नहीं था कि भारत माता का सीना फिर छलनी हो गया !!!!

लेकिन यह नशंपिशाचों की प्यास का अंत नहीं हैं, यह तो महज उसका एक पड़ाव है ! अगला नम्बर किसका है, यह समझना मौजूदा हलात में ज्यादा मुश्किल नहीं है !

खुफिया एजेसियों की मानें तो वह शख्स निरंजननाथ भी हो सकता है और ओमकार चौधरी जैसी कद्दावर शख्तीयत भी हो सकती है, खुद मैं भी ही सकता हूं !

ये कैसा सिस्टम है कि यह सब तब हो रहा है जबकि खुफिया एजेंसियां बहुत पहले ही हाफिस द्वारा चलाए जा रहे आँपरेशन औरंगजेब की सच्चाई से हुकूमत को आगाह करा चुकी हैं !

मुझे अपनी मौत के अंदेशे का जरा भी खौफ नहीं हैं, क्योंकि मैंने जो मशाल जला दी है, वह मैरी मौत के बाद भी बुझने वाली नहीं है !
 
आंसू तो मुझे इस मुल्क के दुर्भाग्य पर आते हैं, जहां आज तक एक भी सच्चा देशभक्त सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर नहीं पहुचां !

बोस और पटेल जैसे दीदावरों के इस मुल्क में आज तक एक भी ऐसा दीदावर पैदा नहीं हुआ जिसके लहू में दुश्मनों की जालिमाना कार्यवाहियाँ की देखकर उबाल आता हो और जो जालिमों को उन्हीं की भाषा से जबाब देने के लिए तड़प उठता हो !

वतनपरस्ती का ऐसा डीएनए आज के हुक्मरानों के खुन से पुरी तरह नदारद है और दिल्ली में बैठकर किश्तों से वतन बेचने बाले सियासी दल्लों की सारे मुल्क में पूरी जमात खडी हो चुकी है !

ये कैसा दुर्भाग्य है कि इस मूल्क के लिखे जाने वाले भविष्य की कलम-----दवात उन्हीं सियासी दल्लों की जमात के अघिकार में है और उनसे यह अधिकार छीनने का माद्दा फिलहाल किसी में भी प्रतीत नहीं होता !! शायद इसीलिए पहले से ही खामोश भारत माता और ज्यादा खामोश हो गई है !

ऐसा लगता है उन्होंने हमारी आने वाली बेगुनाह नस्लों के खुन का जलजला देखने के लिए शायद खुद को तैयार कर लिया हैं

जलजला जो आज आईएसआईएस की शक्ल में ईराक, सीरीया और अफगानिस्तान में उठ रहा है !

आज सबसे अहम सबाल यह उठ रहा है कि क्या हमारा सुरक्षा तंत्र हाफिज लुईस के अॉपरेशन औरंगजेब को रोकने में कामयाब हो पाएगा? मुस्तफा जैसै दुर्दांत आंतकी सरगना को ह्माफिज ने जिस मकसद के लिए आजाद कराया है क्या हम उस मुस्तफा के कदमों की रोक पाएंगे, इन सवालों का जवाब तो आने बाला कल ही देगा लेकिन उससे भी बड़ा एक सवाल है, जो रह-----रहक़र हर भारतबासी के अंदर उठ रहा है !

वह स्याल उस हसान को लेकर हैं, जिसका नाम अर्जुन राणावत है, मगर जिसे सारे देश में हिंदुस्तानी के नाम से जाना जाता है ।।

याद रहे,, यह हिंदुस्तानी भारतीय इंटेलीजेंस का एक छुपा हुआ राज है जिसे पाकिस्तान की धूर्त खुफिया एजेंसी आईएसआई की मक्कारी का जवाब देने के लिए तैयार किया गया था !!

समुची आईएसआई आज अगर किसी के नाम से थरथराती है तो वह शख्स हिंदुस्तानी है और इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुस्तानी आज तक हर इम्तहान में खरा उतरा है !

उसका एक कारनामा----

' अॉपरेशन दुर्ग ' था, जो पाकिस्तान के खिलाफ भारत का सबसे करारा जवाब था ! मगर वह जवाब आज कहीं खो-सा गया लगता है !

मेरा और मेरे इस अखवार के जरिए आज हर भारतवासी का सीधा सबाल उसी हिंदुस्तानी से है !

हम पूरे अधिकार के साथ उससे सबाल कर रहैं हैं कि वह कहाँ सो रहा है ? इस मुल्क में आज इतना कुछ हो रहा है फिर भी वह खामोश क्यों हैं? अगर वह इसी मुल्क में कहीं है तो मुस्तफा की गर्दन मरोड़ने के लिए सामने क्यों नहीं आ रहा ?

वह चुपचाप इतने बेगुनाहों के खुन की होली क्यों देख रहा है?

अगर 'हिंदुस्तानी' की रंगों में सचमुच खून नहीं हिंदुस्तान बहता है तो फिर वह हिंदुस्तान आज नजर क्यों नहीं आ रहा?

आखिर क्यों?

तुम सुन रहे हो न हिंदुस्तानी !

आज एक बार फिर यह मुल्क तुम्हें पुकार रहा है और बहुत आशा भरी नजरों से तुम्हारी तरफ देख रहा है !!

सामने आओ और कुचल दो मां भारती के एक-एक दुश्मन को ।।

वस ! इतना ही लेख था प्रबल कुमार चोपड़ा का ।

आम पाठकों पर तो इस संपादकीय का जो असर हुआ, वह हुआ ही था लेकिन सबसे ज्यादा हलचल केद्रीय गृहमंत्रालय में मची थी । हलचल की शुरुआत उस वक्त हुई, जब गृहमंत्री बादल नारंग सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ने बैठा । उसके सामने मेज पर हिंदी तथा अंग्रेजी के लगभग दस अखबार रखे थे, जिनमें से एक कश्मीर केसरी' भी था । नारंग ने सबसे पहले कश्मीर केसरी का विशेष संपादकीय पढ़ा था और उसे पढ़कर पेशानी पर अाड़ी-तिरछी लकीरें उभर अाई थी । वह चाय का घूंट लेना तक भूल गया था ।

तभी एक अादमी हाट लाइन लिए उसके पास पहुचा !

हाट लाइन पर दूसरी तरफ आईबी चीफ बलवंत राव था ।

“सुबह-सुबह डिस्टर्ब करने के लिए माफी चाहता हूं एचएम साहब ।" बलवंत राव अभिवादन के पश्चात् बोला-----“लेकिन यह बहुत जरूरी था । चीजें ही ऐसी सामने आई हैं ।”

"लगता है कश्मीर केसरी पढ़ लिया है?"

"ओहो ! तो आप भी पढ़ चुके हैं!"

" हां और यकीन मानो राव साहब, आपका फोन नहीं आता तो मैं खुद ही फोन करने वाला था । प्रबल कुमार चोपड़ा एक बहुत जिम्मेदार और काबिल इंसान है । जरा भी उम्मीद नहीं थी कि वह ऐसी गैरजिम्मेदाराना हरकत करेगा ।"

“मेरा भी यही खयाल है सर, हैरानी की बात है कि अॉपरेशन दुर्ग के बारे में उसे कैसे मालूम हुआ । यह तो हमारी इंटेलीजेंस का हिंदुस्तानी से भी कहीं ज्यादा बड़ा और छुपा हुआ ऐसा राज है, जिसके बारे में केवल गिनती के लोगों को ही मालूम है ।"

"मैं भी यहीं सोच रहा हू चीफ !! कम-से-कम पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ा कोई शख्स तो इंटेलीजेंस के ऐसे भेद नहीं मालूम कर सकता । तुम्हारा क्या ख्याल है?"

“सवाल ही नहीं उठता होम मिनिस्टर साहब ।" बलवंत राव दृढता से बोला-------" हम जिन राज की बात कर रहे हैं, उन्हें तो खुद इंटेलीजेंस से जुड़े लोगों के लिए भी मालूम कर पाना आसान नहीं है । और फिर बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, अभी अहम सवाल और भी हैं । यह खबर केवल इंटेलीजेंस के पास ही थी कि गुलशन राय के अलावा जिन बाकी लोगों को मुस्तफा टार्गेट बनाने वाला है, वे कौन हैं? ऐसे में चोपड़ा को यह राज मालूम हुआ तो कैसे आखिर क्या स्रोत है उसके पास इन निहायत ही संवेदनशील और खुफिया जानकारियों तक पहुंचने का ?"

“इस सवाल का जबाव तो चोपड़ा ही दे सकता है ।"

"मेरा भी यहीं खयाल है सर, इसीलिए आपको फोन किया है ।"

"किसलिए?"

"चोपडा मामूली हस्ती नहीं है । मीडिया के सय-साथ सत्ता के गलियारों में भी उसकी वहुत मजबूत पकड़ है । बगैर हाई अथारिटी परमीशन के उससे कोई भी कड़ी पूछताछ मुमकिन नहीं है ।"

" तुम्हें परमीशन देता हूं चीफ़ । जैसे चाहो पूछताछ करो । तुम्हें पूरी छूट है । कोई परेशानी आए तो मुझे फोन करना ।"

"पूछताछ में मेरे लोग संतुष्ट न हुए या चोपडा ने सहयोग नहीं दिया तो हमें उसके गिरफ्तारी वारंट की भी जरूरत होगी ।"

"फिक्र न करो, मैं सारे इंतजाम कर दूगा । मुद्दा जब इतना सेंसटिव हो तो मैं किसी भी रुकावट को बीच में नहीं आने देता ।"

"ठीक है सर ! मैं सबसे तेज तर्रार टीम को चोपड़ा के पास भेजता हूं । सुना है उसकी सिक्योरिटी बहुत पुख्ता कर दी गई है?”

"हां । अॉपरेशन औरंगजेब के मद्देनजर यह करना पड़ा है लेकिन चोपड़ा की कड़ी सिक्योरिटी आईबी की टीम के लिए कोई मुश्कि्ल खड़ी नहीं करेगी । इस बारे में उसे पहले से अादेश मिल जाएगा । तुम बेफिक्र होकर अपना काम करों ।"

"थेक्यू सर ।"

"वेलकम चीफ ।"

सम्बंध विच्छेद हो गया ।

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जसवंत अत्री ने मोबाइल कान से हटाया तो चेहरा क्षण-प्रतिक्षण गम्भीर होता चला गया ।

दूसरी तरफ से इंस्पेक्टर कमल आर्या ने जो कहा था, उसने उसके दिलोदिमाग में हलचल मचा दी थी ।

जसवंत काफी देर तक आर्या की बताई बातों पर मनन करता रहा फिर, मोबाइल पर एक खास नम्बर पंच किया ।

काफी देर वेल बजने के बाद कॉल रिसीव हुई और फिर, कान में एक व्यस्त स्वर पड़ता----" यस ।"

"बिग वॉस ।" अत्री बोला…“आपसे एक सलाह लेनी है ।"

"हमे अनुमान है कि तुम क्या सलाह लेना चाहते हो ।"

"ज . . . .जी? ”

"फिर भी बोलो, क्या बात है?"

“जिस पुलिसिये ने मुझें दहशतगर्दों से ताल्लुक रखने वाली सूचना दी थी, वह मुझे मुलाकात के लिए बुला रहा है ।"

"कहां?" थोडा हंसकर पूछा गया……'"क्यो?"

जसवंत अत्री ने इंस्पेक्टर आर्या के बुलावे के बारे में बताया ।

"वह पुलिसिया इस वक्त कहां है?"

"वहीं । जहाँ इंफार्मर ने उसे बुलाया था ।"

“तुमने तस्दीक की?”

“क्रिस बात की? आर्या के उसकी बताई जगह पर होने की?"

"हां ।"

"नहीं ।"

" क्यों?"

“मुझे पुलिसिये के कमीनेपन पर पूरा भरोसा है । वह पैदाइशी हरामजादा हैं दौलत के लिए कुछ भी कर सकता है ।"

"तुम गधे हो अत्री ।"

“क. . .क्या?" अत्री हड़बड़ाया ।

"तुम अपनी आंखें की रख सकते हो मगर हम यह गलती नहीं कर सकते । इस वक्त तुम्हारा वह पुलिसिया दिल्ली पुलिस के एक एसीपी और मुम्बई से अीए कुछ आईबी एजेंटों के कब्जे में है । वह उसे तुम्हारे वारे में सब कुछ बता चुका है । अब वे तुम्हें अपने जाल में फंसाने के लिए उस पुलिसिए को चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे है । उसने उनकी देख-रेख में ही तुम्हें फोन किया ।"

"य. . .यह आप क्या कह रहे हैं बिग बॉस ।" अत्री चिहुंककर बोला । मारे अविश्वास के उसकी आंखें फैल गई थी ।

“यह एक ऐसा सच है जिसे तुम्हें बताने के लिए हम फोन करने ही वाले थे कि तुम्हारा फोन आ गया । अगर तुम उस पुलिसिये की बातों में आए तो सीधे पुलिस और इंटेलीजेंस की गोद में गिरोगे ।"

""म. . .मुझें यकीन नहीं हो रहा ।" जसवंत के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थी-----इ. . .इसका मतलब तो ये हुआ कि मैं वहां जाऊं या न जाऊं, एसीपी साहब पर पोल तो मेरी खुल ही चुकी है क्योंकि अपके बताए मुताबिक पुलिसिए ने उनके कहने पर उनके सामने ही मुझसे बातें की थी और मैंने भी खुलकर बातें की क्योंकि इस बात का तो मुझे सपने में भी गुमान न था कि. . ."

"यह तुम्हारी प्राब्तम है ।"

“तो अब मैं क्या कया करूं बॉस । हमारा मकसद तो अभी अधूरा है-शिकार अभी सलामत है । मुझें जरा भी गुमान न था कि हमारी सालों की मेहनत पर अचानक पानी फिर जाएगा और एक ही झटके में सब कुछ खत्म हो जाएगा ।"

"हमारे रहते ऐसा कभी नहीं होगा अत्री । हमारा मकसद हर हाल में पूरा होकर रहेगा ।"

"म . . . . . अगर कैसे? अब तक तो उन लोगों ने चौधरी पर मेरा राज भी फाश कर दिया होगा ।"

'" तुम्हारी खुशकिस्मती से अभी तक ऐसा नहीं हुआ है । वे लोग तुम्हें रंगे हाथों पकड़ना चाहते हैं । उनकी यही होशियारी उनकी करारी शिकस्त की वजह बनेगी ।"

"क्या आपके पास कोई प्लान है बिग बॉस !"

"हम प्लान ए के नाकामयाब होने पर प्लान बी और प्लान बी के नाकामयाब होने पर प्लान सी हमेशा तैयार रखते हैं !"

"मैं समझा नहीं बिग बॉस ।"

"जो कल होने वाला था, वह आज ही बल्कि अभी होगा । बदले हुए हालात में ओमकार चौधरी निरंजननाथ से पहले मरेगा ।"

"क. . कौन मारेगा?"

"हम ।"

“अ...आप ऐसा कैसे करेंगे? वह वहुत कड़े पहरे में रहता है !"

"तुम कब काम आओगे? क्यों बैठे हो वहां?”

" म . . . . मैं ?"

"तुम्हारा काम हमें चौधरी तक पहुचाना होगा ।"
 
"ए…ऐसा भला कैसे हो सकता है बिग बॉस! चौधरी बहुत चौकन्ना रहने वाला शख्सं है । चीफ़ मिनिस्टर भी मिलने आता हैं तो वह भी उस सिक्योरिटी सिस्टम को पार किए बगैर चौधरी तक नहीं पहुंच सकता जो उसके चारों तरफ़ फैला रहता है ।"

" तो फिर तुम्हारा क्या फायदा हुआ अत्री ।"

"अब मैं क्या बोलूं बिग बॉस ।”

"बोलो नहीं, सोचो । कोई ऐसी तरकीब सोचो कि हमारा काम मुकम्मल हो जाए और तुम यह कर सकते हो ।”

अत्री सोच में पड़ गया ।

काकी देर तक यूं ही सोच के भंवर में डूबता-उतराता रहा ।

"कुछ सूझा अत्री?" दूसरी तरफ से व्यग्र स्वर में पूछा गया ।

“ह…हां ।" अत्री असमंजस भरे स्वर में बोला…“सूझा तो है कुछ । लेकिन--------लेकिन उसके बेस पर मैं ऐसा कोई मजबूत दावा नहीं कर सकता कि हम जो चाहते है उसमें कामयाब हो ही जाएंगे ।"

"बताओ जसवंत । फौरन से भी पहले बताओ ।" अधीर स्वर में कहा गया-------“सारे पत्ते खुल जाने के बावजूद तुम्हारी समझ में यह बात क्यों नहीं अा रही कि हमारे पास ज़रा भी टाइम नहीं बचा ।"

जसवंत अत्री ने बताना शुरू किया ।
 
कश्मीर केसरी का मालिक और प्रधान संपादक प्रबल कुमार चोपड़ा अट्ठावन साल का एक भारी भरकम शरीर वाला शख्स था ।

उसके गाल सेब की तरह सुर्ख थे ।

आमतौर पर वह नेताओं जैसे सफेद कुर्ता-पाजामा पहनता था और आखों पर नजर का चश्मा लगाता था ।

उसकी कलम में ही नहीं बल्कि समूचे व्यक्तित्व में ऐसा जादुई आकर्षण था, जो सामने वाले को उसकी तरफ़ खींचता था ।

चोपडा वक्त का बहुत पाबंद था और रोजाना सुबह के ठीक दस बजे कश्मीर केसरी अपने मुख्य कार्यालय में पहुच जाता था ।

मौजूदा हालात में इंटेलीजेंस द्वारा जारी किए गए अलर्ट के चलते उसकी अप्वाइंटमेंट लिस्ट वहुत शार्ट हो गई थी ।

आफिस हो अथवा घर, वह बहुत चुनिंदा लोगों से मिलता था ।

चोपड़ा की हिफाजत के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सिक्योरिटी की कमान एसीपी रैंक के अधिकारी के हाथ में थी । पुख्ता इंतजाम के चलते अप्वाइंटमेंट के बावजूद चोपड़ा तक पहुंचने के लिए कई चैंकिंग क्लियरेंस से गुजरना पड़ता था ।

उसकी अाज की पहली अप्वाइंटमेंट मोहनदास नाम के उस शख्स से थी जिसे आईबी का अधिकारी बताया गया था । उसके साथ उसके दो जूनियर भी आने थे, जिनके नाम अप्वाइंटमेंट लिस्ट में दर्ज किए गए ।

सिक्योरिटी इंचार्ज को सीधे गृहमंत्रालय से आदेश दिया गया था कि आईबी की टीम की कोई जांच पड़ताल नहीं होगी इसलिए मोहनदास और उसकी टीम को कोई असुविधा नहीं हुई ।

चोपड़ा को जैसे ही सूचना दी गई कि आईबी की टीम अा चुकी है तो उसने तुरंत तीनों को अपने आँफिस में भेजने के लिए कहा ।

"तुम लोगों में मोहनलाल कौन है?" वह अपने चश्में के पीछे से बारी-वारी तीनों का मुआयना करता हुआ भावहीन स्वर में बोला ।

" मुझे मोहनलाल कहते हैं ।" सफारी सूट वाले ने कहा ।

" बैठो !"

मोहनलाल एक विजिटर चेयर पर बैठ गया ।

"तुम भी बैठो ।" चोपड़ा दोनों एजेंटों से बोला । मगर उन दोनों ने वेसा कोई उपक्रम न किया । वे पूरी मुस्तेदी से अपने अॉफिसर के पीछे दाएं-बाएं खडे़ रहे ।

चोपडा ने उनके अनुशासन को समझा ।

उसने दोबारा उनसे बैठने को नहीं कहा ।

"बोलो ओंफिसर ।" वह मोहनलाल के चेहरे पर निगाह गड़ाता हुआ सहज भाव से बोला-"कैसे आना हुआ? मुल्क की इंटेलीजेंस को हमारी याद केैसे आ गई? और देखो, मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है । मैं तुम्हें केवल पांच मिनट दे सकता हूं ! तुम मेरा मतलब समझ रहे हो ना मुझे कल के लिए संपादकीय लिखना है ।"

“इतने वक्त में मेरा काम हो जाएगा चोपड़ा ।"

“गुड । तो फिर मेरे सवाल का जवाब दो । कैसे आना हुआ ?"

"मुझें तुम्हारे किसी सवाल में कोई दिलचस्पी नहीं है चोपड़ा ।" मोहनलाल सपाट स्वर में बोला----------"मैं यहां तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं, तुमसे अपने सवाल का जबाब लेने अाया हूं ! दिलचस्प बात यह है कि तुमसे पूछने के लिए मेरे पास एक ही सवाल है, महज एक सवाल और मुझें पूरी उम्मीद है कि उसका जवाब तुम पूरी ईमानदारी से दोगे ।"

'" कोशिश करूंगा ।"

"मेरी सूरत को जरा गोर से देखो ।" मोहनलाल उसे गहरी नजरों से देखता हुआ बोला…“ओँर फिर याद करके बताओ कि मेरी शक्ल देखकर क्या तुम्हें कुछ याद आ रहा है?"

"क. ..क्या मतलब?" उसके अजीबोगरीब सवाल पर चोपडा अचकचाया । माथे पर अनायास ही वल पड़ गए ।

"मतलब ताजे आईने की तरह साफ़ है मिस्टर खबरनवीश ।" मोहनलाल लगातार उसकी आंखो में देखता हुआ बोला…“पत्रकार की आंखें और उसका दिमाग वहुत पैने होते हैं । मुझे देखकर जरा इमेजन करो कि अगर मेरे इस क्लीन शेव चेहरे पर चौदह इंच लम्बी ओसामा बाली दाढ़ी और लगभग वैसी मूंछे लगा दी जाएं तो क्या मैं तुम्हें मुस्तफा का जुड़वां भाई महसूस नहीं होऊंगा?"

पलक झपकते ही चोपड़ा के दिमाग पर सन्नाटा छा गया ।

आंखों की पुतलियां पथराकर मोहनलाल के चेहरे पर ठहर गई ।

“और मेरे पीछे खड़े मेरे इन दोनों जूनियरों के चेहरों में भी अगर थोड़ी--सी तब्दीली कर दी जाए तो ।" मोहनलाल संतुलित स्वर में कहता चला गया------"तब क्या तुम्हें इन दोनो के शक्ल में सैयद और नियाज़ के चेहरे नजर नहीं आएंगे? वही सैयद और नियाज़, जिन्होंने अपने दो अन्य साथियों के साथ चांदनी सिंह को अगवा करने का कारनामा अंजाम दिया था, जिसके बदले में सरकार को मुस्तफा को रिहा करना पड़ा था । गौर करो, खुद मेरे साथ साथ इन चारों के भी फोटो अपने अखबार में छापे थे ! "

चोपड़ा की पुतलियां हिली । उन्होंने बारी-बारी से मोहनलाल के दाएं-बाएं खड़े दोनों लड़को को देखा । ।

पलक झपकते ही चोपड़ा के जेहन में ऐसी सुनामी उभरी जिसने उसके अंदर भयंकर सनसनी पैदा कर दी थी ।

इस एहसास ने उसके चेहरे पर गहन आतंक के भाव काबिज कर दिए थे कि उसके सामने इस वक्त साक्षात मुस्तफा खडा़ है और वह भी अकेला नहीं बल्कि अपने दो जल्लादों साथ है ।
 
हलक से एक अजीब-सी हुंकार निकली और वह स्प्रिंग लगे किसी खिलौने की मानिन्द कुर्सी से उछलकर खड़ा हो गया ।

उसका इरादा जोर-जोर से चीखकर बाहर मौजूद सिक्योरिटी का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने का था ।

बदहवासी के आलम में वह यह भी भूल गया था कि उसका चेम्बर साउंडप्रूफ था, चीखने की तो क्या गोली की आवाज भी वहाँ से बाहर नहीं जा सकती थी । वह उस क्षण यह भी गूल गया था कि ऐसी इमरजेंसी के लिए उसकी विशाल मेज पर एक इमरजेंसी अलार्म का स्विच लगा था, जिसे पुश करते ही चैम्बर के बाहर तीखा अलार्म गूंज सकता था ।

मोहनलाल उर्फ मुस्तफा के हाथ में मौजूद रिवॉल्वर को देखते ही उसकी आवाज हलक में ही घुट गई थी । चेहरा फ़क्क पड़ गया था------आंखें आतंक से फटी रह गई थी ।

यह लिखा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि उसकी हालत शेर के सामने खड़े हिरन जैसी हो गई थी । अपनी तरफ तने रिवॉल्वर को देखते हुए उसे महसूस हुआ कि मुस्तफा किसी इंसान का नहीं प्रेत का नाम है । यम का दूत था वह, जिसे दुनिया का कोई भी पहरा रोक नहीं सकता था । उसके सामने गिड़गिड़ाने और जिन्दगी की भीख मांगने तक का होश न रहा । उसे तो बस यह लगा था कि आज उसकी अट्ठावन साला जिदगी का अंत आ पहुचा है और, सच था भी यहीं ।

"धांय . . . .धांय . . . धांय . . . !"

मुस्तफा के रिवॉल्बर ने तीन शोले उगले । पहला चोपड़ा के पेट में जा धंसा । दूसरे ने उसकी छाती में ठीक दिल वाले स्थान पर सुराख कर दिया तीसरा उसके माथे के अार-पार हो गया ।

नीचे गिरने से पहले ही वह लाश में तब्दील हो चुका था ।

सैयद और नियाज़ भाव शून्य चेहरा लिए खडे़ रहे ।

मुस्तफा ने धधकती, सुलगती अंतिम निगाह चोपड़ा पर डाली, फिर उसने नफरत से चोपड़ा की लाश पर थूक दिया ।

रिवॉल्वर वापस सफारी सूट में खोसा, सांसों को व्यवस्थित किया । फिर वे तीनों जैसे वहां आए थे वैसे ही सहज भाव से चलते हुए निर्विघ्न बाहर निकल गए । बाहर कदम-दर-कदम सिक्योरिटी चेन का पूरा अमला मौजूद था लेकिन उन्हें किसी ने नहीं रोका ।

जिन इंटेलीजेंस अफसरों के बारे में गृहमंत्रालय से आदेश मिला था उन्हें रोकने की गुस्ताखी भला कर भी कौन सकता था !

अॉफिस के बाहर उनकी एम्बेरडर तैयार खड़ी थी ।

तीनों के सवार होते ही गाड़ी आगे बढ़ गई ।

जैसे ही मुस्तफा की एम्बेस्डर से हटी, उसी क्षण पीछे से आकर एक अन्य एम्बेस्डर ठीक उसी स्थान पर रुकी, जहाँ एक पल पहले मुस्तफा की एम्बेस्खर खडी़ थी ।

उस एम्बेरुडर से सफारी सूट पहने जो शख्स बाहर निकला उसकी शक्ल मोहनलाल बने मुस्तफा से काफी मिलती थी ।

उसके साथ आए दोनों जूनियरों के साथ भी ऐसा ही था । वह आईबी की तरफ से आई इंटेलीजेंस अफसरों की वास्तविक टीम थी, उन्हें देखते ही चोपड़ा के सिक्योरिटी दस्ते में हड़कम्प मच गया ।

सुअर जैसी थूथनी वाला केंद्रीय रक्षामंत्री अपने पृथ्वीराज रोड स्थित सरकारी आवास में मौजूद था और एक ईजी चेयर पर पसार सुपारी चवा रहा था । उसके सामने रखा विशालकाय बावन इंच वाला एलईडी टेलीविजन अॉन था ।

उस पर थोड़ी देर पहले ही हुए प्रबल कुमार चोपड़ा के कत्ल की सनसनीखेज खबर प्रसारित हो रही थी ।

घटना से जुड़े मौकाए वारदात के बिजुअल्स भी दिखाए जा रहे थे । हंसराज ठकराल काफी संजीदगी तथा दिलचस्पी से वह सारा दृश्य देख और सुन रहा था । उसका निजी सचिव, जयदेव शस्त्री वहां पंहुचा ।

" आ जा शास्त्री ।” ठकराल टीबी का वाल्यूम म्यूट करता हुआ बोला---------"मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था ।”

" सॉरी ठकराल साहब! मुझें आने में जरा देर हो गई ।"

" कोई बात नहीं । बैठ ।"

" मैं ऐसे ही ठीक हूं ।"

"क्या खबर लाया ?"

" खबर अच्छी नहीं है ।"

" आंज कमबख्त एक भी अच्छी खबर सुनने को नहीं मिली । चोपड़ा की खबर तो तुझे लग ही चुकी होगी?"

"मुझे यया, सारी दुनिया को लग चुकी है । हाफिज के हथियार ने आखिर अपने दूसरे टार्गेट को हिट कर ही दिया ।"

“हाफिज का हथियार-------यानी मुस्तफा?”

" आपने ठीक समझा । मेरा दावा है कि यह काम मुस्तफा के अलाबा अोर किसी का नहीं हो सकता ।"

" तूं अपनी खबर सुना । क्या राजा चौरसिया हाथ आया ?"

"नहीं ठकराल साहब ।" शास्त्री के स्वर में खेद का पुट आ गया था---------"चौरसिया हमारे हाथ नहीं आया और अब इस बात में मुझें पूरा शक है किं वह हमारे हाथ कभी आएगा भी नहीं !"

"ऐसा क्या हुआ?

"अपना काम करके पंछी फुर्र हो गया है ।”

"फुर्र हो गया है!" ठकराल के चेहरे पर बड़े हाहाकारी भाव उभरे । वह कुर्सी पर सीधा होकर बैठता हुआ बोला…"यानी बीस हजार करोड़ की चाबी नवाब के हाथ में थमाकर वह अपनी राह लग गया । यही कहा न तूने?"

'"ह. . हां । मेरा यही मतलब है ठकराल साहब ।"

ठकराल के हाव-भाबों में अप्रत्याशित परिवर्तन अाया । वहुत ही तल्ख लहजे में बोला वह----"तूने तो कहा था कि मुम्बई का जो तेरा कांटेक्ट है, वह बहुत भरोसे का आदमी है और उसके रहते हमारा मिशन कभी फेल नहीं हो सकता ।"

"मैंने गलत नहीं कहा था ठकराल साहब । मुम्बई का वह कांटेक्ट वाकई बहुत भरोसे का था । यह मुम्बई के अंडरवर्ल्ड डॉन जहांगीर का अादमी था । दिल्ली में उसके जातभाई डबल एस के जरिए मैंने वहां तक पहुंच बनाई थी लेकिन हालात अचानक बदल गए । नवाब को सच मालूम हो गया और मुम्बई के अंडरवर्ल्ड में खून…खराबे के ऐसे हालात पैदा हो गए कि डबल एस के भरोसेमंद कौशिक ने इस काम से अपने हाथ खींच लिए और हमारा मिशन खटाई में पड़ गया ।"

“कौशिक की मां की आंख ।” ठकराल भड़ककर बोला------------"'मैंने तेरे से पहले ही कहा था कि चौरसिया बहुत काबिल हरामजादा है । वह शर्तिया बीस हजार करोड़ की चाबी ढूंढ़ निकालेगा । फिर भी तूने मेरी बात पर तवब्जो नहीं दी और वह मुम्बई से बाहर निकल गया ।"

""म. . मैंने बताया न कि ।" एकाएक शास्त्री थूक गटककर बोला-'"हालात अचानक पलटा खा गए थे । कौशिक ने नबाब के सामने सब कुछ बक दिया था । ऊपर से चौरसिया पहले से ही वहुत ज्यादा सतर्क था । उससे पहले जो तीन-तीन विदेशी हैकर मारे गए थे, उसका सच उसे मालूम हो चुका था ।”

“सत्यानाशा यह तूने वाकई वहुत बुरी खबर सुनाई है ।"

"आ. . आई एम सॉरी ठकराल साहब ।" वह बोला-------"'बीस हजार करोड़ पर अब नवाब काबिज हो चुका होगा ।"

"नवाब के तो फरिश्तों को भी उन बीस हजार करोड़ का राज मालूम नहीं हो सकता । क्या तू भूल गया कि इस दुनिया में केवल चुनिंदा लोग ही हैं जिन्हें उस रकम का रहस्य पता है और जिन्हें रहस्य पता है, उन लोगों में नवाब जैसे लोग कभी शामिल नहीं है सकते । नवाब तो महज बिचौलिया है-------असली खिलाड़ी तो कोई और है और वह रकम उसके कब्जे में पहुंच चुकी होगी !"

" असली खिलाडी है कौन? क्या आप उसे जानते है ?"

"जानता होता तो क्या मैं यहीं बैठा धार है रहा होता! उसकी मुंडी मरोड़कर सारा रुपया अपनी अंटी में नहीं खोंस चुका होता?"

“इसका मतलब वह रुपया आपके हाथ से निकल चुका है?"

"फिलहाल तू ऐसा कह सकता है शास्त्री, लेकिन हंसराज ठकराल की आंख में भी सुअर का बाल है । यह हमारे लिए भले ही वहुत करारी चोट है, लेकिन अभी सारे रास्ते बंद नहीं हुए है ।"
 
"यानी अाप अभी वह रुपया प्राप्त कर सकते है?”

"हां । सामने जब दौलत का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा हो तो हार मानने बाला दुनिया का सबसे अहमक अादमी होगा । वह दौलत का पहाड़ तो मैं हर हाल में हासिल करके ही रहूंगा ।"

"कैसे ठकराल साहब?" शासत्री के चेहरे पर भी उम्मीद रोशन हो गई थी…"ऐसा आप कैसे करेंगे?"

"बताने का वक्त नहीं आया है शास्त्री पर तू मेरे हर पाप में बराबर का भागीदार है, इसलिए जो कुछ भी होगा, उसमे हमेशा के तरह इस बार भी तेरा अहम रोल होगा ।”

""स. . .सो तो मैं जानता हूं ठकराल साहब, लेकिन. . . . .

“कहां अटक गया?"

"प्रबल कुमार चोपडा का कल्ल कोई मामूली घटना नहीं है, उसके लिए आपको जवाब देना पडे़गा ।"

"बो मैं दे लूंगा । तू चिंता न कर ।” ठकराल धाराप्रवाह अंदाज में कहता चला गया-------"मैंने तिहाड़ जेल से ताल्लुक रखता एक काम सौंपा था तुझे, उसका क्या हुआ"'

“सौरी ठकराल साहब ।" उसके स्वर में फिर खेद का पुट आ गया--“उथर से भी अच्छी खबर नहीं है ।"

"अब क्या हुआ यार?"

"पिछले दिनों दिल्ली की तिहाड़ जेल में यकीनन कुछ ऐसा हुआ

है जो नहीं होना चाहिए था । यह उड़ती हुई खबर मिली है कि उस घटना में तिहाड़ के एक कैदी की मौत हो गई थी ।"

" कैसे ?"

'"एक भारतीय कैदी ने एक पाकिस्तानी कैदी पर हमला कर दिया था । दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन खबर है कि वह कैदी एक ऐसा रिटायर्ड फौजी था, जो पाकिस्तान की जेल में हुई भारतीय कैदी समरजीत की हत्या की खबर पर बुरी तरह भड़क गया था और प्रतिरोधवश आक्रामक होकर पाकिस्तानी टेरेरिस्ट पर हमला कर बैठा था । प्रशासन ने बुरी तरह घायल पाकिस्तानी कैदी को अानन-फानन में अस्पताल पहुंचाया था । सुनने में आया था कि वह मरने से बच गया था, लेकिन असल में यह सच नहीं है ।"

"यानी पाकिस्तानी कैदी बचा नहीं था, मर गया था ?"

"मुझे जो इशारा मिला है, यह तो यहीं कह रहा है । लेकिन फिर कहता हूं यह केवल इशारा भर ही है । इस बारे में कोई भी दावा करने लायक सबूत मेरे पास नहीं है ।”

“पाकिस्तानी कैदी का नाम क्या था?”

"अभी यह भी मालूम नहीं हो सका है लेकिन मेरी कोशिश जारी है । इस सिलसिले में जैसे ही कोई पुख्ता जानकारी मेरे संज्ञान में आएगी, मैं फौरन आपको बताऊंगा ।"

ठकराल ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि मेज पर रखे तीन मोबाइल में से एक बजा ।

ठकराल ने स्कीन पर ब्लिंग करता नम्बर देखा और अनायास ही माथे पर वल पड़ गए । जेहन में सरगोशियां होने लगी । उसने कॉल रिसीव करने के जगह सिर उठाकर शास्त्री को देखा ।

शास्त्री ने इशारा समझा और वहां से चला गया ।

कक्ष का दरवाजा बंद होने पर ठकराल ने काल रिसीव की ।

"आदाब अर्ज है सरकार ।" दूसरी तरफ़ से एक पुख्ता लेकिन खुशामदभरा स्वर ठकराल के कानों में पड़ा ।

"त. . .तुम !" ठकराल गुर्राया-----"फोन क्यों किया?"

"गुस्सा न हों सरकार । वहुत जरूरी हो गया था ।"

"ऐसा क्या हो गया?"

“हुआ नहीं, होने वाला है ।"

"क्या होने वाला है ।"

"पता नहीं । लेकिन कुछ ज़रूर होने वाला है-----कुछ ऐसा, जो नहीं होना चाहिए ।"

"बात क्या है, साफ-साफ बोलो ।"

"उससे पहले सरकार कुछ बता देते तो ज्यादा बेहतर होता?"

"क्या जानना चाहते हो ?"

"क्या बीस हजार करोड़ वाला एकाउंट हैक हो गया है?"

"यह सवाल किसलिए?" ठकराल के कान खड़े हो गए ।

“आप जानते हो सरकार, मेरे सबाल बेवजह नहीं होते । मालूम है तो जबाव दो ।”

"मुझें हुक्म दे रहे हो?”

"अर्ज कर रहा हूं !"

"मेरे पास अभी तक ऐसी कोई इन्फारमेशन नहीं है कि उस एकाउंट को हैक कर लिया गया है ।"

"गुस्ताखी माफ़ करें सरकार ।" दूसरी तरफ़ से उभरता विनम्र स्वर दृढ़ हो गया-------"'आप झूठ बोल रहे है !"

“अच्छा!” ठकराल चिंहुककर बोला-----“मैँ झूठ बोल रहा हूं ! क्या झूठ बोला मैंनें !"'

"आपने एकाउंट के बारे में जो भी बताया, वह सरासर झूठ है !" उभरने वाला स्वर पहले जैसी दृढता से बोला------"'सच यह है कि वह एकाउंट न केवल हैक कर लिया गया है, बल्कि उसमे जमा सारा-का-सारा रुपया निकाल लिया गया है ।"

"यह तुम क्या बकवास कर रहे हो?"

"मैं सच कह रहा हूं सरकार और यह भी सच है कि आप इस सच से बखूबी वाकिफ है !"

“शटअप ठकराल ने उसे डपट भले ही दिया हो मगर सच्चाई ये थी कि वह उसकी सटीक जानकारी पर हैरान हुए बगैर न रह सका था-----"ऐसा कुछ नहीं है । मुझे केवल इतना पता है कि चौरसिया अपने काम में जुटा हुआ है, पर अभी उसे कामयाबी नहीं मिली है !"
 
"आपका यह झूठ आपकी नीयत की स्पष्ट चुगली कर रहा है सरकार । आप दाई से पेट छुपाने की कोशिश कर रहे है । आप शायद भूल गए कि आपकी उस बीस हजार करोड़ वाले एकाउंट का राज़ मैंने ही बताया था और इस शर्त के साथ बताया था कि अगर आप उस रकम को हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं तो उन बीस हजार करोड़ रुपयों में से आधे का हकदार मैं होऊंगा और बाकी आधा अपके हिस्से में आएगा । याद है न? "

"याद है । आगे बोलो ।”

“आपकी नीयत में खोट आ गया है ठकराल साहब । आप पूरे बीस हजार करोड़ हथियाने का ख्वाब देखने लगे हैं । आपकी यह इंकारी आपके उसी खोट का सबूत है ।"

"बकवास बंद करों ।”

"बकवास तो कर रहा है साले मोटी चमड़ी वाले गुंडे?" दूसरी तरफ़ मौजूद शख्स धैर्य का बांध जैसे एकाएक टूट गया था और वह बिफर पड़ा था…“इसीलिए तुम खद्दरवालों की नस्ल से भी यह दुनिया नफरत करती है ।”

"ठहर जा स्वामी ।" मारे अपमान के ठकराल का चेहरा सुर्ख हो गया था…“मुझे गाली देता है?"

"खैर मना कि तू इस वक्त मेरे सामने नहीं है । होता, तो गाली नहीं देता, सीधे गोली मार देता तुझे । मगर कोई बात नहीं, तेरे जैसे सुअर से हिसाब बराबर करने का मेरे पास बहुत वक्त है । तेरे लिए इस राज का पाश ही कयामत वन सकता कि मुल्क के केद्रीय रक्षामंत्री के ताल्लुकात जैसे लोगों से है । तेरी सरकार के पास इस बात का सबूत पहुंचने की देर है, रक्षामंत्री की कुर्सी कल ही तेरे नीचे से खिसक जाएगी ।"

ठकराल के तेवर तुरंत ढीले पड़ गए ।

"लेकिन घबरा मत कुत्ती नसल के इंसान । फिलहाल मैं ऐसा नहीं करूंगा । जानता है क्यों?"

ठकराल खामोशी से सुनता रहा ।

"क्योकि मुझे पता है कि तेरी इस कमीनगी के बावजूद तेरे हाथ कुछ नहीं अाने वाला । बताऊं क्यों?"

"आपका यह झूठ आपकी नीयत की स्पष्ट चुगली कर रहा है सरकार । आप दाई से पेट छुपाने की कोशिश कर रहे है । आप शायद भूल गए कि आपकी उस बीस हजार करोड़ वाले एकाउंट का राज़ मैंने ही बताया था और इस शर्त के साथ बताया था कि अगर आप उस रकम को हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं तो उन बीस हजार करोड़ रुपयों में से आधे का हकदार मैं होऊंगा और बाकी आधा अपके हिस्से में आएगा । याद है न? "

"याद है । आगे बोलो ।”

“आपकी नीयत में खोट आ गया है ठकराल साहब । आप पूरे बीस हजार करोड़ हथियाने का ख्वाब देखने लगे हैं । आपकी यह इंकारी आपके उसी खोट का सबूत है ।"

"बकवास बंद करों ।”

"बकवास तो कर रहा है साले मोटी चमड़ी वाले गुंडे?" दूसरी तरफ़ मौजूद शख्स धैर्य का बांध जैसे एकाएक टूट गया था और वह बिफर पड़ा था…“इसीलिए तुम खद्दरवालों की नस्ल से भी यह दुनिया नफरत करती है ।”

"ठहर जा स्वामी ।" मारे अपमान के ठकराल का चेहरा सुर्ख हो गया था…“मुझे गाली देता है?"

"खैर मना कि तू इस वक्त मेरे सामने नहीं है । होता, तो गाली नहीं देता, सीधे गोली मार देता तुझे । मगर कोई बात नहीं, तेरे जैसे सुअर से हिसाब बराबर करने का मेरे पास बहुत वक्त है । तेरे लिए इस राज का पाश ही कयामत वन सकता कि मुल्क के केद्रीय रक्षामंत्री के ताल्लुकात जैसे लोगों से है । तेरी सरकार के पास इस बात का सबूत पहुंचने की देर है, रक्षामंत्री की कुर्सी कल ही तेरे नीचे से खिसक जाएगी ।"

ठकराल के तेवर तुरंत ढीले पड़ गए ।

"लेकिन घबरा मत कुत्ती नसल के इंसान । फिलहाल मैं ऐसा नहीं करूंगा । जानता है क्यों?"

ठकराल खामोशी से सुनता रहा ।

"क्योकि मुझे पता है कि तेरी इस कमीनगी के बावजूद तेरे हाथ कुछ नहीं अाने वाला । बताऊं क्यों?"

ठकराल अब भी खामोश रहा ।

“क्योंकि उस रकम में कुछ और रकम जुड़कर आईएसआईएस के हाथ में पहुंच चुकी है ।"

"आईएस के हाथ में! क्यों?”

"एएसबी की कीमत के तौर पर ।”

"एएसवी?" ठकराल चौंक पड़ा…“यह क्या है?”

"एटामिक स्पेस वेपन । यह परमाणु की ताकत से चलने वाला एक ऐसा, वहुत ही विनाशकारी हथियार है, जो ईराक से आईएस को हासिल हुआ है । मगर जिसका ईजाद दूसरे महायुद्ध के वाद अमरीकियों और रशियनों ने किया था ।"

“उसे स्पेस वेपन क्यों कहते हैं !"

“क्योंकि वह सचमुच स्पेस वेैपन है । उसका इस्तेमाल केवल स्पेस (अंतरिक्ष) में ही किया जाता है, जमीन पर या समुद्र में नहीं । उसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में ऐसी कयामत ला सकता है, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता-तूं भी नहीं । पहली बार हमारे किसी जेहादी संगठन के हाथ कोई इतना विध्वंसक हथियार लगा था मगर अफ़सोस, आईएस का रास्ता हमारे बाकी जेहादी संगठनों से अलग है, इसलिए वह हमें सहयोग करने को तैयार नहीं है । हमें आईएस को उसकी माकूल कीमत चुकाकर ही हासिल हो सकता था और आईएस ने उसकी कीमत बाईस हजार करोड़ रुपए लगा रखी थी…बाइंस हजार करोड़ ।"

ठकराल भौंचवका-सा होकर उसका हर लफ्ज सुन रहा था ।

"इतनी रकम हमारे पास नहीं थी ।" आवाज पुन: उभरी…“इस फ्रंट पर हमारे सरपरस्त मुल्क पाकिस्तान ने भी हाथ रव्रड़े कर दिए थे । परिणामस्वरूप वह वेपन हम सबके लिए एक सपना बनकर ही रह गया था । हम लोग दो-तीन जेहादी संगठन मिलकर भी उसे खरीदने में सक्षम नहीं थे । ऐसे में मुझे उस बीस हजार करोड रुपए की बरबस ही याद हो अाई, जो इतने बरसों से एक बैंक एकाउंट में पड़ा सड़ रहा था । अगर उस बीस हजार करोड़ में से दस हजार करोड़ भी हमारे हाथ लग जाता तो हमारे लिए आईएस को बाईस हजार करोड़ रुपया चुकाना आसान हो जाता ! इसीलिए मैने तेरे साथ यह सौदा किया था और तुझे उस एकाउंट के बारे में बताया था । लेकिन तूं हरामजादा निकला ।"

"एक हरामजादा दूसरे हरामजादे से इस तरह पेश नहीं आता बेवकूफ । वेैसे मैं इस बात पर सख्त हैरान हूं कि मेरे मुल्क के उस फेक एकाउंट के बारे में मुझे तुझसे पता लगा, जिसमें मेरे ही मुल्क के किसी शख्स का इतना बेशुमार वाला धन जमा था ।”

"ऐसा इसलिए हुआ ठकराल क्योंकि उस एकाउंट में जमा सारा बीस हजार करोड़ रुपया मेरे अपने मुल्क पाकिस्तान का है !”

“तो फिर वह रुपया हमारे मुल्क में कैसे आया?"

"रिश्वता बतौर रिश्वत वह रुपया तेरे मुल्क में दिया गया था ।"

“किसको दिया गया था वह रुपया?"

"वह तेरी इंटेलीजेंस का एक बड़ा अधिकारी था । उसकी मौत की वजह अंतत: वह बीस हजार करोड़ की रिश्वत ही वनी !”

"इतनी बड़ीं रिश्वता मुझे यकीन नहीं होता ।"

"जो काम तेरे उस गद्दार अधिकारी ने हमारे लिए किया था, उसके बदले यह कीमत तो बहुत कम थी । वेैसे तेरे यकीन करने या न करने से मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह रकम तो अब तेरे हाथ भी नहीं आने वाली । वह तो अब बता ही चुका हूं कि आईएसआईएस के हाथों में पहुॉच चुकी है और मेरी यह खबर सौ फीसदी सच है । यह अलग बात है कि यह कारनामा हाफिज लुईस साहब के संगठन ने अंजाम नहीं दिया लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है । जिसने भी किया होगा, हमारी अपनी कौम का ही कोई जांबाज होगा और देख लेना, वह उसका इस्तेमाल बहुत जल्दी तेरे मुल्क के खिलाफ़ ही करेगा । लेकिन असल में तो तरस मुझे तेरे ऊपर अा रहा है ठकराल । तुझे तो न खुदा मिला, न ही बिसाले सनम । आक थू !”

दूसरी तरफ़ से फोन डिस्कनेक्ट हो गया ।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमित लूथरा ओमकार चौधरी के फार्म हाउस पर पहुचा । उसके साथ एनएसजी का एक अफ़सर भी था ।

उसका नाम दामोदर था ।

"आओ कमिश्नर पधारो ।" लूथरा को देखते ही चौधरी के चेहरे पर व्यंगात्मक भाव आ गए------"तुम्हारी शक्ल यहाँ देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है, उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता हैं कहते-कहते उसकी नजर दामोदर पर पड़ीं । बोला…“ये रंगरूट कौन है?"

अमित लूथरा ने असीम धैर्य का परिचय देते हुए दामोदर के बारे में बताया…“इन्हें गृहमंत्रालय की तरफ़ से सास आपकी सुरक्षा के लिए भेजा गया है । ये अपनी पूरी टीम के साथ अाये है ।”

"कमाल है ।" चौधरी ने आश्चर्य जताया था…“इसका मतलब सरकार को याद है कि मुझे सुरक्षा की जरूरत है ।”

"चौधरी साहब ।” कमिश्नर लूथरा पूर्ववत धैर्य से बोला----- मैं किसी राजनैतिक दल का आदमी नहीं हूं । सरकारी आदमी हूं और उसी के आदेश पर अपनी डूयूटी निभाने आया हूं ।"

"तुम जैसा ही एक अफ़सर डूयूटी निभाने चोपड़ा के पास पहुंचा था । जानते हो क्या हुआ ?"

"जो हुआ, उसका हम सबको अफ़सोस है ।”

"केवल अफ़सोस है, बस !”

"जो भी कार्यवाई की जा सकती है, की जा रही है । एनएसजी को जांच सौप दी गई है ।"
 
"सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा बोला जाने वाला यह डायलाग इतना घिस-पिट गया है कमिश्नर कि टीवी पर सुनते-सुनते अब तो जनता भी पक गई है । मैं ही नहीं, सारा देश ऐसी घोषणाओं की सच्चाई से वाकिफ़ है । हकीकत ये है कि यह एक निहायत ही नकारा सरकार है और इसका खुफिया तंत्र भी वेसा ही नकारा है । मैं पूछता हूं चोपड़ा को मारने के लिए जो दहशतगर्द सारे सिक्योरिटी सिस्टम को धता बताकर उसके पास पहुच गए, उन्हें आखिर आईबी का सीक्रेट कैसे मालूम हुआ उन्हें यह राज़ किसने बताया कि आईबी की एक टीम किसी पूछताछ के लिए चोपड़ा के पास जाने वाली है और आफिसर का नाम मोहनलाल है? जबाव दो कमिश्नर ।"

लूथरा के पास कोई जबाब होता तो देता ।

"जाहिर है कि यह राज उसे आईबी से ही मालूम हुआ होगा कुपित चौधरी कहता गया-------"इसका मतलब मुल्क की इंटेलीजेंस ब्यूरो जैसी संस्था के वहुत अंदर तक दहशतगर्दों की पकड़ है । मैं तुमसे सवाल करता दूं कमिश्नर, जो आतंकी आईबी जैसे अभेद्य माने जाने वाले खुफिया संस्थान में घुसपैठ कर सकते हैं, उनके लिए एनएसजी में कर लेना क्या मुश्किल काम होगा? रही बात सिविल पुलिस की, उसके बारे में तो कहने ही क्या!" उसने दामोदर की तरफ देखा…“क्या नाम बताया था तुमने इसका? "

"दामोदर ।” लूथरा ने बताया ।

"यह गूंगा है क्या?"

"नहीं जनाब ।" दामोदर बोला-“मेरा नाम दामोदर है । दामोदर फ्रांम नेशनल सिक्योरिटी गार्ड अॉफ इंडिया ।"

चौधरी ने कहा…“यानी गूंगा नहीं है । लंगडा-लूला, अंधा, बहरा भी नहीं होगा । फिर भी मुझे यह नहीं चाहिए और न ही इसकी टीम की शक्ल देखना चाहता हूं । इसे लेकर लौट जाओ और दोबारा मेरे फार्म हाउस पर मत आना ।"

“चौधरी साहब ।" लूथरा विरोधपूर्ण स्वर में बोला------" आपकी जान को खतरा है । खुफिया एजेंसियां इस बारे से अलर्ट. . ."

"शटअप कमिश्नर ।" चौधरी बिफरकर बोला------"बंद करो अपनी बकवास और जो मैंने कहा है उस पर अमल करो । मुझे न तो तुम्हारी सरकार पर भरोसा है और न ही उसकी मुहैया कराई गई सुरक्षा व्यवस्था पर । मेरी सुरक्षा के लिए पहले से तुम्हारे महकमे और सरकार ने जो लोग लगा रखे हैं, चाहो तो भी ले जा सकते हो । मैंने यह काम एक निजी सिक्योरिटी कम्पनी को सौप दिया है ।"

लूथरा तिलमिलाया !

दामोदर भी तिलमिलाया था लेकिन दोनों ने आपको संयत रखा ।

"अच्छी बात है चौधरी साहब ।" लूथरा बोला------"आपकी यही जिद है तो मैं कुछ नहीं कर सकता।”

चौधरी ने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया ।

लूथरा दामोदर के साथ वापस चला गया ।

तभी यहाँ जसवंत अत्री पहुंचा ।

"क्या खबर है अत्री?” चौधरी ने सवाल किया ।

“खबर अच्छी है ।” अत्री बोला…"हमारे समर्थकों ने काफी भीड़ जुटा ली है । दस हजार से कम नहीं होगी ।"

"निरंजननाथ की क्या पोजीशन है?"

“महारैली के लिए कल रात से ही लोगों का हुजूम दिल्ली में इकट्ठा हो रहा है । ताजा आकड़ों के मुताबिक आधा घंटा पहले तक एक लाख से ज्यादा लोग रामलीला मैदान में इकट्ठा हो चुके थे !! गुलशन और चोपड़ा की हत्या ने सारे मुल्र में उबाल ला दिया है । उसका भी महारैली को पुरा फायदा मिलेगा । निरंजननाथ को पांच लाख लोगों के आने की उम्मीद है, लेकिन मौजूदा हालत में यह भीड छ: लाख भी हो सकती है-------उससे ज्यादा भी ।"

"बहुत खूब !” चौधरी का चेहरा दमक उठा-----" मेरा भी कुछ ऐसा ही ख्याल था । यदि सचमुच ऐसा हो गया अत्री, तो यकीन मानो, यह सरकार अाज ही गिर जाएगी, या आज़ ऐसे हालात बन जाएंगे, जो आने वाले कल में सरकार के पतन का कारण बनेंगे ।"

अत्री खामोश रहा ।

" हम रेैली स्थल के लिए कब रवाना होंगे" उसने पूछा ।

"जब निरंजननाथ मंच पर पंहुच जाएगा ।"

"उसने तो दोपहर दो बजे का वक्त दे रखा है ।"

"मुझे पता है, वह पांच से पहले मंच पर नहीं पहुंचेगा ।"

"सवाल ही नहीं उठता चौधरी साहब ।"

"हम साढे पाच बजे पहुंचेंगे । उसकी मंच पर मौजूदगी में अपने हजारों समर्थकों के साथ पहुचने का अलग ही असर होगा । अभी क्या वत्त हुआ है?"

"एक बजने वाला है ।" अत्री ने रिस्टवॉच देखी !

"अभी वाकी वक्त है । तब तक हमारे समर्थकों की तादाद में और इजाफा करने की कोशिश करो । हम अभी आते हैं ।"

“जी !"

ओमकार चौधरी वहां से चला गया ।

चौधरी जव दिखाई देना बंद हो गया तो अत्री के हाव-भाव चेंज हो गए । जेब में पड़े मोबाइल पर एक ब्लैंक मैसेज सेंड करके किसी को सिग्नल दिया ।

चौधरी बेडरूम में पहुंचा ।

वहां एक तहखाना था ।

तहखाने के बारे में चौधरी के इक्का-----दुक्का विश्वासपात्रों को छोड़कर अन्य कोई नहीं जानता था ।

यह तो चौधरी के अलावा शायद ही किसी को मालूम था कि तहखाने में सुरंग के रूप में एक खुफिया रास्ता भी था ।

उसके जरिए अपात स्थिति में किसी की नजरों में आए बगैेर फार्म हाउस की इमारत से बाहर निकला जा सकता था या फिर चुपचाप इमारत में प्रवेश किया जा सकता था ।

चौधरी सीढि़यां उतरकर तहखाने में पहुचा ।

वहां हर तरफ़ अंधेरा था ।

ऊपर का प्रवेश द्वार उसने मजबूती के साथ बंद कर दिया था ।

दाई दीवार में लगे कुछ स्विच दबाए, परिणामस्वरूप समूचा बेसमेंट एलईडी की दूधिया रोशनी से जगमगाने लगा ।

चौधरी उस दरवाजे की तरफ़ बढ़ा, जो खुफिया रास्ते के दहाने पर था ।

मगर तभी, ठिठककर रुक गया ।

अपने पीछे उसे किसी आहट का एहसास हुआ था ।

फुर्ती से एडि़यों पर घूमा ।

अगले पल दिलो दिमाग पर विजती--सी गिरी ।

उपर की सांस उपर, नीचे की नीचे ।

उसके सामने मुस्तफा खड़ा था ।

साक्षात मुस्तफा!

हालांकि वह मोहनलाल के भेश में था लेकिन अब सारी दुनिया उसे इसी वेश में तो पहचानती थी क्योंकि चोपड़ा के आँफिस लगे सीसीटीवी की यह फुटेज कई-कई बार देश के सभी न्यूज चैनल्स पर चल चुकी थी जिसमें वह चोपड़ा को गोली मार रहा था ।

ओमकार चौधरी के होश उड़ा देने के लिए इतना काफी था कि वो जल्लाद उसके सामने खड़ा था ।

केरेले पर नीम चढ़ा यह कि उसके हाथ में रिवॉल्वर भी था और जाहिर है कि रिवाल्वर का भाड़-सा मुंह उसे ही घूर रहा था ।

चौधरी की सिट्टीं पिट्टी गुम करने के लिए और क्या चाहिए यहाँ हलक से बदहवास-सा स्वर निकल----"म----------मुस्तफा! तुम यहां?"

"यकीन नहीं हो रहा न चौधरी साहब !" उसे अपने रिवॉल्वर के निशाने पर लिए मुस्तफा कुटिल स्वर में बोला ।

"त. . .तुम यहां कैसे पहुंच गए?"
 
"बौखलाहट की ज्यादती के कारण तुम बेवकूफी वाले सवाल पूछ रहे हो चौधरी! यहाँ आने के केवल दो ही तो रास्ते हैँ-एक वह, जिससे तुम यहाँ आए और दूसरा वह, जिससे तुम यहां से बाहर जाना चाहते थे । अपने चारों तरफ़ तुमने जो अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था का जाल फैला रखा है, उसके चलते पहला रास्ता तो मैं इस्तेमाल कर नहीं सकता था । अब कौन---सा बचा?"

"मगर ।" चौधरी के दिल ने वहुत देर बाद धड़कना शुरू किया था । होंठों से फिर भी फंसा हुआ-सा स्वर निकला…"'त...तुम्हें खुफिया रास्ते के बारे में कैसे पता लगा !"

“दिमाग पर जोर डालकर सोचो कैसे पता लगा होगा ?"

"इ. . .इस खुफिया रास्ते के बारे में गिने-चुने लोगों को ही पता है । म.........मेरे साथ धोखा हुआ है । म.. .मेरा कोई अपना गद्दार हो गया ?"

“इस मुल्क का तो इतिहास ही गद्दारों ने लिखा है । जयचंदों की इस दुनिया में किसी वफादार का दगाबाज हो जाना क्या बड़ी बात है! हम तो हमेशा ऐसे ही लोगों का फायदा उठाते रहे हैं ।"

"म. . .मुझे उसका नाम बताओ !"

"क. . .क्या करोगे जानकर चौधरी साहब । हमारी कौम के ऐसे बाशिंदे तो तुम्हारे मुल्क के हर जर्रे पर मिल जाएंगे । तुम तो वहुत छोटे नेता हो, हमारे जांबाज तो पीएमओ के अंदर भी घुसे हुए । किस-किसका नाम पूछोगे?”

"ल. . लेकिन मुझसे तुम्हारी क्या दुश्मनी है?"

"हैरानी है कि तुम मुझसे यह सवाल पूछ रहे हो चौधरी । लगता है मौत के खौफ़ ने तुम्हारा दिमाग हिला दिया है । मुझे इस मुल्क में ऐसे किसी भी सियासत दां को जीते देखना मंजूर नहीं, जिसके अंदर राष्ट्रवाद का कट्टरपंथ हिलोरें मारता हो । सहारे इस कट्टरपंथ ने हमारे जेहाद को बहुत नुकसान पहुंचाया । जिंदा रहे तो और ज्यादा नुकसान पहुचाओगे । तुम्हें देखकर तुम जैसे और कुकुरमुत्ते भी पैदा हो सकते हैं । उनके होने से पहले ही यह नजीर पेश करना जरूरी है कि ऐसे लोगों का हम क्या अंजाम करते है । अपने भगवान को याद कर लो ।”

" न.......नहीं मुस्तफा ।" चौधरी विरोधपूर्ण स्वर में जल्दी से बोला । चेहरा पहले ही पीला ज़र्द पढ़ चुका था-----“गोली मत चलाना । एक मिनट के लिए मेरी बात सुनो । मैं तुम्हें कोई राज. . ."

मुस्तफा उसकी बात सुनने के मूड में नहीं था ।

“धांय. . . धांय . . .धांय !!!"

उसके रिवॉल्वर ने तीन बार आग उगली और तीनों धमाकों की आवाज साउंडप्रूफ़ बेसमेंट में दफन होकर रह गई ।

ओमकार चौधरी के फार्म हाउस से लौटने के बाद कमिश्नर लूथरा ने पुलिस हेडक्वार्टर में स्थित अपने आँफिस में कदम रखा ही था कि उसे चौधरी के कत्ल की सनसनीखेज खबर सुनने को मिली ।

लूथरा सन्नाटे में आ गया ।

उसका रोया-रोया खड़ा हो गया ।

उलटे पांव अॉफिस से बाहर निकला तो एसीपी नेगी को अाते देखा । वह लूथरा को सल्यूट मारने के बाद उखड़ी सांसों के साथ बोला----“चौधरी के बारे में तो अापको पता लग ही गया होगा सर!"

"हां ।" लूथरा ने आंदोलित भाव से कहा-------"‘ मैॉ वही जा रहा था । वैसे मैं अभी वहीं से आ रहा हूं ! कितना समझाया था चौधरी को लेकिन वह नहीं माना । पहले हमारा वह जांबाज इंस्पेक्टर गुलशन राय फिर चोपड़ा और अब ओमकार चौधरी। राजधानी के अंदर यह केैसी कयामत आई हुई है ।" उसने शीघ्र ही खुद को संयत किया फिर नेगी को देखकर सवाल किया----“लेकिन तुम ?"

"मैं भी इसी सिलसिले में आपके पास आया हूँ ।" नेगी ने जल्दी से कहा…“दरअसल मेरे पास एक वहुत अहम खबर है ।"

"जल्दी बताओ?"

“ओमकार चौधरी का एक वहुत खास आदमी टेरेरिस्टों से मिला हुआ है । हमने समय रहते इस सच को भांप लिया था ओंर उस दगाबाज को गिरफ्तार करने के बिल्कुल करीब पहुच गए है, लेकिन मात खा गए थे ।”

“किसकी बात कर रहे हो?”

नेगी ने एक ही सांस में बता दिया कि उसने किस तरह आईबी के निलम्बित एजेंटों पर भरोसा करके आर्या को फ्फड़ा था और फिर आर्या की जुबानी किस तरह जसवंत अत्री के वारे में पता लगा था ।

पहले तो लूथरा भोंचक्क अवस्था में नेगी की तरफ देखता रह गया फिर दांत पीसता बोला--""इंस्पेक्टर आर्य कहां है?”

"कस्टडी में है । हम जसवंत को रंगे हायों गिरफ्तार करना चाहते थे, इसीलिए आर्या के जरिए उसे मुलाकात के लिए बुलाया था और जसवंत ने अनि के लिए कह भी दिया था मगर नहीं आया । हम इंतजार करते रहे । बस । यहीं हम मात खा गए । जसवंत मेरी उम्मीद से ज्यादा शातिर निकला । या फिर शायद उस कमीने आर्या ने ही उसे फोन पर कोई गुप्त इशारा कर दिया था, जिसे हम समझ नहीं पाए और दुश्मन अपना खेल खेलने से कामयाब हो गया ।"

अब तक तो जसवंत अंडरग्राउंड हो गया होगा !

"मैंने अलर्ट जारी कर दिया है । जसवंत जहाँ भी नजर जाएगा, उसे निराकार कर लिया जाएगा ।"

"बाकी बातें बाद में होंगी । फिलहाल मेरा मौकाए वारदात पर पहुंचना जरूरी है । मेरे साथ आओ ।"

"सॉरी सर ।" नेगी ने अपनी जगह से हिलने तक की कोशिश नहीं की । वह दृढ़तापूर्वक बोला-----इस वक्त आपका चौधरी के भी हाउस पर नहीं बल्कि कहीं और पंहुचना बेहद जरूरी है । इसीलिए मैं भागता हुआ अपके अॉफिस की तरफ़ अा रहा था ।"

“कहां?" लूथरा चौंका था ।

“निरंजननाथ के पास । टेरेरिस्टों का अगला निशाना वही होगा । वह महारैली के लिए निकलने ही वाला होगा । हमें हर हाल में निरंजननाथ को वहां जाने से रोकना होगा सर ।"

"यह मुमकिन नहीं है नेगी, ऐसी कोशिश खुद होममिनिस्टर साहब करके देख चुके हैं लेकिन निरंजननाथ नहीं माना ।"

"तब और अब में फ़र्क है । मेरे ख्याल से अगर वर्तमान हालात में समझाया जाए तो यह अपना फैसला बदल सकता है । रामलीला मेैदान में इस वक्त लाखों की भीड़ इकट्ठा है । अाप खुद सोचिए, यदि यहीं निरंजननाथ के साथ कोई अनहोनी होती है तो उसका नतीजा कितना भयानक हो सकता है । बहां मचने बाली भगदड़ हजारों लोगों को मौत के घाट उतार सकती है और मुमकिन है कि टेरेरिस्टों का असली मकसद भी यहीं हो ।"

"यही है ।" लूथरा दल भींचकर कह उठा------"हंड्रेड परसेंट उन शैतानों का मकसद यहीं है लेकिन निरंजन समझे तब ना गृहमंत्रालय की तरफ़ से ऐसी कोशिश दोबारा भी की जा चुकी है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला । वह अपने कदम वापस लेने को तैयार नहीं है । उसे लग रहा है कि सरकार उससे डर गई है । झूठ बोलकर हम रुकवाने की फिराक में है । वैसे भी वह अपनी राजनीति चमकाने का मौका नहीं गंवाना चाहता ।"

"जब वही नहीं रहेगा तो राजनीति का क्या होगा !''
 
"कौन समझाए उसे?''

"तब तो एक ही तरीका बचता है सर ।"

" क्या?"

"उसकी गिरफ्तारी?"

" निजी तौर पर मैं तुमसे सहमत हूं एसीपी । लेकिन यह एक बड़ा मामला है । निरंजननाथ की गिरफ्तारी का फैसला मैं अकेला नहीं ले सकता ! इसके लिए गृहमंत्रालय की परमीशन लेनी होगी !"

" तो लिजिए सर ! उन्हें हालात के बारे में समझाइए ! हमें निरंजननाध को हर हाल में रोकना होगा !"

लूथरा ने अपना मोबाईल निकाल लिया !

बुरी तरह चिंतित नजर आ रहा आईबी का चीफ़, बलवंत राव उस वक्त अपने आँफिस में बैठा सिगार फूक रहा था, जिस वक्त कल्याण होलकर ने अंदर कदम रखा ।

बलवंत ने चौंककर पूछा-------" यहां क्यों आए हो?"

"जरूरी काम था सर ।" होलकर सपाट स्वर में बोला ।

तब भी तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था ।" बलवंत शुष्क स्वर में बोला-------''एक सस्पेंडिड अॉफिसर का मुझसे कोई काम नहीँ हो सकता-----एक ऐसे सस्पेंडिड आफिसर का तो हरगिज नहीं, जिसके खिलाफ जांच भी चल रही हो ।"

"वो अलग विषय है सर, फिलहाल..

"देखो होलकर ।" बलवंत उसकी बात काटकर बोल-----'' पहले ही बहुत परेशान हूं ! अभी मुझें बख्शो ।"

"क्या आपकी परेशानी की वजह जान सकता हूं ?"

"वो तो अंधे को भी दिखाई दे जानी चाहिए । पिछले तीन दिन से मुम्बई से दिल्ली तक जो कुछ हो रहा है, उसने हुकूमत की चूलें हिला दी हैं और देश की बड़ी खुफिया संस्था के कारण आईबी पर भी इसकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ।"

"जिम्मेदारी थी सर, लेकिन अब नहीं है ।” होलकर अपने एक एक शब्द पर जोर देता बोला ।

"क्या मतलब?" बलवंत ने उसे घूरकर देखा था ।

"में सस्पेंड जरुर हो गया हूं लेकिन अच्छी तरह जानता हूं कि आईबी का क्या काम है ।" होलकर कहता चला गया--"आईंवी का काम है------समय रहते सरकार को अलर्ट कर देना और. ..बो आईबी कर चुकी थी यानी अपना फर्ज निभा चुकी थी ! आईबी ने सरकार को आगाह किया था कि खुला घूम रहा मुस्तफा क्या-क्या क्या कर सकता है ! उसके बाद भी अगर सुरक्षा बल उसे नहीं रोक पा रहे हैं तो इसमें आईबी क्या कर सकती है ?"

"में सस्पेंड जरुर हो गया हूं लेकिन अच्छी तरह जानता हूं कि आईबी का क्या काम है ।" होलकर कहता चला गया--"आईंवी का काम है------समय रहते सरकार को अलर्ट कर देना और. ..बो आईबी कर चुकी थी यानी अपना फर्ज निभा चुकी थी ! आईबी ने सरकार को आगाह किया था कि खुला घूम रहा मुस्तफा क्या-क्या क्या कर सकता है ! उसके बाद भी अगर सुरक्षा बल उसे नहीं रोक पा रहे हैं तो इसमें आईबी क्या कर सकती है ?"

बलवंत राव हैरानी से होलकर को देखता रह गया ।

इज्जात हो तो मैं बैठ जाऊं?" होलकर ने पूछा ।

बलवंत राव ने न इंकार किया, न सहमति जताई ।

होलकर एक विजिटर चेयर पर बैठ गया ।

बलवंत राव ने होलकर को वहुत गौर से देखते हुए, वड़ा अजीब सवाल किया---" तुम क्या मुझे खुश करने आए हो?"

"ज. . .जी!" सकपका गया था ।

सिगार का लम्बा कश लेने के बाद बलवंत राव कुर्सी पर पहलू बदलता हुआ बोला------“पहली बात, मुस्तफा की चांदनी से अदला-बदली में हमने मुंह की खाई । दूसरी बात, आजाद होने के बाद मुस्तफा पाकिस्तान नहीं गया बल्कि हमारे मुल्क में ही दनदनाता घूम रहा है और हम यह पता नहीं लगा पा रहे कि बह कब कहां होगा और क्या करेगा, यह किसकी नाकामयाबी है! हमारी ही ना"

होलकर के मुंह से बोल न फूट सका ।

"इसलिए कहा कि तुम शायद मुझे खुश करने आए हो ।" वह कहता चला गया------“आईबी का चीफ होने के नाते मैं यह सोचकर खुश नहीं हो सकता कि मैंने अपना फर्ज निभा दिया है, अब देश में भले ही चाहे जो होता रहे । दो नाकामियां तो मैं तुम्हें अपनी बता ही चुका हूं लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती ।"

"मैं समझा नहीं सर ।"

"मुस्तफा आज जो कुछ भी कर रहा है, वह हाफिज लुईस के अॉपरेशन औरंगजेब के तहत कर रहा है । उसकी तैयारियों को सालों पहले से अंजाम दिया जा रहा था । चांदनी सिंह के कत्ल से लेकर अोमकार चौधरी के कत्ल तक मुस्तफा को हर जगह मैदान विल्कुल साफ मिला । सुरक्षा की इतनी पुख्ता तैयारियों के बावजूद उसे अपना काम करने में कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आई । तुम खुद इस बात के गवाह हो कि मिशन मुस्तफा में उसने किस सरलता से तुम्हें शिकस्त दे दी । क्या समझते हो तुम? क्यों हुआ ऐसा?"

" क्यों हुआ ?"

"शायद तुम अखलाक, मोहसिन, शमशाद, इस्माइल और सरजाना को भूल गए हो! ये वो दहशतगर्द सरगना हैं, जिन्हें बरसो पहले अलग-अलग मकसदों के साथ हिंदुस्तान भेजा गया था ओऱ आईबी सहित हमारी कोई भी खुफिया एजेसी आज तक उनमे से किसी के भी बारे में पता नहीं लगा पाई कि वे लोग हिंदुस्तान के किस कोने में छुपे बैठे है और क्या कर रहे है । मैं क्या कहना चाहता हूं तुम समझ रहे हो न होलकर? "

"जी हां । समझ रहा हूं ।"

"पाकिस्तान से आए चार दहशतगर्द चांदनी सिंह को किडनैप कर लेते हैं । अभी तक जिन बीबीआईपी के कत्ल हुए, उनकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था में रातोंरात इतने अंदर तक सेंध लगा दी जाती है । यह आनन-फानन में नहीं हो गया बल्कि मुस्तफा के लिए ये सारी तैयारियां पहले से ही की जा चुकी थीं । क्या अब तुम्हें यह भी बताना पडे़गा कि उन तैयारियों को किसने अंजाम दिया!"

होलकर को स्वीकार करना पडा़…"इस काम को अंजाम देने वाले जरूर वही पांचों दहशतगर्द हैं, जो सालों से हमारे मुल्क में पैर जमाए हुए हैं ।”

"क्या यह हमारी नाकामी नहीं है कि हम आज तक उन पांचों में से किसी का भी सुराग हासिल नहीं कर सके । अगर हमने यह कर दिखाया होता तो क्या अाज मुस्तफा हमारे मुल्क में यह खूनी खेल खेलने में कामयाब हुआ होता? जवाब दो ।।”

होलकर जवाब न दे सका ।

उसके पास बलवंत राव की बात का जबाब था भी नहीं ।

बलवंत राव ने काफी देर बाद सिगार का कश लिया और फिर कहता चला 'गया-“जाने दो । मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं ये सब बातें तुमसे क्यों डिस्कस कर रहा हूं । खैर, अब जब तुम आ ही गए हो तो बताओ तुम्हें मुझसे क्या जरूरी काम आ पडा?"

कुछ देर होलकर चुप रहा, जैसे फैसला न कर पा रहा हो कि अपनी बात कहाँ से शुरू करे । फिर बोला…"मेरा सवाल सीक्रेट सेल से सम्बंध रखता है सर । क्या मैं यह उम्मीद करूं कि सीक्रेट सेल से सम्बंध रखने वाले किसी सवाल का मुझे सही जवाब मिलेगा?"

" सीक्रेट सेल !!" बलवंत राव के कान खड़े हो गए । वह सीट पर सीधा होकर बैठ गया…“सीक्रेट सेल से सम्बंध रखने वाले किसी सवाल का तुम्हारे पास क्या काम ? और, सीक्रेट सेल के बारे में तुम जानते ही क्या हो?"

"केवल उतना जानता हूं जितना आमतौर पर जाना जाता है ।”

"क्या ?"

"कारगिल हमले, संसद पर हमले और मुम्बई हमले के बाद भारत की सरकार ने एक नए खुफिया आर्गेनाइजेशन के गठन का फैसला लिया था । उसका नाम "सीक्रेट सेल" रखा गया । वस्तुत: सीक्रेट सेल की स्थापना अमरीका के "सील कमांडो'' की तर्ज पर की गई थी, जो कि दुनिया की सबसे खूंखार कमांडो फोर्स है और जिसके कमांडोज को धरती, आकाश और समुद्र, तीनों जगह युद्ध करने का फौलादी प्रशिक्षण दिया जाता है । सच तो यह है कि सीक्रेट सेल पड़ोसी मुल्क की धूर्तता और दगाबाजी के खिलाफ़ भारत के अब तक के घैर्य का प्रतिफल थी । सीक्रेट सेल का चीफ आईबी के ही एक अधिकारी को बनाया गया था, उसका नाम दिनेश सिंह था ।"

“हुम्म ।" बलवंत राव ने नाक व मुंह से सिगार का ढेर सारा धुआं उगलकर हुंकार भरी । आंखें होलकर पर ही टिकी हुई थी ।

“सीक्रेट सेल में पुरुषों के साथ-साथ महिला एजेंटस भी थी ।" होलकर आगे बोला…“कहते है उनमें से हर सीक्रेट एजेंट के दिल में देशभक्ति का ऐसा जज्बा कूट-कूटकर भरा था जो अपने वतन की अान की खातिर धधकते ज्वालामुखी में भी छलांग लगाने से नहीं हिचकते थे । वह देशप्रेमियों के जुनुन का एक ऐसा उच्व सेन्य प्रशिक्षण प्राप्त संगठन था, जो सील कमांडो की तरह दुश्मन मुल्क के अंदर घुसकर अपने टार्गेट को ध्वस्त करने में यकीन भी रखता था और सक्षम भी था । अपने जन्म के अगले एक साल के अंदर उन सीक्रेट कमांडोज ने दुश्मन मुल्क के खिलाफ एक दर्जन से ज्यादा अभियानों को अंजाम दिया था और सीमा पार बैठे बीस से भी ज्यादा आतंकी सरगनाओं को ओसामा विन लादेन की तरह हलाक किया था और उनकी लाशें भी अपने साथ उठा लाए थे । सीक्रेट सेल की एक्टिविटीज ने समूचे दुश्मन मुल्क में ऐसा हाहाकार मचा दिया था कि दहशत का पर्याय बने आतंकी सरगना रात को अपने घर में सोते हुए भी थरनि लगे थे । उन पर यह दहशत सबार हो गई थी कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर सीक्रेट काण्डोज पता नहीं कब उनके सिरों पर प्रकट हो जाएंगे और उनकी लाश के साथ प्रेत की तरह गायब हो जाएंगे ।"

'उसके बाद?"

"सीक्रेट कमांडों से बलपूर्वक निबटने के पाकिस्तानी हुकूमत के जब सारे प्रयास बेकार हो गए तो बहां की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसअाई ने अपना शैतानी पंजा फैलाया और फिर कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी ।"

"क्या हुआ था?"

" सीक्रेट सेल का चीफ दिनेश सिंह बिक गया । कहते हैं कि उसने आईएसआई से एक वहुत बड़ी रकम लेकर अपने ईमान और देश की आन का सौदा कर लिया था । उसके बाद सिक्रेट सेल के जांबाज कमांडोज के कत्लेआम का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने रुकने का नाम ही न लिया । पाकिस्तान में कुछ गिरफ्तारियां भी हुई । ऐसे गिरफ्तार होने वालों में एक पांच सदस्यीय दल भी शामिल था । कहते है कि वह दल किसी अॉपरेशन दुर्ग के तहत उन दिनों इस्लामाबाद गया हुआ था । बहरहाल, यह देश के लिए किसी सदमे से कम नहीं था । रक्षक ही भक्षक बन गया था-शैतान वन गया था और उसने अपनी ही लगाई बगिया को बडी बेदर्दी से उजाड़ दिया था । लेकिन दिनेश सिंह का यह पाप ज्यादा दिनों तक छुप नहीं सका था । अंतत: वह पकड़ा गया । खास बात यह कि उसे पकड़ने वाला धनंजय नाम का, उसी का एक सीक्रेट कमांडो था ।"

"ओह !"

"धनंजय वह शख्स था सर, जिसका सीक्रेट सेल के निर्माण में वहुत बड़ा योगदान था । धनंजय और सीक्रेट सैल एक दूसरे के वगैर अधूरे थे । उसी ने हर सीक्रेट कमांडो को प्रशिक्षण देकर तैयार किया था, उनके अंदर फौलाद भरा था और हर सीक्रेट कमांडो को वह अपनी संतान समझता था । कहते है कि दिनेश सिंह की गद्दारी ने उसे पागल कर दिया था । जुनूनी तो वह पहले से ही था दिनेश सिंह को उसके आँफिस में घुसकर गोली से उड़ा दिया था और यूं एक व्यापक खुफिया संस्था का दुखद अंत हो गया था ।"
 
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